कई लोगों के मन में यह सवाल और विचार तो आता ही है कि जो देख नहीं सकते वे किताब और अखबार पढ़कर देश और दुनिया से कैसे रूबरू हो सकते हैं? राजस्थान के शहर जयपुर से बीते पच्चीस वर्षों से एक अखबार प्रकाशित होता चला आ रहा है, जिसने दृष्टिबाधितों को खबरों की दुनिया से अवगत कराते हुए बेहद मुश्किल लगने वाले काम को आसान कर दिखाया है। इस अखबार का नाम है ब्रेल समाचार पत्र, जिसका फायदा एक लाख से ज्यादा दृष्टिहीन उठा रहे हैं। इस पाक्षिक अखबार के संपादक के अनुसार ब्रेल समाचार पत्र ब्रेल लिपि में प्रकाशित भारत का पहला अखबार है, जिसे राजस्थान के अलावा असम, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश सहित 18 राज्यों में भेजा जाता है। अखबार के प्रकाशन का खर्च ‘राजस्थान दृष्टिबाधित कल्याण संघ’ उठाता है, जिसे दानवीरों से भरपूर दान मिलता है।
दरअसल, ब्रेल लिपि दृष्टिहीनों के लिए एक स्पर्शनीय लेखन प्रणाली है, इसमें उभरे हुए बिंदुओं (डॉट) का उपयोग करके अक्षर, संख्याएं और चिन्ह बनाये जाते हैं, जिन्हें उंगलियों से छूकर समझा और पढ़ा जाता है। यह कोई भाषा नहीं, बल्कि एक कोड है, जो विभिन्न भाषाओं (जैसे हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, गुजराती आदि) को लिखने में मदद करता हैं और नेत्रहीनों को साक्षर बनाता है। ब्रेन लिपि नेत्रहीन तथा कम दृष्टि वाले लोगों को न केवल पढ़ने-लिखने में मदद करती है, बल्कि व्याकरण, वर्तनी और लेखन की अन्य बारीकियों से भी परिचित कराती है, जिससे उन्हें समाज से काफी हद तक जुड़ने-समझने में सहायता मिलती है। ब्रेल लिपि को लुई बे्रेल ने बनाया था, जो कि स्वयं भी नेत्रहीन फ्रांसिसी लेखक थे। 1821 मेंउन्होंने जबइस लिपि काआविष्कारकिया, तब उनकी उम्र मात्र 15 वर्ष थी। अब यह लिपि दुनिया के लगभग सभी देशों में उपयोग में लाई जाती है।
गरीबी की वजह से कई लोग अपने सपने साकार नहीं कर पाते। पैसों की कमी उनके पैरों में बेड़ियां डाल देती है। धनवानों की संतानें शिखर छू लेती हैं और गरीबों के बच्चे सड़कों पर ऐड़िया रगड़ते देखे जाते हैं। अपने देश में लाखों बच्चे और युवा ऐसे हैं, जिन्हें यदि समय रहते मार्गदर्शन, साथ और सहायता मिल जाती तो वे भी मनचाही राह पर सफलतापूर्वक दौड़ते हुए अपने मां-बाप का नाम रोशन कर रहे होते। अभावों में पले-बढ़े पिपरिया निवासी रिटायर्ड फौजी निरंजन वैष्णव जब सेना में भर्ती हुए थे, तभी उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पैसों की तंगी की वजह से किसी का भविष्य अंधकारमय न हो, इसलिए नौकरी से रिटायर होने के पश्चात देश के युवक-युवतियों को सैनिक बनने की नि:शुल्क ट्रेनिंग देंगे। वर्ष 2021 में रिटायरमेंट के बाद फौजी निरंजन वैष्णव ने अपने संकल्प को साकार करने में किंचित भी देरी नहीं की। उनके मार्गदर्शन में 100 से ज्यादा युवा जहां सैनिक बनने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं 95 युवक-युवतियां अपने सघन परिश्रम की बदौलत आर्मी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, अग्निवीर तथा रेलवे पुलिस में अपनी कुशल सेवाएं देते हुए अपने परिवार का सहारा बने हुए हैं। परोपकारी, संवेदनशील और देशप्रेमी फौजी शिक्षण के दौरान एक खास मॉडल के अंतर्गत उत्साहित युवाओं शारीरिक और मानसिक तैयारी करवाते हुए कर्मवीर की तरह पसीना बहाने के लिए प्रेरित करते हैं। रोज सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक क्लास लगती है। इससे पहले सुबह 5.30 से 7.30 बजे तक फिजिकल ट्रेनिंग कराई जाती है। एक युवा दो से तीन साल जबरदस्त तैयारी करता है। उसकी एक-एक विषय पर कमांड हो जाती है। सिलेक्शन के बाद ज्वाइनिंग में पांच से आठ महीने लगते हैं। इस दौरान वह भी कोचिंग में आकर पढ़ाता है। इसके अलावा कुछ पूर्व सैनिक भी अलग-अलग विषयों पर तैयारी कराते हैं। कोचिंग के लिए पूर्व सैनिक एसोसिएशन द्वारा भी संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। इस अभूतपूर्व कोचिंग की नींव रखने वाले निरंजन वैष्णव कहते हैं कि, हमारे देश के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो बस सही प्रेरणा और मार्गदर्शन की जरूरत है। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। उनके दो छोटे भाई और एक बहन थी, जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी मां तथा उन्हें निभानी थी। मां लोगों के घरों में साफ-सफाई तथा अन्य मजदूरी के काम करती रहीं और उन्होंनेे ब्रेड, आइसक्रीम, अखबार और सब्जी बेचने के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखी। दसवीं की पढ़ाई के दौरान कष्टों तथा अड़चनों के सिलसिले के चलते ऐसा भी लगा कि पढ़ाई अधूरे में ही छोड़नी पड़ेगी लेकिन तब किसी देवदूत की तरह बाचावानी के शिक्षक अशोक पटेल ने कंधे पर सहायता का हाथ रखा और नि:शुल्क पढ़ाते हुए आर्थिक सहायता कर उनका मनोबल बढ़ाया।
