बहुत से लोगों की यही धारणा है कि पढ़ने-लिखने और कुछ नया करने की एक तयशुदा उम्र होती है उसके बाद तो खुद को रोजी-रोटी के लिए नौकरी और कामधंधे में लगाना-खपाना होता है। यह मानने वाले भी भरे पड़े हैं कि विधाता ने जिन्हें शारीरिक तौर पर अपंग बनाया है, उनके लिए हर काम कर पाना संभव नहीं। ऐसे विद्वानों का निष्कर्ष है कि जीवन कोई प्रयोगशाला तो नहीं कि नये-नये प्रयोगों की झड़ी लगाकर रखी जाए और अपनी खुशियों में व्यवधान डालने के साथ-साथ दूसरों को भी परेशान किया जाए।
सबकी अपनी-अपनी सोच हैं, अपने-अपने विचार हैं। लेकिन अब समय का चेहरा बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता का दौर प्रारंभ हो चुका है। कई लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। खुद को बदलेंगे नहीं तो पाये हुए को खोने का डर सिर पर तलवार ताने खड़ा रहेगा। वैसे भी सभी के लिए सफलता के एक जैसे रास्ते नहीं हैं। हर किसी की जिन्दगी में ऐसे दौर आते हैं जब सब धीमा पड़ जाता है। योजनाएं रुक जाती है, उत्साह ठंडा पड़ जाता है और लगने लगता है कि लोग आगे बढ़ रहे हैं और हम वहीं खड़े हैं। जो इस ठहराव और परिवर्तन को नहीं समझ पाते उन्हें कई अकल्पनीय परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। यह भी सच है कि वर्षों से जिस राह पर चलने की आदत पड़ चुकी हो उसे बदलना या छोड़ना आसान नहीं।
लेकिन जब और कोई चारा नहीं हो तब? सात समंदर पार वाशिंगटन में अब कई लोग 40 की उम्र पार करने के बावजूद दोबारा पढ़ने-समझने के लिए क्लासरूम में लौट रहे हैं। कोई शेफ से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन रहा है तो कोई नई डिग्री लेकर खुद को और ज्यादा कुशल साबित करना चाहता है। इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो स्कूल के बाद कॉलेज नहीं गये थे वे भी अब पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं, ताकि डिग्री हासिल कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशन स्टैटीस्टिक्स के मुताबिक अमेरिका में 40 की उम्र के 10 लाख से ज्यादा लोग अंडर ग्रेजुएट या ग्रेजुएट प्रोग्राम में पढ़ रहे हैं। इनमें से कई लोग वाइट कॉलर जॉब्स से ज्यादा सैलरी और जॉब सिक्योरिटी चाहते हैं। वहीं युवा पीढ़ी डिग्री की वैल्यू पर सवाल उठा रही है।
टेक्सास यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर सिंडी वुडी ने 41 की उम्र में मास्टर्स और 47 में पीएचडी की। वे कहती हैं कि, मैं एक अच्छा इन्वेस्टमेंट हूं। उन्होंने पढ़ाई के दौरान टीवी देखना छोड़ दिया, घर के काम परिवार को सौंप दिए और रात व वीकेंड पर क्लास अटेंड की। कम खर्च वाले ट्रेड और अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इनकी सालाना फीस करीब 3 हजार डॉलर होती है। इन क्षेत्रों को एआई और ऑटोमेशन से कम खतरा माना जाता है। जैसे-पाइप लीक होने पर प्लंबर की जरूरत तो होगी ही। पेंसिलवेनिया के एक जॉब ट्रेनिंग प्रोग्राम में 108 छात्रों में से एक चौथाई 40 की उम्र के हैं। वे प्लंबिंग, कारपेंट्री, कंस्ट्रक्शन और हेल्थकेयर जैसे स्किल्स सीख रहे हैं। इनमें से कई ने अपनी पुरानी नौकरी खो दी या बेहतर सैलरी की तलाश में हैं।
