Thursday, July 9, 2026

बचपन की पाठशाला

  अपने देश भारत की लगभग एक तिहाई आबादी नाबालिग है। यहां 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे करीब पच्चीस फीसदी हैं फिर भी बच्चों की पता नहीं क्यों ज्यादा चिंता-फिक्र नहीं की जाती? हां, ढोल जरूर पीटे जाते हैं कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। राष्ट्र निर्माण में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आनेवाले समाज और राष्ट्र की नींव हैं। इन्हीं को आगे जाकर नेता, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाजसेवक, उद्योगपति आदि बनना है। बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की हम सबकी जिम्मेदारी है। हमारे देश में हर वर्ष 14 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ जो बाल दिवस मनाया जाता है उसका मूल अर्थ और संदेश यही है कि भारत माता का हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा, सेहत, देखरेख और प्यार का अधिकारी है। कलमकार की नज़र जब गली-कूचों, चौराहों, होटलों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मंदिरों, मदिरालयों, अस्पतालों आदि के ईद-गिर्द छोटे-छोटे बच्चों को कचरा बीनते और भीख मांगते देखती है तो यह प्रश्न तीर की तरह तन जाता है कि यह बच्चे कौन हैं? यकीनन अमीरों की संताने तो नहीं हैं। उनकी औलादे तो तरह-तरह की चॉकलेट, पिज्जा खाने और खिलौने के लिए जन्मी हैं। बदनसीब तो गरीबों के बच्चे हैं, जिन्हें जानवरों की तरह भटकना पड़ता है। स्कूल तो इनके लिए सपना है। ढंग का खाना भी इनके नसीब में नहीं लिखा है। उसे भी ये कचरे में तलाशते हैं। देश के अधिकांश शहरों में डंपिंग यार्ड बनाये गये हैं, जहां पर पूरे शहर की गंदगी जमा होती है। गरीबों के बच्चे इनके इर्द-गिर्द बनी झुग्गी-झोपड़ियों में अपने गरीब मां-बाप के साथ रहते हैं। यह भी जान लें कि कचरे के पहाड़ों के आसपास सक्षम लोग जाना ही नहीं चाहते। यहां से उठने वाली दुर्गंध की वजह से सांस ले पाना मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने काम का कचरा तलाशते देखे जा सकते हैं। इस कचरे में प्लास्टिक की खाली बोतलें, घरों का बेकार सामान, अस्पतालों के द्वारा फेंके गए दास्तानें, इंजेक्शन, फटे पुराने कपड़े, पेन-पेंसिल और किताब, कॉपियां, तौलिए के साथ-साथ कंडोम जैसी बेकार की बहुत सी चीजें होती हैं। गरीब बच्चों की खोजी निगाहें यहां से वो सामान तलाश ही लेती हैं, जिन्हें कबाड़ी चंद सिक्कों में खरीद लेते हैं। बरसात में तो डंपिंग यार्ड में पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों की वजह से डेंगू, मलेरिया जैसे जानलेवा बीमारियों का खतरा होता है। लेकिन गरीबों के बच्चे इसकी परवाह नहीं करते। उनके लिए घर-परिवार तथा खुद के पेट की आग को शांत करने के लिए यही आसान रास्ता है। 

विख्यात कवयित्री अनामिका की कविता की यह पंक्तियां बरबस याद हो आती है :

 ‘‘उन्हें हमेशा जल्दी रहती है,

उनके पेट में चूहे कूदते हैं

और खून में दौड़ती है गिलहरी!

बड़े-बड़े डग भरते

चलते हैं वो तो

उनका ढीला-ढाला कुर्ता 

तन जाता है फूल जाता है उनके पीछे

जैसे कि हो पाल कश्ती का!

बोरियों में टनन-टनन गाती हुई

रम की बोतलें

उनकी झुकी पीठ रीढ़ से

कभी-कभी कहती है, 

कैसी हो? कैसा है मंडी का हाल?’’

नाबालिगों को चोरी-चक्कारी, हेराफेरी के साथ-साथ और भी कई गंभीर अपराध करने के बाद पुलिस पकड़ में आते देखना तो अब आम हो गया है। हाल के वर्षों के दौरान जिस तरह से नाबालिगों ने बलात्कार और हत्या के आरोप में पकड़े जाने पर मीडिया की सुर्खियां बटोरते हुए मां-बाप को भी कलंकित किया है। उस पर जितना भी लिखा जाए, कम है। 

हिंदुस्तान का कानून दहाड़-दहाड़ कर कहता है कि बाल मजदूरी अपराध है। लेकिन कई पटाखों, बारुद की फ्रैक्ट्रियों, ईंटभट्टों, शराब कारखानों तथा मंत्रियों-संत्रियों के आलीशान घरों में छोटे-छोटे बच्चे आपको खून पसीना बहाते दिखाई दे जाएंगे। फिल्मों, टीवी तथा विज्ञापनों में बाल कलाकारों से जबरन अभिनय कराकर उनके शोषण के सच से जागरूक भारतीय खूब-खूब वाकिफ हैं। मेरे देखने में तो यह भी आया है कि महाराष्ट्र और विदर्भ के कई धनाढय परिवार खास तौर पर छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश की कम उम्र की लड़कियों को मोटी पगार का प्रलोभन देकर अपने घरों पर बर्तन, झाड़ू और विभिन्न कार्यों को कराने के लिए लाते हैं और मनमाने तरीके से काम करवाते हैं। उनसे काम करवाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती। इन्हें पढ़ा लिखाकर शिक्षित बनाने तथा बेहतरीन पगार देने का लालच देकर लाया जाता है। मां-बाप भी बहुत आसानी से झांसे में आ जाते हैं। लेकिन अधिकांश मालिक दो-चार महीने में ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दुष्टता उतर आते हैं। उन्हें आराम करने का समय ही नहीं दिया जाता। बस काम ही काम। कैदी की तरह जीने को विवश कर दी गई बच्चियों पर बलात्कार किये जाने की खबरें उनकी नीचता का पर्दाफाश करती रहती हैं। बाल श्रमिकों की तस्करी की खबरें भी किसी से छिपी नहीं हैं। जिला बाल कल्याण विभाग एवं संरक्षण विभाग तथा पुलिस को समय-समय पर छापेमारी कर बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। बच्चों से बड़ी बेशर्मी के साथ मेहनत, मजदूरी कराने वाले दबंग किस्म के शहरी छाती तान कर खड़े हो जाते हैं कि यह बच्चे अपने परिवार की सहमति से काम करते हुए अपने असहाय माता-पिता की सहायता कर रहे हैं। इस पर किसी को भी आपत्ति दर्शाने का कोई अधिकार नहीं। ऐसा भी देखने में आता है कि कम उम्र के घरेलू नौकरों को अपना रिश्तेदार बताकर बाल कल्याण विभाग की आंखों में धूल भी झोंकी जाती है। असहाय, लावारिस बच्चों की देखरेख और सुरक्षा को लेकर सरकारी कोशिशें की तो जाती हैं  लेकिन हकीकत हमारे सामने है। हर बच्चे के हाथ में किताबें हों, खिलौने हों, वे स्वस्थ रहें उन्हें कोई बीमारी न घेरे, इसी सोच और संदेश को प्रचारित और बलवति करने के लिए हर वर्ष 13 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया तो जाता है, लेकिन शासकीय और प्रशासकीय आधे-अधूरे प्रयास प्रशंसा के तो कतई काबिल नहीं। उलटे हमारे समाज में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिनसे छोटे-छोटे बच्चों की दुर्दशा देखी नहीं जाती। उनकी पहल शासन और प्रशासन को मात देती नज़र आती है। यहां मैं 31 वर्षीय रिक्की राज का खास तौर पर उल्लेख करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। रिक्की अपनी परोपकारी संस्था ‘छोटू फाउंडेशन’ के माध्यम से शोषण, अनिश्चितता, गरीबी और भूख की अथाह मार झेलते बच्चों के जीवन को नई दिशा देकर सुधार रहे हैं। हवा-हवाई भाषणबाजी करने वाले नेताओं को आईना दिखाते रिक्की राज के ‘छोटू फाउंडेशन’ के द्वारा अभी तक पांच हजार से अधिक बच्चों के जीवन को संवारते हुए समाज की मुख्य धारा में लाया जा चुका है। अभावग्रस्त आधा-अधूरा बचपन जीते बच्चों के कल्याण का विचार रिक्की के मन में आखिर कैसे आया? वर्ष 2017 में वह उत्तरप्रदेश के आगरा हाईवे से गुजर रहे थे। तभी कुल्फी बेचते एक बच्चे पर उनकी नजर पड़ी। वह कुल्फी बेचने में इस कदर खोया था कि एक तेज रफ्तार बस उसे कुलचते हुए आगे निकल गई। बच्चा सड़क पर लहुलूहान होकर कराहता रहा। किसी ने उसको उठाकर अस्पताल ले जाने की पहल नहीं की। सभी एक-दूसरे का मुंह देखते रहे और बच्चा अंतत: मर गया। आंखों देखे इस दर्दनाक हादसे ने रिक्की की सोच ही बदल दी। वहीं खड़े-खड़े उन्होंने निर्णय ले लिया कि लाचार बच्चों के लिए कुछ सार्थक करना है। 2018 में छोटू फाउंडेशन की स्थापना कर रिक्की ने खुद को असहाय बच्चों के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि, मैंने विभिन्न अभावग्रस्त क्षेत्रों में घूम-घूमकर सर्वे करते हुए पाया कि  कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अमूमन नशे की लत लग जाती है। इसकी वजह से अधिकांश तीस से चालीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मौत का निवाला बन जाते हैं। यह नशे की लत और गरीबी ही है, जो बच्चों को गलत राह पर ले जाकर अपराधी बना रही है। ‘छोटू की पाठशाला’ में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ सेहतमंद रखने के दायित्व को भी प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है। स्वास्थ्य की नियमित जांच की जाती है। उनके कौशल विकास पर भरपूर जोर दिया जाता है। उन पर हमेशा नजर रखी जाती है कि कहीं वे फिर से गलत राह के राही न बन जाएं। छोटू फाउंडेशन के कर्ताधर्ता रिक्की राज की सजगता और ईमानदारी को देखते हुए अनेकों परीचित, दोस्त और रिश्तेदार भी उनकी मदद करने के लिए आगे आने लगे हैं। इसमें अधिकतम मदद तो सोशल मीडिया के जरिए क्राउड फंडिंग से मिलती चली आ रही है। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से शुरू हुआ ‘छोटू फाउंडेशन’ अब नोएडा, ग्रेटर नोएडा के अलावा बिहार और राजस्थान में भी जोर-शोर से सक्रिय है। हमारे देश के हुक्मरान 2047 तक पूर्णतया विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जहां-तहां गगनचुंबी इमारतें, मेट्रो, एक्सप्रेस-वे और अरबो-खरबों का निवेश किया जा रहा है। लेकिन इन बच्चों की किसी को कहीं कोई चिंता नहीं! किसी भी जागरूक भारतीय से यदि सार्थक विकास की परिभाषा पूछें तो वह यही कहेगा कि जब तक देश का हर छोटा-बड़ा नागरिक सुरक्षित और सम्मानित नहीं, तब तक ऐसा विकास आधा-अधूरा है। असली विकास तो तभी होगा, जब इस देश के बचपन को बदहाली से छुटाकारा मिलेगा। हर छोटे-बड़े नागरिक की सेहत और जेब मजबूत होगी। उसे किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।

