Thursday, September 24, 2026

असंभव-संभव

 कुछ लोगों को चुप रहना नहीं आता। खुद तो कुछ करते-धरते नहीं, दूसरों को ही बस उपदेश देते हुए उन्हें भयभीत करते रहते हैं। जबरन की राय और तानों की विषैली बरसात से हैरान-परेशान करने वालों से यदि सफलता पाने वाले चेहरे घबराकर ठहर जाते तो यकीनन विघ्न संतोषियों की जीत हो जाती, ऐसे में असफलता का मलाल जीवनभर उनका पीछा करता रहता। देश की पहली महिला फायर फाइटर बनी हर्षिणी तो कहती हैं कि तानों ने उनके हौसले का और और मजबूती दी। जब उन्होंने नागपुर में स्थित फायर सर्विसेज कॉलेज में पहला कदम रखा तो लड़के चौंक गए। कुछ लड़कों ने उन्हें रोककर कहा कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। यहां सिर्फ लड़के ही पढ़ते हैं। रिस्की काम तो वही कर सकते हैं। लड़कियों को तो आसान कार्य करने के लिए ऊपर वाले ने धरती पर भेजा है। हर्षिणी को लड़कों की यह बात बहुत चुभी। हर्षिणी में तभी दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह परंपरा को तोड़ते हुए सच्ची योद्धा बनकर दिखायेगी। कुछ अड़चने आईं लेकिन अंतत: उन्हें एडमिशन मिल गया। जैसे ही क्लास शुरू हुई तो उन्हें देखने के लिए पूरा ब्वाइज हॉस्टल जमा हो गया। उन्हें लगा था कि लड़की असहज होते हुए अपना निर्णय बदल लेगी। ट्रेनिंग के दौरान भारी सामान के साथ दौड़ लगानी होती तो लड़के पलटकर देखते कि वह गिरी है या नहीं। उन्हें हर्षिणी के गिरने-फिसलने का बेसब्री से इंतजार रहता। हर्षिणी ने साढ़े तीन साल कड़ी ट्रेनिंग के दौरान एक भी छुट्टी नहीं ली, जबकि लड़कों के साथ उलटा था। जब तब छुट्टी लेते रहते थे। हर्षिणी की मेहनत रंग लाई उन्हें ओएनजीसी में फायर फाइटर पद की नौकरी भी मिल गई। पहली पोस्टिंग गुजरात के मेहसाणा में हुई। हर्षिणी वर्तमान में कोलकाता में डीजीएम फायर सेफ्टी के पद पर कार्यरत हैं। घर से बाहर निकलकर काम कर रही महिलाओं के लिए उनका संदेश है कि अपने महिला होने को कभी भी ढाल न बनाएं। मैं अकेली कैसे करूंगी, कैसे जाऊंगी, घरवालों को कैसे मनाऊंगी आदि बातों को अपने करियर की ग्रोथ की राह में किसी भी हालत में आड़े न आने दें। 

देश की पहली लाइन वुमन बब्बुरी सिरीशा ने जब दसवीं के बाद अपने मामा की सलाह पर आईटीआई में इलेक्ट्रिकल ट्रेड चुना तो उनसे कहा गया कि कोई और आसान सी राह पकड़ लो। क्लास में 27 लड़के हैं, अकेली लड़की हो। तुम्हें परेशान करके रख देंगे। इतना ही नहीं दो साल की पढ़ाई के बाद परीक्षा से पहले फरमान सुनाया गया कि तुम एलिजिबल यानी सक्षम नहीं हो। यह तो पुरुषों का क्षेत्र है। बब्बुरी की तो जिद थी कि उन्हें डटे रहना है। वे अदालत पहुंची केस किया, तीन साल तक लड़ाई चली। 18 फीट के खंभे पर फुर्ती से चढ़कर दिखाया। तब कहीं जाकर परीक्षा की अनुमति मिली। फिजिकल टेस्ट के लिए सिरीशा रोज एक्सरसाइज और खंभे पर चढ़ने की प्रैक्टिस करतीं। लोग घूरते, सवाल करते, पर वे कहती, ‘अपने काम पर ध्यान दो। मेरे हौसले को कमजोर करना तुम लोगों की बस की बात नहीं।’ टेस्ट चार तरह के खंभों पर था, उन्होंने रफ पोल पर अभ्यास किया था। एक दिन पहले पता चला कि सेंटर पर स्मूथ पोल है। घबराहट हुई, फिर संभली और टेस्ट पास किया। 2022 में सिरीशा ने बतौर लाइन वर्कर जॉइन किया। कंपनी में उनसे पहले कोई महिला इस पद पर नहीं थी। फील्ड में जातीं तो लोग पूछते कि आप सच में लाइन वर्कर हो? फिलहाल उनके पास ऑफिस वर्क है। लेकिन अगले ट्रांसफर में फील्ड में जाना चाहती है।

अजय कुमार रस्तोगी सरकारी कॉलेज में पच्चीस साल तक लेक्चरर की नौकरी करने के बाद रिटायर हुए तो उलझन के शिकार हो गये। क्या करें, कहां जाएं? बच्चे विदेश में हैं। बीवी रहीं नहीं। अकेले रहने के अलावा कोई और चारा नहीं था। एक रात लिमिट से ज्यादा शराब पीकर घर लौट रहे थे तो पुलिस के लपेटे में आ गए। सारी रात पुलिस स्टेशन बैठना पड़ा। वहीं उन्हें अपनी मां की याद हो गई जिन्हें उन्होंने वर्षों पहले अपने पास रखने की बजाय वृद्धाश्रम में रखना बेहतर समझा था। कई सालों से अपनी जननी से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाये थे। पुलिस थाने में उन्हें काफी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा। जब खाकी वर्दीधारियों को पता चला कि महाशय कॉलेज में पढ़ा चुके हैं तो उन्होंने उनका खूब मजाक उड़ाया। रस्तोगी शर्म के मारे पानी-पानी हो गये। उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अब शराब नहीं पीने की कसम खा ली। कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए दरोगा की जेब गर्म की और सीधे मां को लेने वृद्धाश्रम चल दिये। तब तक उनकी माताश्री 87 वर्ष की हो चुकी थीं। रस्तोगी ने सब कुछ भूलभालकर अपनी उम्रदराज माताजी की तन्मयता से सेवा करनी प्रारंभ करते हुए अपना अधिक से अधिक समय उनके साथ व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें बार-बार खुद पर गुस्सा भी आता कि अपनी संकीर्ण सोच और स्वार्थ की वजह से अपनी मां को अपने पास नहीं रख पाये। बेचारी वृद्धाश्रम में ही बूढ़ी हो गईं। अच्छे-भले बेटे के होने के बावजूद उन पर क्या गुजरी होगी? छह साल तक उन्होंने तन-मन-धन से मां की देखरेख की। उनकी बची-खुची चाहतों को पूरा किया। इधर-उधर घुमाया फिराया। वर्षों तक बेटे से दूर रहीं उम्रदराज मां ने अपने बेटे को भरपूर आशीषें दीं और छह साल बाद यानी 93 की उम्र में दुनिया से विदा हो गईं। रस्तोगी साहब को झटका लगा। मां के चल देने से एक अजीब से खालीपन ने फिर उन्हें घेर लिया। ऐसे में उनको याद आया कि बचपन में कभी उनकी लेखक बनने की प्रबल इच्छा थी, जो नौकरी और घर परिवार चलाने की जद्दोजहद में ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद उन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया। आठ-दस वर्षों में कहानी, कविता और व्यंग्य की रचनाओं के दस संग्रह प्रकाशित हो गये। साहित्य जगत में डंका बजने लगा। उनकी दो कृतियां राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। अब तो उन्होंने अपने घर के बाहर एक अलमारी बनवा कर लाइब्रेरी भी बना दी है, जहां विभिन्न विषयों की सैकड़ों किताबें उपलब्ध है। पढ़ने-लिखने के शौकीन लड़के-लड़कियां, बुजुर्ग बिना किसी झिझक के लाइब्रेरी में आते हैं और अपनी मनपसंद किताब को खोलकर पढ़ने बैठ जाते हैं। अजय कुमार रस्तोगी का भी बचपन का शौक पूरा हो गया है और अब उनका समय भी बड़ी आसानी से कट रहा है।

अमेरिका के शहर डेलावेयर में रहती हैं 108 वर्षीय सुसान यंग ब्राउन। किसान परिवार में पली बढ़ी सुसान ने तीस वर्ष तक बच्चों को पढ़ाया। पूरे मन से नौकरी बजाने के बाद 1977 में रिटायर होने के पश्चात चिंताग्रस्त हो गईं कि खाली रहकर क्या करेंगी? उनके लिए तो एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो जाएगा। अधिकांश करीबी रिश्तेदार स्वर्ग सिधार चुके थे। पति भी कब के चल बसे थे। ऐसे में उन्होंने अपने घर में ही आसपास के बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ कर खुद को व्यस्त कर लिया। ऐसे में उनका समय अच्छी तरह से व्यतीत होने लगा। वर्तमान में वे 108 साल की है, अभी भी जवान हैं। तन से भी और मन से भी। रोज जल्दी उठकर व्यायाम करती हैं। घंटों पैदल चलती हैं और खुद ही कार चलाते हुए बाजार खरीदी करने जाती हैं। उनकी जिन्दगी के तीन बड़े सबक हैं, पहला उम्र बढ़ने के साथ शरीर को बिल्कुल निष्क्रिय कर देना सही नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार रोज कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहें। दूसरा, सीखना कभी बंद मत करें । तीसरा, अपने पैरों पर खड़े रहने की कोशिश कीजिए। अपना काम स्वयं करने की आदत को हमेशा बरकरार रखें। उन्होंने एक प्रेरक किताब भी लिखी है, जो बेस्ट सेलर में शुमार है। उसमें वे लिखती हैं कि दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए अनुशासित जीवन शैली, संतुलित खान-पान और मानसिक सक्रियता आवश्यक है। अपनी नींद को दवा जैसा महत्व दीजिए। रोज लगभग एक ही समय पर सोएं-जागें। रात में मोबाइल या अन्य स्क्रीन लंबे समय तक देखना बंद करें। ब्रेन की हेल्थ के लिए अपनी थाली को सभी आहारों से भरपूर रखिए। थाली में हरी सब्जियां, फल डालें, साबुत अनाज, मेवे और पर्याप्त प्रोटीन रखें। ज्यादा प्रोस्टेड खाना खाने से परहेज करें। 

लंबी उम्र के लिए मशहूर जापान के वृद्धों ने तो नया रिकॉर्ड बना दिया है। देश में 100 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक लाख के पार पहुंच गई है। इनमें महिलाओं की संख्या करीब 88 प्रतिशत है। देश की सबसे ज्यादा उम्र की महिला का नाम किशिमोटो फुयो है। उनकी उम्र करीब 114 साल है। वो राजधानी क्योटो में रहती हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा उम्र के पुरुष का नाम कुमामोटो है, जो 112 साल के हैं। कुमामोटो हिकारू में रहते हैं। जापान के एक उम्रदराज चिकित्सक मानते हैं जापानी लोगों की लंबी उम्र के लिए कई चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हेल्दी डाइट और एक्टिव लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें शामिल हैं। जापान में लोगों के खान-पान में मुख्य तौर पर मछलियां, सब्जियां और चावल शामिल होते हैं। कई पश्चिमी देशों की तुलना में यहां के खाने में सैचुरेटेड फैट कम होता है। बुजुर्गों की लंबी उम्र होने में और भी कई फैक्टर शामिल हैं। इनमें रोजाना पैदल वॉक करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट्स का इस्तेमाल करना और रोजाना साइकिल चलाने जैसी चीजें शामिल हैं।

Thursday, September 17, 2026

जहां चाहें... वहीं राहें

 बहुत से लोगों की यही धारणा है कि पढ़ने-लिखने और कुछ नया करने की एक तयशुदा उम्र होती है उसके बाद तो खुद को रोजी-रोटी के लिए नौकरी और कामधंधे में लगाना-खपाना होता है। यह मानने वाले भी भरे पड़े हैं कि विधाता ने जिन्हें शारीरिक तौर पर अपंग बनाया है, उनके लिए हर काम कर पाना संभव नहीं। ऐसे विद्वानों का निष्कर्ष है कि जीवन कोई प्रयोगशाला तो नहीं कि नये-नये प्रयोगों की झड़ी लगाकर रखी जाए और अपनी खुशियों में व्यवधान डालने के साथ-साथ दूसरों को भी परेशान किया जाए। 

सबकी अपनी-अपनी सोच हैं, अपने-अपने विचार हैं। लेकिन अब समय का चेहरा बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता का दौर प्रारंभ हो चुका है। कई लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। खुद को बदलेंगे नहीं तो पाये हुए को खोने का डर सिर पर तलवार ताने खड़ा रहेगा। वैसे भी सभी के लिए सफलता के एक जैसे रास्ते नहीं हैं। हर किसी की जिन्दगी में ऐसे दौर आते हैं जब सब धीमा पड़ जाता है। योजनाएं रुक जाती है, उत्साह ठंडा पड़ जाता है और लगने लगता है कि लोग आगे बढ़ रहे हैं और हम वहीं खड़े हैं। जो इस ठहराव और परिवर्तन को नहीं समझ पाते उन्हें कई अकल्पनीय परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। यह भी सच है कि वर्षों से जिस राह पर चलने की आदत पड़ चुकी हो उसे बदलना या छोड़ना आसान नहीं। 

लेकिन जब और कोई चारा नहीं हो तब? सात समंदर पार वाशिंगटन में अब कई लोग 40 की उम्र पार करने के बावजूद दोबारा पढ़ने-समझने के लिए क्लासरूम में लौट रहे हैं। कोई शेफ से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन रहा है तो कोई नई डिग्री लेकर खुद को और ज्यादा कुशल साबित करना चाहता है। इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो स्कूल के बाद कॉलेज नहीं गये थे वे भी अब पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं, ताकि डिग्री हासिल कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशन स्टैटीस्टिक्स के मुताबिक अमेरिका में 40 की उम्र के 10 लाख से ज्यादा लोग अंडर ग्रेजुएट या ग्रेजुएट प्रोग्राम में पढ़ रहे हैं। इनमें से कई लोग वाइट कॉलर जॉब्स से ज्यादा सैलरी और जॉब सिक्योरिटी चाहते हैं। वहीं युवा पीढ़ी डिग्री की वैल्यू पर सवाल उठा रही है। 

टेक्सास यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर सिंडी वुडी ने 41 की उम्र में मास्टर्स और 47 में पीएचडी की। वे कहती हैं कि, मैं एक अच्छा इन्वेस्टमेंट हूं। उन्होंने पढ़ाई के दौरान टीवी देखना छोड़ दिया, घर के काम परिवार को सौंप दिए और रात व वीकेंड पर क्लास अटेंड की। कम खर्च वाले ट्रेड और अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इनकी सालाना फीस करीब 3 हजार डॉलर होती है। इन क्षेत्रों को एआई और ऑटोमेशन से कम खतरा माना जाता है। जैसे-पाइप लीक होने पर प्लंबर की जरूरत तो होगी ही। पेंसिलवेनिया के एक जॉब ट्रेनिंग प्रोग्राम में 108 छात्रों में से एक चौथाई 40 की उम्र के हैं। वे प्लंबिंग, कारपेंट्री, कंस्ट्रक्शन और हेल्थकेयर जैसे स्किल्स सीख रहे हैं। इनमें से कई ने अपनी पुरानी नौकरी खो दी या बेहतर सैलरी की तलाश में हैं।

विख्यात रिटेल स्टोर चेन डीमार्ट का नाम आपने भी सुना ही होगा। इसके कर्ताधर्ता हैं राधाकिशन दामानी बहुत ही सहज और सरल इंसान हैं। दामानी जी के देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 500 स्टोर हैं। फोर्ब्स द्वारा जारी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में उनका नाम शामिल है। उनका डीमार्ट ग्राहकों को रोजमर्रा की जरूरत का सामान बाजार से कम कीमत पर उपलब्ध कराने का दावा करता है। ग्राहकों को उन पर भरोसा है, इसलिए उनके सभी स्टोर में भीड़ लगी रहती है। दामानी हमेशा सफेद शर्ट और सफेद पतलून पहनते हैं, इसलिए लोग उन्हें प्यार से ‘मिस्टर व्हाइट एंड व्हाइट’ भी कहते हैं। आम लोगों से जुड़े रहने के पक्षधर, सादगी पसंद दामानी को जब लोग मुंबई के चर्चगेट या इंडस्ट्री हाउस के पास बनी पान दुकान पर पान खाते देखते हैं तो उनकी सरलता के मुरीद हो जाते हैं। दरअसल, उन्हें लंच के बाद पान खाना बहुत पसंद है। इसी बहाने अपने पुराने जान-पहचान वालों से मिलना-मिलाना भी हो जाता है। बीकानेर के मारवाड़ी परिवार में जन्मे राधाकिशन के पिता शिवकिशन का जीवन भी अत्यंत संघर्षमय रहा। मुंबई में एक कमरे के घर में रहकर उन्होने दलाल स्ट्रीट में ब्रोकर का काम करते हुए कई उतार-चढ़ाव देखें। जब राधाकिशन 12वीं में थे तब उनके पिता शिवकिशन का निधन हो गया तो पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर व्यवसाय और परिवार की देखरेख को प्राथमिकता देते हुए कम दाम में अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदे और खूब कमाई की। साल 1992 में देश के शेयर बाजार में हाहाकार मचाने वाला हर्षद मेहता कांड सामने आया। तब जहां सैकड़ों निवेशक डूबे। वहीं दूसरी ओर धैर्यवान राधाकिशन थे जिन्होंने गिरते बाजार में खूब कमाई की। उनकी व्यावसायिक यात्रा धीमे-धीमे चलती रही। इधर-उधर के कुछ और काम भी किए। बाजार की नब्ज़ पर गहरी नज़र रखते हुए 2002 में मुंबई के पवई में डीमार्ट का पहला स्टोर खोला और जो सफलता हासिल की उससे अब देश के छठे सबसे अमीर कारोबारी कहलाते हैं। वे ऐसे व्यापारी नहीं जो परिवार और खुद की सुख-सुविधाओं के लिए ही मेहनत करते हैं। उनके ट्रस्ट के द्वारा 56 लाइब्रेरी बनाई गई हैं, जिनसे 50 हजार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। गरीब बच्चों की कम्प्यूटर शिक्षा के लिए 70 से ज्यादा लैब बनवाई गई हैं। पीएम केयर फंड में 100 करोड़ और कोरोना काल में 55 करोड़ का दान कर चुके दामानी हर कुंभ के दौरान डुबकी लगाने के लिए जरूर जाते हैं। 

बीस साल के मयूरेश का डॉक्टर बनने का सपना अब पूरा होने जा रहा है। केईएम मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला पाने के लिए उसे खासी मशक्कत और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसकी मानसिक और शारीरिक कमजोरी को देखते हुए माता-पिता ने उसे बहुतेरा कहा-समझाया कि डॉक्टर बनने की जिद छोड़ दो, बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन वह नहीं माना। उसके मन-मस्तिष्क से डॉ.आदिल चागला कभी ओझल ही नहीं हो पाए। हां, वही डॉ. चागला जिन्होंने उसका पूरी तन्मयता और आत्मीयता के साथ तब इलाज किया था जब वह मात्र दस वर्ष का था और उसके मस्तिष्क में ब्रेन ट्यूमर होने से सभी ने उसके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, कुछ डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि वह शायद ही अधिक समय तक जिन्दा रह पाए। मौत धीरे-धीरे उसकी तरफ खिंची चली आ रही है। केईएम अस्पताल के पूर्व न्यूरोसर्जन डॉ.आदिल चागला पहले डॉक्टर थे, जिन्होंने उसे हिम्मत का दामन छोड़ने की बजाय चुनौती का डटकर सामना करने की सीख दी थी। साथ ही भरपूर भरोसा दिलाया था कि वह वक्त शीघ्र आयेगा, जब वह अस्पताल से पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर जायेगा। मयूरेश की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी सफल रही लेकिन शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया। कई महीनों के इलाज के दौरान मयूरेश ने डॉ.चागला की गतिविधियों को बहुत करीब से देखा। उनका मरीजों के प्रति अपनत्व भरा बर्ताव, उनके परिवारों को आश्वस्त करने का प्रभावी तौर तरीका मयूरेश को इस कदर प्रभावित कर गया कि उसने तभी डॉ.चागला को अपना आदर्श मानते हुए दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह भी बड़ा होकर डॉक्टर ही बनेगा और मरीजों की ऐसे ही समर्पण भाव से सेवा करेगा। अस्पताल से लौटने के पश्चात मयूरेश ने अपनी चाहत की आंच कभी भी धीमी नहीं होने दी। यह हकीकत अपनी जगह है कि उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शारीरिक कमजोरी और शासकीय नियमों के कारण 2024 में नीट परीक्षा में 480 से अधिक अंक पाने के बावजूद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला। वर्ष 2026 वह दोबारा नीट परीक्षा में शामिल हुआ और उसे 440 अंक मिले, जिससे दिव्यांग कोटा में उसे केईएम अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। वह दिन दूर नहीं, जब वह सफेद एप्रन धारण कर बीमारों को भला चंगा करते हुए उनके जीवन को नई दिशा देगा। 

