Thursday, April 30, 2026

छपे शब्दों की छाप

अपने देश में कभी काफी अखबार और पत्रिकाएं छपती और खूब बिकती थीं। किताबों के प्रति भी पाठकों का अथाह लगाव और जुनून देखते बनता था, लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो चुका है। अखबारों की प्रसार संख्या में भी अकल्पनीय कमी आ चुकी है। कोरोना की महामारी ने जहां कई समाचार पत्रों को बेमौत मारा तो वहीं जो किसी तरह से बचे रह गये उनकी क्या हालत है, उसकी हकीकत अखबार मालिक ही जानते-समझते हैं, लेकिन खुलकर बता नहीं सकते। उस पर सोशल मीडिया ने भी गजब का कहर ढाया है। पुस्तकों के अधिकांश प्रेमी भी सोशल मीडिया के होकर रह गये हैं। एक से एक साहित्यिक पुस्तकें धड़ाधड़ छपती हैं, लेकिन उतनी बिकती नहीं। अधिकांश लेखक अपने रिश्तेदारों, मित्रों, शुभचिंतकों को अपनी किताबें मुफ्त में उपहार स्वरूप देकर खुश हो लेते हैं। भारत देश में अब बहुत कम ऐसे लेखक है, जिनकी कृतियां उन्हें दाम, मान-सम्मान और पाठक उपलब्ध कराती हैं। आज का उजागर सच यह है कि यदि सरकारी और प्रायवेट वाचनालय पुस्तकों की खरीदी बंद कर दें तो अधिकांश प्रकाशक भी अपनी दुकानों का शटर गिराकर किसी दूसरे धंधे में लीन हो जाएं। वैसे कइयों ने तो इस पेशे से सदा-सदा के लिए किनारा भी कर लिया है। जिस काम में मुनाफा नहीं होगा, उसमें कोई समझदार व्यक्ति अपना समय और धन क्यों बर्बाद करेगा? संपूर्ण देश के रेलवे स्टेशनों पर ए.एच.व्हीलर के बुक स्टॉल की शान-शौकत से भले ही आज की पीढ़ी परिचित न हो, लेकिन हमारी पीढ़ी कभी भी नहीं भूल सकती। इन बुक स्टॉल पर हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं और विभिन्न किताबें सहज ही उपलब्ध हो जाती थीं।

‘मुझे वो दिन आज भी याद हैं’ जब मैं तब के मध्यप्रदेश और आज के छत्तीसगढ़ के संस्कारी शहर बिलासपुर में अध्ययनरत था। तब सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय, नीहारिका, दिनमान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं को खरीदने के लिए साइकिल से मीलों का सफर तय करके रेलवे स्टेशन चला जाता था। वहां पर स्थित ए.एच.व्हीलर का बुक स्टॉल वैसी ही संतुष्टि देता था, जैसे किसी आस्थावान भक्त को मंदिर। उस दौर में मात्र बीस-पच्चीस रुपए में पांच-सात पत्रिकाएं और प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, शिवानी, कमलेश्वर, अमृतराय जैसे मनपसंद रचनाकारों की किताबें खरीदकर धन्य हो जाता था। आज से पचास-पचपन वर्ष पूर्व हिंद पॉकेट बुक्स तथा अन्य नामी-गिरामी प्रकाशनों के अच्छे खासे उपन्यास पांच-दस रुपये में मिल जाते थे। सारिका, हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी तब की विख्यात पत्रिकाओं की कीमत भी अधिकतम पांच रुपए के आसपास होती थी। पैसों की कीमत और तंगी के बावजूद भी तब पढ़ने वाले आज की तुलना में कहीं बहुत-बहुत ज्यादा थे। बच्चों के लिए भी एक से एक पत्रिकाएं तथा उपन्यास सजग प्रकाशकों के द्वारा न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध कराये जाते थे, लेकिन अब तो वो दौर सपने जैसा लगता है। नगरों, महानगरों के रेलवे स्टेशनों की शान और शोभा कहलाने वाले ‘ए.एच.व्हीलर’ के बुक स्टॉल भी पाठकों, खरीददारों के अभाव के चलते बंद हो गये हैं। यह कायाकल्प बीते पांच-सात वर्षों में बड़ी तेजी से हुआ है। अब तो रेलवे के उन बुक स्टॉल पर अखबारों, पत्रिकाओं, उपन्यासों की बजाय पेन, कॉपी, बिस्कुट, क्रीम, पाउडर, हल्दीराम के लजीज नमकीन के पैकेट बिकने लगे हैं। मुझे अच्छी तरह से यह भी याद है कि रायपुर में स्थित कॉफी हाऊस में घुसते ही एक बुक स्टॉल हुआ करता था, जहां पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ चर्चित, लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास शीशे की अलमारी में सजे रहते थे। अस्पतालों के आसपास तथा बस अड्डों पर दिखने वाले बुक स्टॉल भी लगभग नदारद हो गये हैं। 

हर वर्ष 23 अप्रैल को दुनिया के अधिकांश देशों में पुस्तक दिवस मनाया जाता है। बीते वर्षों की तरह इस वर्ष भी पुस्तक दिवस मनाते हुए पुस्तकों के अंधकारमय वर्तमान और भविष्य पर चिंता व्यक्त करने के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन और ऑनलाइन कंटेट के आकाश छूते प्रभाव के वशीभूत होकर किताबों के पाठकों में आयी अत्याधिक कमी को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हुए विद्वानों ने लेखों और भाषणों की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पुस्तकों की निरंतर कम होती मांग लेखक, लेखिकाओं की गहन चिंता का विषय रही। संगोष्ठियां आयोजित कर एक स्वर में कहा गया, यदि स्थिति नहीं सुधरी तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। पुस्तकें ज्ञान का सागर होती हैं। अच्छा क्या है, बुरा क्या है, इस सच से रूबरू कराते हुए अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती हैं। दरअसल, सार्थक साहित्य मानवता, सभ्य समाज का वो प्रेरक दस्तावेज है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जागरूक लेखकों की कलम से रचा जाता है। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे, कि जब आपका मन विचलित हो, चिंता ने जकड़ रखा हो या कोई और बड़ा संकट हो तो चुनिंदा प्रेरक किताब पढ़ने लगो। ऐसी हर किताब की अहमियत होती है, जो साथी बन आपके अकेलेपन और निराशा को भगाने के साथ-साथ सोये विवेक और मनोबल को जगाती है। यदि किसी कारणवश आपका गुस्सा शांत होने का नाम न ले रहा हो तो शब्द बर्फ बन क्रोधाग्नि को शांत करने में अकल्पनीय भूमिका निभाते हैं। किसी पुस्तक प्रेमी और महान विचारक का कथन है कि सार्थक किताबों से रूबरू होकर उन्हें शब्द-दर-शब्द पढ़ना जिस अनुभव और ज्ञान के सागर में गोते लगवाता है उसका कोई सानी नहीं। सच तो यह है कि किताबें पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो। इसलिए तो किताबों को इंसानों का सबसे अच्छा मित्र कहा जाता है। हिंदुस्तान के महान कथाकार, उपन्यासकार निर्मल वर्मा कहते हैं, 

‘‘पुस्तकेंमन का शोक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, बल्कि सबकी आंख बचाकर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं। यही पुस्तकें ही हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में हमारी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में साथ देती हैं।’’ किताबों को लेकर विचारक, नाटककार स्वर्गीय सफदर हाशमी के विचार भी काबिलेगौर हैं, 

‘‘किताबे करती हैं बातें

बीते ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की

एक एक पल की।

खुशियों की गमों की

फूलों की, वमों की

जीत की हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे

इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’

कोई भी सार्थक प्रेरक किताब महज कागजों पर लिखे अक्षरों का भंडार नहीं होती, बल्कि प्रतिभावान रचनाकार के देखे और भोगे यथार्थ का सजीव चित्रण होती है। एक अत्यंत विख्यात विदेशी लेखक की पुस्तक जब साहित्य के दुश्मनों ने जलाकर राख कर दी तो उनका बस यही कहना था, कागज भले ही जल जाएं लेकिन शब्द कभी नहीं जलते। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उनका पुनर्जन्म हो जाता है। बुलंदियों पर पहुंचकर लोगों को अचंभित करने वाले कलाकारों, साहित्यकारों, उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि सकारात्मक प्रेरक किताबों से प्रेरित होकर ही उन्होंने यह मुकाम पाया है। कालजयी लेखकों की रचनाएं उनके जीवन का निचोड़ होती हैं। पचासों वर्ष बीत जाने के बाद भी कथाकार, उपन्यासकार, प्रेमचंद पाठकों की पहली पसंद बने हुए हैं। महान विचारक रजनीश यानी ओशो ने कोई किताब नहीं लिखी। उनके शिष्यों, प्रशंसकों और प्रभावितों ने उनके हजारों भाषणों को पुस्तक में संकलित, समाहित कर उन्हें लोकप्रिय लेखक के तौर पर स्थापित करवा दिया। देश के किसी भी शहर में लगने वाले पुस्तक मेलों में आज भी मुंशी प्रेमचंद और ओशो पसंदीदा लेखक के तौर पर छाये रहते हैं। पुस्तक मेलों में पहुंचने वाली भीड़ कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, रविंद्र कालिया, ममता कालिया, अमृता प्रीतम, शिवानी के साथ-साथ नये लेखकों की कृतियों को भी खरीदने में अग्रणी दिखायी देते हुए कहीं न कहीं आश्वस्त करती है कि सोशल मीडिया की आंधी में भी लिखे और छपे हुए शब्दों को पढ़ने, जानने और समझने की दिली चाहत रखने वाले सजग पाठकों की वर्तमान में भी अच्छी-खासी तादाद है। पाठकों की कमी का रोना रोने की बजाय अच्छा साहित्य रचने की जिम्मेदारी तो नये, पुराने लेखकों की भी बनती है। एक प्रश्न लेखकों से यह भी कि वे खुद कितने बेहतर पाठक हैं? अधिकांश लेखक दूसरे लेखकों की नवीनतम कृति उपहार में तो ले लेते हैं, लेकिन उसे पढ़ते नहीं। फिर ऐसे में उनकी किताबें पढ़ी जाएंगी, पढ़ी जाती होंगी इसका अंदाज वे स्वयं लगा सकते हैं। वैसे भी जो अच्छा पाठक नहीं, वो  बेहतर लेखक भी नहीं हो सकता है।

Thursday, April 23, 2026

इस पहल की कभी न टूटे डोर

‘‘इन दिनों उसमें इतनी अकड़ आ गई है, जैसे वह कहीं का कलेक्टर हो गया हो।’’

‘‘तुम तो खुद को कलेक्टर समझने लगे हो। जमीन पर तो तुम्हारे पैर ही नहीं पड़ते। बस हवा में उड़ते रहते हो।’’ जब कोई एकाएक अपना रंग बदल लेता है। कोई-पद-पदवी पाने के पश्चात दूसरों को वह कमतर समझते हुए मिलना-जुलना छोड़ देता है। अकड़ दिखाने लगता है तो शिकायत के तौर पर खट्टे-मीठे अंदाज में अपने मन की बात भड़ास और शिकायत की सुई चुभोने का अपने यहां कुछ ऐसा ही बहुत पुराना चलन है। कलेक्टर कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होते। जिले में सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें सभी मान-सम्मान देते हैं। कलेक्टर बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने का गौरव हासिल होता है। जिले के पूरे प्रशासन को चलाने वाले कलेक्टर महोदय के कंधों पर कानून-व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, विभिन्न विकास कार्यों तथा आपदा प्रबधन की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ और भी कई जिम्मेदारियां होती हैं। काम करते-करते कब दिन गुजर जाता है, इसका उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें आम और खास लोगों से भी मिलना-जुलना होता है। उनकी समस्याओं का समाधान भी उनके कर्तव्य का प्रबल हिस्सा होता है।

 कई बार यह भी देखने में आता है कि गरीब, लाचार जुगाड़ विहीन लोग अत्यंत आवश्यक काम होने पर भी कलेक्टर से मिलने से वंचित रह जाते हैं, जबकि टुटपूंजिए नेता, पत्रकार और दलाल किस्म के चेहरे जिले के प्रशासनिक प्रमुख की चापलूसी कर उनके इर्द-गिर्द खड़े और बैठे नजर आते हैं। झारखंड के गोपालगंज के एक आम नागरिक को अपनी खेती से जुड़े साधारण से काम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर काट कर अपनी कई चप्पलें घिसवानी पड़ीं, लेकिन भ्रष्टाचार, बेइमानी और आराम परस्ती के रंग में रंगे सरकारी तंत्र ने उन्हें निराश कर दिया। उन्हें दु:खी और हताश देखकर किसी शुभचिंतक ने उन्हें कलेक्टर से मिलकर अपनी समस्या से अवगत कराने का सुझाव दिया। वे बड़े बेमन से कलेक्टर महोदय से मिले। उनके आश्चर्य की तब कोई सीमा नहीं रही जब साहब ने अत्यंत सरलता, सहजता और इत्मीनान से उनकी बात सुनी। उनका तुरंत काम भी हो गया। इतना ही नहीं जिलाधीश महोदय ने अधिकारियों से काम में लेटलतीफी और टालने के कारण की सफाई भी मांगी। घर लौटते समय उस उम्रदराज की आंखें खुशी से नम थीं। कलेक्टर से मिलने से पहले उनके मन में तो यह बात गहरे तक घर किये थी कि जब छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी जरूरी काम को करने की फीस मांगते हैं। नहीं देने पर आनाकानी करते हैं तो कलेक्टर तो कलेक्टर हैं। पूरे जिले के मालिक, वो भला कहां आम आदमी की फरियाद सुनने वाले हैं...। इस संपूर्ण चिंताजनक स्थिति-परिस्थिति और पिता की पीड़ा पर स्कूल में पड़ रहे उनके बेटे की पैनी नज़र थी। वह पिता की तकलीफ को लेकर बेहद चिंतित भी था, लेकिन सोचने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था। जब पिता की समस्या का समाधान हो गया और उन्हें चिंतामुक्त तथा हंसते मुस्कराते देखकर संवेदनशील, भावुक और सचेत बेटे के मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि जो कार्य कोई नहीं कर सकते उसे जिलाधिकारी अवश्य कर सकते हैं। ऐसे में तभी उसके मन में जिलाधीश यानी कलेक्टर बनने के सपने ने जन्म लिया। जिसे साकार करने के लिए उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। इस परिश्रमी और जुनूनी बालक का नाम है कुमार आशीर्वाद। आशीर्वाद वर्तमान में नागपुर जिलाधिकारी के पद पर आसीन हैं।

वर्ष 2023 में सोलापुर के जिलाधिकारी के पद को संभालने वाले कुमार आशीर्वाद ने गड़चिरोली में पदस्थ रहने के दौरान दिव्यांग और निराक्षित लोगों को दिव्यांग प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड सीधे उनके घर पहुंचाने की पहल की, उसी से उनकी सच्ची और सार्थक जनसेवा की मंशा का पता चल गया। वर्ष 2025 में सोलापुर में जब बाढ़ ने तांडव मचाया था, तब भी दूर खड़े रहकर निर्देश देने की बजाय वे स्वयं चार-पांच दिन तक बाढ़ प्रभावितों के बीच रहे और एक-एक की समस्या को जाना, समझा और त्वरित समाधान कर राहत प्रदान की। उनके योजनाबद्ध तरीके से काम करने, तुरंत सार्थक निर्णय लेने की प्रभावी समझ की प्रेरक योग्यता की तो केंद्र सरकार ने भी बार-बार सराहना की है, वहीं आम लोगों के दिलों में भी सम्मानजनक स्थान बनाते हुए यह भरोसा जगाया है कि वे जब भी चाहें उनसे मिलने के लिए आ सकते हैं। बिना किसी भेदभाव के उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर हैं। संतरानगरी नागपुर में पदस्थ होने पर उनके ये शब्द थे, ‘‘उपराजधानी होने के कारण नागपुर में चुनौतियां तो बड़ी होंगी, लेकिन सभी को साथ लेकर समन्वय से काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।’’ यह सौ फीसदी सच है कि एक दूसरे के साथ और सहयोग के बिना कोई कार्य सफलता का मुंह नहीं देख पाता। बिना किसी भेदभाव के परिश्रम और लगन से काम करने वाले इंसानों को मान-सम्मान मांगना नहीं पड़ता। उनके सुकर्मों की यशगाथा देखते ही देखते दूर-दूर तक पहुंच जाती है। 

हम भारतवासी वादाखिलाफी, रिश्वतखोरी, छल, कपट और तरह के अनाचारों के सतत शिकार होते चले आ रहे हैं। शासन, प्रशासन के हाथों निरंतर छले जाते चले आ रहे देशवासी अब बदलाव चाहते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अथक परिश्रम और ईमानदारी से अधिकांश भारतीयों में जो सच्चे सेवक की छवि बनाई है वो यकीनन प्रणम्य है। फिर भी हमारा देश वैसा नहीं बन पाया है जैसा यहां की संपूर्ण जनता चाहती है। 

इन दिनों नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह के नाम की यश गाथा की पताका पूरी दुनिया में लहरा रही है। उनके द्वारा देश हित में उठाये गये क्रांतिकारी कदमों के समक्ष भारत की युवा पीढ़ी भी नतमस्तक है। पड़ोसी देश नेपाल के 35 वर्षीय युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ लेने के तुरंत बाद सभी प्रायवेट स्कूलों को बंद करवा दिया है। उनका मकसद है कि उद्योगपति, मंत्री, अफसर और अमीर-गरीब परिवारों के सभी बच्चे एक साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ें ताकि उन्हें समानता का एहसास हो। वीआईपी संस्कृति के घोर विरोधी बालेन शाह ने मंत्रियों, संत्रियों के वीआईपी काफिले के लिए सड़कों को बंद करने की परपंरा समाप्त कर दिया है। जाति-आधारित राजनीति को त्याग कर सामाजिक न्याय और विकास के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध युवा पीएम शाह ने पिछली सरकारों में हुए भ्रष्टाचारों की जांच की घोषणा कर नेपाल के युवाओं का मन जीत लिया है। वर्ष 2022 में बालेन शाह जब काठमांडु के मेयर थे तब उन्होंने वो कर दिखाया जो अभी तक किसी नेता के बस और नीयत की बात नहीं थी। काठमांडु के बीचों-बीच वर्षों से सिर उठाकर खड़े अवैध शोरूम और भव्य इमारतों पर बुलडोजर चलवा कर पूरे देश को अतिक्रमण मुक्त करने की मंशा प्रकट की थी उससे उनकी जो निष्पक्ष और ईमानदार नेता की छवि बनी उसी ने उन्हें इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करवाया है। राजनीति में पर्दापण करते-करते बालेन शाह ने ठान लिया था कि उन्हें दूसरे नेताओं जैसा नहीं बनना है। यदि उन्हें मौका मिला तो भेदभाव और अन्याय का खात्मा करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। अपने देश नेपाल को भ्रष्टाचारियों के हाथों लुटते देख उनका खून खौल उठता था और रातों की नींद उड़ जाती थी। वे अक्सर जिस तरह से आम लोगों के बीच पहुंच कर उनका हालचाल और तकलीफों से अवगत होते हुए समाधान करते नजर आते हैं उससे लगता ही नहीं कि वे पीएम हैं। बिल्कुल अपना सा आम चेहरा प्रतीत होते है। अपने देश के प्रधानमंत्री को अपने बीच पाकर आम जनता को बेहद खुशी होती है। बालेन शाह चकाचौंध वाली पार्टियों और आलीशान दावतों से दूर रहकर पहले की तरह  नेपाली सादा खाना यानी दाल, चावल और सब्जी पसंद करते हैं। उनका कहना है कि मुझे नेपाल के बदलाव का जो अवसर मिला है-उसे मैं यूं ही गंवाने का अपराध नहीं कर सकता।

