Thursday, June 4, 2026

आदरांजलि

हमारे देश, दुनिया और समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और उसका लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इसकी वास्तविक तस्वीर सिर्फ सजग पत्रकार ही नहीं प्रस्तुत करते। कवियों, शायरों, गज़लकारों को भी अन्याय, असमानता, अराजकता, बेइंसाफी और इंसानियत की हत्या, क्रोधित और आक्रोशित करती है। सच का आईना दिखाने और जागृति लाने का दायित्व जितनी शिद्दत के साथ कुछ साहित्यकार निभा रहे हैं और सतत निभाते आये हैं, इसके लिए उन्हें कई बार दंडित और अपमानित भी होना पड़ा है। कितनी अजीब और चिंतनीय हकीकत है कि आज के वक्त में अगर किसी की कीमत सबसे ज्यादा घटी है तो वह मनुष्य ही है। हर धर्म के संतों, महात्माओं, ज्ञानी-ध्यानियों को अपने-अपने धर्म के संकट में पड़ने की चिंता सता रही है। कुछ कलमकार बार-बार लिखते चले आ रहे हैं कि धर्म को विभाजन का औज़ार बनाना बंद करो। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। इंसान पहले, बाकी सबकुछ बाद में। हमारे समय के सजग शायर राजीव रेड्डी लिखते हैं, 

‘‘गीता हूं कुरआन हूं मैं, 

मुझको पढ़ इंसान हूं मैं।

जिन्दा हूं सच बोलके भी, 

देख के खुद हैरान हूं मैं।’’


‘‘ये सारे शहर में दहशत सी क्यों है,

यकीनन कल कोई त्यौहार होगा।’’

जिस तरह से देश और दुनिया में दहशत का माहौल बन चुका है। कब कोई पीठ पर छूरा मार दे। भाई को अपने भाई पर भरोसा नहीं। राजेश रेड्डी की चिंता निरर्थक तो नहीं। रिश्ते लहुलूहान हैं, 

‘‘मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,

 बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।’’ 

साहित्य, कला और चिंतन से वास्ता रखने वाला शायद ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जिसने हिंदी गज़ल को पठनीय और सारगर्भित तस्वीर के साथ पेश करने वाले गज़लकार दुष्यंत कुमार का नाम नहीं सुना होगा। गज़ल को प्यार मोहब्बत, आशिकी दिवानगी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने वाले दुष्यंत कुमार ने वर्षों पहले जो गज़ल लिखी थी, उसी की कुछ पंक्तियां,

‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, 

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’’

गौरतलब है कि उपरोक्त गज़ल वर्षों पहले लिखी गई थी। इसका शब्द-शब्द आम लोगों के साथ-साथ शासकों तक भी बार-बार पहुंचता रहा, लेकिन आम आदमी की समस्याओं, पीड़ाओं, दुख दर्द तथा चिंताओं का अंत नहीं हो पाया। धनवान और...और धनपति होते चले गए, गरीबों के हाथों में भीख के कटोरे देखे जाने लगे।  गरीबी, अशिक्षा, शोषण और भेदभाव का पहाड़ आकाश तक जा पहुंचा। लेकिन अधिकांश शासक अंधे और बहरे बने रहे। नेताओं की भ्रमित करने वाली नारेबाजी के स्वर और बुलंद होते चले गये। न जाने कितने शासकों, चतुर-चालाक नेताओं ने क्रांतिकारी सोच वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को बिना उनका नाम लिए दोहराया और लोगों को भरमाया।

 यह सच अपनी जगह है दुष्यंत कुमार एवं अन्य नामी गज़लकारों की कुछ गज़लों का मंत्रियों, नेताओं, पत्रकारों तथा संपादकों ने अपनी बात में वजन लाने के लिए जी भरकर इस्तेमाल किया और करते हैं। मंत्री-संत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री तक दुष्यंत कुमार एवं अन्य कुछ शायरों के शेरों के जरिए अपनी बात कहते देखे गये हैं। दरअसल, यह सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि जब शब्दों का अभाव होता है तब जागृति का बिगुल बजाने और क्रांति का आह्वान करने के लिए कालजयी गज़लों और कविताओं को ही अपने भाषणों में सम्मानजनक जगह देनी ही पड़ती है। 

‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, 

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’’

‘‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।’’

 ‘‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’’ 

ऐसे और भी अनेकों शेर हैं जो मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की गज़लों के अनेकों गुलदस्तों में सजे हैं। डॉ. बशीर बद्र का हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। देश और दुनिया को प्यार, मोहब्बत, एकता और भाईचारे का संदेश देने वाले शायर का 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भरा पूरा घर आग के हवाले कर दिया गया तो उन्होंने लिखा था कि, 

‘‘लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में, 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में!’’

इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं, गज़लें और कविताएं हमेशा के लिए राख हो गईं! इस दिल दहलाने वाले अन्याय और जुल्म के बाद उन्हें मेरठ से डर लगने लगा। भोपाल में जैसे-तैसे उन्होंने नया घर बसाया। बशीर बद्र ने देश के बंटवारे को भी बहुत करीब से देखा था। उनके लिखे इस शेर

‘‘दुश्मनी जमकर करो,

लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो

जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’’

को शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरे मन से सुनाया और कहीं न कही चेताया था कि हद से ज्यादा  नीचे मत गिरो। लेकिन न उन्हें अक्ल आई और ना ही उनके बाद के पाकिस्तानी शासकों की सोच बदली। अपने देश को रसातल में ले जाने के बाद भी भारत की बरबादी के सपने देखना नहीं छोड़ते।

आधुनिक उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए बशीर बद्र अपने आशियाने को राख किये जाने के दर्दनाक मंजर को कभी भी भूल नहीं पाए। फिर भी हर मंच पर वो श्रोताओं को आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधे रहने का संदेश देते रहे। लेकिन धर्म को विभाजन का औज़ार बनाने वाले कम नहीं हुए। 

दु:खभरी हकीकत तो यह भी है कि कुछ सत्ताधीश और सरकारें भी भेदभाव के रास्ते पर चलती दिखायी देती हैं। ऐसे-वैसे अपराधियोंको सबक सिखाने के लिए उनके वर्षों पुराने वैध-अवैध घरों को धराशायी करने लगी हैं। पिछले चार-पांच वर्षों से उनमें बुलडोजर के प्रति कुछ ऐसा लगाव और विश्वास जागा है कि उन घरोंं को भी नेस्तनाबूत करने में देरी नहीं की जाती, जो अपराधी के माता-पिता के नाम पर हैं। उनके दादा-परदादा ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया था। मैं अक्सर सोचता हूं कि जो भी अवैध अतिक्रमण हैं, उन पर तब क्यों नहीं बुलडोजर चलाया जाता है, जब उन्हें खड़ा किया जा रहा होता है। उसके अवैध होने की खबर प्रशासन के चेहरों को तो होती ही है, लेकिन रिश्वत लेकर तब तो मुंह बंद कर लिया जाता है। जब कोई संगीन अपराध करता है तभी ही उसके घरों पर हथौड़े चलना शंकित करता है। भेदभाव और बेइंसाफी का भी आभास कराता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि यदि अपने अवैध कब्जों को बचाए रखना हो तो जुर्म करने के बाद भी पकड़ में न आएं। किसी भी तरह से खुद को बचाये और छुपाये रखें। यह भी तो देखने में आता है कि बुलडोजर के तांडव के शिकार कुछ आरोपी कुछ साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्जत बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक सरकारी तानाशाही उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है। खूंखार अपराधियों, हत्यारों, आदतन बलात्कारियों, जगजाहिर आतंकवादियों की अवैध इमारतें, कारखाने और दुकानें गिराये जाने का तो सभी समर्थन करते हैं लेकिन जिनके परिवार का बेटा, भतीजा, भाई  अराजकता करते पकड़ा जाता है, तो उनके परिवार के साथ किसी भी तरह की बेइंसाफी नहीं होनी चाहिए। उन बेकसूरों को बेघर करने के सिलसिले सजग भारतीयों को बहुत आहत करते हैं। करे कोई और भरे कोई का यह चलन कहीं न कहीं बेहद अन्यायकारी तो है ही...। 

Thursday, May 28, 2026

नज़रिया

 जैसे मैंने सुना वैसे आपने भी कभी न कभी अल्ताफ राजा का वर्षों पहले गाया हर दिल को छू लेने वाला दर्दभरा यह गीत अवश्य सुना होगा,...