महर्षि दयानंद विश्व विद्यालय रोहतक में एक कोने में खड़े रंग-बिरंगे फूड ट्रक ‘डैफेटेरिया’ को आप देखते ही रह जाएंगे। खूब हैरान भी होंगे। क्योंकि यह भारत का पहला अनोखा डबल डेकर बस फूड ट्रक कैफे है। जहां पर आधे से ज्यादा स्टाफ मूक-बधिर है। मूक-बधिर यानी वो लोग जो बोल और सुन नहीं सकते। जिन्हें कई बार सक्षम लोगों की अवहेलना और तिरस्कार से अपमानित होेना पड़ता है। शेफ और सर्विस स्टाफ में विशेष रूप से दिव्यांगों को शामिल करने का मात्र यही मकसद है कि वे मान-सम्मान के साथ आजीविका कमाते हुए अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा सकें। वे भी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में कहीं पीछे नहीं हैं। यहां मिलने वाला शाकाहारी भोजन और अन्य व्यंजन लाजवाब हैं। विद्यार्थियों और आगंतुकों की भीड़ देखते बनती है। नितांत खामोशी भरी इस दुनिया में कोई चिल्लाकर आर्डर नहीं देता। सिर्फ और सिर्फ इशारों और हावभाव से बातें होती हैं। इस प्रभावी पहल को धरातल पर उतारने वाले युवा संदीप और साहिल अपनी टीम के साथ व्यस्त रहते हैं। ऑर्डर पर ऑर्डर मिलते रहते हैं और ग्राहकों तक लजीज खाना और अन्य बेहतरीन व्यंजन पहुंचते रहते हैं, जो एकदम किफायती भी हैं। काबिलेगौर यह भी कि दो मूक-बधिर युवाओं का यह स्टार्टअप अब इग्नू के स्लेबस में शामिल हो गया है। मैनेजमेंट के विद्यार्थी इस मॉडल की सफलता को समझ नए आइडिया विकसित करेंगे। ‘डैफेटेरिया’ के मेन्यू कार्ड पर व्यंजनों के नाम के साथ-साथ उनके साइन लैग्वेज बने हुए हैं। जब कोई छात्र या अन्य यहां ऑर्डर देता है, तो वह केवल पैसे नहीं चुकाता, बल्कि अपनी अंगुलियों को मोड़कर ‘थैंक यू’ या ‘वेलकम’ कहना भी सीखता है। काउंटर पर खड़े मूक-बधिर युवा ग्राहकों के इशारों को पलक झपकते समझते हैं और चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान बिखेरते हुए खाना परोसते हैं। इस फूड ट्रक स्टार्टअप के अनोखे मॉडल को इतनी लोकप्रियता मिली है कि इसे राष्ट्रपति भवन में आयोजित पर्पल फेस्ट में भी देश के सामने प्रदर्शित होने का गौरव मिल चुका है।

Thursday, September 10, 2026

वक्त जब बदले अपना मिज़ाज

 नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने लगभग तेरह सौ लोगों की जान ले ली और हजारों लोग लापता हो गये, नेपाल-तिब्बत के हिमालयी इलाकों में प्रकृति ने जो तबाही का तांडव मचाया उससे प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते मनुष्य को भी फिर से एक बार चेताया कि यदि वक्त रहते नहीं सुधरे तो आनेवाले समय में इससे भी अधिक विनाश का सामना करना पड़ सकता है। 2026 की छब्बीस जुलाई को कम अज़ कम नेपाल के लोग तो कभी भी नहीं भूल पायेंगे। चारों तरफ कीचड़ और मलबा। पानी ही पानी और अपनी जान बचाने के लिए जद्दोजहद करते स्त्री, पुरुष और बच्चे। जानवरों का तो भगवान ही मालिक था। इस खौफनाक मंजर की तस्वीरें, खबरें जब दूर-दराज बैठे लोगों ने सुनी और देखीं तो हाथ जोड़कर परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे कि हम पर दया बनाये रखना और ऐसी कोई भी आपदा न आने देना। जिस तरह से ग्लेशियर फटने से नेपाल में तबाही हुई वैसे ही खतरे की आहटें भारत में भी सुनाई देने लगी हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की मानें तो भारत की 40 जगहों पर काल मंडरा रहा है। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर से सटे भारतीय इलाकों में बनी 7 झीलें तो इतने अधिक खतरे में हैं कि लोगों की जानों पर कभी भी बड़ा संकट आ सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि, हम भले ही अलग-अलग देशों में रहते हों लेकिन प्रकृति में होने वाले बदलाव के असर से अछूते नहीं हैं। पर्यावरण के क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहे विद्वानों के अनुसार, दरअसल, शुरुआती खबरों के बाद लोगों को लगा था कि भूकंप के झटकों से नेपाल में जमीन खिसकी होगी और भूस्खलन के कारण ही यह भीषण बाढ़ आई। बाद में साफ हुआ कि आपदा की शुरुआत बर्फ व चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से हुई। इससे अचानक तेज बाढ़ आई और भारी मात्रा में मलबा मौत बन नीचे की ओर बह निकला। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि बर्फ, चट्टान और तलछट का यह बड़ा हिस्सा समुद्र तल से करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई से 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा। इससे नीचे बह रही नदी कुछ समय के लिए बंध गई और वहां एक झील बन गई। जब गलेशियर से आया पानी इस झील में भरा, तो अस्थायी बांध टूट गया और पानी का तेज बहाव सीमा के दोनों ओर बसे गांव तक पहुंचकर विनाशकारी गाथा लिख गया। 

जिनके घर कच्चे थे उन्हें तो बाढ़ अपने साथ बहा कर ले गई। भूस्खलन से मची तबाही ने अनेकों अच्छे-भले मकानों को भी नहीं छोड़ा। कई घरों में नीचे वाले फ्लोर पर पानी भर चुका था और पहली, दूसरी मंजिल पर बैठे और खड़े लोगों को मौत एकदम सामने दिखायी दे रही थी। उनकी सांसें अटकी की अटकी थीं। अनेकों उम्रदराज स्त्री-पुरुषों को जब विनाशकारी बाढ़ के बीच से बाहर निकाला गया तो उनके हाथ, पैर कांप रहे थे। आवाज़ थरथरा रही थी और आंखों में अनंत खौफ भरा था। मौत के मुंह से निकलने के सात-आठ दिन बीतने के बाद भी उस पल को भूल नहीं पाये थे। कई उम्रदराज लस्त-पस्त जो ओल्डहोम के ग्राउंडफ्लोर में रहते थे उन्हें बचाया नहीं जा सका। कई लोगों ने डूब चुकी बस्तियों से भाग कर पहाड़ियों की शरण ली तो कहीं उनकी जान बच पाई। बाढ़ के बीच फंसकर ईश्वर की लीला को हतप्रभ देखते अनेकों वृद्धों तथा बच्चों की आपबीती की असंख्य दिलदहलाने वाली बाढ़ दास्तानों के बीच कीचड़ से लथपथ संतानवें वर्षीय मायाबोहरा को बचाव दल ने काफी मेहनत के बाद जीवित बाहर निकाला। बचाव अभियान को कई घटों से मलबे में फंसी महिला के बचे होने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद ही नहीं थी।

छह साल की मासूम मनीषा 60 घंटे तक कीचड़ और मलबे में दबी रही। यहां भी ईश्वरीय चमत्कार सभी को चमत्कृत कर गया। भारी बारिश के कारण जब घर का ढांचा गिरा तो लकड़ी के मलबे का एक हिस्सा मनीषा के सिर के ठीक ऊपर इस तरह टिक गया कि वहां हवा की आवाजाही के लिए एक छोटा सा एयर पॉकेट बन गया। इस छोटे से गैप की वजह से भारी कीचड़ और मलबा उसके चेहरे और नाक को पूरी तरह से ढक नहीं पाया, जिससे उसे लगातार ऑक्सीजन मिलती रही। लगातार 60 घंटों यानी ढाई दिनों तक उसने दमघोटू अंधेरे और भीषण गर्मी को झेला, वो भी बिना भोजन और पानी के यह चमत्कार नहीं तो क्या है? इलाज के दौरान अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने अत्यंत भोलेपन के साथ पिता से कहा, ‘‘मैं जिन्दा हूं, मम्मी पापा। लेकिन आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?’’ कुदरत के भीषण कहर से संघर्ष करते-करते किसी तरह से बच निकले माता-पिता की आंखों से बस आंसू बहते रहे और नेपाल सशस्त्र पुलिस बल और नेपाली सेना की टीम का मन ही मन शुक्रिया अदा करते हुए नतमस्तक होते रहे। 28 अगस्त की शाम जब कर्मठ जवान मलबे के ढेर में फंसे लोगों की खोजबीन कर रहे थे तब एक सतर्क जवान को किसी बच्चे के रोने की बहुत धीमी-धीमी आवाज सुनायी दी। मशीनों का इंतजार करने की बजाय जवान बड़ी सावधानी से  कीचड़ और पत्थरों को हटाने में लग गए। ज़रा सी चूक होने पर मलबा धंस सकता था। इसलिए अत्यंत सावधानी से एक-एक लकड़ी और पत्थरों को हटाकर मनीषा को सुरक्षित बाहर निकाला गया। बाहर निकालते ही जवानों ने उसे प्राथमिक उपचार दिलाया तथा पानी पिलाया। 

नेपाल की पहली महिला पायलट प्रिया अधिकारी ने बाढ़ और भूस्खलन की जानलेवा पीड़ा से जूझते लोगों को राहत पहुंचाने के लिए अपनी रातों की नींद की कतई परवाह नहीं की। प्रिया ने छह दिनों में करीब 160 बचाव मिशन पूरे किए। वह दिन-रात भूखी-प्यासी हिमालय के बेहद कठिन इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाकर लोगों को सुरक्षित निकालने और शवों को बरामद करने के अभियान में जुटी रहीं। बाढ़ से प्रभावितों की मदद के लिए कई स्कूली बच्चों ने अपनी गुल्लकों में जमा रकम और जेब खर्च से बचाए रुपयों को दान देकर मानवता और समझदारी का परिचय दिया। काबिलेगौर यह भी है कि, इनमें कई बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने बाढ़ में अपने माता-पिता को खोया है। रोंगटे खड़े कर देने वाली त्रासदी को जिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा और जिंदा बच गए उनके लिए तो यकीनन यह किसी चमत्कार से कम नहीं। हमारे देश भारत के भी कई लोग प्रलयकारी बाढ़ में फंसकर हैरान-परेशान होते रहे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षित लाने में अपनी संपूर्ण ताकत लगा दी फिर भी कुछ की मौत हो गई और कुछ का कोई अता-पता नहीं! भीषण बाढ़ से बचकर निकले वेलाचेरी के मुरुगु नगर के एक दंपत्ति ने बताया कि बच निकलने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ हो। नावू कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी उन 21 लोगों में शामिल थे, जो गत दिनों नेपाल के काठमांडू से चेन्नई पहुंचे। कुंभकोणम की एक एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर रहे 57 लोगों का एक समूह तीन बसों में सवार होकर रासुवा इलाके से गुज़र रहा था, जो बाढ़ की चपेट में आ गया। वे दो पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़क पर यात्रा करते हुए आस-पास के खूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहे थे। इस सड़क मार्ग के नीचे एक नदी बह रही थी। अचानक, कुछ ही सेकंड में रासुवा का इलाका आपदा क्षेत्र में बदल गया-तेज़ आवाज़, गिरते पत्थर-चट्टानें, कीचड़ और मलबे के साथ तेज़ी से बहता बाढ़ का पानी।

तीनों बसों में से स़िर्फ दूसरी बस ही बाढ़ की चपेट में आने से बची। विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, कुछ मिनटों तक तो हमें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। मैंने देखा कि हमारे पीछे वाली बस झुक रही थी। मैं वह नज़ारा और ज़्यादा देर तक नहीं देख सकी; तभी मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। उस पल को याद करते हुए नावू कबीरदास बोले कि अचानक धमाके जैसी तेज़ आवाज़ हुई और गाड़ी पर पत्थर गिरने लगे। फिर, बाढ़ का पानी तेज़ी से अंदर आने लगा, जैसे कोई बांध खोल दिया गया हो। बाढ़ आने से पहले, उस इलाके से गुज़र रही उनकी बस कीचड़ में फंस जाने के कारण कुछ देर रुकी। उन्हीं कुछ मिनटों ने हमारी जान बचाई। उनका ड्राइवर नेपाल का रहने वाला एक स्थानीय व्यक्ति था। यह पहाड़ी इलाका था जहां अक्सर भूस्खलन और हिमस्खलन होते रहते थे। बाढ़ का पानी देखते ही उसे ख़तरे का अंदाज़ा हो गया। उसने सबसे कहा कि वैन से बाहर निकलें और ऊंची जगह पर जाना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है, फिर वह खुद भी सुरक्षित जगह की ओर भागा। हम भी उसी रास्ते पर गए। उस समय हमारे दिमाग में स़िर्फ हमारे बच्चे ही थे। बचने के लिए उन्हें ऊंची जगह पर चढ़ना पड़ा। कुछ लोगों को छोड़कर, बचे हुए 21 लोगों में से ज़्यादातर की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह कीचड़ और गाद से ढंकी ढलान पर चढ़ना पड़ा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते सांस फूलने लगी फिर भी उनका बताना जारी रहा, ‘‘एक और महिला और मैंने चढ़ना शुरू किया, लेकिन आधे रास्ते में ही फिसलकर गिर गईं। मैं दो बार फिसली। मेरे पैर कीचड़ से सने हुए थे और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था। आखिरकार, वह एक दूसरी महिला की साड़ी को मज़बूती से पकड़कर ऊपर पहुंच पाईं-वह महिला पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थी और उसने अपनी साड़ी उतारकर नीचे की ओर बढ़ाई थी। वह बताती हैं, मेरी रिश्तेदार, पूंगोडी, पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थीं। उस दिन स़िर्फ वही साड़ी पहने हुए थीं। उसने स्वेटर पहना, अपनी साड़ी उतारी और हमारे लिए नीचे लटका दी। हमने उस साड़ी और पास के एक केबल को पकड़कर खुद को ऊपर खींचा। वह आगे कहती हैं, मिट्टी के एक ऐसे टीले पर चढ़ने में हमें डेढ़ घंटा लग गया, जो एक इमारत जितना ऊंचा था। एक बार तो, मैंने जिस पेड़ की टहनी को पकड़ा, वह टूट गई। उसके बाद, पेड़ों को पकड़ने के बजाय, हमने ऊपर चढ़ने के लिए साड़ियों को पकड़ा। आखिर में एक महिला ऊपर नहीं पहुंच पा रही थी; हमने उससे कहा कि वह अपनी कमर के चारों ओर साड़ी बांध ले और हमारे ग्रुप के सदस्यों ने उसे पकड़कर ऊपर खींच लिया। ऊपर पहुंचने पर उन्हें एक आपदा राहत केंद्र मिला। वहां मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें ठीक होने में मदद के लिए पानी और बिस्किट दिए। जिन लोगों के मोबाइल में सिग्नल था, उनके ज़रिए उन्होंने तमिलनाडु में ख़बर भेजी कि वे सुरक्षित हैं। विजया भुवनेश्वरी ने बताया कि, हमारे ग्रुप के एक सदस्य के रिश्तेदार सचिवालय में काम करते हैं। उनके ज़रिए हम सरकार से संपर्क कर पाए। हमने सबूत के तौर पर एक फ़ोटो भेजी कि हम सुरक्षित हैं। ऊपर चढ़ते समय, उन्होंने कीचड़ में फंसे एक व्यक्ति को हाथ हिलाते हुए देखा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते आंखें भीग गईं, ‘‘उसे देखने के बाद, न तो हम और ऊपर चढ़ सकते थे और न ही वहां रुक सकते थे। बचाव दल को सूचना दी गई और बाद में उस व्यक्ति को बचा लिया गया।’’ ऊपर चढ़ने के बाद ही हमने उस बस को ढूंढ़ा जिससे हम आए थे। हमें स़िर्फ अपनी बस दिखाई दी, उसके आगे कई गाड़ियां पलटी हुई थीं। एक गाड़ी का स़िर्फ टायर दिख रहा था। तभी हमें कीचड़ धसने की गंभीरता का एहसास हुआ।

वे डेढ़ दिन तक आपदा राहत केंद्र में रहे। उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं; एक मंज़िल की ऊंचाई वाले मिट्टी के ढेर पर चढ़ने के बाद उन्हें अब 20 मंज़िला इमारत जितनी ऊंचाई वाले खड़ी ढलान वाले पहाड़ी इलाके से गुज़रना था। यह एक संकरा, एक कतार में चलने वाला रास्ता था। हमें तो यह भी नहीं पता कि हम उस पर कैसे चढ़ पाए। दोनों तरफ़ घनी झाड़ियां थीं। हम बस ज़िंदा रहने की ज़बरदस्त इच्छाशक्ति के दम पर ऊपर चढ़े। यह सफ़र बहुत मुश्किल था, क्योंकि उनमें से किसी को भी पर्वतारोहण का अनुभव नहीं था। ज़मीन कीचड़ और दलदल से भरी थी, जिससे हम बार-बार फिसल रहे थे। एक गलत क़दम का मतलब था 50 फ़ीट नीचे गिरना। एक जगह हमने गलत मोड़ ले लिया। एक नेपाली व्यक्ति ने हमें रास्ता दिखाया, हमें नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी दिशा में ऊपर जाना पड़ा। ऊपर चढ़ने से ज़्यादा मुश्किल नीचे उतरना था, बार-बार बैठकर और धीरे-धीरे खिसकते हुए नीचे उतरना पड़ा। तीन घंटे बाद, वे तय पिकअप पॉइंट पर पहुंचे। वहां से उन्हें आर्मी के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। नेपाल में भारतीय दूतावास से संपर्क करने के बाद, वे अपने-अपने घर लौट आए। चेन्नई, कडलोर, मयिलादुथुराई, कृष्णगिरि और त्रिची जैसे इलाकों में फंसे 21 लोगों का तमिलनाडु सकुशल लौटना संभव हुआ। मंत्री राजमोहन के अनुसार, राज्य से 400 से ज़्यादा लोग नेपाल गए थे और उनमें से 90 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।

महाविनाश और दिल दहलाने वाले सात-आठ दिन गुजर जाने के बाद भी जिन परिवारों के लापता लोगों की कोई खबर नहीं मिली उनमें से कई ने तो उनकी प्रतीकात्मक अंत्येष्टि भी कर दी। नदी किनारे चिताएं तो जलीं, लेकिन उनके शव नहीं थे। उनके स्थान पर उनकी तस्वीर या प्रतीक रख परिजनों ने अत्यंत दुखी मन से अंतिम रस्में निभाईं, ताकि  उनकी आत्मा को शांति मिल सके। कुछ ऐसे शव भी थे। जिनके अपनों का पता नहीं चलने के कारण सरकार ने सामूहिक अंतिम संस्कार किया। भारत सरकार ने बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावितों के लिए कई-कई टन राहत सामग्री भेजने के साथ खोज और बचाव अभियानों के लिए विभिन्न उपकरण तथा चिकित्सकों को भेजा। भारत के लोकप्रिय फिल्म अभिनेता और जाने-माने समाजसेवी सोनू सूद तथा युवा संत बागेश्वर महाराज आदि ने कई ट्रक राहत सामग्री नेपाल में भेजकर मानवता का धर्म निभाया।

