चित्र : 1. यह कितनी हैरान और परेशान कर देने वाली खबर है कि एक खरबपति ने गोली मारकर खुद का काम तमाम कर दिया। गरीबों, असहायों, बेरोजगारों, अशिक्षितों और बीमारों की खुदकुशी की खबरें तो एक बारगी समझ में आती हैं, लेकिन जिस रईस के पास खुद का प्राइवेट जेट, बारह रोल्स रॉयस कारों के साथ-साथ और पचासों महंगी से महंगी लग्जरी कारें, आलीशान बंगले, फार्म हाउस और अरबों-खरबों की कमायी वाले उद्योग धंधे हों वो आत्महत्या कर इस दुनिया से चलता बने तो माथा ही घूम जाता है। बेंगलुरु के विख्यात रियल एस्टेट टाइकून और कॉन्फिडेंट ग्रुप के चेयरमैन ने जिस वक्त खुद को गोली मारी तब उसके कारोबारी ठिकानों पर इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी चल रही थी। उद्योगपतियों, व्यापारियों, तरह-तरह के कारोबारियों के यहां आयकर के छापे पड़ना कोई नई और अजूबी घटना नहीं। ऐसा भी नहीं कि सीजे रॉय के यहां आयकर के अधिकारियों ने पहली बार दबिश दी होगी। उनसे कैसे निपटा जाता है, इसका भी ‘गुरुज्ञान’ उसे रहा ही होगा।
आजकल के भागा-भागी के दौर में सी.ए. यानी चार्टर्ड अकाउंटेंट की दिमागी कलाकारी बड़े-छोटे हर उद्योगपति की लगभग हर समस्या का चुटकी बजाते हुए समाधान कर देती है। कौन नहीं जानता कि सीए और अधिकारियों की सेटिंग का चोली दामन का साथ क्या-क्या गुल खिलाता है और काले धंधे वालों का भी बिगड़ा काम संवर जाता है। ऐसा भी नहीं कि बगैर मेहनत के सीजे रॉय पर दौलत बरसी थी। बचपन उसका गरीबी में बीता था। उसने तभी धनपति बनने की राह पकड़ने की ठान ली थी। उसकी महत्वाकांक्षा और मनोबल को उजागर करते कई किस्से उसकी मौत के बाद पढ़ने-सुनने में आते रहे।
जब वह मात्र 13 वर्ष का था, तब वह बेंगलुरु में स्थित एक विशाल कार के शोरूम में ‘डॉल्फिन’ कार को ऐसे देखे जा रहा हो जैसे उसे खरीदने के लिए पहुंचा हो। शोरूम के सेल्समैन ने उसे यह कहकर चलता कर दिया था कि, ‘‘चल भाग यहा से। कार को ऐसे घूर रहा है, जैसे कोई बड़ा धनवान खरीददार हो। पहले अपनी उम्र और औकात तो देख। फौरन चल निकल यहां से।’’ खेलने-कूदने की उम्र में अपमान की चोट खाये स्वाभिमानी बच्चे ने तभी ठान लिया था कि एक दिन वह दुनिया की एक नहीं कई महंगी से महंगी आलीशन कारें खरीदेगा और इस जैसे बदतमीज सेल्समैन देखते रह जाएंगे। 36 वर्ष की उम्र में बिना किसी बैंक से एक पैसा उधार लिए प्राइवेट जेट खरीदने वाले रॉय के यहां अभी भी दो सौ से ज्यादा लग्जरी कारें खड़ी हैं। उसका नाम देश की सबसे महंगी कारों के मालिक तथा सबसे बड़े गैरेज वाले रईसों में शामिल है। रॉय को फिल्में बनाने का भी शौक था। उसकी बनायी चार मलयालम फिल्में विभिन्न सिनेमाघरों में अभी भी दर्शकों का मनोरंजन कर रही हैं, लेकिन वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। खुद को खून से लथपथ कर खत्म करने वाले रॉय की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। उसकी पत्नी, बेटा और बेटी दुबई में रहते थे। वह अकेले ही अपने व्यापार के साम्राज्य को बढ़ाने में लगा था। उसने धन तो कमाया, लेकिन करीबी रिश्तों के मामले में गरीब होता चला गया। बचपन वाला साहस और मनोबल भी पीछे छूट गया। वैसे भी धन का अंबार धीरे-धीरे इंसान को अपना गुलाम बना लेता है। अपने साम्राज्य के छिनने और बर्बाद होने का भय सोचने-विचारने की शक्ति भी छीन लेता है।
