Friday, April 15, 2011
चोर की दाढ़ी में तिनका
देश में ऐसे विद्वानों और बुद्धिजीवियों की भरमार है जो यह तय कर चुके हैं वे सही हैं और दूसरे गलत हैं। विरोध करना इनकी फितरत है। देश का कानून भी इनकी निगाह में सड़-गल चुका है। यह लोग इस इंतजार में हैं कि जैसा वे चाहते और सोचते हैं वैसा ही होने लगे। जिसको ये गाली दें उसकी कोई भूल से भी तारीफ न करे। जो लोग इन्हें पसंद नहीं वे कितना भी अच्छा काम कर लें पर इनकी धारणा टस से मस नहीं होने वाली। देश में 'हीरो' के रूप में उभरे अन्ना हजारे ने अपने अनशन के खत्म होते ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर दी। अन्ना का कहना था कि मोदी प्रदेश के विकास के लिए जी-जान से जुटे हैं। आज देश को ऐसे ही जुझारु नेताओं की जरूरत है। इस बात को देश के साथ-साथ पूरी दुनिया जानती-समझती है कि नरेंद्र मोदी का अतीत भले ही कैसा हो परगुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रदेश की जनता के साथ कभी कोई भेदभाव नहीं किया। वे देश के प्रदेश गुजरात के ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिनपर कभी भी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे। अपने कर्तव्य को निभाने में मोदी ने कहीं कोई कसर बाकी नहीं रखी। मोदी के द्वारा किये गये और किये जा रहे जनहित कार्यों की तारीफ तो कई विरोधी नेता भी करते हैं। ऐसे में अन्ना हजारे ने अगर मोदी की तारीफ कर दी तो कौन-सा आसमान टूट पडा? अन्ना के द्वारा मोदी की तारीफ करने के बाद उनके कुछ साथी भी अपनी नाराजगी पर लगाम नहीं लगा पाये। कांग्रेस के एक दिग्गज नेता ने तो जंतर-मंतर पर हुए उनके आमरण अनशन और तमाम प्रदर्शन पर हुए खर्च का हिसाब मांग डाला। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी के भूख हडताल करने पर उससे हिसाब-किताब मांगा गया हो। अन्ना ने जिस तरह से राजनेताओं को मात दी है उससे उनका बौखलाना जायज है। भाजपा के सुप्रीमों लालकृष्ण आडवानी एवं कुछ और नेताओं का बयान आया कि अन्ना का देश के नेताओं को भ्रष्टाचारी कहना उचित नहीं है। यह सोच आगे चलकर देश को बहुत बडा नुकसान पहुंचा सकती है। यह कौन नहीं जानता कि अन्ना शुरू से ही चिल्लाते चले आ रहे हैं कि हिंदुस्तान की बर्बादी की असली वजह हैं भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी। तमाम भ्रष्टाचारियों को जेल में ठूंस दिया जाना चाहिए। इस तरह की मांग तो हर देशप्रेमी करता चला आ रहा है। इसमें गलत क्या है? जब भ्रष्टाचारी नेता पर उंगली उठती है तोउसका यह तो मतलब होता नहीं कि उंगली ईमानदारों पर भी उठ रही है। यह तो चोर की दाढी में तिनके वाली बात हो गयी। इस देश में हजारों नेता हैं। पांच-सात चेहरों को ही मिर्ची क्यों लगी? ऐसे में एक सवाल यह भी कि अपने आपको पूरी तरह से ईमानदार कहने वाले नेता क्या भ्रष्टाचार को बढावा देने के दोषी नहीं हैं? यह भ्रष्टाचार इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने तक आते-आते आसमान को भी चीर गया है। कोई भी राजनेता यह नहीं कह सकता कि हम भ्रष्टाचारियों को नहीं जानते। हकीकत तो यह है कि अधिकांश नेताओं की शह पर ही तरह-तरह के माफिया पनपते हैं। इन माफियाओं में देश की खनिज सम्पदा के लुटेरे, जमीन चोर, बिल्डर, स्मगलर और नौकरशाह तक शामिल हैं। यह लोग अगर चंदा न दें तो देश के आधे से ज्यादा नेताओं का संसद और विधान सभा में पहुंचना ही मुश्किल हो जाए। चुनाव जीतने और मंत्री बनने के बाद यही नेता आम जनता के हित की लडाई न लडते हुए अपने दाताओं की पैरवी करते नजर आते हैं। दाता देते ही इसलिए हैं कि देश को लूट सकें। यह देश वर्षों से लुट रहा है और शासकों ने गजब की चुप्पी साध रखी है। खुद को ईमानदार कहने वालों के पास इस बात का भी जवाब नहीं है कि यह लोग टाटा, बिरला और अंबानियों के तलवे क्यों चाटते हैं। इन लुटेरों की कौम को बचाने के लिए तमाम कायदे और कानून को ताक पर क्यों रख देते हैं? सच तो यह है कि जनता ने जिसे भी सत्ता सौंपी वही तटस्थ बने रहा। जब खुद के स्वार्थों पर चोट पडती दिखी तो हल्ला मचाया कि सामने वाला भी चोर है...। तेरी भी चुप, मेरी भी चुप को राजनीति का मूलमंत्र बना चुके नेताओं की चालाकी के खेल को जनता पूरी तरह से समझ चुकी है इसलिए वह चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है इस देश के नेता भ्रष्ट हैं...।
Friday, April 8, 2011
अंधेरा छंटने की उम्मीद
कई लोगों का यह मानना है कि भारतवर्ष से भ्रष्टाचार का कभी सफाया नहीं हो सकता। ऐसी सोच रखने वालों को शायद यह जानकारी नहीं है कि हांगकांग के भी कभी हमारे देश जैसे बदतर हालात थे। वहां पर भी हर सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार ने अपनी जडें जमा ली थीं। बाबू, अफसर, डॉक्टर, नेता, मंत्री, संत्री पैसे के गुलाम हो गये थे। रिश्वत को शिष्टाचार के सुनहरे फ्रेम में जड कर हर जगह टांग दिया गया था। 