Thursday, April 16, 2026

बस करो...मत करो

धन के लिए, तथाकथित मान-सम्मान, परिवार की इज्ज़त के लिए और भी कितने-कितने अभिमान और झूठी शान के लिए हत्याओं और रिश्तों की बलि चढ़ाने के क्रूर सिलसिले ने मानवता को शर्मसार होने को मजबूर करना प्रारंभ कर दिया है। वो नगर, महानगर जो कभी इंसानियत की मजबूत नींव पर खड़े नज़र आते थे, अब रेत के घरौंदे से बिखरते और ढहते नज़र आने लगे हैं। संतरानगरी नागपुर में सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाने की परिपाटी रही है। दीपावली, दशहरा, ईद, होली, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस आदि को जिस एकता, तन्मयता और आपसी सद्भाव के साथ मनाया जाता है, वह अनुकरणीय और लाजवाब है। राम जन्मोत्सव (रामनवमी) और हनुमान जयंती की भव्य शोभायात्रा में श्रद्धालुओं की जो भीड़ उमड़ती है, वह भी यकीनन देखते बनती है। स्त्री-पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग सभी आस्था और भक्ति के रंग में रंगे नजर आते हैं, लेकिन इस बार की हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान एक भोले-भाले किशोर को जिस तरह से मौत के घाट उतारा गया, उसे कम अज़ कम सजग शहरवासी तो कभी नहीं भूल पायेंगे। अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता और खौफ की भावना उनके मन-मस्तिष्क में डटी रहेगी। 14 साल का एक चंचल लड़का घर से शोभायात्रा में शामिल होने के लिए निकला, लेकिन फिर वह घर नहीं लौटा। दो दिन बाद उसकी लाश मिली। जब वह घर से शोभायात्रा में जा रहा था तब उसकी दादी ने उसे रोककर कहा था, ‘‘शोभायात्रा में भीड़ बहुत रहने वाली है, अपना ख्याल रखना, किसी अंजान से बिल्कुल न घुलना-मिलना।’’ अथर्व नामक इस बच्चे का जवाब था, ‘‘दादी अब मैं बड़ा हो गया हूं। आप मेरी बिल्कुल फिक्र न करें। अपने मोहल्ले में तो सभी अपने हैं।’’ दादी और संपूर्ण परिवार भी आश्वस्त था। प्रभु राम जी के भक्त हनुमान के धार्मिक आयोजन में किसी अनहोनी की कल्पना ही बेमानी है। शोभायात्रा में शामिल होने वाले तो सभी धर्म-कर्म की सुभावना से परिपूर्ण होते हैं। अथर्व का पूरा परिवार एक-दूसरे के साथ मेलजोल रखने और प्रभु भक्ति में यकीन रखता है। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं रही, लेकिन फिर भी दिलदहलाने वाला कांड हो गया। अथर्व के पिता आर्थिक रूप से संपन्न हैं। अथर्व का अपहरण कर लाखों रुपए की फिरौती वसूलने की तैयारी में लगे बदमाशों को तो जैसे मनचाहा मौका ही मिल गया। अथर्व को बेहोश करने के लिए चूहे मारने का स्प्रे शैतानों ने हफ्ते भर पहले ही खरीद लिया था। उन्होंने अथर्व को बेहोश करने के बाद फिरौती का कॉल करके 50 लाख रुपए मांगने का प्लान गहन चिंतन मनन के बाद बनाया जा चुका था। बस्ती के लोग हनुमान जयंती शोभायात्रा में लीन थे, तभी अथर्व को किसी बहाने से अपने पास बुलाकर कार में बिठाया गया। जब कार बिल्कुल सुनसान निर्जन स्थान पर पहुंची तो चतुर अथर्व उनसे सवाल करने लगा। मुझे कहां ले जा रहे हो! चुप कराने के लिए उसके चहरे पर धड़ाधड़ नशीला स्प्रे मारा गया, लेकिन उस पर असर नहीं हुआ। ऐसे में तीनों अपहरणकर्ता घबरा गये और भेद खुलने के भय से उन्होंने दुपट्टे से उसका गला घोट दिया। हड़बड़ी में हत्या करने के बाद उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। पचास लाख की फिरौती वसूलने की हिम्मत धरी की धरी रह गई। अब तो लाश को ठिकाने लगाने की चिंता में उनके हाथ-पैर कांपने लगे। दूसरी तरफ अथर्व के लापता होने से घर-परिवार में खलबली मच चुकी थी। रातभर उसकी तलाश होती रही। इस बीच धन लोभी दरिंदों ने अथर्व के हाथ-पैर बांधे और बोरे में लाश भरकर रेलवे क्रासिंग के पुल पर फेंक चलते बने। मुख्य हत्यारे का अथर्व के घर पर आना-जाना था। उसे जानकारी थी कि उसके पिता के पास इफरात पैसा है। पचास लाख रुपए तो चुटकी बजते ही मिल जाएंगे। 

महाराष्ट्र में स्थित यवतमाल जिले के एक गांव में छह वर्ष की नन्ही बच्ची रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। कई घंटे तक जब बेटी घर नहीं लौटी तो घर में कोहराम मच गया। मासूम बिटिया रोज मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए जाया करती थी। घंटे-आधे घंटे में हंसती-खेलती लौट आती थी। चुस्त-दुरूस्त बेटी का किसी ने अपरहण तो नहीं कर लिया या खेलते-खेलते रास्ता तो नहीं भटक गई जैसी और कई आशंकाओं से ग्रसित माता-पिता ने घंटों उसे चारों तरफ खोजा। रिश्तेदारों से भी पूछताछ की, लेकिन बेटी नहीं मिली। अंतत: थक हार कर पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। मात्र छह साल की बच्ची के एकाएक गायब हो जाने के मामले को बहुत गंभीरता से लेते हुए बच्ची का पता बताने पर 25 हजार रुपयों की घोषणा के साथ अपने तरीके से खोजबीन करते-करते पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि शिवानी बिटिया कहीं दूर नहीं, आसपास ही है। सतर्क पुलिस जब गांव के एक-एक घर की तलाशी करके पता लगा रही थी तभी शिवानी के घर के बाजू से सटे एक घर के कमरे में एक बोरा पड़ा मिला। बोरे को खोलते ही पुलिस वालों की आंखे फटी की फटी रह गईं। जैसे ही परिवारजनों और ग्रामवासियों को शिवानी का शव मिलने की जानकारी मिली तो सभी गुस्से में आगबबूला हो गये। हत्यारे पड़ोसी ने पुलिसिया पूछताछ में अपराध कबूलने में देरी न करते हुए बताया कि जैसे ही शिवानी की नाक की सोने की नथ पर उसकी नज़र पड़ी तो उसका लालच जाग गया। बच्ची को तरबूज खिलाने का प्रलोभन देकर घर बुलाया और नाक से जबरन नथ निकाल तो ली, लेकिन उसके बाद यह खौफ भी सताने लगा कि वह बाहर जाकर सब बता देगी। उसके माता-पिता और पड़ोसी मार-मार कर उसका हुलिया ही बिगाड़ देंगे। हो सकता है जान ही ले लें। इस डर से उसने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव को बोरे में बंद करके रख दिया। लाश को ठिकाने लगाता इससे पहले ही आसपास के लोग और पुलिस तेजी से सक्रिय हो गई और मेरे पाप का पर्दाफाश हो गया।

 शिवानी की मां का तो रो-रोकर बुरा हाल था। वह खुद को कोसे जा रही थी कि अपनी लाडली बिटिया को यदि वह सोने की नथ न पहनाती तो उसकी ऐसे हत्या तो न कर दी जाती। लालची पड़ोसी मेरी मासूम बिटिया की जान लेने से पहले मुझसे मेरी सारी दौलत भी मांग लेता तो मैं उसे मना नहीं करती। कई-कई बार लिखा और कहा जा चुका है कि बेटियों में पिता की जान बसती है। अपनी पुत्री के लिए जन्मदाता अपना सर्वस्व न्योछावर करने को सदैव तत्पर रहते हैं, लेकिन यह कैसे जन्मदाता हैं? पिता कहलाने के हकदार हैं भी? मुझे यकीन है कि अधिकांश लोगों ने यह खबर नहीं पढ़ी होगी कि राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आमल्दा गांव के एक पिता ने अपनी बेटी के प्रेम विवाह से असहमत और आहत होकर उसे जीते-जी मृत घोषित कर मर्दानगी का खूब जोरदार डंका पीटा। उसने अपनी बिरादरी को तो प्रसन्न और प्रफुल्लित कर दिया, लेकिन बेटी को जो अथाह पीड़ा दी उसे व्यक्त करने के लिए कलमकार खुद को असमर्थ पाता है। राजनीति के खिलाड़ी पिता ने पहले तो मनपसंद युवक से ब्याह न करने के लिए समझदार व्यस्क बेटी को प्रेम से मनाने-समझाने की कोशिश की। यहां तक कि उसकी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवायी। पुलिस ने प्रेम को अपराध बताते हुए फैसला बदलने का बार-बार दबाव बनाया, लेकिन सच्ची समर्पित प्रेमिका टस से मस नहीं हुई। पितृसत्ता के मद में डूबे अहंकारी नेताजी ने अपने प्रशंसकों, रिश्तेदारों और वोटरों में अपनी धाक जमाने के लिए शोक पत्रिका छपवायी, जिसमें लिखा कि मेरी पुत्री का स्वर्गवास हो गया है। उसकी आत्मा की शांति के लिए अमुक दिन तीए की बैठक और इस तारीख पर मृत्यु भोज का आयोजन किया गया है। यह भी गौर करने वाली हकीकत है कि तीए में गांव के अधिकांश स्त्री-पुरुष, बच्चे शामिल हुए और मृत्यु भोज के दिन भी सभी ने बड़े मज़े से लजीज हलुआ-पूड़ी और तरह-तरह का खाना खाया और जी भरकर तारीफ की। कितनी-कितनी लज्जा की बात है कि भारत में इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों को पूरी तरह से अपना मनचाहा जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं है। राजस्थान तो ऐसी तानाशाही में अव्वल लगता है। तभी तो आज भी ऊंची जाति के कई लोग लड़की और लड़के में अंतर करते हैं। जो लड़की घरवालों की मर्जी और पसंद से शादी करे वो अच्छी और जो अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुने वो बुरी और बदचलन। बेटियों के प्रेम विवाह पर बंदिश लगाने वाले ये रूढ़ीवादी लोग बेटों के प्रति बहुत उदार नजर आते हैं। उनका कहना है कि अभी तो लड़कियों पर यह नियम बरकरार है। लड़कों के बारे में बाद में सोचेंगे। लड़कियां घर-परिवार की इज्जत होती हैं।उन्हें ऐसे आजाद नहीं छोड़ा जा सकता। इस क्रूर भेदभाव को लेकर शासन और प्रशासन तमाशबीन बना है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के मुंह से भी प्रखर विरोध के स्वर नहीं गूंजने पर शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा ही आता है...।

Thursday, April 9, 2026

अब तो सब जागें...

ईमानदारी से अथक परिश्रम करने वालों को देर-सबेर सफलता मिलती ही है और जमाना भी उनका वंदन-अभिनंदन करता है। संघर्षशील जुनूनी इंसान भले ही कम धनवान हों, लेकिन उनकी दिल से इज्जत की जाती है। यह हकीकत उन लोगों को बहुत देर के बाद समझ में आती है, जो धोखेबाजी, छल, कपट और मुखौटे लगाकर करोड़पति, अरबपति बनते हैं और बड़े अभिमान के साथ मंचों पर शोभायमान होते हैं। लेकिन जब उनकी वास्तविकता सामने आती है, तब उनकी जो थू-थू होती है। उसे बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। महाराष्ट्र में स्थित शिवणी गांव की मालती डोंगरे पुरुषों की शेविंग-कटिंग करती हैं। उनके ज़िस्म चेहरे को छूती हैं। शेविंग क्रीम लगाकर दाढ़ी बनाती हैं और बड़ी कुशलता के साथ बाल काटती हैं। मालती के पति बिस्तर पर हैं। लगभग बारह वर्ष पूर्व की दोपहर जब वे मजदूरी कर घर लौट रहे थे, तभी एक गाड़ी ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी। काफी देर तक सड़क पर घायल अवस्था में पड़े रहे। अधिकांश लोग अनदेखी कर चलते बने। लेकिन एक सजग और सज्जन राहगीर ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। मालती को भी खबर कर दी। मालती के मेहनतकश पति की कंधे की हड्डी और पसलियां इस कदर टूट गईं थी कि वे चलने और काम करने के लायक नहीं रहे। दो बच्चों की मां मालती पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कमाऊ पति के बिस्तर पकड़ लेने के पश्चात पहले तो उसने छोटे-मोटे काम किए और किसी तरह से पति के इलाज और घर के खर्चों के लिए धन की प्राप्ति की। लेकिन फिर भी घोर आर्थिक संकट बना रहा। इसी दौरान मालती के मन में विचार आया कि मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स तो कर रखा है, ऐसे में क्यों न अपना ब्यूटीपार्लर प्रारंभ कर दूं। चाह ने राह निकाल दी। मालती ने ब्यूटी पार्लर प्रारंभ तो कर दिया, लेकिन गांव में ऐसी बहुत कम महिलाएं थीं, जिन्हें सजने संवरने में अभिरुचि थी। 

पुरुषों के वर्चस्व वाले गांव में अधिकांश महिलाएं घर से बाहर निकलने में भी सकुचाती थीं। ऐसे में ब्यूटीपार्लर को चंद दिनों में बंद करना पड़ा। मालती उस मिट्टी की नहीं बनी हैं जो जीवन के संघर्ष, आंधी तूफान, तेज बरसात से धराशायी हो जाती है। उसने बिना ज्यादा विचार किए ब्यूटी पार्लर को पुरुषों के सैलून में तब्दील कर दिया। इस बदलाव को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया। शुरू-शुरू में पुरुषों ने ‘मालती सैलून’ से यह सोचकर दूरी से बनाये रखी कि महिला से कटिंग और शेविंग करवाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। वह ठीक से उस्तरा और कैंची चला भी पाएगी या नहीं। मालती ने धैर्य को अपना साथी बनाये रखा। धीरे-धीरे पुरुषों का आना और संतुष्ट होकर जाना मालती सैलून को ख्याति दिलाने लगा। ग्राहकों की संख्या में इजाफा होने से अच्छी-खासी कमाई भी होने लगी। दोनों बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आसानी से पति का समुचित इलाज भी होने लगा। कालांतर में बेटे ने पढ़ाई के साथ-साथ सैलून में अपनी मां का साथ देना प्रारंभ कर दिया। बेटी नीट की तैयारी कर रही है। एक अच्छा सा प्लॉट खरीदकर सर्वसुविधायुक्त अपना घर भी बनवा लिया गया है। 

मालती ने जब पुरुषों के लिए सैलून की शुरुआत की तो जान-पहचान वाले लोगों ने तो तंज कसे ही, रिश्तेदारों ने भी यह कहकर कम परेशान नहीं किया, ‘‘औरत होकर पुरुषों की शेविंग-कटिंग करोगी, उनके साथ सटकर खड़ी हो, उनके चेहरे पर हाथ लगाओगी और भी पता नहीं क्या-क्या होगा। पता नहीं कैसे-कैसे लुच्चे-बदनाम भी औरत के आकर्षण में खिंचे चले आएंगे। ऐसे में खाक तुम्हारी इज्जत रह जाएगी।’’ उन्होंने तो बहिष्कार करते हुए यह साफ-साफ कह दिया था कि भूल से भी किसी को मत बताना कि हमसे तुम्हारी कोई रिश्तेदारी है। हम भी तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाएंगे। ऐसे समय में सिर्फ मेरे माता-पिता ही थे जो हमारे साथ खड़े रहे। सैलून खोलने पर पति ने भी कभी ऐतराज प्रकट नहीं किया। उन्हें अपनी पत्नी पर अपार गर्व है। वे कहते है, ‘‘एक्सीडेंट की वजह से मैं तो कुछ भी करने लायक नहीं रह गया था। कमाई बंद हो गई थी। घर चलाना मुश्किल हो गया था। दो छोटे बच्चे थे। मेरी पत्नी ने पूरी जिम्मेदारी अपने अकेले कंधे पर ले ली। बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवा रही है। मेरे इलाज और सेहत का भी पूरा ध्यान रखा है। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखें भीग-भीग जाती हैं। 

हमारी इसी दुनिया में कई लोग ऐसे हैं। जिनका अपना कोई नहीं होता। लावारिस कहे जाने वाले इन लोगों को मरने पर भी दूर-दूर तक कंधा देने वाले नहीं होते। कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उनके अपने ही सदा-सदा के लिए भूला देते हैं। कितनी अच्छी बात है कि हमारी इसी दुनिया में ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने की कर्तव्य की तरह जिम्मेदारी ले रखी है। उन्हें न तो प्रचार की चाह है और न ही पुरस्कार-सम्मान की लालच है। पंजाब के शहर लुधियाना में रहने वाले गुलशन कई वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाते चले आ रहे हैं। उन्हें यह देखकर बहुत पीड़ा होती थी कि सड़क किनारे या अस्पतालों में शव पड़े रहते थे और उनको लेने कोई नहीं आता था। तभी एक दिन उन्होंने ठान लिया कि जब तक जिन्दा हूं किसी भी शव को लावारिस नहीं छोेडूंगा। गुलशन अभी तक पांच सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके  हैं। ‘फक्कड़ बंधु’ भी पिछले 33 साल से जिनका कोई नहीं उनका अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। वर्षों पूर्व कानपुर के बंटी अपने गुमशुदा पिता को ढूंढ़ते हुए लुधियाना पहुंचे तो पिता तो नहीं मिले, लेकिन यहां उनकी मुलाकात जोगेंद्र फक्कड़ से हो गई। जोगेंद्र रेलवे की पटरियों से क्षत-विक्षत शव उठाते थे। दोनों में मेल-मुलाकात होती रही। एक दिन दोनों ने देखा कि पटरियों पर किसी ने खुदकुशी कर ली है। दोनों यह देखकर स्तब्ध रह गए कि आत्महत्या करने वाले के कुछ परिजन भी वहां खड़े थे लेकिन कोई भी टुकड़े-टुकड़े हुए शव को उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। दोनों ने क्षत-विक्षत शव को एकत्रित कर सिविल अस्पताल पहुंचाया। उस दिन से दोनों ने ऐसे शवों को अस्पताल पहुंचाने तथा अंतिम संस्कार करने को अपने जीवन का मकसद बना लिया है। शहरवासियों के बीच ‘फक्कड़ बंधु’ के तौर पर जाने जानेवाले दोनों मित्रों के बारे में आपके क्या विचार हैं? कई लोगों की निगाह में ये छोटे-मोटे इंसान हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं होती। लेकिन सच तो यह है कि ऐसे परोपकारी जब दुनिया से जाते है तो उन्हें जाने, खोने और पाने का कोई मलाल नहीं रहता। खाली जेब, फक्कड़ की तरह जीते रहे, यही संतुष्टि हर चिंता से मुक्त कर देती है। जब कुछ भले लोगों के बीच इस परोपकारियों का जिक्र आता है तो तारीफ ही होती है। हमारे आसपास और दूर कई चेहरे ऐसे हैं जो मेहनत करने की बजाय धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और नकाबपोशी में यकीन रखते हैं। अधिकांश लोग भी उनकी ढोंगी, कपटी, असलियत जानने-समझने के बावजूद खामोशी की चादर ओड़े रहते हैं। शहर और देशवासियों की आंखों में धूल झोंक कर मंचों पर आसीन होने, मान-सम्मान पाने और करोड़ों में खेलने वालों का जब भंडाफोड़ होता है तो आम भारतीय कितने आहत होते हैं इसकी कभी खोज-खबर नहीं ली जाती। इन पंंक्तियों के लिखे जाने के दौरान देशभर के अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर जैसे ही मेैंने यह खबर पड़ी और सुनी तो मैं बस सोचता रह गया कि क्या इंसान इतना भी गिर सकता है? वो भी पैसे के लिए! पूरी दुनिया में भारत की योग विद्या का डंका बज रहा है। अत्यंत उमंगो-तरंगों तथा गर्व के साथ विश्व योग दिवस मनाया जाता है। नई शिक्षा नीति में योग शिक्षा लगभग अनिवार्य है। पश्चिम के देश भी योग में भारत का लोहा मान रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस ने गुजरात के सूरत में ऐसे योगाश्रम का भंडाफोड़ किया है जहां नकली नोटों की फैक्ट्री चल रही थी। इस आश्रम का कर्ताधर्ता आलीशान जीवन जीते हुए महंगी कारों में चलता था। ‘गुरुजी’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस ढोंगी, कपटी, नकाबपोश के 15 फीट ऊंची दीवार वाले आश्रम के भीतर झांकना नामुमकिन है। आश्रम आध्यात्मिक केंद्र से अधिक किसी शाही महल की तरह लगता है। जहां प्रवेश करते ही एक तरफ गौशाला है तो दूसरी तरफ घोड़ों की अस्तबल भी है। कई आलीशान कारें खड़ी हैं। भव्य महंगे सुसज्जित कार्यालय में आरोपी प्रदीप जोटांगिया नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का संचालन कर देश के साथ गद्दारी कर रहा था। योगाभ्यास के लिए आने वाले लोगों की नजरों से दूर, करोड़ों रुपए के नकली नोटों के काले कारोबार का यही से संचालन होता था। आश्रम में बड़े-बड़े तहखाने होने का भी पता चला है। यहीं पर जाली नोट छापने वाली मशीने और अवैध सामग्री रखी जाती थी। योग गुरु प्रदीप अपने हर प्रवचन में कहता था, ईमानदारी इंसान की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चे रास्ते से चलो फल जरूर मिलेगा। धन लोभ इंसान को अंधा बना देता है। किसी को धोखा देना खुद को धोखा देना है। ऐसे मायावी बोलवचन उन तमाम भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, अफसरों, पत्रकारों और वरिष्ठ संपादकों की जुबान से भी अक्सर निकलते और छलकते रहते है, जो हैं तो हर दर्जे के धूर्त और बेईमान लेकिन ईमानदारी का मुखौटा ओड़े हुए हैं। इनका भी आज नहीं तो कल पूरा पर्दाफाश तो होना ही है...।

Thursday, April 2, 2026

धार्मिक अनुष्ठान!

