Wednesday, March 25, 2026

समाधान

यह खबर कितनी चौकाने वाली है कि भारत के कई बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हैं। उन्हें पाठयपुस्तकों के साथ-साथ पालकों के दबाव और आकांक्षाओं से जूझना पड़ रहा है। अधिकांश अभिभावक सख्त अनुशासन की डोर में बांधे रख किसी भी तरह से उन्हें डिग्रीधारक होते देखना चाहते हैं। उनके मन में यह यकीन घर कर चुका है कि कोई भी छोटी-बड़ी डिग्री उन्हें नौकरी तो दिला ही देगी। कई बच्चे बनना कुछ चाहते हैं और उनके माता-पिता की चाहत और होती है। ऐसे में उनके बीच जो कहा-सुनी और टकराव होता है, उससे वो भारतीय खूब वाकिफ हैं, जिन्हें अपनी सख्ती और जिद की वजह से औलाद से दूर होना पड़ता है। बहुतेरे मां-बाप ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, सख्ती से पालना चाहिए। दरअसल, अपने यहां बच्चों का समुचित मार्गदर्शन करने की बजाय इधर-उधर के उदाहरणों को पेश कर नीचा दिखाने की अत्यंत पुरातन परिपाटी है। किसी रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी के बेटे-बेटी की सफलता की कहानियां मन में बसाये अभिभावक अपनी संतानों को किसी से कमतर नहीं देखना चाहते। कई भारतीयों को ज्ञात ही नहीं होगा कि विश्व में एक देश ऐसा भी हैं, जहां के बच्चे पालकों की ऐसी-वैसी विभिन्न बंदिशों से आजाद है। इस देश का नाम है नीदरलैंड। नीदरलैंड को कभी हॉलेंड के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक अत्यंत समृद्ध और विकसित देश नीदरलैंड दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और कृषि उत्पाद निर्यातक देश है। यहां की अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि, भोजन प्रसंस्करण और पेट्रोकेमिकल पर आधारित है। यहां की आधिकारिक भाषा ‘डच’ है। यहां के लोग दुनिया में सबसे लंबे माने जाते हैं। खुले विचारों वाली सोच और नीतियों के लिए जाने जानेवाले नीदरलैंड को विश्व के सबसे खुशहाल और सुरक्षित देशों में गिना जाता है। इस देश में अपनी संतानों को बचपन से ही प्यार और सुरक्षा का अहसास कराया जाता है। यहां पर दस साल की उम्र तक बच्चों को स्कूलों में कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। वहां के लोगों की धारणा है कि एक तनावग्रस्त बच्चा कभी भी बेहतर नागरिक नहीं बन सकता। जहां के बच्चे खुश नहीं वहां के वयस्क भी खुशहाल नहीं हो सकते। दरअसल, नीदरलैंड में सफलता के मायने हैं एक सुनियोजित और चिंतामुक्त जीवन जीना। जहां विश्व के अधिकांश देशों में यह माना जाता है कि किसी भी तरह से कामयाबी हासिल करो, लेकिन नीदरलैंड के बड़े-बुजुर्ग तथा माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चा खुश और संतुष्ट रहेगा तो कामयाबी खुद-ब-खुद उसके कदम चूमेगी। एक प्रसन्न, तनावमुक्त बच्चा ही खुद को बेहतर समझ पाता है। वह अंदर से मोटिवेटेड रहता है और समाज से जुड़ना सीखता है। उसके लिए सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे ओहदे तक पहुंचना नहीं, बल्कि एक आजाद और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बनना है। डच समाज कहने में नहीं करने में यकीन रखता है। उन्हें भौतिक सुखों के लिए आड़े-टेढ़े रास्तों में भटकना और हवा में उड़ना कतई पसंद नहीं। 

