अभी तक मेरा जितने भी वृद्धाश्रम जाना हुआ था, अधिकांश में मेरा सामना ऐसे बुजुर्ग स्त्री-पुरुष से हुआ जिनके जिस्म लस्त-पस्त और चेहरे बुझे-बुझे थे। लगभग सभी को उनके बच्चों तथा परिजनों ने बोझ मानते हुए वहां ला पटका था। कमजोर, बेबस माता-पिता अपनी नालायक धोखेबाज औलादों को कोसते हुए अपना दर्द बयां करते-करते फूट-फूट कर जब रोने लगते थे, तब उन्हें चुप कराना मुश्किल हो जाता था। उनकी अटूट खामोशी भी अपने साथ हुए छल कपट की दास्तां कहती नज़र आती थी। लेकिन इस अद्वितीय वृद्धाश्रम को देखकर मुझे कतई नहीं लगा कि ऐसे-वैसे किसी आश्रय स्थल से रूबरू हूं। यहां की स्वच्छ आबोहवा, सेवा, सुरक्षा और सुविधा की सम्मानजनक हकीकत ने नई आशाएं जगा दीं हैं। मुझे लगा ही नहीं कि मैं उपेक्षा, अकेलेपन, निराशा, चिंता में डूबे बुजुर्गों के बीच बैठा हूं। सभी के चेहरों पर खिली मुस्कान की वजह यकीनन यहां का प्रबंधन और आधुनिक सुख-सुविधाएं भी हैं, जो वर्तमान में अधिकांश उम्रदराजों की चाह और जरूरत हैं और जिनकी अनदेखी होती चली आ रही है। इस वृद्धाश्रम में एक सौ पचास कमरे हैं। सभी में उन सभी सुविधाओं का समावेश है, जो संपन्न घर-परिवारों में उपलब्ध होती हैं। हर स्त्री-पुरुष को उसकी मनपसंद का कमरा मिला हुआ है। यहां पर बुजुर्ग बिना किसी पर निर्भर हुए अपना जीवन जी रहे हैं। मनोरंजन कक्ष भी बना है। यहां भी उनके पढ़ने के लिए भरपूर किताबों युक्त लाइब्रेरी है। विशाल टीवी लगा है। बोर्ड गेम्स और संगीत का भी आनंद लिया जा रहा है। खुद को सेहतमंद, खुशहाल बनाये रखने के लिए फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज की जा रही है। उनका अपने घर परिवार से सतत संपर्क बना रहे, इसके लिए इंटरनेट और वीडियो कॉल की सुविधा उपलब्ध है। उन्हें सक्रिय बनाये रखने के लिए बागवानी, पेंटिंग, लेखन, गायन तथा अपने-अपने विचारों को साझा करने का अटूट सिलसिला भी बना हुआ है। यहां पर रह रहे लगभग हर सीनियर सिटीजन का अपनी संतानों से संपर्क बना रहता है। यह इसलिए है क्योंकि वे अपने बाल-बच्चों की रजामंदी से आये या पहुंचाये गये हैं।
अस्सी वर्षीय अमन कुमार का कुछ वर्ष पहले तक शहर के व्यवसाय जगत में डंका बजा करता था। अमन कुमार ने अपने नाम के अनुरूप शांत और मिलनसार शख्सियत के तौर पर जो ख्याति अर्जित की उसे अधिकांश लोग भूले नहीं हैं। भूल भी नहीं सकते। कोई भी जाना-अनजाना जरूरतमंद उनके घर से खाली हाथ नहीं लौटता था। बिना किसी भेदभाव के सभी की सहायता करने वाले अमन कुमार ने कभी भी प्रसिद्धि की चाह नहीं की। निस्वार्थ जनसेवा के कर्म को अपना धर्म मानकर व्यवसाय में जो भी कीर्तिमान स्थापित किए उसकी तारीफ उनके प्रतिद्वंदी भी करते नहीं थकते। इस सम्मानजनक वृद्धाश्रम में अमन कुमार से मिलकर बहुत अच्छा लगा। बहुत कुछ जानने-समझने का सुअवसर भी मिला। भले ही उनके बेटे, पोते अब उनका व्यवसाय संभाल रहे हैं, लेकिन अब भी उनकी सोच और निर्णय क्षमता की कदर करते हैं। कोई भी अड़चन आने या कोई भी नया कदम उठाने से पहले उनसे सलाह मशविरा