Thursday, February 17, 2011

जा को राखे सोनिया...

देश के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिं‍ह और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर कोई कितने भी आरोप लगा ले पर उन्हें भ्रष्टाचारी तो कतई नहीं सिद्ध किया जा सकता। यह बात अलग है कि जब देश के प्रधानमंत्रियों का लेखा-जोखा इतिहास की किताब में दर्ज होगा तो यह भी जरूर लिखा जायेगा कि यह दोनों प्रधानमंत्री खुद तो पूरी तरह से ईमानदार थे पर इनकी छत्र छाया में भ्रष्टाचारियों ने जमकर देश को लूटा और चांदी काटी। दोनों ईमानदार शासक बेइमानों पर अंकुश नहीं लगा पाये। अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में महाजनों और सौदागरों ने देश की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोडी तो मनमोहन के काल में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी इतने बेलगाम हो गये कि उन्हें बडे से बडा भ्रष्टाचार करने में कोई शर्म नहीं आयी। ऐसा लगा जैसे भ्रष्टाचारियों में एक दूसरे को मात देने की प्रतिस्पर्धा चल रही हो। इसी प्रतिस्पर्धा के चक्कर में देश लुटता रहा और देश के मुखिया यह सफाई देते रहे कि हम बेबस हैं। इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिं‍ह बेबस और मजबूर होने के बावजूद देश के प्रधानमंत्री बने रहे। देश चलता रहा। देश चल रहा है...। देशवासी यह भी जान समझ रहे हैं कि इस देश को प्रधानमंत्री नहीं सोनिया गांधी चला रही हैं। कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी की गुडबुक में जिन लोगों के नाम हैं उनकी अच्छी-खासी मनमानी चल रही है। अगर यह कहें कि उनकी मनमानियों और मक्कारियों की जानबूझ कर अनदेखी की जा रही है तो गलत नहीं होगा। मनमोहन सरकार में एक केंद्रीय मंत्री हैं विलासराव देशमुख। यह महाशय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में ग्रामीण विकास मंत्रालय की कमान संभाले हुए हैं। विलासराव देशमुख का नाम सोनिया गांधी की गुडबुक के पहले पन्ने पर दर्ज है इसलिए उनके सभी गुनाह नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। वैसे भी अपने भक्तों पर देवता हमेशा मेहरबान रहते हैं। उन पर कोई आंच नहीं आने देते। विलासराव देशमुख जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तब विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं ने जोर पकड लिया था। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता था जब किसानों की आत्महत्या की खबर पढने और सुनने को न मिलती रही हो। देश और दुनिया के लोग हैरान थे कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? महाराष्ट्र तो खाते-पीते प्रदेशों में गिना जाता रहा है। एक खुशहाल प्रदेश के अन्नदाता के इतने बुरे हाल कैसे हो गये कि उसे फांसी के फंदे पर झूलना पड रहा है। जहर खाकर जान देनी पड रही है! तब मनमोहन सरकार ने किसानों को राहत प्रदान करने के लिए हजारों करोड रुपये की सहायता उपलब्ध करायी थी। यह सहायता किसानों को मिली या नहीं मिली इसका जवाब देना आसान नहीं है। पर किसानों की चिं‍ता तो हर किसी को थी। तब एक सच्चाई यह भी उभर कर आयी थी कि विदर्भ के किसानों को साहूकारों ने त्रस्त कर रखा है। किसानों को कर्जा देने वाले यह साहूकार इतना अधिक ब्याज वसूलते हैं कि मूलधन ज्यों का त्यों बना रहता है। किसानों की जमीनें तक हडप कर ली जाती हैं और कर्ज चुकता नहीं हो पाता। किसानों का शोषण करने वाले साहूकार तो 'राजा' जैसा जीवन जीते हैं और किसानों को भीख का कटोरा हाथ में थामने को विवश होना पडता है। तब एकाएक होश में आयी महाराष्ट्र सरकार ने किसानों को लूटने-खसोटने वाले अनेकों साहूकारों पर कानूनी फंदा कसा था और कइयों को जेल की हवा भी खिलायी थी। सरकार के इस कदम को सबने सराहा था पर एक कटु सच यह भी था कि प्रदेश के मुखिया विलासराव देशमुख ने सच्चे राजा की भूमिका कतई नहीं निभायी। उन्होंने अपनों को बख्शा और गैरों को सजा दी।खामगांव के विधायक दिलीप सानंदा का परिवार साहूकारी का धंधा करता था। जिस तरह से दूसरे साहूकारों ने किसानों को कर्ज देकर लूटने-खसोटने का गोरखधंधा शुरू कर रखा था उसी तरह से विधायक सानंदा भी बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। उनके खिलाफ कई शिकायतें आयीं। कई किसानों ने अपनी फरियाद सुनायी कि सानंदा परिवार ने उनकी करोडों रुपये की जमीन हथिया ली है। यह परिवार वर्षों से किसानों का शोषण करता चला आ रहा है। चूंकि विधायक का मामला था और देशमुख के इनसे काफी मधुर रिश्ते थे इसलिए इन पर आंच भी नहीं आयी। किसानों का शोषण करने में माहिर सानंदा परिवार देशमुख का अंधभक्त रहा है और देशमुख भी भक्त को प्रसन्न रखने की कला में माहिर हैं। देशमुख ने तो अपनी दोस्ती निभा दी पर सानंदा परिवार के खिलाफ शिकायतों का सिलसिला बढता चला गया। बात यहां तक जा पहुंची कि मामला कोर्ट में भी जा पहुंचा। अदालतें रिश्ते नहीं निभातीं। देशमुख ने जो दोस्ती निभायी थी और पुलिस कार्रवाई में जो बाधा डाली थी उसका खामियाजा सरकार को भुगतना पडा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार महाराष्ट्र सरकार को दस लाख का जुर्माना भरना पडा। सुप्रीम कोर्ट ने देशमुख को फटकार लगाते हुए कहा कि उनका व्यवहार घोर अराजकतावादी था। पर देशमुख को इस से कोई फर्क नहीं पडा। वे भले ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री नहीं हैं पर केंद्र में तो मौज मना ही रहे हैं। अदालत जिस शख्स को दोषी मानती है उसे कांग्रेस सुप्रीमो पाक-साफ मानती हैं इसलिए डॉ. मनमोहन सिं‍ह ने भी खुशी-खुशी ग्रामीण विकास मंत्रालय की कमान देशमुख को सौंप दी। यह भी गौर करने वाली बात है जब देशमुख को यह आलीशान तोहफा दिया गया तो किसानों के शोषक और हत्यारे विधायक सानंदा इतने प्रफुल्लित हुए कि उन्होंने अपने देवता को चांदी का मुकुट और चांदी की तलवार भेंट करने में जरा भी देरी नहीं लगायी। इतना ही नहीं सानंदा ने अपने गांव की दिवारों पर देशमुख को बधाई देने वाले बडे-बडे पोस्टर चिपकाये और लगाये गये जिन पर लिखा था-'जा को राखे साईयां, मार सके ना कोय...।'

