मध्यप्रदेश के सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन का दावा है कि यदि उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दस करोड रुपये उपलब्ध करवा दें तो वे छिन्दवाडा लोकसभा सीट भाजपा के खाते में डलवा सकते हैं। फिलहाल कांग्रेस के कमलनाथ छिन्दवाडा के सांसद हैं। छिन्दवाडा लोकसभा क्षेत्र में कमलनाथ की तूती बोलती है। यह सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। सिर्फ एक बार भाजपा के बुजुर्ग नेता सुंदरलाल पटवा ने छिन्दवाडा लोकसभा से विजयश्री हासिल की थी। अपने विवादास्पद क्रियाकलापों के चलते अक्सर चर्चाओं के घेरे में रहने वाले गौरीशंकर बिसेन ने यह भी कहा है कि चुनाव प्रचार के लिए दस करोड के साथ-साथ एक हेलीकाप्टर एवं सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी का साथ अगर उन्हें मिल जाए तो वे कमलनाथ को बडी आसानी से पटकनी दे सकते हैं। हेमा मालिनी भाजपा की राज्यसभा सांसद हैं। देश के कोने-कोने के मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा इस सुंदरी का खुलकर इस्तेमाल करती रहती है। छिन्दवाडा लोकसभा चुनाव जीतने के लिए कमलनाथ जिस तरह से नोटों की बरसात करते हैं उसके सामने अन्य किसी पार्टी का प्रत्याशी टिक नहीं पाता। कमलनाथ येने-केन-प्रकारेन चुनाव जीतने के लिए कितनी दौलत लुटाते होंगे इसे लेकर तरह-तरह के अनुमान लगाये जाते हैं। वैसे भी कमलनाथ के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं है। उनके परिवार के कई उद्योगधंधे हैं। उन्हें सरकारी ठेके भी आसानी से मिल जाते हैं। इसलिए कमलनाथ जैसे सौदागर चुनाव में धन लुटाने के मामले में सदैव आगे रहते हैं। भाजपा के सहकारिता मंत्री भी चुनावी राजनीति के घाघ खिलाडी हैं। उन्हें मालूम है कि चुनाव चाहे विधानसभा का हो या लोकसभा का अंधाधुंध धनवर्षा करनी ही पडती है। न जाने कितने मतदाताओं को दारू की बोतलों, कम्बलों, साडियों और कडकते नोटों से रिझाना पडता है तभी वे वोट देने के लिए अपने घर से बाहर निकलते हैं। अब वो जमाना भी नहीं रहा कि पार्टी के कार्यकर्ता फोकट में अपना समय जाया करें। अगर चुनाव जीतना है तो गुंडे-मवालियों की फौज भी तैयार करनी पडती है और इनकी कीमत की तो कोई सीमा ही नहीं होती। ईमानदारी के साथ चुनाव लडने की मंशा रखने वाले प्रत्याशी का तो मैदान में कदम रखते ही पसीना छूटने लगता है। भारतवर्ष के चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव के लिए २५ लाख रुपये की खर्च सीमा तय की हुई है पर बिरले ही ऐसे होते हैं जो इतने रुपयों में काम चला लेते हैं। दरअसल यह अंदर की बात है कि कौन प्रत्याशी कितने करोड उडाकर चुनाव जीतता है और चुनाव आयोग के नियम-कायदों की धज्जियां उडाता है। किसी भी राजनीतिक पार्टी और उसके प्रत्याशी के द्वारा इस रहस्य को सरेआम उजागर नहीं किया जाता। गौरीशंकर बिसेन बडबोले भी हैं और भोले भी इसलिए लोकतंत्र की जडों को खोखला करते चले आ रहे गूढ मंत्र का भारी भीड के बीच जाप कर गए। यह दौर ही कुछ ऐसा है जब 'देर आये पर दुरुस्त आये' की तर्ज पर दबा और छिपा सच सामने आने लगा है। ऐसा भी नहीं है कि सजग जन इससे वाकिफ न रहे हों। इंडियन जस्टिस पार्टी के सुप्रीमो उदित राज की पीडा है कि इस देश में सिर्फ पैसे वाले ही चुनाव जीत सकते हैं। देश के अधिकांश मतदाता दारू और कम्बल में बिक जाते हैं। उन्होंने एक न्यूज चैनल पर अपना दुखडा रोते हुए बताया कि वे अच्छी-खासी सरकारी नौकरी में थे। मजे से जीवन गुजर रहा था। देश के दबे-कुचले लोगों की दुर्गति और पीडा उन्हें हमेशा आहत करती रहती थी। इसलिए उन्होंने राजनीति में कदम रखने की ठान ली। परंतु राजनीति में पदार्पण करने के बाद उनका साक्षात्कार जिस कडवी हकीकत से हुआ उससे उनकी रूह कांप उठी और पैरों तले की जमीन खिसक गयी। चुनाव हारने के बाद उन्हें एक ही बात समझ में आयी कि राजनीति में तो सिर्फ और सिर्फ पैसा ही बोलता है और धनपतियों की ही चलती है। सोच और सिद्धांत के बलबूते पर चुनाव जीतना असंभव है।