Thursday, June 18, 2026

नादान नहीं नारी

 अधिकांश नारियां शराब और शराबियों को नापसंद करती हैं। जिन घरों में पुरुष अत्याधिक शराब पीते हैं अनियंत्रित होकर कलह क्लेश करते हैं, बच्चों को मारते-पीटते हैं वहां के शोर-शराबे की आवाज बहुत दूर तक पहुंचती है। नशा कोई भी हो बरबादी का सबब बनता है। कई अच्छे-भले घर-परिवार इसकी वजह से टूटते देखे गये हैं। नशे के खिलाफ औरतें अपने-अपने तरीके से जंग लड़ती हैं। शहरों, गांवों में शराब आसानी से मिल जाती है। कॉलेजों, स्कूलों और धार्मिक स्थलों के आसपास शराब की दुकानें तथा बीयर बार खुल जाते हैं। शासन और प्रशासन की लापरवाही और बेवकूफी का दंड बच्चों तथा महिलाओं को भोगना पड़ता है। सोचिए, उन महिलाओं पर क्या बीतती है जिन्हें अंधेरे में रखकर शराबियों से ब्याह दिया जाता है। जिनके पति अवैध शराब के धंधे में लिप्त होते हैं। सभी पत्नियां विरोध के स्वर बुलंद नहीं करतीं। चुपचाप नर्क भोगती रहती हैं। लेकिन अब जमाना बदल गया है। नारी जानती है कि यदि वह चाहे तो कुछ भी कर सकती है। 

हरियाणा के फतेहाबाद में कुछ महिलाओं को शादी के बाद पता चला कि उनके पति और उनके संपूर्ण ससुराल वाले नशे के धंधे में लिप्त हैं। उन्होंने पहले तो उनसे सही राह अपनाने का अनुरोध किया, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने घर ही छोड़ दिया। महिलाओं का कहना है कि वे मेहनत-मजदूरी कर घर चलाने की पक्षधर हैं। गरीबी से मुक्ति पाने के लिए नशा बेचने के कारोबार में सहभागी बन अपराधी नहीं बनना चाहती। रजनी नामक महिला ने बताया कि शादी से पहले उसे पता नहीं था कि उसका पति अवैध शराब बेचता है। इस चक्कर में कई बार जेल भी जा चुका है। उसने अपने पति से सुधरने की विनती की, लेकिन वह तो ईमानदारी से मेहनत कर कमाने और परिवार चलाने की बजाय अपराध करने का अभ्यस्त हो चुका था। वह उलटे उसे मारने-पीटने पर उतारू हो गया तो उसने पति और ससुराल वालों से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया। अनामिका की शादी को करीब सात-आठ महीने ही हुए थे। उसने देखा और जाना कि, पति अखंड शराबी है। उसका किसी और औरत से याराना है और दोनों मिलकर नशे का कारोबार करते हैं तो उसे बहुत तकलीफ हुई। अपने मां-बाप पर भी गुस्सा आया, जिन्होंने रिश्ता तय करने से पहले आंखें बंद रखीं और उसका भविष्य अंधकारमय कर दिया। पति ने उस पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया कि वह भी नशे के कारोबार में शामिल हो जाए। इससे इफरात कमाई होगी और जिन्दगी बड़े मज़े से कटेगी, लेकिन उसने एकदम मना कर दिया। घर भी छोड़ दिया। अब पति से अलग रहती है। तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा है। 

विदर्भ के चंद्रपुर जिले की सजग महिलाओं के दबाव के चलते भाजपा के जुझारू नेता ने शराबबंदी के आश्वासन को पूरा करने की पहल करते हुए शराबबंदी लागू करवा दी थी। लेकिन बाद में जैसे ही कांग्रेस की सरकार बनी तो शराब की दुकानें धड़ाधड़ खुल गईं। कांग्रेस के भ्रष्टाचारी बिकाऊ मंत्री का बयान आया कि जिले के अधिकतम लोग शराबबंदी के पक्ष में नहीं हैं। शराब के शौकीन पुरुष यही तो चाहते थे। मंत्री के लिए महिलाओं की कोई अहमियत नहीं थी। दरअसल उसे साम, दाम, दंड भेद से चुनाव जीतना आता है। जनहित के उसके लिए कोई मायने नहीं। 

शराब ने न जाने कितने हंसते-खेलते परिवार तबाह किये हैं। एक आदमी की नशे की लत पूरे परिवार का सुख-चैन छीन लेती है। असंख्य महिलाओं को न चाहते हुए भी शराबी पतियों के साथ रो-रोकर जिन्दगी काटनी पड़ती है। नई दिल्ली की रहने वाली एक महिला ने शराबी पति से छुटकारा पाने के लिए जहर देकर उसे मार डाला। महिला का पति एक फाइनेंस कंपनी में मैनेजर था। वह रात को नशे में टुन्न होकर घर आता और उससे लड़ाई-झगड़ा करता। पड़ोसी भी तमाशा देखते और तरह-तरह की बातें करते थे। पति को सुधारने के लिए उसने कई उपाय किए, लेकिन बात नहीं बनी। वह पुलिस थाने भी गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी के बताने पर एक तांत्रिक के पास गई जो नशेड़ियों का इलाज करने में सिद्धहस्त माना जाता था। तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के बाद भी जब पति की पीने की आदत नहीं छूटी तो उसने तांत्रिक को ही कोसना शुरू कर दिया। शातिर तांत्रिक ने महिला को नशेडी पति से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए जहर पिलाकर खत्म करने की सलाह दी तो वह फौरन तैयार हो गई। तांत्रिक ने उसे जहरीला तरल पदार्थ लाकर दिया, जिसे उसने पति को पिला दिया। पति की मौत हो गयी। जब भेद खुला तो महिला और तांत्रिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

अपने शराबी पिता के हाथों मां की पिटायी और अपशब्दों की बौछार से तंग आ गई थी एक बेटी। एक दिन की बात होती तो वह सब्र कर लेती। लेकिन पिता तो रोज शराब पीकर आता और उसकी मां और बहन के साथ अंधाधुंध मारपीट करता। सत्रह वर्षीय लड़की से मां और बहन की दुर्दशा देखी नहीं जाती थी। पिता की करतूतों की वजह से पूरे परिवार को हंसी का पात्र बनना पड़ रहा था। पढ़ी-लिखी शालिनी नामक इस लड़की ने आखिरकार पुलिस में शराबी पिता की शिकायत करने की ठानी। तीन-चार बार वह थाने गई, लेकिन खाकी वर्दी वालों ने उसकी समस्या जानने, सुलझाने के बजाय उसे चलता कर दिया। पुलिसवालों का रवैया देखकर शालिनी निराश तो हुई, लेकिन फिर भी अपना दुखड़ा सुनाने के लिए बार-बार पुलिस स्टेशन जाती रही। वहां उसे बस यही कहा जाता कि नशा करना कोई अपराध नहीं है। अधिकांश पति और पिता नशे में नियंत्रण खो देते हैं। सरकार ने ही जगह-जगह शराब की दुकानें खुलवा रखी हैं। यह सिर्फ देखने के लिए तो नहीं हैं। जिन्हें पीनी है वे पिएंगे ही। पीने के बाद मारपीट और गालीगलौज होना आम बात है। वह कैसी बेटी है, जो अपने पिता की शिकायत करने थाने आ जाती है। शहर में हजारों ऐसे शराबी हैं जो अपनी पत्नियों और बच्चों की पिटायी करते रहते हैं। तुम्हारी तरह उनकी बेटियां तो पिता के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए नहीं चली आतीं!

शालिनी को तरह-तरह के उपदेश देकर पुलिसवाले विदा कर देते। शराबी पिता सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह दिन-रात उदासी और चिंता में डूबी सोचती-विचारती रहती। एक दिन उसके मन में एक नया विचार आया। पिता को सज़ा दिलाने के लिए उसने कोर्ट में छेड़छाड़ का झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया। अदालत में जब मामले की सुनवाई हुई तो उसने जज को बताया कि उसने यौन उत्पीड़न का झूठा मुकदमा दर्ज कराया है। उसने पिता के खिलाफ जज को झूठा मुकदमा दर्ज कराने के पीछे की वजह बताई कि किस तरह से वह अपने शराबी पिता के आतंक से तंग आकर थाने में शिकायत दर्ज करवाने के लिए गयी, लेकिन उसकी एक भी नहीं सुनी गई। अदालत ने लड़की के साहस की प्रशंसा की और पिता को यौन उत्पीड़न के आरोप से तो बरी कर दिया, लेकिन पत्नी और बेटी पर नशे में गालीगलौज और मारपीट करने के आरोप में दोषी ठहराया। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि, अपनी मां की दुर्दशा देखकर बेटी ने जो रास्ता अख्तियार किया वो उसकी मजबूरी थी। नशे में गर्क हो चुके पिताओं का जानवरों से भी बदतर हो जाना हर संस्कारवान बेटी-बहन-पत्नी के खून को खौलाता है। 

महानगर में एक 11 वर्षीय छठवीं में पढ़ने वाली छात्रा को उसी के नशेड़ी पिता ने अपनी अंधी वासना का लगातार शिकार बनाया। विरोध करने पर उसकी मां की हत्या करने की धमकी देता रहा। शराब और गांजे के नशे के गुलाम बाप से डरी सहमी रहने वाली बालिका ने आखिरकार अपने साथ हो रहे दुष्कर्म की जानकारी अपनी पड़ोसी महिला को दे दी। महिला बाप की हैवानियत के बारे में जानकर सन्न और स्तब्ध रह गई। ऐसी बातों को फैलने में देरी नहीं लगती। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने दुष्कर्मी को सबक सिखाने की ठानी। बलात्कारी हैवान को इसकी भनक लग गयी। वह घर से भाग गया। फिर बात पुलिस तक भी जा पहुंची। पुलिस खोजबीन कर बस्ती में छिपे नराधम को दबोचकर थाने में ले आयी। बालिका की मां को भी अपने पति की गिरफ्तारी के बाद बेटी के साथ होते चले आ रहे घिनौने कृत्य का पता चला। उसने थाने के अंदर पति की चप्पलों से ऐसी धुनायी की, कि लोग देखते रह गये। गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व बेटी ने इशारों-इशारों में मां को पिता की करतूत के बारे में अवगत कराने की कोशिश की थी, लेकिन मां ने नजरअंदाज कर दिया था। दरअसल, मां ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि कोई बाप इस हद तक नीचे गिर सकता है। हां, उसे यह जरूर पता था कि उसका पति शराब और गांजे के नशे में मदहोश रहता है। 

अपने देश के कई परिवारों में पुरुषों की नशाखोरी और दरिंदगी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता। उनकी दुराचारी प्रवृत्ति पर भी यह सोचकर परदा डाला जाता है कि भेद खुलने पर पूरे परिवार की बदनामी होगी। लोग जीना हाराम कर देंगे। कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो पर निगाहें जा अटकीं। एक मासूम बेटी घर की दीवार पर लगी दिवंगत पिता की तस्वीर के सामने खड़ी होकर कहती दिखायी दी,‘‘मम्मी आपको मना करते-करते थक गई कि शराब पीना बंद करो फिर भी आप ने पीनी नहीं छोड़ी। मेरी भी चिंता नहीं की। सबको अकेला छोड़कर चल दिए। आपको क्या पता कि आपके ऐसे चल देने से मुझे कितना दु:ख होता है। सबके पापा हैं। मेरी सभी सहेलियां पापा के साथ रहती हैं उनसे ढेर सारी बातें करती हैं। लेकिन मेरी सुनने वाला कोई नहीं है...’’ इस वीडियो को जिसने भी देखा उसकी आंखें नम हो गईं। जागरुक और संवेदनशील लोगों के दिल-दिमाग पर असर करते इस वीडियो का शराब के अखंड शौकीन पिताओं पर कुछ तो असर पड़े यही हम चाहते हैं...। 

Thursday, June 11, 2026

फोटो गैलरी

 अपने नाम का डंका बजवाना किसे अच्छा नहीं लगता? यह हकीकत दीगर है कि कोई अपराध कार्य कर तो कोई सद्कार्य कर चर्चा में आता है। कुछ लोगों को कुख्याति भी सुख और संतुष्टि देती है। गुजरे जमाने को जाने देते हैं। बात आज की करते हैं। सोशल मीडिया के इस अच्छे-बुरे काल ने क्या गलत और क्या सही के निर्णय को ही असमंजस में डाल दिया है। अब जिसे देखो वही वास्तविक दुनिया में कम और आभासी दुनिया में ज्यादा खोया नज़र आता है। वर्चुअल दुनिया में मिलने वाली तारीफों के समक्ष असल दुनिया के सभी रंग फीके लगते हैं। तभी तो दूर और पास के रिश्तेदारों से तो दुरियां बढ़ ही चुकी हैं। एक ही घर में रहने के बावजूद भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची और उनके बच्चे अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन से चिपके और उलझे दिखायी देते हैं। यहां तक कि खाने की मेज पर भी अधिकांश पारिवारिक सदस्यों की निगाहें फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, रील्स और वीडियों से हटती नहीं। वो जमाना लगभग लुप्त होता जा रहा है, जब किसी मेहमान के आगमन पर घर के बड़े-बुजुर्ग का इशारा पाते ही बच्चे सादर प्रणाम और उनकी चरणवंदना करते थे। अब तो सोशल फोबिया के रोगी बच्चे तब तक अपने कमरों में कैद रहते है जब तक मेहमान रुखसत नहीं हो जाते और मां-बाप भी कुछ नहीं कर पाते। उलटे उन्हें भी पहले की तरह अब मेहमानों का घर आना कम भाता-सुहाता है!

हाल ही किया गया एक गंभीर सर्वे बताता है कि शहर हों या गांव लगभग सभी जगहों पर पंद्रह से बीस प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया की जबरदस्त गिरफ्त में हैं। उन्हें मोबाइल रोगी भी कहा जा सकता है। अधिकांश बच्चे एकांत प्रेमी हो रहे हैं। किसी के सामने नहीं आते। अजनबियों से बात करने की बजाय नजरें चुराते हैं। बातचीत करते-करते उनके घबराने और हकलाने के लक्षण दर्शाते हैं कि वे अंदर से कितने भयभीत हैं। सच तो यह है कि अधिकांश युवा भी असंमजस की जकड़न में हैं। अनजानों से करीबी और उनके लाइक्स और कमेट्ंस पाने के चक्कर में अपने आसपास के लोगों से कटते युवा भी एक-दूसरे से घुलना-मिलना भूलते जा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि आज लगभग हर मोबाइल फोन एक आभासी जुए का अड्डा बन चुका है। पैसों के लिए खेले जाने वाले ऑनलाइन खेलों से तंगी, कलह और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर पैनी नज़र गढ़ाते-गढ़ाते मेरी आंखों के सामने उन बदनसीब पिताओं का गमगीन चेहरा घूमने लगा जिनकी औलादों ने क्रिकेट सट्टे और ऑनलाइन जुए में लाखों-करोड़ों रुपए लुटाकर उन्हें बर्बाद कर दिया है। उनकी अच्छी-खासी चलती दुकानोें, घरों तथा कारखानों पर ताले लग गए या हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने और बेचने की नौबत आ चुकी है। अपने खून-पसीने की कमायी की जमापूंजी लुटने के बाद अब वे किसी को अपना मुंह दिखाने से कतराने लगे हैं, जैसे उन्होंने ही कोई गंभीर अपराध किया हो। ऐसी नालायक संतानों को जन्म देने का अपराध तो उनसे हुआ ही है। यह हम नहीं वो खुद माथा पीटते-पीटते बेहाल होकर कहते हैं। सड़कों, चौराहों, बाग-बगीचों और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर आपकी भी उन युवकों और युवतियों पर नज़र तो पड़ती ही होगी और कुछ पल के लिए विचार भी आता होगा कि यह कैसा बेहुदा तमाशा है? हाथ में स्मार्ट फोन और कानों में ईयर बड्स ठूंसकर चलते लड़के-लड़की को कोई होश नहीं, खबर नहीं कि उनके आसपास क्या हो रहा है। कौन उन्हें कैसे घूर रहा है? उनकी अंगुलियां तो बस फोन स्क्रीन पर अठखेलियां कर रही हैं। भीड़ में जबरन खुद को अकेला करने और दिखाने वाली आज की इस पीढ़ी ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एप्ले और जुलियाना श्रोएडर के शोध के मुताबिक ऐसी आदतें बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं।

 जो लोग अपनों तथा बेगानों के साथ सतत मेलजोल रखते हैं। बाग-बगीचों, बसों, रेलगाड़ियों, होटलों, कॉफी हाऊसों में अजनबियों से भी बातचीत करने की पहल करते हैं, वे खुद को उन लोगों की बनिस्पत अधिक खुश, संतुष्ट और सकारात्मक पाते हैं, जो उस ऑनलाइन दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते, जहां हिंसा, ईर्ष्या, भेदभाव और गुस्सा भरा पड़ा है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक व्यक्ति को धार्मिक नगरी हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी पर अपनी जीवित पत्नी का पिंडदान करते देखा गया। अपनी पत्नी का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने वाले इस पति ने गंगा नदी के बीच में खड़े होकर पहले तो पत्नी की फूलों से सजी तस्वीर पर जी भरकर थूका, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज के अनुसार पिंडदान किया। ध्यान रहे कि हमारे देश में मृतक की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने की परंपरा है। जैसे ही वह पत्नी की तस्वीर को गंगा में बहाकर बाहर निकला तो उसने टकटकी लगाकर देखते स्त्री-पुरुषों को बताया कि उसकी बीवी आपत्तिजनक और भड़काऊ वीडियो बनाने से बाज नहीं आ रही है। मैंने उसे कई बार समझाया लेकिन वह नहीं मानी। इंस्टाग्राम पर उसकी बनाई रील्स देख-देखकर लोगों ने मेरा जीना ही हराम कर दिया है। अब मैं घरवाली का मुंह ही नहीं देखना चाहता। वैसे तो मेरे लिए  वह बहुत पहले मर चुकी थी लेकिन जगजाहिर करना भी तो जरूरी था...