Thursday, February 10, 2011

उत्सव और उत्सव

उत्सव शर्मा को कई लोग सनकी कहते हैं। पागल और बेवकूफ कहने वालों की भी कमी नहीं है...। वह अनपढ नहीं है। पढा-लिखा है। पर उसकी हरकतें उसे जेल की सैर करा चुकी हैं। अपनी करनी पर अफसोस जताना भी उसे कतई गवारा नहीं है। वह कहता है अगर हालात ऐसे ही रहे तो वह नहीं बदलेगा। उसका आक्रोश कानून की अनदेखी कर किसी भी हद तक जा सकता है। देश की व्यवस्था के प्रति उसके मन में जो रोष भरा पडा है उसी का ही नतीजा है कि उसने गाजियाबाद अदालत परिसर में डॉ. राजेश तलवार पर अचानक हमला कर लोगों को चौंकने और सोचने पर विवश कर दिया। इससे पहले उत्सव हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौर पर भी हमला कर चुका है। जवानी के जोश से लबालब उत्सव का मानना है कि डॉ. तलवार और राठौर दोनों मुजरिम हैं। हत्यारे हैं। डॉ. तलवार के हाथ अपनी बेटी आरुषि के खून से रंगे हैं तो राठौर ने रुचिका को मौत को गले लगाने के लिए विवश किया। हमारे देश का कानून दोनों का कुछ भी नहीं बिगाड पाया। अपने रुतबे, रसूख और दौलत के दम पर कई अपराधी बडी आसानी से बच निकलते हैं। जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता वे बडी आसानी से सजा के हकदार हो जाते हैं। कानून की इस कमजोरी से खफा होकर अपनी खीज, झुंझलाहट और गुस्से का इजहार करने वाले युवक उत्सव शर्मा के बारे में तो लोगों ने जान लिया पर न जाने और भी कितने उत्सव हैं जो व्यवस्था से नाखुश हैं। वे अभी तक खामोश हैं। कानून को हाथ में लेना उन्हें नहीं सुहाता। पर जब बर्दाश्त करने की ताकत ही खत्म हो जाए तो एक अच्छे भले इंसान को उत्सव शर्मा बनने में कितनी देरी लगती है? एक अकेले उत्सव को सनकी, पागल और सिरफिरा कह कर जेल में डाला जा सकता है पर जब असंख्य उत्सवों का सडकों पर उतर आने का खतरा मंडरा रहा हो तो...? यह खतरा अब ज्यादा दूर नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली हो या देश के अन्य शहर-कस्बे हर कहीं नारियों पर होने वाले अत्याचारों में इजाफा होता चला जा रहा है। हत्या, व्याभिचार और बलात्कार तो रोज हो रहे हैं पर नाम मात्र की खबरें राष्ट्रीय मुद्दा बन पाती हैं। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बच्चियों और युवतियों के साथ चौबीस घंटे ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जो किसी भी संवेदनशील इंसान के खून में उबाल ला सकता है। खादी में नेता और खाकी में पुलिस वाले इतने अपराध कर चुके हैं कि आम लोग इन पर विश्वास करने में कतराने लगे हैं। आम आदमी यह भी मानने लगा है कि वर्तमान राजनीति और राजनेता छल, कपट और फरेब के पर्यायवाची बनकर रह गये हैं। इनके रहते देश का भला होने वाला नहीं है। हालात सुधरेंगे नहीं और बिगडेंगे। जिन्हें देश की चिं‍ता है वे पूरी तरह से बदलाव के इच्छुक हैं। उन्हें आज फिर एक जयप्रकाश नारायण का इंतजार है जो सत्ता का कतई भूखा न हो।इन सत्ता के चटोरों और लुटेरों ने तो देश को कहीं का नहीं रखा। जहां देखो वहां भ्रष्टाचार, अनाचार और व्याभिचार...। समाज में खुलेआम विचरण कर रहे दरिंदों से हर कोई परेशान है। अखबार भी शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब बलात्कार की खबरें न आती हों। ऐसे युवकों की संख्या में लगातार इजाफा होता चला जा रहा है जिनके लिए मौजमस्ती ही जीवन का एकमात्र मकसद है। इनकी वहशी हरकतें बताती हैं कि इनके लिए दूसरों की मां-बहनें महज भोग विलास की वस्तु हैं। स्कूल, कॉलेजों और घरों में ही बच्चियों की अस्मत लुटने लगी है। नौकरी करने वाली युवतियों और महिलाओं का तो भगवान ही मालिक है। पिछले दिनों कानपुर में एक दस वर्षीय बच्ची पर स्कूल में ही बलात्कार हो गया। स्कूल प्रशासन अंधा और बहरा बना रहा। बच्ची की अस्पताल में मौत हो गयी। ऐसी कितनी ही मौतें रोज होती हैं पर किसी को कोई फर्क नहीं पडता। फर्क पडे भी क्यों... यहां तो मंत्री से संत्री तक लगभग सभी एक ही रंग में रंगे हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती का राज है। उनके राज में अराजक तत्वों की तो छोडि‍ए विधायक तक बलात्कार करने से नहीं चूक रहे हैं। विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी को जनता ने जनप्रतिनिधि का ताज पहनाया पर वह तो अबलाओं की आबरू पर ही हाथ डालने लगा। जब पकडा गया तो मर्दानगी धरी की धरी रह गयी। कहने लगा कि मैं तो नामर्द हूं...। ऐसे हैं जनता के यह सेवक। झूठे, मक्कार और ढोंगी। ऐसे में कैसे और क्यों इन पर भरोसा किया जाए? इन्हीं की देखा-देखी पुलिस भी अपना ईमान-धर्म बेच चुकी है और व्याभिचारियों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गयी है।उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की राजधानी दिल्ली के भी बडे बुरे हाल हैं। शीला दीक्षित के हाथ में दिल्ली की सत्ता है पर महिलाएं यहां भी खून के आंसू रोने को विवश हैं। शीला दीक्षित तो बलात्कार के लिए कहीं न कहीं महिलाओं को भी दोषी मानती हैं। तभी तो वे यह कहने में भी संकोच नहीं करतीं कि महिलाओं को समय देखकर घर से बाहर निकलना चाहिए। जिस देश और प्रदेश के शासक ही लुंज-पुंज हों वहां बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और तमाम किस्म के अनाचारियों के पनपने पर आश्चर्य करने की कोई गुंजाइश ही कहां बचती है। इस देश का आम आदमी बेवकूफ कतई नहीं है। उसका राजनीतिज्ञों पर से भरोसा उठ चुका है। सत्ताधीशों की दगाबाजी और कमीनगी के चलते उसका गुस्सा संभाले नहीं संभल पा रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने से शुरू हुआ भ्रष्टाचार सारी हदें पार कर चुका है। दिनों-दिन लूट खसोट के आंकडे बढते ही चले जा रहे हैं। किसी भी माई के लाल में दम नहीं दिखता जो भ्रष्टाचारियों और अनाचारियों का गला दबोच सके। कहीं कोई राजनीति का सपेरा कॉमनवेल्थ की आड में अरबों की डकैती करता है तो कोई टू जी स्पेक्ट्रम में अपने हाथ काले कर देश के माथे पर कलंक लगाता है। देश की राजनीति इतनी ओछी और गंदी हो गयी है कि सच्चे और अच्छे लोग राजनीति में आने से डरते हैं। इस घोर अविश्वास के दौर में अब तो और भी बहुतेरे उत्सवों के सडक पर उतरने के संकेत दिखायी देने लगे हैं...।

