कुछ लोगों को चुप रहना नहीं आता। खुद तो कुछ करते-धरते नहीं, दूसरों को ही बस उपदेश देते हुए उन्हें भयभीत करते रहते हैं। जबरन की राय और तानों की विषैली बरसात से हैरान-परेशान करने वालों से यदि सफलता पाने वाले चेहरे घबराकर ठहर जाते तो यकीनन विघ्न संतोषियों की जीत हो जाती, ऐसे में असफलता का मलाल जीवनभर उनका पीछा करता रहता। देश की पहली महिला फायर फाइटर बनी हर्षिणी तो कहती हैं कि तानों ने उनके हौसले का और और मजबूती दी। जब उन्होंने नागपुर में स्थित फायर सर्विसेज कॉलेज में पहला कदम रखा तो लड़के चौंक गए। कुछ लड़कों ने उन्हें रोककर कहा कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। यहां सिर्फ लड़के ही पढ़ते हैं। रिस्की काम तो वही कर सकते हैं। लड़कियों को तो आसान कार्य करने के लिए ऊपर वाले ने धरती पर भेजा है। हर्षिणी को लड़कों की यह बात बहुत चुभी। हर्षिणी में तभी दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह परंपरा को तोड़ते हुए सच्ची योद्धा बनकर दिखायेगी। कुछ अड़चने आईं लेकिन अंतत: उन्हें एडमिशन मिल गया। जैसे ही क्लास शुरू हुई तो उन्हें देखने के लिए पूरा ब्वाइज हॉस्टल जमा हो गया। उन्हें लगा था कि लड़की असहज होते हुए अपना निर्णय बदल लेगी। ट्रेनिंग के दौरान भारी सामान के साथ दौड़ लगानी होती तो लड़के पलटकर देखते कि वह गिरी है या नहीं। उन्हें हर्षिणी के गिरने-फिसलने का बेसब्री से इंतजार रहता। हर्षिणी ने साढ़े तीन साल कड़ी ट्रेनिंग के दौरान एक भी छुट्टी नहीं ली, जबकि लड़कों के साथ उलटा था। जब तब छुट्टी लेते रहते थे। हर्षिणी की मेहनत रंग लाई उन्हें ओएनजीसी में फायर फाइटर पद की नौकरी भी मिल गई। पहली पोस्टिंग गुजरात के मेहसाणा में हुई। हर्षिणी वर्तमान में कोलकाता में डीजीएम फायर सेफ्टी के पद पर कार्यरत हैं। घर से बाहर निकलकर काम कर रही महिलाओं के लिए उनका संदेश है कि अपने महिला होने को कभी भी ढाल न बनाएं। मैं अकेली कैसे करूंगी, कैसे जाऊंगी, घरवालों को कैसे मनाऊंगी आदि बातों को अपने करियर की ग्रोथ की राह में किसी भी हालत में आड़े न आने दें।
देश की पहली लाइन वुमन बब्बुरी सिरीशा ने जब दसवीं के बाद अपने मामा की सलाह पर आईटीआई में इलेक्ट्रिकल ट्रेड चुना तो उनसे कहा गया कि कोई और आसान सी राह पकड़ लो। क्लास में 27 लड़के हैं, अकेली लड़की हो। तुम्हें परेशान करके रख देंगे। इतना ही नहीं दो साल की पढ़ाई के बाद परीक्षा से पहले फरमान सुनाया गया कि तुम एलिजिबल यानी सक्षम नहीं हो। यह तो पुरुषों का क्षेत्र है। बब्बुरी की तो जिद थी कि उन्हें डटे रहना है। वे अदालत पहुंची केस किया, तीन साल तक लड़ाई चली। 18 फीट के खंभे पर फुर्ती से चढ़कर दिखाया। तब कहीं जाकर परीक्षा की अनुमति मिली। फिजिकल टेस्ट के लिए सिरीशा रोज एक्सरसाइज और खंभे पर चढ़ने की प्रैक्टिस करतीं। लोग घूरते, सवाल करते, पर वे कहती, ‘अपने काम पर ध्यान दो। मेरे हौसले को कमजोर करना तुम लोगों की बस की बात नहीं।’ टेस्ट चार तरह के खंभों पर था, उन्होंने रफ पोल पर अभ्यास किया था। एक दिन पहले पता चला कि सेंटर पर स्मूथ पोल है। घबराहट हुई, फिर संभली और टेस्ट पास किया। 2022 में सिरीशा ने बतौर लाइन वर्कर जॉइन किया। कंपनी में उनसे पहले कोई महिला इस पद पर नहीं थी। फील्ड में जातीं तो लोग पूछते कि आप सच में लाइन वर्कर हो? फिलहाल उनके पास ऑफिस वर्क है। लेकिन अगले ट्रांसफर में फील्ड में जाना चाहती है।