'टी मनी' और 'लकी मनी' के बिना कोई फाइल आगे नहीं सरकती थी। देखते ही देखते हालात इतने खराब होते चले गये कि भ्रष्टाचार में नामी-गिरामी मंत्रियों, अफसरों और जजों तक के नाम उजागर होने लगे। ताकतवर बेहद मजे में थे। आम जनता की चिंताओं और परेशानियों की कोई सीमा नहीं थी। अफसरों और नेताओं को लग रहा था कि उनकी लूटमारी पर कभी कोई अंकुश नहीं लगा पायेगा। वे जनता के धन पर ऐश करते रहेंगे और जनता चुपचाप तमाशा देखती रहेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। जब भ्रष्टाचार की इंतहा हो गयी तो लोग सडकों पर उतर कर भ्रष्टाचारियों को गिरफ्तार करनेकी मांग करने लगे। आमजनों के आक्रोश और नारों की गूंज से हांगकांग की सरकार हिल उठी। हांगकांग में कई ईमानदार चेहरे भी थे जिन्होंने नारों के संदेश को समझा और परिवर्तन का बीडा उठाया। मात्र दो दशक में हांगकांग भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से मुक्त हो गया। कल का भ्रष्ट हांगकांग आज ईमानदार देश कहलाता है। हांगकांग को यह तमगा बडी मेहनत के बाद मिला। भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को जेल की हवा खिलायी गयी और आम जनता को भी सतर्क किया गया कि यदि रिश्वत दी तो खैर नहीं...। जब देने वाले ही नहीं होंगे तो लेने वालों के पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता। अपना देश यहीं मार खा गया है। यहां देने वालों की भी भरमार है। जो सरकारी धन जनता के हित में खर्च होना चाहिए उसका ८५ प्रतिशत हिस्सा अफसर, मंत्री और दलाल मिल बांटकर हडप कर जाते हैं। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। रिश्वतखोरी और तमाम भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाजें भी उठती हैं पर उनमें 'हांगकांग' जैसा दम कभी नजर नहीं आता। यदा-कदा कुछ चेहरे सडकों पर उतरे जरूर पर लोग उनके साथ खडे नजर नहीं आये। लोग किसी के साथ तभी खडे होते हैं जब उन्हें उस पर पूरा यकीन हो। धोखा-दर-धोखा खाने की भी कोई सीमा होती है। हिंदुस्तान की आम जनता तथाकथित क्रांतिकारियों के हाथों कई बार छली जा चुकी है। सिर्फ एक जयप्रकाश नारायण ही थे जिनकी राष्ट्रभक्ति पर किसी को संदेह नहीं था। पूरा देश उनके पीछे हो लिया था पर उस महात्मा को भी पेशेवर नेताओंने छलने और आहत करने में कोई कमी नहीं की। जे.पी. की क्रांति ने कुछ खोटे सिक्कों की भी तकदीर बदल डाली और सत्ता का स्वाद भी चखवाया। पर देश के हालात बद से बदतर होते चले गये। जो लोग देश के लुटेरों के कर्मकांडों से नावाकिफ थे उनकी समझ में भी यह बात आ गयी है कि देश अगर ऐसे ही लुटता रहा तो कुछ भी नहीं बचेगा। शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ चली जाएगी। रिश्वतखोरी, मिलावटखोरी, धोखाधडी और फरेब के जाल में उलझी जनता को वर्षों से किसी निस्वार्थ जन सेवक की तलाश रही है। यह तलाश अन्ना हजारे के रूप में साकार होती दिखायी दे रही है।अन्ना हजारे एक ऐसे कर्मयोगी हैं जिनमें देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। जयप्रकाश नारायण के बाद एक ऐसा शख्स दिखायी दिया है जिस पर हर देशवासी आंख मूंदकर यकीन कर सकता है। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ खुली जंग छेड चुके बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे वर्तमान व्यवस्था से दुखी होने के कारण आमरण अनशन पर हैं। महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानने वाले अन्ना भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सरकार से कडे कानून की मांग यूं ही नहीं कर रहे। वे आम जनता के बीच रहकर निरंतर भ्रष्टाचारियों और अनाचारियों का तमाशा देखते चले आ रहे हैं। जिनके हाथ में सत्ता है वही लूट का तांडव मचाये हुए हैं। चोर जब जज बन जाए तो न्याय की अर्थी निकलना तय है। देश की विधानसभाओं और संसद में ऐसे लोगों की भरमार है जो दोनों हाथों सेदौलत समेटने में लगे हैं। कानून इनके समक्ष बेहद बौना होकर रह गया है। राजनेताओं की देखा-देखी अफसर, व्यापारी, उद्योगपति भी देश को कंगाल करने के दुष्चक्र को गति दे रहे हैं। देश में ऐसा वातावरण बना कर रख दिया गया है कि कई लोग अब भ्रष्टाचार को गुनाह नहीं मानते। ऐसे में खून-पसीना बहाकर बडी मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटाने वाला आम आदमी कहां जाए और क्या करे? अन्ना की पहल को दूसरी लडाई की शुरुआत भी कहा जा रहा है। अन्ना बेहद जिद्दी हैं। कोई भी लडाई उन्होंने कभी अधूरी नहीं छोडी। सरहद पर दुश्मन के दांत खट्टे कर चुका यह ७२ वर्षीय बुजुर्ग ४३ साल तक जन लोकपाल विधेयक का इंतजार करते-करते जब थक गया तो सरकार को उसका फर्ज याद दिलवाने के लिए उसे दिल्ली के जंतर-मंतर में पहुंचकर शंख बजाना पडा। इस शंख की आवाज दूर तक सुनायी दे रही है। जन लोकपाल विधेयक बनने और उसके लागू हो जाने पर भ्रष्ट सांसदों, विधायकों, जजों, मंत्रियों और तमाम सफेदपोश डाकूओं को दिन में तारे नजर आने लगेंगे। कोई भी ताकत उन्हें जेल जाने से नहीं बचा पायेगी। सरकार के होश उडाते अन्ना को छोटा गांधी भी कहा जाता है। पर जिस तरह से वे व्यवस्था के खिलाफ लोहा ले रहे हैं उससे तो यही लगता है कि देश को एक और गांधी मिलने वाला है। यह गांधी लोगों के इस भ्रम का भी अंत कर दिखायेगा कि देश से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी खत्म नहीं किये जा सकते।
Tuesday, April 5, 2011
जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं
