अपने देश भारत की लगभग एक तिहाई आबादी नाबालिग है। यहां 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे करीब पच्चीस फीसदी हैं फिर भी बच्चों की पता नहीं क्यों ज्यादा चिंता-फिक्र नहीं की जाती? हां, ढोल जरूर पीटे जाते हैं कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। राष्ट्र निर्माण में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आनेवाले समाज और राष्ट्र की नींव हैं। इन्हीं को आगे जाकर नेता, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाजसेवक, उद्योगपति आदि बनना है। बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की हम सबकी जिम्मेदारी है। हमारे देश में हर वर्ष 14 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ जो बाल दिवस मनाया जाता है उसका मूल अर्थ और संदेश यही है कि भारत माता का हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा, सेहत, देखरेख और प्यार का अधिकारी है। कलमकार की नज़र जब गली-कूचों, चौराहों, होटलों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मंदिरों, मदिरालयों, अस्पतालों आदि के ईद-गिर्द छोटे-छोटे बच्चों को कचरा बीनते और भीख मांगते देखती है तो यह प्रश्न तीर की तरह तन जाता है कि यह बच्चे कौन हैं? यकीनन अमीरों की संताने तो नहीं हैं। उनकी औलादे तो तरह-तरह की चॉकलेट, पिज्जा खाने और खिलौने के लिए जन्मी हैं। बदनसीब तो गरीबों के बच्चे हैं, जिन्हें जानवरों की तरह भटकना पड़ता है। स्कूल तो इनके लिए सपना है। ढंग का खाना भी इनके नसीब में नहीं लिखा है। उसे भी ये कचरे में तलाशते हैं। देश के अधिकांश शहरों में डंपिंग यार्ड बनाये गये हैं, जहां पर पूरे शहर की गंदगी जमा होती है। गरीबों के बच्चे इनके इर्द-गिर्द बनी झुग्गी-झोपड़ियों में अपने गरीब मां-बाप के साथ रहते हैं। यह भी जान लें कि कचरे के पहाड़ों के आसपास सक्षम लोग जाना ही नहीं चाहते। यहां से उठने वाली दुर्गंध की वजह से सांस ले पाना मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने काम का कचरा तलाशते देखे जा सकते हैं। इस कचरे में प्लास्टिक की खाली बोतलें, घरों का बेकार सामान, अस्पतालों के द्वारा फेंके गए दास्तानें, इंजेक्शन, फटे पुराने कपड़े, पेन-पेंसिल और किताब, कॉपियां, तौलिए के साथ-साथ कंडोम जैसी बेकार की बहुत सी चीजें होती हैं। गरीब बच्चों की खोजी निगाहें यहां से वो सामान तलाश ही लेती हैं, जिन्हें कबाड़ी चंद सिक्कों में खरीद लेते हैं। बरसात में तो डंपिंग यार्ड में पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों की वजह से डेंगू, मलेरिया जैसे जानलेवा बीमारियों का खतरा होता है। लेकिन गरीबों के बच्चे इसकी परवाह नहीं करते। उनके लिए घर-परिवार तथा खुद के पेट की आग को शांत करने के लिए यही आसान रास्ता है।
विख्यात कवयित्री अनामिका की कविता की यह पंक्तियां बरबस याद हो आती है :
‘‘उन्हें हमेशा जल्दी रहती है,
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े-बड़े डग भरते
चलते हैं वो तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूल जाता है उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का!
बोरियों में टनन-टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ रीढ़ से
कभी-कभी कहती है,
कैसी हो? कैसा है मंडी का हाल?’’
नाबालिगों को चोरी-चक्कारी, हेराफेरी के साथ-साथ और भी कई गंभीर अपराध करने के बाद पुलिस पकड़ में आते देखना तो अब आम हो गया है। हाल के वर्षों के दौरान जिस तरह से नाबालिगों ने बलात्कार और हत्या के आरोप में पकड़े जाने पर मीडिया की सुर्खियां बटोरते हुए मां-बाप को भी कलंकित किया है। उस पर जितना भी लिखा जाए, कम है।
हिंदुस्तान का कानून दहाड़-दहाड़ कर कहता है कि बाल मजदूरी अपराध है। लेकिन कई पटाखों, बारुद की फ्रैक्ट्रियों, ईंटभट्टों, शराब कारखानों तथा मंत्रियों-संत्रियों के आलीशान घरों में छोटे-छोटे बच्चे आपको खून पसीना बहाते दिखाई दे जाएंगे। फिल्मों, टीवी तथा विज्ञापनों में बाल कलाकारों से जबरन अभिनय कराकर उनके शोषण के सच से जागरूक भारतीय खूब-खूब वाकिफ हैं। मेरे देखने में तो यह भी आया है कि महाराष्ट्र और विदर्भ के कई धनाढय परिवार खास तौर पर छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश की कम उम्र की लड़कियों को मोटी पगार का प्रलोभन देकर अपने घरों पर बर्तन, झाड़ू और विभिन्न कार्यों को कराने के लिए लाते हैं और मनमाने तरीके से काम करवाते हैं। उनसे काम करवाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती। इन्हें पढ़ा लिखाकर शिक्षित बनाने तथा बेहतरीन पगार देने का लालच देकर लाया जाता है। मां-बाप भी बहुत आसानी से झांसे में आ जाते हैं। लेकिन अधिकांश मालिक दो-चार महीने में ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दुष्टता उतर आते