Thursday, October 22, 2026

ऐसे भी हैं जुनूनी

 दिशा की उम्र महज तेरह साल है। वह सातवीं कक्षा में पढ़ती है। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि वह पांच हजार लोगों को सिगरेट पीने की लत से मुक्ति दिलवा चुकी है। जिस उम्र में बच्चे पढ़ाई और खेल कूूद में मस्त रहते हैं, उस उम्र में दिशा का ‘मिशन नो स्मोकिंग’ के प्रति जबर्दस्त जिद्दी रूझान वाकई स्तब्ध करके रख देता है। दिशा जब मात्र छह साल की थी तब उसके दादा की मौत हो गई थी। दिशा को अपने प्यारे दादा से बहुत लगाव था। वे भी उस पर सारा अपनत्व और प्यार उड़ेल दिया करते थे। दादा का एकाएक दुनिया को छोड़कर चले जाना दिशा के लिए किसी दु:खदायी स्वप्न और पहेली से कम नहीं था। उसकी मां ने दिशा को जब बताया कि उसके दादा सिगरेट बहुत पीते थे इसलिए उन्हें कैंसर हो गया था। कैंसर ने ही उनकी अंतत: जान ले ली। छोटी-सी बच्ची दिशा को उसी दिन से सिगरेट से नफरत हो गई। वह जिस किसी को भी सिगरेट फूंकते देखती तो उसे उसकी मौत की कल्पना जकड़ लेती। उसने तभी ठान लिया कि वह लोगों की सिगरेट की लत को छुड़ाएगी और उन्हें मौत के मुंह से जाने से बचाएगी। जो लोग उसके अनुरोध को अनदेखा करते, दिशा उनके मुंह से सिगरेट छीनकर फेंक देती। लोग गुस्से से तिलमिला उठते और दिशा के गाल पर तमाचे भी जड़ देते। जिद की पक्की दिशा तमाचे खाकर भी मुस्कराती रहती और धीरे से कहती कि अंकल यह सिगरेट बहुत बुरी चीज है। इसको पीने से मेरे दादाजी चल बसे, कृपया आप इसे फेंक देें वर्ना आपका भी मेरे दादा जैसा हाल होगा। ऐसे में मासूम दिशा के अनुरोध का अधिकांश लोगों पर असर होना स्वाभाविक था। कुछ लोग जल्दी मानते तो कुछ लोग देरी से। छोटी सी बच्ची के मुख से धूम्रपान से होने वाले जानलेवा नुकसान के बारे में सुनना लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी था। 

दिशा ने बताया कि मैंने एक डायरी बनाई है। उसमें स्मोकिंग करने वाले लोगों से वादा कराती हूं कि वो आज से सिगरेट नहीं पियेंगे। उन्हें अपने वादे की याद रहे इसलिए उनके हस्ताक्षर भी करवाती हूं। उनके मोबाइल नंबर नोट करती हूं और फिर उन्हें मैसेज और फोन करके फॉलोअप लेती हूं। अभी तक मेरी तीन डायरी भर चुकी हैं और पांच हजार से ज्यादा लोग सिगरेट से तौबा कर चुके हैं। अपने इस मिशन के प्रति पूर्णतया समर्पित दिशा पढ़ाई-लिखाई से भी समझौता नहीं करती। वह कक्षा में हमेशा अव्वल आती है। जिस दिन स्कूल की छुट्टी रहती है उस दिन वह पान-सिगरेट की दुकानों पर अपने दोस्तों के साथ पहुंच जाती है और लोगों को धूम्रपान छोड़ने के लिए प्रेरित करती है। कई लोगों की जिन्दगी में बदलाव लाने वाली दिशा जब भीड़ को धूम्रपान से होने वाली बीमारियों और तकलीफों के बारे में अवगत कराने के लिए बोलती है तो लोग मंत्रमुग्ध सुनते रह जाते हैं। 

सभी जानते हैं कि अपने वतन में नशे के सामानों की खपत बढ़ती चली जा रही है। युवा पीढ़ी को विभिन्न नशों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सरकार एक तरफ शराब, सिगरेट आदि की बिक्री की छूट देती है तो दूसरी तरफ इनसे होने वाली जानलेवा बीमारियों से अवगत कराने के लिए करोड़ों-अरबों रुपये विज्ञापनबाजी में भी खर्च करती है। सरकार के ऐसे सतही प्रयासों का लोगों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता। ड्रग्स के प्रति युवाओं के बढ़ते रूझान और शराब की दुकानों पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारें बता देती हैं कि लोग किस राह पर जा रहे हैं। राजधानी दिल्ली में रहने वाले प्रदीप सिंह गलियों में घूमते हुए युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए गीत गाते दिखायी देते हैं। नशे के खिलाफ  आवाज उठाने और चेतना के गीतों के स्वर बिखेरने वाले प्रदीप चाहते हैं कि उनका संदेश ड्रग्स के शिकार हर युवा तक कुछ इस तरह से पहुंचे कि वह नशे से तौबा कर ले। यह पूछने पर कि उनके मन में गीतों के जरिए युवाओं में जागृति लाने का विचार कैसे आया तो उन्होंने बताया कि मेरे आस-पड़ोस में निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चें हैं और यहां लोगों ने नशे के लिए अपने घर भी बेच दिए हैं। इनकी जिन्दगी नशे के कारण पूरी तरह से तबाह हो गई है। मुझसे ऐसे भयावह मंजर देखे नहीं जाते। मेरी गीत लिखने की तो बचपन से रूचि थी। ऐसे में मन में विचार आया कि अपने गीतों के जरिए नशेड़ियों को नशा छोड़ने का आग्रह कर मानवता के धर्म को निभाऊं और अपने होने को सार्थकता प्रदान करूं। प्रदीप का यह प्रयास व्यर्थ नहीं गया। उनके गीत और संगीत को सुनकर कई युवाओं ने ड्रग्स को हाथ नहीं लगाने की कसम खा ली है। वे अपने गीतों के जरिए और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात कर लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं। 

हिन्दुस्तानी बेटियां अगर चाहें तो कुछ भी कर सकती हैं। इसे एक बार फिर सच साबित कर दिखाया है महाराष्ट्र के अकोला जिले की नासरी ने। जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी बहुल गांव भिलाला में आधी आबादी छोटे किसानों की है और आधी मजदूरों की। नासरी को बचपन से ही खेती में पिता का हाथ बंटाते-बंटाते यह हकीकत समझ में आ गई कि खेती का काम पूरी तरह से घाटे का सौदा है। जितनी लागत लगायी जाती है, उतनी भी नहीं निकल पाती। यदि थोड़ा मुनाफा होता भी है तो वह बैंकों और साहूकारों  के कर्ज को चुकाने में खर्च हो जाता है। किसान के हाथ में कुछ भी नहीं आता। आदिवासी बालिका नासरी को एक ऐसी संस्था के बारे में पता चला जो जैविक खेती ऑर्गेनिक फार्मिंग को प्रोत्साहित करने में लगी थी। इस विधि से खेती करने पर खेती की लागत रासायनिक विधि की तुलना में एक चौथाई हो जाती है। नासरी ने तुरंत जैविक खेती का निर्णय ले लिया। प्रारंभमें उसके पिता ने आना-कानी की, लेकिन नासरी ने उन्हें मना कर ही दम लिया और खुद ही कंपोस्ट खाद आदि तैयार कर विशेषज्ञों द्वारा बतायी गई विधि से खेती प्रारंभकी। 

पहली बार में ही जैविक खेती से वाकई लागत एक चौथाई रह गई और पैदावार भी उतनी हुई जितनी पहले होती थी। अपने खेत में सफल प्रयोग करने के बाद नासरी ने गांव वालों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करने का अभियान चलाया। शुरू-शुरू में तो अविश्वास जताते हुए उसका मज़ाक भी उड़ाया गया। इस तरह का बर्ताव भारतीय परंपरा का अंग है। नासरी किसानों को मरता नहीं देख सकती थी इसलिए उसने गांव वालों को आश्वस्त किया कि वह उनका घाटा कदापि नहीं होने देगी। अगर हुआ भी तो वह खुद झेलेगी। उसने किसानों के लिए खाद आदि स्वयं तैयार कर उपलब्ध करायी। सफलता तो मिलनी ही थी। उसकी सूझबूझ ने गांव की सूरत ही बदल दी। उसके गांव की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी है। किसान खुश हैं। खेती से उन्हें फायदा होने लगा है। देश एवं विदेश के कृषि विशेषज्ञ नासरी के गांव में आते रहते हैं और एक परी की जुनूनी सफलता को देखकर यह मानने को विवश हो जाते हैं कि भारतीय बेटियां अगर ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। जैविक खेती से अपने गांव की तस्वीर बदलने वाली नासरी को महाराष्ट्र सरकार ने कृषि भ्ाूषण पुरस्कार से नवाजा है तो डॉ. पंजाब राव कृषि विद्यापीठ अकोला ने अपना ‘ब्रांड अंबेसेडर’ बनाया है। इसके साथ ही वह 30 से ज्यादा विभिन्न संस्थाओं के द्वारा पुरस्कृत की जा चुकी है।

भयंकर गर्मी के दिन थे। एक युवती अपने दोस्तों के साथ मॉल में खरीदी और मौज-मज़ा करने के लिए गई थी। जब वह मॉल के बाहर निकली तो उसने ऐसे कुछ गरीब बच्चों को देखा जिनके पैरों में चप्पल नहीं थी। पेट की भ्ाूख की तड़प उनके चेहरे से साफ-साफ झलक रही थी। उन्हें भीख मांगते देख उसके मन में कई तरह के विचार आने लगे। वह मॉल से घर लौट तो आई, लेकिन नंगे पैर, भीख मांगते बच्चों का चेहरा बार-बार उसके सामने आ जाता। उसके मन में विचारों की आंधी चलने लगी। उसने सोचा कि पांच-सात सौ रुपये तो वह यूं ही उड़ा देती है। इन बच्चों को पचास-सौ रुपये की चप्पल नसीब नहीं। नंगे पैर घूमने से बच्चों के पैरों में इन्फेक्शन और कई बीमारियां हो जाती हैं। इन रुपयों से दस-बारह बच्चों का खाना और पैरों में एक जोड़ी चप्पल तो जरूर आ सकती है। उसने सबसे पहले बच्चों के नंगे पैरों के लिए चप्पलें उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। वह अपने दोस्तों से मिली। बच्चों की तकलीफ के बारे में उन्हें अवगत कराया। आपस में मिलकर पैसे जुटाये गए। इन पैसों से बच्चों के लिए चप्पलें खरीदी गयीं। युवती ने रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गलियों में रहने वाले गरीब बच्चों को चप्पलें बांटनी शुरू कर दीं। उसका साथ देने वालों का कारवां बढ़ता चला गया। आज उसकी टीम में डाक्टर, इंजीनियर तथा समाजसेवक, उद्योगपति तक  शामिल हैं। जहां चप्पलें बांटनी होती हैं वहां पर उनकी टीम पहले जाकर सर्वेक्षण करती है फिर उन परिवारों को चप्पलें बांटी जाती हैं जिन्हें इनकी जरूरत होती है। हजारों बच्चों को चप्पलें उपलब्ध करवाने वाली इस सच्ची बालसेविका का अगला लक्ष्य गरीब बच्चों को भोजन और फिटनेस किट मुहैया कराना है। वे चाहती है कि दूसरे लोग भी अपने स्तर पर आसपास के गरीब बच्चों की मदद करें, ताकि कोई भी बच्चा खाली पेट  और नंगे पैर होने के कारण बीमार न पड़े। बच्चों के नंगे पैरों में चप्पलें पहनाने वाली इस आदर्श युवती का नाम है डॉ. समर हुसैन। क्या आप उसका अभिनंदन नहीं करना चाहेंगे?

