नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने लगभग तेरह सौ लोगों की जान ले ली और हजारों लोग लापता हो गये, नेपाल-तिब्बत के हिमालयी इलाकों में प्रकृति ने जो तबाही का तांडव मचाया उससे प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते मनुष्य को भी फिर से एक बार चेताया कि यदि वक्त रहते नहीं सुधरे तो आनेवाले समय में इससे भी अधिक विनाश का सामना करना पड़ सकता है। 2026 की छब्बीस जुलाई को कम अज़ कम नेपाल के लोग तो कभी भी नहीं भूल पायेंगे। चारों तरफ कीचड़ और मलबा। पानी ही पानी और अपनी जान बचाने के लिए जद्दोजहद करते स्त्री, पुरुष और बच्चे। जानवरों का तो भगवान ही मालिक था। इस खौफनाक मंजर की तस्वीरें, खबरें जब दूर-दराज बैठे लोगों ने सुनी और देखीं तो हाथ जोड़कर परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे कि हम पर दया बनाये रखना और ऐसी कोई भी आपदा न आने देना। जिस तरह से ग्लेशियर फटने से नेपाल में तबाही हुई वैसे ही खतरे की आहटें भारत में भी सुनाई देने लगी हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की मानें तो भारत की 40 जगहों पर काल मंडरा रहा है। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर से सटे भारतीय इलाकों में बनी 7 झीलें तो इतने अधिक खतरे में हैं कि लोगों की जानों पर कभी भी बड़ा संकट आ सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि, हम भले ही अलग-अलग देशों में रहते हों लेकिन प्रकृति में होने वाले बदलाव के असर से अछूते नहीं हैं। पर्यावरण के क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहे विद्वानों के अनुसार, दरअसल, शुरुआती खबरों के बाद लोगों को लगा था कि भूकंप के झटकों से नेपाल में जमीन खिसकी होगी और भूस्खलन के कारण ही यह भीषण बाढ़ आई। बाद में साफ हुआ कि आपदा की शुरुआत बर्फ व चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से हुई। इससे अचानक तेज बाढ़ आई और भारी मात्रा में मलबा मौत बन नीचे की ओर बह निकला। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि बर्फ, चट्टान और तलछट का यह बड़ा हिस्सा समुद्र तल से करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई से 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा। इससे नीचे बह रही नदी कुछ समय के लिए बंध गई और वहां एक झील बन गई। जब गलेशियर से आया पानी इस झील में भरा, तो अस्थायी बांध टूट गया और पानी का तेज बहाव सीमा के दोनों ओर बसे गांव तक पहुंचकर विनाशकारी गाथा लिख गया।
जिनके घर कच्चे थे उन्हें तो बाढ़ अपने साथ बहा कर ले गई। भूस्खलन से मची तबाही ने अनेकों अच्छे-भले मकानों को भी नहीं छोड़ा। कई घरों में नीचे वाले फ्लोर पर पानी भर चुका था और पहली, दूसरी मंजिल पर बैठे और खड़े लोगों को मौत एकदम सामने दिखायी दे रही थी। उनकी सांसें अटकी की अटकी थीं। अनेकों उम्रदराज स्त्री-पुरुषों को जब विनाशकारी बाढ़ के बीच से बाहर निकाला गया तो उनके हाथ, पैर कांप रहे थे। आवाज़ थरथरा रही थी और आंखों में अनंत खौफ भरा था। मौत के मुंह से निकलने के सात-आठ दिन बीतने के बाद भी उस पल को भूल नहीं पाये थे। कई उम्रदराज लस्त-पस्त जो ओल्डहोम के ग्राउंडफ्लोर में रहते थे उन्हें बचाया नहीं जा सका। कई लोगों ने डूब चुकी बस्तियों से भाग कर पहाड़ियों की शरण ली तो कहीं उनकी जान बच पाई। बाढ़ के बीच फंसकर ईश्वर की लीला को हतप्रभ देखते अनेकों वृद्धों तथा बच्चों की आपबीती की असंख्य दिलदहलाने वाली बाढ़ दास्तानों के बीच कीचड़ से लथपथ संतानवें वर्षीय मायाबोहरा को बचाव दल ने काफी मेहनत के बाद जीवित बाहर निकाला। बचाव अभियान को कई घटों से मलबे में फंसी महिला के बचे होने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद ही नहीं थी।