मायानगरी मुंबई में रेतीले समंदर के निकट एक व्यक्ति ने अनोखा कारोबार प्रारंभ किया है। वह लोगों की समस्याओं का समाधान करने का दावा करता है। लोगों को भी उस पर भरोसा है। तभी तो खिंचे चले आते हैं। इसके लिए उसने बाकायदा एक बोर्ड लगा रखा है, जिसमें विभिन्न इंसानी तकलीफों, जरूरतों और मुश्किलों के शाब्दिक और भावनात्मक समाधान की कीमत लिखी हुई है। साधारण परेशानी सुनने के लिए मात्र ढाई सौ, बड़े संकट को जानने के लिए पांच सौ तो साथ मिल-बैठकर सुनने-सुनाने तथा रोने-गाने के लिए वह एक हजार रुपए की दक्षिणा लेता है। उसके पास कई स्त्री-पुरुष अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आते हैं। वह डिप्रेशन, प्यार में धोखा खाये, जुए-सट्टे में बर्बाद हुए निराश, हताश और अकेलेपन के शिकार लोगों की खासतौर पर मदद करने का दावा करता है। भावनात्मक रूप से टूट चुके लोगों के साथ-साथ नौकरी, कामधंधे की तलाश में भटकते लोगों की परेशानी को वह बहुत ध्यान से सुनता है और सफल होने का रास्ता भी बताता है। वह बड़े इत्मीनान से सभी की सुनता है। कोई जल्दीबाजी और पाने-छुपाने की भावना उसमें नज़र नहीं आती। गरीबों के साथ-साथ अमीर भी उसके आकर्षण से बच नहीं पाते। माथे पर टीका लगाकर बैठे इस शख्स के विभिन्न वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इस अनोखे ज्ञानवान के वीडियो पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। बहुतों ने लिखा है कि लोगों के पास समस्याएं बहुत हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। इसलिए यह धंधा कभी मंदा नहीं पड़ेगा। गरीबों के लिए तो ठीक है, लेकिन रईसों के लिए उसे रेट और ऊंचे रखने चाहिए, क्योंकि उन्हें दिन-रात अथाह जोड़-तोड़, चिंता, परेशानी और दगाबाजी से जूझना, टूटना पड़ रहा है। 

यह कोई नया खेल-करिश्मा नहीं। भारत में सदियों से ऐसे दिमाग वाले अपना चमत्कार दिखाते चले आ रहे हैं। कभी फकीर, कभी साधु, कभी ज्योतिषी, चोर तो कभी सिपाही और पता नहीं क्या-क्या बनकर ठगने और लूटने का गोरखधंधा भी चलता चला आ रहा है। आसाराम, राम-रहीम जैसे अनेकों धूर्त और मक्कार पकड़ में तो आते हैं, लेकिन फिर भी लोगों के दिमाग के दरवाजे खुल नहीं पाते। यदि ऐसा नहीं होता तो जेलों में सड़ रहे शैतान बाबाओं की तर्ज पर नये कपटियों का पैर जमाना संभव ही नहीं हो पाता। धर्म-कर्म और ज्योतिष के उपजाऊ बाजार में अशोक खरात के नाम के नये कपटी की गूंज की खबरों ने हर किसी को चौकाया। पुलिस के शिकंजे में फड़फड़ाते इस कपटी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि दूसरों की हस्त रेखाएं देखते-देखते उसके इतने बुरे दिन आ धमकेंगे कि मुंह छिपाना पड़ जाएगा। लेकिन पाप का घड़ा जब भरता है तो कोई कहां बच पाता है। स्वयं को महान भविष्यवक्ता चमत्कारी-बाबा बताकर असंख्य लोगों की आंखों में धूल झोंकने वाले अशोक खरात उर्फ कैप्टन ने तो अपने चमत्कारों की फर्जी कहानियां प्रचारित करने के लिए ग्रंथनुमा किताबें तक प्रकाशित कर लाखों की तादाद में पूरे महाराष्ट्र में बंटवा दी थीं। इन किताबों के लेखक नामकरण आवारेे का कहना है कि उसे जो बताया गया उसने वही लिखा। उसे तो बस अपनी मोटी फीस से मतलब था। वर्ष 2012 में उससे पहली किताब लिखवायी गई। इस आकर्षक किताब में ‘सिद्ध पुरुष के सानिध्य में’ शीर्षक के तहत खरात की कथित सिद्ध शक्तियों के अनेकों उदाहरण देते हुए उसे दिव्य पुरुष घोषित किया गया। इसके प्रकाशन और मुफ्त वितरण के पश्चात कई नये-नये लोगों को पता चला कि देश की धरती पर एक महान ‘दिव्य पुरुष’ का जन्म हो चुका है। जिसके चरणों में नतमस्तक होने पर हर कष्ट का अंत होना संभव है। आजकल गरीबों से ज्यादा अमीरों को अपना भविष्य जानने की चाहत तड़पाती है। नेताओं और अफसरों को ऐसे ज्ञानियों की तलाश रहती है। खरात ने ऐसे लोगों तक खास तौर पर अपनी पहुंच बनाई और फिर उसकी लाटरी ही खुलती चली गई। देखते ही देखते अंधभक्तों के तेजी से बढ़ते चले जाने से खरात कीं छाती तो चौड़ी होनी ही थी। एक समय ऐसा भी आया जब उसके तिलस्मी दरबार में केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, आईएएस अफसर तथा उद्योगपति भी अपना भविष्य जानने और सुधारने की लालसा के साथ पहुंचने लगे। वह विधायकों, सांसदों को उनके मंत्री बनने के दिन तक की घोषणा करने के साथ-साथ कुर्सी पाने के उपाय बताने लगा। कभी-कभी तुक्का भी चल जाता है। इस मामले में खरात खुशकिस्मत रहा और धन की अंधाधुंध बरसात होने लगी। कुछ ही वर्षों में उसने लगभग 1500 करोड़ की संपत्ति जुटा ली। सत्ता, प्रशासन और उद्योग जगत के नामी-गिरामी चेहरों की देखादेखी आम लोगों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया। हैरत और मजे से लबालब हकीकत यह भी रही कि नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों तथा किस्म-किस्म के रईसों की माताएं, बहनें और पत्नियों के साथ-साथ अनेकों पुलिस वाले भी उसकी चौखट पर अपनी बारी आने के इंतजार में खड़े देखे जाने लगे। अपनी तरक्की के अलावा फलाना केस कब और कैसे सुलझेगा, छिपा और भागा हुआ बलात्कारी, हत्यारा, चोर-लुटेरा, भ्रष्टाचारी कैसे पकड़ में आयेगा यह जानने के लिए खाकी वर्दी, सफेद खादी के साथ सिर झुकाये जब नज़र आने लगी तो खरात ने खुद को धरती का सर्वशक्तिमान... भगवान समझ लिया। ऊंचे लोगों को अपने जाल में फंसा कर नाम के साथ दाम कमाते धूर्त ने ऊंचे घरानों की बहू-बेटियों को भी अपने मायावी जाल में फंसाते हुए वासना का नंगा नाच प्रारंभ कर दिया। शैतान, बलात्कारी की धूर्तता और दुष्टता शायद ही इतनी शीघ्र उजागर हो पाती यदि दुष्कर्म की शिकार एक महिला पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज न करवाती। उसकी साहसी पहल के पश्चात अपनी अस्मत लुटवा चुकी और भी कई महिलाएं शिकायतों के पुलिंदे के साथ थाने पहुंचने लगीं, तो धमाके पर धमाका और निर्लज्ज देहभोगी बेनकाब होता चला गया। धर्म अंधभक्ति और आस्था के बाजार के इस शातिर खिलाड़ी ने कुछ ऐसा जादू चलाया, जिसके चलते महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर इसके पैर धोने के साथ-साथ वो सब भी कर गुजरीं, जो अत्यंत शर्मनाक है। जब ऐसे खास चेहरे अंधी वासना का खिलौना बनते हैं तो  दूसरों की झिझक भी जाती रहती है। अपनी महिला भक्तों के भरोसे का कत्ल या रजामंदी से उसने कितनी महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया इसका संपूर्ण आंकड़ा तो सामने आना संभव नहीं। लुटी-पिटी सभी नारियां मुंह खोलने का साहस नहीं दिखातीं। जो पहली पीड़िता सामने आयी उसने बताया कि अपने परिवार के बिगड़ते हालात की वजह से वह भविष्य के बारे में जानने के लिए उसके पास पहुंची थी। उसे उम्मीद थी तकलीफों से छुटकारा पाने का कोई सार्थक उपाय बाबा के दरबार में अवश्य मिलेगा। एक दिन खरात ने उसे अपने करीब बिठाकर पानी पिलाया, जिसे पीते ही वह बेहोश हो गई। होश में आने पर पता चला कि उसकी आबरू पर डाका डाला जा चुका है। इस दौरान उसकी तस्वीरें भी उतार ली गई थीं। इसके बाद तो देहभोगी ने ब्लैकमेलिंग करने का ऐसा सिलसिला चलाया कि वह बार-बार यौन शोषण का शिकार होने को विवश होती रही। महाराष्ट्र के नाशिक का यह हाई-प्रोफाइल अय्याश शैतान, आस्थावान नारियों को अपने बस में करने के लिए जो पानी पिलाता, उसमें वासना को भड़काने के लिए वियाग्रा सहित कई नशीली दवाएं मिलाता था। जब भक्तिन पर नशे का तीव्र असर हो जाता था तब वह ‘भगवान से दिव्य मिलन’ के नाम पर अपनी देह की भूख शांत करता था। पुलिस के शिकंजे में बुरी तरह फंसने के बाद उसने निर्लज्जता से खुद को सही ठहराते हुए कहा कि, मैंने किसी महिला के साथ गलत नहीं किया। मैंने जो भी किया वो तो धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा था। ये शातिर दुराचारी भले ही खुद ज्यादा शिक्षित नहीं है, लेकिन फिर भी उच्च शिक्षित औरतों को लुभावने शब्दजाल में आसानी से फांस लेता था। वह उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहता था कि, तुम तो अपने पति की तुलना में बेइंतहा आकर्षक और खूबसूरत हो। वो तुम्हारी योग्यता की कद्र नहीं करता। तुम तो किसी राजा की रानी बनने के लायक हो। मेरे साम्राज्य और मेरे पहलू में तुम्हारा तहे-दिल से स्वागत है। उसे उन नारियों को भी खूब निशाना बनाना आता था, जो शारीरिक अतृप्ति, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट से गुजर रही होती थीं। यदि उसकी मनचाही खूबसूरत नारी शरीर सौंपने में आनाकानी करती तो वह उसे दैवी प्रकोप का भय दिखाते हुए धमकाने से भी बाज नहीं आता था कि उसकी अलौकिक शक्तियां से उसके संपूर्ण परिवार का सत्यानाश हो जाएगा। भयभीत करके रख देने वाला उसका मानसिक दबाव कई औरतों को आत्मसमर्पण करने को विवश करता चला गया। उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि यह सोशल मीडिया का जंगी दौर है। पलक झपकते ही बदनामी की काली पताका उनका सत्यानाश करके रख देगी। हुआ भी यही। अनेकों महिलाओं के साथ उसके अश्लील वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर छा गए। सोशल मीडिया के धुरंधरों को ऐसे सेक्स स्कैडलों का बेसब्री से इंतजार रहता है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बड़ी कू्ररता के साथ महिलाओं के चेहरे-मोहरे उजागर कर वे उनके वर्तमान और भविष्य का कबाड़ा कर रहे हैं। आस्था या मजबूरी के चलते बिस्तर की चादर बनने से पहले नारी को भी सौ बार सोचना चाहिए। कलमकार यह सोच-सोच कर भयभीत और चिंतित है कि शिकारी के हाथों लुटी महिलाएं अपने आसपास के लोगों तथा रिश्तेदारों को कैसे अपना मुंह दिखायेंगी। इन अति उत्साही भक्तिनों के बच्चे, माता-पिता और पति परमेश्वर समाज के निशाने और ताने सुनने को विवश होकर रह जाएंगे। बहुतों को पता ही नहीं होगा कि बीते वर्ष दिल्ली के एक विख्यात स्कूल की छात्रा का एक अश्लील अमर्यादित वीडियो वायरल हुआ था। बच्ची के पिता ने बेइंतहा बदनामी और शर्मिंदगी के चलते आत्महत्या कर ली थी...।

Wednesday, March 25, 2026

समाधान

यह खबर कितनी चौकाने वाली है कि भारत के कई बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हैं। उन्हें पाठयपुस्तकों के साथ-साथ पालकों के दबाव और आकांक्षाओं से जूझना पड़ रहा है। अधिकांश अभिभावक सख्त अनुशासन की डोर में बांधे रख किसी भी तरह से उन्हें डिग्रीधारक होते देखना चाहते हैं। उनके मन में यह यकीन घर कर चुका है कि कोई भी छोटी-बड़ी डिग्री उन्हें नौकरी तो दिला ही देगी। कई बच्चे बनना कुछ चाहते हैं और उनके माता-पिता की चाहत और होती है। ऐसे में उनके बीच जो कहा-सुनी और टकराव होता है, उससे वो भारतीय खूब वाकिफ हैं, जिन्हें अपनी सख्ती और जिद की वजह से औलाद से दूर होना पड़ता है। बहुतेरे मां-बाप ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, सख्ती से पालना चाहिए। दरअसल, अपने यहां बच्चों का समुचित मार्गदर्शन करने की बजाय इधर-उधर के उदाहरणों को पेश कर नीचा दिखाने की अत्यंत पुरातन परिपाटी है। किसी रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी के बेटे-बेटी की सफलता की कहानियां मन में बसाये अभिभावक अपनी संतानों को किसी से कमतर नहीं देखना चाहते। कई भारतीयों को ज्ञात ही नहीं होगा कि विश्व में एक देश ऐसा भी हैं, जहां के बच्चे पालकों की ऐसी-वैसी विभिन्न बंदिशों से आजाद है। इस देश का नाम है नीदरलैंड। नीदरलैंड को कभी हॉलेंड के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक अत्यंत समृद्ध और विकसित देश नीदरलैंड दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और कृषि उत्पाद निर्यातक देश है। यहां की अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि, भोजन प्रसंस्करण और पेट्रोकेमिकल पर आधारित है। यहां की आधिकारिक भाषा ‘डच’ है। यहां के लोग दुनिया में सबसे लंबे माने जाते हैं। खुले विचारों वाली सोच और नीतियों के लिए जाने जानेवाले नीदरलैंड को विश्व के सबसे खुशहाल और सुरक्षित देशों में गिना जाता है। इस देश में अपनी संतानों को बचपन से ही प्यार और सुरक्षा का अहसास कराया जाता है। यहां पर दस साल की उम्र तक बच्चों को स्कूलों में कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। वहां के लोगों की धारणा है कि एक तनावग्रस्त बच्चा कभी भी बेहतर नागरिक नहीं बन सकता। जहां के बच्चे खुश नहीं वहां के वयस्क भी खुशहाल नहीं हो सकते। दरअसल, नीदरलैंड में सफलता के मायने हैं एक सुनियोजित और चिंतामुक्त जीवन जीना। जहां विश्व के अधिकांश देशों में यह माना जाता है कि किसी भी तरह से कामयाबी हासिल करो, लेकिन नीदरलैंड के बड़े-बुजुर्ग तथा माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चा खुश और संतुष्ट रहेगा तो कामयाबी खुद-ब-खुद उसके कदम चूमेगी। एक प्रसन्न, तनावमुक्त बच्चा ही खुद को बेहतर समझ पाता है। वह अंदर से मोटिवेटेड रहता है और समाज से जुड़ना सीखता है। उसके लिए सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे ओहदे तक पहुंचना नहीं, बल्कि एक आजाद और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बनना है। डच समाज कहने में नहीं करने में यकीन रखता है। उन्हें भौतिक सुखों के लिए आड़े-टेढ़े रास्तों में भटकना और हवा में उड़ना कतई पसंद नहीं। 

डच समाज में रिश्तों को निभाने की गजब की कला समाहित है। वहां पर परंपरा के तौर पर ‘पापा डे’ को निभाने का चलन है। इस दिन सभी पापा खास तौर पर बच्चों के साथ भरपूर समय बिताने तथा उनका हालचाल जानने के लिए छुट्टी लेते हैं। उनकी समस्याओं को गौर से सुनते हुए समाधान से अवगत कराते हैं। इससे बच्चों को सही और गलत का पता तो चलता ही है, निर्णय लेने की क्षमता और मनोबल में वृद्धि होती है। अभिभावकों की प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि वहां के बच्चे ब्रांडेड कपड़ों या महंगे खिलौने की लालसा करने की बजाय साइकिल चलाने और मिट्टी में खेलने का आनंद लेकर प्रफुल्लित हैं। नीदरलैंड की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चों को खुद साइकिल चलाकर स्कूल जाते देखना दूसरे देशों से पहुंचने वाले पर्यटकों को भी आनंदित करता है। इस अनोखे देश में भारत की तरह बच्चों की निगरानी और टोका-टोकी की कोई जगह नहीं। बच्चों के गिरने पर खुद संभलने की सोच में यकीन रखने वाले माता-पिता का मानना है कि यही भावनात्मक आजादी उनके बच्चों को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है।

