Thursday, February 26, 2026

हे भगवान...!

पहले अपने बच्चों को लेकर मां-बाप इतने चिंतित और परेशान नहीं होते थे, जितने इक्कीसवीं सदी के इस दौर में हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अपने कामधंधे, नौकरी आदि पर अपना दिमाग केंद्रित रखें या अपनी संतानों पर। मोबाइल ने भी उनकी समस्या में जबरदस्त इजाफा कर दिया है। अमीर-गरीब सभी के लड़के-लड़कियां ऐसे ‘मोबाइल रोगी’ हो गए हैं कि उन्हें पढ़ाई-लिखाई की सुध-बुध नहीं रहती। अभिभावकों का उन्हें रोकना-टोकना और समझाना शूल की तरह चुभता है। ऐसे में अभिभावकों का दिमाग ही काम नहीं करता। मोबाइल, ऑनलाइन गेम, सट्टा, जुआ और गलत संगत की वजह से बच्चों की बर्बादी और आत्महत्याओं की खबरें उनका पीछा  करते हुए उन्हें भयभीत करती रहती हैं।

गाजियाबाद की भरी-पूरी ‘भारत सिटी सोसायटी’ में हाल ही में तीन बच्चियों की आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उसके बाद तो लगभग हर सजग भारतीय मोबाइल फोन और जानलेवा ऑनलाइन गेमिंग की लत के बारे में सोचता और बोलता दिखा। अभी तक तो अधिकतर लड़कों के ही मोबाइल के गुलाम होने की खबरें सुर्खियां पा रही थीं अब एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों ने इस पीड़ादायी श्रृंखला में अपना नाम जोड़ लिया। बहनों की इस सामूहिक खुदकुशी के दिल दहलाने वाले सच ने डिजिटल युग का भयावह चेहरा तो दिखाया ही है तथा और भी कई सवाल और चिताएं खड़ी कर दी हैं। पुलिसिया जांच पड़ताल में यह पता चला कि तीनों बहनें एक तथाकथित ‘कोरियाई लवर गेम’ की जबरदस्त कैदी बन कर रह गईं थीं। मां-बाप, रिश्तेदारों तथा स्कूली पढ़ाई से नाता तोड़ते हुए केवल और केवल उस मोबाइल से ही रिश्ता जोड़ चुकी थीं, जिसे मां-बाप ने  उन्हें पढ़ाई के लिए उपलब्ध कराया था। लेकिन ये तीनों बहनें ऐसे विदेशी, कोरियन ऑनलाइन गेम के मोहजाल में जा फंसी जो शुरू-शुरू में आनंदित करता है, फिर धीरे-धीरे वही सुख आदत और गंभीर लत में बदल जाता है। गौरतलब है कि ऐसे अधिकांश ऑनलाइन गेम्स काफी हद तक इसी तरह से बनायेे जाते हैं कि खिलाड़ी लगातार इससे जुड़े रहें। खाना-पीना तक भूल जाएं। कंपनियों के द्वारा उन्हें टास्क पूरा करने के लिए विवश कर दिया जाता है। दरअसल बच्चों को अपने जाल में फंसाने का उनका अपना तौर-तरीका है। 

खिलाड़ियों को यदि कोई टोकता और रोकता है तो वे आगबबूला हो जाते हैं। क्रोध, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन उन्हें आक्रामक बनाता चला जाता है। मोबाइल से अलग होना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है। ‘कोरियाई लवर गेम’ की अत्याधिक लती तीनों बहनों से जब परिवार ने मोबाइल छीना तो वे मानसिक रूप से टूट और बिखर गई। डिजिटल दुनिया को वास्तविक जीवन से कहीं बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण मान चुकी बहनों ने बहुत पहले से ही अपने कोरियन नाम रख लिए थे। निशिका ने अपना कोरियन नाम मारिया, प्राची ने आजीया और पाखी ने अपना कोरियन नाम पिंडी रख लिया था। तीनों आपस में बहुत करीब थीं। उनके कमरे में मिले आठ पृष्ठों के सुसाइड नोट में भी लिखा मिला, ‘‘सॉरी पापा हम कोरिया नहीं छोड़ सकते।’’ तीनों सबकुछ एक साथ करती थीं। मसलन, सुबह उठना, ब्रश करना, नहाना, खाना-पीना, सोना, उठना, बैठना और सबकुछ भूलकर घंटों मोबाइल गेमिंग में लगे रहना। यथार्थ से पूरी तरह से कटी, सिर्फ और सिर्फ सपनों के आकाश में उड़ती बारह, चौदह और सोलह साल की तीनों बहनों ने नौंवी मंजिल से एक साथ कूदकर ही खुदकुशी की।

