यह खबर कितनी चौकाने वाली है कि भारत के कई बच्चे तनाव और डिप्रेशन के शिकार हैं। उन्हें पाठयपुस्तकों के साथ-साथ पालकों के दबाव और आकांक्षाओं से जूझना पड़ रहा है। अधिकांश अभिभावक सख्त अनुशासन की डोर में बांधे रख किसी भी तरह से उन्हें डिग्रीधारक होते देखना चाहते हैं। उनके मन में यह यकीन घर कर चुका है कि कोई भी छोटी-बड़ी डिग्री उन्हें नौकरी तो दिला ही देगी। कई बच्चे बनना कुछ चाहते हैं और उनके माता-पिता की चाहत और होती है। ऐसे में उनके बीच जो कहा-सुनी और टकराव होता है, उससे वो भारतीय खूब वाकिफ हैं, जिन्हें अपनी सख्ती और जिद की वजह से औलाद से दूर होना पड़ता है। बहुतेरे मां-बाप ऐसे हैं, जो मानते हैं कि बच्चों को प्यार से नहीं, सख्ती से पालना चाहिए। दरअसल, अपने यहां बच्चों का समुचित मार्गदर्शन करने की बजाय इधर-उधर के उदाहरणों को पेश कर नीचा दिखाने की अत्यंत पुरातन परिपाटी है। किसी रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी के बेटे-बेटी की सफलता की कहानियां मन में बसाये अभिभावक अपनी संतानों को किसी से कमतर नहीं देखना चाहते। कई भारतीयों को ज्ञात ही नहीं होगा कि विश्व में एक देश ऐसा भी हैं, जहां के बच्चे पालकों की ऐसी-वैसी विभिन्न बंदिशों से आजाद है। इस देश का नाम है नीदरलैंड। नीदरलैंड को कभी हॉलेंड के नाम से भी जाना जाता था। उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक अत्यंत समृद्ध और विकसित देश नीदरलैंड दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य और कृषि उत्पाद निर्यातक देश है। यहां की अर्थव्यवस्था प्रमुख रूप से कृषि, भोजन प्रसंस्करण और पेट्रोकेमिकल पर आधारित है। यहां की आधिकारिक भाषा ‘डच’ है। यहां के लोग दुनिया में सबसे लंबे माने जाते हैं। खुले विचारों वाली सोच और नीतियों के लिए जाने जानेवाले नीदरलैंड को विश्व के सबसे खुशहाल और सुरक्षित देशों में गिना जाता है। इस देश में अपनी संतानों को बचपन से ही प्यार और सुरक्षा का अहसास कराया जाता है। यहां पर दस साल की उम्र तक बच्चों को स्कूलों में कोई होमवर्क नहीं दिया जाता। वहां के लोगों की धारणा है कि एक तनावग्रस्त बच्चा कभी भी बेहतर नागरिक नहीं बन सकता। जहां के बच्चे खुश नहीं वहां के वयस्क भी खुशहाल नहीं हो सकते। दरअसल, नीदरलैंड में सफलता के मायने हैं एक सुनियोजित और चिंतामुक्त जीवन जीना। जहां विश्व के अधिकांश देशों में यह माना जाता है कि किसी भी तरह से कामयाबी हासिल करो, लेकिन नीदरलैंड के बड़े-बुजुर्ग तथा माता-पिता मानते हैं कि यदि बच्चा खुश और संतुष्ट रहेगा तो कामयाबी खुद-ब-खुद उसके कदम चूमेगी। एक प्रसन्न, तनावमुक्त बच्चा ही खुद को बेहतर समझ पाता है। वह अंदर से मोटिवेटेड रहता है और समाज से जुड़ना सीखता है। उसके लिए सफलता का मतलब सिर्फ ऊंचे ओहदे तक पहुंचना नहीं, बल्कि एक आजाद और मानसिक रूप से मजबूत इंसान बनना है। डच समाज कहने में नहीं करने में यकीन रखता है। उन्हें भौतिक सुखों के लिए आड़े-टेढ़े रास्तों में भटकना और हवा में उड़ना कतई पसंद नहीं।
डच समाज में रिश्तों को निभाने की गजब की कला समाहित है। वहां पर परंपरा के तौर पर ‘पापा डे’ को निभाने का चलन है। इस दिन सभी पापा खास तौर पर बच्चों के साथ भरपूर समय बिताने तथा उनका हालचाल जानने के लिए छुट्टी लेते हैं। उनकी समस्याओं को गौर से सुनते हुए समाधान से अवगत कराते हैं। इससे बच्चों को सही और गलत का पता तो चलता ही है, निर्णय लेने की क्षमता और मनोबल में वृद्धि होती है। अभिभावकों की प्रेरणा का ही प्रतिफल है कि वहां के बच्चे ब्रांडेड कपड़ों या महंगे खिलौने की लालसा करने की बजाय साइकिल चलाने और मिट्टी में खेलने का आनंद लेकर प्रफुल्लित हैं। नीदरलैंड की सड़कों पर छोटे-छोटे बच्चों को खुद साइकिल चलाकर स्कूल जाते देखना दूसरे देशों से पहुंचने वाले पर्यटकों को भी आनंदित करता है। इस अनोखे देश में भारत की तरह बच्चों की निगरानी और टोका-टोकी की कोई जगह नहीं। बच्चों के गिरने पर खुद संभलने की सोच में यकीन रखने वाले माता-पिता का मानना है कि यही भावनात्मक आजादी उनके बच्चों को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है।