 फेसबुक पर एक लड़की की खूबसूरत और आकर्षक फोटो देखते ही एक युवक उस पर दिलोजान से मर मिटा। दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया। उनमें घंटों चैटिंग होेने लगी। कुछ ही हफ्तों में युवक ने उससे मिलने की ठानी। अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कार चलाते हुए वह लड़की के शहर जा पहुंचा। पहले से निर्धारित कॉफी हाऊस पर दोनों आमने-सामने थे। लड़की को देखते ही युवक के तो होश ही उड़ गए। फेसबुक में देखी जिस लड़की पर पहली नज़र में वह फिदा हुआ था, उससे लड़की का लुक, रंग और हुलिया कतई मेल नहीं खा रहा था। दोनों में कोई बातचीत हो पाती इससे पहले ही युवक ने फौरन कार स्टार्ट की, घुमाई और वापस अपने शहर की ओर चल पड़ा। दरअसल, लड़की ने अपनी फेसबुक पर जो खूबसूरत तस्वीरें डाली थीं, वे जबरदस्त एडिटिंग, फिल्टर, फोटोशॉप और मेकअप के जादू का कमाल थीं। सच तो यह भी है कि सोशल मीडिया फेक प्रोफाइल, कैटफिशिंग, छल, कपट और धोखाधड़ी का मायावी मंच बन चुका है। हों न हों, लेकिन अच्छा और आकर्षक दिखने की चाह सर्वव्यापी है। कुछ लोग उम्रदराज होने के बाद भी बचपन और जवानी की अपनी खूबसूरत तस्वीरों के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उन्हें कहीं विस्मृत न कर दिया जाए यह चिंता भी उन्हें सतत सताती रहती है।

 क्या आपको पता है कि ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशिया के देशों में मृत व्यक्तियों की कब्र पर बड़ी-बड़ी प्रोफाइल फोटो लगाई जाती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे फेसबुक या इंस्टाग्राम में प्रोफाइल पिक होती हैै। सबसे अधिक हैरत भरी सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग अपनी मौत से पहले ही तय कर लेते हैं और रिश्तेदारों को भी निर्देशित कर देते हैं कि उनकी कौन सी मनपसंद फोटो कब्र पर लगानी है। इसके लिए वे नये-नये आकर्षक वस्त्र धारण कर एक से एक मूड...हाव-भाव में पोज देकर किसी सिद्धहस्त फोटोग्राफर से फोटो खिंचवाते हैं। अत्याधिक बीमार और मौत के कगार पर खड़े शख्स से परिवार के सदस्य ही पूछ लेते हैं कि वह अपनी कब्र पर कौन सी फोटो लगवाना पसंद करेगा? अपनी शक्ल-सूरत और नाम को लोगों के दिलों-दिमाग में बसाये रखने के प्रबल आकांक्षी लोग तो अपनी जवानी में ही कई फोटो तैयार करवाकर रख लेते हैं, जिन्हें उनकी कब्र पर लगाया जाता है। इन देशों में कब्र बनवाने पर भी काफी खर्चा किया जाता है। इस सृष्टि से रुखसत हो जाने के बाद भी आन-बान और शान के साथ मृतकों की यादों को संजोए यहां के कब्रिस्तान किसी फोटो गैलरी से कम नहीं लगते, जहां पर मृतक के धनवान परिजन चमकते पत्थर पर नाम, जन्म तथा मृत्यु के साथ फोटो फ्रेम करवाकर लगवाते हैं। कई कब्रों पर तो एलईडी लाइट्स भी लगाई गई हैं, ताकि रात में भी तस्वीर एकदम स्पष्ट दिखायी देती रहे। कुछ रईस परिवार बड़ी स्क्रीन लगवाकर अपनी खुशी दोगुनी कर लेते हैं। पर्यटकों को ये कब्रिस्तान किसी प्रदर्शनी का भी सुखद और मोहक आभास कराते है।

Thursday, June 4, 2026

आदरांजलि

हमारे देश, दुनिया और समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और उसका लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इसकी वास्तविक तस्वीर सिर्फ सजग पत्रकार ही नहीं प्रस्तुत करते। कवियों, शायरों, गज़लकारों को भी अन्याय, असमानता, अराजकता, बेइंसाफी और इंसानियत की हत्या, क्रोधित और आक्रोशित करती है। सच का आईना दिखाने और जागृति लाने का दायित्व जितनी शिद्दत के साथ कुछ साहित्यकार निभा रहे हैं और सतत निभाते आये हैं, इसके लिए उन्हें कई बार दंडित और अपमानित भी होना पड़ा है। कितनी अजीब और चिंतनीय हकीकत है कि आज के वक्त में अगर किसी की कीमत सबसे ज्यादा घटी है तो वह मनुष्य ही है। हर धर्म के संतों, महात्माओं, ज्ञानी-ध्यानियों को अपने-अपने धर्म के संकट में पड़ने की चिंता सता रही है। कुछ कलमकार बार-बार लिखते चले आ रहे हैं कि धर्म को विभाजन का औज़ार बनाना बंद करो। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। इंसान पहले, बाकी सबकुछ बाद में। हमारे समय के सजग शायर राजीव रेड्डी लिखते हैं, 

‘‘गीता हूं कुरआन हूं मैं, 

मुझको पढ़ इंसान हूं मैं।

जिन्दा हूं सच बोलके भी, 

देख के खुद हैरान हूं मैं।’’


‘‘ये सारे शहर में दहशत सी क्यों है,

यकीनन कल कोई त्यौहार होगा।’’

जिस तरह से देश और दुनिया में दहशत का माहौल बन चुका है। कब कोई पीठ पर छूरा मार दे। भाई को अपने भाई पर भरोसा नहीं। राजेश रेड्डी की चिंता निरर्थक तो नहीं। रिश्ते लहुलूहान हैं, 

‘‘मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,

 बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।’’ 

साहित्य, कला और चिंतन से वास्ता रखने वाला शायद ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जिसने हिंदी गज़ल को पठनीय और सारगर्भित तस्वीर के साथ पेश करने वाले गज़लकार दुष्यंत कुमार का नाम नहीं सुना होगा। गज़ल को प्यार मोहब्बत, आशिकी दिवानगी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने वाले दुष्यंत कुमार ने वर्षों पहले जो गज़ल लिखी थी, उसी की कुछ पंक्तियां,

‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, 

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’’

गौरतलब है कि उपरोक्त गज़ल वर्षों पहले लिखी गई थी। इसका शब्द-शब्द आम लोगों के साथ-साथ शासकों तक भी बार-बार पहुंचता रहा, लेकिन आम आदमी की समस्याओं, पीड़ाओं, दुख दर्द तथा चिंताओं का अंत नहीं हो पाया। धनवान और...और धनपति होते चले गए, गरीबों के हाथों में भीख के कटोरे देखे जाने लगे।  गरीबी, अशिक्षा, शोषण और भेदभाव का पहाड़ आकाश तक जा पहुंचा। लेकिन अधिकांश शासक अंधे और बहरे बने रहे। नेताओं की भ्रमित करने वाली नारेबाजी के स्वर और बुलंद होते चले गये। न जाने कितने शासकों, चतुर-चालाक नेताओं ने क्रांतिकारी सोच वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को बिना उनका नाम लिए दोहराया और लोगों को भरमाया।

 यह सच अपनी जगह है दुष्यंत कुमार एवं अन्य नामी गज़लकारों की कुछ गज़लों का मंत्रियों, नेताओं, पत्रकारों तथा संपादकों ने अपनी बात में वजन लाने के लिए जी भरकर इस्तेमाल किया और करते हैं। मंत्री-संत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री तक दुष्यंत कुमार एवं अन्य कुछ शायरों के शेरों के जरिए अपनी बात कहते देखे गये हैं। दरअसल, यह सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि जब शब्दों का अभाव होता है तब जागृति का बिगुल बजाने और क्रांति का आह्वान करने के लिए कालजयी गज़लों और कविताओं को ही अपने भाषणों में सम्मानजनक जगह देनी ही पड़ती है। 

‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, 

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’’

‘‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।’’

 ‘‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’’ 

ऐसे और भी अनेकों शेर हैं जो मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की गज़लों के अनेकों गुलदस्तों में सजे हैं। डॉ. बशीर बद्र का हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। देश और दुनिया को प्यार, मोहब्बत, एकता और भाईचारे का संदेश देने वाले शायर का 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भरा पूरा घर आग के हवाले कर दिया गया तो उन्होंने लिखा था कि, 

‘‘लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में, 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में!’’

इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं, गज़लें और कविताएं हमेशा के लिए राख हो गईं! इस दिल दहलाने वाले अन्याय और जुल्म के बाद उन्हें मेरठ से डर लगने लगा। भोपाल में जैसे-तैसे उन्होंने नया घर बसाया। बशीर बद्र ने देश के बंटवारे को भी बहुत करीब से देखा था। उनके लिखे इस शेर

‘‘दुश्मनी जमकर करो,

लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो

जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’’

को शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरे मन से सुनाया और कहीं न कही चेताया था कि हद से ज्यादा  नीचे मत गिरो। लेकिन न उन्हें अक्ल आई और ना ही उनके बाद के पाकिस्तानी शासकों की सोच बदली। अपने देश को रसातल में ले जाने के बाद भी भारत की बरबादी के सपने देखना नहीं छोड़ते।

आधुनिक उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए बशीर बद्र अपने आशियाने को राख किये जाने के दर्दनाक मंजर को कभी भी भूल नहीं पाए। फिर भी हर मंच पर वो श्रोताओं को आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधे रहने का संदेश देते रहे। लेकिन धर्म को विभाजन का औज़ार बनाने वाले कम नहीं हुए। 

दु:खभरी हकीकत तो यह भी है कि कुछ सत्ताधीश और सरकारें भी भेदभाव के रास्ते पर चलती दिखायी देती हैं। ऐसे-वैसे अपराधियोंको सबक सिखाने के लिए उनके वर्षों पुराने वैध-अवैध घरों को धराशायी करने लगी हैं। पिछले चार-पांच वर्षों से उनमें बुलडोजर के प्रति कुछ ऐसा लगाव और विश्वास जागा है कि उन घरोंं को भी नेस्तनाबूत करने में देरी नहीं की जाती, जो अपराधी के माता-पिता के नाम पर हैं। उनके दादा-परदादा ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया था। मैं अक्सर सोचता हूं कि जो भी अवैध अतिक्रमण हैं, उन पर तब क्यों नहीं बुलडोजर चलाया जाता है, जब उन्हें खड़ा किया जा रहा होता है। उसके अवैध होने की खबर प्रशासन के चेहरों को तो होती ही है, लेकिन रिश्वत लेकर तब तो मुंह बंद कर लिया जाता है। जब कोई संगीन अपराध करता है तभी ही उसके घरों पर हथौड़े चलना शंकित करता है। भेदभाव और बेइंसाफी का भी आभास कराता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि यदि अपने अवैध कब्जों को बचाए रखना हो तो जुर्म करने के बाद भी पकड़ में न आएं। किसी भी तरह से खुद को बचाये और छुपाये रखें। यह भी तो देखने में आता है कि बुलडोजर के तांडव के शिकार कुछ आरोपी कुछ साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्जत बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक सरकारी तानाशाही उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है। खूंखार अपराधियों, हत्यारों, आदतन बलात्कारियों, जगजाहिर आतंकवादियों की अवैध इमारतें, कारखाने और दुकानें गिराये जाने का तो सभी समर्थन करते हैं लेकिन जिनके परिवार का बेटा, भतीजा, भाई  अराजकता करते पकड़ा जाता है, तो उनके परिवार के साथ किसी भी तरह की बेइंसाफी नहीं होनी चाहिए। उन बेकसूरों को बेघर करने के सिलसिले सजग भारतीयों को बहुत आहत करते हैं। करे कोई और भरे कोई का यह चलन कहीं न कहीं बेहद अन्यायकारी तो है ही...। 

Thursday, May 28, 2026

नज़रिया

 जैसे मैंने सुना वैसे आपने भी कभी न कभी अल्ताफ राजा का वर्षों पहले गाया हर दिल को छू लेने वाला दर्दभरा यह गीत अवश्य सुना होगा,...

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी 

सुबह पहली गाड़ी से 

घर को लौट जाओगे!

जब तुम्हें अकेले में 

मेरी याद आएगी 

आंसुओं की बारिश में 

तुम भी भीग जाओगे...’’ इस सदाबहार गीत की रचना की थी गीतकार ज़हीर आलम ने जो एक भावुक और प्रचार तंत्र से दूर रहने वाले इंसान थे। गरीबी में पले-बढ़े ज़हीर आलम नागपुर में जन्मे थे। बचपन से ही गज़लें और कविताएं ज़हीर आलम को आकर्षित करने लगी थीं। पार्श्वगायक और उम्दा कव्वाल अल्ताफ राजा भी नागपुर की पैदाइश हैं। उनके पिता इब्राहिम इकबाल और मां रानीरूप लता दोनों उस दौर के मशहूर कव्वाल थे। छठवें और सातवें दशक में देश में रात-रातभर जागकर कव्वालियां खूब सुनी जाती थीं। जिस तरह से कवि सम्मेलनों में छाये रहने वाले कवियों के लोग दीवाने थे, वैसे ही कुछ कव्वाल देशवासियों के जबरदस्त चहेते थे। दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली का भी तब गजब का जलवा था। तब टीवी और मोबाइल का आगमन हुआ नहीं था इसलिए लोग फिल्मों, कवि सम्मेलनों तथा कव्वाली से मनोरंजन करते थे। दरअसल वो समय दिल को छूने वाले गीतों, कविताओं और शायरी के नाम था। आज भी पुराने फिल्मी गीत जो सुख-सुकून देते हैं, नये गाने उनके करीब कही नहीं ठहरते।

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी...’’ गीत को गाकर अल्ताफ राजा ने जहां अपार धन और नाम कमाया, वहीं ज़हीर आलम को इस कालजयी गीत को लिखने के बदले मात्र तीन हजार रुपए मिले थे। हालांकि उस समय इतने रुपये भी खासी अहमियत रखते थे। महीनेभर तक खून पसीना बहाने पर जिसे हजार-बारह सौ रुपए नसीब होते हों, उसे महज एक गीत के मेहनताने के तौर पर इतने रुपयों का मिलना अचानक लॉटरी के खुलने जैसा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कलम का जादूगर कपड़ा मिल में काम करता था। तब नागपुर में स्थित एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल में हजारों मजदूर काम करते थे। जब कपड़ा मिलों पर ताले लग गए, तब दूसरे मजदूरों की तरह इस गीतकार को भी महीनों भूख, प्यास और आर्थिक तंगी से लड़ते हुए वर्षों झोपड़ीनुमा घर में रहना पड़ा। इसी महीने छियासी वर्ष की उम्र में नागपुर में स्थित मोमिनपुरा में उनकी मौत हो गई। जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया में गूंजी और अखबारों में छपी, तब अधिकांश शहरवासियों को पता चला कि जिस गीत ने असंख्य लोगों को अपना दिवाना बनाते हुए कैसेट्स कंपनियों और गायक को करोड़ों की कमाई करवाई, उसका रचयिता संतरानगरी में गुमनामी और कंगाली में दिन काटते हुए किसी तरह से भूखा-प्यासा जीता रहा। उसने अपने होने की किसी को खबर ही नहीं होने दी और न ही किसी ने उसकी खबर ली। दरअसल, ज़हीर आलम एक खुद्दार किस्म के गीतकार थे। उन्होंने कभी ढिंढ़ोरा नहीं पीटा कि कालजयी गीत ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ उनके दिल-दिमाग की देन है। इसी गाने ने गायक अल्ताफ राजा को घर-घर पहुंचाया। इसमें कोई शक नहीं कि अल्ताफ को रोमांटिक और दर्दभरे गाने गाने में महारत हासिल थी लेकिन इस गीत ने तो जैसे उन्हें जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि आज भी उन्हें उनकी सदाबहार एल्बम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जाना जाता है।

‘‘कोई दीवाना कहता है,

कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को

बस बादल समझता है।

मैं तुझसे दूर कैसा हूं,

तुम मुझसे दूर कैसी है,

ये तेरा दिल समझता है

या मेरा दिल समझता है।’’

बताने की जरूरत है नहीं कि यह किस हस्ती की लिखी पंक्तियां हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह कुमार विश्वास सिर्फ कविताओं और गज़लों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि धार्मिक प्रवचनकर्ता के तौर पर भी उन्होंने खूब धाक जमायी थी। अपनी शाब्दिक कलाकारी से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों की गहराई में जाकर हर वर्ग के भारतीय जनमानस में जो प्रेरक रस घोला है, वह भी यकीनन अद्भुत है।

अपने प्रभावी अंदाज और सुरीली आवाज से सम्मोहित करने वाले कुमार विश्वास ही ऐसे इकलौते गीतकार, गज़लकार हैं, जिनके गीत युवाओं के साथ-साथ उम्रदराजों के मन-मस्तिष्क में भी बसे हैं। जब कुमार देशी-विदेशी मंचों पर गीत-गज़ल सुनाना प्रारंभ करते हैं तो लोग झूम-झूमकर उनके साथ सुर से सुर मिलाते हुए गाने लगते हैं। डॉ. कुमार खासतौर पर प्रेम, श्रृंगार, देशभक्ति और जीवनदर्शन पर आधारित गीत, गज़ल और कविताएं लिखते हैं। श्रोताओं को अथाह देशभक्ति के रंग में रंग देने वाला उनका गीत, ‘हाथ में तिरंगा हो’ तो बार-बार सुना और सुनाया जाता है। अपनी वाकपटुता और ज्ञान के भंडार की बदौलत एकदम अलग और खास मुकाम बनाने वाले कुमार कवि सम्मेलनों और रामकथा के लिए लाखों रुपए की फीस वसूलते हैं। वैसे यह करिश्मा किसी चमत्कार की देन नहीं, अपितु उनके अथक परिश्रम और विविध कलाओं के सार्थक प्रदर्शन का प्रतिफल है। फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर, उद्योगपति और विभिन्न कारोबारी जब कमाते हैं तो अपनी सभी चाहतों को भी पूरा करते हैं। आम जनता और सच्चे साहित्य प्रेमियों के लाड़ले इस कवि ने कभी अपनी कमाई नहीं छिपाई। इस बहुआयामी शख्सियत ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दिल्ली से लगे आधुनिक नगर नोएडा में आलीशान बंगला बनवाया है। इसके दरवाजे भी सभी के लिए खुले रखे हैं। यह विशाल बंगला किसी महानगर में स्थित फाइव स्टार होटल जैसा ही है, जहां पर पांच सितारा कमरे, स्विमिंग पूल, जिम, स्टीम रूम, स्पा सेंटर, थिएटर और सजने-धजने के लिए सैलून से लेकर और भी बहुत सी ज्ञात-अज्ञात सुविधाएं हैं। खास बात यह भी है कि कवि महोदय चांदी के बर्तनों में खाना खाते हैं। महंगी से महंगी कई आधुनिकतम कारों के मालिक कुमार विश्वास के मौज़ मज़े से जीने और रहने की खबर जब पूरी तरह से बाहर आई तो सोशल मीडिया के साथ-साथ उनकी बिरादरी के लोग भी भौचक्के रह गए। उनके अनुसार, प्रेम-कविता और रामकथा कहने वाले प्रवचनकार को तो सरलता, सहजता और मिट्टी से जुड़े होने का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था लेकिन यह तो हर दर्जे का आराम परस्त ढोंगी और मौज़ मजे का गुलाम निकला। दूसरों को भगवान राम की तरह बनवासी और संतोषी होने का पाठ पढ़ाने वाला चार्टर प्लेन की यात्राएं और चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग का मजा लूट रहा है! यह तो उन आस्थावानों के साथ सरासर छल, कपट और धोखा है, जो इसके प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से दौड़े चले आते हैं। जिन्हें गीतकार के चांदी के बर्तनों में खाना खाने पर आपत्ति है, उन्हें पता होना चाहिए कि मुंबई के सबसे पॉश इलाके अल्टामाउंड रोड में स्थित अपने 27 मंजिला घर ‘एंटीलिया’ में रह रहे मुकेश अंबानी तो सोने के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। उन पर ऐतराज की उंगलियां उठाने की किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई है। 