Thursday, July 2, 2026

छल, कपट, बेवफाई की खाई

 झारखंड के बोकारो जिले में एक सत्रह वर्षीय लड़की फिल्मी अंदाज में 100 फुट ऊंचे मोबाइल टॉवर पर चढ़ गई। लड़की की जिद थी कि वह तब तक नीचे नहीं उतरेगी, जब तक उसके प्रेमी को जेल से रिहा नहीं किया जायेगा। लड़की का रांची के एक युवक से प्रेम प्रसंग चल रहा था। वह उसी से शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके मां-बाप तैयार नहीं थे। उन्होंने उसके प्रेमी के खिलाफ अपहरण की झूठी शिकायत दर्ज करवा दी। कर्तव्यपरायण भारतीय पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया। अदालत ने प्रेमी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। प्रेमिका को यह नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं हुई और उसने प्रेमी को छुड़वाने के लिए मोबाइल टॉवर का सहारा लिया। कई घंटों तक वह इस मांग के साथ वहीं डटी रही।  एहतियातन टॉवर के चारों ओर नेट बिछाया गया। सभी चिंतित और भयभीत थे कि वह कहीं कूदकर अपनी जान न दे दे। उसे मनाने, समझाने और नीचे लाने में पुलिस को कई घंटे लग गए। छत्तीसगढ़ के शहर जांजगीर में विवाह समारोह के दौरान दूल्हे को नशे में धुत देखकर दुल्हन ने शादी करने से सरासर इंकार कर दिया। मुस्कान नामक इस लड़की ने सगाई के समय भी लड़के को जब नशे में टुन्न देखा था तब उसका माथा घूम गया था। तब उसने उसे जीभर कर डांटा-फटकारा था। लड़के के कान पकड़ने पर ही वह शादी के लिए मानी थी। लेकिन जब उसने गौर किया विवाह की रस्मों के दौरान वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा है। नशे में बहकी-बहकी बातें कर रहा है तो उसने नशेड़ी के साथ सात फेरे लेने से स्पष्ट मना कर दिया। मुस्कान के इस साहसिक निर्णय का सभी ने स्वागत किया। जिला पुलिस अधीक्षक तथा विभिन्न समाजसेवकों की उपस्थिति में उसे पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। वो जमाना बहुत पीछे छूट चुका, जब कोई भावुक कवि नारी को अबला बताता था तो पाठक कवि की नारी के प्रति सहानुभूति में रची-बसी सोच की सराहना करते थे। उसे नारी का हितकारी घोषित कर हार, गुलदस्तों और शालों से सम्मानित करते थे। आज नारी, पुरुषों को कड़ी टक्कर देते हुए नया इतिहास लिखने, रचने की ओर तेजी से अग्रसर है। शिक्षा, खेलकूद, ज्ञान-विज्ञान, समाज सेवा, राजनीति आदि तमाम क्षेत्रों में झंडे गाड़ती नारियों की  प्रेरक उपलब्धियों की प्रभावी खबरें हर सजग भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती हैं।

ऐसा कोई भी देशवासी नहीं जो नारी को शिखर पर देखना नहीं चाहता हो। लेकिन बीते कुछ वर्षों से कुछ नारियों के द्वारा संगीन अपराध करने के मामले में पुरुषों की बराबरी करने की खबरों ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। क्रिमिनल लड़की है या लड़का इसमें किसी का पक्ष लेने और सहानुभूति दर्शाने की कोई गुंजाइश नहीं है। बेवफाई तो अपनी जगह है लेकिन कुंआरी और शादीशुदा युवतियां जिस तरह से नृशंस हत्याएं करते हुए मीडिया में छा रही हैं, उससे यह सवाल तो सताता ही है कि क्या उन्हें कानून का भय और जानकारी नहीं? जेलों में जिस तरह से महिलाओं की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि अपराध करने को आतुर नारियों ने अवैध रिश्तों तथा भोग विलास को ही अपने जीवन का असली मकसद मान लिया है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि माता-पिता पर क्या गुजरती है और समाज कैसे-कैसे उनके छल, कपट और गिरेपन पर थूकता है। अपने करीब देखने के लायक ही नहीं समझता। एक हकीकत यह भी है कि बिगड़ी और भटकी शहजादियां इस भरोसे और भ्रम में संगीन अपराधी बन रही हैं कि उनके रईस मां-बाप किसी न किसी तरह से उन्हें बचा ही लेंगे। पैसे से तो सब कुछ खरीदा जा सकता है। यहां तक कि शासन और प्रशासन की बागड़ोर संभाले ऊंचे लोगों का ईमान धर्म भी। उनके लिए यह भी बचकानी सोच है कि सच्चा प्यार ईश्वर की पूजा है। स्वार्थ और बेवफाई का अंजाम कभी भी सुखद नहीं होता। अपने आशिक के लिए पति और मंगेतर को मौत के घाट उतार देने की क्रूर घटनाएं रिश्तों को ही कलंकित नहीं करतीं, मानवता को भी झकझोर देती हैं। 

बीते हफ्ते महाराष्ट्र के पुणे में एक लड़की ने अपने होनेवाले पति को प्रेमी के साथ मिलकर मौत के घाट उतार दिया। इतना ही नहीं उसने नृशंस हत्या को एक हादसे का रूप देने की खौफनाक साजिश रचते हुए प्यार में अंधी, बेवफा युवतियों और पत्नियों की अपराध कुख्यात चर्चित। डायरी के पन्ने खोल दिए। जिनका खबरों से अटूट नाता है, उनके लिए तो राजा रघुवंशी हत्याकांड को भूला पाना बहुत मुश्किल है। हनीमून पर ही खून की होली की कल्पना कौन कर सकता है? इंदौर की पच्चीस वर्षीय सोनम की 11 मई 2025 को राजा रघुवंशी से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। शादी के एक महीने के बाद दोनों हनीमून के लिए शिलांग जा पहुंचे। सोनम ने राजा रघुवंशी से ब्याह तो कर लिया था, लेकिन उसका पूर्व प्रेमी राज कुशवाह अभी भी उसके तन-मन में बसा था। सात फेरे लेने के पश्चात भी वह रघुवंशी को अपना पति स्वीकार नहीं कर पायी थी। प्रेमी के प्यार में अंधी हुई सोनम के लिए हनीमून तो महज दिखावा था। उसने पहले से ही अपने पति को यमलोक पहुंचाने की योजना बना ली थी। इस षडयंत्र में साथी था प्रेमी राज कुशवाह। दोनों ने मिलकर योजना बनाई। तीन कॉन्ट्रेक्ट किलर को अच्छी-खासी फीस देकर शिलांग बुलवाया और हनीमून के दौरान पति राजा रघुवंशी की धारधार हथियारों से हत्या करवाने के पश्चात गहरी खाई में फेंक दिया। उसके पश्चात सोनम ने पुलिस के समक्ष लूटपाट का नाटक किया। इतना ही नहीं खुद के बेहोश होने की झूठी कहानी भी गढ़ी। राजा के शरीर पर हथियारों की मार के गहरे घाव थे, जबकि सोनम को नाममात्र की खरोंच तक नहीं आई थी। सलाखों के पीछे पहुंचने के पश्चात सोनम के पास पछतावे के सिवा और कोई चारा नहीं था।