आजकल देश बाबामय हो गया है। जिधर देखो उधर बाबा। रामदेव बाबा की तोचल पड़ी है। वे शातिर राजनेताओं को भी पीछे छोड़ने लगे हैं।पिछले हफ्ते वे नारंगी शहर नागपुर में पधारे थे। उनके शहर में आने सेपहले उनके चेले-चपाटे दावा करते नहीं थक रहे थे कि बाबा को सुननेके लिए तीन से चार लाख तक की भीड़ जुटेगी। जमकर प्रचार हुआ। रामदेवकी तुलना जयप्रकाश नारायण से की गयी। जिस दिन बाबा की सभा थी, उस दिनके तमाम अखबार उनके गीत-गान से भरे पडे़ थे। हर छोटे-बडे़ अखबारको उसकी हैसियत के हिसाब से विज्ञापन देकर प्रसन्न कर दिया गया था। शहरमें जहां-तहां लगे बडे़-बडे़ बैनर और पोस्टर बता रहे थे कि बाबा केपीछे थैलीशाहों की जमात खड़ी हो चुकी है। खुद बाबा भी सत्ता पाने केलिए अपनी तिजोरी का मुंह खोल चुके हैं।शहर के नामी-गिरामी मैदान में बाबा के निर्देशन में ग्रामनिर्माण सेराष्ट्रनिर्माण रैली आयोजित की गयी। जिसमें मुश्किल से दस-बारह हजार लोगही नजर आ रहे थे। यह लोग लाये गये थे या खुद आये थे यह भी खोज काविषय है। मंच पर भी तरह-तरह के धुरंधर विराजमान थे। कुछ तो ऐसे थेजिन्हें देखकर लोग विस्मित थे और सोच रहे थे कि क्या बाबा ऐसे चेहरोंकी बदौलत देश में क्रांति लायेंगे? चेहरे बेहद प्रसन्न थे। उनके चेहरे कीरंगत उनके अरमानों की दास्तां कह रही थी। ऐसा लग रहा था कि देश कीमनमोहन सरकार शीघ्र ही धराशायी होने वाली है और बाबा के इर्द-गिर्दमंडराने वाली मधुमक्खियों के मंसूबे पूरे होने वाले हैं। बाबा भाषण देनेके लिए खडे़ हुए। भीड़ में कहीं कोई उत्साह नहीं था। बाबा भ्रष्टाचारके खिलाफ लडा़ई लड़ने और देश का कायाकल्प करने का राग अलापरहे थे कि अचानक एक जूता उछला। यह वही जूता था जो अक्सर देश केधंधेबाज किस्म के राजनेताओं पर बरसता रहा है। बाबा का जूते से स्वागतकरने वाला बाबा का ही भक्त था जो बहुत दूर से यह सोचकर आया था कियोगी के करिश्माई व्यक्तित्व से रूबरू होने का सुअवसर मिलेगा। पर यहांयोगी तो भोगी की मुद्रा में था। सत्ता पर काबिज होने की उनकी लालसाऔर कटाक्ष-कटारी बडे़-बडे़ सत्ताखोरों को शर्मिंदा कर रही थी। वेदेश के दिग्गज नेताओं के बारे जिस फूहड़ भाषा का इस्तेमाल कर रहे थेवह यकीनन संत की भाषा तो कतई नहीं थी।अर्धसैनिक बल के जवान मीतू सिंह राठौर जिसने बाबा को जूते की सलामीदी, उसका कहना था वह योगी रामदेव के पास योग सीखने गया था लेकिन वेजिस तरह की लफ्फाजी कर रहे थे, उससे उसका खून खौल उठा। उसे गुस्से नेइतना बेकाबू कर दिया कि उसने बाबा पर जूता फेंककर दे मारा। गुस्सायेजवान का यह भी कहना था कि रामदेव को योग के बारे में कुछ तोकहना चाहिए था। पर उन्होंने उस कला के बारे में एक शब्द भी नहीं कहाजिसने उन्हें देश और दुनिया में उन्हें इतना मालदार और लोकप्रिय बनाया है।राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते बाबा ‘योग के साथ गद्दारी कर रहे हैं।लोग उन्हें कभी माफ नही करेंगे। मैंने तो अभी शुरुआत भर की है।आगे-आगे देखिये क्या-क्या होता है...।राजनेताओं को जब इस तरह का ‘प्रसाद मिलता है तो वे गदगद हो जाते हैं।‘जूते को वे अपनी लोकप्रियता और तरक्की की निशानी मानते हैं। जूताप्रचार भी दिलाता है और सुरक्षा भी। जूता कांड के बाद बाबा की सुरक्षाको लेकर उनके भक्त तरह-तरह की चिंताएं और सवाल उठाते देखे गये।जेड श्रेणी की सुरक्षा के मजबूत घेरे में घूमने वाले बाबा पर आसानी सेजूता चलते ही सारा दोष पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था के मत्थे मढ़ दिया गया।लोग कई तरह के सवाल करते देखे गये। जो योगी देश और दुनिया कोभयमुक्त होने का संदेश देता है वह खुद इतना भयभीत क्यों है? जो खुद डराऔर सहमा हुआ हो वह लोगों की qचताएं और समस्याएं कैसे दूर करपायेगा? बाबा के चेले-चपाटों ने जब ‘सुरक्षा को लेकर नाराजगी का रागछेड़ा तो पुलिस आयुक्त ने सफाई दी कि बाबा रामदेव की सुरक्षाचाक-चौबंद थी। स्वयंसेवकों की लापरवाही के चलते जूता उछल गया। फिरजूता भी तो किसी गैर ने नहीं बल्कि बाबा के परम भक्त ने ही चलाया। सजगभक्तों के निशाने पर आ चुके बाबा रामदेव हिंदुस्तान का बेताज बादशाहबनना चाहते हैं। खुद को किंगमेकर की भूमिका में देखने को बेताब हैं।बडे़-बडे़ रईसों को पीछे छोड़ चुका यह विचित्र योगी टाटाओंऔर अंबानियों को मात देने की भी फिराक में है। योग शिविरों मेंमोटी फीस वसूलने और महंगी कारों में घूमने वाले बाबा दोनों हाथ मेंलड्डू रखते हुए गरज रहे हैं। पर इतिहास गवाह है कि जो गरजते हैं वो बरसतेनहीं। कुछ कर गुजरने वाले किसी और ही मिट्टी के बने होते हैं।देश के प्रदेश राजस्थान में स्थित जयपुर से कोई साठ किलोमीटर की दूरीपर स्थित है सोडा गांव। इस गांव की सरपंच हैं छवि राजवत जिन्होंने अपनेगांव की तस्वीर और तकदीर बदलने के लिए लाखों रुपये की अपनी लगी लगायीनौकरी पर लात मार दी। तीस वर्षीय छवि देश की पहली सरपंच हैं जो एमबीएहैं और युवा भी। पिछले दो साल में छवि ने गांव में ऐसे-ऐसे बदलावकिये जो आजादी के इतने वर्ष गुजर जाने के बाद भी गांववासियों के लिएसपना थे। लोगों के सपनों को साकार करने में जुटी छवि का कहना हैकि तीन साल में मैं अपना गांव बदलकर रख दूंगी। छवि के इरादों औरकुछ कर गुजरने के जुनून की स्वरलहरी विदेशों तक गूंजने लगी है। वेनेताओं और बाबाओं की तरह हो हल्ला मचाने में यकीन नहीं रखतीं। छवितो सिर्फ करके दिखाने में विश्वास रखती हैं...। यह कलम यकीनन छवि कोसलाम करती है और ...।
Thursday, March 24, 2011
यह फर्ज हमें निभाना है...