अपने देश में कई ऐसे दुर्गम क्षेत्र हैं, जहां प्रभावी डॉक्टरी सेवाओं का अभी भी घोर अभाव है। सुलभ और समुचित इलाज उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण अनेकों आदिवासी वर्तमान में भी तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो चल बसते हैं। सुरक्षित प्रसूति के अभाव में अनेकों गर्भवती महिलाओं को अक्सर अथाह पीड़ा तो कई बार मौत का निवाला भी बनना पड़ता है। जंगली तथा पहाड़ी क्षेत्रों में डिग्री धारक डॉक्टर भी नहीं जाना चाहते। अधिकांश डॉक्टर तथा नर्से जनसेवा की बजाय अपनी सुख-सुविधाओं को अधिकतम महत्व देते हैं। ऐसे लोगों की भीड़ में जीवंत मिसाल बनकर उभरी हैं ‘अनीता परकीवार’ जो गोंदिया जिले के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही हैं। अभी तक अनीता परकीवार करीब 800 महिलाओं की सुरक्षित प्रसूति करवा चुकी हैं, जिसमें 98 प्रतिशत प्रसूतियां सामान्य पद्धति से सफलतापूर्वक हुई हैं। मूल रूप से गड़चिरोली की रहने वाली अनीता प्रारंभ से ही आदिवासी क्षेत्रों के गरीब, अनपढ़, अशिक्षित लोगों की समस्याओं से अवगत थीं, इसलिए उन्होंने भौतिक सुखों की चाह में महानगरों की तरफ भागने की बजाय समस्याओं से जूझते आदिवासी क्षेत्र को प्राथमिकता दी।
2004 में पिपरिया गांव में आशा कार्यकर्ता के तौर पर सेवा के दौरान उन्होंने गरीब आदिवासी महिलाओं को स्वस्थ रखने का दृढ़ निश्चय किया। अपने छोटे बच्चे के बावजूद उन्होंने गड़चिरोली में नर्सिंग के पाठ्यक्रम पूरे किए और 2016 में जमाकुडो स्वास्थ्य उपकेंद्र में संविदा स्वास्थ्य सेविका के रूप में नियुक्त हुईं। हिम्मती और साहसी अनीता 11 गांवों की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ 15 और गांवों की अतिरिक्त जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभाल रही हैं, क्योंकि वहां पर कोई हेल्थ वर्कर नहीं है। उनकी अपार निस्वार्थ सेवा भावना का ही प्रतिफल है कि गरीब आदिवासी महिलाएं उन्हें अत्यंत सम्मान देती हैं और ईश्वर का सच्चा दूत मानती हैं।
पहल, प्रेरणा और त्याग ही बदलाव के जन्मदाता हैं। इसे एक बार फिर से सच कर दिखाया है, नागपुर के बीचोंबीच बसी रहाटे नगर की एक बस्ती की कुछ महत्वाकांक्षी और जुनूनी लड़कियों ने। इन्होंने न सिर्फ अपनी जिन्दगी बदली, बल्कि समाज के सोचने के नजरिये को भी बदल डाला। यहां की किसी महिला को बीते सौ सालों में शिक्षा की रोशनी नसीब नहीं हुई थी। गरीबी, उपेक्षा और बदहाली के चलते लोगों के घरों के बर्तन साफ करना, झाडू लगाना, कचरा चुनना और भीख तक मांगने को मजबूर होना तो जैसे उनका मुकद्दर बन चुका था, लेकिन कुछ दिन पूर्व अखबारों में क्रांतिकारी खबर पढ़ने में आयी। रहाटे नगर की तीन बेटियों ने लोगों के मन-मस्तिष्क की स्लेट पर लिखी इस इबारत, ‘बेटे तो कर सकते हैं, लेकिन बेटियां नहीं कर सकती’ को झुठलाते और मिटाते हुए बीए, बीकाम और बीएससी की डिग्री हासिल की तो पास और दूर के लोगों को अपनी धारणा बदलनी पड़ी। कभी यह बेटियां अन्य लड़कियों की तरह कचरे के ढेर में अपना भविष्य तलाशती थीं। हाथ में कटोरा थामकर भीख मांगते हुए लोगों की उपेक्षा और तिरस्कार को झेलती थीं। आजादी के बाद यह पहली पीढ़ी है, जिसने ग्रेजुएशन किया है। इस प्रेरणादायी परिवर्तन के पीछे सेवा सर्वदा संस्था की वर्षों की जागरूक मेहनत है। लगभग बीस वर्षों से यह संस्था रहाटे नगर जैसे पिछड़े इलाकों में शिक्षा, जागरुकता और सामाजिक उत्थान के लिए सतत कार्यरत है। संस्था ने इन बेटियों की शिक्षा के प्रति अभिरुचि प्रबल इच्छा और हिम्मत को देखते हुए स्कूल तथा कॉलेज भेजने का प्रबंध करते हुए कदम-कदम पर साथ-सहायता और मार्गदर्शन किया। भीख मांगने तथा कचरा चुनने से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर तय करने वाली इन कर्मठ लड़कियों की देखा-देखी बस्ती की और भी कई लड़कियों, बंदिशों को तोड़ते हुए परिवर्तन के महासंकल्प के साथ पढ़ने-लिखने के लिए स्कूल तथा कॉलेज जाते हुए दूसरों के लिए प्रेरणा की अलख जगाने लगी हैं...।