अजय कुमार रस्तोगी सरकारी कॉलेज में पच्चीस साल तक लेक्चरर की नौकरी करने के बाद रिटायर हुए तो उलझन के शिकार हो गये। क्या करें, कहां जाएं? बच्चे विदेश में हैं। बीवी रहीं नहीं। अकेले रहने के अलावा कोई और चारा नहीं था। एक रात लिमिट से ज्यादा शराब पीकर घर लौट रहे थे तो पुलिस के लपेटे में आ गए। सारी रात पुलिस स्टेशन बैठना पड़ा। वहीं उन्हें अपनी मां की याद हो गई जिन्हें उन्होंने वर्षों पहले अपने पास रखने की बजाय वृद्धाश्रम में रखना बेहतर समझा था। कई सालों से अपनी जननी से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाये थे। पुलिस थाने में उन्हें काफी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा। जब खाकी वर्दीधारियों को पता चला कि महाशय कॉलेज में पढ़ा चुके हैं तो उन्होंने उनका खूब मजाक उड़ाया। रस्तोगी शर्म के मारे पानी-पानी हो गये। उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अब शराब नहीं पीने की कसम खा ली। कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए दरोगा की जेब गर्म की और सीधे मां को लेने वृद्धाश्रम चल दिये। तब तक उनकी माताश्री 87 वर्ष की हो चुकी थीं। रस्तोगी ने सब कुछ भूलभालकर अपनी उम्रदराज माताजी की तन्मयता से सेवा करनी प्रारंभ करते हुए अपना अधिक से अधिक समय उनके साथ व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें बार-बार खुद पर गुस्सा भी आता कि अपनी संकीर्ण सोच और स्वार्थ की वजह से अपनी मां को अपने पास नहीं रख पाये। बेचारी वृद्धाश्रम में ही बूढ़ी हो गईं। अच्छे-भले बेटे के होने के बावजूद उन पर क्या गुजरी होगी? छह साल तक उन्होंने तन-मन-धन से मां की देखरेख की। उनकी बची-खुची चाहतों को पूरा किया। इधर-उधर घुमाया फिराया। वर्षों तक बेटे से दूर रहीं उम्रदराज मां ने अपने बेटे को भरपूर आशीषें दीं और छह साल बाद यानी 93 की उम्र में दुनिया से विदा हो गईं। रस्तोगी साहब को झटका लगा। मां के चल देने से एक अजीब से खालीपन ने फिर उन्हें घेर लिया। ऐसे में उनको याद आया कि बचपन में कभी उनकी लेखक बनने की प्रबल इच्छा थी, जो नौकरी और घर परिवार चलाने की जद्दोजहद में ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद उन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया। आठ-दस वर्षों में कहानी, कविता और व्यंग्य की रचनाओं के दस संग्रह प्रकाशित हो गये। साहित्य जगत में डंका बजने लगा। उनकी दो कृतियां राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। अब तो उन्होंने अपने घर के बाहर एक अलमारी बनवा कर लाइब्रेरी भी बना दी है, जहां विभिन्न विषयों की सैकड़ों किताबें उपलब्ध है। पढ़ने-लिखने के शौकीन लड़के-लड़कियां, बुजुर्ग बिना किसी झिझक के लाइब्रेरी में आते हैं और अपनी मनपसंद किताब को खोलकर पढ़ने बैठ जाते हैं। अजय कुमार रस्तोगी का भी बचपन का शौक पूरा हो गया है और अब उनका समय भी बड़ी आसानी से कट रहा है।
