Thursday, January 29, 2026

इनका भी करें स्वागत

कई लोगों के मन में यह सवाल और विचार तो आता ही है कि जो देख नहीं सकते वे किताब और अखबार पढ़कर देश और दुनिया से कैसे रूबरू हो सकते हैं? राजस्थान के शहर जयपुर से बीते पच्चीस वर्षों से एक अखबार प्रकाशित होता चला आ रहा है, जिसने दृष्टिबाधितों को खबरों की दुनिया से अवगत कराते हुए बेहद मुश्किल लगने वाले काम को आसान कर दिखाया है। इस अखबार का नाम है ब्रेल समाचार पत्र, जिसका फायदा एक लाख से ज्यादा दृष्टिहीन उठा रहे हैं। इस पाक्षिक अखबार के संपादक के अनुसार ब्रेल समाचार पत्र ब्रेल लिपि में प्रकाशित भारत का पहला अखबार है, जिसे राजस्थान के अलावा असम, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश सहित 18 राज्यों में भेजा जाता है। अखबार के प्रकाशन का खर्च ‘राजस्थान दृष्टिबाधित कल्याण संघ’ उठाता है, जिसे दानवीरों से भरपूर दान मिलता है। 

दरअसल, ब्रेल लिपि दृष्टिहीनों के लिए एक स्पर्शनीय लेखन प्रणाली है, इसमें उभरे हुए बिंदुओं (डॉट) का उपयोग करके अक्षर, संख्याएं और चिन्ह बनाये जाते हैं, जिन्हें उंगलियों से छूकर समझा और पढ़ा जाता है। यह कोई भाषा नहीं, बल्कि एक कोड है, जो विभिन्न भाषाओं (जैसे हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, गुजराती आदि) को लिखने में मदद करता हैं और नेत्रहीनों को साक्षर बनाता है। ब्रेन लिपि नेत्रहीन तथा कम दृष्टि वाले लोगों को न केवल पढ़ने-लिखने में मदद करती है, बल्कि व्याकरण, वर्तनी और लेखन की अन्य बारीकियों से भी परिचित कराती है, जिससे उन्हें समाज से काफी हद तक जुड़ने-समझने में सहायता मिलती है। ब्रेल लिपि को लुई बे्रेल ने बनाया था, जो कि स्वयं भी नेत्रहीन फ्रांसिसी लेखक थे। 1821 मेंउन्होंने जबइस लिपि काआविष्कारकिया, तब उनकी उम्र मात्र 15 वर्ष थी। अब यह लिपि दुनिया के लगभग सभी देशों में उपयोग में लाई जाती है। 

गरीबी की वजह से कई लोग अपने सपने साकार नहीं कर पाते। पैसों की कमी उनके पैरों में बेड़ियां डाल देती है। धनवानों की संतानें शिखर छू लेती हैं और गरीबों के बच्चे सड़कों पर ऐड़िया रगड़ते देखे जाते हैं। अपने देश में लाखों बच्चे और युवा ऐसे हैं, जिन्हें यदि समय रहते मार्गदर्शन, साथ और सहायता मिल जाती तो वे भी मनचाही राह पर सफलतापूर्वक दौड़ते हुए अपने मां-बाप का नाम रोशन कर रहे होते। अभावों में पले-बढ़े पिपरिया निवासी रिटायर्ड फौजी निरंजन वैष्णव जब सेना में भर्ती हुए थे, तभी उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पैसों की तंगी की वजह से किसी का भविष्य अंधकारमय न हो, इसलिए नौकरी से रिटायर होने के पश्चात देश के युवक-युवतियों को सैनिक बनने की नि:शुल्क ट्रेनिंग देंगे। वर्ष 2021 में रिटायरमेंट के बाद फौजी निरंजन वैष्णव ने अपने संकल्प को साकार करने में किंचित भी देरी नहीं की। उनके मार्गदर्शन में 100 से ज्यादा युवा जहां सैनिक बनने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं 95 युवक-युवतियां अपने सघन परिश्रम की बदौलत आर्मी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, अग्निवीर तथा रेलवे पुलिस में अपनी कुशल सेवाएं देते हुए अपने परिवार का सहारा बने हुए हैं। परोपकारी, संवेदनशील और देशप्रेमी फौजी शिक्षण के दौरान एक खास मॉडल के अंतर्गत उत्साहित युवाओं शारीरिक और मानसिक तैयारी करवाते हुए कर्मवीर की तरह पसीना बहाने के लिए प्रेरित करते हैं। रोज सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक क्लास लगती है। इससे पहले सुबह 5.30 से 7.30 बजे तक फिजिकल ट्रेनिंग कराई जाती है। एक युवा दो से तीन साल जबरदस्त तैयारी करता है। उसकी एक-एक विषय पर कमांड हो जाती है। सिलेक्शन के बाद ज्वाइनिंग में पांच से आठ महीने लगते हैं। इस दौरान वह भी कोचिंग में आकर पढ़ाता है। इसके अलावा कुछ पूर्व सैनिक भी अलग-अलग विषयों पर तैयारी कराते हैं। कोचिंग के लिए पूर्व सैनिक एसोसिएशन द्वारा भी संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। इस अभूतपूर्व कोचिंग की नींव रखने वाले निरंजन वैष्णव कहते हैं कि, हमारे देश के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो बस सही प्रेरणा और मार्गदर्शन की जरूरत है। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। उनके दो छोटे भाई और एक बहन थी, जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी मां तथा उन्हें निभानी थी। मां लोगों के घरों में साफ-सफाई तथा अन्य मजदूरी के काम करती रहीं और उन्होंनेे ब्रेड, आइसक्रीम, अखबार और सब्जी बेचने के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखी। दसवीं की पढ़ाई के दौरान कष्टों तथा अड़चनों के सिलसिले के चलते ऐसा भी लगा कि पढ़ाई अधूरे में ही छोड़नी पड़ेगी लेकिन तब किसी देवदूत की तरह बाचावानी के शिक्षक अशोक पटेल ने कंधे पर सहायता का हाथ रखा और नि:शुल्क पढ़ाते हुए आर्थिक सहायता कर उनका मनोबल बढ़ाया।

 अपने देश में कई ऐसे दुर्गम क्षेत्र हैं, जहां प्रभावी डॉक्टरी सेवाओं का अभी भी घोर अभाव है। सुलभ और समुचित इलाज उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण अनेकों आदिवासी वर्तमान में भी तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो चल बसते हैं। सुरक्षित प्रसूति के अभाव में अनेकों गर्भवती महिलाओं को अक्सर अथाह पीड़ा तो कई बार मौत का निवाला भी बनना पड़ता है। जंगली तथा पहाड़ी क्षेत्रों में डिग्री धारक डॉक्टर भी नहीं जाना चाहते। अधिकांश डॉक्टर तथा नर्से जनसेवा की बजाय अपनी सुख-सुविधाओं को अधिकतम महत्व देते हैं। ऐसे लोगों की भीड़ में जीवंत मिसाल बनकर उभरी हैं ‘अनीता परकीवार’ जो गोंदिया जिले के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही हैं। अभी तक अनीता परकीवार करीब 800 महिलाओं की सुरक्षित प्रसूति करवा चुकी हैं, जिसमें 98 प्रतिशत प्रसूतियां सामान्य पद्धति से सफलतापूर्वक हुई हैं। मूल रूप से गड़चिरोली की रहने वाली अनीता प्रारंभ से ही आदिवासी क्षेत्रों के गरीब, अनपढ़, अशिक्षित लोगों की समस्याओं से अवगत थीं, इसलिए उन्होंने भौतिक सुखों की चाह में महानगरों की तरफ भागने की बजाय समस्याओं से जूझते आदिवासी क्षेत्र को प्राथमिकता दी।

2004 में पिपरिया गांव में आशा कार्यकर्ता के तौर पर सेवा के दौरान उन्होंने गरीब आदिवासी महिलाओं को स्वस्थ रखने का दृढ़ निश्चय किया। अपने छोटे बच्चे के बावजूद उन्होंने गड़चिरोली में नर्सिंग के पाठ्यक्रम पूरे किए और 2016 में जमाकुडो स्वास्थ्य उपकेंद्र में संविदा स्वास्थ्य सेविका के रूप में नियुक्त हुईं। हिम्मती और साहसी अनीता 11 गांवों की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ 15 और गांवों की अतिरिक्त जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभाल रही हैं, क्योंकि वहां पर कोई हेल्थ वर्कर नहीं है। उनकी अपार निस्वार्थ सेवा भावना का ही प्रतिफल है कि गरीब आदिवासी महिलाएं उन्हें अत्यंत सम्मान देती हैं और ईश्वर का सच्चा दूत मानती हैं।

पहल, प्रेरणा और त्याग ही बदलाव के जन्मदाता हैं। इसे एक बार फिर से सच कर दिखाया है, नागपुर के बीचोंबीच बसी रहाटे नगर की एक बस्ती की कुछ महत्वाकांक्षी और जुनूनी लड़कियों ने। इन्होंने न सिर्फ अपनी जिन्दगी बदली, बल्कि समाज के सोचने के नजरिये को भी बदल डाला। यहां की किसी महिला को बीते सौ सालों में शिक्षा की रोशनी नसीब नहीं हुई थी। गरीबी, उपेक्षा और बदहाली के चलते लोगों के घरों के बर्तन साफ करना, झाडू लगाना, कचरा चुनना और भीख तक मांगने को मजबूर होना तो जैसे उनका मुकद्दर बन चुका था, लेकिन कुछ दिन पूर्व अखबारों में क्रांतिकारी खबर पढ़ने में आयी। रहाटे नगर की तीन बेटियों ने लोगों के मन-मस्तिष्क की स्लेट पर लिखी इस इबारत, ‘बेटे तो कर सकते हैं, लेकिन बेटियां नहीं कर सकती’ को झुठलाते और मिटाते हुए बीए, बीकाम और बीएससी की डिग्री हासिल की तो पास और दूर के लोगों को अपनी धारणा बदलनी पड़ी। कभी यह बेटियां अन्य लड़कियों की तरह कचरे के ढेर में अपना भविष्य तलाशती थीं। हाथ में कटोरा थामकर भीख मांगते हुए लोगों की उपेक्षा और तिरस्कार को झेलती थीं। आजादी के बाद यह पहली पीढ़ी है, जिसने ग्रेजुएशन किया है। इस प्रेरणादायी परिवर्तन के पीछे सेवा सर्वदा संस्था की वर्षों की जागरूक मेहनत है। लगभग बीस वर्षों से यह संस्था रहाटे नगर जैसे पिछड़े इलाकों में शिक्षा, जागरुकता और सामाजिक उत्थान के लिए सतत कार्यरत है। संस्था ने इन बेटियों की शिक्षा के प्रति अभिरुचि प्रबल इच्छा और हिम्मत को देखते हुए स्कूल तथा कॉलेज भेजने का प्रबंध करते हुए कदम-कदम पर साथ-सहायता और मार्गदर्शन किया। भीख मांगने तथा कचरा चुनने से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर तय करने वाली इन कर्मठ लड़कियों की देखा-देखी बस्ती की और भी कई लड़कियों, बंदिशों को तोड़ते हुए परिवर्तन के महासंकल्प के साथ पढ़ने-लिखने के लिए स्कूल तथा कॉलेज जाते हुए दूसरों के लिए प्रेरणा की अलख जगाने लगी हैं...।

