Thursday, April 16, 2026

बस करो...मत करो

धन के लिए, तथाकथित मान-सम्मान, परिवार की इज्ज़त के लिए और भी कितने-कितने अभिमान और झूठी शान के लिए हत्याओं और रिश्तों की बलि चढ़ाने के क्रूर सिलसिले ने मानवता को शर्मसार होने को मजबूर करना प्रारंभ कर दिया है। वो नगर, महानगर जो कभी इंसानियत की मजबूत नींव पर खड़े नज़र आते थे, अब रेत के घरौंदे से बिखरते और ढहते नज़र आने लगे हैं। संतरानगरी नागपुर में सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाने की परिपाटी रही है। दीपावली, दशहरा, ईद, होली, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस आदि को जिस एकता, तन्मयता और आपसी सद्भाव के साथ मनाया जाता है, वह अनुकरणीय और लाजवाब है। राम जन्मोत्सव (रामनवमी) और हनुमान जयंती की भव्य शोभायात्रा में श्रद्धालुओं की जो भीड़ उमड़ती है, वह भी यकीनन देखते बनती है। स्त्री-पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग सभी आस्था और भक्ति के रंग में रंगे नजर आते हैं, लेकिन इस बार की हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान एक भोले-भाले किशोर को जिस तरह से मौत के घाट उतारा गया, उसे कम अज़ कम सजग शहरवासी तो कभी नहीं भूल पायेंगे। अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता और खौफ की भावना उनके मन-मस्तिष्क में डटी रहेगी। 14 साल का एक चंचल लड़का घर से शोभायात्रा में शामिल होने के लिए निकला, लेकिन फिर वह घर नहीं लौटा। दो दिन बाद उसकी लाश मिली। जब वह घर से शोभायात्रा में जा रहा था तब उसकी दादी ने उसे रोककर कहा था, ‘‘शोभायात्रा में भीड़ बहुत रहने वाली है, अपना ख्याल रखना, किसी अंजान से बिल्कुल न घुलना-मिलना।’’ अथर्व नामक इस बच्चे का जवाब था, ‘‘दादी अब मैं बड़ा हो गया हूं। आप मेरी बिल्कुल फिक्र न करें। अपने मोहल्ले में तो सभी अपने हैं।’’ दादी और संपूर्ण परिवार भी आश्वस्त था। प्रभु राम जी के भक्त हनुमान के धार्मिक आयोजन में किसी अनहोनी की कल्पना ही बेमानी है। शोभायात्रा में शामिल होने वाले तो सभी धर्म-कर्म की सुभावना से परिपूर्ण होते हैं। अथर्व का पूरा परिवार एक-दूसरे के साथ मेलजोल रखने और प्रभु भक्ति में यकीन रखता है। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं रही, लेकिन फिर भी दिलदहलाने वाला कांड हो गया। अथर्व के पिता आर्थिक रूप से संपन्न हैं। अथर्व का अपहरण कर लाखों रुपए की फिरौती वसूलने की तैयारी में लगे बदमाशों को तो जैसे मनचाहा मौका ही मिल गया। अथर्व को बेहोश करने के लिए चूहे मारने का स्प्रे शैतानों ने हफ्ते भर पहले ही खरीद लिया था। उन्होंने अथर्व को बेहोश करने के बाद फिरौती का कॉल करके 50 लाख रुपए मांगने का प्लान गहन चिंतन मनन के बाद बनाया जा चुका था। बस्ती के लोग हनुमान जयंती शोभायात्रा में लीन थे, तभी अथर्व को किसी बहाने से अपने पास बुलाकर कार में बिठाया गया। जब कार बिल्कुल सुनसान निर्जन स्थान पर पहुंची तो चतुर अथर्व उनसे सवाल करने लगा। मुझे कहां ले जा रहे हो! चुप कराने के लिए उसके चहरे पर धड़ाधड़ नशीला स्प्रे मारा गया, लेकिन उस पर असर नहीं हुआ। ऐसे में तीनों अपहरणकर्ता घबरा गये और भेद खुलने के भय से उन्होंने दुपट्टे से उसका गला घोट दिया। हड़बड़ी में हत्या करने के बाद उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। पचास लाख की फिरौती वसूलने की हिम्मत धरी की धरी रह गई। अब तो लाश को ठिकाने लगाने की चिंता में उनके हाथ-पैर कांपने लगे। दूसरी तरफ अथर्व के लापता होने से घर-परिवार में खलबली मच चुकी थी। रातभर उसकी तलाश होती रही। इस बीच धन लोभी दरिंदों ने अथर्व के हाथ-पैर बांधे और बोरे में लाश भरकर रेलवे क्रासिंग के पुल पर फेंक चलते बने। मुख्य हत्यारे का अथर्व के घर पर आना-जाना था। उसे जानकारी थी कि उसके पिता के पास इफरात पैसा है। पचास लाख रुपए तो चुटकी बजते ही मिल जाएंगे। 

महाराष्ट्र में स्थित यवतमाल जिले के एक गांव में छह वर्ष की नन्ही बच्ची रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। कई घंटे तक जब बेटी घर नहीं लौटी तो घर में कोहराम मच गया। मासूम बिटिया रोज मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए जाया करती थी। घंटे-आधे घंटे में हंसती-खेलती लौट आती थी। चुस्त-दुरूस्त बेटी का किसी ने अपरहण तो नहीं कर लिया या खेलते-खेलते रास्ता तो नहीं भटक गई जैसी और कई आशंकाओं से ग्रसित माता-पिता ने घंटों उसे चारों तरफ खोजा। रिश्तेदारों से भी पूछताछ की, लेकिन बेटी नहीं मिली। अंतत: थक हार कर पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। मात्र छह साल की बच्ची के एकाएक गायब हो जाने के मामले को बहुत गंभीरता से लेते हुए बच्ची का पता बताने पर 25 हजार रुपयों की घोषणा के साथ अपने तरीके से खोजबीन करते-करते पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि शिवानी बिटिया कहीं दूर नहीं, आसपास ही है। सतर्क पुलिस जब गांव के एक-एक घर की तलाशी करके पता लगा रही थी तभी शिवानी के घर के बाजू से सटे एक घर के कमरे में एक बोरा पड़ा मिला। बोरे को खोलते ही पुलिस वालों की आंखे फटी की फटी रह गईं। जैसे ही परिवारजनों और ग्रामवासियों को शिवानी का शव मिलने की जानकारी मिली तो सभी गुस्से में आगबबूला हो गये। हत्यारे पड़ोसी ने पुलिसिया पूछताछ में अपराध कबूलने में देरी न करते हुए बताया कि जैसे ही शिवानी की नाक की सोने की नथ पर उसकी नज़र पड़ी तो उसका लालच जाग गया। बच्ची को तरबूज खिलाने का प्रलोभन देकर घर बुलाया और नाक से जबरन नथ निकाल तो ली, लेकिन उसके बाद यह खौफ भी सताने लगा कि वह बाहर जाकर सब बता देगी। उसके माता-पिता और पड़ोसी मार-मार कर उसका हुलिया ही बिगाड़ देंगे। हो सकता है जान ही ले लें। इस डर से उसने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव को बोरे में बंद करके रख दिया। लाश को ठिकाने लगाता इससे पहले ही आसपास के लोग और पुलिस तेजी से सक्रिय हो गई और मेरे पाप का पर्दाफाश हो गया।

 शिवानी की मां का तो रो-रोकर बुरा हाल था। वह खुद को कोसे जा रही थी कि अपनी लाडली बिटिया को यदि वह सोने की नथ न पहनाती तो उसकी ऐसे हत्या तो न कर दी जाती। लालची पड़ोसी मेरी मासूम बिटिया की जान लेने से पहले मुझसे मेरी सारी दौलत भी मांग लेता तो मैं उसे मना नहीं करती। कई-कई बार लिखा और कहा जा चुका है कि बेटियों में पिता की जान बसती है। अपनी पुत्री के लिए जन्मदाता अपना सर्वस्व न्योछावर करने को सदैव तत्पर रहते हैं, लेकिन यह कैसे जन्मदाता हैं? पिता कहलाने के हकदार हैं भी? मुझे यकीन है कि अधिकांश लोगों ने यह खबर नहीं पढ़ी होगी कि राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आमल्दा गांव के एक पिता ने अपनी बेटी के प्रेम विवाह से असहमत और आहत होकर उसे जीते-जी मृत घोषित कर मर्दानगी का खूब जोरदार डंका पीटा। उसने अपनी बिरादरी को तो प्रसन्न और प्रफुल्लित कर दिया, लेकिन बेटी को जो अथाह पीड़ा दी उसे व्यक्त करने के लिए कलमकार खुद को असमर्थ पाता है। राजनीति के खिलाड़ी पिता ने पहले तो मनपसंद युवक से ब्याह न करने के लिए समझदार व्यस्क बेटी को प्रेम से मनाने-समझाने की कोशिश की। यहां तक कि उसकी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवायी। पुलिस ने प्रेम को अपराध बताते हुए फैसला बदलने का बार-बार दबाव बनाया, लेकिन सच्ची समर्पित प्रेमिका टस से मस नहीं हुई। पितृसत्ता के मद में डूबे अहंकारी नेताजी ने अपने प्रशंसकों, रिश्तेदारों और वोटरों में अपनी धाक जमाने के लिए शोक पत्रिका छपवायी, जिसमें लिखा कि मेरी पुत्री का स्वर्गवास हो गया है। उसकी आत्मा की शांति के लिए अमुक दिन तीए की बैठक और इस तारीख पर मृत्यु भोज का आयोजन किया गया है। यह भी गौर करने वाली हकीकत है कि तीए में गांव के अधिकांश स्त्री-पुरुष, बच्चे शामिल हुए और मृत्यु भोज के दिन भी सभी ने बड़े मज़े से लजीज हलुआ-पूड़ी और तरह-तरह का खाना खाया और जी भरकर तारीफ की। कितनी-कितनी लज्जा की बात है कि भारत में इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों को पूरी तरह से अपना मनचाहा जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं है। राजस्थान तो ऐसी तानाशाही में अव्वल लगता है। तभी तो आज भी ऊंची जाति के कई लोग लड़की और लड़के में अंतर करते हैं। जो लड़की घरवालों की मर्जी और पसंद से शादी करे वो अच्छी और जो अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुने वो बुरी और बदचलन। बेटियों के प्रेम विवाह पर बंदिश लगाने वाले ये रूढ़ीवादी लोग बेटों के प्रति बहुत उदार नजर आते हैं। उनका कहना है कि अभी तो लड़कियों पर यह नियम बरकरार है। लड़कों के बारे में बाद में सोचेंगे। लड़कियां घर-परिवार की इज्जत होती हैं।उन्हें ऐसे आजाद नहीं छोड़ा जा सकता। इस क्रूर भेदभाव को लेकर शासन और प्रशासन तमाशबीन बना है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के मुंह से भी प्रखर विरोध के स्वर नहीं गूंजने पर शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा ही आता है...।