मोबाइल आज के समय में जरूरत बन गया है। इस अत्यंत उपयोगी साधन का दुरुपयोग करने वाले बिगड़े नवाबों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता जा रहा है। क्रिकेट सट्टा, चांदी, सोने का सट्टा और भिन्न-भिन्न प्रकार का जुआ मोबाइल और लेपटॉप से खेलने की कलाकारी और बर्बादी की खबरें हर दिन सुनने और पढ़ने में आ रही हैं। अभी हाल ही में शहर के एक रेडिमेड कपड़े की फैक्ट्री के नामी-गिरामी मालिक का बेटा क्रिकेट और चांदी के सट्टे में पंद्रह करोड़ रुपये हार गया। शुरू-शुरू में पांच-सात लाख की कमायी उसके हाथ लगी थी। तब उसे लगा था कि इससे चोखा धंधा और कोई नहीं हो सकता, लेकिन कालांतर में दांव जब उलटे पड़ने लगे तो उसने अपने पिता और मां के बैंक खाते को कब खाली कर दिया और बहन की शादी के लिए घर की अलमारी में सुरक्षित रखे करोड़ों के सोने-हीरे के आभूषण गायब कर दिए किसी को पता नहीं चला। पिता अपने कारोबार में व्यस्त थे और मां को किटी पार्टियों से फुर्सत नहीं थी। वैसे भी उनका अपने बिगड़ैल बेटे पर कोई अंकुश नहीं था। उन्हें उसकी रात-रात भर बाहर रहकर लड़कीबाजी और दारू चढ़ाने की खर्चीली आदत की खबर थी। उन्हें यह भी पता था कि उनका दुलारा जुए का भी शौकीन है। मौज-मस्ती में पच्चीस-पचास हजार रुपये इधर-उधर करता रहता है। लेकिन उस दिन तो उनके पैरोंतले की जमीन ही खिसक गई जब कर्ज में दी गई रकम की वसूली के लिए एकाएक चार-पांच बॉडी बिल्डर अस्त्र-शस्त्र के साथ उनके घर आ धमके। उनके लाडले ने सट्टे में मालामाल होने के लिए जिस गुंडे किस्म के साहूकार से पांच करोड़ का कर्ज लिया था, उसी ने इन्हें वसूली के लिए भेजा था। व्यापारी पिता के लिए कर्ज वसूली के लिए गुंडों का घर आ धमकना किसी सदमें से कम नहीं था। मां तो ऐसी बेहोश हुई कि उसे अस्पताल ले जाने की नौबत आ गई। व्यापारी ने बड़े सधे तौर-तरीके और धैर्य के साथ उनकी सुनी तो पता चला कि मूल रकम तो चार करोड़ थी, लेकिन पांच महीने के मोटे ब्याज की वजह से पांच करोड़ तक जा पहुंची थी। दबंग साहूकार ने काफी सब्र करने के बाद उन्हें वसूली के लिए भेजा था। उसे कारोबारी की हैसियत की भी पूर्ण जानकारी थी। जब उसे कई बार तकादे के बाद भी पैसे नहीं मिले तो मजबूरन दल-बल को भेजना पड़ा। नालायक बेटे के व्यापारी पिता ने अपनी साख पर आंच नहीं आने दी और कुछ ही घंटों में सारा कर्ज चूका दिया और ज्यादा डांटने-फटकारने की बजाय अपने इकलौते बेटे को यह सोचकर सिंगापुर अपनी बेटी के पास भेज दिया कि यदि और भी कोई लेनदार हो तो वह उसकी पकड़ और निगाह से बचा रहे।

धन्ना सेठों पर ऐसे संकट उतनी बिजली नहीं गिराते जितना कि आम मध्यमवर्गीय भारतीयों पर कहर ढाते हुए उनका सबकुछ तहस-नहस करके रख देते हैं। कॉलेज में मेरे सहपाठी रहे अंशुमन शर्मा वर्षों तक स्टेट बैंक की नौकरी करने के पश्चात जब रिटायर हुए तो बहुत प्रफुल्लित थे। कुछ खास दोस्तों के लिए मित्र अंशुमन ने जबलपुर के तीन सितारा होटल में पार्टी भी आयोजित की थी। उसने बड़े शौक से दो मंजिला सर्व सुविधायुक्त घर भी बनवाया था, जिसके गृह प्रवेश का आयोजन भी तभी किया गया था। अंशुमन पूजा-पाठ और धर्म-कर्म में लिप्त रहने वाला प्राणी था। उसने जब चांदी के कप में चाय पिलाई थी तब मित्रों ने सहज तंज कसा था, ‘‘लगता है पंडित जी ने बैंक की मैनेजरी के दौरान अच्छा-खासा माल बटोरा है।’’ तब भाभी जी ने बताया था कि यह तो उनकी शादी के अवसर पर किसी करीबी रिश्तेदार ने उपहार में दिये थे। अंशुमन के इकलौते बेटे ने बीए की आधी-अधूरी पढ़ाई की थी। उसकी बेरोजगारी से ज्यादा उसकी मोबाइल से चिपके रहने की लत को लेकर अंशुमन बेहद चिंतित और परेशान था। दोस्तों ने उसे आश्वस्त किया था कि ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं। आजकल लगभग सभी बच्चे मोबाइल की गिरफ्त में हैं। यदि नौकरी नहीं मिलती तो फिलहाल छोटी-मोटी दुकान शुरू करवा दो। हम सभी दोस्त अपने-अपने ठिकाने चल दिये थे। लगभग छह महीने के बाद खबर मिली थी कि अंशुमन के बेटे पराग ने क्रिकेट सट्टे में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये हारने के बाद आत्महत्या कर ली है। पराग ही अपने पिता के बैंक खाते को देखता-संभालता था। उसने कब जन्मदाता के जीवनभर की जमापूंजी सट्टे में लुटा दी इसका पता पिता को तब चला जब कुछ लेनदारों ने पराग को घर में आकर मारा-पीटा और धमकाया। पराग ने पिता के बैंक खाते को खाली करने के साथ ही कुछ लोगों से मनमाने ब्याज पर लोन भी ले रखा था। अपने बेटे के शव को देखते ही अंशुमन यह कहते हुए बेहोश होकर गिर पड़ा था, हे भगवान, तूने ये क्या कर दिया। मां का तो कलेजा बाहर आ गया था। उसके बाद अंशुमन को होश ही नहीं आया। दो महीने के पश्चात मैं भाभी जी से मिलने के लिए जबलपुर उनके नये निवास स्थान पर गया था। कर्जा चुकाने के लिए उन्हें अपना आशियाना बेचने को विवश होना पड़ा था। भाभी एक कमरे के उजाड़ से घर में अकेली गुमसुम बैठी थीं। उन्हें तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे। एल्युमिनियम के टूटे-फूटे गिलास से धीरे-धीरे पानी के घूंट लेते-लेते मुझे कब सुबकियां आने लगीं मैं ही नहीं जान पाया...।

Thursday, February 19, 2026

जन्म-जन्मांतर!

