Thursday, August 27, 2026

नक्सली-नक्सली

 कुछ शातिर चेहरे देश में गहरी गड़बड़ और उठापटक करने के सपने देख रहे हैं। दरअसल, जब से कर्मठ माननीय नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तभी से ऐसे लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है। इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य के संकल्पों की बात करते-करते ‘दिमागी नक्सल’ से सतर्क और सावधान करने की अपील क्या की, कि राई का पहाड़ बनाने वाले सफेदपोश उछल-कूद मचाने लगे। उन्होंने तो किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कहावत तो कुछ ऐसे चरितार्थ हुई कि क्या कहें? स्वघोषित नक्सलियों की कतार लग गई। आतंकवाद, नक्सलवाद, आतंकवादी, नक्सलवादी, देशद्रोही जैसे शब्द कोई नये शब्द नहीं हैं। नक्सलवाद के राष्ट्रद्रोही खूनी वार को भारत माता ने अनेकों वर्षों तक झेला है। खुद को बड़े गर्व के साथ नक्सली तथा माओवादी कहने-कहलवाने वाले कोई गैर नहीं अपने ही थे। लेकिन थे तो दुश्मन से बदतर ही। उनका खात्मा करने के लिए सरकार ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। अंतत: सफलता भी पायी। हालांकि अव्यवस्था और तनाव बढ़ाने वाले नक्सलियों के कुछ अंश अभी भी बचे हुए हैं। जंगलों में कम, शहरों में ज्यादा।

नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवादी गांव से हुई थी। इसी गांव के नाम पर इसे नक्सलवाद नाम दिया गया। चीनी साम्यवादी नेता माओत्सो तुंग की विचारधारा से प्रेरित वामपंथी नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे आदिवासी और किसान नेताओं को जब लगा कि भारत में सामंती सोच रखने वाले जमींदारों के द्वारा गरीब, किसानों तथा आदिवासियों का इस कदर शोषण और अन्याय किया जा रहा है, जिससे वे भुखमरी और तमाम बदहाली से जूझ रहे हैं तो उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत की। हथियारबंद क्रांति के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रारंभ हुआ, यह आंदोलन बंगाल से निकलकर धीरे-धीरे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्रप्रदेश के आदिवासी इलाकों में तेजी से फैलते हुए सरकारों के लिए सिरदर्दी और गहन चिंता का विषय बनता गया। 

जब नक्सलवाद के संस्थापकों की एक-एक कर मौत हो गई तो जो बचे और नये-नये जुड़े थे उनमें आदिवासियों की चिंता कम और खुद के कल्याण की भावना घर करती गई! भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों की तरह उन्होंने भी शहरों में बंगले बना लिये, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेशों में भेजना प्रारंभ करते हुए किसानों तथा आदिवासियों के बच्चों को अनपढ़ बनाये रखते हुए बंदूकों और बारूदों के बीच मरने-मारने के लिए छोड़ दिया। समय बीतने के साथ-साथ नक्सली नेता ही आदिवासियों को न्याय दिलाने की बजाय उन पर जुल्म ढाने लगे। उन पर दबाव डाला जाने लगा कि वे अपने बच्चों को उनके हिंसक आंदोलन से जोड़ें। खुद भी तन-मन और धन से साथ दें। आदिवासियों के हित के लिए निर्धारित सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधाएं खड़ी की जाने लगीं। ठेकेदारों, व्यापारियों, नेताओं तथा उद्योगपतियों को डरा-धमकाकर मोटी धन-वसूली कर धड़ाधड़ हथियार खरीदे जाने लगे और पुलिस, सुरक्षा बलों तथा आम जनों को मौत के घाट उतारा जाने लगा। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा तथा महाराष्ट्र के अंदरूनी क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, सड़कें न बन पाएं तथा विकास कार्य ठप रहें, इसके लिए तरह-तरह के अड़ंगे डाले गये। खून-खराबा भी किया गया, जिससे बड़ी-बड़ी कंपनियां निवेश करने से बचती रहीं। इससे देश को अत्याधिक आर्थिक नुकसान हुआ। आदिवासी इलाकों में जो विकास कार्य होने चाहिए थे वे कई वर्षों तक ठिठके और पूरे तरह से थमे के थमे रहे। सड़कों, पुलों और रेल लाइनों को बारूदों से उड़ाने वाले दुर्दांत नक्सली यही चाहते थे कि जंगली इलाकों में रहने वाले लोग विकास से अछूते रहकर सरकार को कोसते हुए उनके इशारों पर ही नाचते रहें। वर्षों तक हुआ भी यही। सुरक्षा बलों को नक्सलियों तक पहुंचने में अनेकों तकलीफों तथा संकटों का सामना करना पड़ता था। सुरक्षा बलों की योजना और तैयारी की नक्सलियों को पहले ही खबर लग जाती थी। उन्हें सतर्क कर दिया जाता था। इस काम में उन्हें उन लोगों का साथ और सहयोग मिलता था, जिन्हें जान से हाथ धोने का भय दिखाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता था। अर्बन नक्सली भी इस ‘राष्ट्रद्रोही’ कृत्य में खासी भूमिका निभाते थे। दरअसल, नगरों-महानगरों में अय्याशी कर रहे शहरी नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की शहादत पर हमेशा शर्मनाक मौन साधे रखा और हत्यारे नक्सलियों की मौत पर ज़ार-ज़ार आंसू बहाए और नंग-धड़ंग होकर मानवाधिकार के ढोल पीटे। नक्सलियों ने आधी-सदी तक भारत माता को आहत करते हुए चार हजार आदिवासियों तथा अन्य निर्दोषों की जानें ले लीं। अनेकों को तो इस शक में मार डाला गया कि वे पुलिस के मुखबिर हैं। लगभग साढ़े तीन हजार पुलिस व सुरक्षा बल के जवानों की शहादत पर भी बुद्धिजीवी अर्बन नक्सली कभी कुछ नहीं बोले। इनकी आंखों के सामने ही घने जंगलों में स्थित स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, रेलमार्गों तथा बिजली जैसी विकास परियोजनाओं को बम से उड़ाकर नुकसान पहुंचाया गया। हजारों गरीब आदिवासी नवयुवकों, युवतियों, बच्चों के भविष्य पर डाका डाला गया, कई परिवार तबाह हुए, उजड़े, बिखरे, बार-बार प्रताड़ित हुए लेकिन आतंकवादियों के यह शुभचिंतक सरकार को ही कसूरवार ठहरा कर केवल और केवल उसे ही कोसते रहे। 

