एक लड़की। खूबसूरत लड़की। चतुर चालाक लड़की। पुरुषों की कमजोर नस की पारखी लड़की। नाम चंदना। सच में यदि वह लड़की ही होती तो पत्रकार, कलमकार तथा हम और आप उसका वर्णन कुछ इसी अंदाज के साथ करते, लेकिन वो लड़की नहीं, लड़का है जिसने डॉक्टरों, व्यापारियों, इंजीनियरों, शिक्षकों...यहां तक कि खाकी वर्दी वाले को भी अपनी मीठी-मीठी चैट के जादू से ऐसा फांसा कि वो अपने आप पर शर्मिंदा हो गया। कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहा। चंदना बनकर कइयों को लाखों का चूना लगाने वाले इस लड़के का असली नाम पवन है। उम्र 23 वर्ष।
हैदराबाद का शातिर युवक पवन जब तीन-चार साल पहले पॉलिटेक्निक डिप्लोमा कर रहा था, तभी उसे आसानी से धन कमाने की सूझी। सोचते-सोचते वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मेहनत से फटाफट कुछ खास नहीं होने वाला है। यह सोशल मीडिया का ज़माना है। क्यों न इसी के माध्यम से ठगी का खेल खेलते हुए मालामाल हुआ जाए। उसने अच्छे खासे बुद्धिमानों कोे खूबसूरती के जाल में फंसते देखा है। सोशल मीडिया पर खूबसूरत सजी-धजी लड़कियों की प्रोफाइल सभी को आकर्षित करती है। कई तो बस उनके चेहरे पर लट्टू के लट्टू हो जाते हैं। बस फिर क्या था। उसने खुद को सोशल मीडिया पर लड़की की तरह पेश करने में देरी नहीं की। पवन ने चंदना के नाम से एक-एक कर 13 फर्जी इंस्टाग्राम और 14 फेसबुक अकाउंट बनाए और अपनी कलाकारी में लग गया। इन प्रोफाइल के जरिए चैट करता रहा। चंद ही दिनों में चंदना से दोस्ती करने वालों की कतार लग गई। खूबसूरत सेक्सी लड़की उनसे सेक्सी मादक अंदाज में मीठी-मीठी बातें करती तो वे गदगद हो जाते। कुछ लोगों से तो प्राइवेट बातें भी होने लगीं। इनमें डॉक्टर, व्यवसायी, लेक्चरर, सरकारी अधिकारी आदि शामिल थे। सभी यह सोचकर मदमस्त होते गये कि एक खूबसूरत लड़की उनके जाल में है। रात को घंटों बातचीत होती है। प्राइवेट बातें भी होने लगी हैं। तस्वीरें और वीडियो शेयर करने का सिलसिला भी चल पड़ा है। अब तो वो दिन दूर नहीं जब हुस्नपरी उनके पहलू में होगी और वे सुरापान के साथ जवां जिस्मपान ‘कर रहे होंगे। पुलिस का कहना है कि उसके मायावी जाल में लगभग 82 पुरुष बड़ी आसानी से फंस गए, जबकि हजार से अधिक पर उसने अपना जाल फेंका। उसके चैट करने का मनमोहक अंदाज बहुत गजब का था। पवन से चंदना बनी इस लड़की ने एक पुलिस इंस्पेक्टर से भी 10 लाख रुपए वसूल लिए। एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट जो महज 22 साल का है, उसने खुशी-खुशी 4 लाख रुपए देने के पश्चात पुलिस की शरण ली। उसका कहना था कि उसके ब्लैकमेल करने का अंत ही नहीं हो रहा था। चंदना उर्फ पवन लोगों से जो तस्वीरें और वीडियो मंगवाता था उन्हें अपने मोबाइल में रखता था। बाद में धमकी देकर फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करने की धमकी देता था। अभी तक 25 लाख रुपए की वसूली किये जाने की खबरें हैं।
नागपुर विश्वविद्यालय के रिटायर सहायक कुलसचिव दत्तात्रय पाठक को एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को पुलिस अधिकारी बताते हुए उन्हें कहा कि आपका नाम मुंबई के एक गंभीर अपराध और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा है। आपके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट भी जारी हो चुका है। किसी भी पल आपको हथकड़ियों में जकड़कर जेल में डाल दिया जाएगा। उन्हें यह भी निर्देश दिया गया कि सतत वीडियो कॉल पर बन रहें। इधर-उधर होने की हिमाकत न करें। दत्तात्रय पाठक के तो हाथ-पैर कांपने लगे। यह सोचकर उनकी घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई कि बाहर निकलते ही पुलिस दबोच लेगी। उन्होंने कॉल भी नहीं काटी। बस उनकी सुनते रहे। उन्होंने डरा-धमकाकर बैंक खातों की जानकारी और गहन जांच के नाम पर पूरी रकम ट्रांसफर करने को कहा तो दत्तात्रय ने लगभग 20 लाख रुपए आरटीजीएस के जरिए उनके बताए खाते में भेज दिए। बाद में जब मित्रों, रिश्तेदारों ने उन्हें बताया कि आपको ठगों ने बड़ी आसानी से अपना शिकार बनाया है तो वे अपनी लुटने-पुटने की कहानी सुनाने पुलिस थाने जा पहुंचे।