उदित राज ही नहीं और भी कई सुलझे हुए लोग हैं जो यह मानते हैं कि अगर नेता भ्रष्टाचारी हैं तो अनेकों मतदाता भी बिकाऊ हैं। दरअसल भारत की यह वो तस्वीर है जिसमें हर तरफ गौरीशंकर बिसेन जैसे सत्ताधारी हैं जिनकी सोच यही जाहिर करती है कि देश के मतदाताओं को आसानी से खरीदा जा सकता है। यहां यह भी कहने में हर्ज नहीं है कि जिन्होंने देश को लूटा-खसोटा उन्होंने ही आम देशवासियों को भिखारी बना कर रख दिया है। इन्होंने अगर ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाया होता तो देश में इस कदर असमानता और बदहाली का आलम न होता। जो नेता नोट देकर वोट लेते हैं वे कभी भी यह नहीं चाहेंगे कि इस देश से गरीबी हटे और आम आदमी खुशहाल हो। पर अब उनके चाहने से कुछ नहीं होने वाला। मतदाताओं को इस सच का पता चल गया है कि भ्रष्टाचारियों के झांसे में आकर उन्होंने अभी तक भारत माता का काफी अहित किया है। मजबूरन वोट बेचने वालों ने अपने स्वाभिमान का कभी सौदा नहीं किया। इस देश के आम आदमी को ना जाने कितनी मजबूरियों के हाथों का खिलौना बनने को विवश होना पडता है। जिन लोगों ने भीख को अपना पेशा बना लिया है उनके अंदर की खुद्दारी भी अभी जिंदा है। नागपुर की जनता उस समय अचंभित रह गयी जब उसने जनलोकपाल ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भिखारियों को सडकों पर अन्ना हजारे के पक्ष और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते देखा। शहर के तमाम भिखारियों ने मोर्चा निकाला। उनके हाथों में जो तख्तियां थीं उन पर लिखा था:
''भिखारियों का ऐलान, सारे राजनेता हैं बेईमान, जो अन्ना को देगा धोखा, भिखारी उससे भीख नहीं लेगा।''
इसे अब आप क्या कहेंगे कि पेशेवर भिखारी भी यह कहने लगे हैं कि वे भ्रष्टाचारियों से भीख नहीं लेंगे...।
Thursday, August 25, 2011
Thursday, August 18, 2011
खत्म नहीं हुआ है सब कुछ...
राजनीति से अलविदा, नैतिक मूल्य तमाम
नंगों के इस देश में, धोबी का क्या काम...
जिस देश की जनता अपने ही चुने जनप्रतिनिधियों की धोखाधडी की शिकार हुई हो और जहां देखते ही देखते अरबों-खरबों के घोटालों और भ्रष्टाचार का इतिहास रच दिया गया हो वहां पर राजनेताओं की साख पर लगे दाग-दर-दाग से आहत होकर यदि कोई कवि उपरोक्त पंक्तियां लिखने को विवश होता है तो उसके अंदर घर कर चुके गुस्से और निराशा को नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता। इस देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्र के नाम दिये गये संदेश में जब यह कहते हैं कि अनशनों और धरना प्रदर्शनों से देश का भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता तो लोग अवाक रह जाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर जंग लडने वाले अन्ना हजारे को जब जेल भेज दिया जाता है तो आम जनता का गुस्सा फूट पडता है और वह सडक पर आ जाती है। हालात यहां तक जा पहुंचते हैं कि सरकार को झुकना पडता है। जो प्रधानमंत्री लाल किले पर अनशन और शांत आंदोलन के प्रति बेपरवाह नजर आते हैं वही अपना माथा पकड कर बैठ जाते हैं। उन्हें अंतत: अपनी गलती का अहसास हो ही जाता है। अन्ना की जीत में आम जनता की जीत शामिल है और यही लोकतंत्र का असली चेहरा है जिसे हुक्मरान नजरअंदाज करते आये हैं। आंकडे चीख-चीख कर बता रहे हैं कि वर्ष १९९२ से लेकर अब तक देश में छत्तीस महाघोटाले हो चुके हैं, जिनकी वजह से देशवासियों के खून पसीने के ८० लाख करोड भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में समा चुके हैं। इस देश का आम आदमी तरह-तरह की समस्याओं से निरंतर जूझ रहा है पर राजनेताओं ने उसकी चिंता करनी ही छोड दी है। देश के लिए नासूर बन चुके भ्रष्टाचार के कारण ही महंगाई बेलगाम हो चुकी है। खाद्यान