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी 

सुबह पहली गाड़ी से 

घर को लौट जाओगे!

जब तुम्हें अकेले में 

मेरी याद आएगी 

आंसुओं की बारिश में 

तुम भी भीग जाओगे...’’ इस सदाबहार गीत की रचना की थी गीतकार ज़हीर आलम ने जो एक भावुक और प्रचार तंत्र से दूर रहने वाले इंसान थे। गरीबी में पले-बढ़े ज़हीर आलम नागपुर में जन्मे थे। बचपन से ही गज़लें और कविताएं ज़हीर आलम को आकर्षित करने लगी थीं। पार्श्वगायक और उम्दा कव्वाल अल्ताफ राजा भी नागपुर की पैदाइश हैं। उनके पिता इब्राहिम इकबाल और मां रानीरूप लता दोनों उस दौर के मशहूर कव्वाल थे। छठवें और सातवें दशक में देश में रात-रातभर जागकर कव्वालियां खूब सुनी जाती थीं। जिस तरह से कवि सम्मेलनों में छाये रहने वाले कवियों के लोग दीवाने थे, वैसे ही कुछ कव्वाल देशवासियों के जबरदस्त चहेते थे। दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली का भी तब गजब का जलवा था। तब टीवी और मोबाइल का आगमन हुआ नहीं था इसलिए लोग फिल्मों, कवि सम्मेलनों तथा कव्वाली से मनोरंजन करते थे। दरअसल वो समय दिल को छूने वाले गीतों, कविताओं और शायरी के नाम था। आज भी पुराने फिल्मी गीत जो सुख-सुकून देते हैं, नये गाने उनके करीब कही नहीं ठहरते।

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी...’’ गीत को गाकर अल्ताफ राजा ने जहां अपार धन और नाम कमाया, वहीं ज़हीर आलम को इस कालजयी गीत को लिखने के बदले मात्र तीन हजार रुपए मिले थे। हालांकि उस समय इतने रुपये भी खासी अहमियत रखते थे। महीनेभर तक खून पसीना बहाने पर जिसे हजार-बारह सौ रुपए नसीब होते हों, उसे महज एक गीत के मेहनताने के तौर पर इतने रुपयों का मिलना अचानक लॉटरी के खुलने जैसा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कलम का जादूगर कपड़ा मिल में काम करता था। तब नागपुर में स्थित एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल में हजारों मजदूर काम करते थे। जब कपड़ा मिलों पर ताले लग गए, तब दूसरे मजदूरों की तरह इस गीतकार को भी महीनों भूख, प्यास और आर्थिक तंगी से लड़ते हुए वर्षों झोपड़ीनुमा घर में रहना पड़ा। इसी महीने छियासी वर्ष की उम्र में नागपुर में स्थित मोमिनपुरा में उनकी मौत हो गई। जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया में गूंजी और अखबारों में छपी, तब अधिकांश शहरवासियों को पता चला कि जिस गीत ने असंख्य लोगों को अपना दिवाना बनाते हुए कैसेट्स कंपनियों और गायक को करोड़ों की कमाई करवाई, उसका रचयिता संतरानगरी में गुमनामी और कंगाली में दिन काटते हुए किसी तरह से भूखा-प्यासा जीता रहा। उसने अपने होने की किसी को खबर ही नहीं होने दी और न ही किसी ने उसकी खबर ली। दरअसल, ज़हीर आलम एक खुद्दार किस्म के गीतकार थे। उन्होंने कभी ढिंढ़ोरा नहीं पीटा कि कालजयी गीत ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ उनके दिल-दिमाग की देन है। इसी गाने ने गायक अल्ताफ राजा को घर-घर पहुंचाया। इसमें कोई शक नहीं कि अल्ताफ को रोमांटिक और दर्दभरे गाने गाने में महारत हासिल थी लेकिन इस गीत ने तो जैसे उन्हें जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि आज भी उन्हें उनकी सदाबहार एल्बम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जाना जाता है।

‘‘कोई दीवाना कहता है,

कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को

बस बादल समझता है।

मैं तुझसे दूर कैसा हूं,

तुम मुझसे दूर कैसी है,

ये तेरा दिल समझता है

या मेरा दिल समझता है।’’

बताने की जरूरत है नहीं कि यह किस हस्ती की लिखी पंक्तियां हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह कुमार विश्वास सिर्फ कविताओं और गज़लों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि धार्मिक प्रवचनकर्ता के तौर पर भी उन्होंने खूब धाक जमायी थी। अपनी शाब्दिक कलाकारी से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों की गहराई में जाकर हर वर्ग के भारतीय जनमानस में जो प्रेरक रस घोला है, वह भी यकीनन अद्भुत है।

अपने प्रभावी अंदाज और सुरीली आवाज से सम्मोहित करने वाले कुमार विश्वास ही ऐसे इकलौते गीतकार, गज़लकार हैं, जिनके गीत युवाओं के साथ-साथ उम्रदराजों के मन-मस्तिष्क में भी बसे हैं। जब कुमार देशी-विदेशी मंचों पर गीत-गज़ल सुनाना प्रारंभ करते हैं तो लोग झूम-झूमकर उनके साथ सुर से सुर मिलाते हुए गाने लगते हैं। डॉ. कुमार खासतौर पर प्रेम, श्रृंगार, देशभक्ति और जीवनदर्शन पर आधारित गीत, गज़ल और कविताएं लिखते हैं। श्रोताओं को अथाह देशभक्ति के रंग में रंग देने वाला उनका गीत, ‘हाथ में तिरंगा हो’ तो बार-बार सुना और सुनाया जाता है। अपनी वाकपटुता और ज्ञान के भंडार की बदौलत एकदम अलग और खास मुकाम बनाने वाले कुमार कवि सम्मेलनों और रामकथा के लिए लाखों रुपए की फीस वसूलते हैं। वैसे यह करिश्मा किसी चमत्कार की देन नहीं, अपितु उनके अथक परिश्रम और विविध कलाओं के सार्थक प्रदर्शन का प्रतिफल है। फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर, उद्योगपति और विभिन्न कारोबारी जब कमाते हैं तो अपनी सभी चाहतों को भी पूरा करते हैं। आम जनता और सच्चे साहित्य प्रेमियों के लाड़ले इस कवि ने कभी अपनी कमाई नहीं छिपाई। इस बहुआयामी शख्सियत ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दिल्ली से लगे आधुनिक नगर नोएडा में आलीशान बंगला बनवाया है। इसके दरवाजे भी सभी के लिए खुले रखे हैं। यह विशाल बंगला किसी महानगर में स्थित फाइव स्टार होटल जैसा ही है, जहां पर पांच सितारा कमरे, स्विमिंग पूल, जिम, स्टीम रूम, स्पा सेंटर, थिएटर और सजने-धजने के लिए सैलून से लेकर और भी बहुत सी ज्ञात-अज्ञात सुविधाएं हैं। खास बात यह भी है कि कवि महोदय चांदी के बर्तनों में खाना खाते हैं। महंगी से महंगी कई आधुनिकतम कारों के मालिक कुमार विश्वास के मौज़ मज़े से जीने और रहने की खबर जब पूरी तरह से बाहर आई तो सोशल मीडिया के साथ-साथ उनकी बिरादरी के लोग भी भौचक्के रह गए। उनके अनुसार, प्रेम-कविता और रामकथा कहने वाले प्रवचनकार को तो सरलता, सहजता और मिट्टी से जुड़े होने का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था लेकिन यह तो हर दर्जे का आराम परस्त ढोंगी और मौज़ मजे का गुलाम निकला। दूसरों को भगवान राम की तरह बनवासी और संतोषी होने का पाठ पढ़ाने वाला चार्टर प्लेन की यात्राएं और चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग का मजा लूट रहा है! यह तो उन आस्थावानों के साथ सरासर छल, कपट और धोखा है, जो इसके प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से दौड़े चले आते हैं। जिन्हें गीतकार के चांदी के बर्तनों में खाना खाने पर आपत्ति है, उन्हें पता होना चाहिए कि मुंबई के सबसे पॉश इलाके अल्टामाउंड रोड में स्थित अपने 27 मंजिला घर ‘एंटीलिया’ में रह रहे मुकेश अंबानी तो सोने के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। उन पर ऐतराज की उंगलियां उठाने की किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई है। 