Thursday, January 22, 2026

इनसे जरूर करें मुलाकात

यह फिल्मी नहीं, जीते-जागते नायक हैं। इन्हें किसी दबे-छिपे पुरातन ग्रंथों या धूल में दबी-सिमटी किताबों से नहीं खोजा गया है। ये तो उन अखबारों की प्रेरक देन हैं जिन्हें सुबह पढ़कर शाम तक रद्दी के ढेर के हवाले कर दिया जाता है। इन नायक-नायिकाओं ने हर चुनौती से लड़-भिड़कर अपनी तथा औरों की तक़दीर को पलटा है। इनका हौसला ही इनकी पहचान है। इन्होंने बाहरी नहीं, अपने भीतर की आवाज सुनी है। हर डर और चिंता को भगाया है और इसी संदेश का परचम लहराया है कि बदलाव तभी शुरू होता है जब हम काम की शुरुआत करते हैं। महज सपने देखने और सोचने से कुछ नहीं होता। 

बिहार के एक छोटे से गांव की बेटी रूपम शीघ्र ही डॉक्टर बनने जा रही है। कोई भी कह और सोच सकता है कि यह कौन सी अनोखी बात है। देश में हजारों बेटे-बेटियां पढ़-लिखकर डॉक्टर बनते हैं। सच तो यह है कि रूपम की कहानी औरों से बहुत जुदा है। जब वह मां की कोख से जन्मी तभी उसके दोनों हाथ नदारद थे। माता-पिता के लिए यह दु:खद हकीकत किसी भारी सदमे से कम नहीं थी। फिर भी उन्होंने उसकी परवरिश में कोई भी कमी नहीं करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने तो जैसे भविष्यवाणी ही कर दी थी कि अपनी दिनचर्या की चुनौतियों से जूझती यह दिव्यांग लड़की किसी भी हालत में पढ़-लिख नहीं पाएगी। उम्र भर मां-बाप के लिए बोझ बनी रहेगी। लेकिन रूपम ने तो कमाल ही कर दिया। वह अपने पैरों को हाथ बनाते हुए तमाम मुश्किलों का सामना करने की कला में पारंगत होती चली गई। मां-बाप भी उसके हौसले को देखते ही रह गए। देखते ही देखते उसने अपने पैरों से लिखना भी प्रारंभ कर दिया। 2009 में दसवीं और उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण करने वाली यह बिटिया अब डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब वह मरीजों का इलाज करती नज़र आएगी। 

विश्वजीत भी दोनों हाथों से दिव्यांग है। उसने भी बचपन से ही अपने पैरों से लिखने की आदत डाल ली। शुरू-शुरू में उसे और उसके मां-बाप को काफी दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा। लेकिन कालांतर में उसने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। बिना किसी की मदद के उसने अपने पैरों से पैंसिल पकड़ने और लिखने की प्रैक्टिस करनी प्रारंभ कर दी। विश्वजीत के दो भाई हैं। दोनों ही एकदम सामान्य हैं। उसने बचपन में ही अपने मन में यह बात बिठा ली थी कि वह किसी से कम नहीं। मोबाइल पर कुछ सर्च करना हों किताबें पढ़नी हों या किसी और भारी-भरकम काम करना हो विश्वजीत उसे अपने पैरों से ऐसे अंजाम देता है जैसे दूसरे लोग अपने हाथों से करते देखे जाते हैैं। कुछ दिनों पहले नागपुर में आयोजित विदर्भ विज्ञान उत्सव में विश्वजीत के बनाये पोस्टर को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला यह पोस्टर था ही ऐसा जानदार, जिसने भी देखा बस प्रशंसा करता ही रह गया। गणित विश्वजीत का मनपसंद विषय है। वह प्रशासकीय अधिकारी बन समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहता है। उसकी एक से एक बनाई पेंटिंग को कई बार पुरस्कृत किया जा चुका है। 

कहते हैं आंखें हैं तो दुनिया की रोशनी और रंगीनियां हैं। यही आंखें पूरी सृष्टि कर दीदार करवाती हैं। अपनों तथा बेगानों को देखने का आत्मिक सुख दिलाती हैं। प्रश्न है कि जो दृष्टिहीन हैं उनका क्या? कुदरत की बेइंसाफी उन पर क्या असर डालती है और उनकी जीवन यात्रा कैसे चलती है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल तो नहीं। लेकिन फिर भी हमारी दुनिया में कुछ दृष्टिहीन ऐसे हैं, जो इस कमी को भी अपनी ताकत बनाने की हिम्मत रखते हुए आशा की ऐसी नई रोशनी फैला रहे हैं, जो आंखों वालों को भी स्तब्ध करती है। बहुतों ने तान्या बलसारा का नाम ही नहीं सुना होगा। तान्या जन्म से ही दृष्टिहीन हैं लेकिन उनके मनोबल ने उन्हें ऐसी अलौकिक आंतरिक दृष्टि उपहार में दे दी जिससे वह पास और दूर की आबोहवा को तीव्रता से महसूस करने लगीं। दरअसल, यह भी उस कुदरत का करिश्मा है जिसे बार-बार कोसा जाता है। वो भी उनके द्वारा जिन्हें सबकुछ मिला है। तान्या ने पहले खुद कम्प्यूटर में दक्षता हासिल की और अब कम्प्यूटर साक्षरता के जरिए दृष्टिहीन युवाओं को मुफ्त में प्रशिक्षित कर रही हैं। अब तक 300 से ज्यादा दृष्टिहीनों को प्रशिक्षण देकर उनके जीवन में खुशी के रंग भरने वाली तान्या का कहना है कि अपनी मुश्किलों ने उन्हें दूसरे दृष्टिहीनों के दर्द को समझने के लिए प्रेरित किया। भारत में लाखों दृष्टिहीन नागरिकों को कम्प्यूटर साक्षर बनते देखना उनका सपना है। कई विद्यार्थी उनके द्वारा प्रशिक्षित होने के पश्चात अच्छी-खासी  नौकरियों कर रहे हैं। दृष्टिहीनों को नि:शुल्क कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ तान्या अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास एवं एक्सेसिविलिटी टेस्टिंग के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन कराती हैं। यहां छात्रों को ‘स्पर्श किताबें’ दी जाती हैं। ‘ब्रेल ऑडियो’ अथवा बड़े प्रिंट में नोट भी दिए जाते हैं। तान्या को कोई भी काम कल पर टालना या आधा-अधूरा कर गुजरना बिलकुल पसंद नहीं। इसलिए किसी निश्चित अवधि में आधे-अधूरे ढंग से प्रशिक्षण पूरा करवा देने की बजाय उनके यहां तब तक सिखाया जाता है, जब तक कि विद्यार्थी का आत्मविश्वास पूरी तरह से सुदृढ़ न हो जाए और वह कम्प्यूटर पर सरलतापूर्वक काम न करने लगे। तान्या ने 2006 में कम्प्यूटर सेंटर की शुरुआत की। वर्तमान में देश के कई राज्यों के बड़े तथा छोटे शहरों में उनके कम्प्यूटर सेंटर सफलता पूर्वक चल रहे हैं और कई युवक-युवतियों की किस्मत मानसिक और खुशहाली को बदलते हुए प्रदान कर रहे हैं। 

कोल्हापुर में स्थित एक विशाल फार्म हाउस में डॉ.प्रिया भारती और राहुल नामक युवक की धूमधाम से शादी हो रही थी। मेहमान नाचते-गाते हुए खूबसूरत आकर्षक युवा जोड़े के एक होने का आनंद ले रहे थे। कुछ मित्र और रिश्तेदार अपने-अपने मोबाइल और कैमरों से इन दिलकश लम्हों की तस्वीरें लेते हुए उमंगित-तरंगित हो रहे थे। पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरों की रस्म चल रही थी कि तभी अचानक एक महिला का सिर चकराने लगा और वह धड़ाम से स्टेज पर गिर पड़ी। चमकते-दमकते आलीशान वेशभूषा में सजी-धजी डॉ.प्रिया की जैसे ही बेहोश पड़ी महिला पर नज़र पड़ी तो वह तुरंत सजग डॉक्टर की भूमिका में आते हुए फेरे रोककर उसके प्राथमिक उपचार में लग गईं। जब तक महिला को पूरी तरह से होश नहीं आया, तब तक डॉ.प्रिया वहां से नहीं हिलीं। उनकी इस कर्तव्यपरायणता की तारीफ करने के लिए मेहमानों के पास शब्द नहीं थे। अपनी शादी से ज्यादा मरीज को अहमियत देने वाली खूबसूरत दुल्हन की सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों ने दिल खोलकर तारीफें कीं और बार-बार सराहा।

Thursday, January 15, 2026

भरोसे से छल

मध्यप्रदेश के स्वच्छ और सर्वोत्तम शहर के तमगे वाले इंदौर में स्थित एक घर में छह माह के बच्चे का शव पड़ा था। मृत मासूम के पास बैठी उसकी वृद्ध दादी विलाप करते-करते कहे जा रही थी, ‘‘दस साल बाद भगवान ने खुशी दी थी और भगवान ने ही छीन ली!’’ 

