‘‘इन दिनों उसमें इतनी अकड़ आ गई है, जैसे वह कहीं का कलेक्टर हो गया हो।’’
‘‘तुम तो खुद को कलेक्टर समझने लगे हो। जमीन पर तो तुम्हारे पैर ही नहीं पड़ते। बस हवा में उड़ते रहते हो।’’ जब कोई एकाएक अपना रंग बदल लेता है। कोई-पद-पदवी पाने के पश्चात दूसरों को वह कमतर समझते हुए मिलना-जुलना छोड़ देता है। अकड़ दिखाने लगता है तो शिकायत के तौर पर खट्टे-मीठे अंदाज में अपने मन की बात भड़ास और शिकायत की सुई चुभोने का अपने यहां कुछ ऐसा ही बहुत पुराना चलन है। कलेक्टर कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होते। जिले में सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें सभी मान-सम्मान देते हैं। कलेक्टर बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने का गौरव हासिल होता है। जिले के पूरे प्रशासन को चलाने वाले कलेक्टर महोदय के कंधों पर कानून-व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, विभिन्न विकास कार्यों तथा आपदा प्रबधन की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ और भी कई जिम्मेदारियां होती हैं। काम करते-करते कब दिन गुजर जाता है, इसका उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें आम और खास लोगों से भी मिलना-जुलना होता है। उनकी समस्याओं का समाधान भी उनके कर्तव्य का प्रबल हिस्सा होता है।
कई बार यह भी देखने में आता है कि गरीब, लाचार जुगाड़ विहीन लोग अत्यंत आवश्यक काम होने पर भी कलेक्टर से मिलने से वंचित रह जाते हैं, जबकि टुटपूंजिए नेता, पत्रकार और दलाल किस्म के चेहरे जिले के प्रशासनिक प्रमुख की चापलूसी कर उनके इर्द-गिर्द खड़े और बैठे नजर आते हैं। झारखंड के गोपालगंज के एक आम नागरिक को अपनी खेती से जुड़े साधारण से काम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर काट कर अपनी कई चप्पलें घिसवानी पड़ीं, लेकिन भ्रष्टाचार, बेइमानी और आराम परस्ती के रंग में रंगे सरकारी तंत्र ने उन्हें निराश कर दिया। उन्हें दु:खी और हताश देखकर किसी शुभचिंतक ने उन्हें कलेक्टर से मिलकर अपनी समस्या से अवगत कराने का सुझाव दिया। वे बड़े बेमन से कलेक्टर महोदय से मिले। उनके आश्चर्य की तब कोई सीमा नहीं रही जब साहब ने अत्यंत सरलता, सहजता और इत्मीनान से उनकी बात सुनी। उनका तुरंत काम भी हो गया। इतना ही नहीं जिलाधीश महोदय ने अधिकारियों से काम में लेटलतीफी और टालने के कारण की सफाई भी मांगी। घर लौटते समय उस उम्रदराज की आंखें खुशी से नम थीं। कलेक्टर से मिलने से पहले उनके मन में तो यह बात गहरे तक घर किये थी कि जब छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी जरूरी काम को करने की फीस मांगते हैं। नहीं देने पर आनाकानी करते हैं तो कलेक्टर तो कलेक्टर हैं। पूरे जिले के मालिक, वो भला कहां आम आदमी की फरियाद सुनने वाले हैं...। इस संपूर्ण चिंताजनक स्थिति-परिस्थिति और पिता की पीड़ा पर स्कूल में पड़ रहे उनके बेटे की पैनी नज़र थी। वह पिता की तकलीफ को लेकर बेहद चिंतित भी था, लेकिन सोचने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था। जब पिता की समस्या का समाधान हो गया और उन्हें चिंतामुक्त तथा हंसते मुस्कराते देखकर संवेदनशील, भावुक और सचेत बेटे के मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि जो कार्य कोई नहीं कर सकते उसे जिलाधिकारी अवश्य कर सकते हैं। ऐसे में तभी उसके मन में जिलाधीश यानी कलेक्टर बनने के सपने ने जन्म लिया। जिसे साकार करने के लिए उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। इस परिश्रमी और जुनूनी बालक का नाम है कुमार आशीर्वाद। आशीर्वाद वर्तमान में नागपुर जिलाधिकारी के पद पर आसीन हैं।
