Thursday, May 21, 2026

देश तो है मोदी के साथ

पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें बढ़ना कोई नई बात नहीं। समय-समय पर विभिन्न कारणों से इनकी कीमतों में इजाफा होता रहता है। दरअसल नई बात तो है कि भारत के कर्मवीर अथक योद्धा प्रधानमंत्री का अपने प्रिय देशवासियों को काफी सोच-समझकर यह अनुरोध करना कि समय की मांग को देखते हुए वे कम अज़ कम एक साल तक सोना न खरीदें। घर में रहकर काम करें, विदेशी यात्राओं में कटौती तथा पेट्रोल-डीजल बचाएं और खाद्य तेल का कम इस्तेमाल करें। प्रधानमंत्री ने जिस दिन पेट्रोल-डीजल बचाने और अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की बात कही तो उसी दिन से कुछ जन्मजात विरोधी तंज मिश्रित राग अलापने लगे कि दूसरों को उपदेश देने वाले नरेंद्र मोदी पहले खुद पेट्रोल-डीजल की बचत करने का साहस दिखाएं तथा विदेश यात्राओं पर विराम लगाएं। उनकी सुरक्षा के लिए बीसियों गाड़ियों का जो काफिला आगे-पीछे चलता है, उसमें भी कमी लाएं तो मानें। चतुर, दूरदर्शी प्रधानमंत्री को ऐसी प्रतिक्रियाओं और तंजों का पूर्वानुमान था। इसलिए उन्होंने तथा उनके सहयोगी मंत्रियों ने न केवल अपने काफिले में जबरदस्त कटौती की, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी खुशी-खुशी अपनाया। सरकारी खर्चों में कटौती करने के उद्देश्य से कुछ मंत्रियों की साइकिल, मेट्रो ट्रेन तथा बस यात्रा के साथ-साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का मोटर साइकिल पर मंत्रालय जाना अधिकांश लोगों को बहुत अच्छा लगा लेकिन कुछ लोगों के द्वारा यह भी कहा गया कि ऐसे नाटक-नौटंकी, ऊपरी दिखावे तो पहले भी बहुत होते रहे हैं। प्रतीकात्मक अनुशासन और हवा-हवाई नियंत्रण के स्थान पर स्थायी त्याग भावना जब तक नहीं बनेगी तब तक आम भारतीय इसे ढकोसला ही मानते रहेंगे। असंख्य सजग भारतीयों ने अपने प्रिय पीएम की अपील का आदर करते हुए पैदल तथा साइकिल पर चलने के अलावा बस, मेट्रो आदि को अपनाकर पेट्रोल बचाने के अभियान को गति दी। विख्यात फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने अपनी फ्लाइट की टिकट रद्द करवाकर वंदे भारत ट्रेन से जयपुर से दिल्ली का सफर किया। उन्होंने यह भी कहा कि, यह कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, लेकिन अगर हम सब अपनी तरफ से छोटी-छोटी कोशिशें शुरू करें तो उसका यकीनन बड़ा असर हो सकता है। आज के समय में जिम्मेदार नागरिक होने का मतलब सिर्फ बातें करना नहीं, बल्कि अपनी आदतों में बदलाव लाना जरूरी है। देश सेवा केवल सरहद पर नहीं होती। कभी-कभी वह हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में भी दिखाई देती है और दिखाई देनी भी चाहिए। 

जो लोग पीएम की विदेश यात्राओं पर उंगली उठाते हैं उन्हें खबर नहीं या फिर अंधे हैं। दरअसल, उनकी सभी विदेश यात्राएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा होती हैं। अभी जिस तरह के चिंताजनक हालात हैं। अमेरिका-ईरान के बीच के युद्ध ने पूरी दुनिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। तब ऐसे में आपसी रिश्ते मजबूत करना, तेल आपूर्ति सुनिश्चित करना और निवेश लाना भी निहायत जरूरी है। अपने देश के भले के लिए दिन-रात भागते-दौड़ते मोदी जी यदि किसी देश की प्रधानमंत्री को मिठास भरी भारतीय टॉफी उपहार में देते हैं तो विरोधियों के तन-बदन में आग लग जाती है और जबान ज़हर उगलने लगती है!