मां तो बस अपने सामने दम तोड़ चुके लाडले को अपलक देखती और सोचती जा रही थी। ईश्वर भी कितना अन्यायी है। उससे भी मेरी खुशी देखी नहीं गई। मैं भी कितनी बदनसीब हूं जो अपने जाये को अपना दूध पिलाने में असमर्थ रही। उसे दूध नहीं आता था। ऐसे में डॉक्टर की सलाह पर वह बाहर के दूध में पानी मिलाकर बच्चे को पिलाती थी। दो दिन पहले बच्चे को एकाएक तेज बुखार और दस्त शुरू हो गए। तुरंत अस्पताल जाकर दिखाया तो डॉक्टर ने उसे दवा के साथ इंजेक्शन लगाया। लेकिन घर लाते-लाते रास्ते में हमेशा-हमेशा के लिए लाडले की सांसें थम गईं। दुनिया छोड़ चुके भाई की बहन की खामोशी से दर्द का दरिया बहता रहा। उसकी निगाहें बता रही थी कि कुछ ऐसा टूट गया है जिसे अब जोड़ा नहीं जा सकता। यह हकीकत सिर्फ एक घर-परिवार की नहीं थी। कइयों के साथ जुल्म हुआ था। उनके हंसते-खेलते बच्चों और बड़ों को दूषित पानी ने दर्दनाक मौत दे दी थी। परिवार के अनेकों सदस्य अस्पताल के बिस्तरों पर पड़े सोच रहे थे यह कैसे हो गया? यह भगवान की नहीं इंसान की गलती थी। उसकी लापरवाही और लालच ने मौत का यह तांडव मचाया था। शासन और प्रशासन की घोर लापरवाही और निकम्मेपन की इस दिल दहलाने वाली हत्यारी देन को वो लोग तो कभी नहीं भूल पायेंगे, जिनके अपने उनसे बिछड़ गए। वो शहर जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ और आदर्श शहर घोषित किया गया। वहीं शौचालय की सीवर लाइन और पेयजल पाइप के जानलेवा मिलन से पानी विषैला हो गया और निर्दोषों को मौत की नींद सुलाता चला गया। डायरिया, उल्टी, दस्त और संक्रमण से त्रस्त होकर लोगों का हुजूम डॉक्टरों के यहां पहुंचने लगा फिर भी प्रशासन अपनी आंखें मूंदे रहा। कई इलाकों में नलों से काला बदबूदार पानी आने की शिकायतें अनसुनी करने वाले जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों को तब किंचित होश आया, जब बच्चों तथा बुजुर्गों की मौतों की खबरें मीडिया में सुर्खियां पाने और देशवासियों को चौंकाने लगीं। अपने देश में भले ही बोतलबंद पानी का चलन हो गया है, लेकिन फिर भी अधिकांश आम भारतवासी नलों और हैंडपंपों के पानी पर आश्रित हैं। जिनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाना आसान नहीं उनके लिए विभिन्न कंपनियों का महंगा बोतलबंद पानी खरीद पाना यकीनन मुश्किल है। लापरवाह अधिकारी, नगरसेवक कहीं न कहीं यह मान चुके हैं कि, इस तरह से नागरिकों का जान गंवाना आम बात है। उन्हें इंसानी गम और पीड़ा को गंभीरता से पढ़ने की समझ ही नहीं है। जिस परिवार में दस साल की मन्नतों के बाद बच्चा जन्मा उसने मौत के मुआवजे को लेने से इंकार कर दिया। उनकी तरह और कुछ परिवारों ने भी यही कहा कि जब हमारा बच्चा ही चला गया, अब सरकारी मुआवजा ले भी लें तो क्या वह वापस आ जाएगा? अपनी औलाद से बढ़कर पैसा थोड़े ही है। यदि हमें पता होता कि सरकार हमें पानी नहीं जहर पिला रही है तो हम सावधान हो जाते। किसी भी तरह से बोतलबंद पानी खरीद लाते। शहर में दूषित पानी पीने के बाद कितनी मौतें हुई और कितनों को डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाना पड़ा, महंगे, सस्ते अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती होना पड़ा इसका सही आंकड़ा भी छुपाया गया।

जहां सजग पत्रकारों और अखबारों ने विषैला पानी पीने से 20 लोगों की मौत का दावा किया। दूसरी तरफ सरकार ने 18 परिवारों को दो-दो लाख रुपए का मुआवजा देकर अपने कर्तव्य परायण होने का ढोल पीटा लेकिन अदालत में कहा गया कि, सिर्फ चार मौतें हुई हैं। सच तो यही है कि अधिकांश शासक सच कहना और सुनना ही नहीं चाहते। उन्हें तो चापलूसी और वाहवाही ही रास आती है। इंदौर शहर में जब बच्चों के एक-एक कर मरने की खबरें दिल दहला रही थीं, तभी अनुराग द्वारी नामक सजग पत्रकार ने मध्यप्रदेश के एक  बदतमीज और मुंह फट मंत्री को हकीकत से अवगत करवाते हुए अव्यवस्था को लेकर सवाल पूछे तो वे आगबबूला होकर ‘गाली’ देने के अंदाज में आक्रामक मुद्रा में आ गए। मंत्री के अहंकारी बोल और शर्मनाक हावभाव को जब शहरवासियों ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर देखा-सुना और तो उन्हें भी बेहद शर्मिंदगी और अपनी गलती का एहसास भी हुआ कि उन्होंने कैसे घटिया नेता को अपना कीमती वोट देकर विधायक बनाया और वह मंत्री बनकर अब उन्हीं की छाती पर मूंग दल रहा है। 

इस जानलेवा कांड के बाद जब कुछ पत्रकार तथाकथित स्वच्छ शहर की हकीकत जानने के लिए कुछ इलाकों में गये तो गंदे पानी और बदहाल सफाई व्यवस्था की परतें तेजी से खुलती चली गईं। जगह-जगह कचरे के अंबार बदबू फैला रहे थे और बिना ढक्कन वाले सीवर के चेम्बर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करते प्रतीत हो रहे थे। स्थानीय निवासियों ने बड़े दुखी मन से बताया कि सफाई कर्मी मुख्य सड़क पर झाडू लगाकर चलते बनते हैं। अंदर की गलियों में हफ्तों साफ-सफाई नहीं की जाती। कुछ दिन पहले स्कूल के मास्टर जी का पांच साल का लड़का घर के पास के खुले पड़े सीवर में धड़ाम से जा गिरा। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया! बच्चों की एक पाठशाला तो गंदगी के पहाड़ के एकदम बगल में लगती है। जब-तब बच्चे बीमार होते रहते हैं। बेचारे शिक्षक भी दमघोटू बदबू, कीचड़ के बीच मासूम बच्चों को क, ख, ग सिखाते-सिखाते सिर पकड़कर बैठ जाते हैं। 

इंदौर की आहत करने वाली खबर की आंच अभी धीमी नहीं पड़ी थी कि गुजरात, ओडिशा, राजधानी दिल्ली तथा कर्नाटक में भी पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिश्रित होने से बच्चों और बुजुर्गों के बीमार पड़ने की खबरों ने तो जैसे देशवासियों को और...और भयभीत और चिंतित कर दिया। मध्यप्रदेश के इंदौर, गुजरात के गांधीनगर की तरह ही बेंगलुरू भी स्मार्ट सिटी है लेकिन कितनी शर्म की बात है कि लोग दूषित पानी पीने से बीमार हो रहे हैं। अच्छे-खासे स्वस्थ नागरिकों पर मरने की नौबत आ रही है। सरकार स्मार्ट सिटी, स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है तब भी यह दुर्गति है। मैंने स्वयं दिल्ली में अनेकों इलाकों में लोगों को खुले में शौच करते देखा है। सरकार ने हर घर नल पहुंचाने की जोर-जोर से डफली तो बजायी लेकिन सच तो यह है कि कई नगरों, महानगरों के लोगों की शिकायत है कि उन्हें पानी दो-तीन दिन में एक बार मिलता है। उस पर भी अन्याय यह है कि कई बार वो पीने के योग्य नहीं होता। कई सोसाइटियों में काले, बदबूदार पानी का बार-बार आना प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का पर्दाफाश करता है।  सेफ्टी एडवाइजरी देने वाली ग्लोबल रेस्क्यू नामक संस्था ने भारत को उन देशों की सूची में रखा है, जहां नल का पानी असुरक्षित माना जाता है। हम ये भी न भूलें कि भारत आनेवाले विदेशियों को पहले से हिदायत देकर सतर्क कर दिया जाता है कि वे यहां पर केवल और केवल बोतलबंद मिनरल वाटर ही पिएं। जापान, सिंगापुर, स्विटजरलैंड जैसे देशों के नागरिक नल का पानी इसलिए बेहिचक पीते हैं, क्योंकि वहां पर सिस्टम के कठोर स्टैंडर्ड हैं। लगातार टेस्टिंग और निगरानी बनी रहती है। भारत में  पाइप लाइनें बिछाने पर तो जोर दिया जाता है लेकिन पानी की गुणवत्ता की अनदेखी होती रहती है। इस जानलेवा लापरवाही के कारण ही अधिकांश सजग भारतीयों का सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है।

Thursday, January 8, 2026

उफ़! ...अन्नदाता का इतना-कितना शोषण!!

महाराष्ट्र में स्थित चंद्रपुर जिले की नागभीड़ तहसील। यहीं के एक किसान रोशन शिवदास कुले ने एक साहूकार से एक लाख का कर्ज ले रखा था। इस बीच रोशन की दादी का निधन हो गया। किसान रोशन का पूरा परिवार शोक में डूबा था। तभी सुबह-सुबह साहूकार प्रदीप बावनकुले का रोशन को पैसों के लिए संदेश आया तो उसने दादी की मृत्यु की जानकारी देते हुए कुछ दिन की मोहलत मांगी, लेकिन निर्दयी बेसब्रा साहूकार नहीं माना। जब घर परिवार के सभी लोग अंत्येष्टि की तैयारी में लगे थे, तब वह वहां आ धमका और रोशन को धमकाते हुए कहने लगा कि मुझे तो अभी मेरे पैसे चाहिए। तुम्हारी दादी चल बसी है। इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं। यह तो तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। इससे तुम ही निबटो। वहां पर उपस्थित कुछ लोगों ने क्रूर साहूकार को हाथ जोड़कर शांत रहने की विनती की तो वह बड़ी मुश्किल से चीखते-चिल्लाते हुए वहां से खिसका। उद्दंड साहूकार के ऐसे आतंकी बर्ताव से कोई भी यह सोच सकता है कि रोशन ने उससे काफी बड़ी रकम कर्ज में ली होगी, जिसे वापस देने में वह आनाकानी कर रहा होगा। मैंने भी ऐसा ही कुछ अनुमान लगाया था, लेकिन जब पूरी हकीकत पता चली तो मेरी सोच का अंग-अंग दंग रह गया। विचार शक्ति को लकवा मारता चला गया। 