Thursday, September 3, 2026

मां बस मां

 चित्र-1 : ज़िन्दगी से हैरतअंगेज और कुछ भी नहीं। यहां हर कोई अपनी-अपनी ‘कभी खुशी कभी गम’ नामक फिल्म का निर्माता है। यथार्थ के ताने-बाने में बुनी यही फिल्म कभी उसे रूलाती है तो कभी खुश कर जाती है। गरीबी अमीरी और खून के रिश्ते अपनी जगह। इनके वजन के समक्ष और कुछ भी नहीं। सब हवा-हवाई है। नितांत खोखला है। वो अस्सी के दशक का दौर था। अब की तरह तब भी एक मां मेहनत-मजदूरी कर अपने दो बच्चों के भविष्य के निर्माण में लगी थी। इसके लिए वह दूसरों की निर्माणाधीन गगनचुंबी इमारतों के लिए ईंट-सीमेंट ढोती और उसका छह साल का बच्चा रघु और उससे पांच वर्ष बड़ा गुड्डू भी चंद सिक्के पाने के लिए रेलवे स्टेशन पर चल देते। कोई दयालू यात्री खाने को देता तो खा लेते। नहीं तो भूखे रह जाते। नींद आती तो प्लेटफार्म के किसी कोने में सो जाते। दोनों ने रेलगाड़ी तो देखी थी लेकिन कभी चढ़े नहीं थे। एक दिन रघु रात में पेट में दर्द होने के कारण सो नहीं पाया था। उसकी आंखें बार-बार बंद हुई जा रही थीं। तभी उसकी निगाह सामने खड़ी खाली ट्रेन की बोगी पर जा पड़ी। उसने इधर-उधर देखा। भीड़ में बड़ा भाई कहीं दिखायी नहीं दिया। नन्हा-मुन्ना रघु बड़ी फुर्ती से बोगी में जाकर लेट गया। पलक झपकते ही उसकी आंख लग गई। गहरी नींद ने उसे अपने आगोश में ऐसे ले लिया जैसे मां अपने बच्चे को गोद में ले लेती है। कुछ घंटे के बाद रघुकी नींद खुली। ट्रेन हवा से बातें कर रही थी। ट्रेन के डिब्बे में वह नितांत अकेला था। कई घंटे के पश्चात जब टे्रन रुकी तो वह सोलह सौ किलोमीटर का सफर तय कर कोलकाता पहुंच चुकी थी।

घबराया और डरा बच्चा नीचे उतरा। प्लेटफार्म से बाहर निकलकर भूखे पेट इधर-उधर देखता रहा। एक पुलिस वाले की उस पर नज़र पड़ी तो उसके घर-परिवार का पता लगाने की कोशिश शुरू हो गई। लेकिन मासूम कुछ भी नहीं बता पाया। फिर भी उसके अपनों का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। थक-हारकर प्रशासन ने उसे अनाथआश्रम भेज दिया। कुछ महीनों के बाद आस्ट्रेलिया का एक संपन्न परिवार बच्चा गोद लेने के इरादे से आश्रम आया तो उसे रघु एकदम जच गया। आस्ट्रेलिया के तस्मानिया शहर में रहने वाले दंपत्ति ने उसे नया नाम देते हुए अच्छी तरह से देखभाल करनी प्रारंभ कर दी। नया देश, नया घर और बेइंतहा प्यार पाकर भी रघु अपनी मां और भाई को भूल नहीं पाया। वह धीरे-धीरे बड़ा होता चला गया। बचपन की धुंधली यादें उसके साथ-साथ चलती रहीं। वह तीस वर्ष का हो चुका था। दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उसे हासिल थी। सोशल मीडिया के जमाने ने तेजी से दस्तक दे दी थी। रघु जब खाली होता तो कंप्यूटर खोलकर बैठ जाता। उसे यकीन होता चला गया कि गूगल एक न एक दिन जरूर उसे उसकी मां और भाई से मिला देगा। जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है। एक दिन जब वह कंप्यूटर स्क्रीन पर भारत के रेलवे स्टेशनों और रेल पटरियों को खंगाल रहा था, तभी उसकी सतर्क निगाहें एक जगह पर अटकी की अटकी रह गईं। बिल्कुल वही रेलवे स्टेशन, वही प्लेटफार्म और वही पानी की टंकी जहां पर वह अपने भाई के साथ अक्सर बैठ जाता था। रघु ने अपने बचपन की खोज कर ली थी। अब तो बस वह किसी भी तरह से भारत पहुंच जाना चाहता था। दिल की बेकाबू धड़कन के साथ वह यह भी सोचने लगा कि लगभग छब्बीस साल बीत चुके हैं। मां जिन्दा होगी भी या नहीं। यदि होगी तो उसे पहचान भी पाएगी? वर्ष 2012 के एक दिन युवा रघु अपने गांव बुरहानपुर जा पहुंचा। जैसे ही उसने छोटी सी झोपड़ी के सामने कदम रखे वहां से एक उम्रदराज महिला बाहर निकली। दोनों की नज़रें मिलीं और छब्बीस साल की जुदाई का लंबा फासला सेकंडों में सिमट गया। मां ने फौरन अपने बेटे को गले से लगा लिया। हर किसी को झकझोर कर रख देने वाली इस हकीकत पर आगे चलकर हॉलीवुड में एक फिल्म बनी। ‘लॉयन’ नाम की इस दिल को छू लेनेवाली फिल्म को छह ऑस्कर नॉमिनेशंस मिले। लेकिन एक मां के लिए अपने खोये बेटे से वर्षों बाद मिलना और सीने से लगाना ऑस्कर से भी बड़ा इनाम था।

चित्र -2 : इंदौर में स्थित ‘निराश्रित आश्रम’ में 85 वर्षीय सरिता की मौत हो गई। उसका एक जवान बेटा था। वही उसे साढ़े चार साल पहले आश्रम में यह कहकर छोड़ गया था कि चिन्ता मत करना, मैं दो दिन के बाद आकर तुम्हें ले जाऊंगा। मां को अपने बेटे पर यकीन था। कुछ दिन पहले ही बेटे ने मां के नाम के मकान को बेचा था, जिसे उसके दिवंगत पिता ने मां को खरीदकर दिया था। बेटा रोज-रोज आर्थिक तंगी का रोना रोता रहता था तो बूढ़ी मां पसीज गई थी। हालांकि उसके पति ने उसे कई बार सख्त हिदायत दी थी कि अपने जीते जी इस मकान को भूलकर भी बेटे-बहू या पोते-पोती का नाम न करना। बेचने की अनुमति देने की तो बिल्कुल सोचना ही नहीं। यहां किसी का कोई भरोसा नहीं। लेकिन फिर भी मां ने भरोसा कर लिया। बेटा-बहू जब देखो तब अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने में आ रहे धन के घोर अभाव का राग गाने बैठ जाते। शुरू-शुरू में तो उसे अपने पति का कहा याद रहा लेकिन कालांतर में किन्हीं भावुक क्षणों में उसके मन में विचार आया कि मेरे होते मेरे बच्चे परेशानी झेलें तो मेरा जीना किस काम का? उसे कहां पता था कि घर बिकते ही उसे एकदम बेगाना कर दिया जाएगा। जीवन का आखिरी वक्त वृद्धाश्रम में घुट-घुट कर बिताना पड़ेगा। जिस बेटे को उसने अपनी जान से ज्यादा चाहा, परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी वह उसके बुढ़ापे का सहारा बनने की बजाय इतना निष्ठुर हो जाएगा कि उसके इंतजार में पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह तड़पती रहेगी। उसके पास एक ही चश्मा था। आंखों की रोशनी कम हो जाने के कारण चश्मे का नंबर बदल चुका था। आश्रम के व्यवस्थापक ने जब उसे नया चश्मा लाकर दिया तो वह बहुत खुश होकर बोली थी कि बहुत जरूरी था यह मेरे लिए। मेरा बेटा जब आयेगा तो ठीक से उसे देख तो सकूंगी। मां को आखिरी सांस तक यकीन था कि बेटा जरूर आयेगा। लेकिन वह नहीं आया। आश्रम प्रबंधन ने उसे मां के निधन की बार-बार सूचना दी लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। फिर भी बेटे के आने की राह देखी गई। पूरे तीन दिन तक मां का शव बेटे का इंतजार करता रहा। आखिरकार पूरे सम्मान के साथ अभागी मां का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

चित्र-3 : महाराष्ट्र में एक ऊंची पहाड़ी से गिरते बाप-बेटे और चंद सेकंड के बाद मां के छलांग लगाने का वीडियो जिसने भी देखा बस सन्न रह गया। आपसी विवाद, कलह-क्लेश की ऐसी भी परिणति हो सकती है वो सभी ने देखी। लड़ाई-झगड़े और मनमुटाव किस घर-परिवार में नहीं होते! इस कहानी का मुख्य पात्र कुणाल है जिसकी अपने पिता मुरलीधर से अनबन चल रही थी और मां दोनों के बीच पिस रही थी। कुणाल कोई आवारा किस्म का लड़का नहीं था। दसवी की परीक्षा में उसने 92 प्रतिशत अंक पाये थे। उसके माता-पिता आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। कुणाल अपनी मां के साथ था। कुणाल चाहता था कि माता-पिता भी साथ रहे। उनके बीच दूरी की वजह एक दूसरी औरत भी थी। इसके साथ और भी कुछ जमीन संबंधित पारिवारिक विवाद थे जिनकी वजह से तनाव की स्थिति बनी रहती थी। उनके बड़े बेटे की कुछ वर्ष पूर्व बीमारी के कारण मौत हो गई थी। इससे भी उन्हें बहुत सदमा लगा था। कुणाल की मां संगीता खुद को व्यस्त तथा मन को शांत रखने के लिए सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने लगी थी। उसने अपना एक यू-टयूब चैनल बनाया था, जिसमें तरह-तरह के वीडियोज पोस्ट करती रहती थी। मुरलीधर को संगीता का सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना रास नहीं आता था। तस्वीरों तथा वीडियो में संगीता जिस तरह से खुश दिखायी देती थी। उससे कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि कैमरे के सामने की मुस्कराहट के पीछे कितनी अशांति, तनाव और परेशानी अपना डेरा जमाये है।

कुणाल के पिता ट्रक चलाते थे। बेटे कुणाल ने उनसे बगैर पूछे महंगा मोबाइल फोन खरीदा था, जिसकी किश्ते भरने में उसे मुश्किल हो रही थी। पिता भी आर्थिक परेशानियों के चलते टालमटोल कर रहे थे। पिता के इस व्यवहार से भी वह आहत था। उसने पिता की मजबूरी को समझने की कोशिश नहीं की और पिछली बार की तरह इस बार भी पिता से तीखी बहस करने के पश्चात पहाड़ी पर चला गया। बेटा कहीं खुदकुशी न कर ले, इस डर से मां संगीता और पिता मुरलीधर तुरंत वहां जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि कुणाल पहाड़ी के शिखर के एकदम किनारे खड़ा है। दोनों उससे पीछे हटने की गुहार लगाने लगे। जवाब में कुणाल ने अपना आईफोन, कलाई घड़ी और चांदी की चेन उतार फेंकी और मां से कहने लगा कि मेरी बात कोई नहीं सुनता। ऐसे में मेरी जीने की इच्छा नहीं रही। मेरी जिन्दगी की किसी समस्या का समाधान नहीं निकल पा रहा है। अब कुछ ठीक होगा भी नहीं। तीन घंटे तक उसे मनाने की कोशिशें चलती रहीं। जिद्दी बेटे को मनाने के लिए मां को अंतत: कहना पड़ा कि मैं जीवनभर तुम्हारे ही साथ रहूंगी। अपने पति से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ दूंगी। यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं तो मैं अपना मंगलसूत्र अभी उतारकर फेंक देती हूं। बस अब एक बार तुम मेरा कहना मान लो। मां के बेटे के प्रति प्रेम लगाव, अपनत्व और स्नेह की ऐसी पराकाष्ठा! जहां पति पीछे तो बेटा बहुत पहले! मां के अंदर की गहराई को काश औलादें भी समझ पातीं। इस बीच घबराये पिता मुरलीधर बेटे को पकड़ने के लिए आगे बढ़े तो दोनों का संतुलन ही बिगड़ गया और दोनों ढाई सौ फीट गहरी खाई में जा गिरे। इस दर्दनाक मंजर को देखते ही सिर्फ चार सेकंड के भीतर मां संगीता ने भी पहाड़ी से छलांग लगाकर मौत का दामन थाम लिया। पहाड़ी पर और भी कई लोग जमा थे। नीचे भी भीड़ थी। अधिकांश लोग धड़ाधड़ वीडियो बनाने में लगे थे। कोई भी कुणाल को बचाने के लिए आगे नहीं आया। और एक परिवार पूरी तरह से खत्म हो गया।

चित्र-4 : मां बस मां होती है। ममता का कभी न सूखने वाला सागर। उसके स्नेह, दुलार और अपनत्व का अमृत यहां भी बरसता है और दूर बहुत दूर सात समंदर पार भी। कहीं कोई फर्क नहीं। अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी तूफान से लोहा लेने को तत्पर रहने वाली मां जरूरी नहीं कि शारीरिक रूप से बहुत शक्तिशाली हो। उसके मन की विशालता को नापने वाला अभी तक कोई पैमाना नहीं बना। न्यूयार्क में रहती हैं जेसिका फ्लेचर। उनका एक 11 साल का बेटा है। नाम है, हंटर। हंटर ठीक से नहीं बोल पाता है। दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने, खेलने में उसे कोई रुचि नहीं। बात करते समय अक्सर उसकी नज़रें झुकी की झुकी रहती हैं। हंटर की मां उसकी कमजोरी को खूब जानती और समझती हैं। जेसिका अपने बेटे हंटर के साथ एक रेस्टारेंट में खाना खाने गई थी। हंटर बोल नहीं पाने के कारण एक डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करता है। अचानक उस डिवाइस की बैटरी खत्म हो गई। बेटे के लिए अपनी बात कहना, बताना मुश्किल हो गया। मां जेसिका बहुत परेशान हो गईं, तो हंटर ने एक नेपकिन उठाया और उस पर कीबोर्ड बनाया और अपनी पसंद का खाना बताने लगा। हंटर के इस तरीके ने जेसिका को एक नया रास्ता दिखा दिया। जेसिका समझ चुकी थी कि टेक्निक कभी भी धोखा दे सकती हैं, इसलिए उन्होंने एक टैटू आर्टिस्ट की मदद से अपनी हाथ पर कीबोर्ड का पक्का टैटू ही बनवा लिया। अब जब भी डिजिटल डिवाइस बंद हो जाता है तो बेटा मां के हाथ पर बने अक्षरों को छूकर अपनी बात समझा देता है। जेसिका के इस टैटू में वर्ड स्माइली और एक दिल का सिंबल भी बना हुआ है। टैटू देखने के बाद बेटे ने मां के हाथ पर पहला शब्द टाइप किया, ‘मम्मा।’ मां का ये अनोखा तरीका बेटे को बहुत पसंद आया। सोशल मीडिया पर मां-बेटे की ये स्टोरी खूब वायरल होती रही और लाखों लोगों के दिलों को सतत छूती रही।


Thursday, August 27, 2026

नक्सली-नक्सली

 कुछ शातिर चेहरे देश में गहरी गड़बड़ और उठापटक करने के सपने देख रहे हैं। दरअसल, जब से कर्मठ माननीय नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तभी से ऐसे लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है। इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य के संकल्पों की बात करते-करते ‘दिमागी नक्सल’ से सतर्क और सावधान करने की अपील क्या की, कि राई का पहाड़ बनाने वाले सफेदपोश उछल-कूद मचाने लगे। उन्होंने तो किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कहावत तो कुछ ऐसे चरितार्थ हुई कि क्या कहें? स्वघोषित नक्सलियों की कतार लग गई। आतंकवाद, नक्सलवाद, आतंकवादी, नक्सलवादी, देशद्रोही जैसे शब्द कोई नये शब्द नहीं हैं। नक्सलवाद के राष्ट्रद्रोही खूनी वार को भारत माता ने अनेकों वर्षों तक झेला है। खुद को बड़े गर्व के साथ नक्सली तथा माओवादी कहने-कहलवाने वाले कोई गैर नहीं अपने ही थे। लेकिन थे तो दुश्मन से बदतर ही। उनका खात्मा करने के लिए सरकार ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। अंतत: सफलता भी पायी। हालांकि अव्यवस्था और तनाव बढ़ाने वाले नक्सलियों के कुछ अंश अभी भी बचे हुए हैं। जंगलों में कम, शहरों में ज्यादा।

नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवादी गांव से हुई थी। इसी गांव के नाम पर इसे नक्सलवाद नाम दिया गया। चीनी साम्यवादी नेता माओत्सो तुंग की विचारधारा से प्रेरित वामपंथी नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे आदिवासी और किसान नेताओं को जब लगा कि भारत में सामंती सोच रखने वाले जमींदारों के द्वारा गरीब, किसानों तथा आदिवासियों का इस कदर शोषण और अन्याय किया जा रहा है, जिससे वे भुखमरी और तमाम बदहाली से जूझ रहे हैं तो उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत की। हथियारबंद क्रांति के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रारंभ हुआ, यह आंदोलन बंगाल से निकलकर धीरे-धीरे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्रप्रदेश के आदिवासी इलाकों में तेजी से फैलते हुए सरकारों के लिए सिरदर्दी और गहन चिंता का विषय बनता गया। 

जब नक्सलवाद के संस्थापकों की एक-एक कर मौत हो गई तो जो बचे और नये-नये जुड़े थे उनमें आदिवासियों की चिंता कम और खुद के कल्याण की भावना घर करती गई! भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों की तरह उन्होंने भी शहरों में बंगले बना लिये, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेशों में भेजना प्रारंभ करते हुए किसानों तथा आदिवासियों के बच्चों को अनपढ़ बनाये रखते हुए बंदूकों और बारूदों के बीच मरने-मारने के लिए छोड़ दिया। समय बीतने के साथ-साथ नक्सली नेता ही आदिवासियों को न्याय दिलाने की बजाय उन पर जुल्म ढाने लगे। उन पर दबाव डाला जाने लगा कि वे अपने बच्चों को उनके हिंसक आंदोलन से जोड़ें। खुद भी तन-मन और धन से साथ दें। आदिवासियों के हित के लिए निर्धारित सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधाएं खड़ी की जाने लगीं। ठेकेदारों, व्यापारियों, नेताओं तथा उद्योगपतियों को डरा-धमकाकर मोटी धन-वसूली कर धड़ाधड़ हथियार खरीदे जाने लगे और पुलिस, सुरक्षा बलों तथा आम जनों को मौत के घाट उतारा जाने लगा। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा तथा महाराष्ट्र के अंदरूनी क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, सड़कें न बन पाएं तथा विकास कार्य ठप रहें, इसके लिए तरह-तरह के अड़ंगे डाले गये। खून-खराबा भी किया गया, जिससे बड़ी-बड़ी कंपनियां निवेश करने से बचती रहीं। इससे देश को अत्याधिक आर्थिक नुकसान हुआ। आदिवासी इलाकों में जो विकास कार्य होने चाहिए थे वे कई वर्षों तक ठिठके और पूरे तरह से थमे के थमे रहे। सड़कों, पुलों और रेल लाइनों को बारूदों से उड़ाने वाले दुर्दांत नक्सली यही चाहते थे कि जंगली इलाकों में रहने वाले लोग विकास से अछूते रहकर सरकार को कोसते हुए उनके इशारों पर ही नाचते रहें। वर्षों तक हुआ भी यही। सुरक्षा बलों को नक्सलियों तक पहुंचने में अनेकों तकलीफों तथा संकटों का सामना करना पड़ता था। सुरक्षा बलों की योजना और तैयारी की नक्सलियों को पहले ही खबर लग जाती थी। उन्हें सतर्क कर दिया जाता था। इस काम में उन्हें उन लोगों का साथ और सहयोग मिलता था, जिन्हें जान से हाथ धोने का भय दिखाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता था। अर्बन नक्सली भी इस ‘राष्ट्रद्रोही’ कृत्य में खासी भूमिका निभाते थे। दरअसल, नगरों-महानगरों में अय्याशी कर रहे शहरी नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की शहादत पर हमेशा शर्मनाक मौन साधे रखा और हत्यारे नक्सलियों की मौत पर ज़ार-ज़ार आंसू बहाए और नंग-धड़ंग होकर मानवाधिकार के ढोल पीटे। नक्सलियों ने आधी-सदी तक भारत माता को आहत करते हुए चार हजार आदिवासियों तथा अन्य निर्दोषों की जानें ले लीं। अनेकों को तो इस शक में मार डाला गया कि वे पुलिस के मुखबिर हैं। लगभग साढ़े तीन हजार पुलिस व सुरक्षा बल के जवानों की शहादत पर भी बुद्धिजीवी अर्बन नक्सली कभी कुछ नहीं बोले। इनकी आंखों के सामने ही घने जंगलों में स्थित स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, रेलमार्गों तथा बिजली जैसी विकास परियोजनाओं को बम से उड़ाकर नुकसान पहुंचाया गया। हजारों गरीब आदिवासी नवयुवकों, युवतियों, बच्चों के भविष्य पर डाका डाला गया, कई परिवार तबाह हुए, उजड़े, बिखरे, बार-बार प्रताड़ित हुए लेकिन आतंकवादियों के यह शुभचिंतक सरकार को ही कसूरवार ठहरा कर केवल और केवल उसे ही कोसते रहे। 