गौरतलब है कि 1965 में लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। तब अहसान फरामोश, धोखेबाज हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अचानक हिंदुस्तान पर हमला कर दिया था। युद्ध और भोजन के संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने समस्त देशवासियों को स्वेच्छा से एक दिन का उपवास रखने की अपील की थी। सजग देशवासियों ने अपने जुझारू कर्मठ और अत्यंत भरोसेमंद प्रधानमंत्री की अपील का अनुपालन करने में किंचित भी देरी नहीं की थी और उपवास रखना प्रारंभ कर दिया था। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री को भी तमाम जागरूक भारतवासी लाल बहादुर की तरह ही दिलोजान से चाहते और मानते हैं। जिस तरह से शास्त्री जी ने कभी भी अपने परिजनों को अपने पद और प्रतिष्ठा का फायदा नहीं पहुंचाया और पूरी ईमानदारी से देश सेवा की, वैसे ही राष्ट्रसेवक नरेंद्र मोदी की शान-बान और आन है। भले ही कुछ लोग उनके हर जनहित कार्य में खोट और कमी निकालते नहीं थकते। लेकिन वे तो आम भारतीयों के मन में बसते हैं। सभी देशप्रेमी न सिर्फ उनकी पूरे मन से सुनते हैं, बल्कि उनकी कहे का अनुसरण करने में भी इसलिए देरी नहीं लगाते, क्योंकि वे निष्कलंक हैं। यह सच्चाई अपनी जगह है कि भले ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ साथी सत्ता का लाभ उठाते हुए देखते ही देखते मालामाल हो गये हैं और उनकी औलादों ने मोटी कमाई वाली कंपनियां खड़ी कर ली हैं, लेकिन मोदी के भाई-बहन और भतीजे उसी स्थिति में है जैसे पहले थे। दरअसल देश तो केवल और केवल मोदी का ही मुरीद है। 

प्रधानमंत्री की मितव्ययिता, संसाधन-संरक्षण और आत्मनिर्भरता की अपील में अंतत: देश का ही हित समाहित है। उन्होंने काफी सोचने विचारने के पश्चात ही अपने देशवासियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराना जरूरी समझा, क्योंकि अधिकांशसोना,पेट्रोल, डीजल हमें आयात करना पड़ता है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है। विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनियाभर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल है। दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। यानी भारत गल्फ से तेल खरीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपये में नहीं, बल्कि डॉलर में ही करना होता है। कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं। भारत जब सामान खरीदता है तो डॉलर से भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है। ज्यादा बेचने पर यकीनन डॉलर हमारे पास आएंगे और खरीदने पर डॉलर ज्यादा खर्च होंगे। जो देश ज्यादा निर्यात करते हैं, तो उनका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहता है और जो आयात ज्यादा करते हैं, उनका विदेश मुद्रा भंडारा खाली-खाली या नाममात्र भरा रहता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था। यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा किया और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की स्थिति निर्मित हुई, जो कि देश हित में नहीं। पेट्रोल, डीजल, सोना तथा विदेश यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को यकीनन बचा सकता है। मोदी जी की अपील के पश्चात अनेकों सजग आम जनों, व्यापारियों और अधिकारियों ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि अगले एक वर्ष तक, केवल बेटी की शादी या किसी विशेष अपरिहार्य पारिवारिक अवसर जैसी परिस्थितियों को छोड़कर वे सोना नहीं खरीदेंगे। सोना-चांदी के व्यापारियों ने भी भले ही लंबे नुकसान का संदेह जताया और लाखों कारीगरों पर बेरोजगारी का खतरा मंडराने की बात कही लेकिन फिर भी उन्होंने देश हित को ही प्राथमिकता दी। धैर्य और सब्र का दामन थामे इन कारोबारियों का कहना है, ‘सोना नहीं तो चांदी बेचेंगे। किसी कर्मचारी-कारीगर की रोज़ी-रोटी नहीं छिनेगी। सालभर की तो बात है। मोदी जी हैं...सब ठीक हो जाएगा।’ तभी तो आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है और जहां चाह हो वहां राह भी निकल ही आती है की कहावत को उन्होंने बखूबी चरितार्थ करने में देरी नहीं की। संतरानगरी नागपुर के प्रमुख ज्वेलर्स ने सोने के बदले चांदी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए सिल्वरोत्सव के जो विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाये उनमें चांदी की पायल, चेन, मूर्तियों पर विशेष छूट की पताका फहराते हुए ग्राहकों से अधिक से अधिक चांदी के जेवर, बर्तन, कंगन, धार्मिक मूर्तियां, शोपीस आदि खरीदने के लिए प्रेरित करना प्रारंभ कर दिया। वैसे भी सोना अब केवल उच्च मध्यम वर्ग और रईस ही कई ज्यादा खरीदते हैं। अमीरों के यहां तो सोने के भंडार भरे पड़े हैं। देशभर में सोने-चांदी और डायमंड के असंख्य आलीशान शोरूम हैं, जहां हजारों लोग काम करते हैं। लाखों कारीगरों की दाल-रोटी इन्हीं पर टिकी है। पहले जहां नये गहने खरीदने के विज्ञापनों की भरमार थी, अब पीएम की अपील के बाद विज्ञापन की शब्दावली कुछ यूं है, ‘‘जब अपना सोना घर में है तो आयातित सोने पर निर्भर क्यों रहें? अपने घर के सोने को नए और आधुनिक डिजाइनों में बदलें और विदेशी सोने पर निर्भरता कम करने में योगदान दें। अपने पुराने सोने को नए गहनों में एक्सचेंज करें और पाएं पहले से भी ज्यादा खास फायदे। आइए, मिलकर जगमगाते हैं अपने सोने का तेज...’’ 

