दिशा की उम्र महज तेरह साल है। वह सातवीं कक्षा में पढ़ती है। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि वह पांच हजार लोगों को सिगरेट पीने की लत से मुक्ति दिलवा चुकी है। जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई और खेल कूूद में मस्त रहते हैं, उस उम्र में दिशा का ‘मिशन नो स्मोकिंग’ के प्रति जबर्दस्त जिद्दी रूझान वाकई स्तब्ध करके रख देता है। दिशा जब मात्र छह साल की थी तब उसके दादा की मौत हो गई थी। दिशा को अपने प्यारे दादा से बहुत लगाव था। वे भी उस पर सारा अपनत्व और प्यार उड़ेल दिया करते थे। दादा का एकाएक दुनिया को छोड़कर चले जाना दिशा के लिए किसी दु:खदायी स्वप्न और पहेली से कम नहीं था। उसकी मां ने दिशा को जब बताया कि उसके दादा सिगरेट बहुत पीते थे इसलिए उन्हें कैंसर हो गया था। कैंसर ने ही उनकी अंतत: जान ले ली। छोटी-सी बच्ची दिशा को उसी दिन से सिगरेट से नफरत हो गई। वह जिस किसी को भी सिगरेट फूंकते देखती तो उसे उसकी मौत की कल्पना जकड़ लेती। उसने तभी ठान लिया कि वह लोगों की सिगरेट की लत को छुड़ाएगी और उन्हें मौत के मुंह से जाने से बचाएगी। जो लोग उसके अनुरोध को अनदेखा करते, दिशा उनके मुंह से सिगरेट छीनकर फेंक देती। लोग गुस्से से तिलमिला उठते और दिशा के गाल पर तमाचे भी जड़ देते। जिद की पक्की दिशा तमाचे खाकर भी मुस्कराती रहती और धीरे से कहती कि अंकल यह सिगरेट बहुत बुरी चीज है। इसको पीने से मेरे दादाजी चल बसे, कृपया आप इसे फेंक देें वर्ना आपका भी मेरे दादा जैसा हाल होगा। ऐसे में मासूम दिशा के अनुरोध का अधिकांश लोगों पर असर होना स्वाभाविक था। कुछ लोग जल्दी मानते तो कुछ लोग देरी से। छोटी सी बच्ची के मुख से धूम्रपान से होने वाले जानलेवा नुकसान के बारे में सुनना लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी था।
दिशा ने बताया कि मैंने एक डायरी बनाई है। उसमें स्मोकिंग करने वाले लोगों से वादा कराती हूं कि वो आज से सिगरेट नहीं पियेंगे। उन्हें अपने वादे की याद रहे इसलिए उनके हस्ताक्षर भी करवाती हूं। उनके मोबाइल नंबर नोट करती हूं और फिर उन्हें मैसेज और फोन करके फॉलोअप लेती हूं। अभी तक मेरी तीन डायरी भर चुकी हैं और पांच हजार से ज्यादा लोग सिगरेट से तौबा कर चुके हैं। अपने इस मिशन के प्रति पूर्णतया समर्पित दिशा पढ़ाई-लिखाई से भी समझौता नहीं करती। वह कक्षा में हमेशा अव्वल आती है। जिस दिन स्कूल की छुट्टी रहती है उस दिन वह पान-सिगरेट की दुकानों पर अपने दोस्तों के साथ पहुंच जाती है और लोगों को धूम्रपान छोड़ने के लिए प्रेरित करती है। कई लोगों की जिन्दगी में बदलाव लाने वाली दिशा जब भीड़ को धूम्रपान से होने वाली बीमारियों और तकलीफों के बारे में अवगत कराने के लिए बोलती है तो लोग मंत्रमुग्ध सुनते रह जाते हैं।