Friday, October 16, 2026

अब तो... लिख सच

 यात्राएं तो बहुत कीं। यहां-वहां खूब घूमा। लेकिन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर की यात्रा ने वाकई आंखें खोल दीं। यहां के चप्पे-चप्पे ने बार-बार यह भी कहा कि तुम कहने को तो पत्रकार हो लेकिन आधे-अधूरे हो। नाममात्र के साहित्यकार हो। शब्दों से खिलवाड़ कर हवा में उड़ते रहे हो। पढ़ने-सुनने और प्रत्यक्ष देखने में जमीन-आसमान का अंतर है, जिसे जानने-समझने की तुमने कोई गंभीर कोशिश ही नहीं की। तुम सिर्फ दिखावा करते हो। अपनी मनचाही सुविधा के अनुसार आसान राह चुनते आये हो। सच देखने, सुनने और कहने का जो साहस होना चाहिए, वो अभी तक तुम में पूरी तरह से नहीं आ पाया है।

पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल स्थली जिसे ‘कालापानी’ भी कहा जाता है, वहां पर जब मैं पचासों स्त्री-पुरुषों के साथ गुलामी के दौर की हर घटना और प्रताड़नाओं के मूक साक्षी पीपल के पेड़ की जुबानी स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान की दास्तान सुन रहा था तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। यही हाल उन सभी का था, जो ऐतिहासिक जेल में हर शाम होने वाले आडियो-विजुअल शो को देखकर विस्मित और भावुक हो रहे थे। भारत के विख्यात दिवंगत अभिनेता ओमपुरी की जबरदस्त बुलंद आवाज में क्रांतिकारियों पर ढाये गये जुल्मों का वर्णन सुनती कॉलेज की छात्राएं सायरा और संगीता धीमे-धीमे बतिया रही थीं कि हमें तो इस काले इतिहास की जानकारी ही नहीं थी। आजादी को पाने के लिए कितने-कितने लोग शहीद हो गये। फांसी के फंदों पर हंसते-हंसते झूल गए। इतिहास की किताबों में तो उनका कहीं जिक्र ही नहीं। यदि है भी तो नाममात्र का। जहां देखो वहां मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू और उनकी मंडली ही ऐसे छायी है जैसे देश को आजादी दिलवाने में और किसी बलिदानी का योगदान ही नहीं था। 

क्रांतिवीरों पर अंग्रेजों के घोर अत्याचार की दिल दहलानेवाली हकीकत से रूबरू होती कई महिलाओं की ‘आंखें नम हो रही थी’। उनकी सिसकियां भी सुनाई दे रही थी। इन सिसकियों को भूल पाना मेरे लिए तो कतई आसान नहीं। बिल्कुल वैसे ही जैसे सेलुलर जेल की वो छोटी-छोटी अनेकों कोठरियां जहां गोरे अत्याचारियों ने आजादी के दिवानों को वर्षों तक कैद करके रखा था और बेइंतहा अमानवीय यातनाएं दी थीं। उन्हीं हजारों क्रांतिवीरों में शामिल थे वीर सावरकर यानी महान योद्धा विनायक दामोदर सावरकर। उन्हें 4 जुलाई 1911 को राक्षसी प्रताणनाएं देने के लिए 4 जुलाई 1911 को इसी सेलुलर जेल में लाकर तीसरी मंजिल पर स्थित एक छोटी तंग कोठरी में रखा गया था। आततायी-आतंकी ब्रिटिश सरकार द्वारा वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को दो आजीवन कारावास अर्थात कुल 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। करीब 15 गुणा 8 फीट की इस कोठरी में तीन मीटर की ऊंचाई पर एक छोटा सा रोशनदान था, जहां से जेल का फांसी का फंदा साफ-साफ दिखायी देता था। जुल्मी अंग्रेजों को तो यही भ्रम था कि वीर सावरकर अपने साथी क्रांतिवीरों को फांसी के फंदे पर झूलते देखकर विचलित हो जाएंगे। अंदर तक घबरा जाएंगे उनका मनोबल टूट जाएगा। वीर पुरुष को अन्य कैदियों से भी मिलने नहीं दिया जाता था। अत्याधिक परेशान करने के उद्देश्य से उनसे जेल में बैल की तरह कोल्हू से नारियल और तिल का तेल निकलवाया जाता था। प्रतिदिन कम अज़ कम 30 पाउंड तेल निकालना जरूरी होता था। इस निर्धारित कोटे में यदि कमी होती थी तो उन्हें बड़ी बेरहमी से कोड़ों से पीटा जाता था। यही आतंकी बर्ताव यहां लाये गए अन्य सैकड़ों क्रांतिकारियों के साथ होता था। वीर सावरकर चिंतनशील देशभक्त थे। उन्हें लिखने और पढ़ने का बहुत शौक था। जेल में जब कागज़ और कलम की उनकी मांग को पूर्णतया अस्वीकार कर दिया गया, तो उन्होंने जेल की दीवारों को ही कागज़ और अपनी डायरी बनाते हुए कांटों और कीलों से अनेकों ओजस्वी कविताएं और महाकाव्य लिख डाले। उन्हें खाने के लिए बेहद घटिया भोजन दिया जाता था, जिसमें कीड़े और कंकर मिले होते थे। पीने का पानी भी बेहद गंदा और खारा होता था। कई-कई दिनों तक उन्हें भारी लोहे की बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड़कर रखा जाता था। सेलुलर जेल में पांच-छह वर्ष तक दरिंदों की यातनाएं झेलने वाले ‘अंडमान टाइम्स’ के संपादक ने लिखा, ‘‘स्वतंत्रता सैनानियों से कोड़े मार-मारकर काम करवाया जाता था। पसीना-पसीना और लस्त-पस्त हो जाने के बाद भी खाने के लिए बार-बार तरसाया जाता था। ऐसे में जब उन्हें बहुत भूख सताती और पेट में आग लग जाती तो यदि उस दौरान आसपास कहीं मेंढक नजर आता तो उसे एक झपटे से पकड़कर जिन्दा ही चबा लेते थे। कई बार तो आरामशीन का भूसा खाकर अपनी भूख शांत करनी पड़ती थी। जेल का निर्माण इस तरह से किया गया कि कैदी एक दूसरे से मिल ही नहीं पाते थे। शौच तक के लिए कैदियों को स्वीकृति लेने के लिए घुटनों के बल चलकर जमादार के पास जाना पड़ता है। उसका मन होता है तो इजाजत देता है। नहीं तो बुरी तरह से डांट-फटकार लगा कर भगा देता। सेल में रखा गया बर्तन इतना छोटा होता था कि रात के समय कैदी एक बार भी पेशाब नहीं कर सकते थे। पहनने के लिए कपड़ों के नाम पर उन्हें टाट-बोरा नसीब था। 

 दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गांधी थे, जिन पर कहीं न कहीं अंग्रेज बहुत मेहरबान थे। उन्हें वक्त पर खाना मिल जाता था। गांधी को ‘आगा खान महल’ तो नेहरू को ‘अहमदनगर किले’ या अन्य विभिन्न जेलों में नज़रबंद करके रखा जाता था। जहां पर उन्हें लिखने-पढ़ने की सभी सुख-सुविधाएं मिलती थीं। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत की खोज) तथा अपनी आत्मकथा के कई हिस्सों को जेलों में रहकर बड़े आराम से लिखा था। जेल में रहते हुए ही नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अनेकों पत्र लिखे और बड़े आराम से खूब अध्ययन भी किया। स्वतंत्रता मिलने के बाद नेहरूजी को ही भारतवर्ष का पहला प्रधानमंत्री बनने का सुअवसर मिला, जबकि अनेकों स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को वो सम्मान ही नहीं मिला, जिसके वास्तव में वे अधिकारी थे। उस दौरान बढ़चढ़कर यही प्रचारित किया गया कि देश को आजादी तो केवल गांधी-नेहरू और उनकी प्रिय मंडली ने दिलवायी है। मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों की बदौलत ही बड़ी मुश्किल से देश स्वतंत्र हो पाया है। महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त जिन्हें अग्रेजों ने अंडमान की सेलुलर जेल में रखकर अमानवीय यातनाएं दीं, उनसे और उन जैसे सैकड़ों क्रांतिवीरों की अवहेलना तथा स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाणपत्र मांगा गया। बटुकेश्वर दत्त को तो आजाद भारतवर्ष में ही कई कष्ट झेलने पड़े। वे ताउम्र आर्थिक संकटों से जूझते रहे। बीमार होने पर अस्पताल में समुचित इलाज तक नहीं मिल पाया। 