धनवानों की सोच और उनके जीवन जीने के तौर-तरीकों के बारे में सभी की लगभग एक जैसी धारणा है। अधिकतर धनपति खुद तो दुनियाभर की सुख-सुविधाओं के भोगी होते ही हैं, अपनी संतानों को भी सुविधाभोगी और आरामपरस्त बना देते हैं। उनका मानना होता है कि हमने धन कमाया ही अपने बाल-बच्चों के लिए है तो ऐसे में उन्हें कोई तकलीफ क्यों होने दें। अपनी संतान के लिए किसी भी तरह की कोई कमी न होने देनेवाले रईसों को तो आपने भी जरूर देखा होगा, लेकिन शेख खलफअल हब्तूर जैसे खरबपति शायद ही देखे और सुने होंगे, जिन्होंने कॉलेज से अच्छी-खासी पढ़ाई और डिग्री लेने वाले अपने इकलौते बेटे को अपने हजारों करोड़ के व्यावसायिक साम्राज्य की गद्दी पर तुरंत विराजमान कराने की बजाय होटलों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा लगाने और वेटर के तौर पर काम करने का जमीनी अनुभव लेने के लिए कई महीने तक खुद से दूर रखा। हाल ही में एक कार्यक्रम में खलफ अल हब्तूर ने उदाहरणों के साथ कहा कि, ‘‘डिग्री जरूरी है, लेकिन अनुभव उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली इंजीनियरिंग, असली मैनेजमेंट, असली काम... साइट पर जाकर ही समझ में आता है। सिर्फ किताबें पढ़कर कोई भी करियर नहीं बनता। फील्ड में उतरने से जो सीख मिलती है, वही किसी को प्रोफेशनल बनाती है।’’ अल हब्तूर ग्रुप के चेयरमैन शेख खलफ अल हब्तूर 1.35 लाख करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। उनका कारोबार होटल्स, रियल एस्टेट, ऑटो मोबाइल, शिक्षा और प्रकाशन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। 2023 में 100 अफगान छात्राओं को यूएई की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दे चुका यह खुद्दार और उदार खरबपति हर साल करोड़ों-करोड़ों रुपये का दान करने के बावजूद दानवीर होने का वैसा ढिंढोरा नहीं पिटता। जैसा कि भारत में पीटा जाता है। उनका मानना है कि जमीनी संघर्ष विनम्रता और समय की कीमत से अवगत कराने के साथ-साथ चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है। जब कभी चीजें आपकी सोच और योजना के मुताबिक न हो रही हों तो घबराने की बजाय कुछ देर तक शांत रहकर चिंतन-मनन करते हुए खुद को और सीखने और जानने का समय दें। अनिश्चितता से डरकर भागना छोड़ उसे आत्मसात करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। 

मनचाही सफलता पाने के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आना जरूरी है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी छाती तानकर सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल की वजह से भारत के बच्चे और बड़े किस तरह से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है। अनेकों माता-पिता अपने लाडले, लाडलियों की मोबाइल की लत की वजह से चौबीस घंटे परेशान रहते हैं। यह भी सच है कि कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। बेलगावी जिले के हलगा गांव के सजग लोगों ने जब गौर किया कि उनके यहां के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मोबाइल तथा टीवी देखने में अपना अधिकांश समय बर्बाद कर रहे हैं तो चिंता के मारे उनकी नींद जाती रही। ऐसे में ग्राम पंचायत भी सतर्क हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद रास्ता भी निकाल लिया गया। गांव में हर शाम ग्राम पंचायत कार्यालय से एक सायरन बजता है, जो लोगों को टीवी को तुरंत बंद करने तथा मोबाइल फोन अलग रखने का संकेत देता है। पिछले दिसंबर माह से यह संकेत दो घंटे के डिजिटल डिटॉक्स यानी एक सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। पंचायत अधिकारियों का कहना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों में इस नियम का पालन किया जा रहा है। विद्यार्थी कम अज़ कम दो घंटे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। हलगा गांव ने जो रास्ता दिखाया है, यदि चाहें तो हम और आप भी उसका अनुसरण कर सकते हैं...।

Thursday, March 19, 2026

अंतिम यात्रा

पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता आड़ा-टेढ़ा होता है और बेहद दोस्ताना भी। इस आत्मीय रिश्ते की नींव को मजबूत करने के लिए पहली ईंट तो जन्मदाता को ही रखनी पड़ती है। इसके लिए उसे बहुतेरे जतन और त्याग भी करने पड़ते हैं। फिर भी कहीं न कहीं चूक हो जाती है। कभी इधर से तो कभी उधर से। फिर भी हमारे संसार में हर भूल-चूक और समस्या का समाधान है। बशर्ते नीयत में खोट न हो। कहा जाता है कि ज्यादातर पुत्र मां के करीब होते हैं और बेटियां पापा की दुलारी होती हैं। अधिकतर पिता काफी हद तक खुरदुरे और व्यावहारिक होते हैं तो माताएं ममता और भावुकता की डोर से ताउम्र बंधी होती हैं। यह गुण विधाता ने उन्हें खास तौर पर अर्पित-समर्पित किया है। कुछ पिता बंद किताब होते हैं, जिसे हर कोई नहीं पढ़ पाता। उसे पढ़ने के लिए खोलना होता है। इस दौर की औलादों के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। सभी माता-पिता अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। सदियों से दस्तूर बनी इस मनोकामना की जब अवहेलना और निरादर होता है तो पिता का मन आहत होता है। उनका गुस्सा भी फूट पड़ता है जो इस दौर की अधिकांश औलादों के लिए नागवार होता चला जा रहा है।

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके में एक अरबपति कारोबारी की उसी के बिगडैल बेटे ने बहुत ही क्रूर तरीके से हत्या कर दी। हत्या के पश्चात आरी से अपने जन्मदाता के जिस्म के टुकड़े करने में भी उसके हाथ नहीं कांपे। पैथोलॉजी संचालक व शराब के बड़े कारोबारी मानवेंद्र सिंह अपने अक्षय नामक इस पुत्र को अच्छा और कुशल डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन अक्षय का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। पिता और पुत्र के बीच मनमुटाव और बहसबाजी सतत चलती रहती थी। इसी तनातनी में कभी कभार पिता का हाथ भी बेटे पर उठ जाता था। अपनी जिन्दगी अपने ही तौर तरीके से जीने के अभिलाषी अक्षय के लिए पिता का डांटना-फटकारना असहनीय होता चला गया। उसने अपनी शराबखोरी में और... और इजाफा करते हुए पिता से टकराने की हिम्मत दिखानी प्रारंभ कर दी। पिता भी अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘‘मैं जो चाहता हूं, वही करो, नहीं तो मेरी नजरों से ओझल हो जाओ।’’ ऐसे में आपसी तनाव तो बढ़ना ही था। अपने पापा की नसीहत को बकवास मान उनसे बेइंतहा नफरत करते बिगड़ैल बेटे के मन में इस बात का भी गुस्सा अंदर तक भरा था कि उसकी मां की आत्महत्या के वही जिम्मेदार हैं। यदि इन्होंने दूसरी शादी कर ली तो जायदाद पर सौतेली मां का कब्जा हो जाएगा।

एक रात पिता और पुत्र में खूब कहासुनी हुई। पिता ने गुस्से में रायफल की गोली का भय दिखाया तो बेटे का नफरती माथा घूम गया। अलसुबह उसने उसी रायफल से गहरी नींद में सोये पिता के सिर पर गोली मारी और कुछ घंटों के बाद बाजार जाकर आरी और नीला ड्रम खरीद लाया। उसने बड़े इत्मीनान से कसाई की तरह शव के टुकड़े किए। इससे पहले उसने यूट्यूब पर बहुत गौर से ‘वध’ नामक फिल्म देखी, जिसमें अत्यंत राक्षसी अंदाज में शव को काटने और ठिकाने लगाने का तरीका समझाया गया है। नृशंस हत्यारे ने पहले पिता के दोनों हाथ और पैर काटे। बहुत कोशिश के बाद भी वह धड़ को काट नहीं पाया तो उसे नीले ड्रम में भर दिया। काटे गये दोनों हाथ और पैरों को एक पिट्ठू बैग में डाला और बड़े मजे से कार में सवार होकर शहर से दूर बीस किलोमीटर दूर जा पहुंचा। लाश के चार टुकड़े उसने रास्ते में फेंके और खून से सने कपड़े नहर से लगी घनी झाड़ियों में छुपा दिए। शव के सिर और धड़ को ठिकाने लगाने में सफल नहीं होने पर उसने उन्हें यह सोचकर नीले ड्रम में डाल दिया कि शीघ्र ही इन्हें एसिड से जला और गला देगा। अपने जन्मदाता का कत्ल करने के बाद भी हत्यारे के चेहरे पर पुलिस वालों को कोई शिकन नहीं दिखी। वह यही कहता रहा कि पहले पिता ने पीटा फिर मैंने गुस्से में यह गलती कर दी। जेल में पूरी रात दीवार के सहारे बैठ जरूर बड़बड़ाता और अपनी अक्षम्य करतूत पर पछताता रहा।

मध्यप्रदेश में स्थित बड़वानी में 46 वर्षीय डॉक्टर हरीश पिछले पांच वर्षों से अचेतावस्था में बिस्तर पर पड़े हैं। मार्च 2021 की सुबह क्लिनिक जाते वक्त हुई सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में ऐसी बेहद गंभीर चोटें आई कि लंबे इलाज और सर्जरी के बाद भी होश में नहीं आ पाये। कोमा में होने के कारण हरीश करवट नहीं ले पाते। उनके उम्रदराज पिता अपने हाथों से बेटे की प्रतिदिन मालिश करते हैं। शरीर की साफ-सफाई तथा करवट दिलाते है। हरीश को ट्यूब के माध्यम से दूध, जूस और विभिन्न दवाएं दी जा रही हैं। दिन-रात चल रहे इलाज के खर्च चलते घर बिकने के साथ-साथ बीस लाख का कर्जा भी हो चुका है, लेकिन फिर भी धैर्यवान पिता का हौसला और ईश्वर के प्रति भरोसा बना हुआ है। वो दिन जरूर आएगा जब उनके बेटे को होश आयेगा और वह पहले की तरह एकदम सेहतमंद होकर चलता-फिरता नजर आयेगा।

गड़चिरोली के रहने वाले बंडू यादवराव की 28 वर्षीय बेटी श्रेया की जिन्दगी पिछले चार वर्ष से बिस्तर तक ही सिमटी हुई है। डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया है। वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। पढ़ाई में काफी होशियार रही श्रेया का साफ्टवेयर डेवलपर बनने का प्रबल इरादा था। इसके लिए उसने पुणे के डी.वाई.पाटील कॉलेज ऑफ कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेकर परीक्षा में टॉप किया था। तीन फरवरी 2022 को अपने मित्रों के साथ वह रात को कार से घर लौट रही थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मित्रों को मामूली चोटें आई, लेकिन श्रेया अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो गई। नागपुर के एक नामी डॉक्टर के अस्पताल में भर्ती कराने पर पता चला उसका ब्रेन पूरी तरह से मृत हो चुका है। माता-पिता ने और भी कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सभी ने जांच में पाया कि कोई चमत्कार ही उसे फिर से होश में ला सकता है। चार वर्ष बीतने के पश्चात भी माता-पिता ने चमत्कार की उम्मीद में खुद को बेटी के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया है। लाखों रुपये खर्च कर चुके आशावादी परिवार का कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी दुलारी बिटिया की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसके लिए भले ही उन्हें अपनी बची-खुची सारी पूंजी और जमीन-जायदाद भी क्यों न बेचनी पड़े। बिटियां की चौबीस घंटे की देखरेख के लिए दो कुशल नर्स तो हैं ही, उन्होंने भी अपने सुख-चैन और रातों की नींद से नाता तोड़ लिया है। कोमा की भेंट चढ़ चुकी श्रेया की बड़ी बहन डॉक्टर है। वह भी जीवन से संघर्ष करती आशा और निराशा के बीच झुलती अपनी इकलौती बहन को फिर से एकदम स्वस्थ और फिर से भागते-दौड़ते देखने के लिए अपना सारा काम धाम छोड़कर उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है। परिवार के कुछ शुभचिंतक श्रेया की इच्छा मृत्यु की मांग करने का सुझाव भी देते रहते हैं, लेकिन माता-पिता और बहन के यकीन की डोर बहुत मजबूत है।

इस धरा से अपने ही खून की ऐसी अंतिम विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। करोड़ों संवेदनशील भारतीयों की आंखों को नम कर देने वाला वीडियो आपने भी देखा होगा, जिसमें बहन अपने भाई से कह रही है, ‘‘सबको माफ करते हुए अब जाओ, ठीक है।’’ यह जिन्दगी इंसान को कैसे-कैसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। इसकी हकीकत अशोक राणा और निर्मला देवी से बेहतर और कौन बता सकता है। काल्पनिक किस्से कहानियां लिखना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है दर्दनाक वास्तविकता से रूबरू होना वो भी सतत तेरह वर्षों तक। फुटबाल और जिम का शौकीन हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। एक शाम रक्षाबंधन के दिन वह अचानक चौथी मंजिल से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क और कमर में अत्यंत गहरी चोटें लगीं। इस हादसे के बाद वह जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया। कई डॉक्टरों और अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज करवाने के बावजूद उसकी हालत में तो कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन राणा परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि उन्हें दिल्ली में स्थित अपना तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने बेटे के ठीक होने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। सांस लेने, फीड कराने के साथ मल त्याग के लिए नली लगी रही। अपने कोमाग्रस्त पुत्र को पल-पल अथाह पीड़ा से लड़ते देख माता-पिता अब उसे जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगे। हरीश की 60 वर्षीय मां निर्मला देवी के इन शब्दों ने पत्रकारों की भी आंखें नम कर दीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि हमें ऐसा दिन देखना पड़ेगा, जब बेटे की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि उसकी मुक्ति के लिए दुआ करनी पड़ेगी।’’ हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि जैसा दर्द हमें मिला है, वैसा किसी दूसरे माता-पिता को न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके दर्द को समझा और इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए 13 वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े 32 वर्षीय युवक हरीश के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद माता-पिता ने अपने हरीश के अंगदान के जरिये दूसरों को जीवन देने की जो साहसी और परोपकारी इच्छा जतायी है उसके लिए भी उनका बारम्बार वंदन और अभिनंदन।

Thursday, March 5, 2026

बेटा घर नहीं लौटा

जब कोई अपराधी समाज के लिए आतंक का पर्याय और पुलिस के लिए सिरदर्द बन जाता है तो समाज उससे नफरत और पुलिस उसका एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती। यह भी सच है कि हर डाकू, चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी का भी अपना परिवार होता है। ऐसे यार दोस्त भी होते हैं, जो हर हाल में उसके शुभचिंतक होते हैं। मां-बाप, पत्नी और भाई-बहन के मन में उसके प्रति कहीं न कहीं सद्भावना और स्नेह की ऐसी नदी बहती रहती है, जो आसानी से नहीं सूखती। वे उसे निर्दोष मानने का जो भ्रम पाले रहते हैं वो अंत तक कायम रहता है। जगजाहिर घोषित अपराधी को सज़ा मिलने पर ऐसे करीबी अपनों का चेहरा उतर जाता है और वे कानून व्यवस्था को भी कोसते देखे जाते हैं। हमारे समाज में यदि अपवाद न हों तो सबकुछ एकतरफा लग सकता है। ऐसे ही अपवाद हैं हाजीपुर के एक पिता, जिन्होंने अपने खूंखार अपराधी बेटे के पुलिसिया एनकाउंटर पर न केवल भरपूर खुशी दर्शायी, बल्कि पुलिस को धन्यवाद के साथ शाबाशी भी दी। दो लाख के इनामी कुख्यात अपराधी प्रिंस ने गलत संगत में बचपन से अपराध की राह चुन ली थी। प्रिंस ने वर्ष 2011 में अपने ही दादा को चाकू मारकर घायल कर दिया था। कालांतर में भी उसने कई झगड़े-फसाद किये और जेल जाना-आना लगा रहा। जेल में रहने के दौरान उसका कुछ खूंखार अपराधियों से करीबी जुड़ाव हुआ तो बाहर आने के बाद वह बेखौफ होकर लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को अंजाम देने लगा। यहां तक कि 2018 में हाजीपुर जेल में बंद रहने के दौरान कुख्यात अपराधी मनीष की हत्या में भी उसका नाम गूंजा था। प्रिंस को उसके माता-पिता ने सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वह अंत तक नहीं सुधरा। उलटे उसने देश के कई राज्यों में लूट और हत्या का ऐसा नेटवर्क बनाया कि पुलिस के लिए भी अपार सिरदर्द बन गया। लोगों के तानों से परेशान घरवालों ने ईश्वर से प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी कि इस शैतान का किसी भी तरह से अब अंत ही हो जाए। उन्होंने पुलिस से भी प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी, इस बेलगाम शैतान को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा कर सुधारो या फिर मार गिराओ। बीते माह जब गोलियों की बौछार से पुलिस ने उसका हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा कर दिया तब पिता के यही शब्द थे, ‘पुलिस ने जो किया वो एकदम सही है। जितने भी ऐसे दरिंदे हैं उन्हें भरे चौराहे पर गोली से उड़ा देना चाहिए।’ अन्य परिजनों ने भी पुलिस की सराहना करते हुए बार-बार नतमस्तक होकर धन्यवाद की झड़ी लगा दी। 

नक्सलियों ने राष्ट्र को कितनी हानि पहुंचायी है, कितने घर उजाड़े हैं, कितने-कितने मां-बाप के सपनों को रौंदा है इसका हिसाब लगाना असंभव है। जिन आदिवासी इलाकों में सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार और संपूर्ण विकास की धारा बहाने के लिए प्रयत्नशील रही, वहीं शीर्ष नक्सली अनेकों वर्षों तक अड़ंगा बने रहे। अनपढ़ आदिवासियों को पिछड़ेपन और असमानता के जाल से बाहर ही नहीं निकलने दिया। नक्सली नेताओं ने असंख्य युवक-युवतियों को बरगला कर नक्सली बनाया और खुद के बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए भेजा। महानगरों में कोठियां खड़ी कीं, कारों की कतार लगाकर दुनियाभर के सुख भोगे। इसकी जो हकीकत है उस पर कई उपन्याय लिखे जा सकते हैं। बीते समय की सरकारें तो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरी तरह से नक्सलियों का खात्मा नहीं कर पाईं, लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पूरे मन से प्रतिज्ञाबद्ध ही नहीं काफी हद तक सफल होती दिखायी दे रही है। वर्षों पुराना आतंकी आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा है। अधिकांश नक्सली कमांडरों के हौसले पस्त किये जा चुके हैं। यही वजह है कि अनेकों इनामी नक्सली अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर चुके हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें भी हथियार डालने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ माह पूर्व भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणु गोपाल ने अपने 60 साथियों सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव के चलते दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवुजी ने भी हथियार डाल दिए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय बने देवुजी ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री धर्मराव आत्राम का अपहरण कर उन्हें 17 दिन तक बंधक बनाकर रखा था। इस हैवान ने कितने नेताओं तथा जवानों की जान ली, उसका संपूर्ण लेखा-जोखा किसी भी सजग भारतीय का खून खौला सकता है। ऐसे दरिंदो की मौत तो कोई भी चाहेगा। देवुजी पर 1.25 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। जब उसे लगा कि अब तो कभी भी उसे टपकाया जा सकता है, तो उसने  आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। वैसे भी जान तो सबको प्यारी होती है। फिर भी सरकार उन्हें आत्मसमर्पण का मौका दे रही है। इसके लिए उन्हें तथा उनके परिजनों को सरकार का अहसानमंद होना ही चाहिए। एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जंगलों से तो नक्सलियों का शीघ्र सफाया हो ही जाएगा, लेकिन अर्बन नक्सलियों को कब और कैसे दबोच कर जेलों में डाला जाएगा जो वर्षों से सफेदपोश होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी का नकाब ओढ़े हैं। यही चेहरे तथाकथित क्रांतिकारी, कवि, संपादक, प्रोफेसर, कथाकार और समाजसेवक आदि के चोले में नक्सलियों को पालते-पोसते आ रहे हैं तथा कई भयावह खूनी हमलों के मास्टरमाइंड भी हैं। 