पूर्व की केंद्र की सरकारें ढुलमुल नीति अपनाते हुए खून-खराबा देखती रहीं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने दृढ़ निश्चय किया कि किसी भी हालत में भारतवर्ष से नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया करके दिखाना है। केंद्रीय सुरक्षा बलों और पुलिस ने दिन-रात घने जंगलों में आक्रामक अभियान चलाते हुए नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को नेस्तनाबूत करने का ऐसा तीव्र अभियान चलाया कि नक्सलियों के कमांडरों के हौसले पस्त होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। मुठभेड़ों में कई कुख्यात और शीर्ष कमांडर मौत के घाट उतार दिए गए। बचे-खुचे कमांडरों ने अपने दल-बल के साथ आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। अब तो हजारों नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करते हुए मुख्य धारा में लौट आये हैं। जो नाममात्र के बचे हैं वे भी आत्मसमर्पण की तैयारी में हैं। सरकार का दावा है कि नक्सलवाद नामक कलंक का लगभग अंत हो गया है। सरकारी दावे में बहुतेरी सच्चाई भी नज़र आने लगी है। अनेकों नक्सली जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, खेतों, कारखानों तथा अन्य ईमानदारी और मेहनत के कामों में लगकर सामान्य जीवन जीने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें बहुत सुखद लग रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र के शत्रु, हत्यारे नक्सलियों के दबाव और प्रलोभन ने उन्हें दिशाहीन कर दिया था। काश! ऐसा पहले हो जाता तो उनकी जिन्दगी के कई वर्ष यूं ही बरबाद नहीं होते। वे भी सभी अमन पसंद देशवासियों की तरह इज्जत और शान-शौकत भरा जीवन जी पाते। 

जंगलों से तो नक्सलियों का सफाया हो गया, लेकिन शहरों में जो स्वघोषित नक्सली सीना ताने घूम रहे हैं उनके काम करने का ढंग काफी जाना-पहचाना है। यह लोग विश्वविद्यालयों और इधर-उधर के बौद्धिक मंचों पर विराजमान होकर माओवाद या हिंसक उग्रवाद की विचारधारा का समर्थन करते हुए भारत माता के खिलाफ माहौल बनाने में सतत प्रयत्नशील हैं। राष्ट्रद्रोही तत्वों के सुर में सुर मिलाने वाले इन लोगों में सत्ता का सुख भोगने की जबरदस्त बेचैनी और तीव्र लालसा है। इस सच से इंकार नहीं कि सत्ता और व्यवस्था के प्रति कई लोगों में नाराजगी है। अनेकों भारतीय गुस्से में हैं लेकिन फिर भी वे बड़े संयम और अदब के साथ अपना विरोध प्रकट करते रहते हैं। उनके मन में कभी भी हिंसा और बंदूक उठाने का विचार नहीं आया। सत्ता और व्यवस्था से असहमत और नाराज होकर सड़कों पर उतरने वाले सभी लोगों को नक्सली नहीं कहा जा सकता। जिनके पास दिमाग है वे बोलेंगे भी और विरोध भी दर्शायेंगे। लेकिन उन्होंने कभी देश के प्रधानमंत्री को कभी गंदी-गंदी गालियां नहीं दीं। आज की युवा पीढ़ी देश में बदलाव चाहती है। उसके मन-मस्तिष्क में ऐसे हिंदुस्तान की तस्वीर है जहां हर नागरिक खुश और संतुष्ट हो। नेता केवल नारेबाजी न करते हुए समाज के हर वर्ग की ईमानदारी से सेवा करें और उनकी तकलीफों को जान-समझकर उनका समाधान भी करें। जब तक देश की मूल समस्याओं का हल नहीं निकलेगा तब तक युवा बेचैन रहेंगे और सड़कों पर उतरते रहेंगे। उन्हें दिशाहीन करने के षडयंत्र भी रचे जा रहे हैं।  देशप्रेमियों की भीड़ में कई ऐसे शातिर लोग भी है, जो खुद घातक हथियार नहीं उठाते लेकिन हथियार दिलाते और उकसाते रहते हैं। यही लोग देश के लिए खतरा बने हुए हैं। दरअसल, भारत की राजनीति में कई ऐसे सत्तालोलुपों का जमावड़ा हो गया है। जिन्हें जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। उन्हें यह बात भी समझ आ गई है कि उनकी पोल पूरी तरह से खुल चुकी है। उनका हर नकाब तार-तार हो चुका है। लेकिन फिर से सत्ता पाने की चाह अभी भी बनी हुई है। इसके लिए वे छात्रों तथा युवाओं के जायज आंदोलनों में बिन बुलाये पहुंचते हुए उनके कान में हिंसा और खून-खराबे का मंत्र भी फूंक रहे हैं। यह दिमागी नक्सली उन युवाओं को भी अपने रंग में रंग देना चाहते है जो अभी तक सियासती छल-कपट से दूर हैं। यह  कतई न भूलें कि अर्बन नक्सली वही कलंकित चेहरे हैं जो आतंकवादियों को बचाने के लिए आधी रात में अदालत के दरवाजे खुलवाते हैं और देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों को गले लगाते हैं। उनकी बस यही मंशा है कि जिस तरह से बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं और छात्रों (जेन-जी) ने हिंसक आंदोलन कर सत्ता परिवर्तन या तख्ता पलट किया है। वैसे ही कुछ भारत में भी हो जाए और उनकी फिर से लूटपाट और मौज ही मौज हो जाए।

Thursday, August 20, 2026

सांप और सपेरे

 जनहित के लिए शासन के द्वारा अनेकों योजनाएं चलायी जाती हैं, लेकिन कुछ नेता, मंत्री, भ्रष्टाचारी प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी अपनी करतूतों से बाज नहीं आते। सरकार की सारी मेहनत को अपने लालच की भेंट चढ़ा देते हैं। बहुत कम होता है जब अखबारों तथा न्यूज चैनलों में राजनीतिज्ञों तथा ऊंचे ओहदों पर विराजमान अफसरों के बेलगाम भ्रष्टाचार की खबरें धमाचौकड़ी न मचाती दिखाई देती हों। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत को निर्लज्जता से साकार करते यह ऐसे बेरहम कफन चोर लुटेरे हैं, जिनमें किंचित भी इंसानियत नहीं बची। इनका ज़मीर पूरी तरह से मर-खप चुका है। महाराष्ट्र सरकार ने नवजात शिशुओं को कुपोषण से मुक्त तथा स्वस्थ रखने के उद्देश्य से कई योजनाएं बनायी हैं।

उन्हीं में से ही एक सुविधाजनक योजना है, जिसके अंतर्गत सरकार ने कामकाजी तथा यात्रा करने वाली माताओं को सार्वजनिक स्थानों पर अत्यंत सुरक्षित, स्वच्छ और एकांत स्थान प्रदान कराने के उद्देश्य से ‘हिरकणी कक्ष’ अर्थात स्तनपान कक्ष निर्मित करवाने का निश्चय किया, जहां माताएं सुरक्षित तरीके से नवजातों को स्तनपान करा सकें या भविष्य के उपयोग के लिए स्तन के दूध को निकालकर संग्रहित कर सकें। मातृ एवं शिशु संरक्षण की इस सरकारी योजना को एक क्रांतिकारी कदम मानते हुए सभी ने सराहना की थी लेकिन जन्मजात भ्रष्टाचारियों ने इस पवित्र सेवा कार्य में भी घोर बेइमानी कर शैतान होने का पक्का सबूत दे दिया। महाराष्ट्र में स्थित गोंदिया जिले में 18 स्थानों पर हिरकणी कक्ष स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इन कक्षों में माताओं को किसी तरह की असुविधा न हो, इसी उद्देश्य से बेहतरीन साज-सज्जा के साथ आरामदायक सुविधाएं प्रदान करने क निर्णय लिया गया। लेकिन यहां भी भ्रष्टाचार की बेखौफ होकर परंपरा निभायी गई। अनाड़ी से अनाड़ी आदमी को भी पता है कि प्लास्टिक की अच्छी से अच्छी कुर्सी हजार, डेढ़ हजार में आ जाती है लेकिन सरकारी ठगों ने एक कुर्सी की खरीदी की कीमत चौंतीस हजार, लोहे के तीन से पांच हजार रुपए में मिलने वाले पलंग पंद्रह हजार, चार-पांच हजार की कीमत वाले वॉशबेसिन नब्बे हजार तो बीस से पच्चीस हजार में आसानी से मिलने वाले वातानुकूलित यंत्र का एक लाख रुपये का बोगस खरीदी मूल्य दर्शाया। इतना ही नहीं कॉटन के पर्दों, टीवी, बच्चों के खिलौनों आदि की भी कई गुणा अधिक कीमत दर्शा कर जो महाघोटाला किया, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि  प्रशासनिक क्षेत्र में कितनीऔर कैसी-कैसी धांधली और लूटमार मची है।

महाराष्ट्र के गड़चिरोली जिले में स्थित जपतलाई गांव में स्थित एक आदिवासी स्कूल में बिस्तर न होने के कारण ज़मीन पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया। तीन छात्राओं की मौत हो गई और तीन को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। सरकारी सहायता प्राप्त इस आवासीय स्कूल को कांग्रेस के नेता द्वारा चलाया जा रहा था। जब यह घटना घटी तब वहां पर कोई वॉर्डन मौजूद नहीं था। उस दिन सुबह ही ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया गया था और रात को यह जानलेवा कांड हो गया। छात्राओं की मौत के बाद प्रशासन नींद से जागा। लीपापोती भी शुरू हो गई। अभिभावक सांपों के खौफ से अपने बच्चों को घर लेकर चले गये। मात्र छह छात्र ही बचे रह गये। यह स्कूल 1992 में प्रारंभ हुआ था। लगभग ढाई सौ विद्यार्थियों वाले इस स्कूल के सभी बच्चे-बच्चियों के सोने के लिए पलंग का इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा गया। स्कूल के एक शिक्षक ने मुंह खोला कि प्रिंसिपल महोदय के समक्ष उन्होंने इस समस्या को उठाया था लेकिन वे आनाकानी करते रहे। वैसे भी नेताजी का स्कूल होने के कारण वे बेफिक्र और मदमस्थ थे। नियमों का पालन करने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं था। उन्हें तो बस सरकारी अनुदान की मोटी राशि को खाने-पचाने की जल्दी थी। रात को भी कमरे की खिड़की खुली रहती थी और इसी खिड़की से ही सांप अंदर आया। इससे पहले भी सरकारी आश्रम शालाओंं तथा अनुदान प्राप्त स्कूलों में सांप के काटने से कई छात्र-छात्राओं की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन घटना से सबक लेने की पहल नहीं की गई और यह हत्याएं हो गईं। हां यह हत्याएं ही हैं। यदि संपन्न परिवारों के बच्चे ऐसी मौत मरें तो आसमान पर सिर पर उठा लिया जाता है। यह तो गरीब आदिवासियों के बच्चे हैं। गंभीर बीमारियों तथा चिकित्सा के अभाव में अनेकों बच्चे मारे जा चुके हैं। इनका किसी के लिए कोई मोल नहीं। सरकार ने हर बार की तरह मृत छात्राओं के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता तथा मुख्यमंत्री राहत कोष से भी इतनी ही राशि देकर यह मान लिया कि उनकी पीड़ा का अंत हो गया, समस्या टल गई, लेकिन क्या यह संभव है? अब तो यह सवाल ही बेमानी है कि आदिवासियों के विकास के लिए सरकारें आश्रमशालाओं, अस्पतालों के लिए जो करोड़ों रुपये का अनुदान देती हैं, वह पैसा आखिर जाता कहा है? यह भी काबिलेगौर है कि इंसानी सांपों की दुष्टता, नीचता, भेदभाव और मारने-काटने की वजह से भी कई आदिवासी बच्चे खुदकुशी करने तक को मजबूर हो चुके हैं। कइयों ने तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ी और अपने-अपने घर चल दिए। गरीब मां-बाप ने भी अपनी संतानों को असुरक्षा और अव्यवस्था के चंगुल से बाहर निकाल कर अनपढ़ रखने में ही भलाई समझी। सरकार तो यह मानकर चलती है कि राजनेता, मंत्री, समाजसेवक आदि जब आदिवासी इलाके में आश्रमशाला और अस्पताल चला रहे हैं तो ईमानदारी से अपना फर्ज निभायेंगे। वह तो अनुदान यानी आर्थिक सहायता करने में भी कोई कमी नहीं करती लेकिन भ्रष्टाचारी सांप और सपेरे-लुटेरे अपनी फितरत से बाज नहीं आते।  जब भी ऐसा कोई हत्याकांड सामने आता है तो राजनीति भी शुरू हो जाती है। पक्ष और विपक्ष के शातिर नेता अपने-अपने आदमी की पैरवी पर उतर आते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता है। यहां तो न्यायाधीशों तक के चेहरों पर शर्मनाक कालिख पुती है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक निवास, 30 तुगलक क्रीसेंट, नई दिल्ली के स्टोर रूम में 14 मार्च, 2025 की रात आग लगने के पश्चात जब दमकल विभाग के कर्मचारी पहुंचे तो उन्हें स्टोर रुम में बोरियों में भरे 500-500 रुपये के नोट मिले, जिनमें से काफी नोट जल गए थे। सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ वायरल हुए वीडियो में भी बड़ी मात्रा में अधजली भारतीय करंसी नोट दिखायी दे रही थी, लेकिन भारत के इस महान न्यायाधीश ने एक स्वर में तन कर कहा कि इन बोरों में भरे करोड़ों रुपयों से मेरा कोई वास्ता नहीं! अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया पर ‘दागी’ साहब बहादुर कई हफ्ते तक छाये रहे लेकिन क्या मजाल कि सच उगल देते। उन्हें लगा था मामला रफा-दफा हो जायेगा। कुछ महीनों के बाद लोग भूल-भाल जाएंगे, लेकिन सजग भारतवासी अड़ गये कि गहन जांच कर सच सामने लाया ही जाना चाहिए। अंतत: तीन न्यायाधीशों का एक जांच पैनल गठित किया गया, जिसने अनेकों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही तथा अन्य जानकारियों के आधार पर यही निष्कर्ष पेश किया कि जज यशवंत वर्मा गुनहगार है। कानून तो कहता है कि, ऐसे अपराधी के साथ नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिए। न्याय की कुर्सी पर विराजमान होने वाले सम्मानित शख्स के यहां नोटों से भरे बोरे रखे हों और उसको पता ही न हो, यह कैसे हो सकता है? अभी तक तो हम देखते और सुनते आये थे कि रिश्वत लिफाफों तथा अटैचियों में ली जाती है, लेकिन अब बोरों में भर-भरकर ली जाने लगी है! वो भी उस देश में जहां गरीबी, बदहाली, बेरोजगारी से करोड़ों देशवासी हैरान परेशान हैं। छात्रों को आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। अब देश के युवा पूरी तरह जाग गये हैं। उनकी समझ में आ गया है कि, व्यवस्था में कैसी धांधली चल रही है। नेताओं, अफसरों ने अपने बच्चों के हित को हमेशा प्राथमिकता दी है। गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा का घोर अभाव है। लाखों रुपये की फीस और डोनेशन होने के कारण उनके लिए डॉक्टर, इंजीनियर बनना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। उनके लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद हैं। किसे नौकरी देनी है, यह लगभग पहले से ही तय हो जाता है। सरकारी धन के लुटेरे अपने बच्चों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते हैं, उन्हें लाखों-करोड़ों का खर्च कर देश के बाहर पढ़ाते हैं। इन मतलब परस्तों को कितना भी कोसा और लताड़ा जाए, गालियां दी जाएं, लेख लिखे जाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता। बेशर्मों की चमड़ी बहुत मोटी है...

आप और हम भी बहुत गंभीरता से चिंतन मनन करें कि कोई अपराधी न्याय का पक्षधर कैसे हो सकता है? अपराधी तो अपराधी से दोस्ती निभाएगा। उसी का साथ देगा। पहले भी कुछ न्यायाधीश अपराध कर्म में लिप्त पाये गये हैं लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है। उल्टे पुरस्कारों से नवाजा गया है। दरअसल जिस तरह से अच्छी-खासी इमारत को दीमक अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं, वैसे ही नेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, अफसरों  की भ्रष्ट मंडली विभिन्न सरकारी योजनाओं के करोड़ों-अरबों रुपये अपनी तिजोरियों के अंदर कर  चुकी है, सतत कर रही है। धोखे से काटने और जान लेने वाले सांप तो फिर भी नज़र आ जाते हैं, लेकिन दूर बैठे सपेरे पर्दे के पीछे छिपे रहते हैं। यही सपेरे ही बीन बजाकर सांपों को नचाते और किसको कैसे और कब डसना है बताते और समझाते हैं... 