डच समाज में रिश्तों को निभाने की गजब की कला समाहित है। वहां पर परंपरा के तौर पर ‘पापा डे’ को निभाने का चलन है। इस दिन सभी पापा खास तौर पर बच्चों के साथ भरपूर समय बिताने तथा उनका हालचाल जानने के लिए छुट्टी लेते हैं। उनकी समस्याओं को गौर से सुनते हुए समाधान से अवगत कराते हैं। इससे बच्चों को सही और गलत का पता तो चलता ही है, निर्णय लेने की क्षमता और मनोबल में वृद्धि होती है। अभिभावकों की प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि वहां के बच्चे ब्रांडेड कपड़ों या महंगे खिलौने की लालसा करने की बजाय साइकिल चलाने और मिट्टी में खेलने का आनंद लेकर प्रफुल्लित हैं। नीदरलैंड की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चों को खुद साइकिल चलाकर स्कूल जाते देखना दूसरे देशों से पहुंचने वाले पर्यटकों को भी आनंदित करता है। इस अनोखे देश में भारत की तरह बच्चों की निगरानी और टोका-टोकी की कोई जगह नहीं। बच्चों के गिरने पर खुद संभलने की सोच में यकीन रखने वाले माता-पिता का मानना है कि यही भावनात्मक आजादी उनके बच्चों को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है।

धनवानों की सोच और उनके जीवन जीने के तौर-तरीकों के बारे में सभी की लगभग एक जैसी धारणा है। अधिकतर धनपति खुद तो दुनियाभर की सुख-सुविधाओं के भोगी होते ही हैं, अपनी संतानों को भी सुविधाभोगी और आरामपरस्त बना देते हैं। उनका मानना होता है कि हमने धन कमाया ही अपने बाल-बच्चों के लिए है तो ऐसे में उन्हें कोई तकलीफ क्यों होने दें। अपनी संतान के लिए किसी भी तरह की कोई कमी न होने देनेवाले रईसों को तो आपने भी जरूर देखा होगा, लेकिन शेख खलफअल हब्तूर जैसे खरबपति शायद ही देखे और सुने होंगे, जिन्होंने कॉलेज से अच्छी-खासी पढ़ाई और डिग्री लेने वाले अपने इकलौते बेटे को अपने हजारों करोड़ के व्यावसायिक साम्राज्य की गद्दी पर तुरंत विराजमान कराने की बजाय होटलों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा लगाने और वेटर के तौर पर काम करने का जमीनी अनुभव लेने के लिए कई महीने तक खुद से दूर रखा। हाल ही में एक कार्यक्रम में खलफ अल हब्तूर ने उदाहरणों के साथ कहा कि, ‘‘डिग्री जरूरी है, लेकिन अनुभव उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली इंजीनियरिंग, असली मैनेजमेंट, असली काम... साइट पर जाकर ही समझ में आता है। सिर्फ किताबें पढ़कर कोई भी करियर नहीं बनता। फील्ड में उतरने से जो सीख मिलती है, वही किसी को प्रोफेशनल बनाती है।’’ अल हब्तूर ग्रुप के चेयरमैन शेख खलफ अल हब्तूर 1.35 लाख करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। उनका कारोबार होटल्स, रियल एस्टेट, ऑटो मोबाइल, शिक्षा और प्रकाशन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। 2023 में 100 अफगान छात्राओं को यूएई की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दे चुका यह खुद्दार और उदार खरबपति हर साल करोड़ों-करोड़ों रुपये का दान करने के बावजूद दानवीर होने का वैसा ढिंढोरा नहीं पिटता। जैसा कि भारत में पीटा जाता है। उनका मानना है कि जमीनी संघर्ष विनम्रता और समय की कीमत से अवगत कराने के साथ-साथ चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है। जब कभी चीजें आपकी सोच और योजना के मुताबिक न हो रही हों तो घबराने की बजाय कुछ देर तक शांत रहकर चिंतन-मनन करते हुए खुद को और सीखने और जानने का समय दें। अनिश्चितता से डरकर भागना छोड़ उसे आत्मसात करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। 