 इस बार के ‘वैलेंटाइन-डे’ ने किस्म-किस्म की खबरों से मिलवाया। संयोग से मेरा जन्मदिन भी 14 फरवरी को पड़ता है। काफी वर्षों तक तो जन्मदिन  आया गया हो जाता था। हमारे उस दौर में जन्मदिन मनाने का उतना चलन भी नहीं था, जितना इन दिनों है। अब तो प्रेमी वैलेंटाइन वीक मनाते हैं। पूरे हफ्ते भर मौज मस्ती। वैसे भी यदि जीवन में खुशी और आनंद नहीं तो उसके कोई मायने नहीं। कुछ लोगों की शिकायत है कि सच्चा प्रेम धीरे-धीरे गायब हो रहा है। अधिकांश पति-पत्नी के रिश्तों में भी हैरतअंगेज ठंडापन घर करता जा रहा है। आपसी समझदारी और वफा की जगह बेवफाई बढ़-चढ़कर अपनी रंगत दिखा रही है। प्यार पर मिलावट ही मिलावट और बाजारीकरण का कब्जा है, लेकिन प्रेम और सच्चे समर्पण को लेकर मेरी धारणा दूसरों से अलग है। अपवाद हमेशा रहे हैं। कहीं वफा की प्रेरक दास्तानें तो कहीं बेवफाई की दुकानें हैं, जहां प्रेम की बोली लगती है। रिश्तों को रौंद दिया जाता है। प्रेम केवल एक दिन या एक हफ्ता मनाने का पर्व नहीं। दिल से दिल के इस रिश्ते में से पवित्रता, त्याग, सहनशीलता के साथ समर्पण और सहयोग को यदि गायब कर दें तो कुछ भी नहीं बचता। सच्चे प्रेम की यात्रा तो मृत्यु के बाद भी जारी रहती है। मरकर भी प्यार को जिंदा रखने वाले जॉन ने तो वाकई मन को गदगद और तरोताजा कर दिया...। 

सात समंदर पार कैलिफोर्निया की डायना खुद को दुनिया की खुशकिस्मत महिलाओं में से एक मानती है। उसके पति जब जीवित थे तब उसे हर वैलेंटाइन-डे पर ताजे सफेद फूलों के गुलदस्ते के साथ एक कार्ड उपहार में देते थे। कार्ड पर यही मैसेज रहता था, ‘‘मेरे पास सिर्फ एक दिल है और वो तुम्हारा है। तुम हमेशा मेरी वैलेंटाइन रहोगी। आई लव यू डायना।’’ हमेशा खुश रहने वाले जॉन ने इस दस्तूर को 46 वर्ष तक ऐसे निभाया जैसे डायना उसकी पत्नी नहीं, प्रेयसी हो। दुर्योग से 2017 में गंभीर बीमारी के कारण जॉन की मृत्यु हो गई। 2018 में डायना को ऐन वैलेंटाइन-डे पर जॉन का भेजा सफेद फूलों का गुलदस्ता और कार्ड मिला तो वह हतप्रभ रह गई। क्या उसके प्रियतम ने स्वर्ग से उसे उपहार भेजा है? काफी देर तक वह इसी सवाल में उलझी रही। उसके बाद भी जब पांच साल तक ये सिलसिला बना रहा तो डायना ने खोजबीन की तो पता चला कि जॉन को अपनी मृत्यु का काफी पहले आभास हो गया था। उसी दौरान उसने फूलों का गुलदस्ता बनाकर बेचने वाले स्थानीय दुकानदार को एक मुश्त ढेर सारी रकम देते हुए निर्देश दिया था कि मेरी मौत के बाद भी मेरी पत्नी को ताउम्र हर साल वैलेंटाइन सरप्राइज गिफ्ट देते रहना। जॉन को इस दुनिया से रुखसत हुए नौ वर्ष बीत चुके हैं। हर 14 फरवरी के दिन वही सफेद फूलों का गुलदस्ता, वही कार्ड और मैसेज डायना के पास आता है, तो उसकी आंखें नम हो जाती हैं। उसे यही लगता है उसका प्रियतम अभी भी उसके आसपास है। 

‘‘97 साल के बुजुर्ग ने अपनी 50 साल पुरानी साथी से शादी करने की ठानी’’ इस शीर्षक के अंतर्गत छपी खबर का लब्बोलुआब कुछ ऐसा है कि सिंगापुर में रह रहे एक बुजुर्ग की पत्नी वर्ष 2014 में इस दुनिया से चल बसी। पत्नी के गुजरने के बाद बुजुर्ग को अकेलापन काटने लगा। उन्हें ऐसी साथी की जरूरत महसूस होने लगी, जो सरल, सहज और उनके दिल के करीब हो। ऐसे में उन्हें उस महिला की याद हो आई, जिन्हें वे बीते पचास सालों से जानते-पहचानते थे। वह भी अब अकेली थी। उन्होंने उससे संपर्क साधा तो वह भी हमेशा-हमेशा के लिए उनके साथ रहने को राजी हो गई। बेटों ने अपने उम्रदराज पिता के फिर से शादी करने के निर्णय के खिलाफ शोर-शराबा करना प्रारंभ कर दिया। उनका कहना था कि इस उम्र में शादी करना अपना तथा परिवार का म़जाक उड़वाने जैसा है। ‘लोग क्या कहेंगे’ की सोच ने उन्हें इतना बेचैन कर दिया कि वे अदालत की शरण में जा पहुंचे। बेटों ने पिता को मानसिक रूप से कमजोर सिद्ध करने के लिए कई कारण गिनाये। उन्हें भुलक्कड़ और शारीरिक रोगों का शिकार बताते हुए अस्पताल में भर्ती कराने की इच्छा जतायी, लेकिन कोर्ट ने उनकी दलीलों को कोई महत्व नहीं दिया और याचिका खारिज कर दी। महत्वाकांक्षी चुस्त-दुरुस्त बुजुर्ग 1960 के दशक में शुरू की गई एक केमिकल कंपनी के मालिक हैं, जिससे बेतहाशा कमायी हो रही है। दरअसल, उन्होेंने जैसे ही अपनी वसीयत में बदलाव किए तो स्वार्थी बेटों का माथा ठनका कि हो न हो, यह परिवर्तन नये रिश्ते के दिमाग की उपज है। अब तो बुजुर्ग और महिला शीघ्र ही विवाह के बंधन में बंधने जा रहे हैं। 

