यात्राएं तो बहुत कीं। यहां-वहां खूब घूमा। लेकिन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर की यात्रा ने वाकई आंखें खोल दीं। यहां के चप्पे-चप्पे ने बार-बार यह भी कहा कि तुम कहने को तो पत्रकार हो लेकिन आधे-अधूरे हो। नाममात्र के साहित्यकार हो। शब्दों से खिलवाड़ कर हवा में उड़ते रहे हो। पढ़ने-सुनने और प्रत्यक्ष देखने में जमीन-आसमान का अंतर है, जिसे जानने-समझने की तुमने कोई गंभीर कोशिश ही नहीं की। तुम सिर्फ दिखावा करते हो। अपनी मनचाही सुविधा के अनुसार आसान राह चुनते आये हो। सच देखने, सुनने और कहने का जो साहस होना चाहिए, वो अभी तक तुम में पूरी तरह से नहीं आ पाया है।
पोर्टब्लेयर की ऐतिहासिक जेल स्थली जिसे ‘कालापानी’ भी कहा जाता है, वहां पर जब मैं पचासों स्त्री-पुरुषों के साथ गुलामी के दौर की हर घटना और प्रताड़नाओं के मूक साक्षी पीपल के पेड़ की जुबानी स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान की दास्तान सुन रहा था तो मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे। यही हाल उन सभी का था, जो ऐतिहासिक जेल में हर शाम होने वाले आडियो-विजुअल शो को देखकर विस्मित और भावुक हो रहे थे। भारत के विख्यात दिवंगत अभिनेता ओमपुरी की जबरदस्त बुलंद आवाज में क्रांतिकारियों पर ढाये गये जुल्मों का वर्णन सुनती कॉलेज की छात्राएं सायरा और संगीता धीमे-धीमे बतिया रही थीं कि हमें तो इस काले इतिहास की जानकारी ही नहीं थी। आजादी को पाने के लिए कितने-कितने लोग शहीद हो गये। फांसी के फंदों पर हंसते-हंसते झूल गए। इतिहास की किताबों में तो उनका कहीं जिक्र ही नहीं। यदि है भी तो नाममात्र का। जहां देखो वहां मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू और उनकी मंडली ही ऐसे छायी है जैसे देश को आजादी दिलवाने में और किसी बलिदानी का योगदान ही नहीं था।
क्रांतिवीरों पर अंग्रेजों के घोर अत्याचार की दिल दहलानेवाली हकीकत से रूबरू होती कई महिलाओं की ‘आंखें नम हो रही थी’। उनकी सिसकियां भी सुनाई दे रही थी। इन सिसकियों को भूल पाना मेरे लिए तो कतई आसान नहीं। बिल्कुल वैसे ही जैसे सेलुलर जेल की वो छोटी-छोटी अनेकों कोठरियां जहां गोरे अत्याचारियों ने आजादी के दिवानों को वर्षों तक कैद करके रखा था और बेइंतहा अमानवीय यातनाएं दी थीं। उन्हीं हजारों क्रांतिवीरों में शामिल थे वीर सावरकर यानी महान योद्धा विनायक दामोदर सावरकर। उन्हें 4 जुलाई 1911 को राक्षसी प्रताणनाएं देने के लिए 4 जुलाई 1911 को इसी सेलुलर जेल में लाकर तीसरी मंजिल पर स्थित एक छोटी तंग कोठरी में रखा गया था। आततायी-आतंकी ब्रिटिश सरकार द्वारा वीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को दो आजीवन कारावास अर्थात कुल 50 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। करीब 15 गुणा 8 फीट की इस कोठरी में तीन मीटर की ऊंचाई पर एक छोटा सा रोशनदान था, जहां से जेल का फांसी का फंदा साफ-साफ दिखायी देता था। जुल्मी अंग्रेजों को तो यही भ्रम था कि वीर सावरकर अपने साथी क्रांतिवीरों को फांसी के फंदे पर