और दूसरी जरूरी वस्तुओं के मूल्यों में बेहिसाब वृद्धि के चलते पिछले तीन सालों में उपभोक्ताओं की जेब से छह लाख करोड रुपये काला बाजारियों, नेताओं, दलालों और बेईमान व्यापारियों की जेबों में जा चुके हैं। मुल्क में बडे ही सुनियोजित ढंग से लूट-खसोट का कारोबार चल रहा है। राजनेता, अफसर, उद्योगपति, व्यापारी और छोटे-बडे सरकारी कर्मचारी अपने-अपने तौर-तरीकों के साथ भ्रष्टाचार को बेखौफ होकर अंजाम देते चले आ रहे हैं। उन्हें दबोचने के मामले में देश का कानून इतना बौना है कि उसकी कुछ भी चल नहीं पाती। ऐसे में जब अन्ना हजारे जनलोकपाल के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाने के लिए सामने आये तो भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता उनके साथ खडी हो गयी। यह बात सरकार को रास नही आयी। पर देशवासी परिवर्तन चाहते हैं। उनकी बर्दाश्त करने की हिम्मत जवाब दे चुकी है। आम आदमी को हर जगह भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरों का सामना करना पडता है। पढाई से लेकर नौकरी तक अपनी जेबें ढीली करनी पडती हैं। कई लोग तो यह भी मान चुके हैं कि हिंदुस्तान से भ्रष्टाचार पूरी तरह से खत्म हो ही नहीं सकता। दरअसल इस तरह के नकारात्मक और निराशावादी विचार लोगों में इसलिए अपनी जगह बना चुके हैं क्योंकि जिन्हें देश को चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी उनमें से अधिकांश नेता भ्रष्ट और बेईमान निकले। नेताओं की देखा-देखी अफसरशाही ने भी लोगों को बुरी तरह से निराश और हताश किया है। पिछले दिनों काली कमायी करने वाले कई मंत्रियों और अफसरों को जेल भेजा गया। मध्यप्रदेश के आईएएस अधिकारी अरविंद जोशी और टीनू जोशी के यहां से बरामद हुई अपार दौलत ने तो आयकर अधिकारियों को भी हतप्रभ कर दिया। नोट गिनने के लिए मशीने मंगवानी पडीं। इसतरह की भ्रष्ट जमात देश के हर प्रदेश में भरी पडी है। महिलाएं भी भ्रष्टाचार के मामले में पीछे नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं बीते जब सीबीआई ने पंजाब के शहर मोहाली की प्रथम महिला डीएसपी राका गीरा को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार करने में सफलता पायी। राका गीरा ने लोगों की इस धारणा के परखच्चे उडाकर रख दिये कि महिलाएं काफी हद तक संवेदनशील ईमानदार होती हैं। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से दूर रहती हैं। इस महिला पुलिस अधिकारी के घर मारे गये छापे में करोडों रुपये की नगदी, हीरे जवाहरात तथा हथियार तो मिले ही साथ ही 'बार' में सजी जो विदेशी शराब की पचासों बोतलें मिलीं उनसे यह भी स्पष्ट हो गया महिलाएं भी नशाखोरी में इतिहास रच रही हैं। उन्होंने खुद को किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार कर लिया है। उन्हें भी पुरुषों की तरह मौकों का इंतजार रहता है। फिर भी पूरी तरह से निराश होने की जरूरत नहीं है। अभी भी देश में अन्याय से लडने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। यह बात दीगर है कि उन्हें वो तवज्जो नहीं दी जाती जिसके वे हकदार हैं। यह वो लोग हैं जो लाख तकलीफें सहने के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। बडी से बडी मुसीबत और तूफान के सामने डटे रहते हैं।मदुराई के जिलाधिकारी यू. सागायम का नाम भले ही ज्यादा जाना-पहचाना न हो पर वर्षों से जो लडाई वे लडते चले आ रहे हैं उसे हाशिये में नहीं डाला जा सकता। सागायम एक ऐसे आईएएस अधिकारी हैं जिन्हें अपने उसूलों पर कायम रहने की वजह से १८ बार तबादलों की सज़ा भुगतनी पडी है पर फिर भी उनका मनोबल नहीं टूटा है। वे न खुद रिश्वत लेते हैं और न ही किसी को लेने देते हैं। उनकी इस परिपाटी के चलते उनके दुश्मनों की संख्या भी कम नहीं है। उनसे न तो उनके उच्चाधिकारी खुश रहते हैं और न ही नीचे वाले। उन्होंने दो वर्ष पूर्व स्वेच्छा से अपनी संपत्ति की घोषणा करते हुए बताया था कि उनके पास सात हजार एक सौ बहत्तर रुपये का बैंक बैलेंस और १९ लाख रुपये का एक मकान है। ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभाते चले आ रहे इस अधिकारी की बेटी जब गंभीर रूप से बीमार हुई तो अस्पताल में भरती कराने के लिए उनके पास एक मुश्त पांच हजार रुपये भी नहीं थे। यकीनन बेहद हैरतअंगेज सच्चाई है यह। उस समय यू. सागायम आबकारी विभाग में उपायुक्त थे। इस देश में आबकारी अधिकारी करोडों के वारे-न्यारे करते रहते हैं पर कुछ ऐसे भी हैं जो कहीं भी रहें, अपना ईमान नहीं बेचते। इसी तरह से अपने यहां चंद ऐसे राजनेता भी हैं जिन्होंने अपने माथे पर चरित्रहीन होने का दाग नहीं लगाया है। ऐसे लोग ही आशाएं जगाते हैं कि अगर ठान लिया जाए तो देश में कैंसर की शक्ल अख्तियार कर चुके भ्रष्टाचार के कलंक को मिटाया और धोया जा सकता है:
''अभी खत्म नहीं हुआ है सबकुछ
बचा है औरतों में धीरज
बाकी है बच्चों में भोली मुस्कान
आदमी की आंखों में अभी भी हैं सपने
दुनिया को खूबसूरत व बेहतर बनाने के लिए
बाकी है बहुत कुछ
अभी खत्म नहीं हुआ है सबकुछ''।
नंगों के इस देश में, धोबी का क्या काम...
जिस देश की जनता अपने ही चुने जनप्रतिनिधियों की धोखाधडी की शिकार हुई हो और जहां देखते ही देखते अरबों-खरबों के घोटालों और भ्रष्टाचार का इतिहास रच दिया गया हो वहां पर राजनेताओं की साख पर लगे दाग-दर-दाग से आहत होकर यदि कोई कवि उपरोक्त पंक्तियां लिखने को विवश होता है तो उसके अंदर घर कर चुके गुस्से और निराशा को नजरअंदाज भी तो नहीं किया जा सकता। इस देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्र के नाम दिये गये संदेश में जब यह कहते हैं कि अनशनों और धरना प्रदर्शनों से देश का भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता तो लोग अवाक रह जाते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर जंग लडने वाले अन्ना हजारे को जब जेल भेज दिया जाता है तो आम जनता का गुस्सा फूट पडता है और वह सडक पर आ जाती है। हालात यहां तक जा पहुंचते हैं कि सरकार को झुकना पडता है। जो प्रधानमंत्री लाल किले पर अनशन और शांत आंदोलन के प्रति बेपरवाह नजर आते हैं वही अपना माथा पकड कर बैठ जाते हैं। उन्हें अंतत: अपनी गलती का अहसास हो ही जाता है। अन्ना की जीत में आम जनता की जीत शामिल है और यही लोकतंत्र का असली चेहरा है जिसे हुक्मरान नजरअंदाज करते आये हैं। आंकडे चीख-चीख कर बता रहे हैं कि वर्ष १९९२ से लेकर अब तक देश में छत्तीस महाघोटाले हो चुके हैं, जिनकी वजह से देशवासियों के खून पसीने के ८० लाख करोड भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों में समा चुके हैं। इस देश का आम आदमी तरह-तरह की समस्याओं से निरंतर जूझ रहा है पर राजनेताओं ने उसकी चिंता करनी ही छोड दी है। देश के लिए नासूर बन चुके भ्रष्टाचार के कारण ही महंगाई बेलगाम हो चुकी है। खाद्यान और दूसरी जरूरी वस्तुओं के मूल्यों में बेहिसाब वृद्धि के चलते पिछले तीन सालों में उपभोक्ताओं की जेब से छह लाख करोड रुपये काला बाजारियों, नेताओं, दलालों और बेईमान व्यापारियों की जेबों में जा चुके हैं। मुल्क में बडे ही सुनियोजित ढंग से लूट-खसोट का कारोबार चल रहा है। राजनेता, अफसर, उद्योगपति, व्यापारी और छोटे-बडे सरकारी कर्मचारी अपने-अपने तौर-तरीकों के साथ भ्रष्टाचार को बेखौफ होकर अंजाम देते चले आ रहे हैं। उन्हें दबोचने के मामले में देश का कानून इतना बौना है कि उसकी कुछ भी चल नहीं पाती। ऐसे में जब अन्ना हजारे जनलोकपाल के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाने के लिए सामने आये तो भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता उनके साथ खडी हो गयी। यह बात सरकार को रास नही आयी। पर देशवासी परिवर्तन चाहते हैं। उनकी बर्दाश्त करने की हिम्मत जवाब दे चुकी है। आम आदमी को हर