वैलेंटाइन के दिन भोपाल की एक महिला अफसर के द्वारा खुद से 12 साल छोटे प्रेमी को डेढ़ करोड़ में खरीदने की फिल्मी-सी खबर को पढ़कर मैं कुछ पल तक हक्का-बक्का रह गया, लेकिन फिर अच्छा लगा। किसी भी रिश्ते को जबरन तो नहीं खींचा और स्वीकारा जा सकता। इस खबर की नायिका यानी प्रेमिका की उम्र 54 वर्ष तो प्रेमी 42 वर्ष का है। दोनों कैसे एक दूसरे के करीब आए और जिस्मानी रिश्ते बनाए यह रहस्य अपनी जगह है। अपने से बड़ी रईस औरत का प्रेमी 16 और 12 साल की दो बेटियों का पिता भी है। जब इस नाजायज रिश्ते की वजह से प्रेमी के घर में कलह-क्लेश के कर्कश ढोल-नगाड़े बजने लगे और लोग तरह-तरह की बातें करने लगे तो बदनामी और मानसिक पीड़ा से जूझ रही बड़ी बेटी से रहा नहीं गया तो वह कोर्ट जा पहुंची। हिम्मत और हौसले की डोर से बंधी बेटी को उम्मीद थी कि पिता को ईश्वर सद्बुद्धि देंगे। वे फिर से मां के पास लौट आएंगे, लेकिन काउंसलिंग सत्र के दौरान पिता तो अपनी जिद पर अड़े रहे कि उन्हें जो खुशी-संतुष्टि प्रेमिका के साथ मिलती है, पत्नी के साथ रहने में तो बिल्कुल नहीं मिलती। अब हम दोनों में बेइंतहा दूरियां बढ़ गई हैं। दोबारा करीब आना असंभव है। अब तो प्रेमिका ही मेरे लिए सबकुछ है, जिसकी निकटता मुझे मानसिक शांति से सराबोर कर देती है। पति के इस निर्णय से पत्नी को आघात तो लगा, लेकिन फिर भी उसने खुद को संभालते हुए कहा कि, यह तो घोर अन्याय है। उसकी दोनों बेटियों का भविष्य ही अंधकारमय हो जाएगा। अपने जीते जी वह उनका अहित होते नहीं देख सकती। यदि आपको अपनी जिद से टस से मस नहीं होना है, तो मेरी मांग को ध्यान से सुनें और पूरा करें। मेरी बेटियों के गुजर-बसर के लिए एक शानदार डुप्लेक्स और 27 लाख रुपए नकद दिए जाएं। पत्नी की मांग को सुनकर पति तो चुपचाप सिर झुकाये खड़ा रहा, लेकिन उसकी प्रेमिका ने सारी शर्तें मानते हुए बहुत धैर्य के साथ कहा वह अपने प्रेमी के परिवार को बेसहारा, आर्थिक संकट से जूझते नहीं देखना चाहती। इसलिए मैं अपनी सारी जमा-पूंजी सहर्ष उन्हें देने को तैयार हूं। पत्नी ने लगभग डेढ़ करोड़ की संपत्ति और कैश लेकर अपने पति को अपनी सौतन के हवाले कर दिया है, ‘‘जाओ, अब तुम्हें कोई नहीं रोके-टोकेगा। तुम अपने मन की करने के लिए हर तरह से आजाद हो।’’

सच्चे प्रेम और आत्मिक समर्पण के लिए अमित को  मेरा बारंबार झुक-झुककर सलाम। पुणे के निवासी अमित की पत्नी श्रेष्ठा को कैंसर हो जाने पर कोल्हापुर के एक कैंसर सेंटर में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। कीमोथेरेपी के दौरान श्रेष्ठा के देखते ही देखते काले घने बाल झड़ गये। अमित ने जब अपनी प्रिय पत्नी की यह हालत देखी तो वह बहुत उदास होकर सोचने लगा कि ऐसे में श्रेष्ठा पर क्या बीत रही होगी? शादी के समय सात फेरे लेते वक्त उसने श्रेष्ठा से यह वादा भी किया था कि हर जंग हम दोनों साथ मिलकर लड़ेंगे। वह तुरंत सैलून पहुंचा और अपना सिर मुड़वा लिया। अमित ने श्रेष्ठा और अपनी गंजी तस्वीर फेसबुक पर डालते हुए लिखा, ‘‘बाल तो उग आएंगे, लेकिन प्यार का साथ अमर है...। श्रेष्ठा हम योद्धा हैं। जन्म-जन्मांतर तक साथ मिलकर लड़ेंगे।’’

बीते 14 फरवरी के दिन ही मेरी मित्र रेवती ने अनुराग से तलाक लिया था। इस बार के वैलेंटाइन-डे पर उसने अरबपति सुखसागर खन्ना से शादी कर ली। मजे की बात यह रही कि रेवती और सुखसागर के ब्याह के अवसर पर अनुराग भी उपस्थित था। सभी झूम-झूमकर नाचे। रिश्ते के टूटने को उत्सव की तरह मनाने के लिए रेवती ने जो ‘डिवोर्स रिंग’ पहनी उसे उसी हीरे की अंगूठी को तोड़कर बनाया गया था, जो कभी अनुराग ने उसे सगाई के अवसर पर पहनाई थी। उसे ही ‘डिवोर्स रिंग’ नाम दिया गया। रेवती  आकाशवाणी में ऊंचे पद पर है। अनुराग भी देश के नामी-गिरामी लेखक हैं। सुखसागर दिल्ली के बड़े उद्योगपति हैं।

Thursday, February 12, 2026

तो फिर ऐसे कैसे?

