Thursday, April 30, 2026

छपे शब्दों की छाप

अपने देश में कभी काफी अखबार और पत्रिकाएं छपती और खूब बिकती थीं। किताबों के प्रति भी पाठकों का अथाह लगाव और जुनून देखते बनता था, लेकिन अब वो दिन नहीं रहे। अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो चुका है। अखबारों की प्रसार संख्या में भी अकल्पनीय कमी आ चुकी है। कोरोना की महामारी ने जहां कई समाचार पत्रों को बेमौत मारा तो वहीं जो किसी तरह से बचे रह गये उनकी क्या हालत है, उसकी हकीकत अखबार मालिक ही जानते-समझते हैं, लेकिन खुलकर बता नहीं सकते। उस पर सोशल मीडिया ने भी गजब का कहर ढाया है। पुस्तकों के अधिकांश प्रेमी भी सोशल मीडिया के होकर रह गये हैं। एक से एक साहित्यिक पुस्तकें धड़ाधड़ छपती हैं, लेकिन उतनी बिकती नहीं। अधिकांश लेखक अपने रिश्तेदारों, मित्रों, शुभचिंतकों को अपनी किताबें मुफ्त में उपहार स्वरूप देकर खुश हो लेते हैं। भारत देश में अब बहुत कम ऐसे लेखक है, जिनकी कृतियां उन्हें दाम, मान-सम्मान और पाठक उपलब्ध कराती हैं। आज का उजागर सच यह है कि यदि सरकारी और प्रायवेट वाचनालय पुस्तकों की खरीदी बंद कर दें तो अधिकांश प्रकाशक भी अपनी दुकानों का शटर गिराकर किसी दूसरे धंधे में लीन हो जाएं। वैसे कइयों ने तो इस पेशे से सदा-सदा के लिए किनारा भी कर लिया है। जिस काम में मुनाफा नहीं होगा, उसमें कोई समझदार व्यक्ति अपना समय और धन क्यों बर्बाद करेगा? संपूर्ण देश के रेलवे स्टेशनों पर ए.एच.व्हीलर के बुक स्टॉल की शान-शौकत से भले ही आज की पीढ़ी परिचित न हो, लेकिन हमारी पीढ़ी कभी भी नहीं भूल सकती। इन बुक स्टॉल पर हर तरह की पत्र-पत्रिकाएं और विभिन्न किताबें सहज ही उपलब्ध हो जाती थीं।

‘मुझे वो दिन आज भी याद हैं’ जब मैं तब के मध्यप्रदेश और आज के छत्तीसगढ़ के संस्कारी शहर बिलासपुर में अध्ययनरत था। तब सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, ज्ञानोदय, नीहारिका, दिनमान जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं को खरीदने के लिए साइकिल से मीलों का सफर तय करके रेलवे स्टेशन चला जाता था। वहां पर स्थित ए.एच.व्हीलर का बुक स्टॉल वैसी ही संतुष्टि देता था, जैसे किसी आस्थावान भक्त को मंदिर। उस दौर में मात्र बीस-पच्चीस रुपए में पांच-सात पत्रिकाएं और प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, शिवानी, कमलेश्वर, अमृतराय जैसे मनपसंद रचनाकारों की किताबें खरीदकर धन्य हो जाता था। आज से पचास-पचपन वर्ष पूर्व हिंद पॉकेट बुक्स तथा अन्य नामी-गिरामी प्रकाशनों के अच्छे खासे उपन्यास पांच-दस रुपये में मिल जाते थे। सारिका, हिंदुस्तान और धर्मयुग जैसी तब की विख्यात पत्रिकाओं की कीमत भी अधिकतम पांच रुपए के आसपास होती थी। पैसों की कीमत और तंगी के बावजूद भी तब पढ़ने वाले आज की तुलना में कहीं बहुत-बहुत ज्यादा थे। बच्चों के लिए भी एक से एक पत्रिकाएं तथा उपन्यास सजग प्रकाशकों के द्वारा न्यूनतम कीमत पर उपलब्ध कराये जाते थे, लेकिन अब तो वो दौर सपने जैसा लगता है। नगरों, महानगरों के रेलवे स्टेशनों की शान और शोभा कहलाने वाले ‘ए.एच.व्हीलर’ के बुक स्टॉल भी पाठकों, खरीददारों के अभाव के चलते बंद हो गये हैं। यह कायाकल्प बीते पांच-सात वर्षों में बड़ी तेजी से हुआ है। अब तो रेलवे के उन बुक स्टॉल पर अखबारों, पत्रिकाओं, उपन्यासों की बजाय पेन, कॉपी, बिस्कुट, क्रीम, पाउडर, हल्दीराम के लजीज नमकीन के पैकेट बिकने लगे हैं। मुझे अच्छी तरह से यह भी याद है कि रायपुर में स्थित कॉफी हाऊस में घुसते ही एक बुक स्टॉल हुआ करता था, जहां पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ चर्चित, लोकप्रिय लेखकों के उपन्यास शीशे की अलमारी में सजे रहते थे। अस्पतालों के आसपास तथा बस अड्डों पर दिखने वाले बुक स्टॉल भी लगभग नदारद हो गये हैं। 

