कितनों को खबर हैं कि मांएं अपनी बिगड़ैल औलाद की मनमानी की वजह से खुदकुशी कर रही हैं। नालायक संतानों के कारण कई पिताओं की भी नींद हराम है। कितने लोग जानते हैं कि बच्चों का बचपन छिन रहा है और उनमें घर कर चुकी बुरी संगत और आदतों के कारण मां-बाप को जासूसों की शरण में जाना पड़ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया की घातक आदत से बचपन आत्मघाती और समय से पहले बड़ा हो रहा है और जन्मदाता निराश और छोटे हो रहे हैं?
उत्तर प्रदेश में स्थित चित्रकूट जिले के हरदोली गांव की निवासी शीलादेवी की बस यही तमन्ना थी कि उनका बच्चा सिर्फ पढ़ाई में ध्यान दे। आठवीं कक्षा में पढ़ रहे बेटे राजू की बेहतर परवरिश के लिए ममतामयी मां ने झांसी शहर में किराये का मकान लिया था। वह अपने पुत्र को किसी भी चीज़ की कमी नहीं होने देती थीं, लेकिन राजू ऐसी गलत संगत में जा फंसा, जिससे उसने पढ़ने-लिखने से ध्यान हटाकर मोबाइल गेम्स में अपना सारा समय व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। मां शीलादेवी उसे पढ़ाई को प्राथमिकता देने और मोबाइल से दूरी बनाने के लिए कहती तो वह आग बबूला हो जाता। 38 वर्षीय मां की रातों की नींद उड़ चुकी थी। वह बस यही सोचती रहती कि उसका 13 वर्षीय बेटा यदि इसी तरह से स्मार्टफोन और ऑनलाइन गेम की लत की दल-दल में फंसा रहा, तो उसका तो भविष्य ही चौपट हो जाएगा। एक यही इकलौता बेटा ही तो हमारी असली पूंजी है। मां के साथ-साथ पिता भी बेटे को समझाते-समझाते थक चुके थे। उन्होंने अपनी पत्नी शीलादेवी को अपनी मानसिक स्थिति और सेहत पर ध्यान देने को कहा, लेकिन वह तो बेटे के मोबाइल रोग के चलते निरंतर टूटती चली गई। मंगलवार की उस रात भी वह बहुत चिंतित और उदास थी। रात के करीब दो बजे पति रवींद्र की नींद खुली तो पत्नी कमरे में नहीं थी। दूसरे कमरे में देखने पर वह पंखे से गमछे के सहारे लटकी मिली। घबराए पति ने तुरंत उसे नीचे उतारा और भागे-भागे मेडिकल कॉलेज ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। मां की मौत के बाद बेटा फूट-फूटकर रोता रहा। रिश्तेदार सांत्वना देने की कोशिश करते रहे और वह बार-बार मां को पुकारता रहा...।
आजकल के बच्चों को माता-पिता की सीख, सुझाव और डांट किसी शूल की तरह चुभती है। हमारे दौर में तो मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि किसी गलती को बार-बार दोहराये जाने पर तमाचों से गालों को लाल कर दिया करते थे। स्कूल में टीचर भी थप्पड़ों तथा डंडों की मार से होश ठिकाने लगा दिया करते थे, लेकिन इस दौर के बच्चों में वो सहनशीलता ही नहीं रही। परीक्षा में फेल होने या कम अंक आने पर पालकों की डांट-डपट आज की पीढ़ी को मंजूर नहीं! हैदराबाद में दसवीं की छात्रा वैष्णवी ने अपने अपार्टमेंट की बिल्डिंग की छत से कूदकर इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि परीक्षा में कम अंक आने के कारण उसे कड़ी फटकार लगाई गई थी और इसके लिए उसके मोबाइल प्रेम को कसूरवार ठहरा कर कोसा और लताड़ा गया था। दिल्ली के एक स्कूल में नौंवीं क्लास में पढ़ रहे एक छात्र ने इसलिए मेट्रो स्टेशन से कूदकर अपनी जान दे दी, क्योंकि उसे जोक सुनाने तथा गप्पें मारने की वजह से अक्सर अपनी टीचर की दुत्कार सुनने को मिलती थी। एक ही कक्षा में पांच-पांच बार फेल हो जाने के कारण टीचर उसे अकेले में प्रेम से समझा-समझाकर थक चुकी थी, लेकिन अब उसने सभी छात्रों के सामने उसे नालायक और कामचोर कहना प्रारंभ कर दिया था। इससे उसे अपमान का बोध होता था। एक दिन जब टीचर ने उससे कहा कि यदि उसने खुद को नहीं बदला तो उसे टीसी देकर स्कूल से निकाल दिया जाएगा। उसे किसी अन्य स्कूल में दाखिला तक मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अपनी टीचर की अंतिम चेतावनी से डरे-सहमे छात्र के मां-बाप ने बताया कि उस दिन से वह बहुत शांत रहने लगा था। किसी से बात तक नहीं करता था, लेकिन फिर भी ऐसा कहीं भी नहीं लगता था कि वह आत्महत्या कर लेगा। उसने इस दुनिया से जाने से पहले जो सुसाइड नोट लिखकर छोड़ा वह अत्यंत भावुक तथा परेशान करने वाला है। उसकी दिमागी शब्दावली से पता चलता है कि वह समझदार तो था, लेकिन फिर भी पढ़ाई में ध्यान देने से बचता रहा। उसने अपने माता-पिता और भाई से माफी मांगते हुए लिखा है कि, वह वैसा नहीं बन पाया जैसा वे चाहते थे। अब जाते-जाते उसकी अंतिम इच्छा है कि उसके शरीर के अंग जरूरतमंद लोगों को दान कर दिए जाएं। उसके लिखे सबसे ज्यादा दिल को छू लेने वाले इन शब्दों ने तो सभी को रूला दिया, ‘‘मैं नहीं चाहता कि कोई बच्चा मेरी तरह लापरवाह बने और ऐसे खुदकुशी करे, जैसे मैं कर रहा हूं। जीवन का एक-एक पल बहुत अनमोल है। इसे व्यर्थ में न जाने दें।’’