भविष्य की पीढ़ियों को देश के इतिहास से परिचित करवाने के लिए देश में आपातकाल लगाने वाली जवाहरलाल नेहरू की बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को दिल्ली के लाल किले के पास जमीन के नीचे जो टाइम कैप्सूल (कालपत्र) दबाया था, उसमें भी बताते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार का ही एक तरफा महिमामंडन किया गया था। इंदिरा गांधी की तो यही मंशा थी कि यह कालपत्र 1000 साल तक सुरक्षित रहे लेकिन साल 1977 में जब देश में सत्ता बदली और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस छल-कपट के पिटारे को तुरंत बाहर निकलवाया। ज़रा सोचिए...जो सत्ताभोगी भगतसिंह को आतंकवादी मानते रहे हों और बाकायदा कोर्स की पुस्तकों में भी उन्हें आतंकवादी के तौर पर पेश किया गया हो उनके इरादे कैसे रहे होंगे। महज 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद भगतसिंह के जज़्बात काबिलेगौर हैं, ‘‘अगर मैं इश्क लिखना भी चाहूं तो इंकलाब लिख जाता हूं।’’ अमर शहीद भगत सिंह को याद करते-करते मुझे वो पल याद आ गये जब हम ‘कालापानी’ की सभी कोठियों को करीब से देखकर बाहर निकल रहे थे। स्त्री-पुरुषों, लड़के-लड़कियों की भीड़ में अपने मन की कहती चार-पांच महिलाओं की शिकायती पीड़ा ही कुछ ऐसी थी कि मैं भी उनकी बातचीत में सहभागी हो गया। उनके कथन दर कथन में प्रश्नों का अंबार था।...‘‘देश को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात जितने भी विश्व विद्यालय, चिकित्सालय, शोध संस्थान, कल्याणकारी योजनाएं, हवाई अड्डे, बाग-बगीचे आदि बने उनका नामकरण लगभग नेहरू, गांधी और उनके परिवार के नाम पर क्यों किया गया? यहां तक कि भारतीय मुद्रा पर भी झटपट, गांधी बाबा की तस्वीर छाप दी गई। सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, लाला लाजपतराय जैसे अनेकों सच्चे बलिदानी होने के बावजूद सत्ताधीशों को सिर्फ चंद नाम ही याद रहे! हर कहीं बस उन्हीं का एकाधिकार बना रहा। पता नहीं वो दिन कब आएंगे, जब दूसरे बलिदानियों को भी वैसा ही मान-सम्मान और नाम मिलेगा जैसा चंद घरानों को मिलता आया है। देश के विभिन्न प्रदेशों से पोर्टब्लेयर पहुंचीं इन विद्वान नारियों की दिली चाहत दिखी कि भारतीय नोटों पर भगतसिंह भी नज़र आएं, क्योंकि उनकी कुर्बानी बेमिसाल है।

पोर्टब्लेयर जिसेे खास तौर पर ‘कालापानी’ के नाम से जाना जाता है, अंडमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी है। यह भारत का एक केंद्र शासित प्रदेश है, जो बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्रकृति की गोद में सिमटा छोटे-बड़े अनेकों द्वीपों का समूह अंडमान निकोबार एक ऐसा नन्हा सा राज्य है, जो अपनी ही धुन में थिरकता है। एकदम व्यवस्थित साफ सुथरा। कहीं कोई ऐसा-वैसा शोर-शराबा नहीं। ऐतिहासिक सेलुलर जेल जहां यहां पहुंचने वालों को बलिदानी स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, वहीं पर्यटन स्थल के तौर पर भी यहां की हरीभरी धरा और एक से एक समुद्र तट मंत्रमुग्ध कर देेते हैं। एक बार जो यहां आता है, उसका बार-बार यहां आने को जी चाहता है। यहां के समुद्र का स्वच्छ जल, चारों तरफ फैली हरियाली, पक्षियों की चहक-महक के साथ-साथ समुद्र के पारदर्शी पानी में झूमती मटर गश्ती करती मनमोहक मछलियां हर किसी को मस्त करते हुए स्वर्ग के आनंद का जीवंत एहसास कराती हैं। यहां पर कहीं भी अनैतिकता और अश्लीलता के लिए कोई जगह नहीं। यहां के निवासी अत्यंत नेक दिल और बेहद सफाई पसंद हैं। गोवा की तरह यहां पर अय्याशों तथा अय्याशी का मेला नहीं लगता। समुद्र के किसी भी कोने में लड़के-लड़कियों की लिपटा-लिपटी दुर्लभ है। यहां शराब और बीयर की नदियां तो नहीं बहतीं लेकिन नीला समुद्र, ताड़, सुपारी और खुजूर के ऊंचे-ऊंचे पेड़ और सुहावना मौसम सभी को मदमस्त कर देता है। यहां के कच्चे नारियलों का पानी जहां प्यास बुझाता हैं, वहीं इनमें समाहित भरपूर मलाई भूख मिटाते हुए वाकई तृप्त कर देती है। समुद्र की विभिन्न प्रकार की ताजा मछलियां, झींगा और झींगी के साथ-साथ केरल और बंगाल के स्वादिष्ट भोजन आनंदित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तभी तो इसे मिनी इंडिया यानी छोटा हिंदुस्तान भी कहा जाता है। इस छोटे आकर्षक हिंदुस्तान में प्रशासनिक व्यवस्था दिल जीत लेती है। देश के अन्य प्रदेशों में जहां पानी की छोटी-छोटी प्लास्टिक की बोतलें धड़ल्ले से बेची और प्रयोग में लायी जाती हैं और इस्तेमाल कर शाही ठाठ के साथ यहां-वहां फेंक कर प्रदूषण बढ़ाया जाता है, वैसा चलन अंडमान निकोबार में बिल्कुल नहीं है। यहां तो सिर्फ बड़ी बोतलों में ही पानी उपलब्ध है। यहां के लोग भी इस मामले में अत्यंत जागृत हैं। जहां रहते है वहां साफ और स्वस्थ वातावरण रहे इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इसलिए यहां की हवा शुद्ध है, लोग भी खुश, संतुष्ट और प्रसन्न हैं। 

पोर्टब्लेयर की सुखद यात्रा के दौरान क्रूज का सफर पर्यटन को और...और रोमांचक और खूबसूरत बना देता है। एक द्वीप से दूसरे द्वीप जाने के लिए एक से एक क्रूज लग्जरी आलीशान होटल का जीवंत एहसास कराते हैं। ऊपर खुला आसमान और ठंडी हवाएं, समुद्र की लहरों के साथ अठखेलियां करती मछलियां .....जितनी बार भी देखो मन नहीं भरता। समंदर की बीचोंबीच लाइव डीजे, म्यूजिक डांस, शानदार बुफे डिनर विभिन्न ड्रिंक तथा बीयर की चुस्कियों के साथ डूबते हुए सूरज को देखना पर्यटकों को ऐसा बांधता है कि विदेश यात्राएं भी फीकी लगने लगती हैं.....

अब नहीं होगा बलात्कार?

 मैं नहीं जानता कि लड़कियों पर बार-बार बलात्कार होने की खबरें आप पर क्या असर डालती हैं। आप क्या सोचते हैं। हो सकता है कि आपने यह सोचकर ऐसी खबरों को पढ़ना और सुनना ही बंद कर दिया हो कि इनमें नया क्या है, यह तो रोजमर्रा की बात है। इसमें नया कुछ भी तो नहीं। सच कहूं मुझे तो हर बलात्कार की खबर सन्न कर देती है। ऐसा लगता है बलात्कारियों ने एकजुट होकर फिर से ललकारते हुए सत्ता और व्यवस्था के मुंह पर तमाचा जड़ दिया है कि जिससे जो बनता हो, कर लो। जितना चीखना-चिल्लाना, बोलना, लिखना हो, लिख लो। हम किसी से नहीं डरते। देश का कोई भी कानून हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकता। हमें जहां भी, जब भी मौका मिलेगा हम दूसरों की बहन, बहू, बेटियों की अस्मत लूटते रहेंगे। हम तो वो शैतान हैं जो मौका मिलने पर अपने घर की बहन-बेटियों को भी नहीं बख्शते। यही हमारी फितरत है। हमारी हैवानियत का खेल बस ऐसे ही चलता आया है और चलता रहेगा।

पिछले दिनों राजस्थान के अलवर में एक महिला पर किए गए सामूहिक बलात्कार जैसी वारदातें हमारे बेखौफ जिन्दा होने का सबूत हैं। यह हमारी मर्दानगी ही है, जो पति के सामने खुद तो सामूहिक दुष्कर्म करते ही हैं, पति को भी अपनी पत्नी से बलात्कार करने को विवश कर देते हैं। बड़ी दबंगता के साथ ऐसी हैवानियत का वीडियो बनाते हैं और उसे वायरल भी कर देते हैं, ताकि सारी दुनिया हमारी ताकत से वाकिफ हो जाए। 

इन दरिंदो के कई चेहरे हैं। इन शैतानों ने पूजा स्थलों, घरों, स्कूल, कॉलेजों तक को कलंकित करते हुए इंसानियत को तार-तार करने का सुरक्षित स्थल मान लिया है। स्कूल, कॉलेजों में बेटियां पढ़ने जाती हैं। उनके लिए ये शिक्षा के मंदिर हैं। उनके माता-पिता भी यही सोचते हैं। वे इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं कि शिक्षालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक, प्रोफेसर, प्राचार्य और कर्मचारी नेक नीयत के होते हैं। उनकी बेटियों की मान-मर्यादा के संरक्षक होते हैं। फरीदाबाद में स्थित राजकीय महिला कॉलेज में छात्राओं को परीक्षा में उत्तीर्ण करवाने का लालच देकर तीन बदमाशों की तिकड़ी अस्मत लूटने के गंदे खेल को अंजाम देने में लगी थी। एक भुक्तभोगी छात्रा ने प्राचार्य को चिट्ठी और वीडियो भेजकर कॉलेज में चलने वाले देह शोषण के पूरे खेल के बारे में अवगत कराया तो यह शर्मनाक सच सामने आया। अगर यह छात्रा हिम्मत नहीं दिखाती तो यह काला सच उजागर नहीं हो पाता। छात्राएं घुट-घुट कर शोषित होती रहतीं और वासना के खिलाड़ियों की मनमानी चलती रहती। कॉलेज के एक प्रोफेसर, लैब अटेंडंट और एक चपरासी शातिर गिरोह की तरह छात्राओं को अपने वासना के जाल में फांसते थे। उन्हें परीक्षा में पास करवाने के बदले देह सौंपने को विवश करते थे। उनसे कहा जाता था कि उनके पेपर अलग कमरे में बैठाकर हल करवा देंगे। यह दुराचारी एडमिशन के समय से ही छात्राओं पर अपनी पैनी निगाह रखते थे। मौका पाते ही नजदीकी बढ़ाते थे। मोबाइल नंबर हासिल कर उनसे मीठी-मीठी बातें की जाती थीं। नयी छात्राओं को अपने जाल में फंसाने के लिए उन्हें बताया जाता था कि परीक्षा में पास होने के लिए पहले भी कई छात्राएं उन्हें देह सुख देकर अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हो चुकी हैं। यह शातिर छात्राओं को अपने जाल में फंसाकर पहले पेपर कराने की एवज में रुपये की मांग करते, जिनसे धन मिल जाता है वे तन सौंपने से बच जातीं। जो धन की रिश्वत नहीं दे पातीं उनसे शारीरिक सुख की मांग की जाती। छात्रा ने जो कॉल रिकार्डिंग की है उसमें एक अय्याश आरोपी साफ-साफ यह कहता सुनायी देता है कि दो घंटे की ही तो बात है। हरियाणा टूरिजम के सरकारी होटल में मात्र एक हजार में कमरा किराये पर मिल जाता है। वहां पर मौजमस्ती करेंगे और किसी को कानों-कान खबर ही नहीं होगी। छात्रा ने दावा किया कि ये तीनों मिलकर कई छात्राओं की जिन्दगी बर्बाद कर चुके हैं। यह लोग इतने कमीने हैं कि जब कोई लड़की इनके साथ जाने में आनाकानी करती है तो उस पर किसी अन्य लड़की को भेजने का दबाव डाला जाता है। लड़की गोरी है, सांवली है या काली है, इसकी भी जानकारी ली जाती है। 