चित्र : 1. यह कितनी हैरान और परेशान कर देने वाली खबर है कि एक खरबपति ने गोली मारकर खुद का काम तमाम कर दिया। गरीबों, असहायों, बेरोजगारों, अशिक्षितों और बीमारों की खुदकुशी की खबरें तो एक बारगी समझ में आती हैं, लेकिन जिस रईस के पास खुद का प्राइवेट जेट, बारह रोल्स रॉयस कारों के साथ-साथ और पचासों महंगी से महंगी लग्जरी कारें, आलीशान बंगले, फार्म हाउस और अरबों-खरबों की कमायी वाले उद्योग धंधे हों वो आत्महत्या कर इस दुनिया से चलता बने तो माथा ही घूम जाता है। बेंगलुरु के विख्यात रियल एस्टेट टाइकून और कॉन्फिडेंट ग्रुप के चेयरमैन ने जिस वक्त खुद को गोली मारी तब उसके कारोबारी ठिकानों पर इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी चल रही थी। उद्योगपतियों, व्यापारियों, तरह-तरह के कारोबारियों के यहां आयकर के छापे पड़ना कोई नई और अजूबी घटना नहीं। ऐसा भी नहीं कि सीजे रॉय के यहां आयकर के अधिकारियों ने पहली बार दबिश दी होगी। उनसे कैसे निपटा जाता है, इसका भी ‘गुरुज्ञान’ उसे रहा ही होगा।

 आजकल के भागा-भागी के दौर में सी.ए. यानी चार्टर्ड अकाउंटेंट की दिमागी कलाकारी बड़े-छोटे हर उद्योगपति की लगभग हर समस्या का चुटकी बजाते हुए समाधान कर देती है। कौन नहीं जानता कि सीए और अधिकारियों की सेटिंग का चोली दामन का साथ क्या-क्या गुल खिलाता है और काले धंधे वालों का भी बिगड़ा काम संवर जाता है। ऐसा भी नहीं कि बगैर मेहनत के सीजे रॉय पर दौलत बरसी थी। बचपन उसका गरीबी में बीता था। उसने तभी धनपति बनने की राह पकड़ने की ठान ली थी। उसकी महत्वाकांक्षा और मनोबल को उजागर करते कई किस्से उसकी मौत के बाद पढ़ने-सुनने में आते रहे। 

जब वह मात्र 13 वर्ष का था, तब वह बेंगलुरु में स्थित एक विशाल कार के शोरूम में ‘डॉल्फिन’ कार को ऐसे देखे जा रहा हो जैसे उसे खरीदने के लिए पहुंचा हो। शोरूम के सेल्समैन ने उसे यह कहकर चलता कर दिया था कि, ‘‘चल भाग यहा से। कार को ऐसे घूर रहा है, जैसे कोई बड़ा धनवान खरीददार हो। पहले अपनी उम्र और औकात तो देख। फौरन चल निकल यहां से।’’ खेलने-कूदने की उम्र में अपमान की चोट खाये स्वाभिमानी बच्चे ने तभी ठान लिया था कि एक दिन वह दुनिया की एक नहीं कई महंगी से महंगी आलीशन कारें खरीदेगा और इस जैसे बदतमीज सेल्समैन देखते रह जाएंगे। 36 वर्ष की उम्र में बिना किसी बैंक से एक पैसा उधार लिए प्राइवेट जेट खरीदने वाले रॉय के यहां अभी भी दो सौ से ज्यादा लग्जरी कारें खड़ी हैं। उसका नाम देश की सबसे महंगी कारों के मालिक तथा सबसे बड़े गैरेज वाले रईसों में शामिल है। रॉय को फिल्में बनाने का भी शौक था। उसकी बनायी चार मलयालम फिल्में विभिन्न सिनेमाघरों में अभी भी दर्शकों का मनोरंजन कर रही हैं, लेकिन वह अब इस दुनिया में नहीं हैं। खुद को खून से लथपथ कर खत्म करने वाले रॉय की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। उसकी पत्नी, बेटा और बेटी दुबई में रहते थे। वह अकेले ही अपने व्यापार के साम्राज्य को बढ़ाने में लगा था। उसने धन तो कमाया, लेकिन करीबी रिश्तों के मामले में गरीब होता चला गया। बचपन वाला साहस और मनोबल भी पीछे छूट गया। वैसे भी धन का अंबार धीरे-धीरे इंसान को अपना गुलाम बना लेता है। अपने साम्राज्य के छिनने और बर्बाद होने का भय सोचने-विचारने की शक्ति भी छीन लेता है। 

चित्र : 2. चमकते-दमकते नगरों, महानगरों में रहने की चाह के चलते भारत के गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। अधिकांश युवा गांव में रहकर खेती-बाड़ी या व्यापार करने की बजाय शहर में छोटी-मोटी नौकरी की तलाश में चप्पलें घिसते नज़र आते हैं। गांवों की आबोहवा उन्हें रास ही नहीं आती। शहरों में निरंतर बढ़ती आबादी को संभालने के लिए शासन और प्रशासन को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। मुंबई जैसे महानगरों में दूसरे प्रदेशों से आने वाले लोगों पर विराम लगाने की मांग किसी से छिपी नहीं है। मायानगरी मुंबई, देश की राजधानी दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, गुरुग्राम जैसे भौतिक सुविधाओं से परिपूर्ण नगरों का आकर्षण ही कुछ ऐसा है कि भीड़ निरंतर खिंची चली आ रही है। हर किसी को कहीं भी रहने और मन की करने की आज़ादी है। वैसे भी आज के इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील हिंदुस्तान में कोरोना के पश्चात अधिकांश भारतीयों की सोच में अभूतपूर्व बदलाव आया है। लोग अब धनसंचय में कम और खर्चने में अधिक विश्वास करने लगे हैं। जब सामने सुख-सुविधाओं का अंबार लगा है तो मन मसोस कर क्यों जीना? आज हैं कल का क्या भरोसा? ऐसे सुविधाभोगी काल में कुछ हकीकतें पैरोंतले की जमीन खींचती लगती हैं। 