नीरज कुमार वर्मा पचास की उम्र में तीस के लगते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं। उनके रहन-सहन का कमाल है। पेशे से पत्रकार और साहित्यकार वर्मा रोज सुबह पांच-छह किलोमीटर मार्निंग वॉक करते हैं। शाम को नियमित जिम में जाकर पसीना भी बहाते हैं, लेकिन उनका बीस वर्षीय पुत्र सेहत और रहन-सहन के मामले में उनसे एकदम विपरीत है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक, यू-ट्यूब, रेडिट आदि प्लेटफार्म पर हरदम उसके प्राण अटके रहते हैं। अश्लील वीडियो देखते-देखते कहीं गुम हो जाता है। घर का बना खाना उसे बिल्कुल नहीं सुहाता। महंगे होटलों के पिज्जा, बर्गर, पनीर के बने विभिन्न व्यंजन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी पोटैटो चिप्स, मैगी, कुकीज, आकर्षक पैक में भरे नमकीन, आइस्क्रीम तथा कोकाकोला जैसे पेय पदार्थों ने उसे मोटा और थुलथुल बनाते हुए डायबिटीज और दिल की बीमारी का मरीज बना दिया है। एक बार वह जहां बैठता है, वहां से उठने में उसका पसीना छूटने लगता है। हर समय बस मोबाइल में उलझा रहता है। अपने नालायक पुत्र की संदिग्ध गतिविधियों से परेशान बुद्धिजीवी वर्मा जी को जो शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है, उसका तो उन्हें ही पता है। दूसरे तो बस उन पर व्यंग्य बाण ही चलाते रहते हैं, जो अपना घर नहीं संभाल सकता, वह किस मुंह से संपादक और साहित्यकार बना फिरता है।’’
पीठ के पीछे तो उन धनवान पंडितजी का भी लोग कम मजाक नहीं उड़ाते, जिनके छत्तीसगढ़ में कई उद्योग-धंधे हैं। उनके न्यूज चैनल की तो मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र में भी खासी धाक है। धार्मिक प्रवृत्ति के पंडितजी ने अपनी बड़ी बेटी को बड़े अरमानों के साथ मुंबई में बीबीए यानी बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के लिए भेजा था। पंडितजी के पास धन की तो कोई कमी नहीं, इसलिए उन्होंने बिटिया को खर्च करने की खुली छूट दे रखी थी, लेकिन तब उनके पैरों तले की जमीन खिसकने लगी जब उन्हें उड़ती-उड़ती खबर मिली कि बेटी अंधाधुंध सिगरेट और शराब पीने लगी है। दोस्तों के साथ प्राइवेट पार्टीज में जाती है और रात-रात भर हॉस्टल से गायब रहती है। छत्तीसगढ़ के गांव में पले-बढ़े सीधे-सादे पंडितजी ने मायानगरी मुंबई के बारे में कई अच्छी-बुरी कहानियां सुन रखी थीं। उन्होंने बेटी को वापस लौट आने को कहा तो उसने इंकार कर दिया। बीबीए का जो कोर्स दो साल में पूर्ण होना था, उसमें चार साल लगा दिए, फिर भी अधूरा रहा। अपने किसी शुभचिंतक की सलाह पर जब उन्होंने बेटी को रोजमर्रा की गतिविधियों का पूरा सच जानने के लिए प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी का दरवाजा खटखटाया तो राह भटकी बेटी की हफ्तों की जासूसी के बाद पता चला है कि वह तो हर तरह की ड्रग्स की लत की शिकार हो किसी लड़के के साथ बिना शादी किए रह रही है। इससे पहले भी वह किसी अन्य युवक के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह चुकी है। निहायत ही शाकाहारी पंडितजी की बिटियां हर तरह की नशेबाजी के साथ-साथ छोटा-बड़ा हर तरह का मांस-मटन भी धड़ल्ले से खाने लगी है।