Thursday, February 3, 2011

बौद्ध धर्मगुरु करमापा का मायाजाल

इस भारतवर्ष में साधु-संन्यासी का चोला धारण कर छलने वालों के मायावी संसार का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने में यह कलम खुद को असहाय पा रही है। लोगों की आस्था के साथ खिलवाड करने का यह खेल पता नहीं कब और कहां जाकर थमेगा! अभी तक तो यह देश अपनी ही धरती के ढोंगियों के दंश झेलता आ रहा था पर अब करमापा की करतूत ने देशवासियों की आंखें खोल कर रख दी हैं। हमें हर किसी पर विश्वास कर लेने की घातक प्रवृत्ति से मुक्ति पानी होगी। अन्यथा बहुत बडा अनर्थ हो सकता है। हम बाहरी मुखौटे धारियों के हाथों बुरी तरह से छले जा सकते हैं।बौद्ध धर्मगुरु करमापा के मठ और कार्यालय से करोडों रुपये की बरामदगी हुई। इस अपार दौलत का उनके पास कोई हिसाब-किताब नहीं मिला। जिस तरह से देशी साधु-संत धर्म के प्रचार का दावा करते हैं वैसे ही करमापा का दायित्व होता है भगवान बुद्ध के आदर्शों का अनुसरण कर उनके विचारों को फैलाना। भगवान बुद्ध मानवता के पुजारी थे। करमापा माया के पुजारी निकले। उनके मठ में मिली छह करोड की विदेशी मुद्रा ने और भी कई सवाल खडे कर दिये। चेहरे पर नकाब ओढकर आनेवाले शरणार्थियों से देश ने अनेकों बार धोखा खाया है। अपनी शरण में आने वालों के प्रति सहानुभूति दर्शाना और उनकी सहायता करना भारतीयों की परंपरा और आदत में शुमार रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में तिब्बतियों को धर्मशाला शहर में बसाया गया था। वर्षों से शरणार्थी के रूप में रह रहे इन तिब्बतियों के मन में आज भी तिब्बत बसा है और हिं‍दुस्तान का दाना-पानी खाने-पचाने के बाद भी अपने तिब्बत प्रेम की अलख जगाते रहते हैं। शायद ही ऐसा कोई तिब्बती होगा जिसके मन में भारत के प्रति अटूट लगाव की भावना होगी। कांगडा और धर्मशाला जहां तिब्बती वर्षों से डेरा जमाये हैं वहां के मूल निवासियों को इनका व्यवहार कभी रास नहीं आया। अनेकों सजग हिमाचलियों का कहना है कि तिब्बती हर दर्जे के अहसान फरामोश हैं। दलाईलामा के ये चेले जिस तरह से भारत में ऐश-ओ-आराम भरी जिंदगी जी रहे हैं उससे तो इन्हें भारतवर्ष और यहां के निवासियों का शुक्रगुजार होना चाहिए था पर सच्चाई इससे एकदम उलट है। न जाने कितने तिब्बती ऐसे हैं जिनके क्रियाकलाप बेहद संदिग्ध हैं। यही वजह है कि यह लोग स्थानीय लोगों से दूरी बनाये रखते हैं। नजदीकी बनायेंगे तो पकड में आ जाएंगे। पर इनके धर्मगुरु तो पकड में आ गये हैं। शाही जिं‍दगी जीने वाले करमापा भगवान बुद्ध के आदर्शों का किस तरह पालन करते हैं उसका खुलासा भी उनके धन प्रेम ने कर दिया है।करमापा का अतीत विवादों भरा रहा है। वे २००५ में चीन से भागकर भारत आये थे। तब इन पर चीन का एजेंट होने की सुगबुगहाटें भी उभरी थीं, जिन्हें तथाकथित शांतिदूतों ने अनसुना कर दिया गया था। दुनिया जानती है कि भारत के हुक्मरान शुरू से ही बडे उदारवादी रहे हैं। देशवासी भले ही भूखे मर रहे हों पर मेहमाननवाजी का दस्तूर हर हाल में निभाया जाता है। वर्षों पूर्व आये तिब्बती शरणार्थियों की तरह करमापा को भी सिर आंखों पर बैठाया गया। करमापा तब किशोर उम्र के थे। उनको भारत की जमीन पर अठखेलियां करते हुए छह साल हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने करोडों का साम्राज्य भी खडा कर लिया। है न हैरानी की बात...। जब करमापा ने भारत की धरती पर कदम रखा था तभी सरकार को सतर्क हो जाना चाहिए था। गुप्तचर एजेंसियों को काम पर लगा दिया जाना चाहिए था। पर करमापा तो मेहमान थे। मेहमान को कुछ भी कर गुजरने और किसी से भी मिलने-मिलाने की छूट दे दी गयी और उसी का नतीजा आज हमारे सामने है। खाली हाथ आया धर्मगुरु आज अरबों-खरबों में खेल रहा है और अतिथि शिष्टाचार की जंजीर से बंधे सरकारी हाथ दिखाने के तौर पर जिस तरह से धीरे-धीरे खुल रहे हैं उससे यह उम्मीद तो नहीं बंधती कि करमापा के मायाजाल का पूरी तरह से खुलासा हो पायेगा। करमापा के संदिग्ध मायाजाल ने यह संदेश तो दे ही दिया है कि अतिथि को देवता मानने का जमाना लद चुका है। वैसे यह भी हकीकत है कि अब तो साधु-संतों और भगवाधारियों को ईश्वर का दूत मानने में भी संकोच होने लगा है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कुछ धर्मगुरुओं का शैतानी चेहरा सामने आया है उससे जन आस्था भी बुरी तरह से आहत हुई है। साधु और शैतान में फर्क तलाश कर पाना टेढी खीर हो गया है। अपने ही देश की माटी के कई तथाकथित संन्यासियों से धोखा खाने और उनसे मोहभंग हो जाने के बाद देशवासी तो काफी हद तक सतर्क हो चुके हैं, पर इस देश को चलाने वालों के जागने का इंतजार है। चीन हिं‍दुस्तान का कैसा पडौसी है यह लिखने और बताने की जरूरत नहीं है। अगर करमापा चीन का भेजा हुआ कोई गुप्तचर है तो उससे भारत माता के प्रति वफादारी की उम्मीद करना बेवकूफी ही होगी। तो फिर ऐसों को देश में शरण देने और उनकी मेहमाननवाजी का एक ही मतलब है... देश के साथ धोखाधडी।

