धन के लिए, तथाकथित मान-सम्मान, परिवार की इज्ज़त के लिए और भी कितने-कितने अभिमान और झूठी शान के लिए हत्याओं और रिश्तों की बलि चढ़ाने के क्रूर सिलसिले ने मानवता को शर्मसार होने को मजबूर करना प्रारंभ कर दिया है। वो नगर, महानगर जो कभी इंसानियत की मजबूत नींव पर खड़े नज़र आते थे, अब रेत के घरौंदे से बिखरते और ढहते नज़र आने लगे हैं। संतरानगरी नागपुर में सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाने की परिपाटी रही है। दीपावली, दशहरा, ईद, होली, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस आदि को जिस एकता, तन्मयता और आपसी सद्भाव के साथ मनाया जाता है, वह अनुकरणीय और लाजवाब है। राम जन्मोत्सव (रामनवमी) और हनुमान जयंती की भव्य शोभायात्रा में श्रद्धालुओं की जो भीड़ उमड़ती है, वह भी यकीनन देखते बनती है। स्त्री-पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग सभी आस्था और भक्ति के रंग में रंगे नजर आते हैं, लेकिन इस बार की हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान एक भोले-भाले किशोर को जिस तरह से मौत के घाट उतारा गया, उसे कम अज़ कम सजग शहरवासी तो कभी नहीं भूल पायेंगे। अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता और खौफ की भावना उनके मन-मस्तिष्क में डटी रहेगी। 14 साल का एक चंचल लड़का घर से शोभायात्रा में शामिल होने के लिए निकला, लेकिन फिर वह घर नहीं लौटा। दो दिन बाद उसकी लाश मिली। जब वह घर से शोभायात्रा में जा रहा था तब उसकी दादी ने उसे रोककर कहा था, ‘‘शोभायात्रा में भीड़ बहुत रहने वाली है, अपना ख्याल रखना, किसी अंजान से बिल्कुल न घुलना-मिलना।’’ अथर्व नामक इस बच्चे का जवाब था, ‘‘दादी अब मैं बड़ा हो गया हूं। आप मेरी बिल्कुल फिक्र न करें। अपने मोहल्ले में तो सभी अपने हैं।’’ दादी और संपूर्ण परिवार भी आश्वस्त था। प्रभु राम जी के भक्त हनुमान के धार्मिक आयोजन में किसी अनहोनी की कल्पना ही बेमानी है। शोभायात्रा में शामिल होने वाले तो सभी धर्म-कर्म की सुभावना से परिपूर्ण होते हैं। अथर्व का पूरा परिवार एक-दूसरे के साथ मेलजोल रखने और प्रभु भक्ति में यकीन रखता है। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं रही, लेकिन फिर भी दिलदहलाने वाला कांड हो गया। अथर्व के पिता आर्थिक रूप से संपन्न हैं। अथर्व का अपहरण कर लाखों रुपए की फिरौती वसूलने की तैयारी में लगे बदमाशों को तो जैसे मनचाहा मौका ही मिल गया। अथर्व को बेहोश करने के लिए चूहे मारने का स्प्रे शैतानों ने हफ्ते भर पहले ही खरीद लिया था। उन्होंने अथर्व को बेहोश करने के बाद फिरौती का कॉल करके 50 लाख रुपए मांगने का प्लान गहन चिंतन मनन के बाद बनाया जा चुका था। बस्ती के लोग हनुमान जयंती शोभायात्रा में लीन थे, तभी अथर्व को किसी बहाने से अपने पास बुलाकर कार में बिठाया गया। जब कार बिल्कुल सुनसान निर्जन स्थान पर पहुंची तो चतुर अथर्व उनसे सवाल करने लगा। मुझे कहां ले जा रहे हो! चुप कराने के लिए उसके चहरे पर धड़ाधड़ नशीला स्प्रे मारा गया, लेकिन उस पर असर नहीं हुआ। ऐसे में तीनों अपहरणकर्ता घबरा गये और भेद खुलने के भय से उन्होंने दुपट्टे से उसका गला घोट दिया। हड़बड़ी में हत्या करने के बाद उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। पचास लाख की फिरौती वसूलने की हिम्मत धरी की धरी रह गई। अब तो लाश को ठिकाने लगाने की चिंता में उनके हाथ-पैर कांपने लगे। दूसरी तरफ अथर्व के लापता होने से घर-परिवार में खलबली मच चुकी थी। रातभर उसकी तलाश होती रही। इस बीच धन लोभी दरिंदों ने अथर्व के हाथ-पैर बांधे और बोरे में लाश भरकर रेलवे क्रासिंग के पुल पर फेंक चलते बने। मुख्य हत्यारे का अथर्व के घर पर आना-जाना था। उसे जानकारी थी कि उसके पिता के पास इफरात पैसा है। पचास लाख रुपए तो चुटकी बजते ही मिल जाएंगे।