Thursday, August 13, 2026

आत्म मंथन

 कहने को तो लघुकथा के मायने हैं, छोटी कहानी। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि छोटी कथा में लेखक अपनी पूरी बात कैसे रख सकता है। निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए तो बहुतेरा शब्दजाल भी बुनना पड़ता है? इसका उत्तर देती हैं ऐसी कई लघुकथाएं, जिनमें विस्तार, फैलाव और इधर-उधर की बातों में बिना उलझे मानव के जीवन में समय-समय पर सर उठाकर खड़े हो जाने वाले अवरोधों, पीड़ा, चिंताओं और तनावों के गहरे सत्य की अत्यंत प्रभावी तस्वीर पेश की गई है। 

लघु कथा लेखन में वर्षों से लगे एक प्राध्यापक साहित्यकार का मानना है कि लघुकथा लिखने में अनेकों चुनौतियां होती हैं। बहुत कम स्पेस में बहुत कुछ कहना होता है। इन दोनों के समीकरण को साध लेने का ही परिणाम होती है, पूर्णता प्राप्त लघु कथा। आकार में छोटी लेकिन अत्यंत असरकारी  लघुकथाओं को पढ़ते-पढ़ते पाठक लेखक की पैनी निगाह और यथार्थ को व्यक्त करने के अंदाज से हतप्रभ होने के साथ चौकन्ना भी होता चला जाता है। हमारे देश में इनदिनों सत्ता और राजनीति की तरह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कटघरे में है। अधिकांश न्यूज चैनलों से सजग भारतीयों ने इसलिए दूरी बना ली है, क्यूंकि उनमें सार्थक खबरों को अहमियत ही नहीं दी जाती। वैसे तो इसके कई कारण है। लेकिन गजेंद्र रावत की लिखी लघुकथा ‘कवरेज’ को पढ़ते ही काफी हद तक जवाब तो मिल ही जाता है, 

‘‘सुबह से करते-करते बारह बजे उसका नंबर आया। अब वो एक टी.वी. चैनल के वातानुकूलित ऑफिस में इंटरव्यू बोर्ड के समक्ष बैठा हुआ था। बोर्ड के एक सदस्य ने धीरे से कहा, ‘‘पढ़ाई तो ठीक-ठाक है मगर अनुभव है क्या?’’ ‘‘जी हां, मैं पिछले पांच साल से एक ग्लोबल टी.वी. चैनल में संवाददाता था।’’ ‘‘ग्लोबल चैनल! तो फिर जॉब क्यों छोड़ी?’’ बोर्ड के दूसरे सदस्य ने आश्चर्य से पूछा। ‘‘दरअसल, एक सड़क दुर्घटना की कवरेज के लिए मुझे भेजा गया था, लेकिन सड़क पर बुरी तरह घायल नौजवान का तड़पना मुझसे नहीं देखा गया...और घटनास्थल की कवरेज के बजाय मैंने उसे अस्पताल पहुंचा दिया। इस प्रकार मुझ पर आरोप लगा कि मैंने एक सनसनीखेज़ ख़बर का सत्यानाश कर दिया। लिहाजा मुझे चैनल से निकाल दिया गया।’’ उसने बड़े ही भोलेपन से अपनी बात रख दी।

‘‘ठीक है, आप जा सकते हैं, आपको हफ्ते के भीतर सूचित कर दिया जाएगा।’’ बीच की बड़ी कुर्सी पर बैठा चेयरमैन बोला। दो दिन बाद उसके फोन पर मैसेज़ था-फिलहाल आपको यह जॉब नहीं दी जाती, भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित-चेयरमैन। 

लोग सच का सामना करने से कैसे घबराते हैं और आहत हो जाते हैं इसका चित्रण लेखिका सीमा जैन ने अपनी लघुकथा ‘कुछ नया’ में बखूबी किया है...

‘‘घर में घुसते ही पति ने कुर्ता उतारकर फेंका और चीखते हुए बोले-क्या ज़रूरत थी घर की बात बाहर बताने की, सच बोलकर क्या मिल गया तुझे?’’ मैंने ठंडी आवाज़ में कहा-‘‘झूठ के नुकसान आप नहीं समझ पायेंगे।’’ ‘‘ज्ञानी तो, तुम हो ही चुकी हो! किचन क्वीन जो बन गई हो, दिमाग घूम गया था तुम्हारा। टी.वी. पर जब पूरा देश देखे, तो पैर ज़मीन पर हो ही नहीं सकते हैं।’’‘‘इसमें घमंड जैसी कोई बात नहीं है, बस एक गलतफहमी दूर करना ज़रूरी था।’’ ‘‘यही कि तुम बहुत दुखियारी औरत हो।’’ ‘‘बिल्कुल नहीं, कुछ दुखियारी औरतों को ये कहना ज़रूरी था कि पति की मार खाकर, सास के ताने और जुल्म सहकर भी अपने हुनर के बल पर यहां तक पहुंचा जा सकता है।’’ ‘‘पूरी दुनिया के सामने मेरा और मेरी मां का अपमान करके मिल गई शांति? ’’ ‘‘मेरी तरह घुट-घुटकर जीने वाली हर औरत को शक्ति मिलेगी ये सुनकर कि हर औरत का साथ उसका पति नहीं कभी-कभी दु:ख भी देता है।’’ ‘‘घर में तो कभी ढंग का खाना बनाया नहीं, कभी नमक कम तो कभी शक्कर ज्यादा...’’ ‘‘ये इसी बात का जवाब था जो मुझे रोज़ सुनना पड़ता था। कुछ नया और ढंग का खाना बनाना मुझे नहीं आता है, तो आज मैंने ढंग के खाने का खिताब जीता साथ ही कुछ नया भी कर डाला, जो फोटो खिंचवाने के बाद कोई बताना पसन्द नहीं करता मैंने आज वो सबको बता दिया।’’

विख्यात व्यंग्यकार, उपन्यास लेखक डॉ. महेंद्र कुमार ठाकुर की व्यंग्य और हकीकत में रची-बसी लघुकथाओं को पढ़ने के बाद पाठक उन्हें भूल नहीं पाते। ठाकुर विक्रयकर विभाग में उच्च अधिकारी रहे हैं। उनकी लिखी कई लघुकथाओं का मंचन भी हो चुका है। ज्योतिष के क्षेत्र में भी दबदबा रखने वाले लेखक की ‘अफसर’ लघुकथा उनके साहस और यथार्थ लेखन की परिचायक है, 

वह पूरे अफसर थे, एकदम कड़क, रौबदार, उनकी आवाज में ही नहीं, चाल और हाव-भाव में भी अफसरी थी। उनका हर अंदाज एक अफसर का था। उन्हें अपनी कार में चढ़ना होता तो चमचा दरवाजा खोलता, ‘आइए सर, बैठिए’। वह जहां पहुंचते एक चमचा कार का दरवाजा खोलता, ‘नमस्कार सर, आइए।’ उन्हें हस्ताक्षर करना होता तो एक चमचा पेन खोलकर उनके हाथों में देता, ‘सर, लिजिए।’ एक चमचा फाइलें खोलकर दिखलाता, ‘‘सर यहा करने हैं हस्ताक्षर।’’ उनके हस्ताक्षर होते ही एक चमचा फाइलें वहां से हटाता जाता। सिगरेट पीनी हो तो एक चमचा पैकेट खोलकर उनके सामने कर देता, ‘‘सर ये रही सिगरेट, आपके पसंदीदा मारका की है।’’ दूसरा चमचा लाइटर चलाकर उनके मुंह के पास कर देता। वह उसके लाइटर से मुंह में रखी सिगरेट जलाते। एक दिन दोपहर को कार्यालय में फोन की घंटी बजी। उनके पी.ए. ने रिसिवर उठाया, ‘‘सर दिल्ली से छोटे भाई साहब का फोन है, लीजिए।’’ ‘‘हां, हैलो।’’, ‘‘हां भैया, मां का देहांत हो गया है।’’ उधर, से आवाज आई, ‘‘ठीक है, डेड बॉडी यहां भिजवाने की व्यवस्था करो। कार्यक्रम यही होगा। मेरे पास वहां आने का वक्त नहीं है।’’ अफसर ने कहा। 

श्मशान घाट पर भी अफसर अपनी पूरी शान में हैं। चिता के चारों ओर फेरे लग रहे हैं। जलती लकड़ी लेकर उनका सबसे खास चमचा उनके थोड़ा पीछे रहकर फेरे लगा रहा है। वे मायूस और गंभीर मुद्रा में अपनी मां की मृतदेह की परिक्रमा कर रहे हैं। उदास हैं, दुखी हैं, आंसू तक नहीं आ सकते थे। परिक्रमा पूरी हो चुकी है। पंडित की आवाज आई, ‘‘अब चिता को अग्नि दे दो।’’ चमचे  जलती लकड़ी उनके हाथ में दे दी, ‘‘लीजिए सर, चमचे ने उनके हाथों को सहारा देकर जलती लकड़ी का जलता हिस्सा मां के मुख तक पहुंचाया। चिता के लपटे फैल रही थी। चिता को अग्नि देकर उसे उन्होंने पुन: चमचे के हाथों में दे दिया। मां की मृतदेह अग्नि को समर्पित हो चुकी थी। उनका अफसरी अंदाज शान से अब भी मौजूद था। उनकी आंखों में आंसू नहीं आ सकते थे। वे अफसर थे। हां, उनके अधीनस्थ जरूर फूट-फूटकर रो रहे थे।’’

Thursday, August 6, 2026

आने और जाने के बीच

 आपके मन में भी विचार तो जरूर आता होगा कि ऐसी खबरों का सिलसिला आखिर कब टूटेगा?...

गुजरात के जामनगर में एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। जिसके साथ उसने सात फेरे लेते हुए जन्म-जन्मांतर तक साथ निभाने का वादा किया था, उसी को शराब में साइनाइड मिलाकर मौत की नींद सुला देने के बाद पंद्रह फीट गहरे गड्ढे में गाड़ दिया। इस हत्याकांड का महीनों बाद तब खुलासा हुआ, जब मृतक के भाई ने पुलिस में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। हत्यारी पत्नी तो अपने पति के ऑस्ट्रेलिया में होने का झूठ फैलाकर अपने प्रेमी के साथ अय्याशी में लीन हो चुकी थी। हमारे देश में लगभग हर घर में दिन की शुरुआत चाय से होती है। मां, बहन, पत्नी के हाथों की बनी चाय आपसी रिश्तों में अपनत्व की मिठास और जुड़ाव की खुशबू भी घोलती है। उत्तरप्रदेश के कानपुर के अंतर्गत आनेवाले रावतपुर के गणेशनगर में रहने वाले एक धनवान परिवार के सदस्यों को चाय के स्वाद में आए बदलाव ने चिंतित कर दिया। अच्छे-खासे सेहतमंद स्त्री-पुरुष बीमार पड़ने लगे। डॉक्टरों की शरण ली गई तो उन्होंने खाने-पीने की चीज़ों में किसी हानिकारक पदार्थ के मिलाये जाने की आशंका जताई। परिवार के युवा हिमांशु की शादी हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे। किसी पर एकाएक शक नहीं किया जा सकता था। इसलिए रसोईघर से लेकर घर के सभी कमरों में सीसीटीवी लगवाये गये। कैमरों में हिमांशु की पत्नी बार-बार चाय में काले रंग का पदार्थ मिलाती दिखी। इतना ही नहीं रूम फ्रेशनर में भी कोई संदिग्ध तरल पदार्थ मिलाती नज़र आई। घर में तनाव का वातावरण बन गया। अंतत: जो सच्चाई सामने आई उसने तो भरे पूरे परिवार के होश ही उड़ा दिए। हिमांशु की पत्नी चाय तथा रूम फ्रेशनर में अत्यंत विषैला रसायन मिलाकर पूरे परिवार के सदस्यों का खात्मा कर पूरी संपत्ति पर कब्जा करने की साजिश रच चुकी थी। यदि घर में कैमरे नहीं लगवाये जाते तो सच सामने आ ही नहीं पाता। 

वक्त ऐसे भी करवट लेगा किसको पता था? औरतें हत्याएं करने के मामले में पेशेवर अपराधी पुरुषों को मात देने पर उतर आएंगी और ऐसे-ऐसे तरीके अपनाएंगी कि पति नाम का जीव एकदम बेबस और बेचारा बन कर रह जाएगा! सात साल पहले जिस अतुल नामक युवक ने घरवालों का कहना न मानते हुए विद्रोह कर दामिनी नामक युवती से शादी की थी, उसी ने बीस लाख के बीमा की रकम के लिए अपने प्रेमी के साथ मिलकर उसे मौत की नींद सुला दिया। इसके लिए उसने कोई पारंपरिक औजार, हथियार चुनने की बजाय विषैले सांप का सहारा लिया। मेरठ शहर की इस दामिनी ने पहले तो पति को दूध में नींद की गोलियां मिलाकर दीं...और गहरी नींद सो जाने के बाद उसके बिस्तर में एक ज़हरीला सांप छोड़ दिया। सांप के डसने से नींद में ही अतुल चल बसा। हत्यारिन दामिनी का पति अतुल स्कूल संचालक था और उसका प्रेमी उसी स्कूल की बस का मामूली सा ड्राइवर! दामिनी भी स्कूल संचालन में सहायता करती थी। इसी दौरान पता नहीं कब और कैसे खूबसूरत दामिनी ड्राइवर पर मर मिटी और उसको हमेशा-हमेशा के लिए पाने के लिए अपने पति को मिटा दिया।

 शार्टकट से धन कमाने के लिए ठगी करतीं और बड़ी आसानी से ठग-लुटेरों की साथी बनतीं कुछ नारियां रही सही कसर को भी पूरा करने पर उतारू हैं। शादी का झांसा देकर भोले-भाले युवकों से नकदी और गहने ऐंठ लेने की खबरें कुछ वर्ष पहले तक तो राजस्थान, हरियाणा और पंजाब से सुनने-सुनाने में आती थीं, लेकिन अब तो जहां-तहां लुटेरी दुल्हनों की फसल बड़ी तेजी से पैदा हो रही है। अभी...अभी शहर के दैनिकों में अपने शहर में ‘लुटेरी दुल्हन’ गिरोह के पर्दाफाश होने की खबर पढ़ी, ‘‘गुजरात के एक युवक को शादी के लिए अच्छी लड़की की तलाश थी। उसने संतरानगरी में रहनेवाले अपने मित्र को अपनी परेशानी बताई तो उसने नागपुर में उसके लायक लड़की होने का आश्वासन देकर शीघ्र आने को कहा। नागपुर पहुंचने के कुछ घंटों के बाद खूबसूरत लड़की उसके सामने पेश कर दी गई। युवक को लड़की तुरंत जंच गई। लड़की वालों को भी शादी करने की जल्दी थी। उन्होंने दुल्हन के श्रृंगार के नाम पर गहनों तथा अन्य खर्चों के लिए लाखों रुपए पहले ही रखवा लिए। फिर शहर के एक मंदिर में संपूर्ण रीति-रिवाज के साथ विवाह भी संपन्न हो गया। युवक खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह जल्द से जल्द अपनी दुल्हन को राजस्थान ले जाने के मंसूबे बना ही रहा था कि, इस बीच एक युवक वहां आ धमका। वह अकेला नहीं था। वह शादी के जोड़े में सजी-धजी दुल्हन को अपनी पत्नी बताते हुए हंगामा करने लगा। शादी के सूट-बूट में ‘हीरो’ बना युवक हक्का-बक्का रह गया। उसकी बहसबाजी कोई काम नहीं आयी। ड्रामे की मास्टरमाइंड नायिका और उसके साथी बड़ी ठसन से उसकी नज़रों के सामने से चलते बने और वह असहाय...अवाक रह गया।

कुछ दिन पहले रायपुर की एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट और पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर एक ऐसे शातिर ठग को पकड़ा, जिसने शहर के विख्यात लग्जरी होटल हयात में दो दिनों तक ठहरकर लजीज खाना खाया, महंगी शराब पीते हुए खूब मौज की और लगभग पैंसठ हजार का बिल चुकाए बिना फुर्र हो गया। तमिलनाडु निवासी विंग्सन जॉन नामक यह ठग अलग-अलग नाम से देशभर के विभिन्न नगरों, महानगरों के आलीशान होटलों में ठहरता था और फिर चकमा देकर भाग खड़ा होता था। अभी तक वह लगभग तीन सौ लग्जरी होटलों में मुफ्त ठहरने और खाने-पीने का आनंद लूट चुका है। साल 2022 में भी उसे एक फाइव स्टार होटल की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था। वहां भी उसने बिना बिल चुकाए होटल छोड़ा और वहां का लैपटॉप भी लेकर खिसक गया। पुलिसिया जांच में पता चला कि, जॉन की पहली गिरफ्तारी 1996 में दिल्ली में हुई थी। तब उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। वहां से छूटने के बाद वह नहीं सुधरा। उसने केरलम, तमिलनाडु, गोवा, आंधप्रदेश और महाराष्ट्र के विभिन्न होटलों में मुफ्त में मज़ा लूटा। जेलें ही उसके लिए घर थीं। वहां उसे नये-नये लोग मिलते थे। उसे दोस्ती गांठने में महारत हासिल थी। पंद्रह साल उसने जेलों में ही बिताये। हर बार अपनी पहचान बदलने में माहिर जॉन कभी खुद को अंग्रेजी का शिक्षक तो कभी धनाढ्य टूरिस्ट अथवा योगा प्रशिक्षक बताकर होटल में महंगे से महंगा कमरा लेता था। उसके हाथों में दो बैग होते थे। एक में उसके कपड़े तो दूसरे बैग में अखबार और तकिए होते थे। अपना सामान वह होटल कर्मचारियों को कभी छूने नहीं देता था। होटल छोड़ते वक्त वह अखबार और तकिए वाला बैग अपने कमरे में ही रहने देता था, ताकि होटल के स्टॉफ को लगे कि वह कहीं आसपास जा रहा है। अपना काम निपटाकर शीघ्र लौट आएगा। जाते-जाते होटल का कीमती सामान चुराना उसकी आदत में शुमार था। पुलिस को उसने बड़े फख्र के साथ बताया कि, पूरे विश्व में अपनी कुख्याति का डंका बजाने वाला खूबसूूरत औरतों का रसिया और हत्यारा...शातिर ठग चार्ल्स शोभराज उसके लिए ‘महानायक’ है। वह उसे अपना एकमात्र आदर्श मार्गदर्शक मानता रहा है। उस जैसा चतुर व्यक्ति उसने और कोई नहीं देखा। फर्जी पहचान और छल कपट के तरीके अपनाने की तमाम कलाएं उसने अपने ‘गुरु’ चार्ल्स से ही सीखीं और सफल रहा। दिल्ली की तिहाड़ जेल में दोनों एकसाथ थे। चार्ल्स शोभराज ने अय्याशी के लिए कौन से नये-नये रास्ते चुने और कई खूबसूरत औरतों को भोगने के बाद कैसे मौत के घाट उतारा आदि...आदि सब कुछ जॉन को बताकर बेखौफ होकर हिंसा और छलकपट करने की सीख दी। महाठग शोभराज ने भी अपने जीवन का अधिकांश समय जेलों में ही बिताया। भले ही मौज मस्ती और ऐश के बहुतेरे दिन उसके हिस्से में आये हों लेकिन फिर भी वह कभी चैन से सो नहीं पाया। जॉन ने काफी हद तक शोभराज के पदचिन्हों को अपनाया, लेकिन जॉन ने आखिर क्या पाया? वास्तव में उसने गंवाया ही गंवाया। कुछ भी नहीं पाया। भौतिक सुखों के चक्कर में परिवार से नाता टूटा। मां-बाप ने नालायक बेटे से रिश्ता तोड़ लिया। पत्नी और बच्चों का भी कोई अता-पता नहीं। ऐसे नकली सुख किस काम के? इस दुनिया में आने और जाने के बीच मेहनत कर लोग क्या कुछ नहीं पा लेते। इस धरती के अधिकांश लोग बेइमानों, चरित्रहीनों और मुफ्तखोरों का कभी सम्मान नहीं करते। भले ही वे कितने ही साधन संपन्न हो जाएं। यह दुनिया परिश्रमी और चरित्रवानों को सलाम करती है। कई संगीन अपराधी देखने में आये, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम काल में बस यही अफसोस था कि काश...गलत साथ और संगत में नहीं पड़ते तो पश्चाताप की आग में न जलना पड़ता। अपनी उम्र का अधिकतर समय पुलिस और अदालतों से बचने के लिए छिप-छिपाकर तो नहीं गंवाना पड़ता है। कानून के डर से भाग-भागकर जीना भी कोई जीना है! अपने पति की हत्या और उसके शव के टुकड़े कर नीले ड्रम में दफनाने वाली मुस्कान कई माह से जेल में बंद है। उसके घर वालों ने उससे नाता तोड़ लिया है। पति को सांप से डसवाकर मारने वाली दामिनी बार-बार अपने 6 वर्षीय बेटे को याद कर रोती रहती है। अपने सैनिक पति की हत्यारिन कोमल जेल में बंद दूसरी महिलाओं से बस यही कहती रहती है कि प्यार में अंधी होकर मैंने अपना घर बर्बाद कर दिया। अपने ही हाथों अपना सुहाग उजाड़ने वाली जितनी भी महिलाएं जेल में बंद हैं, दिन-रात पश्चाताप की आग में जल रही हैं। अपने घर-परिवार में इज्जत और शान से रहती थीं, लेकिन अब जेल में कैदियों के लिए खाना बनाने, झाड़ू लगाने तथा घास छीलते हुए घुट-घुटकर दिन काट रही हैं। कब मौत हो जाएगी किसी को पता ही नहीं चलेगा।

