पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता आड़ा-टेढ़ा होता है और बेहद दोस्ताना भी। इस आत्मीय रिश्ते की नींव को मजबूत करने के लिए पहली ईंट तो जन्मदाता को ही रखनी पड़ती है। इसके लिए उसे बहुतेरे जतन और त्याग भी करने पड़ते हैं। फिर भी कहीं न कहीं चूक हो जाती है। कभी इधर से तो कभी उधर से। फिर भी हमारे संसार में हर भूल-चूक और समस्या का समाधान है। बशर्ते नीयत में खोट न हो। कहा जाता है कि ज्यादातर पुत्र मां के करीब होते हैं और बेटियां पापा की दुलारी होती हैं। अधिकतर पिता काफी हद तक खुरदुरे और व्यावहारिक होते हैं तो माताएं ममता और भावुकता की डोर से ताउम्र बंधी होती हैं। यह गुण विधाता ने उन्हें खास तौर पर अर्पित-समर्पित किया है। कुछ पिता बंद किताब होते हैं, जिसे हर कोई नहीं पढ़ पाता। उसे पढ़ने के लिए खोलना होता है। इस दौर की औलादों के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। सभी माता-पिता अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। सदियों से दस्तूर बनी इस मनोकामना की जब अवहेलना और निरादर होता है तो पिता का मन आहत होता है। उनका गुस्सा भी फूट पड़ता है जो इस दौर की अधिकांश औलादों के लिए नागवार होता चला जा रहा है।
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके में एक अरबपति कारोबारी की उसी के बिगडैल बेटे ने बहुत ही क्रूर तरीके से हत्या कर दी। हत्या के पश्चात आरी से अपने जन्मदाता के जिस्म के टुकड़े करने में भी उसके हाथ नहीं कांपे। पैथोलॉजी संचालक व शराब के बड़े कारोबारी मानवेंद्र सिंह अपने अक्षय नामक इस पुत्र को अच्छा और कुशल डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन अक्षय का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। पिता और पुत्र के बीच मनमुटाव और बहसबाजी सतत चलती रहती थी। इसी तनातनी में कभी कभार पिता का हाथ भी बेटे पर उठ जाता था। अपनी जिन्दगी अपने ही तौर तरीके से जीने के अभिलाषी अक्षय के लिए पिता का डांटना-फटकारना असहनीय होता चला गया। उसने अपनी शराबखोरी में और... और इजाफा करते हुए पिता से टकराने की हिम्मत दिखानी प्रारंभ कर दी। पिता भी अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘‘मैं जो चाहता हूं, वही करो, नहीं तो मेरी नजरों से ओझल हो जाओ।’’ ऐसे में आपसी तनाव तो बढ़ना ही था। अपने पापा की नसीहत को बकवास मान उनसे बेइंतहा नफरत करते बिगड़ैल बेटे के मन में इस बात का भी गुस्सा अंदर तक भरा था कि उसकी मां की आत्महत्या के वही जिम्मेदार हैं। यदि इन्होंने दूसरी शादी कर ली तो जायदाद पर सौतेली मां का कब्जा हो जाएगा।
एक रात पिता और पुत्र में खूब कहासुनी हुई। पिता ने गुस्से में रायफल की गोली का भय दिखाया तो बेटे का नफरती माथा घूम गया। अलसुबह उसने उसी रायफल से गहरी नींद में सोये पिता के सिर पर गोली मारी और कुछ घंटों के बाद बाजार जाकर आरी और नीला ड्रम खरीद लाया। उसने बड़े इत्मीनान से कसाई की तरह शव के टुकड़े किए। इससे पहले उसने यूट्यूब पर बहुत गौर से ‘वध’ नामक फिल्म देखी, जिसमें अत्यंत राक्षसी अंदाज में शव को काटने और ठिकाने लगाने का तरीका समझाया गया है। नृशंस हत्यारे ने पहले पिता के दोनों हाथ और पैर काटे। बहुत कोशिश के बाद भी वह धड़ को काट नहीं पाया तो उसे नीले ड्रम में भर दिया। काटे गये दोनों हाथ और पैरों को एक पिट्ठू बैग में डाला और बड़े मजे से कार में सवार होकर शहर से दूर बीस किलोमीटर दूर जा पहुंचा। लाश के चार टुकड़े उसने रास्ते में फेंके और खून से सने कपड़े नहर से लगी घनी झाड़ियों में छुपा दिए। शव के सिर और धड़ को ठिकाने लगाने में सफल नहीं होने पर उसने उन्हें यह सोचकर नीले ड्रम में डाल दिया कि शीघ्र ही इन्हें एसिड से जला और गला देगा। अपने जन्मदाता का कत्ल करने के बाद भी हत्यारे के चेहरे पर पुलिस वालों को कोई शिकन नहीं दिखी। वह यही कहता रहा कि पहले पिता ने पीटा फिर मैंने गुस्से में यह गलती कर दी। जेल में पूरी रात दीवार के सहारे बैठ जरूर बड़बड़ाता और अपनी अक्षम्य करतूत पर पछताता रहा।
मध्यप्रदेश में स्थित बड़वानी में 46 वर्षीय डॉक्टर हरीश पिछले पांच वर्षों से अचेतावस्था में बिस्तर पर पड़े हैं। मार्च 2021 की सुबह क्लिनिक जाते वक्त हुई सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में ऐसी बेहद गंभीर चोटें आई कि लंबे इलाज और सर्जरी के बाद भी होश में नहीं आ पाये। कोमा में होने के कारण हरीश करवट नहीं ले पाते। उनके उम्रदराज पिता अपने हाथों से बेटे की प्रतिदिन मालिश करते हैं। शरीर की साफ-सफाई तथा करवट दिलाते है। हरीश को ट्यूब के माध्यम से दूध, जूस और विभिन्न दवाएं दी जा रही हैं। दिन-रात चल रहे इलाज के खर्च चलते घर बिकने के साथ-साथ बीस लाख का कर्जा भी हो चुका है, लेकिन फिर भी धैर्यवान पिता का हौसला और ईश्वर के प्रति भरोसा बना हुआ है। वो दिन जरूर आएगा जब उनके बेटे को होश आयेगा और वह पहले की तरह एकदम सेहतमंद होकर चलता-फिरता नजर आयेगा।
