Saturday, November 1, 2025

उत्सव की महक

रोशनी के महाउत्सव दीपावली का हम सभी को हमेशा इंतजार रहता है। वैसे भी हम भारतीय जगजाहिर उत्सव प्रेमी हैं। कोई भी त्योहार ऐसा नहीं है जिससे कोई न कोई उद्देश्य न जुड़ा हो। हमारे बुजुर्गों ने त्योहारों की परिपाटी की नींव यूं ही नहीं रखी। दीपोत्सव उमंग-तरंग, ऊर्जा के साथ-साथ नई सोच की प्रेरक धारा की जगमगाहट का जन्मदाता है। दरअसल स्वयं को जानने-पहचानने और खोजने का नाम ही दीपावली है। अधिकांश लोग इस पुरातन उत्सव को रस्में अदायगी की तरह मनाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इस सुअवसर पर प्रकाश, सेवा और सहयोग का दीपक प्रज्वलित कर महाउत्सव को सार्थकता का जामा पहनाते हैं। वर्ष 2025 की दीपावली को ऐसे ही अनूठे भारतीयों ने और...और प्रेरणास्पद और यादगार बना दिया। महाराष्ट्र के अमरावती में इस वर्ष भी ‘वंदे मातरम’ समूह से जुड़े वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा विभिन्न कारोबारियों ने मेलघाट के दो गांवों के हर घर में जाकर नये कपड़े, किताबें, साइकल और मिठाइयां वितरित कीं। लगभग 800 लोगों का यह समूह सोलह साल से हर दिवाली पर किसी ने किसी गांव का सर्वे करता है और असहायों तथा जरूरतमंदों के जीवन में मिठास घोलता है। बीमारों की दवाएं देने के साथ-साथ उनका इलाज भी किया जाता है। अब तक इन्होंने 27 लोगों की सर्जरी अपने खर्चे से कराकर उन्हें नयी जिन्दगी दी है। जिन किसानों ने आत्महत्या कर ली है उनके परिवारों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी इनके द्वारा उठाया जाता है। यह भी गौरतलब है कि ऐसे परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उद्योग लगाने की तैयारी भी की जा रही है। 

इस बार की दिवाली के मौके पर बेंगलुरू शहर में सैकड़ों परोपकारी लोगों ने ऐसे बीमारों के साथ दिवाली मनाई, जो कैंसर के अंतिम पड़ाव पर हैं। अभावों से जूझते दुखियारों की देखरेख और सेवा के लिए वालेंटियर बन करीब 200 युवाओं ने अनाथ बच्चों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर, एसिड अटैक सवाईवर तथा दृष्टिबाधितों के साथ रंगारंग दिवाली मनाते हुए उसे नीरस जीवन में आत्मविश्वास के साथ-साथ अपार खुशियां भर दीं। अनाथ बच्चों ने स्टेज पर अपने भीतर छिपी कलाओं का खुलकर प्रदर्शन कर तालियां पायीं। वृद्धाश्रमों तथा गरीब बच्चों के बीच जाकर दीये जलाने वाले युवाओं की इस पहल का हर किसी ने वंदन...अभिनंदन किया।

मुंबई से लगे वसई में एक शख्स ने अपने जवान बेटे की आसामायिक मौत के बाद जो साहसी फैसला लिया उसकी तारीफ करने के लिए कलमकार के पास शब्द नहीं हैं। अपने माता-पिता की 24 वर्षीय इकलौती संतान सत्यम दिवाली के अवसर पर वापी में हुई भीषण सड़क दुर्घटना में इस कदर बुरी तरह से घायल हुआ कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने अंतत: उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। फिर भी सत्यम के माता-पिता की आस की डोर नहीं टूटी। उन्होंने तुरंत अपने लाडले बेटे को निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया, लेकिन वहां पर कोई सुधार नहीं हुआ। आखिरकार उन्होंने अपने लाडले को दूसरों में देखने और बनाए रखने के लिए उसके अंगों को दान करने का हिम्मती फैसला लेते हुए उसे साकार भी कर दिया। सत्यम की किडनी, लिवर, टिश्यू और कार्निया के महादान से जिन्दगी और मौत से लड़ रहे कई अनजान लोगों को नया जीवन मिला है। उनके लिए सत्यम के माता-पिता पूज्य देवता से कम नहीं। यहां यह भी काबिलेगौर है कि दिवाली के त्योहार के कारण मुंबई में भीड़ भड़ाका होने की वजह से हर जगह ट्रैफिक जाम था। ऐसे में मुंबई ट्रैफिक पुलिस ने भी अपनी मुस्तैदी, इंसानियत और लाजवाब समन्यवय की आदर्श मिसाल पेश करते हुए घंटों की दूरी मिनटोंं में पूर्ण करते हुए लाइव लिवर को उस अस्पताल तक पहुंचाया जहां जरूरतमंद इंतजार कर रहे थे। इस पूरी फुर्तीली कवायद के दौरान एक पुलिस पायलट वाहन रास्ते को पूरी तरह से साफ रखने के लिए एंबुलेंस के आगे चल रहा था। 