दरअसल, हमारे यहां साहित्यकार, कलाकार होने का मतलब ही है, गरीबी और बदहाली से जूझता टूटता-फूटता आंसू बहाता इंसान। यह धारणा बना ली गई है कि यदि कोई शख्स, कवि, गीतकार और पत्रकार है तो उसका धन से क्या काम? यदि कोई कलाकार धनपति है, तो कहीं न कहीं वह भ्रष्टाचारी और बेइमान ही होगा। ईमानदारी से तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है। यही वजह है कि विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाले अधिकांश लोग गरीब की छवि के कैदी बनकर रहना पसंद करते हैं। भले ही उनकी परवरिश धन की बरसात और सुख-सुविधाओं के बीच हुई हो लेकिन वे यही प्रचारित करते नहीं थकते कि उन्होंने गरीबी, बदहाली और भुखमरी को बहुत करीब से देखा और भोगा है। उनका यह झूठ उन लोगों को बहुत राहत और संतुष्टि प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में खुद कुछ नहीं कर पाए। जहां से चले थे वहीं के होकर रह गए। उन्हें शून्य से उठे लोगों की तरक्की से जलन होती है। यह भी सच है कि नामचीन हस्तियों की गरीबी और बदहाली की काल्पनिक कहानियां न जाने कितनों की बर्बादी का सबब बनती चली आ रही हैं। कई ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जो साहस और परिश्रम की सीढ़ियों पर पैर रख बहुत ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे हवा-हवाई महानुभावों का अनुसरण करना नहीं छोड़ा जो अपने खोखले दिखावटी उसूलों का परचम लहराकर दूसरों की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं। खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले इन आत्ममुग्धों के बाल-बच्चे अशिक्षित, अधनंगे रहकर भूख से तड़पते-कलपते रहते हैं लेकिन यह तथाकथित सिद्धांतवादी होश में आने का नाम ही नहीं लेते।

Thursday, May 21, 2026

देश तो है मोदी के साथ

पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें बढ़ना कोई नई बात नहीं। समय-समय पर विभिन्न कारणों से इनकी कीमतों में इजाफा होता रहता है। दरअसल नई बात तो है कि भारत के कर्मवीर अथक योद्धा प्रधानमंत्री का अपने प्रिय देशवासियों को काफी सोच-समझकर यह अनुरोध करना कि समय की मांग को देखते हुए वे कम अज़ कम एक साल तक सोना न खरीदें। घर में रहकर काम करें, विदेशी यात्राओं में कटौती तथा पेट्रोल-डीजल बचाएं और खाद्य तेल का कम इस्तेमाल करें। प्रधानमंत्री ने जिस दिन पेट्रोल-डीजल बचाने और अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की बात कही तो उसी दिन से कुछ जन्मजात विरोधी तंज मिश्रित राग अलापने लगे कि दूसरों को उपदेश देने वाले नरेंद्र मोदी पहले खुद पेट्रोल-डीजल की बचत करने का साहस दिखाएं तथा विदेश यात्राओं पर विराम लगाएं। उनकी सुरक्षा के लिए बीसियों गाड़ियों का जो काफिला आगे-पीछे चलता है, उसमें भी कमी लाएं तो मानें। चतुर, दूरदर्शी प्रधानमंत्री को ऐसी प्रतिक्रियाओं और तंजों का पूर्वानुमान था। इसलिए उन्होंने तथा उनके सहयोगी मंत्रियों ने न केवल अपने काफिले में जबरदस्त कटौती की, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी खुशी-खुशी अपनाया। सरकारी खर्चों में कटौती करने के उद्देश्य से कुछ मंत्रियों की साइकिल, मेट्रो ट्रेन तथा बस यात्रा के साथ-साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का मोटर साइकिल पर मंत्रालय जाना अधिकांश लोगों को बहुत अच्छा लगा लेकिन कुछ लोगों के द्वारा यह भी कहा गया कि ऐसे नाटक-नौटंकी, ऊपरी दिखावे तो पहले भी बहुत होते रहे हैं। प्रतीकात्मक अनुशासन और हवा-हवाई नियंत्रण के स्थान पर स्थायी त्याग भावना जब तक नहीं बनेगी तब तक आम भारतीय इसे ढकोसला ही मानते रहेंगे। असंख्य सजग भारतीयों ने अपने प्रिय पीएम की अपील का आदर करते हुए पैदल तथा साइकिल पर चलने के अलावा बस, मेट्रो आदि को अपनाकर पेट्रोल बचाने के अभियान को गति दी। विख्यात फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने अपनी फ्लाइट की टिकट रद्द करवाकर वंदे भारत ट्रेन से जयपुर से दिल्ली का सफर किया। उन्होंने यह भी कहा कि, यह कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, लेकिन अगर हम सब अपनी तरफ से छोटी-छोटी कोशिशें शुरू करें तो उसका यकीनन बड़ा असर हो सकता है। आज के समय में जिम्मेदार नागरिक होने का मतलब सिर्फ बातें करना नहीं, बल्कि अपनी आदतों में बदलाव लाना जरूरी है। देश सेवा केवल सरहद पर नहीं होती। कभी-कभी वह हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में भी दिखाई देती है और दिखाई देनी भी चाहिए। 

जो लोग पीएम की विदेश यात्राओं पर उंगली उठाते हैं उन्हें खबर नहीं या फिर अंधे हैं। दरअसल, उनकी सभी विदेश यात्राएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा होती हैं। अभी जिस तरह के चिंताजनक हालात हैं। अमेरिका-ईरान के बीच के युद्ध ने पूरी दुनिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। तब ऐसे में आपसी रिश्ते मजबूत करना, तेल आपूर्ति सुनिश्चित करना और निवेश लाना भी निहायत जरूरी है। अपने देश के भले के लिए दिन-रात भागते-दौड़ते मोदी जी यदि किसी देश की प्रधानमंत्री को मिठास भरी भारतीय टॉफी उपहार में देते हैं तो विरोधियों के तन-बदन में आग लग जाती है और जबान ज़हर उगलने लगती है!

गौरतलब है कि 1965 में लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। तब अहसान फरामोश, धोखेबाज हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अचानक हिंदुस्तान पर हमला कर दिया था। युद्ध और भोजन के संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने समस्त देशवासियों को स्वेच्छा से एक दिन का उपवास रखने की अपील की थी। सजग देशवासियों ने अपने जुझारू कर्मठ और अत्यंत भरोसेमंद प्रधानमंत्री की अपील का अनुपालन करने में किंचित भी देरी नहीं की थी और उपवास रखना प्रारंभ कर दिया था। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री को भी तमाम जागरूक भारतवासी लाल बहादुर की तरह ही दिलोजान से चाहते और मानते हैं। जिस तरह से शास्त्री जी ने कभी भी अपने परिजनों को अपने पद और प्रतिष्ठा का फायदा नहीं पहुंचाया और पूरी ईमानदारी से देश सेवा की, वैसे ही राष्ट्रसेवक नरेंद्र मोदी की शान-बान और आन है। भले ही कुछ लोग उनके हर जनहित कार्य में खोट और कमी निकालते नहीं थकते। लेकिन वे तो आम भारतीयों के मन में बसते हैं। सभी देशप्रेमी न सिर्फ उनकी पूरे मन से सुनते हैं, बल्कि उनकी कहे का अनुसरण करने में भी इसलिए देरी नहीं लगाते, क्योंकि वे निष्कलंक हैं। यह सच्चाई अपनी जगह है कि भले ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ साथी सत्ता का लाभ उठाते हुए देखते ही देखते मालामाल हो गये हैं और उनकी औलादों ने मोटी कमाई वाली कंपनियां खड़ी कर ली हैं, लेकिन मोदी के भाई-बहन और भतीजे उसी स्थिति में है जैसे पहले थे। दरअसल देश तो केवल और केवल मोदी का ही मुरीद है। 

प्रधानमंत्री की मितव्ययिता, संसाधन-संरक्षण और आत्मनिर्भरता की अपील में अंतत: देश का ही हित समाहित है। उन्होंने काफी सोचने विचारने के पश्चात ही अपने देशवासियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराना जरूरी समझा, क्योंकि अधिकांशसोना,पेट्रोल, डीजल हमें आयात करना पड़ता है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है। विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनियाभर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल है। दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। यानी भारत गल्फ से तेल खरीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपये में नहीं, बल्कि डॉलर में ही करना होता है। कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं। भारत जब सामान खरीदता है तो डॉलर से भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है। ज्यादा बेचने पर यकीनन डॉलर हमारे पास आएंगे और खरीदने पर डॉलर ज्यादा खर्च होंगे। जो देश ज्यादा निर्यात करते हैं, तो उनका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहता है और जो आयात ज्यादा करते हैं, उनका विदेश मुद्रा भंडारा खाली-खाली या नाममात्र भरा रहता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था। यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा किया और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की स्थिति निर्मित हुई, जो कि देश हित में नहीं। पेट्रोल, डीजल, सोना तथा विदेश यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को यकीनन बचा सकता है। मोदी जी की अपील के पश्चात अनेकों सजग आम जनों, व्यापारियों और अधिकारियों ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि अगले एक वर्ष तक, केवल बेटी की शादी या किसी विशेष अपरिहार्य पारिवारिक अवसर जैसी परिस्थितियों को छोड़कर वे सोना नहीं खरीदेंगे। सोना-चांदी के व्यापारियों ने भी भले ही लंबे नुकसान का संदेह जताया और लाखों कारीगरों पर बेरोजगारी का खतरा मंडराने की बात कही लेकिन फिर भी उन्होंने देश हित को ही प्राथमिकता दी। धैर्य और सब्र का दामन थामे इन कारोबारियों का कहना है, ‘सोना नहीं तो चांदी बेचेंगे। किसी कर्मचारी-कारीगर की रोज़ी-रोटी नहीं छिनेगी। सालभर की तो बात है। मोदी जी हैं...सब ठीक हो जाएगा।’ तभी तो आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है और जहां चाह हो वहां राह भी निकल ही आती है की कहावत को उन्होंने बखूबी चरितार्थ करने में देरी नहीं की। संतरानगरी नागपुर के प्रमुख ज्वेलर्स ने सोने के बदले चांदी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए सिल्वरोत्सव के जो विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाये उनमें चांदी की पायल, चेन, मूर्तियों पर विशेष छूट की पताका फहराते हुए ग्राहकों से अधिक से अधिक चांदी के जेवर, बर्तन, कंगन, धार्मिक मूर्तियां, शोपीस आदि खरीदने के लिए प्रेरित करना प्रारंभ कर दिया। वैसे भी सोना अब केवल उच्च मध्यम वर्ग और रईस ही कई ज्यादा खरीदते हैं। अमीरों के यहां तो सोने के भंडार भरे पड़े हैं। देशभर में सोने-चांदी और डायमंड के असंख्य आलीशान शोरूम हैं, जहां हजारों लोग काम करते हैं। लाखों कारीगरों की दाल-रोटी इन्हीं पर टिकी है। पहले जहां नये गहने खरीदने के विज्ञापनों की भरमार थी, अब पीएम की अपील के बाद विज्ञापन की शब्दावली कुछ यूं है, ‘‘जब अपना सोना घर में है तो आयातित सोने पर निर्भर क्यों रहें? अपने घर के सोने को नए और आधुनिक डिजाइनों में बदलें और विदेशी सोने पर निर्भरता कम करने में योगदान दें। अपने पुराने सोने को नए गहनों में एक्सचेंज करें और पाएं पहले से भी ज्यादा खास फायदे। आइए, मिलकर जगमगाते हैं अपने सोने का तेज...’’ 

यह भी सौ फिसदी सच है कि बीते कुछ वर्षों में सोने-चांदी की कीमतों में जिस तरह से बेतहाशा इजाफा हुआ है, ठीक वैसे ही मंत्रियों, अधिकारियों, नेताओं तथा तमाम छोटे-बड़े जनप्रतिनिधियों में बेतहाशा अहंकार आया है। अधिकांश जनप्रतिनिधि आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गये हैं। जब जनता के वोटों से निर्वाचित यह धुरंधर पेट्रोल-डीजल की बचत और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए नियमित बस, मेट्रो, साइकिल, मोटर साइकिल पर आना जाना करेंगे तो लोगों से भी मिलेंगे तो इन्हें पता चलेगा कि आम भारतीय कितने कष्ट में हैं। उनकी समस्याओं को कैसे अनसुना किया जा रहा है। जिन्हें गांव, शहर, प्रदेश और देश चलाने के लिए वोट दिए गये हैं वे तो वातानुकूलित कमरों, कारों का मजा लूटते हैं और उन्हें राजा बनाने वाले मेहनतकश तपती गर्मी, बरसात और सर्दी के शिकार होने को विवश हैं। अभी तक असलियत से मुंह चुराते चले आ रहे शासक, प्रशासक सच को जानें और समझें कि भारत के आम नागरिक पर क्या गुजर रही है। उसे सत्ताधीशों की ऐशपरस्ती और नालायकी का खामियाजा बार-बार मरकर भुगतना पड़ रहा है।

नम्बर

कोई जब अपने अथक परिश्रम की बदौलत सफल होता है तो उसकी तारीफ की जाती है। यही हमारे यहां का चलन और दस्तूर रहा है। लेकिन हर बात, चीज़, कर्म और कथन में मीन-मेख निकालने वालों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। इस चक्कर में किसी की उपलब्धियों की तारीफ करना छोड़ उसकी कमी की खोज करने वालों के बारे में क्या कहा जाए और किया जाए? उत्तरप्रदेश के सीतापुर की प्राची निगम ने दसवीं की परीक्षा में जब टॉप किया तो उसे बधाई और शुभकामनाएं देने वाले कम और तानाकशी यानी ट्रोल करने वाले बहुत ज्यादा थे। यह व्यवहार किसी को भी हैरान और आहत कर सकता है। प्राची को भी बहुत ठेस पहुंची। अकेले में बारम्बार रोती रही। उससे मिलने के लिए आनेवाले शुभचिंतकों ने उसे सोशल मीडिया पर आती भद्दी टिप्पणियों को भूलने और पूरी तरह से नजरअंदाज करने को कहा लेकिन तब भी वह ट्रोल करने वालों के दंशों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकी।

यूपी बोर्ड में टॉप टेन में अपनी प्रभावी जगह बनाने वाली प्राची के चेहरे पर लड़कों की तरह जो मूंछ और बाल उग आये वही उसके शत्रु बन गये और सोशल मीडिया के शैतानों को उसे चिढ़ाने और मजाक उड़ाने का मौका मिल गया। प्राची सोचती रह गई कि काश! वह टॉप में नहीं आती। अन्य लाखों छात्र-छात्राओं की तरह साधारण नंबर पाती और अपने आप में मस्त रहती। न्यूज चैनल वालों का रवैया भी उसके प्रति निराशाजनक ही रहा। वे भी उसके चेहरे के बालों पर कैमरे केंद्रित कर उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आए। उनका खोद-खोदकर यह पूछना, गहरे तक आहत करता रहा  ‘‘लड़कों की तरह दाढ़ी, मूंछ में कैसा लगता है? ये कैसे और कब हुआ? मां-बाप ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया! कैसे लापरवाह अभिभावक हैं?’’ प्राची कभी जवाब देती तो कभी चुप्पी साध लेती। ऐसे ही सुलगते सवालों और भेदती निगाहों की भीड़ का सामना करते-करते उसने आगे की पढ़ाई में ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। इस दौरान उसके माता-पिता ने लाखों रुपए खर्च कर कुशल चिकित्सकों से उसके चेहरे का कई बार इलाज करवाया। इससे उसेकाफी हद तक चेहरे के घने बालों से मुक्ति मिल गई। फिर भी पहचान बनी रही। उसने सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूरियां बना लीं। बारहवीं की परीक्षा में प्राची 500 अंकों में 450 अंक प्राप्त कर साधारण विद्यार्थियों में शुमार हो गई। लेकिन इस बार भी ट्रोलर अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आये। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसकी पुरानी फोटो लगाकर उसके पिछड़ने और कम नम्बर पाने का मजाक उड़ाते रहे। किसी ने लिखा, कहां गई अक्लमंदी? लगता है दसवीं की परीक्षा में नकल मारने की जो सुविधा मिली थी, इस बार नहीं मिली। किसी की कमेटंस थी, ‘तुक्का हर बार नहीं चलता।’ कोई यह कहने से नहीं चूका, ऊपरवाले से हाथ-पैर जोड़कर अच्छी शक्ल-सूरत तो मांग लेती। घूर-घूरकर फोटो देखी, लेकिन समझ में ही नहीं आया कि औरत है या आदमी? ऐसे अबूझ पहेली से राम बचाये!’’ वैसे तो बचपन से ही प्राची के चेहरे पर लड़कों जैसे कुछ-कुछ बाल दिखने लगे थे लेकिन नौंवी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते बालों का बढ़ना उसकी परेशानी का सबब बनने लगा। मोहल्ले के लड़कों के साथ-साथ सहपाठी लड़कियों और सहेलियों की निगाहों की चुभन को प्राची तीव्रता से महसूस करने लगी थी। अब तो प्राची में इतनी हिम्मत आ गई है कि कोई भी तंज, कटाक्ष उस पर असरहीन रहता है। उसने फिजूल के सोशल मीडिया से भी हमेशा-हमेशा के लिए किनारा कर लिया है। अब तो वह अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतया समर्पित रहकर अपनी लाइफ इंजॉय कर रही है। 