दरअसल, हमारे यहां साहित्यकार, कलाकार होने का मतलब ही है, गरीबी और बदहाली से जूझता टूटता-फूटता आंसू बहाता इंसान। यह धारणा बना ली गई है कि यदि कोई शख्स, कवि, गीतकार और पत्रकार है तो उसका धन से क्या काम? यदि कोई कलाकार धनपति है, तो कहीं न कहीं वह भ्रष्टाचारी और बेइमान ही होगा। ईमानदारी से तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है। यही वजह है कि विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाले अधिकांश लोग गरीब की छवि के कैदी बनकर रहना पसंद करते हैं। भले ही उनकी परवरिश धन की बरसात और सुख-सुविधाओं के बीच हुई हो लेकिन वे यही प्रचारित करते नहीं थकते कि उन्होंने गरीबी, बदहाली और भुखमरी को बहुत करीब से देखा और भोगा है। उनका यह झूठ उन लोगों को बहुत राहत और संतुष्टि प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में खुद कुछ नहीं कर पाए। जहां से चले थे वहीं के होकर रह गए। उन्हें शून्य से उठे लोगों की तरक्की से जलन होती है। यह भी सच है कि नामचीन हस्तियों की गरीबी और बदहाली की काल्पनिक कहानियां न जाने कितनों की बर्बादी का सबब बनती चली आ रही हैं। कई ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जो साहस और परिश्रम की सीढ़ियों पर पैर रख बहुत ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे हवा-हवाई महानुभावों का अनुसरण करना नहीं छोड़ा जो अपने खोखले दिखावटी उसूलों का परचम लहराकर दूसरों की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं। खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले इन आत्ममुग्धों के बाल-बच्चे अशिक्षित, अधनंगे रहकर भूख से तड़पते-कलपते रहते हैं लेकिन यह तथाकथित सिद्धांतवादी होश में आने का नाम ही नहीं लेते।

Thursday, May 21, 2026

देश तो है मोदी के साथ

पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें बढ़ना कोई नई बात नहीं। समय-समय पर विभिन्न कारणों से इनकी कीमतों में इजाफा होता रहता है। दरअसल नई बात तो है कि भारत के कर्मवीर अथक योद्धा प्रधानमंत्री का अपने प्रिय देशवासियों को काफी सोच-समझकर यह अनुरोध करना कि समय की मांग को देखते हुए वे कम अज़ कम एक साल तक सोना न खरीदें। घर में रहकर काम करें, विदेशी यात्राओं में कटौती तथा पेट्रोल-डीजल बचाएं और खाद्य तेल का कम इस्तेमाल करें। प्रधानमंत्री ने जिस दिन पेट्रोल-डीजल बचाने और अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की बात कही तो उसी दिन से कुछ जन्मजात विरोधी तंज मिश्रित राग अलापने लगे कि दूसरों को उपदेश देने वाले नरेंद्र मोदी पहले खुद पेट्रोल-डीजल की बचत करने का साहस दिखाएं तथा विदेश यात्राओं पर विराम लगाएं। उनकी सुरक्षा के लिए बीसियों गाड़ियों का जो काफिला आगे-पीछे चलता है, उसमें भी कमी लाएं तो मानें। चतुर, दूरदर्शी प्रधानमंत्री को ऐसी प्रतिक्रियाओं और तंजों का पूर्वानुमान था। इसलिए उन्होंने तथा उनके सहयोगी मंत्रियों ने न केवल अपने काफिले में जबरदस्त कटौती की, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी खुशी-खुशी अपनाया। सरकारी खर्चों में कटौती करने के उद्देश्य से कुछ मंत्रियों की साइकिल, मेट्रो ट्रेन तथा बस यात्रा के साथ-साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का मोटर साइकिल पर मंत्रालय जाना अधिकांश लोगों को बहुत अच्छा लगा लेकिन कुछ लोगों के द्वारा यह भी कहा गया कि ऐसे नाटक-नौटंकी, ऊपरी दिखावे तो पहले भी बहुत होते रहे हैं। प्रतीकात्मक अनुशासन और हवा-हवाई नियंत्रण के स्थान पर स्थायी त्याग भावना जब तक नहीं बनेगी तब तक आम भारतीय इसे ढकोसला ही मानते रहेंगे। असंख्य सजग भारतीयों ने अपने प्रिय पीएम की अपील का आदर करते हुए पैदल तथा साइकिल पर चलने के अलावा बस, मेट्रो आदि को अपनाकर पेट्रोल बचाने के अभियान को गति दी। विख्यात फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने अपनी फ्लाइट की टिकट रद्द करवाकर वंदे भारत ट्रेन से जयपुर से दिल्ली का सफर किया। उन्होंने यह भी कहा कि, यह कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, लेकिन अगर हम सब अपनी तरफ से छोटी-छोटी कोशिशें शुरू करें तो उसका यकीनन बड़ा असर हो सकता है। आज के समय में जिम्मेदार नागरिक होने का मतलब सिर्फ बातें करना नहीं, बल्कि अपनी आदतों में बदलाव लाना जरूरी है। देश सेवा केवल सरहद पर नहीं होती। कभी-कभी वह हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में भी दिखाई देती है और दिखाई देनी भी चाहिए। 

जो लोग पीएम की विदेश यात्राओं पर उंगली उठाते हैं उन्हें खबर नहीं या फिर अंधे हैं। दरअसल, उनकी सभी विदेश यात्राएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा होती हैं। अभी जिस तरह के चिंताजनक हालात हैं। अमेरिका-ईरान के बीच के युद्ध ने पूरी दुनिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। तब ऐसे में आपसी रिश्ते मजबूत करना, तेल आपूर्ति सुनिश्चित करना और निवेश लाना भी निहायत जरूरी है। अपने देश के भले के लिए दिन-रात भागते-दौड़ते मोदी जी यदि किसी देश की प्रधानमंत्री को मिठास भरी भारतीय टॉफी उपहार में देते हैं तो विरोधियों के तन-बदन में आग लग जाती है और जबान ज़हर उगलने लगती है!

गौरतलब है कि 1965 में लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। तब अहसान फरामोश, धोखेबाज हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अचानक हिंदुस्तान पर हमला कर दिया था। युद्ध और भोजन के संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने समस्त देशवासियों को स्वेच्छा से एक दिन का उपवास रखने की अपील की थी। सजग देशवासियों ने अपने जुझारू कर्मठ और अत्यंत भरोसेमंद प्रधानमंत्री की अपील का अनुपालन करने में किंचित भी देरी नहीं की थी और उपवास रखना प्रारंभ कर दिया था। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री को भी तमाम जागरूक भारतवासी लाल बहादुर की तरह ही दिलोजान से चाहते और मानते हैं। जिस तरह से शास्त्री जी ने कभी भी अपने परिजनों को अपने पद और प्रतिष्ठा का फायदा नहीं पहुंचाया और पूरी ईमानदारी से देश सेवा की, वैसे ही राष्ट्रसेवक नरेंद्र मोदी की शान-बान और आन है। भले ही कुछ लोग उनके हर जनहित कार्य में खोट और कमी निकालते नहीं थकते। लेकिन वे तो आम भारतीयों के मन में बसते हैं। सभी देशप्रेमी न सिर्फ उनकी पूरे मन से सुनते हैं, बल्कि उनकी कहे का अनुसरण करने में भी इसलिए देरी नहीं लगाते, क्योंकि वे निष्कलंक हैं। यह सच्चाई अपनी जगह है कि भले ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ साथी सत्ता का लाभ उठाते हुए देखते ही देखते मालामाल हो गये हैं और उनकी औलादों ने मोटी कमाई वाली कंपनियां खड़ी कर ली हैं, लेकिन मोदी के भाई-बहन और भतीजे उसी स्थिति में है जैसे पहले थे। दरअसल देश तो केवल और केवल मोदी का ही मुरीद है। 