यह भी सौ फिसदी सच है कि बीते कुछ वर्षों में सोने-चांदी की कीमतों में जिस तरह से बेतहाशा इजाफा हुआ है, ठीक वैसे ही मंत्रियों, अधिकारियों, नेताओं तथा तमाम छोटे-बड़े जनप्रतिनिधियों में बेतहाशा अहंकार आया है। अधिकांश जनप्रतिनिधि आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गये हैं। जब जनता के वोटों से निर्वाचित यह धुरंधर पेट्रोल-डीजल की बचत और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए नियमित बस, मेट्रो, साइकिल, मोटर साइकिल पर आना जाना करेंगे तो लोगों से भी मिलेंगे तो इन्हें पता चलेगा कि आम भारतीय कितने कष्ट में हैं। उनकी समस्याओं को कैसे अनसुना किया जा रहा है। जिन्हें गांव, शहर, प्रदेश और देश चलाने के लिए वोट दिए गये हैं वे तो वातानुकूलित कमरों, कारों का मजा लूटते हैं और उन्हें राजा बनाने वाले मेहनतकश तपती गर्मी, बरसात और सर्दी के शिकार होने को विवश हैं। अभी तक असलियत से मुंह चुराते चले आ रहे शासक, प्रशासक सच को जानें और समझें कि भारत के आम नागरिक पर क्या गुजर रही है। उसे सत्ताधीशों की ऐशपरस्ती और नालायकी का खामियाजा बार-बार मरकर भुगतना पड़ रहा है।

नम्बर

कोई जब अपने अथक परिश्रम की बदौलत सफल होता है तो उसकी तारीफ की जाती है। यही हमारे यहां का चलन और दस्तूर रहा है। लेकिन हर बात, चीज़, कर्म और कथन में मीन-मेख निकालने वालों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। इस चक्कर में किसी की उपलब्धियों की तारीफ करना छोड़ उसकी कमी की खोज करने वालों के बारे में क्या कहा जाए और किया जाए? उत्तरप्रदेश के सीतापुर की प्राची निगम ने दसवीं की परीक्षा में जब टॉप किया तो उसे बधाई और शुभकामनाएं देने वाले कम और तानाकशी यानी ट्रोल करने वाले बहुत ज्यादा थे। यह व्यवहार किसी को भी हैरान और आहत कर सकता है। प्राची को भी बहुत ठेस पहुंची। अकेले में बारम्बार रोती रही। उससे मिलने के लिए आनेवाले शुभचिंतकों ने उसे सोशल मीडिया पर आती भद्दी टिप्पणियों को भूलने और पूरी तरह से नजरअंदाज करने को कहा लेकिन तब भी वह ट्रोल करने वालों के दंशों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकी।

