Saturday, March 12, 2011

पीडा में मुस्काओ थोडा

आज भी होली का नाम सुनते ही दिल प्रफुल्लित हो उठता है। आंखों के सामने कई-कई रंग तैरने लगते हैं। होली ही एकमात्र ऐसा त्योहार है जो लगभग हर देश में किसी न किसी रूप और नाम के साथ मनाया जाता है।हम भारतवासी तो वैसे भी उत्सव प्रेमी कहलाते हैं। हर त्योहार बडे उत्साह के साथ मनाना हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है। पर होली की तो बात ही निराली है। इंसानों के साथ-साथ खुद प्रकृति भी इस उमंगों भरे त्योहार को मनाने के लिए लालायित रहती है। रंग-बिरंगे फूलों से महकती हवाओं में गूंजने वाला यह मधुर संदेश सहज ही सुना जा सकता है कि ऊपर वाले ने इस धरती पर हर प्राणी को गाने और मुस्कराने के लिए भेजा है। इंसान का जीवन तो वैसे भी अनमोल है। बार-बार नहीं मिलता। इसलिए जीवन में जितनी खुशियां लूट सकते हो लूट लो। निराशा और हताशा से मुक्ति पाकर मस्ती में डूब जाओ। हर शत्रुता, भेदभाव और मनमुटाव को भुलाकर दुश्मनों को भी गले लगा लो...। इसलिए तो कहा गया है कि बसंत ऋतु का यह उत्सव स्नेह, अपनत्व, उल्लास का ऐसा उत्सव है जिसकी खुमारी जीवन का वास्तविक आनंद देती है। इस सर्वसमावेशी त्योहार के मनाये जाने के पीछे हमारे पूर्वजों की मूल भावना यकीनन यही रही होगी कि समाज में अपनत्व, भाईचारा और अमन शांति बनी रहे। आपसी रिश्तों की डोर ढीली न होने पाये। पर क्या वाकई बुजुर्गों की मंशा और सीख पर अमल होता है? यह इंसान की फितरत है कि वह जिन्हें अपना आदर्श मानता है उन्हीं का अनुसरण भी करता है। पिछले दिनों युवा नेता वरुण गांधी की शादी सम्पन्न हुई। वरुण गांधी कांग्रेस पार्टी की सुप्रीमो सोनिया गांधी के परिवार के अभिन्न अंग हैं। यह बात दीगर है कि सोनिया गांधी और वरुण गांधी की मां मेनका गांधी के बीच वर्षों से मनमुटाव चला आ रहा है। शादी से पूर्व वरुण गांधी खुद अपनी ताई सोनिया को ससम्मान आमंत्रित करने गये थे। वरुण को यकीन था कि उसके भाई राहुल गांधी और बहन प्रियंका तो उसकी खुशी में हर हाल में शामिल होंगे ही। देश के असंख्य लोगों की निगाहें इस ओर लगी थीं। करोडों लोग ऐसे भी थे जो यह मानकर चल रहे थे कि मैडम सोनिया इस शादी में अवश्य परिवार सहित शिरकत कर एक महान उदाहरण पेश करेंगी। वे पूर्व में भी देश के समक्ष अपनी महानता, त्याग और दरियादिली की मिसालें पेश करती आयी हैं। पारिवारिक रंजिश तो बहुत छोटी बात होती है। बडे लोग इन रंजिशों से बहुत ऊपर होते हैं। परंतु वरुण गांधी की शादी में न सोनिया पहुंचीं और न ही राहुल और प्रियंका। सोनिया भक्त यह भी कह सकते हैं कि यह तो गांधी परिवार का आपसी मामला है। आम लोगों का इससे क्या लेना-देना...। कांग्रेसी सफाई देने के लिए स्वतंत्र हैं और लोग भी सोचने और निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। सच तो यह है कि कांग्रेस सुप्रीमो के प्रति आम सजग जनों की जो विभिन्न टिप्पणियां आयीं उन्हें सकारात्मक तो कतई नहीं कहा जा सकता। वैसे भी भारतीयों के लिए शादी ब्याह भी किसी उत्सव से कम नहीं होते। जब बडों ने त्योहारों की गरिमा का ख्याल रखना बंद कर दिया है तब आम आदमी को कोसना व्यर्थ है। इसलिए तो कहते हैं कि पूर्व में मनायी जाने वाली होली और आज की होली में काफी परिवर्तन आ चुका है। पहले लोग वाकई दिल खोलकर होली खेला करते थे। ऊंच-नीच और अपने पराये की भावना को भूलकर आत्मीयता के साथ एक-दूसरे को रंगों की बौछारों में भिगो दिया जाता था। ढोल-मजीरा, नगाडे की थाप और होली के गीतों के बीच भंग की मस्ती की बात ही कुछ खास हुआ करती थी। पर अब तो होली शराब और कबाब के बिना अधूरी मानी जाती है। होली के दूसरे दिन देश के लगभग सारे अखबार खून-खराबे और पुरानी शत्रुताओं और रंजिशों को भुनाने की खबरों से भरे रहते हैं। अधिकांश अमन-प्रेमी होली के दिन घर में दुबक कर रहना पसंद करते हैं। वे बाहर निकल कर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। महिलाओं का तो सडकों पर अकेले निकलना ही मुश्किल हो जाता है। सडकों पर या तो पुलिस वाले होते हैं या फिर ऐसे युवकों की मदहोश टोलियां जो पी-खाकर इतनी मस्तायी रहती हैं कि उन्हें किसी की बहन-बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड करने में कोई भय नहीं लगता। देश के निरंतर बिगडते हालातों ने भी लोगों की चिं‍ताएं बढा दी हैं। गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी तो पुरानी बातें हो गयी हैं। अब तो और भी तरह-तरह की परेशानियां हैं जिनसे देशवासी निरंतर जूझ रहे हैं।कवि वीरेंद्र मिश्र की लिखी यह पंक्तियां काबिले गौर हैं:''महानगर में रहें, या रहें गांवों में,हमने देखा है, लोग जी रहे हैं तनावों में...''त्योहार आदमी तब मना सकता है जब वह बेफिक्र हो। बेफिक्री तब आती है जब सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा हो। पर यहां तो देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। युवा अपराधों की ओर अग्रसर हैं। महिलाएं असुरक्षित हैं और राजनेताओं को देश को लूटने से फुर्सत नहीं है। फिर भी हम हिंदुस्तानी बहुत दिलवाले हैं। हमने अपना हौसला नहीं खोया है और न ही इतने निराश हैं कि त्योहार मनाना छोड दें। यह त्योहार ही तो हैं जो हमें तमाम परेशानियों को भुला देने की ताकत देते हैं। होली तो फिर होली है...युवा कवि गिरीश पंकज की कविता की कुछ पंक्तियों के साथ आप सबको होली की अनेकानेक शुभकामनाएं-जीना भी एक कला हैपीडा में मुस्काओ थोडासाफ दिखेगा तुम्हें नजारापरदे जरा उठाओ थोडाखुशियां हो जाती हैं दूनीबेशक इन्हें लुटाओ थोडाहोगा परिवर्तन भी इक दिनसोए लोग जगाओ थोडा।

