ईमानदारी से अथक परिश्रम करने वालों को देर-सबेर सफलता मिलती ही है और जमाना भी उनका वंदन-अभिनंदन करता है। संघर्षशील जुनूनी इंसान भले ही कम धनवान हों, लेकिन उनकी दिल से इज्जत की जाती है। यह हकीकत उन लोगों को बहुत देर के बाद समझ में आती है, जो धोखेबाजी, छल, कपट और मुखौटे लगाकर करोड़पति, अरबपति बनते हैं और बड़े अभिमान के साथ मंचों पर शोभायमान होते हैं। लेकिन जब उनकी वास्तविकता सामने आती है, तब उनकी जो थू-थू होती है। उसे बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। महाराष्ट्र में स्थित शिवणी गांव की मालती डोंगरे पुरुषों की शेविंग-कटिंग करती हैं। उनके ज़िस्म चेहरे को छूती हैं। शेविंग क्रीम लगाकर दाढ़ी बनाती हैं और बड़ी कुशलता के साथ बाल काटती हैं। मालती के पति बिस्तर पर हैं। लगभग बारह वर्ष पूर्व की दोपहर जब वे मजदूरी कर घर लौट रहे थे, तभी एक गाड़ी ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी। काफी देर तक सड़क पर घायल अवस्था में पड़े रहे। अधिकांश लोग अनदेखी कर चलते बने। लेकिन एक सजग और सज्जन राहगीर ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। मालती को भी खबर कर दी। मालती के मेहनतकश पति की कंधे की हड्डी और पसलियां इस कदर टूट गईं थी कि वे चलने और काम करने के लायक नहीं रहे। दो बच्चों की मां मालती पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कमाऊ पति के बिस्तर पकड़ लेने के पश्चात पहले तो उसने छोटे-मोटे काम किए और किसी तरह से पति के इलाज और घर के खर्चों के लिए धन की प्राप्ति की। लेकिन फिर भी घोर आर्थिक संकट बना रहा। इसी दौरान मालती के मन में विचार आया कि मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स तो कर रखा है, ऐसे में क्यों न अपना ब्यूटीपार्लर प्रारंभ कर दूं। चाह ने राह निकाल दी। मालती ने ब्यूटी पार्लर प्रारंभ तो कर दिया, लेकिन गांव में ऐसी बहुत कम महिलाएं थीं, जिन्हें सजने संवरने में अभिरुचि थी।
पुरुषों के वर्चस्व वाले गांव में अधिकांश महिलाएं घर से बाहर निकलने में भी सकुचाती थीं। ऐसे में ब्यूटीपार्लर को चंद दिनों में बंद करना पड़ा। मालती उस मिट्टी की नहीं बनी हैं जो जीवन के संघर्ष, आंधी तूफान, तेज बरसात से धराशायी हो जाती है। उसने बिना ज्यादा विचार किए ब्यूटी पार्लर को पुरुषों के सैलून में तब्दील कर दिया। इस बदलाव को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया। शुरू-शुरू में पुरुषों ने ‘मालती सैलून’ से यह सोचकर दूरी से बनाये रखी कि महिला से कटिंग और शेविंग करवाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। वह ठीक से उस्तरा और कैंची चला भी पाएगी या नहीं। मालती ने धैर्य को अपना साथी बनाये रखा। धीरे-धीरे पुरुषों का आना और संतुष्ट होकर जाना मालती सैलून को ख्याति दिलाने लगा। ग्राहकों की संख्या में इजाफा होने से अच्छी-खासी कमाई भी होने लगी। दोनों बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आसानी से पति का समुचित इलाज भी होने लगा। कालांतर में बेटे ने पढ़ाई के साथ-साथ सैलून में अपनी मां का साथ देना प्रारंभ कर दिया। बेटी नीट की तैयारी कर रही है। एक अच्छा सा प्लॉट खरीदकर सर्वसुविधायुक्त अपना घर भी बनवा लिया गया है।