मनचाही सफलता पाने के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आना जरूरी है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी छाती तानकर सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल की वजह से भारत के बच्चे और बड़े किस तरह से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है। अनेकों माता-पिता अपने लाडले, लाडलियों की मोबाइल की लत की वजह से चौबीस घंटे परेशान रहते हैं। यह भी सच है कि कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। बेलगावी जिले के हलगा गांव के सजग लोगों ने जब गौर किया कि उनके यहां के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मोबाइल तथा टीवी देखने में अपना अधिकांश समय बर्बाद कर रहे हैं तो चिंता के मारे उनकी नींद जाती रही। ऐसे में ग्राम पंचायत भी सतर्क हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद रास्ता भी निकाल लिया गया। गांव में हर शाम ग्राम पंचायत कार्यालय से एक सायरन बजता है, जो लोगों को टीवी को तुरंत बंद करने तथा मोबाइल फोन अलग रखने का संकेत देता है। पिछले दिसंबर माह से यह संकेत दो घंटे के डिजिटल डिटॉक्स यानी एक सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। पंचायत अधिकारियों का कहना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों में इस नियम का पालन किया जा रहा है। विद्यार्थी कम अज़ कम दो घंटे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। हलगा गांव ने जो रास्ता दिखाया है, यदि चाहें तो हम और आप भी उसका अनुसरण कर सकते हैं...।

Thursday, March 19, 2026

अंतिम यात्रा

पिता और पुत्र के बीच का रिश्ता आड़ा-टेढ़ा होता है और बेहद दोस्ताना भी। इस आत्मीय रिश्ते की नींव को मजबूत करने के लिए पहली ईंट तो जन्मदाता को ही रखनी पड़ती है। इसके लिए उसे बहुतेरे जतन और त्याग भी करने पड़ते हैं। फिर भी कहीं न कहीं चूक हो जाती है। कभी इधर से तो कभी उधर से। फिर भी हमारे संसार में हर भूल-चूक और समस्या का समाधान है। बशर्ते नीयत में खोट न हो। कहा जाता है कि ज्यादातर पुत्र मां के करीब होते हैं और बेटियां पापा की दुलारी होती हैं। अधिकतर पिता काफी हद तक खुरदुरे और व्यावहारिक होते हैं तो माताएं ममता और भावुकता की डोर से ताउम्र बंधी होती हैं। यह गुण विधाता ने उन्हें खास तौर पर अर्पित-समर्पित किया है। कुछ पिता बंद किताब होते हैं, जिसे हर कोई नहीं पढ़ पाता। उसे पढ़ने के लिए खोलना होता है। इस दौर की औलादों के पास इसके लिए वक्त ही नहीं है। सभी माता-पिता अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। सदियों से दस्तूर बनी इस मनोकामना की जब अवहेलना और निरादर होता है तो पिता का मन आहत होता है। उनका गुस्सा भी फूट पड़ता है जो इस दौर की अधिकांश औलादों के लिए नागवार होता चला जा रहा है।

उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके में एक अरबपति कारोबारी की उसी के बिगडैल बेटे ने बहुत ही क्रूर तरीके से हत्या कर दी। हत्या के पश्चात आरी से अपने जन्मदाता के जिस्म के टुकड़े करने में भी उसके हाथ नहीं कांपे। पैथोलॉजी संचालक व शराब के बड़े कारोबारी मानवेंद्र सिंह अपने अक्षय नामक इस पुत्र को अच्छा और कुशल डॉक्टर बनते देखना चाहते थे, लेकिन अक्षय का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। पिता और पुत्र के बीच मनमुटाव और बहसबाजी सतत चलती रहती थी। इसी तनातनी में कभी कभार पिता का हाथ भी बेटे पर उठ जाता था। अपनी जिन्दगी अपने ही तौर तरीके से जीने के अभिलाषी अक्षय के लिए पिता का डांटना-फटकारना असहनीय होता चला गया। उसने अपनी शराबखोरी में और... और इजाफा करते हुए पिता से टकराने की हिम्मत दिखानी प्रारंभ कर दी। पिता भी अपनी जिद पर अड़े रहे, ‘‘मैं जो चाहता हूं, वही करो, नहीं तो मेरी नजरों से ओझल हो जाओ।’’ ऐसे में आपसी तनाव तो बढ़ना ही था। अपने पापा की नसीहत को बकवास मान उनसे बेइंतहा नफरत करते बिगड़ैल बेटे के मन में इस बात का भी गुस्सा अंदर तक भरा था कि उसकी मां की आत्महत्या के वही जिम्मेदार हैं। यदि इन्होंने दूसरी शादी कर ली तो जायदाद पर सौतेली मां का कब्जा हो जाएगा।

एक रात पिता और पुत्र में खूब कहासुनी हुई। पिता ने गुस्से में रायफल की गोली का भय दिखाया तो बेटे का नफरती माथा घूम गया। अलसुबह उसने उसी रायफल से गहरी नींद में सोये पिता के सिर पर गोली मारी और कुछ घंटों के बाद बाजार जाकर आरी और नीला ड्रम खरीद लाया। उसने बड़े इत्मीनान से कसाई की तरह शव के टुकड़े किए। इससे पहले उसने यूट्यूब पर बहुत गौर से ‘वध’ नामक फिल्म देखी, जिसमें अत्यंत राक्षसी अंदाज में शव को काटने और ठिकाने लगाने का तरीका समझाया गया है। नृशंस हत्यारे ने पहले पिता के दोनों हाथ और पैर काटे। बहुत कोशिश के बाद भी वह धड़ को काट नहीं पाया तो उसे नीले ड्रम में भर दिया। काटे गये दोनों हाथ और पैरों को एक पिट्ठू बैग में डाला और बड़े मजे से कार में सवार होकर शहर से दूर बीस किलोमीटर दूर जा पहुंचा। लाश के चार टुकड़े उसने रास्ते में फेंके और खून से सने कपड़े नहर से लगी घनी झाड़ियों में छुपा दिए। शव के सिर और धड़ को ठिकाने लगाने में सफल नहीं होने पर उसने उन्हें यह सोचकर नीले ड्रम में डाल दिया कि शीघ्र ही इन्हें एसिड से जला और गला देगा। अपने जन्मदाता का कत्ल करने के बाद भी हत्यारे के चेहरे पर पुलिस वालों को कोई शिकन नहीं दिखी। वह यही कहता रहा कि पहले पिता ने पीटा फिर मैंने गुस्से में यह गलती कर दी। जेल में पूरी रात दीवार के सहारे बैठ जरूर बड़बड़ाता और अपनी अक्षम्य करतूत पर पछताता रहा।

मध्यप्रदेश में स्थित बड़वानी में 46 वर्षीय डॉक्टर हरीश पिछले पांच वर्षों से अचेतावस्था में बिस्तर पर पड़े हैं। मार्च 2021 की सुबह क्लिनिक जाते वक्त हुई सड़क दुर्घटना में उनके सिर और रीढ़ की हड्डी में ऐसी बेहद गंभीर चोटें आई कि लंबे इलाज और सर्जरी के बाद भी होश में नहीं आ पाये। कोमा में होने के कारण हरीश करवट नहीं ले पाते। उनके उम्रदराज पिता अपने हाथों से बेटे की प्रतिदिन मालिश करते हैं। शरीर की साफ-सफाई तथा करवट दिलाते है। हरीश को ट्यूब के माध्यम से दूध, जूस और विभिन्न दवाएं दी जा रही हैं। दिन-रात चल रहे इलाज के खर्च चलते घर बिकने के साथ-साथ बीस लाख का कर्जा भी हो चुका है, लेकिन फिर भी धैर्यवान पिता का हौसला और ईश्वर के प्रति भरोसा बना हुआ है। वो दिन जरूर आएगा जब उनके बेटे को होश आयेगा और वह पहले की तरह एकदम सेहतमंद होकर चलता-फिरता नजर आयेगा।

