Thursday, December 18, 2025

अपने ही पतन के जतन

कितनों को खबर हैं कि मांएं अपनी बिगड़ैल औलाद की मनमानी की वजह से खुदकुशी कर रही हैं। नालायक संतानों के कारण कई पिताओं की भी नींद हराम है। कितने लोग जानते हैं कि बच्चों का बचपन छिन रहा है और उनमें घर कर चुकी बुरी संगत और आदतों के कारण मां-बाप को जासूसों की शरण में जाना पड़ रहा है। मोबाइल और सोशल मीडिया की घातक आदत से बचपन आत्मघाती और समय से पहले बड़ा हो रहा है और जन्मदाता निराश और छोटे हो रहे हैं?

उत्तर प्रदेश में स्थित चित्रकूट जिले के हरदोली गांव की निवासी शीलादेवी की बस यही तमन्ना थी कि उनका बच्चा सिर्फ पढ़ाई में ध्यान दे। आठवीं कक्षा में पढ़ रहे बेटे राजू की बेहतर परवरिश के लिए ममतामयी मां ने झांसी शहर में किराये का मकान लिया था। वह अपने पुत्र को किसी भी चीज़ की कमी नहीं होने देती थीं, लेकिन राजू ऐसी गलत संगत में जा फंसा, जिससे उसने पढ़ने-लिखने से ध्यान हटाकर मोबाइल गेम्स में अपना सारा समय व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। मां शीलादेवी उसे पढ़ाई को प्राथमिकता देने और मोबाइल से दूरी बनाने के लिए कहती तो वह आग बबूला हो जाता। 38 वर्षीय मां की रातों की नींद उड़ चुकी थी। वह बस यही सोचती रहती कि उसका 13 वर्षीय बेटा यदि इसी तरह से स्मार्टफोन और ऑनलाइन गेम की लत की दल-दल में फंसा रहा, तो उसका तो भविष्य ही चौपट हो जाएगा। एक यही इकलौता बेटा ही तो हमारी असली पूंजी है। मां के साथ-साथ पिता भी बेटे को समझाते-समझाते थक चुके थे। उन्होंने अपनी पत्नी शीलादेवी को अपनी मानसिक स्थिति और सेहत पर ध्यान देने को कहा, लेकिन वह तो बेटे के मोबाइल रोग के चलते निरंतर टूटती चली गई। मंगलवार की उस रात भी वह बहुत चिंतित और उदास थी। रात के करीब दो बजे पति रवींद्र की नींद खुली तो पत्नी कमरे में नहीं थी। दूसरे कमरे में देखने पर वह पंखे से गमछे के सहारे लटकी मिली। घबराए पति ने तुरंत उसे नीचे उतारा और भागे-भागे मेडिकल कॉलेज ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। मां की मौत के बाद बेटा फूट-फूटकर रोता रहा। रिश्तेदार सांत्वना देने की कोशिश करते रहे और वह बार-बार मां को पुकारता रहा...।

आजकल के बच्चों को माता-पिता की सीख, सुझाव और डांट किसी शूल की तरह चुभती है। हमारे दौर में तो मां-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि किसी गलती को बार-बार दोहराये जाने पर तमाचों से गालों को लाल कर दिया करते थे। स्कूल में टीचर भी थप्पड़ों तथा डंडों की मार से होश ठिकाने लगा दिया करते थे, लेकिन इस दौर के बच्चों में वो सहनशीलता ही नहीं रही। परीक्षा में फेल होने या कम अंक आने पर पालकों की डांट-डपट आज की पीढ़ी को मंजूर नहीं! हैदराबाद में दसवीं की छात्रा वैष्णवी ने अपने अपार्टमेंट की बिल्डिंग की छत से कूदकर इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि परीक्षा में कम अंक आने के कारण उसे कड़ी फटकार लगाई गई थी और इसके लिए उसके मोबाइल प्रेम को कसूरवार ठहरा कर कोसा और लताड़ा गया था। दिल्ली के एक स्कूल में नौंवीं क्लास में पढ़ रहे एक छात्र ने इसलिए मेट्रो स्टेशन से कूदकर अपनी जान दे दी, क्योंकि उसे जोक सुनाने तथा गप्पें मारने की वजह से अक्सर अपनी टीचर की दुत्कार सुनने को मिलती थी। एक ही कक्षा में पांच-पांच बार फेल हो जाने के कारण टीचर उसे अकेले में प्रेम से समझा-समझाकर थक चुकी थी, लेकिन अब उसने सभी छात्रों के सामने उसे नालायक और कामचोर कहना प्रारंभ कर दिया था। इससे उसे अपमान का बोध होता था। एक दिन जब टीचर ने उससे कहा कि यदि उसने खुद को नहीं बदला तो उसे टीसी देकर स्कूल से निकाल दिया जाएगा। उसे किसी अन्य स्कूल में दाखिला तक मिलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। अपनी टीचर की अंतिम चेतावनी से डरे-सहमे छात्र के मां-बाप ने बताया कि उस दिन से वह बहुत शांत रहने लगा था। किसी से बात तक नहीं करता था, लेकिन फिर भी ऐसा कहीं भी नहीं लगता था कि वह आत्महत्या कर लेगा। उसने इस दुनिया से जाने से पहले जो सुसाइड नोट लिखकर छोड़ा वह अत्यंत भावुक तथा परेशान करने वाला है। उसकी दिमागी शब्दावली से पता चलता है कि वह समझदार तो था, लेकिन फिर भी पढ़ाई में ध्यान देने से बचता रहा। उसने अपने माता-पिता और भाई से माफी मांगते हुए लिखा है कि, वह वैसा नहीं बन पाया जैसा वे चाहते थे। अब जाते-जाते उसकी अंतिम इच्छा है कि उसके शरीर के अंग जरूरतमंद लोगों को दान कर दिए जाएं। उसके लिखे सबसे ज्यादा दिल को छू लेने वाले इन शब्दों ने तो सभी को रूला दिया, ‘‘मैं नहीं चाहता कि कोई बच्चा मेरी तरह लापरवाह बने और ऐसे खुदकुशी करे, जैसे मैं कर रहा हूं। जीवन का एक-एक पल बहुत अनमोल है। इसे व्यर्थ में न जाने दें।’’ 

नीरज कुमार वर्मा पचास की उम्र में तीस के लगते हैं। यह कोई चमत्कार नहीं। उनके रहन-सहन का कमाल है। पेशे से पत्रकार और साहित्यकार वर्मा रोज सुबह पांच-छह किलोमीटर मार्निंग वॉक करते हैं। शाम को नियमित जिम में जाकर पसीना भी बहाते हैं, लेकिन उनका बीस वर्षीय पुत्र सेहत और रहन-सहन के मामले में उनसे एकदम विपरीत है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक, यू-ट्यूब, रेडिट आदि प्लेटफार्म पर हरदम उसके प्राण अटके रहते हैं। अश्लील वीडियो देखते-देखते कहीं गुम हो जाता है। घर का बना खाना उसे बिल्कुल नहीं सुहाता। महंगे होटलों के पिज्जा, बर्गर, पनीर के बने विभिन्न व्यंजन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड यानी पोटैटो चिप्स, मैगी, कुकीज, आकर्षक पैक में भरे नमकीन, आइस्क्रीम तथा कोकाकोला जैसे पेय पदार्थों ने उसे मोटा और थुलथुल बनाते हुए डायबिटीज और दिल की बीमारी का मरीज बना दिया है। एक बार वह जहां बैठता है, वहां से उठने में उसका पसीना छूटने लगता है। हर समय बस मोबाइल में उलझा रहता है। अपने नालायक पुत्र की संदिग्ध गतिविधियों से परेशान बुद्धिजीवी वर्मा जी को जो शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है, उसका तो उन्हें ही पता है। दूसरे तो बस उन पर व्यंग्य बाण ही चलाते रहते हैं, जो अपना घर नहीं संभाल सकता, वह किस मुंह से संपादक और साहित्यकार बना फिरता है।’’ 

पीठ के पीछे तो उन धनवान पंडितजी का भी लोग कम मजाक नहीं उड़ाते, जिनके छत्तीसगढ़ में कई उद्योग-धंधे हैं। उनके न्यूज चैनल की तो मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र में भी खासी धाक है। धार्मिक प्रवृत्ति के पंडितजी ने अपनी बड़ी बेटी को बड़े अरमानों के साथ मुंबई में बीबीए यानी बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के लिए भेजा था। पंडितजी के पास धन की तो कोई कमी नहीं, इसलिए उन्होंने बिटिया को खर्च करने की खुली छूट दे रखी थी, लेकिन तब उनके पैरों तले की जमीन खिसकने लगी जब उन्हें उड़ती-उड़ती खबर मिली कि बेटी अंधाधुंध सिगरेट और शराब पीने लगी है। दोस्तों के साथ प्राइवेट पार्टीज में जाती है और रात-रात भर हॉस्टल से गायब रहती है। छत्तीसगढ़ के गांव में पले-बढ़े सीधे-सादे पंडितजी ने मायानगरी मुंबई के बारे में कई अच्छी-बुरी कहानियां सुन रखी थीं। उन्होंने बेटी को वापस लौट आने को कहा तो उसने इंकार कर दिया। बीबीए का जो कोर्स दो साल में पूर्ण होना था, उसमें चार साल लगा दिए, फिर भी अधूरा रहा। अपने किसी शुभचिंतक की सलाह पर जब उन्होंने बेटी को रोजमर्रा की गतिविधियों का पूरा सच जानने के लिए प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी का दरवाजा खटखटाया तो राह भटकी बेटी की हफ्तों की जासूसी के बाद पता चला है कि वह तो हर तरह की ड्रग्स की लत की शिकार हो किसी लड़के के साथ बिना शादी किए रह रही है। इससे पहले भी वह किसी अन्य युवक के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह चुकी है। निहायत ही शाकाहारी पंडितजी की बिटियां हर तरह की नशेबाजी के साथ-साथ छोटा-बड़ा हर तरह का मांस-मटन भी धड़ल्ले से खाने लगी है। 

सोशल मीडिया के प्रदूषण ने हमारे देश भारत में अभिभावकों के लिए गहरा संकट खड़ा कर दिया है। कहावत है कि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत।’ किसी भी चीज़ की अति हर जगह बुरी होती है। इसमें दो मत नहीं कि सोशल मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार और पहचान का भी साधन बन चुका है। फिलहाल भारत डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और मीडिया शिक्षा पर जोर दे रहा है। बच्चों को डर से नहीं समझ से सुरक्षित करने का रास्ता अपनाया जा रहा है। यही लोकतांत्रिक रास्ता है। अभी हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के लिए कई सोशल मीडिया मंचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। ध्यान रहे कि इस साल की शुरुआत में आस्ट्रेलिया में 14 वर्षीय बच्चे को टिकटॉक पर परफेक्ट बॉडी नामक श्रृंखला के वीडियो देख-देखकर अपने ही शरीर से घृणा होने लगी थी। खाना खाने से उसे भय लगने लगा था। आस्ट्रेलिया की सरकारी रिर्पोट से पता चला कि 10 से 15 वर्ष के 96 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी सोशल प्लेटफार्म से जुड़े रहे हैं। उनमें से अधिकांश ने हिंसा, नफरत, शारीरिक हीनता और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाले कंटेंट देखे है। लगभग हर दूसरे बच्चे ने ‘साइबर बुलिंग’ झेली है और हर सातवां बच्चा ग्रूमिंग का शिकार हुआ, जहां कोई व्यस्क ऑनलाइन मीठी बातों में फंसाकर बच्चों के शोषण की कोशिश करता है। भारत में भी ऑनलाइन गेम और ‘टिकटॉक’ ने अनेकों जानें ली है और कितने बच्चों का भविष्य बर्बाद किया है। अब तो सभी जान गये हैं कि सोशल मीडिया की वजह से किशोरों तथा युवाओं में गलत आदतों के अलावा महिलाओं के प्रति गलत भावना, नफरत तथा आत्महत्या जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों में बढ़ोतरी हुई है। सोशल मीडिया में धड़ल्ले से जो रील-शार्ट वीडियो दिखाये जा रहे है उनमें हिंसा, द्वेष के साथ-साथ देवर-भाभी, भाई-बहन, पिता-बेटी, सास-ससुर जैसे पवित्र रिश्तों में जो गंदगी भर दी गई उसका सभी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। बच्चों का तो दिमाग ही अश्लील सामग्री से प्रदूषित हो रहा है। 

नग्नता देखने के बाद उनमें पवित्र रिश्तों के प्रति कैसी भावना जागेगी, इसका जवाब पाने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं। यह भी सच है कि ऑस्ट्रेलिया की तुलना में भारत बहुत बड़ा देश है। यहां पर यू-ट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि से करोड़ो लोगों का जुड़ाव है। बच्चों को सोशल मीडिया पर बहुत अधिक समय बिताने और अश्लील सामग्री पर अपना ध्यान केंद्रित करने से बचाने के लिए प्रतिबंध नहीं उनकी इंटरनेट गतिविधियों की निगरानी की जरूरत है। यह विकट समस्या और भी कई देशों में परेशानी का सबब बनी हुई है। डजिटल दुनिया में होने वाले नुकसानों की निगरानी के लिए वैश्विक स्तर पर कई संगठन खड़े हो चुके हैं। विश्व आर्थिक मंच ने ऑनलाइन हानिकारक कंटेंट से निपटने के लिए ‘ग्लोबल कोलिशन ऑफ डिजिटल सेफ्टी’ बनाया है। यह संस्था नए ऑनलाइन सुरक्षा विनियमन के लिए सर्वोत्तम तरीकों के आदान-प्रदान, ऑनलाइन जोखिम को कम करने और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों में परस्पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम करेगी। कम उम्र में अनुचित ऑनलाइन कंटेंट के अलावा, सोशल मीडिया और डिजिटल सामग्री का अत्यधिक उपयोग भी एक बड़ी समस्या है। बच्चे और किशोर डिवाइस स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिता रहे हैं। यह उनके मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट का उपयोग करने वाले 11 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में समस्याग्रस्त डिजिटल व्यवहार की आशंका अधिक होती है। जैसे, केवल ऑनलाइन दोस्त बनाना और ऐसी साइटों पर जाना, जो माता-पिता को पसंद नहीं है। साथ ही उनके ऑनलाइन उत्पीड़न में शामिल होने की भी आशंका प्रबल होती है। सोशल मीडिया एप्स पर बहुत अधिक समय बिताने से चिड़चिड़ापन, खाने के विकार और आत्मसम्मान में कमी की समस्या हो सकती है। किशोरियों के लिए ये स्थितियां विशेष रूप से चिंताजनक हैं। रिपोर्ट बताती है कि 13 से 17 वर्ष की 46 प्रतिशत किशोरियों ने कहा कि, सोशल मीडिया ने उन्हें अपने शरीर के बारे में बुरा महसूस कराया। यह संकट भारत समेत पूरी दुनिया में एक जैसा है। नियामक एजेंसियां ऐसे प्लेटफॉर्मों पर लॉग इन करने के लिए पहचान और उम्र को बुनियादी मानदंड बनाने की मांग कर रही हैं। कुछ लोग इससे उपयोगकर्ता की गोपनीयता भंग होने की चिंता जता रहे हैं, लेकिन इंटरनेट को ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।

Thursday, December 11, 2025

अंतिम निर्णय

मैं तो चिंतित हो जाता हूं। घबराहट होने लगती है। कई बार माथा पकड़ भी बैठ जाता हूं। आप भी बताएं कि ऐसी खबरों को पढ़कर आप पर क्या बीतती है? क्या ऐसा नहीं लगता कि नारी की आजादी, बदलाव, विकास और तरक्की के जो दावे किये जा रहे हैं, उनमें आधी-अधूरी सच्चाई है। सच तो कुछ और ही है..., जो कभी सामने आता है, कभी छुप जाता है तो कभी दबा दिया जाता है। कितने लोगों ने यह खबर पढ़ी?

छत्तीसगढ़ में स्थित बस्तर के एक छोटे से गांव बकावंड में एक डरपोक निर्दयी बाप ने अपनी बेटी को पूरे बीस साल तक अपने घर के अंधेरे दमघोटू कमरे में बंदी बनाकर रखा। बच्ची जब मात्र आठ साल की थी, तभी कायर बाप को लगा कि गांव के एक बदमाश युवक की गंदी निगाहें बच्ची पर हैं। उसने पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराने या युवक को फटकारने की हिम्मत करने की बजाय अपनी ही पुत्री की सुरक्षा के लिए यह खौफनाक रास्ता चुना। बच्ची की मां की बहुत पहले मौत हो गई थी। यह बाप मजदूरी कर किसी तरह से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर पाता था। जिस बिना खिड़की वाले मिट्टी के कच्चे कमरे में लड़की बीस वर्षों तक कैद रही वहां पिता रोज दरवाजा खोलकर खाना रखता और फिर दरवाजा ऐसे बंद कर देता था कि लाख कोशिश के बाद बेटी के लिए बाहर निकलना तो दूर झांकना भी मुश्किल था। उसने बीस साल तक किसी बाहरी इंसान का चेहरा नहीं देखा। घोर आश्चर्य की बात है कि उसका नहाना, जागना, सोना और खाना-पीना बंद कमरे में इतने वर्षों तक होता रहा। पड़ोसियों को भी खबर नहीं लगी कि निकट के घर की दिवारों के पीछे एक मासूम बेटी कैद होकर खून के आंसू बहा रही है। लड़की के भाई-भाभी भी ज्यादा दूर नहीं रहते थे, लेकिन उन्होंने भी कभी उसकी सुध लेना जरूरी नहीं समझा। सतत अंधेरे में रहते-रहते लड़की की आंखों की रोशनी जाती रही। वह पूरी तरह से अंधी हो गई। सन्नाटे और अकेलेपन ने उसकी आवाज भी छीन ली। बच्ची से जवान हो चुकी यह बिटिया तो घुट-घुटकर अंतत: दम ही तोड़ देती यदि उसके दादा ने समाज कल्याण विभाग को इस जुल्म के बारे में जानकारी नहीं दी होती। लड़की का नाम लिसा है। लिसा को मेडिकल जांच के बाद आश्रय स्थल ‘घरौंदा’ में रखा गया है। यहां के साफ-सुथरे हवादार माहौल में पौष्टिक भोजन और नियमित स्वास्थ्य सेवाओं के साथ उसकी देखरेख की जा रही है। लिसा धीरे-धीरे मानसिक रूप से सामान्य तो हो रही है, लेकिन किसी भी अनजान इंसान को देखकर कांपने और डरने लगती है। उसकी देखरेख में जी-जान से लगी सिस्टर टेसी फ्लावर चाहती हैं कि लिसा न सिर्फ सेहतमंद हो, बल्कि जीवन को फिर से समझे और बेखौफ होकर खुशी-खुशी जीना प्रारंभ करे। लिसा का बाप अपनी बेवकूफी पर शर्मिंदा है। उसने अस्पताल के डॉक्टरों से निवेदन किया है कि अब मैं वृद्ध हो गया हूं। आप ही इसकी देखरेख करें।