सभी जानते हैं कि अपने वतन में नशे के सामानों की खपत बढ़ती चली जा रही है। युवा पीढ़ी को विभिन्न नशों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सरकार एक तरफ शराब, सिगरेट आदि की बिक्री की छूट देती है तो दूसरी तरफ इनसे होने वाली जानलेवा बीमारियों से अवगत कराने के लिए करोड़ों-अरबों रुपये विज्ञापनबाजी में भी खर्च करती है। सरकार के ऐसे सतही प्रयासों का लोगों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। ड्रग्स के प्रति युवाओं के बढ़ते रूझान और शराब की दुकानों पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारें बता देती हैं कि लोग किस राह पर जा रहे हैं। राजधानी दिल्ली में रहने वाले प्रदीप सिंह गलियों में घूमते हुए युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए गीत गाते दिखायी देते हैं। नशे के खिलाफ आवाज उठाने और चेतना के गीतों के स्वर बिखेरने वाले प्रदीप चाहते हैं कि उनका संदेश ड्रग्स के शिकार हर युवा तक कुछ इस तरह से पहुंचे कि वह नशे से तौबा कर ले। यह पूछने पर कि उनके मन में गीतों के जरिए युवाओं में जागृति लाने का विचार कैसे आया तो उन्होंने बताया कि मेरे आस-पड़ोस में निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चें हैं और यहां लोगों ने नशे के लिए अपने घर भी बेच दिए हैं। इनकी जिन्दगी नशे के कारण पूरी तरह से तबाह हो गई है। मुझसे ऐसे भयावह मंजर देखे नहीं जाते। मेरी गीत लिखने की तो बचपन से रूचि थी। ऐसे में मन में विचार आया कि अपने गीतों के जरिए नशेड़ियों को नशा छोड़ने का आग्रह कर मानवता के धर्म को निभाऊं और अपने होने को सार्थकता प्रदान करूं। प्रदीप का यह प्रयास व्यर्थ नहीं गया। उनके गीत और संगीत को सुनकर कई युवाओं ने ड्रग्स को हाथ नहीं लगाने की कसम खा ली है। वे अपने गीतों के जरिए और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात कर लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं।
हिन्दुस्तानी बेटियां अगर चाहें तो कुछ भी कर सकती हैं। इसे एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है महाराष्ट्र के अकोला जिले की नासरी ने। जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बहुल गांव भिलाला में आधी आबादी छोटे किसानों की है और आधी मजदूरों की। नासरी को बचपन से ही खेती में पिता का हाथ बंटाते-बंटाते यह हकीकत समझ में आ गई कि खेती का काम पूरी तरह से घाटे का सौदा है। जितनी लागत लगायी जाती है, उतनी भी नहीं निकल पाती। यदि थोड़ा मुनाफा होता भी है तो वह बैंकों और साहूकारों के कर्ज को चुकाने में खर्च हो जाता है। किसान के हाथ में कुछ भी नहीं आता। आदिवासी बालिका नासरी को एक ऐसी संस्था के बारे में पता चला जो जैविक खेती ऑर्गेनिक फार्मिंग को प्रोत्साहित करने में लगी थी। इस विधि से खेती करने पर खेती की लागत रासायनिक विधि की तुलना में एक चौथाई हो जाती है। नासरी ने तुरंत जैविक खेती का निर्णय ले लिया। प्रारंभमें उसके पिता ने आना-कानी की, लेकिन नासरी ने उन्हें मना कर ही दम लिया और खुद ही कंपोस्ट खाद आदि तैयार कर विशेषज्ञों द्वारा बतायी गई विधि से खेती प्रारंभकी।