Thursday, March 10, 2011

बंधे हुए हाथ

शासन और प्रशासन की मेहरबानी से शिक्षा के क्षेत्र को भी बाजार बना कर रख दिया गया है। राजनेताओं और धन्नासेठों ने जब से इस क्षेत्र में अपनी पैठ जमायी है तभी से देश को न तो ढंग के डॉक्टर मिल पा रहे हैं और न ही इंजिनियर। मां-बाप को अपनी औलादों को डॉक्टर और इंजिनियर बनाने के लिए लाखों रुपये भेंट में चढाने पडते हैं तब कहीं जाकर कॉलेज में प्रवेश मिल पाता है। गरीबों के बच्चों का डॉक्टर और इंजिनियर बनने का ख्वाब अधूरा ही रह जाता है। उनकी योग्यता धरी की धरी रह जाती है और रईसों की नालायक औलादें भी बाजी मार ले जाती हैं। देश के न जाने कितने ऐसे अस्पताल हैं जहां मोटी फीस झटकने के बाद भी अनाडी डॉक्टर मरीजों की जान ले लेते हैं और उनका बाल भी बांका नहीं हो पाता। बडे-बडे शहरों और महानगरों में ऐसे-ऐसे आलीशान अस्पताल खुल गये हैं जहां आम आदमी घुसने से भी घबराता और कतराता है। इलाज का तो सवाल ही नहीं उठता। धन्नासेठों की पूंजी से खुले फाइव स्टार और सेवन स्टार अस्पतालों में अधिकतर उन्हीं मरीजों की भीड होती है जिनकी जेबें लबालब भरी होती हैं और लाख-पचास हजार तो वे छोटी-मोटी शारीरिक जांच के नाम पर ही अर्पित करने की हैसियत रखते हैं।डॉक्टरों के साथ-साथ अधिकांश इंजिनियरों के भी यही हाल हैं। जनसेवा और देश सेवा से उनका कोई वास्ता नहीं है। सबको अंधाधुंध कमायी की पडी है और इसके लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार हैं। मंत्री नेता और इंजिनियर पुल बनाते हैं और कुछ ही साल में उनका जो हश्र होता है उसे हम और आप देखते रह जाते हैं। आधे से ज्यादा रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती है। मीडिया चीखता चिल्लाता है पर किसी को कोई फर्क नहीं पडता। कई बार तो ऐसा भी लगता है मीडिया भी इस सारे खेल में शामिल है। देश की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में पैसा बोलता है और पैसा ही चलता है यह तो खबर पुरानी है। अब जो नयी खबर आयी है वह उन माता-पिता को बेहद परेशान कर देने वाली है जो अपनी बेटियों को डॉक्टर बनाने का सपना संजोये रहते हैं। जबलपुर के नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढाई कर रही युवतियों को परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए देहभोगियों के बिस्तर की शोभा बनने को विवश किया जाता रहा है। यह कोई ऐसी-वैसी खबर नहीं है जिसे पढ कर यूं ही भुला दिया जाए। डॉक्टर बन देश और समाज की सेवा करने का सपना देखने वाली युवतियों को यौन शोषण का शिकार होना पडे तो इससे बडी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। जिन युवतियों को भविष्य में समाज को रोगमुक्त करना है उन्हीं को हमारे और आपके बीच रहने वाले भेडि‍ये देह से ज्यादा कुछ नहीं समझते। इसलिए वे उन्हें 'रोगी' बनाकर रख देना चाहते हैं। उनकी मंशा है कि सारी नारी बिरादरी देह के चक्र में उलझ कर रह जाए। उनके लिए वेश्याओं और मेडिकल छात्राओं में कोई फर्क नहीं। युवक-युवतियों को डॉक्टर बनाने वाले देश भर में और भी सैकडों मेडिकल कॉलेज हैं। संयोग से