माड़वी हिडमा। हां यही नाम था उसका, जिसने सोलह वर्ष की उम्र में जंगलों में हथियार थाम कर भटकने की ठान ली थी और कई वर्ष तक खून-खराबा करता रहा। हिडमा के दिल-दिमाग में शहरी नक्सलियों ने यह भर दिया गया था कि नक्सली गरीबी, शोषण और असमानता के खात्मे के लिए कटिबद्ध हैं। वे तब तक सरकारों के खिलाफ हथियार उठाये रहेंगे, जब तक चारों तरफ समानता और खुशहाली नहीं आ जाती। उसे नक्सली कमांडरों के वास्तविक चरित्र का पता ही नहीं था। दरअसल, सच को उससे छिपाया गया था। हिडमा को हथियार चलाने का प्रशिक्षण सुजाता नामक नक्सली महिला से मिला था, जिसे बस्तर की लेडी वीरप्पन कहा जाता था। सुजाता बस्तर डिविजन कमेटी की प्रभारी थी और सुकमा समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े नक्सली हमलों में अहम भूमिका निभा चुकी थी। 2024 में सुजाता को सुरक्षा बलों ने तेलंगाना से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। उसके शागिर्द हिडमा को कई बड़े नक्सली हमलों का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। उस पर भी सरकार ने 1 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। हिडमा को सीपीआई (माओवादी) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर कहा जाता था, जिसे नक्सलियों की सबसे प्रशिक्षित और घातक इकाई माना जाता है। वह दंडकारण्य के घने जंगलों में सक्रिय रहता था और अबूझमाड़ के कठिन भू-भाग व सुकमा-बीजापुर बेल्ट की अंदर तक गहन जानकारी थी। इसी कारण कई खूनी वारदातों में लिप्त रहने के बावजूद सुरक्षा बलों की पकड़ से दूर था। उसे यकीन था कि सुरक्षा बल उस तक नहीं पहुंच सकेंगे। बीते वर्ष छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हिडमा की मां से मुलाकात कर उसे समझाने और सही राह पर लाने को कहा था। मां भी तहेदिल से चाहती थी कि उसका बेटा आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए और शांति से जिए। आखिर कब तक कानून से मुंह छिपाता जंगलों में भटकता रहेगा। ममतामयी मां कई वर्षों से अपने बेटे और बहू को देखने के लिए तरस रही थी। वह दिन-रात ईश्वर से दोनों की सलामती की प्रार्थना करती नहीं थकती थी। उसे पक्का भरोसा था कि बेटा उसका कहना जरूर मानेगा। अपने बेटे की सलामती चाहती थी। उसने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें अत्यंत भावुक होकर कहा था, ‘‘कहां हो बेटा? घर लौट आओ, सरेंडर कर दो।’’ लेकिन बेटे ने मां की ममता का मान नहीं रखा। अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। कुछ ही दिनों के पश्चात अखबारों में यह खबर छपी, ‘‘छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश बार्डर पर सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली हिडमा और उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया।’’

Thursday, February 26, 2026

हे भगवान...!

पहले अपने बच्चों को लेकर मां-बाप इतने चिंतित और परेशान नहीं होते थे, जितने इक्कीसवीं सदी के इस दौर में हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने कामधंधे, नौकरी आदि पर अपना दिमाग केंद्रित रखें या अपनी संतानों पर। मोबाइल ने भी उनकी समस्या में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। अमीर-गरीब सभी के लड़के-लड़कियां ऐसे ‘मोबाइल रोगी’ हो गए हैं कि उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुध-बुध नहीं रहती। अभिभावकों का उन्हें रोकना-टोकना और समझाना शूल की तरह चुभता है। ऐसे में अभिभावकों का दिमाग ही काम नहीं करता। मोबाइल, ऑनलाइन गेम, सट्टा, जुआ और गलत संगत की वजह से बच्चों की बर्बादी और आत्महत्याओं की खबरें उनका पीछा  करते हुए उन्हें भयभीत करती रहती हैं।

गाजियाबाद की भरी-पूरी ‘भारत सिटी सोसायटी’ में हाल ही में तीन बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद तो लगभग हर सजग भारतीय मोबाइल फोन और जानलेवा ऑनलाइन गेमिंग की लत के बारे में सोचता और बोलता दिखा। अभी तक तो अधिकतर लड़कों के ही मोबाइल के गुलाम होने की खबरें सुर्खियां पा रही थीं अब एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों ने इस पीड़ादायी श्रृंखला में अपना नाम जोड़ लिया। बहनों की इस सामूहिक खुदकुशी के दिल दहलाने वाले सच ने डिजिटल युग का भयावह चेहरा तो दिखाया ही है तथा और भी कई सवाल और चिताएं खड़ी कर दी हैं। पुलिसिया जांच पड़ताल में यह पता चला कि तीनों बहनें एक तथाकथित ‘कोरियाई लवर गेम’ की जबरदस्त कैदी बन कर रह गईं थीं। मां-बाप, रिश्तेदारों तथा स्कूली पढ़ाई से नाता तोड़ते हुए केवल और केवल उस मोबाइल से ही रिश्ता जोड़ चुकी थीं, जिसे मां-बाप ने  उन्हें पढ़ाई के लिए उपलब्ध कराया था। लेकिन ये तीनों बहनें ऐसे विदेशी, कोरियन ऑनलाइन गेम के मोहजाल में जा फंसी जो शुरू-शुरू में आनंदित करता है, फिर धीरे-धीरे वही सुख आदत और गंभीर लत में बदल जाता है। गौरतलब है कि ऐसे अधिकांश ऑनलाइन गेम्स काफी हद तक इसी तरह से बनायेे जाते हैं कि खिलाड़ी लगातार इससे जुड़े रहें। खाना-पीना तक भूल जाएं। कंपनियों के द्वारा उन्हें टास्क पूरा करने के लिए विवश कर दिया जाता है। दरअसल बच्चों को अपने जाल में फंसाने का उनका अपना तौर-तरीका है। 

खिलाड़ियों को यदि कोई टोकता और रोकता है तो वे आगबबूला हो जाते हैं। क्रोध, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन उन्हें आक्रामक बनाता चला जाता है। मोबाइल से अलग होना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है। ‘कोरियाई लवर गेम’ की अत्याधिक लती तीनों बहनों से जब परिवार ने मोबाइल छीना तो वे मानसिक रूप से टूट और बिखर गई। डिजिटल दुनिया को वास्तविक जीवन से कहीं बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण मान चुकी बहनों ने बहुत पहले से ही अपने कोरियन नाम रख लिए थे। निशिका ने अपना कोरियन नाम मारिया, प्राची ने आजीया और पाखी ने अपना कोरियन नाम पिंडी रख लिया था। तीनों आपस में बहुत करीब थीं। उनके कमरे में मिले आठ पृष्ठों के सुसाइड नोट में भी लिखा मिला, ‘‘सॉरी पापा हम कोरिया नहीं छोड़ सकते।’’ तीनों सबकुछ एक साथ करती थीं। मसलन, सुबह उठना, ब्रश करना, नहाना, खाना-पीना, सोना, उठना, बैठना और सबकुछ भूलकर घंटों मोबाइल गेमिंग में लगे रहना। यथार्थ से पूरी तरह से कटी, सिर्फ और सिर्फ सपनों के आकाश में उड़ती बारह, चौदह और सोलह साल की तीनों बहनों ने नौंवी मंजिल से एक साथ कूदकर ही खुदकुशी की।

मोबाइल आज के समय में जरूरत बन गया है। इस अत्यंत उपयोगी साधन का दुरुपयोग करने वाले बिगड़े नवाबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। क्रिकेट सट्टा, चांदी, सोने का सट्टा और भिन्न-भिन्न प्रकार का जुआ मोबाइल और लेपटॉप से खेलने की कलाकारी और बर्बादी की खबरें हर दिन सुनने और पढ़ने में आ रही हैं। अभी हाल ही में शहर के एक रेडिमेड कपड़े की फैक्ट्री के नामी-गिरामी मालिक का बेटा क्रिकेट और चांदी के सट्टे में पंद्रह करोड़ रुपये हार गया। शुरू-शुरू में पांच-सात लाख की कमायी उसके हाथ लगी थी। तब उसे लगा था कि इससे चोखा धंधा और कोई नहीं हो सकता, लेकिन कालांतर में दांव जब उलटे पड़ने लगे तो उसने अपने पिता और मां के बैंक खाते को कब खाली कर दिया और बहन की शादी के लिए घर की अलमारी में सुरक्षित रखे करोड़ों के सोने-हीरे के आभूषण गायब कर दिए किसी को पता नहीं चला। पिता अपने कारोबार में व्यस्त थे और मां को किटी पार्टियों से फुर्सत नहीं थी। वैसे भी उनका अपने बिगड़ैल बेटे पर कोई अंकुश नहीं था। उन्हें उसकी रात-रात भर बाहर रहकर लड़कीबाजी और दारू चढ़ाने की खर्चीली आदत की खबर थी। उन्हें यह भी पता था कि उनका दुलारा जुए का भी शौकीन है। मौज-मस्ती में पच्चीस-पचास हजार रुपये इधर-उधर करता रहता है। लेकिन उस दिन तो उनके पैरोंतले की जमीन ही खिसक गई जब कर्ज में दी गई रकम की वसूली के लिए एकाएक चार-पांच बॉडी बिल्डर अस्त्र-शस्त्र के साथ उनके घर आ धमके। उनके लाडले ने सट्टे में मालामाल होने के लिए जिस गुंडे किस्म के साहूकार से पांच करोड़ का कर्ज लिया था, उसी ने इन्हें वसूली के लिए भेजा था। व्यापारी पिता के लिए कर्ज वसूली के लिए गुंडों का घर आ धमकना किसी सदमें से कम नहीं था। मां तो ऐसी बेहोश हुई कि उसे अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। व्यापारी ने बड़े सधे तौर-तरीके और धैर्य के साथ उनकी सुनी तो पता चला कि मूल रकम तो चार करोड़ थी, लेकिन पांच महीने के मोटे ब्याज की वजह से पांच करोड़ तक जा पहुंची थी। दबंग साहूकार ने काफी सब्र करने के बाद उन्हें वसूली के लिए भेजा था। उसे कारोबारी की हैसियत की भी पूर्ण जानकारी थी। जब उसे कई बार तकादे के बाद भी पैसे नहीं मिले तो मजबूरन दल-बल को भेजना पड़ा। नालायक बेटे के व्यापारी पिता ने अपनी साख पर आंच नहीं आने दी और कुछ ही घंटों में सारा कर्ज चूका दिया और ज्यादा डांटने-फटकारने की बजाय अपने इकलौते बेटे को यह सोचकर सिंगापुर अपनी बेटी के पास भेज दिया कि यदि और भी कोई लेनदार हो तो वह उसकी पकड़ और निगाह से बचा रहे।

धन्ना सेठों पर ऐसे संकट उतनी बिजली नहीं गिराते जितना कि आम मध्यमवर्गीय भारतीयों पर कहर ढाते हुए उनका सबकुछ तहस-नहस करके रख देते हैं। कॉलेज में मेरे सहपाठी रहे अंशुमन शर्मा वर्षों तक स्टेट बैंक की नौकरी करने के पश्चात जब रिटायर हुए तो बहुत प्रफुल्लित थे। कुछ खास दोस्तों के लिए मित्र अंशुमन ने जबलपुर के तीन सितारा होटल में पार्टी भी आयोजित की थी। उसने बड़े शौक से दो मंजिला सर्व सुविधायुक्त घर भी बनवाया था, जिसके गृह प्रवेश का आयोजन भी तभी किया गया था। अंशुमन पूजा-पाठ और धर्म-कर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी था। उसने जब चांदी के कप में चाय पिलाई थी तब मित्रों ने सहज तंज कसा था, ‘‘लगता है पंडित जी ने बैंक की मैनेजरी के दौरान अच्छा-खासा माल बटोरा है।’’ तब भाभी जी ने बताया था कि यह तो उनकी शादी के अवसर पर किसी करीबी रिश्तेदार ने उपहार में दिये थे। अंशुमन के इकलौते बेटे ने बीए की आधी-अधूरी पढ़ाई की थी। उसकी बेरोजगारी से ज्यादा उसकी मोबाइल से चिपके रहने की लत को लेकर अंशुमन बेहद चिंतित और परेशान था। दोस्तों ने उसे आश्वस्त किया था कि ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। आजकल लगभग सभी बच्चे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। यदि नौकरी नहीं मिलती तो फिलहाल छोटी-मोटी दुकान शुरू करवा दो। हम सभी दोस्त अपने-अपने ठिकाने चल दिये थे। लगभग छह महीने के बाद खबर मिली थी कि अंशुमन के बेटे पराग ने क्रिकेट सट्टे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये हारने के बाद आत्महत्या कर ली है। पराग ही अपने पिता के बैंक खाते को देखता-संभालता था। उसने कब जन्मदाता के जीवनभर की जमापूंजी सट्टे में लुटा दी इसका पता पिता को तब चला जब कुछ लेनदारों ने पराग को घर में आकर मारा-पीटा और धमकाया। पराग ने पिता के बैंक खाते को खाली करने के साथ ही कुछ लोगों से मनमाने ब्याज पर लोन भी ले रखा था। अपने बेटे के शव को देखते ही अंशुमन यह कहते हुए बेहोश होकर गिर पड़ा था, हे भगवान, तूने ये क्या कर दिया। मां का तो कलेजा बाहर आ गया था। उसके बाद अंशुमन को होश ही नहीं आया। दो महीने के पश्चात मैं भाभी जी से मिलने के लिए जबलपुर उनके नये निवास स्थान पर गया था। कर्जा चुकाने के लिए उन्हें अपना आशियाना बेचने को विवश होना पड़ा था। भाभी एक कमरे के उजाड़ से घर में अकेली गुमसुम बैठी थीं। उन्हें तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। एल्युमिनियम के टूटे-फूटे गिलास से धीरे-धीरे पानी के घूंट लेते-लेते मुझे कब सुबकियां आने लगीं मैं ही नहीं जान पाया...।

Thursday, February 19, 2026

जन्म-जन्मांतर!

 इस बार के ‘वैलेंटाइन-डे’ ने किस्म-किस्म की खबरों से मिलवाया। संयोग से मेरा जन्मदिन भी 14 फरवरी को पड़ता है। काफी वर्षों तक तो जन्मदिन  आया गया हो जाता था। हमारे उस दौर में जन्मदिन मनाने का उतना चलन भी नहीं था, जितना इन दिनों है। अब तो प्रेमी वैलेंटाइन वीक मनाते हैं। पूरे हफ्ते भर मौज मस्ती। वैसे भी यदि जीवन में खुशी और आनंद नहीं तो उसके कोई मायने नहीं। कुछ लोगों की शिकायत है कि सच्चा प्रेम धीरे-धीरे गायब हो रहा है। अधिकांश पति-पत्नी के रिश्तों में भी हैरतअंगेज ठंडापन घर करता जा रहा है। आपसी समझदारी और वफा की जगह बेवफाई बढ़-चढ़कर अपनी रंगत दिखा रही है। प्यार पर मिलावट ही मिलावट और बाजारीकरण का कब्जा है, लेकिन प्रेम और सच्चे समर्पण को लेकर मेरी धारणा दूसरों से अलग है। अपवाद हमेशा रहे हैं। कहीं वफा की प्रेरक दास्तानें तो कहीं बेवफाई की दुकानें हैं, जहां प्रेम की बोली लगती है। रिश्तों को रौंद दिया जाता है। प्रेम केवल एक दिन या एक हफ्ता मनाने का पर्व नहीं। दिल से दिल के इस रिश्ते में से पवित्रता, त्याग, सहनशीलता के साथ समर्पण और सहयोग को यदि गायब कर दें तो कुछ भी नहीं बचता। सच्चे प्रेम की यात्रा तो मृत्यु के बाद भी जारी रहती है। मरकर भी प्यार को जिंदा रखने वाले जॉन ने तो वाकई मन को गदगद और तरोताजा कर दिया...। 

सात समंदर पार कैलिफोर्निया की डायना खुद को दुनिया की खुशकिस्मत महिलाओं में से एक मानती है। उसके पति जब जीवित थे तब उसे हर वैलेंटाइन-डे पर ताजे सफेद फूलों के गुलदस्ते के साथ एक कार्ड उपहार में देते थे। कार्ड पर यही मैसेज रहता था, ‘‘मेरे पास सिर्फ एक दिल है और वो तुम्हारा है। तुम हमेशा मेरी वैलेंटाइन रहोगी। आई लव यू डायना।’’ हमेशा खुश रहने वाले जॉन ने इस दस्तूर को 46 वर्ष तक ऐसे निभाया जैसे डायना उसकी पत्नी नहीं, प्रेयसी हो। दुर्योग से 2017 में गंभीर बीमारी के कारण जॉन की मृत्यु हो गई। 2018 में डायना को ऐन वैलेंटाइन-डे पर जॉन का भेजा सफेद फूलों का गुलदस्ता और कार्ड मिला तो वह हतप्रभ रह गई। क्या उसके प्रियतम ने स्वर्ग से उसे उपहार भेजा है? काफी देर तक वह इसी सवाल में उलझी रही। उसके बाद भी जब पांच साल तक ये सिलसिला बना रहा तो डायना ने खोजबीन की तो पता चला कि जॉन को अपनी मृत्यु का काफी पहले आभास हो गया था। उसी दौरान उसने फूलों का गुलदस्ता बनाकर बेचने वाले स्थानीय दुकानदार को एक मुश्त ढेर सारी रकम देते हुए निर्देश दिया था कि मेरी मौत के बाद भी मेरी पत्नी को ताउम्र हर साल वैलेंटाइन सरप्राइज गिफ्ट देते रहना। जॉन को इस दुनिया से रुखसत हुए नौ वर्ष बीत चुके हैं। हर 14 फरवरी के दिन वही सफेद फूलों का गुलदस्ता, वही कार्ड और मैसेज डायना के पास आता है, तो उसकी आंखें नम हो जाती हैं। उसे यही लगता है उसका प्रियतम अभी भी उसके आसपास है। 