बलात्कार का शिकार होनेवाली लड़कियों पर क्या बीतती है, इसकी हकीकत जानने के लिए उस बेटी के दर्द से रूबरू होना जरूरी है, जिसे उसके पिता और चाचा ने एक आकर्षक सामान की तरह बेच दिया। पांच साल तक बीस से ज्यादा वहशियों ने उसे बड़ी निर्दयता के साथ अपनी हवस का शिकार बनाया। उसे मजबूरन एक बलात्कारी की मां भी बनना पड़ा। फिर भी उसे बलात्कारियों से मुक्ति नहीं मिली। उसने पुलिस थाने में जाकर भी कई बार अपना दर्द बयां किया, लेकिन उसकी नहीं सुनी गई। अंतत: तंग आकर उसने खुद को आग के हवाले कर दिया। अगर उसका वीडियो सामने नहीं आता तो उसके साथ हुई दरिंदगी की सच्चाई सामने नहीं आ पाती। उत्तरप्रदेश के हापुड़ की रहने वाली 75 से 80 प्रतिशत तक जल चुकी यह युवती फिलहाल दिल्ली के एक अस्पताल में अधमरी बिस्तर पर पड़ी है। अथाह दर्द के कारण बार-बार वह चीखती-चिल्लाती और कराहती है तो उसकी गूंज पूरे अस्पताल को हिलाकर रख देती है। उसके शरीर का अंग-अंग जल चुका है। पूरे शरीर पर पट्टियां बंधी हैं। बहुत कोशिश के बाद भी उससे ज्यादा बोलते नहीं बनता। जब कभी-कभार मुंह खोलती है तो बस यही कहती है कि जल जाने के बाद मैं इतनी कुरूप हो चुकी हूं कि अब कोई भी मेरे साथ बलात्कार करने की नहीं सोचेगा। अब मैं पूरी तरह से सुरक्षित हूं। क्या देश की सत्ता-व्यवस्था और हमारा समाज उसके इन शब्दों के मर्म तक पहुंचना चाहेगा? क्या उसे बलात्कार का दंश झेलने वाली महिलाओं का वास्तविक दर्द कभी समझ में आयेगा? या फिर मुआवजा के तौर पर कुछ रुपए और सहानुभ्ाूति के चंद बोल बोलकर यह मान लिया जाता रहेगा कि हमने तो अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। इससे ज्यादा और हम कर भी क्या सकते हैं? इनसे यह सवाल तो किया ही जाना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जब तुम लोगों की बहन-बेटियों की इज्जत लुटेगी तभी तुम्हें होश आयेगा?

अब तो... लिख सच

 यात्राएं तो बहुत कीं। यहां-वहां खूब घूमा। लेकिन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर की यात्रा ने वाकई आंखें खोल दीं। यहां के चप्पे-चप्पे ने बार-बार यह भी कहा कि तुम कहने को तो पत्रकार हो लेकिन आधे-अधूरे हो। नाममात्र के साहित्यकार हो। शब्दों से खिलवाड़ कर हवा में उड़ते रहे हो। पढ़ने-सुनने और प्रत्यक्ष देखने में जमीन-आसमान का अंतर है, जिसे जानने-समझने की तुमने कोई गंभीर कोशिश ही नहीं की। तुम सिर्फ दिखावा करते हो। अपनी मनचाही सुविधा के अनुसार आसान राह चुनते आये हो। सच देखने, सुनने और कहने का जो साहस होना चाहिए, वो अभी तक तुम में पूरी तरह से नहीं आ पाया है।

पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल स्थली जिसे ‘कालापानी’ भी कहा जाता है, वहां पर जब मैं पचासों स्त्री-पुरुषों के साथ गुलामी के दौर की हर घटना और प्रताड़नाओं के मूक साक्षी पीपल के पेड़ की जुबानी स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान की दास्तान सुन रहा था तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। यही हाल उन सभी का था, जो ऐतिहासिक जेल में हर शाम होने वाले आडियो-विजुअल शो को देखकर विस्मित और भावुक हो रहे थे। भारत के विख्यात दिवंगत अभिनेता ओमपुरी की जबरदस्त बुलंद आवाज में क्रांतिकारियों पर ढाये गये जुल्मों का वर्णन सुनती कॉलेज की छात्राएं सायरा और संगीता धीमे-धीमे बतिया रही थीं कि हमें तो इस काले इतिहास की जानकारी ही नहीं थी। आजादी को पाने के लिए कितने-कितने लोग शहीद हो गये। फांसी के फंदों पर हंसते-हंसते झूल गए। इतिहास की किताबों में तो उनका कहीं जिक्र ही नहीं। यदि है भी तो नाममात्र का। जहां देखो वहां मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू और उनकी मंडली ही ऐसे छायी है जैसे देश को आजादी दिलवाने में और किसी बलिदानी का योगदान ही नहीं था। 

क्रांतिवीरों पर अंग्रेजों के घोर अत्याचार की दिल दहलानेवाली हकीकत से रूबरू होती कई महिलाओं की ‘आंखें नम हो रही थी’। उनकी सिसकियां भी सुनाई दे रही थी। इन सिसकियों को भूल पाना मेरे लिए तो कतई आसान नहीं। बिल्कुल वैसे ही जैसे सेलुलर जेल की वो छोटी-छोटी अनेकों कोठरियां जहां गोरे अत्याचारियों ने आजादी के दिवानों को वर्षों तक कैद करके रखा था और बेइंतहा अमानवीय यातनाएं दी थीं। उन्हीं हजारों क्रांतिवीरों में शामिल थे वीर सावरकर यानी महान योद्धा विनायक दामोदर सावरकर। उन्हें 4 जुलाई 1911 को राक्षसी प्रताणनाएं देने के लिए 4 जुलाई 1911 को इसी सेलुलर जेल में लाकर तीसरी मंजिल पर स्थित एक छोटी तंग कोठरी में रखा गया था। आततायी-आतंकी ब्रिटिश सरकार द्वारा वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को दो आजीवन कारावास अर्थात कुल 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। करीब 15 गुणा 8 फीट की इस कोठरी में तीन मीटर की ऊंचाई पर एक छोटा सा रोशनदान था, जहां से जेल का फांसी का फंदा साफ-साफ दिखायी देता था। जुल्मी अंग्रेजों को तो यही भ्रम था कि वीर सावरकर अपने साथी क्रांतिवीरों को फांसी के फंदे पर झूलते देखकर विचलित हो जाएंगे। अंदर तक घबरा जाएंगे उनका मनोबल टूट जाएगा। वीर पुरुष को अन्य कैदियों से भी मिलने नहीं दिया जाता था। अत्याधिक परेशान करने के उद्देश्य से उनसे जेल में बैल की तरह कोल्हू से नारियल और तिल का तेल निकलवाया जाता था। प्रतिदिन कम अज़ कम 30 पाउंड तेल निकालना जरूरी होता था। इस निर्धारित कोटे में यदि कमी होती थी तो उन्हें बड़ी बेरहमी से कोड़ों से पीटा जाता था। यही आतंकी बर्ताव यहां लाये गए अन्य सैकड़ों क्रांतिकारियों के साथ होता था। वीर सावरकर चिंतनशील देशभक्त थे। उन्हें लिखने और पढ़ने का बहुत शौक था। जेल में जब कागज़ और कलम की उनकी मांग को पूर्णतया अस्वीकार कर दिया गया, तो उन्होंने जेल की दीवारों को ही कागज़ और अपनी डायरी बनाते हुए कांटों और कीलों से अनेकों ओजस्वी कविताएं और महाकाव्य लिख डाले। उन्हें खाने के लिए बेहद घटिया भोजन दिया जाता था, जिसमें कीड़े और कंकर मिले होते थे। पीने का पानी भी बेहद गंदा और खारा होता था। कई-कई दिनों तक उन्हें भारी लोहे की बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड़कर रखा जाता था। सेलुलर जेल में पांच-छह वर्ष तक दरिंदों की यातनाएं झेलने वाले ‘अंडमान टाइम्स’ के संपादक ने लिखा, ‘‘स्वतंत्रता सैनानियों से कोड़े मार-मारकर काम करवाया जाता था। पसीना-पसीना और लस्त-पस्त हो जाने के बाद भी खाने के लिए बार-बार तरसाया जाता था। ऐसे में जब उन्हें बहुत भूख सताती और पेट में आग लग जाती तो यदि उस दौरान आसपास कहीं मेंढक नजर आता तो उसे एक झपटे से पकड़कर जिन्दा ही चबा लेते थे। कई बार तो आरामशीन का भूसा खाकर अपनी भूख शांत करनी पड़ती थी। जेल का निर्माण इस तरह से किया गया कि कैदी एक दूसरे से मिल ही नहीं पाते थे। शौच तक के लिए कैदियों को स्वीकृति लेने के लिए घुटनों के बल चलकर जमादार के पास जाना पड़ता है। उसका मन होता है तो इजाजत देता है। नहीं तो बुरी तरह से डांट-फटकार लगा कर भगा देता। सेल में रखा गया बर्तन इतना छोटा होता था कि रात के समय कैदी एक बार भी पेशाब नहीं कर सकते थे। पहनने के लिए कपड़ों के नाम पर उन्हें टाट-बोरा नसीब था। 

 दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गांधी थे, जिन पर कहीं न कहीं अंग्रेज बहुत मेहरबान थे। उन्हें वक्त पर खाना मिल जाता था। गांधी को ‘आगा खान महल’ तो नेहरू को ‘अहमदनगर किले’ या अन्य विभिन्न जेलों में नज़रबंद करके रखा जाता था। जहां पर उन्हें लिखने-पढ़ने की सभी सुख-सुविधाएं मिलती थीं। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत की खोज) तथा अपनी आत्मकथा के कई हिस्सों को जेलों में रहकर बड़े आराम से लिखा था। जेल में रहते हुए ही नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अनेकों पत्र लिखे और बड़े आराम से खूब अध्ययन भी किया। स्वतंत्रता मिलने के बाद नेहरूजी को ही भारतवर्ष का पहला प्रधानमंत्री बनने का सुअवसर मिला, जबकि अनेकों स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को वो सम्मान ही नहीं मिला, जिसके वास्तव में वे अधिकारी थे। उस दौरान बढ़चढ़कर यही प्रचारित किया गया कि देश को आजादी तो केवल गांधी-नेहरू और उनकी प्रिय मंडली ने दिलवायी है। मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों की बदौलत ही बड़ी मुश्किल से देश स्वतंत्र हो पाया है। महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त जिन्हें अग्रेजों ने अंडमान की सेलुलर जेल में रखकर अमानवीय यातनाएं दीं, उनसे और उन जैसे सैकड़ों क्रांतिवीरों की अवहेलना तथा स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाणपत्र मांगा गया। बटुकेश्वर दत्त को तो आजाद भारतवर्ष में ही कई कष्ट झेलने पड़े। वे ताउम्र आर्थिक संकटों से जूझते रहे। बीमार होने पर अस्पताल में समुचित इलाज तक नहीं मिल पाया। 

भविष्य की पीढ़ियों को देश के इतिहास से परिचित करवाने के लिए देश में आपातकाल लगाने वाली जवाहरलाल नेहरू की बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को दिल्ली के लाल किले के पास जमीन के नीचे जो टाइम कैप्सूल (कालपत्र) दबाया था, उसमें भी बताते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार का ही एक तरफा महिमामंडन किया गया था। इंदिरा गांधी की तो यही मंशा थी कि यह कालपत्र 1000 साल तक सुरक्षित रहे लेकिन साल 1977 में जब देश में सत्ता बदली और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस छल-कपट के पिटारे को तुरंत बाहर निकलवाया। ज़रा सोचिए...जो सत्ताभोगी भगतसिंह को आतंकवादी मानते रहे हों और बाकायदा कोर्स की पुस्तकों में भी उन्हें आतंकवादी के तौर पर पेश किया गया हो उनके इरादे कैसे रहे होंगे। महज 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद भगतसिंह के जज़्बात काबिलेगौर हैं, ‘‘अगर मैं इश्क लिखना भी चाहूं तो इंकलाब लिख जाता हूं।’’ अमर शहीद भगत सिंह को याद करते-करते मुझे वो पल याद आ गये जब हम ‘कालापानी’ की सभी कोठियों को करीब से देखकर बाहर निकल रहे थे। स्त्री-पुरुषों, लड़के-लड़कियों की भीड़ में अपने मन की कहती चार-पांच महिलाओं की शिकायती पीड़ा ही कुछ ऐसी थी कि मैं भी उनकी बातचीत में सहभागी हो गया। उनके कथन दर कथन में प्रश्नों का अंबार था।...‘‘देश को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात जितने भी विश्व विद्यालय, चिकित्सालय, शोध संस्थान, कल्याणकारी योजनाएं, हवाई अड्डे, बाग-बगीचे आदि बने उनका नामकरण लगभग नेहरू, गांधी और उनके परिवार के नाम पर क्यों किया गया? यहां तक कि भारतीय मुद्रा पर भी झटपट, गांधी बाबा की तस्वीर छाप दी गई। सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, लाला लाजपतराय जैसे अनेकों सच्चे बलिदानी होने के बावजूद सत्ताधीशों को सिर्फ चंद नाम ही याद रहे! हर कहीं बस उन्हीं का एकाधिकार बना रहा। पता नहीं वो दिन कब आएंगे, जब दूसरे बलिदानियों को भी वैसा ही मान-सम्मान और नाम मिलेगा जैसा चंद घरानों को मिलता आया है। देश के विभिन्न प्रदेशों से पोर्टब्लेयर पहुंचीं इन विद्वान नारियों की दिली चाहत दिखी कि भारतीय नोटों पर भगतसिंह भी नज़र आएं, क्योंकि उनकी कुर्बानी बेमिसाल है।

पोर्टब्लेयर जिसेे खास तौर पर ‘कालापानी’ के नाम से जाना जाता है, अंडमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी है। यह भारत का एक केंद्र शासित प्रदेश है, जो बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्रकृति की गोद में सिमटा छोटे-बड़े अनेकों द्वीपों का समूह अंडमान निकोबार एक ऐसा नन्हा सा राज्य है, जो अपनी ही धुन में थिरकता है। एकदम व्यवस्थित साफ सुथरा। कहीं कोई ऐसा-वैसा शोर-शराबा नहीं। ऐतिहासिक सेलुलर जेल जहां यहां पहुंचने वालों को बलिदानी स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, वहीं पर्यटन स्थल के तौर पर भी यहां की हरीभरी धरा और एक से एक समुद्र तट मंत्रमुग्ध कर देेते हैं। एक बार जो यहां आता है, उसका बार-बार यहां आने को जी चाहता है। यहां के समुद्र का स्वच्छ जल, चारों तरफ फैली हरियाली, पक्षियों की चहक-महक के साथ-साथ समुद्र के पारदर्शी पानी में झूमती मटर गश्ती करती मनमोहक मछलियां हर किसी को मस्त करते हुए स्वर्ग के आनंद का जीवंत एहसास कराती हैं। यहां पर कहीं भी अनैतिकता और अश्लीलता के लिए कोई जगह नहीं। यहां के निवासी अत्यंत नेक दिल और बेहद सफाई पसंद हैं। गोवा की तरह यहां पर अय्याशों तथा अय्याशी का मेला नहीं लगता। समुद्र के किसी भी कोने में लड़के-लड़कियों की लिपटा-लिपटी दुर्लभ है। यहां शराब और बीयर की नदियां तो नहीं बहतीं लेकिन नीला समुद्र, ताड़, सुपारी और खुजूर के ऊंचे-ऊंचे पेड़ और सुहावना मौसम सभी को मदमस्त कर देता है। यहां के कच्चे नारियलों का पानी जहां प्यास बुझाता हैं, वहीं इनमें समाहित भरपूर मलाई भूख मिटाते हुए वाकई तृप्त कर देती है। समुद्र की विभिन्न प्रकार की ताजा मछलियां, झींगा और झींगी के साथ-साथ केरल और बंगाल के स्वादिष्ट भोजन आनंदित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तभी तो इसे मिनी इंडिया यानी छोटा हिंदुस्तान भी कहा जाता है। इस छोटे आकर्षक हिंदुस्तान में प्रशासनिक व्यवस्था दिल जीत लेती है। देश के अन्य प्रदेशों में जहां पानी की छोटी-छोटी प्लास्टिक की बोतलें धड़ल्ले से बेची और प्रयोग में लायी जाती हैं और इस्तेमाल कर शाही ठाठ के साथ यहां-वहां फेंक कर प्रदूषण बढ़ाया जाता है, वैसा चलन अंडमान निकोबार में बिल्कुल नहीं है। यहां तो सिर्फ बड़ी बोतलों में ही पानी उपलब्ध है। यहां के लोग भी इस मामले में अत्यंत जागृत हैं। जहां रहते है वहां साफ और स्वस्थ वातावरण रहे इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इसलिए यहां की हवा शुद्ध है, लोग भी खुश, संतुष्ट और प्रसन्न हैं। 

पोर्टब्लेयर की सुखद यात्रा के दौरान क्रूज का सफर पर्यटन को और...और रोमांचक और खूबसूरत बना देता है। एक द्वीप से दूसरे द्वीप जाने के लिए एक से एक क्रूज लग्जरी आलीशान होटल का जीवंत एहसास कराते हैं। ऊपर खुला आसमान और ठंडी हवाएं, समुद्र की लहरों के साथ अठखेलियां करती मछलियां .....जितनी बार भी देखो मन नहीं भरता। समंदर की बीचोंबीच लाइव डीजे, म्यूजिक डांस, शानदार बुफे डिनर विभिन्न ड्रिंक तथा बीयर की चुस्कियों के साथ डूबते हुए सूरज को देखना पर्यटकों को ऐसा बांधता है कि विदेश यात्राएं भी फीकी लगने लगती हैं.....

Thursday, October 1, 2026

मामा का भात

 उस दिन मैं राजधानी में था। एक कवि मित्र ने बताया कि हमारा वर्षों पुराना पत्रकार मित्र रवि रात्रे जीटीबी अस्पताल में भर्ती है। कवि मित्र को साथ लेकर मैं अस्पताल जा पहुंचा। दोस्त का हालचाल जानने के बाद हम वापस लौट ही रहे थे कि अस्पताल में शोर-शराबा सुनायी दिया। अस्पताल के डॉक्टर गुस्सायी भीड़ को नियंत्रित करने में लगे थे। पांचवीं कक्षा की एक छात्रा की पानी की जगह तेजाब पीने से मौत हो गई थी। परिजन और स्थानीय लोग उग्र प्रदर्शन की मुद्रा में थे। पहले तो वे लोग अस्पताल के डॉक्टरों को ही छात्रा की मौत का दोषी मान रहे थे, लेकिन जब उन्हें सच से अवगत कराया गया तो उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। पूर्वी दिल्ली के हर्ष विहार इलाके में स्थित एक स्कूल में पढ़ने वाली पांचवी कक्षा की छात्रा को स्कूल प्रशासन ने एकाएक तबीयत बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया था। बाद में परिजनों को भी सूचना दे दी। अस्पताल में भर्ती कराते समय स्कूल प्रशासन ने डॉक्टरों को बताया कि बच्ची की पानी पीने से तबीयत बिगड़ गई है। डॉक्टरों को इलाज के दौरान पहले शक और फिर बाद में यकीन हो गया कि बच्ची ने पानी नहीं तेजाब पिया है। उन्होंने मामले की सूचना पुलिस को दे दी। सभी डॉक्टर पूरी ताकत के साथ बच्ची को बचाने में लग गये, लेकिन उनकी सारी मेहनत धरी की धरी रह गई। कुछ ही घंटों के बाद बच्ची ने दम तोड़ दिया। पुलिस की जांच में बड़ा चौंकाने वाला सच सामने आया। रोज की तरह उस दिन भी सुबह संजना स्कूल पहुंची थी। लंच के दौरान वह अन्य बच्चों के साथ खाना खा रही थी। इस बीच उसने क्लास में ही खाना खाने आई चौथी कक्षा की छात्रा से पीने के लिए पानी की बोतल मांगी तो उसने संजना को सहर्ष बोतल थमा दी। जिसे पीते ही उसकी तबीयत बिगड़ गई और धड़ाधड़ उल्टियां होने लगीं। पेट जलने लगा। होंठ भी जल गए। दरअसल वह चौथी की बच्ची कोल्डड्रिंक की बोतल में पानी के बजाए गलती से तेजाब ले आई थी जिसे संजना ने पानी समझ कर पी लिया था। स्कूल में जहां बच्चे बैठकर खाना खा रहे थे, वहां उन्होंने फर्श पर तेजाब गिरने के बाद आने वाले सफेद निशान देखे। स्कूल प्रशासन को भी पता चल गया था कि बच्ची ने पानी की जगह तेजाब पी लिया है, लेकिन फिर भी उन्होंने परिजनों और डॉक्टरों से सच को छुपाये रखा। यदि समय पर तेजाब पीने के बारे में बताया जाता तो यकीनन डॉक्टर और गंभीरता से इलाज करते तो आज बच्ची जिन्दा होती। इस मौत के दोषी तो माता-पिता भी हैं जिन्होंने घर में तेजाब की बोतल लाकर रख दी थी और बच्ची पानी की बोतल समझकर स्कूल ले गई। इसे अगर संजना नहीं पीती तो यह बच्ची पीती और उसका भी यही दर्दनाक हश्र होता। दिल्ली में तेजाब बेचना गैरकानूनी है फिर भी गली की एक दुकान पर बड़ी आसानी से तेजाब उपलब्ध था! जिसे टॉयलेट साफ करने के लिए खरीदा गया था। संजना के पिता ईंट के भट्टे पर मजदूरी कर अपनी बच्ची को पढ़ा रहे थे। उनकी इच्छा थी कि लाड़ली बड़ी होकर बड़ी अफसर बने। तेजाबी लापरवाही ने उनके सपने को चकनाचूर कर दिया। 