Thursday, April 9, 2026

अब तो सब जागें...

ईमानदारी से अथक परिश्रम करने वालों को देर-सबेर सफलता मिलती ही है और जमाना भी उनका वंदन-अभिनंदन करता है। संघर्षशील जुनूनी इंसान भले ही कम धनवान हों, लेकिन उनकी दिल से इज्जत की जाती है। यह हकीकत उन लोगों को बहुत देर के बाद समझ में आती है, जो धोखेबाजी, छल, कपट और मुखौटे लगाकर करोड़पति, अरबपति बनते हैं और बड़े अभिमान के साथ मंचों पर शोभायमान होते हैं। लेकिन जब उनकी वास्तविकता सामने आती है, तब उनकी जो थू-थू होती है। उसे बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। महाराष्ट्र में स्थित शिवणी गांव की मालती डोंगरे पुरुषों की शेविंग-कटिंग करती हैं। उनके ज़िस्म चेहरे को छूती हैं। शेविंग क्रीम लगाकर दाढ़ी बनाती हैं और बड़ी कुशलता के साथ बाल काटती हैं। मालती के पति बिस्तर पर हैं। लगभग बारह वर्ष पूर्व की दोपहर जब वे मजदूरी कर घर लौट रहे थे, तभी एक गाड़ी ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी। काफी देर तक सड़क पर घायल अवस्था में पड़े रहे। अधिकांश लोग अनदेखी कर चलते बने। लेकिन एक सजग और सज्जन राहगीर ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। मालती को भी खबर कर दी। मालती के मेहनतकश पति की कंधे की हड्डी और पसलियां इस कदर टूट गईं थी कि वे चलने और काम करने के लायक नहीं रहे। दो बच्चों की मां मालती पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कमाऊ पति के बिस्तर पकड़ लेने के पश्चात पहले तो उसने छोटे-मोटे काम किए और किसी तरह से पति के इलाज और घर के खर्चों के लिए धन की प्राप्ति की। लेकिन फिर भी घोर आर्थिक संकट बना रहा। इसी दौरान मालती के मन में विचार आया कि मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स तो कर रखा है, ऐसे में क्यों न अपना ब्यूटीपार्लर प्रारंभ कर दूं। चाह ने राह निकाल दी। मालती ने ब्यूटी पार्लर प्रारंभ तो कर दिया, लेकिन गांव में ऐसी बहुत कम महिलाएं थीं, जिन्हें सजने संवरने में अभिरुचि थी। 

पुरुषों के वर्चस्व वाले गांव में अधिकांश महिलाएं घर से बाहर निकलने में भी सकुचाती थीं। ऐसे में ब्यूटीपार्लर को चंद दिनों में बंद करना पड़ा। मालती उस मिट्टी की नहीं बनी हैं जो जीवन के संघर्ष, आंधी तूफान, तेज बरसात से धराशायी हो जाती है। उसने बिना ज्यादा विचार किए ब्यूटी पार्लर को पुरुषों के सैलून में तब्दील कर दिया। इस बदलाव को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया। शुरू-शुरू में पुरुषों ने ‘मालती सैलून’ से यह सोचकर दूरी से बनाये रखी कि महिला से कटिंग और शेविंग करवाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। वह ठीक से उस्तरा और कैंची चला भी पाएगी या नहीं। मालती ने धैर्य को अपना साथी बनाये रखा। धीरे-धीरे पुरुषों का आना और संतुष्ट होकर जाना मालती सैलून को ख्याति दिलाने लगा। ग्राहकों की संख्या में इजाफा होने से अच्छी-खासी कमाई भी होने लगी। दोनों बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आसानी से पति का समुचित इलाज भी होने लगा। कालांतर में बेटे ने पढ़ाई के साथ-साथ सैलून में अपनी मां का साथ देना प्रारंभ कर दिया। बेटी नीट की तैयारी कर रही है। एक अच्छा सा प्लॉट खरीदकर सर्वसुविधायुक्त अपना घर भी बनवा लिया गया है। 

मालती ने जब पुरुषों के लिए सैलून की शुरुआत की तो जान-पहचान वाले लोगों ने तो तंज कसे ही, रिश्तेदारों ने भी यह कहकर कम परेशान नहीं किया, ‘‘औरत होकर पुरुषों की शेविंग-कटिंग करोगी, उनके साथ सटकर खड़ी हो, उनके चेहरे पर हाथ लगाओगी और भी पता नहीं क्या-क्या होगा। पता नहीं कैसे-कैसे लुच्चे-बदनाम भी औरत के आकर्षण में खिंचे चले आएंगे। ऐसे में खाक तुम्हारी इज्जत रह जाएगी।’’ उन्होंने तो बहिष्कार करते हुए यह साफ-साफ कह दिया था कि भूल से भी किसी को मत बताना कि हमसे तुम्हारी कोई रिश्तेदारी है। हम भी तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाएंगे। ऐसे समय में सिर्फ मेरे माता-पिता ही थे जो हमारे साथ खड़े रहे। सैलून खोलने पर पति ने भी कभी ऐतराज प्रकट नहीं किया। उन्हें अपनी पत्नी पर अपार गर्व है। वे कहते है, ‘‘एक्सीडेंट की वजह से मैं तो कुछ भी करने लायक नहीं रह गया था। कमाई बंद हो गई थी। घर चलाना मुश्किल हो गया था। दो छोटे बच्चे थे। मेरी पत्नी ने पूरी जिम्मेदारी अपने अकेले कंधे पर ले ली। बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवा रही है। मेरे इलाज और सेहत का भी पूरा ध्यान रखा है। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखें भीग-भीग जाती हैं। 