यकीनन ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है जो यह मानते हैं कि शरीफ आदमी को पुलिस वालों से दूरी ही बना कर रखनी चाहिए। पर क्या वाकई यह धारणा उचित है? इस धारणा के वशीभूत होकर कहीं हम समाज और देश का नुकसान तो नहीं कर रहे?महाराष्ट्र के प्रगतिशील कहे जाने वाले शहर नागपुर में बीते दिनों एक इंजिनियरिंग छात्रा की दिन दहाडे हत्या कर दी गयी। मोनिका किरनापुरे नामक यह छात्रा सुबह साढे दस बजे कॉलेज के समीप पहुंची ही थी कि धारदार हथियार से वार कर उसे सडक पर ढेर कर दिया गया। अज्ञात हत्यारे अपना काम कर भाग खडे हुए। मोनिका की जिस जगह पर निर्मम हत्या की गयी वहां अच्छी खासी चहल-पहल थी। लोग आ-जा रहे थे। हथियार से घायल हुई मोनिका काफी देर तक सडक पर बिलखती और तडपती रही। लोग आते-जाते रहे। आखिरकार मोनिका ने अपने प्राण त्याग दिये। दूसरे दिन अखबारों में खबर छपी। एक और हत्या में इजाफा हुआ। पुलिस वाले हत्यारों को पकडने के अभियान में जुट गये। पर जब दस दिन बीतने के बाद भी पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लगा तो पुलिस पर निष्क्रियता के आरोप लगने लगे। महाराष्ट्र सरकार ने हत्यारों की जानकारी देने की ऐवज में एक लाख रुपया का ईनाम देने की घोषणा कर दी। मोनिका के माता-पिता शहर के विभिन्न नेताओं से मिले। विधायकों और मंत्रियों के दरवाजे पर पहुंच कर बेटी के हत्यारे को तुरंत पकडने की गुहार लगायी। सभी तरफ से आश्वासन मिले। बेचारे मां-बाप एवं परिवार के अन्य सदस्य उस जगह पर भी पहुंचे जहां पर उनकी दुलारी बिटिया की नृशंस हत्या कर दी गयी थी। उनका यहां पर पहुंचने का एक मकसद यह भी था कि हो सकता है किसी को उन पर दया आ जाए, उसकी सोयी हुई आत्मा जाग जाए, और वह हत्यारों का नाम-पता या और कोई खोज खबर उजागर कर दे। घटनास्थल पर पूरा परिवार फूट-फूट कर रोया। फूल अर्पित कर पूजा-अर्चना की गयी। अथाह दु:ख में डूबे मोनिका के परिजनों को विलाप करते देख पत्थर से पत्थर इंसान का दिल पसीज गया। आसपास भी‹ड बढती चली गयी। लोग दिलासा भी देते रहे कि हत्यारे जल्द पकडे जाएंगे। लोगों की सांत्वना ने मोनिका के परिजनों पर कोई असर नहीं डाला। मोनिका की मां को तडपते और सिर पटक-पटक कर रोते देख आसपास रहने वाला कोई शख्स पानी का गिलास ले आया। आंसुओं के समुंदर में डूबी मां ने पानी पीने से इंकार करते हुए अपनी भडास निकाल ही दी-'तब तुम लोग कहां थे जब मेरी बेटी यहीं पर खून से तर-बतर कराह रही थी... पानी... पानी चिल्ला रही थी पर तुम में से कोई भी उसे पानी देने के लिए नहीं आया। सब तमाशा देखते रहे!'अपनी बेटी को खो चुकी मां हत्या स्थल के निकट रहने वाले नागरिकों से खुल कर सामने आने और बेखौफ सच बताने की फरियाद करती रही। उसने यह भी कहा कि आज मेरी बेटी की हत्या हुई है और अगर आप लोग इसी तरह से चुप्पी ओढे रहे तो कल किसी और की बेटी को भी निशाना बनाया जा सकता है। नागपुर के पुलिस कमिश्नर ने भी प्रत्यक्षदर्शियों को अपनी चुप्पी तोडने की अपील की। अपराधियों के आतंक के भय से हर कोई सहमा हुआ था। अधिकांश नागरिक यह धारणा बना चुके हैं कि अराजक तत्व अक्सर पुलिस पर भारी पड जाते हैं। उनके खिलाफ गवाही देना मौत को निमंत्रण देना है। कई पुलिस वालों की गुंडे-बदमाशों से यारी भी कोई नयी बात नहीं है। मोनिका की हत्या के तेरह दिन बाद अंतत: पुलिस विभाग को जनता से यह अनुरोध करना पडा कि ई-मेल एसएमएस से हत्यारे का सुराग दें। हत्यारे को पकडने के लिए और भी कई नये तरीके अपनाये गये। जनता का मनोबल बढाया गया पर यह पंक्तियां लिखे जाने तक हत्यारों का कोई अता-पता नहीं चल पाया था। लोगों के मन में यकीनन यह बात घर कर चुकी है कि वक्त पडने पर पुलिस उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती। हत्यारों, बलात्कारियों और तमाम अपराधियों के सामने पुलिस बौनी है। यह दुर्दशा केवल नागपुर भर की नहीं है। दिल्ली, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, बैंगलूरू आदि...आदि तमाम महानगर इस गंभीर समस्या की गिरफ्त में हैं। सरे बाजार हत्या और बलात्कार हो जाते हैं और कोई माई का लाल सामने आकर गवाही देने की हिम्मत नहीं दिखाता। न जाने कितनी मोनिकाएं हत्यारों के हाथों खत्म कर दी जाती है और कोई सुराग नहीं मिल पाता। दरअसल हर नागरिक इस भ्रम में रहता है कि वह तो सुरक्षित है। उसके परिवार की बहू-बेटी के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं होगा और जब हो जाता है तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाती है।