जैसे मैंने सुना वैसे आपने भी कभी न कभी अल्ताफ राजा का वर्षों पहले गाया हर दिल को छू लेने वाला दर्दभरा यह गीत अवश्य सुना होगा,...
‘‘तुम तो ठहरे परदेसी
सुबह पहली गाड़ी से
घर को लौट जाओगे!
जब तुम्हें अकेले में
मेरी याद आएगी
आंसुओं की बारिश में
तुम भी भीग जाओगे...’’ इस सदाबहार गीत की रचना की थी गीतकार ज़हीर आलम ने जो एक भावुक और प्रचार तंत्र से दूर रहने वाले इंसान थे। गरीबी में पले-बढ़े ज़हीर आलम नागपुर में जन्मे थे। बचपन से ही गज़लें और कविताएं ज़हीर आलम को आकर्षित करने लगी थीं। पार्श्वगायक और उम्दा कव्वाल अल्ताफ राजा भी नागपुर की पैदाइश हैं। उनके पिता इब्राहिम इकबाल और मां रानीरूप लता दोनों उस दौर के मशहूर कव्वाल थे। छठवें और सातवें दशक में देश में रात-रातभर जागकर कव्वालियां खूब सुनी जाती थीं। जिस तरह से कवि सम्मेलनों में छाये रहने वाले कवियों के लोग दीवाने थे, वैसे ही कुछ कव्वाल देशवासियों के जबरदस्त चहेते थे। दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली का भी तब गजब का जलवा था। तब टीवी और मोबाइल का आगमन हुआ नहीं था इसलिए लोग फिल्मों, कवि सम्मेलनों तथा कव्वाली से मनोरंजन करते थे। दरअसल वो समय दिल को छूने वाले गीतों, कविताओं और शायरी के नाम था। आज भी पुराने फिल्मी गीत जो सुख-सुकून देते हैं, नये गाने उनके करीब कही नहीं ठहरते।
‘‘तुम तो ठहरे परदेसी...’’ गीत को गाकर अल्ताफ राजा ने जहां अपार धन और नाम कमाया, वहीं ज़हीर आलम को इस कालजयी गीत को लिखने के बदले मात्र तीन हजार रुपए मिले थे। हालांकि उस समय इतने रुपये भी खासी अहमियत रखते थे। महीनेभर तक खून पसीना बहाने पर जिसे हजार-बारह सौ रुपए नसीब होते हों, उसे महज एक गीत के मेहनताने के तौर पर इतने रुपयों का मिलना अचानक लॉटरी के खुलने जैसा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कलम का जादूगर कपड़ा मिल में काम करता था। तब नागपुर में स्थित एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल में हजारों मजदूर काम करते थे। जब कपड़ा मिलों पर ताले लग गए, तब दूसरे मजदूरों की तरह इस गीतकार को भी महीनों भूख, प्यास और आर्थिक तंगी से लड़ते हुए वर्षों झोपड़ीनुमा घर में रहना पड़ा। इसी महीने छियासी वर्ष की उम्र में नागपुर में स्थित मोमिनपुरा में उनकी मौत हो गई। जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया में गूंजी और अखबारों में छपी, तब अधिकांश शहरवासियों को पता चला कि जिस गीत ने असंख्य लोगों को अपना दिवाना बनाते हुए कैसेट्स कंपनियों और गायक को करोड़ों की कमाई करवाई, उसका रचयिता संतरानगरी में गुमनामी और कंगाली में दिन काटते हुए किसी तरह से भूखा-प्यासा जीता रहा। उसने अपने होने की किसी को खबर ही नहीं होने दी और न ही किसी ने उसकी खबर ली। दरअसल, ज़हीर आलम एक खुद्दार किस्म के गीतकार थे। उन्होंने कभी ढिंढ़ोरा नहीं पीटा कि कालजयी गीत ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ उनके दिल-दिमाग की देन है। इसी गाने ने गायक अल्ताफ राजा को घर-घर पहुंचाया। इसमें कोई शक नहीं कि अल्ताफ को रोमांटिक और दर्दभरे गाने गाने में महारत हासिल थी लेकिन इस गीत ने तो जैसे उन्हें जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि आज भी उन्हें उनकी सदाबहार एल्बम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जाना जाता है।
‘‘कोई दीवाना कहता है,
कोई पागल समझता है,
मगर धरती की बेचैनी को
बस बादल समझता है।
मैं तुझसे दूर कैसा हूं,
तुम मुझसे दूर कैसी है,
ये तेरा दिल समझता है
या मेरा दिल समझता है।’’
बताने की जरूरत है नहीं कि यह किस हस्ती की लिखी पंक्तियां हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह कुमार विश्वास सिर्फ कविताओं और गज़लों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि धार्मिक प्रवचनकर्ता के तौर पर भी उन्होंने खूब धाक जमायी थी। अपनी शाब्दिक कलाकारी से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों की गहराई में जाकर हर वर्ग के भारतीय जनमानस में जो प्रेरक रस घोला है, वह भी यकीनन अद्भुत है।