हमारी इसी दुनिया में कई लोग ऐसे हैं। जिनका अपना कोई नहीं होता। लावारिस कहे जाने वाले इन लोगों को मरने पर भी दूर-दूर तक कंधा देने वाले नहीं होते। कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उनके अपने ही सदा-सदा के लिए भूला देते हैं। कितनी अच्छी बात है कि हमारी इसी दुनिया में ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने की कर्तव्य की तरह जिम्मेदारी ले रखी है। उन्हें न तो प्रचार की चाह है और न ही पुरस्कार-सम्मान की लालच है। पंजाब के शहर लुधियाना में रहने वाले गुलशन कई वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाते चले आ रहे हैं। उन्हें यह देखकर बहुत पीड़ा होती थी कि सड़क किनारे या अस्पतालों में शव पड़े रहते थे और उनको लेने कोई नहीं आता था। तभी एक दिन उन्होंने ठान लिया कि जब तक जिन्दा हूं किसी भी शव को लावारिस नहीं छोेडूंगा। गुलशन अभी तक पांच सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके  हैं। ‘फक्कड़ बंधु’ भी पिछले 33 साल से जिनका कोई नहीं उनका अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। वर्षों पूर्व कानपुर के बंटी अपने गुमशुदा पिता को ढूंढ़ते हुए लुधियाना पहुंचे तो पिता तो नहीं मिले, लेकिन यहां उनकी मुलाकात जोगेंद्र फक्कड़ से हो गई। जोगेंद्र रेलवे की पटरियों से क्षत-विक्षत शव उठाते थे। दोनों में मेल-मुलाकात होती रही। एक दिन दोनों ने देखा कि पटरियों पर किसी ने खुदकुशी कर ली है। दोनों यह देखकर स्तब्ध रह गए कि आत्महत्या करने वाले के कुछ परिजन भी वहां खड़े थे लेकिन कोई भी टुकड़े-टुकड़े हुए शव को उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। दोनों ने क्षत-विक्षत शव को एकत्रित कर सिविल अस्पताल पहुंचाया। उस दिन से दोनों ने ऐसे शवों को अस्पताल पहुंचाने तथा अंतिम संस्कार करने को अपने जीवन का मकसद बना लिया है। शहरवासियों के बीच ‘फक्कड़ बंधु’ के तौर पर जाने जानेवाले दोनों मित्रों के बारे में आपके क्या विचार हैं? कई लोगों की निगाह में ये छोटे-मोटे इंसान हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं होती। लेकिन सच तो यह है कि ऐसे परोपकारी जब दुनिया से जाते है तो उन्हें जाने, खोने और पाने का कोई मलाल नहीं रहता। खाली जेब, फक्कड़ की तरह जीते रहे, यही संतुष्टि हर चिंता से मुक्त कर देती है। जब कुछ भले लोगों के बीच इस परोपकारियों का जिक्र आता है तो तारीफ ही होती है। हमारे आसपास और दूर कई चेहरे ऐसे हैं जो मेहनत करने की बजाय धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और नकाबपोशी में यकीन रखते हैं। अधिकांश लोग भी उनकी ढोंगी, कपटी, असलियत जानने-समझने के बावजूद खामोशी की चादर ओड़े रहते हैं। शहर और देशवासियों की आंखों में धूल झोंक कर मंचों पर आसीन होने, मान-सम्मान पाने और करोड़ों में खेलने वालों का जब भंडाफोड़ होता है तो आम भारतीय कितने आहत होते हैं इसकी कभी खोज-खबर नहीं ली जाती। इन पंंक्तियों के लिखे जाने के दौरान देशभर के अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर जैसे ही मेैंने यह खबर पड़ी और सुनी तो मैं बस सोचता रह गया कि क्या इंसान इतना भी गिर सकता है? वो भी पैसे के लिए! पूरी दुनिया में भारत की योग विद्या का डंका बज रहा है। अत्यंत उमंगो-तरंगों तथा गर्व के साथ विश्व योग दिवस मनाया जाता है। नई शिक्षा नीति में योग शिक्षा लगभग अनिवार्य है। पश्चिम के देश भी योग में भारत का लोहा मान रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस ने गुजरात के सूरत में ऐसे योगाश्रम का भंडाफोड़ किया है जहां नकली नोटों की फैक्ट्री चल रही थी। इस आश्रम का कर्ताधर्ता आलीशान जीवन जीते हुए महंगी कारों में चलता था। ‘गुरुजी’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस ढोंगी, कपटी, नकाबपोश के 15 फीट ऊंची दीवार वाले आश्रम के भीतर झांकना नामुमकिन है। आश्रम आध्यात्मिक केंद्र से अधिक किसी शाही महल की तरह लगता है। जहां प्रवेश करते ही एक तरफ गौशाला है तो दूसरी तरफ घोड़ों की अस्तबल भी है। कई आलीशान कारें खड़ी हैं। भव्य महंगे सुसज्जित कार्यालय में आरोपी प्रदीप जोटांगिया नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का संचालन कर देश के साथ गद्दारी कर रहा था। योगाभ्यास के लिए आने वाले लोगों की नजरों से दूर, करोड़ों रुपए के नकली नोटों के काले कारोबार का यही से संचालन होता था। आश्रम में बड़े-बड़े तहखाने होने का भी पता चला है। यहीं पर जाली नोट छापने वाली मशीने और अवैध सामग्री रखी जाती थी। योग गुरु प्रदीप अपने हर प्रवचन में कहता था, ईमानदारी इंसान की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चे रास्ते से चलो फल जरूर मिलेगा। धन लोभ इंसान को अंधा बना देता है। किसी को धोखा देना खुद को धोखा देना है। ऐसे मायावी बोलवचन उन तमाम भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, अफसरों, पत्रकारों और वरिष्ठ संपादकों की जुबान से भी अक्सर निकलते और छलकते रहते है, जो हैं तो हर दर्जे के धूर्त और बेईमान लेकिन ईमानदारी का मुखौटा ओड़े हुए हैं। इनका भी आज नहीं तो कल पूरा पर्दाफाश तो होना ही है...।

Thursday, April 2, 2026

धार्मिक अनुष्ठान!

मायानगरी मुंबई में रेतीले समंदर के निकट एक व्यक्ति ने अनोखा कारोबार प्रारंभ किया है। वह लोगों की समस्याओं का समाधान करने का दावा करता है। लोगों को भी उस पर भरोसा है। तभी तो खिंचे चले आते हैं। इसके लिए उसने बाकायदा एक बोर्ड लगा रखा है, जिसमें विभिन्न इंसानी तकलीफों, जरूरतों और मुश्किलों के शाब्दिक और भावनात्मक समाधान की कीमत लिखी हुई है। साधारण परेशानी सुनने के लिए मात्र ढाई सौ, बड़े संकट को जानने के लिए पांच सौ तो साथ मिल-बैठकर सुनने-सुनाने तथा रोने-गाने के लिए वह एक हजार रुपए की दक्षिणा लेता है। उसके पास कई स्त्री-पुरुष अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आते हैं। वह डिप्रेशन, प्यार में धोखा खाये, जुए-सट्टे में बर्बाद हुए निराश, हताश और अकेलेपन के शिकार लोगों की खासतौर पर मदद करने का दावा करता है। भावनात्मक रूप से टूट चुके लोगों के साथ-साथ नौकरी, कामधंधे की तलाश में भटकते लोगों की परेशानी को वह बहुत ध्यान से सुनता है और सफल होने का रास्ता भी बताता है। वह बड़े इत्मीनान से सभी की सुनता है। कोई जल्दीबाजी और पाने-छुपाने की भावना उसमें नज़र नहीं आती। गरीबों के साथ-साथ अमीर भी उसके आकर्षण से बच नहीं पाते। माथे पर टीका लगाकर बैठे इस शख्स के विभिन्न वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इस अनोखे ज्ञानवान के वीडियो पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। बहुतों ने लिखा है कि लोगों के पास समस्याएं बहुत हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। इसलिए यह धंधा कभी मंदा नहीं पड़ेगा। गरीबों के लिए तो ठीक है, लेकिन रईसों के लिए उसे रेट और ऊंचे रखने चाहिए, क्योंकि उन्हें दिन-रात अथाह जोड़-तोड़, चिंता, परेशानी और दगाबाजी से जूझना, टूटना पड़ रहा है। 