प्रधानमंत्री की मितव्ययिता, संसाधन-संरक्षण और आत्मनिर्भरता की अपील में अंतत: देश का ही हित समाहित है। उन्होंने काफी सोचने विचारने के पश्चात ही अपने देशवासियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराना जरूरी समझा, क्योंकि अधिकांशसोना,पेट्रोल, डीजल हमें आयात करना पड़ता है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है। विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनियाभर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल है। दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। यानी भारत गल्फ से तेल खरीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपये में नहीं, बल्कि डॉलर में ही करना होता है। कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं। भारत जब सामान खरीदता है तो डॉलर से भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है। ज्यादा बेचने पर यकीनन डॉलर हमारे पास आएंगे और खरीदने पर डॉलर ज्यादा खर्च होंगे। जो देश ज्यादा निर्यात करते हैं, तो उनका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहता है और जो आयात ज्यादा करते हैं, उनका विदेश मुद्रा भंडारा खाली-खाली या नाममात्र भरा रहता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था। यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा किया और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की स्थिति निर्मित हुई, जो कि देश हित में नहीं। पेट्रोल, डीजल, सोना तथा विदेश यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को यकीनन बचा सकता है। मोदी जी की अपील के पश्चात अनेकों सजग आम जनों, व्यापारियों और अधिकारियों ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि अगले एक वर्ष तक, केवल बेटी की शादी या किसी विशेष अपरिहार्य पारिवारिक अवसर जैसी परिस्थितियों को छोड़कर वे सोना नहीं खरीदेंगे। सोना-चांदी के व्यापारियों ने भी भले ही लंबे नुकसान का संदेह जताया और लाखों कारीगरों पर बेरोजगारी का खतरा मंडराने की बात कही लेकिन फिर भी उन्होंने देश हित को ही प्राथमिकता दी। धैर्य और सब्र का दामन थामे इन कारोबारियों का कहना है, ‘सोना नहीं तो चांदी बेचेंगे। किसी कर्मचारी-कारीगर की रोज़ी-रोटी नहीं छिनेगी। सालभर की तो बात है। मोदी जी हैं...सब ठीक हो जाएगा।’ तभी तो आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है और जहां चाह हो वहां राह भी निकल ही आती है की कहावत को उन्होंने बखूबी चरितार्थ करने में देरी नहीं की। संतरानगरी नागपुर के प्रमुख ज्वेलर्स ने सोने के बदले चांदी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए सिल्वरोत्सव के जो विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाये उनमें चांदी की पायल, चेन, मूर्तियों पर विशेष छूट की पताका फहराते हुए ग्राहकों से अधिक से अधिक चांदी के जेवर, बर्तन, कंगन, धार्मिक मूर्तियां, शोपीस आदि खरीदने के लिए प्रेरित करना प्रारंभ कर दिया। वैसे भी सोना अब केवल उच्च मध्यम वर्ग और रईस ही कई ज्यादा खरीदते हैं। अमीरों के यहां तो सोने के भंडार भरे पड़े हैं। देशभर में सोने-चांदी और डायमंड के असंख्य आलीशान शोरूम हैं, जहां हजारों लोग काम करते हैं। लाखों कारीगरों की दाल-रोटी इन्हीं पर टिकी है। पहले जहां नये गहने खरीदने के विज्ञापनों की भरमार थी, अब पीएम की अपील के बाद विज्ञापन की शब्दावली कुछ यूं है, ‘‘जब अपना सोना घर में है तो आयातित सोने पर निर्भर क्यों रहें? अपने घर के सोने को नए और आधुनिक डिजाइनों में बदलें और विदेशी सोने पर निर्भरता कम करने में योगदान दें। अपने पुराने सोने को नए गहनों में एक्सचेंज करें और पाएं पहले से भी ज्यादा खास फायदे। आइए, मिलकर जगमगाते हैं अपने सोने का तेज...’’ 

यह भी सौ फिसदी सच है कि बीते कुछ वर्षों में सोने-चांदी की कीमतों में जिस तरह से बेतहाशा इजाफा हुआ है, ठीक वैसे ही मंत्रियों, अधिकारियों, नेताओं तथा तमाम छोटे-बड़े जनप्रतिनिधियों में बेतहाशा अहंकार आया है। अधिकांश जनप्रतिनिधि आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गये हैं। जब जनता के वोटों से निर्वाचित यह धुरंधर पेट्रोल-डीजल की बचत और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए नियमित बस, मेट्रो, साइकिल, मोटर साइकिल पर आना जाना करेंगे तो लोगों से भी मिलेंगे तो इन्हें पता चलेगा कि आम भारतीय कितने कष्ट में हैं। उनकी समस्याओं को कैसे अनसुना किया जा रहा है। जिन्हें गांव, शहर, प्रदेश और देश चलाने के लिए वोट दिए गये हैं वे तो वातानुकूलित कमरों, कारों का मजा लूटते हैं और उन्हें राजा बनाने वाले मेहनतकश तपती गर्मी, बरसात और सर्दी के शिकार होने को विवश हैं। अभी तक असलियत से मुंह चुराते चले आ रहे शासक, प्रशासक सच को जानें और समझें कि भारत के आम नागरिक पर क्या गुजर रही है। उसे सत्ताधीशों की ऐशपरस्ती और नालायकी का खामियाजा बार-बार मरकर भुगतना पड़ रहा है।

नम्बर

कोई जब अपने अथक परिश्रम की बदौलत सफल होता है तो उसकी तारीफ की जाती है। यही हमारे यहां का चलन और दस्तूर रहा है। लेकिन हर बात, चीज़, कर्म और कथन में मीन-मेख निकालने वालों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। इस चक्कर में किसी की उपलब्धियों की तारीफ करना छोड़ उसकी कमी की खोज करने वालों के बारे में क्या कहा जाए और किया जाए? उत्तरप्रदेश के सीतापुर की प्राची निगम ने दसवीं की परीक्षा में जब टॉप किया तो उसे बधाई और शुभकामनाएं देने वाले कम और तानाकशी यानी ट्रोल करने वाले बहुत ज्यादा थे। यह व्यवहार किसी को भी हैरान और आहत कर सकता है। प्राची को भी बहुत ठेस पहुंची। अकेले में बारम्बार रोती रही। उससे मिलने के लिए आनेवाले शुभचिंतकों ने उसे सोशल मीडिया पर आती भद्दी टिप्पणियों को भूलने और पूरी तरह से नजरअंदाज करने को कहा लेकिन तब भी वह ट्रोल करने वालों के दंशों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकी।