हमारे इर्द-गिर्द अभी भी ऐसे बेरहम, अन्यायी, शोषक शैतान धनपशु सक्रिय हैं, जिनकी क्रूरता की सच्चाई रूह को कंपा देती है। पैंतीस वर्षीय मेहनतकश किसान रोशन ने कुछ वर्ष पूर्व बार-बार खराब फसल होने के कारण अपनी आर्थिक हालत सुधारने के लिए दूध का कारोबार करने की सोची थी। इसके लिए उसने दो तंदुरूस्त गायों के खरीदने के लिए अवैध साहूकार से ब्याज पर एक लाख का कर्ज लिया। उसे यकीन था कि दूध बेचकर वह घर का जरूरी खर्चा तथा साहूकार का कर्जा भी निर्धारित समय पर चुकाने में अवश्य कामयाब होगा। उसे अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा था। जोश-जोश में रोशन ने साहूकार से ब्याज की दर के बारे में कोई जानकारी नहीं ली थी। यह उसकी बदकिस्मती ही कहेंगे कि उसने जो सोचा था वो नहीं हो पाया। कुछ ही हफ्तों के बाद दोनों गायों की किसी गंभीर बीमारी के चलते मौत हो गई। ऐसे में साहूकार को जैसे ही खबर लगी तो वह कर्ज वसूली के लिए उसके सर पर आकर खड़ा हुआ। रोशन ने उसके पैर पकड़ लिए। फिर भी साहूकार के तकादे का दबाव बढ़ता चला गया। दरअसल, जालिम साहूकार की नीयत में ही जबरदस्त खोट घर कर चुकी थी। उसने सीधे-सादे रोशन को एक लाख की मूल रकम पर प्रतिदिन 10 हजार रुपए ब्याज चुकाने का फरमान सुना दिया। दाने-दाने को मोहताज रोशन पर तो अब जैसे बिजली ही गिर पड़ी। तुरंत उसके मन में आया कि वह भी दूसरे मजबूर लुटे-पिटे किसानों की तरह आत्महत्या कर ले, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया। धीरे-धीरे महीने और साल गुजरते गये। ब्याज पर ब्याज के कारण एक लाख का कर्ज 74 लाख में तब्दील हो गया। इस दौरान रोशन ने पहले अपनी खेत की जमीन बेची, फिर धीरे-धीरे अपना घर, मवेशी, ट्रैक्टर और मोटर साइकिल तक बेचकर मिली रकम साहूकार के हवाले कर दी, लेकिन फिर भी कर्ज जस का तस बना रहा। रोशन ने लाख हाथ-पैर जोड़े। रहम की भीख मांगी, लेकिन साहूकार का बिलकुल दिल नहीं पसीजा। वह येन-केन-प्रकारेण और... और वसूली के लिए प्रताड़ना का चाबुक बरसाता रहा। इसी दौरान एक दिन रोशन साहूकार के यहां गया और उससे हाथ जोड़कर बोला कि, अब जब मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरा सब कुछ बिक चुका है, तब ऐसी हालत में अब मैं क्या करूं? साहूकार ने उसे अपने पास बिठाकर कहा कि, तुम्हें पता नहीं, तुम्हारे जिस्म का एक-एक अंग बहुत कीमती है। अब तुम्हें इन्हें बेचकर अपना कर्जा चुकाना होगा। फिलहाल तुम अपनी किडनी को बेचकर काफी हद तक कर्ज मुक्त हो सकते हो। यह सुनते ही तन-मन से लहूलुहान हतप्रभ रोशन काफी देर तक साहूकार के चेहरे को ताकता रहा। रोशन को नागपुर से कोलकाता ले जाया गया। वहां से किडनी रैकेट के सरगनाओं ने उसे कंबोडिया पहुंचा दिया। वहां पर अत्यंत सुनियोजित तरीके से उसकी किडनी निकालकर 8 लाख रुपए उसके  हाथ में थमा दिए गए। इन रुपयों को भी रोशन ने साहूकार को सौंप दिया। किडनी के निकाले जाने के बाद रोशन की शारीरिक हालत बिगड़ती चली गई और उसने बिस्तर पकड़ लिया। 

इतना सब कुछ होने के बाद भी साहूकार ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। आखिरकार उसने किसी तरह से स्थानीय विधायक से मेल-मुलाकात कर उन्हें अपनी आपबीती बतायी। जैसे ही नरपिशाच साहूकार के लूटकांड की दिल दहलाने वाली हकीकत की अखबारों में विस्तार से खबर छपी तो उसके बाद तो और भी कई किसान अपना दुखड़ा सुनाने के लिए सामने आने लगे, जिन्हें साहूकारों ने बेतहाशा ब्याज वसूल कर तन-मन और धन से कंगाल बनाया गया था। उनके घर, जमीनें और अन्य सामान अपने नाम लिखवा लिये गए थे। इस शर्मनाक किडनी कांड की जब दूर-दूर तक गूंज गूंजी तो आंखें और कान बंद कर नींद लेती पुलिस को भी मजबूरन सक्रिय होना पड़ा। सघन जांच में पता चला कि इस शैतानी कुकर्म में कुछ डॉक्टरों की भी अहम भूमिका है, जिनके बारे में अधिकांश भारतीयों ने धरती के भगवान होने का भ्रम पाल रखा है। यह भी सच सामने आया कि और भी कई किसानों को दुर्जन साहूकारों की साजिश में फंस कर कंबोडिया में जाकर अपनी किडनी बेचने को विवश होना पड़ा है। कुदरत और इंसानी-शैतानी के मारे गरीब और मजबूर किसानों की किडनियां सिर्फ कंबोडिया ही नहीं चीन में भी प्रत्यारोपित की जा रही हैं। पूरे विदर्भ में कई वर्षों से किडनी तस्करों का खतरनाक रैकेट सक्रिय है। ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी कई सफेदपोश अवैध साहूकारी करते हुए मनमाना ब्याज लगाकर अपने शिकार को भिखारी और लाचार-बीमार बना रहे हैं। यह भी काबिलेगौर है कि, मानव अंगों के सौदागर मजबूर शख्स की किडनी को बेचकर पाते तो सत्तर-अस्सी लाख रुपये हैं, लेकिन उनके हाथ में मात्र पांच-सात लाख रुपए थमाते हैं। अपने शिकार को फांसने के लिए दलाल सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। कुछ किडनी के सौदागर तो ऐसे भी हैं जिन्होंने पहले अपनी किडनी बेची या बेचनी पड़ी लेकिन अब स्वयं इस भयावह कारोबार में शामिल हो गये हैं। महाराष्ट्र और विदर्भ के किसानों की खुदकुशी करने की खबरें वर्षों से देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित करती आ रही हैं, लेकिन फिर भी सिलसिला थमता नजर नहीं आता। गैरकानूनी साहूकारों की हत्यारी साहूकारी के खिलाफ कभी-कभार नारे भी गूंजते हैं, लेकिन कानूनी शिकंजा कहीं न कहीं अंतत: ढीला पड़ जाता है। अथाह कर्ज में डूबे लाचार किसानों को सरकारी मदद पहुंचाने की खबरें भी सुनी-सुनायी जाती हैं, लेकिन फिर भी धूप, गर्मी, सर्दी और बरसात में अन्न उपजा कर सभी का पेट भरने वाला अन्नदाता जहां भूखा रह जाता है, वहीं तकलीफों से भी बाहर नहीं निकल पाता है। उसकी खुदकुशी के आंकड़े बढ़ते ही चले जाते हैं। अपनी किडनी को बेचने को विवश होने वाले किसान रोशन ने यदि अपना मुंह खोलने की पहल और हिम्मत नहीं की होती तो मानव अंगों के शैतान सौदागरों का शर्मनाक सच दबा का दबा रह जाता। किसानों का खुदकुशी करना या अपने शरीर के अंगों को बेचने के लिए मजबूर होना यही दर्शाता है कि अन्नदाता के लिए खेती-बाड़ी अत्यंत घाटे का सौदा है। उसकी सारी मेहनत धरी की धरी रह जाती है। देश की अर्थव्यवस्था में सुधार किए बिना किसानों का उद्धार नहीं हो सकता। अरबपति-खरबपति धन्नासेठों के कर्ज माफ करने वाली सरकार किसानों की खुदकुशी और उनकी कर्जमाफी जैसी गंभीर समस्या की अनदेखी कर रही है। विपक्ष ही नहीं पक्ष के भी कुछ सजग नेता मानते हैं कि किसानों के विकास के लिए सरकार ने कोई ठोस उपाय योजना नहीं बनाई है। राज्य सरकार के आश्वासन साबुन की झाग की तरह गायब हो जाते हैं। एक सच यह भी कि हम और आप किसान की मेहनत की उपज की कतई कद्र नहीं करते। सोना-चांदी के दाम आसमान को छूते चले जाएं, लेकिन गेहूं, चावल, दाल की कीमतों का बढ़ना सभी की नींद उड़ा देता है। आलू हमें महंगा लगता है। आलू से बनने वाली चिप्स, वेफर्स, कुरकुरे और अन्य चटपटे व्यंजन भले ही कितने महंगे हों, सभी खुशी-खुशी खरीद लेते हैं। यही इंसानी सोच कृषि की सम्मानजनक आमदनी की शत्रु बनी हुई है। अदने से प्याज की कीमतें बढ़ने से सरकारें अलटी-पलटी कर दी जाती हैं। यही वजह है कि अधिकांश युवा खेती से सतत दूरी बना रहे हैं। वैसे भी ऐसे घाटे का धंधा कौन करना चाहेगा, जिसमें लागत निकलना ही मुश्किल हो रहा हो। आकाश छूती महंगाई और तंगी के इस दौर में किसानों की फसलों के समुचित दाम दिलाने के लिए हमने तो कभी देश की आम जनता को सड़कों पर उतरते नहीं देखा...।