गड़चिरोली के रहने वाले बंडू यादवराव की 28 वर्षीय बेटी श्रेया की जिन्दगी पिछले चार वर्ष से बिस्तर तक ही सिमटी हुई है। डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया है। वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। पढ़ाई में काफी होशियार रही श्रेया का साफ्टवेयर डेवलपर बनने का प्रबल इरादा था। इसके लिए उसने पुणे के डी.वाई.पाटील कॉलेज ऑफ कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेकर परीक्षा में टॉप किया था। तीन फरवरी 2022 को अपने मित्रों के साथ वह रात को कार से घर लौट रही थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मित्रों को मामूली चोटें आई, लेकिन श्रेया अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो गई। नागपुर के एक नामी डॉक्टर के अस्पताल में भर्ती कराने पर पता चला उसका ब्रेन पूरी तरह से मृत हो चुका है। माता-पिता ने और भी कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सभी ने जांच में पाया कि कोई चमत्कार ही उसे फिर से होश में ला सकता है। चार वर्ष बीतने के पश्चात भी माता-पिता ने चमत्कार की उम्मीद में खुद को बेटी के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया है। लाखों रुपये खर्च कर चुके आशावादी परिवार का कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी दुलारी बिटिया की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसके लिए भले ही उन्हें अपनी बची-खुची सारी पूंजी और जमीन-जायदाद भी क्यों न बेचनी पड़े। बिटियां की चौबीस घंटे की देखरेख के लिए दो कुशल नर्स तो हैं ही, उन्होंने भी अपने सुख-चैन और रातों की नींद से नाता तोड़ लिया है। कोमा की भेंट चढ़ चुकी श्रेया की बड़ी बहन डॉक्टर है। वह भी जीवन से संघर्ष करती आशा और निराशा के बीच झुलती अपनी इकलौती बहन को फिर से एकदम स्वस्थ और फिर से भागते-दौड़ते देखने के लिए अपना सारा काम धाम छोड़कर उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है। परिवार के कुछ शुभचिंतक श्रेया की इच्छा मृत्यु की मांग करने का सुझाव भी देते रहते हैं, लेकिन माता-पिता और बहन के यकीन की डोर बहुत मजबूत है।
इस धरा से अपने ही खून की ऐसी अंतिम विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। करोड़ों संवेदनशील भारतीयों की आंखों को नम कर देने वाला वीडियो आपने भी देखा होगा, जिसमें बहन अपने भाई से कह रही है, ‘‘सबको माफ करते हुए अब जाओ, ठीक है।’’ यह जिन्दगी इंसान को कैसे-कैसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। इसकी हकीकत अशोक राणा और निर्मला देवी से बेहतर और कौन बता सकता है। काल्पनिक किस्से कहानियां लिखना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है दर्दनाक वास्तविकता से रूबरू होना वो भी सतत तेरह वर्षों तक। फुटबाल और जिम का शौकीन हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। एक शाम रक्षाबंधन के दिन वह अचानक चौथी मंजिल से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क और कमर में अत्यंत गहरी चोटें लगीं। इस हादसे के बाद वह जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया। कई डॉक्टरों और अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज करवाने के बावजूद उसकी हालत में तो कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन राणा परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि उन्हें दिल्ली में स्थित अपना तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने बेटे के ठीक होने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। सांस लेने, फीड कराने के साथ मल त्याग के लिए नली लगी रही। अपने कोमाग्रस्त पुत्र को पल-पल अथाह पीड़ा से लड़ते देख माता-पिता अब उसे जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगे। हरीश की 60 वर्षीय मां निर्मला देवी के इन शब्दों ने पत्रकारों की भी आंखें नम कर दीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि हमें ऐसा दिन देखना पड़ेगा, जब बेटे की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि उसकी मुक्ति के लिए दुआ करनी पड़ेगी।’’ हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि जैसा दर्द हमें मिला है, वैसा किसी दूसरे माता-पिता को न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके दर्द को समझा और इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए 13 वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े 32 वर्षीय युवक हरीश के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद माता-पिता ने अपने हरीश के अंगदान के जरिये दूसरों को जीवन देने की जो साहसी और परोपकारी इच्छा जतायी है उसके लिए भी उनका बारम्बार वंदन और अभिनंदन।