हैं। उन्हें आराम करने का समय ही नहीं दिया जाता। बस काम ही काम। कैदी की तरह जीने को विवश कर दी गई बच्चियों पर बलात्कार किये जाने की खबरें उनकी नीचता का पर्दाफाश करती रहती हैं। बाल श्रमिकों की तस्करी की खबरें भी किसी से छिपी नहीं हैं। जिला बाल कल्याण विभाग एवं संरक्षण विभाग तथा पुलिस को समय-समय पर छापेमारी कर बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। बच्चों से बड़ी बेशर्मी के साथ मेहनत, मजदूरी कराने वाले दबंग किस्म के शहरी छाती तान कर खड़े हो जाते हैं कि यह बच्चे अपने परिवार की सहमति से काम करते हुए अपने असहाय माता-पिता की सहायता कर रहे हैं। इस पर किसी को भी आपत्ति दर्शाने का कोई अधिकार नहीं। ऐसा भी देखने में आता है कि कम उम्र के घरेलू नौकरों को अपना रिश्तेदार बताकर बाल कल्याण विभाग की आंखों में धूल भी झोंकी जाती है। असहाय, लावारिस बच्चों की देखरेख और सुरक्षा को लेकर सरकारी कोशिशें की तो जाती हैं लेकिन हकीकत हमारे सामने है। हर बच्चे के हाथ में किताबें हों, खिलौने हों, वे स्वस्थ रहें उन्हें कोई बीमारी न घेरे, इसी सोच और संदेश को प्रचारित और बलवति करने के लिए हर वर्ष 13 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया तो जाता है, लेकिन शासकीय और प्रशासकीय आधे-अधूरे प्रयास प्रशंसा के तो कतई काबिल नहीं। उलटे हमारे समाज में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिनसे छोटे-छोटे बच्चों की दुर्दशा देखी नहीं जाती। उनकी पहल शासन और प्रशासन को मात देती नज़र आती है। यहां मैं 31 वर्षीय रिक्की राज का खास तौर पर उल्लेख करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। रिक्की अपनी परोपकारी संस्था ‘छोटू फाउंडेशन’ के माध्यम से शोषण, अनिश्चितता, गरीबी और भूख की अथाह मार झेलते बच्चों के जीवन को नई दिशा देकर सुधार रहे हैं। हवा-हवाई भाषणबाजी करने वाले नेताओं को आईना दिखाते रिक्की राज के ‘छोटू फाउंडेशन’ के द्वारा अभी तक पांच हजार से अधिक बच्चों के जीवन को संवारते हुए समाज की मुख्य धारा में लाया जा चुका है। अभावग्रस्त आधा-अधूरा बचपन जीते बच्चों के कल्याण का विचार रिक्की के मन में आखिर कैसे आया? वर्ष 2017 में वह उत्तरप्रदेश के आगरा हाईवे से गुजर रहे थे। तभी कुल्फी बेचते एक बच्चे पर उनकी नजर पड़ी। वह कुल्फी बेचने में इस कदर खोया था कि एक तेज रफ्तार बस उसे कुलचते हुए आगे निकल गई। बच्चा सड़क पर लहुलूहान होकर कराहता रहा। किसी ने उसको उठाकर अस्पताल ले जाने की पहल नहीं की। सभी एक-दूसरे का मुंह देखते रहे और बच्चा अंतत: मर गया। आंखों देखे इस दर्दनाक हादसे ने रिक्की की सोच ही बदल दी। वहीं खड़े-खड़े उन्होंने निर्णय ले लिया कि लाचार बच्चों के लिए कुछ सार्थक करना है। 2018 में छोटू फाउंडेशन की स्थापना कर रिक्की ने खुद को असहाय बच्चों के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि, मैंने विभिन्न अभावग्रस्त क्षेत्रों में घूम-घूमकर सर्वे करते हुए पाया कि कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अमूमन नशे की लत लग जाती है। इसकी वजह से अधिकांश तीस से चालीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मौत का निवाला बन जाते हैं। यह नशे की लत और गरीबी ही है, जो बच्चों को गलत राह पर ले जाकर अपराधी बना रही है। ‘छोटू की पाठशाला’ में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ सेहतमंद रखने के दायित्व को भी प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है। स्वास्थ्य की नियमित जांच की जाती है। उनके कौशल विकास पर भरपूर जोर दिया जाता है। उन पर हमेशा नजर रखी जाती है कि कहीं वे फिर से गलत राह के राही न बन जाएं। छोटू फाउंडेशन के कर्ताधर्ता रिक्की राज की सजगता और ईमानदारी को देखते हुए अनेकों परीचित, दोस्त और रिश्तेदार भी उनकी मदद करने के लिए आगे आने लगे हैं। इसमें अधिकतम मदद तो सोशल मीडिया के जरिए क्राउड फंडिंग से मिलती चली आ रही है। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से शुरू हुआ ‘छोटू फाउंडेशन’ अब नोएडा, ग्रेटर नोएडा के अलावा बिहार और राजस्थान में भी जोर-शोर से सक्रिय है। हमारे देश के हुक्मरान 2047 तक पूर्णतया विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जहां-तहां गगनचुंबी इमारतें, मेट्रो, एक्सप्रेस-वे और अरबो-खरबों का निवेश किया जा रहा है। लेकिन इन बच्चों की किसी को कहीं कोई चिंता नहीं! किसी भी जागरूक भारतीय से यदि सार्थक विकास की परिभाषा पूछें तो वह यही कहेगा कि जब तक देश का हर छोटा-बड़ा नागरिक सुरक्षित और सम्मानित नहीं, तब तक ऐसा विकास आधा-अधूरा है। असली विकास तो तभी होगा, जब इस देश के बचपन को बदहाली से छुटाकारा मिलेगा। हर छोटे-बड़े नागरिक की सेहत और जेब मजबूत होगी। उसे किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।