तीन महीने पहले दिल्ली में था। एक दूर के रिश्तेदार के यहां ठहरा हुआ था। उनका नाम है अशोक सेठी। सेठी जी की सोनीपत के पास शू फैक्ट्री है। हर तरह के शूज के निर्माता, इन महाशय की विवाहित बेटी कुछ दिनों से अपने मायके में आकर रह रही थी। कविता नाम की इस बिटिया की शादी दो साल पहले ही उत्तम नगर के रईस खानदान में हुई थी। उसका पति अनूप चड्ढा सरकारी ठेकेदारी के साथ-साथ जमीनों की खरीदी-बिक्री का बड़ा खिलाड़ी है। धन-दौलत के मामले में अपने ससुर को टक्कर देने वाले अनूप ने कुछ दिन तो कविता से अच्छा व्यवहार किया, फिर कालांतर में जब वह रोज-रोज शराब के नशे में धुत होकर आधी-आधी रात को घर आने लगा तो कविता का माथा ठनका। कविता को शराब पीने वालों से शुरू से ही नफरत थी। जब रिश्ते की बात चली थी तब उसे आश्वस्त किया गया था कि अनूप में कोई ऐब नहीं है। शराब और लड़की बाजी में लिप्त होने की बीमारी से दूर-दूर तक उसका कोई वास्ता नहीं है। वह तो सिर्फ अपने कारोबार में डूबा रहता है, लेकिन शादी के चंद रोज के बाद ही कविता को पड़ोसियों से पता चल गया कि उसका दो-दो औरतों से चक्कर चल रहा है। वेश्याओं के यहां जाकर रातें बिताने के चर्चे तो उसके तब होने लगे थे जब वह कॉलेज में पढ़ रहा था। शराब के साथ-साथ गांजा और एमडी भी वह तभी लेने लगा था। उसके करोड़पति खानदान में कोई भी शरीफ आदमी अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं था। कविता के पिता को अंधेरे में रखकर चट मंगनी-पट ब्याह का बड़ी तेजी से ऐसा चक्कर चलाया गया, जिससे उन्हें लड़के के बारे में ज्यादा खोज-खबर लेने का मौका ही नहीं मिल पाया। जिसने जो बताया उसे ही सच मानकर कविता की अनूप से शादी कर दी गई। इस शादी में कम अज़ कम पांच करोड़ रुपये की आहूति दी गई। लाखों की कार, सोना-चांदी, कपड़े एवं अन्य महंगे-महंगे उपहार देकर सेठी अपनी इकलौती बेटी का गंगा नहाने के अंदाज में कन्यादान कर कुछ हफ्तों के लिए विदेश यात्रा पर निकल लिए। शुरुआत में तो कविता यह सोचकर अपने पति की प्रताड़ना सहती रही कि वह उसे धीरे-धीरे सही राह में लाने में कामयाब हो जाएगी, लेकिन हफ्ते, महीने गुजर जाने के बाद भी रात को उसका नशे में लड़खड़ाते आना और गालीगलौच करना कायम रहा। कविता की बर्दाश्त करने की ताकत तब खत्म हो गई जब उसे अंधाधुंध मारा-पीटा जाने लगा। बार-बार घर से लाखों रुपये लाने की मांग भी की जाने लगी। दो-तीन बार उसकी मांग की पूर्ति भी की गई, लेकिन लालच का सिलसिला बना रहा। रोती-बिलखती कविता जब भी अपने मायके पहुंची तो मां-बाप ने उसे इस दिलासे के साथ सुसराल वापस जाने को विवश कर दिया कि तुम कुछ तो सब्र करो, जब बच्चा हो जाएगा तो पति खुद-ब-खुद सुधर जाएगा। कविता न चाहते हुए भी लौट तो गई, लेकिन अनूप का नजरिया नहीं बदला। उसने कविता को कोल्ड ड्रिंक में जहर मिलाकर मारने की भी कोशिश की। उसका मुंह बंद रखने के लिए खौलता हुआ पानी भी फेंका। एक रात तो जब वह अपनी पुरानी प्रेमिका को घर ले आया तो कविता के रहे सहे सब्र का पैमाना चूर-चूर हो गया। उसने फौरन अपना कुछ जरूरी सामान अटैची में भरा और पिता की शरण में चली आई। 

कविता ने जब अपना दुखड़ा मुझे सुनाया तो मैंने अशोक से कहा कि जब बेटी सुसराल में रहना ही नहीं चाहती तो बार-बार वापस जाने का फरमान सुनाकर उसे किस अपराध की सजा दे रहे हो? उसका तो कोई दोष नहीं। अब जब गलत लोगों से पाला पड़ गया है तो बेटी के हित में कोई रास्ता तो निकालना तुम्हारा फर्ज है। प्रत्युत्तर में अशोक ने यह कहकर मुझे आहत कर दिया, ‘‘तुम्हें मालूम तो है कि मैंने शादी में अपने खून-पसीने से कमाये करोड़ों रुपए खर्च किए थे। यह लड़की एडजस्ट करना ही नहीं जानती। बार-बार जिस तरह से मुंह उठाये चली आती है, उससे मेरे मान-सम्मान को ठेस लगती है। आसपास रहने वाले कई तरह की बातें करते हैं। उन्हें इसमें ही कुछ न कुछ खोट और कमी लगती हैं। मैं तो तलाक के पक्ष में भी नहीं हूं।’’

‘‘मैं तुम्हारी सोच से बिल्कुल सहमत नहीं। तुम्हें पता है कि बाप अपनी बेटी के लिए क्या-क्या नहीं करते? कुछ महीने ही हुए हैं। एक विवेकशील पिता को जब उसकी बेटी ने अश्रुपूरित आंखों से बताया कि उसका पति राक्षस से भी गया बीता है। वह ससुराल के अपमानजनक वातावरण से मुक्ति चाहती है। मुझे डर है कि, कहीं वह मेरी हत्या न कर दे या फिर मैं ही खुदकुशी करने पर विवश हो जाऊं। पिता ने बिना कोई उपदेश दिये बेटी को नर्क से वापस लाने का फैसला कर लिया। उसने अपने कुछ शुभचिंतकों को एकत्रित किया और बैंड-बाजे के साथ अपनी लाडली बिटियां को लेने जा पहुंचा। ससुराल वाले स्तब्ध रह गए। उन्हें बताया गया कि हम अपनी बेटी को लेने आये हैं। हमे उनसे कोई रिश्ता नहीं रखना है। लड़केवालों ने बिना कोई नाटक किए दहेज में मिले तमाम सामान को वापस देते हुए शर्मिंदगी से अपना सिर झुका लिया। बेटी आज अपने पिता के घर में नई शुरुआत करते हुए खुश और संतुष्ट है। मैं चाहता हूं कि अपनी बेटी के लिए तुम भी दस-बीस लोगों को बारात की शक्ल में लड़के वालों के यहां धड़धड़ाते हुए जा पहुंचो और बेटी को सम्मान के साथ वापस ले आओ, बिल्कुल वैसे ही जैसे वे नाचते-कूदते हुए वे बेटी को ब्याह कर ले गए थे। ऐसे लोगों को ऐसे ही तमाचा जड़ा जाना जरूरी है।’’

मैं सोच रहा था अशोक सेठी मेरे सुझाव को सिर आंखों पर लेते हुए सकारात्मक फैसला लेने में देरी नहीं करेगा, लेकिन उसने तो मेरी ही ऐसी-तैसी करके रख दी और मुझे अपमानित कर अपने घर से बाहर कर दिया। सेठी की पत्नी और बेटे ने भी मुझे तीखे शब्दों के वार से अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। दिल्ली से नागपुर आने के बाद मैं अपने कामकाज में व्यस्त हो गया। कुछ दिनों के बाद किसी मित्र ने मोबाइल कर अत्यंत दुखद खबर दी, ‘‘कविता ने ज़हर खाकर अपने पिता के घर में आत्महत्या कर ली है। वह किसी भी हालत में ससुराल नहीं जाना चाहती थी, लेकिन माता-पिता और भाई उस पर दबाव डाल रहे थे कि उसे पिता के घर से जाना ही होगा। अपने मायके में रहकर कब तक हमारी बदनामी का कारण बनी रहोगी?’’

 बदनामी और मान-सम्मान दोनों ही कहीं न कहीं उस अभिमान से जुड़े हैं, जिसकी वजह से अभी तक न जाने कितनी बहन, बेटियों और बहुओं की जान जा चुकी है। ऊंच-नीच, अमीर गरीब की स्वार्थी और घटिया सोच का कभी अंत होगा भी या नहीं? इक्कीस साल की आंचल और बीस साल के सक्षम ने एक दूसरे से सच्चा प्रेम ही तो किया था। दोनों निश्छल प्रेमी अलग-अलग जाती के थे। सदियों से चला आ रहा यही अंतर, भेदभाव उनका दुश्मन बन गया। लड़की के परिजन हर तरह से बलवान थे। उन्होंने प्रेमी सक्षम को अपने बेटी से मिलने से बहुत रोका-टोका, लेकिन न तो वो माना और प्रेमिका भी अडिग बनी रही। दोनों लगभग तीन वर्ष से प्रेम के पवित्र रिश्ते की मजबूत डोर से बंधे हुए थे। नांदेड़ शहर में जन्मा और पला बढ़ा सक्षम ताटे बौद्ध समाज का युवक था तो आंचल का पदमशाली (बुनकर) समाज से नाता था। यह कम्यूनिटी स्पेशल बैकवर्ड क्लास में आती है। अहंकारी आंचल के परिवार को दोनों का एक होना कतई मंजूर नहीं था। उन्होंने सक्षम की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सक्षम की गोली मार कर हत्या की गई थी। कविता को जैसे ही अपनेे प्रेमी की नृशंस हत्या के बारे में पता चला तो वह रात को ही अपने पिता का घर छोड़ सक्षम के घर जा पहुंची और उसने हमेशा-हमेशा के लिए वहीं रहने का ऐलान कर दिया। जब सक्षम के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी तब आंचल ने जो फैसला किया उससे हर कोई स्तब्ध रह गया। समर्पित प्रेमिका ने अपने प्रेमी को अंतिम विदाई देने से पहले दुल्हे की तरह सजा कर शादी की रस्में निभाते हुए उसके शरीर पर हल्दी-कुमकुम लगाई और उसके हाथ से वही हल्दी-कुमकुम अपने शरीर पर लगाया तथा शव के हाथ में सिंदूर देकर उसे अपने माथे पर लगा दिया और मांग में भी भर दिया। जब अंतिम संस्कार की पूर्ण तैयारी हो गई और परिजन अर्थी को कंधा देने के लिए उठाने लगे तो आंचल ने सबको रोक कर अर्थी के साथ रोते-बिलखते हुए सात फेरे लेते हुए  कहा यह उसका सच्चा विवाह है। मरते दम तक मैं किसी और के बारे में नहीं सोचूंगी। मेरा परिवार चाहता था कि हम अलग हो जाएं, लेकिन मैंने तो सक्षम से शादी कर ली। अंतिम यात्रा से पहले उसके नारियल फोड़ते ही आसपास मौजूद पड़ोसी और सभी परिवार वाले फूट-फूटकर रो पड़े। कविता ने अपने हत्यारे पिता और भाइयों को फांसी के फंदे पर लटकाने की मांग की है।

Thursday, December 4, 2025

ज़िस्म की कीमत

आपने कभी सोचा, गौर किया कि तरह-तरह के नशों की आदत इंसान को किस दलदल में फंसाती है? उसकी प्रतिष्ठा, पूछ परख और जिस्म की हस्ती मिटती चली जाती है? किसी भी नशेड़ी के नशे की शुरुआत सिगरेट, बीड़ी से होती है और फिर उसके कदम पतन की राह में आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं। अखंड शराबी को यदि शराब न मिले तो उसका तन-मन तड़पने लगता है। वह नशे के नये-नये साधन तलाशने लगता है। नशे के ज़हर से भरे मीठे दंश से होनेवाली असंख्य तबाहियां इन आंखों ने देखी हैं। खेतों-खलिहानों वाले पंजाब को ‘उड़ते पंजाब’ के नाम से दागदार होते देखा है। जहां शराबबंदी है, वहां चोरी-छिपे ही नहीं खुलेआम मैंने शराब बिकती-मिलती देखी है। सरकारें भी जानती-समझती हैं फिर भी क्यों अंधी, बहरी बनी हैं, इसका जवाब मुझे तो अभी तक नहीं मिला। सबसे बड़ा उदाहरण बिहार का है, जहां कहने को तो करीब दस साल से शराबबंदी है, लेकिन पीने वाले कभी बिना पिये नहीं सोते। चाहे कुछ भी हो जाए नशा तो करना ही है। इसके लिए बिहार के युवाओं ने शराब का विकल्प तलाशते हुए गांजा, स्मैक, चरस और ब्राउनशुगर से दोस्ती करनी प्रारंभ कर दी है। इतना ही नहीं इस प्रदेश में कफ सिरप की मांग बहुत बढ़ गई है, जिन्हें शराब नहीं मिलती वे सिरप पी रहे हैं। 

अवैध शराब के जाने-पहचाने खिलाड़ियों की तरह सिरप के निर्माता, विक्रेता और तस्कर खूब मालामाल हो रहे हैं। जिनकी औलादें नशे के चंगुल में फंस रही हैं और फंसी हैं उन मां-बाप की नींदे हराम हो रही हैं। शहर ही नहीं गांवों के नौजवान ड्रग्स के दिवाने हो रहे हैं। गरीब, अमीर पालक सभी चिंतित और परेशान हैं। डॉक्टर, प्रोफेसर, अधिकारी, व्यापारी अपनी संतानों को घातक नशों के दलदल से बाहर निकालने के लिए नशा मुक्ति केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं। एक नशा मुक्ति केंद्र संचालक का कहना है कि, मुक्ति केंद्र में लाये जाने वाले अधिकांश बीस से पच्चीस वर्ष के युवा हैं। इनमें कई स्मैक के आदी हो गये हैं। वैसे अकेले बिहार को नशे के ऐसे दुर्दिन नहीं देखने पढ़ रहे हैं। महाराष्ट्र के युवा भी बड़ी तेजी से ड्रग्स की संगत में अपने भविष्य का सत्यानाश कर रहे हैं। इस प्रदेश की उपराजधानी नागपुर को संस्कारों का शहर कहा जाता है, लेकिन नशा युवाओं के पतन का कारण बन रहा है। यहां बच्चों की बर्बादी के कितने-कितने इंतजाम हो चुके हैं और हो रहे हैं। अब तो गिनना और बताना भी मुश्किल होता जा रहा है। संतरों की नगरी में नशे की पुड़िया ने किताब-कापियों की जगह ले ली है। कुछ नकाबपोश दवा दुकानदार ड्रग माफिया बन चुके हैं। शहर के कई इलाकों में सूखा नशा यानी गांजा और एमडी की लत लगाकर युवाओं के भविष्य के साथ जिस तरह से खिलवाड़ हो रहा है, उससे सजग नागरिक भी चिंतित हैं। खबरें चीख-चीख कर दावा कर रही हैं कि नागपुर में रोजाना चार से पांच किलो एमडी ड्रग और 200 किलो से ज्यादा गांजा सहजता से बिक रहा है। 

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर वो शहर है, जहां बाहर से आनेवाले नशेड़ियों को शराब की दुकानों तथा बीयर बारों की तलाश में बिल्कुल माथा-पच्ची नहीं करनी पड़ती। लगभग हर चौक-चौराहे और गली कूचे में भी नशे में डूबने के लिए मयखाने आबाद हैं। कई देशी शराब की दुकानों के तो जैसे दरवाजे ही कभी बंद नहीं होते। गगनचुंबी इमारतों का निर्माण करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक, ठेलेवाले कभी भी यहां दारू पीते देखे जा सकते हैं। इन सदाबहार पियक्कड़ों के लिए बहुत से नशे के सरकारी ठिकानों पर उबला अंडा, आमलेट, नमकीन तथा नमक जैसे चखनों का भरपूर इंतजाम है। मैंने खास तौर पर यह भी गौर किया है कि, पिछले पांच-सात सालों में शहर में दवाई की दुकानों में भी जबरदस्त इजाफा हुआ है। पहले मेडिकल स्टोर्स की तलाश करनी पड़ती थी, लेकिन अब तो जहां नजर डालो वहां किसी भव्य शोरुम की तरह मेडिकल स्टोर्स खुले नज़र आते हैं और अपने यहां लोगों का तांता लगवाने के लिए अधिक से अधिक छूट का प्रलोभन भी देने लगे हैं। युवाओं की जिन्दगी को तबाही के कगार पर पहुंचा रहे ड्रग माफियाओं को कुछ पुलिस वालों का संरक्षण मिलता चला आ रहा है, तो दूसरी तरफ नशे के सौदागरों को नेस्तनाबूत करने के पुलिसिया अभियान की खबरें भी पढ़ने में आ रही हैं। शहर में नशे के काले कारोबार का समूल खात्मा करने के लिए नागपुर पुलिस ने एड़ी-चोटी की ताकत लगा दी है। ‘ऑपरेशन थंडर’ के तहत सीपी रवींद्रकुमार सिंगल ड्रग तस्करी और बिक्री करने वाले नेटवर्क का भंडाफोड़ कर कमर तोड़ने में लगे हैं। ‘ऑपरेशन थंडर’ केवल एक अपराध विरोधी अभियान नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक मुहिम है, जिसके तहत पुलिस शहर के स्कूलों, कॉलेजों, झुग्गी बस्तियों और शहरी इलाकों में जागरुकता अभियान चला रही है। आम लोगों को भी सतर्क किया जा रहा है। लोगों में जागृति लाने और नशे के सौदागरों की पकड़ा-धकड़ी के ऐसे अभियान पहले भी देखे गये हैं लेकिन पुलिस के उच्च अधिकारी के स्थानांतरण होते ही दम तोड़ देते हैं।

बीते हफ्ते कुछ उन युवकों से मिलना हुआ, जो एमडी की दलदल में बुरी तरह से फंस चुके हैं। उन्होंने बताया कि, पुराने एमडी के नशेड़ी दोस्तों ने उन्हें शुरू-शुरू में कहा कि, एक बार ट्राय करके देखो। ऐसा आनंद आयेगा जो जीवनभर याद रहेगा। दुनिया किसी जन्नत जैसी लगेगी। तब की शुरुआत धीरे-धीरे लत में बदलती चली गई। तीन साल हो गये हैं। एमडी की पुड़िया और गांजा के कश ने जिन्दगी को तबाह करके रख दिया है। वापसी का कोई रास्ता नज़र ही नहीं आता। परिवार का भरोसा, पढ़ाई और मान-सम्मान लुट गया है। कई बार आत्महत्या करने का भी मन होता है। सबसे ज्यादा बुरा तो उन लड़कियों के साथ हो रहा है, जो पढ़ाई के लिए बाहरगांव से नागपुर आई हैं। ड्रग माफिया का जाल स्कूल और कॉलेजों की दहलीज तक फैल चुका है। स्कूली और कॉलेज की लड़कियों को पहले तो एमडी के तस्कर दोस्त और हितैषी बन मुफ्त में नशे की पुड़ियां थमाते हैं, फिर जब धीरे-धीरे उन्हें इसकी लत लग जाती है तो उनसे पैसों की मांग की जाती है। एमडी और सूखे नशे के लपेटे में गिरफ्तार लड़कियों की जेब जब खाली हो जाती है तो  शिकारी उनकी देह के साथ मौजमस्ती करने के लिए तरह-तरह के जाल फेंकने लगते हैं। अपनी अस्मत लुटाने के बाद भी अधिकांश लड़कियां खामोश रहती हैं। इस घातक खतरनाक कुचक्र में फंसी लड़कियों की शर्मगाथा सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान का माथा घूम सकता है।  रजनी (काल्पनिक नाम) की आपबीती उसी के शब्दों में, 

