संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, वाईएस राजशेखर रेड्डी, जीएमसी बालायोगी, ओपी जिन्दल, विजय रूपानी, दोरजी खांडू जैसे और भी कुछ नेताओं की विमान दुर्घटना में हुई मौत की अत्यंत दु:खद श्रृंखला में एक नाम और जुड़ गया। महाराष्ट्र के कद्दावार राजनेता, समय के पाबंद उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती हवाई अड्डे के रनवे पर लैंडिग के दौरान घटी भयावह प्लेन दुर्घटना में मौत हो गई। उनके साथ विमान में सवार चार अन्य लोगों की भी जान चली गई। इस दर्दनाक दुर्घटना ने प्रदेश और देशवासियों को गमगीन और स्तब्ध कर दिया।
अजित पवार महाराष्ट्र के अत्यंत महत्वाकांक्षी नेता थे। जो मन में होता था उसे छिपाते नहीं थे। कभी-कभी तो वे ऐसा कुछ कह जाते थे, जो अशोभनीय होता था और सुनने वाला अवाक रह जाता था। उनकी स्पष्टवादिता किसी के लिए दंश तो किसी को सचेत करने वाली भी होती थी। किसी चुनावी मंच पर उन्होंने अपने चाचा शरद पवार पर इस शाब्दिक अंदाज में आक्रमण कर आपसी रिश्ते बिगाड़ लिए थे, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि शरद पवार हमारे लिए देवता हैं, लेकिन हर नेता का अपना समय होता है। अस्सी वर्ष की उम्र पार करने के पश्चात नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए या नहीं? मैं भी 60 वर्ष की उम्र पार कर चुका हूं। क्या हमें मौका नहीं मिलना चाहिए था? अगर मैं उनका बेटा होता तो यकीनन उन्होंने मुझे बेहतरीन अवसर दिया गया होता। चूंकि मैं उनका बेटा नहीं, इसलिए मेरी हमेशा अनदेखी होती रही है।’’ इसी अंदरूनी कड़वाहट के चलते ही जुलाई 2023 में भतीजे अजित पवार सभी को चौंकाते हुए अपने चाचा शरद पवार से अलग हो गए थे। राजनीति के चाणक्य माने जानेवाले शरद पवार को भतीजे का यह कदम अत्यंत आहत कर गया था, लेकिन तब उनके मन में यह विचार भी जरूर आया होगा कि जिसे मैंने राजनीति के दांव-पेंच सिखाए वही मेरे सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। दरअसल, राजनीति की यही रणनीति है। यहां कोई किसी का सगा नहीं। खून के रिश्तों की नसों में से कब खून गायब हो जाए और पानी समा जाए पता ही नहीं चलता। वैसे भी अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को अपनी विरासत सौंपने के लिए कुछ भी कर गुजरते आए राष्ट्रवादी कांग्रेस के संस्थापक शरद पवार अवसरवादिता की जगजाहिर मिसाल रहे हैं। उन्होंने उसी की जड़ें काटीं, जिन्होंने कभी उन्हें खाद पानी दिया था। यहां यह कहना भी गलत नहीं कि मतलब परस्ती और ‘जिधर दम उधर हम’ का मूलमंत्र अजित पवार ने उन्हीं से जाना और सीखा था। अजित पवार पर कितने-कितने भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। फिर भी वे सतत विधायक, सांसद, मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनते रहे। मतदाताओं को कैसे लुभाना है, अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को किस तरह से खुश रखना है और सत्ता की मलाई का भरपूर स्वाद कैसे लेते रहना है, इसमें यदि वे पारंगत नहीं होते तो विशाल प्रदेश महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की बलवती उम्मीद उनमें अंत तक रची-बसी नहीं रहती।
प्रदेश के इस धाकड़ नेता को सदा-सदा के लिए दुनिया छोड़े अभी तीन दिन ही हुए थे कि उनकी सांसद पत्नी सुनेत्रा पवार को प्रदेश की उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी गई। एक शोकग्रस्त पत्नी को राजनीति के धुरंधर खिलाड़ियों ने अश्रु बहाने तक की मोहलत नहीं दी। प्रदेश की सत्ता पर फटाफट उन्हें ऐसे विराजमान करवा दिया गया, जैसे कुर्सी को हथियाने वालों की भीड़ लगी हो या प्रदेश में पहली बार महिला को उपमुख्यमंत्री बनाने की राह में अड़चने डालने वालों के रातों-रात एकजुट होने का घातक खतरा मंडरा रहा हो। जिस तरह से उनके पति-परमेश्वर पर सिंचाई विभाग में अरबों-खरबों के संगीन घोटालों के आरोप लगते रहे, वैसे ही उन पर भी सहकारी बैंक के हजारों करोड़ रुपयों को आर-पार करने के दाग-धब्बे लगे हुए हैं। खुद को सही ठहराने के लिए सत्ताधीशों के पास बहानों और तर्कों की कमी नहीं होती, लेकिन आम भारतीयों की निगाह में तो यह राजसी ताजपोशी सत्ता की अथाह भूख में समाहित