चित्र : 2. चमकते-दमकते नगरों, महानगरों में रहने की चाह के चलते भारत के गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। अधिकांश युवा गांव में रहकर खेती-बाड़ी या व्यापार करने की बजाय शहर में छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसते नज़र आते हैं। गांवों की आबोहवा उन्हें रास ही नहीं आती। शहरों में निरंतर बढ़ती आबादी को संभालने के लिए शासन और प्रशासन को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। मुंबई जैसे महानगरों में दूसरे प्रदेशों से आने वाले लोगों पर विराम लगाने की मांग किसी से छिपी नहीं है। मायानगरी मुंबई, देश की राजधानी दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, गुरुग्राम जैसे भौतिक सुविधाओं से परिपूर्ण नगरों का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि भीड़ निरंतर खिंची चली आ रही है। हर किसी को कहीं भी रहने और मन की करने की आज़ादी है। वैसे भी आज के इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील हिंदुस्तान में कोरोना के पश्चात अधिकांश भारतीयों की सोच में अभूतपूर्व बदलाव आया है। लोग अब धनसंचय में कम और खर्चने में अधिक विश्वास करने लगे हैं। जब सामने सुख-सुविधाओं का अंबार लगा है तो मन मसोस कर क्यों जीना? आज हैं कल का क्या भरोसा? ऐसे सुविधाभोगी काल में कुछ हकीकतें पैरोंतले की जमीन खींचती लगती हैं।
अपने ही देश के प्रदेश तेलंगाना के अश्वरावुपेटा मंडल में स्थित घने जंगलों की एक ऊंची पहाड़ी पर मात्र एक आदिवासी परिवार अकेला रहकर बहुत खुश और संतुष्ट है। पच्चीस वर्षों से घने जंगल में अपने अंदाज से आनंदमय जीवन जीते इस परिवार के मुखिया गुरुगुंटला रेडैया, उसकी पत्नी लक्ष्मी और पुत्र गंगिरेड्डी को प्रशासन ने अनेकों बार पहाड़ी से नीचे आकर रहने को कहा, लेकिन वे नहीं माने। स्वच्छ पानी, बिजली, अस्पताल, शिक्षा, फोन जैसी सुविधाओं के प्रति इच्छा और रुचि नहीं रखने वाला तीन सदस्यों का यह परिवार लोगों के बीच जाने से भी कतराता है। हां, लक्ष्मी जरूर कभी-कभार पहाड़ के नीचे चली जाती है, जहां पर उसकी बेटी की ससुराल है। लक्ष्मी ने बताया कि उनके कुल 9 बच्चे हुए थे, जिनमें से सात की मौत हो गई। अब तो केवल बेटा और बेटी ही बचे हैं। लक्ष्मी अपने पति और बेटा-बेटी को अपनी जान से ज्यादा चाहती है। उसका कहना है कि मेरे पति जहां रहेंगे, मैं भी वहीं रहूंगी। बेटा भी अपने माता-पिता के साथ रहने, जीने-मरने की ठाने है। पत्रकारों ने गुरुगुंटला और उसकी पत्नी लक्ष्मी से जब जानना चाहा कि क्या उन्हें घने जंगल में जंगली जानवरों का भय नहीं सताता तो लक्ष्मी तुरंत बोल पड़ी कि दिन में तो सूरज होता है और रात में चांद और तारे। जब बहुत सर्दी पड़ती है, तब हम अलाव जलाते है। यहां हर तरह की सूखी घास मिल जाती है, जिसे जलाते ही अंधेरा और सर्दी दोनों भाग खड़े होते हैं। कोई जानवर भी आसपास नहीं आता। हम तो बड़े मजे से यहां पर चावल और बाजरा के साथ-साथ सब्जियां उगाते और खाते हैं। पास की नदी से पीने का पानी भी मिल जाता है। यहां जंगल में उनकी खुद की पांच झोपड़ियां हैं। तीनों के रहने के लिए अलग-अलग झोपड़ी है। कुत्ते और मुर्गियों के लिए एक तो लकड़ी-जलावन को बारिश से बचाने के लिए एक अलग झोपड़ी है। उनका बेटा गंगिरेड्डी अनपढ़ है। अभी तक उसने शादी नहीं की है। यदि कोई मनपसंद लड़की उनके साथ पहाड़ पर आकर रहने को तैयार होगी, तभी वह उससे ब्याह करेगा।