Thursday, January 1, 2026

उम्मीद की दस्तक

अभी तक मेरा जितने भी वृद्धाश्रम जाना हुआ था, अधिकांश में मेरा सामना ऐसे बुजुर्ग स्त्री-पुरुष से हुआ जिनके जिस्म लस्त-पस्त और चेहरे बुझे-बुझे थे। लगभग सभी को उनके बच्चों तथा परिजनों ने बोझ मानते हुए वहां ला पटका था। कमजोर, बेबस माता-पिता अपनी नालायक धोखेबाज औलादों को कोसते हुए अपना दर्द बयां करते-करते फूट-फूट कर जब रोने लगते थे, तब उन्हें चुप कराना मुश्किल हो जाता था। उनकी अटूट खामोशी भी अपने साथ हुए छल कपट की दास्तां कहती नज़र आती थी। लेकिन इस अद्वितीय वृद्धाश्रम को देखकर मुझे कतई नहीं लगा कि ऐसे-वैसे किसी आश्रय स्थल से रूबरू हूं। यहां की स्वच्छ आबोहवा, सेवा, सुरक्षा और सुविधा की सम्मानजनक हकीकत ने नई आशाएं जगा दीं हैं। मुझे लगा ही नहीं कि मैं उपेक्षा, अकेलेपन, निराशा, चिंता में डूबे बुजुर्गों के बीच बैठा हूं। सभी के चेहरों पर खिली मुस्कान की वजह यकीनन यहां का प्रबंधन और आधुनिक सुख-सुविधाएं भी हैं, जो वर्तमान में अधिकांश उम्रदराजों की चाह और जरूरत हैं और जिनकी अनदेखी होती चली आ रही है। इस वृद्धाश्रम में एक सौ पचास कमरे हैं। सभी में उन सभी सुविधाओं का समावेश है, जो संपन्न घर-परिवारों में उपलब्ध होती हैं। हर स्त्री-पुरुष को उसकी मनपसंद का कमरा मिला हुआ है। यहां पर बुजुर्ग बिना किसी पर निर्भर हुए अपना जीवन जी रहे हैं। मनोरंजन कक्ष भी बना है। यहां भी उनके पढ़ने के लिए भरपूर किताबों युक्त लाइब्रेरी है। विशाल टीवी लगा है। बोर्ड गेम्स और संगीत का भी आनंद लिया जा रहा है। खुद को सेहतमंद, खुशहाल बनाये रखने के लिए फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज की जा रही है। उनका अपने घर परिवार से सतत संपर्क बना रहे, इसके लिए इंटरनेट और वीडियो कॉल की सुविधा उपलब्ध है। उन्हें सक्रिय बनाये रखने के लिए बागवानी, पेंटिंग, लेखन, गायन तथा अपने-अपने विचारों को साझा करने का अटूट सिलसिला भी बना हुआ है। यहां पर रह रहे लगभग हर सीनियर सिटीजन का अपनी संतानों से संपर्क बना रहता है। यह इसलिए है क्योंकि वे अपने बाल-बच्चों की रजामंदी से आये या पहुंचाये गये हैं। 

अस्सी वर्षीय अमन कुमार का कुछ वर्ष पहले तक शहर के व्यवसाय जगत में डंका बजा करता था। अमन कुमार ने अपने नाम के अनुरूप शांत और मिलनसार शख्सियत के तौर पर जो ख्याति अर्जित की उसे अधिकांश लोग भूले नहीं हैं। भूल भी नहीं सकते। कोई भी जाना-अनजाना जरूरतमंद उनके घर से खाली हाथ नहीं लौटता था। बिना किसी भेदभाव के सभी की सहायता करने वाले अमन कुमार ने कभी भी प्रसिद्धि की चाह नहीं की। निस्वार्थ जनसेवा के कर्म को अपना धर्म मानकर व्यवसाय में जो भी कीर्तिमान स्थापित किए उसकी तारीफ उनके प्रतिद्वंदी भी करते नहीं थकते। इस सम्मानजनक वृद्धाश्रम में अमन कुमार से मिलकर बहुत अच्छा लगा। बहुत कुछ जानने-समझने का सुअवसर भी मिला। भले ही उनके बेटे, पोते अब उनका व्यवसाय संभाल रहे हैं, लेकिन अब भी उनकी सोच और निर्णय क्षमता की कदर करते हैं। कोई भी अड़चन आने या कोई भी नया कदम उठाने से पहले उनसे सलाह मशविरा लेना नहीं भूलते। अमन कहते हैं कि मनुष्य के लिए साठ और पैसंठ से ऊपर की उम्र का दौर बेहद अहम होता है। शरीर और मन दोनों की देखभाल और जरूरी हो जाती है। उचित रहन-सहन और सकारात्मक विचारों से आनंद मिलता है और नकारात्मक सोच घातक साबित होती है। बढ़ती उम्र के लिए संतुलित आहार और पर्याप्त नींद बहुत जरूरी है। सच तो यह है कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ शरीर की जरूरतें बदल जाती हैं। भोजन में प्रोटीन, हरी सब्जियां, दालें और विभिन्न फलों का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी होता है। अधिकांश घर-परिवारों में आज के व्यस्ततम दौर में जो देखभाल कम ही संभव होती है, उसकी पूर्ति थी यह अनोखा वृद्धाश्रम कर रहा है। सीनियर सिटीजन और तनाव का चोली दामन का साथ सर्व विदित है। यहां नियमित होने वाली धार्मिक, आध्यात्मिक, गतिविधियां, मेडिटेशन, म्यूजिक थेरेपी और मिलजुलकर की जानेवाली बागवानी तथा विचार गोष्ठी जो खुशी तथा शांति प्रदान करती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 75 वर्षीय शिक्षाविद रामचंद अग्रवाल से मिलना भी यादगार बन गया। उनकी पत्नी का पांच वर्ष पूर्व निधन हो गया था। भरे पूरे परिवार में भी उनका दम घुटता था। बेटे और बहुएं अपने-अपने काम में व्यस्त रहते थे। किसी दिन उन्हें किसी ने इस वृद्धाश्रम के बारे में बताया। बच्चों की सहमति से वे यहां रहने चले आए। कई वर्षों तक अपने लेखन के शौक से दूर रहने के बाद मन में विचार आया कि क्यों न अब साहित्य लेखन किया जाए। उन्होंने मात्र चार वर्ष में पांच किताबें लिखीं और प्रकाशित भी हो गईं। इतना ही नहीं एक लेख संग्रह को प्रदेश की साहित्य अकादमी के द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। उनका कहना है कि पढ़ने का शौक तो तब से था, जब नौकरी में था। अपने कमरे में पचासों किताबें जमा कर रखी थीं। लेकिन उन्हें तल्लीनता के साथ पढ़ने का समय नहीं मिलता था। यहां आने के बाद सालभर मेें कई किताबें पढ़ डाली। 

श्री रामकृष्ण दमानी का नाम शहर के ही नहीं प्रदेश के रईसों में शुमार है। उन्होंने भी उम्र के सत्तरवें पायदान पर कदम रखने के बाद इस सम्मानजनक आशियाने को अपना ठिकाना बना लिया है। अपार धनराशि होने के बावजूद सरल और सहज जीवनयापन के लिए जाने जानेवाले दमानी जी को मीडिया की चकाचौंध कभी रास नहीं आई। उनकी एक बेटी है जो विदेश में रहती है। देश वापस लौटने की उसकी इच्छा नहीं। ऐसे में उन्होंने छह महीने पूर्व अपनी आलीशान कोठी पर ताला जड़ा और चुपचाप यहां रहने के लिए चले आए। कुछ स्त्री-पुरुषों को ध्यान कक्ष में योग में लीन देखकर मैं उनसे बातचीत करने के लिए आधे घंटे तक इंतजार करता रहा। मुझे यह जानकर हैरत हुई कि कुछ पति, पत्नी भी यहां बड़े आराम से रह रहे हैं। संतानहीन, खुशहाल दंपति को जो शांति और सुकून यहां मिला वो अपने उस फ्लैट में संभव नहीं था, जो शहर की गगनचुंबी इमारत में स्थित है। अब तो जब भी उनका मन होता है बेफिक्र होकर कहीं भी घूमने चले जाते हैं। कुछ दिन पहले ही कश्मीर और शिमला घूम कर आये हैं। यह अत्यंत सुखद हकीकत है कि हमारे समाज और परिवारों के बीच के व्यवहार, सोच और अनुभवों के मौसम में धीरे-धीरे बदलाव देखने में आ रहा है। अपने देश में सास और बहू के रिश्तों के बीच के तनाव और टकराव की खबरें किसी से छिपी नहीं रही हैं। इन तमाम खबरों के बीच बीते दिनों गुजरात के शहर सूरत में कई बहुओं ने अपनी सास के मां बनने जो किस्से सुनाये उससे हर कोई गदगद हो गया। व्यावसायिक नगरी सूरत में सवानी ग्रुप वर्षों से समाजसेवा में सक्रिय है। इसके अध्यक्ष है महेश सवानी जो 17 साल से सामूहिक विवाह का आयोजन करते चले आ रहे हैं। अभी तक पांच हजार से ज्यादा बेटियों की शादियां करवा चुके हैं। 20 दिसंबर, 2025 को उन्होंने एक विशेष सम्मान समारोह का आयोजन किया, जिसमें बहुओं पर अपार प्यार और स्नेह बरसाने वाली सासू मांओं को सम्मानित किया गया। इस दिलकश आयोजन में बहुओं ने दिल खोलकर बताया कि कैसे सास मां बनकर उनकी चिंता-फिक्र करती हैं। खुशी में झूमती अनिता बोलीं, ‘‘मुझे कभी नहीं लगा कि मैं अपनी मम्मी का और परिवार को छोड़कर अपने ससुराल आ गई हूं। मेरी मम्मी से भी ज्यादा मेरी सासू मां मेरा ध्यान रखती हैं। मुझे खाना बनाना नहीं आता था। मेेरी सास ने मुझे सब कुछ बड़े प्यार से सिखाया। मेरी ममता से भरी सासु मां के अंदर मुझे मम्मी, बहन, दोस्त सब नजर आता है। मुझसे कोई गलती हो जाती है तब अपने पास बिठाकर प्यार से समझती है।’’ रजनी ने बताया कि मुझे तो घर के काम ही नहीं आते थे। नौकरी के दौरान अक्सर बाहर रहना पड़ता था तो सासू मां का मेरे बगैर मन ही नहीं लगता था। वह फोन कर मेरा हालचाल पूछती रहतीं। मेरी डिलीवरी के समय भी उन्होंने मेरी खूब देखभाल की। कभी भी मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी। स्नेहल के शब्द थे, ‘प्रेग्नेंसी के दौरान मैं कुछ भी खाती तो तुरंत उल्टी हो जाती थी। तब मेरी सासू मां उल्टी साफ करती थी। मुझे किसी बात के लिए रोकती नहीं हैं। कभी भी हमारे बीच अनबन नहीं हुई। मैं उन्हें काम करने से मना करती हूं, फिर भी आधा काम कर ही देती हैं। अगर मैं सो रही हूं और कभी देर हो जाए तो मुझे कभी नींद से उठाया नहीं है।’ अपने अनुभव को साझा करते हुए रीमा और प्रभा का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था, ‘‘मेरे सास-ससुर ने मुझे बहू नहीं, बल्कि बेटी के रूप में स्वीकार किया है। वे शुरू से ही कहते थे कि इतने सालों से बेटी नहीं है। हम तुम्हें बेटी की तरह ही रखेंगे। जब मैं ऑफिस में होती हूं तब भी मेरी सास मुझे फोन करके पूछती है-जो खाने का मन कर रहा हो, बताओ बनाकर रखूंगी। मैं ऑफिस से आती हूं तो मेरी सास और देवरानी मुझे आराम करने को कहते हैं’’....‘‘जब मेरे पिता बीमार थे, तब मैं उनकी सेवा कर सकूं, इसके लिए मुझे सासू मां ने पिता के पास रहने की छूट दी। जब मां बीमार पड़ीं तो उनकी देखभाल के लिए मैं चार महीने तक अपने मायके में रही। मेरी सास ने हमेशा मेरा पूरा सहयोग किया। कभी कोई ताना नहीं दिया।’’