Thursday, January 27, 2011

हत्यारा मनोरंजन

देश के हर सजग नागरिक को पता है कि चीन भारतवर्ष के प्रति कटुता और शत्रुता की भावना रखता है। पर हमारे देश के उदारवादी हुक्मरान इस जगजाहिर हकीकत को भुला चुके हैं। दुश्मन देश की तिजोरियों को भरने के लिए हिं‍दुस्तान के दरवाजे पूरी तरह से खोल दिये गये हैं। चीन यहां पर हुछ भी बेचने और खपाने के लिए आज़ाद है। कानून भी उसका कुछ नहीं बिगाड सकता। यह चीन ही है जिसने भारत के घरेलू उद्योग में ऐसी जबरदस्त सेंध लगायी है कि यहां के छोटे उद्योगपतियों का तो जीना ही हराम हो गया है। जहां देखो वहां चीन का सामान बिक रहा है और सस्ता होने के कारण लोग भी बडे फख्र के साथ बेच और खरीद रहे हैं। विदेशी खिलौने बच्चों को इतने सुहाते हैं कि वे देशी खिलौने को हाथ भी नहीं लगाते। जब से अपने देश में चीनी खिलौने बिकने शुरू हुए हैं तब से लेकर आज तक कई बच्चों को अपने प्राण गंवाने पडे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो इन खिलौनों ने अनेकों बार कहर ढाया है। फिर भी लोग हैं कि इनमें बच्चों का मनोरंजन ढूढते हैं।खिलौनों की बिक्री और खरीदी का रोग तो पुराना पड चुका है। अब तो पतंग उडाने के लिए भी चीन की डोर यानी धागा आने लगा है। इस बार की मकर संक्रांति के मौके पर इस डोर ने कइयों की जीवन लीला ही समाप्त कर डाली। अकेले नागपुर जिले में ही चीनी मंजे ने सात-आठ प्राणियों के प्राण हर लिये और घायल होने वालों का आंकडा तीस के पार जा पहुंचा। पुणे की कंपनी में काम करने वाला एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर खरीददारी के लिए मोटर साइकिल से बाजार जा रहा था। उसकी शीघ्र ही शादी होने वाली थी। हर तरफ पतंगबाजी का उत्सव था। पतंगबाज घरों की छतों और मैदानों में चीनी डोर से पतंग उडा रहे थे। एक पतंग की डोर अचानक युवक के गले तक पहुंची और फिर उसकी तेज धार ने उसका गला ही काट डाला। युवक कुछ भी समझ नहीं पाया। घायल अवस्था में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उसकी मौत हो गयी। किसी के मनोरंजन ने किसी की जान ले ली और एक हंसता-खेलता परिवार मातम के आगोश में सिमट कर रह गया। उस इंजिनियर की तरह और भी जो लोग चीनी मंजे की बलि च‹ढे उनका आखिर क्या कसूर था? पंजाब के शहर अमृतसर में भी चीनी मंजे ने कइयों को घायल किया। एक राह चलते व्यक्ति की गला कट जाने के कारण मौत हो गयी। चीनी मंजे ने पतंगबाजों का भले ही भरपूर मनोरंजन किया हो पर बेकसूरों की जिस तरह से जानें गयीं उसकी चिं‍ता किसी ने भी नहीं जतायी। बता दें कि चीनी मंजे में लोहे के चूर्ण का इस्तेमाल होता है और यह इतना धारदार होता है कि जिस भी गले को छूता है वह लहूलुहान हुए बिना नहीं रहता। गले की नसें भी कट-फट जाती हैं। जब खून बहना शुरू होता है तो रुकने का नाम ही नहीं लेता। घायल व्यक्ति को यदि फौरन अस्पताल नहीं पहुंचाया गया तो मौके पर ही उसकी जान चली जाती है। इसके शिकार हुए व्यक्ति को सोचने समझने का मौका भी नहीं मिल पाता। अमृतसर में तो चीनी डोर को बेचने के आरोप में कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। पर नागपुर में बेचने और उडाने वालों को पूरी आजादी थी। इस मामले में गुजरात सरकार की तारीफ करनी पडेगी। वहां पर चीनी धागे को बेचने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया। अमृतसर में जो गिरफ्तारियां हुई वे भी खानापूर्ति जैसी थीं। यह गिरफ्तारियां धारा १८८ के तहत हुई। जिसके यकीनन कोई मायने नहीं होते क्योंकि इसमें फौरन जमानत मिल जाती है। नागपुर, अमृतसर, दिल्ली, पानीपत, करनाल, सोनीपत आदि में जिन पतंगबाजों के हाथों की खूनी डोर की वजह से राह चलते लोग घायल हुए और मारे गये उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। ऐसा भी नहीं है कि चीनी डोर की जानलेवा धार की खबर प्रशासन को नहीं थी। पर अपने यहां का प्रशासन तो अधिकतर वो लोग चलाते हैं जिन्हें तब दर्द होता है जब उनके अपनों की जान जाती है। नागरिकों की सुरक्षा की चिं‍ता न तो शासकों को रहती है और न ही सरकारी नुमाइंदों को। यह सच्चाई भी बेहद चौंकाने वाली है कि चीन में इस हत्यारी डोर पर प्रतिबंध लगा हुआ है। हिं‍दुस्तान में प्रतिबंध होने के बाद भी कितनी आजादी के साथ तरह-तरह के सामान बिकते हैं इसकी तो हर किसी को खबर है। ऐसे में चीन को दोष देना बेमानी है अभी तो चीन ने पतंग की डोर भेजी है। थोडा और सब्र कीजिए वहां से पिस्टलें, बंदूकें और बम-बारूद के जखीरे भी आने लगेंगे और बाजार में बिकते नजर आयेंगे। अंधे-बहरों के देश में यह तमाशा पता नहीं कैसे-कैसे रंग लायेगा।