विख्यात रिटेल स्टोर चेन डीमार्ट का नाम आपने भी सुना ही होगा। इसके कर्ताधर्ता हैं राधाकिशन दामानी बहुत ही सहज और सरल इंसान हैं। दामानी जी के देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 500 स्टोर हैं। फोर्ब्स द्वारा जारी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में उनका नाम शामिल है। उनका डीमार्ट ग्राहकों को रोजमर्रा की जरूरत का सामान बाजार से कम कीमत पर उपलब्ध कराने का दावा करता है। ग्राहकों को उन पर भरोसा है, इसलिए उनके सभी स्टोर में भीड़ लगी रहती है। दामानी हमेशा सफेद शर्ट और सफेद पतलून पहनते हैं, इसलिए लोग उन्हें प्यार से ‘मिस्टर व्हाइट एंड व्हाइट’ भी कहते हैं। आम लोगों से जुड़े रहने के पक्षधर, सादगी पसंद दामानी को जब लोग मुंबई के चर्चगेट या इंडस्ट्री हाउस के पास बनी पान दुकान पर पान खाते देखते हैं तो उनकी सरलता के मुरीद हो जाते हैं। दरअसल, उन्हें लंच के बाद पान खाना बहुत पसंद है। इसी बहाने अपने पुराने जान-पहचान वालों से मिलना-मिलाना भी हो जाता है। बीकानेर के मारवाड़ी परिवार में जन्मे राधाकिशन के पिता शिवकिशन का जीवन भी अत्यंत संघर्षमय रहा। मुंबई में एक कमरे के घर में रहकर उन्होने दलाल स्ट्रीट में ब्रोकर का काम करते हुए कई उतार-चढ़ाव देखें। जब राधाकिशन 12वीं में थे तब उनके पिता शिवकिशन का निधन हो गया तो पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर व्यवसाय और परिवार की देखरेख को प्राथमिकता देते हुए कम दाम में अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदे और खूब कमाई की। साल 1992 में देश के शेयर बाजार में हाहाकार मचाने वाला हर्षद मेहता कांड सामने आया। तब जहां सैकड़ों निवेशक डूबे। वहीं दूसरी ओर धैर्यवान राधाकिशन थे जिन्होंने गिरते बाजार में खूब कमाई की। उनकी व्यावसायिक यात्रा धीमे-धीमे चलती रही। इधर-उधर के कुछ और काम भी किए। बाजार की नब्ज़ पर गहरी नज़र रखते हुए 2002 में मुंबई के पवई में डीमार्ट का पहला स्टोर खोला और जो सफलता हासिल की उससे अब देश के छठे सबसे अमीर कारोबारी कहलाते हैं। वे ऐसे व्यापारी नहीं जो परिवार और खुद की सुख-सुविधाओं के लिए ही मेहनत करते हैं। उनके ट्रस्ट के द्वारा 56 लाइब्रेरी बनाई गई हैं, जिनसे 50 हजार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। गरीब बच्चों की कम्प्यूटर शिक्षा के लिए 70 से ज्यादा लैब बनवाई गई हैं। पीएम केयर फंड में 100 करोड़ और कोरोना काल में 55 करोड़ का दान कर चुके दामानी हर कुंभ के दौरान डुबकी लगाने के लिए जरूर जाते हैं।
बीस साल के मयूरेश का डॉक्टर बनने का सपना अब पूरा होने जा रहा है। केईएम मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला पाने के लिए उसे खासी मशक्कत और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसकी मानसिक और शारीरिक कमजोरी को देखते हुए माता-पिता ने उसे बहुतेरा कहा-समझाया कि डॉक्टर बनने की जिद छोड़ दो, बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन वह नहीं माना। उसके मन-मस्तिष्क से डॉ.आदिल चागला कभी ओझल ही नहीं हो पाए। हां, वही डॉ. चागला जिन्होंने उसका पूरी तन्मयता और आत्मीयता के साथ तब इलाज किया था जब वह मात्र दस वर्ष का था और उसके मस्तिष्क में ब्रेन ट्यूमर होने से सभी ने उसके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, कुछ डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि वह शायद ही अधिक समय तक जिन्दा रह पाए। मौत धीरे-धीरे उसकी तरफ खिंची चली आ रही है। केईएम अस्पताल के पूर्व न्यूरोसर्जन डॉ.