पूर्व की केंद्र की सरकारें ढुलमुल नीति अपनाते हुए खून-खराबा देखती रहीं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने दृढ़ निश्चय किया कि किसी भी हालत में भारतवर्ष से नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया करके दिखाना है। केंद्रीय सुरक्षा बलों और पुलिस ने दिन-रात घने जंगलों में आक्रामक अभियान चलाते हुए नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को नेस्तनाबूत करने का ऐसा तीव्र अभियान चलाया कि नक्सलियों के कमांडरों के हौसले पस्त होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। मुठभेड़ों में कई कुख्यात और शीर्ष कमांडर मौत के घाट उतार दिए गए। बचे-खुचे कमांडरों ने अपने दल-बल के साथ आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। अब तो हजारों नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करते हुए मुख्य धारा में लौट आये हैं। जो नाममात्र के बचे हैं वे भी आत्मसमर्पण की तैयारी में हैं। सरकार का दावा है कि नक्सलवाद नामक कलंक का लगभग अंत हो गया है। सरकारी दावे में बहुतेरी सच्चाई भी नज़र आने लगी है। अनेकों नक्सली जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, खेतों, कारखानों तथा अन्य ईमानदारी और मेहनत के कामों में लगकर सामान्य जीवन जीने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें बहुत सुखद लग रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र के शत्रु, हत्यारे नक्सलियों के दबाव और प्रलोभन ने उन्हें दिशाहीन कर दिया था। काश! ऐसा पहले हो जाता तो उनकी जिन्दगी के कई वर्ष यूं ही बरबाद नहीं होते। वे भी सभी अमन पसंद देशवासियों की तरह इज्जत और शान-शौकत भरा जीवन जी पाते। 

जंगलों से तो नक्सलियों का सफाया हो गया, लेकिन शहरों में जो स्वघोषित नक्सली सीना ताने घूम रहे हैं उनके काम करने का ढंग काफी जाना-पहचाना है। यह लोग विश्वविद्यालयों और इधर-उधर के बौद्धिक मंचों पर विराजमान होकर माओवाद या हिंसक उग्रवाद की विचारधारा का समर्थन करते हुए भारत माता के खिलाफ माहौल बनाने में सतत प्रयत्नशील हैं। राष्ट्रद्रोही तत्वों के सुर में सुर मिलाने वाले इन लोगों में सत्ता का सुख भोगने की जबरदस्त बेचैनी और तीव्र लालसा है। इस सच से इंकार नहीं कि सत्ता और व्यवस्था के प्रति कई लोगों में नाराजगी है। अनेकों भारतीय गुस्से में हैं लेकिन फिर भी वे बड़े संयम और अदब के साथ अपना विरोध प्रकट करते रहते हैं। उनके मन में कभी भी हिंसा और बंदूक उठाने का विचार नहीं आया। सत्ता और व्यवस्था से असहमत और नाराज होकर सड़कों पर उतरने वाले सभी लोगों को नक्सली नहीं कहा जा सकता। जिनके पास दिमाग है वे बोलेंगे भी और विरोध भी दर्शायेंगे। लेकिन उन्होंने कभी देश के प्रधानमंत्री को कभी गंदी-गंदी गालियां नहीं दीं। आज की युवा पीढ़ी देश में बदलाव चाहती है। उसके मन-मस्तिष्क में ऐसे हिंदुस्तान की तस्वीर है जहां हर नागरिक खुश और संतुष्ट हो। नेता केवल नारेबाजी न करते हुए समाज के हर वर्ग की ईमानदारी से सेवा करें और उनकी तकलीफों को जान-समझकर उनका समाधान भी करें। जब तक देश की मूल समस्याओं का हल नहीं निकलेगा तब तक युवा बेचैन रहेंगे और सड़कों पर उतरते रहेंगे। उन्हें दिशाहीन करने के षडयंत्र भी रचे जा रहे हैं।  देशप्रेमियों की भीड़ में कई ऐसे शातिर लोग भी है, जो खुद घातक हथियार नहीं उठाते लेकिन हथियार दिलाते और उकसाते रहते हैं। यही लोग देश के लिए खतरा बने हुए हैं। दरअसल, भारत की राजनीति में कई ऐसे सत्तालोलुपों का जमावड़ा हो गया है। जिन्हें जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। उन्हें यह बात भी समझ आ गई है कि उनकी पोल पूरी तरह से खुल चुकी है। उनका हर नकाब तार-तार हो चुका है। लेकिन फिर से सत्ता पाने की चाह अभी भी बनी हुई है। इसके लिए वे छात्रों तथा युवाओं के जायज आंदोलनों में बिन बुलाये पहुंचते हुए उनके कान में हिंसा और खून-खराबे का मंत्र भी फूंक रहे हैं। यह दिमागी नक्सली उन युवाओं को भी अपने रंग में रंग देना चाहते है जो अभी तक सियासती छल-कपट से दूर हैं। यह  कतई न भूलें कि अर्बन नक्सली वही कलंकित चेहरे हैं जो आतंकवादियों को बचाने के लिए आधी रात में अदालत के दरवाजे खुलवाते हैं और देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों को गले लगाते हैं। उनकी बस यही मंशा है कि जिस तरह से बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं और छात्रों (जेन-जी) ने हिंसक आंदोलन कर सत्ता परिवर्तन या तख्ता पलट किया है। वैसे ही कुछ भारत में भी हो जाए और उनकी फिर से लूटपाट और मौज ही मौज हो जाए।