Thursday, January 20, 2011

बापू के सपनों को साकार करने वाला गांव

क्या आप भारतवर्ष में किसी ऐसे गांव की कल्पना कर सकते हैं जहां के लोगों का गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध और अपराधियों से दूर-दूर तक नाता न हो? आपको इस सवाल के जवाब के लिए काफी देर तक माथा-पच्ची करनी पड सकती है तब भी जरूरी नहीं कि आप किसी ऐसे गांव का नाम बता सकें। भारत देश के प्रदेश महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में एक गांव है जिसका नाम है हिवरे बाजार। यह गांव वाकई देश की शान है जिसने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वराज, अपना राज के सपने को साकार किया है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि असली भारतवर्ष गांवों में बसता है पर आज देश के अधिकांश ग्रामों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। देश के अन्नदाता को बंधुआ मजदूर की जिं‍दगी जीनी पड रही है। रोजी-रोटी के लिए शहरों की तरफ पलायन करना पडता है। सूदखोरों और शोषकों ने गांव के गांव हथिया लिये हैं। हिवरे बाजार का चेहरा भी कभी बेहद बदरंग था। इस गांव की शक्ल पिछले बारह साल के अंदर ऐसी बदली है कि गांववासी हिवरे बाजार को मंदिर मानते हैं। साफ सुथरे पेय जल और सिं‍चाई साधनों से भरपूर इस गांव की सडकों पर गंदगी का नामोनिशान नहीं है। आपसी सद्भाव और एकता के तो कहने ही क्या...। यहां एक मात्र मुस्लिम परिवार रहता है उसके लिए भी गांव वालों ने मस्जिद बनवायी है। गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी और अशिक्षा ने यहां से कब का पलायन कर लिया है। हिवरे बाजार का चेहरा-मोहरा बदलने में जिस महापुरुष की प्रेरणा का ही एक मात्र योगदान है, वे हैं समाज सुधारक अन्ना हजारे। भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली जंग लडने वाले अन्ना हजारे अपने मूल गांव रालेगन सिद्धी का अभूतपूर्व कायाकल्प कर देश और दुनिया को दिखा चुके हैं कि महात्मा गांधी के असली अनुयायी होने के क्या मायने हैं। एक निच्छल और ईमानदार व्यक्ति की पहल ही ऐसा परिवर्तन ला सकती है जिससे सोये हुए लोग जाग सकते हैं और कुछ नया कर सकते हैं। अपने देश में ऐसी आदर्श शख्सियतों का नितांत अभाव है जिनसे युवा प्रेरणा ले सकें। अन्ना हजारे हिवरे बाजार के युवकों के प्रेरणा स्त्रोत बने और युवकों ने अपने गांव की तकदीर बदलने का फैसला कर लिया। कुछ जागरूक युवकों की निगाह से यह सच्चाई छिपी नहीं थी कि उनका गांव अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है। नेताओं ने पूरी तरह से आंखें मूंद ली थीं। हर कोई अपना घर भरने में लगा था। शिक्षक स्कूल से गायब रहते थे। बच्चों को पढाने-लिखाने की बजाय शराब के नशे में डूबे रहना उनकी आदत बन चुका था। हालात इतने बदतर हो गये थे कि नशेडी स्कूल मास्टर बच्चों से ही शराब बुलाकर पीते और स्कूल में ढेर हो जाते। युवकों ने अपने दिल की बात बुजुर्गों को बतायी। पहले तो वे तैयार नहीं हुए। बहुत समझाने पर हिवरे बाजार की ग्राम पंचायत की सत्ता एक वर्ष के लिए उन्हें सौंपी गयी। युवकों ने एक ही वर्ष में बुजुर्गों के साथ-साथ तमाम गांववासियों का दिल भी जीत लिया। पिछले बारह वर्षों से हिवरे बाजार की सत्ता युवकों के हाथ में है।आज की तारीख में हिवरे बाजार एक ऐसा आदर्श गांव बन चुका है जिससे दूसरे गांव वाले भी सीख लेते हैं। शिक्षकों ने नशे से तौबा कर ली है और वे बच्चों को दिल लगाकर पढाते हैं। हिवरे बाजार में सभी महत्वपूर्ण निर्णय मिल-बैठकर लिये जाते हैं। ग्राम सभा में हर व्यक्ति की बात सुनी जाती है। महिलाओं को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। ग्रामवासियों को पूरी ईमानदारी के साथ राशन उपलब्ध करवाया जाता है और अफसर रिश्वत मांगने की जुर्रत नहीं करते। गांव के हर आदमी को अपने गांव में ही काम मिलने लगा है और पलायन की बीमारी का नामोनिशान मिट चुका है। पहले जहां प्रति व्यक्ति सालाना आय मात्र आठ सौ रुपये थी आज वह ब‹ढकर अट्टाईस हजार रुपये तक पहुंच गयी है। यानी चार व्यक्तियों का परिवार साल भर में बडे आराम से एक लाख से ऊपर कमा लेता है। इस गांव में लाखों हरे-भरे पेडों की कतारें देखकर बाहर से आने वाला कोई भी शख्स आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रहता। गांव के इस खुशहाल और आदर्श रूप ने बाहरी लोगों को भी आकर्षित करना शुरू कर दिया है। लोग यहां आकर बसना चाहते हैं। पर गांव वालों का फैसला है कि बाहरी लोगों को जमीन नहीं बेची जाएगी। हिवरे बाजार में विकास की गंगा बहाने वाले युवकों के पारदर्शी कामकाज का ही परिणाम है कि यहां की ग्राम पंचायत के लिए चुनाव कराने की नौबत ही नहीं आती। जब चुनाव का समय आता है युवकों को निर्विरोध सत्ता सौंप दी जाती है। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविं‍द केसरी इस गांव की पंचायत की सर्वजन हितकारी कार्य प्रणाली को सराहते हुए कहते हैं कि दिल्ली में बैठे सत्ताधीशों को हिवरे बाजार से सीख लेनी चाहिए। वे तो यहां तक कहते हैं कि इस गांव में पैर रखते ही मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं किसी और देश में पहुंच गया हूं। पाठकों को यह पढ-सुनकर हैरानी भी हो सकती है कि एक समय ऐसा भी था जब यहां के पढे-लिखे युवक हिवरे बाजार का नाम लेने में भी शर्मिंदगी महसूस करते थे। जब देखो तब पुलिस वाले अपराधियों को दबोचने के लिए आ धमकते थे। पर आज न तो अपराध हैं और न ही अपराधी। इस गांव के हर बाशिं‍दे को अपने गांव पर इस कदर नाज़ है कि वह अपने नाम के साथ अपने गांव का नाम उपनाम के रूप में जोडकर गौरवान्वित होता है। भारतवर्ष की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के हाथों हिवरे बाजार को देश की सर्वश्रेष्ठ पंचायत का पुरस्कार भी हासिल हो चुका है।