यह कोई नया खेल-करिश्मा नहीं। भारत में सदियों से ऐसे दिमाग वाले अपना चमत्कार दिखाते चले आ रहे हैं। कभी फकीर, कभी साधु, कभी ज्योतिषी, चोर तो कभी सिपाही और पता नहीं क्या-क्या बनकर ठगने और लूटने का गोरखधंधा भी चलता चला आ रहा है। आसाराम, राम-रहीम जैसे अनेकों धूर्त और मक्कार पकड़ में तो आते हैं, लेकिन फिर भी लोगों के दिमाग के दरवाजे खुल नहीं पाते। यदि ऐसा नहीं होता तो जेलों में सड़ रहे शैतान बाबाओं की तर्ज पर नये कपटियों का पैर जमाना संभव ही नहीं हो पाता। धर्म-कर्म और ज्योतिष के उपजाऊ बाजार में अशोक खरात के नाम के नये कपटी की गूंज की खबरों ने हर किसी को चौकाया। पुलिस के शिकंजे में फड़फड़ाते इस कपटी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि दूसरों की हस्त रेखाएं देखते-देखते उसके इतने बुरे दिन आ धमकेंगे कि मुंह छिपाना पड़ जाएगा। लेकिन पाप का घड़ा जब भरता है तो कोई कहां बच पाता है। स्वयं को महान भविष्यवक्ता चमत्कारी-बाबा बताकर असंख्य लोगों की आंखों में धूल झोंकने वाले अशोक खरात उर्फ कैप्टन ने तो अपने चमत्कारों की फर्जी कहानियां प्रचारित करने के लिए ग्रंथनुमा किताबें तक प्रकाशित कर लाखों की तादाद में पूरे महाराष्ट्र में बंटवा दी थीं। इन किताबों के लेखक नामकरण आवारेे का कहना है कि उसे जो बताया गया उसने वही लिखा। उसे तो बस अपनी मोटी फीस से मतलब था। वर्ष 2012 में उससे पहली किताब लिखवायी गई। इस आकर्षक किताब में ‘सिद्ध पुरुष के सानिध्य में’ शीर्षक के तहत खरात की कथित सिद्ध शक्तियों के अनेकों उदाहरण देते हुए उसे दिव्य पुरुष घोषित किया गया। इसके प्रकाशन और मुफ्त वितरण के पश्चात कई नये-नये लोगों को पता चला कि देश की धरती पर एक महान ‘दिव्य पुरुष’ का जन्म हो चुका है। जिसके चरणों में नतमस्तक होने पर हर कष्ट का अंत होना संभव है। आजकल गरीबों से ज्यादा अमीरों को अपना भविष्य जानने की चाहत तड़पाती है। नेताओं और अफसरों को ऐसे ज्ञानियों की तलाश रहती है। खरात ने ऐसे लोगों तक खास तौर पर अपनी पहुंच बनाई और फिर उसकी लाटरी ही खुलती चली गई। देखते ही देखते अंधभक्तों के तेजी से बढ़ते चले जाने से खरात कीं छाती तो चौड़ी होनी ही थी। एक समय ऐसा भी आया जब उसके तिलस्मी दरबार में केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, आईएएस अफसर तथा उद्योगपति भी अपना भविष्य जानने और सुधारने की लालसा के साथ पहुंचने लगे। वह विधायकों, सांसदों को उनके मंत्री बनने के दिन तक की घोषणा करने के साथ-साथ कुर्सी पाने के उपाय बताने लगा। कभी-कभी तुक्का भी चल जाता है। इस मामले में खरात खुशकिस्मत रहा और धन की अंधाधुंध बरसात होने लगी। कुछ ही वर्षों में उसने लगभग 1500 करोड़ की संपत्ति जुटा ली। सत्ता, प्रशासन और उद्योग जगत के नामी-गिरामी चेहरों की देखादेखी आम लोगों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया। हैरत और मजे से लबालब हकीकत यह भी रही कि नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों तथा किस्म-किस्म के रईसों की माताएं, बहनें और पत्नियों के साथ-साथ अनेकों पुलिस वाले भी उसकी चौखट पर अपनी बारी आने के इंतजार में खड़े देखे जाने लगे। अपनी तरक्की के अलावा फलाना केस कब और कैसे सुलझेगा, छिपा और भागा हुआ बलात्कारी, हत्यारा, चोर-लुटेरा, भ्रष्टाचारी कैसे पकड़ में आयेगा यह जानने के लिए खाकी वर्दी, सफेद खादी के साथ सिर झुकाये जब नज़र आने लगी तो खरात ने खुद को धरती का सर्वशक्तिमान... भगवान समझ लिया। ऊंचे लोगों को अपने जाल में फंसा कर नाम के साथ दाम कमाते धूर्त ने ऊंचे घरानों की बहू-बेटियों को भी अपने मायावी जाल में फंसाते हुए वासना का नंगा नाच प्रारंभ कर दिया। शैतान, बलात्कारी की धूर्तता और दुष्टता शायद ही इतनी शीघ्र उजागर हो पाती यदि दुष्कर्म की शिकार एक महिला पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज न करवाती। उसकी साहसी पहल के पश्चात अपनी अस्मत लुटवा चुकी और भी कई महिलाएं शिकायतों के पुलिंदे के साथ थाने पहुंचने लगीं, तो धमाके पर धमाका और निर्लज्ज देहभोगी बेनकाब होता चला गया। धर्म अंधभक्ति और आस्था के बाजार के इस शातिर खिलाड़ी ने कुछ ऐसा जादू चलाया, जिसके चलते महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर इसके पैर धोने के साथ-साथ वो सब भी कर गुजरीं, जो अत्यंत शर्मनाक है। जब ऐसे खास चेहरे अंधी वासना का खिलौना बनते हैं तो  दूसरों की झिझक भी जाती रहती है। अपनी महिला भक्तों के भरोसे का कत्ल या रजामंदी से उसने कितनी महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया इसका संपूर्ण आंकड़ा तो सामने आना संभव नहीं। लुटी-पिटी सभी नारियां मुंह खोलने का साहस नहीं दिखातीं। जो पहली पीड़िता सामने आयी उसने बताया कि अपने परिवार के बिगड़ते हालात की वजह से वह भविष्य के बारे में जानने के लिए उसके पास पहुंची थी। उसे उम्मीद थी तकलीफों से छुटकारा पाने का कोई सार्थक उपाय बाबा के दरबार में अवश्य मिलेगा। एक दिन खरात ने उसे अपने करीब बिठाकर पानी पिलाया, जिसे पीते ही वह बेहोश हो गई। होश में आने पर पता चला कि उसकी आबरू पर डाका डाला जा चुका है। इस दौरान उसकी तस्वीरें भी उतार ली गई थीं। इसके बाद तो देहभोगी ने ब्लैकमेलिंग करने का ऐसा सिलसिला चलाया कि वह बार-बार यौन शोषण का शिकार होने को विवश होती रही। महाराष्ट्र के नाशिक का यह हाई-प्रोफाइल अय्याश शैतान, आस्थावान नारियों को अपने बस में करने के लिए जो पानी पिलाता, उसमें वासना को भड़काने के लिए वियाग्रा सहित कई नशीली दवाएं मिलाता था। जब भक्तिन पर नशे का तीव्र असर हो जाता था तब वह ‘भगवान से दिव्य मिलन’ के नाम पर अपनी देह की भूख शांत करता था। पुलिस के शिकंजे में बुरी तरह फंसने के बाद उसने निर्लज्जता से खुद को सही ठहराते हुए कहा कि, मैंने किसी महिला के साथ गलत नहीं किया। मैंने जो भी किया वो तो धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा था। ये शातिर दुराचारी भले ही खुद ज्यादा शिक्षित नहीं है, लेकिन फिर भी उच्च शिक्षित औरतों को लुभावने शब्दजाल में आसानी से फांस लेता था। वह उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहता था कि, तुम तो अपने पति की तुलना में बेइंतहा आकर्षक और खूबसूरत हो। वो तुम्हारी योग्यता की कद्र नहीं करता। तुम तो किसी राजा की रानी बनने के लायक हो। मेरे साम्राज्य और मेरे पहलू में तुम्हारा तहे-दिल से स्वागत है। उसे उन नारियों को भी खूब निशाना बनाना आता था, जो शारीरिक अतृप्ति, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट से गुजर रही होती थीं। यदि उसकी मनचाही खूबसूरत नारी शरीर सौंपने में आनाकानी करती तो वह उसे दैवी प्रकोप का भय दिखाते हुए धमकाने से भी बाज नहीं आता था कि उसकी अलौकिक शक्तियां से उसके संपूर्ण परिवार का सत्यानाश हो जाएगा। भयभीत करके रख देने वाला उसका मानसिक दबाव कई औरतों को आत्मसमर्पण करने को विवश करता चला गया। उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि यह सोशल मीडिया का जंगी दौर है। पलक झपकते ही बदनामी की काली पताका उनका सत्यानाश करके रख देगी। हुआ भी यही। अनेकों महिलाओं के साथ उसके अश्लील वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर छा गए। सोशल मीडिया के धुरंधरों को ऐसे सेक्स स्कैडलों का बेसब्री से इंतजार रहता है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बड़ी कू्ररता के साथ महिलाओं के चेहरे-मोहरे उजागर कर वे उनके वर्तमान और भविष्य का कबाड़ा कर रहे हैं। आस्था या मजबूरी के चलते बिस्तर की चादर बनने से पहले नारी को भी सौ बार सोचना चाहिए। कलमकार यह सोच-सोच कर भयभीत और चिंतित है कि शिकारी के हाथों लुटी महिलाएं अपने आसपास के लोगों तथा रिश्तेदारों को कैसे अपना मुंह दिखायेंगी। इन अति उत्साही भक्तिनों के बच्चे, माता-पिता और पति परमेश्वर समाज के निशाने और ताने सुनने को विवश होकर रह जाएंगे। बहुतों को पता ही नहीं होगा कि बीते वर्ष दिल्ली के एक विख्यात स्कूल की छात्रा का एक अश्लील अमर्यादित वीडियो वायरल हुआ था। बच्ची के पिता ने बेइंतहा बदनामी और शर्मिंदगी के चलते आत्महत्या कर ली थी...।

Wednesday, March 25, 2026

समाधान

यह खबर कितनी चौकाने वाली है कि भारत के कई बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हैं। उन्हें पाठयपुस्तकों के साथ-साथ पालकों के दबाव और आकांक्षाओं से जूझना पड़ रहा है। अधिकांश अभिभावक सख्त अनुशासन की डोर में बांधे रख किसी भी तरह से उन्हें डिग्रीधारक होते देखना चाहते हैं। उनके मन में यह यकीन घर कर चुका है कि कोई भी छोटी-बड़ी डिग्री उन्हें नौकरी तो दिला ही देगी। कई बच्चे बनना कुछ चाहते हैं और उनके माता-पिता की चाहत और होती है। ऐसे में उनके बीच जो कहा-सुनी और टकराव होता है, उससे वो भारतीय खूब वाकिफ हैं, जिन्हें अपनी सख्ती और जिद की वजह से औलाद से दूर होना पड़ता है। बहुतेरे मां-बाप ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, सख्ती से पालना चाहिए। दरअसल, अपने यहां बच्चों का समुचित मार्गदर्शन करने की बजाय इधर-उधर के उदाहरणों को पेश कर नीचा दिखाने की अत्यंत पुरातन परिपाटी है। किसी रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी के बेटे-बेटी की सफलता की कहानियां मन में बसाये अभिभावक अपनी संतानों को किसी से कमतर नहीं देखना चाहते। कई भारतीयों को ज्ञात ही नहीं होगा कि विश्व में एक देश ऐसा भी हैं, जहां के बच्चे पालकों की ऐसी-वैसी विभिन्न बंदिशों से आजाद है। इस देश का नाम है नीदरलैंड। नीदरलैंड को कभी हॉलेंड के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक अत्यंत समृद्ध और विकसित देश नीदरलैंड दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और कृषि उत्पाद निर्यातक देश है। यहां की अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि, भोजन प्रसंस्करण और पेट्रोकेमिकल पर आधारित है। यहां की आधिकारिक भाषा ‘डच’ है। यहां के लोग दुनिया में सबसे लंबे माने जाते हैं। खुले विचारों वाली सोच और नीतियों के लिए जाने जानेवाले नीदरलैंड को विश्व के सबसे खुशहाल और सुरक्षित देशों में गिना जाता है। इस देश में अपनी संतानों को बचपन से ही प्यार और सुरक्षा का अहसास कराया जाता है। यहां पर दस साल की उम्र तक बच्चों को स्कूलों में कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। वहां के लोगों की धारणा है कि एक तनावग्रस्त बच्चा कभी भी बेहतर नागरिक नहीं बन सकता। जहां के बच्चे खुश नहीं वहां के वयस्क भी खुशहाल नहीं हो सकते। दरअसल, नीदरलैंड में सफलता के मायने हैं एक सुनियोजित और चिंतामुक्त जीवन जीना। जहां विश्व के अधिकांश देशों में यह माना जाता है कि किसी भी तरह से कामयाबी हासिल करो, लेकिन नीदरलैंड के बड़े-बुजुर्ग तथा माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चा खुश और संतुष्ट रहेगा तो कामयाबी खुद-ब-खुद उसके कदम चूमेगी। एक प्रसन्न, तनावमुक्त बच्चा ही खुद को बेहतर समझ पाता है। वह अंदर से मोटिवेटेड रहता है और समाज से जुड़ना सीखता है। उसके लिए सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे ओहदे तक पहुंचना नहीं, बल्कि एक आजाद और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बनना है। डच समाज कहने में नहीं करने में यकीन रखता है। उन्हें भौतिक सुखों के लिए आड़े-टेढ़े रास्तों में भटकना और हवा में उड़ना कतई पसंद नहीं। 