Thursday, August 20, 2026

सांप और सपेरे

 जनहित के लिए शासन के द्वारा अनेकों योजनाएं चलायी जाती हैं, लेकिन कुछ नेता, मंत्री, भ्रष्टाचारी प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी अपनी करतूतों से बाज नहीं आते। सरकार की सारी मेहनत को अपने लालच की भेंट चढ़ा देते हैं। बहुत कम होता है जब अखबारों तथा न्यूज चैनलों में राजनीतिज्ञों तथा ऊंचे ओहदों पर विराजमान अफसरों के बेलगाम भ्रष्टाचार की खबरें धमाचौकड़ी न मचाती दिखाई देती हों। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत को निर्लज्जता से साकार करते यह ऐसे बेरहम कफन चोर लुटेरे हैं, जिनमें किंचित भी इंसानियत नहीं बची। इनका ज़मीर पूरी तरह से मर-खप चुका है। महाराष्ट्र सरकार ने नवजात शिशुओं को कुपोषण से मुक्त तथा स्वस्थ रखने के उद्देश्य से कई योजनाएं बनायी हैं।

उन्हीं में से ही एक सुविधाजनक योजना है, जिसके अंतर्गत सरकार ने कामकाजी तथा यात्रा करने वाली माताओं को सार्वजनिक स्थानों पर अत्यंत सुरक्षित, स्वच्छ और एकांत स्थान प्रदान कराने के उद्देश्य से ‘हिरकणी कक्ष’ अर्थात स्तनपान कक्ष निर्मित करवाने का निश्चय किया, जहां माताएं सुरक्षित तरीके से नवजातों को स्तनपान करा सकें या भविष्य के उपयोग के लिए स्तन के दूध को निकालकर संग्रहित कर सकें। मातृ एवं शिशु संरक्षण की इस सरकारी योजना को एक क्रांतिकारी कदम मानते हुए सभी ने सराहना की थी लेकिन जन्मजात भ्रष्टाचारियों ने इस पवित्र सेवा कार्य में भी घोर बेइमानी कर शैतान होने का पक्का सबूत दे दिया। महाराष्ट्र में स्थित गोंदिया जिले में 18 स्थानों पर हिरकणी कक्ष स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इन कक्षों में माताओं को किसी तरह की असुविधा न हो, इसी उद्देश्य से बेहतरीन साज-सज्जा के साथ आरामदायक सुविधाएं प्रदान करने क निर्णय लिया गया। लेकिन यहां भी भ्रष्टाचार की बेखौफ होकर परंपरा निभायी गई। अनाड़ी से अनाड़ी आदमी को भी पता है कि प्लास्टिक की अच्छी से अच्छी कुर्सी हजार, डेढ़ हजार में आ जाती है लेकिन सरकारी ठगों ने एक कुर्सी की खरीदी की कीमत चौंतीस हजार, लोहे के तीन से पांच हजार रुपए में मिलने वाले पलंग पंद्रह हजार, चार-पांच हजार की कीमत वाले वॉशबेसिन नब्बे हजार तो बीस से पच्चीस हजार में आसानी से मिलने वाले वातानुकूलित यंत्र का एक लाख रुपये का बोगस खरीदी मूल्य दर्शाया। इतना ही नहीं कॉटन के पर्दों, टीवी, बच्चों के खिलौनों आदि की भी कई गुणा अधिक कीमत दर्शा कर जो महाघोटाला किया, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि  प्रशासनिक क्षेत्र में कितनीऔर कैसी-कैसी धांधली और लूटमार मची है।