झूलते देखकर विचलित हो जाएंगे। अंदर तक घबरा जाएंगे उनका मनोबल टूट जाएगा। वीर पुरुष को अन्य कैदियों से भी मिलने नहीं दिया जाता था। अत्याधिक परेशान करने के उद्देश्य से उनसे जेल में बैल की तरह कोल्हू से नारियल और तिल का तेल निकलवाया जाता था। प्रतिदिन कम अज़ कम 30 पाउंड तेल निकालना जरूरी होता था। इस निर्धारित कोटे में यदि कमी होती थी तो उन्हें बड़ी बेरहमी से कोड़ों से पीटा जाता था। यही आतंकी बर्ताव यहां लाये गए अन्य सैकड़ों क्रांतिकारियों के साथ होता था। वीर सावरकर चिंतनशील देशभक्त थे। उन्हें लिखने और पढ़ने का बहुत शौक था। जेल में जब कागज़ और कलम की उनकी मांग को पूर्णतया अस्वीकार कर दिया गया, तो उन्होंने जेल की दीवारों को ही कागज़ और अपनी डायरी बनाते हुए कांटों और कीलों से अनेकों ओजस्वी कविताएं और महाकाव्य लिख डाले। उन्हें खाने के लिए बेहद घटिया भोजन दिया जाता था, जिसमें कीड़े और कंकर मिले होते थे। पीने का पानी भी बेहद गंदा और खारा होता था। कई-कई दिनों तक उन्हें भारी लोहे की बेड़ियों और हथकड़ियों में जकड़कर रखा जाता था। सेलुलर जेल में पांच-छह वर्ष तक दरिंदों की यातनाएं झेलने वाले ‘अंडमान टाइम्स’ के संपादक ने लिखा, ‘‘स्वतंत्रता सैनानियों से कोड़े मार-मारकर काम करवाया जाता था। पसीना-पसीना और लस्त-पस्त हो जाने के बाद भी खाने के लिए बार-बार तरसाया जाता था। ऐसे में जब उन्हें बहुत भूख सताती और पेट में आग लग जाती तो यदि उस दौरान आसपास कहीं मेंढक नजर आता तो उसे एक झपटे से पकड़कर जिन्दा ही चबा लेते थे। कई बार तो आरामशीन का भूसा खाकर अपनी भूख शांत करनी पड़ती थी। जेल का निर्माण इस तरह से किया गया कि कैदी एक दूसरे से मिल ही नहीं पाते थे। शौच तक के लिए कैदियों को स्वीकृति लेने के लिए घुटनों के बल चलकर जमादार के पास जाना पड़ता है। उसका मन होता है तो इजाजत देता है। नहीं तो बुरी तरह से डांट-फटकार लगा कर भगा देता। सेल में रखा गया बर्तन इतना छोटा होता था कि रात के समय कैदी एक बार भी पेशाब नहीं कर सकते थे। पहनने के लिए कपड़ों के नाम पर उन्हें टाट-बोरा नसीब था।
दूसरी तरफ जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गांधी थे, जिन पर कहीं न कहीं अंग्रेज बहुत मेहरबान थे। उन्हें वक्त पर खाना मिल जाता था। गांधी को ‘आगा खान महल’ तो नेहरू को ‘अहमदनगर किले’ या अन्य विभिन्न जेलों में नज़रबंद करके रखा जाता था। जहां पर उन्हें लिखने-पढ़ने की सभी सुख-सुविधाएं मिलती थीं। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत की खोज) तथा अपनी आत्मकथा के कई हिस्सों को जेलों में रहकर बड़े आराम से लिखा था। जेल में रहते हुए ही नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को अनेकों पत्र लिखे और बड़े आराम से खूब अध्ययन भी किया। स्वतंत्रता मिलने के बाद नेहरूजी को ही भारतवर्ष का पहला प्रधानमंत्री बनने का सुअवसर मिला, जबकि अनेकों स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को वो सम्मान ही नहीं मिला, जिसके वास्तव में वे अधिकारी थे। उस दौरान बढ़चढ़कर यही प्रचारित