‘‘97 साल के बुजुर्ग ने अपनी 50 साल पुरानी साथी से शादी करने की ठानी’’ इस शीर्षक के अंतर्गत छपी खबर का लब्बोलुआब कुछ ऐसा है कि सिंगापुर में रह रहे एक बुजुर्ग की पत्नी वर्ष 2014 में इस दुनिया से चल बसी। पत्नी के गुजरने के बाद बुजुर्ग को अकेलापन काटने लगा। उन्हें ऐसी साथी की जरूरत महसूस होने लगी, जो सरल, सहज और उनके दिल के करीब हो। ऐसे में उन्हें उस महिला की याद हो आई, जिन्हें वे बीते पचास सालों से जानते-पहचानते थे। वह भी अब अकेली थी। उन्होंने उससे संपर्क साधा तो वह भी हमेशा-हमेशा के लिए उनके साथ रहने को राजी हो गई। बेटों ने अपने उम्रदराज पिता के फिर से शादी करने के निर्णय के खिलाफ शोर-शराबा करना प्रारंभ कर दिया। उनका कहना था कि इस उम्र में शादी करना अपना तथा परिवार का म़जाक उड़वाने जैसा है। ‘लोग क्या कहेंगे’ की सोच ने उन्हें इतना बेचैन कर दिया कि वे अदालत की शरण में जा पहुंचे। बेटों ने पिता को मानसिक रूप से कमजोर सिद्ध करने के लिए कई कारण गिनाये। उन्हें भुलक्कड़ और शारीरिक रोगों का शिकार बताते हुए अस्पताल में भर्ती कराने की इच्छा जतायी, लेकिन कोर्ट ने उनकी दलीलों को कोई महत्व नहीं दिया और याचिका खारिज कर दी। महत्वाकांक्षी चुस्त-दुरुस्त बुजुर्ग 1960 के दशक में शुरू की गई एक केमिकल कंपनी के मालिक हैं, जिससे बेतहाशा कमायी हो रही है। दरअसल, उन्होेंने जैसे ही अपनी वसीयत में बदलाव किए तो स्वार्थी बेटों का माथा ठनका कि हो न हो, यह परिवर्तन नये रिश्ते के दिमाग की उपज है। अब तो बुजुर्ग और महिला शीघ्र ही विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं। 

वैलेंटाइन के दिन भोपाल की एक महिला अफसर के द्वारा खुद से 12 साल छोटे प्रेमी को डेढ़ करोड़ में खरीदने की फिल्मी-सी खबर को पढ़कर मैं कुछ पल तक हक्का-बक्का रह गया, लेकिन फिर अच्छा लगा। किसी भी रिश्ते को जबरन तो नहीं खींचा और स्वीकारा जा सकता। इस खबर की नायिका यानी प्रेमिका की उम्र 54 वर्ष तो प्रेमी 42 वर्ष का है। दोनों कैसे एक दूसरे के करीब आए और जिस्मानी रिश्ते बनाए यह रहस्य अपनी जगह है। अपने से बड़ी रईस औरत का प्रेमी 16 और 12 साल की दो बेटियों का पिता भी है। जब इस नाजायज रिश्ते की वजह से प्रेमी के घर में कलह-क्लेश के कर्कश ढोल-नगाड़े बजने लगे और लोग तरह-तरह की बातें करने लगे तो बदनामी और मानसिक पीड़ा से जूझ रही बड़ी बेटी से रहा नहीं गया तो वह कोर्ट जा पहुंची। हिम्मत और हौसले की डोर से बंधी बेटी को उम्मीद थी कि पिता को ईश्वर सद्बुद्धि देंगे। वे फिर से मां के पास लौट आएंगे, लेकिन काउंसलिंग सत्र के दौरान पिता तो अपनी जिद पर अड़े रहे कि उन्हें जो खुशी-संतुष्टि प्रेमिका के साथ मिलती है, पत्नी के साथ रहने में तो बिल्कुल नहीं मिलती। अब हम दोनों में बेइंतहा दूरियां बढ़ गई हैं। दोबारा करीब आना असंभव है। अब तो प्रेमिका ही मेरे लिए सबकुछ है, जिसकी निकटता मुझे मानसिक शांति से सराबोर कर देती है। पति के इस निर्णय से पत्नी को आघात तो लगा, लेकिन फिर भी उसने खुद को संभालते हुए कहा कि, यह तो घोर अन्याय है। उसकी दोनों बेटियों का भविष्य ही अंधकारमय हो जाएगा। अपने जीते जी वह उनका अहित होते नहीं देख सकती। यदि आपको अपनी जिद से टस से मस नहीं होना है, तो मेरी मांग को ध्यान से सुनें और पूरा करें। मेरी बेटियों के गुजर-बसर के लिए एक शानदार डुप्लेक्स और 27 लाख रुपए नकद दिए जाएं। पत्नी की मांग को सुनकर पति तो चुपचाप सिर झुकाये खड़ा रहा, लेकिन उसकी प्रेमिका ने सारी शर्तें मानते हुए बहुत धैर्य के साथ कहा वह अपने प्रेमी के परिवार को बेसहारा, आर्थिक संकट से जूझते नहीं देखना चाहती। इसलिए मैं अपनी सारी जमा-पूंजी सहर्ष उन्हें देने को तैयार हूं। पत्नी ने लगभग डेढ़ करोड़ की संपत्ति और कैश लेकर अपने पति को अपनी सौतन के हवाले कर दिया है, ‘‘जाओ, अब तुम्हें कोई नहीं रोके-टोकेगा। तुम अपने मन की करने के लिए हर तरह से आजाद हो।’’

सच्चे प्रेम और आत्मिक समर्पण के लिए अमित को  मेरा बारंबार झुक-झुककर सलाम। पुणे के निवासी अमित की पत्नी श्रेष्ठा को कैंसर हो जाने पर कोल्हापुर के एक कैंसर सेंटर में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। कीमोथेरेपी के दौरान श्रेष्ठा के देखते ही देखते काले घने बाल झड़ गये। अमित ने जब अपनी प्रिय पत्नी की यह हालत देखी तो वह बहुत उदास होकर सोचने लगा कि ऐसे में श्रेष्ठा पर क्या बीत रही होगी? शादी के समय सात फेरे लेते वक्त उसने श्रेष्ठा से यह वादा भी किया था कि हर जंग हम दोनों साथ मिलकर लड़ेंगे। वह तुरंत सैलून पहुंचा और अपना सिर मुड़वा लिया। अमित ने श्रेष्ठा और अपनी गंजी तस्वीर फेसबुक पर डालते हुए लिखा, ‘‘बाल तो उग आएंगे, लेकिन प्यार का साथ अमर है...। श्रेष्ठा हम योद्धा हैं। जन्म-जन्मांतर तक साथ मिलकर लड़ेंगे।’’

बीते 14 फरवरी के दिन ही मेरी मित्र रेवती ने अनुराग से तलाक लिया था। इस बार के वैलेंटाइन-डे पर उसने अरबपति सुखसागर खन्ना से शादी कर ली। मजे की बात यह रही कि रेवती और सुखसागर के ब्याह के अवसर पर अनुराग भी उपस्थित था। सभी झूम-झूमकर नाचे। रिश्ते के टूटने को उत्सव की तरह मनाने के लिए रेवती ने जो ‘डिवोर्स रिंग’ पहनी उसे उसी हीरे की अंगूठी को तोड़कर बनाया गया था, जो कभी अनुराग ने उसे सगाई के अवसर पर पहनाई थी। उसे ही ‘डिवोर्स रिंग’ नाम दिया गया। रेवती  आकाशवाणी में ऊंचे पद पर है। अनुराग भी देश के नामी-गिरामी लेखक हैं। सुखसागर दिल्ली के बड़े उद्योगपति हैं।

Thursday, February 12, 2026

तो फिर ऐसे कैसे?

चित्र : 1. यह कितनी हैरान और परेशान कर देने वाली खबर है कि एक खरबपति ने गोली मारकर खुद का काम तमाम कर दिया। गरीबों, असहायों, बेरोजगारों, अशिक्षितों और बीमारों की खुदकुशी की खबरें तो एक बारगी समझ में आती हैं, लेकिन जिस रईस के पास खुद का प्राइवेट जेट, बारह रोल्स रॉयस कारों के साथ-साथ और पचासों महंगी से महंगी लग्जरी कारें, आलीशान बंगले, फार्म हाउस और अरबों-खरबों की कमायी वाले उद्योग धंधे हों वो आत्महत्या कर इस दुनिया से चलता बने तो माथा ही घूम जाता है। बेंगलुरु के विख्यात रियल एस्टेट टाइकून और कॉन्फिडेंट ग्रुप के चेयरमैन ने जिस वक्त खुद को गोली मारी तब उसके कारोबारी ठिकानों पर इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी चल रही थी। उद्योगपतियों, व्यापारियों, तरह-तरह के कारोबारियों के यहां आयकर के छापे पड़ना कोई नई और अजूबी घटना नहीं। ऐसा भी नहीं कि सीजे रॉय के यहां आयकर के अधिकारियों ने पहली बार दबिश दी होगी। उनसे कैसे निपटा जाता है, इसका भी ‘गुरुज्ञान’ उसे रहा ही होगा।

 आजकल के भागा-भागी के दौर में सी.ए. यानी चार्टर्ड अकाउंटेंट की दिमागी कलाकारी बड़े-छोटे हर उद्योगपति की लगभग हर समस्या का चुटकी बजाते हुए समाधान कर देती है। कौन नहीं जानता कि सीए और अधिकारियों की सेटिंग का चोली दामन का साथ क्या-क्या गुल खिलाता है और काले धंधे वालों का भी बिगड़ा काम संवर जाता है। ऐसा भी नहीं कि बगैर मेहनत के सीजे रॉय पर दौलत बरसी थी। बचपन उसका गरीबी में बीता था। उसने तभी धनपति बनने की राह पकड़ने की ठान ली थी। उसकी महत्वाकांक्षा और मनोबल को उजागर करते कई किस्से उसकी मौत के बाद पढ़ने-सुनने में आते रहे। 

जब वह मात्र 13 वर्ष का था, तब वह बेंगलुरु में स्थित एक विशाल कार के शोरूम में ‘डॉल्फिन’ कार को ऐसे देखे जा रहा हो जैसे उसे खरीदने के लिए पहुंचा हो। शोरूम के सेल्समैन ने उसे यह कहकर चलता कर दिया था कि, ‘‘चल भाग यहा से। कार को ऐसे घूर रहा है, जैसे कोई बड़ा धनवान खरीददार हो। पहले अपनी उम्र और औकात तो देख। फौरन चल निकल यहां से।’’ खेलने-कूदने की उम्र में अपमान की चोट खाये स्वाभिमानी बच्चे ने तभी ठान लिया था कि एक दिन वह दुनिया की एक नहीं कई महंगी से महंगी आलीशन कारें खरीदेगा और इस जैसे बदतमीज सेल्समैन देखते रह जाएंगे। 36 वर्ष की उम्र में बिना किसी बैंक से एक पैसा उधार लिए प्राइवेट जेट खरीदने वाले रॉय के यहां अभी भी दो सौ से ज्यादा लग्जरी कारें खड़ी हैं। उसका नाम देश की सबसे महंगी कारों के मालिक तथा सबसे बड़े गैरेज वाले रईसों में शामिल है। रॉय को फिल्में बनाने का भी शौक था। उसकी बनायी चार मलयालम फिल्में विभिन्न सिनेमाघरों में अभी भी दर्शकों का मनोरंजन कर रही हैं, लेकिन वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। खुद को खून से लथपथ कर खत्म करने वाले रॉय की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। उसकी पत्नी, बेटा और बेटी दुबई में रहते थे। वह अकेले ही अपने व्यापार के साम्राज्य को बढ़ाने में लगा था। उसने धन तो कमाया, लेकिन करीबी रिश्तों के मामले में गरीब होता चला गया। बचपन वाला साहस और मनोबल भी पीछे छूट गया। वैसे भी धन का अंबार धीरे-धीरे इंसान को अपना गुलाम बना लेता है। अपने साम्राज्य के छिनने और बर्बाद होने का भय सोचने-विचारने की शक्ति भी छीन लेता है। 

चित्र : 2. चमकते-दमकते नगरों, महानगरों में रहने की चाह के चलते भारत के गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। अधिकांश युवा गांव में रहकर खेती-बाड़ी या व्यापार करने की बजाय शहर में छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसते नज़र आते हैं। गांवों की आबोहवा उन्हें रास ही नहीं आती। शहरों में निरंतर बढ़ती आबादी को संभालने के लिए शासन और प्रशासन को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। मुंबई जैसे महानगरों में दूसरे प्रदेशों से आने वाले लोगों पर विराम लगाने की मांग किसी से छिपी नहीं है। मायानगरी मुंबई, देश की राजधानी दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, गुरुग्राम जैसे भौतिक सुविधाओं से परिपूर्ण नगरों का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि भीड़ निरंतर खिंची चली आ रही है। हर किसी को कहीं भी रहने और मन की करने की आज़ादी है। वैसे भी आज के इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील हिंदुस्तान में कोरोना के पश्चात अधिकांश भारतीयों की सोच में अभूतपूर्व बदलाव आया है। लोग अब धनसंचय में कम और खर्चने में अधिक विश्वास करने लगे हैं। जब सामने सुख-सुविधाओं का अंबार लगा है तो मन मसोस कर क्यों जीना? आज हैं कल का क्या भरोसा? ऐसे सुविधाभोगी काल में कुछ हकीकतें पैरोंतले की जमीन खींचती लगती हैं। 

अपने ही देश के प्रदेश तेलंगाना के अश्वरावुपेटा मंडल में स्थित घने जंगलों की एक ऊंची पहाड़ी पर मात्र एक आदिवासी परिवार अकेला रहकर बहुत खुश और संतुष्ट है। पच्चीस वर्षों से घने जंगल में अपने अंदाज से आनंदमय जीवन जीते इस परिवार के मुखिया गुरुगुंटला रेडैया, उसकी पत्नी लक्ष्मी और पुत्र गंगिरेड्डी को प्रशासन ने अनेकों बार पहाड़ी से नीचे आकर रहने को कहा, लेकिन वे नहीं माने। स्वच्छ पानी, बिजली, अस्पताल, शिक्षा, फोन जैसी सुविधाओं के प्रति इच्छा और रुचि नहीं रखने वाला तीन सदस्यों का यह परिवार लोगों के बीच जाने से भी कतराता है। हां, लक्ष्मी जरूर कभी-कभार पहाड़ के नीचे चली जाती है, जहां पर उसकी बेटी की ससुराल है। लक्ष्मी ने बताया कि उनके कुल 9 बच्चे हुए थे, जिनमें से सात की मौत हो गई। अब तो केवल बेटा और बेटी ही बचे हैं। लक्ष्मी अपने पति और बेटा-बेटी को अपनी जान से ज्यादा चाहती है। उसका कहना है कि मेरे पति जहां रहेंगे, मैं भी वहीं रहूंगी। बेटा भी अपने माता-पिता के साथ रहने, जीने-मरने की ठाने है। पत्रकारों ने गुरुगुंटला और उसकी पत्नी लक्ष्मी से जब जानना चाहा कि क्या उन्हें घने जंगल में जंगली जानवरों का भय नहीं सताता तो लक्ष्मी तुरंत बोल पड़ी कि दिन में तो सूरज होता है और रात में चांद और तारे। जब बहुत सर्दी पड़ती है, तब हम अलाव जलाते है। यहां हर तरह की सूखी घास मिल जाती है, जिसे जलाते ही अंधेरा और सर्दी दोनों भाग खड़े होते हैं। कोई जानवर भी आसपास नहीं आता। हम तो बड़े मजे से यहां पर चावल और बाजरा के साथ-साथ सब्जियां उगाते और खाते हैं। पास की नदी से पीने का पानी भी मिल जाता है। यहां जंगल में उनकी खुद की पांच झोपड़ियां हैं। तीनों के रहने के लिए अलग-अलग झोपड़ी है। कुत्ते और मुर्गियों के लिए एक तो लकड़ी-जलावन को बारिश से बचाने के लिए एक अलग झोपड़ी है। उनका बेटा गंगिरेड्डी अनपढ़ है। अभी तक उसने शादी नहीं की है। यदि कोई मनपसंद लड़की उनके साथ पहाड़ पर आकर रहने को तैयार होगी, तभी वह उससे ब्याह करेगा।

इस पहाड़ी के घने जंगल में कभी एकसाथ 40 आदिवासी परिवारों का बसेरा था। प्रशासनिक अधिकारी वर्षों तक उन्हें आधुनिक संसार के बारे में बताते और समझाते रहे कि यहां जंगल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना संभव नहीं है। इसलिए उन्हें पहाड़ी से तीन किलोमीटर नीचे आना ही होगा। यहां पर बिजली, पानी और बच्चों की शिक्षा तथा सभी के लिए चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी। अंतत:, अधिकारियों की वर्षों की मेहनत रंग लाई। उन 40 परिवारों में से 39 परिवार मान गए। सभी के लिए पहाड़ी की तलहटी में बसाई गई सर्व सुविधायुक्त पुनर्वास कॉलोनी में रहने की व्यवस्था कर दी गई। पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं। यह इकलौता परिवार तब भी नहीं माना था और आज भी अपनी जिद पर कायम है। नीचे आकर रहने वाले कई परिवारों के बच्चे अब पढ़-लिखकर प्राइवेट और सरकारी नौकरी कर मजे से रह रहे हैं, तो कुछ अपने निजी व्यवसाय को शिखर पर पहुंचाने का प्रेरक इतिहास रच रहे हैं।

चित्र : 3. हर आदमी, औरत की तमन्ना होती है कि उनका अपना घर हो। जहां वे सर्दी, गर्मी, बरसात और आंधी-तूफान से सुरक्षित बचे रहें। ऐसे घरों की कल्पना ही डरा देती है, जिनमें छत, दरवाजे और दीवारें नदारद हों। यहां तक कि कोई तय शुदा पता तक न हो। अपने ही देश में कई लोग खुले आकाश के नीचे जीने-मरने को विवश हैं। बहुत ही कम भारतीय इस सच से वाकिफ होंगे। दरअसल, ऐसी खबरें उन तक पहुंचती ही नहीं या वे इस हकीकत से रूबरू ही नहीं होना चाहते कि रोटी, कपड़ा और मकान के लिए हमारी ही तरह इस धरती पर जन्में इंसानों को कैसे-कैसे संघर्ष करने पड़ रहे हैं। आंध्रप्रदेश के पोलावरम जिले में स्थित सबरी नदी पर कुछ परिवार कई सालों से नावों में रह रहे हैं। ये मेहनतकश 11 मछुआरों का परिवार है, जिन्होंने नाव केऊपर तिरपाल लगा रखी है। उसके नीचे अलमारियां और चावल के बक्से हैं। तेल, साबुन, सब्जी और सभी घरेलू सामान व्यवस्थित ढंग से बिल्कुल वैसे ही रखे हुए हैं, जैसे हम और आप अपने सजे-धजे घरों में रखते हैं। नाश्ता, खाना-पीना, सोना-जागना सब इनका नाव पर ही होता है। इन्हीं नावों पर ही जन्में बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं। कुछ स्कूल भी जाने लगे हैं।

जीविकोपार्जन के लिए अपने गृहनगर से 130 किलोमीटर दूर रहने को मजबूर यह लोग दिन-रात मछली पकड़ने के अभ्यस्त हैं। कभी-कभी किसी-किसी परिवार को मछली पकड़ने के लिए हफ्तों तक अलग जगह पर रहना पड़ता है। उन्हें भले ही दिन में मछली पकड़ना अच्छा लगता है, लेकिन जब अंधेरा हो जाता है तो नावों में बच्चे डर जाते हैं। दूर से आती लोमडियों की आवाजें उनका दिल दहलाती हैं। मछली पकड़ने के लिए गए मां-बाप का इंतजार करते बच्चे धीरे-धीरे सर्दी, गर्मी और बरसात की मार सहने के भी आदी हो गये हैं। रात को अचानक बीमार पड़ने पर भगवान भरोसे रहना पड़ता है। एक मां का कहना है कि हम अपने बच्चों को अपने जैसा नहीं बनाना चाहते। भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन उनकी पढ़ाई में व्यवधान नहीं होने देंगे। हमारे बुजुर्गों ने हमे नाव दी। हम बच्चों को बेहतर जिन्दगी देने की कोशिश कर रहे हैं। मछुआरे अपनी नाव को मंदिर मानते हैं। नावों के नाम भी हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर रखे गए हैं। नाव पर रखे तुलसी के पौधे की किसी बच्चे की तरह देखरेख करते हुए उसे मुरझाने नहीं दिया जाता। नाव पर चप्पल नहीं पहनते। नंगे पैर रहते हैं।