महाराष्ट्र में स्थित यवतमाल जिले के एक गांव में छह वर्ष की नन्ही बच्ची रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। कई घंटे तक जब बेटी घर नहीं लौटी तो घर में कोहराम मच गया। मासूम बिटिया रोज मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए जाया करती थी। घंटे-आधे घंटे में हंसती-खेलती लौट आती थी। चुस्त-दुरूस्त बेटी का किसी ने अपरहण तो नहीं कर लिया या खेलते-खेलते रास्ता तो नहीं भटक गई जैसी और कई आशंकाओं से ग्रसित माता-पिता ने घंटों उसे चारों तरफ खोजा। रिश्तेदारों से भी पूछताछ की, लेकिन बेटी नहीं मिली। अंतत: थक हार कर पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। मात्र छह साल की बच्ची के एकाएक गायब हो जाने के मामले को बहुत गंभीरता से लेते हुए बच्ची का पता बताने पर 25 हजार रुपयों की घोषणा के साथ अपने तरीके से खोजबीन करते-करते पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि शिवानी बिटिया कहीं दूर नहीं, आसपास ही है। सतर्क पुलिस जब गांव के एक-एक घर की तलाशी करके पता लगा रही थी तभी शिवानी के घर के बाजू से सटे एक घर के कमरे में एक बोरा पड़ा मिला। बोरे को खोलते ही पुलिस वालों की आंखे फटी की फटी रह गईं। जैसे ही परिवारजनों और ग्रामवासियों को शिवानी का शव मिलने की जानकारी मिली तो सभी गुस्से में आगबबूला हो गये। हत्यारे पड़ोसी ने पुलिसिया पूछताछ में अपराध कबूलने में देरी न करते हुए बताया कि जैसे ही शिवानी की नाक की सोने की नथ पर उसकी नज़र पड़ी तो उसका लालच जाग गया। बच्ची को तरबूज खिलाने का प्रलोभन देकर घर बुलाया और नाक से जबरन नथ निकाल तो ली, लेकिन उसके बाद यह खौफ भी सताने लगा कि वह बाहर जाकर सब बता देगी। उसके माता-पिता और पड़ोसी मार-मार कर उसका हुलिया ही बिगाड़ देंगे। हो सकता है जान ही ले लें। इस डर से उसने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव को बोरे में बंद करके रख दिया। लाश को ठिकाने लगाता इससे पहले ही आसपास के लोग और पुलिस तेजी से सक्रिय हो गई और मेरे पाप का पर्दाफाश हो गया।
शिवानी की मां का तो रो-रोकर बुरा हाल था। वह खुद को कोसे जा रही थी कि अपनी लाडली बिटिया को यदि वह सोने की नथ न पहनाती तो उसकी ऐसे हत्या तो न कर दी जाती। लालची पड़ोसी मेरी मासूम बिटिया की जान लेने से पहले मुझसे मेरी सारी दौलत भी मांग लेता तो मैं उसे मना नहीं करती। कई-कई बार लिखा और कहा जा चुका है कि बेटियों में पिता की जान बसती है। अपनी पुत्री के लिए जन्मदाता अपना सर्वस्व न्योछावर करने को सदैव तत्पर रहते हैं, लेकिन यह कैसे जन्मदाता हैं? पिता कहलाने के हकदार हैं भी? मुझे यकीन है कि अधिकांश लोगों ने यह खबर नहीं पढ़ी होगी कि राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आमल्दा गांव के एक पिता ने अपनी बेटी के प्रेम विवाह से असहमत और आहत होकर उसे जीते-जी मृत घोषित कर मर्दानगी का खूब जोरदार डंका पीटा। उसने अपनी बिरादरी को तो प्रसन्न और प्रफुल्लित कर दिया, लेकिन बेटी को जो अथाह पीड़ा दी उसे व्यक्त करने के लिए कलमकार खुद को असमर्थ पाता है। राजनीति के खिलाड़ी पिता ने पहले तो मनपसंद युवक से ब्याह न करने के लिए समझदार व्यस्क बेटी को प्रेम से मनाने-समझाने की कोशिश की। यहां तक कि उसकी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवायी। पुलिस ने प्रेम को अपराध बताते हुए फैसला बदलने का बार-बार दबाव बनाया, लेकिन सच्ची समर्पित प्रेमिका टस से मस नहीं हुई। पितृसत्ता के मद में डूबे अहंकारी नेताजी ने अपने प्रशंसकों, रिश्तेदारों और वोटरों में अपनी धाक जमाने के लिए शोक पत्रिका छपवायी, जिसमें लिखा कि मेरी पुत्री का स्वर्गवास हो गया है। उसकी आत्मा की शांति के लिए अमुक दिन तीए की बैठक और इस तारीख पर मृत्यु भोज का आयोजन किया गया है। यह भी गौर करने वाली हकीकत है कि तीए में गांव के अधिकांश स्त्री-पुरुष, बच्चे शामिल हुए और मृत्यु भोज के दिन भी सभी ने बड़े मज़े से लजीज हलुआ-पूड़ी और तरह-तरह का खाना खाया और जी भरकर तारीफ की। कितनी-कितनी लज्जा की बात है कि भारत में इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों को पूरी तरह से अपना मनचाहा जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं है। राजस्थान तो ऐसी तानाशाही में अव्वल लगता है। तभी तो आज भी ऊंची जाति के कई लोग लड़की और लड़के में अंतर करते हैं। जो लड़की घरवालों की मर्जी और पसंद से शादी करे वो अच्छी और जो अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुने वो बुरी और बदचलन। बेटियों के प्रेम विवाह पर बंदिश लगाने वाले ये रूढ़ीवादी लोग बेटों के प्रति बहुत उदार नजर आते हैं। उनका कहना है कि अभी तो लड़कियों पर यह नियम बरकरार है। लड़कों के बारे में बाद में सोचेंगे। लड़कियां घर-परिवार की इज्जत होती हैं।उन्हें ऐसे आजाद नहीं छोड़ा जा सकता। इस क्रूर भेदभाव को लेकर शासन और प्रशासन तमाशबीन बना है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के मुंह से भी प्रखर विरोध के स्वर नहीं गूंजने पर शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा ही आता है...।