अभी भंडाफोड एक ही कॉलेज का हुआ है और जो सच्चाई बाहर आयी है वह तो यही बता रही है कि पास होने के लिए जहां युवकों को धन देना पडता है वहीं छात्राओं को भोगियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की पीडा से गुजरना पडता है। यह शर्मनाक हकीकत पर्दे में ही सिमटी रह जाती अगर एक मेडिकल छात्रा ने मुंह न खोला होता। ध्यान रहे कि मुंह तभी खुलता है जब बर्दाश्त करने की ताकत खत्म हो जाती है। कोई भी भारतीय लडकी इस तरह के आरोप लगाने से पहले हजार बार सोचती है क्योंकि वह जानती है कि हमारा समाज किस मिट्टी का बना हुआ है। यहां तो बलात्कार की शिकार हुई लडकियों को ही शंका की निगाह से देखा जाता है। यह कितनी शर्म की बात है कि भावी लेडी डॉक्टरों को शरीर नुचवाने के लिए मजबूर करने वालों में पुरुष ही नहीं महिलाएं भी शामिल हैं। पुरुषों में कॉलेज के उपकुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, छात्र नेता और विभिन्न दलालों के नाम हैं तो महिलाएं भी पढी-लिखी और इज्जतदार घरानों से ताल्लुक रखती हैं। लगता है पढे-लिखे और इज्जतदार लोगों को भी ऐसे धतकर्म रास आने लगे हैं। हैरान और परेशान कर देने वाली बात तो यह भी है कि एक नामी मेडिकल कॉलेज में पास करवाने के बदले अस्मत लूटने का दुष्चक्र वर्षों तक चलता रहता है और प्रशासन की आंख तभी खुलती है जब एक युवती अपनी इज्जत को दावपर लगाकर शोर मचाती है कि मेडिकल कॉलेज नरपशुओं के चंगुल में फंस चुका है। यह नरपशु इतने वहशी और कमीने हैं कि इन्हें अपनी बेटी और पोती की उम्र की लडकियों के साथ बिस्तरबाजी करने में शर्म नहीं आती। ऐसा तो हो नहीं सकता कि कॉलेज के सभी शिक्षक देहखोर हों। बुरों के बीच कहीं न कहीं अच्छे लोग भी होते हैं पर इन अच्छों की अच्छाई तब बेहद आहत करती है जब वे जानबूझकर आंखें मूंदे रहते हैं। इस हैरतअंगेज तथ्य को भी कैसे नजर अंदाज कर दें कि जैसे ही भावी लेडी डॉक्टरों की लाज लूटने का मामला सामने आया तो समाज के कुछ ठेकेदार जिसमें मंत्री और नेता शामिल हैं, अस्मत के लुटेरों को बचाने के लिए अपनी आवाजें बुलंद करने लगे। जिनसे हम समाज की गंदगी दूर करने की उम्मीद रखते हैं वही खुद कितने गंदे और ओछे हैं उसका खुलासा भी हो गया है। सच तो यह है कि अगर इन देह शोषकों पर नेताओं और मंत्रियों की कृपा दृष्टि न होती तो वे इतनी घिनौनी हरकत को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस तरह के नालायक और पथभ्रष्ट जनप्रतिनिधि भी तो हम और आप ही चुनते हैं ऐसे में अगर यह कहा जाए कि यह सब हमारी ही करनी का फल है तो किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए।जब मैं यह पंक्तियां लिख रहा था तब मेरे सामने महिला दिवस के रंग में रंगे ढेरों अखबार पडे थे। दिमाग में बार-बार यह सवाल सिर उठाता रहा कि जिस देश में शिक्षा के मंदिरों में युवतियों को अपनी अस्मत अर्पित करने को विवश कर दिया जाता हो वहां पर चंद महिलाओं की विकास गाथा के गीत गाने के आखिर क्या मायने हो सकते हैं? असली सच तो यह है कि देश की बेटियों की इज्जत लुट रही है और सजा देने वाले हाथ बंधे हुए हैं...।