नगरों-महानगरों में रहने वाले नागरिक मशीनी जीवन जीते-जीते खुद भी मशीन बनकर रह गये हैं। वे हद दर्जे के संवेदनहीन और स्वार्थी होते चले जा रहे हैं। उन्हें तो बस अपनी चमडी और दमडी की चिंता रहती है। तभी तो भरे बाजार हत्याएं हो जाती हैं। बलात्कार हो जाते हैं। लोग आंखें मींचे आगे बढ जाते हैं। लोग पुलिस की चक्करबाजी से बचना चाहते हैं। दरअसल कई भुक्तभोगी निराशा और हताशा के शिकार हो चुके हैं। जिन्होंने कभी सामने आने की हिम्मत दिखायी और डटे रहे उनके अनुभव और परिणाम भी ज्यादा अच्छे नहीं रहे। उन्हें तरह-तरह की तकलीफें झेलनी पडीं। कानून भी उनका रक्षा कवच नहीं बन पाया। तय है कि यह जो हालात हैं उन्हें किसी भी सूरत में अच्छा नहीं कहा जा सकता। पर हम और आप यह क्यों भूल गये हैं कि चुप्पी, खामोशी और तटस्थता अपराधियों के हौसले बढाती है। माना कि सच की लडाई लडने में कई तकलीफें झेलनी पडी हों पुलिस और अदालत की भागदौड में पसीना बहाया गया हो पर इसका अर्थ यह तो नहीं हम गुंडे-बदमाशों को मनमानी करने की छूट दे दें और अपनी मां-बहनों की हत्याएं करने और इज्जत लूटने के लिए खुला छोड दें? पुलिसवाले भी इंसान हैं। सभी बुरे नहीं हैं, कुछ अच्छे भी तो हैं। हमें उनकी निष्ठा पर संदेह जताने का कोई अधिकार नहीं है। जो लोग देश और समाज के शत्रु हैं उनकी असली जगह जेल है। उन्हें जेल पहुंचाने का फर्ज हम सबको हर हाल में निभाना है...।
Saturday, March 12, 2011
पीडा में मुस्काओ थोडा
आज भी होली का नाम सुनते ही दिल प्रफुल्लित हो उठता है। आंखों के सामने कई-कई रंग तैरने लगते हैं। होली ही एकमात्र ऐसा त्योहार है जो लगभग हर देश में किसी न किसी रूप और नाम के साथ मनाया जाता है।हम भारतवासी तो वैसे भी उत्सव प्रेमी कहलाते हैं। हर त्योहार बडे उत्साह के साथ मनाना हमारी परंपरा का हिस्सा रहा है। पर होली की तो बात ही निराली है। इंसानों के साथ-साथ खुद प्रकृति भी इस उमंगों भरे त्योहार को मनाने के लिए लालायित रहती है। रंग-बिरंगे फूलों से महकती हवाओं में गूंजने वाला यह मधुर संदेश सहज ही सुना जा सकता है कि ऊपर वाले ने इस धरती पर हर प्राणी को गाने और मुस्कराने के लिए भेजा है। इंसान का जीवन तो वैसे भी अनमोल है। बार-बार नहीं मिलता। इसलिए जीवन में जितनी खुशियां लूट सकते हो लूट लो। निराशा और हताशा से मुक्ति पाकर मस्ती में डूब जाओ। हर शत्रुता, भेदभाव और मनमुटाव को भुलाकर दुश्मनों को भी गले लगा लो...। इसलिए तो कहा गया है कि बसंत ऋतु का यह उत्सव स्नेह, अपनत्व, उल्लास का ऐसा उत्सव है जिसकी खुमारी जीवन का वास्तविक आनंद देती है। इस सर्वसमावेशी त्योहार के मनाये जाने के पीछे हमारे पूर्वजों की मूल भावना यकीनन यही रही होगी कि समाज में अपनत्व, भाईचारा और अमन शांति बनी रहे। आपसी रिश्तों की डोर ढीली न होने पाये। पर क्या वाकई बुजुर्गों की मंशा और सीख पर अमल होता है? यह इंसान की फितरत है कि वह जिन्हें अपना आदर्श मानता है उन्हीं का अनुसरण भी करता है। पिछले दिनों युवा नेता वरुण गांधी की शादी सम्पन्न हुई। वरुण गांधी कांग्रेस पार्टी की सुप्रीमो सोनिया गांधी के परिवार के अभिन्न अंग हैं। यह बात दीगर है कि सोनिया गांधी और वरुण गांधी की मां मेनका गांधी के बीच वर्षों से मनमुटाव चला आ रहा है। शादी से पूर्व वरुण गांधी खुद अपनी ताई सोनिया को ससम्मान आमंत्रित करने गये थे। वरुण को यकीन था कि उसके भाई राहुल गांधी और बहन प्रियंका तो उसकी खुशी में हर हाल में शामिल होंगे ही। देश के असंख्य लोगों की निगाहें इस ओर लगी थीं। करोडों लोग ऐसे भी थे जो यह मानकर चल रहे थे कि मैडम सोनिया इस शादी में अवश्य परिवार सहित शिरकत कर एक महान उदाहरण पेश करेंगी। वे पूर्व में भी देश के समक्ष अपनी महानता, त्याग और दरियादिली की मिसालें पेश करती आयी हैं। पारिवारिक रंजिश तो बहुत छोटी बात होती है। बडे लोग इन रंजिशों से बहुत ऊपर होते हैं। परंतु वरुण गांधी की शादी में न सोनिया पहुंचीं और न ही राहुल और प्रियंका। सोनिया भक्त यह भी कह सकते हैं कि यह तो गांधी परिवार का आपसी मामला है। आम लोगों का इससे क्या लेना-देना...। कांग्रेसी सफाई देने के लिए स्वतंत्र हैं और लोग भी सोचने और निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। सच तो यह है कि कांग्रेस सुप्रीमो के प्रति आम सजग जनों की जो विभिन्न टिप्पणियां आयीं उन्हें