इतिहास गवाह है कि जो लोग परिश्रम, साहस और अपने लक्ष्य से मुंह नहीं चुराते वही अंतत: इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हुए अपार प्रशंसा और गड़गड़ाती तालियों का मनोहारी उपहार पाते हैं। अपने देश भारत में अनेकों महिलाएं दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा और बर्तन मांजकर अपना घर परिवार चलाती है। अब तो कुछ प्रदेशों की सरकारें भी गरीब परिवार की महिलाओं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए हर माह डेढ़-दो हजार की नगद राशि प्रदान करती हैं। लेकिन इससे इस महंगाई के दौर में यकीनन ज्यादा राहत नहीं मिलती। उनको मिलने वाली राशि को लेकर कुछ सक्षम लोग यह रोना रोते भी दिखते हैं कि सरकार ने मुफ्त में राशि देकर काम करने वाली बाइयों के भाव बढ़ा दिये हैं। एक तो ढंग से काम नहीं करती, उस पर पहले से ज्यादा मेहनताना भी मांगने लगी हैं। पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बर्तन-कपड़े धोकर लगभग चार-पांच हजार रुपए कमाने वाली कलिता मांझी विधायक बन गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें आसाराम सीट से चुनाव लड़वाया और वे अच्छे-खासे वोटों से जीत गईं। और भी कुछ महिलाएं विधायक बनने में सफल रहीं। लेकिन कलिता मांझी यकीनन उनसे अलग हैं। अधिकांश चुनावी योद्धाओं ने जहां चुनाव प्रचार में मतदाताओं को लुभाने के लिए लाखों-लाखों रुपए खर्च किए वहीं कलिता मांझी इस लायक थी ही नहीं कि कुछ हजार रुपये की भी व्यवस्था कर पाती। उसने बिना पैसे के चुनाव लड़ा और चुनाव जीत कर दिखाया। उसके विधानसभा के चुनाव में विजयी होने से आम देशवासियों में यह संदेश तो गया ही है कि यदि छवि निष्कलंक हो। नीयत में कोई खोट न हो तो शुभचिंतक और वोटर भी बढ़-चढ़कर तन-मन और धन से साथ और सहयोग देने में  कोई कमी नहीं छोड़ते। चुनाव जीतने वाले विधायकों ने शपथ ग्रहण के समारोह के लिए हजारों रुपये खर्च कर नये-नये परिधान बनवाये लेकिन कलिता के पास तो ढंग की एकाध साड़ी तक नहीं थी। ऐसे में जिस घर में वह काम करती थीं, उसी के मालिक ने सादगी प्रेमी ईमानदार कलिता मांझी को सुंदर साड़ी उपहार में दी, जिसे पहनकर वह कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। यह भी काबिलेगौर है कि चुनाव जीतने के बाद भी मांझी जब अपने मालिक के यहां काम करने पहुंची तो उनके साथ-साथ पूरे मोहल्ले के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। विधायक बनने के बाद भी अपनी जड़ों को न भूलते हुए उसने सामान्य दिनों की तरह बर्तन और कपड़े धोए और अन्य घरेलू काम भी निपटाए। 

जहां चाह होती है वहां राह न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता। कुछ कर्मवीर पुरातन कहावतों को चरितार्थ करने के लिए ही इस धरा पर आते हैं। दांत के बीच कलम दबाकर लिखने वाले मोहम्मद फैजानउल्ला से आप मिलेंगे तो उसके हौसले को सलाम किये बिना नहीं रह पायेंगे। झारखंड में दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले फैजानउल्ला को जन्म से सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी ने अपने क्रूर शिकंजे में जकड़ लिया था, जिससे वह न तो खुद से हिल-डुल सकता था और न ही उठ-बैठ सकता था। अभी भी वही हालत हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह अच्छा हुआ कि फैजान बोलने-बतियाने लगा। इससे उसके माता-पिता को काफी अच्छा लगा और राहत महसूस हुई कि कम अज़ कम बच्चा बोलता और समझता तो है। इस गंभीर बीमारी की वजह से फैजान का स्कूल जाना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में जितेंद्र कुमार भगत नामक शिक्षक ने फैजान के जीवन में किसी फरिश्ते की तरह प्रवेश किया। दरअसल, जब उन्हें उसके स्कूल नहीं जाने की वजह का पता चला तो वे खुद उसके घर जा पहुंचे। दिव्यांग फैजान का मनोबल और पढ़ने की अत्याधिक इच्छा को देखकर उन्होंने उसके सपने को साकार करने की दिशा में तुरंत काम करना प्रारंभ कर दिया। फैजान लिखना चाहकर भी लिखने में असमर्थ था। शुरू-शुरू में उन्होंने कलम को धागे से बांधकर लिखवाने की कोशिश की लेकिन यह प्रयास पूर्णतया असफल रहा। झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोंडा में विकलांग बच्चों को शिक्षित करने के लिए विशेष शिक्षा विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत जितेंद्र कुमार कुछ दिनों तक अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहे। उन्होंने एक कलम फैजान के मुंह में दांतों के बीच पकड़ाकर लकीर खिंचवाने का कई बार प्रयास किए और अंतत: मेहनत रंग लायी। धीरे-धीरे फैजान लिखने में इतना अधिकसमर्थ हो गया कि दूसरे सामान्य बच्चों और उसकी लिखावट में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। शिक्षक जितेंद्र के कड़े परिश्रम और फैजान के सतत अभ्यास और लगन की बदौलत आठवीं की बोर्ड परीक्षा तथा नौवीं की परीक्षा में खुद लिखकर चौकाने वाली सफलता पाई। इतना ही नहीं वह दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंकों के साथ दिव्यांग कैटेगरी में टॉपर बना है। उसने परीक्षा में राइटर की उपलब्धता के बावजूद ज्यादातर कॉपी खुद ही लिखी।

सबूत

कुछ खबरों को पढ़-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भ्ाुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भ्ाूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाड़ले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भ्ाूख से चीख रहा था। तड़प रहा था। मां ने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भ्ाूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भ्ाूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कोई ऐसा सामान नहीं बचा था, जिसे बेचकर दूध, चावल-दाल का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोड़कर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तड़पन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया और उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे खामोश कर  दिया! 

एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में ‘मां’ है, जो अपनी औलाद को बड़े लाड़-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां के हत्यारिन होने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड़ लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! यदि वह इतनी परेशान थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां को हिरासत में ले लिया। हत्यारी की उम्रदराज मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहती रही कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...। लेकिन कानून की अपनी मर्यादा है। उसका चक्का कानून की किताबों और वकीलों के दांव-पेंच से चलता है। किसी के पास फुर्सत नहीं जो गंभीरता और गहराई से जाने और समझे। असली अपराध और अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भ्ाूख से तड़प-तड़प कर मरने की खबर कभी भी पढ़ने-सुनने में नहीं आती। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ़ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गड्ढा, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पड़ती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकड़ों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।

महाराष्ट्र के एक गांव का एक युवा किसान अपनी चिता सजाकर उस पर जिंदा जल गया। सत्तर हजार रुपये के कर्ज के तले दबे इस किसान ने चिता पर लेटने के बाद जहर पिया। यानी वह किसी भी हालत में जीना नहीं चाहता था। अगर कहीं आग से बच जाता तो विष उसके प्राण ले ही लेता। पुख्ता मौत के लिए जिंदा जल मरने की यह इकलौती घटना नहीं है। ऐसी हृदय विदारक घटनाओं के बारे में जब पढ़ने और सुनने मात्र से कंपकपी छूटने लगती है तो सोचें कि आत्महत्या करने वाले लोगों की कैसी मानसिक स्थिति रहती होगी? खुद की चिता के लिए खुद ही लकड़ियां और केरोसीन का इंतजाम करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं। भौतिकता से सराबोर आधुनिकता के इस अजब-गजब काल में अंधविश्वास, घृणा, अराजकता और व्याभिचार की कोई सीमा नहीं रही। ढाई-तीन साल की  मासूम बेटियां दरिंदों की अंधी हवस का शिकार हो रही हैं। कोई पैंसठ साल का इंसान कैसे ऐसा पाप कर गुजरता है, लाख सोचने पर भी जवाब नहीं मिलता। 

एक रिक्शा चालक की तीन बेटियों की कई दिनों तक खाना नहीं मिलने पर मौत हो गई। वह रिक्शा वाला गरीब था, लेकिन किसी को भूखा देख अपनी दिन भर की कमाई उसकी झोली में डाल देता था, लेकिन उसकी बेटियों पर किसी को रहम नहीं आया। तड़प-तड़प कर तीनों चल बसीं। पिछले दिनों ओडिशा के एक आदिवासी की उस तस्वीर को देश और दुनिया के करोड़ों लोगों ने देखा और शासन और प्रशासन को कोसा। इस गरीब किसान को अपनी मृतक बहन के बैंक में जमा लगभग बीस हजार रुपये निकालने के लिए कई चक्कर काटने पड़े। बैंक वालों ने उसकी दुनिया छोड़ चुकी बहन के मरने का पुख्ता प्रमाण मांगा तो उसने अपने बहन की कब्र खोदी और बहन के कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक वालों के समक्ष पहुंचकर बोला, क्या और भी कोई सबूत चाहिए? 

क्या इंसानी की संवेदनाएं लुप्त होती चली जा रही हैं? कुछ लोग कहते हैं कि इंसान जानवर बनता चला जा रहा है। क्या वाकई यह सच है? अभी हाल ही में दिल्ली के एक ही परिवार के छह सदस्यों ने अंधविश्वास के चक्कर में आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उस परिवार के रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा उनके कुत्ते शामी को गहरे तक आघात पहुंचाया। घटना के बाद शामी की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। वह गुमसुम रहने लगा था और अंतत: घर में ही मृत पाया गया।

Thursday, April 30, 2026

छपे शब्दों की छाप

अपने देश में कभी काफी अखबार और पत्रिकाएं छपती और खूब बिकती थीं। किताबों के प्रति भी पाठकों का अथाह लगाव और जुनून देखते बनता था, लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो चुका है। अखबारों की प्रसार संख्या में भी अकल्पनीय कमी आ चुकी है। कोरोना की महामारी ने जहां कई समाचार पत्रों को बेमौत मारा तो वहीं जो किसी तरह से बचे रह गये उनकी क्या हालत है, उसकी हकीकत अखबार मालिक ही जानते-समझते हैं, लेकिन खुलकर बता नहीं सकते। उस पर सोशल मीडिया ने भी गजब का कहर ढाया है। पुस्तकों के अधिकांश प्रेमी भी सोशल मीडिया के होकर रह गये हैं। एक से एक साहित्यिक पुस्तकें धड़ाधड़ छपती हैं, लेकिन उतनी बिकती नहीं। अधिकांश लेखक अपने रिश्तेदारों, मित्रों, शुभचिंतकों को अपनी किताबें मुफ्त में उपहार स्वरूप देकर खुश हो लेते हैं। भारत देश में अब बहुत कम ऐसे लेखक है, जिनकी कृतियां उन्हें दाम, मान-सम्मान और पाठक उपलब्ध कराती हैं। आज का उजागर सच यह है कि यदि सरकारी और प्रायवेट वाचनालय पुस्तकों की खरीदी बंद कर दें तो अधिकांश प्रकाशक भी अपनी दुकानों का शटर गिराकर किसी दूसरे धंधे में लीन हो जाएं। वैसे कइयों ने तो इस पेशे से सदा-सदा के लिए किनारा भी कर लिया है। जिस काम में मुनाफा नहीं होगा, उसमें कोई समझदार व्यक्ति अपना समय और धन क्यों बर्बाद करेगा? संपूर्ण देश के रेलवे स्टेशनों पर ए.एच.व्हीलर के बुक स्टॉल की शान-शौकत से भले ही आज की पीढ़ी परिचित न हो, लेकिन हमारी पीढ़ी कभी भी नहीं भूल सकती। इन बुक स्टॉल पर हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं और विभिन्न किताबें सहज ही उपलब्ध हो जाती थीं।

‘मुझे वो दिन आज भी याद हैं’ जब मैं तब के मध्यप्रदेश और आज के छत्तीसगढ़ के संस्कारी शहर बिलासपुर में अध्ययनरत था। तब सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय, नीहारिका, दिनमान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं को खरीदने के लिए साइकिल से मीलों का सफर तय करके रेलवे स्टेशन चला जाता था। वहां पर स्थित ए.एच.व्हीलर का बुक स्टॉल वैसी ही संतुष्टि देता था, जैसे किसी आस्थावान भक्त को मंदिर। उस दौर में मात्र बीस-पच्चीस रुपए में पांच-सात पत्रिकाएं और प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, शिवानी, कमलेश्वर, अमृतराय जैसे मनपसंद रचनाकारों की किताबें खरीदकर धन्य हो जाता था। आज से पचास-पचपन वर्ष पूर्व हिंद पॉकेट बुक्स तथा अन्य नामी-गिरामी प्रकाशनों के अच्छे खासे उपन्यास पांच-दस रुपये में मिल जाते थे। सारिका, हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी तब की विख्यात पत्रिकाओं की कीमत भी अधिकतम पांच रुपए के आसपास होती थी। पैसों की कीमत और तंगी के बावजूद भी तब पढ़ने वाले आज की तुलना में कहीं बहुत-बहुत ज्यादा थे। बच्चों के लिए भी एक से एक पत्रिकाएं तथा उपन्यास सजग प्रकाशकों के द्वारा न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध कराये जाते थे, लेकिन अब तो वो दौर सपने जैसा लगता है। नगरों, महानगरों के रेलवे स्टेशनों की शान और शोभा कहलाने वाले ‘ए.एच.व्हीलर’ के बुक स्टॉल भी पाठकों, खरीददारों के अभाव के चलते बंद हो गये हैं। यह कायाकल्प बीते पांच-सात वर्षों में बड़ी तेजी से हुआ है। अब तो रेलवे के उन बुक स्टॉल पर अखबारों, पत्रिकाओं, उपन्यासों की बजाय पेन, कॉपी, बिस्कुट, क्रीम, पाउडर, हल्दीराम के लजीज नमकीन के पैकेट बिकने लगे हैं। मुझे अच्छी तरह से यह भी याद है कि रायपुर में स्थित कॉफी हाऊस में घुसते ही एक बुक स्टॉल हुआ करता था, जहां पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ चर्चित, लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास शीशे की अलमारी में सजे रहते थे। अस्पतालों के आसपास तथा बस अड्डों पर दिखने वाले बुक स्टॉल भी लगभग नदारद हो गये हैं। 

हर वर्ष 23 अप्रैल को दुनिया के अधिकांश देशों में पुस्तक दिवस मनाया जाता है। बीते वर्षों की तरह इस वर्ष भी पुस्तक दिवस मनाते हुए पुस्तकों के अंधकारमय वर्तमान और भविष्य पर चिंता व्यक्त करने के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन और ऑनलाइन कंटेट के आकाश छूते प्रभाव के वशीभूत होकर किताबों के पाठकों में आयी अत्याधिक कमी को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हुए विद्वानों ने लेखों और भाषणों की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पुस्तकों की निरंतर कम होती मांग लेखक, लेखिकाओं की गहन चिंता का विषय रही। संगोष्ठियां आयोजित कर एक स्वर में कहा गया, यदि स्थिति नहीं सुधरी तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। पुस्तकें ज्ञान का सागर होती हैं। अच्छा क्या है, बुरा क्या है, इस सच से रूबरू कराते हुए अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती हैं। दरअसल, सार्थक साहित्य मानवता, सभ्य समाज का वो प्रेरक दस्तावेज है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जागरूक लेखकों की कलम से रचा जाता है। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे, कि जब आपका मन विचलित हो, चिंता ने जकड़ रखा हो या कोई और बड़ा संकट हो तो चुनिंदा प्रेरक किताब पढ़ने लगो। ऐसी हर किताब की अहमियत होती है, जो साथी बन आपके अकेलेपन और निराशा को भगाने के साथ-साथ सोये विवेक और मनोबल को जगाती है। यदि किसी कारणवश आपका गुस्सा शांत होने का नाम न ले रहा हो तो शब्द बर्फ बन क्रोधाग्नि को शांत करने में अकल्पनीय भूमिका निभाते हैं। किसी पुस्तक प्रेमी और महान विचारक का कथन है कि सार्थक किताबों से रूबरू होकर उन्हें शब्द-दर-शब्द पढ़ना जिस अनुभव और ज्ञान के सागर में गोते लगवाता है उसका कोई सानी नहीं। सच तो यह है कि किताबें पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो। इसलिए तो किताबों को इंसानों का सबसे अच्छा मित्र कहा जाता है। हिंदुस्तान के महान कथाकार, उपन्यासकार निर्मल वर्मा कहते हैं, 

‘‘पुस्तकेंमन का शोक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, बल्कि सबकी आंख बचाकर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं। यही पुस्तकें ही हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में हमारी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में साथ देती हैं।’’ किताबों को लेकर विचारक, नाटककार स्वर्गीय सफदर हाशमी के विचार भी काबिलेगौर हैं, 

‘‘किताबे करती हैं बातें

बीते ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की

एक एक पल की।

खुशियों की गमों की

फूलों की, वमों की

जीत की हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे

इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’

कोई भी सार्थक प्रेरक किताब महज कागजों पर लिखे अक्षरों का भंडार नहीं होती, बल्कि प्रतिभावान रचनाकार के देखे और भोगे यथार्थ का सजीव चित्रण होती है। एक अत्यंत विख्यात विदेशी लेखक की पुस्तक जब साहित्य के दुश्मनों ने जलाकर राख कर दी तो उनका बस यही कहना था, कागज भले ही जल जाएं लेकिन शब्द कभी नहीं जलते। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उनका पुनर्जन्म हो जाता है। बुलंदियों पर पहुंचकर लोगों को अचंभित करने वाले कलाकारों, साहित्यकारों, उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि सकारात्मक प्रेरक किताबों से प्रेरित होकर ही उन्होंने यह मुकाम पाया है। कालजयी लेखकों की रचनाएं उनके जीवन का निचोड़ होती हैं। पचासों वर्ष बीत जाने के बाद भी कथाकार, उपन्यासकार, प्रेमचंद पाठकों की पहली पसंद बने हुए हैं। महान विचारक रजनीश यानी ओशो ने कोई किताब नहीं लिखी। उनके शिष्यों, प्रशंसकों और प्रभावितों ने उनके हजारों भाषणों को पुस्तक में संकलित, समाहित कर उन्हें लोकप्रिय लेखक के तौर पर स्थापित करवा दिया। देश के किसी भी शहर में लगने वाले पुस्तक मेलों में आज भी मुंशी प्रेमचंद और ओशो पसंदीदा लेखक के तौर पर छाये रहते हैं। पुस्तक मेलों में पहुंचने वाली भीड़ कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, रविंद्र कालिया, ममता कालिया, अमृता प्रीतम, शिवानी के साथ-साथ नये लेखकों की कृतियों को भी खरीदने में अग्रणी दिखायी देते हुए कहीं न कहीं आश्वस्त करती है कि सोशल मीडिया की आंधी में भी लिखे और छपे हुए शब्दों को पढ़ने, जानने और समझने की दिली चाहत रखने वाले सजग पाठकों की वर्तमान में भी अच्छी-खासी तादाद है। पाठकों की कमी का रोना रोने की बजाय अच्छा साहित्य रचने की जिम्मेदारी तो नये, पुराने लेखकों की भी बनती है। एक प्रश्न लेखकों से यह भी कि वे खुद कितने बेहतर पाठक हैं? अधिकांश लेखक दूसरे लेखकों की नवीनतम कृति उपहार में तो ले लेते हैं, लेकिन उसे पढ़ते नहीं। फिर ऐसे में उनकी किताबें पढ़ी जाएंगी, पढ़ी जाती होंगी इसका अंदाज वे स्वयं लगा सकते हैं। वैसे भी जो अच्छा पाठक नहीं, वो  बेहतर लेखक भी नहीं हो सकता है।