गड़चिरोली के रहने वाले बंडू यादवराव की 28 वर्षीय बेटी श्रेया की जिन्दगी पिछले चार वर्ष से बिस्तर तक ही सिमटी हुई है। डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया है। वह न बोल सकती है और न ही सुन सकती है। पढ़ाई में काफी होशियार रही श्रेया का साफ्टवेयर डेवलपर बनने का प्रबल इरादा था। इसके लिए उसने पुणे के डी.वाई.पाटील कॉलेज ऑफ कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में प्रवेश लेकर परीक्षा में टॉप किया था। तीन फरवरी 2022 को अपने मित्रों के साथ वह रात को कार से घर लौट रही थी। इस बीच कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। मित्रों को मामूली चोटें आई, लेकिन श्रेया अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो गई। नागपुर के एक नामी डॉक्टर के अस्पताल में भर्ती कराने पर पता चला उसका ब्रेन पूरी तरह से मृत हो चुका है। माता-पिता ने और भी कई डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन सभी ने जांच में पाया कि कोई चमत्कार ही उसे फिर से होश में ला सकता है। चार वर्ष बीतने के पश्चात भी माता-पिता ने चमत्कार की उम्मीद में खुद को बेटी के इर्द-गिर्द सीमित कर दिया है। लाखों रुपये खर्च कर चुके आशावादी परिवार का कहना है कि वे किसी भी हालत में अपनी दुलारी बिटिया की देखभाल में कोई कमी नहीं होने देंगे, इसके लिए भले ही उन्हें अपनी बची-खुची सारी पूंजी और जमीन-जायदाद भी क्यों न बेचनी पड़े। बिटियां की चौबीस घंटे की देखरेख के लिए दो कुशल नर्स तो हैं ही, उन्होंने भी अपने सुख-चैन और रातों की नींद से नाता तोड़ लिया है। कोमा की भेंट चढ़ चुकी श्रेया की बड़ी बहन डॉक्टर है। वह भी जीवन से संघर्ष करती आशा और निराशा के बीच झुलती अपनी इकलौती बहन को फिर से एकदम स्वस्थ और फिर से भागते-दौड़ते देखने के लिए अपना सारा काम धाम छोड़कर उसके बिस्तर के पास बैठी रहती है। परिवार के कुछ शुभचिंतक श्रेया की इच्छा मृत्यु की मांग करने का सुझाव भी देते रहते हैं, लेकिन माता-पिता और बहन के यकीन की डोर बहुत मजबूत है।