सकारात्मक तो कतई नहीं कहा जा सकता। वैसे भी भारतीयों के लिए शादी ब्याह भी किसी उत्सव से कम नहीं होते। जब बडों ने त्योहारों की गरिमा का ख्याल रखना बंद कर दिया है तब आम आदमी को कोसना व्यर्थ है। इसलिए तो कहते हैं कि पूर्व में मनायी जाने वाली होली और आज की होली में काफी परिवर्तन आ चुका है। पहले लोग वाकई दिल खोलकर होली खेला करते थे। ऊंच-नीच और अपने पराये की भावना को भूलकर आत्मीयता के साथ एक-दूसरे को रंगों की बौछारों में भिगो दिया जाता था। ढोल-मजीरा, नगाडे की थाप और होली के गीतों के बीच भंग की मस्ती की बात ही कुछ खास हुआ करती थी। पर अब तो होली शराब और कबाब के बिना अधूरी मानी जाती है। होली के दूसरे दिन देश के लगभग सारे अखबार खून-खराबे और पुरानी शत्रुताओं और रंजिशों को भुनाने की खबरों से भरे रहते हैं। अधिकांश अमन-प्रेमी होली के दिन घर में दुबक कर रहना पसंद करते हैं। वे बाहर निकल कर कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। महिलाओं का तो सडकों पर अकेले निकलना ही मुश्किल हो जाता है। सडकों पर या तो पुलिस वाले होते हैं या फिर ऐसे युवकों की मदहोश टोलियां जो पी-खाकर इतनी मस्तायी रहती हैं कि उन्हें किसी की बहन-बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड करने में कोई भय नहीं लगता। देश के निरंतर बिगडते हालातों ने भी लोगों की चिंताएं बढा दी हैं। गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी तो पुरानी बातें हो गयी हैं। अब तो और भी तरह-तरह की परेशानियां हैं जिनसे देशवासी निरंतर जूझ रहे हैं।कवि वीरेंद्र मिश्र की लिखी यह पंक्तियां काबिले गौर हैं:''महानगर में रहें, या रहें गांवों में,हमने देखा है, लोग जी रहे हैं तनावों में...''त्योहार आदमी तब मना सकता है जब वह बेफिक्र हो। बेफिक्री तब आती है जब सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा हो। पर यहां तो देश के किसान आत्महत्या कर रहे हैं। युवा अपराधों की ओर अग्रसर हैं। महिलाएं असुरक्षित हैं और राजनेताओं को देश को लूटने से फुर्सत नहीं है। फिर भी हम हिंदुस्तानी बहुत दिलवाले हैं। हमने अपना हौसला नहीं खोया है और न ही इतने निराश हैं कि त्योहार मनाना छोड दें। यह त्योहार ही तो हैं जो हमें तमाम परेशानियों को भुला देने की ताकत देते हैं। होली तो फिर होली है...युवा कवि गिरीश पंकज की कविता की कुछ पंक्तियों के साथ आप सबको होली की अनेकानेक शुभकामनाएं-जीना भी एक कला हैपीडा में मुस्काओ थोडासाफ दिखेगा तुम्हें नजारापरदे जरा उठाओ थोडाखुशियां हो जाती हैं दूनीबेशक इन्हें लुटाओ थोडाहोगा परिवर्तन भी इक दिनसोए लोग जगाओ थोडा।
Thursday, March 10, 2011
बंधे हुए हाथ
शासन और प्रशासन की मेहरबानी से शिक्षा के क्षेत्र को भी बाजार बना कर रख दिया गया है। राजनेताओं और धन्नासेठों ने जब से इस क्षेत्र में अपनी पैठ जमायी है तभी से देश को न तो ढंग के डॉक्टर मिल पा रहे हैं और न ही इंजिनियर। मां-बाप को अपनी औलादों को डॉक्टर और इंजिनियर बनाने के लिए लाखों रुपये भेंट में चढाने पडते हैं तब कहीं जाकर कॉलेज में प्रवेश मिल पाता है। गरीबों के बच्चों का डॉक्टर और इंजिनियर बनने का ख्वाब अधूरा ही रह जाता है। उनकी योग्यता धरी की धरी रह जाती है और रईसों की नालायक औलादें भी बाजी मार ले जाती हैं। देश के न जाने कितने ऐसे अस्पताल हैं जहां मोटी फीस झटकने के बाद भी अनाडी डॉक्टर मरीजों की जान ले लेते हैं और उनका बाल भी बांका नहीं हो पाता। बडे-बडे शहरों और महानगरों में ऐसे-ऐसे आलीशान अस्पताल खुल गये हैं जहां आम आदमी घुसने से भी घबराता और कतराता है। इलाज का तो सवाल ही नहीं उठता। धन्नासेठों की पूंजी से खुले फाइव स्टार और सेवन स्टार अस्पतालों में अधिकतर उन्हीं मरीजों की भीड होती है जिनकी जेबें लबालब भरी होती हैं और लाख-पचास हजार तो वे छोटी-मोटी शारीरिक जांच के नाम पर ही अर्पित करने की हैसियत रखते हैं।