पहले अपने बच्चों को लेकर मां-बाप इतने चिंतित और परेशान नहीं होते थे, जितने इक्कीसवीं सदी के इस दौर में हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने कामधंधे, नौकरी आदि पर अपना दिमाग केंद्रित रखें या अपनी संतानों पर। मोबाइल ने भी उनकी समस्या में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। अमीर-गरीब सभी के लड़के-लड़कियां ऐसे ‘मोबाइल रोगी’ हो गए हैं कि उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुध-बुध नहीं रहती। अभिभावकों का उन्हें रोकना-टोकना और समझाना शूल की तरह चुभता है। ऐसे में अभिभावकों का दिमाग ही काम नहीं करता। मोबाइल, ऑनलाइन गेम, सट्टा, जुआ और गलत संगत की वजह से बच्चों की बर्बादी और आत्महत्याओं की खबरें उनका पीछा करते हुए उन्हें भयभीत करती रहती हैं।
गाजियाबाद की भरी-पूरी ‘भारत सिटी सोसायटी’ में हाल ही में तीन बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद तो लगभग हर सजग भारतीय मोबाइल फोन और जानलेवा ऑनलाइन गेमिंग की लत के बारे में सोचता और बोलता दिखा। अभी तक तो अधिकतर लड़कों के ही मोबाइल के गुलाम होने की खबरें सुर्खियां पा रही थीं अब एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों ने इस पीड़ादायी श्रृंखला में अपना नाम जोड़ लिया। बहनों की इस सामूहिक खुदकुशी के दिल दहलाने वाले सच ने डिजिटल युग का भयावह चेहरा तो दिखाया ही है तथा और भी कई सवाल और चिताएं खड़ी कर दी हैं। पुलिसिया जांच पड़ताल में यह पता चला कि तीनों बहनें एक तथाकथित ‘कोरियाई लवर गेम’ की जबरदस्त कैदी बन कर रह गईं थीं। मां-बाप, रिश्तेदारों तथा स्कूली पढ़ाई से नाता तोड़ते हुए केवल और केवल उस मोबाइल से ही रिश्ता जोड़ चुकी थीं, जिसे मां-बाप ने उन्हें पढ़ाई के लिए उपलब्ध कराया था। लेकिन ये तीनों बहनें ऐसे विदेशी, कोरियन ऑनलाइन गेम के मोहजाल में जा फंसी जो शुरू-शुरू में आनंदित करता है, फिर धीरे-धीरे वही सुख आदत और गंभीर लत में बदल जाता है। गौरतलब है कि ऐसे अधिकांश ऑनलाइन गेम्स काफी हद तक इसी तरह से बनायेे जाते हैं कि खिलाड़ी लगातार इससे जुड़े रहें। खाना-पीना तक भूल जाएं। कंपनियों के द्वारा उन्हें टास्क पूरा करने के लिए विवश कर दिया जाता है। दरअसल बच्चों को अपने जाल में फंसाने का उनका अपना तौर-तरीका है।
खिलाड़ियों को यदि कोई टोकता और रोकता है तो वे आगबबूला हो जाते हैं। क्रोध, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन उन्हें आक्रामक बनाता चला जाता है। मोबाइल से अलग होना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है। ‘कोरियाई लवर गेम’ की अत्याधिक लती तीनों बहनों से जब परिवार ने मोबाइल छीना तो वे मानसिक रूप से टूट और बिखर गई। डिजिटल दुनिया को वास्तविक जीवन से कहीं बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण मान चुकी बहनों ने बहुत पहले से ही अपने कोरियन नाम रख लिए थे। निशिका ने अपना कोरियन नाम मारिया, प्राची ने आजीया और पाखी ने अपना कोरियन नाम पिंडी रख लिया था। तीनों आपस में बहुत करीब थीं। उनके कमरे में मिले आठ पृष्ठों के सुसाइड नोट में भी लिखा मिला, ‘‘सॉरी पापा हम कोरिया नहीं छोड़ सकते।’’ तीनों सबकुछ एक साथ करती थीं। मसलन, सुबह उठना, ब्रश करना, नहाना, खाना-पीना, सोना, उठना, बैठना और सबकुछ भूलकर घंटों मोबाइल गेमिंग में लगे रहना। यथार्थ से पूरी तरह से कटी, सिर्फ और सिर्फ सपनों के आकाश में उड़ती बारह, चौदह और सोलह साल की तीनों बहनों ने नौंवी मंजिल से एक साथ कूदकर ही खुदकुशी की।
मोबाइल आज के समय में जरूरत बन गया है। इस अत्यंत उपयोगी साधन का दुरुपयोग करने वाले बिगड़े नवाबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। क्रिकेट सट्टा, चांदी, सोने का सट्टा और भिन्न-भिन्न प्रकार का जुआ मोबाइल और लेपटॉप से खेलने की कलाकारी और बर्बादी की खबरें हर दिन सुनने और पढ़ने में आ रही हैं। अभी हाल ही में शहर के एक रेडिमेड कपड़े की फैक्ट्री के नामी-गिरामी मालिक का बेटा क्रिकेट और चांदी के सट्टे में पंद्रह करोड़ रुपये हार गया। शुरू-शुरू में पांच-सात लाख की कमायी उसके हाथ लगी थी। तब उसे लगा था कि इससे चोखा धंधा और कोई नहीं हो सकता, लेकिन कालांतर में दांव जब उलटे पड़ने लगे तो उसने अपने पिता और मां के बैंक खाते को कब खाली कर दिया और बहन की शादी के लिए घर की अलमारी में सुरक्षित रखे