जब कोई अपराधी समाज के लिए आतंक का पर्याय और पुलिस के लिए सिरदर्द बन जाता है तो समाज उससे नफरत और पुलिस उसका एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती। यह भी सच है कि हर डाकू, चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी का भी अपना परिवार होता है। ऐसे यार दोस्त भी होते हैं, जो हर हाल में उसके शुभचिंतक होते हैं। मां-बाप, पत्नी और भाई-बहन के मन में उसके प्रति कहीं न कहीं सद्भावना और स्नेह की ऐसी नदी बहती रहती है, जो आसानी से नहीं सूखती। वे उसे निर्दोष मानने का जो भ्रम पाले रहते हैं वो अंत तक कायम रहता है। जगजाहिर घोषित अपराधी को सज़ा मिलने पर ऐसे करीबी अपनों का चेहरा उतर जाता है और वे कानून व्यवस्था को भी कोसते देखे जाते हैं। हमारे समाज में यदि अपवाद न हों तो सबकुछ एकतरफा लग सकता है। ऐसे ही अपवाद हैं हाजीपुर के एक पिता, जिन्होंने अपने खूंखार अपराधी बेटे के पुलिसिया एनकाउंटर पर न केवल भरपूर खुशी दर्शायी, बल्कि पुलिस को धन्यवाद के साथ शाबाशी भी दी। दो लाख के इनामी कुख्यात अपराधी प्रिंस ने गलत संगत में बचपन से अपराध की राह चुन ली थी। प्रिंस ने वर्ष 2011 में अपने ही दादा को चाकू मारकर घायल कर दिया था। कालांतर में भी उसने कई झगड़े-फसाद किये और जेल जाना-आना लगा रहा। जेल में रहने के दौरान उसका कुछ खूंखार अपराधियों से करीबी जुड़ाव हुआ तो बाहर आने के बाद वह बेखौफ होकर लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को अंजाम देने लगा। यहां तक कि 2018 में हाजीपुर जेल में बंद रहने के दौरान कुख्यात अपराधी मनीष की हत्या में भी उसका नाम गूंजा था। प्रिंस को उसके माता-पिता ने सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वह अंत तक नहीं सुधरा। उलटे उसने देश के कई राज्यों में लूट और हत्या का ऐसा नेटवर्क बनाया कि पुलिस के लिए भी अपार सिरदर्द बन गया। लोगों के तानों से परेशान घरवालों ने ईश्वर से प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी कि इस शैतान का किसी भी तरह से अब अंत ही हो जाए। उन्होंने पुलिस से भी प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी, इस बेलगाम शैतान को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा कर सुधारो या फिर मार गिराओ। बीते माह जब गोलियों की बौछार से पुलिस ने उसका हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा कर दिया तब पिता के यही शब्द थे, ‘पुलिस ने जो किया वो एकदम सही है। जितने भी ऐसे दरिंदे हैं उन्हें भरे चौराहे पर गोली से उड़ा देना चाहिए।’ अन्य परिजनों ने भी पुलिस की सराहना करते हुए बार-बार नतमस्तक होकर धन्यवाद की झड़ी लगा दी।
नक्सलियों ने राष्ट्र को कितनी हानि पहुंचायी है, कितने घर उजाड़े हैं, कितने-कितने मां-बाप के सपनों को रौंदा है इसका हिसाब लगाना असंभव है। जिन आदिवासी इलाकों में सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार और संपूर्ण विकास की धारा बहाने के लिए प्रयत्नशील रही, वहीं शीर्ष नक्सली अनेकों वर्षों तक अड़ंगा बने रहे। अनपढ़ आदिवासियों को पिछड़ेपन और असमानता के जाल से बाहर ही नहीं निकलने दिया। नक्सली नेताओं ने असंख्य युवक-युवतियों को बरगला कर नक्सली बनाया और खुद के बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए भेजा। महानगरों में कोठियां खड़ी कीं, कारों की कतार लगाकर दुनियाभर के सुख भोगे। इसकी जो हकीकत है उस पर कई उपन्याय लिखे जा सकते हैं। बीते समय की सरकारें तो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरी तरह से नक्सलियों का खात्मा नहीं कर पाईं, लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पूरे मन से प्रतिज्ञाबद्ध ही नहीं काफी हद तक सफल होती दिखायी दे रही है। वर्षों पुराना आतंकी आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा है। अधिकांश नक्सली कमांडरों के हौसले पस्त किये जा चुके हैं। यही वजह है कि अनेकों इनामी नक्सली अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर चुके हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें भी हथियार डालने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ माह पूर्व भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणु गोपाल ने अपने 60 साथियों सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव के चलते दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवुजी ने भी हथियार डाल दिए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय बने देवुजी ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री धर्मराव आत्राम का अपहरण कर उन्हें 17 दिन तक बंधक बनाकर रखा था। इस हैवान ने कितने नेताओं तथा जवानों की जान ली, उसका संपूर्ण लेखा-जोखा किसी भी सजग भारतीय का खून खौला सकता है। ऐसे दरिंदो की मौत तो कोई भी चाहेगा। देवुजी पर 1.25 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। जब उसे लगा कि अब तो कभी भी उसे टपकाया जा सकता है, तो उसने आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। वैसे भी जान तो सबको प्यारी होती है। फिर भी सरकार उन्हें आत्मसमर्पण का मौका दे रही है। इसके लिए उन्हें तथा उनके परिजनों को सरकार का अहसानमंद होना ही चाहिए। एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जंगलों से तो नक्सलियों का शीघ्र सफाया हो ही जाएगा, लेकिन अर्बन नक्सलियों को कब और कैसे दबोच कर जेलों में डाला जाएगा जो वर्षों से सफेदपोश होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी का नकाब ओढ़े हैं। यही चेहरे तथाकथित क्रांतिकारी, कवि, संपादक, प्रोफेसर, कथाकार और समाजसेवक आदि के चोले में नक्सलियों को पालते-पोसते आ रहे हैं तथा कई भयावह खूनी हमलों के मास्टरमाइंड भी हैं।
माड़वी हिडमा। हां यही नाम था उसका, जिसने सोलह वर्ष की उम्र में जंगलों में हथियार थाम कर भटकने की ठान ली थी और कई वर्ष तक खून-खराबा करता रहा। हिडमा के दिल-दिमाग में शहरी नक्सलियों ने यह भर दिया गया था कि नक्सली गरीबी, शोषण और असमानता के खात्मे के लिए कटिबद्ध हैं। वे तब तक सरकारों के खिलाफ हथियार उठाये रहेंगे, जब तक चारों तरफ समानता और खुशहाली नहीं आ जाती। उसे नक्सली कमांडरों के वास्तविक चरित्र का पता ही नहीं था। दरअसल, सच को उससे छिपाया गया था। हिडमा को हथियार चलाने का प्रशिक्षण सुजाता नामक नक्सली महिला से मिला था, जिसे बस्तर की लेडी वीरप्पन कहा जाता था। सुजाता बस्तर डिविजन कमेटी की प्रभारी थी और सुकमा समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े नक्सली हमलों में अहम भूमिका निभा चुकी थी। 2024 में सुजाता को सुरक्षा बलों ने तेलंगाना से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। उसके शागिर्द हिडमा को कई बड़े नक्सली हमलों का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। उस पर भी सरकार ने 1 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। हिडमा को सीपीआई (माओवादी) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर कहा जाता था, जिसे नक्सलियों की सबसे प्रशिक्षित और घातक इकाई माना जाता है। वह दंडकारण्य के घने जंगलों में सक्रिय रहता था और अबूझमाड़ के कठिन भू-भाग व सुकमा-बीजापुर बेल्ट की अंदर तक गहन जानकारी थी। इसी कारण कई खूनी वारदातों में लिप्त रहने के बावजूद सुरक्षा बलों की पकड़ से दूर था। उसे यकीन था कि सुरक्षा बल उस तक नहीं पहुंच सकेंगे। बीते वर्ष छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हिडमा की मां से मुलाकात कर उसे समझाने और सही राह पर लाने को कहा था। मां भी तहेदिल से चाहती थी कि उसका बेटा आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए और शांति से जिए। आखिर कब तक कानून से मुंह छिपाता जंगलों में भटकता रहेगा। ममतामयी मां कई वर्षों से अपने बेटे और बहू को देखने के लिए तरस रही थी। वह दिन-रात ईश्वर से दोनों की सलामती की प्रार्थना करती नहीं थकती थी। उसे पक्का भरोसा था कि बेटा उसका कहना जरूर मानेगा। अपने बेटे की सलामती चाहती थी। उसने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें अत्यंत भावुक होकर कहा था, ‘‘कहां हो बेटा? घर लौट आओ, सरेंडर कर दो।’’ लेकिन बेटे ने मां की ममता का मान नहीं रखा। अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। कुछ ही दिनों के पश्चात अखबारों में यह खबर छपी, ‘‘छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश बार्डर पर सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली हिडमा और उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया।’’