डॉक्टरों के साथ-साथ अधिकांश इंजिनियरों के भी यही हाल हैं। जनसेवा और देश सेवा से उनका कोई वास्ता नहीं है। सबको अंधाधुंध कमायी की पडी है और इसके लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार हैं। मंत्री नेता और इंजिनियर पुल बनाते हैं और कुछ ही साल में उनका जो हश्र होता है उसे हम और आप देखते रह जाते हैं। आधे से ज्यादा रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाती है। मीडिया चीखता चिल्लाता है पर किसी को कोई फर्क नहीं पडता। कई बार तो ऐसा भी लगता है मीडिया भी इस सारे खेल में शामिल है। देश की विभिन्न शिक्षण संस्थाओं में पैसा बोलता है और पैसा ही चलता है यह तो खबर पुरानी है। अब जो नयी खबर आयी है वह उन माता-पिता को बेहद परेशान कर देने वाली है जो अपनी बेटियों को डॉक्टर बनाने का सपना संजोये रहते हैं। जबलपुर के नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढाई कर रही युवतियों को परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए देहभोगियों के बिस्तर की शोभा बनने को विवश किया जाता रहा है। यह कोई ऐसी-वैसी खबर नहीं है जिसे पढ कर यूं ही भुला दिया जाए। डॉक्टर बन देश और समाज की सेवा करने का सपना देखने वाली युवतियों को यौन शोषण का शिकार होना पडे तो इससे बडी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। जिन युवतियों को भविष्य में समाज को रोगमुक्त करना है उन्हीं को हमारे और आपके बीच रहने वाले भेडिये देह से ज्यादा कुछ नहीं समझते। इसलिए वे उन्हें 'रोगी' बनाकर रख देना चाहते हैं। उनकी मंशा है कि सारी नारी बिरादरी देह के चक्र में उलझ कर रह जाए। उनके लिए वेश्याओं और मेडिकल छात्राओं में कोई फर्क नहीं। युवक-युवतियों को डॉक्टर बनाने वाले देश भर में और भी सैकडों मेडिकल कॉलेज हैं। संयोग से अभी भंडाफोड एक ही कॉलेज का हुआ है और जो सच्चाई बाहर आयी है वह तो यही बता रही है कि पास होने के लिए जहां युवकों को धन देना पडता है वहीं छात्राओं को भोगियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने की पीडा से गुजरना पडता है। यह शर्मनाक हकीकत पर्दे में ही सिमटी रह जाती अगर एक मेडिकल छात्रा ने मुंह न खोला होता। ध्यान रहे कि मुंह तभी खुलता है जब बर्दाश्त करने की ताकत खत्म हो जाती है। कोई भी भारतीय लडकी इस तरह के आरोप लगाने से पहले हजार बार सोचती है क्योंकि वह जानती है कि हमारा समाज किस मिट्टी का बना हुआ है। यहां तो बलात्कार की शिकार हुई लडकियों को ही शंका की निगाह से देखा जाता है। यह कितनी शर्म की बात है कि भावी लेडी डॉक्टरों को शरीर नुचवाने के लिए मजबूर करने वालों में पुरुष ही नहीं महिलाएं भी शामिल हैं। पुरुषों में कॉलेज के उपकुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, छात्र नेता और विभिन्न दलालों के नाम हैं तो महिलाएं भी पढी-लिखी और इज्जतदार घरानों से ताल्लुक रखती हैं। लगता है पढे-लिखे और इज्जतदार लोगों को भी ऐसे धतकर्म रास आने लगे हैं। हैरान और परेशान कर देने वाली बात तो यह भी है कि एक नामी मेडिकल कॉलेज में पास करवाने के बदले अस्मत लूटने का दुष्चक्र वर्षों तक चलता रहता है और प्रशासन की आंख तभी खुलती है जब एक युवती अपनी इज्जत को दावपर लगाकर शोर मचाती है कि मेडिकल कॉलेज नरपशुओं के चंगुल में फंस चुका है। यह नरपशु इतने वहशी और कमीने हैं कि इन्हें अपनी बेटी और पोती की उम्र की लडकियों के साथ बिस्तरबाजी करने में शर्म नहीं आती। ऐसा तो हो नहीं सकता कि कॉलेज के सभी शिक्षक देहखोर हों। बुरों के बीच कहीं न कहीं अच्छे लोग भी होते हैं पर इन अच्छों की अच्छाई तब बेहद आहत करती है जब वे जानबूझकर आंखें मूंदे रहते हैं। इस हैरतअंगेज तथ्य को भी कैसे नजर अंदाज कर दें कि जैसे ही भावी लेडी डॉक्टरों की लाज लूटने का मामला सामने आया तो समाज के कुछ ठेकेदार जिसमें मंत्री और नेता शामिल हैं, अस्मत के लुटेरों को बचाने के लिए अपनी आवाजें बुलंद करने लगे। जिनसे हम समाज की गंदगी दूर करने की उम्मीद रखते हैं वही खुद कितने गंदे और ओछे हैं उसका खुलासा भी हो गया है। सच तो यह है कि अगर इन देह शोषकों पर नेताओं और मंत्रियों की कृपा दृष्टि न होती तो वे इतनी घिनौनी हरकत को अंजाम ही नहीं दे पाते। इस तरह के नालायक और पथभ्रष्ट जनप्रतिनिधि भी तो हम और आप ही चुनते हैं ऐसे में अगर यह कहा जाए कि यह सब हमारी ही करनी का फल है तो किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए।जब मैं यह पंक्तियां लिख रहा था तब मेरे सामने महिला दिवस के रंग में रंगे ढेरों अखबार पडे थे। दिमाग में बार-बार यह सवाल सिर उठाता रहा कि जिस देश में शिक्षा के मंदिरों में युवतियों को अपनी अस्मत अर्पित करने को विवश कर दिया जाता हो वहां पर चंद महिलाओं की विकास गाथा के गीत गाने के आखिर क्या मायने हो सकते हैं? असली सच तो यह है कि देश की बेटियों की इज्जत लुट रही है और सजा देने वाले हाथ बंधे हुए हैं...।
Thursday, March 3, 2011
कहां से आएगा सच्चा नायक?