इस धरा से अपने ही खून की ऐसी अंतिम विदाई की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। करोड़ों संवेदनशील भारतीयों की आंखों को नम कर देने वाला वीडियो आपने भी देखा होगा, जिसमें बहन अपने भाई से कह रही है, ‘‘सबको माफ करते हुए अब जाओ, ठीक है।’’ यह जिन्दगी इंसान को कैसे-कैसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है। इसकी हकीकत अशोक राणा और निर्मला देवी से बेहतर और कौन बता सकता है। काल्पनिक किस्से कहानियां लिखना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल है दर्दनाक वास्तविकता से रूबरू होना वो भी सतत तेरह वर्षों तक। फुटबाल और जिम का शौकीन हरीश पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। एक शाम रक्षाबंधन के दिन वह अचानक चौथी मंजिल से गिरने की वजह से उसके मस्तिष्क और कमर में अत्यंत गहरी चोटें लगीं। इस हादसे के बाद वह जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया। कई डॉक्टरों और अस्पतालों में महंगे से महंगा इलाज करवाने के बावजूद उसकी हालत में तो कोई सुधार नहीं हुआ, लेकिन राणा परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती चली गई। यहां तक कि उन्हें दिल्ली में स्थित अपना तीन मंजिला मकान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने बेटे के ठीक होने की उम्मीद नहीं छोड़ी। वर्ष पर वर्ष बीतते चले गए। सांस लेने, फीड कराने के साथ मल त्याग के लिए नली लगी रही। अपने कोमाग्रस्त पुत्र को पल-पल अथाह पीड़ा से लड़ते देख माता-पिता अब उसे जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थना करने लगे। हरीश की 60 वर्षीय मां निर्मला देवी के इन शब्दों ने पत्रकारों की भी आंखें नम कर दीं, ‘‘कभी सोचा नहीं था कि हमें ऐसा दिन देखना पड़ेगा, जब बेटे की लंबी उम्र के लिए नहीं, बल्कि उसकी मुक्ति के लिए दुआ करनी पड़ेगी।’’ हमारी ईश्वर से प्रार्थना है कि जैसा दर्द हमें मिला है, वैसा किसी दूसरे माता-पिता को न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके दर्द को समझा और इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए 13 वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े 32 वर्षीय युवक हरीश के जीवन रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। इच्छा मृत्यु की अनुमति मिलने के बाद माता-पिता ने अपने हरीश के अंगदान के जरिये दूसरों को जीवन देने की जो साहसी और परोपकारी इच्छा जतायी है उसके लिए भी उनका बारम्बार वंदन और अभिनंदन।

Thursday, March 5, 2026

बेटा घर नहीं लौटा

जब कोई अपराधी समाज के लिए आतंक का पर्याय और पुलिस के लिए सिरदर्द बन जाता है तो समाज उससे नफरत और पुलिस उसका एनकाउंटर करने से भी नहीं चूकती। यह भी सच है कि हर डाकू, चोर, लुटेरे, हत्यारे, बलात्कारी का भी अपना परिवार होता है। ऐसे यार दोस्त भी होते हैं, जो हर हाल में उसके शुभचिंतक होते हैं। मां-बाप, पत्नी और भाई-बहन के मन में उसके प्रति कहीं न कहीं सद्भावना और स्नेह की ऐसी नदी बहती रहती है, जो आसानी से नहीं सूखती। वे उसे निर्दोष मानने का जो भ्रम पाले रहते हैं वो अंत तक कायम रहता है। जगजाहिर घोषित अपराधी को सज़ा मिलने पर ऐसे करीबी अपनों का चेहरा उतर जाता है और वे कानून व्यवस्था को भी कोसते देखे जाते हैं। हमारे समाज में यदि अपवाद न हों तो सबकुछ एकतरफा लग सकता है। ऐसे ही अपवाद हैं हाजीपुर के एक पिता, जिन्होंने अपने खूंखार अपराधी बेटे के पुलिसिया एनकाउंटर पर न केवल भरपूर खुशी दर्शायी, बल्कि पुलिस को धन्यवाद के साथ शाबाशी भी दी। दो लाख के इनामी कुख्यात अपराधी प्रिंस ने गलत संगत में बचपन से अपराध की राह चुन ली थी। प्रिंस ने वर्ष 2011 में अपने ही दादा को चाकू मारकर घायल कर दिया था। कालांतर में भी उसने कई झगड़े-फसाद किये और जेल जाना-आना लगा रहा। जेल में रहने के दौरान उसका कुछ खूंखार अपराधियों से करीबी जुड़ाव हुआ तो बाहर आने के बाद वह बेखौफ होकर लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को अंजाम देने लगा। यहां तक कि 2018 में हाजीपुर जेल में बंद रहने के दौरान कुख्यात अपराधी मनीष की हत्या में भी उसका नाम गूंजा था। प्रिंस को उसके माता-पिता ने सही राह पर लाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वह अंत तक नहीं सुधरा। उलटे उसने देश के कई राज्यों में लूट और हत्या का ऐसा नेटवर्क बनाया कि पुलिस के लिए भी अपार सिरदर्द बन गया। लोगों के तानों से परेशान घरवालों ने ईश्वर से प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी कि इस शैतान का किसी भी तरह से अब अंत ही हो जाए। उन्होंने पुलिस से भी प्रार्थना करनी प्रारंभ कर दी, इस बेलगाम शैतान को कड़ी से कड़ी सजा दिलवा कर सुधारो या फिर मार गिराओ। बीते माह जब गोलियों की बौछार से पुलिस ने उसका हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा कर दिया तब पिता के यही शब्द थे, ‘पुलिस ने जो किया वो एकदम सही है। जितने भी ऐसे दरिंदे हैं उन्हें भरे चौराहे पर गोली से उड़ा देना चाहिए।’ अन्य परिजनों ने भी पुलिस की सराहना करते हुए बार-बार नतमस्तक होकर धन्यवाद की झड़ी लगा दी। 