Thursday, July 30, 2026

सोशल मीडिया से जन्मा एक आंदोलन

 मज़ाक-मज़ाक में शुरू किये गए छात्रों के हितकारी संगठन ने सरकार को नानी याद दिला दी। सुप्रीम कोर्ट की एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी से आहत होकर सात समंदर पार अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक पढ़े-लिखे युवक ने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या होगा अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं। अभिजीत के उपरोक्त चंद शब्द कुछ ही दिनों में उन करोड़ों युवाओं तक पहुंच गए, जो देश की लुंजपुंज शिक्षा व्यवस्था से खार खाये बैठे थे। न कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा, न ही कोई आलीशान दफ्तर बस सोशल मीडिया के मंच पर ही कॉकरोच पार्टी का विचार जन्मा और कुछ ही दिनों के बाद देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षा मंत्री के तुरंत इस्तीफे की मांग को लेकर उनका धरना प्रदर्शन प्रारंभ हो गया। शुरू-शुरू में तो छात्रों के आंदोलन को खास अहमियत नहीं दी गई। सभी को लगा कि यह नये-नवाड़े किस दम पर उस सरकार को अपना दम दिखा पायेंगे, जो अपनी ही मस्ती में चूर है। जैसे-जैसे दिन बीतते गये छात्रों की ज़िद और जुनून की हकीकत सोये हुए लोगों को जगाने लगी। उन भारतीयों ने भी अपने भ्रम के दायरे से बाहर निकलना प्रारंभ कर दिया, जिन्हें इस अनोखी पहल के शीघ्र ही पंगु हो जाने की उम्मीद थी। आंदोलन को प्रभावी बनाने और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए देश के कोने-कोने से छात्रों के साथ अन्य लोग भी पहुंचने लगे। नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के मां-बाप तथा उनके परिजन भी उनके साथ आ खड़े हुए। लगभग बाइस छात्र-छात्राओं की आत्महत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो नहीं थी। दिल्ली से प्रारंभ हुए छात्र आंदोलन की प्रभावी लहर को देश के अन्य शहरों और महानगरों तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के संविधान चौक पर हजारों की तादाद में युवक-युवतियां शामिल हुए। इस प्रदर्शन में मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले के मगनिया गांव की एक गमगीन मां नीलम चतुर्वेदी की उपस्थिति ने सभी को अत्यंत भावुक कर दिया। उनकी बेटी आकांक्षा चतुर्वेदी ने नीट पेपर लीक विवाद और री-एग्जाम की खबर के बाद अत्याधिक तनाव में होने के चलते आत्महत्या कर ली। नीलम चतुर्वेदी बताते-बताते फूट-फूटकर रोती रहीं। 

इसी तरह से महाराष्ट्र के अहिल्यानगर की उन्नीस साल की छात्रा ने नीट री-एग्जाम में उम्मीद से कम अंक मिलने पर मौत को गले लगा लिया। दोबारा हुए पेपर में मात्र 11 नंबर से चूकने पर आहत हुई छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘‘मेरा डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया। मेरे माता-पिता को दोष न दें।’’ इस छात्रा ने पूर्व में जो नीट परीक्षा का एग्जाम दिया था उसमें उसके पेपर बहुत अच्छे गये थे, लेकिन पेपर लीक होने की वजह से दोबारा पेपर तो दिया लेकिन कम अंक आने से डॉक्टर बनने का सपना धरा रह गया। गरीब माता-पिता को तो बच्चों को सफल होते देखने के लिए गहने तक बेचने पड़ते हैं। खेती-बाड़ी और घर तक खोना पड़ता है। जंतर-मंतर तथा विभिन्न शहरों मेें हुए छात्रों के आंदोलन में और भी कई माता-पिता शामिल हुए। उनका कहना था कि हमारा बेटा-बेटी तो अब नहीं रहे लेकिन हम नहीं चाहते कि भविष्य में किसी और की संतान को खुदकुशी करनी पड़े। सच तो यह है कि हमारे देश में लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं अग्नि परीक्षा जैसी होती हैं। परीक्षा मेंसफल होने के लिए छात्र भी जी-जान लगा देते हैं, लेकिन जब पेपर लीक हो जाता है या कोई और व्यवधान आ जाता है तो उनके अरमानों पर चोट पहुंचती ही है, तो कुछ छात्र खुदकुशी कर गुजरते हैं। परीक्षाओं में पेपर लीक होने, बेखौफ नकल चलने तथा अन्य अनियमितताओं के होने की जगजाहिर जानकारी से सभी सजग भारतीय वाकिफ हैं। लेकिन देश के स्थापित नेताओं और दलों ने इस समस्या के समाधान के लिए धरना आंदोलन की नहीं सोची! कॉकरोच जनता पार्टी ने हिम्मत और अभूतपूर्व पहल की और विख्यात गज़लकार दुष्यंत कुमार की चर्चित गज़ल की इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया।

‘‘कौन कहता है, आसमां में सुराग नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’’

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और अन्य मांगे स्वीकार कर लिये जाने के बाद प्रदर्शन-आंदोलन समाप्त हो गया। इन पत्थरों के चलने-चलाने के बीच कुछ सत्तालोलुप शातिर नेताओं ने गर्म तवे पर अपने स्वार्थ की रोटियां पकाने की जो कोशिश की, उस पर भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन घिसे-पिटे खोटे सिक्कों पर कलम चलाकर अपना समय जाया करने का हमारा बिल्कुल मन नहीं है। लेकिन हां, पूरे देश में सूखी घास में लगी आग की तरह फैले कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा। सत्ताधीशों को किंचित भी अनुमान नहीं था कि भारतीय छात्रों का आंदोलन पूरे देश में फैलकर उनकी नींद हराम कर देगा। किशोरों और युवाओं के प्रतिनिधियों को आदर-सम्मान के साथ निमंत्रित कर बातचीत करनी पड़ेगी। 

छात्रों के आंदोलन स्थल जंतर-मंतर तथा संसद मार्च में रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे पत्रकारों, एंकरों को जिस तरह से विरोध झेलना पड़ा। मारपीट का शिकार होना पड़ा। उसके लिए इस आंदोलन को याद रखा जाएगा। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि अधिकांश न्यूज चैनल सरकार परस्त हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं कि मीडिया की चाटूकार होने की यह शर्मनाक छवि एकाएक बनी है। दरअसल, जब से उद्योगपतियों, नेताओं और माफिया किस्म के घोर मतलबपरस्त ताकतवरों ने न्यूज चैनलों को शुरू किया या कब्जाया तब से स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते एकदम बेकाबू हो गई। अब तो लगभग हर न्यूज चैनल पर किसी खास दल पार्टी, नेता, मंत्री और दमदार हस्ती का ठपा लगा नजर आता है। अधिकांश अखबार यानी प्रिंट मीडिया भी धनवान घरानों की गिरफ्त में छटपटा रहे है। ऐसे में यह तो तय है कि मालिक जो चाहेंगे वही होगा। वही ही तो हो रहा है। यह भी कहीं न कहीं सच है कि प्रिंट मीडिया की साख पर अभी तक उतना बट्टा नहीं लगा, जितना कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लोगों की नज़रों से गिरा है। बुरी तरह बदनाम हो चुके चैनलों के मालिक तो जमीनी पत्रकारिता करने से रहे। उन्हें तो अपने वातानुकूलित कार्यालयों के आलीशान कमरों में बैठकर अपने अन्य धंधों से माया बटोरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। उन्होंने मीडिया के क्षेत्र में पर्दापण ही इसलिए किया है, ताकि उनके काले-पीले अथाह कमाई वाले कारोबार बिना किसी रुकावट के चलते रहें। मीडिया उनके लिए सुरक्षा कवच है। जंतर-मंतर और संसद मार्ग में भी मालिकों की नौकरी बजाने वाले एंकर और संवाददाता ही लहूलुहान हुए। जाने-अनजाने हुड़दंगियों ने जीभर कर उन्हीं का जिस तरह से मज़ाक उड़ाया उससे उनके होश उड़ गए। बुरी तरह से निशाने पर आए उन चुनिंदा न्यूज चैनलों के मालिकों की समझ में भी आ गया कि अब उन्हें सरकार की जी हजूरी तथा सिर्फ और सिर्फ तारीफों की झड़ी लगाने की अपनी दाग़दार आदत से बाहर निकलना ही होगा।

एक जमाना था जब आम जनता मीडिया के चाल-चलन पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। लेकिन अब वह अत्यंत सतर्क हो गई है। उसे अच्छी तरह से पता होता है कि कौन किसके इशारे पर जबरन सरकार का विरोध करने में लगा है और किसने मलाई खाने के लिए चम्मचागिरी का झंडा उठा रखा है। भारत तो बहुत बड़ा लोकतांत्रिक देश है। छोटे-छोटे देशों में भी जागृति आ चुकी है। बीते वर्ष पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी के उग्र विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकार के तलवे चाटने वाले वहां के प्रमुख नेपाली भाषा के एक अखबार के कार्यालय को आग से फूंक दिया गया था। आज के युवा शिगूफेबाजी और लफ्फाजी करने वालों की नस-नस से वाकिफ हो गये हैं। खासतौर पर भारत में तो हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के आधार पर विभाजन करने की राजनीति से तंग आ चुके हैं। उन्हें भेदभाव से चिढ़ है। वे बेरोजगारी से मुक्ति चाहते हैं। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में असमानता होने के कारण गरीबों की संतानें अशिक्षित रहने को विवश हैं। अधिकतर संपन्न परिवारों के बच्चों को डॉक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर एवं अन्य उच्च पदों पर विराजमान होने के अवसर मिल रहे हैं। जबकि बिना किसी भेदभाव के सभी देशवासियों को उनकी मनपसंद शिक्षा को उपलब्ध कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। 

लाठीचार्ज और आंसू गैस को झेलते हुए भी जेन जी के मीम, रील्स और तरह-तरह के व्यंग्यात्मक वीडियो बनाने के बेफिक्री भरे अंदाज ने लोगों को आकर्षित किया। वहीं नई पीढ़ी की अलग सोच भी सामने आयी। अपवाद तो हर कहीं देखने में मिलते हैं, लेकिन अनुशासन, आपसी सहयोग, डिजिटल नेटवर्क व महिला सुरक्षा जैसे पहलुओं ने इसे पारंपरिक आंदोलनों से अलग बनाया। इस आंदोलन में एक नई पहल और भी देखी गई। देश-विदेश से समर्थकों ने स्विगी और जोमेटो जैसे प्लेटफार्म के जरिए भूखे-प्यासे छात्रों तथा उनके साथियों को भरपूर खाने-पीने का सामान, दवाइयां तथा अन्य जरूरत की चीजे सीधे प्रदर्शन स्थल पर भेजकर कहीं न कहीं उन शंकाओं और सवालों का निराकरण कर दिया कि घर-बार छोड़कर आये हजारों कॉकरोचों के पीछे कौन हैं। कुछ लोगों के अलग विचार हैं। उन्हें लगता है कि यह भारत सरकार को अस्थिर करने का सपना देखती ताकतों का सोचा-समझा षडयंत्र था। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवतियों का मौजूद रहना उनकी जागृति और सार्थक सोच का परिचायक बना। लगभग सभी छात्राएं युवकों की भीड़ होने के बावजूद खुद को सुरक्षित पा खुश और संतुष्ट थीं। इसी एकता और मर्यादा का पालन करने के चलते अंत तक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल माध्यम बना रहा। देश तथा विदेशों तक मीम्स, रील्स, लाइव स्ट्रीम, एक्स पोस्ट व इंस्टा अपडेटस के जरिए पल-पल की खबर पहुंचती रही। सामाजिक कार्यकर्ता, सच्चे गांधीवादी सोनम वांगचुक ने छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पर 26 दिन तक अनशन का आंदोलन की गरिमा बढ़ाई। यह कहना गलत नहीं कि यदि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक भूख हड़ताल नहीं करते तो जेन जी का यह आंदोलन विशाल और प्रभावी स्वरूप अख्तियार नहीं कर पाता। लेकिन फिर भी उनके महान योगदान पर सवाल उठाये गये। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा तो अक्सर होता आया है.....

Thursday, July 23, 2026

आप भी सोचिए...

 देश की राजधानी दिल्ली में स्थित आदर्शनगर मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास एक तेज रफ्तार स्कूल बस ने स्कूली बच्चों से भरे ई-रिक्शा को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण हादसे में ई-रिक्शा में सवार बारह वर्षीय छात्रा प्रियांशी औंधे मुंह सड़क पर गिर गई और बस के पहिए की चपेट में आने से लहुलूहान हो गई। मासूम बच्ची सड़क पर खून से लथपथ तड़प रही थी, तब कुछ लोग उसकी जान बचाने की बजाय अपने मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। वहीं अधिकांश लोगों को उसकी तरफ देखने की फुर्सत ही नहीं थी। उन्हें तो अपने घर, ऑफिस, दुकान जाकर काम में लग जाने की जल्दी थी। महानगरों के लोग दुर्घटनाएं देखने के अभ्यरत हो चुके हैं। उनकी मानवीय भावना-संवेदना गायब हो चुकी है। ई-रिक्शा में सवार बच्चों की प्रियांशी को अस्पताल ले जाने और किसी तरह से बचाने की मिन्नतें उनके लिए अर्थहीन थीं। दस-पंद्रह मिनट ऐसे ही गुजर जाने के बाद जिम में काम करने वाले गोविंदा नामक युवक की घायल बच्ची पर नज़र पड़ी तो उसने उसे तुरंत अपनी गोद में उठाया और भागते-भागते बाबू जगजीवनराम अस्पताल पहुंचा। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया।

बच्ची तो चल बसी। उसकी मौत के बाद उसके परिवार में जो कोहराम मचा उसे भी आसपास के लोगों ने देखा। उन्होंने शोकाकुल माता-पिता को सांत्वना भी दी लेकिन उनका क्या, जिन्होंने हादसे के बाद घटनास्थल पर मौजूद रहने के बावजूद अपने अंदर के जिन्दा इंसान को दफना दिया, बस तमाशबीन और पत्थर दिल बने रहे। यही संवेदनहीनता समाज को कटघरे में खड़ा कर अपराधी साबित करती है। खून से लथपथ पड़े इंसान को बचाने की पहल करने की बजाय धड़ाधड़ वीडियो बनाने वाले निर्मोही और निर्लज्ज कहते हैं कि क्यों पुलिस की पूछा-पूछी और अस्पताल के चक्कर में अपना वक्त गवाएं। हमें और भी बहुतेरे काम है। हमने समाजसेवा का ठेका थोड़े ही ले रखा है।

जौनपुर में एक डॉक्टर हैं जो पिछले छह दशकों से मरीजों का मुफ्त इलाज करते चले आ रहे हैं। बीमार, लाचार और बेबसों की सुबह से ही उनके दरवाजे के बाहर लंबी कतार लग जाती है। महंगाई के इस काल में हलका सा पेट दर्द और अन्य छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होने पर जहां डॉक्टर विभिन्न अंदरूनी जांच के लिए पर्चे पर पर्चे लिख कर मरीज के हजारों रुपए खर्च करवा देते हैं, वहीं 92 वर्षीय डॉ.द्विवेदी की अनुभवी, जादुई उंगलियां कलाई छूकर बीमारी का एकदम सटीक पता लगा लेती हैं। मरीज के ब्लड प्रेशर, यूरीन टेस्ट और खान-पान के इतिहास की जानकारी के आधार पर अत्यंत प्रभावी दवाएं देने वाले गरीबों के यह मसीहा केवल दवाओं की वास्तविक लागत लेने के स्वर्निर्मित कड़े नियम से बंधे हैं। 1960 के दशक में जब हमारे देश भारत में काबिल डॉक्टरों की अत्यंत कमी थी तब शिवसूरत द्विवेदी ने उत्तरप्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। डिग्री मिलते ही उन्हें पहले वाराणसी और उसके बाद चुनार में सरकारी डॉक्टर के पद पर नियुक्ति मिल गई। चुनार तब पिछड़ा इलाका था, जहां न बिजली थी और न ही अन्य मूलभूत सुविधाओं का अता-पता था। स्थानीय डॉक्टर बिना मोटी फीस के मरीज को देखने से मना कर देते थे। सरकारी नौकरी करते-करते डॉ.द्विवेदी को किसी सगे-संबंधी से जानकारी मिली कि जौनपुर, जहां उनका जन्म हुआ, वहां पर भी गरीब लोग समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। वे शानदार सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर जौनपुर चले गए। परिवारजन तथा रिश्तेदार हतप्रभ सोचते रह गये। कैसा आदमी है जो बेहतरीन सरकारी नौकरी को लात मारकर ऐसी जगह आ गया है, जहां कोई कमाई-धमाई नहीं होने वाली है! लेकिन डॉ.द्विवेदी पर तो अपनी माटी का कर्ज चुकाने का जुनून सवार था। 

लोगों को आज भी अस्सी के दशक की वो घटना अच्छी तरह से याद है। जौनपुर के निकट स्थित गांव के एक अत्यंत गरीब मरीज को जब लोग इलाज के लिए उनके पास लाए, तो उसकी नब्ज डूब रही थी और सांसें थमने की कगार पर थीं। पूरे गांव ने उसकी मृत्यु को निश्चित मान लिया था। लेकिन डॉ.द्विवेदी ने हार नहीं मानी और उन्होंने रातभर बिना पलक झपकाए उसकी देखरेख और सेवा करते हुए पुरानी चिकित्सा पद्धतियों और अपने जादुई तजुर्बे से ऐसा इलाज किया कि सुबह होते-होते वह मरणासन्न मरीज अपने पैरों पर उठ खड़ा हो गया। पूरे इलाके में इसे किसी चमत्कार की तरह देखा गया। इस घटना के बाद उनके पास मरीजों की बाढ़ आ गई, जिसे संभालने के लिए उन्होंने अपने ही घर के कमरों को ‘नि:शुल्क अस्पताल वार्ड’ में तब्दील कर दिया। उनके मरीजों के प्रति जुड़ाव ने उन्हें देवता का दर्जा दिला दिया है। सभी बस यही चाहते हैं कि वे हमसे कभी दूर न हों। ईश्वर हमेशा उन पर मेहरबान रहें।