महाराष्ट्र के गड़चिरोली जिले में स्थित जपतलाई गांव में स्थित एक आदिवासी स्कूल में बिस्तर न होने के कारण ज़मीन पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया। तीन छात्राओं की मौत हो गई और तीन को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। सरकारी सहायता प्राप्त इस आवासीय स्कूल को कांग्रेस के नेता द्वारा चलाया जा रहा था। जब यह घटना घटी तब वहां पर कोई वॉर्डन मौजूद नहीं था। उस दिन सुबह ही ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया गया था और रात को यह जानलेवा कांड हो गया। छात्राओं की मौत के बाद प्रशासन नींद से जागा। लीपापोती भी शुरू हो गई। अभिभावक सांपों के खौफ से अपने बच्चों को घर लेकर चले गये। मात्र छह छात्र ही बचे रह गये। यह स्कूल 1992 में प्रारंभ हुआ था। लगभग ढाई सौ विद्यार्थियों वाले इस स्कूल के सभी बच्चे-बच्चियों के सोने के लिए पलंग का इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा गया। स्कूल के एक शिक्षक ने मुंह खोला कि प्रिंसिपल महोदय के समक्ष उन्होंने इस समस्या को उठाया था लेकिन वे आनाकानी करते रहे। वैसे भी नेताजी का स्कूल होने के कारण वे बेफिक्र और मदमस्थ थे। नियमों का पालन करने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं था। उन्हें तो बस सरकारी अनुदान की मोटी राशि को खाने-पचाने की जल्दी थी। रात को भी कमरे की खिड़की खुली रहती थी और इसी खिड़की से ही सांप अंदर आया। इससे पहले भी सरकारी आश्रम शालाओंं तथा अनुदान प्राप्त स्कूलों में सांप के काटने से कई छात्र-छात्राओं की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन घटना से सबक लेने की पहल नहीं की गई और यह हत्याएं हो गईं। हां यह हत्याएं ही हैं। यदि संपन्न परिवारों के बच्चे ऐसी मौत मरें तो आसमान पर सिर पर उठा लिया जाता है। यह तो गरीब आदिवासियों के बच्चे हैं। गंभीर बीमारियों तथा चिकित्सा के अभाव में अनेकों बच्चे मारे जा चुके हैं। इनका किसी के लिए कोई मोल नहीं। सरकार ने हर बार की तरह मृत छात्राओं के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता तथा मुख्यमंत्री राहत कोष से भी इतनी ही राशि देकर यह मान लिया कि उनकी पीड़ा का अंत हो गया, समस्या टल गई, लेकिन क्या यह संभव है? अब तो यह सवाल ही बेमानी है कि आदिवासियों के विकास के लिए सरकारें आश्रमशालाओं, अस्पतालों के लिए जो करोड़ों रुपये का अनुदान देती हैं, वह पैसा आखिर जाता कहा है? यह भी काबिलेगौर है कि इंसानी सांपों की दुष्टता, नीचता, भेदभाव और मारने-काटने की वजह से भी कई आदिवासी बच्चे खुदकुशी करने तक को मजबूर हो चुके हैं। कइयों ने तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ी और अपने-अपने घर चल दिए। गरीब मां-बाप ने भी अपनी संतानों को असुरक्षा और अव्यवस्था के चंगुल से बाहर निकाल कर अनपढ़ रखने में ही भलाई समझी। सरकार तो यह मानकर चलती है कि राजनेता, मंत्री, समाजसेवक आदि जब आदिवासी इलाके में आश्रमशाला और अस्पताल चला रहे हैं तो ईमानदारी से अपना फर्ज निभायेंगे। वह तो अनुदान यानी आर्थिक सहायता करने में भी कोई कमी नहीं करती लेकिन भ्रष्टाचारी सांप और सपेरे-लुटेरे अपनी फितरत से बाज नहीं आते।  जब भी ऐसा कोई हत्याकांड सामने आता है तो राजनीति भी शुरू हो जाती है। पक्ष और विपक्ष के शातिर नेता अपने-अपने आदमी की पैरवी पर उतर आते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता है। यहां तो न्यायाधीशों तक के चेहरों पर शर्मनाक कालिख पुती है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक निवास, 30 तुगलक क्रीसेंट, नई दिल्ली के स्टोर रूम में 14 मार्च, 2025 की रात आग लगने के पश्चात जब दमकल विभाग के कर्मचारी पहुंचे तो उन्हें स्टोर रुम में बोरियों में भरे 500-500 रुपये के नोट मिले, जिनमें से काफी नोट जल गए थे। सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ वायरल हुए वीडियो में भी बड़ी मात्रा में अधजली भारतीय करंसी नोट दिखायी दे रही थी, लेकिन भारत के इस महान न्यायाधीश ने एक स्वर में तन कर कहा कि इन बोरों में भरे करोड़ों रुपयों से मेरा कोई वास्ता नहीं! अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया पर ‘दागी’ साहब बहादुर कई हफ्ते तक छाये रहे लेकिन क्या मजाल कि सच उगल देते। उन्हें लगा था मामला रफा-दफा हो जायेगा। कुछ महीनों के बाद लोग भूल-भाल जाएंगे, लेकिन सजग भारतवासी अड़ गये कि गहन जांच कर सच सामने लाया ही जाना चाहिए। अंतत: तीन न्यायाधीशों का एक जांच पैनल गठित किया गया, जिसने अनेकों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही तथा अन्य जानकारियों के आधार पर यही निष्कर्ष पेश किया कि जज यशवंत वर्मा गुनहगार है। कानून तो कहता है कि, ऐसे अपराधी के साथ नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिए। न्याय की कुर्सी पर विराजमान होने वाले सम्मानित शख्स के यहां नोटों से भरे बोरे रखे हों और उसको पता ही न हो, यह कैसे हो सकता है? अभी तक तो हम देखते और सुनते आये थे कि रिश्वत लिफाफों तथा अटैचियों में ली जाती है, लेकिन अब बोरों में भर-भरकर ली जाने लगी है! वो भी उस देश में जहां गरीबी, बदहाली, बेरोजगारी से करोड़ों देशवासी हैरान परेशान हैं। छात्रों को आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। अब देश के युवा पूरी तरह जाग गये हैं। उनकी समझ में आ गया है कि, व्यवस्था में कैसी धांधली चल रही है। नेताओं, अफसरों ने अपने बच्चों के हित को हमेशा प्राथमिकता दी है। गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा का घोर अभाव है। लाखों रुपये की फीस और डोनेशन होने के कारण उनके लिए डॉक्टर, इंजीनियर बनना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। उनके लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद हैं। किसे नौकरी देनी है, यह लगभग पहले से ही तय हो जाता है। सरकारी धन के लुटेरे अपने बच्चों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते हैं, उन्हें लाखों-करोड़ों का खर्च कर देश के बाहर पढ़ाते हैं। इन मतलब परस्तों को कितना भी कोसा और लताड़ा जाए, गालियां दी जाएं, लेख लिखे जाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता। बेशर्मों की चमड़ी बहुत मोटी है...