जगह भाई-भतीजावाद और रिश्वतखोरों का सामना करना पडता है। पढाई से लेकर नौकरी तक अपनी जेबें ढीली करनी पडती हैं। कई लोग तो यह भी मान चुके हैं कि हिंदुस्तान से भ्रष्टाचार पूरी तरह से खत्म हो ही नहीं सकता। दरअसल इस तरह के नकारात्मक और निराशावादी विचार लोगों में इसलिए अपनी जगह बना चुके हैं क्योंकि जिन्हें देश को चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गयी उनमें से अधिकांश नेता भ्रष्ट और बेईमान निकले। नेताओं की देखा-देखी अफसरशाही ने भी लोगों को बुरी तरह से निराश और हताश किया है। पिछले दिनों काली कमायी करने वाले कई मंत्रियों और अफसरों को जेल भेजा गया। मध्यप्रदेश के आईएएस अधिकारी अरविंद जोशी और टीनू जोशी के यहां से बरामद हुई अपार दौलत ने तो आयकर अधिकारियों को भी हतप्रभ कर दिया। नोट गिनने के लिए मशीने मंगवानी पडीं। इसतरह की भ्रष्ट जमात देश के हर प्रदेश में भरी पडी है। महिलाएं भी भ्रष्टाचार के मामले में पीछे नहीं हैं। ज्यादा दिन नहीं बीते जब सीबीआई ने पंजाब के शहर मोहाली की प्रथम महिला डीएसपी राका गीरा को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार करने में सफलता पायी। राका गीरा ने लोगों की इस धारणा के परखच्चे उडाकर रख दिये कि महिलाएं काफी हद तक संवेदनशील ईमानदार होती हैं। भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से दूर रहती हैं। इस महिला पुलिस अधिकारी के घर मारे गये छापे में करोडों रुपये की नगदी, हीरे जवाहरात तथा हथियार तो मिले ही साथ ही 'बार' में सजी जो विदेशी शराब की पचासों बोतलें मिलीं उनसे यह भी स्पष्ट हो गया महिलाएं भी नशाखोरी में इतिहास रच रही हैं। उन्होंने खुद को किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार कर लिया है। उन्हें भी पुरुषों की तरह मौकों का इंतजार रहता है। फिर भी पूरी तरह से निराश होने की जरूरत नहीं है। अभी भी देश में अन्याय से लडने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। यह बात दीगर है कि उन्हें वो तवज्जो नहीं दी जाती जिसके वे हकदार हैं। यह वो लोग हैं जो लाख तकलीफें सहने के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। बडी से बडी मुसीबत और तूफान के सामने डटे रहते हैं।मदुराई के जिलाधिकारी यू. सागायम का नाम भले ही ज्यादा जाना-पहचाना न हो पर वर्षों से जो लडाई वे लडते चले आ रहे हैं उसे हाशिये में नहीं डाला जा सकता। सागायम एक ऐसे आईएएस अधिकारी हैं जिन्हें अपने उसूलों पर कायम रहने की वजह से १८ बार तबादलों की सज़ा भुगतनी पडी है पर फिर भी उनका मनोबल नहीं टूटा है। वे न खुद रिश्वत लेते हैं और न ही किसी को लेने देते हैं। उनकी इस परिपाटी के चलते उनके दुश्मनों की संख्या भी कम नहीं है। उनसे न तो उनके उच्चाधिकारी खुश रहते हैं और न ही नीचे वाले। उन्होंने दो वर्ष पूर्व स्वेच्छा से अपनी संपत्ति की घोषणा करते हुए बताया था कि उनके पास सात हजार एक सौ बहत्तर रुपये का बैंक बैलेंस और १९ लाख रुपये का एक मकान है। ईमानदारी के साथ अपना कर्तव्य निभाते चले आ रहे इस अधिकारी की बेटी जब गंभीर रूप से बीमार हुई तो अस्पताल में भरती कराने के लिए उनके पास एक मुश्त पांच हजार रुपये भी नहीं थे। यकीनन बेहद हैरतअंगेज सच्चाई है यह। उस समय यू. सागायम आबकारी विभाग में उपायुक्त थे। इस देश में आबकारी अधिकारी करोडों के वारे-न्यारे करते रहते हैं पर कुछ ऐसे भी हैं जो कहीं भी रहें, अपना ईमान नहीं बेचते। इसी तरह से अपने यहां चंद ऐसे राजनेता भी हैं जिन्होंने अपने माथे पर चरित्रहीन होने का दाग नहीं लगाया है। ऐसे लोग ही आशाएं जगाते हैं कि अगर ठान लिया जाए तो देश में कैंसर की शक्ल अख्तियार कर चुके भ्रष्टाचार के कलंक को मिटाया और धोया जा सकता है:
''अभी खत्म नहीं हुआ है सबकुछ
बचा है औरतों में धीरज
बाकी है बच्चों में भोली मुस्कान
आदमी की आंखों में अभी भी हैं सपने