यूपी बोर्ड में टॉप टेन में अपनी प्रभावी जगह बनाने वाली प्राची के चेहरे पर लड़कों की तरह जो मूंछ और बाल उग आये वही उसके शत्रु बन गये और सोशल मीडिया के शैतानों को उसे चिढ़ाने और मजाक उड़ाने का मौका मिल गया। प्राची सोचती रह गई कि काश! वह टॉप में नहीं आती। अन्य लाखों छात्र-छात्राओं की तरह साधारण नंबर पाती और अपने आप में मस्त रहती। न्यूज चैनल वालों का रवैया भी उसके प्रति निराशाजनक ही रहा। वे भी उसके चेहरे के बालों पर कैमरे केंद्रित कर उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आए। उनका खोद-खोदकर यह पूछना, गहरे तक आहत करता रहा  ‘‘लड़कों की तरह दाढ़ी, मूंछ में कैसा लगता है? ये कैसे और कब हुआ? मां-बाप ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया! कैसे लापरवाह अभिभावक हैं?’’ प्राची कभी जवाब देती तो कभी चुप्पी साध लेती। ऐसे ही सुलगते सवालों और भेदती निगाहों की भीड़ का सामना करते-करते उसने आगे की पढ़ाई में ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। इस दौरान उसके माता-पिता ने लाखों रुपए खर्च कर कुशल चिकित्सकों से उसके चेहरे का कई बार इलाज करवाया। इससे उसेकाफी हद तक चेहरे के घने बालों से मुक्ति मिल गई। फिर भी पहचान बनी रही। उसने सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूरियां बना लीं। बारहवीं की परीक्षा में प्राची 500 अंकों में 450 अंक प्राप्त कर साधारण विद्यार्थियों में शुमार हो गई। लेकिन इस बार भी ट्रोलर अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आये। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसकी पुरानी फोटो लगाकर उसके पिछड़ने और कम नम्बर पाने का मजाक उड़ाते रहे। किसी ने लिखा, कहां गई अक्लमंदी? लगता है दसवीं की परीक्षा में नकल मारने की जो सुविधा मिली थी, इस बार नहीं मिली। किसी की कमेटंस थी, ‘तुक्का हर बार नहीं चलता।’ कोई यह कहने से नहीं चूका, ऊपरवाले से हाथ-पैर जोड़कर अच्छी शक्ल-सूरत तो मांग लेती। घूर-घूरकर फोटो देखी, लेकिन समझ में ही नहीं आया कि औरत है या आदमी? ऐसे अबूझ पहेली से राम बचाये!’’ वैसे तो बचपन से ही प्राची के चेहरे पर लड़कों जैसे कुछ-कुछ बाल दिखने लगे थे लेकिन नौंवी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते बालों का बढ़ना उसकी परेशानी का सबब बनने लगा। मोहल्ले के लड़कों के साथ-साथ सहपाठी लड़कियों और सहेलियों की निगाहों की चुभन को प्राची तीव्रता से महसूस करने लगी थी। अब तो प्राची में इतनी हिम्मत आ गई है कि कोई भी तंज, कटाक्ष उस पर असरहीन रहता है। उसने फिजूल के सोशल मीडिया से भी हमेशा-हमेशा के लिए किनारा कर लिया है। अब तो वह अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतया समर्पित रहकर अपनी लाइफ इंजॉय कर रही है। 

इतिहास गवाह है कि जो लोग परिश्रम, साहस और अपने लक्ष्य से मुंह नहीं चुराते वही अंतत: इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हुए अपार प्रशंसा और गड़गड़ाती तालियों का मनोहारी उपहार पाते हैं। अपने देश भारत में अनेकों महिलाएं दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा और बर्तन मांजकर अपना घर परिवार चलाती है। अब तो कुछ प्रदेशों की सरकारें भी गरीब परिवार की महिलाओं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए हर माह डेढ़-दो हजार की नगद राशि प्रदान करती हैं। लेकिन इससे इस महंगाई के दौर में यकीनन ज्यादा राहत नहीं मिलती। उनको मिलने वाली राशि को लेकर कुछ सक्षम लोग यह रोना रोते भी दिखते हैं कि सरकार ने मुफ्त में राशि देकर काम करने वाली बाइयों के भाव बढ़ा दिये हैं। एक तो ढंग से काम नहीं करती, उस पर पहले से ज्यादा मेहनताना भी मांगने लगी हैं। पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बर्तन-कपड़े धोकर लगभग चार-पांच हजार रुपए कमाने वाली कलिता मांझी विधायक बन गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें आसाराम सीट से चुनाव लड़वाया और वे अच्छे-खासे वोटों से जीत गईं। और भी कुछ महिलाएं विधायक बनने में सफल रहीं। लेकिन कलिता मांझी यकीनन उनसे अलग हैं। अधिकांश चुनावी योद्धाओं ने जहां चुनाव प्रचार में मतदाताओं को लुभाने के लिए लाखों-लाखों रुपए खर्च किए वहीं कलिता मांझी इस लायक थी ही नहीं कि कुछ हजार रुपये की भी व्यवस्था कर पाती। उसने बिना पैसे के चुनाव लड़ा और चुनाव जीत कर दिखाया। उसके विधानसभा के चुनाव में विजयी होने से आम देशवासियों में यह संदेश तो गया ही है कि यदि छवि निष्कलंक हो। नीयत में कोई खोट न हो तो शुभचिंतक और वोटर भी बढ़-चढ़कर तन-मन और धन से साथ और सहयोग देने में  कोई कमी नहीं छोड़ते। चुनाव जीतने वाले विधायकों ने शपथ ग्रहण के समारोह के लिए हजारों रुपये खर्च कर नये-नये परिधान बनवाये लेकिन कलिता के पास तो ढंग की एकाध साड़ी तक नहीं थी। ऐसे में जिस घर में वह काम करती थीं, उसी के मालिक ने सादगी प्रेमी ईमानदार कलिता मांझी को सुंदर साड़ी उपहार में दी, जिसे पहनकर वह कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। यह भी काबिलेगौर है कि चुनाव जीतने के बाद भी मांझी जब अपने मालिक के यहां काम करने पहुंची तो उनके साथ-साथ पूरे मोहल्ले के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। विधायक बनने के बाद भी अपनी जड़ों को न भूलते हुए उसने सामान्य दिनों की तरह बर्तन और कपड़े धोए और अन्य घरेलू काम भी निपटाए। 

जहां चाह होती है वहां राह न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता। कुछ कर्मवीर पुरातन कहावतों को चरितार्थ करने के लिए ही इस धरा पर आते हैं। दांत के बीच कलम दबाकर लिखने वाले मोहम्मद फैजानउल्ला से आप मिलेंगे तो उसके हौसले को सलाम किये बिना नहीं रह पायेंगे। झारखंड में दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले फैजानउल्ला को जन्म से सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी ने अपने क्रूर शिकंजे में जकड़ लिया था, जिससे वह न तो खुद से हिल-डुल सकता था और न ही उठ-बैठ सकता था। अभी भी वही हालत हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह अच्छा हुआ कि फैजान बोलने-बतियाने लगा। इससे उसके माता-पिता को काफी अच्छा लगा और राहत महसूस हुई कि कम अज़ कम बच्चा बोलता और समझता तो है। इस गंभीर बीमारी की वजह से फैजान का स्कूल जाना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में जितेंद्र कुमार भगत नामक शिक्षक ने फैजान के जीवन में किसी फरिश्ते की तरह प्रवेश किया। दरअसल, जब उन्हें उसके स्कूल नहीं जाने की वजह का पता चला तो वे खुद उसके घर जा पहुंचे। दिव्यांग फैजान का मनोबल और पढ़ने की अत्याधिक इच्छा को देखकर उन्होंने उसके सपने को साकार करने की दिशा में तुरंत काम करना प्रारंभ कर दिया। फैजान लिखना चाहकर भी लिखने में असमर्थ था। शुरू-शुरू में उन्होंने कलम को धागे से बांधकर लिखवाने की कोशिश की लेकिन यह प्रयास पूर्णतया असफल रहा। झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोंडा में विकलांग बच्चों को शिक्षित करने के लिए विशेष शिक्षा विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत जितेंद्र कुमार कुछ दिनों तक अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहे। उन्होंने एक कलम फैजान के मुंह में दांतों के बीच पकड़ाकर लकीर खिंचवाने का कई बार प्रयास किए और अंतत: मेहनत रंग लायी। धीरे-धीरे फैजान लिखने में इतना अधिकसमर्थ हो गया कि दूसरे सामान्य बच्चों और उसकी लिखावट में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। शिक्षक जितेंद्र के कड़े परिश्रम और फैजान के सतत अभ्यास और लगन की बदौलत आठवीं की बोर्ड परीक्षा तथा नौवीं की परीक्षा में खुद लिखकर चौकाने वाली सफलता पाई। इतना ही नहीं वह दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंकों के साथ दिव्यांग कैटेगरी में टॉपर बना है। उसने परीक्षा में राइटर की उपलब्धता के बावजूद ज्यादातर कॉपी खुद ही लिखी।

सबूत

कुछ खबरों को पढ़-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भ्ाुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भ्ाूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाड़ले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भ्ाूख से चीख रहा था। तड़प रहा था। मां ने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भ्ाूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भ्ाूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कोई ऐसा सामान नहीं बचा था, जिसे बेचकर दूध, चावल-दाल का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोड़कर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तड़पन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया और उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे खामोश कर  दिया! 

एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में ‘मां’ है, जो अपनी औलाद को बड़े लाड़-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां के हत्यारिन होने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड़ लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! यदि वह इतनी परेशान थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां को हिरासत में ले लिया। हत्यारी की उम्रदराज मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहती रही कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...। लेकिन कानून की अपनी मर्यादा है। उसका चक्का कानून की किताबों और वकीलों के दांव-पेंच से चलता है। किसी के पास फुर्सत नहीं जो गंभीरता और गहराई से जाने और समझे। असली अपराध और अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भ्ाूख से तड़प-तड़प कर मरने की खबर कभी भी पढ़ने-सुनने में नहीं आती। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ़ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गड्ढा, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पड़ती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकड़ों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।

महाराष्ट्र के एक गांव का एक युवा किसान अपनी चिता सजाकर उस पर जिंदा जल गया। सत्तर हजार रुपये के कर्ज के तले दबे इस किसान ने चिता पर लेटने के बाद जहर पिया। यानी वह किसी भी हालत में जीना नहीं चाहता था। अगर कहीं आग से बच जाता तो विष उसके प्राण ले ही लेता। पुख्ता मौत के लिए जिंदा जल मरने की यह इकलौती घटना नहीं है। ऐसी हृदय विदारक घटनाओं के बारे में जब पढ़ने और सुनने मात्र से कंपकपी छूटने लगती है तो सोचें कि आत्महत्या करने वाले लोगों की कैसी मानसिक स्थिति रहती होगी? खुद की चिता के लिए खुद ही लकड़ियां और केरोसीन का इंतजाम करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं। भौतिकता से सराबोर आधुनिकता के इस अजब-गजब काल में अंधविश्वास, घृणा, अराजकता और व्याभिचार की कोई सीमा नहीं रही। ढाई-तीन साल की  मासूम बेटियां दरिंदों की अंधी हवस का शिकार हो रही हैं। कोई पैंसठ साल का इंसान कैसे ऐसा पाप कर गुजरता है, लाख सोचने पर भी जवाब नहीं मिलता। 

एक रिक्शा चालक की तीन बेटियों की कई दिनों तक खाना नहीं मिलने पर मौत हो गई। वह रिक्शा वाला गरीब था, लेकिन किसी को भूखा देख अपनी दिन भर की कमाई उसकी झोली में डाल देता था, लेकिन उसकी बेटियों पर किसी को रहम नहीं आया। तड़प-तड़प कर तीनों चल बसीं। पिछले दिनों ओडिशा के एक आदिवासी की उस तस्वीर को देश और दुनिया के करोड़ों लोगों ने देखा और शासन और प्रशासन को कोसा। इस गरीब किसान को अपनी मृतक बहन के बैंक में जमा लगभग बीस हजार रुपये निकालने के लिए कई चक्कर काटने पड़े। बैंक वालों ने उसकी दुनिया छोड़ चुकी बहन के मरने का पुख्ता प्रमाण मांगा तो उसने अपने बहन की कब्र खोदी और बहन के कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक वालों के समक्ष पहुंचकर बोला, क्या और भी कोई सबूत चाहिए? 

क्या इंसानी की संवेदनाएं लुप्त होती चली जा रही हैं? कुछ लोग कहते हैं कि इंसान जानवर बनता चला जा रहा है। क्या वाकई यह सच है? अभी हाल ही में दिल्ली के एक ही परिवार के छह सदस्यों ने अंधविश्वास के चक्कर में आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उस परिवार के रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा उनके कुत्ते शामी को गहरे तक आघात पहुंचाया। घटना के बाद शामी की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। वह गुमसुम रहने लगा था और अंतत: घर में ही मृत पाया गया।

Thursday, April 30, 2026

छपे शब्दों की छाप

अपने देश में कभी काफी अखबार और पत्रिकाएं छपती और खूब बिकती थीं। किताबों के प्रति भी पाठकों का अथाह लगाव और जुनून देखते बनता था, लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो चुका है। अखबारों की प्रसार संख्या में भी अकल्पनीय कमी आ चुकी है। कोरोना की महामारी ने जहां कई समाचार पत्रों को बेमौत मारा तो वहीं जो किसी तरह से बचे रह गये उनकी क्या हालत है, उसकी हकीकत अखबार मालिक ही जानते-समझते हैं, लेकिन खुलकर बता नहीं सकते। उस पर सोशल मीडिया ने भी गजब का कहर ढाया है। पुस्तकों के अधिकांश प्रेमी भी सोशल मीडिया के होकर रह गये हैं। एक से एक साहित्यिक पुस्तकें धड़ाधड़ छपती हैं, लेकिन उतनी बिकती नहीं। अधिकांश लेखक अपने रिश्तेदारों, मित्रों, शुभचिंतकों को अपनी किताबें मुफ्त में उपहार स्वरूप देकर खुश हो लेते हैं। भारत देश में अब बहुत कम ऐसे लेखक है, जिनकी कृतियां उन्हें दाम, मान-सम्मान और पाठक उपलब्ध कराती हैं। आज का उजागर सच यह है कि यदि सरकारी और प्रायवेट वाचनालय पुस्तकों की खरीदी बंद कर दें तो अधिकांश प्रकाशक भी अपनी दुकानों का शटर गिराकर किसी दूसरे धंधे में लीन हो जाएं। वैसे कइयों ने तो इस पेशे से सदा-सदा के लिए किनारा भी कर लिया है। जिस काम में मुनाफा नहीं होगा, उसमें कोई समझदार व्यक्ति अपना समय और धन क्यों बर्बाद करेगा? संपूर्ण देश के रेलवे स्टेशनों पर ए.एच.व्हीलर के बुक स्टॉल की शान-शौकत से भले ही आज की पीढ़ी परिचित न हो, लेकिन हमारी पीढ़ी कभी भी नहीं भूल सकती। इन बुक स्टॉल पर हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं और विभिन्न किताबें सहज ही उपलब्ध हो जाती थीं।

‘मुझे वो दिन आज भी याद हैं’ जब मैं तब के मध्यप्रदेश और आज के छत्तीसगढ़ के संस्कारी शहर बिलासपुर में अध्ययनरत था। तब सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय, नीहारिका, दिनमान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं को खरीदने के लिए साइकिल से मीलों का सफर तय करके रेलवे स्टेशन चला जाता था। वहां पर स्थित ए.एच.व्हीलर का बुक स्टॉल वैसी ही संतुष्टि देता था, जैसे किसी आस्थावान भक्त को मंदिर। उस दौर में मात्र बीस-पच्चीस रुपए में पांच-सात पत्रिकाएं और प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, शिवानी, कमलेश्वर, अमृतराय जैसे मनपसंद रचनाकारों की किताबें खरीदकर धन्य हो जाता था। आज से पचास-पचपन वर्ष पूर्व हिंद पॉकेट बुक्स तथा अन्य नामी-गिरामी प्रकाशनों के अच्छे खासे उपन्यास पांच-दस रुपये में मिल जाते थे। सारिका, हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी तब की विख्यात पत्रिकाओं की कीमत भी अधिकतम पांच रुपए के आसपास होती थी। पैसों की कीमत और तंगी के बावजूद भी तब पढ़ने वाले आज की तुलना में कहीं बहुत-बहुत ज्यादा थे। बच्चों के लिए भी एक से एक पत्रिकाएं तथा उपन्यास सजग प्रकाशकों के द्वारा न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध कराये जाते थे, लेकिन अब तो वो दौर सपने जैसा लगता है। नगरों, महानगरों के रेलवे स्टेशनों की शान और शोभा कहलाने वाले ‘ए.एच.व्हीलर’ के बुक स्टॉल भी पाठकों, खरीददारों के अभाव के चलते बंद हो गये हैं। यह कायाकल्प बीते पांच-सात वर्षों में बड़ी तेजी से हुआ है। अब तो रेलवे के उन बुक स्टॉल पर अखबारों, पत्रिकाओं, उपन्यासों की बजाय पेन, कॉपी, बिस्कुट, क्रीम, पाउडर, हल्दीराम के लजीज नमकीन के पैकेट बिकने लगे हैं। मुझे अच्छी तरह से यह भी याद है कि रायपुर में स्थित कॉफी हाऊस में घुसते ही एक बुक स्टॉल हुआ करता था, जहां पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ चर्चित, लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास शीशे की अलमारी में सजे रहते थे। अस्पतालों के आसपास तथा बस अड्डों पर दिखने वाले बुक स्टॉल भी लगभग नदारद हो गये हैं। 