वसंत कुमार भी सीनियर सिटीजन हैं। मिलिट्री इंजीनियरिंग सेवा से रिटायर हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। सेवा निवृत्ति के पश्चात उनके शान और आराम से दिन कट रहे थे कि एक दिन उनके पास फोन आया और सामने वाले ने खुद को सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताते हुए कहा कि मैं मुंबई के कोलाबा से बोल रहा हूं। मामला बड़ा गंभीर है। आपके नाम पर लिए गए सिमकार्ड का इस्तेमाल आपराधिक गतिविधियों में हुआ है। उम्रदराज वसंतकुमार को ईडी का वारंट और सरकारी दस्तावेज भी तुरंत भेज दिये गए। उन्हें देखते ही उनकी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। उन्हें लगा कि वाकई मामला बहुत गंभीर है। अब तो जेल जाने की नौबत आ सकती है। अपनी इज्जत बचाने के लिए भयभीत वसंत कुमार ने आखिरकार अपनी सेवानिवृत्ति की बचत में से लगभग 17 लाख रुपए आरटीजीएम से ट्रांसफर कर चैन की सांस ली, लेकिन जब समझ में आया कि उन्हें तो डरा-धमकाकर टोपी पहना दी गई है तो भागे-भागे जा पहुंचे पुलिस स्टेशन।
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर से रिटायर वरिष्ठ तकनीशियन विनय गायकवाड़ को व्हाट्सएप पर कॉल आया कि मैं सीआईडी अधिकारी बोल रहा हूं। आप जेल जाने की तैयारी कर लें। आपके बैंक खाते से दो करोड़ रुपए की मनी लांड्रिंग हुई है। विनय ने जैसे ही कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ तो खुद को सीआईडी अधिकारी बताते शख्स ने वीडियो कॉल पर दूसरे अधिकारी से कनेक्ट कराया तो जैसे ही उन्होंने स्क्रीन पर उसके गले में पुलिस आईडी कार्ड और मुंबई पुलिस का लोगो के साथ-साथ अपने नाम पर अरेस्ट वारंट और ईडी नोटिस देखा तो कांपने लगे। साथ ही पुख्ता यकीन भी हो गया कि वे तो असली जांच के शिकंजे में हैं। इसके बाद विनय की और बुरी हालत कर दी गई। उन्हें सात दिनों तक डिजिटल अरेस्ट रखते हुए खाना-पीना, उठना-बैठना हराम कर दिया गया। उन पर जबरदस्त दबाव बनाया गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा तथा मनी लांड्रिंग से जुड़ा गोपनीय मामला है। इसलिए हर घंटे अपनी लोकेशन दें। परिवार के किसी सदस्य को बताने की जुर्रत की तो उन्हें लंबी जेल की हवा खानी पड़ेगी। 61 वर्षीय विनय पर पल-पल वीडियो कॉल के जरिए नज़र रखी गई। न तो बच्चों से बात कर पाये और न घर में काम करने वाली नौकरानी से। हर पल यही चिंता और भय कि अब फौरन पुलिस आएगी और घसीटते हुए बेइज्ज़त कर अपने साथ ही ले जाएगी। जब जालसाजों ने देखा कि उनका शिकार पूरी तरह से टूट चुका है तो उन्होंने बचाव का रास्ता सुझाया कि गिरफ्तारी से बचने के लिए बैंक में जमा अपना सारा पैसा सरकारी खाते में ट्रांसफर कर दो। जांच के बाद यदि निर्दोष पाए गए तो लौटा दिया जाएगा। उनका तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था। डर के मारे बस घिग्घी बंधी थी। उनके आदेशानुसार फोन को चालू रख बैंक पहुंचे और कांपते हाथों से जब 24.80 लाख रुपए का आरटीजीएस फार्म भरा, तब बैंक अधिकारियों को उनका व्यवहार बहुत अजीब लगा। उन्होंने एकाएक इतनी बड़ी रकम निकालने के बारे में पूछा तो बोले कि अचानक दोस्त को जरूरत पड़ गई। यहां तक कि फोन पर मौजूद जालसाज ने खुद को दोस्त की तरह पेश करते हुए बैंक कर्मी से बात की और तुरंत पैसे ट्रांसफर करवा लिए। अपनी खून-पसीने का जमा धन लुटाने के बाद जब उन्होंने बात करने की सोची तो नंबर बंद पाया। कोई क्लीन चिट ऑर्डर भी नहीं आया तो विनय को खुद के ठगे जाने का अहसास हुआ तो पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने के लिए दौड़ पड़े।