देश में कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी हैं, जो अपनी ड्यूटी इस कदर ईमानदारी से निभाते हैं कि उनके समक्ष बार-बार नतमस्तक होने को जी चाहता है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन आयुक्त तुकाराम मुंढे भी उन्हीं फरिश्तों में शामिल हैं। किसी फिल्मी नायक की तरह अत्यंत लोकप्रिय तुकाराम मुंढे का नाम सुनते ही भ्रष्टाचारियों का पसीना छूटने लगता है। उन्हें जिस विभाग में नियुक्त किया जाता है, आंधी-तूफान की तरह वहां की गंदगी की सफाई में लग जाते हैं। उनका मानना है कि वे वातानुकूलित कमरे में कुर्सी पर बैठकर महज आर्डर देने के लिए उच्च अधिकारी नहीं बनेे हैं। महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के इस आईएएस ने कभी यह नहीं देखा कि सामने वाले का कैसा रूतबा पहुंच और मान-सम्मान है। उनकी पैनी नज़र उसके नाम पर नहीं, अपराध कर्म पर रहती है, जिसका पर्दाफाश करना वे अपना एकमात्र कर्तव्य मानते हैं। बिना किसी भेदभाव के नियमों का सख्ती से पालन करवाने को कटिबद्ध तुकाराम को जहां आमजान सिंघम और रियल लाइफ का हीरो मानते हैं, वहीं नेताओं को उनकी समझौता नहीं करने की जिद हमेशा परेशान किये रहती है। बिना किसी पूर्व सूचना के कारखानों, दफ्तरों और अस्पतालों का निरीक्षण करने के लिए पहुंच जानेवाले इस कर्मवीर को मिलावटखोर और मुनाफाखोर अपना शत्रु मानते हैं। उनकी निर्भीक कार्यशैली ने उन्हें ईनाम कम और तबादले ज्यादा दिलवाये हैं। 21 साल के करियर में लगभग 25 स्थानांतरण ईनाम के तौर पर उनके हिस्से में आ चुके हैं। 2026 के मई महीने में मुंढे को महाराष्ट्र के अन्न और औषधि प्रशासन का जैसे ही कमिश्नर नियुक्त किया गया, उन्होंने मिलावटखोरों की नींद हराम कर दी। अवैध खाद्य और औषधि निर्माताओं और विभिन्न माफियाओं के यहां छापामारी के साथ-साथ वर्षों से स्थापित मिठाई बनाने वाली फैक्ट्रियों, रेस्तरां आदि का एकाएक निरीक्षण और पर्दाफाश कर लोगों की आंखें खोल दीं कि किस तरह से उनके जीवन के साथ धनपशु खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें सिंथेटिक दूध, नकली पनीर, गुटखा-तंबाखू और नकली दवाइयों के जरिए खोखला और बीमार बनाया जा रहा है। ध्यान रहे कि नकली दवाएं बनाने, खाद्य पदार्थों में मिलावट करने, प्रतिबंधित गुटखा-तंबाखू बनाने और बेचने-बिकवाने वाले एक ही दिन में आसानी से पैदा नहीं होते। उन्हें भ्रष्ट अफसरों का भी साथ और सहयोग मिलता है, तभी उनकी जड़ें मजबूत होती चली जाती हैं और फिर देखते ही देखते चोर-चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं। मुंढे जैसे उसूलों के पक्के ईमानदार अधिकारी के छापों से अवैध धंधेबाजों, मिलावट माफियाओं आदि की कमाई पर तो चोट पड़ती ही है, वहीं रिश्वतखोर अधिकारियों और कर्मचारियों की आवक पर भी लगाम लग जाती है। यही कारण है कि तुकाराम मुंढे जहां भी जाते हैं, वहां उनके नीचे कार्यरत अधिकांश अधिकारी उनसे नाखुश रहते हैं और ईश्वर से उनके स्थानांतरण की प्रार्थना के साथ-साथ अपने खास नेताओं, विधायकों, मंत्रियों के दरबार में थैलियां लेकर इस फरियाद के साथ पहुंच जाते हैं कि कृपया, इनसे शीघ्र मुक्ति दिलाओ। यह जब तक डटे रहेंगे तब तक हमारी ऊपरी कमाई बंद रहेगी तो ऐसे में हम आपकी सेवा कैसे कर पायेंगे! यह हकीकत भी काबिलेगौर है कि जैसे ही तेज तर्रार, कड़क छवि वाले तुकाराम मुंढे ने अन्न व औषधि प्रशासन की कमान संभाली है तो उनके नीचे कार्यरत कुछ पुराने बदनाम ‘वसूली’ करने वाले अधिकारी साहब के नाम के डंडे का खौफ दिखाते हुए पहले से भी अधिक ‘मोटी वसूली’ करने लगे हैं। यह भी सच है कि सत्ताधीशों के साथ और सहयोग के बिना ‘वसूली सिंडिकेट’ इतनी हिम्मत नहीं कर सकता। इस कर्तव्यपरायण आदर्श अधिकारी का जब-जब कहीं से तबादला होता है तब-तबवहां की आम जनता उनके तबादले के विरोध में सड़कों पर उतर आती है। मजबूरन नम आंखों से विदा करती तो है लेकिन दिल और दिमाग में बड़े आदर के साथ हमेशा बसाये रखती है।

Thursday, July 16, 2026

महामंत्र

 हजारों साल बीत गये। कई हस्तियां जन्मीं और चल बसीं। बहुत को विस्मृत कर दिया गया। नाममात्र के नाम लोगों को याद रहे। श्रीकृष्ण और श्रीराम की हस्ती सदियां-सदियां गुजर जाने के बाद भी जस की तस बनी हुई है। सच तो यह है कि समय गुजरने के साथ-साथ उनकी आराधना करने वालों की तादाद में इजाफा ही हो रहा है। दोनों ने मनुष्य को ईमानदारी से कर्तव्य पथ पर चलने की सीख दी। परिश्रम के मार्ग में आनेवाले व्यवधानों से भी कभी भी न घबराने का पाठ पढ़ाया। उन्हीं के सुझाये रास्तों का अनुसरण कर न जाने कितने-कितने इंसानों का उद्धार हो गया। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘सब कुछ संभव है अगर तुम्हें खुद पर पूर्ण विश्वास है। मन ही हमारा मित्र है और मन ही शत्रु। यहां मन का मतलब है विचारों का निरंतर प्रवाह। आत्म सुधार के लिए अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने मन और उसमें उठने वाले विचारों को शुद्ध बनाए रखें। आध्यात्मिक जीवनचर्या अपनाने से मन को विषय भोगों से दूर रखने में सहायता मिलती है। दरअसल, मन और इंद्रियों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि अगर हम उन्हें एक इंच भी ढील देते हैं तो वे एक मील तक फैल जाती हैं। लेकिन यदि हम दृढ़ निश्चय के साथ उन्हें काबू में लाने का अभ्यास करें तो वे शांत हो जाती हैं और हम आसानी से बेहतर इंसान बन सकते हैं।’’ जिस महान धरा पर श्रीकृष्ण और श्रीराम अवतरित हुए वहीं आप और हम जन्मे हैं, इससे बड़े भाग्य और खुशनसीबी की और क्या उपलब्धि हो सकती है। इन दोनों आराध्यों का संपूर्ण जीवन अपने आप में जीवन प्रबंधन की सार्थक और सशक्त किताब है। इस किताब के पन्ने-पन्ने में लिखा है, चुनौतियों का डट कर सामना करें। अन्यायी से बिलकुल न डरें। अनुशासन और परिश्रम से कभी भी मुंह न मोड़ें। रिश्तों के मान-सम्मान में कभी कोई कमी न आने दें। यह किताब यह भी बताती है कि गुरु, साधु, धर्मगुरु, नेता और राजा का आचरण कैसा होना चाहिए। जिस प्रकार संतान को सुधारने की जिम्मेदारी माता-पिता पर होती है, औलाद के पथभ्रष्ट होेने पर अभिभावकों को भी कोसा जाता है। उसी प्रकार प्रजा की भलाई, बुराई का सारा भार राजा के ऊपर होता है। इसलिए कहा गया है, ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ यदि देश का राजा, सदाचारी, न्यायप्रिय और धर्म कर्म वाला होता है तो प्रजा में सारे गुण क्रमश: उतर आते हैं। इसके विपरीत यदि राजा दुराचारी है, अन्यायी और प्रजा के साथ भेदभाव करने वाला होता है तो प्रजा में भी उच्छृंखलता, अनाचार पापाचार एवं प्रतिहिंसा के भाव फैलने में देरी नहीं लगती। ऐसे में राजा और प्रजा दोनों ही अधोगति को प्राप्त होते हैं। आनंदमूर्ति गुरु मां कहती हैं कि कृष्ण के नाम का अर्थ है-चैतन्य। कृष्ण का अर्थ है चुम्बकीय शक्ति रखने वाला। श्रीकृष्ण का आकर्षण बीते आने वाले कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। कुरुक्षेत्र में दो सेनाओं के बीच खड़े होकर भारी तनाव के समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वो दुनिया का सर्वोत्तम ज्ञान है। महाभारत के युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन अपने परिजनों के मोह में पड़कर लड़ने में आनाकानी कर रहे थे तब श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भागवत कथा का उपदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता (अर्थात शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं) और क्षत्रिय धर्म का बिना फल की चिंता किए पालने की शिक्षा दी। उन्होंने यह भी समझाया कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके परिणाम (फल) पर नहीं। 

हम बचपन से ही रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा को सुनते आये हैं। रामकथा में प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन और मर्यादा का वर्णन तो श्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्तिरस का वर्णन अलौकिक सुखदायी है। इन्हें सुनने से मन को शांति और आध्यात्मिक ज्ञान की मधुर प्राप्ति होती है। भगवान श्रीराम ने अपने श्रद्धेय पिताश्री की आज्ञा का पालन करते हुए सहर्ष 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उनके साथ उनकी अर्धांगिनी माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी महलों के सुख त्याग कर जंगल-जंगल भटके। बड़ों की आज्ञा का पालन और रिश्तों के सम्मान का इससे बड़ा उदाहरण इतिहास में और कहीं मिलना दुर्लभ है। हर तरह की मुश्किलों में धैर्य रखना, सबको साथ लेकर चलना, श्रीराम ने अपने कर्मों से पूरी सृष्टि को सिखाया। उन्होंने कहा, इस धरती पर जन्मे सभी मनुष्य एक समान है। उन्होंने खुशी-खुशी शबरी के जूठे बेर खाए और वानरों से मित्रता की। दुष्ट रावण का संहार करने वाले श्रीराम का संपूर्ण जीवन ही प्रेरणादायक है। तभी तो श्रीकृष्ण और श्रीराम के सार्थक संदेश हिंदुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी आकर्षक और मार्गदर्शक बने हुए हैं। हमारे देश में समय-समय पर रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा कहने वाले कई सच्चे महान संत हुए हैं। ये विद्वान संत अपनी मधुर वाणी और प्रभावी कथावाचन के माध्यम से समाज में ज्ञान, भक्ति और अच्छे संस्कार का उजाला फैलाते चले आ रहे हैं। पूज्य श्री मोरारी बापू संपूर्ण देश और दुनिया में सत्य और प्रेम पर आधारित रामकथा के लिए विख्यात हैं। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वरधाम) का रामकथा और हनुमंत कथा प्रस्तुत करने का प्रभावी अंदाज युवाओं को भी आकर्षित कर रहा है। हालांकि कुछ विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ते। श्री रमेश भाई ओझा, रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा वाचन कर बड़ी सहजता से लाखों श्रद्धालुओं का मन जीत लेते हैं। वृंदावन के अनोखे संत श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज बहुत ही सरल और हास्य विनोद की प्रभावी शैली में जब श्रीमद्भागवत कथा का प्रस्तुतिकरण करते हैं तो युवक-युवतियों का अपार हुजूम भी मंत्रमुग्ध हो बस सुनता ही रह जाता है। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज की भागवत और रामकथा प्रस्तुत करने की शैली भी लाजवाब है। सामाजिक समस्याओं के समाधान और सनातन धर्म की रक्षा का संदेश देने वाले इन महाराज की तरह कृष्ण भक्ति और भागवत कथा के लिए देश और दुनिया में जानी जा रहीं जयाकिशोरी, देवी चित्रलेखा, स्वामी अविचलदास, संत विजय कौशल जी आदि कुछ सात्विक हस्तियां हैं, जिन्होंने प्रवचन के माध्यम से धर्म के प्रचार की मशाल को बुलंदी के साथ थामा हुआ है। इनमें एक नाम कुमार विश्वास का भी जुड़ गया है, जो कवि के तौर पर डंका बजाने के पश्चात प्रवचन के क्षेत्र में भी छाये हुए हैं। श्रीकृष्ण और श्रीराम के प्रेरक जीवन चरित्र को भक्तों तथा श्रद्धालुओं तक पहुंचाने वाले सभी कथावाचक मालामाल हैं। कार्यक्रम के आयोजक पांच-दस लाख तो आसानी से दे देते हैं। अथाह धन के साथ-साथ कथावाचन का क्षेत्र पुरस्कारों से भी उनकी झोली भरता चला आ रहा है। अपराधियों को भी यह पवित्र क्षेत्र आकर्षित करने लगा है। चिंताजनक तथ्य यह भी है कि कुछ संगीन नकाबपोश अपराधी अपने मकसद में कामयाब भी हुए हैं।

पंडवानी की साम्राज्ञी तीजनबाई किसी परिचय की मोहताज नहीं। कुछ दिन पहले ही उनका निधन हुआ है। पंडवानी यानी पांडवों की कथा को मंच पर घूम-घूमकर सुनाती रहीं तीजनबाई जब महाभारत के विभिन्न प्रसंगों, विशेषकर भीम और अर्जुन की वीरता का बखान करती थीं तो दर्शकों में अथाह जोश भर जाता था। छत्तीसगढ़ में जन्मी तीजनबाई लोकगीत-नाटय की पहली महिला कलाकार थीं, जिन्होंने विदेशों में भी अपने नाम तथा कला की पताका फहराई। उनका विवाह मात्र 12 वर्ष की उम्र में हो गया था। पंडवानी गायन के लिए उन्होंने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए अपना संघर्ष जारी रखा। उनके पति को अपनी पत्नी तीजन का मंच पर जाना कतई पसंद नहीं था। घर में रोज-रोज कलह-क्लेश होने लगा। तीजनबाई को रूढ़िवादी पति के हाथों कई बार पिटना भी पड़ा और अंतत: विवाह टूट गया। परिवार तथा समाज ने भी बहिष्कृत कर दिया। दूसरी शादी भी हुई, लेकिन दूसरे पति ने भी विरोध किया कि यह तो पुरुषों वाला काम है। घर की औरतों का मंच पर नाचना-गाना शोभा नहीं देता। लोग मजाक उड़ाते हैं लेकिन तब तक तीजनबाई के अंदर का कृष्ण जाग चुका था। भीम और अर्जुन की साहस कथा में रच-बस चुकी तीजनबाई विरोधियों का डटकर सामना करना सीख चुकी थीं। उन्हें  पता चल चुका था कि कुछ भी नया करने वालों की राह में रोड़े डालने वालों को सिर्फ और सिर्फ अपने अटल जुनून और अथक परिश्रम से पटकनी दी जा सकती है। एक बार पति महोदय कुछ ज्यादा ही मर्दांनगी दिखाने के चक्कर में मंच पर चढ़कर गाली-गलौच करने लगे और पत्नी पर चुपचाप मंच से उतरने का दबाव डालने लगे। तब तीजनबाई ने आव देखा न ताव तंबूरे को लहराते हुए उसे जोर से फटकारा, जिससे उसके होश उड़ गये और वह चुपचाप चलता बना। उसके बाद की संघर्ष की यात्रा की दास्तां अनंत है। जिसने यह सिद्ध कर दिखाया कि कर्मवीर मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेते है। उन पर किसी के विरोध का तंत्र-मंत्र नहीं चलता। बेखौफ चलते-बढ़ते जाना ही मंजिल तक पहुंचने का एकमात्र ‘महामंत्र’ है। जो बचपन में कभी स्कूल की सीढ़ी नहीं चढ़ी थी उसने साक्षरता अभियान के सहारे बमुश्किल पांचवी पास की लेकिन अपनी कला के प्रदर्शन के बलबूते पर 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण हासिल कर अपना लोहा मनवाते हुए दिखा दिया कि जब कुछ करने की जिद हो तो सफलता मिलती ही है। 

किसी अच्छे काम में विघ्न डालने, छलकपट करने वालों की नस्ल कभी भी नहीं मरती। श्रीराम के नाम की आड़ में लूटपाट और शैतानी करने वाले रावण के रूप और प्रतिरूप आज भी हमारे समाज में जिन्दा हैं। अयोध्या में बने भगवान श्रीराम के पवित्र मंदिर में चढ़ावे में आने वाले रुपयों की चोरी और सोने, चांदी, हीरे के दान के गबन की खबरों ने तो सभी देशवासियों को झकझोर कर रख दिया। राम भक्तों के दान और चढ़ावे में सेंध लगाने वाले चोरों और डकैतों की जालसाजी और नीचता तो देखिए कि श्रीराम की अपार आस्था से सराबोर सात्विक धन को शराबखोरी में भी उड़ाया गया। किसी ने कारें खरीदीं तो किसी ने बंगले ताने तो कोई साहूकार बनकर लूट की मोटी रकम को ब्याज पर देकर धन्ना सेठ बन गया। इन लुटेरों में ज़रा भी इंसानियत होती तो इतने अंधे नहीं बन जाते। वर्षों के संघर्ष के बाद बने दिव्य राम मंदिर में लूटपाट करने से पहले जरूर सोचते-विचारते। लेकिन उनकी आत्मा और विवेक का ही सत्यानाश हो चुका था। अब जब इन निर्लज्ज जन्मजात बेईमानों का पर्दाफाश हो चुका है तो कम अज़ कम हमें और आपको नकाबपोशों से सतर्क और सावधान हो जाना चाहिए।

Thursday, July 9, 2026

बचपन की पाठशाला

  अपने देश भारत की लगभग एक तिहाई आबादी नाबालिग है। यहां 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे करीब पच्चीस फीसदी हैं फिर भी बच्चों की पता नहीं क्यों ज्यादा चिंता-फिक्र नहीं की जाती? हां, ढोल जरूर पीटे जाते हैं कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। राष्ट्र निर्माण में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आनेवाले समाज और राष्ट्र की नींव हैं। इन्हीं को आगे जाकर नेता, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाजसेवक, उद्योगपति आदि बनना है। बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की हम सबकी जिम्मेदारी है। हमारे देश में हर वर्ष 14 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ जो बाल दिवस मनाया जाता है उसका मूल अर्थ और संदेश यही है कि भारत माता का हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा, सेहत, देखरेख और प्यार का अधिकारी है। कलमकार की नज़र जब गली-कूचों, चौराहों, होटलों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मंदिरों, मदिरालयों, अस्पतालों आदि के ईद-गिर्द छोटे-छोटे बच्चों को कचरा बीनते और भीख मांगते देखती है तो यह प्रश्न तीर की तरह तन जाता है कि यह बच्चे कौन हैं? यकीनन अमीरों की संताने तो नहीं हैं। उनकी औलादे तो तरह-तरह की चॉकलेट, पिज्जा खाने और खिलौने के लिए जन्मी हैं। बदनसीब तो गरीबों के बच्चे हैं, जिन्हें जानवरों की तरह भटकना पड़ता है। स्कूल तो इनके लिए सपना है। ढंग का खाना भी इनके नसीब में नहीं लिखा है। उसे भी ये कचरे में तलाशते हैं। देश के अधिकांश शहरों में डंपिंग यार्ड बनाये गये हैं, जहां पर पूरे शहर की गंदगी जमा होती है। गरीबों के बच्चे इनके इर्द-गिर्द बनी झुग्गी-झोपड़ियों में अपने गरीब मां-बाप के साथ रहते हैं। यह भी जान लें कि कचरे के पहाड़ों के आसपास सक्षम लोग जाना ही नहीं चाहते। यहां से उठने वाली दुर्गंध की वजह से सांस ले पाना मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने काम का कचरा तलाशते देखे जा सकते हैं। इस कचरे में प्लास्टिक की खाली बोतलें, घरों का बेकार सामान, अस्पतालों के द्वारा फेंके गए दास्तानें, इंजेक्शन, फटे पुराने कपड़े, पेन-पेंसिल और किताब, कॉपियां, तौलिए के साथ-साथ कंडोम जैसी बेकार की बहुत सी चीजें होती हैं। गरीब बच्चों की खोजी निगाहें यहां से वो सामान तलाश ही लेती हैं, जिन्हें कबाड़ी चंद सिक्कों में खरीद लेते हैं। बरसात में तो डंपिंग यार्ड में पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों की वजह से डेंगू, मलेरिया जैसे जानलेवा बीमारियों का खतरा होता है। लेकिन गरीबों के बच्चे इसकी परवाह नहीं करते। उनके लिए घर-परिवार तथा खुद के पेट की आग को शांत करने के लिए यही आसान रास्ता है। 

विख्यात कवयित्री अनामिका की कविता की यह पंक्तियां बरबस याद हो आती है :

 ‘‘उन्हें हमेशा जल्दी रहती है,

उनके पेट में चूहे कूदते हैं

और खून में दौड़ती है गिलहरी!

बड़े-बड़े डग भरते

चलते हैं वो तो

उनका ढीला-ढाला कुर्ता 

तन जाता है फूल जाता है उनके पीछे

जैसे कि हो पाल कश्ती का!

बोरियों में टनन-टनन गाती हुई

रम की बोतलें

उनकी झुकी पीठ रीढ़ से

कभी-कभी कहती है, 

कैसी हो? कैसा है मंडी का हाल?’’