Thursday, April 23, 2026

इस पहल की कभी न टूटे डोर

‘‘इन दिनों उसमें इतनी अकड़ आ गई है, जैसे वह कहीं का कलेक्टर हो गया हो।’’

‘‘तुम तो खुद को कलेक्टर समझने लगे हो। जमीन पर तो तुम्हारे पैर ही नहीं पड़ते। बस हवा में उड़ते रहते हो।’’ जब कोई एकाएक अपना रंग बदल लेता है। कोई-पद-पदवी पाने के पश्चात दूसरों को वह कमतर समझते हुए मिलना-जुलना छोड़ देता है। अकड़ दिखाने लगता है तो शिकायत के तौर पर खट्टे-मीठे अंदाज में अपने मन की बात भड़ास और शिकायत की सुई चुभोने का अपने यहां कुछ ऐसा ही बहुत पुराना चलन है। कलेक्टर कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होते। जिले में सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें सभी मान-सम्मान देते हैं। कलेक्टर बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर जिले का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी बनने का गौरव हासिल होता है। जिले के पूरे प्रशासन को चलाने वाले कलेक्टर महोदय के कंधों पर कानून-व्यवस्था, राजस्व प्रशासन, विभिन्न विकास कार्यों तथा आपदा प्रबधन की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ और भी कई जिम्मेदारियां होती हैं। काम करते-करते कब दिन गुजर जाता है, इसका उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें आम और खास लोगों से भी मिलना-जुलना होता है। उनकी समस्याओं का समाधान भी उनके कर्तव्य का प्रबल हिस्सा होता है।

 कई बार यह भी देखने में आता है कि गरीब, लाचार जुगाड़ विहीन लोग अत्यंत आवश्यक काम होने पर भी कलेक्टर से मिलने से वंचित रह जाते हैं, जबकि टुटपूंजिए नेता, पत्रकार और दलाल किस्म के चेहरे जिले के प्रशासनिक प्रमुख की चापलूसी कर उनके इर्द-गिर्द खड़े और बैठे नजर आते हैं। झारखंड के गोपालगंज के एक आम नागरिक को अपनी खेती से जुड़े साधारण से काम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर पर चक्कर काट कर अपनी कई चप्पलें घिसवानी पड़ीं, लेकिन भ्रष्टाचार, बेइमानी और आराम परस्ती के रंग में रंगे सरकारी तंत्र ने उन्हें निराश कर दिया। उन्हें दु:खी और हताश देखकर किसी शुभचिंतक ने उन्हें कलेक्टर से मिलकर अपनी समस्या से अवगत कराने का सुझाव दिया। वे बड़े बेमन से कलेक्टर महोदय से मिले। उनके आश्चर्य की तब कोई सीमा नहीं रही जब साहब ने अत्यंत सरलता, सहजता और इत्मीनान से उनकी बात सुनी। उनका तुरंत काम भी हो गया। इतना ही नहीं जिलाधीश महोदय ने अधिकारियों से काम में लेटलतीफी और टालने के कारण की सफाई भी मांगी। घर लौटते समय उस उम्रदराज की आंखें खुशी से नम थीं। कलेक्टर से मिलने से पहले उनके मन में तो यह बात गहरे तक घर किये थी कि जब छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी जरूरी काम को करने की फीस मांगते हैं। नहीं देने पर आनाकानी करते हैं तो कलेक्टर तो कलेक्टर हैं। पूरे जिले के मालिक, वो भला कहां आम आदमी की फरियाद सुनने वाले हैं...। इस संपूर्ण चिंताजनक स्थिति-परिस्थिति और पिता की पीड़ा पर स्कूल में पड़ रहे उनके बेटे की पैनी नज़र थी। वह पिता की तकलीफ को लेकर बेहद चिंतित भी था, लेकिन सोचने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकता था। जब पिता की समस्या का समाधान हो गया और उन्हें चिंतामुक्त तथा हंसते मुस्कराते देखकर संवेदनशील, भावुक और सचेत बेटे के मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर गई कि जो कार्य कोई नहीं कर सकते उसे जिलाधिकारी अवश्य कर सकते हैं। ऐसे में तभी उसके मन में जिलाधीश यानी कलेक्टर बनने के सपने ने जन्म लिया। जिसे साकार करने के लिए उसने अपनी पूरी ताकत लगा दी। इस परिश्रमी और जुनूनी बालक का नाम है कुमार आशीर्वाद। आशीर्वाद वर्तमान में नागपुर जिलाधिकारी के पद पर आसीन हैं।

वर्ष 2023 में सोलापुर के जिलाधिकारी के पद को संभालने वाले कुमार आशीर्वाद ने गड़चिरोली में पदस्थ रहने के दौरान दिव्यांग और निराक्षित लोगों को दिव्यांग प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और राशन कार्ड सीधे उनके घर पहुंचाने की पहल की, उसी से उनकी सच्ची और सार्थक जनसेवा की मंशा का पता चल गया। वर्ष 2025 में सोलापुर में जब बाढ़ ने तांडव मचाया था, तब भी दूर खड़े रहकर निर्देश देने की बजाय वे स्वयं चार-पांच दिन तक बाढ़ प्रभावितों के बीच रहे और एक-एक की समस्या को जाना, समझा और त्वरित समाधान कर राहत प्रदान की। उनके योजनाबद्ध तरीके से काम करने, तुरंत सार्थक निर्णय लेने की प्रभावी समझ की प्रेरक योग्यता की तो केंद्र सरकार ने भी बार-बार सराहना की है, वहीं आम लोगों के दिलों में भी सम्मानजनक स्थान बनाते हुए यह भरोसा जगाया है कि वे जब भी चाहें उनसे मिलने के लिए आ सकते हैं। बिना किसी भेदभाव के उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए तत्पर हैं। संतरानगरी नागपुर में पदस्थ होने पर उनके ये शब्द थे, ‘‘उपराजधानी होने के कारण नागपुर में चुनौतियां तो बड़ी होंगी, लेकिन सभी को साथ लेकर समन्वय से काम करने में कोई कसर नहीं छोड़ूंगा।’’ यह सौ फीसदी सच है कि एक दूसरे के साथ और सहयोग के बिना कोई कार्य सफलता का मुंह नहीं देख पाता। बिना किसी भेदभाव के परिश्रम और लगन से काम करने वाले इंसानों को मान-सम्मान मांगना नहीं पड़ता। उनके सुकर्मों की यशगाथा देखते ही देखते दूर-दूर तक पहुंच जाती है। 

हम भारतवासी वादाखिलाफी, रिश्वतखोरी, छल, कपट और तरह के अनाचारों के सतत शिकार होते चले आ रहे हैं। शासन, प्रशासन के हाथों निरंतर छले जाते चले आ रहे देशवासी अब बदलाव चाहते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने अथक परिश्रम और ईमानदारी से अधिकांश भारतीयों में जो सच्चे सेवक की छवि बनाई है वो यकीनन प्रणम्य है। फिर भी हमारा देश वैसा नहीं बन पाया है जैसा यहां की संपूर्ण जनता चाहती है। 

इन दिनों नेपाल के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह के नाम की यश गाथा की पताका पूरी दुनिया में लहरा रही है। उनके द्वारा देश हित में उठाये गये क्रांतिकारी कदमों के समक्ष भारत की युवा पीढ़ी भी नतमस्तक है। पड़ोसी देश नेपाल के 35 वर्षीय युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शपथ लेने के तुरंत बाद सभी प्रायवेट स्कूलों को बंद करवा दिया है। उनका मकसद है कि उद्योगपति, मंत्री, अफसर और अमीर-गरीब परिवारों के सभी बच्चे एक साथ सरकारी स्कूलों में पढ़ें ताकि उन्हें समानता का एहसास हो। वीआईपी संस्कृति के घोर विरोधी बालेन शाह ने मंत्रियों, संत्रियों के वीआईपी काफिले के लिए सड़कों को बंद करने की परपंरा समाप्त कर दिया है। जाति-आधारित राजनीति को त्याग कर सामाजिक न्याय और विकास के लिए पूर्णतया प्रतिबद्ध युवा पीएम शाह ने पिछली सरकारों में हुए भ्रष्टाचारों की जांच की घोषणा कर नेपाल के युवाओं का मन जीत लिया है। वर्ष 2022 में बालेन शाह जब काठमांडु के मेयर थे तब उन्होंने वो कर दिखाया जो अभी तक किसी नेता के बस और नीयत की बात नहीं थी। काठमांडु के बीचों-बीच वर्षों से सिर उठाकर खड़े अवैध शोरूम और भव्य इमारतों पर बुलडोजर चलवा कर पूरे देश को अतिक्रमण मुक्त करने की मंशा प्रकट की थी उससे उनकी जो निष्पक्ष और ईमानदार नेता की छवि बनी उसी ने उन्हें इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान करवाया है। राजनीति में पर्दापण करते-करते बालेन शाह ने ठान लिया था कि उन्हें दूसरे नेताओं जैसा नहीं बनना है। यदि उन्हें मौका मिला तो भेदभाव और अन्याय का खात्मा करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। अपने देश नेपाल को भ्रष्टाचारियों के हाथों लुटते देख उनका खून खौल उठता था और रातों की नींद उड़ जाती थी। वे अक्सर जिस तरह से आम लोगों के बीच पहुंच कर उनका हालचाल और तकलीफों से अवगत होते हुए समाधान करते नजर आते हैं उससे लगता ही नहीं कि वे पीएम हैं। बिल्कुल अपना सा आम चेहरा प्रतीत होते है। अपने देश के प्रधानमंत्री को अपने बीच पाकर आम जनता को बेहद खुशी होती है। बालेन शाह चकाचौंध वाली पार्टियों और आलीशान दावतों से दूर रहकर पहले की तरह  नेपाली सादा खाना यानी दाल, चावल और सब्जी पसंद करते हैं। उनका कहना है कि मुझे नेपाल के बदलाव का जो अवसर मिला है-उसे मैं यूं ही गंवाने का अपराध नहीं कर सकता।

Thursday, April 16, 2026

बस करो...मत करो

धन के लिए, तथाकथित मान-सम्मान, परिवार की इज्ज़त के लिए और भी कितने-कितने अभिमान और झूठी शान के लिए हत्याओं और रिश्तों की बलि चढ़ाने के क्रूर सिलसिले ने मानवता को शर्मसार होने को मजबूर करना प्रारंभ कर दिया है। वो नगर, महानगर जो कभी इंसानियत की मजबूत नींव पर खड़े नज़र आते थे, अब रेत के घरौंदे से बिखरते और ढहते नज़र आने लगे हैं। संतरानगरी नागपुर में सभी उत्सव धूमधाम से मनाये जाने की परिपाटी रही है। दीपावली, दशहरा, ईद, होली, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस आदि को जिस एकता, तन्मयता और आपसी सद्भाव के साथ मनाया जाता है, वह अनुकरणीय और लाजवाब है। राम जन्मोत्सव (रामनवमी) और हनुमान जयंती की भव्य शोभायात्रा में श्रद्धालुओं की जो भीड़ उमड़ती है, वह भी यकीनन देखते बनती है। स्त्री-पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग सभी आस्था और भक्ति के रंग में रंगे नजर आते हैं, लेकिन इस बार की हनुमान जयंती की शोभायात्रा के दौरान एक भोले-भाले किशोर को जिस तरह से मौत के घाट उतारा गया, उसे कम अज़ कम सजग शहरवासी तो कभी नहीं भूल पायेंगे। अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता और खौफ की भावना उनके मन-मस्तिष्क में डटी रहेगी। 14 साल का एक चंचल लड़का घर से शोभायात्रा में शामिल होने के लिए निकला, लेकिन फिर वह घर नहीं लौटा। दो दिन बाद उसकी लाश मिली। जब वह घर से शोभायात्रा में जा रहा था तब उसकी दादी ने उसे रोककर कहा था, ‘‘शोभायात्रा में भीड़ बहुत रहने वाली है, अपना ख्याल रखना, किसी अंजान से बिल्कुल न घुलना-मिलना।’’ अथर्व नामक इस बच्चे का जवाब था, ‘‘दादी अब मैं बड़ा हो गया हूं। आप मेरी बिल्कुल फिक्र न करें। अपने मोहल्ले में तो सभी अपने हैं।’’ दादी और संपूर्ण परिवार भी आश्वस्त था। प्रभु राम जी के भक्त हनुमान के धार्मिक आयोजन में किसी अनहोनी की कल्पना ही बेमानी है। शोभायात्रा में शामिल होने वाले तो सभी धर्म-कर्म की सुभावना से परिपूर्ण होते हैं। अथर्व का पूरा परिवार एक-दूसरे के साथ मेलजोल रखने और प्रभु भक्ति में यकीन रखता है। उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं रही, लेकिन फिर भी दिलदहलाने वाला कांड हो गया। अथर्व के पिता आर्थिक रूप से संपन्न हैं। अथर्व का अपहरण कर लाखों रुपए की फिरौती वसूलने की तैयारी में लगे बदमाशों को तो जैसे मनचाहा मौका ही मिल गया। अथर्व को बेहोश करने के लिए चूहे मारने का स्प्रे शैतानों ने हफ्ते भर पहले ही खरीद लिया था। उन्होंने अथर्व को बेहोश करने के बाद फिरौती का कॉल करके 50 लाख रुपए मांगने का प्लान गहन चिंतन मनन के बाद बनाया जा चुका था। बस्ती के लोग हनुमान जयंती शोभायात्रा में लीन थे, तभी अथर्व को किसी बहाने से अपने पास बुलाकर कार में बिठाया गया। जब कार बिल्कुल सुनसान निर्जन स्थान पर पहुंची तो चतुर अथर्व उनसे सवाल करने लगा। मुझे कहां ले जा रहे हो! चुप कराने के लिए उसके चहरे पर धड़ाधड़ नशीला स्प्रे मारा गया, लेकिन उस पर असर नहीं हुआ। ऐसे में तीनों अपहरणकर्ता घबरा गये और भेद खुलने के भय से उन्होंने दुपट्टे से उसका गला घोट दिया। हड़बड़ी में हत्या करने के बाद उनके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। पचास लाख की फिरौती वसूलने की हिम्मत धरी की धरी रह गई। अब तो लाश को ठिकाने लगाने की चिंता में उनके हाथ-पैर कांपने लगे। दूसरी तरफ अथर्व के लापता होने से घर-परिवार में खलबली मच चुकी थी। रातभर उसकी तलाश होती रही। इस बीच धन लोभी दरिंदों ने अथर्व के हाथ-पैर बांधे और बोरे में लाश भरकर रेलवे क्रासिंग के पुल पर फेंक चलते बने। मुख्य हत्यारे का अथर्व के घर पर आना-जाना था। उसे जानकारी थी कि उसके पिता के पास इफरात पैसा है। पचास लाख रुपए तो चुटकी बजते ही मिल जाएंगे। 

महाराष्ट्र में स्थित यवतमाल जिले के एक गांव में छह वर्ष की नन्ही बच्ची रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। कई घंटे तक जब बेटी घर नहीं लौटी तो घर में कोहराम मच गया। मासूम बिटिया रोज मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने के लिए जाया करती थी। घंटे-आधे घंटे में हंसती-खेलती लौट आती थी। चुस्त-दुरूस्त बेटी का किसी ने अपरहण तो नहीं कर लिया या खेलते-खेलते रास्ता तो नहीं भटक गई जैसी और कई आशंकाओं से ग्रसित माता-पिता ने घंटों उसे चारों तरफ खोजा। रिश्तेदारों से भी पूछताछ की, लेकिन बेटी नहीं मिली। अंतत: थक हार कर पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। मात्र छह साल की बच्ची के एकाएक गायब हो जाने के मामले को बहुत गंभीरता से लेते हुए बच्ची का पता बताने पर 25 हजार रुपयों की घोषणा के साथ अपने तरीके से खोजबीन करते-करते पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुंची कि शिवानी बिटिया कहीं दूर नहीं, आसपास ही है। सतर्क पुलिस जब गांव के एक-एक घर की तलाशी करके पता लगा रही थी तभी शिवानी के घर के बाजू से सटे एक घर के कमरे में एक बोरा पड़ा मिला। बोरे को खोलते ही पुलिस वालों की आंखे फटी की फटी रह गईं। जैसे ही परिवारजनों और ग्रामवासियों को शिवानी का शव मिलने की जानकारी मिली तो सभी गुस्से में आगबबूला हो गये। हत्यारे पड़ोसी ने पुलिसिया पूछताछ में अपराध कबूलने में देरी न करते हुए बताया कि जैसे ही शिवानी की नाक की सोने की नथ पर उसकी नज़र पड़ी तो उसका लालच जाग गया। बच्ची को तरबूज खिलाने का प्रलोभन देकर घर बुलाया और नाक से जबरन नथ निकाल तो ली, लेकिन उसके बाद यह खौफ भी सताने लगा कि वह बाहर जाकर सब बता देगी। उसके माता-पिता और पड़ोसी मार-मार कर उसका हुलिया ही बिगाड़ देंगे। हो सकता है जान ही ले लें। इस डर से उसने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी और शव को बोरे में बंद करके रख दिया। लाश को ठिकाने लगाता इससे पहले ही आसपास के लोग और पुलिस तेजी से सक्रिय हो गई और मेरे पाप का पर्दाफाश हो गया।