Thursday, March 3, 2011

कहां से आएगा सच्चा नायक?

रिश्वत लेने और देने वाले पहले से ज्यादा चालाक हो गये हैं। नोटों की गड्डियां मुसीबत खडी कर सकती हैं इसलिए शातिर और चालाक लोगों ने इस परंपरा को निभाने के लिए नये-नये तौर तरीके ईजाद कर लिये हैं। अभी हाल ही में नालको के चेयरमैन सह प्रबंध निदेशक को सोने की ईटे लेते पकडा गया है। देने वाले का भी पता चल गया है पर उसे फौरन सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका। हमारे यहां यही सबसे बडी बुराई भी है और कमजोरी भी। रिश्वत देने वाले को वो सजा नहीं दी जाती जिसका वह हकदार होता है। देने वाले न हों तो लेने वालों के पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता। अपना काम निकालने के लिए नौकरशाहों को भ्रष्ट करना व्यापारियों और उद्योगपतियों का जाना-पहचाना धंधा है। ये धंधेबाज सोने और चांदी की ईटों की खैरात बांटकर मंत्रियों और अफसरों को खरीदते-खरीदते न जाने कितनी सफलता (?) की सीढिं‍यां चढ जाते हैं। इनमें से कुछ टाटा, बिडला, अंबानी बन पूरे देश को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं और खून-पसीने की कमायी खाने वाले इन्हें देखते ही रह जाते हैं। यह ऐसी दास्तां है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। हदें पार हो चुकी हैं इसलिए हाहाकार मचा है जो बहुत दूर तक सुनायी दे रहा है। कल तो जो सच्चाई पर्दे में कैद थी आज पूरी तरह से बाहर आ गयी है। लोग जान गये हैं कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में देश का किसी भी हालत में भला नहीं हो सकता। भला सिर्फ उन्हीं का होगा जिनके हाथ में सत्ता है या फिर जो सत्ता को खरीदने की ताकत रखते हैं। देश की विधानसभाओं और संसद में भ्रष्टाचारियों का ही वर्चस्व है। अधिकांश विधायक और सांसद देश को लूटने की फिराक में लगे रहते हैं। उनके पास उनके लिए भी वक्त नहीं जिन्होंने इन पर आस्था जताकर लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचाया। जिन्होंने मंदिरों की पवित्रता नष्ट कर दी है क्या उन्हें दंड नहीं मिलना चाहिए...? कौन इन्हें दंडित करेगा? आज यह सवाल सभी देशप्रेमियों के दिल और दिमाग में हलचल मचाये हुए है। देश को किसी सच्चे नायक की तलाश है। पर अफसोस! सवा सौ करोड की आबादी वाले देश में आज एक भी सच्चा नायक नहीं मिल रहा है। दरअसल जिस रफ्तार से नायक खलनायक बनते चले गये उसी के चलते अब भारतवासी किसी पर आसानी से यकीन करने को तैयार नहीं हैं।देश को अपने चंगुल में ले चुके सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ योग गुरु बाबा रामदेव ने ताल ठोक दी है। उनके साथ समाज सेवक अन्ना हजारे, भाजपा के कारतूस रामजेठमलानी, किरण बेदी, सुब्रम्हण्यम स्वामी, गोविं‍दाचार्य, स्वामी अग्निवेश, कवि हरिओम पवार जैसे लडाकू चेहरे भी खडे नजर आ रहे हैं। बीते सप्ताह देश की राजधानी दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में बाबा ने ऐलान किया कि 'हम योग भी सिखाएंगे और भ्रष्टाचार को भी मिटाएंगे। विदेशों में जमा किया काला धन वापस लाया जाएगा। यही नहीं, देश के बच्चों को राजनीति व भ्रष्टाचार रोकने की शिक्षा भी दी जाएगी।' कांग्रेस पर खुल कर निशाना साधते बाबा के विचारों से हर कोई सहमत है पर घूम-फिर कर बात वहीं पर आ जाती है कि क्या देश की तमाम जनता इस बडबोले योगी पर विश्वास करने को तैयार है? कहा जा रहा है कि राजनीति में आने की छटपटाहट में योग गुरु बाबा रामदेव आज हर वह पैंतरा अपना और आजमा रहे हैं जो राजनीति और सत्ता का भूखा व्यक्ति अपनाता है। राजनीति के धुरंधरों का यह भी मानना है कि बाबा को अपने बारे बहुत बडी गलतफहमी हो गयी है। वे यह भूल गये हैं कि लोग उनके पास योग सीखने और निरोगी रहने के गुर जानने के लिए आते हैं। बाबा अपने योग कार्यक्रमों में एकत्रित होने वाली अपार भीड को देख हवा में उड रहे हैं और उन्हें लगने लगा है कि यह भीड उन्हें एक राजनेता के रूप में भी स्वीकार करने को आतुर है।बाबा रामदेव खुद को साधु-संन्यासी कहते नहीं थकते। पर वे यह भी भूल गये हैं कि राजनीति संत का पेशा नहीं है। योग की दुकान से सत्ता के गलियारों में अपनी पैठ जमाने की तीव्र लालसा पाले बाबा के विरोध में जहां बहुतेरे लोग ख‹डे नजर आते हैं वही उनके पक्षधरों की भी कमी नहीं है। अच्छी-खासी पूंजीपतियों की जमात उनके साथ है। कुछ मीडिया दिग्गज भी प्रचारक और प्रायोजक की भूमिका में हैं। सत्ता की चाशनी किसे अच्छी नहीं लगती। इसके लिए अच्छे-अच्छों को भटकते देखा गया है। मुझे यह पंक्तियां लिखते वक्त साध्वी उमा भारती की याद आ रही है। वे जब धार्मिक प्रवचन करती थीं तब लाखों-करोडों की चहेती थीं पर राजनीति ने उनका जो हश्र किया वो किसी से छिपा नहीं है। उमा भारती को भी यह भ्रम हो गया था कि उनके प्रवचन सुनने के लिए जो हजारों-लाखों की भीड जुटती है वह उन्हें एक राजनेता के रूप में भी सहर्ष स्वीकार कर लेगी। वे भारतीय जनता पार्टी से जुड गयीं। एक लहर थी जिसने साध्वी की नैया पार भी लगा दी। वे मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं पर राजनीति के खिलाडि‍यों ने उनके ऐसे होश ठिकाने लगाये कि वे कहीं की नहीं रहीं। आज की तारीख में साध्वी यहां से वहां भटक रही हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। राजनीति और सत्ता की भूख ने उनकी छवि को इस कदर धूमिल करके रख दिया है कि इस जन्म में तो कहीं कोई सुधार की गुंजाइश ही नहीं दिखती। बाबा रामदेव के इरादे नेक हो सकते हैं पर उनके इर्द-गिर्द खडे नजर आने वाले कुछ चेहरे पूरी तरह से स्वच्छ नहीं हैं। जेठमलानी जैसे सत्ता लोलुपों ने जब भाजपा को कहीं का नहीं छोडा तो बाबा कहां दिखेंगे राम ही जानें...। कहा तो यह भी जा रहा है कि बाबा तो पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के मोहरे हैं? इस पार्टी ने सत्ता तक पहुंचने के लिए जिस तरह से कभी साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा और अन्य कई साधु-संतों को आगे कर वोट हथियाये थे वैसे ही बाबा को आगे खडा कर फिर से केंद्र की सत्ता पाने के सपने देखने शुरू कर दिये हैं। अगर यह सच है तो बाबा रामदेव और भाजपा के सपने धरे के धरे रह जाने वाले हैं क्योंकि इस देश की जागरूक जनता अब और अधिक धोखे खाने को तैयार नहीं है...।