‘‘मैं अभी बाइस वर्ष की हूं। छत्तीसगढ़ के शहर कोरबा में मेरे माता-पिता रहते हैं। मां गृहिणी हैं, पिता कपड़े के व्यापारी हैं। उन्होंने अत्यंत उत्साह के साथ एयर होस्टेस की ट्रेनिंग के लिए चार वर्ष पूर्व मुझे नागपुर भेजा था। मैं भी शुरू से पढ़ाई में खासी होशियार थी। एयर होस्टेस बनना मेरा बचपन का सपना था। नागपुर में मैं अपनी सहेली के साथ फ्लैट किराये पर लेकर रह रही थी। नागपुर में आने के बाद ही मेरी उससे जान-पहचान हुई थी। पिता खर्चे के लिए हर महीने बीस हजार रुपए भेजा करते थे। शुरू-शुरू में तो इतने रुपयों से मेरा ठीक-ठाक गुजारा हो जाता था, लेकिन गड़बड़ तब होनी शुरू हुई, जब मैं सहेली की देखा-देखी पहले बीयर फिर शराब पीने लगी। इसी दौरान उसने किसी दिन मुझे गांजे का कश लगाने को उकसाया तो मेरा मन भी ललचाया। यह मेरे सूखे नशे की पहली सीढ़ी थी, जिस पर पैर धरते ही मैं अपनी जमीन भूलकर आकाश में उड़ने लगी। एक रात मेरी सहेली, उसका ब्वॉयफ्रेंड, एक अनजान युवक और मैं कार से वर्धा रोड पर स्थित एक क्लब में जा पहुंचे। मकसद तो पीना-पिलाना और गांजा के कश लगाना था। वहां हम चारों ने नशे में झूमते हुए खूब डांस किया। वहीं पर मैंने एमडी ड्रग भी आजमा ली। शराब के साथ इन तमाम नशों के ओवर डोज ने मेरी हालत बिगाड़ दी और धड़ाधड़ उल्टियां होने लगीं। रात के दो-ढाई बजे हम लड़खड़ाते हुए क्लब से निकलकर कार पर सवार हो गए। उल्टियों के कारण मैं लस्त-पस्त हो चुकी थी। मेरा मस्तिष्क घूम रहा था। कार ने अभी कुछ पल का सफर तय किया ही था कि मेरी सहेली और उसका दोस्त जो कार चला रहा था, कुछ खाने के लिए कार से नीचे उतर गए। उनके जाते ही अजनबी युवक ने मेरे साथ बलात्कार करना प्रारंभ कर दिया और मैं बेबस सी पड़ी रही। दूसरे दिन मैंने सहेली को बताया तो वह मुस्कुरा कर रह गई। मुझे उसकी मिलीभगत भी समझ में आ गई। शाम को युवक का फोन आया, मिलने आ रहा हूं। आनाकानी करोगी, तो कहीं की नहीं रहोगी। सेक्स के दौरान खींची गई तस्वीरें और वीडियो देखना चाहोगी तो दिखा दूंगा। पुलिस स्टेशन जाना चाहती थी, लेकिन सहेली ने भारी बदनामी का भय दिखाकर रोक दिया। सात-आठ महीने तक वह मेरे ज़िस्म से खेलता रहा। 

एयर होस्टेस बनने की चाहत ने दम तोड़ दिया। माता-पिता को भी मेरी बदचलनी की खबर मिल गई। उन्होंने हमेशा-हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया है। अब तो रात-बेरात कोई भी मोबाइल कर पूछता है, तुम्हारा रेट क्या है जानम? जब कभी किसी सड़क चौराहे से गुजर रही होती हूं तो पुरुषों की घूरती निगाहों को देखकर सोचती रहती हूं कि सबको मेरे बारे में पता चल गया है। सभी मेरी एक रात या कुछ घंटों की कीमत जानने को आतुर हैं। शहर के उन तमाम होटलों, स्पा, ब्यूटी पार्लर, फार्म हाउस, फ्लैटों के चप्पे-चप्पे को नाप चुकी हूं, जहां देह का व्यापार होता है। इन अय्याशी के ठिकानों की सभी को खबर है। पुलिस की छापामारी का शिकार होकर कुछ रातें थानों की जेल में भी काट चुकी हूं। जब भी आंख बंद कर सोचती हूं तो खुद से नफरत होने लगती है। ज़हर खाने की प्रबल इच्छा पर किसी तरह नियंत्रण रख जी रही हूं। मैं हर लड़की को यही कहना चाहती हूं कि मेरी तबाही से सबक लें। मायावी शहर में बहुत संभलकर रहें। गलत संगत और नशे के आसपास भी न जाएं। इनकी दोस्ती जिस तरह से भटकाती है और अंतत: नर्क दिखाती है,  उसे मैं रोज मर-मर कर देख और भोग रही हूं, लेकिन मैं नहीं चाहती कि किसी और लड़की का इससे सामना हो।

Thursday, November 27, 2025

तमाशा-तमाचा

‘‘आप लोगों को शर्म आनी चाहिए, आपके घर में मां-बाप हैं, आपके बच्चे हैं, शर्म नहीं आती?’’ 

अथाह गुस्से में कहे गये यह शब्द फिल्म अभिनेता सनी देओल के थे। उनकी यह फटकार, भड़ास और लताड़ तेजाब की तरह बरसी थी उन पैपराजी पर जो सुबह-सुबह तस्वीरें खींचने के लिए उनके बंगले के बाहर भीड़ की शक्ल में आकर डट गये थे। ‘गदर’ फिल्म के नायक का यह गुस्सा काफी हद तक वाजिब था। सैकड़ों फिल्मों के कसरती नायक, उनके पिता धर्मेंद्र को लगातार 11 दिनों तक मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती रहने के पश्चात यह सोचकर घर लाया गया था कि घरवालों को सुकून से उनके साथ रहने और सेवा करने का अवसर मिलेगा। ऊपर वाले ने जितने दिन की मोहलत दी है वो तो कम अ़ज कम ठीक-ठाक कटेंगे। करोड़ों देशवासियों के चहेते ‘शोले’ के हीरो को शांति मिलेगी। पूरा परिवार उनकी सेवा और देखरेख में लगा हुआ था। ऐसे में कोई भी नहीं चाहता था कि घर के आसपास भीड़भाड़ और शोर-शराबा हो, लेकिन पैपराजी कहा मानने वाले थे। जैसे ही 89 वर्षीय बीमार अभिनेता को अस्पताल से घर लाया गया, हंगामा और शोर-शराबा करती बेतहाशा भीड़ घर के बाहर आ जुटी। इस हुजूम को देखते ही सनी गुस्से से लाल-बेहाल हो गए।

मायानगरी मुंबई में पिछले पांच-सात सालों से ‘पैपराजी’ की सेलिब्रिटीज की निजता में डकैती और उनके इर्द-गिर्द सतत उछल-कूद की खबरों ने देशवासियों को भी हैरान कर रखा है। दरअसल, बॉलीवुड ही नहीं, महानगरों में जहां-तहां पैपराजी की जमात कुकरमुत्ते की तरह उगी देखी जाने लगी है। यह वो अनियंत्रित अति उत्साहित फोटोग्राफर हैं, जो सेलिब्रिटीज की तस्वीरें खींचने और वीडियो बनाने के लिए दिन-रात पगलाये रहते हैं। किसी  की मजबूरी, दुख तकलीफ और समय से इनका कोई लेना-देना नहीं है। किसी भी इंवेट, होटल, घर से बाहर जैसे ही किन्ही अभिनेताओं, अभिनेत्रियों, संगीतकारों, उद्योगपतियों तथा राजनेताओं जैसी मशहूर हस्तियों और यहां तक कि उनके मासूम बच्चों को देखते ही ये बिना किसी अनुमति के अधिकारपूर्वक फोटो खींचने तथा वीडियो बनाने लगते हैं। सेलिब्रिटीज के हर मूवमेंट पर नज़र रखने वाले पैपराजी छाती तान कर श्मशानघाट और कब्रिस्तान तक भी धड़धड़ाते हुए पहुंच जाते हैं और वहां पर पूछा-पाछी और तस्वीरें खींच-खींच कर मृतक के परिवार को परेशान करके रख देते हैं।

दरअसल, इनका लक्ष्य ऐसी तस्वीरें कैप्चर करना होता हैं, जो सनसनीखेज और मनोरंजक हों, ताकि वे उन तस्वीरों को न्यूज एजेंसियों, सोशल मीडिया, अखबारों तथा विभिन्न पत्रिकाओं को बेचकर कमाई कर सकें। यह भी सच हैं कि पैपराजी का काम अत्यंत जोखिमभरा होता है। सेलिब्रिटीज का लगातार पीछा करने वाली भागदौड़ में इन्हें बहुत सावधान रहना पड़ता है। मशहूर हस्तियों की निजता में दखल देने के कारण यह बार-बार अपमानित भी होते रहते हैं। पैपराजी दरअसल, इतालवी भाषा का शब्द है और इसका सही उच्चारण पापाराजी है, लेकिन समय के साथ अपभ्रंश होते हुए यह पैपराजी हो गया। इस पेशे से जुड़े लोगों की जिद और जुनून ने तब पूरे विश्व के मीडिया में सुर्खियां बटोरी थीं, जब प्रिसेंस ऑफ वेल्स डायना की मौत हुई थी। इस भयावह दिल दहलाने वाली दुर्घटना के लिए पैपराजी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा गया था कि राजकुमारी डायना और उनके प्रेमी की किसी भी हालत में तस्वीरें लेने के लिए यदि यह लोग शिकारी की तरह उनका पीछा नहीं करते तो प्रेमी-प्रेमिका को अंधाधुंध कार नहीं दौड़ानी पड़ती और जानलेवा हादसा भी नहीं होता। नामी-गिरामी हस्तियों तथा अपने-अपने क्षेत्र में उभरते चेहरों को शुरू-शुरू में तो प्रसिद्धि पाने के लिए पैपराजी का तस्वीरेें खींचना और वीडियो बनाना बहुत भाता है, लेकिन जब वे अपनी सीमाएं लांघते हुए उनके बेडरूम तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें मुक्के और गालियां भी झेलनी पड़ती हैं। फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा के पिता की श्रद्धांजलि सभा में पहुंची उम्रदराज फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन का एक वीडियो बार-बार वायरल होता रहता है, जिसमें वे फोटोग्राफर्स पर भड़कते हुए कहती नजर आती हैं, ‘‘आप लोगों को कोई लिहाज शर्म नहीं है न?’’ बॉलीवुड में तेजी से उभरी एक अभिनेत्री का कहना है कि, जब तक मैं ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुई थी, तब तक कहीं भी बड़े आराम से आती-जाती थी, लेकिन अब तो किसी रेस्टॉरेंट, कैफे, पब, होटल, गार्डन आदि में जाना हराम हो गया है। मेरे पहुंचने से पहले पैपराजी पहुंच जाते हैं और बंदूक की तरह कैमरे तान देते हैं। अब यदि बेहयायी की बात करें तो अकेले सोशल मीडिया और रोजी-रोटी के लिए एड़िया रगड़ते पैपराजी ही हद दर्जे के बेशर्म नहीं हैं।

देश के स्थापित न्यूज चैनल भी सबसे पहले लोगों तक न्यूज पहुंचाने के चक्कर में कैसी-कैसी बदतमीजियां और बेवकूफियां करते हैं, अब सभी जान गये हैं। हिट पर हिट फिल्में देनेवाले शांत और शालीन गरम-धरम सदाबहार अभिनेता की मौत की झूठी खबर बार-बार दिखाकर ‘आज तक’ जैसे विख्यात न्यूज चैनल की प्रख्यात एंकर अंजना ओम कश्यप ने गैरजिम्मेदार होने का सबूत पेश करते हुए अपनी जो खिल्ली उड़वायी उससे यह भी साबित हो गया कि टीआरपी और नंबर वन बने रहने के लिए भारत का इलेक्ट्रानिक मीडिया कितना गिर चुका है। जिंदादिल नायक धर्मेंद्र से पूर्व जाने-माने कॉमेडियन असरानी की झूठी मौत की खबर फैलाकर सोशल मीडिया को भी काफी बदनामी झेलनी पड़ी, लेकिन यह भी तो सच है कि, न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया में जमीन-आसमान का फर्क है। सोशल मीडिया तो झूठ और अफवाहों का पुलिंदा है, जो पूरी तरह से बेलगाम है। उस पर किसी का कोई अंकुश नहीं है, लेकिन हर न्यूज चैनल से यह उम्मीद की जाती है कि वह बिना पुष्टि के कोई खबर दर्शकों तक न पहुंचाए, लेकिन अब उम्मीद और भरोसे के परखच्चे उड़ चुके हैं। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ दिखाने की इनकी वहशी भूख का कहां जाकर अंत होगा, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। अस्पताल से अपने घर में लाये जाने के कुछ दिन बाद जब निहायत ही जमीनी अभिनेता की वास्तव में मौत हुई तो घर परिवार वालों ने बिना किसी शोर-शराबे के उनका अंतिम संस्कार कर दिया। अपनी साख पर बट्टा लगवा चुके मीडिया को भी उनके चल बसने की खबर देरी से मिली। दमदार करिश्माई अभिनेता के जिन्दा रहते उनकी मौत की खबरें फैलाने वाले हतप्रभ रह गए। अपने जन्मदाता की मौत की झूठी खबरों से आहत परेशान सनी देओल तथा परिवार ने सब पर प्यार लुटाने वाले पिता के सचमुच हुई मौत की दुखद खबर से मीडिया को फौरन इसलिए अवगत नहीं कराया, क्योंकि उनके मन में उसके प्रति अथाह गुस्सा था। साथ ही वे नहीं चाहते थे अभिनेता की अंतिम विदाई के वक्त उमड़ने वाली भीड़ से किसी को कोई परेशानी हो। लगभग सात दशक तक फिल्मी आकाश में जगमगाने वाला सितारा चुपचाप विदा हो गया। यह दु:ख उनके उन लाखों प्रशंसकों के दिलों में सदैव बना रहेगा। इसके लिए वो लोग भी दोषी हैं, जिन्होंने असंख्य भारतीयों के प्रिय सितारे की जीते जी मौत की खबरें चलाकर देओल परिवार ही नहीं समस्त सजग देशवासियों को आहत किया। मुझे वो पल याद आ रहे हैं, जब लगभग बीस वर्ष पूर्व मैं फिल्म सिटी में किसी फिल्मी पत्रिका के लिए उनका साक्षात्कार ले रहा था, तब एकाएक उन्होंने मुझसे पूछा था कि, मेरी ऐसी कौन-सी खासियत है, जो तुम्हें वाकई प्रभावित करती है? मेरा जवाब था, पर्दे पर जब आप खलनायक की धुनाई करते हैं तो अधिकांश दूसरों अभिनेताओं की तरह नकली नहीं लगते। आपका मजबूत जिस्म खुद-ब-खुद बोलता नज़र आता है। मेरा जवाब सुनकर शायरी, नज़्मों और कविताओं के शौकीन भावुक नायक ने मुस्कुरा कर जिस तरह से मेरी पीठ थपथपायी थी, मैं शायद ही कभी भूल पाऊं...। सपने तो सभी देखते हैं लेकिन उन्हें कितने लोग वास्तव में साकार कर पाते हैं? आलस्य, बहानेबाजी, टालमटोल और खुद पर भरोसे का अभाव उन्हें आगे बढ़ने ही नहीं देता। जहां के तहां अटके रह जाते हैं। विशाल हृदय और सादगी से परिपूर्ण धर्मेंद्र जब पंद्रह-सोलह वर्ष के थे, तब सड़कों, चौराहों तथा फिल्म थियेटर पर फिल्मी सितारों के पोस्टर देखते-देखते उनके मन में बार-बार विचार आता कि वो दिन कब आयेगा जब इन पोस्टरों पर उनका चेहरा होगा और भीड़ उनके पीछे दौड़ेगी। अपनी चाहत, अपने सपने को साकार करने के लिए कुछ वर्ष बाद पंजाब की मिट्टी की सौंधी खुशबू के साथ मुंबई जा पहुंचे और वहां पर दिन-रात संंघर्ष करते हुए फिल्मी दुनिया में अपनी जो पताका फहराई किसी विशाल प्रेरक किताब जैसी ही है। इसे सभी को पढ़ना और अपने सपनों को कुशल कुम्हार की तरह गढ़ने और रंगने में खुद को झोक देना चाहिए। जिस्मानी तौर पर भले ही धरमजी हम सबके बीच नहीं है लेकिन उनकी गर्मजोशी, आकर्षण और उनकी यादगार फिल्में हमारे साथ हैं।

Thursday, November 20, 2025

कहां से कहां तक

बीते हफ्ते अमेरिका के दो शादीशुदा जोड़ों का वीडियो देखने में आया। चारों एक ही घर में मिल-जुलकर रहते हैं। खाते-पीते और खुलकर रोमांस करते हैं। उनके हंसते-खेलते चार सेहतमंद बच्चे हैं। एक दूसरे के पति के साथ हमबिस्तर होने वाली महिलाओं को पता ही नहीं है कि वे किससे गर्भवती हुईं और बच्चों का पिता कौन है। उन्होंने कभी इस विषय पर गंभीरता से दिमाग नहीं खपाया। अंधी वासना के झूले में झूलते पुरुषों ने भी बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। उनके लिए तो बस दिन-रात सेक्स और मौज-मजा ही सबकुछ है। परिवार, समाज और मानवीय मूल्यों को सीधी चुनौती देते ऐसे और भी कुछ लोग अमेरिका तथा अन्य देशों में हो सकते हैं। चार पैरेटंस और चार बच्चों वाली इस अजूबी फैमिली का वीडियो देखने के बाद कई लोगों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। किसी ने कमेंट किया कि दरअसल, यह परिवार नहीं, बल्कि एक अजीबोगरीब प्रयोगशाला है, तो किसी ने लिखा कि बेचारे बच्चे! जब उन्हें पता ही नहीं कि उनका असली बाप कौन है तो बड़े होकर पूछने वालों को क्या जवाब देंगे? शर्म के मारे इधर-उधर मुंह छिपाते फिरेंगे। किस्सों तथा कहानियों का ऐसे ही जन्म होता है। यह अजब-गजब कारनामें लेखकों के प्रेरणा स्त्रोत होते हैं। रोमांचक और मनोरंजक फिल्में और किताबें इन्हीं से ही प्रेरित होकर बनायी और लिखी जाती हैं। भारतवर्ष के विशाल प्रदेश उत्तरप्रदेश के ललितपुर जिले मेंदो सगी बहनों ने चुपचाप बड़ी शांति से आपस में अपने पति ही बदल लिए...