Monday, February 9, 2026

कभी न आने वाला कल

संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, वाईएस राजशेखर रेड्डी, जीएमसी बालायोगी, ओपी जिन्दल, विजय रूपानी, दोरजी खांडू जैसे और भी कुछ नेताओं की विमान दुर्घटना में हुई मौत की अत्यंत दु:खद श्रृंखला में एक नाम और जुड़ गया। महाराष्ट्र के कद्दावार राजनेता, समय के पाबंद उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती हवाई अड्डे के रनवे पर लैंडिग के दौरान घटी भयावह प्लेन दुर्घटना में मौत हो गई। उनके साथ विमान में सवार चार अन्य लोगों की भी जान चली गई। इस दर्दनाक दुर्घटना ने प्रदेश और देशवासियों को गमगीन और स्तब्ध कर दिया। 

अजित पवार महाराष्ट्र के अत्यंत महत्वाकांक्षी नेता थे। जो मन में होता था उसे छिपाते नहीं थे। कभी-कभी तो वे ऐसा कुछ कह जाते थे, जो अशोभनीय होता था और सुनने वाला अवाक रह जाता था। उनकी स्पष्टवादिता किसी के लिए दंश तो किसी को सचेत करने वाली भी होती थी। किसी चुनावी मंच पर उन्होंने अपने चाचा शरद पवार पर इस शाब्दिक अंदाज में आक्रमण कर आपसी रिश्ते बिगाड़ लिए थे, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि शरद पवार हमारे लिए देवता हैं, लेकिन हर नेता का अपना समय होता है। अस्सी वर्ष की उम्र पार करने के पश्चात नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए या नहीं? मैं भी 60 वर्ष की उम्र पार कर चुका हूं। क्या हमें मौका नहीं मिलना चाहिए था? अगर मैं उनका बेटा होता तो यकीनन उन्होंने मुझे बेहतरीन अवसर दिया गया होता। चूंकि मैं उनका बेटा नहीं, इसलिए मेरी हमेशा अनदेखी होती रही है।’’ इसी अंदरूनी कड़वाहट के चलते ही जुलाई 2023 में भतीजे अजित पवार सभी को चौंकाते हुए अपने चाचा शरद पवार से अलग हो गए थे। राजनीति के चाणक्य माने जानेवाले शरद पवार को भतीजे का यह कदम अत्यंत आहत कर गया था, लेकिन तब उनके मन में यह विचार भी जरूर आया होगा कि जिसे मैंने राजनीति के दांव-पेंच सिखाए वही मेरे सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। दरअसल, राजनीति की यही रणनीति है। यहां कोई किसी का सगा नहीं। खून के रिश्तों की नसों में से कब खून गायब हो जाए और पानी समा जाए पता ही नहीं चलता। वैसे भी अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को अपनी विरासत सौंपने के लिए कुछ भी कर गुजरते आए राष्ट्रवादी कांग्रेस के संस्थापक शरद पवार अवसरवादिता की जगजाहिर मिसाल रहे हैं। उन्होंने उसी की जड़ें काटीं, जिन्होंने कभी उन्हें खाद पानी दिया था। यहां यह कहना भी गलत नहीं कि मतलब परस्ती और ‘जिधर दम उधर हम’ का मूलमंत्र अजित पवार ने उन्हीं से जाना और सीखा था। अजित पवार पर कितने-कितने भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। फिर भी वे सतत विधायक, सांसद, मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनते रहे। मतदाताओं को कैसे लुभाना है, अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को किस तरह से खुश रखना है और सत्ता की मलाई का भरपूर स्वाद कैसे लेते रहना है, इसमें यदि वे पारंगत नहीं होते तो विशाल प्रदेश महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की बलवती उम्मीद उनमें अंत तक रची-बसी नहीं रहती। 

प्रदेश के इस धाकड़ नेता को सदा-सदा के लिए दुनिया छोड़े अभी तीन दिन ही हुए थे कि उनकी सांसद पत्नी सुनेत्रा पवार को प्रदेश की उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी गई। एक शोकग्रस्त पत्नी को राजनीति के धुरंधर खिलाड़ियों ने अश्रु बहाने तक की मोहलत नहीं दी। प्रदेश की सत्ता पर फटाफट उन्हें ऐसे विराजमान करवा दिया गया, जैसे कुर्सी को हथियाने वालों की भीड़ लगी हो या प्रदेश में पहली बार महिला को उपमुख्यमंत्री बनाने की राह में अड़चने डालने वालों के रातों-रात एकजुट होने का घातक खतरा मंडरा रहा हो। जिस तरह से उनके पति-परमेश्वर पर सिंचाई विभाग में अरबों-खरबों के संगीन घोटालों के आरोप लगते रहे, वैसे ही उन पर भी सहकारी बैंक के हजारों करोड़ रुपयों को आर-पार करने के दाग-धब्बे लगे हुए हैं। खुद को सही ठहराने के लिए सत्ताधीशों के पास बहानों और तर्कों की कमी नहीं होती, लेकिन आम भारतीयों की निगाह में तो यह राजसी ताजपोशी सत्ता की अथाह भूख में समाहित बेशर्मी ही है। हर किसी को चिंतित और दिल दहला देने वाली चार्टर प्लेन की दुर्घटना में पवार के सुरक्षा कर्मी, पायलट, को-पायलट तथा फ्लाइंग अटेडेंट की मौत से भी उनके परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस तरह से अजित पवार के कुछ सपने अधूरे रह गए, वैसे ही इन मृतकों की कई चाहतों ने भी दम तोड़ दिया। ड्यूटी के दौरान हुई इनकी मृत्यु को कुछ संवेदनशील भारतीयों ने शहादत का दर्जा देते हुए सोशल मीडिया में लिखा और चेताया कि इतिहास में राजा की मौत का तो भरपूर जिक्र होता है, उसे शहीद का दर्जा देने में भी देरी नहीं की जाती, लेकिन उनके रक्षकों और सेवकों को अपनी जान की कुर्बानी देने के बावजूद मान-सम्मान देने में नेता तो नेता, मुख्य धारा का मीडिया भी कंजूसी करता है। उन्हें ठीक से याद तक नहीं किया जाता। यह अलग बात है कि उन्हें दो-चार लाख की सहायता तथा भविष्य में उनके परिवार का ख्याल रखने के आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है। अजित पवार के निजी सुरक्षा रक्षक कांस्टेबल विदीप जाधव को उनके साथी अनुशासन, निष्ठा सतर्कता, ईमानदारी और वफादारी का प्रतिरूप मानते थे। दरअसल, विदीप जाधव ऐसे कर्मठ सिपाही थे, जिन्होंने कभी भी अपनी डयूटी घड़ी का कांटा देखकर नहीं की। अजित पवार को अपने इस अंगरक्षक पर अपार भरोसा था। कभी-कभार राजनीतिक यात्रा के दौरान अजित दादा उन्हें अपने घर का खाना तक अपने साथ बिठाकर खिलाते थे। जब जाधव के घर उनके नहीं रहने की खबर पहुंची तब उनकी पत्नी मायके गई हुई थी। मां को बेटे के कहे अंतिम शब्द बार-बार याद आ रहे थे कि शाम तक घर लौट आऊंगा। मां उसे घर के जिस दरवाजे तक छोड़ने गई थी उसे ही निहारती रही। जैसे उसे यकीन हो कि बेटा जरूर लौटेगा। 

विमान की को-पायलट शांभवी पाठक की मार्च में शादी होने वाली थी। मां-बाप तो अपनी इस हंसमुख बेटी को खुशी-खुशी विदा करने के सपने देख रहे थे, लेकिन उन्हें बड़े भारी मन से उसकी अर्थी उठानी पड़ी। दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव स्थित शांभवी के नये घर में बस मातम सन्नाटा छाया हुआ था। घर की चमकती-दमकती दीवारें पूछ रही थीं कि एक होनहार पायलट की हौसले की उड़ान ऐसे कैसे थम गई? फ्लाइट अटेंडेंट पिंकी माली उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित भैरव गांव की रहने वाली थी। विमान हादसे के एक दिन पहले ही उसने अपने पिता को बताया था कि, पापा मैं अजित दादा के साथ बारामती जा रही हूं। उन्हें छोड़ने के बाद नांदेड़ जाऊंगी और होटल पहुंचते ही आपसे अच्छी तरह से बात करूंगी और इस यात्रा के अनुभवों के बारे में बताऊंगी, लेकिन वह कल नहीं आया। कभी आयेगा भी नहीं। पिंकी ने कुछ दिन पहले ही अपने भाई को बताया था कि, वीएसआर चार्टर विमान कंपनी के पायलट ज्यादा अनुभवी नहीं हैं। उनका व्यवहार भी ठीक नहीं है। पिंकी पिछले दो वर्षों से इसी कंपनी में काम कर रही थी। जिसके विमान ने दुर्घटनाग्रस्त  होकर उसकी जिन्दगी की यात्रा पर दुखदायी विराम लगा दिया।

पायलट सुमित कपूर मूलत: दिल्ली के रहने वाले थे। उनके पास 16,500 घण्टों से अधिक का अनुभव था। यह भी सच है कि कैप्टन कपूर का रिकार्ड ठीक नहीं था। उन्हें सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने के कारण निलंबित भी किया गया था। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली एयरपोर्ट पर दिल्ली-बंगलुरु उड़ान से पहले वे ‘ब्रेथ एनलाइजर’ टेस्ट में शराब के नशे में धुत पाए गए थे। दूसरी बार दिल्ली से गुवाहाटी की उड़ान के दौरान वे फिर से नशे की हालत में ड्यूटी पर मौजूद पाए गए। दूसरी बार पकड़े जाने पर उनके प्रति सख्त रुख अपनाया गया और उन्हें तीन साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। किसी भी कमर्शियल पायलट के लिए 3 साल का सस्पेंशन करियर का अंत माना जाता है, लेकिन फिर भी उन्होंने पता नहीं कैसे वापसी कर ली और ‘वीएसआर वेंचर्स’ जैसे निजी ऑपरेटर कंपनी के साथ जुड़कर वीआईपी उड़ानें भरने लगे। ऐसे में प्राइवेट आपरेटर पर भी सवाल उठे जिसने एक विवादित ट्रैक रिकॉर्ड वाले पायलट को राज्य के उपमुख्यमंत्री की सुरक्षा सौंपी!

Thursday, January 29, 2026

इनका भी करें स्वागत

कई लोगों के मन में यह सवाल और विचार तो आता ही है कि जो देख नहीं सकते वे किताब और अखबार पढ़कर देश और दुनिया से कैसे रूबरू हो सकते हैं? राजस्थान के शहर जयपुर से बीते पच्चीस वर्षों से एक अखबार प्रकाशित होता चला आ रहा है, जिसने दृष्टिबाधितों को खबरों की दुनिया से अवगत कराते हुए बेहद मुश्किल लगने वाले काम को आसान कर दिखाया है। इस अखबार का नाम है ब्रेल समाचार पत्र, जिसका फायदा एक लाख से ज्यादा दृष्टिहीन उठा रहे हैं। इस पाक्षिक अखबार के संपादक के अनुसार ब्रेल समाचार पत्र ब्रेल लिपि में प्रकाशित भारत का पहला अखबार है, जिसे राजस्थान के अलावा असम, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश सहित 18 राज्यों में भेजा जाता है। अखबार के प्रकाशन का खर्च ‘राजस्थान दृष्टिबाधित कल्याण संघ’ उठाता है, जिसे दानवीरों से भरपूर दान मिलता है। 

दरअसल, ब्रेल लिपि दृष्टिहीनों के लिए एक स्पर्शनीय लेखन प्रणाली है, इसमें उभरे हुए बिंदुओं (डॉट) का उपयोग करके अक्षर, संख्याएं और चिन्ह बनाये जाते हैं, जिन्हें उंगलियों से छूकर समझा और पढ़ा जाता है। यह कोई भाषा नहीं, बल्कि एक कोड है, जो विभिन्न भाषाओं (जैसे हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, गुजराती आदि) को लिखने में मदद करता हैं और नेत्रहीनों को साक्षर बनाता है। ब्रेन लिपि नेत्रहीन तथा कम दृष्टि वाले लोगों को न केवल पढ़ने-लिखने में मदद करती है, बल्कि व्याकरण, वर्तनी और लेखन की अन्य बारीकियों से भी परिचित कराती है, जिससे उन्हें समाज से काफी हद तक जुड़ने-समझने में सहायता मिलती है। ब्रेल लिपि को लुई बे्रेल ने बनाया था, जो कि स्वयं भी नेत्रहीन फ्रांसिसी लेखक थे। 1821 मेंउन्होंने जबइस लिपि काआविष्कारकिया, तब उनकी उम्र मात्र 15 वर्ष थी। अब यह लिपि दुनिया के लगभग सभी देशों में उपयोग में लाई जाती है। 

गरीबी की वजह से कई लोग अपने सपने साकार नहीं कर पाते। पैसों की कमी उनके पैरों में बेड़ियां डाल देती है। धनवानों की संतानें शिखर छू लेती हैं और गरीबों के बच्चे सड़कों पर ऐड़िया रगड़ते देखे जाते हैं। अपने देश में लाखों बच्चे और युवा ऐसे हैं, जिन्हें यदि समय रहते मार्गदर्शन, साथ और सहायता मिल जाती तो वे भी मनचाही राह पर सफलतापूर्वक दौड़ते हुए अपने मां-बाप का नाम रोशन कर रहे होते। अभावों में पले-बढ़े पिपरिया निवासी रिटायर्ड फौजी निरंजन वैष्णव जब सेना में भर्ती हुए थे, तभी उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पैसों की तंगी की वजह से किसी का भविष्य अंधकारमय न हो, इसलिए नौकरी से रिटायर होने के पश्चात देश के युवक-युवतियों को सैनिक बनने की नि:शुल्क ट्रेनिंग देंगे। वर्ष 2021 में रिटायरमेंट के बाद फौजी निरंजन वैष्णव ने अपने संकल्प को साकार करने में किंचित भी देरी नहीं की। उनके मार्गदर्शन में 100 से ज्यादा युवा जहां सैनिक बनने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं 95 युवक-युवतियां अपने सघन परिश्रम की बदौलत आर्मी, बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, सीआईएसएफ, अग्निवीर तथा रेलवे पुलिस में अपनी कुशल सेवाएं देते हुए अपने परिवार का सहारा बने हुए हैं। परोपकारी, संवेदनशील और देशप्रेमी फौजी शिक्षण के दौरान एक खास मॉडल के अंतर्गत उत्साहित युवाओं शारीरिक और मानसिक तैयारी करवाते हुए कर्मवीर की तरह पसीना बहाने के लिए प्रेरित करते हैं। रोज सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक क्लास लगती है। इससे पहले सुबह 5.30 से 7.30 बजे तक फिजिकल ट्रेनिंग कराई जाती है। एक युवा दो से तीन साल जबरदस्त तैयारी करता है। उसकी एक-एक विषय पर कमांड हो जाती है। सिलेक्शन के बाद ज्वाइनिंग में पांच से आठ महीने लगते हैं। इस दौरान वह भी कोचिंग में आकर पढ़ाता है। इसके अलावा कुछ पूर्व सैनिक भी अलग-अलग विषयों पर तैयारी कराते हैं। कोचिंग के लिए पूर्व सैनिक एसोसिएशन द्वारा भी संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। इस अभूतपूर्व कोचिंग की नींव रखने वाले निरंजन वैष्णव कहते हैं कि, हमारे देश के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो बस सही प्रेरणा और मार्गदर्शन की जरूरत है। जब वे मात्र 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया था। उनके दो छोटे भाई और एक बहन थी, जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी मां तथा उन्हें निभानी थी। मां लोगों के घरों में साफ-सफाई तथा अन्य मजदूरी के काम करती रहीं और उन्होंनेे ब्रेड, आइसक्रीम, अखबार और सब्जी बेचने के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखी। दसवीं की पढ़ाई के दौरान कष्टों तथा अड़चनों के सिलसिले के चलते ऐसा भी लगा कि पढ़ाई अधूरे में ही छोड़नी पड़ेगी लेकिन तब किसी देवदूत की तरह बाचावानी के शिक्षक अशोक पटेल ने कंधे पर सहायता का हाथ रखा और नि:शुल्क पढ़ाते हुए आर्थिक सहायता कर उनका मनोबल बढ़ाया।

 अपने देश में कई ऐसे दुर्गम क्षेत्र हैं, जहां प्रभावी डॉक्टरी सेवाओं का अभी भी घोर अभाव है। सुलभ और समुचित इलाज उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण अनेकों आदिवासी वर्तमान में भी तरह-तरह की बीमारियों का शिकार हो चल बसते हैं। सुरक्षित प्रसूति के अभाव में अनेकों गर्भवती महिलाओं को अक्सर अथाह पीड़ा तो कई बार मौत का निवाला भी बनना पड़ता है। जंगली तथा पहाड़ी क्षेत्रों में डिग्री धारक डॉक्टर भी नहीं जाना चाहते। अधिकांश डॉक्टर तथा नर्से जनसेवा की बजाय अपनी सुख-सुविधाओं को अधिकतम महत्व देते हैं। ऐसे लोगों की भीड़ में जीवंत मिसाल बनकर उभरी हैं ‘अनीता परकीवार’ जो गोंदिया जिले के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में घर-घर जाकर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही हैं। अभी तक अनीता परकीवार करीब 800 महिलाओं की सुरक्षित प्रसूति करवा चुकी हैं, जिसमें 98 प्रतिशत प्रसूतियां सामान्य पद्धति से सफलतापूर्वक हुई हैं। मूल रूप से गड़चिरोली की रहने वाली अनीता प्रारंभ से ही आदिवासी क्षेत्रों के गरीब, अनपढ़, अशिक्षित लोगों की समस्याओं से अवगत थीं, इसलिए उन्होंने भौतिक सुखों की चाह में महानगरों की तरफ भागने की बजाय समस्याओं से जूझते आदिवासी क्षेत्र को प्राथमिकता दी।

2004 में पिपरिया गांव में आशा कार्यकर्ता के तौर पर सेवा के दौरान उन्होंने गरीब आदिवासी महिलाओं को स्वस्थ रखने का दृढ़ निश्चय किया। अपने छोटे बच्चे के बावजूद उन्होंने गड़चिरोली में नर्सिंग के पाठ्यक्रम पूरे किए और 2016 में जमाकुडो स्वास्थ्य उपकेंद्र में संविदा स्वास्थ्य सेविका के रूप में नियुक्त हुईं। हिम्मती और साहसी अनीता 11 गांवों की जिम्मेदारी संभालने के साथ-साथ 15 और गांवों की अतिरिक्त जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभाल रही हैं, क्योंकि वहां पर कोई हेल्थ वर्कर नहीं है। उनकी अपार निस्वार्थ सेवा भावना का ही प्रतिफल है कि गरीब आदिवासी महिलाएं उन्हें अत्यंत सम्मान देती हैं और ईश्वर का सच्चा दूत मानती हैं।