 शिवानी की मां का तो रो-रोकर बुरा हाल था। वह खुद को कोसे जा रही थी कि अपनी लाडली बिटिया को यदि वह सोने की नथ न पहनाती तो उसकी ऐसे हत्या तो न कर दी जाती। लालची पड़ोसी मेरी मासूम बिटिया की जान लेने से पहले मुझसे मेरी सारी दौलत भी मांग लेता तो मैं उसे मना नहीं करती। कई-कई बार लिखा और कहा जा चुका है कि बेटियों में पिता की जान बसती है। अपनी पुत्री के लिए जन्मदाता अपना सर्वस्व न्योछावर करने को सदैव तत्पर रहते हैं, लेकिन यह कैसे जन्मदाता हैं? पिता कहलाने के हकदार हैं भी? मुझे यकीन है कि अधिकांश लोगों ने यह खबर नहीं पढ़ी होगी कि राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के आमल्दा गांव के एक पिता ने अपनी बेटी के प्रेम विवाह से असहमत और आहत होकर उसे जीते-जी मृत घोषित कर मर्दानगी का खूब जोरदार डंका पीटा। उसने अपनी बिरादरी को तो प्रसन्न और प्रफुल्लित कर दिया, लेकिन बेटी को जो अथाह पीड़ा दी उसे व्यक्त करने के लिए कलमकार खुद को असमर्थ पाता है। राजनीति के खिलाड़ी पिता ने पहले तो मनपसंद युवक से ब्याह न करने के लिए समझदार व्यस्क बेटी को प्रेम से मनाने-समझाने की कोशिश की। यहां तक कि उसकी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवायी। पुलिस ने प्रेम को अपराध बताते हुए फैसला बदलने का बार-बार दबाव बनाया, लेकिन सच्ची समर्पित प्रेमिका टस से मस नहीं हुई। पितृसत्ता के मद में डूबे अहंकारी नेताजी ने अपने प्रशंसकों, रिश्तेदारों और वोटरों में अपनी धाक जमाने के लिए शोक पत्रिका छपवायी, जिसमें लिखा कि मेरी पुत्री का स्वर्गवास हो गया है। उसकी आत्मा की शांति के लिए अमुक दिन तीए की बैठक और इस तारीख पर मृत्यु भोज का आयोजन किया गया है। यह भी गौर करने वाली हकीकत है कि तीए में गांव के अधिकांश स्त्री-पुरुष, बच्चे शामिल हुए और मृत्यु भोज के दिन भी सभी ने बड़े मज़े से लजीज हलुआ-पूड़ी और तरह-तरह का खाना खाया और जी भरकर तारीफ की। कितनी-कितनी लज्जा की बात है कि भारत में इक्कीसवीं सदी में भी बेटियों को पूरी तरह से अपना मनचाहा जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं है। राजस्थान तो ऐसी तानाशाही में अव्वल लगता है। तभी तो आज भी ऊंची जाति के कई लोग लड़की और लड़के में अंतर करते हैं। जो लड़की घरवालों की मर्जी और पसंद से शादी करे वो अच्छी और जो अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुने वो बुरी और बदचलन। बेटियों के प्रेम विवाह पर बंदिश लगाने वाले ये रूढ़ीवादी लोग बेटों के प्रति बहुत उदार नजर आते हैं। उनका कहना है कि अभी तो लड़कियों पर यह नियम बरकरार है। लड़कों के बारे में बाद में सोचेंगे। लड़कियां घर-परिवार की इज्जत होती हैं।उन्हें ऐसे आजाद नहीं छोड़ा जा सकता। इस क्रूर भेदभाव को लेकर शासन और प्रशासन तमाशबीन बना है। पढ़ी-लिखी महिलाओं के मुंह से भी प्रखर विरोध के स्वर नहीं गूंजने पर शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा ही आता है...।

Thursday, April 9, 2026

अब तो सब जागें...

ईमानदारी से अथक परिश्रम करने वालों को देर-सबेर सफलता मिलती ही है और जमाना भी उनका वंदन-अभिनंदन करता है। संघर्षशील जुनूनी इंसान भले ही कम धनवान हों, लेकिन उनकी दिल से इज्जत की जाती है। यह हकीकत उन लोगों को बहुत देर के बाद समझ में आती है, जो धोखेबाजी, छल, कपट और मुखौटे लगाकर करोड़पति, अरबपति बनते हैं और बड़े अभिमान के साथ मंचों पर शोभायमान होते हैं। लेकिन जब उनकी वास्तविकता सामने आती है, तब उनकी जो थू-थू होती है। उसे बयां करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। महाराष्ट्र में स्थित शिवणी गांव की मालती डोंगरे पुरुषों की शेविंग-कटिंग करती हैं। उनके ज़िस्म चेहरे को छूती हैं। शेविंग क्रीम लगाकर दाढ़ी बनाती हैं और बड़ी कुशलता के साथ बाल काटती हैं। मालती के पति बिस्तर पर हैं। लगभग बारह वर्ष पूर्व की दोपहर जब वे मजदूरी कर घर लौट रहे थे, तभी एक गाड़ी ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी। काफी देर तक सड़क पर घायल अवस्था में पड़े रहे। अधिकांश लोग अनदेखी कर चलते बने। लेकिन एक सजग और सज्जन राहगीर ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। मालती को भी खबर कर दी। मालती के मेहनतकश पति की कंधे की हड्डी और पसलियां इस कदर टूट गईं थी कि वे चलने और काम करने के लायक नहीं रहे। दो बच्चों की मां मालती पर तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कमाऊ पति के बिस्तर पकड़ लेने के पश्चात पहले तो उसने छोटे-मोटे काम किए और किसी तरह से पति के इलाज और घर के खर्चों के लिए धन की प्राप्ति की। लेकिन फिर भी घोर आर्थिक संकट बना रहा। इसी दौरान मालती के मन में विचार आया कि मैंने ब्यूटीशियन का कोर्स तो कर रखा है, ऐसे में क्यों न अपना ब्यूटीपार्लर प्रारंभ कर दूं। चाह ने राह निकाल दी। मालती ने ब्यूटी पार्लर प्रारंभ तो कर दिया, लेकिन गांव में ऐसी बहुत कम महिलाएं थीं, जिन्हें सजने संवरने में अभिरुचि थी। 

पुरुषों के वर्चस्व वाले गांव में अधिकांश महिलाएं घर से बाहर निकलने में भी सकुचाती थीं। ऐसे में ब्यूटीपार्लर को चंद दिनों में बंद करना पड़ा। मालती उस मिट्टी की नहीं बनी हैं जो जीवन के संघर्ष, आंधी तूफान, तेज बरसात से धराशायी हो जाती है। उसने बिना ज्यादा विचार किए ब्यूटी पार्लर को पुरुषों के सैलून में तब्दील कर दिया। इस बदलाव को भी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया। शुरू-शुरू में पुरुषों ने ‘मालती सैलून’ से यह सोचकर दूरी से बनाये रखी कि महिला से कटिंग और शेविंग करवाने पर कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। वह ठीक से उस्तरा और कैंची चला भी पाएगी या नहीं। मालती ने धैर्य को अपना साथी बनाये रखा। धीरे-धीरे पुरुषों का आना और संतुष्ट होकर जाना मालती सैलून को ख्याति दिलाने लगा। ग्राहकों की संख्या में इजाफा होने से अच्छी-खासी कमाई भी होने लगी। दोनों बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और आसानी से पति का समुचित इलाज भी होने लगा। कालांतर में बेटे ने पढ़ाई के साथ-साथ सैलून में अपनी मां का साथ देना प्रारंभ कर दिया। बेटी नीट की तैयारी कर रही है। एक अच्छा सा प्लॉट खरीदकर सर्वसुविधायुक्त अपना घर भी बनवा लिया गया है। 

मालती ने जब पुरुषों के लिए सैलून की शुरुआत की तो जान-पहचान वाले लोगों ने तो तंज कसे ही, रिश्तेदारों ने भी यह कहकर कम परेशान नहीं किया, ‘‘औरत होकर पुरुषों की शेविंग-कटिंग करोगी, उनके साथ सटकर खड़ी हो, उनके चेहरे पर हाथ लगाओगी और भी पता नहीं क्या-क्या होगा। पता नहीं कैसे-कैसे लुच्चे-बदनाम भी औरत के आकर्षण में खिंचे चले आएंगे। ऐसे में खाक तुम्हारी इज्जत रह जाएगी।’’ उन्होंने तो बहिष्कार करते हुए यह साफ-साफ कह दिया था कि भूल से भी किसी को मत बताना कि हमसे तुम्हारी कोई रिश्तेदारी है। हम भी तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए भूल जाएंगे। ऐसे समय में सिर्फ मेरे माता-पिता ही थे जो हमारे साथ खड़े रहे। सैलून खोलने पर पति ने भी कभी ऐतराज प्रकट नहीं किया। उन्हें अपनी पत्नी पर अपार गर्व है। वे कहते है, ‘‘एक्सीडेंट की वजह से मैं तो कुछ भी करने लायक नहीं रह गया था। कमाई बंद हो गई थी। घर चलाना मुश्किल हो गया था। दो छोटे बच्चे थे। मेरी पत्नी ने पूरी जिम्मेदारी अपने अकेले कंधे पर ले ली। बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवा रही है। मेरे इलाज और सेहत का भी पूरा ध्यान रखा है। मुझे गर्व है कि मुझे ऐसी पत्नी मिली।’’ यह कहते-कहते उनकी आंखें भीग-भीग जाती हैं। 

हमारी इसी दुनिया में कई लोग ऐसे हैं। जिनका अपना कोई नहीं होता। लावारिस कहे जाने वाले इन लोगों को मरने पर भी दूर-दूर तक कंधा देने वाले नहीं होते। कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं, जिन्हें उनके अपने ही सदा-सदा के लिए भूला देते हैं। कितनी अच्छी बात है कि हमारी इसी दुनिया में ही ऐसे लोग हैं जिन्होंने लावारिस शवों के अंतिम संस्कार करने की कर्तव्य की तरह जिम्मेदारी ले रखी है। उन्हें न तो प्रचार की चाह है और न ही पुरस्कार-सम्मान की लालच है। पंजाब के शहर लुधियाना में रहने वाले गुलशन कई वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाते चले आ रहे हैं। उन्हें यह देखकर बहुत पीड़ा होती थी कि सड़क किनारे या अस्पतालों में शव पड़े रहते थे और उनको लेने कोई नहीं आता था। तभी एक दिन उन्होंने ठान लिया कि जब तक जिन्दा हूं किसी भी शव को लावारिस नहीं छोेडूंगा। गुलशन अभी तक पांच सौ लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके  हैं। ‘फक्कड़ बंधु’ भी पिछले 33 साल से जिनका कोई नहीं उनका अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। वर्षों पूर्व कानपुर के बंटी अपने गुमशुदा पिता को ढूंढ़ते हुए लुधियाना पहुंचे तो पिता तो नहीं मिले, लेकिन यहां उनकी मुलाकात जोगेंद्र फक्कड़ से हो गई। जोगेंद्र रेलवे की पटरियों से क्षत-विक्षत शव उठाते थे। दोनों में मेल-मुलाकात होती रही। एक दिन दोनों ने देखा कि पटरियों पर किसी ने खुदकुशी कर ली है। दोनों यह देखकर स्तब्ध रह गए कि आत्महत्या करने वाले के कुछ परिजन भी वहां खड़े थे लेकिन कोई भी टुकड़े-टुकड़े हुए शव को उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। दोनों ने क्षत-विक्षत शव को एकत्रित कर सिविल अस्पताल पहुंचाया। उस दिन से दोनों ने ऐसे शवों को अस्पताल पहुंचाने तथा अंतिम संस्कार करने को अपने जीवन का मकसद बना लिया है। शहरवासियों के बीच ‘फक्कड़ बंधु’ के तौर पर जाने जानेवाले दोनों मित्रों के बारे में आपके क्या विचार हैं? कई लोगों की निगाह में ये छोटे-मोटे इंसान हैं, जिनकी कोई कीमत नहीं होती। लेकिन सच तो यह है कि ऐसे परोपकारी जब दुनिया से जाते है तो उन्हें जाने, खोने और पाने का कोई मलाल नहीं रहता। खाली जेब, फक्कड़ की तरह जीते रहे, यही संतुष्टि हर चिंता से मुक्त कर देती है। जब कुछ भले लोगों के बीच इस परोपकारियों का जिक्र आता है तो तारीफ ही होती है। हमारे आसपास और दूर कई चेहरे ऐसे हैं जो मेहनत करने की बजाय धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और नकाबपोशी में यकीन रखते हैं। अधिकांश लोग भी उनकी ढोंगी, कपटी, असलियत जानने-समझने के बावजूद खामोशी की चादर ओड़े रहते हैं। शहर और देशवासियों की आंखों में धूल झोंक कर मंचों पर आसीन होने, मान-सम्मान पाने और करोड़ों में खेलने वालों का जब भंडाफोड़ होता है तो आम भारतीय कितने आहत होते हैं इसकी कभी खोज-खबर नहीं ली जाती। इन पंंक्तियों के लिखे जाने के दौरान देशभर के अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर जैसे ही मेैंने यह खबर पड़ी और सुनी तो मैं बस सोचता रह गया कि क्या इंसान इतना भी गिर सकता है? वो भी पैसे के लिए! पूरी दुनिया में भारत की योग विद्या का डंका बज रहा है। अत्यंत उमंगो-तरंगों तथा गर्व के साथ विश्व योग दिवस मनाया जाता है। नई शिक्षा नीति में योग शिक्षा लगभग अनिवार्य है। पश्चिम के देश भी योग में भारत का लोहा मान रहे हैं। दूसरी ओर पुलिस ने गुजरात के सूरत में ऐसे योगाश्रम का भंडाफोड़ किया है जहां नकली नोटों की फैक्ट्री चल रही थी। इस आश्रम का कर्ताधर्ता आलीशान जीवन जीते हुए महंगी कारों में चलता था। ‘गुरुजी’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस ढोंगी, कपटी, नकाबपोश के 15 फीट ऊंची दीवार वाले आश्रम के भीतर झांकना नामुमकिन है। आश्रम आध्यात्मिक केंद्र से अधिक किसी शाही महल की तरह लगता है। जहां प्रवेश करते ही एक तरफ गौशाला है तो दूसरी तरफ घोड़ों की अस्तबल भी है। कई आलीशान कारें खड़ी हैं। भव्य महंगे सुसज्जित कार्यालय में आरोपी प्रदीप जोटांगिया नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का संचालन कर देश के साथ गद्दारी कर रहा था। योगाभ्यास के लिए आने वाले लोगों की नजरों से दूर, करोड़ों रुपए के नकली नोटों के काले कारोबार का यही से संचालन होता था। आश्रम में बड़े-बड़े तहखाने होने का भी पता चला है। यहीं पर जाली नोट छापने वाली मशीने और अवैध सामग्री रखी जाती थी। योग गुरु प्रदीप अपने हर प्रवचन में कहता था, ईमानदारी इंसान की सबसे बड़ी पूंजी है। सच्चे रास्ते से चलो फल जरूर मिलेगा। धन लोभ इंसान को अंधा बना देता है। किसी को धोखा देना खुद को धोखा देना है। ऐसे मायावी बोलवचन उन तमाम भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, अफसरों, पत्रकारों और वरिष्ठ संपादकों की जुबान से भी अक्सर निकलते और छलकते रहते है, जो हैं तो हर दर्जे के धूर्त और बेईमान लेकिन ईमानदारी का मुखौटा ओड़े हुए हैं। इनका भी आज नहीं तो कल पूरा पर्दाफाश तो होना ही है...।

Thursday, April 2, 2026

धार्मिक अनुष्ठान!

मायानगरी मुंबई में रेतीले समंदर के निकट एक व्यक्ति ने अनोखा कारोबार प्रारंभ किया है। वह लोगों की समस्याओं का समाधान करने का दावा करता है। लोगों को भी उस पर भरोसा है। तभी तो खिंचे चले आते हैं। इसके लिए उसने बाकायदा एक बोर्ड लगा रखा है, जिसमें विभिन्न इंसानी तकलीफों, जरूरतों और मुश्किलों के शाब्दिक और भावनात्मक समाधान की कीमत लिखी हुई है। साधारण परेशानी सुनने के लिए मात्र ढाई सौ, बड़े संकट को जानने के लिए पांच सौ तो साथ मिल-बैठकर सुनने-सुनाने तथा रोने-गाने के लिए वह एक हजार रुपए की दक्षिणा लेता है। उसके पास कई स्त्री-पुरुष अपना दुखड़ा सुनाने के लिए आते हैं। वह डिप्रेशन, प्यार में धोखा खाये, जुए-सट्टे में बर्बाद हुए निराश, हताश और अकेलेपन के शिकार लोगों की खासतौर पर मदद करने का दावा करता है। भावनात्मक रूप से टूट चुके लोगों के साथ-साथ नौकरी, कामधंधे की तलाश में भटकते लोगों की परेशानी को वह बहुत ध्यान से सुनता है और सफल होने का रास्ता भी बताता है। वह बड़े इत्मीनान से सभी की सुनता है। कोई जल्दीबाजी और पाने-छुपाने की भावना उसमें नज़र नहीं आती। गरीबों के साथ-साथ अमीर भी उसके आकर्षण से बच नहीं पाते। माथे पर टीका लगाकर बैठे इस शख्स के विभिन्न वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। इस अनोखे ज्ञानवान के वीडियो पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। बहुतों ने लिखा है कि लोगों के पास समस्याएं बहुत हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। इसलिए यह धंधा कभी मंदा नहीं पड़ेगा। गरीबों के लिए तो ठीक है, लेकिन रईसों के लिए उसे रेट और ऊंचे रखने चाहिए, क्योंकि उन्हें दिन-रात अथाह जोड़-तोड़, चिंता, परेशानी और दगाबाजी से जूझना, टूटना पड़ रहा है। 