दस वर्ष पूर्व उत्तरप्रदेश के ललितपुर जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम पाली के निवासी एक समझदार पिता ने बड़ी धूमधाम से अपनी दो बेटियों की शादी अलग-अलग ग्रामों के दो युवकों से की थी। दोनों बहनें अपने-अपने पतियों के संग सामान्य जीवन जी रही थीं। समय के बीतने के साथ-साथ उनके बाल-बच्चे भी हो गये। दोनों बहनों का एक दूसरे के घर आना-जाना भी बना रहा। इसी दौरान छोटी बहन अपने जीजा के प्रति आकर्षित हो गई। जीजाश्री का भी मन खूबसूरत साली के गोरे कसे बदन पर डांवाडोल हो गया और दोनों में जिस्मानी संंबंध बन गए। एक दिन ऐसा भी आया जब साली और जीजा ने परिवार और समाज की चिंता और परवाह न करते हुए शादी कर ली। बड़ी बहन को बहुत सदमा लगा। फिर भी उसने धैर्य का दामन नहीं छोड़ा। मन ही मन वह कोई हल निकालने की उधेड़बुन में लगी रही। बिल्कुल फिल्मी-सी लगने वाली इस रोचक-अजूबी कथा में झटकेदार नया मोड़ तब आया जब बड़ी बहन ने छोटी बहन के पति को मिल-बैठकर समझाया और सबकुछ भूलभाल कर नये सिरे से जीवन की शुरुआत करने के लिए मनाते हुए उससे शादी कर ली। यह भी कहा जा सकता है कि दोनों बहनों ने खुशी-खुशी आपसी रजामंदी से पतियों की अदला-बदली कर ली। इसके साथ ही बड़ी बहन ने अपने तीनों बच्चे छोटी बहन को देते हुए उसके दोनों बच्चों को अपने पास रख लिया। दोनों का एक-दूसरे के घर फिर से आना-जाना भी शुरू हो गया। घोर आश्चर्य की बात तो यह है कि उनके इस हैरतअंगेज कारनामे का पता उनके माता-पिता को तब चला, जब छोटी बहन अपने जीजा यानी अपने नये पति के साथ मायके पहुंची। पिता को जैसे ही इस अजूबी मर्यादाहीन अदला-बदली के बारे में बेटी ने बताया तो उन्होंने फटकारते हुए फौरन घर से बाहर कर दिया। बड़ी बेटी के लिए भी माता-पिता ने अपने घर के दरवाजे हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दिए। एक-दूसरे के पतियों के साथ रह रहीं दोनों बहनों के कृत्य से रिश्तेदार भी नाखुश हैं। अधिकांश ग्रामवासियों ने उनसे दूरी बना ली है। वे अपनी बहू-बेटियों को उनके निकट जाने से रोकते हुए एक नई बहस, भय और चिन्ता में उलझे हैं...।

कुछ लोग भोग विलास के ऐसे गुलाम हैं कि उन्हें विवाह की परिभाषा का ही पता नहीं है। देश के बड़े-बड़े महानगरों में तथाकथित आधुनिक सोच वाले विवाहित जोड़े आपसी सहमति से कुछ घंटों के लिए जीवनसाथियों की अदला-बदली कर शारीरिक संबंध बनाकर आनंदित होते हैं। अंधी वासना की तृप्ति के इस खेल में अधिकांश महिलाएं आसानी से तैयार नहीं होतीं। पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते की पवित्रता और मर्यादा उन्हें दूसरे पुरुष के समक्ष वस्त्रहीन तथा लज्जाहीन होने से बार-बार रोकती-टोकती है। वे जानती-समझती हैं कि, शादी बंधन नहीं बोध है। एक दूसरे को जानने समझने का सुखद मंच है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल स्त्री-पुरुष का नहीं, दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो आत्माओं का अलौकिक और पवित्र मिलन है। जहां पति-पत्नी केवल एक दूसरे का साथ नहीं निभाते, बल्कि धर्म, कर्म, अर्थ और मोक्ष की अनंत यात्रा के सहचर बन एक दूसरे के लिए जीते-मरते हैं। यह अपना देश भारत ही है, जहां अपने पति के लंबे जीवन और स्वस्थ बने रहने के लिए निर्जला व्रत रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। सुहागन स्त्रियों के साथ-साथ कुंआरी लड़कियां भी मनचाहा पति पाने के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं। यह भी अत्यंत सुखद हकीकत है कि अब तो कई पुरुष भी निर्जला व्रत रख पत्नी का साथ देने लगे हैं। एक दूसरे की खुशहाली के लिए प्रेम और समर्पण का यह भाव वाकई वंदनीय है। बताया जाता है कि, हजारों वर्ष पहले जब दुनिया में शादी-ब्याह करने का चलन नहीं था तब स्त्री-पुरुष चलते-फिरते जिस्मानी संबंध बनाते थे और फिर भूल जाते थे। बच्चों के जन्मने पर पूरा गांव उन्हें पालता-पोसता था। मां को भी पता नहीं चलता था कि उसके गर्भ में किसका बच्चा है। लगभग दस हजार वर्ष पहले तक यही स्थिति थी। तब पेड़-पौधों के पत्तों, टहनियों तथा जानवरों का शिकार कर सभी मानव अपने पेट की भूख को शांत करते थे, लेकिन धीरे-धीरे एक दौर ऐसा आया जब खेती-बाड़ी की जाने लगी। कृषि क्रांति ने इंसानों की सोच, खान-पान और रहन-सहन को बदल दिया। खून-पसीना बहाकर उपजाये गए अनाज और जमीन पर मौत के बाद किसका अधिकार होगा, ये सवाल जब बलवती हुआ तो शादी-ब्याह की शुरुआत हुई। अग्नि के समक्ष सात फेरे लेकर हमेशा के लिए एक दूसरे के होने और मां-बाप बनने के सुख और संतुष्टि ने कई चिंताओं तथा समस्याओं का समाधान भी कर दिया। बच्चों को पिता का नाम देने से यह भी निश्चित हो गया कि वही उनके वारिस हैं। 

आजकल कई महिलाएं शादी करने से कतराती और घबराती हैं। उन्हें शादी ऐसा बंधन लगती है, जहां पति का ही दबाव तंत्र चलता है। पुरुष मालिक तो पत्नी गुलाम की तरह जीने को विवश कर दी जाती है। जो महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होकर कमाने-खाने लगती हैं उनकी सोच भी बदल जाती है। अपने आसपास रह रहे पति, पत्नी में होने वाले झगड़ों और तलाक में बढ़ते मामलों ने सिर्फ महिलाओं को ही नहीं पुरुषों को भी भयभीत कर दिया है। कुछ वर्ष पहले तक पति तथा घर-परिवार के जुल्मों से तंग महिलाओं की खुदकुशी की खबरें सुनने-पढ़ने में आती थीं, लेकिन अब तो पत्नियों की गुंडागर्दी के शिकार पति भी आत्महत्या करते देखे जा रहे हैं। सच तो यह है कि हर बात के दो पहलू हैं। अपवाद भी सर्वत्र हैं। शादी-ब्याह के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी हुई हैं।

जरूरत से ज्यादा दखलअंदाजी, टोका-टाकी आज के दौर में किसी को भी पसंद नहीं। उस पर जब महिला अच्छा खासा कमा रही हो तो वह यह भी चाहेगी उसकी कमायी पर उसका भी हक हो। वह उसे अपनी पसंद से खर्च करने के लिए स्वतंत्र हो। वह अपने किसी दोस्त या परिचित से जब भी और जहां भी मिलना चाहे कोई उस पर अंकुश न लगाए। दरअसल, जहां मिलजुलकर जिम्मेदारियां नहीं उठायी जातीं, समझौता करने की बजाय शंका, क्रोध, अविश्वास, अहंकार बलवति रहता है, वहां क्लेश और दूरियां खुद-ब-खुद दौड़ी चली आती हैं।

Thursday, November 13, 2025

खुद के कातिल

 सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के सार्थक अभिनय और अथाह परिश्रम से बनी, 2022 में रिलीज हुई फिल्म ‘झुंड’ का नाम कई देशवासियों ने नहीं सुना होगा। यह फिल्म स्लम सॉकर के संस्थापक विजय बारसे के जीवन पर आधारित है। इसमें अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे रिटायर्ड स्पोर्टस कोच की भूमिका अत्यंत प्रभावी ढंग से निभाई है, जो झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित करता है तथा उनमें खेल के प्रति उत्साह जगा कर बुराइयों से दूर रहने की सीख देता है। फिल्म ‘झुंड’ की अधिकांश शूटिंग भी महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में हुई थी। स्लम सॉकर एक गैर सरकारी संगठन है, जो गरीब असहाय बच्चों और युवाओं को कर्मठ और संस्कारवान बनाने के लिए वर्षों से कार्यरत है। यह संगठन खेल के साथ-साथ किताबी और व्यवहारिक ज्ञान और स्वास्थ्य से संबंधित कार्यशालाओं का आयोजन कर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने तथा सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए प्रेरित करता है। स्लम यानी झुग्गी बस्ती की असुविधाओं के बीच जीवनयापन कर रहे परिवारों के बच्चों को इधर-उधर के घातक भटकाव से बचाने और उनका भविष्य उज्ज्वल बनाने के स्लम सॉकर के नि:स्वार्थ प्रयास से प्रभावित होकर फिल्मी बादशाह अमिताभ बच्चन ने बहुत ही कम जाने पहचाने फिल्म निर्माता-निर्देशक नागराज मंजुले द्वारा निर्देशित फिल्म ‘झुंड’ में मुख्य भूमिका निभायी। बिल्कुल वैसे ही जैसे विजय बारसे ने बेरोजगारी और बदहाली में जीते मलीन बस्ती के बच्चों की फुटबॉल टीम बनाकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। 

इस नितांत सच्ची प्रेरक हकीकत पर आधारित फिल्म ‘झुंड’ में जान डालने के लिए फिल्म निर्माता नागराज मंजुले ने गगनचुंबी अट्टालिकाओं के पास और दूर बदबूदार कचरे के ढेर में सांस लेती झोपड़पट्टियों को नजदीक से देखने के लिए महीनों चक्कर काटे। इसी दौरान जब वे अपने गले में कैमरा लटकाये रेल की पटरियों के करीब से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे मालगाड़ी से कोयला चुरा रहे हैं। उन पर तुरंत अपना कैमरा केंद्रित कर वे धड़ाधड़ तस्वीरें लेने लगे। प्रियांशु नामक युवा भी इन कोयला चोरों में शामिल था। मंजुले ने उससे बातचीत की तो पता चला कि वह फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी है। फुटबॉल खेलने के लिए उसने अपनी टीम भी बना रखी है। उन्होंने प्रियांशु और उसके साथियों से ‘झुंड’ में काम करने की बात की तो वे फौरन राजी हो गए। इस अनूठी फिल्म में अधिकांश स्थानीय चेहरों के काम करने के कारण नागपुर ही नहीं संपूर्ण विदर्भ और महाराष्ट्र में उत्सुक्ता के साथ-साथ खुशी देखी गई थी। झुग्गी बस्ती के निवासियों के मन में यह आशा जागी थी कि उनके बच्चों के अब जरूर अच्छे दिन आएंगे। अमिताभ बच्चन जैसे विख्यात अभिनेता के साथ काम करने का उन्हे फायदा मिलेगा। मायानगरी मुंबई उन्हें हाथों-हाथ लेगी। 

विदर्भ और खासतौर नागपुर जिले में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें मुंबई जाकर संघर्ष करने के बाद ही कभी-कभार पहचान मिल पाती है। मुंबई की ‘फिल्म सिटी’ की तरह संतरानगरी में भी फिल्मों के निर्माण के लिए ‘फिल्मसिटी’ जैसा प्रोजेक्ट साकार करने की खबरें कलाकारों को गुदगुदाती रहती हैं। संपूर्ण विदर्भ की प्राकृतिक सुंदरता देश के बड़े-बड़े फिल्मी निर्माताओं को आकर्षित करती आयी है। कई फिल्मों की शूटिंग भी यहां हो चुकी है। नागराज मंजुले ने मलीन बस्ती के लड़कों से अभिनय करवाकर उन्हें यह अहसास तो करवा ही दिया कि उनके अंदर भी कलाकार छिपा है। वे यदि सतत अपने अभिनय को निखारें और संघर्ष करेें तो वे भी फिल्मों में काम कर अमिताभ बच्चन की तरह करोड़ों लोगों के चहेते बन सकते हैं। 

दशहरा-दीपावली से कुछ दिन पहले विभिन्न दैनिक अखबारों के प्रथम पेज पर छपी इस खबर ने सभी को हतप्रभ कर दिया, ‘‘झुंड’ के कलाकार प्रियांशु की नृशंस हत्या’ अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘झुंड’ में फुटबॉल खिलाड़ी का किरदार निभाकर लोकप्रियता और तारीफें बटोरने वाले कलाकार प्रियांशु को उसी के दोस्त ने घातक हथियार से मौत के घाट उतार दिया। प्रियांशु और ध्रुव गहरे दोस्त थे। दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना था। आधी-आधी रात तक दोनों आवारागर्दी करते देखे जाते थे। दोनों पर सेंधमारी, लूटमारी और चोरी-चकारी जैसे कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। रात को जब दोनों बैठकर शराब पी रहे थे तो उसी दौरान उनमें किसी बात को लेकर विवाद हो गया। दोनों ने एक दूसरे को देख लेने की धमकी दी। इसके बाद नशे में धुत धु्रव ने अपनी सुध-बुध खो चुके प्रियांशु के शरीर को चाकू से गोद डाला। इतना ही नहीं जिंदा होने के शक में उसने बड़ा-सा पत्थर उठाया और अपने दोस्त के सिर को बुरी तरह से कुचल कर घर जाकर आराम से सो गया।’’

मन में तरह-तरह के विचार लाने और चौकाने वाली यह खबर कई दिनों तक मेरा भी पीछा करती रही। रह-रहकर ‘झुंड’ में देखा प्रियांशु का चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा। जिसे अपनी किस्मत बदलने का अपार अवसर मिला था और भाग्य से मिले इस अवसर का फायदा उठाकर आगे बढ़ना था, ...और बार-बार पर्दे पर चमकना था, वह कुत्ते की मौत मारा गया! उसके मरने पर किसी ने कोई सहानुभूति और गम के दो शब्द तक नहीं कहे। सभी का बस यही कहना था कि गलत संगत और नशा करने वालों का अंतत: यही हश्र होता है। यह भी सच है कि प्रियांशु फुटबॉल का दिवाना था। उसने अपनी फुटबॉल की टीम भी बना रखी थी। उसकी टीम को ‘झुंड’ के लिए चुना गया था। खेल के प्रति उसके पागलपन को देखते हुए कई लोगों को उम्मीद थी कि वह अच्छा खिलाड़ी बनेगा, लेकिन अपने घर-परिवार तथा आसपास के लोगों की सोच के तराजू पर खरा उतरने की उसने कोशिश ही नहीं की। फिल्म में काम कर उसने जो प्रसिद्धि बटोरी, उसका भी ट्रेनों में यात्रियों के विभिन्न कीमती सामानों और धड़ाधड़ मोबाइलों की चोरी कर सत्यानाश कर दिया। किसी ने सच ही कहा है कि नशे और अय्याशी की लत इंसान की सबसे बड़ी शत्रु है। चरित्रहीनों को अंधा और बहरा बनने में देरी नहीं लगाती। तभी तो अपने ही पांव में कुल्हाड़ी मारते हुए वर्तमान और भविष्य का सदा-सदा के लिए कबाड़ा कर देते हैं। फिल्में देखने के कई शौकीनों ने अपनी एक गलती की वजह से तबाह हुए फिल्म अभिनेता शाइनी आहूजा का नाम कभी न कभी जरूर सुना होगा। सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता का फिल्मफेयर अवॉर्ड हासिल करने वाले इस एक्टर की धूम मचा देनेवाली फिल्म ‘गैंगस्टर’ भी देखी होगी। शाइनी आहूजा ने इस फिल्म के अलावा ‘वो लम्हे’, ‘भूल भुलैया’, ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ जैसी सफल फिल्मों में सशक्त अभिनय कर मायानगरी में बड़ी मेहनत से अपनी खास जगह बनाई थी। गोरे-चिट्टे हैंडसम, भूरी आंखों वाले शाइनी के निरंतर ऊंचाइयां छूते ग्राफ से अन्य अभिनेता घबराने लगे थे, लेकिन वह खुद को नियंत्रित नहीं रख पाया। साल 2011 में एक दिन की सुबह के सभी अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर बस एक ही खबर थी, ‘‘फिल्म अभिनेता शाइनी आहूजा ने अपने घर की नौकरानी से किया बलात्कार’’ मुंबई की फास्ट ट्रैक कोर्ट में इस शर्मनाक दुराचार के मामले की सुनवाई हुई। उसे दोषी ठहराते हुए सात साल की सजा सुना दी गई। अभिनेता बार-बार हाथ जोड़कर कहता रहा कि उसने बलात्कार नहीं किया। दोनों की सहमति से ही शारीरिक संबंध बने। वह बेकसूर है, लेकिन उसकी फरियाद किसी ने भी नहीं सुनी। किसी भी कलाकार से कलाप्रेमी यह अपेक्षा रखते हैं उसका चरित्र निष्कलंक हो। अपराध से दूर-दूर तक उसका कोई नाता न हो। प्रियांशु का तो अभी ठिठकता पहला कदम ही था। यहां तो वर्षों से जड़े जमाये विख्यात से विख्यात कलाकार भी सूखे पत्तों की तरह रौंद दिए जाते हैं। शाहनी को फिल्मों में काम मिलना भी बंद हो गया। चमकता-उभरता सितारा गुमनामी के अंधेरे में गुम हो गया। वह जहां भी जाता लोग दुत्कार और तिरस्कार भरी निगाह से देखते। आखिरकार वह देश से भाग खड़ा हुआ। सुनने में आया है कि अब वह दिन-रात पश्चाताप की आग में जलते हुए फिलीपींस में छोटी-मोटी गारमेंट की फैक्ट्री चलाते हुए बस जैसे-तैसे दिन काट रहा है...।

Thursday, November 6, 2025

मासूम पौधा...छायादार पेड़!