Thursday, January 13, 2011

नैना...मधुमति और रूपम

एक औरत ने दिन-दहाडे बिहार के एक विधायक की हत्या कर दी। यह औरत एक शिक्षिका है। विधायक महोदय वर्षों से उसका यौन शोषण करते चले आ रहे थे। वह भी किन्हीं मजबूरियों के चलते शोषित होती चली आ रही थी। एक तरह से यह भी कह सकते हैं कि नेताजी के साथ बिस्तरबाजी करने से उसे खास परहेज नहीं था। दरअसल बात तब बिगडी जब अय्याश नेता उसकी जवान होती बेटी पर नजरें गढाने लगा। वह आग-बबूला हो उठी और उसने वो कदम उठा लिया जो अभी तक देह भोगी नेता उठाते चले आ रहे हैं। हां अभी तक तो हम और आपने सफेदपोश नेताओं के द्वारा निर्मम तरीके से मार दी गयी पत्नियों और प्रेमिकाओं की खबरें ही पढी हैं पर यहां तो एकदम उल्टा हो गया। अय्याश नेता को एक नारी ने मार गिराया। जिसने भी यह खबर पढी-सुनी वह हतप्रभ रह गया। भारतीय जनता पार्टी के विधायक की हत्यारी रूपम पाठक का कहना है कि उसने यह कदम बहुत सोच समझ कर उठाया है। महिला के अतीत के पन्नों में यह आश्चर्यजनक सच्चाई दर्ज है कि जब उसे पहली बार विधायक ने दबोचा और मनमानी की तो बदनामी के डर से उसने खामोशी ओडे रखी। फिर तो उसके साथ सिलसिला ही चल पडा। विधायक ने देह सुख की एवज में शिक्षिका को कई सुख सुविधाएं भी मुहैय्या करवायीं। रूपम पाठक एक पढी-लिखी महिला हैं, पढाती-लिखाती हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वह पुरुषों के नीयत को भांपना न जानती हों। कौनसी बदनामी के डर से वे तब चुप्पी साधे रहीं जब विधायक ने पहली बार उनकी अस्मत लूटी थी? उसे तो तभी शोर मचा देना चाहिए था जब नेता ने पहली बार उन पर हाथ डालने की जुर्रत की थी। इस किस्म के दुराचारी नेताओं के एक बार बडे हाथ फिर कभी पीछे नहीं हटते। उन्हें मां-बहन और बेटी की पहचान ही कहां होती है। वे तो सिर्फ अपनी भूख मिटाना जानते हैं। रूपम भी एक देह भोगी की हवस का जिस तरह से सहज निशाना बनी वो कोई नयी बात नहीं है। नयी बात तो यह है कि उसने हवसखोर नेता को मौत की नींद सुला कर एक नया अध्याय रचा है...।इसी देश में ऐसे राजनीतिज्ञ भी हुए हैं जिन्होंने बेरहमी की तमाम सीमाएं लांघने में कभी कोई संकोच नहीं किया। देश की राजधानी दिल्ली में कभी सुशील शर्मा का सिक्का चलता था। युवक कांग्रेस का नेता था वह। बहुत ऊपर तक पहुंच थी उसकी। सुशील शर्मा के वैभव और रसूख से प्रभावित होकर नैना साहनी नामक युवती ने पहले उससे प्यार किया फिर शादी भी कर ली। नैना साहनी उन महत्वाकांक्षी युवतियों में शामिल थी जो राजनीति में पांव जमाने के लिए नेताओं से सहर्ष रिश्ते जोडती हैं। २ जुलाई १९९५ के दिन युवा नेता सुशील शर्मा ने गोली मार कर नैना साहनी की हत्या कर दी। हत्या के बाद भी जब उसका जी नहीं भरा तो उसने उसके टुकडे-टुकडे कर तंदूर में मुर्गे की तरह भूनकर इंसानी दरिंदगी का वो चेहरा पेश किया जिसे देख-सुनकर लोग दहल