अपने ही देश के प्रदेश तेलंगाना के अश्वरावुपेटा मंडल में स्थित घने जंगलों की एक ऊंची पहाड़ी पर मात्र एक आदिवासी परिवार अकेला रहकर बहुत खुश और संतुष्ट है। पच्चीस वर्षों से घने जंगल में अपने अंदाज से आनंदमय जीवन जीते इस परिवार के मुखिया गुरुगुंटला रेडैया, उसकी पत्नी लक्ष्मी और पुत्र गंगिरेड्डी को प्रशासन ने अनेकों बार पहाड़ी से नीचे आकर रहने को कहा, लेकिन वे नहीं माने। स्वच्छ पानी, बिजली, अस्पताल, शिक्षा, फोन जैसी सुविधाओं के प्रति इच्छा और रुचि नहीं रखने वाला तीन सदस्यों का यह परिवार लोगों के बीच जाने से भी कतराता है। हां, लक्ष्मी जरूर कभी-कभार पहाड़ के नीचे चली जाती है, जहां पर उसकी बेटी की ससुराल है। लक्ष्मी ने बताया कि उनके कुल 9 बच्चे हुए थे, जिनमें से सात की मौत हो गई। अब तो केवल बेटा और बेटी ही बचे हैं। लक्ष्मी अपने पति और बेटा-बेटी को अपनी जान से ज्यादा चाहती है। उसका कहना है कि मेरे पति जहां रहेंगे, मैं भी वहीं रहूंगी। बेटा भी अपने माता-पिता के साथ रहने, जीने-मरने की ठाने है। पत्रकारों ने गुरुगुंटला और उसकी पत्नी लक्ष्मी से जब जानना चाहा कि क्या उन्हें घने जंगल में जंगली जानवरों का भय नहीं सताता तो लक्ष्मी तुरंत बोल पड़ी कि दिन में तो सूरज होता है और रात में चांद और तारे। जब बहुत सर्दी पड़ती है, तब हम अलाव जलाते है। यहां हर तरह की सूखी घास मिल जाती है, जिसे जलाते ही अंधेरा और सर्दी दोनों भाग खड़े होते हैं। कोई जानवर भी आसपास नहीं आता। हम तो बड़े मजे से यहां पर चावल और बाजरा के साथ-साथ सब्जियां उगाते और खाते हैं। पास की नदी से पीने का पानी भी मिल जाता है। यहां जंगल में उनकी खुद की पांच झोपड़ियां हैं। तीनों के रहने के लिए अलग-अलग झोपड़ी है। कुत्ते और मुर्गियों के लिए एक तो लकड़ी-जलावन को बारिश से बचाने के लिए एक अलग झोपड़ी है। उनका बेटा गंगिरेड्डी अनपढ़ है। अभी तक उसने शादी नहीं की है। यदि कोई मनपसंद लड़की उनके साथ पहाड़ पर आकर रहने को तैयार होगी, तभी वह उससे ब्याह करेगा।

इस पहाड़ी के घने जंगल में कभी एकसाथ 40 आदिवासी परिवारों का बसेरा था। प्रशासनिक अधिकारी वर्षों तक उन्हें आधुनिक संसार के बारे में बताते और समझाते रहे कि यहां जंगल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना संभव नहीं है। इसलिए उन्हें पहाड़ी से तीन किलोमीटर नीचे आना ही होगा। यहां पर बिजली, पानी और बच्चों की शिक्षा तथा सभी के लिए चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवा दी जाएंगी। अंतत:, अधिकारियों की वर्षों की मेहनत रंग लाई। उन 40 परिवारों में से 39 परिवार मान गए। सभी के लिए पहाड़ी की तलहटी में बसाई गई सर्व सुविधायुक्त पुनर्वास कॉलोनी में रहने की व्यवस्था कर दी गई। पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं। यह इकलौता परिवार तब भी नहीं माना था और आज भी अपनी जिद पर कायम है। नीचे आकर रहने वाले कई परिवारों के बच्चे अब पढ़-लिखकर प्राइवेट और सरकारी नौकरी कर मजे से रह रहे हैं, तो कुछ अपने निजी व्यवसाय को शिखर पर पहुंचाने का प्रेरक इतिहास रच रहे हैं।

चित्र : 3. हर आदमी, औरत की तमन्ना होती है कि उनका अपना घर हो। जहां वे सर्दी, गर्मी, बरसात और आंधी-तूफान से सुरक्षित बचे रहें। ऐसे घरों की कल्पना ही डरा देती है, जिनमें छत, दरवाजे और दीवारें नदारद हों। यहां तक कि कोई तय शुदा पता तक न हो। अपने ही देश में कई लोग खुले आकाश के नीचे जीने-मरने को विवश हैं। बहुत ही कम भारतीय इस सच से वाकिफ होंगे। दरअसल, ऐसी खबरें उन तक पहुंचती ही नहीं या वे इस हकीकत से रूबरू ही नहीं होना चाहते कि रोटी, कपड़ा और मकान के लिए हमारी ही तरह इस धरती पर जन्में इंसानों को कैसे-कैसे संघर्ष करने पड़ रहे हैं। आंध्रप्रदेश के पोलावरम जिले में स्थित सबरी नदी पर कुछ परिवार कई सालों से नावों में रह रहे हैं। ये मेहनतकश 11 मछुआरों का परिवार है, जिन्होंने नाव केऊपर तिरपाल लगा रखी है। उसके नीचे अलमारियां और चावल के बक्से हैं। तेल, साबुन, सब्जी और सभी घरेलू सामान व्यवस्थित ढंग से बिल्कुल वैसे ही रखे हुए हैं, जैसे हम और आप अपने सजे-धजे घरों में रखते हैं। नाश्ता, खाना-पीना, सोना-जागना सब इनका नाव पर ही होता है। इन्हीं नावों पर ही जन्में बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे हैं। कुछ स्कूल भी जाने लगे हैं।