Thursday, February 24, 2011

नेताओं की गुंडागर्दी

शरद पवार देश के नामी-गिरामी नेता हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। वर्षों से केंद्र की सत्ता की मलाई खा रहे हैं। राजनीति से ज्यादा क्रिकेट के प्रति उनका जो लगाव है वह देशवासियों से छिपा नहीं है। कई लोगों का मानना है कि शरद पवार राजनीति के ऐसे मंजे हुए खिलाडी हैं जिन्हें मात देना हर किसी के बस की बात नहीं है। खुद पर निरंतर लगने वाले गंभीर से गंभीर आरोपों के जवाब में चुप्पी अख्तियार कर लेना उनकी पुरानी आदत है। उन पर देशद्रोही, माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम के करीबी होने के बहुतेरे आरोप लगे। पर वे खामोशी ओढे रहे। सामाजिक कार्यकर्ता खैरनार का तो यह भी दावा है कि दाऊद को यदि शरद पवार की छत्रछाया नहीं मिलती तो वह हिं‍दुस्तान की धरती पर बम-बारूद बिछाकर असंख्य भारतीयों की जान लेने की हिम्मत और जुर्रत नहीं कर पाता। कहने वाले तो यह भी दावे के साथ कहते हैं कि आज की तारीख में शरद पवार बेहिसाब दौलत के मालिक हैं। उनकी तिजोरियों में अरबों-खरबों रुपये और हीरे-जवाहरात का जखीरा भरा पडा है। धन संपत्ति के मामले में अंबानी-टाटा जैसे उद्योगपति उनके समक्ष दूध पीते बच्चे हैं। शरद पवार की इकलौती पुत्री भी सांसद हैं। उनके भतीजे अजीत पवार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री हैं। यानि पूरा कुनबा देश की राजनीति में जमा हुआ है। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के पुत्र की भूमिका उनके भतीजे निभाते चले आ रहे हैं। अजीत पवार खुलकर कहने और करने वाले शख्स हैं। वे जो कहते हैं उस पर अमल भी करते हैं। उनका मानना है कि राजनीति में वही सफल हो सकता है जिसे गुंडागर्दी में महारत हासिल हो। राजनीति में अभूतपूर्व सफलता तभी मिलती है जब शराफत के चोले को उतार फेंका जाए और खुलकर 'दादागिरी' की राह अपना ली जाए। दरअसल राजनीति सीधे-सादे लोगों के बस की बात ही नहीं है। जब तक टेढे नहीं बनेंगे तब तक कुछ भी हासिल नहीं होगा। यकीनन अजीत दादा की तारीफ करने में कंजूसी नहीं की जानी चाहिए। इस तरह की स्पष्टवादिता के लिए बहुत बडा कलेजा चाहिए। इस मामले में महाराष्ट्र के इस धाकड उपमुख्यमंत्री का कोई हाथ भी नहीं पकड सकता। जो दिल में आता है कह देते हैं। पत्रकारों को भी फटकारने और लाठी-डंडे का भय दिखाने में पीछे नहीं रहते। ताऊ भले पत्रकारों से भतीजे के किये-धरे की माफी मांग लें पर भतीजे के कालर टाइट रहते हैं। राजनीति के पुराने और नये खिलाडी में यही तो फर्क है। अजीत पवार का एक ही सपना है जैसे भी हो महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना है। इसके लिए वे अपनी फौज भी तैयार कर रहे हैं। अपनी फौज के सिपाहियों का मनोबल बढाये रखना हर कप्तान का दायित्व होता है। दरअसल इसी दायित्व को निभाते हुए अजीत दादा ने अपने चंगुओं-मंगुओं को कर्तव्य और निष्ठा का पाठ पढाते-पढाते खुद को 'टांग्या' की उपाधि से विभूषित कर डाला। मराठी के इस शब्द का अर्थ है: बदमाश और आवारा छोकरा। इस मूलमंत्र से कौन वाकिफ नहीं है कि राजनीति में अपने नेता को आदर्श मानकर उसके चरित्र और क्रियाकलापों का अनुसरण करने वाले ही आगे बढते हैं। तय है जिन्हें आगे बढना है वे अपने गुरु के आदेश का पालन करेंगे ही। ऐसे में राजनीति का क्या होगा?... जैसे सवालों पर ज्यादा दिमाग खपाने की कोई जरूरत नहीं बचती। सब कुछ प्रत्यक्ष दिखायी दे रहा है। कुछ भी लुका-छिपा नहीं है। हमारे देश के राजनेताओं को सच का आईना दिखाने वाले कतई पसंद नहीं आते। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाले बाबा रामदेव ने जब भ्रष्ट मंत्रियों की हकीकत बयां की तो एक कांग्रेस के सांसद इतने बौखला गये कि बाबा को गालियां देने पर उतर आये। ऐसा तो हो नहीं सकता कि सांसद गालियों का अर्थ न जानता हो। योगगुरु तो भ्रष्टाचार मिटाने और विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने की बात कर रहे थे और सांसद महोदय उन्हें ब्लडी इंडियन और कुत्ता कहकर अपनी असली औकात दिखा गये...।सच तो यह है कि यह गाली किसी रामदेव को नहीं दी गयी है बल्कि उन सभी राष्ट्रभक्तों को दी गयी है जिन्हें अपने देश से प्यार है और गद्दारों से नफरत है। तय है कि सांसद के मुंह से भद्दी-भद्दी गालियां इसलिए बरसीं क्योंकि उन्हें बाबा के द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाये जा रहे अभियान से डर लगने लगा है। सांसद महोदय भ्रष्टाचार, बेईमानी, लूट-खसोट और काले धन के हिमायती हैं। जो लोग इनके साथ खडे हैं और जिन्होंने आंख, कान और मुंह बंद कर रखे हैं वे अच्छे और भले लोग हैं और विरोध करने वाले ब्लडी इंडियन... कुत्ते हैं...।अरुणाचल प्रदेश के सांसद निनोंग एरिंग और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत दादा के बीच ज्यादा फर्क दिखायी नहीं देता। दोनों को आईना दिखाने वालों से नफरत है। दोनों यही चाहते हैं कि दुनिया का सारा कारोबार उन्ही के हिसाब से चले। जो इनकी न माने उसके होश ठिकाने लगा दो। जनता के वोट से चुने गये कुछ जनप्रतिनिधि कितने मुंहफट, निर्लज्ज और बेलगाम हो जाते हैं उसका जीता-जागता प्रमाण हैं ये लोग। पत्रकार बेचारे इन नेताओं के लिए क्या-क्या नहीं करते। गली-कूचों से शहरों में लाते हैं। राजधानियों की रोशनियों में पहुंचाते हैं और यह नेता मतलब निकलते ही दूध में गिरी मक्खी की तरह उन्हें निकाल फेंकते हैं! दरअसल अजीत दादा जैसे अहंकारी सत्ताधीशों की निगाह में असली पत्रकार वही है जो उनके पक्ष में लिखे। उनकी तारीफों के पुल बांधे। जो ऐसा नहीं कर सकते उन्हें डंडे से सबक सिखाना भी दादा को खूब आता है। कुछ नेता यह काम पर्दे में रहकर करते हैं और दादा जैसे राजनेता डंके की चोट पर...।

Thursday, February 17, 2011

जा को राखे सोनिया...