यह कोई नया खेल-करिश्मा नहीं। भारत में सदियों से ऐसे दिमाग वाले अपना चमत्कार दिखाते चले आ रहे हैं। कभी फकीर, कभी साधु, कभी ज्योतिषी, चोर तो कभी सिपाही और पता नहीं क्या-क्या बनकर ठगने और लूटने का गोरखधंधा भी चलता चला आ रहा है। आसाराम, राम-रहीम जैसे अनेकों धूर्त और मक्कार पकड़ में तो आते हैं, लेकिन फिर भी लोगों के दिमाग के दरवाजे खुल नहीं पाते। यदि ऐसा नहीं होता तो जेलों में सड़ रहे शैतान बाबाओं की तर्ज पर नये कपटियों का पैर जमाना संभव ही नहीं हो पाता। धर्म-कर्म और ज्योतिष के उपजाऊ बाजार में अशोक खरात के नाम के नये कपटी की गूंज की खबरों ने हर किसी को चौकाया। पुलिस के शिकंजे में फड़फड़ाते इस कपटी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि दूसरों की हस्त रेखाएं देखते-देखते उसके इतने बुरे दिन आ धमकेंगे कि मुंह छिपाना पड़ जाएगा। लेकिन पाप का घड़ा जब भरता है तो कोई कहां बच पाता है। स्वयं को महान भविष्यवक्ता चमत्कारी-बाबा बताकर असंख्य लोगों की आंखों में धूल झोंकने वाले अशोक खरात उर्फ कैप्टन ने तो अपने चमत्कारों की फर्जी कहानियां प्रचारित करने के लिए ग्रंथनुमा किताबें तक प्रकाशित कर लाखों की तादाद में पूरे महाराष्ट्र में बंटवा दी थीं। इन किताबों के लेखक नामकरण आवारेे का कहना है कि उसे जो बताया गया उसने वही लिखा। उसे तो बस अपनी मोटी फीस से मतलब था। वर्ष 2012 में उससे पहली किताब लिखवायी गई। इस आकर्षक किताब में ‘सिद्ध पुरुष के सानिध्य में’ शीर्षक के तहत खरात की कथित सिद्ध शक्तियों के अनेकों उदाहरण देते हुए उसे दिव्य पुरुष घोषित किया गया। इसके प्रकाशन और मुफ्त वितरण के पश्चात कई नये-नये लोगों को पता चला कि देश की धरती पर एक महान ‘दिव्य पुरुष’ का जन्म हो चुका है। जिसके चरणों में नतमस्तक होने पर हर कष्ट का अंत होना संभव है। आजकल गरीबों से ज्यादा अमीरों को अपना भविष्य जानने की चाहत तड़पाती है। नेताओं और अफसरों को ऐसे ज्ञानियों की तलाश रहती है। खरात ने ऐसे लोगों तक खास तौर पर अपनी पहुंच बनाई और फिर उसकी लाटरी ही खुलती चली गई। देखते ही देखते अंधभक्तों के तेजी से बढ़ते चले जाने से खरात कीं छाती तो चौड़ी होनी ही थी। एक समय ऐसा भी आया जब उसके तिलस्मी दरबार में केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, आईएएस अफसर तथा उद्योगपति भी अपना भविष्य जानने और सुधारने की लालसा के साथ पहुंचने लगे। वह विधायकों, सांसदों को उनके मंत्री बनने के दिन तक की घोषणा करने के साथ-साथ कुर्सी पाने के उपाय बताने लगा। कभी-कभी तुक्का भी चल जाता है। इस मामले में खरात खुशकिस्मत रहा और धन की अंधाधुंध बरसात होने लगी। कुछ ही वर्षों में उसने लगभग 1500 करोड़ की संपत्ति जुटा ली। सत्ता, प्रशासन और उद्योग जगत के नामी-गिरामी चेहरों की देखादेखी आम लोगों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो गया। हैरत और मजे से लबालब हकीकत यह भी रही कि नेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों तथा किस्म-किस्म के रईसों की माताएं, बहनें और पत्नियों के साथ-साथ अनेकों पुलिस वाले भी उसकी चौखट पर अपनी बारी आने के इंतजार में खड़े देखे जाने लगे। अपनी तरक्की के अलावा फलाना केस कब और कैसे सुलझेगा, छिपा और भागा हुआ बलात्कारी, हत्यारा, चोर-लुटेरा, भ्रष्टाचारी कैसे पकड़ में आयेगा यह जानने के लिए खाकी वर्दी, सफेद खादी के साथ सिर झुकाये जब नज़र आने लगी तो खरात ने खुद को धरती का सर्वशक्तिमान... भगवान समझ लिया। ऊंचे लोगों को अपने जाल में फंसा कर नाम के साथ दाम कमाते धूर्त ने ऊंचे घरानों की बहू-बेटियों को भी अपने मायावी जाल में फंसाते हुए वासना का नंगा नाच प्रारंभ कर दिया। शैतान, बलात्कारी की धूर्तता और दुष्टता शायद ही इतनी शीघ्र उजागर हो पाती यदि दुष्कर्म की शिकार एक महिला पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज न करवाती। उसकी साहसी पहल के पश्चात अपनी अस्मत लुटवा चुकी और भी कई महिलाएं शिकायतों के पुलिंदे के साथ थाने पहुंचने लगीं, तो धमाके पर धमाका और निर्लज्ज देहभोगी बेनकाब होता चला गया। धर्म अंधभक्ति और आस्था के बाजार के इस शातिर खिलाड़ी ने कुछ ऐसा जादू चलाया, जिसके चलते महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर इसके पैर धोने के साथ-साथ वो सब भी कर गुजरीं, जो अत्यंत शर्मनाक है। जब ऐसे खास चेहरे अंधी वासना का खिलौना बनते हैं तो  दूसरों की झिझक भी जाती रहती है। अपनी महिला भक्तों के भरोसे का कत्ल या रजामंदी से उसने कितनी महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाया इसका संपूर्ण आंकड़ा तो सामने आना संभव नहीं। लुटी-पिटी सभी नारियां मुंह खोलने का साहस नहीं दिखातीं। जो पहली पीड़िता सामने आयी उसने बताया कि अपने परिवार के बिगड़ते हालात की वजह से वह भविष्य के बारे में जानने के लिए उसके पास पहुंची थी। उसे उम्मीद थी तकलीफों से छुटकारा पाने का कोई सार्थक उपाय बाबा के दरबार में अवश्य मिलेगा। एक दिन खरात ने उसे अपने करीब बिठाकर पानी पिलाया, जिसे पीते ही वह बेहोश हो गई। होश में आने पर पता चला कि उसकी आबरू पर डाका डाला जा चुका है। इस दौरान उसकी तस्वीरें भी उतार ली गई थीं। इसके बाद तो देहभोगी ने ब्लैकमेलिंग करने का ऐसा सिलसिला चलाया कि वह बार-बार यौन शोषण का शिकार होने को विवश होती रही। महाराष्ट्र के नाशिक का यह हाई-प्रोफाइल अय्याश शैतान, आस्थावान नारियों को अपने बस में करने के लिए जो पानी पिलाता, उसमें वासना को भड़काने के लिए वियाग्रा सहित कई नशीली दवाएं मिलाता था। जब भक्तिन पर नशे का तीव्र असर हो जाता था तब वह ‘भगवान से दिव्य मिलन’ के नाम पर अपनी देह की भूख शांत करता था। पुलिस के शिकंजे में बुरी तरह फंसने के बाद उसने निर्लज्जता से खुद को सही ठहराते हुए कहा कि, मैंने किसी महिला के साथ गलत नहीं किया। मैंने जो भी किया वो तो धार्मिक अनुष्ठान का एक हिस्सा था। ये शातिर दुराचारी भले ही खुद ज्यादा शिक्षित नहीं है, लेकिन फिर भी उच्च शिक्षित औरतों को लुभावने शब्दजाल में आसानी से फांस लेता था। वह उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहता था कि, तुम तो अपने पति की तुलना में बेइंतहा आकर्षक और खूबसूरत हो। वो तुम्हारी योग्यता की कद्र नहीं करता। तुम तो किसी राजा की रानी बनने के लायक हो। मेरे साम्राज्य और मेरे पहलू में तुम्हारा तहे-दिल से स्वागत है। उसे उन नारियों को भी खूब निशाना बनाना आता था, जो शारीरिक अतृप्ति, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट से गुजर रही होती थीं। यदि उसकी मनचाही खूबसूरत नारी शरीर सौंपने में आनाकानी करती तो वह उसे दैवी प्रकोप का भय दिखाते हुए धमकाने से भी बाज नहीं आता था कि उसकी अलौकिक शक्तियां से उसके संपूर्ण परिवार का सत्यानाश हो जाएगा। भयभीत करके रख देने वाला उसका मानसिक दबाव कई औरतों को आत्मसमर्पण करने को विवश करता चला गया। उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि यह सोशल मीडिया का जंगी दौर है। पलक झपकते ही बदनामी की काली पताका उनका सत्यानाश करके रख देगी। हुआ भी यही। अनेकों महिलाओं के साथ उसके अश्लील वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर छा गए। सोशल मीडिया के धुरंधरों को ऐसे सेक्स स्कैडलों का बेसब्री से इंतजार रहता है। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बड़ी कू्ररता के साथ महिलाओं के चेहरे-मोहरे उजागर कर वे उनके वर्तमान और भविष्य का कबाड़ा कर रहे हैं। आस्था या मजबूरी के चलते बिस्तर की चादर बनने से पहले नारी को भी सौ बार सोचना चाहिए। कलमकार यह सोच-सोच कर भयभीत और चिंतित है कि शिकारी के हाथों लुटी महिलाएं अपने आसपास के लोगों तथा रिश्तेदारों को कैसे अपना मुंह दिखायेंगी। इन अति उत्साही भक्तिनों के बच्चे, माता-पिता और पति परमेश्वर समाज के निशाने और ताने सुनने को विवश होकर रह जाएंगे। बहुतों को पता ही नहीं होगा कि बीते वर्ष दिल्ली के एक विख्यात स्कूल की छात्रा का एक अश्लील अमर्यादित वीडियो वायरल हुआ था। बच्ची के पिता ने बेइंतहा बदनामी और शर्मिंदगी के चलते आत्महत्या कर ली थी...।

Wednesday, March 25, 2026

समाधान

यह खबर कितनी चौकाने वाली है कि भारत के कई बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हैं। उन्हें पाठयपुस्तकों के साथ-साथ पालकों के दबाव और आकांक्षाओं से जूझना पड़ रहा है। अधिकांश अभिभावक सख्त अनुशासन की डोर में बांधे रख किसी भी तरह से उन्हें डिग्रीधारक होते देखना चाहते हैं। उनके मन में यह यकीन घर कर चुका है कि कोई भी छोटी-बड़ी डिग्री उन्हें नौकरी तो दिला ही देगी। कई बच्चे बनना कुछ चाहते हैं और उनके माता-पिता की चाहत और होती है। ऐसे में उनके बीच जो कहा-सुनी और टकराव होता है, उससे वो भारतीय खूब वाकिफ हैं, जिन्हें अपनी सख्ती और जिद की वजह से औलाद से दूर होना पड़ता है। बहुतेरे मां-बाप ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, सख्ती से पालना चाहिए। दरअसल, अपने यहां बच्चों का समुचित मार्गदर्शन करने की बजाय इधर-उधर के उदाहरणों को पेश कर नीचा दिखाने की अत्यंत पुरातन परिपाटी है। किसी रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी के बेटे-बेटी की सफलता की कहानियां मन में बसाये अभिभावक अपनी संतानों को किसी से कमतर नहीं देखना चाहते। कई भारतीयों को ज्ञात ही नहीं होगा कि विश्व में एक देश ऐसा भी हैं, जहां के बच्चे पालकों की ऐसी-वैसी विभिन्न बंदिशों से आजाद है। इस देश का नाम है नीदरलैंड। नीदरलैंड को कभी हॉलेंड के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक अत्यंत समृद्ध और विकसित देश नीदरलैंड दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और कृषि उत्पाद निर्यातक देश है। यहां की अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि, भोजन प्रसंस्करण और पेट्रोकेमिकल पर आधारित है। यहां की आधिकारिक भाषा ‘डच’ है। यहां के लोग दुनिया में सबसे लंबे माने जाते हैं। खुले विचारों वाली सोच और नीतियों के लिए जाने जानेवाले नीदरलैंड को विश्व के सबसे खुशहाल और सुरक्षित देशों में गिना जाता है। इस देश में अपनी संतानों को बचपन से ही प्यार और सुरक्षा का अहसास कराया जाता है। यहां पर दस साल की उम्र तक बच्चों को स्कूलों में कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। वहां के लोगों की धारणा है कि एक तनावग्रस्त बच्चा कभी भी बेहतर नागरिक नहीं बन सकता। जहां के बच्चे खुश नहीं वहां के वयस्क भी खुशहाल नहीं हो सकते। दरअसल, नीदरलैंड में सफलता के मायने हैं एक सुनियोजित और चिंतामुक्त जीवन जीना। जहां विश्व के अधिकांश देशों में यह माना जाता है कि किसी भी तरह से कामयाबी हासिल करो, लेकिन नीदरलैंड के बड़े-बुजुर्ग तथा माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चा खुश और संतुष्ट रहेगा तो कामयाबी खुद-ब-खुद उसके कदम चूमेगी। एक प्रसन्न, तनावमुक्त बच्चा ही खुद को बेहतर समझ पाता है। वह अंदर से मोटिवेटेड रहता है और समाज से जुड़ना सीखता है। उसके लिए सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे ओहदे तक पहुंचना नहीं, बल्कि एक आजाद और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बनना है। डच समाज कहने में नहीं करने में यकीन रखता है। उन्हें भौतिक सुखों के लिए आड़े-टेढ़े रास्तों में भटकना और हवा में उड़ना कतई पसंद नहीं। 

डच समाज में रिश्तों को निभाने की गजब की कला समाहित है। वहां पर परंपरा के तौर पर ‘पापा डे’ को निभाने का चलन है। इस दिन सभी पापा खास तौर पर बच्चों के साथ भरपूर समय बिताने तथा उनका हालचाल जानने के लिए छुट्टी लेते हैं। उनकी समस्याओं को गौर से सुनते हुए समाधान से अवगत कराते हैं। इससे बच्चों को सही और गलत का पता तो चलता ही है, निर्णय लेने की क्षमता और मनोबल में वृद्धि होती है। अभिभावकों की प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि वहां के बच्चे ब्रांडेड कपड़ों या महंगे खिलौने की लालसा करने की बजाय साइकिल चलाने और मिट्टी में खेलने का आनंद लेकर प्रफुल्लित हैं। नीदरलैंड की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चों को खुद साइकिल चलाकर स्कूल जाते देखना दूसरे देशों से पहुंचने वाले पर्यटकों को भी आनंदित करता है। इस अनोखे देश में भारत की तरह बच्चों की निगरानी और टोका-टोकी की कोई जगह नहीं। बच्चों के गिरने पर खुद संभलने की सोच में यकीन रखने वाले माता-पिता का मानना है कि यही भावनात्मक आजादी उनके बच्चों को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है।

धनवानों की सोच और उनके जीवन जीने के तौर-तरीकों के बारे में सभी की लगभग एक जैसी धारणा है। अधिकतर धनपति खुद तो दुनियाभर की सुख-सुविधाओं के भोगी होते ही हैं, अपनी संतानों को भी सुविधाभोगी और आरामपरस्त बना देते हैं। उनका मानना होता है कि हमने धन कमाया ही अपने बाल-बच्चों के लिए है तो ऐसे में उन्हें कोई तकलीफ क्यों होने दें। अपनी संतान के लिए किसी भी तरह की कोई कमी न होने देनेवाले रईसों को तो आपने भी जरूर देखा होगा, लेकिन शेख खलफअल हब्तूर जैसे खरबपति शायद ही देखे और सुने होंगे, जिन्होंने कॉलेज से अच्छी-खासी पढ़ाई और डिग्री लेने वाले अपने इकलौते बेटे को अपने हजारों करोड़ के व्यावसायिक साम्राज्य की गद्दी पर तुरंत विराजमान कराने की बजाय होटलों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा लगाने और वेटर के तौर पर काम करने का जमीनी अनुभव लेने के लिए कई महीने तक खुद से दूर रखा। हाल ही में एक कार्यक्रम में खलफ अल हब्तूर ने उदाहरणों के साथ कहा कि, ‘‘डिग्री जरूरी है, लेकिन अनुभव उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली इंजीनियरिंग, असली मैनेजमेंट, असली काम... साइट पर जाकर ही समझ में आता है। सिर्फ किताबें पढ़कर कोई भी करियर नहीं बनता। फील्ड में उतरने से जो सीख मिलती है, वही किसी को प्रोफेशनल बनाती है।’’ अल हब्तूर ग्रुप के चेयरमैन शेख खलफ अल हब्तूर 1.35 लाख करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। उनका कारोबार होटल्स, रियल एस्टेट, ऑटो मोबाइल, शिक्षा और प्रकाशन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। 2023 में 100 अफगान छात्राओं को यूएई की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दे चुका यह खुद्दार और उदार खरबपति हर साल करोड़ों-करोड़ों रुपये का दान करने के बावजूद दानवीर होने का वैसा ढिंढोरा नहीं पिटता। जैसा कि भारत में पीटा जाता है। उनका मानना है कि जमीनी संघर्ष विनम्रता और समय की कीमत से अवगत कराने के साथ-साथ चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है। जब कभी चीजें आपकी सोच और योजना के मुताबिक न हो रही हों तो घबराने की बजाय कुछ देर तक शांत रहकर चिंतन-मनन करते हुए खुद को और सीखने और जानने का समय दें। अनिश्चितता से डरकर भागना छोड़ उसे आत्मसात करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। 

मनचाही सफलता पाने के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आना जरूरी है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी छाती तानकर सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल की वजह से भारत के बच्चे और बड़े किस तरह से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है। अनेकों माता-पिता अपने लाडले, लाडलियों की मोबाइल की लत की वजह से चौबीस घंटे परेशान रहते हैं। यह भी सच है कि कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। बेलगावी जिले के हलगा गांव के सजग लोगों ने जब गौर किया कि उनके यहां के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मोबाइल तथा टीवी देखने में अपना अधिकांश समय बर्बाद कर रहे हैं तो चिंता के मारे उनकी नींद जाती रही। ऐसे में ग्राम पंचायत भी सतर्क हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद रास्ता भी निकाल लिया गया। गांव में हर शाम ग्राम पंचायत कार्यालय से एक सायरन बजता है, जो लोगों को टीवी को तुरंत बंद करने तथा मोबाइल फोन अलग रखने का संकेत देता है। पिछले दिसंबर माह से यह संकेत दो घंटे के डिजिटल डिटॉक्स यानी एक सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। पंचायत अधिकारियों का कहना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों में इस नियम का पालन किया जा रहा है। विद्यार्थी कम अज़ कम दो घंटे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। हलगा गांव ने जो रास्ता दिखाया है, यदि चाहें तो हम और आप भी उसका अनुसरण कर सकते हैं...।