मालती ने जब पुरुषों के लिए सैलून की शुरुआत की तो जान-पहचान वाले लोगों ने तो तंज कसे ही, रिश्तेदारों ने भी यह कहकर कम परेशान नहीं किया, ‘‘औरत होकर पुरुषों की शेविंग-कटिंग करोगी, उनके साथ सटकर खड़ी हो, उनके चेहरे पर हाथ लगाओगी और भी पता नहीं क्या-क्या होगा। पता नहीं कैसे-कैसे लुच्चे-बदनाम भी औरत के आकर्षण में खिंचे चले आएंगे। ऐसे में खाक तुम्हारी इज्जत रह जाएगी।’’ उन्होंने तो बहिष्कार करते हुए यह साफ-साफ कह दिया था कि भूल से भी किसी को मत बताना कि हमसे तुम्हारी कोई रिश्तेदारी है। हम भी तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाएंगे। ऐसे समय में सिर्फ मेरे माता-पिता ही थे जो हमारे साथ खड़े रहे। सैलून खोलने पर पति ने भी कभी ऐतराज प्रकट नहीं किया। उन्हें अपनी पत्नी पर अपार गर्व है। वे कहते है, ‘‘एक्सीडेंट की वजह से मैं तो कुछ भी करने लायक नहीं रह गया था। कमाई बंद हो गई थी। घर चलाना मुश्किल हो गया था। दो छोटे बच्चे थे। मेरी पत्नी ने पूरी जिम्मेदारी अपने अकेले कंधे पर ले ली। बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवा रही है। मेरे इलाज और सेहत का भी पूरा ध्यान रखा है। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखें भीग-भीग जाती हैं।
हमारी इसी दुनिया में कई लोग ऐसे हैं। जिनका अपना कोई नहीं होता। लावारिस कहे जाने वाले इन लोगों को मरने पर भी दूर-दूर तक कंधा देने वाले नहीं होते। कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उनके अपने ही सदा-सदा के लिए भूला देते हैं। कितनी अच्छी बात है कि हमारी इसी दुनिया में ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने की कर्तव्य की तरह जिम्मेदारी ले रखी है। उन्हें न तो प्रचार की चाह है और न ही पुरस्कार-सम्मान की लालच है। पंजाब के शहर लुधियाना में रहने वाले गुलशन कई वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाते चले आ रहे हैं। उन्हें यह देखकर बहुत पीड़ा होती थी कि सड़क किनारे या अस्पतालों में शव पड़े रहते थे और उनको लेने कोई नहीं आता था। तभी एक दिन उन्होंने ठान लिया कि जब तक जिन्दा हूं किसी भी शव को लावारिस नहीं छोेडूंगा। गुलशन अभी तक पांच सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। ‘फक्कड़ बंधु’ भी पिछले 33 साल से जिनका कोई नहीं उनका अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। वर्षों पूर्व कानपुर के बंटी अपने गुमशुदा पिता को ढूंढ़ते हुए लुधियाना पहुंचे तो पिता तो नहीं मिले, लेकिन यहां उनकी मुलाकात जोगेंद्र फक्कड़ से हो गई। जोगेंद्र रेलवे की पटरियों से क्षत-विक्षत शव उठाते थे। दोनों में मेल-मुलाकात होती रही। एक दिन दोनों ने देखा कि पटरियों पर किसी ने खुदकुशी कर ली है। दोनों यह देखकर स्तब्ध रह गए कि आत्महत्या करने वाले के कुछ परिजन भी वहां खड़े थे लेकिन कोई भी टुकड़े-टुकड़े हुए शव को उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। दोनों ने क्षत-विक्षत शव को एकत्रित कर सिविल अस्पताल पहुंचाया। उस दिन से दोनों ने ऐसे शवों को अस्पताल पहुंचाने तथा अंतिम संस्कार करने को अपने जीवन का मकसद बना लिया है। शहरवासियों के बीच ‘फक्कड़ बंधु’ के तौर पर जाने जानेवाले दोनों मित्रों के बारे में आपके क्या विचार हैं? कई लोगों की निगाह में ये छोटे-मोटे इंसान हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं होती। लेकिन सच तो यह है कि ऐसे परोपकारी जब दुनिया से जाते है तो उन्हें जाने, खोने और पाने का कोई मलाल नहीं रहता। खाली जेब, फक्कड़ की तरह जीते रहे, यही संतुष्टि हर चिंता से मुक्त कर देती है। जब कुछ भले लोगों के बीच इस परोपकारियों का जिक्र आता है तो तारीफ ही होती है। हमारे आसपास और दूर कई चेहरे ऐसे हैं जो मेहनत करने की बजाय धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और नकाबपोशी में यकीन रखते हैं। अधिकांश लोग भी उनकी ढोंगी, कपटी, असलियत जानने-समझने के बावजूद खामोशी की चादर ओड़े रहते हैं। शहर और देशवासियों की आंखों में धूल झोंक कर मंचों पर आसीन होने, मान-सम्मान पाने और करोड़ों में खेलने वालों का जब भंडाफोड़ होता है तो आम भारतीय कितने आहत होते हैं इसकी कभी खोज-खबर नहीं ली जाती। इन पंंक्तियों के लिखे जाने के दौरान देशभर के अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर जैसे ही मेैंने यह खबर पड़ी और सुनी तो मैं बस सोचता रह गया कि क्या इंसान इतना भी गिर सकता है? वो भी पैसे के लिए! पूरी दुनिया में भारत की योग विद्या का डंका बज रहा है। अत्यंत उमंगो-तरंगों तथा गर्व के साथ विश्व योग दिवस मनाया जाता है। नई शिक्षा नीति में योग शिक्षा लगभग अनिवार्य है। पश्चिम के देश भी योग में भारत का लोहा मान रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस ने गुजरात के सूरत में ऐसे योगाश्रम का भंडाफोड़ किया है जहां नकली नोटों की फैक्ट्री चल रही थी। इस आश्रम का कर्ताधर्ता आलीशान जीवन जीते हुए महंगी कारों में चलता था। ‘गुरुजी’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस ढोंगी, कपटी, नकाबपोश के 15 फीट ऊंची दीवार वाले आश्रम के भीतर झांकना नामुमकिन है। आश्रम आध्यात्मिक केंद्र से अधिक किसी शाही महल की तरह लगता है। जहां प्रवेश करते ही एक तरफ गौशाला है तो दूसरी तरफ घोड़ों की अस्तबल भी है। कई आलीशान कारें खड़ी हैं। भव्य महंगे सुसज्जित कार्यालय में आरोपी प्रदीप जोटांगिया नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का संचालन कर देश के साथ गद्दारी कर रहा था। योगाभ्यास के लिए आने वाले लोगों की नजरों से दूर, करोड़ों रुपए के नकली नोटों के काले कारोबार का यही से संचालन होता था। आश्रम में बड़े-बड़े तहखाने होने का भी पता चला है। यहीं पर जाली नोट छापने वाली मशीने और अवैध सामग्री रखी जाती थी। योग गुरु प्रदीप अपने हर प्रवचन में कहता था, ईमानदारी इंसान की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चे रास्ते से चलो फल जरूर मिलेगा। धन लोभ इंसान को अंधा बना देता है। किसी को धोखा देना खुद को धोखा देना है। ऐसे मायावी बोलवचन उन तमाम भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, अफसरों, पत्रकारों और वरिष्ठ संपादकों की जुबान से भी अक्सर निकलते और छलकते रहते है, जो हैं तो हर दर्जे के धूर्त और बेईमान लेकिन ईमानदारी का मुखौटा ओड़े हुए हैं। इनका भी आज नहीं तो कल पूरा पर्दाफाश तो होना ही है...।