उठे। दरअसल सुशील शर्मा को अपनी पत्नी पर शक हो गया था कि उसके दूसरे मर्दों के साथ भी अवैध संबंध हैं। कई युवतियों के साथ जिस्मानी ताल्लुकात रखने वाले सफेदपोश नेता ने सिर्फ शक के चलते ही अपनी पत्नी का वो हश्र कर डाला कि मानवता भी कांप उठी। इस कांड से उन महिलाओं को शिक्षा लेनी चाहिए थी जो राजनीति में किस्मत आजमाने के सपने देखा करती हैं और हर नेता को फरिश्ता मान लेती हैं। इस दानवी कृत्य के बाद भी न जाने कितनी महत्वाकांक्षी युवतियां सफेदपोश भेडि‍यों के चंगुल में फंस कर बर्बाद हुई और कई तो बे-मौत मारी भी गयीं।अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब पूरे देश में उत्तरप्रदेश के एक अय्याश विधायक अमरमणि त्रिपाठी के मोहपाश में फंसकर जान गंवाने वाली मधुमिता का हैरतअंगेज तूफानी किस्सा गूंजा था। मधुमिता भी हद दर्जे की महत्वाकांक्षी युवती थी। वीर रस की कविताएं लिखा करती थी। खूबसूरत भी थी। देश के विभिन्न शहरों में होने वाले कवि सम्मेलनों में शिरकत करती रहती थी। ऐसे ही किसी कार्यक्रम में अमरमणि त्रिपाठी की नजर उस पर पडी और फिर दोनों को जिस्मानी तौर पर एक होने में देरी नहीं लगी। विधायक त्रिपाठी ने मधुमिता को ऐसे-ऐसे सपने दिखाये कि वह अपना अच्छा-बुरा भूल गयी। वह एक भावुक कवियत्री थी। राजनीति की अंधी गलियों में चलने वाले कर्मकांडो का भी उसे पूरा ज्ञान था। पर उसके मन में तो दौलत से खेलने और राजनीति के क्षेत्र में चमकने का सपना पल रहा था। खूबसूरत नारियों की देह को भोगने के अभ्यस्त हो चुके अमरमणि ने मधुमिता को दो बार गर्भवती बनाया और तीसरी बार जब फिर यह नौबत आयी तो मधुमिता विद्रोह पर उतर आयी। नेता संग सात फेरे लेने की जिद करने लगी। नेता के घर में पहले से ही एक पत्नी विराजमान थी। वैसे भी नेताओं को विद्रोह कभी रास नहीं आता। मधुमिता का काम तमाम कर दिया गया। देश भर में हो-हल्ला मचा। विधायक को जेल हो गयी। एक होनहार कवियत्री दास्तां बन कर रह गयी। कविता, शशि, शारदा, अनुपमा आदि... आदि न जाने कितनियों की कतार है जो राजनेताओं के करीब गयीं और फिर कब्र में पहुंचा दी गयीं। उनकी सारी महत्वाकांक्षाएं धरी की धरी रह गयीं। वे अगर अनपढ और गंवार होतीं तो बात आयी-गयी हो जाती। एकाध को छोडकर अधिकांश जानती समझती थीं कि वेश्या बन चुकी राजनीति के गलियारे में साधू कम और दुर्जन ज्यादा हैं। फिर भी उस जाल में जा उलझीं जिससे निकल पाना आसान नहीं होता। नैना भून दी गयी और रूपम ने भून डाला। रूपम, नैना, मधुमिता आदि के प्रति सहानुभूति दिखाने वालों की भीड को देखकर मन में यह विचार भी कौंधता है कि इनके प्रति इतनी अंधी सहानुभूति क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि यह महिलाएं हैं? क्या इनकी अमर्यादित भूल कोई मायने नहीं रखती? औरत होने भर से अगर यह दया और सहानुभूति की पात्र बनती रहेंगी तो बात और बिगडेगी।