किया गया कि देश को आजादी तो केवल गांधी-नेहरू और उनकी प्रिय मंडली ने दिलवायी है। मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों की बदौलत ही बड़ी मुश्किल से देश स्वतंत्र हो पाया है। महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त जिन्हें अग्रेजों ने अंडमान की सेलुलर जेल में रखकर अमानवीय यातनाएं दीं, उनसे और उन जैसे सैकड़ों क्रांतिवीरों की अवहेलना तथा स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाणपत्र मांगा गया। बटुकेश्वर दत्त को तो आजाद भारतवर्ष में ही कई कष्ट झेलने पड़े। वे ताउम्र आर्थिक संकटों से जूझते रहे। बीमार होने पर अस्पताल में समुचित इलाज तक नहीं मिल पाया।
भविष्य की पीढ़ियों को देश के इतिहास से परिचित करवाने के लिए देश में आपातकाल लगाने वाली जवाहरलाल नेहरू की बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 15 अगस्त 1973 को दिल्ली के लाल किले के पास जमीन के नीचे जो टाइम कैप्सूल (कालपत्र) दबाया था, उसमें भी बताते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार का ही एक तरफा महिमामंडन किया गया था। इंदिरा गांधी की तो यही मंशा थी कि यह कालपत्र 1000 साल तक सुरक्षित रहे लेकिन साल 1977 में जब देश में सत्ता बदली और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस छल-कपट के पिटारे को तुरंत बाहर निकलवाया। ज़रा सोचिए...जो सत्ताभोगी भगतसिंह को आतंकवादी मानते रहे हों और बाकायदा कोर्स की पुस्तकों में भी उन्हें आतंकवादी के तौर पर पेश किया गया हो उनके इरादे कैसे रहे होंगे। महज 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीद भगतसिंह के जज़्बात काबिलेगौर हैं, ‘‘अगर मैं इश्क लिखना भी चाहूं तो इंकलाब लिख जाता हूं।’’ अमर शहीद भगत सिंह को याद करते-करते मुझे वो पल याद आ गये जब हम ‘कालापानी’ की सभी कोठियों को करीब से देखकर बाहर निकल रहे थे। स्त्री-पुरुषों, लड़के-लड़कियों की भीड़ में अपने मन की कहती चार-पांच महिलाओं की शिकायती पीड़ा ही कुछ ऐसी थी कि मैं भी उनकी बातचीत में सहभागी हो गया। उनके कथन दर कथन में प्रश्नों का अंबार था।...‘‘देश को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात जितने भी विश्व विद्यालय, चिकित्सालय, शोध संस्थान, कल्याणकारी योजनाएं, हवाई अड्डे, बाग-बगीचे आदि बने उनका नामकरण लगभग नेहरू, गांधी और उनके परिवार के नाम पर क्यों किया गया? यहां तक कि भारतीय मुद्रा पर भी झटपट, गांधी बाबा की तस्वीर छाप दी गई। सुभाषचंद्र बोस, भगतसिंह, लाला लाजपतराय जैसे अनेकों सच्चे बलिदानी होने के बावजूद सत्ताधीशों को सिर्फ चंद नाम ही याद रहे! हर कहीं बस उन्हीं का एकाधिकार बना रहा। पता नहीं वो दिन कब आएंगे, जब दूसरे बलिदानियों को भी वैसा ही मान-सम्मान और नाम मिलेगा जैसा चंद घरानों को मिलता आया है। देश के विभिन्न प्रदेशों से पोर्टब्लेयर पहुंचीं इन विद्वान नारियों की दिली चाहत दिखी कि भारतीय नोटों पर भगतसिंह भी नज़र आएं, क्योंकि उनकी कुर्बानी बेमिसाल है।