नक्सलियों ने राष्ट्र को कितनी हानि पहुंचायी है, कितने घर उजाड़े हैं, कितने-कितने मां-बाप के सपनों को रौंदा है इसका हिसाब लगाना असंभव है। जिन आदिवासी इलाकों में सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, रोजगार और संपूर्ण विकास की धारा बहाने के लिए प्रयत्नशील रही, वहीं शीर्ष नक्सली अनेकों वर्षों तक अड़ंगा बने रहे। अनपढ़ आदिवासियों को पिछड़ेपन और असमानता के जाल से बाहर ही नहीं निकलने दिया। नक्सली नेताओं ने असंख्य युवक-युवतियों को बरगला कर नक्सली बनाया और खुद के बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए भेजा। महानगरों में कोठियां खड़ी कीं, कारों की कतार लगाकर दुनियाभर के सुख भोगे। इसकी जो हकीकत है उस पर कई उपन्याय लिखे जा सकते हैं। बीते समय की सरकारें तो बहुत कोशिशों के बाद भी पूरी तरह से नक्सलियों का खात्मा नहीं कर पाईं, लेकिन वर्तमान केंद्र सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए पूरे मन से प्रतिज्ञाबद्ध ही नहीं काफी हद तक सफल होती दिखायी दे रही है। वर्षों पुराना आतंकी आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा है। अधिकांश नक्सली कमांडरों के हौसले पस्त किये जा चुके हैं। यही वजह है कि अनेकों इनामी नक्सली अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर चुके हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें भी हथियार डालने को विवश होना पड़ रहा है। कुछ माह पूर्व भूपति उर्फ मल्लोजुला वेणु गोपाल ने अपने 60 साथियों सहित महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव के चलते दुर्दांत नक्सली थिप्परी तिरुपति उर्फ देवुजी ने भी हथियार डाल दिए। तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय बने देवुजी ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री धर्मराव आत्राम का अपहरण कर उन्हें 17 दिन तक बंधक बनाकर रखा था। इस हैवान ने कितने नेताओं तथा जवानों की जान ली, उसका संपूर्ण लेखा-जोखा किसी भी सजग भारतीय का खून खौला सकता है। ऐसे दरिंदो की मौत तो कोई भी चाहेगा। देवुजी पर 1.25 करोड़ रुपए का इनाम रखा गया था। जब उसे लगा कि अब तो कभी भी उसे टपकाया जा सकता है, तो उसने  आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। वैसे भी जान तो सबको प्यारी होती है। फिर भी सरकार उन्हें आत्मसमर्पण का मौका दे रही है। इसके लिए उन्हें तथा उनके परिजनों को सरकार का अहसानमंद होना ही चाहिए। एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जंगलों से तो नक्सलियों का शीघ्र सफाया हो ही जाएगा, लेकिन अर्बन नक्सलियों को कब और कैसे दबोच कर जेलों में डाला जाएगा जो वर्षों से सफेदपोश होने के साथ-साथ बुद्धिजीवी का नकाब ओढ़े हैं। यही चेहरे तथाकथित क्रांतिकारी, कवि, संपादक, प्रोफेसर, कथाकार और समाजसेवक आदि के चोले में नक्सलियों को पालते-पोसते आ रहे हैं तथा कई भयावह खूनी हमलों के मास्टरमाइंड भी हैं। 