Thursday, December 18, 2025

अपने ही पतन के जतन

कितनों को खबर हैं कि मांएं अपनी बिगड़ैल औलाद की मनमानी की वजह से खुदकुशी कर रही हैं। नालायक संतानों के कारण कई पिताओं की भी नींद हराम है। कितने लोग जानते हैं कि बच्चों का बचपन छिन रहा है और उनमें घर कर चुकी बुरी संगत और आदतों के कारण मां-बाप को जासूसों की शरण में जाना पड़ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया की घातक आदत से बचपन आत्मघाती और समय से पहले बड़ा हो रहा है और जन्मदाता निराश और छोटे हो रहे हैं?

उत्तर प्रदेश में स्थित चित्रकूट जिले के हरदोली गांव की निवासी शीलादेवी की बस यही तमन्ना थी कि उनका बच्चा सिर्फ पढ़ाई में ध्यान दे। आठवीं कक्षा में पढ़ रहे बेटे राजू की बेहतर परवरिश के लिए ममतामयी मां ने झांसी शहर में किराये का मकान लिया था। वह अपने पुत्र को किसी भी चीज़ की कमी नहीं होने देती थीं, लेकिन राजू ऐसी गलत संगत में जा फंसा, जिससे उसने पढ़ने-लिखने से ध्यान हटाकर मोबाइल गेम्स में अपना सारा समय व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। मां शीलादेवी उसे पढ़ाई को प्राथमिकता देने और मोबाइल से दूरी बनाने के लिए कहती तो वह आग बबूला हो जाता। 38 वर्षीय मां की रातों की नींद उड़ चुकी थी। वह बस यही सोचती रहती कि उसका 13 वर्षीय बेटा यदि इसी तरह से स्मार्टफोन और ऑनलाइन गेम की लत की दल-दल में फंसा रहा, तो उसका तो भविष्य ही चौपट हो जाएगा। एक यही इकलौता बेटा ही तो हमारी असली पूंजी है। मां के साथ-साथ पिता भी बेटे को समझाते-समझाते थक चुके थे। उन्होंने अपनी पत्नी शीलादेवी को अपनी मानसिक स्थिति और सेहत पर ध्यान देने को कहा, लेकिन वह तो बेटे के मोबाइल रोग के चलते निरंतर टूटती चली गई। मंगलवार की उस रात भी वह बहुत चिंतित और उदास थी। रात के करीब दो बजे पति रवींद्र की नींद खुली तो पत्नी कमरे में नहीं थी। दूसरे कमरे में देखने पर वह पंखे से गमछे के सहारे लटकी मिली। घबराए पति ने तुरंत उसे नीचे उतारा और भागे-भागे मेडिकल कॉलेज ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। मां की मौत के बाद बेटा फूट-फूटकर रोता रहा। रिश्तेदार सांत्वना देने की कोशिश करते रहे और वह बार-बार मां को पुकारता रहा...।

आजकल के बच्चों को माता-पिता की सीख, सुझाव और डांट किसी शूल की तरह चुभती है। हमारे दौर में तो मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि किसी गलती को बार-बार दोहराये जाने पर तमाचों से गालों को लाल कर दिया करते थे। स्कूल में टीचर भी थप्पड़ों तथा डंडों की मार से होश ठिकाने लगा दिया करते थे, लेकिन इस दौर के बच्चों में वो सहनशीलता ही नहीं रही। परीक्षा में फेल होने या कम अंक आने पर पालकों की डांट-डपट आज की पीढ़ी को मंजूर नहीं! हैदराबाद में दसवीं की छात्रा वैष्णवी ने अपने अपार्टमेंट की बिल्डिंग की छत से कूदकर इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि परीक्षा में कम अंक आने के कारण उसे कड़ी फटकार लगाई गई थी और इसके लिए उसके मोबाइल प्रेम को कसूरवार ठहरा कर कोसा और लताड़ा गया था। दिल्ली के एक स्कूल में नौंवीं क्लास में पढ़ रहे एक छात्र ने इसलिए मेट्रो स्टेशन से कूदकर अपनी जान दे दी, क्योंकि उसे जोक सुनाने तथा गप्पें मारने की वजह से अक्सर अपनी टीचर की दुत्कार सुनने को मिलती थी। एक ही कक्षा में पांच-पांच बार फेल हो जाने के कारण टीचर उसे अकेले में प्रेम से समझा-समझाकर थक चुकी थी, लेकिन अब उसने सभी छात्रों के सामने उसे नालायक और कामचोर कहना प्रारंभ कर दिया था। इससे उसे अपमान का बोध होता था। एक दिन जब टीचर ने उससे कहा कि यदि उसने खुद को नहीं बदला तो उसे टीसी देकर स्कूल से निकाल दिया जाएगा। उसे किसी अन्य स्कूल में दाखिला तक मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अपनी टीचर की अंतिम चेतावनी से डरे-सहमे छात्र के मां-बाप ने बताया कि उस दिन से वह बहुत शांत रहने लगा था। किसी से बात तक नहीं करता था, लेकिन फिर भी ऐसा कहीं भी नहीं लगता था कि वह आत्महत्या कर लेगा। उसने इस दुनिया से जाने से पहले जो सुसाइड नोट लिखकर छोड़ा वह अत्यंत भावुक तथा परेशान करने वाला है। उसकी दिमागी शब्दावली से पता चलता है कि वह समझदार तो था, लेकिन फिर भी पढ़ाई में ध्यान देने से बचता रहा। उसने अपने माता-पिता और भाई से माफी मांगते हुए लिखा है कि, वह वैसा नहीं बन पाया जैसा वे चाहते थे। अब जाते-जाते उसकी अंतिम इच्छा है कि उसके शरीर के अंग जरूरतमंद लोगों को दान कर दिए जाएं। उसके लिखे सबसे ज्यादा दिल को छू लेने वाले इन शब्दों ने तो सभी को रूला दिया, ‘‘मैं नहीं चाहता कि कोई बच्चा मेरी तरह लापरवाह बने और ऐसे खुदकुशी करे, जैसे मैं कर रहा हूं। जीवन का एक-एक पल बहुत अनमोल है। इसे व्यर्थ में न जाने दें।’’ 

नीरज कुमार वर्मा पचास की उम्र में तीस के लगते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं। उनके रहन-सहन का कमाल है। पेशे से पत्रकार और साहित्यकार वर्मा रोज सुबह पांच-छह किलोमीटर मार्निंग वॉक करते हैं। शाम को नियमित जिम में जाकर पसीना भी बहाते हैं, लेकिन उनका बीस वर्षीय पुत्र सेहत और रहन-सहन के मामले में उनसे एकदम विपरीत है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक, यू-ट्यूब, रेडिट आदि प्लेटफार्म पर हरदम उसके प्राण अटके रहते हैं। अश्लील वीडियो देखते-देखते कहीं गुम हो जाता है। घर का बना खाना उसे बिल्कुल नहीं सुहाता। महंगे होटलों के पिज्जा, बर्गर, पनीर के बने विभिन्न व्यंजन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी पोटैटो चिप्स, मैगी, कुकीज, आकर्षक पैक में भरे नमकीन, आइस्क्रीम तथा कोकाकोला जैसे पेय पदार्थों ने उसे मोटा और थुलथुल बनाते हुए डायबिटीज और दिल की बीमारी का मरीज बना दिया है। एक बार वह जहां बैठता है, वहां से उठने में उसका पसीना छूटने लगता है। हर समय बस मोबाइल में उलझा रहता है। अपने नालायक पुत्र की संदिग्ध गतिविधियों से परेशान बुद्धिजीवी वर्मा जी को जो शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है, उसका तो उन्हें ही पता है। दूसरे तो बस उन पर व्यंग्य बाण ही चलाते रहते हैं, जो अपना घर नहीं संभाल सकता, वह किस मुंह से संपादक और साहित्यकार बना फिरता है।’’ 

पीठ के पीछे तो उन धनवान पंडितजी का भी लोग कम मजाक नहीं उड़ाते, जिनके छत्तीसगढ़ में कई उद्योग-धंधे हैं। उनके न्यूज चैनल की तो मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र में भी खासी धाक है। धार्मिक प्रवृत्ति के पंडितजी ने अपनी बड़ी बेटी को बड़े अरमानों के साथ मुंबई में बीबीए यानी बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के लिए भेजा था। पंडितजी के पास धन की तो कोई कमी नहीं, इसलिए उन्होंने बिटिया को खर्च करने की खुली छूट दे रखी थी, लेकिन तब उनके पैरों तले की जमीन खिसकने लगी जब उन्हें उड़ती-उड़ती खबर मिली कि बेटी अंधाधुंध सिगरेट और शराब पीने लगी है। दोस्तों के साथ प्राइवेट पार्टीज में जाती है और रात-रात भर हॉस्टल से गायब रहती है। छत्तीसगढ़ के गांव में पले-बढ़े सीधे-सादे पंडितजी ने मायानगरी मुंबई के बारे में कई अच्छी-बुरी कहानियां सुन रखी थीं। उन्होंने बेटी को वापस लौट आने को कहा तो उसने इंकार कर दिया। बीबीए का जो कोर्स दो साल में पूर्ण होना था, उसमें चार साल लगा दिए, फिर भी अधूरा रहा। अपने किसी शुभचिंतक की सलाह पर जब उन्होंने बेटी को रोजमर्रा की गतिविधियों का पूरा सच जानने के लिए प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी का दरवाजा खटखटाया तो राह भटकी बेटी की हफ्तों की जासूसी के बाद पता चला है कि वह तो हर तरह की ड्रग्स की लत की शिकार हो किसी लड़के के साथ बिना शादी किए रह रही है। इससे पहले भी वह किसी अन्य युवक के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह चुकी है। निहायत ही शाकाहारी पंडितजी की बिटियां हर तरह की नशेबाजी के साथ-साथ छोटा-बड़ा हर तरह का मांस-मटन भी धड़ल्ले से खाने लगी है। 