यह तेजाब न जाने कितनी युवतियों को जिन्दा लाश बना चुका है। तेजाबी हमले के बाद चेहरे और दिलो-दिमाग पर जो निराशा और उदासी अंकित हो जाती है उससे आसानी से मुक्ति नहीं पायी जा सकती। उपदेश देना बहुत आसान है, सच का सामना करना बहुत मुश्किल। बीते हफ्ते एक गुस्साये प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को यह कहकर तेजाब से नहला दिया कि तुम्हें अपनी खूबसूरती पर बहुत गुरूर है। इसके खात्मे के लिए तुम्हें सजा देना जरूरी है। इससे उन युवतियों को भी सबक मिलेगा जो बात-बात पर खूबसूरत होने के अहंकार में अकड़ दिखाती रहती हैं। 

देश के एक जाने-माने प्लास्टिक सर्जन, जो वर्षों से तेजाब हमले की शिकार महिलाओं का इलाज करते चले आ रहे हैं, का कहना है कि अगर कोई महिला पुरुष की बात नहीं मानती तो वह उस पर तेजाब फेंक कर एक सेकंड में ही उसकी सारी जिन्दगी बरबाद कर देता हैं। इस राक्षसी प्रवृत्ति का अंत होता दिखायी नहीं देता। तेजाब की बुरी तरह से शिकार होने वाली कई महिलाएं तो जिन्दा ही नहीं रहना चाहतीं। बहुत कम ऐसी होती हैं जो जीवन की मुख्य धारा में लौटने का साहस दिखाती हैं। ज्यादातर तो घर की चार दीवारी में कैद हो जाती हैं। उनकी घुट-घुट कर कब मौत हो जाती है, पता ही नहीं चलता। तेजाब के हमले की शिकार हुई लक्ष्मी जैसी हिम्मत दिखाने वाली कुछ महिलाएं ही हैं जिन्होंने अपने जीवन को कड़े संघर्ष में तब्दील कर दिखाया। लक्ष्मी गायिका बनना चाहती थी। तब उसकी उम्र थी पंद्रह वर्ष जब एक बत्तीस वर्षीय अमानुष ने तेजाब फेंककर उनका पूरा चेहरा बुरी तरह से जला दिया था। हमले के कुछ दिन बाद जब लक्ष्मी ने आइना देखा तो वह खुद को ही नहीं पहचान पाई। सबकुछ उलट-पुलट हो चुका था। लक्ष्मी और पूरे परिवार पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा था। बाद में लक्ष्मी ने खुद को ऐसा संभाला और ऐसे-ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कि दुनिया देखती रह गई। दसवीं तक पढ़ी लक्ष्मी को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा ने इंटरनेशनल वूमेन ऑफ करेज़ अवार्ड देकर सम्मानित किया था। देश और विदेश में कई टीवी शोज में भाग लेकर अपनी प्रेरक और निर्भीक छवि बनाने वाली लक्ष्मी को कालांतर में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। शुरू-शुरू में तो उसके लिए कालीन बिछाये गये, तारीफों और स्वागतों की झड़ी लगा दी गई, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसे बेहद कटु सच से रूबरू करवा दिया गया। जिस प्रेमी ने उम्रभर साथ देने का वादा किया था वह भी भाग खड़ा हुआ। बेटी का खर्च उठाने में भी असमर्थता व्यक्त कर दी। लक्ष्मी के जीवन संघर्ष पर करोड़ों रुपये खर्च कर फिल्म बनायी गई, लेकिन उसके पास घर का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे। यह किसी एक लक्ष्मी की दास्तान नहीं है। इनकी संख्या हजारों में है, जो नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। उन्हें सहानुभूति दिखाने वाले तो बहुत मिलते हैं, लेकिन नौकरी देने में आना-कानी की जाती है। 

राजधानी दिल्ली में महिला सुरक्षा पदयात्रा का आयोजन किया गया जिसमें तेजाब पीड़ितों ने लोगों के साथ अपना दर्द साझा किया। इस पदयात्रा में कई ट्रांसजेंडर भी शामिल हुए। उन्होंने नारे लगाए कि किन्नरों को सम्मान दो, वो भी इंसान हैं। उन्हें बेवजह अपमानित किया जाता है। किसी भी दफ्तर व पुलिस थाने में उनकी शिकायत नहीं सुनी जाती। कई किन्नरों को पढ़े-लिखे होने के बावजूद काम नहीं मिलता। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के एक गांव में किन्नरों ने जो कर दिखाया उसकी मिसाल मिलना आसान नहीं है। उस गांव में एक गरीब परिवार अपनी बेटी की शादी को लेकर बहुत चिन्तित था। बिटिया की शादी तय हो गई थी और माता-पिता की जेब लगभग खाली थी। लड़की की मौसी का किन्नरों के बीच उठना-बैठना था। एक दिन उसने कुछ किन्नरों को इस गंभीर समस्या से अवगत कराया तो वे द्रवित हो उठे। उन्होंने मौसी को आश्वस्त किया कि वे लड़की की शादी में जो सहयोग बन पड़ेगा जरूर करेंगे। बातों ही बातों में उन्होंने मौसी से लड़की की शादी की तारीख भी जान ली। मौसी ने उनके आश्वासन को बहुत हलके में लिया। उसने सोचा कि झूठी तसल्ली देने के लिए ऐसी बातें तो सभी करते हैं। जहां अपने मुश्किल की घड़ी में किनारा कर लेते हैं वहां गैरों से क्यों कोई उम्मीद रखना...। जो किन्नर दूसरों के सहारे पलते हैं वो क्या किसी की सहायता करेंगे? लड़की की शादी के दो-तीन दिन पहले एक साथ नौ किन्नर लड़की के घर जा पहुंचे। लड़की के माता-पिता उन्हें देखकर घबरा गये। उन्हें इस बात का डर सताने लगा कि अब इन्हें कुछ-न-कुछ देकर विदा करना पड़ेगा। बिना लिये तो यह लोग टस से मस नहीं होंगे। लड़की के माता-पिता और रिश्तेदारों के उतरे हुए चेहरे को देखकर किन्नरों ने खिलखिलाते हुए कहा, अरे हम तो लड़की के मामा हैं जो अपना फर्ज निभाने आए हैं। अपनी भांजी की शादी में भात देने आए हैं। किसी को कुछ समझ में आ पाता इससे पहले उन्होंने पांच तोला सोना, पंद्रह तोला चांदी, और साढ़े तीन लाख रुपये लड़की की झोली में डाल दिए...। 

Thursday, September 24, 2026

असंभव-संभव

 कुछ लोगों को चुप रहना नहीं आता। खुद तो कुछ करते-धरते नहीं, दूसरों को ही बस उपदेश देते हुए उन्हें भयभीत करते रहते हैं। जबरन की राय और तानों की विषैली बरसात से हैरान-परेशान करने वालों से यदि सफलता पाने वाले चेहरे घबराकर ठहर जाते तो यकीनन विघ्न संतोषियों की जीत हो जाती, ऐसे में असफलता का मलाल जीवनभर उनका पीछा करता रहता। देश की पहली महिला फायर फाइटर बनी हर्षिणी तो कहती हैं कि तानों ने उनके हौसले का और और मजबूती दी। जब उन्होंने नागपुर में स्थित फायर सर्विसेज कॉलेज में पहला कदम रखा तो लड़के चौंक गए। कुछ लड़कों ने उन्हें रोककर कहा कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। यहां सिर्फ लड़के ही पढ़ते हैं। रिस्की काम तो वही कर सकते हैं। लड़कियों को तो आसान कार्य करने के लिए ऊपर वाले ने धरती पर भेजा है। हर्षिणी को लड़कों की यह बात बहुत चुभी। हर्षिणी में तभी दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह परंपरा को तोड़ते हुए सच्ची योद्धा बनकर दिखायेगी। कुछ अड़चने आईं लेकिन अंतत: उन्हें एडमिशन मिल गया। जैसे ही क्लास शुरू हुई तो उन्हें देखने के लिए पूरा ब्वाइज हॉस्टल जमा हो गया। उन्हें लगा था कि लड़की असहज होते हुए अपना निर्णय बदल लेगी। ट्रेनिंग के दौरान भारी सामान के साथ दौड़ लगानी होती तो लड़के पलटकर देखते कि वह गिरी है या नहीं। उन्हें हर्षिणी के गिरने-फिसलने का बेसब्री से इंतजार रहता। हर्षिणी ने साढ़े तीन साल कड़ी ट्रेनिंग के दौरान एक भी छुट्टी नहीं ली, जबकि लड़कों के साथ उलटा था। जब तब छुट्टी लेते रहते थे। हर्षिणी की मेहनत रंग लाई उन्हें ओएनजीसी में फायर फाइटर पद की नौकरी भी मिल गई। पहली पोस्टिंग गुजरात के मेहसाणा में हुई। हर्षिणी वर्तमान में कोलकाता में डीजीएम फायर सेफ्टी के पद पर कार्यरत हैं। घर से बाहर निकलकर काम कर रही महिलाओं के लिए उनका संदेश है कि अपने महिला होने को कभी भी ढाल न बनाएं। मैं अकेली कैसे करूंगी, कैसे जाऊंगी, घरवालों को कैसे मनाऊंगी आदि बातों को अपने करियर की ग्रोथ की राह में किसी भी हालत में आड़े न आने दें। 