देश के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिं‍ह और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर कोई कितने भी आरोप लगा ले पर उन्हें भ्रष्टाचारी तो कतई नहीं सिद्ध किया जा सकता। यह बात अलग है कि जब देश के प्रधानमंत्रियों का लेखा-जोखा इतिहास की किताब में दर्ज होगा तो यह भी जरूर लिखा जायेगा कि यह दोनों प्रधानमंत्री खुद तो पूरी तरह से ईमानदार थे पर इनकी छत्र छाया में भ्रष्टाचारियों ने जमकर देश को लूटा और चांदी काटी। दोनों ईमानदार शासक बेइमानों पर अंकुश नहीं लगा पाये। अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में महाजनों और सौदागरों ने देश की लुटिया डुबोने में कोई कसर नहीं छोडी तो मनमोहन के काल में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी इतने बेलगाम हो गये कि उन्हें बडे से बडा भ्रष्टाचार करने में कोई शर्म नहीं आयी। ऐसा लगा जैसे भ्रष्टाचारियों में एक दूसरे को मात देने की प्रतिस्पर्धा चल रही हो। इसी प्रतिस्पर्धा के चक्कर में देश लुटता रहा और देश के मुखिया यह सफाई देते रहे कि हम बेबस हैं। इसमें हमारा कोई दोष नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिं‍ह बेबस और मजबूर होने के बावजूद देश के प्रधानमंत्री बने रहे। देश चलता रहा। देश चल रहा है...। देशवासी यह भी जान समझ रहे हैं कि इस देश को प्रधानमंत्री नहीं सोनिया गांधी चला रही हैं। कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी की गुडबुक में जिन लोगों के नाम हैं उनकी अच्छी-खासी मनमानी चल रही है। अगर यह कहें कि उनकी मनमानियों और मक्कारियों की जानबूझ कर अनदेखी की जा रही है तो गलत नहीं होगा। मनमोहन सरकार में एक केंद्रीय मंत्री हैं विलासराव देशमुख। यह महाशय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में ग्रामीण विकास मंत्रालय की कमान संभाले हुए हैं। विलासराव देशमुख का नाम सोनिया गांधी की गुडबुक के पहले पन्ने पर दर्ज है इसलिए उनके सभी गुनाह नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। वैसे भी अपने भक्तों पर देवता हमेशा मेहरबान रहते हैं। उन पर कोई आंच नहीं आने देते। विलासराव देशमुख जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तब विदर्भ में किसानों की आत्महत्याओं ने जोर पकड लिया था। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता था जब किसानों की आत्महत्या की खबर पढने और सुनने को न मिलती रही हो। देश और दुनिया के लोग हैरान थे कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? महाराष्ट्र तो खाते-पीते प्रदेशों में गिना जाता रहा है। एक खुशहाल प्रदेश के अन्नदाता के इतने बुरे हाल कैसे हो गये कि उसे फांसी के फंदे पर झूलना पड रहा है। जहर खाकर जान देनी पड रही है! तब मनमोहन सरकार ने किसानों को राहत प्रदान करने के लिए हजारों करोड रुपये की सहायता उपलब्ध करायी थी। यह सहायता किसानों को मिली या नहीं मिली इसका जवाब देना आसान नहीं है। पर किसानों की चिं‍ता तो हर किसी को थी। तब एक सच्चाई यह भी उभर कर आयी थी कि विदर्भ के किसानों को साहूकारों ने त्रस्त कर रखा है। किसानों को कर्जा देने वाले यह साहूकार इतना अधिक ब्याज वसूलते हैं कि मूलधन ज्यों का त्यों बना रहता है। किसानों की जमीनें तक हडप कर ली जाती हैं और कर्ज चुकता नहीं हो पाता। किसानों का शोषण करने वाले साहूकार तो 'राजा' जैसा जीवन जीते हैं और किसानों को भीख का कटोरा हाथ में थामने को विवश होना पडता है। तब एकाएक होश में आयी महाराष्ट्र सरकार ने किसानों को लूटने-खसोटने वाले अनेकों साहूकारों पर कानूनी फंदा कसा था और कइयों को जेल की हवा भी खिलायी थी। सरकार के इस कदम को सबने सराहा था पर एक कटु सच यह भी था कि प्रदेश के मुखिया विलासराव देशमुख ने सच्चे राजा की भूमिका कतई नहीं निभायी। उन्होंने अपनों को बख्शा और गैरों को सजा दी।खामगांव के विधायक दिलीप सानंदा का परिवार साहूकारी का धंधा करता था। जिस तरह से दूसरे साहूकारों ने किसानों को कर्ज देकर लूटने-खसोटने का गोरखधंधा शुरू कर रखा था उसी तरह से विधायक सानंदा भी बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। उनके खिलाफ कई शिकायतें आयीं। कई किसानों ने अपनी फरियाद सुनायी कि सानंदा परिवार ने उनकी करोडों रुपये की जमीन हथिया ली है। यह परिवार वर्षों से किसानों का शोषण करता चला आ रहा है। चूंकि विधायक का मामला था और देशमुख के इनसे काफी मधुर रिश्ते थे इसलिए इन पर आंच भी नहीं आयी। किसानों का शोषण करने में माहिर सानंदा परिवार देशमुख का अंधभक्त रहा है और देशमुख भी भक्त को प्रसन्न रखने की कला में माहिर हैं। देशमुख ने तो अपनी दोस्ती निभा दी पर सानंदा परिवार के खिलाफ शिकायतों का सिलसिला बढता चला गया। बात यहां तक जा पहुंची कि मामला कोर्ट में भी जा पहुंचा। अदालतें रिश्ते नहीं निभातीं। देशमुख ने जो दोस्ती निभायी थी और पुलिस कार्रवाई में जो बाधा डाली थी उसका खामियाजा सरकार को भुगतना पडा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार महाराष्ट्र सरकार को दस लाख का जुर्माना भरना पडा। सुप्रीम कोर्ट ने देशमुख को फटकार लगाते हुए कहा कि उनका व्यवहार घोर अराजकतावादी था। पर देशमुख को इस से कोई फर्क नहीं पडा। वे भले ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री नहीं हैं पर केंद्र में तो मौज मना ही रहे हैं। अदालत जिस शख्स को दोषी मानती है उसे कांग्रेस सुप्रीमो पाक-साफ मानती हैं इसलिए डॉ. मनमोहन सिं‍ह ने भी खुशी-खुशी ग्रामीण विकास मंत्रालय की कमान देशमुख को सौंप दी। यह भी गौर करने वाली बात है जब देशमुख को यह आलीशान तोहफा दिया गया तो किसानों के शोषक और हत्यारे विधायक सानंदा इतने प्रफुल्लित हुए कि उन्होंने अपने देवता को चांदी का मुकुट और चांदी की तलवार भेंट करने में जरा भी देरी नहीं लगायी। इतना ही नहीं सानंदा ने अपने गांव की दिवारों पर देशमुख को बधाई देने वाले बडे-बडे पोस्टर चिपकाये और लगाये गये जिन पर लिखा था-'जा को राखे साईयां, मार सके ना कोय...।'