यूपी बोर्ड में टॉप टेन में अपनी प्रभावी जगह बनाने वाली प्राची के चेहरे पर लड़कों की तरह जो मूंछ और बाल उग आये वही उसके शत्रु बन गये और सोशल मीडिया के शैतानों को उसे चिढ़ाने और मजाक उड़ाने का मौका मिल गया। प्राची सोचती रह गई कि काश! वह टॉप में नहीं आती। अन्य लाखों छात्र-छात्राओं की तरह साधारण नंबर पाती और अपने आप में मस्त रहती। न्यूज चैनल वालों का रवैया भी उसके प्रति निराशाजनक ही रहा। वे भी उसके चेहरे के बालों पर कैमरे केंद्रित कर उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आए। उनका खोद-खोदकर यह पूछना, गहरे तक आहत करता रहा  ‘‘लड़कों की तरह दाढ़ी, मूंछ में कैसा लगता है? ये कैसे और कब हुआ? मां-बाप ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया! कैसे लापरवाह अभिभावक हैं?’’ प्राची कभी जवाब देती तो कभी चुप्पी साध लेती। ऐसे ही सुलगते सवालों और भेदती निगाहों की भीड़ का सामना करते-करते उसने आगे की पढ़ाई में ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। इस दौरान उसके माता-पिता ने लाखों रुपए खर्च कर कुशल चिकित्सकों से उसके चेहरे का कई बार इलाज करवाया। इससे उसेकाफी हद तक चेहरे के घने बालों से मुक्ति मिल गई। फिर भी पहचान बनी रही। उसने सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूरियां बना लीं। बारहवीं की परीक्षा में प्राची 500 अंकों में 450 अंक प्राप्त कर साधारण विद्यार्थियों में शुमार हो गई। लेकिन इस बार भी ट्रोलर अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आये। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसकी पुरानी फोटो लगाकर उसके पिछड़ने और कम नम्बर पाने का मजाक उड़ाते रहे। किसी ने लिखा, कहां गई अक्लमंदी? लगता है दसवीं की परीक्षा में नकल मारने की जो सुविधा मिली थी, इस बार नहीं मिली। किसी की कमेटंस थी, ‘तुक्का हर बार नहीं चलता।’ कोई यह कहने से नहीं चूका, ऊपरवाले से हाथ-पैर जोड़कर अच्छी शक्ल-सूरत तो मांग लेती। घूर-घूरकर फोटो देखी, लेकिन समझ में ही नहीं आया कि औरत है या आदमी? ऐसे अबूझ पहेली से राम बचाये!’’ वैसे तो बचपन से ही प्राची के चेहरे पर लड़कों जैसे कुछ-कुछ बाल दिखने लगे थे लेकिन नौंवी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते बालों का बढ़ना उसकी परेशानी का सबब बनने लगा। मोहल्ले के लड़कों के साथ-साथ सहपाठी लड़कियों और सहेलियों की निगाहों की चुभन को प्राची तीव्रता से महसूस करने लगी थी। अब तो प्राची में इतनी हिम्मत आ गई है कि कोई भी तंज, कटाक्ष उस पर असरहीन रहता है। उसने फिजूल के सोशल मीडिया से भी हमेशा-हमेशा के लिए किनारा कर लिया है। अब तो वह अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतया समर्पित रहकर अपनी लाइफ इंजॉय कर रही है। 