मध्यप्रदेश के धार जिले में 2026 के अप्रैल महीने में 28 वर्षीय पुरोहित देवकृष्ण की उसके घर में ही हत्या कर दी गई। यहां भी हत्यारी थी उसकी पत्नी प्रियंका, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को इसलिए  मार डाला, क्योंकि उसके शरीर का रंग काला था और उसके अनुसार उसके लायक भी नहीं था। हत्या के बाद प्रियंका ने पुलिस को बताया कि लुटेरों ने घर में घुसकर लूटपाट की और मेरे जीवनसाथी का खात्मा कर दिया। लेकिन सच्चाई सामने आने में ज्यादा समय नहीं लगा। रिश्तेदारों तथा जान पहचान के लोगों से पता चला कि हत्यारी अपने पति को काला-कलूटा और नाकाबिल कहकर  अपमानित करती रहती थी। वर्ष 2017 में तेलंगाना में स्वाति नामक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को बेहोशी का इंजेक्शन देकर मार डाला। इतना ही नहीं उसका नामो निशान खत्म करने के लिए शव को जंगल में जला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। बिल्कुल फिल्मी तौर-तरीके के साथ उसने अपने प्रेमी के चेहरे पर एसिड डाला और ससुराल वालों को बताया कि अज्ञात लोगों ने उसके पति सुधाकर पर एसिड अटैक किया है। दरअसल, हत्यारी पत्नी अपने प्रेमी राजेश की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उसे हमेशा-हमेशा के लिए पति सुधाकर की पहचान देने की तैयारी में थी। लेकिन अस्पताल में जब नकली सुधाकर (राजेश) को मटन सूप परोसा गया तो उसने लेने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि वह शुद्ध शाकाहारी था, जबकि सुधाकर (पति) मांसाहारी था। इसी वजह से ससुरालवालों को शक हुआ और हैरतअंगेज और खौफनाक साजिश का पर्दाफाश हो गया। बिरयानी में नींद की गोलियां डालकर पति का हमेशा-हमेशा के लिए अंत, कत्ल करने के बाद नीले और पीले ड्रम में पति की लाश छिपाने दबाने की खबरों को भी भूला पाना आसान तो नहीं। यह खौफनाक हिंसक सिलसिला कब और कहां जाकर थमेगा, इसका उत्तर फिलहाल नदारद है। 

18 जून 2026 के दिन रियल एस्टेट कंपनी के मालिक केतन अग्रवाल को उसकी मंगेतर सिया गोयल ने पुणे के निकट स्थित विख्यात लोहगढ़ किले  की पहाड़ियों पर भ्रमण के बहाने से ले जाकर खाई में धकेलकर जो दर्दनाक मौत दी उससे उसने भी कुख्यात हत्यारियोेंं में अपना नाम शामिल करवा लिया। इस शातिर लड़की का अखबारों तथा सोशल मीडिया से कुछ न कुछ तो वास्ता रहा होगा, जिनमें वासना में अंधी हुई बेवफा, बेवकूफ नारियों की खबरे सुर्खियां बन सभी को सावधान करती रहती हैं। फिर भी उसने अंधापन नहीं छोड़ा! बीस वर्षीय सिया की भले ही केतन से बड़ी धूमधाम से सगाई हो चुकी थी लेकिन अभी भी उसने अपने प्रेमी चेतन चौधरी से मिलना-जुलना नहीं छोड़ा था। सिया को अपना प्रेमी, अपने मंगेतर से कहीं ज्यादा भाता था। सांवले रंग के केतन के बाल झड़ चुके थे और वह विग लगाता था। बोलते समय हकलाता भी था, जो सिया को नापसंद था। वह मंगेतर केतन से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी। इसलिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर केतन के खात्मे की साजिश रची और घूमने के बहाने लोहगढ़ किले पर ले गई। उसके पीछे-पीछे प्रेमी चेतन भी जा पहुंचा और मौका मिलते ही दोनों ने केतन को 400 फीट गहरी खाई में धक्का देकर अंधा विश्वास करने की दर्दनाक सौगात दे दी। केतन सिया से बेइंतहा प्यार करता था। इश्क के नशे में वह इतना अंधा हो चुका था कि वह उसकी साजिशों को नजरअंदाज करता गया। विवाह तो अभी होने को था, लेकिन सिया ने शॉपिंग के नाम पर उससे 1 करोड़ रुपए झटक कर अपने प्रेमी चेतन को सौंप दिए, ताकि वह अपनी हैसियत सुधार सके। दोनों ने तीन साल बाद शादी करने की योजना बना रखी थी। उससे पहले दोनों चेतन से अधिक से अधिक धन ऐंठने में लगे थे। दोनों पार्टी बाजी और नशे के शौकीन थे। पुलिस लॉकअप में भी सिया ने बीयर की मांग की। केतन अग्रवाल की मौत के बाद हत्यारी सिया के माता-पिता को भी गहरा सदमा लगा। उसके पिता को तो हार्टअटैक आ गया और अस्पताल में भर्ती किया गया। बीमार पिता ने यह भी कहा कि ‘बेटी को फांसी दे दी जाए। मुझे कोई गम नहीं होगा। अपने जवान बेटे को खोने वाले पिता को फूट-फूटकर रोते देख सभी की आंखें भर आईं। हर कोई यही कहता नजर आया कि धोखेबाज कपटी, फरेबी सिया को भरे चौराहे पर फांसी दे दी जानी चाहिए। वह अब इस दुनिया में रहने लायक नहीं हैं...

Thursday, June 25, 2026

जागो मोहन प्यारे...

 ‘‘वो 11 जून की रात थी। पति भी साथ थे। मैं शौचालय गई थी। तभी धड़धड़ाते हुए पांच गुंडे वहां आ पहुंचे। मेरे पति को बाहर से बंद कर उन्होंने मुझे कसकर दबोच लिया। मैं हतप्रभ थी। यह क्या हो रहा है? मुझे अंधेरे में खींचकर ले जाया गया। मेरी साड़ी खोली और मुंह बंद कर दिया। एक ने मेरे ब्लाउज को तार-तार कर मेरे हाथ बांध दिए। इस दौरान मैं पति को आवाज लगाती रही। आसपास का कोई तो सुन ले इसी उम्मीद में छोड़ देने की फरियाद के साथ चीखती-चिल्लाती रही। मेरा मुंह बंद करने के लिए उन बदमाशों ने शरीर पर ब्लेड से चीरफाड़ और अंधाधुंध मारपीट जारी रखी। मेरी छाती और जांघ खून से लथपथ होती रही और मैं बेहोश हो गई। पांचों ने बारी-बारी से मुझ पर बलात्कार किया और मुंह न खोलने की धमकी देकर बड़े आराम से चलते बने। दरवाजा बंद होने के कारण मेरे पति अभी तक अंदर थे। मैंने अपनी देवरानी को फोन किया तो उसके आने के बाद पति को बाहर निकाला गया। मेरी शारीरिक दुर्दशा देखकर उनकी तो जान ही निकल गई। वह दहाड़-दहाड़ कर रोते रहे। तब तक कुछ लोग भी वहां पर आ गये थे। मेरे दु:ख से अवगत होनेे से ज्यादा उन पर वीडियो बनाने की धुन सवार थी। मैं एक कदम भी चलने में असमर्थ थी। किसी तरह से मुझे सदर अस्पताल ले जाया गया। जांच के दौरान मेरे गुप्तांग से बंदूक की गोली, पत्थर, लकड़ी और कंकड़ निकाले गए जिन्हें दुष्कर्म के दौरान मेरे गुप्तांग में डाला गया था।’’ डॉक्टर और खाकी वर्दी वाले भी महिला के साथ हुई इस घोर अक्षम्य दरिंदगी को लेकर चिंतित और अत्यंत परेशान हैं। नारी पर इतना जुल्म तो अकल्पनीय है, लेकिन जो मंजर सामने हैं वो तो सोचने-समझने वाले इंसानों को चिंता और सवालों के घने जंगल में छोड़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के एक शहर में तुलसी के गमले के पास रील बनाने को लेकर पहले तो विवाद हुआ फिर जंग छिड़ गई। एक परिवार के बच्चे पड़ोसी के घर के बाहर रखे पवित्र तुलसी के पौधे के गमले के पास रील बना रहे थे। इसी दौरान गमले को हल्का धक्का लग गया। यह कोई बहुत बड़ी घटना नहीं थी, लेकिन कुछ लोगों ने इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए उत्तेजक अफवाहें फैला दीं। उसके बाद देखते ही देखते आपसी विवाद कुछ ऐसा बढ़ा कि एक-दूसरे के बीच मारपीट शुरू हो गई। दो महिलाओं के सिर पर अंधाधुंध वार किये जाने से हरे-भरे गमले के आसपास की जमीन लाल हो गई और पूरी कॉलोनी में जबरदस्त तनाव का माहौल बन गया। कुछ अति उत्साही लोगों ने बीच-बचाव करने की बजाय वीडियो बनाना जरूरी समझा। उनके बनाये वीडियो के वायरल होने के पश्चात गली-मोहल्ले के विवाद ने पूरे शहर को अपने लपेटे में लेते-लेते अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया। पुलिस ने बेकाबू होती स्थिति को नियंत्रित कर संभाल लिया। विघ्न संतोषी तो पूरे शहर में आग लगाकर अपने हाथ सेंकने की तैयारी में थे। 

विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर उकसाऊ आधी-अधूरी जानकारी तेजी से फैलने के कारण लोगों में जो तनाव फैलता है वही उन्हें अराजक और हिंसक भी बनाता है। वैसे भी आज के दौर में अधिकांश लोग मानसिक अशांति की गिरफ्त में हैं। नारंगी शहर नागपुर में एक चिकित्सक अस्पताल में मृत पाये गए। कुछ दिनों से पारिवारिक कलह की वजह से मानसिक तनाव से गुजर रहे डॉक्टर साहब ने स्वयं को अत्याधिक मात्रा में एनेस्थीसिया दवा का इंजेक्शन लगा कर मौत के हवाले कर दिया। जिन पर दूसरों को बचाने की जिम्मेदारी है उनकी गैर जिम्मेदारी पर क्या कहें? राजधानी दिल्ली के पचास वर्षीय डॉक्टर मनीष गुप्ता ने अपने घर में काम करने वाली औरत को क्रिकेट बैट और चाकू से अंधाधुंध धुनाई कर मौत के घाट उतार दिया। पुलिस को जब खबर लगी तो वह फौरन उसके घर पहुंची। वह सिर पर हाथ धरे साढ़ियों पर बैठा मिला। खून से सना बैट और चाकू उसकी दरिंदगी की गवाही दे रहे थे। उसने बिना कोई विरोध किये कहा, ‘‘मुझे फांसी दे दो।’’ अपनी नौकरानी की नृशंस हत्या की उसने जो वजह बतायी वह भी बेहद चौंकाने वाली है। उसका कहना था कि,  वह जादूगर थी, काला जादू करती थी। उसके घर में पैर रखते ही नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता था। इससे मेरे बेटे की पढ़ाई भी बाधित होती थी। 

कुछ महीने पूर्व इस अंधविश्वासी डॉक्टर ने नौकरानी को मोबाइल पर किसी से जादू टोने की बात करते सुना था। वह पंद्रह साल से डॉक्टर के यहां काम कर रही थी। डॉक्टर की मेडिकल हिस्ट्री से पता चला है कि वह तनावग्रस्त रहता था, उसे खुखरी रखने का भी शौक था। इस बात को लेकर भी वह गुस्से में रहता था कि नौकरानी उसकी पत्नी की ज्यादा सुनती थी और उसकी अवहेलना करती थी। डिप्रेशन में गुजर रहे त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मनीष गुप्ता को यकीन हो चला था कि घर में चल रही अशांति की वजह भी यही नौकरानी ही है। मनीष की पत्नी भी डॉक्टर है। उनका इकलौता बेटा भी मानसिक रूप से कमजोर है।

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में स्थित थाने में एक महिला ने शिकायत दर्ज करवाई है कि उसका पति चौबीस घंटे उसके चरित्र पर शक करता है। मैं किसी से बात करूं तो पूछा-पाछी करते हुए तरह-तरह के लांछन लगाने लगता है। फल-फू्रट और सब्जी के ठेले वाले से ज्यादा देर तक बात करूं तो उसका पारा चढ़ जाता है। जान-पहचान वाले से भी यदि हंस कर बोलती हूं तो पिटायी करने पर उतर आता है। कुछ दिन पहले तो वह संदेह की आग में ऐसा झुलसा कि मेरे सिर के बाल काट कर मुंडन कर दिया। इतने में जब उसका मन नहीं माना तो मेरे पूरे जिस्म पर इंजन ऑयल और कालिख पोत दी। इससे उसे खुशी और संतुष्टि मिली लेकिन मेरा तो मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया। मैं ही जानती हूं कि मुझे पल-पल कैसी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। कू्ररता की तमाम हदें पार कर देने वाले इस हिंसक पति ने अपनी नीचता को प्रदर्शित करने वाला वीडियो भी बनाया, जिसे सोशल मीडिया पर वायरल कर अपनी मर्दांनगी का गुणगान किया।

हिंसा, शंका, बलात्कार, जादूटोना और खून-खराबा। यह वो शब्द हैं जो सभ्य और संस्कारी लोगों की जुबान और आचरण में शोभा नहीं देते। लेकिन जब कुछ लोगों के दिल-दिमाग में यह दाग-धब्बे गहरे तक रच-बस चुके हों तो उनका इलाज होना भी जरूरी है। इस अजब-गजब काल में खुदकुशी के वीडियो और रील्स बन रही हैं और खूब वायरल हो रही हैं। फूहड़ कॉमेडी को सराहा जा रहा है। संगीन अपराधी अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदा होने की बजाय वीडियो और रील्स बनाकर अपने कुकर्मों के यशोगान में लगे हैं! माना कि आज लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया सरल और सहज माध्यम है। इस आधुनिक मंच पर मिलने वाले लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स की मायावी भीड़ बैठे-बिठाए छाती को चौड़ा कर देती है। यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर सार्थक जानकारियां पहुंचाने वालों को तारीफों के गुलदस्ते मिलना प्रेरणा के दीप जलाता है। लेकिन यहीं पर नकारात्मकता, बेहूदगी, अस्थिरता और क्रूरता जैसे शर्मनाक प्रवृत्तियों के ढोल पीटने वालों की पीठ भी थपथपायी जा रही है। अपने धर्म और समुदाय को महान और दूसरे को नीचा दर्शाने वाले धूर्त खलनायक खुद को ‘नायक’ मानने लगे हैं। मनोरंजन के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। कुछ लुच्चे- टुच्चे लस्त-पस्त भोगी पत्रकार और वरिष्ठ सफेदपोश संपादक जनाधार विहीन विपक्षी नेताओं तथा विरोधी दलों के लिफाफों पर ही जिन्दा हैं। राजनेताओं, मंत्रियों और महिलाओं पर अभद्रतम टिप्पणियां करने वाले शैतान कामेडियन और कलमकार जब भारत के निष्कलंक कर्मवीर प्रधानमंत्री के बारे में ओछी और अनर्गल बातें बोलते और लिखते है तो देशप्रेमियों का खून खौल जाता है। असहाय औरतों के बलात्कारी गैंगरेप के वीडियो सोशल मीडिया पर डालने से पहले अपनी मां, बहनों, बहू, बेटियों के बारे में विचार क्यों नहीं करते? याद रहे कि जैसे को तैसा मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। चरित्र और नैतिकता विहीन लोगों की अंधी भीड़ में जब अच्छे-भले चेहरे शामिल हो जाएं तो दु:ख और शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा भी आता है। इसलिए बहुत सोच-समझकर लाइक्स और साझा करने की दौड़ में शामिल हुआ जाए...तो इसी में सभी की आन-बान और शान बनी रहने वाली है...


Thursday, June 18, 2026

नादान नहीं नारी

 अधिकांश नारियां शराब और शराबियों को नापसंद करती हैं। जिन घरों में पुरुष अत्याधिक शराब पीते हैं अनियंत्रित होकर कलह क्लेश करते हैं, बच्चों को मारते-पीटते हैं वहां के शोर-शराबे की आवाज बहुत दूर तक पहुंचती है। नशा कोई भी हो बरबादी का सबब बनता है। कई अच्छे-भले घर-परिवार इसकी वजह से टूटते देखे गये हैं। नशे के खिलाफ औरतें अपने-अपने तरीके से जंग लड़ती हैं। शहरों, गांवों में शराब आसानी से मिल जाती है। कॉलेजों, स्कूलों और धार्मिक स्थलों के आसपास शराब की दुकानें तथा बीयर बार खुल जाते हैं। शासन और प्रशासन की लापरवाही और बेवकूफी का दंड बच्चों तथा महिलाओं को भोगना पड़ता है। सोचिए, उन महिलाओं पर क्या बीतती है जिन्हें अंधेरे में रखकर शराबियों से ब्याह दिया जाता है। जिनके पति अवैध शराब के धंधे में लिप्त होते हैं। सभी पत्नियां विरोध के स्वर बुलंद नहीं करतीं। चुपचाप नर्क भोगती रहती हैं। लेकिन अब जमाना बदल गया है। नारी जानती है कि यदि वह चाहे तो कुछ भी कर सकती है। 

हरियाणा के फतेहाबाद में कुछ महिलाओं को शादी के बाद पता चला कि उनके पति और उनके संपूर्ण ससुराल वाले नशे के धंधे में लिप्त हैं। उन्होंने पहले तो उनसे सही राह अपनाने का अनुरोध किया, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने घर ही छोड़ दिया। महिलाओं का कहना है कि वे मेहनत-मजदूरी कर घर चलाने की पक्षधर हैं। गरीबी से मुक्ति पाने के लिए नशा बेचने के कारोबार में सहभागी बन अपराधी नहीं बनना चाहती। रजनी नामक महिला ने बताया कि शादी से पहले उसे पता नहीं था कि उसका पति अवैध शराब बेचता है। इस चक्कर में कई बार जेल भी जा चुका है। उसने अपने पति से सुधरने की विनती की, लेकिन वह तो ईमानदारी से मेहनत कर कमाने और परिवार चलाने की बजाय अपराध करने का अभ्यस्त हो चुका था। वह उलटे उसे मारने-पीटने पर उतारू हो गया तो उसने पति और ससुराल वालों से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया। अनामिका की शादी को करीब सात-आठ महीने ही हुए थे। उसने देखा और जाना कि, पति अखंड शराबी है। उसका किसी और औरत से याराना है और दोनों मिलकर नशे का कारोबार करते हैं तो उसे बहुत तकलीफ हुई। अपने मां-बाप पर भी गुस्सा आया, जिन्होंने रिश्ता तय करने से पहले आंखें बंद रखीं और उसका भविष्य अंधकारमय कर दिया। पति ने उस पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया कि वह भी नशे के कारोबार में शामिल हो जाए। इससे इफरात कमाई होगी और जिन्दगी बड़े मज़े से कटेगी, लेकिन उसने एकदम मना कर दिया। घर भी छोड़ दिया। अब पति से अलग रहती है। तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा है। 