डच समाज में रिश्तों को निभाने की गजब की कला समाहित है। वहां पर परंपरा के तौर पर ‘पापा डे’ को निभाने का चलन है। इस दिन सभी पापा खास तौर पर बच्चों के साथ भरपूर समय बिताने तथा उनका हालचाल जानने के लिए छुट्टी लेते हैं। उनकी समस्याओं को गौर से सुनते हुए समाधान से अवगत कराते हैं। इससे बच्चों को सही और गलत का पता तो चलता ही है, निर्णय लेने की क्षमता और मनोबल में वृद्धि होती है। अभिभावकों की प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि वहां के बच्चे ब्रांडेड कपड़ों या महंगे खिलौने की लालसा करने की बजाय साइकिल चलाने और मिट्टी में खेलने का आनंद लेकर प्रफुल्लित हैं। नीदरलैंड की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चों को खुद साइकिल चलाकर स्कूल जाते देखना दूसरे देशों से पहुंचने वाले पर्यटकों को भी आनंदित करता है। इस अनोखे देश में भारत की तरह बच्चों की निगरानी और टोका-टोकी की कोई जगह नहीं। बच्चों के गिरने पर खुद संभलने की सोच में यकीन रखने वाले माता-पिता का मानना है कि यही भावनात्मक आजादी उनके बच्चों को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है।

धनवानों की सोच और उनके जीवन जीने के तौर-तरीकों के बारे में सभी की लगभग एक जैसी धारणा है। अधिकतर धनपति खुद तो दुनियाभर की सुख-सुविधाओं के भोगी होते ही हैं, अपनी संतानों को भी सुविधाभोगी और आरामपरस्त बना देते हैं। उनका मानना होता है कि हमने धन कमाया ही अपने बाल-बच्चों के लिए है तो ऐसे में उन्हें कोई तकलीफ क्यों होने दें। अपनी संतान के लिए किसी भी तरह की कोई कमी न होने देनेवाले रईसों को तो आपने भी जरूर देखा होगा, लेकिन शेख खलफअल हब्तूर जैसे खरबपति शायद ही देखे और सुने होंगे, जिन्होंने कॉलेज से अच्छी-खासी पढ़ाई और डिग्री लेने वाले अपने इकलौते बेटे को अपने हजारों करोड़ के व्यावसायिक साम्राज्य की गद्दी पर तुरंत विराजमान कराने की बजाय होटलों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा लगाने और वेटर के तौर पर काम करने का जमीनी अनुभव लेने के लिए कई महीने तक खुद से दूर रखा। हाल ही में एक कार्यक्रम में खलफ अल हब्तूर ने उदाहरणों के साथ कहा कि, ‘‘डिग्री जरूरी है, लेकिन अनुभव उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली इंजीनियरिंग, असली मैनेजमेंट, असली काम... साइट पर जाकर ही समझ में आता है। सिर्फ किताबें पढ़कर कोई भी करियर नहीं बनता। फील्ड में उतरने से जो सीख मिलती है, वही किसी को प्रोफेशनल बनाती है।’’ अल हब्तूर ग्रुप के चेयरमैन शेख खलफ अल हब्तूर 1.35 लाख करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। उनका कारोबार होटल्स, रियल एस्टेट, ऑटो मोबाइल, शिक्षा और प्रकाशन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। 2023 में 100 अफगान छात्राओं को यूएई की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दे चुका यह खुद्दार और उदार खरबपति हर साल करोड़ों-करोड़ों रुपये का दान करने के बावजूद दानवीर होने का वैसा ढिंढोरा नहीं पिटता। जैसा कि भारत में पीटा जाता है। उनका मानना है कि जमीनी संघर्ष विनम्रता और समय की कीमत से अवगत कराने के साथ-साथ चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है। जब कभी चीजें आपकी सोच और योजना के मुताबिक न हो रही हों तो घबराने की बजाय कुछ देर तक शांत रहकर चिंतन-मनन करते हुए खुद को और सीखने और जानने का समय दें। अनिश्चितता से डरकर भागना छोड़ उसे आत्मसात करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। 

मनचाही सफलता पाने के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आना जरूरी है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी छाती तानकर सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल की वजह से भारत के बच्चे और बड़े किस तरह से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है। अनेकों माता-पिता अपने लाडले, लाडलियों की मोबाइल की लत की वजह से चौबीस घंटे परेशान रहते हैं। यह भी सच है कि कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। बेलगावी जिले के हलगा गांव के सजग लोगों ने जब गौर किया कि उनके यहां के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मोबाइल तथा टीवी देखने में अपना अधिकांश समय बर्बाद कर रहे हैं तो चिंता के मारे उनकी नींद जाती रही। ऐसे में ग्राम पंचायत भी सतर्क हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद रास्ता भी निकाल लिया गया। गांव में हर शाम ग्राम पंचायत कार्यालय से एक सायरन बजता है, जो लोगों को टीवी को तुरंत बंद करने तथा मोबाइल फोन अलग रखने का संकेत देता है। पिछले दिसंबर माह से यह संकेत दो घंटे के डिजिटल डिटॉक्स यानी एक सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। पंचायत अधिकारियों का कहना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों में इस नियम का पालन किया जा रहा है। विद्यार्थी कम अज़ कम दो घंटे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। हलगा गांव ने जो रास्ता दिखाया है, यदि चाहें तो हम और आप भी उसका अनुसरण कर सकते हैं...।

Thursday, March 19, 2026

अंतिम यात्रा

पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता आड़ा-टेढ़ा होता है और बेहद दोस्ताना भी। इस आत्मीय रिश्ते की नींव को मजबूत करने के लिए पहली ईंट तो जन्मदाता को ही रखनी पड़ती है। इसके लिए उसे बहुतेरे जतन और त्याग भी करने पड़ते हैं। फिर भी कहीं न कहीं चूक हो जाती है। कभी इधर से तो कभी उधर से। फिर भी हमारे संसार में हर भूल-चूक और समस्या का समाधान है। बशर्ते नीयत में खोट न हो। कहा जाता है कि ज्यादातर पुत्र मां के करीब होते हैं और बेटियां पापा की दुलारी होती हैं। अधिकतर पिता काफी हद तक खुरदुरे और व्यावहारिक होते हैं तो माताएं ममता और भावुकता की डोर से ताउम्र बंधी होती हैं। यह गुण विधाता ने उन्हें खास तौर पर अर्पित-समर्पित किया है। कुछ पिता बंद किताब होते हैं, जिसे हर कोई नहीं पढ़ पाता। उसे पढ़ने के लिए खोलना होता है। इस दौर की औलादों के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। सभी माता-पिता अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। सदियों से दस्तूर बनी इस मनोकामना की जब अवहेलना और निरादर होता है तो पिता का मन आहत होता है। उनका गुस्सा भी फूट पड़ता है जो इस दौर की अधिकांश औलादों के लिए नागवार होता चला जा रहा है।

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके में एक अरबपति कारोबारी की उसी के बिगडैल बेटे ने बहुत ही क्रूर तरीके से हत्या कर दी। हत्या के पश्चात आरी से अपने जन्मदाता के जिस्म के टुकड़े करने में भी उसके हाथ नहीं कांपे। पैथोलॉजी संचालक व शराब के बड़े कारोबारी मानवेंद्र सिंह अपने अक्षय नामक इस पुत्र को अच्छा और कुशल डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन अक्षय का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। पिता और पुत्र के बीच मनमुटाव और बहसबाजी सतत चलती रहती थी। इसी तनातनी में कभी कभार पिता का हाथ भी बेटे पर उठ जाता था। अपनी जिन्दगी अपने ही तौर तरीके से जीने के अभिलाषी अक्षय के लिए पिता का डांटना-फटकारना असहनीय होता चला गया। उसने अपनी शराबखोरी में और... और इजाफा करते हुए पिता से टकराने की हिम्मत दिखानी प्रारंभ कर दी। पिता भी अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘‘मैं जो चाहता हूं, वही करो, नहीं तो मेरी नजरों से ओझल हो जाओ।’’ ऐसे में आपसी तनाव तो बढ़ना ही था। अपने पापा की नसीहत को बकवास मान उनसे बेइंतहा नफरत करते बिगड़ैल बेटे के मन में इस बात का भी गुस्सा अंदर तक भरा था कि उसकी मां की आत्महत्या के वही जिम्मेदार हैं। यदि इन्होंने दूसरी शादी कर ली तो जायदाद पर सौतेली मां का कब्जा हो जाएगा।