इतिहास गवाह है कि जो लोग परिश्रम, साहस और अपने लक्ष्य से मुंह नहीं चुराते वही अंतत: इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हुए अपार प्रशंसा और गड़गड़ाती तालियों का मनोहारी उपहार पाते हैं। अपने देश भारत में अनेकों महिलाएं दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा और बर्तन मांजकर अपना घर परिवार चलाती है। अब तो कुछ प्रदेशों की सरकारें भी गरीब परिवार की महिलाओं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए हर माह डेढ़-दो हजार की नगद राशि प्रदान करती हैं। लेकिन इससे इस महंगाई के दौर में यकीनन ज्यादा राहत नहीं मिलती। उनको मिलने वाली राशि को लेकर कुछ सक्षम लोग यह रोना रोते भी दिखते हैं कि सरकार ने मुफ्त में राशि देकर काम करने वाली बाइयों के भाव बढ़ा दिये हैं। एक तो ढंग से काम नहीं करती, उस पर पहले से ज्यादा मेहनताना भी मांगने लगी हैं। पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बर्तन-कपड़े धोकर लगभग चार-पांच हजार रुपए कमाने वाली कलिता मांझी विधायक बन गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें आसाराम सीट से चुनाव लड़वाया और वे अच्छे-खासे वोटों से जीत गईं। और भी कुछ महिलाएं विधायक बनने में सफल रहीं। लेकिन कलिता मांझी यकीनन उनसे अलग हैं। अधिकांश चुनावी योद्धाओं ने जहां चुनाव प्रचार में मतदाताओं को लुभाने के लिए लाखों-लाखों रुपए खर्च किए वहीं कलिता मांझी इस लायक थी ही नहीं कि कुछ हजार रुपये की भी व्यवस्था कर पाती। उसने बिना पैसे के चुनाव लड़ा और चुनाव जीत कर दिखाया। उसके विधानसभा के चुनाव में विजयी होने से आम देशवासियों में यह संदेश तो गया ही है कि यदि छवि निष्कलंक हो। नीयत में कोई खोट न हो तो शुभचिंतक और वोटर भी बढ़-चढ़कर तन-मन और धन से साथ और सहयोग देने में  कोई कमी नहीं छोड़ते। चुनाव जीतने वाले विधायकों ने शपथ ग्रहण के समारोह के लिए हजारों रुपये खर्च कर नये-नये परिधान बनवाये लेकिन कलिता के पास तो ढंग की एकाध साड़ी तक नहीं थी। ऐसे में जिस घर में वह काम करती थीं, उसी के मालिक ने सादगी प्रेमी ईमानदार कलिता मांझी को सुंदर साड़ी उपहार में दी, जिसे पहनकर वह कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। यह भी काबिलेगौर है कि चुनाव जीतने के बाद भी मांझी जब अपने मालिक के यहां काम करने पहुंची तो उनके साथ-साथ पूरे मोहल्ले के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। विधायक बनने के बाद भी अपनी जड़ों को न भूलते हुए उसने सामान्य दिनों की तरह बर्तन और कपड़े धोए और अन्य घरेलू काम भी निपटाए। 

जहां चाह होती है वहां राह न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता। कुछ कर्मवीर पुरातन कहावतों को चरितार्थ करने के लिए ही इस धरा पर आते हैं। दांत के बीच कलम दबाकर लिखने वाले मोहम्मद फैजानउल्ला से आप मिलेंगे तो उसके हौसले को सलाम किये बिना नहीं रह पायेंगे। झारखंड में दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले फैजानउल्ला को जन्म से सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी ने अपने क्रूर शिकंजे में जकड़ लिया था, जिससे वह न तो खुद से हिल-डुल सकता था और न ही उठ-बैठ सकता था। अभी भी वही हालत हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह अच्छा हुआ कि फैजान बोलने-बतियाने लगा। इससे उसके माता-पिता को काफी अच्छा लगा और राहत महसूस हुई कि कम अज़ कम बच्चा बोलता और समझता तो है। इस गंभीर बीमारी की वजह से फैजान का स्कूल जाना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में जितेंद्र कुमार भगत नामक शिक्षक ने फैजान के जीवन में किसी फरिश्ते की तरह प्रवेश किया। दरअसल, जब उन्हें उसके स्कूल नहीं जाने की वजह का पता चला तो वे खुद उसके घर जा पहुंचे। दिव्यांग फैजान का मनोबल और पढ़ने की अत्याधिक इच्छा को देखकर उन्होंने उसके सपने को साकार करने की दिशा में तुरंत काम करना प्रारंभ कर दिया। फैजान लिखना चाहकर भी लिखने में असमर्थ था। शुरू-शुरू में उन्होंने कलम को धागे से बांधकर लिखवाने की कोशिश की लेकिन यह प्रयास पूर्णतया असफल रहा। झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोंडा में विकलांग बच्चों को शिक्षित करने के लिए विशेष शिक्षा विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत जितेंद्र कुमार कुछ दिनों तक अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहे। उन्होंने एक कलम फैजान के मुंह में दांतों के बीच पकड़ाकर लकीर खिंचवाने का कई बार प्रयास किए और अंतत: मेहनत रंग लायी। धीरे-धीरे फैजान लिखने में इतना अधिकसमर्थ हो गया कि दूसरे सामान्य बच्चों और उसकी लिखावट में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। शिक्षक जितेंद्र के कड़े परिश्रम और फैजान के सतत अभ्यास और लगन की बदौलत आठवीं की बोर्ड परीक्षा तथा नौवीं की परीक्षा में खुद लिखकर चौकाने वाली सफलता पाई। इतना ही नहीं वह दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंकों के साथ दिव्यांग कैटेगरी में टॉपर बना है। उसने परीक्षा में राइटर की उपलब्धता के बावजूद ज्यादातर कॉपी खुद ही लिखी।

सबूत

कुछ खबरों को पढ़-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भ्ाुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भ्ाूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाड़ले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भ्ाूख से चीख रहा था। तड़प रहा था। मां ने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भ्ाूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भ्ाूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कोई ऐसा सामान नहीं बचा था, जिसे बेचकर दूध, चावल-दाल का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोड़कर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तड़पन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया और उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे खामोश कर  दिया! 

एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में ‘मां’ है, जो अपनी औलाद को बड़े लाड़-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां के हत्यारिन होने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड़ लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! यदि वह इतनी परेशान थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां को हिरासत में ले लिया। हत्यारी की उम्रदराज मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहती रही कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...। लेकिन कानून की अपनी मर्यादा है। उसका चक्का कानून की किताबों और वकीलों के दांव-पेंच से चलता है। किसी के पास फुर्सत नहीं जो गंभीरता और गहराई से जाने और समझे। असली अपराध और अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भ्ाूख से तड़प-तड़प कर मरने की खबर कभी भी पढ़ने-सुनने में नहीं आती। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ़ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गड्ढा, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पड़ती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकड़ों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।

महाराष्ट्र के एक गांव का एक युवा किसान अपनी चिता सजाकर उस पर जिंदा जल गया। सत्तर हजार रुपये के कर्ज के तले दबे इस किसान ने चिता पर लेटने के बाद जहर पिया। यानी वह किसी भी हालत में जीना नहीं चाहता था। अगर कहीं आग से बच जाता तो विष उसके प्राण ले ही लेता। पुख्ता मौत के लिए जिंदा जल मरने की यह इकलौती घटना नहीं है। ऐसी हृदय विदारक घटनाओं के बारे में जब पढ़ने और सुनने मात्र से कंपकपी छूटने लगती है तो सोचें कि आत्महत्या करने वाले लोगों की कैसी मानसिक स्थिति रहती होगी? खुद की चिता के लिए खुद ही लकड़ियां और केरोसीन का इंतजाम करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं। भौतिकता से सराबोर आधुनिकता के इस अजब-गजब काल में अंधविश्वास, घृणा, अराजकता और व्याभिचार की कोई सीमा नहीं रही। ढाई-तीन साल की  मासूम बेटियां दरिंदों की अंधी हवस का शिकार हो रही हैं। कोई पैंसठ साल का इंसान कैसे ऐसा पाप कर गुजरता है, लाख सोचने पर भी जवाब नहीं मिलता। 

एक रिक्शा चालक की तीन बेटियों की कई दिनों तक खाना नहीं मिलने पर मौत हो गई। वह रिक्शा वाला गरीब था, लेकिन किसी को भूखा देख अपनी दिन भर की कमाई उसकी झोली में डाल देता था, लेकिन उसकी बेटियों पर किसी को रहम नहीं आया। तड़प-तड़प कर तीनों चल बसीं। पिछले दिनों ओडिशा के एक आदिवासी की उस तस्वीर को देश और दुनिया के करोड़ों लोगों ने देखा और शासन और प्रशासन को कोसा। इस गरीब किसान को अपनी मृतक बहन के बैंक में जमा लगभग बीस हजार रुपये निकालने के लिए कई चक्कर काटने पड़े। बैंक वालों ने उसकी दुनिया छोड़ चुकी बहन के मरने का पुख्ता प्रमाण मांगा तो उसने अपने बहन की कब्र खोदी और बहन के कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक वालों के समक्ष पहुंचकर बोला, क्या और भी कोई सबूत चाहिए? 

क्या इंसानी की संवेदनाएं लुप्त होती चली जा रही हैं? कुछ लोग कहते हैं कि इंसान जानवर बनता चला जा रहा है। क्या वाकई यह सच है? अभी हाल ही में दिल्ली के एक ही परिवार के छह सदस्यों ने अंधविश्वास के चक्कर में आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उस परिवार के रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा उनके कुत्ते शामी को गहरे तक आघात पहुंचाया। घटना के बाद शामी की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। वह गुमसुम रहने लगा था और अंतत: घर में ही मृत पाया गया।