विदर्भ के चंद्रपुर जिले की सजग महिलाओं के दबाव के चलते भाजपा के जुझारू नेता ने शराबबंदी के आश्वासन को पूरा करने की पहल करते हुए शराबबंदी लागू करवा दी थी। लेकिन बाद में जैसे ही कांग्रेस की सरकार बनी तो शराब की दुकानें धड़ाधड़ खुल गईं। कांग्रेस के भ्रष्टाचारी बिकाऊ मंत्री का बयान आया कि जिले के अधिकतम लोग शराबबंदी के पक्ष में नहीं हैं। शराब के शौकीन पुरुष यही तो चाहते थे। मंत्री के लिए महिलाओं की कोई अहमियत नहीं थी। दरअसल उसे साम, दाम, दंड भेद से चुनाव जीतना आता है। जनहित के उसके लिए कोई मायने नहीं। 

शराब ने न जाने कितने हंसते-खेलते परिवार तबाह किये हैं। एक आदमी की नशे की लत पूरे परिवार का सुख-चैन छीन लेती है। असंख्य महिलाओं को न चाहते हुए भी शराबी पतियों के साथ रो-रोकर जिन्दगी काटनी पड़ती है। नई दिल्ली की रहने वाली एक महिला ने शराबी पति से छुटकारा पाने के लिए जहर देकर उसे मार डाला। महिला का पति एक फाइनेंस कंपनी में मैनेजर था। वह रात को नशे में टुन्न होकर घर आता और उससे लड़ाई-झगड़ा करता। पड़ोसी भी तमाशा देखते और तरह-तरह की बातें करते थे। पति को सुधारने के लिए उसने कई उपाय किए, लेकिन बात नहीं बनी। वह पुलिस थाने भी गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी के बताने पर एक तांत्रिक के पास गई जो नशेड़ियों का इलाज करने में सिद्धहस्त माना जाता था। तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के बाद भी जब पति की पीने की आदत नहीं छूटी तो उसने तांत्रिक को ही कोसना शुरू कर दिया। शातिर तांत्रिक ने महिला को नशेडी पति से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए जहर पिलाकर खत्म करने की सलाह दी तो वह फौरन तैयार हो गई। तांत्रिक ने उसे जहरीला तरल पदार्थ लाकर दिया, जिसे उसने पति को पिला दिया। पति की मौत हो गयी। जब भेद खुला तो महिला और तांत्रिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

अपने शराबी पिता के हाथों मां की पिटायी और अपशब्दों की बौछार से तंग आ गई थी एक बेटी। एक दिन की बात होती तो वह सब्र कर लेती। लेकिन पिता तो रोज शराब पीकर आता और उसकी मां और बहन के साथ अंधाधुंध मारपीट करता। सत्रह वर्षीय लड़की से मां और बहन की दुर्दशा देखी नहीं जाती थी। पिता की करतूतों की वजह से पूरे परिवार को हंसी का पात्र बनना पड़ रहा था। पढ़ी-लिखी शालिनी नामक इस लड़की ने आखिरकार पुलिस में शराबी पिता की शिकायत करने की ठानी। तीन-चार बार वह थाने गई, लेकिन खाकी वर्दी वालों ने उसकी समस्या जानने, सुलझाने के बजाय उसे चलता कर दिया। पुलिसवालों का रवैया देखकर शालिनी निराश तो हुई, लेकिन फिर भी अपना दुखड़ा सुनाने के लिए बार-बार पुलिस स्टेशन जाती रही। वहां उसे बस यही कहा जाता कि नशा करना कोई अपराध नहीं है। अधिकांश पति और पिता नशे में नियंत्रण खो देते हैं। सरकार ने ही जगह-जगह शराब की दुकानें खुलवा रखी हैं। यह सिर्फ देखने के लिए तो नहीं हैं। जिन्हें पीनी है वे पिएंगे ही। पीने के बाद मारपीट और गालीगलौज होना आम बात है। वह कैसी बेटी है, जो अपने पिता की शिकायत करने थाने आ जाती है। शहर में हजारों ऐसे शराबी हैं जो अपनी पत्नियों और बच्चों की पिटायी करते रहते हैं। तुम्हारी तरह उनकी बेटियां तो पिता के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए नहीं चली आतीं!

शालिनी को तरह-तरह के उपदेश देकर पुलिसवाले विदा कर देते। शराबी पिता सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह दिन-रात उदासी और चिंता में डूबी सोचती-विचारती रहती। एक दिन उसके मन में एक नया विचार आया। पिता को सज़ा दिलाने के लिए उसने कोर्ट में छेड़छाड़ का झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया। अदालत में जब मामले की सुनवाई हुई तो उसने जज को बताया कि उसने यौन उत्पीड़न का झूठा मुकदमा दर्ज कराया है। उसने पिता के खिलाफ जज को झूठा मुकदमा दर्ज कराने के पीछे की वजह बताई कि किस तरह से वह अपने शराबी पिता के आतंक से तंग आकर थाने में शिकायत दर्ज करवाने के लिए गयी, लेकिन उसकी एक भी नहीं सुनी गई। अदालत ने लड़की के साहस की प्रशंसा की और पिता को यौन उत्पीड़न के आरोप से तो बरी कर दिया, लेकिन पत्नी और बेटी पर नशे में गालीगलौज और मारपीट करने के आरोप में दोषी ठहराया। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि, अपनी मां की दुर्दशा देखकर बेटी ने जो रास्ता अख्तियार किया वो उसकी मजबूरी थी। नशे में गर्क हो चुके पिताओं का जानवरों से भी बदतर हो जाना हर संस्कारवान बेटी-बहन-पत्नी के खून को खौलाता है। 

महानगर में एक 11 वर्षीय छठवीं में पढ़ने वाली छात्रा को उसी के नशेड़ी पिता ने अपनी अंधी वासना का लगातार शिकार बनाया। विरोध करने पर उसकी मां की हत्या करने की धमकी देता रहा। शराब और गांजे के नशे के गुलाम बाप से डरी सहमी रहने वाली बालिका ने आखिरकार अपने साथ हो रहे दुष्कर्म की जानकारी अपनी पड़ोसी महिला को दे दी। महिला बाप की हैवानियत के बारे में जानकर सन्न और स्तब्ध रह गई। ऐसी बातों को फैलने में देरी नहीं लगती। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने दुष्कर्मी को सबक सिखाने की ठानी। बलात्कारी हैवान को इसकी भनक लग गयी। वह घर से भाग गया। फिर बात पुलिस तक भी जा पहुंची। पुलिस खोजबीन कर बस्ती में छिपे नराधम को दबोचकर थाने में ले आयी। बालिका की मां को भी अपने पति की गिरफ्तारी के बाद बेटी के साथ होते चले आ रहे घिनौने कृत्य का पता चला। उसने थाने के अंदर पति की चप्पलों से ऐसी धुनायी की, कि लोग देखते रह गये। गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व बेटी ने इशारों-इशारों में मां को पिता की करतूत के बारे में अवगत कराने की कोशिश की थी, लेकिन मां ने नजरअंदाज कर दिया था। दरअसल, मां ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि कोई बाप इस हद तक नीचे गिर सकता है। हां, उसे यह जरूर पता था कि उसका पति शराब और गांजे के नशे में मदहोश रहता है। 

अपने देश के कई परिवारों में पुरुषों की नशाखोरी और दरिंदगी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता। उनकी दुराचारी प्रवृत्ति पर भी यह सोचकर परदा डाला जाता है कि भेद खुलने पर पूरे परिवार की बदनामी होगी। लोग जीना हाराम कर देंगे। कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो पर निगाहें जा अटकीं। एक मासूम बेटी घर की दीवार पर लगी दिवंगत पिता की तस्वीर के सामने खड़ी होकर कहती दिखायी दी,‘‘मम्मी आपको मना करते-करते थक गई कि शराब पीना बंद करो फिर भी आप ने पीनी नहीं छोड़ी। मेरी भी चिंता नहीं की। सबको अकेला छोड़कर चल दिए। आपको क्या पता कि आपके ऐसे चल देने से मुझे कितना दु:ख होता है। सबके पापा हैं। मेरी सभी सहेलियां पापा के साथ रहती हैं उनसे ढेर सारी बातें करती हैं। लेकिन मेरी सुनने वाला कोई नहीं है...’’ इस वीडियो को जिसने भी देखा उसकी आंखें नम हो गईं। जागरुक और संवेदनशील लोगों के दिल-दिमाग पर असर करते इस वीडियो का शराब के अखंड शौकीन पिताओं पर कुछ तो असर पड़े यही हम चाहते हैं...। 

Thursday, June 11, 2026

फोटो गैलरी

 अपने नाम का डंका बजवाना किसे अच्छा नहीं लगता? यह हकीकत दीगर है कि कोई अपराध कार्य कर तो कोई सद्कार्य कर चर्चा में आता है। कुछ लोगों को कुख्याति भी सुख और संतुष्टि देती है। गुजरे जमाने को जाने देते हैं। बात आज की करते हैं। सोशल मीडिया के इस अच्छे-बुरे काल ने क्या गलत और क्या सही के निर्णय को ही असमंजस में डाल दिया है। अब जिसे देखो वही वास्तविक दुनिया में कम और आभासी दुनिया में ज्यादा खोया नज़र आता है। वर्चुअल दुनिया में मिलने वाली तारीफों के समक्ष असल दुनिया के सभी रंग फीके लगते हैं। तभी तो दूर और पास के रिश्तेदारों से तो दुरियां बढ़ ही चुकी हैं। एक ही घर में रहने के बावजूद भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची और उनके बच्चे अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन से चिपके और उलझे दिखायी देते हैं। यहां तक कि खाने की मेज पर भी अधिकांश पारिवारिक सदस्यों की निगाहें फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, रील्स और वीडियों से हटती नहीं। वो जमाना लगभग लुप्त होता जा रहा है, जब किसी मेहमान के आगमन पर घर के बड़े-बुजुर्ग का इशारा पाते ही बच्चे सादर प्रणाम और उनकी चरणवंदना करते थे। अब तो सोशल फोबिया के रोगी बच्चे तब तक अपने कमरों में कैद रहते है जब तक मेहमान रुखसत नहीं हो जाते और मां-बाप भी कुछ नहीं कर पाते। उलटे उन्हें भी पहले की तरह अब मेहमानों का घर आना कम भाता-सुहाता है!