माड़वी हिडमा। हां यही नाम था उसका, जिसने सोलह वर्ष की उम्र में जंगलों में हथियार थाम कर भटकने की ठान ली थी और कई वर्ष तक खून-खराबा करता रहा। हिडमा के दिल-दिमाग में शहरी नक्सलियों ने यह भर दिया गया था कि नक्सली गरीबी, शोषण और असमानता के खात्मे के लिए कटिबद्ध हैं। वे तब तक सरकारों के खिलाफ हथियार उठाये रहेंगे, जब तक चारों तरफ समानता और खुशहाली नहीं आ जाती। उसे नक्सली कमांडरों के वास्तविक चरित्र का पता ही नहीं था। दरअसल, सच को उससे छिपाया गया था। हिडमा को हथियार चलाने का प्रशिक्षण सुजाता नामक नक्सली महिला से मिला था, जिसे बस्तर की लेडी वीरप्पन कहा जाता था। सुजाता बस्तर डिविजन कमेटी की प्रभारी थी और सुकमा समेत कई इलाकों में बड़े-बड़े नक्सली हमलों में अहम भूमिका निभा चुकी थी। 2024 में सुजाता को सुरक्षा बलों ने तेलंगाना से गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। उसके शागिर्द हिडमा को कई बड़े नक्सली हमलों का मुख्य सूत्रधार माना जाता था। उस पर भी सरकार ने 1 करोड़ का इनाम घोषित कर रखा था। हिडमा को सीपीआई (माओवादी) की बटालियन नंबर-1 का कमांडर कहा जाता था, जिसे नक्सलियों की सबसे प्रशिक्षित और घातक इकाई माना जाता है। वह दंडकारण्य के घने जंगलों में सक्रिय रहता था और अबूझमाड़ के कठिन भू-भाग व सुकमा-बीजापुर बेल्ट की अंदर तक गहन जानकारी थी। इसी कारण कई खूनी वारदातों में लिप्त रहने के बावजूद सुरक्षा बलों की पकड़ से दूर था। उसे यकीन था कि सुरक्षा बल उस तक नहीं पहुंच सकेंगे। बीते वर्ष छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने हिडमा की मां से मुलाकात कर उसे समझाने और सही राह पर लाने को कहा था। मां भी तहेदिल से चाहती थी कि उसका बेटा आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में लौट आए और शांति से जिए। आखिर कब तक कानून से मुंह छिपाता जंगलों में भटकता रहेगा। ममतामयी मां कई वर्षों से अपने बेटे और बहू को देखने के लिए तरस रही थी। वह दिन-रात ईश्वर से दोनों की सलामती की प्रार्थना करती नहीं थकती थी। उसे पक्का भरोसा था कि बेटा उसका कहना जरूर मानेगा। अपने बेटे की सलामती चाहती थी। उसने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें अत्यंत भावुक होकर कहा था, ‘‘कहां हो बेटा? घर लौट आओ, सरेंडर कर दो।’’ लेकिन बेटे ने मां की ममता का मान नहीं रखा। अपनी ही जिद पर अड़ा रहा। कुछ ही दिनों के पश्चात अखबारों में यह खबर छपी, ‘‘छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश बार्डर पर सुरक्षा बलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में एक करोड़ का इनामी खूंखार नक्सली हिडमा और उसकी पत्नी राजे उर्फ रजक्का को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया।’’