धनवानों की सोच और उनके जीवन जीने के तौर-तरीकों के बारे में सभी की लगभग एक जैसी धारणा है। अधिकतर धनपति खुद तो दुनियाभर की सुख-सुविधाओं के भोगी होते ही हैं, अपनी संतानों को भी सुविधाभोगी और आरामपरस्त बना देते हैं। उनका मानना होता है कि हमने धन कमाया ही अपने बाल-बच्चों के लिए है तो ऐसे में उन्हें कोई तकलीफ क्यों होने दें। अपनी संतान के लिए किसी भी तरह की कोई कमी न होने देनेवाले रईसों को तो आपने भी जरूर देखा होगा, लेकिन शेख खलफअल हब्तूर जैसे खरबपति शायद ही देखे और सुने होंगे, जिन्होंने कॉलेज से अच्छी-खासी पढ़ाई और डिग्री लेने वाले अपने इकलौते बेटे को अपने हजारों करोड़ के व्यावसायिक साम्राज्य की गद्दी पर तुरंत विराजमान कराने की बजाय होटलों में बर्तन धोने, झाडू-पोछा लगाने और वेटर के तौर पर काम करने का जमीनी अनुभव लेने के लिए कई महीने तक खुद से दूर रखा। हाल ही में एक कार्यक्रम में खलफ अल हब्तूर ने उदाहरणों के साथ कहा कि, ‘‘डिग्री जरूरी है, लेकिन अनुभव उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। असली इंजीनियरिंग, असली मैनेजमेंट, असली काम... साइट पर जाकर ही समझ में आता है। सिर्फ किताबें पढ़कर कोई भी करियर नहीं बनता। फील्ड में उतरने से जो सीख मिलती है, वही किसी को प्रोफेशनल बनाती है।’’ अल हब्तूर ग्रुप के चेयरमैन शेख खलफ अल हब्तूर 1.35 लाख करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं। उनका कारोबार होटल्स, रियल एस्टेट, ऑटो मोबाइल, शिक्षा और प्रकाशन जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ है। 2023 में 100 अफगान छात्राओं को यूएई की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप दे चुका यह खुद्दार और उदार खरबपति हर साल करोड़ों-करोड़ों रुपये का दान करने के बावजूद दानवीर होने का वैसा ढिंढोरा नहीं पिटता। जैसा कि भारत में पीटा जाता है। उनका मानना है कि जमीनी संघर्ष विनम्रता और समय की कीमत से अवगत कराने के साथ-साथ चुनौतियों का सामना करना भी सिखाता है। जब कभी चीजें आपकी सोच और योजना के मुताबिक न हो रही हों तो घबराने की बजाय कुछ देर तक शांत रहकर चिंतन-मनन करते हुए खुद को और सीखने और जानने का समय दें। अनिश्चितता से डरकर भागना छोड़ उसे आत्मसात करने वालों को सफलता जरूर मिलती है।
मनचाही सफलता पाने के लिए कम्फर्ट जोन से बाहर आना जरूरी है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है। एक समस्या खत्म होती है तो दूसरी छाती तानकर सामने आ खड़ी होती है। मोबाइल की वजह से भारत के बच्चे और बड़े किस तरह से अस्त-व्यस्त हो रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है। अनेकों माता-पिता अपने लाडले, लाडलियों की मोबाइल की लत की वजह से चौबीस घंटे परेशान रहते हैं। यह भी सच है कि कोई भी समस्या ऐसी नहीं, जिसका समाधान न हो। बेलगावी जिले के हलगा गांव के सजग लोगों ने जब गौर किया कि उनके यहां के बच्चे पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मोबाइल तथा टीवी देखने में अपना अधिकांश समय बर्बाद कर रहे हैं तो चिंता के मारे उनकी नींद जाती रही। ऐसे में ग्राम पंचायत भी सतर्क हो गई। बहुत सोच-विचार के बाद रास्ता भी निकाल लिया गया। गांव में हर शाम ग्राम पंचायत कार्यालय से एक सायरन बजता है, जो लोगों को टीवी को तुरंत बंद करने तथा मोबाइल फोन अलग रखने का संकेत देता है। पिछले दिसंबर माह से यह संकेत दो घंटे के डिजिटल डिटॉक्स यानी एक सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। पंचायत अधिकारियों का कहना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा घरों में इस नियम का पालन किया जा रहा है। विद्यार्थी कम अज़ कम दो घंटे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर समय का सदुपयोग कर रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। हलगा गांव ने जो रास्ता दिखाया है, यदि चाहें तो हम और आप भी उसका अनुसरण कर सकते हैं...।

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