इस पहाड़ी के घने जंगल में कभी एकसाथ 40 आदिवासी परिवारों का बसेरा था। प्रशासनिक अधिकारी वर्षों तक उन्हें आधुनिक संसार के बारे में बताते और समझाते रहे कि यहां जंगल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना संभव नहीं है। इसलिए उन्हें पहाड़ी से तीन किलोमीटर नीचे आना ही होगा। यहां पर बिजली, पानी और बच्चों की शिक्षा तथा सभी के लिए चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी। अंतत:, अधिकारियों की वर्षों की मेहनत रंग लाई। उन 40 परिवारों में से 39 परिवार मान गए। सभी के लिए पहाड़ी की तलहटी में बसाई गई सर्व सुविधायुक्त पुनर्वास कॉलोनी में रहने की व्यवस्था कर दी गई। पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं। यह इकलौता परिवार तब भी नहीं माना था और आज भी अपनी जिद पर कायम है। नीचे आकर रहने वाले कई परिवारों के बच्चे अब पढ़-लिखकर प्राइवेट और सरकारी नौकरी कर मजे से रह रहे हैं, तो कुछ अपने निजी व्यवसाय को शिखर पर पहुंचाने का प्रेरक इतिहास रच रहे हैं।
चित्र : 3. हर आदमी, औरत की तमन्ना होती है कि उनका अपना घर हो। जहां वे सर्दी, गर्मी, बरसात और आंधी-तूफान से सुरक्षित बचे रहें। ऐसे घरों की कल्पना ही डरा देती है, जिनमें छत, दरवाजे और दीवारें नदारद हों। यहां तक कि कोई तय शुदा पता तक न हो। अपने ही देश में कई लोग खुले आकाश के नीचे जीने-मरने को विवश हैं। बहुत ही कम भारतीय इस सच से वाकिफ होंगे। दरअसल, ऐसी खबरें उन तक पहुंचती ही नहीं या वे इस हकीकत से रूबरू ही नहीं होना चाहते कि रोटी, कपड़ा और मकान के लिए हमारी ही तरह इस धरती पर जन्में इंसानों को कैसे-कैसे संघर्ष करने पड़ रहे हैं। आंध्रप्रदेश के पोलावरम जिले में स्थित सबरी नदी पर कुछ परिवार कई सालों से नावों में रह रहे हैं। ये मेहनतकश 11 मछुआरों का परिवार है, जिन्होंने नाव केऊपर तिरपाल लगा रखी है। उसके नीचे अलमारियां और चावल के बक्से हैं। तेल, साबुन, सब्जी और सभी घरेलू सामान व्यवस्थित ढंग से बिल्कुल वैसे ही रखे हुए हैं, जैसे हम और आप अपने सजे-धजे घरों में रखते हैं। नाश्ता, खाना-पीना, सोना-जागना सब इनका नाव पर ही होता है। इन्हीं नावों पर ही जन्में बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं। कुछ स्कूल भी जाने लगे हैं।
जीविकोपार्जन के लिए अपने गृहनगर से 130 किलोमीटर दूर रहने को मजबूर यह लोग दिन-रात मछली पकड़ने के अभ्यस्त हैं। कभी-कभी किसी-किसी परिवार को मछली पकड़ने के लिए हफ्तों तक अलग जगह पर रहना पड़ता है। उन्हें भले ही दिन में मछली पकड़ना अच्छा लगता है, लेकिन जब अंधेरा हो जाता है तो नावों में बच्चे डर जाते हैं। दूर से आती लोमडियों की आवाजें उनका दिल दहलाती हैं। मछली पकड़ने के लिए गए मां-बाप का इंतजार करते बच्चे धीरे-धीरे सर्दी, गर्मी और बरसात की मार सहने के भी आदी हो गये हैं। रात को अचानक बीमार पड़ने पर भगवान भरोसे रहना पड़ता है। एक मां का कहना है कि हम अपने बच्चों को अपने जैसा नहीं बनाना चाहते। भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन उनकी पढ़ाई में व्यवधान नहीं होने देंगे। हमारे बुजुर्गों ने हमे नाव दी। हम बच्चों को बेहतर जिन्दगी देने की कोशिश कर रहे हैं। मछुआरे अपनी नाव को मंदिर मानते हैं। नावों के नाम भी हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर रखे गए हैं। नाव पर रखे तुलसी के पौधे की किसी बच्चे की तरह देखरेख करते हुए उसे मुरझाने नहीं दिया जाता। नाव पर चप्पल नहीं पहनते। नंगे पैर रहते हैं।