रिश्वत लेने और देने वाले पहले से ज्यादा चालाक हो गये हैं। नोटों की गड्डियां मुसीबत खडी कर सकती हैं इसलिए शातिर और चालाक लोगों ने इस परंपरा को निभाने के लिए नये-नये तौर तरीके ईजाद कर लिये हैं। अभी हाल ही में नालको के चेयरमैन सह प्रबंध निदेशक को सोने की ईटे लेते पकडा गया है। देने वाले का भी पता चल गया है पर उसे फौरन सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका। हमारे यहां यही सबसे बडी बुराई भी है और कमजोरी भी। रिश्वत देने वाले को वो सजा नहीं दी जाती जिसका वह हकदार होता है। देने वाले न हों तो लेने वालों के पैदा होने का सवाल ही नहीं उठता। अपना काम निकालने के लिए नौकरशाहों को भ्रष्ट करना व्यापारियों और उद्योगपतियों का जाना-पहचाना धंधा है। ये धंधेबाज सोने और चांदी की ईटों की खैरात बांटकर मंत्रियों और अफसरों को खरीदते-खरीदते न जाने कितनी सफलता (?) की सीढिंयां चढ जाते हैं। इनमें से कुछ टाटा, बिडला, अंबानी बन पूरे देश को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं और खून-पसीने की कमायी खाने वाले इन्हें देखते ही रह जाते हैं। यह ऐसी दास्तां है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। हदें पार हो चुकी हैं इसलिए हाहाकार मचा है जो बहुत दूर तक सुनायी दे रहा है। कल तो जो सच्चाई पर्दे में कैद थी आज पूरी तरह से बाहर आ गयी है। लोग जान गये हैं कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में देश का किसी भी हालत में भला नहीं हो सकता। भला सिर्फ उन्हीं का होगा जिनके हाथ में सत्ता है या फिर जो सत्ता को खरीदने की ताकत रखते हैं। देश की विधानसभाओं और संसद में भ्रष्टाचारियों का ही वर्चस्व है। अधिकांश विधायक और सांसद देश को लूटने की फिराक में लगे रहते हैं। उनके पास उनके लिए भी वक्त नहीं जिन्होंने इन पर आस्था जताकर लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचाया। जिन्होंने मंदिरों की पवित्रता नष्ट कर दी है क्या उन्हें दंड नहीं मिलना चाहिए...? कौन इन्हें दंडित करेगा? आज यह सवाल सभी देशप्रेमियों के दिल और दिमाग में हलचल मचाये हुए है। देश को किसी सच्चे नायक की तलाश है। पर अफसोस! सवा सौ करोड की आबादी वाले देश में आज एक भी सच्चा नायक नहीं मिल रहा है। दरअसल जिस रफ्तार से नायक खलनायक बनते चले गये उसी के चलते अब भारतवासी किसी पर आसानी से यकीन करने को तैयार नहीं हैं।देश को अपने चंगुल में ले चुके सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ योग गुरु बाबा रामदेव ने ताल ठोक दी है। उनके साथ समाज सेवक अन्ना हजारे, भाजपा के कारतूस रामजेठमलानी, किरण बेदी, सुब्रम्हण्यम स्वामी, गोविंदाचार्य, स्वामी अग्निवेश, कवि हरिओम पवार जैसे लडाकू चेहरे भी खडे नजर आ रहे हैं। बीते सप्ताह देश की राजधानी दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में बाबा ने ऐलान किया कि 'हम योग भी सिखाएंगे और भ्रष्टाचार को भी मिटाएंगे। विदेशों में जमा किया काला धन वापस लाया जाएगा। यही नहीं, देश के बच्चों को राजनीति व भ्रष्टाचार रोकने की शिक्षा भी दी जाएगी।' कांग्रेस पर खुल कर निशाना साधते बाबा के विचारों से हर कोई सहमत है पर घूम-फिर कर बात वहीं पर आ जाती है कि क्या देश की तमाम जनता इस बडबोले योगी पर विश्वास करने को तैयार है? कहा जा रहा है कि राजनीति में आने की छटपटाहट में योग गुरु बाबा रामदेव आज हर वह पैंतरा अपना और आजमा रहे हैं जो राजनीति और सत्ता का भूखा व्यक्ति अपनाता है। राजनीति के धुरंधरों का यह भी मानना है कि बाबा को अपने बारे बहुत बडी गलतफहमी हो गयी है। वे यह भूल गये हैं कि लोग उनके पास योग सीखने और निरोगी रहने के गुर जानने के लिए आते हैं। बाबा अपने योग कार्यक्रमों में एकत्रित होने वाली अपार भीड को देख हवा में उड रहे हैं और उन्हें लगने लगा है कि यह भीड उन्हें एक राजनेता के रूप में भी स्वीकार करने को आतुर है।बाबा रामदेव खुद को साधु-संन्यासी कहते नहीं थकते। पर वे यह भी भूल गये हैं कि राजनीति संत का पेशा नहीं है। योग की दुकान से सत्ता के गलियारों में अपनी पैठ जमाने की तीव्र लालसा पाले बाबा के विरोध में जहां बहुतेरे लोग ख‹डे नजर आते हैं वही उनके पक्षधरों की भी कमी नहीं है। अच्छी-खासी पूंजीपतियों की जमात उनके साथ है। कुछ मीडिया दिग्गज भी प्रचारक और प्रायोजक की भूमिका में हैं। सत्ता की चाशनी किसे अच्छी नहीं लगती। इसके लिए अच्छे-अच्छों को भटकते देखा गया है। मुझे यह पंक्तियां लिखते वक्त साध्वी उमा भारती की याद आ रही है। वे जब धार्मिक प्रवचन करती थीं तब लाखों-करोडों की चहेती थीं पर राजनीति ने उनका जो हश्र किया वो किसी से छिपा नहीं है। उमा भारती को भी यह भ्रम हो गया था कि उनके प्रवचन सुनने के लिए जो हजारों-लाखों की भीड जुटती है वह उन्हें एक राजनेता के रूप में भी सहर्ष स्वीकार कर लेगी। वे भारतीय जनता पार्टी से जुड गयीं। एक लहर थी जिसने साध्वी की नैया पार भी लगा दी। वे मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनीं पर राजनीति के खिलाडियों ने उनके ऐसे होश ठिकाने लगाये कि वे कहीं की नहीं रहीं। आज की तारीख में साध्वी यहां से वहां भटक रही हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। राजनीति और सत्ता की भूख ने उनकी छवि को इस कदर धूमिल करके रख दिया है कि इस जन्म में तो कहीं कोई सुधार की गुंजाइश ही नहीं दिखती। बाबा रामदेव के इरादे नेक हो सकते हैं पर उनके इर्द-गिर्द खडे नजर आने वाले कुछ चेहरे पूरी तरह से स्वच्छ नहीं हैं। जेठमलानी जैसे सत्ता लोलुपों ने जब भाजपा को कहीं का नहीं छोडा तो बाबा कहां दिखेंगे राम ही जानें...। कहा तो यह भी जा रहा है कि बाबा तो पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के मोहरे हैं? इस पार्टी ने सत्ता तक पहुंचने के लिए जिस तरह से कभी साध्वी उमा भारती, ऋतंभरा और अन्य कई साधु-संतों को आगे कर वोट हथियाये थे वैसे ही बाबा को आगे खडा कर फिर से केंद्र की सत्ता पाने के सपने देखने शुरू कर दिये हैं। अगर यह सच है तो बाबा रामदेव और भाजपा के सपने धरे के धरे रह जाने वाले हैं क्योंकि इस देश की जागरूक जनता अब और अधिक धोखे खाने को तैयार नहीं है...।
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