एक रात पिता और पुत्र में खूब कहासुनी हुई। पिता ने गुस्से में रायफल की गोली का भय दिखाया तो बेटे का नफरती माथा घूम गया। अलसुबह उसने उसी रायफल से गहरी नींद में सोये पिता के सिर पर गोली मारी और कुछ घंटों के बाद बाजार जाकर आरी और नीला ड्रम खरीद लाया। उसने बड़े इत्मीनान से कसाई की तरह शव के टुकड़े किए। इससे पहले उसने यूट्यूब पर बहुत गौर से ‘वध’ नामक फिल्म देखी, जिसमें अत्यंत राक्षसी अंदाज में शव को काटने और ठिकाने लगाने का तरीका समझाया गया है। नृशंस हत्यारे ने पहले पिता के दोनों हाथ और पैर काटे। बहुत कोशिश के बाद भी वह धड़ को काट नहीं पाया तो उसे नीले ड्रम में भर दिया। काटे गये दोनों हाथ और पैरों को एक पिट्ठू बैग में डाला और बड़े मजे से कार में सवार होकर शहर से दूर बीस किलोमीटर दूर जा पहुंचा। लाश के चार टुकड़े उसने रास्ते में फेंके और खून से सने कपड़े नहर से लगी घनी झाड़ियों में छुपा दिए। शव के सिर और धड़ को ठिकाने लगाने में सफल नहीं होने पर उसने उन्हें यह सोचकर नीले ड्रम में डाल दिया कि शीघ्र ही इन्हें एसिड से जला और गला देगा। अपने जन्मदाता का कत्ल करने के बाद भी हत्यारे के चेहरे पर पुलिस वालों को कोई शिकन नहीं दिखी। वह यही कहता रहा कि पहले पिता ने पीटा फिर मैंने गुस्से में यह गलती कर दी। जेल में पूरी रात दीवार के सहारे बैठ जरूर बड़बड़ाता और अपनी अक्षम्य करतूत पर पछताता रहा।

मध्यप्रदेश में स्थित बड़वानी में 46 वर्षीय डॉक्टर हरीश पिछले पांच वर्षों से अचेतावस्था में बिस्तर पर पड़े हैं। मार्च 2021 की सुबह क्लिनिक जाते वक्त हुई सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में ऐसी बेहद गंभीर चोटें आई कि लंबे इलाज और सर्जरी के बाद भी होश में नहीं आ पाये। कोमा में होने के कारण हरीश करवट नहीं ले पाते। उनके उम्रदराज पिता अपने हाथों से बेटे की प्रतिदिन मालिश करते हैं। शरीर की साफ-सफाई तथा करवट दिलाते है। हरीश को ट्यूब के माध्यम से दूध, जूस और विभिन्न दवाएं दी जा रही हैं। दिन-रात चल रहे इलाज के खर्च चलते घर बिकने के साथ-साथ बीस लाख का कर्जा भी हो चुका है, लेकिन फिर भी धैर्यवान पिता का हौसला और ईश्वर के प्रति भरोसा बना हुआ है। वो दिन जरूर आएगा जब उनके बेटे को होश आयेगा और वह पहले की तरह एकदम सेहतमंद होकर चलता-फिरता नजर आयेगा।

गड़चिरोली के रहने वाले बंडू यादवराव की 28 वर्षीय बेटी श्रेया की जिन्दगी पिछले चार वर्ष से बिस्तर तक ही सिमटी हुई है। डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया है। वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। पढ़ाई में काफी होशियार रही श्रेया का साफ्टवेयर डेवलपर बनने का प्रबल इरादा था। इसके लिए उसने पुणे के डी.वाई.पाटील कॉलेज ऑफ कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेकर परीक्षा में टॉप किया था। तीन फरवरी 2022 को अपने मित्रों के साथ वह रात को कार से घर लौट रही थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मित्रों को मामूली चोटें आई, लेकिन श्रेया अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो गई। नागपुर के एक नामी डॉक्टर के अस्पताल में भर्ती कराने पर पता चला उसका ब्रेन पूरी तरह से मृत हो चुका है। माता-पिता ने और भी कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सभी ने जांच में पाया कि कोई चमत्कार ही उसे फिर से होश में ला सकता है। चार वर्ष बीतने के पश्चात भी माता-पिता ने चमत्कार की उम्मीद में खुद को बेटी के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया है। लाखों रुपये खर्च कर चुके आशावादी परिवार का कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी दुलारी बिटिया की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसके लिए भले ही उन्हें अपनी बची-खुची सारी पूंजी और जमीन-जायदाद भी क्यों न बेचनी पड़े। बिटियां की चौबीस घंटे की देखरेख के लिए दो कुशल नर्स तो हैं ही, उन्होंने भी अपने सुख-चैन और रातों की नींद से नाता तोड़ लिया है। कोमा की भेंट चढ़ चुकी श्रेया की बड़ी बहन डॉक्टर है। वह भी जीवन से संघर्ष करती आशा और निराशा के बीच झुलती अपनी इकलौती बहन को फिर से एकदम स्वस्थ और फिर से भागते-दौड़ते देखने के लिए अपना सारा काम धाम छोड़कर उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है। परिवार के कुछ शुभचिंतक श्रेया की इच्छा मृत्यु की मांग करने का सुझाव भी देते रहते हैं, लेकिन माता-पिता और बहन के यकीन की डोर बहुत मजबूत है।

इस धरा से अपने ही खून की ऐसी अंतिम विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। करोड़ों संवेदनशील भारतीयों की आंखों को नम कर देने वाला वीडियो आपने भी देखा होगा, जिसमें बहन अपने भाई से कह रही है, ‘‘सबको माफ करते हुए अब जाओ, ठीक है।’’ यह जिन्दगी इंसान को कैसे-कैसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। इसकी हकीकत अशोक राणा और निर्मला देवी से बेहतर और कौन बता सकता है। काल्पनिक किस्से कहानियां लिखना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है दर्दनाक वास्तविकता से रूबरू होना वो भी सतत तेरह वर्षों तक। फुटबाल और जिम का शौकीन हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। एक शाम रक्षाबंधन के दिन वह अचानक चौथी मंजिल से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क और कमर में अत्यंत गहरी चोटें लगीं। इस हादसे के बाद वह जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया। कई डॉक्टरों और अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज करवाने के बावजूद उसकी हालत में तो कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन राणा परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि उन्हें दिल्ली में स्थित अपना तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने बेटे के ठीक होने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। सांस लेने, फीड कराने के साथ मल त्याग के लिए नली लगी रही। अपने कोमाग्रस्त पुत्र को पल-पल अथाह पीड़ा से लड़ते देख माता-पिता अब उसे जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगे। हरीश की 60 वर्षीय मां निर्मला देवी के इन शब्दों ने पत्रकारों की भी आंखें नम कर दीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि हमें ऐसा दिन देखना पड़ेगा, जब बेटे की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि उसकी मुक्ति के लिए दुआ करनी पड़ेगी।’’ हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि जैसा दर्द हमें मिला है, वैसा किसी दूसरे माता-पिता को न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके दर्द को समझा और इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए 13 वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े 32 वर्षीय युवक हरीश के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद माता-पिता ने अपने हरीश के अंगदान के जरिये दूसरों को जीवन देने की जो साहसी और परोपकारी इच्छा जतायी है उसके लिए भी उनका बारम्बार वंदन और अभिनंदन।