वर्ष 2023 में सोलापुर के जिलाधिकारी के पद को संभालने वाले कुमार आशीर्वाद ने गड़चिरोली में पदस्थ रहने के दौरान दिव्यांग और निराक्षित लोगों को दिव्यांग प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड सीधे उनके घर पहुंचाने की पहल की, उसी से उनकी सच्ची और सार्थक जनसेवा की मंशा का पता चल गया। वर्ष 2025 में सोलापुर में जब बाढ़ ने तांडव मचाया था, तब भी दूर खड़े रहकर निर्देश देने की बजाय वे स्वयं चार-पांच दिन तक बाढ़ प्रभावितों के बीच रहे और एक-एक की समस्या को जाना, समझा और त्वरित समाधान कर राहत प्रदान की। उनके योजनाबद्ध तरीके से काम करने, तुरंत सार्थक निर्णय लेने की प्रभावी समझ की प्रेरक योग्यता की तो केंद्र सरकार ने भी बार-बार सराहना की है, वहीं आम लोगों के दिलों में भी सम्मानजनक स्थान बनाते हुए यह भरोसा जगाया है कि वे जब भी चाहें उनसे मिलने के लिए आ सकते हैं। बिना किसी भेदभाव के उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर हैं। संतरानगरी नागपुर में पदस्थ होने पर उनके ये शब्द थे, ‘‘उपराजधानी होने के कारण नागपुर में चुनौतियां तो बड़ी होंगी, लेकिन सभी को साथ लेकर समन्वय से काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।’’ यह सौ फीसदी सच है कि एक दूसरे के साथ और सहयोग के बिना कोई कार्य सफलता का मुंह नहीं देख पाता। बिना किसी भेदभाव के परिश्रम और लगन से काम करने वाले इंसानों को मान-सम्मान मांगना नहीं पड़ता। उनके सुकर्मों की यशगाथा देखते ही देखते दूर-दूर तक पहुंच जाती है।
हम भारतवासी वादाखिलाफी, रिश्वतखोरी, छल, कपट और तरह के अनाचारों के सतत शिकार होते चले आ रहे हैं। शासन, प्रशासन के हाथों निरंतर छले जाते चले आ रहे देशवासी अब बदलाव चाहते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अथक परिश्रम और ईमानदारी से अधिकांश भारतीयों में जो सच्चे सेवक की छवि बनाई है वो यकीनन प्रणम्य है। फिर भी हमारा देश वैसा नहीं बन पाया है जैसा यहां की संपूर्ण जनता चाहती है।
इन दिनों नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह के नाम की यश गाथा की पताका पूरी दुनिया में लहरा रही है। उनके द्वारा देश हित में उठाये गये क्रांतिकारी कदमों के समक्ष भारत की युवा पीढ़ी भी नतमस्तक है। पड़ोसी देश नेपाल के 35 वर्षीय युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ लेने के तुरंत बाद सभी प्रायवेट स्कूलों को बंद करवा दिया है। उनका मकसद है कि उद्योगपति, मंत्री, अफसर और अमीर-गरीब परिवारों के सभी बच्चे एक साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ें ताकि उन्हें समानता का एहसास हो। वीआईपी संस्कृति के घोर विरोधी बालेन शाह ने मंत्रियों, संत्रियों के वीआईपी काफिले के लिए सड़कों को बंद करने की परपंरा समाप्त कर दिया है। जाति-आधारित राजनीति को त्याग कर सामाजिक न्याय और विकास के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध युवा पीएम शाह ने पिछली सरकारों में हुए भ्रष्टाचारों की जांच की घोषणा कर नेपाल के युवाओं का मन जीत लिया है। वर्ष 2022 में बालेन शाह जब काठमांडु के मेयर थे तब उन्होंने वो कर दिखाया जो अभी तक किसी नेता के बस और नीयत की बात नहीं थी। काठमांडु के बीचों-बीच वर्षों से सिर उठाकर खड़े अवैध शोरूम और भव्य इमारतों पर बुलडोजर चलवा कर पूरे देश को अतिक्रमण मुक्त करने की मंशा प्रकट की थी उससे उनकी जो निष्पक्ष और ईमानदार नेता की छवि बनी उसी ने उन्हें इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करवाया है। राजनीति में पर्दापण करते-करते बालेन शाह ने ठान लिया था कि उन्हें दूसरे नेताओं जैसा नहीं बनना है। यदि उन्हें मौका मिला तो भेदभाव और अन्याय का खात्मा करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। अपने देश नेपाल को भ्रष्टाचारियों के हाथों लुटते देख उनका खून खौल उठता था और रातों की नींद उड़ जाती थी। वे अक्सर जिस तरह से आम लोगों के बीच पहुंच कर उनका हालचाल और तकलीफों से अवगत होते हुए समाधान करते नजर आते हैं उससे लगता ही नहीं कि वे पीएम हैं। बिल्कुल अपना सा आम चेहरा प्रतीत होते है। अपने देश के प्रधानमंत्री को अपने बीच पाकर आम जनता को बेहद खुशी होती है। बालेन शाह चकाचौंध वाली पार्टियों और आलीशान दावतों से दूर रहकर पहले की तरह नेपाली सादा खाना यानी दाल, चावल और सब्जी पसंद करते हैं। उनका कहना है कि मुझे नेपाल के बदलाव का जो अवसर मिला है-उसे मैं यूं ही गंवाने का अपराध नहीं कर सकता।