दुनिया को खूबसूरत व बेहतर बनाने के लिए
बाकी है बहुत कुछ
अभी खत्म नहीं हुआ है सबकुछ''।
Wednesday, August 3, 2011
इज्जत की जंग
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी भारत आई तो प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छा गयीं। अखबारों और न्यूज चैनलों ने पडौसी देश की इस महिला मंत्री की शिक्षा-दीक्षा और राजनीतिक सूझबूझ के बारे में देशवासियों को अवगत कराना कतई जरूरी नहीं समझा। बस हर तरफ उनके खूबसूरत चेहरे, पहनावे और रहन-सहन का बखान होता रहा। अमेरिका की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से होटल मैनेजमेंट में एमएससी कर चुकीं ३४ वर्षीय हिना एक सुलझी हुई महिला हैं और अपनी योग्यता की बदौलत पाकिस्तान की पहली विदेश मंत्री बनने में सफल हुई हैं। उन्होंने पाकिस्तान में वर्ष २००८ में हुए आम चुनाव में पी पी पी की टिकट पर चुनाव लडा था और हजारों वोटों से जीती थीं। यानी हिना सिर्फ अपनी खूबसूरती की वजह से इस मुकाम तक नहीं पहुंची हैं। हिना को भारत यात्रा के दौरान यही बात खटकती रही कि हिंदुस्तानी मीडिया ने उसे महज आकर्षक मॉडल की तरह पेश किया और उसकी उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया। हिना की कातिल खूबसूरती और पतली कमर का गुणगान तो पाकिस्तान के अखबार भी करते रहे हैं पर हिना को भारत से ऐसी उम्मीद नहीं थी। हिना के मन में यह बात बैठ गयी है कि भारतीय मीडिया ने उनके साथ बेशर्मी भरा रवैया अख्तियार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। उनके राजनीतिक कद की अनदेखी करते हुए सिर्फ और सिर्फ उनकी फैशनपरस्त कीमती पोशाक, डिजायनर हैंडबैग और कीमती धूप के चश्में पर बार-बार टिप्पणी कर बेशर्मी की सारी हदें पार कर दीं। नारियां चाहे कहीं की भी हों पर उन्हें हमेशा यह शिकायत रहती है कि बेशर्मों की निगाहें उनके पहनावे और देह के भूगोल पर ही टिकी रहती हैं। इसमें सिर्फ मीडिया को दोषी ठहराने से कुछ नहीं होगा। दोषियों की जमात तो हर तरफ खडी नजर आती है। कहने को दुनिया बदल चुकी है और हम २१ वीं सदी में रह रहे हैं, लेकिन पुरुष की मानसिकता नहीं बदली है। वह खुद को राजा समझता है और स्त्री को अपना गुलाम। आज की पढी-लिखी नारी पुरुषों की दादागिरी सहने को तैयार नहीं है। वह उनकी इस सोच से बेहद खफा है कि नारियां देह मात्र हैं। पुरुषों की वासना को भडकाने के लिए वे जानबूझकर बदन दिखाऊ वस्त्र पहनती हैं। पुरुषों की इसी मानसिकता के खिलाफ दिल्ली में 'बेशर्मी मोर्चा' निकाला गया। दरअसल इस मोर्चे की प्रेरणा उन्हें कनाडा से मिली जहां एक पुलिस अधिकारी ने यह कहा कि हम महिलाओं को तभी सुरक्षा दे पायेंगे जब वे स्लट (बेशर्म) कपडे पहनना छोड देंगी। हिंदुस्तान में भी ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि महिलाओं का पहनावा पुरुषों को उकसाता है और ऐसे में कई बार वे बेकाबू हो जाते हैं। आखिर वे भी तो इंसान हैं...। राजधानी में निकाले गये बेशर्मी मोर्चा को इज्जत की जंग भी कहा गया। इस जंग में भाग लेने वाली लडकियों का कहना था कि हम आजाद देश की आजाद नागरिक हैं। हमें क्या पहनना है और कैसे रहना है यह फैसला करने का अधिकार किसी ओर को कतई नहीं है। हम मॉडर्न कपडे पहनें या छोटे कपडे इस पर पुरुषों को मिर्ची क्यों लगती है? एक सुलझी हुई अभिनेत्री का बयान आया कि दिल्ली देश की राजधानी है फिर भी यहां महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। जिन लोगों की सोच गंदी है वही लोग यह कहते हैं कि लडकियों का कम कपडे पहनना, फैशन करना या देर रात घर से बाहर निकलना छेडछाड को बढावा देता है। अगर ऐसा होता तो भंवरी देवी का बलात्कार नहीं होता।