Thursday, February 10, 2011

उत्सव और उत्सव

उत्सव शर्मा को कई लोग सनकी कहते हैं। पागल और बेवकूफ कहने वालों की भी कमी नहीं है...। वह अनपढ नहीं है। पढा-लिखा है। पर उसकी हरकतें उसे जेल की सैर करा चुकी हैं। अपनी करनी पर अफसोस जताना भी उसे कतई गवारा नहीं है। वह कहता है अगर हालात ऐसे ही रहे तो वह नहीं बदलेगा। उसका आक्रोश कानून की अनदेखी कर किसी भी हद तक जा सकता है। देश की व्यवस्था के प्रति उसके मन में जो रोष भरा पडा है उसी का ही नतीजा है कि उसने गाजियाबाद अदालत परिसर में डॉ. राजेश तलवार पर अचानक हमला कर लोगों को चौंकने और सोचने पर विवश कर दिया। इससे पहले उत्सव हरियाणा के पूर्व डीजीपी राठौर पर भी हमला कर चुका है। जवानी के जोश से लबालब उत्सव का मानना है कि डॉ. तलवार और राठौर दोनों मुजरिम हैं। हत्यारे हैं। डॉ. तलवार के हाथ अपनी बेटी आरुषि के खून से रंगे हैं तो राठौर ने रुचिका को मौत को गले लगाने के लिए विवश किया। हमारे देश का कानून दोनों का कुछ भी नहीं बिगाड पाया। अपने रुतबे, रसूख और दौलत के दम पर कई अपराधी बडी आसानी से बच निकलते हैं। जिनके पास यह सब कुछ नहीं होता वे बडी आसानी से सजा के हकदार हो जाते हैं। कानून की इस कमजोरी से खफा होकर अपनी खीज, झुंझलाहट और गुस्से का इजहार करने वाले युवक उत्सव शर्मा के बारे में तो लोगों ने जान लिया पर न जाने और भी कितने उत्सव हैं जो व्यवस्था से नाखुश हैं। वे अभी तक खामोश हैं। कानून को हाथ में लेना उन्हें नहीं सुहाता। पर जब बर्दाश्त करने की ताकत ही खत्म हो जाए तो एक अच्छे भले इंसान को उत्सव शर्मा बनने में कितनी देरी लगती है? एक अकेले उत्सव को सनकी, पागल और सिरफिरा कह कर जेल में डाला जा सकता है पर जब असंख्य उत्सवों का सडकों पर उतर आने का खतरा मंडरा रहा हो तो...? यह खतरा अब ज्यादा दूर नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली हो या देश के अन्य शहर-कस्बे हर कहीं नारियों पर होने वाले अत्याचारों में इजाफा होता चला जा रहा है। हत्या, व्याभिचार और बलात्कार तो रोज हो रहे हैं पर नाम मात्र की खबरें राष्ट्रीय मुद्दा बन पाती हैं। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बच्चियों और युवतियों के साथ चौबीस घंटे ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जो किसी भी संवेदनशील इंसान के खून में उबाल ला सकता है। खादी में नेता और खाकी में पुलिस वाले इतने अपराध कर चुके हैं कि आम लोग इन पर विश्वास करने में कतराने लगे हैं। आम आदमी यह भी मानने लगा है कि वर्तमान राजनीति और राजनेता छल, कपट और फरेब के पर्यायवाची बनकर रह गये हैं। इनके रहते देश का भला होने वाला नहीं है। हालात सुधरेंगे नहीं और बिगडेंगे। जिन्हें देश की चिं‍ता है वे पूरी तरह से बदलाव के इच्छुक हैं। उन्हें आज फिर एक जयप्रकाश नारायण का इंतजार है जो सत्ता का कतई भूखा न हो।इन सत्ता के चटोरों और लुटेरों ने तो देश को कहीं का नहीं रखा। जहां देखो वहां भ्रष्टाचार, अनाचार और व्याभिचार...। समाज में खुलेआम विचरण कर रहे दरिंदों से हर कोई परेशान है। अखबार भी शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता जब बलात्कार की खबरें न आती हों। ऐसे युवकों की संख्या में लगातार इजाफा होता चला जा रहा है जिनके लिए मौजमस्ती ही जीवन का एकमात्र मकसद है। इनकी वहशी हरकतें बताती हैं कि इनके लिए दूसरों की मां-बहनें महज भोग विलास की वस्तु हैं। स्कूल, कॉलेजों और घरों में ही बच्चियों की अस्मत लुटने लगी है। नौकरी करने वाली युवतियों और महिलाओं का तो भगवान ही मालिक है। पिछले दिनों कानपुर में एक दस वर्षीय बच्ची पर स्कूल में ही बलात्कार हो गया। स्कूल प्रशासन अंधा और बहरा बना रहा। बच्ची की अस्पताल में मौत हो गयी। ऐसी कितनी ही मौतें रोज होती हैं पर किसी को कोई फर्क नहीं पडता। फर्क पडे भी क्यों... यहां तो मंत्री से संत्री तक लगभग सभी एक ही रंग में रंगे हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती का राज है। उनके राज में अराजक तत्वों की तो छोडि‍ए विधायक तक बलात्कार करने से नहीं चूक रहे हैं। विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी को जनता ने जनप्रतिनिधि का ताज पहनाया पर वह तो अबलाओं की आबरू पर ही हाथ डालने लगा। जब पकडा गया तो मर्दानगी धरी की धरी रह गयी। कहने लगा कि मैं तो नामर्द हूं...। ऐसे हैं जनता के यह सेवक। झूठे, मक्कार और ढोंगी। ऐसे में कैसे और क्यों इन पर भरोसा किया जाए? इन्हीं की देखा-देखी पुलिस भी अपना ईमान-धर्म बेच चुकी है और व्याभिचारियों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गयी है।उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की राजधानी दिल्ली के भी बडे बुरे हाल हैं। शीला दीक्षित के हाथ में दिल्ली की सत्ता है पर महिलाएं यहां भी खून के आंसू रोने को विवश हैं। शीला दीक्षित तो बलात्कार के लिए कहीं न कहीं महिलाओं को भी दोषी मानती हैं। तभी तो वे यह कहने में भी संकोच नहीं करतीं कि महिलाओं को समय देखकर घर से बाहर निकलना चाहिए। जिस देश और प्रदेश के शासक ही लुंज-पुंज हों वहां बलात्कारी, भ्रष्टाचारी और तमाम किस्म के अनाचारियों के पनपने पर आश्चर्य करने की कोई गुंजाइश ही कहां बचती है। इस देश का आम आदमी बेवकूफ कतई नहीं है। उसका राजनीतिज्ञों पर से भरोसा उठ चुका है। सत्ताधीशों की दगाबाजी और कमीनगी के चलते उसका गुस्सा संभाले नहीं संभल पा रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने से शुरू हुआ भ्रष्टाचार सारी हदें पार कर चुका है। दिनों-दिन लूट खसोट के आंकडे बढते ही चले जा रहे हैं। किसी भी माई के लाल में दम नहीं दिखता जो भ्रष्टाचारियों और अनाचारियों का गला दबोच सके। कहीं कोई राजनीति का सपेरा कॉमनवेल्थ की आड में अरबों की डकैती करता है तो कोई टू जी स्पेक्ट्रम में अपने हाथ काले कर देश के माथे पर कलंक लगाता है। देश की राजनीति इतनी ओछी और गंदी हो गयी है कि सच्चे और अच्छे लोग राजनीति में आने से डरते हैं। इस घोर अविश्वास के दौर में अब तो और भी बहुतेरे उत्सवों के सडक पर उतरने के संकेत दिखायी देने लगे हैं...।