लेना नहीं भूलते। अमन कहते हैं कि मनुष्य के लिए साठ और पैसंठ से ऊपर की उम्र का दौर बेहद अहम होता है। शरीर और मन दोनों की देखभाल और जरूरी हो जाती है। उचित रहन-सहन और सकारात्मक विचारों से आनंद मिलता है और नकारात्मक सोच घातक साबित होती है। बढ़ती उम्र के लिए संतुलित आहार और पर्याप्त नींद बहुत जरूरी है। सच तो यह है कि उम्र के बढ़ने के साथ-साथ शरीर की जरूरतें बदल जाती हैं। भोजन में प्रोटीन, हरी सब्जियां, दालें और विभिन्न फलों का पर्याप्त मात्रा में होना जरूरी होता है। अधिकांश घर-परिवारों में आज के व्यस्ततम दौर में जो देखभाल कम ही संभव होती है, उसकी पूर्ति थी यह अनोखा वृद्धाश्रम कर रहा है। सीनियर सिटीजन और तनाव का चोली दामन का साथ सर्व विदित है। यहां नियमित होने वाली धार्मिक, आध्यात्मिक, गतिविधियां, मेडिटेशन, म्यूजिक थेरेपी और मिलजुलकर की जानेवाली बागवानी तथा विचार गोष्ठी जो खुशी तथा शांति प्रदान करती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। 75 वर्षीय शिक्षाविद रामचंद अग्रवाल से मिलना भी यादगार बन गया। उनकी पत्नी का पांच वर्ष पूर्व निधन हो गया था। भरे पूरे परिवार में भी उनका दम घुटता था। बेटे और बहुएं अपने-अपने काम में व्यस्त रहते थे। किसी दिन उन्हें किसी ने इस वृद्धाश्रम के बारे में बताया। बच्चों की सहमति से वे यहां रहने चले आए। कई वर्षों तक अपने लेखन के शौक से दूर रहने के बाद मन में विचार आया कि क्यों न अब साहित्य लेखन किया जाए। उन्होंने मात्र चार वर्ष में पांच किताबें लिखीं और प्रकाशित भी हो गईं। इतना ही नहीं एक लेख संग्रह को प्रदेश की साहित्य अकादमी के द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। उनका कहना है कि पढ़ने का शौक तो तब से था, जब नौकरी में था। अपने कमरे में पचासों किताबें जमा कर रखी थीं। लेकिन उन्हें तल्लीनता के साथ पढ़ने का समय नहीं मिलता था। यहां आने के बाद सालभर मेें कई किताबें पढ़ डाली।
श्री रामकृष्ण दमानी का नाम शहर के ही नहीं प्रदेश के रईसों में शुमार है। उन्होंने भी उम्र के सत्तरवें पायदान पर कदम रखने के बाद इस सम्मानजनक आशियाने को अपना ठिकाना बना लिया है। अपार धनराशि होने के बावजूद सरल और सहज जीवनयापन के लिए जाने जानेवाले दमानी जी को मीडिया की चकाचौंध कभी रास नहीं आई। उनकी एक बेटी है जो विदेश में रहती है। देश वापस लौटने की उसकी इच्छा नहीं। ऐसे में उन्होंने छह महीने पूर्व अपनी आलीशान कोठी पर ताला जड़ा और चुपचाप यहां रहने के लिए चले आए। कुछ स्त्री-पुरुषों को ध्यान कक्ष में योग में लीन देखकर मैं उनसे बातचीत करने के लिए आधे घंटे तक इंतजार करता रहा। मुझे यह जानकर हैरत हुई कि कुछ पति, पत्नी भी यहां बड़े आराम से रह रहे हैं। संतानहीन, खुशहाल दंपति को जो शांति और सुकून यहां मिला वो अपने उस फ्लैट में संभव नहीं था, जो शहर की गगनचुंबी इमारत में स्थित है। अब तो जब भी उनका मन होता है बेफिक्र होकर कहीं भी घूमने चले जाते हैं। कुछ दिन पहले ही कश्मीर और शिमला घूम कर आये हैं। यह अत्यंत