सोशल मीडिया के प्रदूषण ने हमारे देश भारत में अभिभावकों के लिए गहरा संकट खड़ा कर दिया है। कहावत है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत।’ किसी भी चीज़ की अति हर जगह बुरी होती है। इसमें दो मत नहीं कि सोशल मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार और पहचान का भी साधन बन चुका है। फिलहाल भारत डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और मीडिया शिक्षा पर जोर दे रहा है। बच्चों को डर से नहीं समझ से सुरक्षित करने का रास्ता अपनाया जा रहा है। यही लोकतांत्रिक रास्ता है। अभी हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के लिए कई सोशल मीडिया मंचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। ध्यान रहे कि इस साल की शुरुआत में आस्ट्रेलिया में 14 वर्षीय बच्चे को टिकटॉक पर परफेक्ट बॉडी नामक श्रृंखला के वीडियो देख-देखकर अपने ही शरीर से घृणा होने लगी थी। खाना खाने से उसे भय लगने लगा था। आस्ट्रेलिया की सरकारी रिर्पोट से पता चला कि 10 से 15 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी सोशल प्लेटफार्म से जुड़े रहे हैं। उनमें से अधिकांश ने हिंसा, नफरत, शारीरिक हीनता और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाले कंटेंट देखे है। लगभग हर दूसरे बच्चे ने ‘साइबर बुलिंग’ झेली है और हर सातवां बच्चा ग्रूमिंग का शिकार हुआ, जहां कोई व्यस्क ऑनलाइन मीठी बातों में फंसाकर बच्चों के शोषण की कोशिश करता है। भारत में भी ऑनलाइन गेम और ‘टिकटॉक’ ने अनेकों जानें ली है और कितने बच्चों का भविष्य बर्बाद किया है। अब तो सभी जान गये हैं कि सोशल मीडिया की वजह से किशोरों तथा युवाओं में गलत आदतों के अलावा महिलाओं के प्रति गलत भावना, नफरत तथा आत्महत्या जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया में धड़ल्ले से जो रील-शार्ट वीडियो दिखाये जा रहे है उनमें हिंसा, द्वेष के साथ-साथ देवर-भाभी, भाई-बहन, पिता-बेटी, सास-ससुर जैसे पवित्र रिश्तों में जो गंदगी भर दी गई उसका सभी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। बच्चों का तो दिमाग ही अश्लील सामग्री से प्रदूषित हो रहा है। 

नग्नता देखने के बाद उनमें पवित्र रिश्तों के प्रति कैसी भावना जागेगी, इसका जवाब पाने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं। यह भी सच है कि ऑस्ट्रेलिया की तुलना में भारत बहुत बड़ा देश है। यहां पर यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि से करोड़ो लोगों का जुड़ाव है। बच्चों को सोशल मीडिया पर बहुत अधिक समय बिताने और अश्लील सामग्री पर अपना ध्यान केंद्रित करने से बचाने के लिए प्रतिबंध नहीं उनकी इंटरनेट गतिविधियों की निगरानी की जरूरत है। यह विकट समस्या और भी कई देशों में परेशानी का सबब बनी हुई है। डजिटल दुनिया में होने वाले नुकसानों की निगरानी के लिए वैश्विक स्तर पर कई संगठन खड़े हो चुके हैं। विश्व आर्थिक मंच ने ऑनलाइन हानिकारक कंटेंट से निपटने के लिए ‘ग्लोबल कोलिशन ऑफ डिजिटल सेफ्टी’ बनाया है। यह संस्था नए ऑनलाइन सुरक्षा विनियमन के लिए सर्वोत्तम तरीकों के आदान-प्रदान, ऑनलाइन जोखिम को कम करने और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों में परस्पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। कम उम्र में अनुचित ऑनलाइन कंटेंट के अलावा, सोशल मीडिया और डिजिटल सामग्री का अत्यधिक उपयोग भी एक बड़ी समस्या है। बच्चे और किशोर डिवाइस स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिता रहे हैं। यह उनके मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट का उपयोग करने वाले 11 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में समस्याग्रस्त डिजिटल व्यवहार की आशंका अधिक होती है। जैसे, केवल ऑनलाइन दोस्त बनाना और ऐसी साइटों पर जाना, जो माता-पिता को पसंद नहीं है। साथ ही उनके ऑनलाइन उत्पीड़न में शामिल होने की भी आशंका प्रबल होती है। सोशल मीडिया एप्स पर बहुत अधिक समय बिताने से चिड़चिड़ापन, खाने के विकार और आत्मसम्मान में कमी की समस्या हो सकती है। किशोरियों के लिए ये स्थितियां विशेष रूप से चिंताजनक हैं। रिपोर्ट बताती है कि 13 से 17 वर्ष की 46 प्रतिशत किशोरियों ने कहा कि, सोशल मीडिया ने उन्हें अपने शरीर के बारे में बुरा महसूस कराया। यह संकट भारत समेत पूरी दुनिया में एक जैसा है। नियामक एजेंसियां ऐसे प्लेटफॉर्मों पर लॉग इन करने के लिए पहचान और उम्र को बुनियादी मानदंड बनाने की मांग कर रही हैं। कुछ लोग इससे उपयोगकर्ता की गोपनीयता भंग होने की चिंता जता रहे हैं, लेकिन इंटरनेट को ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

Thursday, December 11, 2025

अंतिम निर्णय

मैं तो चिंतित हो जाता हूं। घबराहट होने लगती है। कई बार माथा पकड़ भी बैठ जाता हूं। आप भी बताएं कि ऐसी खबरों को पढ़कर आप पर क्या बीतती है? क्या ऐसा नहीं लगता कि नारी की आजादी, बदलाव, विकास और तरक्की के जो दावे किये जा रहे हैं, उनमें आधी-अधूरी सच्चाई है। सच तो कुछ और ही है..., जो कभी सामने आता है, कभी छुप जाता है तो कभी दबा दिया जाता है। कितने लोगों ने यह खबर पढ़ी?

छत्तीसगढ़ में स्थित बस्तर के एक छोटे से गांव बकावंड में एक डरपोक निर्दयी बाप ने अपनी बेटी को पूरे बीस साल तक अपने घर के अंधेरे दमघोटू कमरे में बंदी बनाकर रखा। बच्ची जब मात्र आठ साल की थी, तभी कायर बाप को लगा कि गांव के एक बदमाश युवक की गंदी निगाहें बच्ची पर हैं। उसने पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराने या युवक को फटकारने की हिम्मत करने की बजाय अपनी ही पुत्री की सुरक्षा के लिए यह खौफनाक रास्ता चुना। बच्ची की मां की बहुत पहले मौत हो गई थी। यह बाप मजदूरी कर किसी तरह से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता था। जिस बिना खिड़की वाले मिट्टी के कच्चे कमरे में लड़की बीस वर्षों तक कैद रही वहां पिता रोज दरवाजा खोलकर खाना रखता और फिर दरवाजा ऐसे बंद कर देता था कि लाख कोशिश के बाद बेटी के लिए बाहर निकलना तो दूर झांकना भी मुश्किल था। उसने बीस साल तक किसी बाहरी इंसान का चेहरा नहीं देखा। घोर आश्चर्य की बात है कि उसका नहाना, जागना, सोना और खाना-पीना बंद कमरे में इतने वर्षों तक होता रहा। पड़ोसियों को भी खबर नहीं लगी कि निकट के घर की दिवारों के पीछे एक मासूम बेटी कैद होकर खून के आंसू बहा रही है। लड़की के भाई-भाभी भी ज्यादा दूर नहीं रहते थे, लेकिन उन्होंने भी कभी उसकी सुध लेना जरूरी नहीं समझा। सतत अंधेरे में रहते-रहते लड़की की आंखों की रोशनी जाती रही। वह पूरी तरह से अंधी हो गई। सन्नाटे और अकेलेपन ने उसकी आवाज भी छीन ली। बच्ची से जवान हो चुकी यह बिटिया तो घुट-घुटकर अंतत: दम ही तोड़ देती यदि उसके दादा ने समाज कल्याण विभाग को इस जुल्म के बारे में जानकारी नहीं दी होती। लड़की का नाम लिसा है। लिसा को मेडिकल जांच के बाद आश्रय स्थल ‘घरौंदा’ में रखा गया है। यहां के साफ-सुथरे हवादार माहौल में पौष्टिक भोजन और नियमित स्वास्थ्य सेवाओं के साथ उसकी देखरेख की जा रही है। लिसा धीरे-धीरे मानसिक रूप से सामान्य तो हो रही है, लेकिन किसी भी अनजान इंसान को देखकर कांपने और डरने लगती है। उसकी देखरेख में जी-जान से लगी सिस्टर टेसी फ्लावर चाहती हैं कि लिसा न सिर्फ सेहतमंद हो, बल्कि जीवन को फिर से समझे और बेखौफ होकर खुशी-खुशी जीना प्रारंभ करे। लिसा का बाप अपनी बेवकूफी पर शर्मिंदा है। उसने अस्पताल के डॉक्टरों से निवेदन किया है कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं। आप ही इसकी देखरेख करें।