अमेरिका के शहर डेलावेयर में रहती हैं 108 वर्षीय सुसान यंग ब्राउन। किसान परिवार में पली बढ़ी सुसान ने तीस वर्ष तक बच्चों को पढ़ाया। पूरे मन से नौकरी बजाने के बाद 1977 में रिटायर होने के पश्चात चिंताग्रस्त हो गईं कि खाली रहकर क्या करेंगी? उनके लिए तो एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो जाएगा। अधिकांश करीबी रिश्तेदार स्वर्ग सिधार चुके थे। पति भी कब के चल बसे थे। ऐसे में उन्होंने अपने घर में ही आसपास के बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ कर खुद को व्यस्त कर लिया। ऐसे में उनका समय अच्छी तरह से व्यतीत होने लगा। वर्तमान में वे 108 साल की है, अभी भी जवान हैं। तन से भी और मन से भी। रोज जल्दी उठकर व्यायाम करती हैं। घंटों पैदल चलती हैं और खुद ही कार चलाते हुए बाजार खरीदी करने जाती हैं। उनकी जिन्दगी के तीन बड़े सबक हैं, पहला उम्र बढ़ने के साथ शरीर को बिल्कुल निष्क्रिय कर देना सही नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार रोज कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहें। दूसरा, सीखना कभी बंद मत करें । तीसरा, अपने पैरों पर खड़े रहने की कोशिश कीजिए। अपना काम स्वयं करने की आदत को हमेशा बरकरार रखें। उन्होंने एक प्रेरक किताब भी लिखी है, जो बेस्ट सेलर में शुमार है। उसमें वे लिखती हैं कि दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए अनुशासित जीवन शैली, संतुलित खान-पान और मानसिक सक्रियता आवश्यक है। अपनी नींद को दवा जैसा महत्व दीजिए। रोज लगभग एक ही समय पर सोएं-जागें। रात में मोबाइल या अन्य स्क्रीन लंबे समय तक देखना बंद करें। ब्रेन की हेल्थ के लिए अपनी थाली को सभी आहारों से भरपूर रखिए। थाली में हरी सब्जियां, फल डालें, साबुत अनाज, मेवे और पर्याप्त प्रोटीन रखें। ज्यादा प्रोस्टेड खाना खाने से परहेज करें।
लंबी उम्र के लिए मशहूर जापान के वृद्धों ने तो नया रिकॉर्ड बना दिया है। देश में 100 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक लाख के पार पहुंच गई है। इनमें महिलाओं की संख्या करीब 88 प्रतिशत है। देश की सबसे ज्यादा उम्र की महिला का नाम किशिमोटो फुयो है। उनकी उम्र करीब 114 साल है। वो राजधानी क्योटो में रहती हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा उम्र के पुरुष का नाम कुमामोटो है, जो 112 साल के हैं। कुमामोटो हिकारू में रहते हैं। जापान के एक उम्रदराज चिकित्सक मानते हैं जापानी लोगों की लंबी उम्र के लिए कई चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हेल्दी डाइट और एक्टिव लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें शामिल हैं। जापान में लोगों के खान-पान में मुख्य तौर पर मछलियां, सब्जियां और चावल शामिल होते हैं। कई पश्चिमी देशों की तुलना में यहां के खाने में सैचुरेटेड फैट कम होता है। बुजुर्गों की लंबी उम्र होने में और भी कई फैक्टर शामिल हैं। इनमें रोजाना पैदल वॉक करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट्स का इस्तेमाल करना और रोजाना साइकिल चलाने जैसी चीजें शामिल हैं।