हाल ही किया गया एक गंभीर सर्वे बताता है कि शहर हों या गांव लगभग सभी जगहों पर पंद्रह से बीस प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया की जबरदस्त गिरफ्त में हैं। उन्हें मोबाइल रोगी भी कहा जा सकता है। अधिकांश बच्चे एकांत प्रेमी हो रहे हैं। किसी के सामने नहीं आते। अजनबियों से बात करने की बजाय नजरें चुराते हैं। बातचीत करते-करते उनके घबराने और हकलाने के लक्षण दर्शाते हैं कि वे अंदर से कितने भयभीत हैं। सच तो यह है कि अधिकांश युवा भी असंमजस की जकड़न में हैं। अनजानों से करीबी और उनके लाइक्स और कमेट्ंस पाने के चक्कर में अपने आसपास के लोगों से कटते युवा भी एक-दूसरे से घुलना-मिलना भूलते जा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि आज लगभग हर मोबाइल फोन एक आभासी जुए का अड्डा बन चुका है। पैसों के लिए खेले जाने वाले ऑनलाइन खेलों से तंगी, कलह और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर पैनी नज़र गढ़ाते-गढ़ाते मेरी आंखों के सामने उन बदनसीब पिताओं का गमगीन चेहरा घूमने लगा जिनकी औलादों ने क्रिकेट सट्टे और ऑनलाइन जुए में लाखों-करोड़ों रुपए लुटाकर उन्हें बर्बाद कर दिया है। उनकी अच्छी-खासी चलती दुकानोें, घरों तथा कारखानों पर ताले लग गए या हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने और बेचने की नौबत आ चुकी है। अपने खून-पसीने की कमायी की जमापूंजी लुटने के बाद अब वे किसी को अपना मुंह दिखाने से कतराने लगे हैं, जैसे उन्होंने ही कोई गंभीर अपराध किया हो। ऐसी नालायक संतानों को जन्म देने का अपराध तो उनसे हुआ ही है। यह हम नहीं वो खुद माथा पीटते-पीटते बेहाल होकर कहते हैं। सड़कों, चौराहों, बाग-बगीचों और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर आपकी भी उन युवकों और युवतियों पर नज़र तो पड़ती ही होगी और कुछ पल के लिए विचार भी आता होगा कि यह कैसा बेहुदा तमाशा है? हाथ में स्मार्ट फोन और कानों में ईयर बड्स ठूंसकर चलते लड़के-लड़की को कोई होश नहीं, खबर नहीं कि उनके आसपास क्या हो रहा है। कौन उन्हें कैसे घूर रहा है? उनकी अंगुलियां तो बस फोन स्क्रीन पर अठखेलियां कर रही हैं। भीड़ में जबरन खुद को अकेला करने और दिखाने वाली आज की इस पीढ़ी ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एप्ले और जुलियाना श्रोएडर के शोध के मुताबिक ऐसी आदतें बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं।

 जो लोग अपनों तथा बेगानों के साथ सतत मेलजोल रखते हैं। बाग-बगीचों, बसों, रेलगाड़ियों, होटलों, कॉफी हाऊसों में अजनबियों से भी बातचीत करने की पहल करते हैं, वे खुद को उन लोगों की बनिस्पत अधिक खुश, संतुष्ट और सकारात्मक पाते हैं, जो उस ऑनलाइन दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते, जहां हिंसा, ईर्ष्या, भेदभाव और गुस्सा भरा पड़ा है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक व्यक्ति को धार्मिक नगरी हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी पर अपनी जीवित पत्नी का पिंडदान करते देखा गया। अपनी पत्नी का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने वाले इस पति ने गंगा नदी के बीच में खड़े होकर पहले तो पत्नी की फूलों से सजी तस्वीर पर जी भरकर थूका, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज के अनुसार पिंडदान किया। ध्यान रहे कि हमारे देश में मृतक की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने की परंपरा है। जैसे ही वह पत्नी की तस्वीर को गंगा में बहाकर बाहर निकला तो उसने टकटकी लगाकर देखते स्त्री-पुरुषों को बताया कि उसकी बीवी आपत्तिजनक और भड़काऊ वीडियो बनाने से बाज नहीं आ रही है। मैंने उसे कई बार समझाया लेकिन वह नहीं मानी। इंस्टाग्राम पर उसकी बनाई रील्स देख-देखकर लोगों ने मेरा जीना ही हराम कर दिया है। अब मैं घरवाली का मुंह ही नहीं देखना चाहता। वैसे तो मेरे लिए  वह बहुत पहले मर चुकी थी लेकिन जगजाहिर करना भी तो जरूरी था...

 फेसबुक पर एक लड़की की खूबसूरत और आकर्षक फोटो देखते ही एक युवक उस पर दिलोजान से मर मिटा। दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया। उनमें घंटों चैटिंग होेने लगी। कुछ ही हफ्तों में युवक ने उससे मिलने की ठानी। अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कार चलाते हुए वह लड़की के शहर जा पहुंचा। पहले से निर्धारित कॉफी हाऊस पर दोनों आमने-सामने थे। लड़की को देखते ही युवक के तो होश ही उड़ गए। फेसबुक में देखी जिस लड़की पर पहली नज़र में वह फिदा हुआ था, उससे लड़की का लुक, रंग और हुलिया कतई मेल नहीं खा रहा था। दोनों में कोई बातचीत हो पाती इससे पहले ही युवक ने फौरन कार स्टार्ट की, घुमाई और वापस अपने शहर की ओर चल पड़ा। दरअसल, लड़की ने अपनी फेसबुक पर जो खूबसूरत तस्वीरें डाली थीं, वे जबरदस्त एडिटिंग, फिल्टर, फोटोशॉप और मेकअप के जादू का कमाल थीं। सच तो यह भी है कि सोशल मीडिया फेक प्रोफाइल, कैटफिशिंग, छल, कपट और धोखाधड़ी का मायावी मंच बन चुका है। हों न हों, लेकिन अच्छा और आकर्षक दिखने की चाह सर्वव्यापी है। कुछ लोग उम्रदराज होने के बाद भी बचपन और जवानी की अपनी खूबसूरत तस्वीरों के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उन्हें कहीं विस्मृत न कर दिया जाए यह चिंता भी उन्हें सतत सताती रहती है।

 क्या आपको पता है कि ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशिया के देशों में मृत व्यक्तियों की कब्र पर बड़ी-बड़ी प्रोफाइल फोटो लगाई जाती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे फेसबुक या इंस्टाग्राम में प्रोफाइल पिक होती हैै। सबसे अधिक हैरत भरी सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग अपनी मौत से पहले ही तय कर लेते हैं और रिश्तेदारों को भी निर्देशित कर देते हैं कि उनकी कौन सी मनपसंद फोटो कब्र पर लगानी है। इसके लिए वे नये-नये आकर्षक वस्त्र धारण कर एक से एक मूड...हाव-भाव में पोज देकर किसी सिद्धहस्त फोटोग्राफर से फोटो खिंचवाते हैं। अत्याधिक बीमार और मौत के कगार पर खड़े शख्स से परिवार के सदस्य ही पूछ लेते हैं कि वह अपनी कब्र पर कौन सी फोटो लगवाना पसंद करेगा? अपनी शक्ल-सूरत और नाम को लोगों के दिलों-दिमाग में बसाये रखने के प्रबल आकांक्षी लोग तो अपनी जवानी में ही कई फोटो तैयार करवाकर रख लेते हैं, जिन्हें उनकी कब्र पर लगाया जाता है। इन देशों में कब्र बनवाने पर भी काफी खर्चा किया जाता है। इस सृष्टि से रुखसत हो जाने के बाद भी आन-बान और शान के साथ मृतकों की यादों को संजोए यहां के कब्रिस्तान किसी फोटो गैलरी से कम नहीं लगते, जहां पर मृतक के धनवान परिजन चमकते पत्थर पर नाम, जन्म तथा मृत्यु के साथ फोटो फ्रेम करवाकर लगवाते हैं। कई कब्रों पर तो एलईडी लाइट्स भी लगाई गई हैं, ताकि रात में भी तस्वीर एकदम स्पष्ट दिखायी देती रहे। कुछ रईस परिवार बड़ी स्क्रीन लगवाकर अपनी खुशी दोगुनी कर लेते हैं। पर्यटकों को ये कब्रिस्तान किसी प्रदर्शनी का भी सुखद और मोहक आभास कराते है।