हर वर्ष 23 अप्रैल को दुनिया के अधिकांश देशों में पुस्तक दिवस मनाया जाता है। बीते वर्षों की तरह इस वर्ष भी पुस्तक दिवस मनाते हुए पुस्तकों के अंधकारमय वर्तमान और भविष्य पर चिंता व्यक्त करने के साथ-साथ डिजिटल स्क्रीन और ऑनलाइन कंटेट के आकाश छूते प्रभाव के वशीभूत होकर किताबों के पाठकों में आयी अत्याधिक कमी को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हुए विद्वानों ने लेखों और भाषणों की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और पुस्तकों की निरंतर कम होती मांग लेखक, लेखिकाओं की गहन चिंता का विषय रही। संगोष्ठियां आयोजित कर एक स्वर में कहा गया, यदि स्थिति नहीं सुधरी तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। पुस्तकें ज्ञान का सागर होती हैं। अच्छा क्या है, बुरा क्या है, इस सच से रूबरू कराते हुए अंधेरे से उजाले की ओर ले जाती हैं। दरअसल, सार्थक साहित्य मानवता, सभ्य समाज का वो प्रेरक दस्तावेज है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए जागरूक लेखकों की कलम से रचा जाता है। हमारे बुजुर्ग कहा करते थे, कि जब आपका मन विचलित हो, चिंता ने जकड़ रखा हो या कोई और बड़ा संकट हो तो चुनिंदा प्रेरक किताब पढ़ने लगो। ऐसी हर किताब की अहमियत होती है, जो साथी बन आपके अकेलेपन और निराशा को भगाने के साथ-साथ सोये विवेक और मनोबल को जगाती है। यदि किसी कारणवश आपका गुस्सा शांत होने का नाम न ले रहा हो तो शब्द बर्फ बन क्रोधाग्नि को शांत करने में अकल्पनीय भूमिका निभाते हैं। किसी पुस्तक प्रेमी और महान विचारक का कथन है कि सार्थक किताबों से रूबरू होकर उन्हें शब्द-दर-शब्द पढ़ना जिस अनुभव और ज्ञान के सागर में गोते लगवाता है उसका कोई सानी नहीं। सच तो यह है कि किताबें पढ़ने से बड़ा सुख शायद ही कोई हो। इसलिए तो किताबों को इंसानों का सबसे अच्छा मित्र कहा जाता है। हिंदुस्तान के महान कथाकार, उपन्यासकार निर्मल वर्मा कहते हैं, 

‘‘पुस्तकेंमन का शोक, दिल का डर या अभाव की हूक कम नहीं करतीं, बल्कि सबकी आंख बचाकर चुपके से दुखते सिर के नीचे सिरहाना रख देती हैं। यही पुस्तकें ही हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में हमारी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक के रूप में साथ देती हैं।’’ किताबों को लेकर विचारक, नाटककार स्वर्गीय सफदर हाशमी के विचार भी काबिलेगौर हैं, 

‘‘किताबे करती हैं बातें

बीते ज़मानों की

दुनिया की, इन्सानों की

आज की, कल की

एक एक पल की।

खुशियों की गमों की

फूलों की, वमों की

जीत की हार की

प्यार की, मार की

क्या तुम नहीं सुनोगे

इन किताबों की बातें?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।’’

कोई भी सार्थक प्रेरक किताब महज कागजों पर लिखे अक्षरों का भंडार नहीं होती, बल्कि प्रतिभावान रचनाकार के देखे और भोगे यथार्थ का सजीव चित्रण होती है। एक अत्यंत विख्यात विदेशी लेखक की पुस्तक जब साहित्य के दुश्मनों ने जलाकर राख कर दी तो उनका बस यही कहना था, कागज भले ही जल जाएं लेकिन शब्द कभी नहीं जलते। कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उनका पुनर्जन्म हो जाता है। बुलंदियों पर पहुंचकर लोगों को अचंभित करने वाले कलाकारों, साहित्यकारों, उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि सकारात्मक प्रेरक किताबों से प्रेरित होकर ही उन्होंने यह मुकाम पाया है। कालजयी लेखकों की रचनाएं उनके जीवन का निचोड़ होती हैं। पचासों वर्ष बीत जाने के बाद भी कथाकार, उपन्यासकार, प्रेमचंद पाठकों की पहली पसंद बने हुए हैं। महान विचारक रजनीश यानी ओशो ने कोई किताब नहीं लिखी। उनके शिष्यों, प्रशंसकों और प्रभावितों ने उनके हजारों भाषणों को पुस्तक में संकलित, समाहित कर उन्हें लोकप्रिय लेखक के तौर पर स्थापित करवा दिया। देश के किसी भी शहर में लगने वाले पुस्तक मेलों में आज भी मुंशी प्रेमचंद और ओशो पसंदीदा लेखक के तौर पर छाये रहते हैं। पुस्तक मेलों में पहुंचने वाली भीड़ कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, रविंद्र कालिया, ममता कालिया, अमृता प्रीतम, शिवानी के साथ-साथ नये लेखकों की कृतियों को भी खरीदने में अग्रणी दिखायी देते हुए कहीं न कहीं आश्वस्त करती है कि सोशल मीडिया की आंधी में भी लिखे और छपे हुए शब्दों को पढ़ने, जानने और समझने की दिली चाहत रखने वाले सजग पाठकों की वर्तमान में भी अच्छी-खासी तादाद है। पाठकों की कमी का रोना रोने की बजाय अच्छा साहित्य रचने की जिम्मेदारी तो नये, पुराने लेखकों की भी बनती है। एक प्रश्न लेखकों से यह भी कि वे खुद कितने बेहतर पाठक हैं? अधिकांश लेखक दूसरे लेखकों की नवीनतम कृति उपहार में तो ले लेते हैं, लेकिन उसे पढ़ते नहीं। फिर ऐसे में उनकी किताबें पढ़ी जाएंगी, पढ़ी जाती होंगी इसका अंदाज वे स्वयं लगा सकते हैं। वैसे भी जो अच्छा पाठक नहीं, वो  बेहतर लेखक भी नहीं हो सकता है।

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