पोर्टब्लेयर जिसेे खास तौर पर ‘कालापानी’ के नाम से जाना जाता है, अंडमान निकोबार द्वीप समूह की राजधानी है। यह भारत का एक केंद्र शासित प्रदेश है, जो बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्रकृति की गोद में सिमटा छोटे-बड़े अनेकों द्वीपों का समूह अंडमान निकोबार एक ऐसा नन्हा सा राज्य है, जो अपनी ही धुन में थिरकता है। एकदम व्यवस्थित साफ सुथरा। कहीं कोई ऐसा-वैसा शोर-शराबा नहीं। ऐतिहासिक सेलुलर जेल जहां यहां पहुंचने वालों को बलिदानी स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, वहीं पर्यटन स्थल के तौर पर भी यहां की हरीभरी धरा और एक से एक समुद्र तट मंत्रमुग्ध कर देेते हैं। एक बार जो यहां आता है, उसका बार-बार यहां आने को जी चाहता है। यहां के समुद्र का स्वच्छ जल, चारों तरफ फैली हरियाली, पक्षियों की चहक-महक के साथ-साथ समुद्र के पारदर्शी पानी में झूमती मटर गश्ती करती मनमोहक मछलियां हर किसी को मस्त करते हुए स्वर्ग के आनंद का जीवंत एहसास कराती हैं। यहां पर कहीं भी अनैतिकता और अश्लीलता के लिए कोई जगह नहीं। यहां के निवासी अत्यंत नेक दिल और बेहद सफाई पसंद हैं। गोवा की तरह यहां पर अय्याशों तथा अय्याशी का मेला नहीं लगता। समुद्र के किसी भी कोने में लड़के-लड़कियों की लिपटा-लिपटी दुर्लभ है। यहां शराब और बीयर की नदियां तो नहीं बहतीं लेकिन नीला समुद्र, ताड़, सुपारी और खुजूर के ऊंचे-ऊंचे पेड़ और सुहावना मौसम सभी को मदमस्त कर देता है। यहां के कच्चे नारियलों का पानी जहां प्यास बुझाता हैं, वहीं इनमें समाहित भरपूर मलाई भूख मिटाते हुए वाकई तृप्त कर देती है। समुद्र की विभिन्न प्रकार की ताजा मछलियां, झींगा और झींगी के साथ-साथ केरल और बंगाल के स्वादिष्ट भोजन आनंदित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। तभी तो इसे मिनी इंडिया यानी छोटा हिंदुस्तान भी कहा जाता है। इस छोटे आकर्षक हिंदुस्तान में प्रशासनिक व्यवस्था दिल जीत लेती है। देश के अन्य प्रदेशों में जहां पानी की छोटी-छोटी प्लास्टिक की बोतलें धड़ल्ले से बेची और प्रयोग में लायी जाती हैं और इस्तेमाल कर शाही ठाठ के साथ यहां-वहां फेंक कर प्रदूषण बढ़ाया जाता है, वैसा चलन अंडमान निकोबार में बिल्कुल नहीं है। यहां तो सिर्फ बड़ी बोतलों में ही पानी उपलब्ध है। यहां के लोग भी इस मामले में अत्यंत जागृत हैं। जहां रहते है वहां साफ और स्वस्थ वातावरण रहे इसका पूरा ध्यान रखते हैं। इसलिए यहां की हवा शुद्ध है, लोग भी खुश, संतुष्ट और प्रसन्न हैं।
पोर्टब्लेयर की सुखद यात्रा के दौरान क्रूज का सफर पर्यटन को और...और रोमांचक और खूबसूरत बना देता है। एक द्वीप से दूसरे द्वीप जाने के लिए एक से एक क्रूज लग्जरी आलीशान होटल का जीवंत एहसास कराते हैं। ऊपर खुला आसमान और ठंडी हवाएं, समुद्र की लहरों के साथ अठखेलियां करती मछलियां .....जितनी बार भी देखो मन नहीं भरता। समंदर की बीचोंबीच लाइव डीजे, म्यूजिक डांस, शानदार बुफे डिनर विभिन्न ड्रिंक तथा बीयर की चुस्कियों के साथ डूबते हुए सूरज को देखना पर्यटकों को ऐसा बांधता है कि विदेश यात्राएं भी फीकी लगने लगती हैं.....