बेशर्मी ही है। हर किसी को चिंतित और दिल दहला देने वाली चार्टर प्लेन की दुर्घटना में पवार के सुरक्षा कर्मी, पायलट, को-पायलट तथा फ्लाइंग अटेडेंट की मौत से भी उनके परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस तरह से अजित पवार के कुछ सपने अधूरे रह गए, वैसे ही इन मृतकों की कई चाहतों ने भी दम तोड़ दिया। ड्यूटी के दौरान हुई इनकी मृत्यु को कुछ संवेदनशील भारतीयों ने शहादत का दर्जा देते हुए सोशल मीडिया में लिखा और चेताया कि इतिहास में राजा की मौत का तो भरपूर जिक्र होता है, उसे शहीद का दर्जा देने में भी देरी नहीं की जाती, लेकिन उनके रक्षकों और सेवकों को अपनी जान की कुर्बानी देने के बावजूद मान-सम्मान देने में नेता तो नेता, मुख्य धारा का मीडिया भी कंजूसी करता है। उन्हें ठीक से याद तक नहीं किया जाता। यह अलग बात है कि उन्हें दो-चार लाख की सहायता तथा भविष्य में उनके परिवार का ख्याल रखने के आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है। अजित पवार के निजी सुरक्षा रक्षक कांस्टेबल विदीप जाधव को उनके साथी अनुशासन, निष्ठा सतर्कता, ईमानदारी और वफादारी का प्रतिरूप मानते थे। दरअसल, विदीप जाधव ऐसे कर्मठ सिपाही थे, जिन्होंने कभी भी अपनी डयूटी घड़ी का कांटा देखकर नहीं की। अजित पवार को अपने इस अंगरक्षक पर अपार भरोसा था। कभी-कभार राजनीतिक यात्रा के दौरान अजित दादा उन्हें अपने घर का खाना तक अपने साथ बिठाकर खिलाते थे। जब जाधव के घर उनके नहीं रहने की खबर पहुंची तब उनकी पत्नी मायके गई हुई थी। मां को बेटे के कहे अंतिम शब्द बार-बार याद आ रहे थे कि शाम तक घर लौट आऊंगा। मां उसे घर के जिस दरवाजे तक छोड़ने गई थी उसे ही निहारती रही। जैसे उसे यकीन हो कि बेटा जरूर लौटेगा।
विमान की को-पायलट शांभवी पाठक की मार्च में शादी होने वाली थी। मां-बाप तो अपनी इस हंसमुख बेटी को खुशी-खुशी विदा करने के सपने देख रहे थे, लेकिन उन्हें बड़े भारी मन से उसकी अर्थी उठानी पड़ी। दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव स्थित शांभवी के नये घर में बस मातम सन्नाटा छाया हुआ था। घर की चमकती-दमकती दीवारें पूछ रही थीं कि एक होनहार पायलट की हौसले की उड़ान ऐसे कैसे थम गई? फ्लाइट अटेंडेंट पिंकी माली उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित भैरव गांव की रहने वाली थी। विमान हादसे के एक दिन पहले ही उसने अपने पिता को बताया था कि, पापा मैं अजित दादा के साथ बारामती जा रही हूं। उन्हें छोड़ने के बाद नांदेड़ जाऊंगी और होटल पहुंचते ही आपसे अच्छी तरह से बात करूंगी और इस यात्रा के अनुभवों के बारे में बताऊंगी, लेकिन वह कल नहीं आया। कभी आयेगा भी नहीं। पिंकी ने कुछ दिन पहले ही अपने भाई को बताया था कि, वीएसआर चार्टर विमान कंपनी के पायलट ज्यादा अनुभवी नहीं हैं। उनका व्यवहार भी ठीक नहीं है। पिंकी पिछले दो वर्षों से इसी कंपनी में काम कर रही थी। जिसके विमान ने दुर्घटनाग्रस्त होकर उसकी जिन्दगी की यात्रा पर दुखदायी विराम लगा दिया।
पायलट सुमित कपूर मूलत: दिल्ली के रहने वाले थे। उनके पास 16,500 घण्टों से अधिक का अनुभव था। यह भी सच है कि कैप्टन कपूर का रिकार्ड ठीक नहीं था। उन्हें सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने के कारण निलंबित भी किया गया था। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली एयरपोर्ट पर दिल्ली-बंगलुरु उड़ान से पहले वे ‘ब्रेथ एनलाइजर’ टेस्ट में शराब के नशे में धुत पाए गए थे। दूसरी बार दिल्ली से गुवाहाटी की उड़ान के दौरान वे फिर से नशे की हालत में ड्यूटी पर मौजूद पाए गए। दूसरी बार पकड़े जाने पर उनके प्रति सख्त रुख अपनाया गया और उन्हें तीन साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। किसी भी कमर्शियल पायलट के लिए 3 साल का सस्पेंशन करियर का अंत माना जाता है, लेकिन फिर भी उन्होंने पता नहीं कैसे वापसी कर ली और ‘वीएसआर वेंचर्स’ जैसे निजी ऑपरेटर कंपनी के साथ जुड़कर वीआईपी उड़ानें भरने लगे। ऐसे में प्राइवेट आपरेटर पर भी सवाल उठे जिसने एक विवादित ट्रैक रिकॉर्ड वाले पायलट को राज्य के उपमुख्यमंत्री की सुरक्षा सौंपी!

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