सोशल मीडिया के प्रदूषण ने हमारे देश भारत में अभिभावकों के लिए गहरा संकट खड़ा कर दिया है। कहावत है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत।’ किसी भी चीज़ की अति हर जगह बुरी होती है। इसमें दो मत नहीं कि सोशल मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार और पहचान का भी साधन बन चुका है। फिलहाल भारत डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और मीडिया शिक्षा पर जोर दे रहा है। बच्चों को डर से नहीं समझ से सुरक्षित करने का रास्ता अपनाया जा रहा है। यही लोकतांत्रिक रास्ता है। अभी हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के लिए कई सोशल मीडिया मंचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। ध्यान रहे कि इस साल की शुरुआत में आस्ट्रेलिया में 14 वर्षीय बच्चे को टिकटॉक पर परफेक्ट बॉडी नामक श्रृंखला के वीडियो देख-देखकर अपने ही शरीर से घृणा होने लगी थी। खाना खाने से उसे भय लगने लगा था। आस्ट्रेलिया की सरकारी रिर्पोट से पता चला कि 10 से 15 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी सोशल प्लेटफार्म से जुड़े रहे हैं। उनमें से अधिकांश ने हिंसा, नफरत, शारीरिक हीनता और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाले कंटेंट देखे है। लगभग हर दूसरे बच्चे ने ‘साइबर बुलिंग’ झेली है और हर सातवां बच्चा ग्रूमिंग का शिकार हुआ, जहां कोई व्यस्क ऑनलाइन मीठी बातों में फंसाकर बच्चों के शोषण की कोशिश करता है। भारत में भी ऑनलाइन गेम और ‘टिकटॉक’ ने अनेकों जानें ली है और कितने बच्चों का भविष्य बर्बाद किया है। अब तो सभी जान गये हैं कि सोशल मीडिया की वजह से किशोरों तथा युवाओं में गलत आदतों के अलावा महिलाओं के प्रति गलत भावना, नफरत तथा आत्महत्या जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया में धड़ल्ले से जो रील-शार्ट वीडियो दिखाये जा रहे है उनमें हिंसा, द्वेष के साथ-साथ देवर-भाभी, भाई-बहन, पिता-बेटी, सास-ससुर जैसे पवित्र रिश्तों में जो गंदगी भर दी गई उसका सभी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। बच्चों का तो दिमाग ही अश्लील सामग्री से प्रदूषित हो रहा है।
नग्नता देखने के बाद उनमें पवित्र रिश्तों के प्रति कैसी भावना जागेगी, इसका जवाब पाने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं। यह भी सच है कि ऑस्ट्रेलिया की तुलना में भारत बहुत बड़ा देश है। यहां पर यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि से करोड़ो लोगों का जुड़ाव है। बच्चों को सोशल मीडिया पर बहुत अधिक समय बिताने और अश्लील सामग्री पर अपना ध्यान केंद्रित करने से बचाने के लिए प्रतिबंध नहीं उनकी इंटरनेट गतिविधियों की निगरानी की जरूरत है। यह विकट समस्या और भी कई देशों में परेशानी का सबब बनी हुई है। डजिटल दुनिया में होने वाले नुकसानों की निगरानी के लिए वैश्विक स्तर पर कई संगठन खड़े हो चुके हैं। विश्व आर्थिक मंच ने ऑनलाइन हानिकारक कंटेंट से निपटने के लिए ‘ग्लोबल कोलिशन ऑफ डिजिटल सेफ्टी’ बनाया है। यह संस्था नए ऑनलाइन सुरक्षा विनियमन के लिए सर्वोत्तम तरीकों के आदान-प्रदान, ऑनलाइन जोखिम को कम करने और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों में परस्पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। कम उम्र में अनुचित ऑनलाइन कंटेंट के अलावा, सोशल मीडिया और डिजिटल सामग्री का अत्यधिक उपयोग भी एक बड़ी समस्या है। बच्चे और किशोर डिवाइस स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिता रहे हैं। यह उनके मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट का उपयोग करने वाले 11 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में समस्याग्रस्त डिजिटल व्यवहार की आशंका अधिक होती है। जैसे, केवल ऑनलाइन दोस्त बनाना और ऐसी साइटों पर जाना, जो माता-पिता को पसंद नहीं है। साथ ही उनके ऑनलाइन उत्पीड़न में शामिल होने की भी आशंका प्रबल होती है। सोशल मीडिया एप्स पर बहुत अधिक समय बिताने से चिड़चिड़ापन, खाने के विकार और आत्मसम्मान में कमी की समस्या हो सकती है। किशोरियों के लिए ये स्थितियां विशेष रूप से चिंताजनक हैं। रिपोर्ट बताती है कि 13 से 17 वर्ष की 46 प्रतिशत किशोरियों ने कहा कि, सोशल मीडिया ने उन्हें अपने शरीर के बारे में बुरा महसूस कराया। यह संकट भारत समेत पूरी दुनिया में एक जैसा है। नियामक एजेंसियां ऐसे प्लेटफॉर्मों पर लॉग इन करने के लिए पहचान और उम्र को बुनियादी मानदंड बनाने की मांग कर रही हैं। कुछ लोग इससे उपयोगकर्ता की गोपनीयता भंग होने की चिंता जता रहे हैं, लेकिन इंटरनेट को ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

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