जीविकोपार्जन के लिए अपने गृहनगर से 130 किलोमीटर दूर रहने को मजबूर यह लोग दिन-रात मछली पकड़ने के अभ्यस्त हैं। कभी-कभी किसी-किसी परिवार को मछली पकड़ने के लिए हफ्तों तक अलग जगह पर रहना पड़ता है। उन्हें भले ही दिन में मछली पकड़ना अच्छा लगता है, लेकिन जब अंधेरा हो जाता है तो नावों में बच्चे डर जाते हैं। दूर से आती लोमडियों की आवाजें उनका दिल दहलाती हैं। मछली पकड़ने के लिए गए मां-बाप का इंतजार करते बच्चे धीरे-धीरे सर्दी, गर्मी और बरसात की मार सहने के भी आदी हो गये हैं। रात को अचानक बीमार पड़ने पर भगवान भरोसे रहना पड़ता है। एक मां का कहना है कि हम अपने बच्चों को अपने जैसा नहीं बनाना चाहते। भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन उनकी पढ़ाई में व्यवधान नहीं होने देंगे। हमारे बुजुर्गों ने हमे नाव दी। हम बच्चों को बेहतर जिन्दगी देने की कोशिश कर रहे हैं। मछुआरे अपनी नाव को मंदिर मानते हैं। नावों के नाम भी हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर रखे गए हैं। नाव पर रखे तुलसी के पौधे की किसी बच्चे की तरह देखरेख करते हुए उसे मुरझाने नहीं दिया जाता। नाव पर चप्पल नहीं पहनते। नंगे पैर रहते हैं।

Monday, February 9, 2026

कभी न आने वाला कल

संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, वाईएस राजशेखर रेड्डी, जीएमसी बालायोगी, ओपी जिन्दल, विजय रूपानी, दोरजी खांडू जैसे और भी कुछ नेताओं की विमान दुर्घटना में हुई मौत की अत्यंत दु:खद श्रृंखला में एक नाम और जुड़ गया। महाराष्ट्र के कद्दावार राजनेता, समय के पाबंद उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती हवाई अड्डे के रनवे पर लैंडिग के दौरान घटी भयावह प्लेन दुर्घटना में मौत हो गई। उनके साथ विमान में सवार चार अन्य लोगों की भी जान चली गई। इस दर्दनाक दुर्घटना ने प्रदेश और देशवासियों को गमगीन और स्तब्ध कर दिया। 

अजित पवार महाराष्ट्र के अत्यंत महत्वाकांक्षी नेता थे। जो मन में होता था उसे छिपाते नहीं थे। कभी-कभी तो वे ऐसा कुछ कह जाते थे, जो अशोभनीय होता था और सुनने वाला अवाक रह जाता था। उनकी स्पष्टवादिता किसी के लिए दंश तो किसी को सचेत करने वाली भी होती थी। किसी चुनावी मंच पर उन्होंने अपने चाचा शरद पवार पर इस शाब्दिक अंदाज में आक्रमण कर आपसी रिश्ते बिगाड़ लिए थे, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि शरद पवार हमारे लिए देवता हैं, लेकिन हर नेता का अपना समय होता है। अस्सी वर्ष की उम्र पार करने के पश्चात नए लोगों को अवसर मिलना चाहिए या नहीं? मैं भी 60 वर्ष की उम्र पार कर चुका हूं। क्या हमें मौका नहीं मिलना चाहिए था? अगर मैं उनका बेटा होता तो यकीनन उन्होंने मुझे बेहतरीन अवसर दिया गया होता। चूंकि मैं उनका बेटा नहीं, इसलिए मेरी हमेशा अनदेखी होती रही है।’’ इसी अंदरूनी कड़वाहट के चलते ही जुलाई 2023 में भतीजे अजित पवार सभी को चौंकाते हुए अपने चाचा शरद पवार से अलग हो गए थे। राजनीति के चाणक्य माने जानेवाले शरद पवार को भतीजे का यह कदम अत्यंत आहत कर गया था, लेकिन तब उनके मन में यह विचार भी जरूर आया होगा कि जिसे मैंने राजनीति के दांव-पेंच सिखाए वही मेरे सामने सीना तान कर खड़ा हो गया। दरअसल, राजनीति की यही रणनीति है। यहां कोई किसी का सगा नहीं। खून के रिश्तों की नसों में से कब खून गायब हो जाए और पानी समा जाए पता ही नहीं चलता। वैसे भी अपनी पुत्री सुप्रिया सुले को अपनी विरासत सौंपने के लिए कुछ भी कर गुजरते आए राष्ट्रवादी कांग्रेस के संस्थापक शरद पवार अवसरवादिता की जगजाहिर मिसाल रहे हैं। उन्होंने उसी की जड़ें काटीं, जिन्होंने कभी उन्हें खाद पानी दिया था। यहां यह कहना भी गलत नहीं कि मतलब परस्ती और ‘जिधर दम उधर हम’ का मूलमंत्र अजित पवार ने उन्हीं से जाना और सीखा था। अजित पवार पर कितने-कितने भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। फिर भी वे सतत विधायक, सांसद, मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनते रहे। मतदाताओं को कैसे लुभाना है, अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को किस तरह से खुश रखना है और सत्ता की मलाई का भरपूर स्वाद कैसे लेते रहना है, इसमें यदि वे पारंगत नहीं होते तो विशाल प्रदेश महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने की बलवती उम्मीद उनमें अंत तक रची-बसी नहीं रहती। 