Thursday, March 5, 2026

बेटा घर नहीं लौटा

जब कोई अपराधी समाज के लिए आतंक का पर्याय और पुलिस के लिए सिरदर्द बन जाता है तो समाज उससे नफरत और पुलिस उसका एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती। यह भी सच है कि हर डाकू, चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी का भी अपना परिवार होता है। ऐसे यार दोस्त भी होते हैं, जो हर हाल में उसके शुभचिंतक होते हैं। मां-बाप, पत्नी और भाई-बहन के मन में उसके प्रति कहीं न कहीं सद्भावना और स्नेह की ऐसी नदी बहती रहती है, जो आसानी से नहीं सूखती। वे उसे निर्दोष मानने का जो भ्रम पाले रहते हैं वो अंत तक कायम रहता है। जगजाहिर घोषित अपराधी को सज़ा मिलने पर ऐसे करीबी अपनों का चेहरा उतर जाता है और वे कानून व्यवस्था को भी कोसते देखे जाते हैं। हमारे समाज में यदि अपवाद न हों तो सबकुछ एकतरफा लग सकता है। ऐसे ही अपवाद हैं हाजीपुर के एक पिता, जिन्होंने अपने खूंखार अपराधी बेटे के पुलिसिया एनकाउंटर पर न केवल भरपूर खुशी दर्शायी, बल्कि पुलिस को धन्यवाद के साथ शाबाशी भी दी। दो लाख के इनामी कुख्यात अपराधी प्रिंस ने गलत संगत में बचपन से अपराध की राह चुन ली थी। प्रिंस ने वर्ष 2011 में अपने ही दादा को चाकू मारकर घायल कर दिया था। कालांतर में भी उसने कई झगड़े-फसाद किये और जेल जाना-आना लगा रहा। जेल में रहने के दौरान उसका कुछ खूंखार अपराधियों से करीबी जुड़ाव हुआ तो बाहर आने के बाद वह बेखौफ होकर लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को अंजाम देने लगा। यहां तक कि 2018 में हाजीपुर जेल में बंद रहने के दौरान कुख्यात अपराधी मनीष की हत्या में भी उसका नाम गूंजा था। प्रिंस को उसके माता-पिता ने सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वह अंत तक नहीं सुधरा। उलटे उसने देश के कई राज्यों में लूट और हत्या का ऐसा नेटवर्क बनाया कि पुलिस के लिए भी अपार सिरदर्द बन गया। लोगों के तानों से परेशान घरवालों ने ईश्वर से प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी कि इस शैतान का किसी भी तरह से अब अंत ही हो जाए। उन्होंने पुलिस से भी प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी, इस बेलगाम शैतान को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा कर सुधारो या फिर मार गिराओ। बीते माह जब गोलियों की बौछार से पुलिस ने उसका हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा कर दिया तब पिता के यही शब्द थे, ‘पुलिस ने जो किया वो एकदम सही है। जितने भी ऐसे दरिंदे हैं उन्हें भरे चौराहे पर गोली से उड़ा देना चाहिए।’ अन्य परिजनों ने भी पुलिस की सराहना करते हुए बार-बार नतमस्तक होकर धन्यवाद की झड़ी लगा दी। 

नक्सलियों ने राष्ट्र को कितनी हानि पहुंचायी है, कितने घर उजाड़े हैं, कितने-कितने मां-बाप के सपनों को रौंदा है इसका हिसाब लगाना असंभव है। जिन आदिवासी इलाकों में सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार और संपूर्ण विकास की धारा बहाने के लिए प्रयत्नशील रही, वहीं शीर्ष नक्सली अनेकों वर्षों तक अड़ंगा बने रहे। अनपढ़ आदिवासियों को पिछड़ेपन और असमानता के जाल से बाहर ही नहीं निकलने दिया। नक्सली नेताओं ने असंख्य युवक-युवतियों को बरगला कर नक्सली बनाया और खुद के बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए भेजा। महानगरों में कोठियां खड़ी कीं, कारों की कतार लगाकर दुनियाभर के सुख भोगे। इसकी जो हकीकत है उस पर कई उपन्याय लिखे जा सकते हैं। बीते समय की सरकारें तो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरी तरह से नक्सलियों का खात्मा नहीं कर पाईं, लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पूरे मन से प्रतिज्ञाबद्ध ही नहीं काफी हद तक सफल होती दिखायी दे रही है। वर्षों पुराना आतंकी आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा है। अधिकांश नक्सली कमांडरों के हौसले पस्त किये जा चुके हैं। यही वजह है कि अनेकों इनामी नक्सली अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर चुके हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें भी हथियार डालने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ माह पूर्व भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणु गोपाल ने अपने 60 साथियों सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव के चलते दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवुजी ने भी हथियार डाल दिए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय बने देवुजी ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री धर्मराव आत्राम का अपहरण कर उन्हें 17 दिन तक बंधक बनाकर रखा था। इस हैवान ने कितने नेताओं तथा जवानों की जान ली, उसका संपूर्ण लेखा-जोखा किसी भी सजग भारतीय का खून खौला सकता है। ऐसे दरिंदो की मौत तो कोई भी चाहेगा। देवुजी पर 1.25 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। जब उसे लगा कि अब तो कभी भी उसे टपकाया जा सकता है, तो उसने  आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। वैसे भी जान तो सबको प्यारी होती है। फिर भी सरकार उन्हें आत्मसमर्पण का मौका दे रही है। इसके लिए उन्हें तथा उनके परिजनों को सरकार का अहसानमंद होना ही चाहिए। एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जंगलों से तो नक्सलियों का शीघ्र सफाया हो ही जाएगा, लेकिन अर्बन नक्सलियों को कब और कैसे दबोच कर जेलों में डाला जाएगा जो वर्षों से सफेदपोश होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी का नकाब ओढ़े हैं। यही चेहरे तथाकथित क्रांतिकारी, कवि, संपादक, प्रोफेसर, कथाकार और समाजसेवक आदि के चोले में नक्सलियों को पालते-पोसते आ रहे हैं तथा कई भयावह खूनी हमलों के मास्टरमाइंड भी हैं। 

माड़वी हिडमा। हां यही नाम था उसका, जिसने सोलह वर्ष की उम्र में जंगलों में हथियार थाम कर भटकने की ठान ली थी और कई वर्ष तक खून-खराबा करता रहा। हिडमा के दिल-दिमाग में शहरी नक्सलियों ने यह भर दिया गया था कि नक्सली गरीबी, शोषण और असमानता के खात्मे के लिए कटिबद्ध हैं। वे तब तक सरकारों के खिलाफ हथियार उठाये रहेंगे, जब तक चारों तरफ समानता और खुशहाली नहीं आ जाती। उसे नक्सली कमांडरों के वास्तविक चरित्र का पता ही नहीं था। दरअसल, सच को उससे छिपाया गया था। हिडमा को हथियार चलाने का प्रशिक्षण सुजाता नामक नक्सली महिला से मिला था, जिसे बस्तर की लेडी वीरप्पन कहा जाता था। सुजाता बस्तर डिविजन कमेटी की प्रभारी थी और सुकमा समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े नक्सली हमलों में अहम भूमिका निभा चुकी थी। 2024 में सुजाता को सुरक्षा बलों ने तेलंगाना से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। उसके शागिर्द हिडमा को कई बड़े नक्सली हमलों का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। उस पर भी सरकार ने 1 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। हिडमा को सीपीआई (माओवादी) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर कहा जाता था, जिसे नक्सलियों की सबसे प्रशिक्षित और घातक इकाई माना जाता है। वह दंडकारण्य के घने जंगलों में सक्रिय रहता था और अबूझमाड़ के कठिन भू-भाग व सुकमा-बीजापुर बेल्ट की अंदर तक गहन जानकारी थी। इसी कारण कई खूनी वारदातों में लिप्त रहने के बावजूद सुरक्षा बलों की पकड़ से दूर था। उसे यकीन था कि सुरक्षा बल उस तक नहीं पहुंच सकेंगे। बीते वर्ष छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हिडमा की मां से मुलाकात कर उसे समझाने और सही राह पर लाने को कहा था। मां भी तहेदिल से चाहती थी कि उसका बेटा आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए और शांति से जिए। आखिर कब तक कानून से मुंह छिपाता जंगलों में भटकता रहेगा। ममतामयी मां कई वर्षों से अपने बेटे और बहू को देखने के लिए तरस रही थी। वह दिन-रात ईश्वर से दोनों की सलामती की प्रार्थना करती नहीं थकती थी। उसे पक्का भरोसा था कि बेटा उसका कहना जरूर मानेगा। अपने बेटे की सलामती चाहती थी। उसने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें अत्यंत भावुक होकर कहा था, ‘‘कहां हो बेटा? घर लौट आओ, सरेंडर कर दो।’’ लेकिन बेटे ने मां की ममता का मान नहीं रखा। अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। कुछ ही दिनों के पश्चात अखबारों में यह खबर छपी, ‘‘छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश बार्डर पर सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली हिडमा और उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया।’’

Thursday, February 26, 2026

हे भगवान...!

पहले अपने बच्चों को लेकर मां-बाप इतने चिंतित और परेशान नहीं होते थे, जितने इक्कीसवीं सदी के इस दौर में हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने कामधंधे, नौकरी आदि पर अपना दिमाग केंद्रित रखें या अपनी संतानों पर। मोबाइल ने भी उनकी समस्या में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। अमीर-गरीब सभी के लड़के-लड़कियां ऐसे ‘मोबाइल रोगी’ हो गए हैं कि उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुध-बुध नहीं रहती। अभिभावकों का उन्हें रोकना-टोकना और समझाना शूल की तरह चुभता है। ऐसे में अभिभावकों का दिमाग ही काम नहीं करता। मोबाइल, ऑनलाइन गेम, सट्टा, जुआ और गलत संगत की वजह से बच्चों की बर्बादी और आत्महत्याओं की खबरें उनका पीछा  करते हुए उन्हें भयभीत करती रहती हैं।