देश की पहली लाइन वुमन बब्बुरी सिरीशा ने जब दसवीं के बाद अपने मामा की सलाह पर आईटीआई में इलेक्ट्रिकल ट्रेड चुना तो उनसे कहा गया कि कोई और आसान सी राह पकड़ लो। क्लास में 27 लड़के हैं, अकेली लड़की हो। तुम्हें परेशान करके रख देंगे। इतना ही नहीं दो साल की पढ़ाई के बाद परीक्षा से पहले फरमान सुनाया गया कि तुम एलिजिबल यानी सक्षम नहीं हो। यह तो पुरुषों का क्षेत्र है। बब्बुरी की तो जिद थी कि उन्हें डटे रहना है। वे अदालत पहुंची केस किया, तीन साल तक लड़ाई चली। 18 फीट के खंभे पर फुर्ती से चढ़कर दिखाया। तब कहीं जाकर परीक्षा की अनुमति मिली। फिजिकल टेस्ट के लिए सिरीशा रोज एक्सरसाइज और खंभे पर चढ़ने की प्रैक्टिस करतीं। लोग घूरते, सवाल करते, पर वे कहती, ‘अपने काम पर ध्यान दो। मेरे हौसले को कमजोर करना तुम लोगों की बस की बात नहीं।’ टेस्ट चार तरह के खंभों पर था, उन्होंने रफ पोल पर अभ्यास किया था। एक दिन पहले पता चला कि सेंटर पर स्मूथ पोल है। घबराहट हुई, फिर संभली और टेस्ट पास किया। 2022 में सिरीशा ने बतौर लाइन वर्कर जॉइन किया। कंपनी में उनसे पहले कोई महिला इस पद पर नहीं थी। फील्ड में जातीं तो लोग पूछते कि आप सच में लाइन वर्कर हो? फिलहाल उनके पास ऑफिस वर्क है। लेकिन अगले ट्रांसफर में फील्ड में जाना चाहती है।

अजय कुमार रस्तोगी सरकारी कॉलेज में पच्चीस साल तक लेक्चरर की नौकरी करने के बाद रिटायर हुए तो उलझन के शिकार हो गये। क्या करें, कहां जाएं? बच्चे विदेश में हैं। बीवी रहीं नहीं। अकेले रहने के अलावा कोई और चारा नहीं था। एक रात लिमिट से ज्यादा शराब पीकर घर लौट रहे थे तो पुलिस के लपेटे में आ गए। सारी रात पुलिस स्टेशन बैठना पड़ा। वहीं उन्हें अपनी मां की याद हो गई जिन्हें उन्होंने वर्षों पहले अपने पास रखने की बजाय वृद्धाश्रम में रखना बेहतर समझा था। कई सालों से अपनी जननी से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाये थे। पुलिस थाने में उन्हें काफी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा। जब खाकी वर्दीधारियों को पता चला कि महाशय कॉलेज में पढ़ा चुके हैं तो उन्होंने उनका खूब मजाक उड़ाया। रस्तोगी शर्म के मारे पानी-पानी हो गये। उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अब शराब नहीं पीने की कसम खा ली। कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए दरोगा की जेब गर्म की और सीधे मां को लेने वृद्धाश्रम चल दिये। तब तक उनकी माताश्री 87 वर्ष की हो चुकी थीं। रस्तोगी ने सब कुछ भूलभालकर अपनी उम्रदराज माताजी की तन्मयता से सेवा करनी प्रारंभ करते हुए अपना अधिक से अधिक समय उनके साथ व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें बार-बार खुद पर गुस्सा भी आता कि अपनी संकीर्ण सोच और स्वार्थ की वजह से अपनी मां को अपने पास नहीं रख पाये। बेचारी वृद्धाश्रम में ही बूढ़ी हो गईं। अच्छे-भले बेटे के होने के बावजूद उन पर क्या गुजरी होगी? छह साल तक उन्होंने तन-मन-धन से मां की देखरेख की। उनकी बची-खुची चाहतों को पूरा किया। इधर-उधर घुमाया फिराया। वर्षों तक बेटे से दूर रहीं उम्रदराज मां ने अपने बेटे को भरपूर आशीषें दीं और छह साल बाद यानी 93 की उम्र में दुनिया से विदा हो गईं। रस्तोगी साहब को झटका लगा। मां के चल देने से एक अजीब से खालीपन ने फिर उन्हें घेर लिया। ऐसे में उनको याद आया कि बचपन में कभी उनकी लेखक बनने की प्रबल इच्छा थी, जो नौकरी और घर परिवार चलाने की जद्दोजहद में ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद उन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया। आठ-दस वर्षों में कहानी, कविता और व्यंग्य की रचनाओं के दस संग्रह प्रकाशित हो गये। साहित्य जगत में डंका बजने लगा। उनकी दो कृतियां राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। अब तो उन्होंने अपने घर के बाहर एक अलमारी बनवा कर लाइब्रेरी भी बना दी है, जहां विभिन्न विषयों की सैकड़ों किताबें उपलब्ध है। पढ़ने-लिखने के शौकीन लड़के-लड़कियां, बुजुर्ग बिना किसी झिझक के लाइब्रेरी में आते हैं और अपनी मनपसंद किताब को खोलकर पढ़ने बैठ जाते हैं। अजय कुमार रस्तोगी का भी बचपन का शौक पूरा हो गया है और अब उनका समय भी बड़ी आसानी से कट रहा है।

अमेरिका के शहर डेलावेयर में रहती हैं 108 वर्षीय सुसान यंग ब्राउन। किसान परिवार में पली बढ़ी सुसान ने तीस वर्ष तक बच्चों को पढ़ाया। पूरे मन से नौकरी बजाने के बाद 1977 में रिटायर होने के पश्चात चिंताग्रस्त हो गईं कि खाली रहकर क्या करेंगी? उनके लिए तो एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो जाएगा। अधिकांश करीबी रिश्तेदार स्वर्ग सिधार चुके थे। पति भी कब के चल बसे थे। ऐसे में उन्होंने अपने घर में ही आसपास के बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ कर खुद को व्यस्त कर लिया। ऐसे में उनका समय अच्छी तरह से व्यतीत होने लगा। वर्तमान में वे 108 साल की है, अभी भी जवान हैं। तन से भी और मन से भी। रोज जल्दी उठकर व्यायाम करती हैं। घंटों पैदल चलती हैं और खुद ही कार चलाते हुए बाजार खरीदी करने जाती हैं। उनकी जिन्दगी के तीन बड़े सबक हैं, पहला उम्र बढ़ने के साथ शरीर को बिल्कुल निष्क्रिय कर देना सही नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार रोज कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहें। दूसरा, सीखना कभी बंद मत करें । तीसरा, अपने पैरों पर खड़े रहने की कोशिश कीजिए। अपना काम स्वयं करने की आदत को हमेशा बरकरार रखें। उन्होंने एक प्रेरक किताब भी लिखी है, जो बेस्ट सेलर में शुमार है। उसमें वे लिखती हैं कि दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए अनुशासित जीवन शैली, संतुलित खान-पान और मानसिक सक्रियता आवश्यक है। अपनी नींद को दवा जैसा महत्व दीजिए। रोज लगभग एक ही समय पर सोएं-जागें। रात में मोबाइल या अन्य स्क्रीन लंबे समय तक देखना बंद करें। ब्रेन की हेल्थ के लिए अपनी थाली को सभी आहारों से भरपूर रखिए। थाली में हरी सब्जियां, फल डालें, साबुत अनाज, मेवे और पर्याप्त प्रोटीन रखें। ज्यादा प्रोस्टेड खाना खाने से परहेज करें। 

लंबी उम्र के लिए मशहूर जापान के वृद्धों ने तो नया रिकॉर्ड बना दिया है। देश में 100 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक लाख के पार पहुंच गई है। इनमें महिलाओं की संख्या करीब 88 प्रतिशत है। देश की सबसे ज्यादा उम्र की महिला का नाम किशिमोटो फुयो है। उनकी उम्र करीब 114 साल है। वो राजधानी क्योटो में रहती हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा उम्र के पुरुष का नाम कुमामोटो है, जो 112 साल के हैं। कुमामोटो हिकारू में रहते हैं। जापान के एक उम्रदराज चिकित्सक मानते हैं जापानी लोगों की लंबी उम्र के लिए कई चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हेल्दी डाइट और एक्टिव लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें शामिल हैं। जापान में लोगों के खान-पान में मुख्य तौर पर मछलियां, सब्जियां और चावल शामिल होते हैं। कई पश्चिमी देशों की तुलना में यहां के खाने में सैचुरेटेड फैट कम होता है। बुजुर्गों की लंबी उम्र होने में और भी कई फैक्टर शामिल हैं। इनमें रोजाना पैदल वॉक करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट्स का इस्तेमाल करना और रोजाना साइकिल चलाने जैसी चीजें शामिल हैं।

Thursday, September 17, 2026

जहां चाहें... वहीं राहें

 बहुत से लोगों की यही धारणा है कि पढ़ने-लिखने और कुछ नया करने की एक तयशुदा उम्र होती है उसके बाद तो खुद को रोजी-रोटी के लिए नौकरी और कामधंधे में लगाना-खपाना होता है। यह मानने वाले भी भरे पड़े हैं कि विधाता ने जिन्हें शारीरिक तौर पर अपंग बनाया है, उनके लिए हर काम कर पाना संभव नहीं। ऐसे विद्वानों का निष्कर्ष है कि जीवन कोई प्रयोगशाला तो नहीं कि नये-नये प्रयोगों की झड़ी लगाकर रखी जाए और अपनी खुशियों में व्यवधान डालने के साथ-साथ दूसरों को भी परेशान किया जाए। 

सबकी अपनी-अपनी सोच हैं, अपने-अपने विचार हैं। लेकिन अब समय का चेहरा बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता का दौर प्रारंभ हो चुका है। कई लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। खुद को बदलेंगे नहीं तो पाये हुए को खोने का डर सिर पर तलवार ताने खड़ा रहेगा। वैसे भी सभी के लिए सफलता के एक जैसे रास्ते नहीं हैं। हर किसी की जिन्दगी में ऐसे दौर आते हैं जब सब धीमा पड़ जाता है। योजनाएं रुक जाती है, उत्साह ठंडा पड़ जाता है और लगने लगता है कि लोग आगे बढ़ रहे हैं और हम वहीं खड़े हैं। जो इस ठहराव और परिवर्तन को नहीं समझ पाते उन्हें कई अकल्पनीय परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। यह भी सच है कि वर्षों से जिस राह पर चलने की आदत पड़ चुकी हो उसे बदलना या छोड़ना आसान नहीं। 