इसी तरह से कोलकाता की एक बुजुर्ग महिला को साइबर ठगों ने खुद को राष्ट्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हुए 14 दिन तक डिजिटल अरेस्ट करके 61 लाख का चूना लगा दिया। उन्हें यह कहकर डराया-धमकाया गया कि उनके बैंक खाते से आतंकी संगठनों को धन उपलब्ध कराया जा रहा है। महिला के इंकार करने पर ठगों ने उनका आधारकार्ड नंबर और गिरफ्तारी वारंट दिखाते हुए इस कदर भयभीत किया कि वे मामले को निपटाने के नाम पर लुट गईं।
नारंगी नगर नागपुर महानगर पालिका में कार्यरत कल्पना की जागरुकता और सूझबूझ की जितनी तारीफ की जाए कम होगी। कल्पना के मोबाइल पर आये कॉल में खुद को साइबर पुलिस अफसर बताने वाले शख्स ने बड़ी ठसन के साथ कहा कि मैडम आपकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हुआ है। तुरंत अपने दस्तावेज ऑनलाइन भेजो। पहले तो कल्पना किंचित घबराईं। फिर खुदको संभालते हुए बोलीं कि आप चाहें तो मेरे घर आ सकते हैं या फिर मैं खुद पुलिस स्टेशन आती हूं। वहीं बात कर लेते हैं। फोन करने वाला प्रत्युत्तर में गुस्साये स्वर में बोला कि हमारे पास पुलिस से बात करने का समय नहीं। यदि हमारे निर्देश का पालन नहीं किया तो एक घंटे के भीतर आपको गिरफ्तार कर लेंगे। जैसे ही फोन कटा तो कल्पना ने तत्काल अपने दोस्तों को जानकारी दी और पुलिस स्टेशन जाकर पूरी बात बतायी। दो घंटे के पश्चात जब उसी नंबर पर फोन किया गया तो किसी ने नहीं उठाया।
कितनी-कितनी हैरत की बात है कि अखबारों के माध्यम से अक्सर लोगों को बार-बार सचेत किया जाता है कि कोई भी सरकारी एजेंसी किसी को डिजिटल अरेस्ट नहीं करती। पुलिस कभी वाट्सएप पर अरेस्ट वारंट नहीं भेजती। दरअसल, डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानून नहीं हैं। फिर भी लोग सतर्क नहीं होते। रिटायर अफसर, सीनियर सिटीजन जिस तादाद में ठगों के शिकार हो रहे हैं, उससे उनके अनुभवी पढ़े-लिखे होने पर भी शंका होने लगती है। वेरिफिकेशन के नाम पर धन की मांग पूरी तरह से फर्जी होती है। वरिष्ठ नागरिक अपने बैंक खातों में दैनिक ऑनलाइन लेन-देन की सीमा तय रखें। गौरतलब है कि महाराष्ट्र की सरकार ने डिजिटल अरेस्ट रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की घोषणा की है। ऐसे अपराधों को रोकने के लिए बैंकों की मदद ली जा रही है। गौरतलब है कि हाल के दिनों में महाराष्ट्र के शहर मुंबई, पुणे, नागपुर, संभाजीनगर, नाशिक सहित अन्य जिलों में बुजुर्गों को डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर ठगा और लूटा गया है। कुछ मामलों में बुजुर्गों ने पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक या इससे अधिक राशि गंवा दी। ऐसे मामलों में बैंक थोड़ी संवेदनशीलता और सतर्कता का परिचय दें तो डिजिटल अरेस्ट को रोकना संभव है।
फेसबुक पर किसी की फ्रेंड रिक्वेस्ट आने पर दस बार चिंतन-मनन करें। सोशल मीडिया पर किसी की तस्वीर देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि प्रोफाइल के पीछे असल में कौन है। नाम कुछ और हो सकता है, फोटो किसी और की हो सकती है और बातचीत करने वाला व्यक्ति अपनी असली पहचान छिपा सकता है। सोशल मीडिया पर अंधों की तरह भरोसा करने से बचें। भरोसा करने और अपने प्राइवेट डिटेल शेयर करने के बीच एक फर्क होता है। खासकर तब, जब सामने वाला व्यक्ति बहुत जल्दी बातचीत को निजी विषयों की तरफ ले जाने लगे या तस्वीरें और वीडियो भेजने को कहने लगे। अगर कोई प्राइवेट तस्वीरों को वायरल करने की धमकी देकर पैसे मांगता है, तो घबराकर भुगतान करने के बजाय चैट, प्रोफाइल लिंक, फोन नंबर और लेन-देन के सबूत रखने चाहिए। इसके बाद पुलिस और साइबर क्राइम में शिकायत की जा सकती है।