करोड़ों के सोने-हीरे के आभूषण गायब कर दिए किसी को पता नहीं चला। पिता अपने कारोबार में व्यस्त थे और मां को किटी पार्टियों से फुर्सत नहीं थी। वैसे भी उनका अपने बिगड़ैल बेटे पर कोई अंकुश नहीं था। उन्हें उसकी रात-रात भर बाहर रहकर लड़कीबाजी और दारू चढ़ाने की खर्चीली आदत की खबर थी। उन्हें यह भी पता था कि उनका दुलारा जुए का भी शौकीन है। मौज-मस्ती में पच्चीस-पचास हजार रुपये इधर-उधर करता रहता है। लेकिन उस दिन तो उनके पैरोंतले की जमीन ही खिसक गई जब कर्ज में दी गई रकम की वसूली के लिए एकाएक चार-पांच बॉडी बिल्डर अस्त्र-शस्त्र के साथ उनके घर आ धमके। उनके लाडले ने सट्टे में मालामाल होने के लिए जिस गुंडे किस्म के साहूकार से पांच करोड़ का कर्ज लिया था, उसी ने इन्हें वसूली के लिए भेजा था। व्यापारी पिता के लिए कर्ज वसूली के लिए गुंडों का घर आ धमकना किसी सदमें से कम नहीं था। मां तो ऐसी बेहोश हुई कि उसे अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। व्यापारी ने बड़े सधे तौर-तरीके और धैर्य के साथ उनकी सुनी तो पता चला कि मूल रकम तो चार करोड़ थी, लेकिन पांच महीने के मोटे ब्याज की वजह से पांच करोड़ तक जा पहुंची थी। दबंग साहूकार ने काफी सब्र करने के बाद उन्हें वसूली के लिए भेजा था। उसे कारोबारी की हैसियत की भी पूर्ण जानकारी थी। जब उसे कई बार तकादे के बाद भी पैसे नहीं मिले तो मजबूरन दल-बल को भेजना पड़ा। नालायक बेटे के व्यापारी पिता ने अपनी साख पर आंच नहीं आने दी और कुछ ही घंटों में सारा कर्ज चूका दिया और ज्यादा डांटने-फटकारने की बजाय अपने इकलौते बेटे को यह सोचकर सिंगापुर अपनी बेटी के पास भेज दिया कि यदि और भी कोई लेनदार हो तो वह उसकी पकड़ और निगाह से बचा रहे।
धन्ना सेठों पर ऐसे संकट उतनी बिजली नहीं गिराते जितना कि आम मध्यमवर्गीय भारतीयों पर कहर ढाते हुए उनका सबकुछ तहस-नहस करके रख देते हैं। कॉलेज में मेरे सहपाठी रहे अंशुमन शर्मा वर्षों तक स्टेट बैंक की नौकरी करने के पश्चात जब रिटायर हुए तो बहुत प्रफुल्लित थे। कुछ खास दोस्तों के लिए मित्र अंशुमन ने जबलपुर के तीन सितारा होटल में पार्टी भी आयोजित की थी। उसने बड़े शौक से दो मंजिला सर्व सुविधायुक्त घर भी बनवाया था, जिसके गृह प्रवेश का आयोजन भी तभी किया गया था। अंशुमन पूजा-पाठ और धर्म-कर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी था। उसने जब चांदी के कप में चाय पिलाई थी तब मित्रों ने सहज तंज कसा था, ‘‘लगता है पंडित जी ने बैंक की मैनेजरी के दौरान अच्छा-खासा माल बटोरा है।’’ तब भाभी जी ने बताया था कि यह तो उनकी शादी के अवसर पर किसी करीबी रिश्तेदार ने उपहार में दिये थे। अंशुमन के इकलौते बेटे ने बीए की आधी-अधूरी पढ़ाई की थी। उसकी बेरोजगारी से ज्यादा उसकी मोबाइल से चिपके रहने की लत को लेकर अंशुमन बेहद चिंतित और परेशान था। दोस्तों ने उसे आश्वस्त किया था कि ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। आजकल लगभग सभी बच्चे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। यदि नौकरी नहीं मिलती तो फिलहाल छोटी-मोटी दुकान शुरू करवा दो। हम सभी दोस्त अपने-अपने ठिकाने चल दिये थे। लगभग छह महीने के बाद खबर मिली थी कि अंशुमन के बेटे पराग ने क्रिकेट सट्टे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये हारने के बाद आत्महत्या कर ली है। पराग ही अपने पिता के बैंक खाते को देखता-संभालता था। उसने कब जन्मदाता के जीवनभर की जमापूंजी सट्टे में लुटा दी इसका पता पिता को तब चला जब कुछ लेनदारों ने पराग को घर में आकर मारा-पीटा और धमकाया। पराग ने पिता के बैंक खाते को खाली करने के साथ ही कुछ लोगों से मनमाने ब्याज पर लोन भी ले रखा था। अपने बेटे के शव को देखते ही अंशुमन यह कहते हुए बेहोश होकर गिर पड़ा था, हे भगवान, तूने ये क्या कर दिया। मां का तो कलेजा बाहर आ गया था। उसके बाद अंशुमन को होश ही नहीं आया। दो महीने के पश्चात मैं भाभी जी से मिलने के लिए जबलपुर उनके नये निवास स्थान पर गया था। कर्जा चुकाने के लिए उन्हें अपना आशियाना बेचने को विवश होना पड़ा था। भाभी एक कमरे के उजाड़ से घर में अकेली गुमसुम बैठी थीं। उन्हें तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। एल्युमिनियम के टूटे-फूटे गिलास से धीरे-धीरे पानी के घूंट लेते-लेते मुझे कब सुबकियां आने लगीं मैं ही नहीं जान पाया...।