तीन महीने पहले दिल्ली में था। एक दूर के रिश्तेदार के यहां ठहरा हुआ था। उनका नाम है अशोक सेठी। सेठी जी की सोनीपत के पास शू फैक्ट्री है। हर तरह के शूज के निर्माता, इन महाशय की विवाहित बेटी कुछ दिनों से अपने मायके में आकर रह रही थी। कविता नाम की इस बिटिया की शादी दो साल पहले ही उत्तम नगर के रईस खानदान में हुई थी। उसका पति अनूप चड्ढा सरकारी ठेकेदारी के साथ-साथ जमीनों की खरीदी-बिक्री का बड़ा खिलाड़ी है। धन-दौलत के मामले में अपने ससुर को टक्कर देने वाले अनूप ने कुछ दिन तो कविता से अच्छा व्यवहार किया, फिर कालांतर में जब वह रोज-रोज शराब के नशे में धुत होकर आधी-आधी रात को घर आने लगा तो कविता का माथा ठनका। कविता को शराब पीने वालों से शुरू से ही नफरत थी। जब रिश्ते की बात चली थी तब उसे आश्वस्त किया गया था कि अनूप में कोई ऐब नहीं है। शराब और लड़की बाजी में लिप्त होने की बीमारी से दूर-दूर तक उसका कोई वास्ता नहीं है। वह तो सिर्फ अपने कारोबार में डूबा रहता है, लेकिन शादी के चंद रोज के बाद ही कविता को पड़ोसियों से पता चल गया कि उसका दो-दो औरतों से चक्कर चल रहा है। वेश्याओं के यहां जाकर रातें बिताने के चर्चे तो उसके तब होने लगे थे जब वह कॉलेज में पढ़ रहा था। शराब के साथ-साथ गांजा और एमडी भी वह तभी लेने लगा था। उसके करोड़पति खानदान में कोई भी शरीफ आदमी अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं था। कविता के पिता को अंधेरे में रखकर चट मंगनी-पट ब्याह का बड़ी तेजी से ऐसा चक्कर चलाया गया, जिससे उन्हें लड़के के बारे में ज्यादा खोज-खबर लेने का मौका ही नहीं मिल पाया। जिसने जो बताया उसे ही सच मानकर कविता की अनूप से शादी कर दी गई। इस शादी में कम अज़ कम पांच करोड़ रुपये की आहूति दी गई। लाखों की कार, सोना-चांदी, कपड़े एवं अन्य महंगे-महंगे उपहार देकर सेठी अपनी इकलौती बेटी का गंगा नहाने के अंदाज में कन्यादान कर कुछ हफ्तों के लिए विदेश यात्रा पर निकल लिए। शुरुआत में तो कविता यह सोचकर अपने पति की प्रताड़ना सहती रही कि वह उसे धीरे-धीरे सही राह में लाने में कामयाब हो जाएगी, लेकिन हफ्ते, महीने गुजर जाने के बाद भी रात को उसका नशे में लड़खड़ाते आना और गालीगलौच करना कायम रहा। कविता की बर्दाश्त करने की ताकत तब खत्म हो गई जब उसे अंधाधुंध मारा-पीटा जाने लगा। बार-बार घर से लाखों रुपये लाने की मांग भी की जाने लगी। दो-तीन बार उसकी मांग की पूर्ति भी की गई, लेकिन लालच का सिलसिला बना रहा। रोती-बिलखती कविता जब भी अपने मायके पहुंची तो मां-बाप ने उसे इस दिलासे के साथ सुसराल वापस जाने को विवश कर दिया कि तुम कुछ तो सब्र करो, जब बच्चा हो जाएगा तो पति खुद-ब-खुद सुधर जाएगा। कविता न चाहते हुए भी लौट तो गई, लेकिन अनूप का नजरिया नहीं बदला। उसने कविता को कोल्ड ड्रिंक में जहर मिलाकर मारने की भी कोशिश की। उसका मुंह बंद रखने के लिए खौलता हुआ पानी भी फेंका। एक रात तो जब वह अपनी पुरानी प्रेमिका को घर ले आया तो कविता के रहे सहे सब्र का पैमाना चूर-चूर हो गया। उसने फौरन अपना कुछ जरूरी सामान अटैची में भरा और पिता की शरण में चली आई। 

कविता ने जब अपना दुखड़ा मुझे सुनाया तो मैंने अशोक से कहा कि जब बेटी सुसराल में रहना ही नहीं चाहती तो बार-बार वापस जाने का फरमान सुनाकर उसे किस अपराध की सजा दे रहे हो? उसका तो कोई दोष नहीं। अब जब गलत लोगों से पाला पड़ गया है तो बेटी के हित में कोई रास्ता तो निकालना तुम्हारा फर्ज है। प्रत्युत्तर में अशोक ने यह कहकर मुझे आहत कर दिया, ‘‘तुम्हें मालूम तो है कि मैंने शादी में अपने खून-पसीने से कमाये करोड़ों रुपए खर्च किए थे। यह लड़की एडजस्ट करना ही नहीं जानती। बार-बार जिस तरह से मुंह उठाये चली आती है, उससे मेरे मान-सम्मान को ठेस लगती है। आसपास रहने वाले कई तरह की बातें करते हैं। उन्हें इसमें ही कुछ न कुछ खोट और कमी लगती हैं। मैं तो तलाक के पक्ष में भी नहीं हूं।’’

‘‘मैं तुम्हारी सोच से बिल्कुल सहमत नहीं। तुम्हें पता है कि बाप अपनी बेटी के लिए क्या-क्या नहीं करते? कुछ महीने ही हुए हैं। एक विवेकशील पिता को जब उसकी बेटी ने अश्रुपूरित आंखों से बताया कि उसका पति राक्षस से भी गया बीता है। वह ससुराल के अपमानजनक वातावरण से मुक्ति चाहती है। मुझे डर है कि, कहीं वह मेरी हत्या न कर दे या फिर मैं ही खुदकुशी करने पर विवश हो जाऊं। पिता ने बिना कोई उपदेश दिये बेटी को नर्क से वापस लाने का फैसला कर लिया। उसने अपने कुछ शुभचिंतकों को एकत्रित किया और बैंड-बाजे के साथ अपनी लाडली बिटियां को लेने जा पहुंचा। ससुराल वाले स्तब्ध रह गए। उन्हें बताया गया कि हम अपनी बेटी को लेने आये हैं। हमे उनसे कोई रिश्ता नहीं रखना है। लड़केवालों ने बिना कोई नाटक किए दहेज में मिले तमाम सामान को वापस देते हुए शर्मिंदगी से अपना सिर झुका लिया। बेटी आज अपने पिता के घर में नई शुरुआत करते हुए खुश और संतुष्ट है। मैं चाहता हूं कि अपनी बेटी के लिए तुम भी दस-बीस लोगों को बारात की शक्ल में लड़के वालों के यहां धड़धड़ाते हुए जा पहुंचो और बेटी को सम्मान के साथ वापस ले आओ, बिल्कुल वैसे ही जैसे वे नाचते-कूदते हुए वे बेटी को ब्याह कर ले गए थे। ऐसे लोगों को ऐसे ही तमाचा जड़ा जाना जरूरी है।’’

मैं सोच रहा था अशोक सेठी मेरे सुझाव को सिर आंखों पर लेते हुए सकारात्मक फैसला लेने में देरी नहीं करेगा, लेकिन उसने तो मेरी ही ऐसी-तैसी करके रख दी और मुझे अपमानित कर अपने घर से बाहर कर दिया। सेठी की पत्नी और बेटे ने भी मुझे तीखे शब्दों के वार से अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। दिल्ली से नागपुर आने के बाद मैं अपने कामकाज में व्यस्त हो गया। कुछ दिनों के बाद किसी मित्र ने मोबाइल कर अत्यंत दुखद खबर दी, ‘‘कविता ने ज़हर खाकर अपने पिता के घर में आत्महत्या कर ली है। वह किसी भी हालत में ससुराल नहीं जाना चाहती थी, लेकिन माता-पिता और भाई उस पर दबाव डाल रहे थे कि उसे पिता के घर से जाना ही होगा। अपने मायके में रहकर कब तक हमारी बदनामी का कारण बनी रहोगी?’’

 बदनामी और मान-सम्मान दोनों ही कहीं न कहीं उस अभिमान से जुड़े हैं, जिसकी वजह से अभी तक न जाने कितनी बहन, बेटियों और बहुओं की जान जा चुकी है। ऊंच-नीच, अमीर गरीब की स्वार्थी और घटिया सोच का कभी अंत होगा भी या नहीं? इक्कीस साल की आंचल और बीस साल के सक्षम ने एक दूसरे से सच्चा प्रेम ही तो किया था। दोनों निश्छल प्रेमी अलग-अलग जाती के थे। सदियों से चला आ रहा यही अंतर, भेदभाव उनका दुश्मन बन गया। लड़की के परिजन हर तरह से बलवान थे। उन्होंने प्रेमी सक्षम को अपने बेटी से मिलने से बहुत रोका-टोका, लेकिन न तो वो माना और प्रेमिका भी अडिग बनी रही। दोनों लगभग तीन वर्ष से प्रेम के पवित्र रिश्ते की मजबूत डोर से बंधे हुए थे। नांदेड़ शहर में जन्मा और पला बढ़ा सक्षम ताटे बौद्ध समाज का युवक था तो आंचल का पदमशाली (बुनकर) समाज से नाता था। यह कम्यूनिटी स्पेशल बैकवर्ड क्लास में आती है। अहंकारी आंचल के परिवार को दोनों का एक होना कतई मंजूर नहीं था। उन्होंने सक्षम की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सक्षम की गोली मार कर हत्या की गई थी। कविता को जैसे ही अपनेे प्रेमी की नृशंस हत्या के बारे में पता चला तो वह रात को ही अपने पिता का घर छोड़ सक्षम के घर जा पहुंची और उसने हमेशा-हमेशा के लिए वहीं रहने का ऐलान कर दिया। जब सक्षम के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी तब आंचल ने जो फैसला किया उससे हर कोई स्तब्ध रह गया। समर्पित प्रेमिका ने अपने प्रेमी को अंतिम विदाई देने से पहले दुल्हे की तरह सजा कर शादी की रस्में निभाते हुए उसके शरीर पर हल्दी-कुमकुम लगाई और उसके हाथ से वही हल्दी-कुमकुम अपने शरीर पर लगाया तथा शव के हाथ में सिंदूर देकर उसे अपने माथे पर लगा दिया और मांग में भी भर दिया। जब अंतिम संस्कार की पूर्ण तैयारी हो गई और परिजन अर्थी को कंधा देने के लिए उठाने लगे तो आंचल ने सबको रोक कर अर्थी के साथ रोते-बिलखते हुए सात फेरे लेते हुए  कहा यह उसका सच्चा विवाह है। मरते दम तक मैं किसी और के बारे में नहीं सोचूंगी। मेरा परिवार चाहता था कि हम अलग हो जाएं, लेकिन मैंने तो सक्षम से शादी कर ली। अंतिम यात्रा से पहले उसके नारियल फोड़ते ही आसपास मौजूद पड़ोसी और सभी परिवार वाले फूट-फूटकर रो पड़े। कविता ने अपने हत्यारे पिता और भाइयों को फांसी के फंदे पर लटकाने की मांग की है।