आप और हम भी बहुत गंभीरता से चिंतन मनन करें कि कोई अपराधी न्याय का पक्षधर कैसे हो सकता है? अपराधी तो अपराधी से दोस्ती निभाएगा। उसी का साथ देगा। पहले भी कुछ न्यायाधीश अपराध कर्म में लिप्त पाये गये हैं लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है। उल्टे पुरस्कारों से नवाजा गया है। दरअसल जिस तरह से अच्छी-खासी इमारत को दीमक अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं, वैसे ही नेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, अफसरों  की भ्रष्ट मंडली विभिन्न सरकारी योजनाओं के करोड़ों-अरबों रुपये अपनी तिजोरियों के अंदर कर  चुकी है, सतत कर रही है। धोखे से काटने और जान लेने वाले सांप तो फिर भी नज़र आ जाते हैं, लेकिन दूर बैठे सपेरे पर्दे के पीछे छिपे रहते हैं। यही सपेरे ही बीन बजाकर सांपों को नचाते और किसको कैसे और कब डसना है बताते और समझाते हैं... 

Thursday, August 13, 2026

आत्म मंथन

 कहने को तो लघुकथा के मायने हैं, छोटी कहानी। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि छोटी कथा में लेखक अपनी पूरी बात कैसे रख सकता है। निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए तो बहुतेरा शब्दजाल भी बुनना पड़ता है? इसका उत्तर देती हैं ऐसी कई लघुकथाएं, जिनमें विस्तार, फैलाव और इधर-उधर की बातों में बिना उलझे मानव के जीवन में समय-समय पर सर उठाकर खड़े हो जाने वाले अवरोधों, पीड़ा, चिंताओं और तनावों के गहरे सत्य की अत्यंत प्रभावी तस्वीर पेश की गई है। 

लघु कथा लेखन में वर्षों से लगे एक प्राध्यापक साहित्यकार का मानना है कि लघुकथा लिखने में अनेकों चुनौतियां होती हैं। बहुत कम स्पेस में बहुत कुछ कहना होता है। इन दोनों के समीकरण को साध लेने का ही परिणाम होती है, पूर्णता प्राप्त लघु कथा। आकार में छोटी लेकिन अत्यंत असरकारी  लघुकथाओं को पढ़ते-पढ़ते पाठक लेखक की पैनी निगाह और यथार्थ को व्यक्त करने के अंदाज से हतप्रभ होने के साथ चौकन्ना भी होता चला जाता है। हमारे देश में इनदिनों सत्ता और राजनीति की तरह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कटघरे में है। अधिकांश न्यूज चैनलों से सजग भारतीयों ने इसलिए दूरी बना ली है, क्यूंकि उनमें सार्थक खबरों को अहमियत ही नहीं दी जाती। वैसे तो इसके कई कारण है। लेकिन गजेंद्र रावत की लिखी लघुकथा ‘कवरेज’ को पढ़ते ही काफी हद तक जवाब तो मिल ही जाता है, 

‘‘सुबह से करते-करते बारह बजे उसका नंबर आया। अब वो एक टी.वी. चैनल के वातानुकूलित ऑफिस में इंटरव्यू बोर्ड के समक्ष बैठा हुआ था। बोर्ड के एक सदस्य ने धीरे से कहा, ‘‘पढ़ाई तो ठीक-ठाक है मगर अनुभव है क्या?’’ ‘‘जी हां, मैं पिछले पांच साल से एक ग्लोबल टी.वी. चैनल में संवाददाता था।’’ ‘‘ग्लोबल चैनल! तो फिर जॉब क्यों छोड़ी?’’ बोर्ड के दूसरे सदस्य ने आश्चर्य से पूछा। ‘‘दरअसल, एक सड़क दुर्घटना की कवरेज के लिए मुझे भेजा गया था, लेकिन सड़क पर बुरी तरह घायल नौजवान का तड़पना मुझसे नहीं देखा गया...और घटनास्थल की कवरेज के बजाय मैंने उसे अस्पताल पहुंचा दिया। इस प्रकार मुझ पर आरोप लगा कि मैंने एक सनसनीखेज़ ख़बर का सत्यानाश कर दिया। लिहाजा मुझे चैनल से निकाल दिया गया।’’ उसने बड़े ही भोलेपन से अपनी बात रख दी।

‘‘ठीक है, आप जा सकते हैं, आपको हफ्ते के भीतर सूचित कर दिया जाएगा।’’ बीच की बड़ी कुर्सी पर बैठा चेयरमैन बोला। दो दिन बाद उसके फोन पर मैसेज़ था-फिलहाल आपको यह जॉब नहीं दी जाती, भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित-चेयरमैन। 

लोग सच का सामना करने से कैसे घबराते हैं और आहत हो जाते हैं इसका चित्रण लेखिका सीमा जैन ने अपनी लघुकथा ‘कुछ नया’ में बखूबी किया है...

‘‘घर में घुसते ही पति ने कुर्ता उतारकर फेंका और चीखते हुए बोले-क्या ज़रूरत थी घर की बात बाहर बताने की, सच बोलकर क्या मिल गया तुझे?’’ मैंने ठंडी आवाज़ में कहा-‘‘झूठ के नुकसान आप नहीं समझ पायेंगे।’’ ‘‘ज्ञानी तो, तुम हो ही चुकी हो! किचन क्वीन जो बन गई हो, दिमाग घूम गया था तुम्हारा। टी.वी. पर जब पूरा देश देखे, तो पैर ज़मीन पर हो ही नहीं सकते हैं।’’‘‘इसमें घमंड जैसी कोई बात नहीं है, बस एक गलतफहमी दूर करना ज़रूरी था।’’ ‘‘यही कि तुम बहुत दुखियारी औरत हो।’’ ‘‘बिल्कुल नहीं, कुछ दुखियारी औरतों को ये कहना ज़रूरी था कि पति की मार खाकर, सास के ताने और जुल्म सहकर भी अपने हुनर के बल पर यहां तक पहुंचा जा सकता है।’’ ‘‘पूरी दुनिया के सामने मेरा और मेरी मां का अपमान करके मिल गई शांति? ’’ ‘‘मेरी तरह घुट-घुटकर जीने वाली हर औरत को शक्ति मिलेगी ये सुनकर कि हर औरत का साथ उसका पति नहीं कभी-कभी दु:ख भी देता है।’’ ‘‘घर में तो कभी ढंग का खाना बनाया नहीं, कभी नमक कम तो कभी शक्कर ज्यादा...’’ ‘‘ये इसी बात का जवाब था जो मुझे रोज़ सुनना पड़ता था। कुछ नया और ढंग का खाना बनाना मुझे नहीं आता है, तो आज मैंने ढंग के खाने का खिताब जीता साथ ही कुछ नया भी कर डाला, जो फोटो खिंचवाने के बाद कोई बताना पसन्द नहीं करता मैंने आज वो सबको बता दिया।’’