Thursday, June 4, 2026

आदरांजलि

हमारे देश, दुनिया और समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और उसका लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इसकी वास्तविक तस्वीर सिर्फ सजग पत्रकार ही नहीं प्रस्तुत करते। कवियों, शायरों, गज़लकारों को भी अन्याय, असमानता, अराजकता, बेइंसाफी और इंसानियत की हत्या, क्रोधित और आक्रोशित करती है। सच का आईना दिखाने और जागृति लाने का दायित्व जितनी शिद्दत के साथ कुछ साहित्यकार निभा रहे हैं और सतत निभाते आये हैं, इसके लिए उन्हें कई बार दंडित और अपमानित भी होना पड़ा है। कितनी अजीब और चिंतनीय हकीकत है कि आज के वक्त में अगर किसी की कीमत सबसे ज्यादा घटी है तो वह मनुष्य ही है। हर धर्म के संतों, महात्माओं, ज्ञानी-ध्यानियों को अपने-अपने धर्म के संकट में पड़ने की चिंता सता रही है। कुछ कलमकार बार-बार लिखते चले आ रहे हैं कि धर्म को विभाजन का औज़ार बनाना बंद करो। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। इंसान पहले, बाकी सबकुछ बाद में। हमारे समय के सजग शायर राजीव रेड्डी लिखते हैं, 

‘‘गीता हूं कुरआन हूं मैं, 

मुझको पढ़ इंसान हूं मैं।

जिन्दा हूं सच बोलके भी, 

देख के खुद हैरान हूं मैं।’’


‘‘ये सारे शहर में दहशत सी क्यों है,

यकीनन कल कोई त्यौहार होगा।’’

जिस तरह से देश और दुनिया में दहशत का माहौल बन चुका है। कब कोई पीठ पर छूरा मार दे। भाई को अपने भाई पर भरोसा नहीं। राजेश रेड्डी की चिंता निरर्थक तो नहीं। रिश्ते लहुलूहान हैं, 

‘‘मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,

 बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।’’ 

साहित्य, कला और चिंतन से वास्ता रखने वाला शायद ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जिसने हिंदी गज़ल को पठनीय और सारगर्भित तस्वीर के साथ पेश करने वाले गज़लकार दुष्यंत कुमार का नाम नहीं सुना होगा। गज़ल को प्यार मोहब्बत, आशिकी दिवानगी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने वाले दुष्यंत कुमार ने वर्षों पहले जो गज़ल लिखी थी, उसी की कुछ पंक्तियां,

‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, 

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’’

गौरतलब है कि उपरोक्त गज़ल वर्षों पहले लिखी गई थी। इसका शब्द-शब्द आम लोगों के साथ-साथ शासकों तक भी बार-बार पहुंचता रहा, लेकिन आम आदमी की समस्याओं, पीड़ाओं, दुख दर्द तथा चिंताओं का अंत नहीं हो पाया। धनवान और...और धनपति होते चले गए, गरीबों के हाथों में भीख के कटोरे देखे जाने लगे।  गरीबी, अशिक्षा, शोषण और भेदभाव का पहाड़ आकाश तक जा पहुंचा। लेकिन अधिकांश शासक अंधे और बहरे बने रहे। नेताओं की भ्रमित करने वाली नारेबाजी के स्वर और बुलंद होते चले गये। न जाने कितने शासकों, चतुर-चालाक नेताओं ने क्रांतिकारी सोच वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को बिना उनका नाम लिए दोहराया और लोगों को भरमाया।

 यह सच अपनी जगह है दुष्यंत कुमार एवं अन्य नामी गज़लकारों की कुछ गज़लों का मंत्रियों, नेताओं, पत्रकारों तथा संपादकों ने अपनी बात में वजन लाने के लिए जी भरकर इस्तेमाल किया और करते हैं। मंत्री-संत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री तक दुष्यंत कुमार एवं अन्य कुछ शायरों के शेरों के जरिए अपनी बात कहते देखे गये हैं। दरअसल, यह सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि जब शब्दों का अभाव होता है तब जागृति का बिगुल बजाने और क्रांति का आह्वान करने के लिए कालजयी गज़लों और कविताओं को ही अपने भाषणों में सम्मानजनक जगह देनी ही पड़ती है। 

‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, 

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’’

‘‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।’’

 ‘‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’’ 

ऐसे और भी अनेकों शेर हैं जो मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की गज़लों के अनेकों गुलदस्तों में सजे हैं। डॉ. बशीर बद्र का हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। देश और दुनिया को प्यार, मोहब्बत, एकता और भाईचारे का संदेश देने वाले शायर का 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भरा पूरा घर आग के हवाले कर दिया गया तो उन्होंने लिखा था कि, 

‘‘लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में, 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में!’’

इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं, गज़लें और कविताएं हमेशा के लिए राख हो गईं! इस दिल दहलाने वाले अन्याय और जुल्म के बाद उन्हें मेरठ से डर लगने लगा। भोपाल में जैसे-तैसे उन्होंने नया घर बसाया। बशीर बद्र ने देश के बंटवारे को भी बहुत करीब से देखा था। उनके लिखे इस शेर

‘‘दुश्मनी जमकर करो,

लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो

जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’’

को शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरे मन से सुनाया और कहीं न कही चेताया था कि हद से ज्यादा  नीचे मत गिरो। लेकिन न उन्हें अक्ल आई और ना ही उनके बाद के पाकिस्तानी शासकों की सोच बदली। अपने देश को रसातल में ले जाने के बाद भी भारत की बरबादी के सपने देखना नहीं छोड़ते।

आधुनिक उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए बशीर बद्र अपने आशियाने को राख किये जाने के दर्दनाक मंजर को कभी भी भूल नहीं पाए। फिर भी हर मंच पर वो श्रोताओं को आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधे रहने का संदेश देते रहे। लेकिन धर्म को विभाजन का औज़ार बनाने वाले कम नहीं हुए। 

दु:खभरी हकीकत तो यह भी है कि कुछ सत्ताधीश और सरकारें भी भेदभाव के रास्ते पर चलती दिखायी देती हैं। ऐसे-वैसे अपराधियोंको सबक सिखाने के लिए उनके वर्षों पुराने वैध-अवैध घरों को धराशायी करने लगी हैं। पिछले चार-पांच वर्षों से उनमें बुलडोजर के प्रति कुछ ऐसा लगाव और विश्वास जागा है कि उन घरोंं को भी नेस्तनाबूत करने में देरी नहीं की जाती, जो अपराधी के माता-पिता के नाम पर हैं। उनके दादा-परदादा ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया था। मैं अक्सर सोचता हूं कि जो भी अवैध अतिक्रमण हैं, उन पर तब क्यों नहीं बुलडोजर चलाया जाता है, जब उन्हें खड़ा किया जा रहा होता है। उसके अवैध होने की खबर प्रशासन के चेहरों को तो होती ही है, लेकिन रिश्वत लेकर तब तो मुंह बंद कर लिया जाता है। जब कोई संगीन अपराध करता है तभी ही उसके घरों पर हथौड़े चलना शंकित करता है। भेदभाव और बेइंसाफी का भी आभास कराता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि यदि अपने अवैध कब्जों को बचाए रखना हो तो जुर्म करने के बाद भी पकड़ में न आएं। किसी भी तरह से खुद को बचाये और छुपाये रखें। यह भी तो देखने में आता है कि बुलडोजर के तांडव के शिकार कुछ आरोपी कुछ साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्जत बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक सरकारी तानाशाही उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है। खूंखार अपराधियों, हत्यारों, आदतन बलात्कारियों, जगजाहिर आतंकवादियों की अवैध इमारतें, कारखाने और दुकानें गिराये जाने का तो सभी समर्थन करते हैं लेकिन जिनके परिवार का बेटा, भतीजा, भाई  अराजकता करते पकड़ा जाता है, तो उनके परिवार के साथ किसी भी तरह की बेइंसाफी नहीं होनी चाहिए। उन बेकसूरों को बेघर करने के सिलसिले सजग भारतीयों को बहुत आहत करते हैं। करे कोई और भरे कोई का यह चलन कहीं न कहीं बेहद अन्यायकारी तो है ही...। 

Thursday, May 28, 2026

नज़रिया

 जैसे मैंने सुना वैसे आपने भी कभी न कभी अल्ताफ राजा का वर्षों पहले गाया हर दिल को छू लेने वाला दर्दभरा यह गीत अवश्य सुना होगा,...

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी 

सुबह पहली गाड़ी से 

घर को लौट जाओगे!