पहली बार में ही जैविक खेती से वाकई लागत एक चौथाई रह गई और पैदावार भी उतनी हुई जितनी पहले होती थी। अपने खेत में सफल प्रयोग करने के बाद नासरी ने गांव वालों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करने का अभियान चलाया। शुरू-शुरू में तो अविश्वास जताते हुए उसका मज़ाक भी उड़ाया गया। इस तरह का बर्ताव भारतीय परंपरा का अंग है। नासरी किसानों को मरता नहीं देख सकती थी इसलिए उसने गांव वालों को आश्वस्त किया कि वह उनका घाटा कदापि नहीं होने देगी। अगर हुआ भी तो वह खुद झेलेगी। उसने किसानों के लिए खाद आदि स्वयं तैयार कर उपलब्ध करायी। सफलता तो मिलनी ही थी। उसकी सूझबूझ ने गांव की सूरत ही बदल दी। उसके गांव की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी है। किसान खुश हैं। खेती से उन्हें फायदा होने लगा है। देश एवं विदेश के कृषि विशेषज्ञ नासरी के गांव में आते रहते हैं और एक परी की जुनूनी सफलता को देखकर यह मानने को विवश हो जाते हैं कि भारतीय बेटियां अगर ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। जैविक खेती से अपने गांव की तस्वीर बदलने वाली नासरी को महाराष्ट्र सरकार ने कृषि भ्ाूषण पुरस्कार से नवाजा है तो डॉ. पंजाब राव कृषि विद्यापीठ अकोला ने अपना ‘ब्रांड अंबेसेडर’ बनाया है। इसके साथ ही वह 30 से ज्यादा विभिन्न संस्थाओं के द्वारा पुरस्कृत की जा चुकी है।
भयंकर गर्मी के दिन थे। एक युवती अपने दोस्तों के साथ मॉल में खरीदी और मौज-मज़ा करने के लिए गई थी। जब वह मॉल के बाहर निकली तो उसने ऐसे कुछ गरीब बच्चों को देखा जिनके पैरों में चप्पल नहीं थी। पेट की भ्ाूख की तड़प उनके चेहरे से साफ-साफ झलक रही थी। उन्हें भीख मांगते देख उसके मन में कई तरह के विचार आने लगे। वह मॉल से घर लौट तो आई, लेकिन नंगे पैर, भीख मांगते बच्चों का चेहरा बार-बार उसके सामने आ जाता। उसके मन में विचारों की आंधी चलने लगी। उसने सोचा कि पांच-सात सौ रुपये तो वह यूं ही उड़ा देती है। इन बच्चों को पचास-सौ रुपये की चप्पल नसीब नहीं। नंगे पैर घूमने से बच्चों के पैरों में इन्फेक्शन और कई बीमारियां हो जाती हैं। इन रुपयों से दस-बारह बच्चों का खाना और पैरों में एक जोड़ी चप्पल तो जरूर आ सकती है। उसने सबसे पहले बच्चों के नंगे पैरों के लिए चप्पलें उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। वह अपने दोस्तों से मिली। बच्चों की तकलीफ के बारे में उन्हें अवगत कराया। आपस में मिलकर पैसे जुटाये गए। इन पैसों से बच्चों के लिए चप्पलें खरीदी गयीं। युवती ने रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गलियों में रहने वाले गरीब बच्चों को चप्पलें बांटनी शुरू कर दीं। उसका साथ देने वालों का कारवां बढ़ता चला गया। आज उसकी टीम में डाक्टर, इंजीनियर तथा समाजसेवक, उद्योगपति तक शामिल हैं। जहां चप्पलें बांटनी होती हैं वहां पर उनकी टीम पहले जाकर सर्वेक्षण करती है फिर उन परिवारों को चप्पलें बांटी जाती हैं जिन्हें इनकी जरूरत होती है। हजारों बच्चों को चप्पलें उपलब्ध करवाने वाली इस सच्ची बालसेविका का अगला लक्ष्य गरीब बच्चों को भोजन और फिटनेस किट मुहैया कराना है। वे चाहती है कि दूसरे लोग भी अपने स्तर पर आसपास के गरीब बच्चों की मदद करें, ताकि कोई भी बच्चा खाली पेट और नंगे पैर होने के कारण बीमार न पड़े। बच्चों के नंगे पैरों में चप्पलें पहनाने वाली इस आदर्श युवती का नाम है डॉ. समर हुसैन। क्या आप उसका अभिनंदन नहीं करना चाहेंगे?