नाबालिगों को चोरी-चक्कारी, हेराफेरी के साथ-साथ और भी कई गंभीर अपराध करने के बाद पुलिस पकड़ में आते देखना तो अब आम हो गया है। हाल के वर्षों के दौरान जिस तरह से नाबालिगों ने बलात्कार और हत्या के आरोप में पकड़े जाने पर मीडिया की सुर्खियां बटोरते हुए मां-बाप को भी कलंकित किया है। उस पर जितना भी लिखा जाए, कम है। 

हिंदुस्तान का कानून दहाड़-दहाड़ कर कहता है कि बाल मजदूरी अपराध है। लेकिन कई पटाखों, बारुद की फ्रैक्ट्रियों, ईंटभट्टों, शराब कारखानों तथा मंत्रियों-संत्रियों के आलीशान घरों में छोटे-छोटे बच्चे आपको खून पसीना बहाते दिखाई दे जाएंगे। फिल्मों, टीवी तथा विज्ञापनों में बाल कलाकारों से जबरन अभिनय कराकर उनके शोषण के सच से जागरूक भारतीय खूब-खूब वाकिफ हैं। मेरे देखने में तो यह भी आया है कि महाराष्ट्र और विदर्भ के कई धनाढय परिवार खास तौर पर छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश की कम उम्र की लड़कियों को मोटी पगार का प्रलोभन देकर अपने घरों पर बर्तन, झाड़ू और विभिन्न कार्यों को कराने के लिए लाते हैं और मनमाने तरीके से काम करवाते हैं। उनसे काम करवाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती। इन्हें पढ़ा लिखाकर शिक्षित बनाने तथा बेहतरीन पगार देने का लालच देकर लाया जाता है। मां-बाप भी बहुत आसानी से झांसे में आ जाते हैं। लेकिन अधिकांश मालिक दो-चार महीने में ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दुष्टता उतर आते हैं। उन्हें आराम करने का समय ही नहीं दिया जाता। बस काम ही काम। कैदी की तरह जीने को विवश कर दी गई बच्चियों पर बलात्कार किये जाने की खबरें उनकी नीचता का पर्दाफाश करती रहती हैं। बाल श्रमिकों की तस्करी की खबरें भी किसी से छिपी नहीं हैं। जिला बाल कल्याण विभाग एवं संरक्षण विभाग तथा पुलिस को समय-समय पर छापेमारी कर बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। बच्चों से बड़ी बेशर्मी के साथ मेहनत, मजदूरी कराने वाले दबंग किस्म के शहरी छाती तान कर खड़े हो जाते हैं कि यह बच्चे अपने परिवार की सहमति से काम करते हुए अपने असहाय माता-पिता की सहायता कर रहे हैं। इस पर किसी को भी आपत्ति दर्शाने का कोई अधिकार नहीं। ऐसा भी देखने में आता है कि कम उम्र के घरेलू नौकरों को अपना रिश्तेदार बताकर बाल कल्याण विभाग की आंखों में धूल भी झोंकी जाती है। असहाय, लावारिस बच्चों की देखरेख और सुरक्षा को लेकर सरकारी कोशिशें की तो जाती हैं  लेकिन हकीकत हमारे सामने है। हर बच्चे के हाथ में किताबें हों, खिलौने हों, वे स्वस्थ रहें उन्हें कोई बीमारी न घेरे, इसी सोच और संदेश को प्रचारित और बलवति करने के लिए हर वर्ष 13 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया तो जाता है, लेकिन शासकीय और प्रशासकीय आधे-अधूरे प्रयास प्रशंसा के तो कतई काबिल नहीं। उलटे हमारे समाज में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिनसे छोटे-छोटे बच्चों की दुर्दशा देखी नहीं जाती। उनकी पहल शासन और प्रशासन को मात देती नज़र आती है। यहां मैं 31 वर्षीय रिक्की राज का खास तौर पर उल्लेख करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। रिक्की अपनी परोपकारी संस्था ‘छोटू फाउंडेशन’ के माध्यम से शोषण, अनिश्चितता, गरीबी और भूख की अथाह मार झेलते बच्चों के जीवन को नई दिशा देकर सुधार रहे हैं। हवा-हवाई भाषणबाजी करने वाले नेताओं को आईना दिखाते रिक्की राज के ‘छोटू फाउंडेशन’ के द्वारा अभी तक पांच हजार से अधिक बच्चों के जीवन को संवारते हुए समाज की मुख्य धारा में लाया जा चुका है। अभावग्रस्त आधा-अधूरा बचपन जीते बच्चों के कल्याण का विचार रिक्की के मन में आखिर कैसे आया? वर्ष 2017 में वह उत्तरप्रदेश के आगरा हाईवे से गुजर रहे थे। तभी कुल्फी बेचते एक बच्चे पर उनकी नजर पड़ी। वह कुल्फी बेचने में इस कदर खोया था कि एक तेज रफ्तार बस उसे कुलचते हुए आगे निकल गई। बच्चा सड़क पर लहुलूहान होकर कराहता रहा। किसी ने उसको उठाकर अस्पताल ले जाने की पहल नहीं की। सभी एक-दूसरे का मुंह देखते रहे और बच्चा अंतत: मर गया। आंखों देखे इस दर्दनाक हादसे ने रिक्की की सोच ही बदल दी। वहीं खड़े-खड़े उन्होंने निर्णय ले लिया कि लाचार बच्चों के लिए कुछ सार्थक करना है। 2018 में छोटू फाउंडेशन की स्थापना कर रिक्की ने खुद को असहाय बच्चों के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि, मैंने विभिन्न अभावग्रस्त क्षेत्रों में घूम-घूमकर सर्वे करते हुए पाया कि  कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अमूमन नशे की लत लग जाती है। इसकी वजह से अधिकांश तीस से चालीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मौत का निवाला बन जाते हैं। यह नशे की लत और गरीबी ही है, जो बच्चों को गलत राह पर ले जाकर अपराधी बना रही है। ‘छोटू की पाठशाला’ में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ सेहतमंद रखने के दायित्व को भी प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है। स्वास्थ्य की नियमित जांच की जाती है। उनके कौशल विकास पर भरपूर जोर दिया जाता है। उन पर हमेशा नजर रखी जाती है कि कहीं वे फिर से गलत राह के राही न बन जाएं। छोटू फाउंडेशन के कर्ताधर्ता रिक्की राज की सजगता और ईमानदारी को देखते हुए अनेकों परीचित, दोस्त और रिश्तेदार भी उनकी मदद करने के लिए आगे आने लगे हैं। इसमें अधिकतम मदद तो सोशल मीडिया के जरिए क्राउड फंडिंग से मिलती चली आ रही है। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से शुरू हुआ ‘छोटू फाउंडेशन’ अब नोएडा, ग्रेटर नोएडा के अलावा बिहार और राजस्थान में भी जोर-शोर से सक्रिय है। हमारे देश के हुक्मरान 2047 तक पूर्णतया विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जहां-तहां गगनचुंबी इमारतें, मेट्रो, एक्सप्रेस-वे और अरबो-खरबों का निवेश किया जा रहा है। लेकिन इन बच्चों की किसी को कहीं कोई चिंता नहीं! किसी भी जागरूक भारतीय से यदि सार्थक विकास की परिभाषा पूछें तो वह यही कहेगा कि जब तक देश का हर छोटा-बड़ा नागरिक सुरक्षित और सम्मानित नहीं, तब तक ऐसा विकास आधा-अधूरा है। असली विकास तो तभी होगा, जब इस देश के बचपन को बदहाली से छुटाकारा मिलेगा। हर छोटे-बड़े नागरिक की सेहत और जेब मजबूत होगी। उसे किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।

Thursday, July 2, 2026

छल, कपट, बेवफाई की खाई

 झारखंड के बोकारो जिले में एक सत्रह वर्षीय लड़की फिल्मी अंदाज में 100 फुट ऊंचे मोबाइल टॉवर पर चढ़ गई। लड़की की जिद थी कि वह तब तक नीचे नहीं उतरेगी, जब तक उसके प्रेमी को जेल से रिहा नहीं किया जायेगा। लड़की का रांची के एक युवक से प्रेम प्रसंग चल रहा था। वह उसी से शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके मां-बाप तैयार नहीं थे। उन्होंने उसके प्रेमी के खिलाफ अपहरण की झूठी शिकायत दर्ज करवा दी। कर्तव्यपरायण भारतीय पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया। अदालत ने प्रेमी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। प्रेमिका को यह नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं हुई और उसने प्रेमी को छुड़वाने के लिए मोबाइल टॉवर का सहारा लिया। कई घंटों तक वह इस मांग के साथ वहीं डटी रही।  एहतियातन टॉवर के चारों ओर नेट बिछाया गया। सभी चिंतित और भयभीत थे कि वह कहीं कूदकर अपनी जान न दे दे। उसे मनाने, समझाने और नीचे लाने में पुलिस को कई घंटे लग गए। छत्तीसगढ़ के शहर जांजगीर में विवाह समारोह के दौरान दूल्हे को नशे में धुत देखकर दुल्हन ने शादी करने से सरासर इंकार कर दिया। मुस्कान नामक इस लड़की ने सगाई के समय भी लड़के को जब नशे में टुन्न देखा था तब उसका माथा घूम गया था। तब उसने उसे जीभर कर डांटा-फटकारा था। लड़के के कान पकड़ने पर ही वह शादी के लिए मानी थी। लेकिन जब उसने गौर किया विवाह की रस्मों के दौरान वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा है। नशे में बहकी-बहकी बातें कर रहा है तो उसने नशेड़ी के साथ सात फेरे लेने से स्पष्ट मना कर दिया। मुस्कान के इस साहसिक निर्णय का सभी ने स्वागत किया। जिला पुलिस अधीक्षक तथा विभिन्न समाजसेवकों की उपस्थिति में उसे पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। वो जमाना बहुत पीछे छूट चुका, जब कोई भावुक कवि नारी को अबला बताता था तो पाठक कवि की नारी के प्रति सहानुभूति में रची-बसी सोच की सराहना करते थे। उसे नारी का हितकारी घोषित कर हार, गुलदस्तों और शालों से सम्मानित करते थे। आज नारी, पुरुषों को कड़ी टक्कर देते हुए नया इतिहास लिखने, रचने की ओर तेजी से अग्रसर है। शिक्षा, खेलकूद, ज्ञान-विज्ञान, समाज सेवा, राजनीति आदि तमाम क्षेत्रों में झंडे गाड़ती नारियों की  प्रेरक उपलब्धियों की प्रभावी खबरें हर सजग भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती हैं।

ऐसा कोई भी देशवासी नहीं जो नारी को शिखर पर देखना नहीं चाहता हो। लेकिन बीते कुछ वर्षों से कुछ नारियों के द्वारा संगीन अपराध करने के मामले में पुरुषों की बराबरी करने की खबरों ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। क्रिमिनल लड़की है या लड़का इसमें किसी का पक्ष लेने और सहानुभूति दर्शाने की कोई गुंजाइश नहीं है। बेवफाई तो अपनी जगह है लेकिन कुंआरी और शादीशुदा युवतियां जिस तरह से नृशंस हत्याएं करते हुए मीडिया में छा रही हैं, उससे यह सवाल तो सताता ही है कि क्या उन्हें कानून का भय और जानकारी नहीं? जेलों में जिस तरह से महिलाओं की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि अपराध करने को आतुर नारियों ने अवैध रिश्तों तथा भोग विलास को ही अपने जीवन का असली मकसद मान लिया है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि माता-पिता पर क्या गुजरती है और समाज कैसे-कैसे उनके छल, कपट और गिरेपन पर थूकता है। अपने करीब देखने के लायक ही नहीं समझता। एक हकीकत यह भी है कि बिगड़ी और भटकी शहजादियां इस भरोसे और भ्रम में संगीन अपराधी बन रही हैं कि उनके रईस मां-बाप किसी न किसी तरह से उन्हें बचा ही लेंगे। पैसे से तो सब कुछ खरीदा जा सकता है। यहां तक कि शासन और प्रशासन की बागड़ोर संभाले ऊंचे लोगों का ईमान धर्म भी। उनके लिए यह भी बचकानी सोच है कि सच्चा प्यार ईश्वर की पूजा है। स्वार्थ और बेवफाई का अंजाम कभी भी सुखद नहीं होता। अपने आशिक के लिए पति और मंगेतर को मौत के घाट उतार देने की क्रूर घटनाएं रिश्तों को ही कलंकित नहीं करतीं, मानवता को भी झकझोर देती हैं। 

बीते हफ्ते महाराष्ट्र के पुणे में एक लड़की ने अपने होनेवाले पति को प्रेमी के साथ मिलकर मौत के घाट उतार दिया। इतना ही नहीं उसने नृशंस हत्या को एक हादसे का रूप देने की खौफनाक साजिश रचते हुए प्यार में अंधी, बेवफा युवतियों और पत्नियों की अपराध कुख्यात चर्चित। डायरी के पन्ने खोल दिए। जिनका खबरों से अटूट नाता है, उनके लिए तो राजा रघुवंशी हत्याकांड को भूला पाना बहुत मुश्किल है। हनीमून पर ही खून की होली की कल्पना कौन कर सकता है? इंदौर की पच्चीस वर्षीय सोनम की 11 मई 2025 को राजा रघुवंशी से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। शादी के एक महीने के बाद दोनों हनीमून के लिए शिलांग जा पहुंचे। सोनम ने राजा रघुवंशी से ब्याह तो कर लिया था, लेकिन उसका पूर्व प्रेमी राज कुशवाह अभी भी उसके तन-मन में बसा था। सात फेरे लेने के पश्चात भी वह रघुवंशी को अपना पति स्वीकार नहीं कर पायी थी। प्रेमी के प्यार में अंधी हुई सोनम के लिए हनीमून तो महज दिखावा था। उसने पहले से ही अपने पति को यमलोक पहुंचाने की योजना बना ली थी। इस षडयंत्र में साथी था प्रेमी राज कुशवाह। दोनों ने मिलकर योजना बनाई। तीन कॉन्ट्रेक्ट किलर को अच्छी-खासी फीस देकर शिलांग बुलवाया और हनीमून के दौरान पति राजा रघुवंशी की धारधार हथियारों से हत्या करवाने के पश्चात गहरी खाई में फेंक दिया। उसके पश्चात सोनम ने पुलिस के समक्ष लूटपाट का नाटक किया। इतना ही नहीं खुद के बेहोश होने की झूठी कहानी भी गढ़ी। राजा के शरीर पर हथियारों की मार के गहरे घाव थे, जबकि सोनम को नाममात्र की खरोंच तक नहीं आई थी। सलाखों के पीछे पहुंचने के पश्चात सोनम के पास पछतावे के सिवा और कोई चारा नहीं था।

मध्यप्रदेश के धार जिले में 2026 के अप्रैल महीने में 28 वर्षीय पुरोहित देवकृष्ण की उसके घर में ही हत्या कर दी गई। यहां भी हत्यारी थी उसकी पत्नी प्रियंका, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को इसलिए  मार डाला, क्योंकि उसके शरीर का रंग काला था और उसके अनुसार उसके लायक भी नहीं था। हत्या के बाद प्रियंका ने पुलिस को बताया कि लुटेरों ने घर में घुसकर लूटपाट की और मेरे जीवनसाथी का खात्मा कर दिया। लेकिन सच्चाई सामने आने में ज्यादा समय नहीं लगा। रिश्तेदारों तथा जान पहचान के लोगों से पता चला कि हत्यारी अपने पति को काला-कलूटा और नाकाबिल कहकर  अपमानित करती रहती थी। वर्ष 2017 में तेलंगाना में स्वाति नामक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को बेहोशी का इंजेक्शन देकर मार डाला। इतना ही नहीं उसका नामो निशान खत्म करने के लिए शव को जंगल में जला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। बिल्कुल फिल्मी तौर-तरीके के साथ उसने अपने प्रेमी के चेहरे पर एसिड डाला और ससुराल वालों को बताया कि अज्ञात लोगों ने उसके पति सुधाकर पर एसिड अटैक किया है। दरअसल, हत्यारी पत्नी अपने प्रेमी राजेश की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उसे हमेशा-हमेशा के लिए पति सुधाकर की पहचान देने की तैयारी में थी। लेकिन अस्पताल में जब नकली सुधाकर (राजेश) को मटन सूप परोसा गया तो उसने लेने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि वह शुद्ध शाकाहारी था, जबकि सुधाकर (पति) मांसाहारी था। इसी वजह से ससुरालवालों को शक हुआ और हैरतअंगेज और खौफनाक साजिश का पर्दाफाश हो गया। बिरयानी में नींद की गोलियां डालकर पति का हमेशा-हमेशा के लिए अंत, कत्ल करने के बाद नीले और पीले ड्रम में पति की लाश छिपाने दबाने की खबरों को भी भूला पाना आसान तो नहीं। यह खौफनाक हिंसक सिलसिला कब और कहां जाकर थमेगा, इसका उत्तर फिलहाल नदारद है। 

18 जून 2026 के दिन रियल एस्टेट कंपनी के मालिक केतन अग्रवाल को उसकी मंगेतर सिया गोयल ने पुणे के निकट स्थित विख्यात लोहगढ़ किले  की पहाड़ियों पर भ्रमण के बहाने से ले जाकर खाई में धकेलकर जो दर्दनाक मौत दी उससे उसने भी कुख्यात हत्यारियोेंं में अपना नाम शामिल करवा लिया। इस शातिर लड़की का अखबारों तथा सोशल मीडिया से कुछ न कुछ तो वास्ता रहा होगा, जिनमें वासना में अंधी हुई बेवफा, बेवकूफ नारियों की खबरे सुर्खियां बन सभी को सावधान करती रहती हैं। फिर भी उसने अंधापन नहीं छोड़ा! बीस वर्षीय सिया की भले ही केतन से बड़ी धूमधाम से सगाई हो चुकी थी लेकिन अभी भी उसने अपने प्रेमी चेतन चौधरी से मिलना-जुलना नहीं छोड़ा था। सिया को अपना प्रेमी, अपने मंगेतर से कहीं ज्यादा भाता था। सांवले रंग के केतन के बाल झड़ चुके थे और वह विग लगाता था। बोलते समय हकलाता भी था, जो सिया को नापसंद था। वह मंगेतर केतन से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी। इसलिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर केतन के खात्मे की साजिश रची और घूमने के बहाने लोहगढ़ किले पर ले गई। उसके पीछे-पीछे प्रेमी चेतन भी जा पहुंचा और मौका मिलते ही दोनों ने केतन को 400 फीट गहरी खाई में धक्का देकर अंधा विश्वास करने की दर्दनाक सौगात दे दी। केतन सिया से बेइंतहा प्यार करता था। इश्क के नशे में वह इतना अंधा हो चुका था कि वह उसकी साजिशों को नजरअंदाज करता गया। विवाह तो अभी होने को था, लेकिन सिया ने शॉपिंग के नाम पर उससे 1 करोड़ रुपए झटक कर अपने प्रेमी चेतन को सौंप दिए, ताकि वह अपनी हैसियत सुधार सके। दोनों ने तीन साल बाद शादी करने की योजना बना रखी थी। उससे पहले दोनों चेतन से अधिक से अधिक धन ऐंठने में लगे थे। दोनों पार्टी बाजी और नशे के शौकीन थे। पुलिस लॉकअप में भी सिया ने बीयर की मांग की। केतन अग्रवाल की मौत के बाद हत्यारी सिया के माता-पिता को भी गहरा सदमा लगा। उसके पिता को तो हार्टअटैक आ गया और अस्पताल में भर्ती किया गया। बीमार पिता ने यह भी कहा कि ‘बेटी को फांसी दे दी जाए। मुझे कोई गम नहीं होगा। अपने जवान बेटे को खोने वाले पिता को फूट-फूटकर रोते देख सभी की आंखें भर आईं। हर कोई यही कहता नजर आया कि धोखेबाज कपटी, फरेबी सिया को भरे चौराहे पर फांसी दे दी जानी चाहिए। वह अब इस दुनिया में रहने लायक नहीं हैं...