विख्यात व्यंग्यकार, उपन्यास लेखक डॉ. महेंद्र कुमार ठाकुर की व्यंग्य और हकीकत में रची-बसी लघुकथाओं को पढ़ने के बाद पाठक उन्हें भूल नहीं पाते। ठाकुर विक्रयकर विभाग में उच्च अधिकारी रहे हैं। उनकी लिखी कई लघुकथाओं का मंचन भी हो चुका है। ज्योतिष के क्षेत्र में भी दबदबा रखने वाले लेखक की ‘अफसर’ लघुकथा उनके साहस और यथार्थ लेखन की परिचायक है, 

वह पूरे अफसर थे, एकदम कड़क, रौबदार, उनकी आवाज में ही नहीं, चाल और हाव-भाव में भी अफसरी थी। उनका हर अंदाज एक अफसर का था। उन्हें अपनी कार में चढ़ना होता तो चमचा दरवाजा खोलता, ‘आइए सर, बैठिए’। वह जहां पहुंचते एक चमचा कार का दरवाजा खोलता, ‘नमस्कार सर, आइए।’ उन्हें हस्ताक्षर करना होता तो एक चमचा पेन खोलकर उनके हाथों में देता, ‘सर, लिजिए।’ एक चमचा फाइलें खोलकर दिखलाता, ‘‘सर यहा करने हैं हस्ताक्षर।’’ उनके हस्ताक्षर होते ही एक चमचा फाइलें वहां से हटाता जाता। सिगरेट पीनी हो तो एक चमचा पैकेट खोलकर उनके सामने कर देता, ‘‘सर ये रही सिगरेट, आपके पसंदीदा मारका की है।’’ दूसरा चमचा लाइटर चलाकर उनके मुंह के पास कर देता। वह उसके लाइटर से मुंह में रखी सिगरेट जलाते। एक दिन दोपहर को कार्यालय में फोन की घंटी बजी। उनके पी.ए. ने रिसिवर उठाया, ‘‘सर दिल्ली से छोटे भाई साहब का फोन है, लीजिए।’’ ‘‘हां, हैलो।’’, ‘‘हां भैया, मां का देहांत हो गया है।’’ उधर, से आवाज आई, ‘‘ठीक है, डेड बॉडी यहां भिजवाने की व्यवस्था करो। कार्यक्रम यही होगा। मेरे पास वहां आने का वक्त नहीं है।’’ अफसर ने कहा। 

श्मशान घाट पर भी अफसर अपनी पूरी शान में हैं। चिता के चारों ओर फेरे लग रहे हैं। जलती लकड़ी लेकर उनका सबसे खास चमचा उनके थोड़ा पीछे रहकर फेरे लगा रहा है। वे मायूस और गंभीर मुद्रा में अपनी मां की मृतदेह की परिक्रमा कर रहे हैं। उदास हैं, दुखी हैं, आंसू तक नहीं आ सकते थे। परिक्रमा पूरी हो चुकी है। पंडित की आवाज आई, ‘‘अब चिता को अग्नि दे दो।’’ चमचे  जलती लकड़ी उनके हाथ में दे दी, ‘‘लीजिए सर, चमचे ने उनके हाथों को सहारा देकर जलती लकड़ी का जलता हिस्सा मां के मुख तक पहुंचाया। चिता के लपटे फैल रही थी। चिता को अग्नि देकर उसे उन्होंने पुन: चमचे के हाथों में दे दिया। मां की मृतदेह अग्नि को समर्पित हो चुकी थी। उनका अफसरी अंदाज शान से अब भी मौजूद था। उनकी आंखों में आंसू नहीं आ सकते थे। वे अफसर थे। हां, उनके अधीनस्थ जरूर फूट-फूटकर रो रहे थे।’’

Thursday, August 6, 2026

आने और जाने के बीच

 आपके मन में भी विचार तो जरूर आता होगा कि ऐसी खबरों का सिलसिला आखिर कब टूटेगा?...