नवरात्रि का पर्व निकट था। शहर के कलाकार देवी की मूर्तियां बनाने में तल्लीन थे। अत्यंत परिश्रम और भक्तिभाव से मूर्तिकार को देवी मां की मूर्ति गढ़ते देख मेरा वहां कुछ पल ठहरने को मन हो आया। इस कुशल और अनुभवी मूर्तिकार का शहर ही नहीं प्रदेश में भी बड़ा नाम है। अपनी कला में बेजोड़ मूर्तिकार का मानना है कि उसके लिए सबसे पवित्र-अनमोल और सुखद पल वो होते हैं, जब वह मां दुर्गा की आंखों में रंग भरता है। रात-दिन के अथक परिश्रम से बनायी और सजायी गई मिट्टी की प्रतिमाएं नास्तिकों में भी श्रद्धा और आस्था के भाव जगा देती हैं। बच्चे, किशोर, युवा और बुजुर्ग नवरात्रि के जगमगाते पंडालों की ओर बरबस खिंचे चले आते हैं और नतमस्तक हो जाते हैं। मूर्ति कला के प्रति जी-जान से समर्पित सिद्धहस्त कलाकार का बस चले तो वह मिट्टी में ही सांस फूंक दे, जान डाल दे, बिल्कुल वैसे ही जैसे ममत्व से परिपूर्ण कई माताएं विपरीत हालातों में भी अपनी संतानों के जीवन को खुशनुमा बनाने और उन्हें शीर्ष तक पहुंचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करते हुए खुद जीना भूल जाती हैं। इसके साथ ही यह संदेश भी देती चली जाती हैं, जिद ही इंसान की जीत का महामंत्र है। दिल्ली के रानीखेड़ा में जन्मी आयुषी वसंत विहार की एसडीएम यानी सब डिविजनल मजिस्ट्रेट हैं। प्रशासन, कानून व्यवस्था और राजस्व में संबंधित दायित्वों को अच्छी तरह से संभाल रही हैं। सभी लोग उनकी कार्यशैली से अति संतुष्ट और प्रभावित हैं। गौरतलब है कि आईएएस अधिकारी भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। देश और समाज में उनकी उल्लेखनीय भूमिका होती है। कहने को तो देश में असंख्य आईएएस अधिकारी हैं, लेकिन यहां कलमकार आयुषी की कहानी इसलिए पेश कर रहा है, क्योंकि वह देख नहीं सकती। जब वह मात्र एक साल की थी, तब उसके माता-पिता को पता चला था कि उनकी मासूम लाडली बिटिया पूरी तरह से दृष्टिहीन यानी अंधी है। उसके लिए सूरज की रोशनी और अंधेरा एक समान है। लाल, हरे, नीले, काले, पीले, सफेद, जामुनी, कत्थे आदि सभी रंगों के उसके लिए एक से मायने हैं। दिल को आहत करने वाले इस कटु सच को जान-समझकर पहले तो माता-पिता काफी देर तक चुपचाप एक दूसरे को अश्रुपूरित आंखों से देखते रहे। दोनों को निराशा की आंधी ने बहुत चिंतित और परेशान किया। तरह-तरह के विचार मन-मस्तिष्क में आते-जाते रहे। ऐसे में हमारी इकलौती बिटिया के भविष्य का क्या होगा? बेटे तो जैसे-तैसे अंधेरे से लड़ लेते हैं, लेकिन बेटी की जीवन नैया कैसे पार होगी? 

आयुषी की मां आशारानी सीनियर नर्सिंग ऑफिसर थीं। उन्होंने सुख-दु:ख के हर चेहरे को करीब से देखा था। कई किताबें पढ़ी थीं। साधु-संतों के प्रवचन सुने थे। उन्होंने किसी तरह से खुद को संभाला। पति को भी इस विपरीत परिस्थिति का हिम्मत के साथ सामना करने के लिए प्रेरित किया। रिश्तेदारों तथा आसपास के लोगों की तरह-तरह की भयावह शंकाओं से परिपूर्ण बोलती को बंद करने के लिए डंके की चोट पर कहा कि हमारी बिटिया की आंखों में रोशनी नहीं है तो क्या हुआ? हम उसे ज्ञान का ऐसा उजाला देंगे कि सभी देखते रह जाएंगे। ममतामयी मां ने बेटी की भविष्य की राह में उजाला ही उजाला लाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए अच्छे से अच्छे स्कूल, कॉलेज से शिक्षित-दीक्षित किया कि लोग वाकई देखते ही रह गए। आयुषी ने भी मेहनत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अटूट लगन, अथाह जुनून की बदौलत उसने 2021 में यूपीएससी में ऑल इंडिया में 48 रैंक हासिल कर दिखा दिया कि पौधे को यदि जागरूक माली, बेहतर खाद पानी, हवा मिले तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत उसे मजबूत छायादार पेड़ बनने से नहीं रोक सकती। आईएएस बनने से पहले आयुषी ने दस साल तक प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका के तौर पर काम किया। उसी दौरान ठान लिया कि चाहे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े, लेकिन आईएएस बनकर दिखाना है। आयुषी के सपने को साकार करने वाली मां वर्षों तक बड़ी मुश्किल से आधी-अधूरी नींद ले पाईं। आयुषी बताती हैं कि मां पहले तो बोल-बोल कर, फिर रिकॉर्डर के जरिए यूपीएससी के कोर्स सुनाती थीं। वर्ष 2016, 17, 18 तक इन तीनों साल प्रिलिम्स निकाला, लेकिन मैंस क्लियर नहीं कर पा रही थी। लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी। हर कमी या गलती से सबक लिया। उस मिस्टेक को रिपीट नहीं होने दिया। किताबे डाउनलोड कीं। यूट्यूब पर वीडियो सुने। कुछ इस तरह यूपीएससी की तैयारी की। अपनी दिव्यांगता के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया। 2021 में यूपीएससी रिजल्ट में ऑल इंडिया रैंक 48 थी। 2022 में यूपीएससी ट्रेनिंग करने के बाद एजीएमयूटी कैडर के तहत पहली पोस्टिंग बतौर ट्रेनी गोवा में असिस्टेंट कलेक्टर हुईं।

आयुषी की मां की हार्दिक ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी देश-दुनिया के विख्यात शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में प्रतिभागी बने। साहसी और जुनूनी बेटी ने मां के इस सपने को भी पूरा कर दिखाया है। आयुषी कवयित्री भी हैं। अपने अनुभवों और अहसासों को शब्दों में पिरोना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। वह अभी तक 50 से अधिक कविताएं लिख चुकी हैं। अनेकों किताबें पढ़ चुकी इस अनूठी, प्रेरक प्रशासनिक अधिकारी को मूवी भी साउंड सुनकर विजुलाइज करके देखना बहुत सुकून देता है। 

यदि नारी ठान ले तो उसके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं है। परिवार की रोजी-रोटी की गाड़ी चलाने के लिए हमारे इर्द-गिर्द कई महिलाएं पुरुषों की तरह खून-पसीना बहाती देखी जा सकती हैं। उन्हीं में शामिल हैं लक्ष्मी अगदारी, जो कोयला खदान में बड़ी सावधानी से जमीन से सौ मीटर नीचे जाकर बारूद लगाती हैं। यहीं से कोयला मिलता है। यहां पहुंचने और विस्फोटक लगाने में तीन घंटे से ज्यादा लगते हैं। विस्फोट के बाद कोयला टूटता है और उसे निकालने का काम शुरू होता है, खदान में हर पल घना अंधेरा छाया रहता है। दम घोटू घने अंधकार में एक बारगी पुरुष भी घबरा जाते हैं। पहले लक्ष्मी के पति कोयला खदान में काम करते थे। अचानक उनके चल बसने के बाद लक्ष्मी ने सफाईकर्मी या चपरासी का आसान काम करने की बजाय कोयला खदानों में विस्फोटक लगाने (ओपन माइन ब्लास्टिंग) के जोखिम वाले काम को चुना। उन्हें कुछ पुरुषों ने चेताया और समझाया भी कि महिलाओं के लिए यह काम कतई आसान नहीं, लेकिन लक्ष्मी ने इस खतरनाक कार्य को इसलिए प्राथमिकता दी कि दूसरी औरतें भी कोयला खदानों में काम करने के लिए आगे आएं। इसे करने में उन्हें किंचित भी भय न लगे। 

पुलिस वालों के प्रति अधिकांश लोग अच्छी राय नहीं रखते। उनकी परछाई से भी दूर रहने में भलाई समझते हैं। यह भी सच है क कुछ खाकी वर्दीधारियों ने पुलिस महकमे की आन-बान और शान को निरंतर बचाये और बनाए रखा है। यह बहुत अच्छी बात है कि अब महिलाएं भी पुलिस विभाग में बड़े दमखम के साथ अपनी चमक बिखेरते हुए, ईमानदारी, दृढ़ता और संवदेनशीलता के साथ अपने कर्तव्य को निभा रही हैं और खाकी वर्दी की गरिमा बढ़ा रही हैं। उन्हीं में से एक नाम है दिल्ली पुलिस की कांस्टेबल सोनिका यादव का, जिन्होंने अपने दृढ़ आत्मबल का सार्थक प्रदर्शन कर उन लोगों को अपना मुंह बंद रखने को विवश कर दिया, जो नारी को अभी भी कमजोर मानते हैं। खेलकूद में हमेशा आगे रहीं सोनिका को उसके माता-पिता ने बचपन में ही हर चुनौती का भयमुक्त होकर सामना करने का पाठ पढ़ा दिया था। बेटी ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। नारी के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों और सदियों से चली आ रही परंपराओं और धारणाओं को तोड़ते हुए नारी के भीतर छिपी ताकत का प्रतिनिधित्व करती सोनिका ने गर्भवती होने के बावजूद वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में भाग लेकर न केवल पदक जीता, बल्कि यह संदेश भी दिया कि गर्भवती महिलाएं सिर्फ विश्राम और देखभाल के लिए नहीं होती हैं। सोनिका जब मां बनने वाली थीं, तभी उनसे कुछ लोगों ने बड़ी गंभीरता और सहानुभूति से कहा कि अब खेल से दूरी बना लो। घर में पूरी तरह से आराम करो, लेकिन सोनिका ने डॉक्टरों की निगरानी में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए प्रशिक्षण जारी रखा। बहादुर सोनिका ने दूसरे देश की महिलाओं के बारे में खूब पढ़ा, जाना और ठाना था कि वे प्रेग्नेंसी के दौरान भी अपनी विभिन्न गतिविधियों को सतत जारी रखती हैं। यहां तक कि कड़ी से कड़ी कसरत और खेलने-कूदने से भी नहीं घबरातीं। यदि वे ऐसा कर सकती हैं तो वह क्यों नहीं? भारतीय नारियां न तो विदेशी नारियों से कहीं कम हैं और न ही कमजोर। प्रतियोगिता के दिन गर्भवती सोनिका को मंच पर उतरते देख लोग स्तब्ध रह गए थे। कहीं कोई चिंता और भय नहीं। सिर्फ और सिर्फ आत्मविश्वास से उनका चेहरा दमक रहा था। जैसे ही 145 किलोग्राम के वजन को बड़ी आसानी से उठाया तो पूरा हॉल प्रशंसा, शाबाशी और आदर से परिपूर्ण तालियों से गूंज उठा...।

Saturday, November 1, 2025

उत्सव की महक

रोशनी के महाउत्सव दीपावली का हम सभी को हमेशा इंतजार रहता है। वैसे भी हम भारतीय जगजाहिर उत्सव प्रेमी हैं। कोई भी त्योहार ऐसा नहीं है जिससे कोई न कोई उद्देश्य न जुड़ा हो। हमारे बुजुर्गों ने त्योहारों की परिपाटी की नींव यूं ही नहीं रखी। दीपोत्सव उमंग-तरंग, ऊर्जा के साथ-साथ नई सोच की प्रेरक धारा की जगमगाहट का जन्मदाता है। दरअसल स्वयं को जानने-पहचानने और खोजने का नाम ही दीपावली है। अधिकांश लोग इस पुरातन उत्सव को रस्में अदायगी की तरह मनाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इस सुअवसर पर प्रकाश, सेवा और सहयोग का दीपक प्रज्वलित कर महाउत्सव को सार्थकता का जामा पहनाते हैं। वर्ष 2025 की दीपावली को ऐसे ही अनूठे भारतीयों ने और...और प्रेरणास्पद और यादगार बना दिया। महाराष्ट्र के अमरावती में इस वर्ष भी ‘वंदे मातरम’ समूह से जुड़े वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा विभिन्न कारोबारियों ने मेलघाट के दो गांवों के हर घर में जाकर नये कपड़े, किताबें, साइकल और मिठाइयां वितरित कीं। लगभग 800 लोगों का यह समूह सोलह साल से हर दिवाली पर किसी ने किसी गांव का सर्वे करता है और असहायों तथा जरूरतमंदों के जीवन में मिठास घोलता है। बीमारों की दवाएं देने के साथ-साथ उनका इलाज भी किया जाता है। अब तक इन्होंने 27 लोगों की सर्जरी अपने खर्चे से कराकर उन्हें नयी जिन्दगी दी है। जिन किसानों ने आत्महत्या कर ली है उनके परिवारों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी इनके द्वारा उठाया जाता है। यह भी गौरतलब है कि ऐसे परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उद्योग लगाने की तैयारी भी की जा रही है। 

इस बार की दिवाली के मौके पर बेंगलुरू शहर में सैकड़ों परोपकारी लोगों ने ऐसे बीमारों के साथ दिवाली मनाई, जो कैंसर के अंतिम पड़ाव पर हैं। अभावों से जूझते दुखियारों की देखरेख और सेवा के लिए वालेंटियर बन करीब 200 युवाओं ने अनाथ बच्चों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर, एसिड अटैक सवाईवर तथा दृष्टिबाधितों के साथ रंगारंग दिवाली मनाते हुए उसे नीरस जीवन में आत्मविश्वास के साथ-साथ अपार खुशियां भर दीं। अनाथ बच्चों ने स्टेज पर अपने भीतर छिपी कलाओं का खुलकर प्रदर्शन कर तालियां पायीं। वृद्धाश्रमों तथा गरीब बच्चों के बीच जाकर दीये जलाने वाले युवाओं की इस पहल का हर किसी ने वंदन...अभिनंदन किया।

मुंबई से लगे वसई में एक शख्स ने अपने जवान बेटे की आसामायिक मौत के बाद जो साहसी फैसला लिया उसकी तारीफ करने के लिए कलमकार के पास शब्द नहीं हैं। अपने माता-पिता की 24 वर्षीय इकलौती संतान सत्यम दिवाली के अवसर पर वापी में हुई भीषण सड़क दुर्घटना में इस कदर बुरी तरह से घायल हुआ कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने अंतत: उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। फिर भी सत्यम के माता-पिता की आस की डोर नहीं टूटी। उन्होंने तुरंत अपने लाडले बेटे को निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया, लेकिन वहां पर कोई सुधार नहीं हुआ। आखिरकार उन्होंने अपने लाडले को दूसरों में देखने और बनाए रखने के लिए उसके अंगों को दान करने का हिम्मती फैसला लेते हुए उसे साकार भी कर दिया। सत्यम की किडनी, लिवर, टिश्यू और कार्निया के महादान से जिन्दगी और मौत से लड़ रहे कई अनजान लोगों को नया जीवन मिला है। उनके लिए सत्यम के माता-पिता पूज्य देवता से कम नहीं। यहां यह भी काबिलेगौर है कि दिवाली के त्योहार के कारण मुंबई में भीड़ भड़ाका होने की वजह से हर जगह ट्रैफिक जाम था। ऐसे में मुंबई ट्रैफिक पुलिस ने भी अपनी मुस्तैदी, इंसानियत और लाजवाब समन्यवय की आदर्श मिसाल पेश करते हुए घंटों की दूरी मिनटोंं में पूर्ण करते हुए लाइव लिवर को उस अस्पताल तक पहुंचाया जहां जरूरतमंद इंतजार कर रहे थे। इस पूरी फुर्तीली कवायद के दौरान एक पुलिस पायलट वाहन रास्ते को पूरी तरह से साफ रखने के लिए एंबुलेंस के आगे चल रहा था। 

बिहार के शहर गयाजी की स्कूल शिक्षक रीता रानी महज तीन फीट की हैं। रीता का कद भले ही छोटा है, लेकिन सोच बहुत ऊंची है। छात्र-छात्राओं को अपनी शैली में शिक्षित करती रीता छात्रों की अत्यंत प्रिय हैं। लोगों की सेवा में सदैव तत्पर रहने का गुण उन्हें ‘बिहार गौरव अवार्ड’ दिलवा चुका है। पितृपक्ष मेले के दौरान दिव्यांगों तथा वृद्धों के लिए व्हीलचेयर की अपने पैसों से व्यवस्था करने वाली रीता की मुस्कुराहट दिवाली के दीप की तरह हरदम जगमगाती रहती है। तमिलनाडु के मदुरे में रहते हैं, डॉक्टर, स्वामीनाथन चंद्रमौली। उनकी वैन में ऑक्सीजन, अल्ट्रासाउंड, ईसीजी जैसी तमाम सुविधाएं हैं। परोपकारी चंद्रमौली रोज सुबह अपनी वैन में बैठकर बुजुर्ग मरीजों के इलाज के लिए घर से निकल जाते हैं। बिना किसी प्रचार और शोर-शराबे के पच्चीस हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुके ये अनूठे डॉक्टर साहब गरीबों, असहायों तथा जरूरतमंदों से फीस नहीं लेते। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के चिंचणी गांव में चाहे दिवाली हो या किसी का जन्मदिन और शादी-ब्याह, लेकिन पटाखे बिलकुल नहीं फोड़े जाते। लगभग दस वर्ष पूर्व इस गांव में पटाखों के धमाकों की तीव्र आवाजों से एक कुत्ता इस कदर भयभीत हो गया था कि वह गांव से भागकर जंगल में चला गया और गड्ढा खोदकर वहां हमेशा के लिए सो गया। इस हैरतअंगेज घटना के बाद सजग ग्राम वासियों ने आपस में मिल-बैठकर सोचा-विचारा कि पटाखों की आवाज से गांव के बुजुर्गों तथा रोगियों को बहुत अशांति का सामना करना पड़ता है तथा गाय-भैंस भी भय तथा सदमे का शिकार होे जाती हैं। इस वजह से दूध भी कम देती हैं। ऐसा विस्फोटक जश्न भी किस काम काम का जो किसी के लिए परेशानी का कारण बने। उसके बाद गांव में पटाखे फोड़ने पर जो विराम लगा वो अभी तक कायम है। दिवाली की छुट्टियों में गांव के बच्चे भी पटाखे जलाने की नहीं सोचते। वे खुशी-खुशी मिल-जुलकर किले बनाते हैं और कठपुतली का मनोरंजक खेल खेलते हैं।