बिहार के शहर गयाजी की स्कूल शिक्षक रीता रानी महज तीन फीट की हैं। रीता का कद भले ही छोटा है, लेकिन सोच बहुत ऊंची है। छात्र-छात्राओं को अपनी शैली में शिक्षित करती रीता छात्रों की अत्यंत प्रिय हैं। लोगों की सेवा में सदैव तत्पर रहने का गुण उन्हें ‘बिहार गौरव अवार्ड’ दिलवा चुका है। पितृपक्ष मेले के दौरान दिव्यांगों तथा वृद्धों के लिए व्हीलचेयर की अपने पैसों से व्यवस्था करने वाली रीता की मुस्कुराहट दिवाली के दीप की तरह हरदम जगमगाती रहती है। तमिलनाडु के मदुरे में रहते हैं, डॉक्टर, स्वामीनाथन चंद्रमौली। उनकी वैन में ऑक्सीजन, अल्ट्रासाउंड, ईसीजी जैसी तमाम सुविधाएं हैं। परोपकारी चंद्रमौली रोज सुबह अपनी वैन में बैठकर बुजुर्ग मरीजों के इलाज के लिए घर से निकल जाते हैं। बिना किसी प्रचार और शोर-शराबे के पच्चीस हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुके ये अनूठे डॉक्टर साहब गरीबों, असहायों तथा जरूरतमंदों से फीस नहीं लेते। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के चिंचणी गांव में चाहे दिवाली हो या किसी का जन्मदिन और शादी-ब्याह, लेकिन पटाखे बिलकुल नहीं फोड़े जाते। लगभग दस वर्ष पूर्व इस गांव में पटाखों के धमाकों की तीव्र आवाजों से एक कुत्ता इस कदर भयभीत हो गया था कि वह गांव से भागकर जंगल में चला गया और गड्ढा खोदकर वहां हमेशा के लिए सो गया। इस हैरतअंगेज घटना के बाद सजग ग्राम वासियों ने आपस में मिल-बैठकर सोचा-विचारा कि पटाखों की आवाज से गांव के बुजुर्गों तथा रोगियों को बहुत अशांति का सामना करना पड़ता है तथा गाय-भैंस भी भय तथा सदमे का शिकार होे जाती हैं। इस वजह से दूध भी कम देती हैं। ऐसा विस्फोटक जश्न भी किस काम काम का जो किसी के लिए परेशानी का कारण बने। उसके बाद गांव में पटाखे फोड़ने पर जो विराम लगा वो अभी तक कायम है। दिवाली की छुट्टियों में गांव के बच्चे भी पटाखे जलाने की नहीं सोचते। वे खुशी-खुशी मिल-जुलकर किले बनाते हैं और कठपुतली का मनोरंजक खेल खेलते हैं।

छत्तीसगढ़ के अत्यंत मेल-मिलाप वाले सांस्कृतिक शहर बिलासपुर में दिवाली की रात जब 9 साल की काव्या का परिवार पूजा की तैयारी कर रहा था। तभी मासूम काव्या पटाखे जलाने के लिए दौड़ी तो एकाएक वहीं पर रखी घंटी पर मुंह के बल गिर पड़ी। घंटी का ऊपरी नुकीला सिरा जो कि लगभग चार-पांच सेंटीमीटर लंबा था, उसकी आंख से होते हुए दिमाग में धंस गया। डॉक्टरों की सलाह पर काव्या को इलाज के लिए रायपुर ले जाया गया। दिवाली होने के कारण अस्पताल के अधिकांश डॉक्टर छुट्टी पर थे। फिर भी जैसे ही डॉक्टरों को खबर लगी तो वे दौड़े-दौड़े चले आए। लगभग चार घंटों तक डॉक्टरों की सजग कुशल टीम ने सघन सर्जरी कर बच्ची की आंख की रोशनी लौटाने का चमत्कार कर दिखाया और उसके बाद ही अपने-अपने घर जाकर उन्होंने दीप जलाकर खुशी-खुशी दीपावली मनायी।

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