हर वर्ष 23 अप्रैल को दुनिया के अधिकांश देशों में पुस्तक दिवस मनाया जाता है। बीते वर्षों की तरह इस वर्ष भी पुस्तक दिवस मनाते हुए पुस्तकों के अंधकारमय वर्तमान और भविष्य पर चिंता व्यक्त करने के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन और ऑनलाइन कंटेट के आकाश छूते प्रभाव के वशीभूत होकर किताबों के पाठकों में आयी अत्याधिक कमी को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हुए विद्वानों ने लेखों और भाषणों की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पुस्तकों की निरंतर कम होती मांग लेखक, लेखिकाओं की गहन चिंता का विषय रही। संगोष्ठियां आयोजित कर एक स्वर में कहा गया, यदि स्थिति नहीं सुधरी तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। पुस्तकें ज्ञान का सागर होती हैं। अच्छा क्या है, बुरा क्या है, इस सच से रूबरू कराते हुए अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती हैं। दरअसल, सार्थक साहित्य मानवता, सभ्य समाज का वो प्रेरक दस्तावेज है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जागरूक लेखकों की कलम से रचा जाता है। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे, कि जब आपका मन विचलित हो, चिंता ने जकड़ रखा हो या कोई और बड़ा संकट हो तो चुनिंदा प्रेरक किताब पढ़ने लगो। ऐसी हर किताब की अहमियत होती है, जो साथी बन आपके अकेलेपन और निराशा को भगाने के साथ-साथ सोये विवेक और मनोबल को जगाती है। यदि किसी कारणवश आपका गुस्सा शांत होने का नाम न ले रहा हो तो शब्द बर्फ बन क्रोधाग्नि को शांत करने में अकल्पनीय भूमिका निभाते हैं। किसी पुस्तक प्रेमी और महान विचारक का कथन है कि सार्थक किताबों से रूबरू होकर उन्हें शब्द-दर-शब्द पढ़ना जिस अनुभव और ज्ञान के सागर में गोते लगवाता है उसका कोई सानी नहीं। सच तो यह है कि किताबें पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो। इसलिए तो किताबों को इंसानों का सबसे अच्छा मित्र कहा जाता है। हिंदुस्तान के महान कथाकार, उपन्यासकार निर्मल वर्मा कहते हैं, 

‘‘पुस्तकेंमन का शोक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, बल्कि सबकी आंख बचाकर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं। यही पुस्तकें ही हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में हमारी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में साथ देती हैं।’’ किताबों को लेकर विचारक, नाटककार स्वर्गीय सफदर हाशमी के विचार भी काबिलेगौर हैं, 

‘‘किताबे करती हैं बातें

बीते ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की

एक एक पल की।

खुशियों की गमों की

फूलों की, वमों की

जीत की हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे

इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’

कोई भी सार्थक प्रेरक किताब महज कागजों पर लिखे अक्षरों का भंडार नहीं होती, बल्कि प्रतिभावान रचनाकार के देखे और भोगे यथार्थ का सजीव चित्रण होती है। एक अत्यंत विख्यात विदेशी लेखक की पुस्तक जब साहित्य के दुश्मनों ने जलाकर राख कर दी तो उनका बस यही कहना था, कागज भले ही जल जाएं लेकिन शब्द कभी नहीं जलते। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उनका पुनर्जन्म हो जाता है। बुलंदियों पर पहुंचकर लोगों को अचंभित करने वाले कलाकारों, साहित्यकारों, उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि सकारात्मक प्रेरक किताबों से प्रेरित होकर ही उन्होंने यह मुकाम पाया है। कालजयी लेखकों की रचनाएं उनके जीवन का निचोड़ होती हैं। पचासों वर्ष बीत जाने के बाद भी कथाकार, उपन्यासकार, प्रेमचंद पाठकों की पहली पसंद बने हुए हैं। महान विचारक रजनीश यानी ओशो ने कोई किताब नहीं लिखी। उनके शिष्यों, प्रशंसकों और प्रभावितों ने उनके हजारों भाषणों को पुस्तक में संकलित, समाहित कर उन्हें लोकप्रिय लेखक के तौर पर स्थापित करवा दिया। देश के किसी भी शहर में लगने वाले पुस्तक मेलों में आज भी मुंशी प्रेमचंद और ओशो पसंदीदा लेखक के तौर पर छाये रहते हैं। पुस्तक मेलों में पहुंचने वाली भीड़ कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, रविंद्र कालिया, ममता कालिया, अमृता प्रीतम, शिवानी के साथ-साथ नये लेखकों की कृतियों को भी खरीदने में अग्रणी दिखायी देते हुए कहीं न कहीं आश्वस्त करती है कि सोशल मीडिया की आंधी में भी लिखे और छपे हुए शब्दों को पढ़ने, जानने और समझने की दिली चाहत रखने वाले सजग पाठकों की वर्तमान में भी अच्छी-खासी तादाद है। पाठकों की कमी का रोना रोने की बजाय अच्छा साहित्य रचने की जिम्मेदारी तो नये, पुराने लेखकों की भी बनती है। एक प्रश्न लेखकों से यह भी कि वे खुद कितने बेहतर पाठक हैं? अधिकांश लेखक दूसरे लेखकों की नवीनतम कृति उपहार में तो ले लेते हैं, लेकिन उसे पढ़ते नहीं। फिर ऐसे में उनकी किताबें पढ़ी जाएंगी, पढ़ी जाती होंगी इसका अंदाज वे स्वयं लगा सकते हैं। वैसे भी जो अच्छा पाठक नहीं, वो  बेहतर लेखक भी नहीं हो सकता है।

Thursday, April 23, 2026

इस पहल की कभी न टूटे डोर

‘‘इन दिनों उसमें इतनी अकड़ आ गई है, जैसे वह कहीं का कलेक्टर हो गया हो।’’

‘‘तुम तो खुद को कलेक्टर समझने लगे हो। जमीन पर तो तुम्हारे पैर ही नहीं पड़ते। बस हवा में उड़ते रहते हो।’’ जब कोई एकाएक अपना रंग बदल लेता है। कोई-पद-पदवी पाने के पश्चात दूसरों को वह कमतर समझते हुए मिलना-जुलना छोड़ देता है। अकड़ दिखाने लगता है तो शिकायत के तौर पर खट्टे-मीठे अंदाज में अपने मन की बात भड़ास और शिकायत की सुई चुभोने का अपने यहां कुछ ऐसा ही बहुत पुराना चलन है। कलेक्टर कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होते। जिले में सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें सभी मान-सम्मान देते हैं। कलेक्टर बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने का गौरव हासिल होता है। जिले के पूरे प्रशासन को चलाने वाले कलेक्टर महोदय के कंधों पर कानून-व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, विभिन्न विकास कार्यों तथा आपदा प्रबधन की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ और भी कई जिम्मेदारियां होती हैं। काम करते-करते कब दिन गुजर जाता है, इसका उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें आम और खास लोगों से भी मिलना-जुलना होता है। उनकी समस्याओं का समाधान भी उनके कर्तव्य का प्रबल हिस्सा होता है।