छत्तीसगढ़ के अत्यंत मेल-मिलाप वाले सांस्कृतिक शहर बिलासपुर में दिवाली की रात जब 9 साल की काव्या का परिवार पूजा की तैयारी कर रहा था। तभी मासूम काव्या पटाखे जलाने के लिए दौड़ी तो एकाएक वहीं पर रखी घंटी पर मुंह के बल गिर पड़ी। घंटी का ऊपरी नुकीला सिरा जो कि लगभग चार-पांच सेंटीमीटर लंबा था, उसकी आंख से होते हुए दिमाग में धंस गया। डॉक्टरों की सलाह पर काव्या को इलाज के लिए रायपुर ले जाया गया। दिवाली होने के कारण अस्पताल के अधिकांश डॉक्टर छुट्टी पर थे। फिर भी जैसे ही डॉक्टरों को खबर लगी तो वे दौड़े-दौड़े चले आए। लगभग चार घंटों तक डॉक्टरों की सजग कुशल टीम ने सघन सर्जरी कर बच्ची की आंख की रोशनी लौटाने का चमत्कार कर दिखाया और उसके बाद ही अपने-अपने घर जाकर उन्होंने दीप जलाकर खुशी-खुशी दीपावली मनायी।

Thursday, September 25, 2025

Thursday, September 18, 2025

चलती-फिरती किताबें

कुछ लोग ऐसे होते है जिनका जीवन किसी ऐसी किताब से कम नहीं होता जिसे पढ़ने का हर किसी का मन होता है। 

‘‘मेरा जन्म 1991 में आंध्रप्रदेश के सीतारामपुरम गांव में हुआ। माता-पिता को तब आघात लगा, जब उन्हें पता चला कि उनका बच्चा तो अंधा है। रिश्तेदारों, अड़ोसी, पड़ोसियों ने भी उन्हें घोर बदकिस्मत करार दे डाला। सभी ने उन्हें सलाह दी कि ऐसे बच्चे का होना न होना एक बराबर है। वैसे भी लड़के तो मां-बाप की सेवा और उनका नाम रोशन करने के लिए जन्मते हैं। मां-बाप के सपने अपनी अच्छी औलाद की बदौलत ही साकार होते हैं। यह अंधा तो उनके लिए फंदा है। ऐसे फंदों से मुक्ति पाना ही अक्लमंदी है। जैसे दूसरे समझदार मां-बाप करते हैं, तुम भी इसका गला घोंट दो। चुपचाप कहीं दफना दो। यह नहीं कर सकते तो अनाथालय में ले जाकर छोड़ दो। वही इसे खिलाएंगे, पिलायेंगे और जो उनकी मर्जी होगी, करेंगे। अनाथालय की शरण में पल-बढ़कर भीख मांगना तो सीख ही लेगा। तुम लोगों का तो इसे पालते-पालते ही दम निकल जायेगा। घर के बर्तन तक बिक जायेंगे और हाथ में कटोरा पकड़कर भीख मांगने की नौबत आ जाएगी।’’

कई दिन तक तो मां हर किसी के सुझावों को मजबूरन सुनती रहीं। लेकिन जब उनके चुभने वाले बोल वचनों की अति हो गई वह उन पर बिफर पड़ीं। उन्हें आसपास फटकने तक से मना कर दिया। मां के अंतिम फैसले के तौर पर कहे गये इन शब्दों ने तो सभी की जुबानें बंद कर दीं, ‘‘तुम लोग कान खोलकर सुन लो, जब तक मैं जिन्दा हूं, अपने बच्चे पर आंच नहीं आने दूंगी। खुद को बेचकर भी इसकी इतनी अच्छी तरह से परवरिश करूंगी कि दुनिया भी हतप्रभ देखती रह जाएगी। मैं चार साल का हुआ तो मां ने गांव के स्कूल में दाखिला करवा तो दिया, लेकिन घर से अकेले बाहर निकलना मेरे लिए आसान नहीं था। कभी पिता स्कूल छोड़ने जाते तो कभी मां छोड़ आतीं और लेने भी पहुंच जातीं। स्कूल में मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चे मुझ से दूरी बनाये रखते। जब मैं तीसरी कक्षा में पहुंचा तो प्रिंसिपल ने मेरे लिए फरमान जारी कर दिया कि हमें ऐसे बच्चे की जरूरत नहीं, जिसके लिए हमें जरूरत से ज्यादा दिमाग खपाना और अपना कीमती समय बरबाद करना पड़े। मां के जुनून ने मुझे हैदराबाद के ब्लाइंड स्कूल में पहुंचा दिया, लेकिन वहां भी मुझे कुछ भी सुझायी नहीं देता था। चौबीस घंटे बस घबराया-घबराया रहता। एक रात मैंने स्कूल से भागने की कोशिश की तो वार्डन की मुझ पर निगाह पड़ गई। उन्होंने मेरे इरादे को भांप लिया था। गुस्से में उन्होंने मुझे अपने पास खींचा और पांच-सात तमाचे जड़ते हुए कहा कि कहां-कहां भागोगे? ऐसे भागने से तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। अपना नहीं तो उस मां का ख्याल करो, जिसने कई सपने पाल रखे हैं। ईश्वर ने तुम्हें किसी चमत्कार के लिए इस धरती पर भेजा है। डरो नहीं, बस लड़ो...लड़ते ही रहो। वार्डन के चांटों और शब्दों का ही असर था कि उस दिन मुझे लगा कि मैं तो देख सकता हूं। मुझे हर चुनौती का डटकर सामना करते हुए खुशी-खुशी जीना है। मेरे अंदर साहस की रोशनी की तरंगें दौड़ने लगीं। मैं दसवीं तक टॉपर रहा, लेकिन मेरे मनोबल को तोड़ने वाली ताकतें तब भी मेरे पीछे पड़ी रहीं। 

दसवीं के बाद आईआईटी की कोचिंग के लिए एक कोचिंग सेंटर गया तो वहां के संचालक ने तीखे थप्पड़-सा शब्द-बाण मारा कि तुम जैसे पौधे कभी पेड़ नहीं बन सकते, क्योंकि उनमें तेज बारिश और आंधियों को सहने की ताकत नहीं होती। हमेशा-हमेशा के लिए फौरन धराशायी हो जाते हैं और साथियों के तेजी से दौड़ते कदमों से रौंद दिये जाते हैं। साइंस में एडमिशन पाने के लिए अंतत: मुझे कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। मां के हाथ और साथ के दम पर वो लड़ाई भी मैंने डट कर लड़ी और जीत हासिल की। आंध्रप्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड में साइंस लेकर 92 प्रतिशत नंबर के साथ पास होने वाला मैं पहला नेत्रहीन छात्र बना। उसके बाद तो बड़ी आसानी से अमेरिका के एमआईटी में प्रवेश मिल गया और यहां भी तब तक किसी दृष्टिहीन छात्र को प्रवेश नहीं मिला था। अमेरिका से पढ़ाई कर लौटा तो तकदीर मेरे स्वागत के लिए सभी दरवाजे खोले खड़ी थी। मैं हौसले से लबालब था। मां खुशी से फूली नहीं समा रही थी। मैंने अपने दम पर हैदराबाद में कंज्यूमर फूड पैकेजिंग कंपनी शुरू की। 

23 की उम्र में बोलैंट कंपनी का सीईओ बना। आज जब छत्तीस साल का होने जा रहा हूं। मेरी कंपनी 600 करोड़ के आंकड़े को छू चुकी है, जहां चार सौ कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें 70 प्रतिशत दिव्यांग हैं। जिन्दगी ने मुझे एक ही पाठ पढ़ाया है कि ऊपर वाला भी तभी साथ देता है, जब हम हिम्मत और योजना के साथ चलते रहते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किल भरी राहें हों, जुनूनी संघर्ष की बदौलत अंतत: आसान हो ही जाती हैं और मंजिल खुद-ब-खुद गले लगाती है। अब मेरे कदम सतत ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वक्त में मेरी तिजोरी में हो सकता है पांच-दस हजार करोड़ रुपये हों, लेकिन वो धन मेरी मां और उनकी कुर्बानी से बढ़कर तो नहीं हो सकता। मेरी सबसे बड़ी दौलत तो मेरी मां हैं, जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया है।’’ यह आत्मकथन है श्रीकांत बोला का जो जन्म से दृष्टि बाधित हैं। अपनी हिम्मत के दम पर सफलताओं का परचम लहराते हुए लोगों को अचंभित करते रहे हैं। वर्तमान में देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों में शुमार श्रीकांत बोला की संघर्ष भरी यात्रा पर एक चर्चित फिल्म भी बन चुकी है। ‘श्रीकांत’ नाम की 2024 में रिलीज हुई इस फिल्म ने करोड़ों दर्शकों को प्रभावित किया है। 

एक सवाल कि एक रुपये में क्या होता है, क्या मिलता है? हलकी सी चाकलेट और संतरे के स्वाद वाली गोली जरूर मिल जाती है, जिसे आज के बच्चे भी पसंद नहीं करते। भिखारी भी एक रुपये के सिक्के को लेने से कतराते हैं। कागज़ के नोट तो वैसे भी आजकल कम नज़र आते हैं, जो हैं भी, वो शादी, ब्याह या किसी अन्य शुभ कार्य में दस को ग्यारह, सौ को एक सौ एक और पांच सौ को पांच सौ एक के शुभ आंकड़े बनाने... दर्शाने के काम आते हैं। महंगाई भी कितनी बढ़ा दी गई है। कुछ भी सस्ता नहीं मिलता। अनाज, दूध, सब्जियां, दवाएं सब महंगी होती चली जा रही हैं। पीने के पानी तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। गरीब आदमी यदि किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाए तो उसका बचना मुश्किल है। डॉक्टरी के पेशे की इंसानियत भी जाती रही है, लेकिन फिर भी सच्चे इंसानों के अंदर का इंसान जिन्दा है इसे साबित कर दिखाया है ओडिशा के संबलपुर जिले के युवा डॉक्टर शंकर रामचंदानी ने। उन्होंने गरीबों और वंचितों के इलाज के लिए ‘एक रुपया’ क्लिनिक खोला है। किराये के मकान में खोले गये इस अस्पताल में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। गरीबों से एक रुपया फीस भी इसलिए लेते हैं, ताकि उन्हें यह न लगे कि वे मुफ्त में इलाज करा रहे हैं। वे लंबे समय से चाह रहे थे कि ऐसे चिकित्सालय की स्थापना करें, जहां गरीब और बेसहारा लोग आसानी से पहुंचकर मुफ्त में इलाज करवा सकें। उनका मानना है बड़े-बड़े अस्पतालों में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है, इसलिए वहां पर इलाज भी महंगा हो जाता है। इसलिए उन्होंने आलीशान अस्पताल खोलने की बजाय साधारण अस्पताल खोला है, जहां पर उनकी कोशिश है कि जिनकी जेबें खाली हैं वे भी गर्व के साथ बीमारी से छुटकारा पा सकें। चालीस वर्षीय डॉक्टर की पत्नी भी डॉक्टर हैं। दोनों विभिन्न अस्पतालों में कई वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। दोनों अधिकांश डॉक्टरों की धनलोलुपता से वाकिफ है।

महाराष्ट्र के प्रगतिशील नगर पुणे में एक डॉक्टर हैं जिन्होंने बेटियों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। गणेश राख है इनका नाम। तेरह साल में 2500 बेटियों की नि:शुल्क डिलीवरी कराने का कीर्तिमान रच चुके डॉ.गणेश बताते हैं कि 29 दिसंबर 2011 को उनके अस्पताल में एक गरीब दिहाड़ी श्रमिक अपनी पत्नी की डिलीवरी के लिये आया था। उसने बड़े दुखी और बुझे स्वर में बताया था कि उसे पहले दो बेटियां हैं, दोनों ही सीजेरियन से हुई हैं लेकिन अब वह खर्च वहन नहीं कर सकेगा। लेकिन अगर लड़का हुआ तो वह अपना घर गिरवी रखकर भी अस्पताल का खुशी-खुशी बिल चुकाएगा। मुझे यह बात बहुत खटक गई। मैंने उससे कहा कि यदि तुम्हारे यहां बेटी पैदा हुई तो मैं फीस नहीं लूंगा। संयोग से इस बार भी उसके यहां बेटी जन्मी तो वह बहुत निराश हो गया। फिर भी उसने पूछा कि आपकी फीस कितनी हुई? जब मैंने कहा शून्य तो उसकी आंखें भीग गईं। उसके चेहरे पर उभरे राहत के भाव को देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसी पल से मैंने ठान लिया कि मेरे अस्पताल में जब भी लड़की पैदा होगी तो परिजनों से कोई फीस नहीं ली जाएगी। यह भी निर्णय किया गया कि जैसे लड़के के जन्मने पर उनके परिजन जश्न मनाते हैं, स्वागत करते हैं, वैसे ही हम लड़की के आगमन पर केक और मिठाइयां बांटकर जश्न मनाएंगे। डॉ.गणेश राख की इस पहल की सभी तारीफ कर रहे हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी जमकर उनकी सराहना की है। डॉक्टर साहब का सपना है, शीघ्र ही सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल खोलें जहां पर महिलाओं की सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त में कर सकें।

Thursday, September 11, 2025

रेत की सत्ता

राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच मनमुटाव और टकराव कोई नई बात नहीं है। दोनों अपने-अपने अहंकार और जिद के गुलाम हैं। उन्हें करनी तो जनसेवा चाहिए, लेकिन वे जनता को जीरो और खुद को हीरो समझते हैं। किसी को कुछ भी न समझने की तांडवी मनोवृत्ति के शिकार कुछ मंत्री, विधायक तो अक्सर अपने कपड़े उतारकर बेशर्मी की सुर्खियां बटोरते दिख जाते हैं। मध्यप्रदेश के भिंड जिले में विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह और कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव कुत्ते बिल्ली की तरह आपस में भिड़ गए। कलेक्टर ने विधायक की ओर उंगली उठाई तो विधायक ने उनके मुंह की रंगत बिगाड़ने के इरादे से मुक्का तान लिया। विधायक और कलेक्टर को तीखे आवेश में तू...तू, मैं...मैं करते देख वहां पर उपस्थित लोग आनंदित होते रहे और लड़ाई के और उग्र रूप धारण करने की बेसब्री से राह देखते रहे। गुस्सैल विधायक कुशवाह वर्ष 2012 में तत्कालीन एसपी जयनंदन को थप्पड़ जड़ने के आरोप के भी दागी हैं। उन्हें खामोश रहकर आज्ञा पालन करने वाले अधिकारी सुहाते हैं। जो प्रशासनिक अधिकारी सिर उठा कर बात करता है उसका तो बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन इस बार  अपनी टक्कर के नौकरशाह से उनका पाला पड़ गया। कलेक्टर श्रीवास्तव को विधायक का तल्ख लहजे में बात करना बर्दाश्त नहीं हुआ तो उन्होंने उनकी विधायकी का लिहाज न करते हुए भड़कते हुए आक्रामक शब्दों की गोली दागी, ‘‘औकात में रहकर बात करो।’’ ऐसे में विधायक को तैश में आना ही था, उन्होंने चीखते हुए कहा, ‘‘औकात किसे बता रहे हो, तू हमें नहीं जानता?’’, ‘‘अच्छी तरह से जानता हूं। बहुत हो चुका। अब मैं तेरी रेत चोरी बिलकुल नहीं चलने दूंगा।’’ विधायक का प्रतिउत्तर आया, ‘‘सबसे बड़ा चोर तो तू हैं...’’ 

किसानों की खेती-बाड़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण जरूरत खाद से शुरू हुई जंग उस रेत तक आ पहुंची जिसकी वजह से बार-बार देश के लगभग सभी प्रदेशों में धमाके होते रहते हैं। कोई भी प्रदेश हो, रेत की लूट हर कहीं छायी रहती है। यही रेत ही है जो कई मंत्रियों, विधायकों तथा उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं की अंधाधुंध काली कमायी का आसान जरिया है, तो वहीं तहसीलदार, कलेक्टर और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की जेब भरायी का सहज सुलभ साधन है। यह लिखना सरासर गलत होगा कि अपने देश में सिर्फ भ्रष्टों का ही जमावड़ा है। बेइमानों की अपार भीड़ में कुछ ईमानदार भी हैं, जिनकी चोर-लुटेरों से अक्सर मुठभेड़ होती रहती है। एक पुख्ता निष्कर्ष यह भी है कि, अधिकांश सत्ताधीशों को ईमानदार अधिकारी शूल की तरह चुभते हैं। उत्तरप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी रही हैं दुर्गा नागपाल। इस कर्तव्य परायण अधिकारी ने कई बार भूमाफियाओं, खनिज माफियाओं और स्मगलरों को दबोच कर उन्हें जेल पहुंचाया। इसी पकड़ा-धकड़ी में प्रदेश के एक बलवान मंत्री के करीबी रिश्तेदार और कार्यकर्ता भी नहीं बच पाए। ऐसे में एक दिन मंत्री ने अधिकारी दुर्गा नागपाल को तुरंत अपनी कोठी में हाजिर होने का फरमान सुनाया। दुर्गा को लगा था कि तारीफ करते हुए उनकी पीठ थपथपायी जाएगी, लेकिन बौखलाये मंत्री उन्हें देखते ही धमकाते हुए गरजे कि तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम हमारे लोगों को रेत चोरी करने से रोको। तुम्हारी इस हिटलरशाही से तो हमारा चुनाव जीतना भी मुश्किल हो जाएगा। अपने इन्हीं खास कार्यकर्ताओं तथा शुभचिंतकों की भाग-दौड़ की बदौलत ही तो हम हर चुनाव में विजय की पताका लहराते चले आ रहे हैं। उसूलों की पक्की दुर्गा नागपाल ने जब मंत्री के आदेश को मानने से इंकार कर दिया तो उन्हें तुरंत निलंबित कर दिया गया। 