सुखद हकीकत है कि हमारे समाज और परिवारों के बीच के व्यवहार, सोच और अनुभवों के मौसम में धीरे-धीरे बदलाव देखने में आ रहा है। अपने देश में सास और बहू के रिश्तों के बीच के तनाव और टकराव की खबरें किसी से छिपी नहीं रही हैं। इन तमाम खबरों के बीच बीते दिनों गुजरात के शहर सूरत में कई बहुओं ने अपनी सास के मां बनने जो किस्से सुनाये उससे हर कोई गदगद हो गया। व्यावसायिक नगरी सूरत में सवानी ग्रुप वर्षों से समाजसेवा में सक्रिय है। इसके अध्यक्ष है महेश सवानी जो 17 साल से सामूहिक विवाह का आयोजन करते चले आ रहे हैं। अभी तक पांच हजार से ज्यादा बेटियों की शादियां करवा चुके हैं। 20 दिसंबर, 2025 को उन्होंने एक विशेष सम्मान समारोह का आयोजन किया, जिसमें बहुओं पर अपार प्यार और स्नेह बरसाने वाली सासू मांओं को सम्मानित किया गया। इस दिलकश आयोजन में बहुओं ने दिल खोलकर बताया कि कैसे सास मां बनकर उनकी चिंता-फिक्र करती हैं। खुशी में झूमती अनिता बोलीं, ‘‘मुझे कभी नहीं लगा कि मैं अपनी मम्मी का और परिवार को छोड़कर अपने ससुराल आ गई हूं। मेरी मम्मी से भी ज्यादा मेरी सासू मां मेरा ध्यान रखती हैं। मुझे खाना बनाना नहीं आता था। मेेरी सास ने मुझे सब कुछ बड़े प्यार से सिखाया। मेरी ममता से भरी सासु मां के अंदर मुझे मम्मी, बहन, दोस्त सब नजर आता है। मुझसे कोई गलती हो जाती है तब अपने पास बिठाकर प्यार से समझती है।’’ रजनी ने बताया कि मुझे तो घर के काम ही नहीं आते थे। नौकरी के दौरान अक्सर बाहर रहना पड़ता था तो सासू मां का मेरे बगैर मन ही नहीं लगता था। वह फोन कर मेरा हालचाल पूछती रहतीं। मेरी डिलीवरी के समय भी उन्होंने मेरी खूब देखभाल की। कभी भी मुझे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी। स्नेहल के शब्द थे, ‘प्रेग्नेंसी के दौरान मैं कुछ भी खाती तो तुरंत उल्टी हो जाती थी। तब मेरी सासू मां उल्टी साफ करती थी। मुझे किसी बात के लिए रोकती नहीं हैं। कभी भी हमारे बीच अनबन नहीं हुई। मैं उन्हें काम करने से मना करती हूं, फिर भी आधा काम कर ही देती हैं। अगर मैं सो रही हूं और कभी देर हो जाए तो मुझे कभी नींद से उठाया नहीं है।’ अपने अनुभव को साझा करते हुए रीमा और प्रभा का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था, ‘‘मेरे सास-ससुर ने मुझे बहू नहीं, बल्कि बेटी के रूप में स्वीकार किया है। वे शुरू से ही कहते थे कि इतने सालों से बेटी नहीं है। हम तुम्हें बेटी की तरह ही रखेंगे। जब मैं ऑफिस में होती हूं तब भी मेरी सास मुझे फोन करके पूछती है-जो खाने का मन कर रहा हो, बताओ बनाकर रखूंगी। मैं ऑफिस से आती हूं तो मेरी सास और देवरानी मुझे आराम करने को कहते हैं’’....‘‘जब मेरे पिता बीमार थे, तब मैं उनकी सेवा कर सकूं, इसके लिए मुझे सासू मां ने पिता के पास रहने की छूट दी। जब मां बीमार पड़ीं तो उनकी देखभाल के लिए मैं चार महीने तक अपने मायके में रही। मेरी सास ने हमेशा मेरा पूरा सहयोग किया। कभी कोई ताना नहीं दिया।’’

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