Thursday, March 19, 2026

अंतिम यात्रा

पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता आड़ा-टेढ़ा होता है और बेहद दोस्ताना भी। इस आत्मीय रिश्ते की नींव को मजबूत करने के लिए पहली ईंट तो जन्मदाता को ही रखनी पड़ती है। इसके लिए उसे बहुतेरे जतन और त्याग भी करने पड़ते हैं। फिर भी कहीं न कहीं चूक हो जाती है। कभी इधर से तो कभी उधर से। फिर भी हमारे संसार में हर भूल-चूक और समस्या का समाधान है। बशर्ते नीयत में खोट न हो। कहा जाता है कि ज्यादातर पुत्र मां के करीब होते हैं और बेटियां पापा की दुलारी होती हैं। अधिकतर पिता काफी हद तक खुरदुरे और व्यावहारिक होते हैं तो माताएं ममता और भावुकता की डोर से ताउम्र बंधी होती हैं। यह गुण विधाता ने उन्हें खास तौर पर अर्पित-समर्पित किया है। कुछ पिता बंद किताब होते हैं, जिसे हर कोई नहीं पढ़ पाता। उसे पढ़ने के लिए खोलना होता है। इस दौर की औलादों के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। सभी माता-पिता अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। सदियों से दस्तूर बनी इस मनोकामना की जब अवहेलना और निरादर होता है तो पिता का मन आहत होता है। उनका गुस्सा भी फूट पड़ता है जो इस दौर की अधिकांश औलादों के लिए नागवार होता चला जा रहा है।

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके में एक अरबपति कारोबारी की उसी के बिगडैल बेटे ने बहुत ही क्रूर तरीके से हत्या कर दी। हत्या के पश्चात आरी से अपने जन्मदाता के जिस्म के टुकड़े करने में भी उसके हाथ नहीं कांपे। पैथोलॉजी संचालक व शराब के बड़े कारोबारी मानवेंद्र सिंह अपने अक्षय नामक इस पुत्र को अच्छा और कुशल डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन अक्षय का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। पिता और पुत्र के बीच मनमुटाव और बहसबाजी सतत चलती रहती थी। इसी तनातनी में कभी कभार पिता का हाथ भी बेटे पर उठ जाता था। अपनी जिन्दगी अपने ही तौर तरीके से जीने के अभिलाषी अक्षय के लिए पिता का डांटना-फटकारना असहनीय होता चला गया। उसने अपनी शराबखोरी में और... और इजाफा करते हुए पिता से टकराने की हिम्मत दिखानी प्रारंभ कर दी। पिता भी अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘‘मैं जो चाहता हूं, वही करो, नहीं तो मेरी नजरों से ओझल हो जाओ।’’ ऐसे में आपसी तनाव तो बढ़ना ही था। अपने पापा की नसीहत को बकवास मान उनसे बेइंतहा नफरत करते बिगड़ैल बेटे के मन में इस बात का भी गुस्सा अंदर तक भरा था कि उसकी मां की आत्महत्या के वही जिम्मेदार हैं। यदि इन्होंने दूसरी शादी कर ली तो जायदाद पर सौतेली मां का कब्जा हो जाएगा।

एक रात पिता और पुत्र में खूब कहासुनी हुई। पिता ने गुस्से में रायफल की गोली का भय दिखाया तो बेटे का नफरती माथा घूम गया। अलसुबह उसने उसी रायफल से गहरी नींद में सोये पिता के सिर पर गोली मारी और कुछ घंटों के बाद बाजार जाकर आरी और नीला ड्रम खरीद लाया। उसने बड़े इत्मीनान से कसाई की तरह शव के टुकड़े किए। इससे पहले उसने यूट्यूब पर बहुत गौर से ‘वध’ नामक फिल्म देखी, जिसमें अत्यंत राक्षसी अंदाज में शव को काटने और ठिकाने लगाने का तरीका समझाया गया है। नृशंस हत्यारे ने पहले पिता के दोनों हाथ और पैर काटे। बहुत कोशिश के बाद भी वह धड़ को काट नहीं पाया तो उसे नीले ड्रम में भर दिया। काटे गये दोनों हाथ और पैरों को एक पिट्ठू बैग में डाला और बड़े मजे से कार में सवार होकर शहर से दूर बीस किलोमीटर दूर जा पहुंचा। लाश के चार टुकड़े उसने रास्ते में फेंके और खून से सने कपड़े नहर से लगी घनी झाड़ियों में छुपा दिए। शव के सिर और धड़ को ठिकाने लगाने में सफल नहीं होने पर उसने उन्हें यह सोचकर नीले ड्रम में डाल दिया कि शीघ्र ही इन्हें एसिड से जला और गला देगा। अपने जन्मदाता का कत्ल करने के बाद भी हत्यारे के चेहरे पर पुलिस वालों को कोई शिकन नहीं दिखी। वह यही कहता रहा कि पहले पिता ने पीटा फिर मैंने गुस्से में यह गलती कर दी। जेल में पूरी रात दीवार के सहारे बैठ जरूर बड़बड़ाता और अपनी अक्षम्य करतूत पर पछताता रहा।

मध्यप्रदेश में स्थित बड़वानी में 46 वर्षीय डॉक्टर हरीश पिछले पांच वर्षों से अचेतावस्था में बिस्तर पर पड़े हैं। मार्च 2021 की सुबह क्लिनिक जाते वक्त हुई सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में ऐसी बेहद गंभीर चोटें आई कि लंबे इलाज और सर्जरी के बाद भी होश में नहीं आ पाये। कोमा में होने के कारण हरीश करवट नहीं ले पाते। उनके उम्रदराज पिता अपने हाथों से बेटे की प्रतिदिन मालिश करते हैं। शरीर की साफ-सफाई तथा करवट दिलाते है। हरीश को ट्यूब के माध्यम से दूध, जूस और विभिन्न दवाएं दी जा रही हैं। दिन-रात चल रहे इलाज के खर्च चलते घर बिकने के साथ-साथ बीस लाख का कर्जा भी हो चुका है, लेकिन फिर भी धैर्यवान पिता का हौसला और ईश्वर के प्रति भरोसा बना हुआ है। वो दिन जरूर आएगा जब उनके बेटे को होश आयेगा और वह पहले की तरह एकदम सेहतमंद होकर चलता-फिरता नजर आयेगा।

गड़चिरोली के रहने वाले बंडू यादवराव की 28 वर्षीय बेटी श्रेया की जिन्दगी पिछले चार वर्ष से बिस्तर तक ही सिमटी हुई है। डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया है। वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। पढ़ाई में काफी होशियार रही श्रेया का साफ्टवेयर डेवलपर बनने का प्रबल इरादा था। इसके लिए उसने पुणे के डी.वाई.पाटील कॉलेज ऑफ कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेकर परीक्षा में टॉप किया था। तीन फरवरी 2022 को अपने मित्रों के साथ वह रात को कार से घर लौट रही थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मित्रों को मामूली चोटें आई, लेकिन श्रेया अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो गई। नागपुर के एक नामी डॉक्टर के अस्पताल में भर्ती कराने पर पता चला उसका ब्रेन पूरी तरह से मृत हो चुका है। माता-पिता ने और भी कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सभी ने जांच में पाया कि कोई चमत्कार ही उसे फिर से होश में ला सकता है। चार वर्ष बीतने के पश्चात भी माता-पिता ने चमत्कार की उम्मीद में खुद को बेटी के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया है। लाखों रुपये खर्च कर चुके आशावादी परिवार का कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी दुलारी बिटिया की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसके लिए भले ही उन्हें अपनी बची-खुची सारी पूंजी और जमीन-जायदाद भी क्यों न बेचनी पड़े। बिटियां की चौबीस घंटे की देखरेख के लिए दो कुशल नर्स तो हैं ही, उन्होंने भी अपने सुख-चैन और रातों की नींद से नाता तोड़ लिया है। कोमा की भेंट चढ़ चुकी श्रेया की बड़ी बहन डॉक्टर है। वह भी जीवन से संघर्ष करती आशा और निराशा के बीच झुलती अपनी इकलौती बहन को फिर से एकदम स्वस्थ और फिर से भागते-दौड़ते देखने के लिए अपना सारा काम धाम छोड़कर उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है। परिवार के कुछ शुभचिंतक श्रेया की इच्छा मृत्यु की मांग करने का सुझाव भी देते रहते हैं, लेकिन माता-पिता और बहन के यकीन की डोर बहुत मजबूत है।

इस धरा से अपने ही खून की ऐसी अंतिम विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। करोड़ों संवेदनशील भारतीयों की आंखों को नम कर देने वाला वीडियो आपने भी देखा होगा, जिसमें बहन अपने भाई से कह रही है, ‘‘सबको माफ करते हुए अब जाओ, ठीक है।’’ यह जिन्दगी इंसान को कैसे-कैसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। इसकी हकीकत अशोक राणा और निर्मला देवी से बेहतर और कौन बता सकता है। काल्पनिक किस्से कहानियां लिखना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है दर्दनाक वास्तविकता से रूबरू होना वो भी सतत तेरह वर्षों तक। फुटबाल और जिम का शौकीन हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। एक शाम रक्षाबंधन के दिन वह अचानक चौथी मंजिल से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क और कमर में अत्यंत गहरी चोटें लगीं। इस हादसे के बाद वह जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया। कई डॉक्टरों और अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज करवाने के बावजूद उसकी हालत में तो कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन राणा परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि उन्हें दिल्ली में स्थित अपना तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने बेटे के ठीक होने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। सांस लेने, फीड कराने के साथ मल त्याग के लिए नली लगी रही। अपने कोमाग्रस्त पुत्र को पल-पल अथाह पीड़ा से लड़ते देख माता-पिता अब उसे जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगे। हरीश की 60 वर्षीय मां निर्मला देवी के इन शब्दों ने पत्रकारों की भी आंखें नम कर दीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि हमें ऐसा दिन देखना पड़ेगा, जब बेटे की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि उसकी मुक्ति के लिए दुआ करनी पड़ेगी।’’ हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि जैसा दर्द हमें मिला है, वैसा किसी दूसरे माता-पिता को न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके दर्द को समझा और इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए 13 वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े 32 वर्षीय युवक हरीश के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद माता-पिता ने अपने हरीश के अंगदान के जरिये दूसरों को जीवन देने की जो साहसी और परोपकारी इच्छा जतायी है उसके लिए भी उनका बारम्बार वंदन और अभिनंदन।

Thursday, March 5, 2026

बेटा घर नहीं लौटा

जब कोई अपराधी समाज के लिए आतंक का पर्याय और पुलिस के लिए सिरदर्द बन जाता है तो समाज उससे नफरत और पुलिस उसका एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती। यह भी सच है कि हर डाकू, चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी का भी अपना परिवार होता है। ऐसे यार दोस्त भी होते हैं, जो हर हाल में उसके शुभचिंतक होते हैं। मां-बाप, पत्नी और भाई-बहन के मन में उसके प्रति कहीं न कहीं सद्भावना और स्नेह की ऐसी नदी बहती रहती है, जो आसानी से नहीं सूखती। वे उसे निर्दोष मानने का जो भ्रम पाले रहते हैं वो अंत तक कायम रहता है। जगजाहिर घोषित अपराधी को सज़ा मिलने पर ऐसे करीबी अपनों का चेहरा उतर जाता है और वे कानून व्यवस्था को भी कोसते देखे जाते हैं। हमारे समाज में यदि अपवाद न हों तो सबकुछ एकतरफा लग सकता है। ऐसे ही अपवाद हैं हाजीपुर के एक पिता, जिन्होंने अपने खूंखार अपराधी बेटे के पुलिसिया एनकाउंटर पर न केवल भरपूर खुशी दर्शायी, बल्कि पुलिस को धन्यवाद के साथ शाबाशी भी दी। दो लाख के इनामी कुख्यात अपराधी प्रिंस ने गलत संगत में बचपन से अपराध की राह चुन ली थी। प्रिंस ने वर्ष 2011 में अपने ही दादा को चाकू मारकर घायल कर दिया था। कालांतर में भी उसने कई झगड़े-फसाद किये और जेल जाना-आना लगा रहा। जेल में रहने के दौरान उसका कुछ खूंखार अपराधियों से करीबी जुड़ाव हुआ तो बाहर आने के बाद वह बेखौफ होकर लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को अंजाम देने लगा। यहां तक कि 2018 में हाजीपुर जेल में बंद रहने के दौरान कुख्यात अपराधी मनीष की हत्या में भी उसका नाम गूंजा था। प्रिंस को उसके माता-पिता ने सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वह अंत तक नहीं सुधरा। उलटे उसने देश के कई राज्यों में लूट और हत्या का ऐसा नेटवर्क बनाया कि पुलिस के लिए भी अपार सिरदर्द बन गया। लोगों के तानों से परेशान घरवालों ने ईश्वर से प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी कि इस शैतान का किसी भी तरह से अब अंत ही हो जाए। उन्होंने पुलिस से भी प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी, इस बेलगाम शैतान को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा कर सुधारो या फिर मार गिराओ। बीते माह जब गोलियों की बौछार से पुलिस ने उसका हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा कर दिया तब पिता के यही शब्द थे, ‘पुलिस ने जो किया वो एकदम सही है। जितने भी ऐसे दरिंदे हैं उन्हें भरे चौराहे पर गोली से उड़ा देना चाहिए।’ अन्य परिजनों ने भी पुलिस की सराहना करते हुए बार-बार नतमस्तक होकर धन्यवाद की झड़ी लगा दी। 

नक्सलियों ने राष्ट्र को कितनी हानि पहुंचायी है, कितने घर उजाड़े हैं, कितने-कितने मां-बाप के सपनों को रौंदा है इसका हिसाब लगाना असंभव है। जिन आदिवासी इलाकों में सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार और संपूर्ण विकास की धारा बहाने के लिए प्रयत्नशील रही, वहीं शीर्ष नक्सली अनेकों वर्षों तक अड़ंगा बने रहे। अनपढ़ आदिवासियों को पिछड़ेपन और असमानता के जाल से बाहर ही नहीं निकलने दिया। नक्सली नेताओं ने असंख्य युवक-युवतियों को बरगला कर नक्सली बनाया और खुद के बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए भेजा। महानगरों में कोठियां खड़ी कीं, कारों की कतार लगाकर दुनियाभर के सुख भोगे। इसकी जो हकीकत है उस पर कई उपन्याय लिखे जा सकते हैं। बीते समय की सरकारें तो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरी तरह से नक्सलियों का खात्मा नहीं कर पाईं, लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पूरे मन से प्रतिज्ञाबद्ध ही नहीं काफी हद तक सफल होती दिखायी दे रही है। वर्षों पुराना आतंकी आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा है। अधिकांश नक्सली कमांडरों के हौसले पस्त किये जा चुके हैं। यही वजह है कि अनेकों इनामी नक्सली अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर चुके हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें भी हथियार डालने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ माह पूर्व भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणु गोपाल ने अपने 60 साथियों सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव के चलते दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवुजी ने भी हथियार डाल दिए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय बने देवुजी ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री धर्मराव आत्राम का अपहरण कर उन्हें 17 दिन तक बंधक बनाकर रखा था। इस हैवान ने कितने नेताओं तथा जवानों की जान ली, उसका संपूर्ण लेखा-जोखा किसी भी सजग भारतीय का खून खौला सकता है। ऐसे दरिंदो की मौत तो कोई भी चाहेगा। देवुजी पर 1.25 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। जब उसे लगा कि अब तो कभी भी उसे टपकाया जा सकता है, तो उसने  आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। वैसे भी जान तो सबको प्यारी होती है। फिर भी सरकार उन्हें आत्मसमर्पण का मौका दे रही है। इसके लिए उन्हें तथा उनके परिजनों को सरकार का अहसानमंद होना ही चाहिए। एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जंगलों से तो नक्सलियों का शीघ्र सफाया हो ही जाएगा, लेकिन अर्बन नक्सलियों को कब और कैसे दबोच कर जेलों में डाला जाएगा जो वर्षों से सफेदपोश होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी का नकाब ओढ़े हैं। यही चेहरे तथाकथित क्रांतिकारी, कवि, संपादक, प्रोफेसर, कथाकार और समाजसेवक आदि के चोले में नक्सलियों को पालते-पोसते आ रहे हैं तथा कई भयावह खूनी हमलों के मास्टरमाइंड भी हैं। 

माड़वी हिडमा। हां यही नाम था उसका, जिसने सोलह वर्ष की उम्र में जंगलों में हथियार थाम कर भटकने की ठान ली थी और कई वर्ष तक खून-खराबा करता रहा। हिडमा के दिल-दिमाग में शहरी नक्सलियों ने यह भर दिया गया था कि नक्सली गरीबी, शोषण और असमानता के खात्मे के लिए कटिबद्ध हैं। वे तब तक सरकारों के खिलाफ हथियार उठाये रहेंगे, जब तक चारों तरफ समानता और खुशहाली नहीं आ जाती। उसे नक्सली कमांडरों के वास्तविक चरित्र का पता ही नहीं था। दरअसल, सच को उससे छिपाया गया था। हिडमा को हथियार चलाने का प्रशिक्षण सुजाता नामक नक्सली महिला से मिला था, जिसे बस्तर की लेडी वीरप्पन कहा जाता था। सुजाता बस्तर डिविजन कमेटी की प्रभारी थी और सुकमा समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े नक्सली हमलों में अहम भूमिका निभा चुकी थी। 2024 में सुजाता को सुरक्षा बलों ने तेलंगाना से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। उसके शागिर्द हिडमा को कई बड़े नक्सली हमलों का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। उस पर भी सरकार ने 1 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। हिडमा को सीपीआई (माओवादी) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर कहा जाता था, जिसे नक्सलियों की सबसे प्रशिक्षित और घातक इकाई माना जाता है। वह दंडकारण्य के घने जंगलों में सक्रिय रहता था और अबूझमाड़ के कठिन भू-भाग व सुकमा-बीजापुर बेल्ट की अंदर तक गहन जानकारी थी। इसी कारण कई खूनी वारदातों में लिप्त रहने के बावजूद सुरक्षा बलों की पकड़ से दूर था। उसे यकीन था कि सुरक्षा बल उस तक नहीं पहुंच सकेंगे। बीते वर्ष छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हिडमा की मां से मुलाकात कर उसे समझाने और सही राह पर लाने को कहा था। मां भी तहेदिल से चाहती थी कि उसका बेटा आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए और शांति से जिए। आखिर कब तक कानून से मुंह छिपाता जंगलों में भटकता रहेगा। ममतामयी मां कई वर्षों से अपने बेटे और बहू को देखने के लिए तरस रही थी। वह दिन-रात ईश्वर से दोनों की सलामती की प्रार्थना करती नहीं थकती थी। उसे पक्का भरोसा था कि बेटा उसका कहना जरूर मानेगा। अपने बेटे की सलामती चाहती थी। उसने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें अत्यंत भावुक होकर कहा था, ‘‘कहां हो बेटा? घर लौट आओ, सरेंडर कर दो।’’ लेकिन बेटे ने मां की ममता का मान नहीं रखा। अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। कुछ ही दिनों के पश्चात अखबारों में यह खबर छपी, ‘‘छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश बार्डर पर सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली हिडमा और उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया।’’