इसी तरह से हरियाणा में अनिल विज नाम के भाजपा के पुराने नेता हैं। मंत्री बने बिना उन्हें चैन नहीं आता। मुख्यमंत्री बनने के लिए हाथ-पैर पटकते रहते हैं, लेकिन अभी तक दाल नहीं गली। उन्हें भी अपने प्रदेश की आईपीएस अफसर संगीता वालिया का कर्तव्यपरायण होना कभी रास नहीं आया। अनिल विज तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने जिला शिकायत एवं लोक मामलों की समिति की बैठक बुलायी थी। उसी दौरान इस मंत्री ने एक एनजीओ की शिकायत का हवाला देते हुए एसपी संगीता पर शराब बिकवाने का संगीन आरोप जड़ दिया। ईमानदार अधिकारी संगीता के लिए यह आरोप किसी तमाचे से कम नहीं था। मंत्री जब सारी हदें पार करते हुए संगीता को अपमानित करने पर तुल गए और वर्दी उतरवाने की धौंस देने लगे तो स्वाभिमानी संगीता बगावत की मुद्रा अख्तियार करते हुए उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगीं। उन्होंने एक-एक सवाल का जवाब देकर सबके सामने मंत्री की बोलती बंद कर दी। मंत्री हैरान-परेशान संगीता का मुंह ताकते रह गए। अभी तक उनका ऐसे अफसरों से ही वास्ता पड़ा था, जो उनकी डांट-फटकार चुपचाप सुन अपराधी की तरह अपना सिर झुका लेते थे। स्वच्छ छवि की परिश्रमी इस खाकी वर्दी धारी नारी को जब गेट आउट कहा गया तो उसने ललकारने वाले तेवरों के साथ कहा, ‘‘श्रीमानजी इस वर्ष ढाई हजार से अधिक अवैध शराब विक्रेताओं को हमने पकड़ा था। दुख इस बात का है कि हम मेहनत करते हैं, लेकिन अधिकारियों को आसानी से कोर्ट से जमानत मिल जाती है। जब देखो तब आप लोगों का भी फोन आ जाता है कि जिन्हें पकड़ा गया है, वे हमारे आदमी हैं, उन्हें तुरंत छोड़ दो। पिछले महीने भाग-दौड़ी कर मैंने कुछ रेत माफियाओं पर हाथ डाला था। उन्हें किसी भी हालत में जेल भिजवाने की ठान चुकी थी, लेकिन आपका फोन आ गया कि, यह तो मेरे समर्पित कार्यकर्ता हैं, इन्हें कुछ भी नहीं होना चाहिए। ऐसे में बहुत से अधिकारियों को समझ  में ही नहीं आता कि कानून का पालन करें या गुलामों की तरह आपके आज्ञाकारी बने रहें, लेकिन मैं औरों की तरह नहीं जो अपने मूल फर्ज़ से नाता तोड़ आपकी जी हजूरी करती रहूं। मैं आपको बताये देती हूं कि आपका बर्ताव अशोभनीय होने के साथ-साथ  पद के प्रतिकूल भी है और बेहद शर्मनाक भी।’’ हरियाणा के सनकी मंत्री अनिल विज की तरह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार भी तू...तड़ाक और गुस्सा दिखाने के मामले में आम लोगों में कुख्यात तो अपने प्रशंसकों और चम्मचों के आदर के पात्र हैं। सोच समझकर बोलने से परहेज रखने वाले अजित पवार और प्रदेश की आईपीएस अधिकारी अंजना कृष्णा के बीच की बातचीत के वीडियो ने एक बार फिर से अजित पवार को चर्चित कर दिया। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में अंधाधुंध रेत खुदाई की पुख्ता जानकारी मिलने के पश्चात अंजना कृष्णा ने दल-बल के साथ वहां पहुंचने में देरी नहीं लगायी, जहां रेत की डकैती को बेखौफ अंजाम दिया जा रहा था। नदी में रेत यानी मरूम की खुदाई करने में लगे रेत माफियाओं को उन्होंने काम रोकने को कहा तो वे अपनी ऊंची पहुंच की आवाज बुलंद करते हुए उन्हें ही धमकाने लगे। कर्तव्य परायण महिला पुलिस अधिकारी ने जब कानून का डंडा चलाते हुए कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कीे तो किसी ने अपने आका से बात करते-करते अपना मोबाइल महिला अधिकारी के हाथ में थमा दिया। उधर से कहा गया, ‘‘मैं डिप्टी चीफ मिनिस्टर बोल रहा हूं, तुरंत एक्शन रोको।’’ अधिकारी उपमुख्यमंत्री की आवाज को नहीं पहचानती थीं, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। यह भी हो सकता है उनके मन में विचार आया हो कि रेती की अवैध खुदाई करने वाले शातिर ने उन पर दबाव बनाने के लिए किसी ऐरे-गैरे को फोन लगाकर उन्हें पकड़ाया हो, लेकिन दूसरी तरफ मंत्री महोदय का तो तन-बदन सुलग उठा। एक महिला अधिकारी की इतनी हिम्मत! मंत्री ने फौरन महिला पुलिस अधिकारी से वीडियो कॉल पर बातचीत करते हुए पूछा, ‘‘क्या वे अब उनका चेहरा पहचान रही हैैं?’’ जवाब में वे बोलीं, ‘‘उन्होंने तुरंत समझा नहीं कि वह उपमुख्यमंत्री से बात कर रही हैैं...।’’ यह पूरा माजरा यह तो स्पष्ट कर ही रहा है कि इस देश के नेता अपने चहेते कार्यकर्ताओं के कमाने-धमाने की कितनी चिंता और ध्यान रखते हैं।

Thursday, September 4, 2025

पतन दर पतन

राजनीति के मैदान में चुनावी योद्धा एक दूसरे को नीचा दिखाते-दिखाते नीचता की हर हद को लांघ रहे हैं। देश में जब भी कहीं चुनाव होने होते हैं, तो विपक्षी दल और नेता सत्तासीन होने के सपने देखने लगते हैं। सपने देखना गलत नहीं। वर्षों से यही होता आया है। चुनाव प्रचार के दौरान पक्ष और विपक्ष के नेताओं से शालीनता और मर्यादा के पालन की उम्मीद की जाती है, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही। तब विरोध में भी शिष्टाचार समाहित रहता था। उम्र और पद की गरिमा का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए अपनी जुबान पर नियंत्रण रखा जाता था, लेकिन अब कई नेता घटिया से घटिया भाषा का इस्तेमाल कर अपने घोर पतित और चरित्रहीन होने के भी सबूत पेश कर रहे हैं। उनकी यह गिरावट उनकी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा कर रही है। सत्ता की चाहत के लिए ऐसे पतन की यकीनन कल्पना नहीं की गई थी। सत्ताधीशों की कार्यप्रणाली से नाखुश होने पर उनके खिलाफ जनजागरण करने की बजाय गालीगलौच करने की प्रवृत्ति अक्षम्य होने के साथ-साथ खुद के लिए मौत का कुआं खोदने वाली बेवकूफी है।

जब से नरेंद्र मोदी भारत वर्ष के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कुछ नेता, पत्रकार, संपादक, उम्रदराज वकील तथा खास किस्म के बुद्धिजीवी पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह छटपटा और फड़फड़ा रहे हैं। मोदी की हर अच्छी बात में खोट निकालने की जिद में जोकर बने नज़र आ रहे हैं। साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि नरेंद्र मोदी पर वोटों की हेराफेरी कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के आरोप वो ‘मंडली’ लगा रही है, जो वर्षों से येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए बौखलायी और पगलायी है। यह मंडली जब कहीं से चुनाव जीतती है तो जोर-शोर से अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन शर्मनाक पराजय होने पर ईवीएम यानी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में हुई वोटों की हेराफेरी के राग अलापने लगती है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पीएम बनने की बहुत जल्दी है। जिस तरह से राहुल धैर्य खोकर आक्रामक हो गये हैं, उससे भाजपा ही नहीं सजग देशवासी भी हैरान हैं। राजनीति में एक दूसरे पर बयानों की तोप चलाना, खामियां गिनाना भी कोई नई बात नहीं। ये तो सतर्कता की पहचान है, लेकिन ओछेपन पर उतर आना तो अज्ञानी और नालायक होने की निशानी है। कुछ वर्ष पहले तक भाजपा के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी का खूब मजाक उड़ाया। उन्हें शहजादे कहकर प्रधानमंत्री ने भी उन पर तंज कसे। उन्हें नासमझ ‘पप्पू’ साबित करने का भरपूर अभियान भी भाजपा वालों ने चलाया। अब राहुल खुद को परिपक्व दिखाने के चक्कर में बार-बार आपा खोते नज़र आते है। उनके कार्यकर्ता और नेता भी अपने नायक का अनुसरण कर रहे हैं। उनकी वोट अधिकार यात्रा के दौरान दरभंगा के मंच से एक कांग्रेसी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अपने मुंह पर कालिख पोत ली। राहुल गांधी को लोकसभा चुनावों में आंशिक सफलता क्या मिली कि उनके तेवर ही बदल गये। उनकी देखा-देखी कांग्रेस के अदने से कार्यकर्ता और नेता भी तू-तड़ाक करते हुए बेहूदगी और निर्लज्जता के काले परचम लहराने लगे। दरभंगा में जिस मंच पर माननीय प्रधानमंत्री और उनकी आदरणीय माताजी के लिए अपमानजनक शब्द उगले गये, वहां हालांकि स्वयं राहुल गांधी मौजूद नहीं थे, लेकिन उनका अनुसरण कर जहर उगलने वालों का हौसला बुलंद था। लगता है अब राहुल गांधी एंड कंपनी के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। पिछले एक दशक से कांग्रेस को  देश और प्रदेशों में लगातार चुनावी हार झेलनी पड़ रही है। आज केवल हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। साउथ और नॉर्थ मेें भी कांग्रेस अकेले दम पर सरकार बनाने की हैसियत में नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में निराशा और हताशा स्वाभाविक है, लेकिन एटम बम और हाइड्रोजन बम फोड़ने की धमकी देने के क्या मायने हैं? आपको सच्चाई बताने से कौन रोक रहा है, लेकिन बम और बारूद की भाषा तो मत बोलिए। लगता है कि जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कांग्रेस के नायक को खलनायक बनने में संकोच नहीं हो रहा है तथा उनकी पार्टी के छोटे-मोटे नेताओं को अपमानजनक और आक्रामक भाषा के जरिए विषैले तीर चलाने की आदत पड़ती जा रही है। कांग्रेस के अधिकांश प्रवक्ता भी हर उस शख्स को अपना शत्रु मानने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के प्रति श्रद्धा तथा सॉफ्ट कार्नर रखता है। यह लाइलाज बीमारी तो कुछ चुनिंदा पत्रकारों को भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। उन्होंने भाजपा और मोदी की बुराई करने की शपथ ले रखी है। ऐसा तो नहीं है कि मोदी सरकार ने जनहित के कोई कार्य ही न किए हों, लेकिन इन्होंने तो अपनी आंख पर पट्टी और मुंह पर ताले लगा रखे हैं। इन्होंने कसम खा रखी है कि ये ताले तभी खुलेंगे, जब कांग्रेस सत्ता पायेगी और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। 

हाल ही में इंडिया टुडे ग्रुप की ओर से मूड ऑफ नेशन सर्वे कराया गया है। इस सर्वे का मकसद यह जानना है अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो क्या नतीजे बदलेंगे या वही रहेंगे। यह सर्वे कहता है कि अभी चुनाव होने पर सरकार तो एनडीए की ही बनेगी! सीटों की संख्या में भी मामूली बदलाव हो सकते हैं। 2024 में 293 सीटें जीतने वाली एनडीए 324 सीटें जीत सकती है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की सीटें 234 से घटकर 208 में सिमट जाने का अनुमान है। यानी विपक्ष अभी इस लायक नहीं कि अपनी छाती तान सके। आम जनता की सोच एक पक्षीय सोच वाले मीडिया जैसी नहीं है। वह यह भी जानती है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प देश में अभी तो दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रहा है। अब बात करते हैं नरेंद्र मोदी के अपनी उम्र के 75 साल पूर्ण करने के पश्चात रिटायर होने की। वैसे तो अनुमान तो संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के रिटायर होने के भी लगाये जा रहे थे। 11 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे मोहन भागवत ने स्पष्ट कर दिया है कि, उनका रिटायर होने का कोई इरादा नहीं। एक कार्यक्रम के मंच पर उन्होंने स्पष्ट किया कि, मैंने यह नहीं कहा था कि मैं रिटायर हो जाऊंगा या किसी और को 75 साल के होने पर रिटायर हो जाना चाहिए। मैं 80 की उम्र तक शाखा लगाऊंगा। तय है कि विरोधी कितना भी सिर पटक लें, आरोपों के हाइड्रोजन बम फेंक लें, लेकिन 17 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे नरेंद्र मोदी भी गद्दी नहीं छोड़ने वाले। उनमें कम अज़ कम 85 साल की उम्र तक देश की सेवा करने का पूरा दमखम है। विरोधी उनके रिटायर होने के दिन-रात सपने देखने और धड़ाधड़ गालियां देने के लिए स्वतंत्र हैं।

Monday, September 1, 2025

कितनी लाचार और नादान हैं बेचारी!

कोई दिन ऐसा नहीं जिस दिन ऐसी खबर नहीं। गंगा जमुना रेड एरिया में पुलिस का छापा। आठ लड़कियों को मुक्त कराया। इनमें पांच हैं नाबालिग। देह मंडी से पुलिस चौकी लगी हुई है। खाकी वर्दी वालों ने जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंदे रखीं। बस जेब भरते रहे। संतरा नगरी में एक कुख्यात गैंगस्टर की छत्रछाया में चल रहे कॉपर सैलून में पुलिसिया छापे के दौरान सैक्स रैकेट का भंडाफोड़। पांच पीड़िताओंको पुलिस ने अपने कब्जे में लिया। इनमें दो छात्राओं का भी समावेश है। पिस्तौल की नोंक पर गैंगस्टर ने पहले इनसे बलात्कार किया, फिर देह के धंधे में झोंक दिया।

क्राइम ब्रांच के सामाजिक सुरक्षा दस्ते ने हुडकेश्वर इलाके में चल रहे देह व्यापार के अड्डे से छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक महिला को मुक्त कराया। सुनीता और उसका बेटा यश इस अड्डे के संचालक हैं। दोनों ही लड़कियों को अच्छी कमायी का लालच देकर फांसते थे और बेखौफ होकर जिस्म फरोशी करवाते थे। छत्तीसगढ़ से रोजी-रोटी की तलाश में आई महिला को भी मां-बेटे ने मिलकर अपने जाल में फंसाया था। इसी तरह से रईसों के इलाके वाठोड़ा में स्थित एक होटल में गुप्त कमरे में चल रहे देह व्यापार में लिप्त दो पीड़ित महिलाओं को छुड़ाया गया। यह दोनों महिलाएं पहले भी कई बार ग्राहकों के जिस्म की भूख मिटाती पकड़ी जा चुकी हैं। शहर में बीयर बार की आड़ में चोरी-छिपे डांस बार की खबर लगने पर पुलिस ने जब छापा मारा तो पुलिस ने देखा कि तीन युवतियां आधे-अधूरे वस्त्रों में अश्लील नृत्य कर रही थीं। रात के डेढ़ बजे लगभग पचास से ज्यादा शौकीन बेशर्मी से सराबोर डांस का शराब पीते हुए मज़ा ले रहे थे। उनके द्वारा नशे में झूमती बालाओं पर धड़ाधड़ नोट भी बरसाये जा रहे थे। ‘शिव शक्ति’ नामक इस बार में अलग से एक कमरा भी था, जहां पर खासमखास ग्राहक मदहोशी की हालत में लोटपोट हो रहे थे। कुछ तो अपनी पसंद की युवतियों को अपनी गोद में बिठा  कर अश्लील हरकतें कर रहे थे। 

मायानगरी मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे कई बार हैं, जहां पर आर्केस्ट्रा का लाइसेंस लेकर नये किस्म की वेश्यावृत्ति करवायी जाती है। नियमित आने वाले रईसों, अपराधियों को विशेष छूट देने का भी प्रावधान है। बार गर्ल पर नोटों की बरसात करने की जिसकी जितनी क्षमता होती है, उसकी उसी के अनुसार पूछ परख और इज्ज़त होती हैं। शहर में कुछ करोड़पति मतवाले ऐसे भी हैं जिनका इन महफिलों में पहुंचना रोज का काम है। उन्हें करारे नोट उड़ाने के अलावा बार गर्ल को नोटों के हार पहनाने में अलौकिक आनंद आता है। मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे उद्योगपतियों, नेताओं और माफियाओं की भरमार है जिनके अधिकांश खाकी वर्दीधारियों से मधुर संबंध हैं और इन्हीं की बिरादरी के अधिकांश लोग ऐसे अय्याशी के अड्डों की जान, शान हैं। पुलिस कभी-कभार छापा मारने का नाटक कर अपने होने के निशानी छोड़ती रहती है। फिर गहरी नींद में लीन हो जाती है। जागरूक जनता लाख जगाने की कसरत करती रहे, लेकिन उसकी हर मेहनत धरी की धरी रह जाती है। एक सच जिस पर बहुत कम गौर किया जाता है, वो ये भी है कि ब्यूटी पार्लरों, मसाज के विभिन्न चमकते-दमकते ठिकानों, यूनी सेक्स सैलूनों, फार्म हाऊसों में अपना जिस्म बेचती जिन लड़कियों, औरतों की पकड़ा-धकड़ी की नौटंकी की जाती है उन्हें बड़े सम्मान और सहानुभूति के साथ पीड़िता दर्शाया जाता है। जबकि इनमें से अधिकांश बार-बार पकड़ में आती रहती हैं। फिर भी बेचारी, भोली-भाली और नादान पंछी घोषित कर आजाद उड़ने के लिए छोड़ दी जाती हैं। सच तो यह है कि हमारे यहां अपराध कर्म में पुुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती महिलाओं को कुछ ज्यादा ही छूट दी जा रही है। कल तक स्त्रियां दहशत में थीं, आज पुरुष डरे-सहमे हैं। कभी किसी पति का शव नीले ड्रम में मिलता है तो कभी किसी अंधी गहरी खाई में उसका शव पाया जाता है। हर नारी अपना जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र है। माता-पिता के चयन पर आपत्ति दर्शाने का हर युवती को पूरा-पूरा हक है। लेकिन गलत फैसले और नकाबपोशी उन्हें कलंकित करते हुए कठघरे में खड़ा कर देती है। अभी हाल ही में रेलगाड़ी से इंदौर से कटनी के लिए निकली एक 29 वर्षीय युवती अपनी मर्जी से बड़े शातिर अंदाज से अपने मित्र के साथ गायब हो गई। इस गुमशुदा युवती को खोजने के लिए पचासों पुलिस वाले जमीन-आसमान एक करते रहे लेकिन वह हाथ नहीं लगी। उसके गुम होने को लेकर कई तरह की शंकाएं जन्मती रहीं। कहीं चलती टे्रन से गिर तो नहीं पड़ी। किसी बदमाश ने अपहरण तो नहीं कर लिया। लोग युवती के प्रति सहानुभूति तो पुलिस को कोसते हुए उसे नालायक ठहराते रहे। पुलिस को गुमराह करने के लिए शातिर लड़की ने जंगल में अपना मोबाइल फेंक दिया था। अपना सामान तक ट्रेन में लावारिस छोड़ चलती बनी थी। यह युवती वकील है। जज बनने का सपना देख रही थी। घरवाले उसकी शादी के लिए योग्य साथी तलाश कर रहे थे लेकिन वह तो अपने यार के साथ जिन्दगी गुजारने की ठाने थी, इसलिए उसके साथ बीच रास्ते में उतरी और अपहरण का नाटक रचते हुए जा पहुंची नेपाल। पुलिस उसे तलाशने के लिए जहां-तहां नाचती रही। यह तो अच्छा हुआ कि गुमराह करने में माहिर शातिर वकीलन को तेरह दिन बाद काठमांडु से बरामद कर लिया। यदि नहीं मिलती तो हंगामा मचा रहता कि इस देश में औरतें बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं। चलती रेल गाड़ियों से उन्हें गायब करवा दिया जाता है। इसे आप नारी के आधुनिक और प्रगतिशील होने का प्रमाण कहेंगे या कुछ और? मैंने तो जब यह खबर पढ़ी तो सन्न रह गया। रामपुर जिले के एक गांव की महिला, जो शादीशुदा होने के बावजूद दस बार अपने पुराने आशिक के साथ भाग चुकी है। अपनी इस भगौड़ी पत्नी से परेशान पति ने अंतत: पंचायत की शरण ली। महिला  ने पंचों के सामने स्पष्ट कहा कि मैं पंद्रह दिन अपने प्रेमी के साथ तो पंद्रह दिन पति के साथ रहूंगी। यदि पति को मंजूर है तो ठीक नहीं तो मेरे लिए तो प्रेमी के घर के दरवाजे खुले हैं। जहां मैं मौज मजे के साथ रहने में देरी नहीं लगाऊंगी।