आदिल चागला पहले डॉक्टर थे, जिन्होंने उसे हिम्मत का दामन छोड़ने की बजाय चुनौती का डटकर सामना करने की सीख दी थी। साथ ही भरपूर भरोसा दिलाया था कि वह वक्त शीघ्र आयेगा, जब वह अस्पताल से पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर जायेगा। मयूरेश की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी सफल रही लेकिन शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया। कई महीनों के इलाज के दौरान मयूरेश ने डॉ.चागला की गतिविधियों को बहुत करीब से देखा। उनका मरीजों के प्रति अपनत्व भरा बर्ताव, उनके परिवारों को आश्वस्त करने का प्रभावी तौर तरीका मयूरेश को इस कदर प्रभावित कर गया कि उसने तभी डॉ.चागला को अपना आदर्श मानते हुए दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह भी बड़ा होकर डॉक्टर ही बनेगा और मरीजों की ऐसे ही समर्पण भाव से सेवा करेगा। अस्पताल से लौटने के पश्चात मयूरेश ने अपनी चाहत की आंच कभी भी धीमी नहीं होने दी। यह हकीकत अपनी जगह है कि उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शारीरिक कमजोरी और शासकीय नियमों के कारण 2024 में नीट परीक्षा में 480 से अधिक अंक पाने के बावजूद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला। वर्ष 2026 वह दोबारा नीट परीक्षा में शामिल हुआ और उसे 440 अंक मिले, जिससे दिव्यांग कोटा में उसे केईएम अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। वह दिन दूर नहीं, जब वह सफेद एप्रन धारण कर बीमारों को भला चंगा करते हुए उनके जीवन को नई दिशा देगा।
महर्षि दयानंद विश्व विद्यालय रोहतक में एक कोने में खड़े रंग-बिरंगे फूड ट्रक ‘डैफेटेरिया’ को आप देखते ही रह जाएंगे। खूब हैरान भी होंगे। क्योंकि यह भारत का पहला अनोखा डबल डेकर बस फूड ट्रक कैफे है। जहां पर आधे से ज्यादा स्टाफ मूक-बधिर है। मूक-बधिर यानी वो लोग जो बोल और सुन नहीं सकते। जिन्हें कई बार सक्षम लोगों की अवहेलना और तिरस्कार से अपमानित होेना पड़ता है। शेफ और सर्विस स्टाफ में विशेष रूप से दिव्यांगों को शामिल करने का मात्र यही मकसद है कि वे मान-सम्मान के साथ आजीविका कमाते हुए अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा सकें। वे भी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में कहीं पीछे नहीं हैं। यहां मिलने वाला शाकाहारी भोजन और अन्य व्यंजन लाजवाब हैं। विद्यार्थियों और आगंतुकों की भीड़ देखते बनती है। नितांत खामोशी भरी इस दुनिया में कोई चिल्लाकर आर्डर नहीं देता। सिर्फ और सिर्फ इशारों और हावभाव से बातें होती हैं। इस प्रभावी पहल को धरातल पर उतारने वाले युवा संदीप और साहिल अपनी टीम के साथ व्यस्त रहते हैं। ऑर्डर पर ऑर्डर मिलते रहते हैं और ग्राहकों तक लजीज खाना और अन्य बेहतरीन व्यंजन पहुंचते रहते हैं, जो एकदम किफायती भी हैं। काबिलेगौर यह भी कि दो मूक-बधिर युवाओं का यह स्टार्टअप अब इग्नू के स्लेबस में शामिल हो गया है। मैनेजमेंट के विद्यार्थी इस मॉडल की सफलता को समझ नए आइडिया विकसित करेंगे। ‘डैफेटेरिया’ के मेन्यू कार्ड पर व्यंजनों के नाम के साथ-साथ उनके साइन लैग्वेज बने हुए हैं। जब कोई छात्र या अन्य यहां ऑर्डर देता है, तो वह केवल पैसे नहीं चुकाता, बल्कि अपनी अंगुलियों को मोड़कर ‘थैंक यू’ या ‘वेलकम’ कहना भी सीखता है। काउंटर पर खड़े मूक-बधिर युवा ग्राहकों के इशारों को पलक झपकते समझते हैं और चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान बिखेरते हुए खाना परोसते हैं। इस फूड ट्रक स्टार्टअप के अनोखे मॉडल को इतनी लोकप्रियता मिली है कि इसे राष्ट्रपति भवन में आयोजित पर्पल फेस्ट में भी देश के सामने प्रदर्शित होने का गौरव मिल चुका है।