प्रदेश के इस धाकड़ नेता को सदा-सदा के लिए दुनिया छोड़े अभी तीन दिन ही हुए थे कि उनकी सांसद पत्नी सुनेत्रा पवार को प्रदेश की उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी गई। एक शोकग्रस्त पत्नी को राजनीति के धुरंधर खिलाड़ियों ने अश्रु बहाने तक की मोहलत नहीं दी। प्रदेश की सत्ता पर फटाफट उन्हें ऐसे विराजमान करवा दिया गया, जैसे कुर्सी को हथियाने वालों की भीड़ लगी हो या प्रदेश में पहली बार महिला को उपमुख्यमंत्री बनाने की राह में अड़चने डालने वालों के रातों-रात एकजुट होने का घातक खतरा मंडरा रहा हो। जिस तरह से उनके पति-परमेश्वर पर सिंचाई विभाग में अरबों-खरबों के संगीन घोटालों के आरोप लगते रहे, वैसे ही उन पर भी सहकारी बैंक के हजारों करोड़ रुपयों को आर-पार करने के दाग-धब्बे लगे हुए हैं। खुद को सही ठहराने के लिए सत्ताधीशों के पास बहानों और तर्कों की कमी नहीं होती, लेकिन आम भारतीयों की निगाह में तो यह राजसी ताजपोशी सत्ता की अथाह भूख में समाहित बेशर्मी ही है। हर किसी को चिंतित और दिल दहला देने वाली चार्टर प्लेन की दुर्घटना में पवार के सुरक्षा कर्मी, पायलट, को-पायलट तथा फ्लाइंग अटेडेंट की मौत से भी उनके परिजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस तरह से अजित पवार के कुछ सपने अधूरे रह गए, वैसे ही इन मृतकों की कई चाहतों ने भी दम तोड़ दिया। ड्यूटी के दौरान हुई इनकी मृत्यु को कुछ संवेदनशील भारतीयों ने शहादत का दर्जा देते हुए सोशल मीडिया में लिखा और चेताया कि इतिहास में राजा की मौत का तो भरपूर जिक्र होता है, उसे शहीद का दर्जा देने में भी देरी नहीं की जाती, लेकिन उनके रक्षकों और सेवकों को अपनी जान की कुर्बानी देने के बावजूद मान-सम्मान देने में नेता तो नेता, मुख्य धारा का मीडिया भी कंजूसी करता है। उन्हें ठीक से याद तक नहीं किया जाता। यह अलग बात है कि उन्हें दो-चार लाख की सहायता तथा भविष्य में उनके परिवार का ख्याल रखने के आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाता है। अजित पवार के निजी सुरक्षा रक्षक कांस्टेबल विदीप जाधव को उनके साथी अनुशासन, निष्ठा सतर्कता, ईमानदारी और वफादारी का प्रतिरूप मानते थे। दरअसल, विदीप जाधव ऐसे कर्मठ सिपाही थे, जिन्होंने कभी भी अपनी डयूटी घड़ी का कांटा देखकर नहीं की। अजित पवार को अपने इस अंगरक्षक पर अपार भरोसा था। कभी-कभार राजनीतिक यात्रा के दौरान अजित दादा उन्हें अपने घर का खाना तक अपने साथ बिठाकर खिलाते थे। जब जाधव के घर उनके नहीं रहने की खबर पहुंची तब उनकी पत्नी मायके गई हुई थी। मां को बेटे के कहे अंतिम शब्द बार-बार याद आ रहे थे कि शाम तक घर लौट आऊंगा। मां उसे घर के जिस दरवाजे तक छोड़ने गई थी उसे ही निहारती रही। जैसे उसे यकीन हो कि बेटा जरूर लौटेगा। 

विमान की को-पायलट शांभवी पाठक की मार्च में शादी होने वाली थी। मां-बाप तो अपनी इस हंसमुख बेटी को खुशी-खुशी विदा करने के सपने देख रहे थे, लेकिन उन्हें बड़े भारी मन से उसकी अर्थी उठानी पड़ी। दिल्ली के सफदरजंग एनक्लेव स्थित शांभवी के नये घर में बस मातम सन्नाटा छाया हुआ था। घर की चमकती-दमकती दीवारें पूछ रही थीं कि एक होनहार पायलट की हौसले की उड़ान ऐसे कैसे थम गई? फ्लाइट अटेंडेंट पिंकी माली उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले में स्थित भैरव गांव की रहने वाली थी। विमान हादसे के एक दिन पहले ही उसने अपने पिता को बताया था कि, पापा मैं अजित दादा के साथ बारामती जा रही हूं। उन्हें छोड़ने के बाद नांदेड़ जाऊंगी और होटल पहुंचते ही आपसे अच्छी तरह से बात करूंगी और इस यात्रा के अनुभवों के बारे में बताऊंगी, लेकिन वह कल नहीं आया। कभी आयेगा भी नहीं। पिंकी ने कुछ दिन पहले ही अपने भाई को बताया था कि, वीएसआर चार्टर विमान कंपनी के पायलट ज्यादा अनुभवी नहीं हैं। उनका व्यवहार भी ठीक नहीं है। पिंकी पिछले दो वर्षों से इसी कंपनी में काम कर रही थी। जिसके विमान ने दुर्घटनाग्रस्त  होकर उसकी जिन्दगी की यात्रा पर दुखदायी विराम लगा दिया।

पायलट सुमित कपूर मूलत: दिल्ली के रहने वाले थे। उनके पास 16,500 घण्टों से अधिक का अनुभव था। यह भी सच है कि कैप्टन कपूर का रिकार्ड ठीक नहीं था। उन्हें सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने के कारण निलंबित भी किया गया था। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली एयरपोर्ट पर दिल्ली-बंगलुरु उड़ान से पहले वे ‘ब्रेथ एनलाइजर’ टेस्ट में शराब के नशे में धुत पाए गए थे। दूसरी बार दिल्ली से गुवाहाटी की उड़ान के दौरान वे फिर से नशे की हालत में ड्यूटी पर मौजूद पाए गए। दूसरी बार पकड़े जाने पर उनके प्रति सख्त रुख अपनाया गया और उन्हें तीन साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। किसी भी कमर्शियल पायलट के लिए 3 साल का सस्पेंशन करियर का अंत माना जाता है, लेकिन फिर भी उन्होंने पता नहीं कैसे वापसी कर ली और ‘वीएसआर वेंचर्स’ जैसे निजी ऑपरेटर कंपनी के साथ जुड़कर वीआईपी उड़ानें भरने लगे। ऐसे में प्राइवेट आपरेटर पर भी सवाल उठे जिसने एक विवादित ट्रैक रिकॉर्ड वाले पायलट को राज्य के उपमुख्यमंत्री की सुरक्षा सौंपी!