छह साल की मासूम मनीषा 60 घंटे तक कीचड़ और मलबे में दबी रही। यहां भी ईश्वरीय चमत्कार सभी को चमत्कृत कर गया। भारी बारिश के कारण जब घर का ढांचा गिरा तो लकड़ी के मलबे का एक हिस्सा मनीषा के सिर के ठीक ऊपर इस तरह टिक गया कि वहां हवा की आवाजाही के लिए एक छोटा सा एयर पॉकेट बन गया। इस छोटे से गैप की वजह से भारी कीचड़ और मलबा उसके चेहरे और नाक को पूरी तरह से ढक नहीं पाया, जिससे उसे लगातार ऑक्सीजन मिलती रही। लगातार 60 घंटों यानी ढाई दिनों तक उसने दमघोटू अंधेरे और भीषण गर्मी को झेला, वो भी बिना भोजन और पानी के यह चमत्कार नहीं तो क्या है? इलाज के दौरान अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने अत्यंत भोलेपन के साथ पिता से कहा, ‘‘मैं जिन्दा हूं, मम्मी पापा। लेकिन आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?’’ कुदरत के भीषण कहर से संघर्ष करते-करते किसी तरह से बच निकले माता-पिता की आंखों से बस आंसू बहते रहे और नेपाल सशस्त्र पुलिस बल और नेपाली सेना की टीम का मन ही मन शुक्रिया अदा करते हुए नतमस्तक होते रहे। 28 अगस्त की शाम जब कर्मठ जवान मलबे के ढेर में फंसे लोगों की खोजबीन कर रहे थे तब एक सतर्क जवान को किसी बच्चे के रोने की बहुत धीमी-धीमी आवाज सुनायी दी। मशीनों का इंतजार करने की बजाय जवान बड़ी सावधानी से कीचड़ और पत्थरों को हटाने में लग गए। ज़रा सी चूक होने पर मलबा धंस सकता था। इसलिए अत्यंत सावधानी से एक-एक लकड़ी और पत्थरों को हटाकर मनीषा को सुरक्षित बाहर निकाला गया। बाहर निकालते ही जवानों ने उसे प्राथमिक उपचार दिलाया तथा पानी पिलाया।
नेपाल की पहली महिला पायलट प्रिया अधिकारी ने बाढ़ और भूस्खलन की जानलेवा पीड़ा से जूझते लोगों को राहत पहुंचाने के लिए अपनी रातों की नींद की कतई परवाह नहीं की। प्रिया ने छह दिनों में करीब 160 बचाव मिशन पूरे किए। वह दिन-रात भूखी-प्यासी हिमालय के बेहद कठिन इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाकर लोगों को सुरक्षित निकालने और शवों को बरामद करने के अभियान में जुटी रहीं। बाढ़ से प्रभावितों की मदद के लिए कई स्कूली बच्चों ने अपनी गुल्लकों में जमा रकम और जेब खर्च से बचाए रुपयों को दान देकर मानवता और समझदारी का परिचय दिया। काबिलेगौर यह भी है कि, इनमें कई बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने बाढ़ में अपने माता-पिता को खोया है। रोंगटे खड़े कर देने वाली त्रासदी को जिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा और जिंदा बच गए उनके लिए तो यकीनन यह किसी चमत्कार से कम नहीं। हमारे देश भारत के भी कई लोग प्रलयकारी बाढ़ में फंसकर हैरान-परेशान होते रहे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षित लाने में अपनी संपूर्ण ताकत लगा दी फिर भी कुछ की मौत हो गई और कुछ का कोई अता-पता नहीं! भीषण बाढ़ से बचकर निकले वेलाचेरी के मुरुगु नगर के एक दंपत्ति ने बताया कि बच निकलने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ हो। नावू कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी उन 21 लोगों में शामिल थे, जो गत दिनों नेपाल के काठमांडू से चेन्नई पहुंचे। कुंभकोणम की एक एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर रहे 57 लोगों का एक समूह तीन बसों में सवार होकर रासुवा इलाके से गुज़र रहा था, जो बाढ़ की चपेट में आ गया। वे दो पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़क पर यात्रा करते हुए आस-पास के खूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहे थे। इस सड़क मार्ग के नीचे एक नदी बह रही थी। अचानक, कुछ ही सेकंड में रासुवा का इलाका आपदा क्षेत्र में बदल गया-तेज़ आवाज़, गिरते पत्थर-चट्टानें, कीचड़ और मलबे के साथ तेज़ी से बहता बाढ़ का पानी।
तीनों बसों में से स़िर्फ दूसरी बस ही बाढ़ की चपेट में आने से बची। विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, कुछ मिनटों तक तो हमें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। मैंने देखा कि हमारे पीछे वाली बस झुक रही थी। मैं वह नज़ारा और ज़्यादा देर तक नहीं देख सकी; तभी मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। उस पल को याद करते हुए नावू कबीरदास बोले कि अचानक धमाके जैसी तेज़ आवाज़ हुई और गाड़ी पर पत्थर गिरने लगे। फिर, बाढ़ का पानी तेज़ी से अंदर आने लगा, जैसे कोई बांध खोल दिया गया हो। बाढ़ आने से पहले, उस इलाके से गुज़र रही उनकी बस कीचड़ में फंस जाने के कारण कुछ देर रुकी। उन्हीं कुछ मिनटों ने हमारी जान बचाई। उनका ड्राइवर नेपाल का रहने वाला एक स्थानीय व्यक्ति था। यह पहाड़ी इलाका था जहां अक्सर भूस्खलन और हिमस्खलन होते रहते थे। बाढ़ का पानी देखते ही उसे ख़तरे का अंदाज़ा हो गया। उसने सबसे कहा कि वैन से बाहर निकलें और ऊंची जगह पर जाना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है, फिर वह खुद भी सुरक्षित जगह की ओर भागा। हम भी उसी रास्ते पर गए। उस समय हमारे दिमाग में स़िर्फ हमारे बच्चे ही थे। बचने के लिए उन्हें ऊंची जगह पर चढ़ना पड़ा। कुछ लोगों को छोड़कर, बचे हुए 21 लोगों में से ज़्यादातर की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह कीचड़ और गाद से ढंकी ढलान पर चढ़ना पड़ा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते सांस फूलने लगी फिर भी उनका बताना जारी रहा, ‘‘एक और महिला और मैंने चढ़ना शुरू किया, लेकिन आधे रास्ते में ही फिसलकर गिर गईं। मैं दो बार फिसली। मेरे पैर कीचड़ से सने हुए थे और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था। आखिरकार, वह एक दूसरी महिला की साड़ी को मज़बूती से पकड़कर ऊपर पहुंच पाईं-वह महिला पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थी और उसने अपनी साड़ी उतारकर नीचे की ओर बढ़ाई थी। वह बताती हैं, मेरी रिश्तेदार, पूंगोडी, पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थीं। उस दिन स़िर्फ वही साड़ी पहने हुए थीं। उसने स्वेटर पहना, अपनी साड़ी उतारी और हमारे लिए नीचे लटका दी। हमने उस साड़ी और पास के एक केबल को पकड़कर खुद को ऊपर खींचा। वह आगे कहती हैं, मिट्टी के एक ऐसे टीले पर चढ़ने में हमें डेढ़ घंटा लग गया, जो एक इमारत जितना ऊंचा था। एक बार तो, मैंने जिस पेड़ की टहनी को पकड़ा, वह टूट गई। उसके बाद, पेड़ों को पकड़ने के बजाय, हमने ऊपर चढ़ने के लिए साड़ियों को पकड़ा। आखिर में एक महिला ऊपर नहीं पहुंच पा रही थी; हमने उससे कहा कि वह अपनी कमर के चारों ओर साड़ी बांध ले और हमारे ग्रुप के सदस्यों ने उसे पकड़कर ऊपर खींच लिया। ऊपर पहुंचने पर उन्हें एक आपदा राहत केंद्र मिला। वहां मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें ठीक होने में मदद के लिए पानी और बिस्किट दिए। जिन लोगों के मोबाइल में सिग्नल था, उनके ज़रिए उन्होंने तमिलनाडु में ख़बर भेजी कि वे सुरक्षित हैं। विजया भुवनेश्वरी ने बताया कि, हमारे ग्रुप के एक सदस्य के रिश्तेदार सचिवालय में काम करते हैं। उनके ज़रिए हम सरकार से संपर्क कर पाए। हमने सबूत के तौर पर एक फ़ोटो भेजी कि हम सुरक्षित हैं। ऊपर चढ़ते समय, उन्होंने कीचड़ में फंसे एक व्यक्ति को हाथ हिलाते हुए देखा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते आंखें भीग गईं, ‘‘उसे देखने के बाद, न तो हम और ऊपर चढ़ सकते थे और न ही वहां रुक सकते थे। बचाव दल को सूचना दी गई और बाद में उस व्यक्ति को बचा लिया गया।’’ ऊपर चढ़ने के बाद ही हमने उस बस को ढूंढ़ा जिससे हम आए थे। हमें स़िर्फ अपनी बस दिखाई दी, उसके आगे कई गाड़ियां पलटी हुई थीं। एक गाड़ी का स़िर्फ टायर दिख रहा था। तभी हमें कीचड़ धसने की गंभीरता का एहसास हुआ।
वे डेढ़ दिन तक आपदा राहत केंद्र में रहे। उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं; एक मंज़िल की ऊंचाई वाले मिट्टी के ढेर पर चढ़ने के बाद उन्हें अब 20 मंज़िला इमारत जितनी ऊंचाई वाले खड़ी ढलान वाले पहाड़ी इलाके से गुज़रना था। यह एक संकरा, एक कतार में चलने वाला रास्ता था। हमें तो यह भी नहीं पता कि हम उस पर कैसे चढ़ पाए। दोनों तरफ़ घनी झाड़ियां थीं। हम बस ज़िंदा रहने की ज़बरदस्त इच्छाशक्ति के दम पर ऊपर चढ़े। यह सफ़र बहुत मुश्किल था, क्योंकि उनमें से किसी को भी पर्वतारोहण का अनुभव नहीं था। ज़मीन कीचड़ और दलदल से भरी थी, जिससे हम बार-बार फिसल रहे थे। एक गलत क़दम का मतलब था 50 फ़ीट नीचे गिरना। एक जगह हमने गलत मोड़ ले लिया। एक नेपाली व्यक्ति ने हमें रास्ता दिखाया, हमें नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी दिशा में ऊपर जाना पड़ा। ऊपर चढ़ने से ज़्यादा मुश्किल नीचे उतरना था, बार-बार बैठकर और धीरे-धीरे खिसकते हुए नीचे उतरना पड़ा। तीन घंटे बाद, वे तय पिकअप पॉइंट पर पहुंचे। वहां से उन्हें आर्मी के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। नेपाल में भारतीय दूतावास से संपर्क करने के बाद, वे अपने-अपने घर लौट आए। चेन्नई, कडलोर, मयिलादुथुराई, कृष्णगिरि और त्रिची जैसे इलाकों में फंसे 21 लोगों का तमिलनाडु सकुशल लौटना संभव हुआ। मंत्री राजमोहन के अनुसार, राज्य से 400 से ज़्यादा लोग नेपाल गए थे और उनमें से 90 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।
महाविनाश और दिल दहलाने वाले सात-आठ दिन गुजर जाने के बाद भी जिन परिवारों के लापता लोगों की कोई खबर नहीं मिली उनमें से कई ने तो उनकी प्रतीकात्मक अंत्येष्टि भी कर दी। नदी किनारे चिताएं तो जलीं, लेकिन उनके शव नहीं थे। उनके स्थान पर उनकी तस्वीर या प्रतीक रख परिजनों ने अत्यंत दुखी मन से अंतिम रस्में निभाईं, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके। कुछ ऐसे शव भी थे। जिनके अपनों का पता नहीं चलने के कारण सरकार ने सामूहिक अंतिम संस्कार किया। भारत सरकार ने बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावितों के लिए कई-कई टन राहत सामग्री भेजने के साथ खोज और बचाव अभियानों के लिए विभिन्न उपकरण तथा चिकित्सकों को भेजा। भारत के लोकप्रिय फिल्म अभिनेता और जाने-माने समाजसेवी सोनू सूद तथा युवा संत बागेश्वर महाराज आदि ने कई ट्रक राहत सामग्री नेपाल में भेजकर मानवता का धर्म निभाया।