लेकिन जब और कोई चारा नहीं हो तब? सात समंदर पार वाशिंगटन में अब कई लोग 40 की उम्र पार करने के बावजूद दोबारा पढ़ने-समझने के लिए क्लासरूम में लौट रहे हैं। कोई शेफ से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन रहा है तो कोई नई डिग्री लेकर खुद को और ज्यादा कुशल साबित करना चाहता है। इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो स्कूल के बाद कॉलेज नहीं गये थे वे भी अब पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं, ताकि डिग्री हासिल कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशन स्टैटीस्टिक्स के मुताबिक अमेरिका में 40 की उम्र के 10 लाख से ज्यादा लोग अंडर ग्रेजुएट या ग्रेजुएट प्रोग्राम में पढ़ रहे हैं। इनमें से कई लोग वाइट कॉलर जॉब्स से ज्यादा सैलरी और जॉब सिक्योरिटी चाहते हैं। वहीं युवा पीढ़ी डिग्री की वैल्यू पर सवाल उठा रही है। 

टेक्सास यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर सिंडी वुडी ने 41 की उम्र में मास्टर्स और 47 में पीएचडी की। वे कहती हैं कि, मैं एक अच्छा इन्वेस्टमेंट हूं। उन्होंने पढ़ाई के दौरान टीवी देखना छोड़ दिया, घर के काम परिवार को सौंप दिए और रात व वीकेंड पर क्लास अटेंड की। कम खर्च वाले ट्रेड और अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इनकी सालाना फीस करीब 3 हजार डॉलर होती है। इन क्षेत्रों को एआई और ऑटोमेशन से कम खतरा माना जाता है। जैसे-पाइप लीक होने पर प्लंबर की जरूरत तो होगी ही। पेंसिलवेनिया के एक जॉब ट्रेनिंग प्रोग्राम में 108 छात्रों में से एक चौथाई 40 की उम्र के हैं। वे प्लंबिंग, कारपेंट्री, कंस्ट्रक्शन और हेल्थकेयर जैसे स्किल्स सीख रहे हैं। इनमें से कई ने अपनी पुरानी नौकरी खो दी या बेहतर सैलरी की तलाश में हैं।

विख्यात रिटेल स्टोर चेन डीमार्ट का नाम आपने भी सुना ही होगा। इसके कर्ताधर्ता हैं राधाकिशन दामानी बहुत ही सहज और सरल इंसान हैं। दामानी जी के देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 500 स्टोर हैं। फोर्ब्स द्वारा जारी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में उनका नाम शामिल है। उनका डीमार्ट ग्राहकों को रोजमर्रा की जरूरत का सामान बाजार से कम कीमत पर उपलब्ध कराने का दावा करता है। ग्राहकों को उन पर भरोसा है, इसलिए उनके सभी स्टोर में भीड़ लगी रहती है। दामानी हमेशा सफेद शर्ट और सफेद पतलून पहनते हैं, इसलिए लोग उन्हें प्यार से ‘मिस्टर व्हाइट एंड व्हाइट’ भी कहते हैं। आम लोगों से जुड़े रहने के पक्षधर, सादगी पसंद दामानी को जब लोग मुंबई के चर्चगेट या इंडस्ट्री हाउस के पास बनी पान दुकान पर पान खाते देखते हैं तो उनकी सरलता के मुरीद हो जाते हैं। दरअसल, उन्हें लंच के बाद पान खाना बहुत पसंद है। इसी बहाने अपने पुराने जान-पहचान वालों से मिलना-मिलाना भी हो जाता है। बीकानेर के मारवाड़ी परिवार में जन्मे राधाकिशन के पिता शिवकिशन का जीवन भी अत्यंत संघर्षमय रहा। मुंबई में एक कमरे के घर में रहकर उन्होने दलाल स्ट्रीट में ब्रोकर का काम करते हुए कई उतार-चढ़ाव देखें। जब राधाकिशन 12वीं में थे तब उनके पिता शिवकिशन का निधन हो गया तो पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर व्यवसाय और परिवार की देखरेख को प्राथमिकता देते हुए कम दाम में अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदे और खूब कमाई की। साल 1992 में देश के शेयर बाजार में हाहाकार मचाने वाला हर्षद मेहता कांड सामने आया। तब जहां सैकड़ों निवेशक डूबे। वहीं दूसरी ओर धैर्यवान राधाकिशन थे जिन्होंने गिरते बाजार में खूब कमाई की। उनकी व्यावसायिक यात्रा धीमे-धीमे चलती रही। इधर-उधर के कुछ और काम भी किए। बाजार की नब्ज़ पर गहरी नज़र रखते हुए 2002 में मुंबई के पवई में डीमार्ट का पहला स्टोर खोला और जो सफलता हासिल की उससे अब देश के छठे सबसे अमीर कारोबारी कहलाते हैं। वे ऐसे व्यापारी नहीं जो परिवार और खुद की सुख-सुविधाओं के लिए ही मेहनत करते हैं। उनके ट्रस्ट के द्वारा 56 लाइब्रेरी बनाई गई हैं, जिनसे 50 हजार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। गरीब बच्चों की कम्प्यूटर शिक्षा के लिए 70 से ज्यादा लैब बनवाई गई हैं। पीएम केयर फंड में 100 करोड़ और कोरोना काल में 55 करोड़ का दान कर चुके दामानी हर कुंभ के दौरान डुबकी लगाने के लिए जरूर जाते हैं। 

बीस साल के मयूरेश का डॉक्टर बनने का सपना अब पूरा होने जा रहा है। केईएम मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला पाने के लिए उसे खासी मशक्कत और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसकी मानसिक और शारीरिक कमजोरी को देखते हुए माता-पिता ने उसे बहुतेरा कहा-समझाया कि डॉक्टर बनने की जिद छोड़ दो, बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन वह नहीं माना। उसके मन-मस्तिष्क से डॉ.आदिल चागला कभी ओझल ही नहीं हो पाए। हां, वही डॉ. चागला जिन्होंने उसका पूरी तन्मयता और आत्मीयता के साथ तब इलाज किया था जब वह मात्र दस वर्ष का था और उसके मस्तिष्क में ब्रेन ट्यूमर होने से सभी ने उसके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, कुछ डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि वह शायद ही अधिक समय तक जिन्दा रह पाए। मौत धीरे-धीरे उसकी तरफ खिंची चली आ रही है। केईएम अस्पताल के पूर्व न्यूरोसर्जन डॉ.आदिल चागला पहले डॉक्टर थे, जिन्होंने उसे हिम्मत का दामन छोड़ने की बजाय चुनौती का डटकर सामना करने की सीख दी थी। साथ ही भरपूर भरोसा दिलाया था कि वह वक्त शीघ्र आयेगा, जब वह अस्पताल से पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर जायेगा। मयूरेश की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी सफल रही लेकिन शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया। कई महीनों के इलाज के दौरान मयूरेश ने डॉ.चागला की गतिविधियों को बहुत करीब से देखा। उनका मरीजों के प्रति अपनत्व भरा बर्ताव, उनके परिवारों को आश्वस्त करने का प्रभावी तौर तरीका मयूरेश को इस कदर प्रभावित कर गया कि उसने तभी डॉ.चागला को अपना आदर्श मानते हुए दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह भी बड़ा होकर डॉक्टर ही बनेगा और मरीजों की ऐसे ही समर्पण भाव से सेवा करेगा। अस्पताल से लौटने के पश्चात मयूरेश ने अपनी चाहत की आंच कभी भी धीमी नहीं होने दी। यह हकीकत अपनी जगह है कि उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शारीरिक कमजोरी और शासकीय नियमों के कारण 2024 में नीट परीक्षा में 480 से अधिक अंक पाने के बावजूद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला। वर्ष 2026 वह दोबारा नीट परीक्षा में शामिल हुआ और उसे 440 अंक मिले, जिससे दिव्यांग कोटा में उसे केईएम अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। वह दिन दूर नहीं, जब वह सफेद एप्रन धारण कर बीमारों को भला चंगा करते हुए उनके जीवन को नई दिशा देगा। 

महर्षि दयानंद विश्व विद्यालय रोहतक में एक कोने में खड़े रंग-बिरंगे फूड ट्रक ‘डैफेटेरिया’ को आप देखते ही रह जाएंगे। खूब हैरान भी होंगे। क्योंकि यह भारत का पहला अनोखा डबल डेकर बस फूड ट्रक कैफे है। जहां पर आधे से ज्यादा स्टाफ मूक-बधिर है। मूक-बधिर यानी वो लोग जो बोल और सुन नहीं सकते। जिन्हें कई बार सक्षम लोगों की अवहेलना और तिरस्कार से अपमानित होेना पड़ता है। शेफ और सर्विस स्टाफ में विशेष रूप से दिव्यांगों को शामिल करने का मात्र यही मकसद है कि वे मान-सम्मान के साथ आजीविका कमाते हुए अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा सकें। वे भी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में कहीं पीछे नहीं हैं। यहां मिलने वाला शाकाहारी भोजन और अन्य व्यंजन लाजवाब हैं। विद्यार्थियों और आगंतुकों की भीड़ देखते बनती है। नितांत खामोशी भरी इस दुनिया में कोई चिल्लाकर आर्डर नहीं देता। सिर्फ और सिर्फ इशारों और हावभाव से बातें होती हैं। इस प्रभावी पहल को धरातल पर उतारने वाले युवा संदीप और साहिल अपनी टीम के साथ व्यस्त रहते हैं। ऑर्डर पर ऑर्डर मिलते रहते हैं और ग्राहकों तक लजीज खाना और अन्य बेहतरीन व्यंजन पहुंचते रहते हैं, जो एकदम किफायती भी हैं। काबिलेगौर यह भी कि दो मूक-बधिर युवाओं का यह स्टार्टअप अब इग्नू के स्लेबस में शामिल हो गया है। मैनेजमेंट के विद्यार्थी इस मॉडल की सफलता को समझ नए आइडिया विकसित करेंगे। ‘डैफेटेरिया’ के मेन्यू कार्ड पर व्यंजनों के नाम के साथ-साथ उनके साइन लैग्वेज बने हुए हैं। जब कोई छात्र या अन्य यहां ऑर्डर देता है, तो वह केवल पैसे नहीं चुकाता, बल्कि अपनी अंगुलियों को मोड़कर ‘थैंक यू’ या ‘वेलकम’ कहना भी सीखता है। काउंटर पर खड़े मूक-बधिर युवा ग्राहकों के इशारों को पलक झपकते समझते हैं और चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान बिखेरते हुए खाना परोसते हैं। इस फूड ट्रक स्टार्टअप के अनोखे मॉडल को इतनी लोकप्रियता मिली है कि इसे राष्ट्रपति भवन में आयोजित पर्पल फेस्ट में भी देश के सामने प्रदर्शित होने का गौरव मिल चुका है।