गाजियाबाद की भरी-पूरी ‘भारत सिटी सोसायटी’ में हाल ही में तीन बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद तो लगभग हर सजग भारतीय मोबाइल फोन और जानलेवा ऑनलाइन गेमिंग की लत के बारे में सोचता और बोलता दिखा। अभी तक तो अधिकतर लड़कों के ही मोबाइल के गुलाम होने की खबरें सुर्खियां पा रही थीं अब एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों ने इस पीड़ादायी श्रृंखला में अपना नाम जोड़ लिया। बहनों की इस सामूहिक खुदकुशी के दिल दहलाने वाले सच ने डिजिटल युग का भयावह चेहरा तो दिखाया ही है तथा और भी कई सवाल और चिताएं खड़ी कर दी हैं। पुलिसिया जांच पड़ताल में यह पता चला कि तीनों बहनें एक तथाकथित ‘कोरियाई लवर गेम’ की जबरदस्त कैदी बन कर रह गईं थीं। मां-बाप, रिश्तेदारों तथा स्कूली पढ़ाई से नाता तोड़ते हुए केवल और केवल उस मोबाइल से ही रिश्ता जोड़ चुकी थीं, जिसे मां-बाप ने  उन्हें पढ़ाई के लिए उपलब्ध कराया था। लेकिन ये तीनों बहनें ऐसे विदेशी, कोरियन ऑनलाइन गेम के मोहजाल में जा फंसी जो शुरू-शुरू में आनंदित करता है, फिर धीरे-धीरे वही सुख आदत और गंभीर लत में बदल जाता है। गौरतलब है कि ऐसे अधिकांश ऑनलाइन गेम्स काफी हद तक इसी तरह से बनायेे जाते हैं कि खिलाड़ी लगातार इससे जुड़े रहें। खाना-पीना तक भूल जाएं। कंपनियों के द्वारा उन्हें टास्क पूरा करने के लिए विवश कर दिया जाता है। दरअसल बच्चों को अपने जाल में फंसाने का उनका अपना तौर-तरीका है। 

खिलाड़ियों को यदि कोई टोकता और रोकता है तो वे आगबबूला हो जाते हैं। क्रोध, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन उन्हें आक्रामक बनाता चला जाता है। मोबाइल से अलग होना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है। ‘कोरियाई लवर गेम’ की अत्याधिक लती तीनों बहनों से जब परिवार ने मोबाइल छीना तो वे मानसिक रूप से टूट और बिखर गई। डिजिटल दुनिया को वास्तविक जीवन से कहीं बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण मान चुकी बहनों ने बहुत पहले से ही अपने कोरियन नाम रख लिए थे। निशिका ने अपना कोरियन नाम मारिया, प्राची ने आजीया और पाखी ने अपना कोरियन नाम पिंडी रख लिया था। तीनों आपस में बहुत करीब थीं। उनके कमरे में मिले आठ पृष्ठों के सुसाइड नोट में भी लिखा मिला, ‘‘सॉरी पापा हम कोरिया नहीं छोड़ सकते।’’ तीनों सबकुछ एक साथ करती थीं। मसलन, सुबह उठना, ब्रश करना, नहाना, खाना-पीना, सोना, उठना, बैठना और सबकुछ भूलकर घंटों मोबाइल गेमिंग में लगे रहना। यथार्थ से पूरी तरह से कटी, सिर्फ और सिर्फ सपनों के आकाश में उड़ती बारह, चौदह और सोलह साल की तीनों बहनों ने नौंवी मंजिल से एक साथ कूदकर ही खुदकुशी की।

मोबाइल आज के समय में जरूरत बन गया है। इस अत्यंत उपयोगी साधन का दुरुपयोग करने वाले बिगड़े नवाबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। क्रिकेट सट्टा, चांदी, सोने का सट्टा और भिन्न-भिन्न प्रकार का जुआ मोबाइल और लेपटॉप से खेलने की कलाकारी और बर्बादी की खबरें हर दिन सुनने और पढ़ने में आ रही हैं। अभी हाल ही में शहर के एक रेडिमेड कपड़े की फैक्ट्री के नामी-गिरामी मालिक का बेटा क्रिकेट और चांदी के सट्टे में पंद्रह करोड़ रुपये हार गया। शुरू-शुरू में पांच-सात लाख की कमायी उसके हाथ लगी थी। तब उसे लगा था कि इससे चोखा धंधा और कोई नहीं हो सकता, लेकिन कालांतर में दांव जब उलटे पड़ने लगे तो उसने अपने पिता और मां के बैंक खाते को कब खाली कर दिया और बहन की शादी के लिए घर की अलमारी में सुरक्षित रखे करोड़ों के सोने-हीरे के आभूषण गायब कर दिए किसी को पता नहीं चला। पिता अपने कारोबार में व्यस्त थे और मां को किटी पार्टियों से फुर्सत नहीं थी। वैसे भी उनका अपने बिगड़ैल बेटे पर कोई अंकुश नहीं था। उन्हें उसकी रात-रात भर बाहर रहकर लड़कीबाजी और दारू चढ़ाने की खर्चीली आदत की खबर थी। उन्हें यह भी पता था कि उनका दुलारा जुए का भी शौकीन है। मौज-मस्ती में पच्चीस-पचास हजार रुपये इधर-उधर करता रहता है। लेकिन उस दिन तो उनके पैरोंतले की जमीन ही खिसक गई जब कर्ज में दी गई रकम की वसूली के लिए एकाएक चार-पांच बॉडी बिल्डर अस्त्र-शस्त्र के साथ उनके घर आ धमके। उनके लाडले ने सट्टे में मालामाल होने के लिए जिस गुंडे किस्म के साहूकार से पांच करोड़ का कर्ज लिया था, उसी ने इन्हें वसूली के लिए भेजा था। व्यापारी पिता के लिए कर्ज वसूली के लिए गुंडों का घर आ धमकना किसी सदमें से कम नहीं था। मां तो ऐसी बेहोश हुई कि उसे अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। व्यापारी ने बड़े सधे तौर-तरीके और धैर्य के साथ उनकी सुनी तो पता चला कि मूल रकम तो चार करोड़ थी, लेकिन पांच महीने के मोटे ब्याज की वजह से पांच करोड़ तक जा पहुंची थी। दबंग साहूकार ने काफी सब्र करने के बाद उन्हें वसूली के लिए भेजा था। उसे कारोबारी की हैसियत की भी पूर्ण जानकारी थी। जब उसे कई बार तकादे के बाद भी पैसे नहीं मिले तो मजबूरन दल-बल को भेजना पड़ा। नालायक बेटे के व्यापारी पिता ने अपनी साख पर आंच नहीं आने दी और कुछ ही घंटों में सारा कर्ज चूका दिया और ज्यादा डांटने-फटकारने की बजाय अपने इकलौते बेटे को यह सोचकर सिंगापुर अपनी बेटी के पास भेज दिया कि यदि और भी कोई लेनदार हो तो वह उसकी पकड़ और निगाह से बचा रहे।

धन्ना सेठों पर ऐसे संकट उतनी बिजली नहीं गिराते जितना कि आम मध्यमवर्गीय भारतीयों पर कहर ढाते हुए उनका सबकुछ तहस-नहस करके रख देते हैं। कॉलेज में मेरे सहपाठी रहे अंशुमन शर्मा वर्षों तक स्टेट बैंक की नौकरी करने के पश्चात जब रिटायर हुए तो बहुत प्रफुल्लित थे। कुछ खास दोस्तों के लिए मित्र अंशुमन ने जबलपुर के तीन सितारा होटल में पार्टी भी आयोजित की थी। उसने बड़े शौक से दो मंजिला सर्व सुविधायुक्त घर भी बनवाया था, जिसके गृह प्रवेश का आयोजन भी तभी किया गया था। अंशुमन पूजा-पाठ और धर्म-कर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी था। उसने जब चांदी के कप में चाय पिलाई थी तब मित्रों ने सहज तंज कसा था, ‘‘लगता है पंडित जी ने बैंक की मैनेजरी के दौरान अच्छा-खासा माल बटोरा है।’’ तब भाभी जी ने बताया था कि यह तो उनकी शादी के अवसर पर किसी करीबी रिश्तेदार ने उपहार में दिये थे। अंशुमन के इकलौते बेटे ने बीए की आधी-अधूरी पढ़ाई की थी। उसकी बेरोजगारी से ज्यादा उसकी मोबाइल से चिपके रहने की लत को लेकर अंशुमन बेहद चिंतित और परेशान था। दोस्तों ने उसे आश्वस्त किया था कि ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। आजकल लगभग सभी बच्चे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। यदि नौकरी नहीं मिलती तो फिलहाल छोटी-मोटी दुकान शुरू करवा दो। हम सभी दोस्त अपने-अपने ठिकाने चल दिये थे। लगभग छह महीने के बाद खबर मिली थी कि अंशुमन के बेटे पराग ने क्रिकेट सट्टे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये हारने के बाद आत्महत्या कर ली है। पराग ही अपने पिता के बैंक खाते को देखता-संभालता था। उसने कब जन्मदाता के जीवनभर की जमापूंजी सट्टे में लुटा दी इसका पता पिता को तब चला जब कुछ लेनदारों ने पराग को घर में आकर मारा-पीटा और धमकाया। पराग ने पिता के बैंक खाते को खाली करने के साथ ही कुछ लोगों से मनमाने ब्याज पर लोन भी ले रखा था। अपने बेटे के शव को देखते ही अंशुमन यह कहते हुए बेहोश होकर गिर पड़ा था, हे भगवान, तूने ये क्या कर दिया। मां का तो कलेजा बाहर आ गया था। उसके बाद अंशुमन को होश ही नहीं आया। दो महीने के पश्चात मैं भाभी जी से मिलने के लिए जबलपुर उनके नये निवास स्थान पर गया था। कर्जा चुकाने के लिए उन्हें अपना आशियाना बेचने को विवश होना पड़ा था। भाभी एक कमरे के उजाड़ से घर में अकेली गुमसुम बैठी थीं। उन्हें तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। एल्युमिनियम के टूटे-फूटे गिलास से धीरे-धीरे पानी के घूंट लेते-लेते मुझे कब सुबकियां आने लगीं मैं ही नहीं जान पाया...।