Thursday, August 21, 2025

ऐसे छिन रहा बच्चों का बचपन

मोबाइल की चाहत और उसकी लत कई खौफनाक मंजर दिखा रही है। ऐसी कभी कल्पना नहीं की गई थी कि मोबाइल की वजह से आत्महत्याएं होने लगेंगी। बीते दिनों एक सोलह साल के किशोर ने अपनी मां से मोबाइल की मांग की। मां ने असमर्थता प्रकट कर दी तो वह बहुत निराश और आहत हो गया। जैसे उसकी दुनिया ही लुट गई हो। वह मां के सामने ही ऊंची पहाड़ी से कूद गया। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। दो अन्य और पंद्रह वर्षीय किशारों ने भी यही रास्ता चुना। गरीब किसान पिता के पास बेटे को मोबाइल दिलाने के पैसे नहीं थे। बेटे ने खेत में जाकर पेड़ से लटक कर फांसी लगा ली। इसी तरह से अपने जन्मदिन पर पुत्र ने उपहार में मां से मोबाइल मांगा तो उसने कुछ दिन इंतजार करने को कहा, लेकिन उसे मोबाइल से ज्यादा अपनी जान ज्यादा सस्ती और गैर जरूरी लगी। वह कीटनाशक पीकर इस दुनिया से ही चल बसा। 

सोचो तो बड़े कमाल की चीज़ है यह मोबाइल। छोटों के साथ-साथ बड़े भी इसके चक्रव्यूह में छटपटा रहे हैं। इसकी वजह से तनाव व अनिद्रा के चंगुल में फंस रहे हैं।  कई घरों की मां-बहनें अपने तीन-चार साल के बच्चों को मोबाइल ऐसे पकड़ा रही हैं जैसे वो बच्चे-बच्ची के मन बहलाने का कोई बेहतरीन खिलौना हो। रोते लाडले-लाडली को मोबाइल से बहलाने, चुप कराने और हंसाने वाले पालकों की जब मोबाइल की वजह से ही रोने की नौबत आती है तब उन्हें अपनी गलती का अहसास तो होता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती। है।

मासूम और नादान से लगने वाले बच्चों की मोबाइल की जिद्दी चाहत जब उन्हें खुदकुशी के लिए उकसाती है तो वह अंतत: दिल दहलाने वाली खबर भी बन जाती है। जिसे पढ़ने और सुनने के बाद लोग भूलने में भी देरी नहीं लगाते। लेकिन जिन पर बिजली गिरती है उनके जख्म कभी भी भर ही नहीं पाते। आज के आपाधापी के मायावी दौर ने माता-पिता को बहुत व्यस्त कर दिया है। उनके पास अपने बच्चों की देखरेख के लिए पर्याप्त वक्त नहीं। एक खबर जो मैंने पढ़ी, हो सकता है, आपकी आंखों के सामने से नहीं गुजरी हो, उससे मैं आपको अवगत कराये देता हूं। खबर पंजाब के लुधियाना शहर की है लेकिन ऐसे हालात देश में अब हर कहीं हैं। कोई भी शहर इससे अछूता नहीं। गांव भी इसकी चपेट में हैं। धन-दौलत के चक्कर में रिश्तों की अहमियत को ताक पर रख चुके कामकाजी पालकों के पास अपने बच्चों के लिए भी समय नहीं। अपनी औलादों की देखभाल के लिए उन्हें नौकरानी, आया नर्स आदि रखनी पड़ रही हैं। वही उन्हें नहलाती, सुलाती और खिलाती हैं। बच्चे उनसे जो मांगते हैं, देने की पूरी कोशिश करती हैं। अपना मोबाइल भी मालिकों के बच्चे-बच्ची को खुशी-खुशी पकड़ा कर अपने दूसरे कामों में व्यस्त हो जाती हैं। लुधियाना के एक बड़े नामी-गिरामी उद्योगपति बहुत व्यस्त रहते थे। उनकी पत्नी के पास भी ढेरों समाजसेवा के काम थे, इसलिए वह भी अपने सात साल के बेटे की देखरेख के लिए समय नहीं निकाल पाती थीं। सुबह से रात तक नौकरानी ही बच्चे के साथ रहती। वही उसे नहलाती, खिलाती और तैयार करती। कभी-कभार वह बच्चे के साथ रात को सो भी जाती। किसी छुट्टी के दिन पति-पत्नी को जब लगा कि उनका बच्चा नौकरानी से अत्याधिक जुड़ाव महसूस करने लगा है तो उन्होंने नई नौकरानी रखने को लेकर आपस में बातचीत की। बच्चे ने जब उनकी यह बात सुनी तो उसने झट से कहा कि यही मेरी मां है। अगर यह जाएगी तो मैं भी इसके साथ जाऊंगा। आपके साथ नहीं रहूंगा। इसी तरह से शहर के एक डॉक्टर दंपति का छह साल का बेटा छुट्टी के दिन भी अपनी मां की गोद में जाने के बजाय आया के पास बैठा रहता। इसी दौरान  रात को एक बार जब बच्चे को पिता के पास सोने को कहा गया तो भावनात्मक तौर पर मां-बाप से पूरी तरह दूर और कट चुके बच्चे ने साफ मना कर दिया। उसने आया के साथ सोकर अपनी जिद पूरी की तो डॉक्टर दंपति को यह बात बहुत खटकी। लेकिन अब उनके पास और कोई चारा नहीं। एक छह साल की बच्ची ने जब मोबाइल नहीं दिये जाने पर मां से यह कहा कि आया दीदी बहुत अच्छी हैं, आप बहुत बुरी हैं। जब देखो तब आप मुझे बस डांटती रहती हैं। मेरी कोई बात नहीं मानतीं। दीदी तो अपना मोबाइल झट से मेरे हाथ में पकड़ा देती है। जब एक उच्च पद पर कार्यरत महिला अफसर ने देखा कि उनका छह साल का बेटा आया की बोली, लहजे और शब्दों में बात करने लगा है। बात-बात पर चीखने-चिल्लाने और गालियां भी देने लगता है तो उनकी तो नींद ही उड़ गई। दरअसल, उनकी आया दूसरे राज्य की बोली में बात करती थी और भद्दी-भद्दी गालियां देने में भी संकोच नहीं करती थी। अफसर  जब चाइल्ड एक्सपर्ट के पास पहुंची तो उन्होंने बताया कि छोटे बच्चे वहीं भाषा अपनाते हैं जो वे सबसे ज्यादा सुनते हैं। अब अफसर मां समय निकालकर रोज आधा घंटा बच्चे को प्रेरक कहानी और सही शब्दों का अभ्यास कराती हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि बच्चों की परवरिश में मां-बाप की अहम भूमिका होती है, अगर वे व्यस्त हैं तो भी रोज कम से कम एक-दो घंटे बच्चों के साथ जरूर बिताएं, ताकि बच्चे खुद को मां-बाप से जुड़ा महसूस करते रहें। बच्चा रोज जिसके साथ होता है, वही उसकी भाषा, व्यवहार और इमोशन तय करता है। अगर वह दिनभर आया के साथ है तो उसके लिए मां की अहमियत कम होती चली जाती है। शुरुआती छह साल बच्चों के व्यवहार और सोच को आकार देते हैं। अगर इन सालों में मां-बाप दूरी बना लें तो बाद में बच्चे का उनसे जुड़ना मुश्किल हो जाता है। मां-बाप की अनदेखी और कमजोर परवरिश उन्हें इस कदर गुस्सैल बना देती है कि वे उनसे नफरत तक करने लगते हैं। अकेलेपन और माता-पिता के सौतेलेपन के शिकार बच्चे अपराध की दुनिया से भी आसानी से जुड़ जाते हैं। इसकी गवाह हैं, शहरों में कुछ सालों में नाबालिगों के अपराध करने की घटनाओं में लगातार बढ़ती संख्या। हाल ही के वर्षों में चोरी, लूटपाट, मारपीट, बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों में नाबालिगों केलिप्त होने की खबरों ने विचारकों को चिंताग्रस्त कर दिया है। अत्यंत दुखद पहलू तो यह भी है कि किशोरों को शराब, गांजा, चरस और हुक्का पीने का शौक उन्हें नशेड़ी बना रहा है। इस कुचक्र में बालक ही नहीं बालिकाएं भी फंसती चली जा रही हैं। बीते हफ्ते नागपुर में रहने वाली दो बालिकाओं ने मिलकर छत्तीसगढ़ में अपनी ही दादी की हत्या कर दी। गांजा, एमडी जैसे मादक पदार्थों की डिलिवरी में जब नाबालिग पकड़े जाते हैं तो पुलिस का माथा भी चकरा जाता है। खबरें बताती हैं कि किशोर उम्र के बच्चे नशे के लिए पैसे चुकाने के लिए चोरी, ठगी और अपहरण जैसे अपराधों में अपनी भागीदारी दर्शा रहे हैं। कई नाबालिगों ने तो अपहरण, धोखाधड़ी और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों को अंजाम देकर अपने भविष्य को पूरी तरह से अंधकारमय कर लिया है...।

Monday, August 18, 2025

ऐसे कैसे खोता मनोबल?

संतरानगरी नागपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र संकेत दाभाड़े ने होस्टल में शाल की मदद से फांसी लगा ली। संकेत एक होनहार छात्र था। उसके डॉक्टर बनने में मात्र एक वर्ष ही बाकी था। माता-पिता बहुत खुश थे। उनका सपना जो साकार होने जा रहा था। संकेत के पिता शिक्षक हैं। मां संस्कारी, परिश्रमी गृहिणी हैं। कॉलेज के पहले दस अत्यंत होशियार विद्यार्थियों में गिने जानेवाले संकेत ने खुदकुशी क्यों की, इसका भी जवाब नहीं मिल पाया। उसके रहन-सहन और बर्ताव से कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वह किसी परेशानी में है। वह नियमित डायरी लिखा करता था। देश की राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके बंगाली मार्केट के एक गेस्ट हाऊस में ठहरे धीरज नामक चार्टेड अकाउंटेंट (सीए) ने भी खुदकुशी की, लेकिन उसकी खुदकुशी का तरीका स्तब्ध करने वाला है। आर्थिक तौर पर अच्छे-भले धीरज ने आत्महत्या की पूरी तैयारी के साथ गेस्ट हाऊस में प्रथम मंजिल पर 28 से 30 जुलाई तक के लिए एक बीएचके बुक कराया था। चेक आउट का समय आने पर जब कर्मचारियों ने दरवाजा खटखटाया तो उन्हें कोई प्रतिक्रिया और हलचल नहीं दिखायी दी। उलटे उन्हें अंदर से आ रही असहनीय बदबू की वजह से नाक पर रूमाल रखना पड़ा। खबर पुलिस तक पहुंचायी गयी। दरवाजे को तोड़ने पर धीरज का शव बिस्तर पर पड़ा मिला। मृतक ने एक मास्क पहना हुआ था, जो पतली नीली पाइप के माध्यम से एक वाल्व और मीटर वाले सिलेंडर से जुड़ा हुआ था। उसके चेहरे पर एक पतली पारदर्शी प्लास्टिक लिपटी हुई थी और गर्दन पर सील थी। घातक तरीके से मुंह में पाइप डालकर शरीर के अंदर हीलियम गैस को प्रवेश करा कर खुदकुशी करने वाला धीरज बिना तड़पे मौत का आलिंगन करना चाहता था। पाइप से शरीर में हीलियम गैस डालकर आत्महत्या करने का यह पहला मामला है। धीरज ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि, मैं जा रहा हूं। इसके लिए किसी को कसूरवार न ठहराया जाए। मौत मेरे लिए जीवन का ही एक खूबसूरत हिस्सा है। मेरी नज़र में खुदकुशी करना गलत नहीं है। वैसे भी यहां मेरा अपना कोई नहीं। फिर मेरा भी किसी से कोई जुड़ाव नहीं रहा। धीरज के पिता की 2003 में मृत्यु हो गई थी और मां ने उनकी मौत होते ही किसी और से शादी कर ली थी। 

भारत के महानगर विशाखापटनम में कलेक्टर के पद पर आसीन चालीस वर्षीय आनंदम ने रेल की पटरी पर सिर रख कर अपनी जान दे दी। इन युवा महत्वाकांक्षी कलेक्टर महोदय को बेहतरीन प्रशासन और मिलनसार स्वभाव का धनी माना जाता था। उनसे जो भी एक बार मिल लेता, हमेशा-हमेशा उनको याद रखता। महिलाओं में खासे लोकप्रिय रहे आनंदम की दिल दहलाने वाली खुदकुशी की वजह हैं उनकी अर्धांगिनी, जिन्हें वो जी-जान से चाहते थे। उनकी एक पांच साल की प्यारी-प्यारी बिटियां भी है। पत्नी भी रेलवे में उच्च पद पर कार्यरत है। ऐसी जोड़ियों को हमारे यहां बहुत खुश नसीब माना जाता है, लेकिन यहां एक गड़बड़ थी। वैसे ऐसी परेशानियां अधिकांश घर-परिवारों में आम हैं। कलेक्टर की पत्नी की अपनी सास से नहीं निभ रही थी। जब देखो तब घर में कलह-क्लेश मचा रहता था। कलेक्टर साहब अपनी बीवी के साथ-साथ मां को भी समझाते-समझाते थक गये थे। इस घरेलू जंग की वजह से मां और बीवी दोनों उन्हें ही कोसते रहते। तमाम बाहरी समस्याओं का चुटकी से हल निकालने वाले कलेक्टर को एक दिन लगा कि वे घर के मोर्चे की जंग पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं हैं। उनकी जिन्दगी नर्क बनती चली जा रही है। जीवन भी बोझ हो चला है। जब उनकी पत्नी और मां को उनकी खुदकुशी की खबर मिली तो उनका रो-रोकर बुरा हाल था। उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी था, लेकिन उन्हीं की वजह से निराश और हताश होकर जाने वाला अब वापस तो नहीं आने वाला था। 

नारंगी नगर के ही एक डॉक्टर को बीमारी, परेशानी और अकेलेपन ने अपने जबड़ों में ऐसा जकड़ा कि उन्होंने जहर खा लिया। मौत के मुंह में समाने के लिए उन्होंने पत्नी को भी राज़ी कर ज़हर का सेवन कराया। डॉक्टर तो चल बसे, लेकिन पत्नी अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही है। दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टर ने खुदकुशी करने से पहले जो सुसाइड नोट लिख कर छोड़ा, उसमें इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया। डॉक्टर गंगाधर पिछले काफी समय से पेट के अल्सर और दांतों की गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे। लगातार इलाज के बाद भी जब स्थिति नहीं सुधरी तो खुदकुशी को ही अंतिम इलाज मान लिया। ऐसा भी कतई नहीं था कि गंगाधर की प्रैक्टिस नहीं चलती थी। जानने-पहचानने वाले सभी लोग उन्हें सफल और सुलझा हुआ डॉक्टर मानते थे। उनके क्लिनिक में पहुंचने वाले मरीजों को उनके इलाज पर भी भरोसा था। पति-पत्नी दोनों घर में अकेले रहते थे। उनकी बेटी एक निजी स्कूल में शिक्षिका हैं और बेटा उत्तराखंड में एक स्टील प्लांट में अकाउंटेंट है। 

पुलिस को घटनास्थल की जांच के दौरान तीन सुसाइड नोट के साथ-साथ दो कीटनाशक की बोतलें भी मिलीं। यह आत्महत्या करने वाले सभी चेहरे उन खास लोगों में शामिल हैं, जिनसे समाज को अनंत अपेक्षाएं रहती हैं। लोगों को खुश और संतुष्ट रखने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर होती है। इनके ही इस तरह से मर जाने पर लोग आसानी से यकीन नहीं कर पाते। बस हतप्रभ रह सोचते रह जाते हैं कि क्या इनके पास कोई और विकल्प नहीं था? जब खुद पर आती है, तो अच्छा भला मनुष्य इतना असहाय, निर्बल और दिशाहीन क्यों हो जाता है? जिन्दगी तो विधाता का सौंपा गया एक अनमोल उपहार है, उसे सहेज और संवार कर रखने की बजाय यूं ही गंवा देना सवाल तो खड़े करता ही है। जहां लोग अपनी लंबी उम्र के लिए तरह-तरह के जतन करते हों, वहीं पर ऐसे लोगों की मौजूदगी सहानुभूति और मान-सम्मान की हकदार भी नहीं लगती। कोरोना की महामारी ने इंसानों को जीवन का मोल समझा दिया था। वैसे भी बीते कुछ वर्षों से भारतीयों में स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहने की भावना बलवती हुई है। सेहतमंद बने रहने के लिए बेहतर खान-पान, मार्निंग वॉक, योग, मेडिटेशन और जिम जाने के चलन में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। पहले जहां पचपन-साठ साल की उम्र में अधिकांश लोग बिस्तर पकड़ लेते थे, अब सत्तर-अस्सी की उम्र में भी कई स्त्री-पुरुष भागते-दौड़ते दिखायी देते हैं। सतत ऊर्जावान, सेहतमंद और लंबी आयु जीने के मामले में पूरे विश्व में जापानियों को प्रेरणा स्त्रोत माना जाता है। जापान में 70-80 साल की महिलाएं टैक्सी चलाती देखी जा सकती हैं। 100 साल की उम्र के बुजुर्ग खुद अपने लिए खाना बनाते हैं। बागवानी करते हैं। अच्छी तरह से देख और सुन सकते हैं। सकारात्मक सोच, पौष्टिक भोजन, नियमित मॉर्निंग और इवंनिंग वॉक तथा चिन्तामुक्त भरपूर नींद जापानियों की लंबी उम्र का जबरदस्त टॉनिक है। अभी हाल ही में जापान की 114 वर्षीय सेवानिवृत्त चिकित्सक शिगेको कागावा चल बसीं। कागावा ने द्वितीय विश्व युद्ध से पहले मेडिकल स्कूल से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। युद्ध के दौरान ओसाका के अस्पताल में अपनी सेवाएं देने के प्रश्चात प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में अपने परिवार के क्लिनिक का संचालन किया। वह 86 वर्ष की आयु में जब सेवा निवृत्त हुईं तब भी उनकी चुस्ती-फुर्ती में कोई फर्क नहीं आया था। उनसे जब उनकी बेहतरीन सेहत और लंबी उम्र का राज पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मेरे पास कोई रहस्य नहीं है। मैं बस रोज अपने मनपसंद गेम खेलती हूं। सकारात्मक सोचती हूं। मेरी ऊर्जा ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं जहां चाहती हूं, वहां तुरंत चली जाती हूं। जो चाहती हूं, वही खाती हूं और जो चाहती हूं, वही करती हूं। एकदम स्वतंत्र होने का यही एहसास मेरा हमेशा मनोबल बढ़ाता है।’