अपने प्रभावी अंदाज और सुरीली आवाज से सम्मोहित करने वाले कुमार विश्वास ही ऐसे इकलौते गीतकार, गज़लकार हैं, जिनके गीत युवाओं के साथ-साथ उम्रदराजों के मन-मस्तिष्क में भी बसे हैं। जब कुमार देशी-विदेशी मंचों पर गीत-गज़ल सुनाना प्रारंभ करते हैं तो लोग झूम-झूमकर उनके साथ सुर से सुर मिलाते हुए गाने लगते हैं। डॉ. कुमार खासतौर पर प्रेम, श्रृंगार, देशभक्ति और जीवनदर्शन पर आधारित गीत, गज़ल और कविताएं लिखते हैं। श्रोताओं को अथाह देशभक्ति के रंग में रंग देने वाला उनका गीत, ‘हाथ में तिरंगा हो’ तो बार-बार सुना और सुनाया जाता है। अपनी वाकपटुता और ज्ञान के भंडार की बदौलत एकदम अलग और खास मुकाम बनाने वाले कुमार कवि सम्मेलनों और रामकथा के लिए लाखों रुपए की फीस वसूलते हैं। वैसे यह करिश्मा किसी चमत्कार की देन नहीं, अपितु उनके अथक परिश्रम और विविध कलाओं के सार्थक प्रदर्शन का प्रतिफल है। फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर, उद्योगपति और विभिन्न कारोबारी जब कमाते हैं तो अपनी सभी चाहतों को भी पूरा करते हैं। आम जनता और सच्चे साहित्य प्रेमियों के लाड़ले इस कवि ने कभी अपनी कमाई नहीं छिपाई। इस बहुआयामी शख्सियत ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दिल्ली से लगे आधुनिक नगर नोएडा में आलीशान बंगला बनवाया है। इसके दरवाजे भी सभी के लिए खुले रखे हैं। यह विशाल बंगला किसी महानगर में स्थित फाइव स्टार होटल जैसा ही है, जहां पर पांच सितारा कमरे, स्विमिंग पूल, जिम, स्टीम रूम, स्पा सेंटर, थिएटर और सजने-धजने के लिए सैलून से लेकर और भी बहुत सी ज्ञात-अज्ञात सुविधाएं हैं। खास बात यह भी है कि कवि महोदय चांदी के बर्तनों में खाना खाते हैं। महंगी से महंगी कई आधुनिकतम कारों के मालिक कुमार विश्वास के मौज़ मज़े से जीने और रहने की खबर जब पूरी तरह से बाहर आई तो सोशल मीडिया के साथ-साथ उनकी बिरादरी के लोग भी भौचक्के रह गए। उनके अनुसार, प्रेम-कविता और रामकथा कहने वाले प्रवचनकार को तो सरलता, सहजता और मिट्टी से जुड़े होने का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था लेकिन यह तो हर दर्जे का आराम परस्त ढोंगी और मौज़ मजे का गुलाम निकला। दूसरों को भगवान राम की तरह बनवासी और संतोषी होने का पाठ पढ़ाने वाला चार्टर प्लेन की यात्राएं और चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग का मजा लूट रहा है! यह तो उन आस्थावानों के साथ सरासर छल, कपट और धोखा है, जो इसके प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से दौड़े चले आते हैं। जिन्हें गीतकार के चांदी के बर्तनों में खाना खाने पर आपत्ति है, उन्हें पता होना चाहिए कि मुंबई के सबसे पॉश इलाके अल्टामाउंड रोड में स्थित अपने 27 मंजिला घर ‘एंटीलिया’ में रह रहे मुकेश अंबानी तो सोने के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। उन पर ऐतराज की उंगलियां उठाने की किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई है।
दरअसल, हमारे यहां साहित्यकार, कलाकार होने का मतलब ही है, गरीबी और बदहाली से जूझता टूटता-फूटता आंसू बहाता इंसान। यह धारणा बना ली गई है कि यदि कोई शख्स, कवि, गीतकार और पत्रकार है तो उसका धन से क्या काम? यदि कोई कलाकार धनपति है, तो कहीं न कहीं वह भ्रष्टाचारी और बेइमान ही होगा। ईमानदारी से तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है। यही वजह है कि विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाले अधिकांश लोग गरीब की छवि के कैदी बनकर रहना पसंद करते हैं। भले ही उनकी परवरिश धन की बरसात और सुख-सुविधाओं के बीच हुई हो लेकिन वे यही प्रचारित करते नहीं थकते कि उन्होंने गरीबी, बदहाली और भुखमरी को बहुत करीब से देखा और भोगा है। उनका यह झूठ उन लोगों को बहुत राहत और संतुष्टि प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में खुद कुछ नहीं कर पाए। जहां से चले थे वहीं के होकर रह गए। उन्हें शून्य से उठे लोगों की तरक्की से जलन होती है। यह भी सच है कि नामचीन हस्तियों की गरीबी और बदहाली की काल्पनिक कहानियां न जाने कितनों की बर्बादी का सबब बनती चली आ रही हैं। कई ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जो साहस और परिश्रम की सीढ़ियों पर पैर रख बहुत ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे हवा-हवाई महानुभावों का अनुसरण करना नहीं छोड़ा जो अपने खोखले दिखावटी उसूलों का परचम लहराकर दूसरों की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं। खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले इन आत्ममुग्धों के बाल-बच्चे अशिक्षित, अधनंगे रहकर भूख से तड़पते-कलपते रहते हैं लेकिन यह तथाकथित सिद्धांतवादी होश में आने का नाम ही नहीं लेते।