Thursday, February 3, 2011

बौद्ध धर्मगुरु करमापा का मायाजाल

इस भारतवर्ष में साधु-संन्यासी का चोला धारण कर छलने वालों के मायावी संसार का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने में यह कलम खुद को असहाय पा रही है। लोगों की आस्था के साथ खिलवाड करने का यह खेल पता नहीं कब और कहां जाकर थमेगा! अभी तक तो यह देश अपनी ही धरती के ढोंगियों के दंश झेलता आ रहा था पर अब करमापा की करतूत ने देशवासियों की आंखें खोल कर रख दी हैं। हमें हर किसी पर विश्वास कर लेने की घातक प्रवृत्ति से मुक्ति पानी होगी। अन्यथा बहुत बडा अनर्थ हो सकता है। हम बाहरी मुखौटे धारियों के हाथों बुरी तरह से छले जा सकते हैं।बौद्ध धर्मगुरु करमापा के मठ और कार्यालय से करोडों रुपये की बरामदगी हुई। इस अपार दौलत का उनके पास कोई हिसाब-किताब नहीं मिला। जिस तरह से देशी साधु-संत धर्म के प्रचार का दावा करते हैं वैसे ही करमापा का दायित्व होता है भगवान बुद्ध के आदर्शों का अनुसरण कर उनके विचारों को फैलाना। भगवान बुद्ध मानवता के पुजारी थे। करमापा माया के पुजारी निकले। उनके मठ में मिली छह करोड की विदेशी मुद्रा ने और भी कई सवाल खडे कर दिये। चेहरे पर नकाब ओढकर आनेवाले शरणार्थियों से देश ने अनेकों बार धोखा खाया है। अपनी शरण में आने वालों के प्रति सहानुभूति दर्शाना और उनकी सहायता करना भारतीयों की परंपरा और आदत में शुमार रहा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में तिब्बतियों को धर्मशाला शहर में बसाया गया था। वर्षों से शरणार्थी के रूप में रह रहे इन तिब्बतियों के मन में आज भी तिब्बत बसा है और हिं‍दुस्तान का दाना-पानी खाने-पचाने के बाद भी अपने तिब्बत प्रेम की अलख जगाते रहते हैं। शायद ही ऐसा कोई तिब्बती होगा जिसके मन में भारत के प्रति अटूट लगाव की भावना होगी। कांगडा और धर्मशाला जहां तिब्बती वर्षों से डेरा जमाये हैं वहां के मूल निवासियों को इनका व्यवहार कभी रास नहीं आया। अनेकों सजग हिमाचलियों का कहना है कि तिब्बती हर दर्जे के अहसान फरामोश हैं। दलाईलामा के ये चेले जिस तरह से भारत में ऐश-ओ-आराम भरी जिंदगी जी रहे हैं उससे तो इन्हें भारतवर्ष और यहां के निवासियों का शुक्रगुजार होना चाहिए था पर सच्चाई इससे एकदम उलट है। न जाने कितने तिब्बती ऐसे हैं जिनके क्रियाकलाप बेहद संदिग्ध हैं। यही वजह है कि यह लोग स्थानीय लोगों से दूरी बनाये रखते हैं। नजदीकी बनायेंगे तो पकड में आ जाएंगे। पर इनके धर्मगुरु तो पकड में आ गये हैं। शाही जिं‍दगी जीने वाले करमापा भगवान बुद्ध के आदर्शों का किस तरह पालन करते हैं उसका खुलासा भी उनके धन प्रेम ने कर दिया है।करमापा का अतीत विवादों भरा रहा है। वे २००५ में चीन से भागकर भारत आये थे। तब इन पर चीन का एजेंट होने की सुगबुगहाटें भी उभरी थीं, जिन्हें तथाकथित शांतिदूतों ने अनसुना कर दिया गया था। दुनिया जानती है कि भारत के हुक्मरान शुरू से ही बडे उदारवादी रहे हैं। देशवासी भले ही भूखे मर रहे हों पर मेहमाननवाजी का दस्तूर हर हाल में निभाया जाता है। वर्षों पूर्व आये तिब्बती शरणार्थियों की तरह करमापा को भी सिर आंखों पर बैठाया गया। करमापा तब किशोर उम्र के थे। उनको भारत की जमीन पर अठखेलियां करते हुए छह साल हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने करोडों का साम्राज्य भी खडा कर लिया। है न हैरानी की बात...। जब करमापा ने भारत की धरती पर कदम रखा था तभी सरकार को सतर्क हो जाना चाहिए था। गुप्तचर एजेंसियों को काम पर लगा दिया जाना चाहिए था। पर करमापा तो मेहमान थे। मेहमान को कुछ भी कर गुजरने और किसी से भी मिलने-मिलाने की छूट दे दी गयी और उसी का नतीजा आज हमारे सामने है। खाली हाथ आया धर्मगुरु आज अरबों-खरबों में खेल रहा है और अतिथि शिष्टाचार की जंजीर से बंधे सरकारी हाथ दिखाने के तौर पर जिस तरह से धीरे-धीरे खुल रहे हैं उससे यह उम्मीद तो नहीं बंधती कि करमापा के मायाजाल का पूरी तरह से खुलासा हो पायेगा। करमापा के संदिग्ध मायाजाल ने यह संदेश तो दे ही दिया है कि अतिथि को देवता मानने का जमाना लद चुका है। वैसे यह भी हकीकत है कि अब तो साधु-संतों और भगवाधारियों को ईश्वर का दूत मानने में भी संकोच होने लगा है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कुछ धर्मगुरुओं का शैतानी चेहरा सामने आया है उससे जन आस्था भी बुरी तरह से आहत हुई है। साधु और शैतान में फर्क तलाश कर पाना टेढी खीर हो गया है। अपने ही देश की माटी के कई तथाकथित संन्यासियों से धोखा खाने और उनसे मोहभंग हो जाने के बाद देशवासी तो काफी हद तक सतर्क हो चुके हैं, पर इस देश को चलाने वालों के जागने का इंतजार है। चीन हिं‍दुस्तान का कैसा पडौसी है यह लिखने और बताने की जरूरत नहीं है। अगर करमापा चीन का भेजा हुआ कोई गुप्तचर है तो उससे भारत माता के प्रति वफादारी की उम्मीद करना बेवकूफी ही होगी। तो फिर ऐसों को देश में शरण देने और उनकी मेहमाननवाजी का एक ही मतलब है... देश के साथ धोखाधडी।