जब तुम्हें अकेले में 

मेरी याद आएगी 

आंसुओं की बारिश में 

तुम भी भीग जाओगे...’’ इस सदाबहार गीत की रचना की थी गीतकार ज़हीर आलम ने जो एक भावुक और प्रचार तंत्र से दूर रहने वाले इंसान थे। गरीबी में पले-बढ़े ज़हीर आलम नागपुर में जन्मे थे। बचपन से ही गज़लें और कविताएं ज़हीर आलम को आकर्षित करने लगी थीं। पार्श्वगायक और उम्दा कव्वाल अल्ताफ राजा भी नागपुर की पैदाइश हैं। उनके पिता इब्राहिम इकबाल और मां रानीरूप लता दोनों उस दौर के मशहूर कव्वाल थे। छठवें और सातवें दशक में देश में रात-रातभर जागकर कव्वालियां खूब सुनी जाती थीं। जिस तरह से कवि सम्मेलनों में छाये रहने वाले कवियों के लोग दीवाने थे, वैसे ही कुछ कव्वाल देशवासियों के जबरदस्त चहेते थे। दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली का भी तब गजब का जलवा था। तब टीवी और मोबाइल का आगमन हुआ नहीं था इसलिए लोग फिल्मों, कवि सम्मेलनों तथा कव्वाली से मनोरंजन करते थे। दरअसल वो समय दिल को छूने वाले गीतों, कविताओं और शायरी के नाम था। आज भी पुराने फिल्मी गीत जो सुख-सुकून देते हैं, नये गाने उनके करीब कही नहीं ठहरते।

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी...’’ गीत को गाकर अल्ताफ राजा ने जहां अपार धन और नाम कमाया, वहीं ज़हीर आलम को इस कालजयी गीत को लिखने के बदले मात्र तीन हजार रुपए मिले थे। हालांकि उस समय इतने रुपये भी खासी अहमियत रखते थे। महीनेभर तक खून पसीना बहाने पर जिसे हजार-बारह सौ रुपए नसीब होते हों, उसे महज एक गीत के मेहनताने के तौर पर इतने रुपयों का मिलना अचानक लॉटरी के खुलने जैसा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कलम का जादूगर कपड़ा मिल में काम करता था। तब नागपुर में स्थित एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल में हजारों मजदूर काम करते थे। जब कपड़ा मिलों पर ताले लग गए, तब दूसरे मजदूरों की तरह इस गीतकार को भी महीनों भूख, प्यास और आर्थिक तंगी से लड़ते हुए वर्षों झोपड़ीनुमा घर में रहना पड़ा। इसी महीने छियासी वर्ष की उम्र में नागपुर में स्थित मोमिनपुरा में उनकी मौत हो गई। जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया में गूंजी और अखबारों में छपी, तब अधिकांश शहरवासियों को पता चला कि जिस गीत ने असंख्य लोगों को अपना दिवाना बनाते हुए कैसेट्स कंपनियों और गायक को करोड़ों की कमाई करवाई, उसका रचयिता संतरानगरी में गुमनामी और कंगाली में दिन काटते हुए किसी तरह से भूखा-प्यासा जीता रहा। उसने अपने होने की किसी को खबर ही नहीं होने दी और न ही किसी ने उसकी खबर ली। दरअसल, ज़हीर आलम एक खुद्दार किस्म के गीतकार थे। उन्होंने कभी ढिंढ़ोरा नहीं पीटा कि कालजयी गीत ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ उनके दिल-दिमाग की देन है। इसी गाने ने गायक अल्ताफ राजा को घर-घर पहुंचाया। इसमें कोई शक नहीं कि अल्ताफ को रोमांटिक और दर्दभरे गाने गाने में महारत हासिल थी लेकिन इस गीत ने तो जैसे उन्हें जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि आज भी उन्हें उनकी सदाबहार एल्बम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जाना जाता है।

‘‘कोई दीवाना कहता है,

कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को

बस बादल समझता है।

मैं तुझसे दूर कैसा हूं,

तुम मुझसे दूर कैसी है,

ये तेरा दिल समझता है

या मेरा दिल समझता है।’’

बताने की जरूरत है नहीं कि यह किस हस्ती की लिखी पंक्तियां हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह कुमार विश्वास सिर्फ कविताओं और गज़लों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि धार्मिक प्रवचनकर्ता के तौर पर भी उन्होंने खूब धाक जमायी थी। अपनी शाब्दिक कलाकारी से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों की गहराई में जाकर हर वर्ग के भारतीय जनमानस में जो प्रेरक रस घोला है, वह भी यकीनन अद्भुत है।

अपने प्रभावी अंदाज और सुरीली आवाज से सम्मोहित करने वाले कुमार विश्वास ही ऐसे इकलौते गीतकार, गज़लकार हैं, जिनके गीत युवाओं के साथ-साथ उम्रदराजों के मन-मस्तिष्क में भी बसे हैं। जब कुमार देशी-विदेशी मंचों पर गीत-गज़ल सुनाना प्रारंभ करते हैं तो लोग झूम-झूमकर उनके साथ सुर से सुर मिलाते हुए गाने लगते हैं। डॉ. कुमार खासतौर पर प्रेम, श्रृंगार, देशभक्ति और जीवनदर्शन पर आधारित गीत, गज़ल और कविताएं लिखते हैं। श्रोताओं को अथाह देशभक्ति के रंग में रंग देने वाला उनका गीत, ‘हाथ में तिरंगा हो’ तो बार-बार सुना और सुनाया जाता है। अपनी वाकपटुता और ज्ञान के भंडार की बदौलत एकदम अलग और खास मुकाम बनाने वाले कुमार कवि सम्मेलनों और रामकथा के लिए लाखों रुपए की फीस वसूलते हैं। वैसे यह करिश्मा किसी चमत्कार की देन नहीं, अपितु उनके अथक परिश्रम और विविध कलाओं के सार्थक प्रदर्शन का प्रतिफल है। फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर, उद्योगपति और विभिन्न कारोबारी जब कमाते हैं तो अपनी सभी चाहतों को भी पूरा करते हैं। आम जनता और सच्चे साहित्य प्रेमियों के लाड़ले इस कवि ने कभी अपनी कमाई नहीं छिपाई। इस बहुआयामी शख्सियत ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दिल्ली से लगे आधुनिक नगर नोएडा में आलीशान बंगला बनवाया है। इसके दरवाजे भी सभी के लिए खुले रखे हैं। यह विशाल बंगला किसी महानगर में स्थित फाइव स्टार होटल जैसा ही है, जहां पर पांच सितारा कमरे, स्विमिंग पूल, जिम, स्टीम रूम, स्पा सेंटर, थिएटर और सजने-धजने के लिए सैलून से लेकर और भी बहुत सी ज्ञात-अज्ञात सुविधाएं हैं। खास बात यह भी है कि कवि महोदय चांदी के बर्तनों में खाना खाते हैं। महंगी से महंगी कई आधुनिकतम कारों के मालिक कुमार विश्वास के मौज़ मज़े से जीने और रहने की खबर जब पूरी तरह से बाहर आई तो सोशल मीडिया के साथ-साथ उनकी बिरादरी के लोग भी भौचक्के रह गए। उनके अनुसार, प्रेम-कविता और रामकथा कहने वाले प्रवचनकार को तो सरलता, सहजता और मिट्टी से जुड़े होने का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था लेकिन यह तो हर दर्जे का आराम परस्त ढोंगी और मौज़ मजे का गुलाम निकला। दूसरों को भगवान राम की तरह बनवासी और संतोषी होने का पाठ पढ़ाने वाला चार्टर प्लेन की यात्राएं और चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग का मजा लूट रहा है! यह तो उन आस्थावानों के साथ सरासर छल, कपट और धोखा है, जो इसके प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से दौड़े चले आते हैं। जिन्हें गीतकार के चांदी के बर्तनों में खाना खाने पर आपत्ति है, उन्हें पता होना चाहिए कि मुंबई के सबसे पॉश इलाके अल्टामाउंड रोड में स्थित अपने 27 मंजिला घर ‘एंटीलिया’ में रह रहे मुकेश अंबानी तो सोने के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। उन पर ऐतराज की उंगलियां उठाने की किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई है। 

दरअसल, हमारे यहां साहित्यकार, कलाकार होने का मतलब ही है, गरीबी और बदहाली से जूझता टूटता-फूटता आंसू बहाता इंसान। यह धारणा बना ली गई है कि यदि कोई शख्स, कवि, गीतकार और पत्रकार है तो उसका धन से क्या काम? यदि कोई कलाकार धनपति है, तो कहीं न कहीं वह भ्रष्टाचारी और बेइमान ही होगा। ईमानदारी से तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है। यही वजह है कि विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाले अधिकांश लोग गरीब की छवि के कैदी बनकर रहना पसंद करते हैं। भले ही उनकी परवरिश धन की बरसात और सुख-सुविधाओं के बीच हुई हो लेकिन वे यही प्रचारित करते नहीं थकते कि उन्होंने गरीबी, बदहाली और भुखमरी को बहुत करीब से देखा और भोगा है। उनका यह झूठ उन लोगों को बहुत राहत और संतुष्टि प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में खुद कुछ नहीं कर पाए। जहां से चले थे वहीं के होकर रह गए। उन्हें शून्य से उठे लोगों की तरक्की से जलन होती है। यह भी सच है कि नामचीन हस्तियों की गरीबी और बदहाली की काल्पनिक कहानियां न जाने कितनों की बर्बादी का सबब बनती चली आ रही हैं। कई ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जो साहस और परिश्रम की सीढ़ियों पर पैर रख बहुत ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे हवा-हवाई महानुभावों का अनुसरण करना नहीं छोड़ा जो अपने खोखले दिखावटी उसूलों का परचम लहराकर दूसरों की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं। खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले इन आत्ममुग्धों के बाल-बच्चे अशिक्षित, अधनंगे रहकर भूख से तड़पते-कलपते रहते हैं लेकिन यह तथाकथित सिद्धांतवादी होश में आने का नाम ही नहीं लेते।