पहल, प्रेरणा और त्याग ही बदलाव के जन्मदाता हैं। इसे एक बार फिर से सच कर दिखाया है, नागपुर के बीचोंबीच बसी रहाटे नगर की एक बस्ती की कुछ महत्वाकांक्षी और जुनूनी लड़कियों ने। इन्होंने न सिर्फ अपनी जिन्दगी बदली, बल्कि समाज के सोचने के नजरिये को भी बदल डाला। यहां की किसी महिला को बीते सौ सालों में शिक्षा की रोशनी नसीब नहीं हुई थी। गरीबी, उपेक्षा और बदहाली के चलते लोगों के घरों के बर्तन साफ करना, झाडू लगाना, कचरा चुनना और भीख तक मांगने को मजबूर होना तो जैसे उनका मुकद्दर बन चुका था, लेकिन कुछ दिन पूर्व अखबारों में क्रांतिकारी खबर पढ़ने में आयी। रहाटे नगर की तीन बेटियों ने लोगों के मन-मस्तिष्क की स्लेट पर लिखी इस इबारत, ‘बेटे तो कर सकते हैं, लेकिन बेटियां नहीं कर सकती’ को झुठलाते और मिटाते हुए बीए, बीकाम और बीएससी की डिग्री हासिल की तो पास और दूर के लोगों को अपनी धारणा बदलनी पड़ी। कभी यह बेटियां अन्य लड़कियों की तरह कचरे के ढेर में अपना भविष्य तलाशती थीं। हाथ में कटोरा थामकर भीख मांगते हुए लोगों की उपेक्षा और तिरस्कार को झेलती थीं। आजादी के बाद यह पहली पीढ़ी है, जिसने ग्रेजुएशन किया है। इस प्रेरणादायी परिवर्तन के पीछे सेवा सर्वदा संस्था की वर्षों की जागरूक मेहनत है। लगभग बीस वर्षों से यह संस्था रहाटे नगर जैसे पिछड़े इलाकों में शिक्षा, जागरुकता और सामाजिक उत्थान के लिए सतत कार्यरत है। संस्था ने इन बेटियों की शिक्षा के प्रति अभिरुचि प्रबल इच्छा और हिम्मत को देखते हुए स्कूल तथा कॉलेज भेजने का प्रबंध करते हुए कदम-कदम पर साथ-सहायता और मार्गदर्शन किया। भीख मांगने तथा कचरा चुनने से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर तय करने वाली इन कर्मठ लड़कियों की देखा-देखी बस्ती की और भी कई लड़कियों, बंदिशों को तोड़ते हुए परिवर्तन के महासंकल्प के साथ पढ़ने-लिखने के लिए स्कूल तथा कॉलेज जाते हुए दूसरों के लिए प्रेरणा की अलख जगाने लगी हैं...।

Thursday, January 22, 2026

इनसे जरूर करें मुलाकात

यह फिल्मी नहीं, जीते-जागते नायक हैं। इन्हें किसी दबे-छिपे पुरातन ग्रंथों या धूल में दबी-सिमटी किताबों से नहीं खोजा गया है। ये तो उन अखबारों की प्रेरक देन हैं जिन्हें सुबह पढ़कर शाम तक रद्दी के ढेर के हवाले कर दिया जाता है। इन नायक-नायिकाओं ने हर चुनौती से लड़-भिड़कर अपनी तथा औरों की तक़दीर को पलटा है। इनका हौसला ही इनकी पहचान है। इन्होंने बाहरी नहीं, अपने भीतर की आवाज सुनी है। हर डर और चिंता को भगाया है और इसी संदेश का परचम लहराया है कि बदलाव तभी शुरू होता है जब हम काम की शुरुआत करते हैं। महज सपने देखने और सोचने से कुछ नहीं होता। 

बिहार के एक छोटे से गांव की बेटी रूपम शीघ्र ही डॉक्टर बनने जा रही है। कोई भी कह और सोच सकता है कि यह कौन सी अनोखी बात है। देश में हजारों बेटे-बेटियां पढ़-लिखकर डॉक्टर बनते हैं। सच तो यह है कि रूपम की कहानी औरों से बहुत जुदा है। जब वह मां की कोख से जन्मी तभी उसके दोनों हाथ नदारद थे। माता-पिता के लिए यह दु:खद हकीकत किसी भारी सदमे से कम नहीं थी। फिर भी उन्होंने उसकी परवरिश में कोई भी कमी नहीं करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने तो जैसे भविष्यवाणी ही कर दी थी कि अपनी दिनचर्या की चुनौतियों से जूझती यह दिव्यांग लड़की किसी भी हालत में पढ़-लिख नहीं पाएगी। उम्र भर मां-बाप के लिए बोझ बनी रहेगी। लेकिन रूपम ने तो कमाल ही कर दिया। वह अपने पैरों को हाथ बनाते हुए तमाम मुश्किलों का सामना करने की कला में पारंगत होती चली गई। मां-बाप भी उसके हौसले को देखते ही रह गए। देखते ही देखते उसने अपने पैरों से लिखना भी प्रारंभ कर दिया। 2009 में दसवीं और उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण करने वाली यह बिटिया अब डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब वह मरीजों का इलाज करती नज़र आएगी। 

विश्वजीत भी दोनों हाथों से दिव्यांग है। उसने भी बचपन से ही अपने पैरों से लिखने की आदत डाल ली। शुरू-शुरू में उसे और उसके मां-बाप को काफी दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा। लेकिन कालांतर में उसने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। बिना किसी की मदद के उसने अपने पैरों से पैंसिल पकड़ने और लिखने की प्रैक्टिस करनी प्रारंभ कर दी। विश्वजीत के दो भाई हैं। दोनों ही एकदम सामान्य हैं। उसने बचपन में ही अपने मन में यह बात बिठा ली थी कि वह किसी से कम नहीं। मोबाइल पर कुछ सर्च करना हों किताबें पढ़नी हों या किसी और भारी-भरकम काम करना हो विश्वजीत उसे अपने पैरों से ऐसे अंजाम देता है जैसे दूसरे लोग अपने हाथों से करते देखे जाते हैैं। कुछ दिनों पहले नागपुर में आयोजित विदर्भ विज्ञान उत्सव में विश्वजीत के बनाये पोस्टर को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला यह पोस्टर था ही ऐसा जानदार, जिसने भी देखा बस प्रशंसा करता ही रह गया। गणित विश्वजीत का मनपसंद विषय है। वह प्रशासकीय अधिकारी बन समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहता है। उसकी एक से एक बनाई पेंटिंग को कई बार पुरस्कृत किया जा चुका है। 

कहते हैं आंखें हैं तो दुनिया की रोशनी और रंगीनियां हैं। यही आंखें पूरी सृष्टि कर दीदार करवाती हैं। अपनों तथा बेगानों को देखने का आत्मिक सुख दिलाती हैं। प्रश्न है कि जो दृष्टिहीन हैं उनका क्या? कुदरत की बेइंसाफी उन पर क्या असर डालती है और उनकी जीवन यात्रा कैसे चलती है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल तो नहीं। लेकिन फिर भी हमारी दुनिया में कुछ दृष्टिहीन ऐसे हैं, जो इस कमी को भी अपनी ताकत बनाने की हिम्मत रखते हुए आशा की ऐसी नई रोशनी फैला रहे हैं, जो आंखों वालों को भी स्तब्ध करती है। बहुतों ने तान्या बलसारा का नाम ही नहीं सुना होगा। तान्या जन्म से ही दृष्टिहीन हैं लेकिन उनके मनोबल ने उन्हें ऐसी अलौकिक आंतरिक दृष्टि उपहार में दे दी जिससे वह पास और दूर की आबोहवा को तीव्रता से महसूस करने लगीं। दरअसल, यह भी उस कुदरत का करिश्मा है जिसे बार-बार कोसा जाता है। वो भी उनके द्वारा जिन्हें सबकुछ मिला है। तान्या ने पहले खुद कम्प्यूटर में दक्षता हासिल की और अब कम्प्यूटर साक्षरता के जरिए दृष्टिहीन युवाओं को मुफ्त में प्रशिक्षित कर रही हैं। अब तक 300 से ज्यादा दृष्टिहीनों को प्रशिक्षण देकर उनके जीवन में खुशी के रंग भरने वाली तान्या का कहना है कि अपनी मुश्किलों ने उन्हें दूसरे दृष्टिहीनों के दर्द को समझने के लिए प्रेरित किया। भारत में लाखों दृष्टिहीन नागरिकों को कम्प्यूटर साक्षर बनते देखना उनका सपना है। कई विद्यार्थी उनके द्वारा प्रशिक्षित होने के पश्चात अच्छी-खासी  नौकरियों कर रहे हैं। दृष्टिहीनों को नि:शुल्क कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ तान्या अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास एवं एक्सेसिविलिटी टेस्टिंग के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन कराती हैं। यहां छात्रों को ‘स्पर्श किताबें’ दी जाती हैं। ‘ब्रेल ऑडियो’ अथवा बड़े प्रिंट में नोट भी दिए जाते हैं। तान्या को कोई भी काम कल पर टालना या आधा-अधूरा कर गुजरना बिलकुल पसंद नहीं। इसलिए किसी निश्चित अवधि में आधे-अधूरे ढंग से प्रशिक्षण पूरा करवा देने की बजाय उनके यहां तब तक सिखाया जाता है, जब तक कि विद्यार्थी का आत्मविश्वास पूरी तरह से सुदृढ़ न हो जाए और वह कम्प्यूटर पर सरलतापूर्वक काम न करने लगे। तान्या ने 2006 में कम्प्यूटर सेंटर की शुरुआत की। वर्तमान में देश के कई राज्यों के बड़े तथा छोटे शहरों में उनके कम्प्यूटर सेंटर सफलता पूर्वक चल रहे हैं और कई युवक-युवतियों की किस्मत मानसिक और खुशहाली को बदलते हुए प्रदान कर रहे हैं। 

कोल्हापुर में स्थित एक विशाल फार्म हाउस में डॉ.प्रिया भारती और राहुल नामक युवक की धूमधाम से शादी हो रही थी। मेहमान नाचते-गाते हुए खूबसूरत आकर्षक युवा जोड़े के एक होने का आनंद ले रहे थे। कुछ मित्र और रिश्तेदार अपने-अपने मोबाइल और कैमरों से इन दिलकश लम्हों की तस्वीरें लेते हुए उमंगित-तरंगित हो रहे थे। पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरों की रस्म चल रही थी कि तभी अचानक एक महिला का सिर चकराने लगा और वह धड़ाम से स्टेज पर गिर पड़ी। चमकते-दमकते आलीशान वेशभूषा में सजी-धजी डॉ.प्रिया की जैसे ही बेहोश पड़ी महिला पर नज़र पड़ी तो वह तुरंत सजग डॉक्टर की भूमिका में आते हुए फेरे रोककर उसके प्राथमिक उपचार में लग गईं। जब तक महिला को पूरी तरह से होश नहीं आया, तब तक डॉ.प्रिया वहां से नहीं हिलीं। उनकी इस कर्तव्यपरायणता की तारीफ करने के लिए मेहमानों के पास शब्द नहीं थे। अपनी शादी से ज्यादा मरीज को अहमियत देने वाली खूबसूरत दुल्हन की सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों ने दिल खोलकर तारीफें कीं और बार-बार सराहा।

Thursday, January 15, 2026

भरोसे से छल

मध्यप्रदेश के स्वच्छ और सर्वोत्तम शहर के तमगे वाले इंदौर में स्थित एक घर में छह माह के बच्चे का शव पड़ा था। मृत मासूम के पास बैठी उसकी वृद्ध दादी विलाप करते-करते कहे जा रही थी, ‘‘दस साल बाद भगवान ने खुशी दी थी और भगवान ने ही छीन ली!’’ 

मां तो बस अपने सामने दम तोड़ चुके लाडले को अपलक देखती और सोचती जा रही थी। ईश्वर भी कितना अन्यायी है। उससे भी मेरी खुशी देखी नहीं गई। मैं भी कितनी बदनसीब हूं जो अपने जाये को अपना दूध पिलाने में असमर्थ रही। उसे दूध नहीं आता था। ऐसे में डॉक्टर की सलाह पर वह बाहर के दूध में पानी मिलाकर बच्चे को पिलाती थी। दो दिन पहले बच्चे को एकाएक तेज बुखार और दस्त शुरू हो गए। तुरंत अस्पताल जाकर दिखाया तो डॉक्टर ने उसे दवा के साथ इंजेक्शन लगाया। लेकिन घर लाते-लाते रास्ते में हमेशा-हमेशा के लिए लाडले की सांसें थम गईं। दुनिया छोड़ चुके भाई की बहन की खामोशी से दर्द का दरिया बहता रहा। उसकी निगाहें बता रही थी कि कुछ ऐसा टूट गया है जिसे अब जोड़ा नहीं जा सकता। यह हकीकत सिर्फ एक घर-परिवार की नहीं थी। कइयों के साथ जुल्म हुआ था। उनके हंसते-खेलते बच्चों और बड़ों को दूषित पानी ने दर्दनाक मौत दे दी थी। परिवार के अनेकों सदस्य अस्पताल के बिस्तरों पर पड़े सोच रहे थे यह कैसे हो गया? यह भगवान की नहीं इंसान की गलती थी। उसकी लापरवाही और लालच ने मौत का यह तांडव मचाया था। शासन और प्रशासन की घोर लापरवाही और निकम्मेपन की इस दिल दहलाने वाली हत्यारी देन को वो लोग तो कभी नहीं भूल पायेंगे, जिनके अपने उनसे बिछड़ गए। वो शहर जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ और आदर्श शहर घोषित किया गया। वहीं शौचालय की सीवर लाइन और पेयजल पाइप के जानलेवा मिलन से पानी विषैला हो गया और निर्दोषों को मौत की नींद सुलाता चला गया। डायरिया, उल्टी, दस्त और संक्रमण से त्रस्त होकर लोगों का हुजूम डॉक्टरों के यहां पहुंचने लगा फिर भी प्रशासन अपनी आंखें मूंदे रहा। कई इलाकों में नलों से काला बदबूदार पानी आने की शिकायतें अनसुनी करने वाले जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों को तब किंचित होश आया, जब बच्चों तथा बुजुर्गों की मौतों की खबरें मीडिया में सुर्खियां पाने और देशवासियों को चौंकाने लगीं। अपने देश में भले ही बोतलबंद पानी का चलन हो गया है, लेकिन फिर भी अधिकांश आम भारतवासी नलों और हैंडपंपों के पानी पर आश्रित हैं। जिनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाना आसान नहीं उनके लिए विभिन्न कंपनियों का महंगा बोतलबंद पानी खरीद पाना यकीनन मुश्किल है। लापरवाह अधिकारी, नगरसेवक कहीं न कहीं यह मान चुके हैं कि, इस तरह से नागरिकों का जान गंवाना आम बात है। उन्हें इंसानी गम और पीड़ा को गंभीरता से पढ़ने की समझ ही नहीं है। जिस परिवार में दस साल की मन्नतों के बाद बच्चा जन्मा उसने मौत के मुआवजे को लेने से इंकार कर दिया। उनकी तरह और कुछ परिवारों ने भी यही कहा कि जब हमारा बच्चा ही चला गया, अब सरकारी मुआवजा ले भी लें तो क्या वह वापस आ जाएगा? अपनी औलाद से बढ़कर पैसा थोड़े ही है। यदि हमें पता होता कि सरकार हमें पानी नहीं जहर पिला रही है तो हम सावधान हो जाते। किसी भी तरह से बोतलबंद पानी खरीद लाते। शहर में दूषित पानी पीने के बाद कितनी मौतें हुई और कितनों को डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाना पड़ा, महंगे, सस्ते अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती होना पड़ा इसका सही आंकड़ा भी छुपाया गया।

जहां सजग पत्रकारों और अखबारों ने विषैला पानी पीने से 20 लोगों की मौत का दावा किया। दूसरी तरफ सरकार ने 18 परिवारों को दो-दो लाख रुपए का मुआवजा देकर अपने कर्तव्य परायण होने का ढोल पीटा लेकिन अदालत में कहा गया कि, सिर्फ चार मौतें हुई हैं। सच तो यही है कि अधिकांश शासक सच कहना और सुनना ही नहीं चाहते। उन्हें तो चापलूसी और वाहवाही ही रास आती है। इंदौर शहर में जब बच्चों के एक-एक कर मरने की खबरें दिल दहला रही थीं, तभी अनुराग द्वारी नामक सजग पत्रकार ने मध्यप्रदेश के एक  बदतमीज और मुंह फट मंत्री को हकीकत से अवगत करवाते हुए अव्यवस्था को लेकर सवाल पूछे तो वे आगबबूला होकर ‘गाली’ देने के अंदाज में आक्रामक मुद्रा में आ गए। मंत्री के अहंकारी बोल और शर्मनाक हावभाव को जब शहरवासियों ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर देखा-सुना और तो उन्हें भी बेहद शर्मिंदगी और अपनी गलती का एहसास भी हुआ कि उन्होंने कैसे घटिया नेता को अपना कीमती वोट देकर विधायक बनाया और वह मंत्री बनकर अब उन्हीं की छाती पर मूंग दल रहा है। 

इस जानलेवा कांड के बाद जब कुछ पत्रकार तथाकथित स्वच्छ शहर की हकीकत जानने के लिए कुछ इलाकों में गये तो गंदे पानी और बदहाल सफाई व्यवस्था की परतें तेजी से खुलती चली गईं। जगह-जगह कचरे के अंबार बदबू फैला रहे थे और बिना ढक्कन वाले सीवर के चेम्बर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करते प्रतीत हो रहे थे। स्थानीय निवासियों ने बड़े दुखी मन से बताया कि सफाई कर्मी मुख्य सड़क पर झाडू लगाकर चलते बनते हैं। अंदर की गलियों में हफ्तों साफ-सफाई नहीं की जाती। कुछ दिन पहले स्कूल के मास्टर जी का पांच साल का लड़का घर के पास के खुले पड़े सीवर में धड़ाम से जा गिरा। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया! बच्चों की एक पाठशाला तो गंदगी के पहाड़ के एकदम बगल में लगती है। जब-तब बच्चे बीमार होते रहते हैं। बेचारे शिक्षक भी दमघोटू बदबू, कीचड़ के बीच मासूम बच्चों को क, ख, ग सिखाते-सिखाते सिर पकड़कर बैठ जाते हैं। 

इंदौर की आहत करने वाली खबर की आंच अभी धीमी नहीं पड़ी थी कि गुजरात, ओडिशा, राजधानी दिल्ली तथा कर्नाटक में भी पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिश्रित होने से बच्चों और बुजुर्गों के बीमार पड़ने की खबरों ने तो जैसे देशवासियों को और...और भयभीत और चिंतित कर दिया। मध्यप्रदेश के इंदौर, गुजरात के गांधीनगर की तरह ही बेंगलुरू भी स्मार्ट सिटी है लेकिन कितनी शर्म की बात है कि लोग दूषित पानी पीने से बीमार हो रहे हैं। अच्छे-खासे स्वस्थ नागरिकों पर मरने की नौबत आ रही है। सरकार स्मार्ट सिटी, स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है तब भी यह दुर्गति है। मैंने स्वयं दिल्ली में अनेकों इलाकों में लोगों को खुले में शौच करते देखा है। सरकार ने हर घर नल पहुंचाने की जोर-जोर से डफली तो बजायी लेकिन सच तो यह है कि कई नगरों, महानगरों के लोगों की शिकायत है कि उन्हें पानी दो-तीन दिन में एक बार मिलता है। उस पर भी अन्याय यह है कि कई बार वो पीने के योग्य नहीं होता। कई सोसाइटियों में काले, बदबूदार पानी का बार-बार आना प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का पर्दाफाश करता है।  सेफ्टी एडवाइजरी देने वाली ग्लोबल रेस्क्यू नामक संस्था ने भारत को उन देशों की सूची में रखा है, जहां नल का पानी असुरक्षित माना जाता है। हम ये भी न भूलें कि भारत आनेवाले विदेशियों को पहले से हिदायत देकर सतर्क कर दिया जाता है कि वे यहां पर केवल और केवल बोतलबंद मिनरल वाटर ही पिएं। जापान, सिंगापुर, स्विटजरलैंड जैसे देशों के नागरिक नल का पानी इसलिए बेहिचक पीते हैं, क्योंकि वहां पर सिस्टम के कठोर स्टैंडर्ड हैं। लगातार टेस्टिंग और निगरानी बनी रहती है। भारत में  पाइप लाइनें बिछाने पर तो जोर दिया जाता है लेकिन पानी की गुणवत्ता की अनदेखी होती रहती है। इस जानलेवा लापरवाही के कारण ही अधिकांश सजग भारतीयों का सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है।