Thursday, January 6, 2011

देवता बीमार है

२०१० की विदायी तो हो चुकी है परंतु उसके द्वारा छोडे गये कई सवालों के जवाब २०११ को ही देने हैं। सबसे बडा सवाल भ्रष्टाचार का है जिसने देश की नस-नस को जकड लिया है। सियासियों और नौकरशाहों में ईमानदारों की तलाश कर पाना बेहद मुश्किल हो गया है। जिसे देखो वही कटघरे में खडा नजर आ रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वाले भी मुखौटे में कैद नजर आते हैं। ऐसे विकट दौर में कुछ चेहरे हैं जो तूफानों में आशा के दीप थामे हुए हैं। बिहार चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज हासिल करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भ्रष्ट नौकरशाहों की अक्ल ठिकाने लगाने के लिए अपने हाथ में हंटर थाम लिया है। उनका दावा है कि यह हंटर किसी भी भ्रष्ट नौकरशाह को नहीं बख्शेगा। अपने पिछले शासन काल में अफसरशाही की मनमानी और भ्रष्ट आचरण से रूबरू होने के बाद ही उन्होंने यह अभूतपूर्व निर्णय लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए पर बिहार में भ्रष्टाचारियों को पनपने और जीने नहीं देंगे। देश का प्रदेश बिहार लालू मार्का नेताओं के शोषण और लूटपाट का वर्षों तक शिकार होता रहा है। जनता ने ऐसे भ्रष्ट नेताओं को पूरी तरह से नकार कर जब नीतीश कुमार को बागडोर सौंपी है तो वे भी कुछ कर गुजरना चाहते हैं। वे जानते हैं कि बिहार को बरबाद करने में नौकरशाही ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी। राजनेताओं और अफसरों ने एकजुट होकर प्रदेश को लूटा-खसोटा है। जनता को हर काम के लिए रिश्वत देनी पडती है। नीचे से ऊपर तक सबसे रेट तय हैं। नीतीश कुमार के द्वारा भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने की मुहिम के चलते सरकारी महकमों में हडकंप-सा मच गया है। प्रदेश में भ्रष्टाचार की परंपरा को निभाने वाले अफसरों और कर्मचारियों को धडाधड रंगे हाथ पकडने के अभियान में अभूतपूर्व तेजी लायी जा चुकी है। नीतीश के तेवर बता रहे हैं कि उन्होंने कथनी और करनी में एकरूपता लाने की कसम खा ली है। जिन्हें दबोचा जा रहा है उनकी संपत्तियों को जब्त कर वहां पर स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोले जा रहे हैं। नीतीश सरकार भ्रष्ट नौकरशाहों की शिनाख्त करने के बाद उनकी सूचियां बनाने में भी दिमाग खपा रही है क्योंकि भ्रष्टाचार की बदौलत करोडपति और अरबपति बनने वालो की बहुत बडी संख्या है। सभी सरकारी अफसरों को अपनी संपत्ति की जानकारी देने के आदेश दे दिये गये हैं। साथ ही उन्हें हिदायत दी गयी है कि वे प्रतिवर्ष अपनी संपत्ति की जानकारी पेश करना न भूलें। जो लोग अपनी संपत्ति का खुलासा करने में आना-कानी कर रहे हैं उनके वेतन रोकने के सख्त निर्देश भी दे दिये गये हैं।कहते हैं कि दूसरों को सुधारने से पहले खुद का पाक-साफ होना निहायत जरूरी है। नीतीश कुमार ने भी अपनी तथा अपने बेटे की संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है। नीतीश के तेवर अगर ठंडे नहीं प‹डे तो शीघ्र ही भ्रष्ट विधायकों और मंत्रियों की भी शामत आ सकती है। अपनी ही बिरादरी पर हंटर बरसाना और उसके होश ठिकाने लगाना आसान काम नहीं है। पर उन्हें इस अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण होकर दिखाना होगा। अन्यथा सब कुछ तमाशा बनकर रह जायेगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ नीतीश की पहल अगर रंग लायी तो यकीनन बिहार का चेहरा-मोहरा बदलने में समय नहीं लगेगा। बिहार तेजी से विकास के पथ पर दौडता नजर आयेगा और देश के दूसरे राज्यों के मुखिया भी अपने आप को बदलने को विवश हो जाएंगे। सबको खबर है कि देश के साथ-साथ लगभग हर प्रदेश भ्रष्टाचार के रोग के चंगुल में जकडा हुआ है। यही वो बीमारी है जिसने हिं‍दूस्तान को लगभग खोखला करके रख दिया है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद रह चुके फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र से जब यह पूछा गया कि क्या वे फिर से राजनीति में सक्रिय होना चाहेंगे? उनका जवाब था कि कौन उल्लू का पट्ठा चुनावी राजनीति में लौटेगा। तय है कि उम्रदराज नायक ने राजनीति के गंदे चेहरे को इतने करीब से देखा और समझा है कि उसे राजनीति से ही घृणा हो गयी है। उन जैसे और भी न जाने कितने हैं जिनके लिए राजनीति के रंग-ढंग वेश्या से भी बदतर हैं। वेश्या का तो कहीं न कहीं कोई ईमान धर्म होता है पर राजनीति का तो कोई ईमान-धर्म ही नहीं रहा। अभिनेता का यह भी मानना है कि आज भारत माता को मां नहीं समझा जाता। जिस दिन सियासी दलों ने भारत माता को अपनी मां समझकर इसकी सेवा शुरू कर दी, देश अपने आप स्वर्ग बन जायेगा। अक्सर यह सोचकर मन दहल जाता है कि यह कैसा राष्ट्र है और कैसे-कैसे इसके कर्ताधर्ता हैं। एक दूरसंचार मंत्री हजारों करोड का घोटाला बडी आसानी से कर गुजरता है और प्रधान मंत्री की चुप्पी पर सुप्रीम कोर्ट को सवाल उठाना पडता है? विश्व के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश के कर्णधारों की अकर्मणयता और बेबसी यह पंक्तियां एकदम सटीक बैठती हैं: ''आस्था का जिस्म घायल, रूह तक बेजार हैक्या करे कोई दुआ, जब देवता बीमार है।''यकीनन अपने देश के बडे विचित्र हालात बन चुके हैं। घपलेबाजों ने आसमान का भी सीना चीर कर रख दिया है। यहां जब एक मधु कोडा पकड में आता है तो फौरन चार हजार करोड की हेराफेरी सामने आती है। राष्ट्रमंडल खेलों में हुआ आठ हजार करोड से अधिक का घोटाला देशवासियों के मुंह पर तमाचा-सा जड देता है और चीख-चीख कर बताता है कि यह देश राजनीति के खिलाडि‍यों के हाथों की कठपुतली बन चुका है। ऐसी न जाने कितनी हेराफेरियां होती रहती हैं। एकाध का ही पर्दाफाश हो पाता है बाकी मौज उडाते रहते हैं। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की जडों को काटने के लिए कोई सामने नहीं आता। ऐसे में नीतीश कुमार ने उम्मीद तो जगायी है। देखते हैं क्या होता है...।