गुजरात के जामनगर में एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। जिसके साथ उसने सात फेरे लेते हुए जन्म-जन्मांतर तक साथ निभाने का वादा किया था, उसी को शराब में साइनाइड मिलाकर मौत की नींद सुला देने के बाद पंद्रह फीट गहरे गड्ढे में गाड़ दिया। इस हत्याकांड का महीनों बाद तब खुलासा हुआ, जब मृतक के भाई ने पुलिस में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। हत्यारी पत्नी तो अपने पति के ऑस्ट्रेलिया में होने का झूठ फैलाकर अपने प्रेमी के साथ अय्याशी में लीन हो चुकी थी। हमारे देश में लगभग हर घर में दिन की शुरुआत चाय से होती है। मां, बहन, पत्नी के हाथों की बनी चाय आपसी रिश्तों में अपनत्व की मिठास और जुड़ाव की खुशबू भी घोलती है। उत्तरप्रदेश के कानपुर के अंतर्गत आनेवाले रावतपुर के गणेशनगर में रहने वाले एक धनवान परिवार के सदस्यों को चाय के स्वाद में आए बदलाव ने चिंतित कर दिया। अच्छे-खासे सेहतमंद स्त्री-पुरुष बीमार पड़ने लगे। डॉक्टरों की शरण ली गई तो उन्होंने खाने-पीने की चीज़ों में किसी हानिकारक पदार्थ के मिलाये जाने की आशंका जताई। परिवार के युवा हिमांशु की शादी हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे। किसी पर एकाएक शक नहीं किया जा सकता था। इसलिए रसोईघर से लेकर घर के सभी कमरों में सीसीटीवी लगवाये गये। कैमरों में हिमांशु की पत्नी बार-बार चाय में काले रंग का पदार्थ मिलाती दिखी। इतना ही नहीं रूम फ्रेशनर में भी कोई संदिग्ध तरल पदार्थ मिलाती नज़र आई। घर में तनाव का वातावरण बन गया। अंतत: जो सच्चाई सामने आई उसने तो भरे पूरे परिवार के होश ही उड़ा दिए। हिमांशु की पत्नी चाय तथा रूम फ्रेशनर में अत्यंत विषैला रसायन मिलाकर पूरे परिवार के सदस्यों का खात्मा कर पूरी संपत्ति पर कब्जा करने की साजिश रच चुकी थी। यदि घर में कैमरे नहीं लगवाये जाते तो सच सामने आ ही नहीं पाता। 

वक्त ऐसे भी करवट लेगा किसको पता था? औरतें हत्याएं करने के मामले में पेशेवर अपराधी पुरुषों को मात देने पर उतर आएंगी और ऐसे-ऐसे तरीके अपनाएंगी कि पति नाम का जीव एकदम बेबस और बेचारा बन कर रह जाएगा! सात साल पहले जिस अतुल नामक युवक ने घरवालों का कहना न मानते हुए विद्रोह कर दामिनी नामक युवती से शादी की थी, उसी ने बीस लाख के बीमा की रकम के लिए अपने प्रेमी के साथ मिलकर उसे मौत की नींद सुला दिया। इसके लिए उसने कोई पारंपरिक औजार, हथियार चुनने की बजाय विषैले सांप का सहारा लिया। मेरठ शहर की इस दामिनी ने पहले तो पति को दूध में नींद की गोलियां मिलाकर दीं...और गहरी नींद सो जाने के बाद उसके बिस्तर में एक ज़हरीला सांप छोड़ दिया। सांप के डसने से नींद में ही अतुल चल बसा। हत्यारिन दामिनी का पति अतुल स्कूल संचालक था और उसका प्रेमी उसी स्कूल की बस का मामूली सा ड्राइवर! दामिनी भी स्कूल संचालन में सहायता करती थी। इसी दौरान पता नहीं कब और कैसे खूबसूरत दामिनी ड्राइवर पर मर मिटी और उसको हमेशा-हमेशा के लिए पाने के लिए अपने पति को मिटा दिया।

 शार्टकट से धन कमाने के लिए ठगी करतीं और बड़ी आसानी से ठग-लुटेरों की साथी बनतीं कुछ नारियां रही सही कसर को भी पूरा करने पर उतारू हैं। शादी का झांसा देकर भोले-भाले युवकों से नकदी और गहने ऐंठ लेने की खबरें कुछ वर्ष पहले तक तो राजस्थान, हरियाणा और पंजाब से सुनने-सुनाने में आती थीं, लेकिन अब तो जहां-तहां लुटेरी दुल्हनों की फसल बड़ी तेजी से पैदा हो रही है। अभी...अभी शहर के दैनिकों में अपने शहर में ‘लुटेरी दुल्हन’ गिरोह के पर्दाफाश होने की खबर पढ़ी, ‘‘गुजरात के एक युवक को शादी के लिए अच्छी लड़की की तलाश थी। उसने संतरानगरी में रहनेवाले अपने मित्र को अपनी परेशानी बताई तो उसने नागपुर में उसके लायक लड़की होने का आश्वासन देकर शीघ्र आने को कहा। नागपुर पहुंचने के कुछ घंटों के बाद खूबसूरत लड़की उसके सामने पेश कर दी गई। युवक को लड़की तुरंत जंच गई। लड़की वालों को भी शादी करने की जल्दी थी। उन्होंने दुल्हन के श्रृंगार के नाम पर गहनों तथा अन्य खर्चों के लिए लाखों रुपए पहले ही रखवा लिए। फिर शहर के एक मंदिर में संपूर्ण रीति-रिवाज के साथ विवाह भी संपन्न हो गया। युवक खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह जल्द से जल्द अपनी दुल्हन को राजस्थान ले जाने के मंसूबे बना ही रहा था कि, इस बीच एक युवक वहां आ धमका। वह अकेला नहीं था। वह शादी के जोड़े में सजी-धजी दुल्हन को अपनी पत्नी बताते हुए हंगामा करने लगा। शादी के सूट-बूट में ‘हीरो’ बना युवक हक्का-बक्का रह गया। उसकी बहसबाजी कोई काम नहीं आयी। ड्रामे की मास्टरमाइंड नायिका और उसके साथी बड़ी ठसन से उसकी नज़रों के सामने से चलते बने और वह असहाय...अवाक रह गया।