 कई बार यह भी देखने में आता है कि गरीब, लाचार जुगाड़ विहीन लोग अत्यंत आवश्यक काम होने पर भी कलेक्टर से मिलने से वंचित रह जाते हैं, जबकि टुटपूंजिए नेता, पत्रकार और दलाल किस्म के चेहरे जिले के प्रशासनिक प्रमुख की चापलूसी कर उनके इर्द-गिर्द खड़े और बैठे नजर आते हैं। झारखंड के गोपालगंज के एक आम नागरिक को अपनी खेती से जुड़े साधारण से काम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर काट कर अपनी कई चप्पलें घिसवानी पड़ीं, लेकिन भ्रष्टाचार, बेइमानी और आराम परस्ती के रंग में रंगे सरकारी तंत्र ने उन्हें निराश कर दिया। उन्हें दु:खी और हताश देखकर किसी शुभचिंतक ने उन्हें कलेक्टर से मिलकर अपनी समस्या से अवगत कराने का सुझाव दिया। वे बड़े बेमन से कलेक्टर महोदय से मिले। उनके आश्चर्य की तब कोई सीमा नहीं रही जब साहब ने अत्यंत सरलता, सहजता और इत्मीनान से उनकी बात सुनी। उनका तुरंत काम भी हो गया। इतना ही नहीं जिलाधीश महोदय ने अधिकारियों से काम में लेटलतीफी और टालने के कारण की सफाई भी मांगी। घर लौटते समय उस उम्रदराज की आंखें खुशी से नम थीं। कलेक्टर से मिलने से पहले उनके मन में तो यह बात गहरे तक घर किये थी कि जब छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी जरूरी काम को करने की फीस मांगते हैं। नहीं देने पर आनाकानी करते हैं तो कलेक्टर तो कलेक्टर हैं। पूरे जिले के मालिक, वो भला कहां आम आदमी की फरियाद सुनने वाले हैं...। इस संपूर्ण चिंताजनक स्थिति-परिस्थिति और पिता की पीड़ा पर स्कूल में पड़ रहे उनके बेटे की पैनी नज़र थी। वह पिता की तकलीफ को लेकर बेहद चिंतित भी था, लेकिन सोचने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था। जब पिता की समस्या का समाधान हो गया और उन्हें चिंतामुक्त तथा हंसते मुस्कराते देखकर संवेदनशील, भावुक और सचेत बेटे के मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि जो कार्य कोई नहीं कर सकते उसे जिलाधिकारी अवश्य कर सकते हैं। ऐसे में तभी उसके मन में जिलाधीश यानी कलेक्टर बनने के सपने ने जन्म लिया। जिसे साकार करने के लिए उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। इस परिश्रमी और जुनूनी बालक का नाम है कुमार आशीर्वाद। आशीर्वाद वर्तमान में नागपुर जिलाधिकारी के पद पर आसीन हैं।

वर्ष 2023 में सोलापुर के जिलाधिकारी के पद को संभालने वाले कुमार आशीर्वाद ने गड़चिरोली में पदस्थ रहने के दौरान दिव्यांग और निराक्षित लोगों को दिव्यांग प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड सीधे उनके घर पहुंचाने की पहल की, उसी से उनकी सच्ची और सार्थक जनसेवा की मंशा का पता चल गया। वर्ष 2025 में सोलापुर में जब बाढ़ ने तांडव मचाया था, तब भी दूर खड़े रहकर निर्देश देने की बजाय वे स्वयं चार-पांच दिन तक बाढ़ प्रभावितों के बीच रहे और एक-एक की समस्या को जाना, समझा और त्वरित समाधान कर राहत प्रदान की। उनके योजनाबद्ध तरीके से काम करने, तुरंत सार्थक निर्णय लेने की प्रभावी समझ की प्रेरक योग्यता की तो केंद्र सरकार ने भी बार-बार सराहना की है, वहीं आम लोगों के दिलों में भी सम्मानजनक स्थान बनाते हुए यह भरोसा जगाया है कि वे जब भी चाहें उनसे मिलने के लिए आ सकते हैं। बिना किसी भेदभाव के उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर हैं। संतरानगरी नागपुर में पदस्थ होने पर उनके ये शब्द थे, ‘‘उपराजधानी होने के कारण नागपुर में चुनौतियां तो बड़ी होंगी, लेकिन सभी को साथ लेकर समन्वय से काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।’’ यह सौ फीसदी सच है कि एक दूसरे के साथ और सहयोग के बिना कोई कार्य सफलता का मुंह नहीं देख पाता। बिना किसी भेदभाव के परिश्रम और लगन से काम करने वाले इंसानों को मान-सम्मान मांगना नहीं पड़ता। उनके सुकर्मों की यशगाथा देखते ही देखते दूर-दूर तक पहुंच जाती है। 

हम भारतवासी वादाखिलाफी, रिश्वतखोरी, छल, कपट और तरह के अनाचारों के सतत शिकार होते चले आ रहे हैं। शासन, प्रशासन के हाथों निरंतर छले जाते चले आ रहे देशवासी अब बदलाव चाहते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अथक परिश्रम और ईमानदारी से अधिकांश भारतीयों में जो सच्चे सेवक की छवि बनाई है वो यकीनन प्रणम्य है। फिर भी हमारा देश वैसा नहीं बन पाया है जैसा यहां की संपूर्ण जनता चाहती है। 

इन दिनों नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह के नाम की यश गाथा की पताका पूरी दुनिया में लहरा रही है। उनके द्वारा देश हित में उठाये गये क्रांतिकारी कदमों के समक्ष भारत की युवा पीढ़ी भी नतमस्तक है। पड़ोसी देश नेपाल के 35 वर्षीय युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ लेने के तुरंत बाद सभी प्रायवेट स्कूलों को बंद करवा दिया है। उनका मकसद है कि उद्योगपति, मंत्री, अफसर और अमीर-गरीब परिवारों के सभी बच्चे एक साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ें ताकि उन्हें समानता का एहसास हो। वीआईपी संस्कृति के घोर विरोधी बालेन शाह ने मंत्रियों, संत्रियों के वीआईपी काफिले के लिए सड़कों को बंद करने की परपंरा समाप्त कर दिया है। जाति-आधारित राजनीति को त्याग कर सामाजिक न्याय और विकास के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध युवा पीएम शाह ने पिछली सरकारों में हुए भ्रष्टाचारों की जांच की घोषणा कर नेपाल के युवाओं का मन जीत लिया है। वर्ष 2022 में बालेन शाह जब काठमांडु के मेयर थे तब उन्होंने वो कर दिखाया जो अभी तक किसी नेता के बस और नीयत की बात नहीं थी। काठमांडु के बीचों-बीच वर्षों से सिर उठाकर खड़े अवैध शोरूम और भव्य इमारतों पर बुलडोजर चलवा कर पूरे देश को अतिक्रमण मुक्त करने की मंशा प्रकट की थी उससे उनकी जो निष्पक्ष और ईमानदार नेता की छवि बनी उसी ने उन्हें इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करवाया है। राजनीति में पर्दापण करते-करते बालेन शाह ने ठान लिया था कि उन्हें दूसरे नेताओं जैसा नहीं बनना है। यदि उन्हें मौका मिला तो भेदभाव और अन्याय का खात्मा करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। अपने देश नेपाल को भ्रष्टाचारियों के हाथों लुटते देख उनका खून खौल उठता था और रातों की नींद उड़ जाती थी। वे अक्सर जिस तरह से आम लोगों के बीच पहुंच कर उनका हालचाल और तकलीफों से अवगत होते हुए समाधान करते नजर आते हैं उससे लगता ही नहीं कि वे पीएम हैं। बिल्कुल अपना सा आम चेहरा प्रतीत होते है। अपने देश के प्रधानमंत्री को अपने बीच पाकर आम जनता को बेहद खुशी होती है। बालेन शाह चकाचौंध वाली पार्टियों और आलीशान दावतों से दूर रहकर पहले की तरह  नेपाली सादा खाना यानी दाल, चावल और सब्जी पसंद करते हैं। उनका कहना है कि मुझे नेपाल के बदलाव का जो अवसर मिला है-उसे मैं यूं ही गंवाने का अपराध नहीं कर सकता।