कुछ दिन पहले रायपुर की एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट और पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर एक ऐसे शातिर ठग को पकड़ा, जिसने शहर के विख्यात लग्जरी होटल हयात में दो दिनों तक ठहरकर लजीज खाना खाया, महंगी शराब पीते हुए खूब मौज की और लगभग पैंसठ हजार का बिल चुकाए बिना फुर्र हो गया। तमिलनाडु निवासी विंग्सन जॉन नामक यह ठग अलग-अलग नाम से देशभर के विभिन्न नगरों, महानगरों के आलीशान होटलों में ठहरता था और फिर चकमा देकर भाग खड़ा होता था। अभी तक वह लगभग तीन सौ लग्जरी होटलों में मुफ्त ठहरने और खाने-पीने का आनंद लूट चुका है। साल 2022 में भी उसे एक फाइव स्टार होटल की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था। वहां भी उसने बिना बिल चुकाए होटल छोड़ा और वहां का लैपटॉप भी लेकर खिसक गया। पुलिसिया जांच में पता चला कि, जॉन की पहली गिरफ्तारी 1996 में दिल्ली में हुई थी। तब उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। वहां से छूटने के बाद वह नहीं सुधरा। उसने केरलम, तमिलनाडु, गोवा, आंधप्रदेश और महाराष्ट्र के विभिन्न होटलों में मुफ्त में मज़ा लूटा। जेलें ही उसके लिए घर थीं। वहां उसे नये-नये लोग मिलते थे। उसे दोस्ती गांठने में महारत हासिल थी। पंद्रह साल उसने जेलों में ही बिताये। हर बार अपनी पहचान बदलने में माहिर जॉन कभी खुद को अंग्रेजी का शिक्षक तो कभी धनाढ्य टूरिस्ट अथवा योगा प्रशिक्षक बताकर होटल में महंगे से महंगा कमरा लेता था। उसके हाथों में दो बैग होते थे। एक में उसके कपड़े तो दूसरे बैग में अखबार और तकिए होते थे। अपना सामान वह होटल कर्मचारियों को कभी छूने नहीं देता था। होटल छोड़ते वक्त वह अखबार और तकिए वाला बैग अपने कमरे में ही रहने देता था, ताकि होटल के स्टॉफ को लगे कि वह कहीं आसपास जा रहा है। अपना काम निपटाकर शीघ्र लौट आएगा। जाते-जाते होटल का कीमती सामान चुराना उसकी आदत में शुमार था। पुलिस को उसने बड़े फख्र के साथ बताया कि, पूरे विश्व में अपनी कुख्याति का डंका बजाने वाला खूबसूूरत औरतों का रसिया और हत्यारा...शातिर ठग चार्ल्स शोभराज उसके लिए ‘महानायक’ है। वह उसे अपना एकमात्र आदर्श मार्गदर्शक मानता रहा है। उस जैसा चतुर व्यक्ति उसने और कोई नहीं देखा। फर्जी पहचान और छल कपट के तरीके अपनाने की तमाम कलाएं उसने अपने ‘गुरु’ चार्ल्स से ही सीखीं और सफल रहा। दिल्ली की तिहाड़ जेल में दोनों एकसाथ थे। चार्ल्स शोभराज ने अय्याशी के लिए कौन से नये-नये रास्ते चुने और कई खूबसूरत औरतों को भोगने के बाद कैसे मौत के घाट उतारा आदि...आदि सब कुछ जॉन को बताकर बेखौफ होकर हिंसा और छलकपट करने की सीख दी। महाठग शोभराज ने भी अपने जीवन का अधिकांश समय जेलों में ही बिताया। भले ही मौज मस्ती और ऐश के बहुतेरे दिन उसके हिस्से में आये हों लेकिन फिर भी वह कभी चैन से सो नहीं पाया। जॉन ने काफी हद तक शोभराज के पदचिन्हों को अपनाया, लेकिन जॉन ने आखिर क्या पाया? वास्तव में उसने गंवाया ही गंवाया। कुछ भी नहीं पाया। भौतिक सुखों के चक्कर में परिवार से नाता टूटा। मां-बाप ने नालायक बेटे से रिश्ता तोड़ लिया। पत्नी और बच्चों का भी कोई अता-पता नहीं। ऐसे नकली सुख किस काम के? इस दुनिया में आने और जाने के बीच मेहनत कर लोग क्या कुछ नहीं पा लेते। इस धरती के अधिकांश लोग बेइमानों, चरित्रहीनों और मुफ्तखोरों का कभी सम्मान नहीं करते। भले ही वे कितने ही साधन संपन्न हो जाएं। यह दुनिया परिश्रमी और चरित्रवानों को सलाम करती है। कई संगीन अपराधी देखने में आये, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम काल में बस यही अफसोस था कि काश...गलत साथ और संगत में नहीं पड़ते तो पश्चाताप की आग में न जलना पड़ता। अपनी उम्र का अधिकतर समय पुलिस और अदालतों से बचने के लिए छिप-छिपाकर तो नहीं गंवाना पड़ता है। कानून के डर से भाग-भागकर जीना भी कोई जीना है! अपने पति की हत्या और उसके शव के टुकड़े कर नीले ड्रम में दफनाने वाली मुस्कान कई माह से जेल में बंद है। उसके घर वालों ने उससे नाता तोड़ लिया है। पति को सांप से डसवाकर मारने वाली दामिनी बार-बार अपने 6 वर्षीय बेटे को याद कर रोती रहती है। अपने सैनिक पति की हत्यारिन कोमल जेल में बंद दूसरी महिलाओं से बस यही कहती रहती है कि प्यार में अंधी होकर मैंने अपना घर बर्बाद कर दिया। अपने ही हाथों अपना सुहाग उजाड़ने वाली जितनी भी महिलाएं जेल में बंद हैं, दिन-रात पश्चाताप की आग में जल रही हैं। अपने घर-परिवार में इज्जत और शान से रहती थीं, लेकिन अब जेल में कैदियों के लिए खाना बनाने, झाड़ू लगाने तथा घास छीलते हुए घुट-घुटकर दिन काट रही हैं। कब मौत हो जाएगी किसी को पता ही नहीं चलेगा।