वैसे यह सच है कि उन महिलाओं के साथ भी बलात्कार होते देखे गये हैं जो बनाव श्रृंगार से दूर रहती हैं और बदन उघाडू वस्त्र भी नहीं पहनतीं। छेडछाड और बलात्कार के लिए महिलाओं के पहनावे को दोषी ठहराने वालों के लिए नारियां इंसान न होकर हाट में खरीदे गये पशु के समान हैं जिन्हें मनमाने ढंग से सताने में उन्हें मज़ा आता है। मज़ा लेने में तो मीडिया भी नहीं चूकता। न्यूज चैनल वालों की नजर में पाकिस्तानी हिना रब्बानी हों या हिंदुस्तानी लडकियां सब एक समान हैं। ये वही देखते हैं जो इन्हें दिखाना होता है। 'बेशर्मी मोर्चा' के दौरान अधिकांश चैनल वालों ने सारा फोकस महिलाओं के पहनावे पर ही केंद्रित रखा और उन लडकियों को बार-बार दिखाया जो आधे-अधूरे कपडे पहन कर अंग प्रदर्शन कर रही थीं। महिलाओं का शारीरिक शोषण करने वाले जहां-तहां भरे पडे हैं। पुलिस थानों में महिला सिपाहियों पर बलात्कार और दुष्कर्म की खबरें अक्सर पढने में आती रहती हैं। शिक्षण संस्थानों में जहां नैतिकता और शालीनता का पाठ पढाया जाता है वहां भी छात्राओं का शीलहरण हो जाता है। वासनाखोरों के लिए मर्यादा महत्वहीन है। नारी देह ही हमेशा उनके निशाने पर रहती है। मौका मिलते ही वे शैतानियत पर उतर आते हैं। इसे अब आप क्या कहेंगे कि चेन्नई के एक कॉलेज में शिक्षक ने छात्रा को बाथरूम में ले जाकर कपडे उतारने को विवश कर दिया। बताते हैं कि इस कॉलेज में छात्राओं के मोबाइल फोन ले जाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है। शिक्षक महाशय ने पहले बैग की तलाशी ली फिर तलाशी के नाम पर वो कर्मकांड कर डाला जिससे इस सोच पर मुहर लग गयी कि लडकियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। चेन्नई के इस कॉलेज में तलाशी के बहाने छात्राओं को निर्वस्त्र करने की कुछ घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। सच तो यह है कि महिलाओं के प्रति समाज का जो नजरिया है उसमें नीचे से ऊपर तक खोट ही खोट है। गंवार ही नहीं पढे-लिखे भी स्त्रियों पर बलात्कार का कहर ढाने और हिंसा के चाबुक बरसाने में अपनी बहादुरी समझते हैं। कई बार भरी भीड की आंखों के सामने राह चलती महिलाओं की इज्जत तार-तार कर दी जाती है पर लोग तटस्थ बने रहते हैं। समाज की इसी संवेदनहीनता की वजह से अगर महिलाएं बेशर्मी मोर्चा निकालती हैं तो समाज के कई ठेकेदारों को तकलीफ क्यों होती है?
Thursday, July 28, 2011
धोखेबाजों की गिरफ्त में छटपटाता देश
राष्ट्रमंडल खेलों में अरबों-खरबों के वारे-न्यारे करने के आरोपी सुरेश कलमाडी के बारे में एक अजब-गजब जानकारी आयी है कि उन्हें भूल जाने की बीमारी है। वैसे अभी तक नेताओं को लपेटे में लेने वाली कई तरह की बीमारियों के बारे में सुना और जाना जाता था पर स्मृतिलोप नामक यह नयी बीमारी अचंभित कर देने वाली है। यह बीमारी इंसान को भुलक्कड बना देती है। कलमाडी के परिजनों का कहना है कि यह उनकी पुरानी बीमारी है।अभी तक तो हम यही सुनते आये थे कि नेताओं की स्मरण शक्ति लाजवाब होती है पर यहां तो उल्टा हो गया! खिलाडियों के खिलाडी के घरवालों का यह भी कहना है कि कलमाडी कई बार तो कल का खाया-पिया भी याद नहीं रख पाते। इस अजूबी खबर को जिसने भी सुना वह हैरान होने के बजाय भ्रष्ट नेताओं की कौम को कोसता नजर आया। खुद को बचाने के लिए ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। अपने यहां वैसे भी ऐसे-ऐसे महंगे वकीलों की अच्छी-खासी तादाद है जो अपने मुवक्किल को पाक-साफ दर्शाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें खोजते रहते हैं। तय है कि जेठमालानी टाइप के किसी वकील ने अपना दिमाग लडाया है और भ्रष्टाचारी की याददाश्त खो जाने की खूबसूरत कहानी गढ कर पेश कर दी है। पर अब देशवासी ऐसी कहानियों पर कतई यकीन नहीं करते। कानून की आंख में धूल झोंकने के लिए गढी गयी इस कहानी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि इस मुल्क के नेता आम जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नये-नये बहाने और तरीके तलाशने में कोई कसर नहीं छोडते। यह लोग अक्सर कामयाब भी हो जाते हैं। दरअसल इनका कोई ईमानधर्म ही नहीं है। अब टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले में जेल की हवा खा रहे पूर्व दूरसंचार मंत्री की याददाश्त वापिस लौट आयी है। वे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि मैंने जो कुछ भी किया उसकी पूरी जानकारी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम को थी। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर डाली है। यह बात दीगर है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से इस्तीफा लेने में उनका पसीना छूट गया। कांग्रेस के एक नेता मणिशंकर अय्यर की निगाह में कांग्रेस पार्टी एक सर्कस है। परंतु सजग देशवासियों को हर राजनीतिक पार्टी के रंग-ढंग सर्कस जैसे नजर आते हैं। इस सर्कस में जोकर भी हैं और लुटेरे भी जिन्होंने देश का तमाशा बनाकर रख दिया है। इनके बेशर्म तमाशों से उकता कर अदालत को हंटर उठाने को विवश होना पड रहा है। क्या यह सरकार के लिए शर्म की बात नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट को उसे बार-बार फटकार लगानी पडती है और उसके बाद ही वह जागती है। २२ अगस्त २००८ के दिन कैश फॉर वोट कांड का मामला सामने आया था। इस संगीन मामले को दबाने के भरसक प्रयास किये गये। सरकार ने तो आंखें ही मूंद ली थीं। पर कोर्ट की लताड के बाद हलचल शुरू हो पायी। सत्ता के दलाल अमर सिंह कटघरे में हैं। अमर सिंह ही खरीद फरोख्त और लेन-देन की असली कडी थे। पाठक मित्रों को याद होगा कि अमेरिका से एटमी करार के मुद्दे पर वाम मोर्चा के साठ सांसदों ने मनमोहन सरकार से जब समर्थन वापस ले लिया था तब सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। यदि उस संकट के समय समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य छोटे दल समर्थन नहीं देते तो सरकार धराशायी हो जाती। तब भाजपा के तीन सांसदो ने लोकसभा में विश्वास मत से ठीक पहले एक करोड रुपयों की नोटों की गड्डियां लहराते हुए धमाका किया था कि उन्हें गैरहाजिर रहने के लिए यह नोट दिये गये हैं। यह एक तरह से लोकतंत्र की हत्या का मामला था। हत्यारों में अमर सिंह के साथ-साथ सोनिया गांधी के खासमखास अहमद पटेल ने भी सुर्खियां बटोरी थीं। पर धीरे-धीरे शोर थम गया और राजनीति के दलाल दूसरे कामों में लग गये। इस तरह के और भी कई मामले हैं जिन्हें नेताओं ने मीडिया को खुश करते हुए आसानी से दबाकर रख दिया है। कैश फार वोट के मामले में यदि मीडिया का एक वर्ग अपना जमीर नहीं बेचता तो इसका तभी पर्दाफाश हो जाता। पर जहां चोर-चोर मौसेरे भाइयों का वर्चस्व हो वहां सच्चाई के सामने आने की उम्मीद रखना खुद को धोखा देने से ज्यादा और कुछ नहीं है। ऐसे में अगर यह कहा जाए कि हमारा मुल्क धोखेबाजों की गिरफ्त में छटपटा रहा है तो गलत नहीं होगा।
Thursday, July 21, 2011
जरूरी है जयचंदो की शिनाख्त
खबर है कि भारत सरकार ने हाल ही में दो अत्याधुनिक विमान खरीदें हैं। हर तरह के सुरक्षा उपकरणों से सुसज्जित इन विमानों की कीमत सैकडों करोड रुपये है। इन्हें खासतौर पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए मंगवाया गया है ताकि उडान के दौरान उन पर कोई आंच न आए। इस देश में १० करोड ऐसे बदनसीब हैं जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिल पाता। खुले आकाश के नीचे अपनी रातें गुजारने वालों की संख्या भी बेहिसाब है। आम लोगों की सुरक्षा का कहीं अता-पता नहीं है। शासकों के पास इनकी चिंता करने का समय ही नहीं है। वे अपनी ही लडाई में उलझे हैं। इस मनमोहन सरकार का क्या हश्र होगा कुछ भी समझ में नही आ रहा है। यह तय है कि इससे कोई भी खुश नहीं है। चारों तरफ असंतोष के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार के प्रति लोगों का विश्वास इस कदर घट चुका है कि अब वे मानने लगे हैं कि यह सरकार उनके किसी काम की नहीं। पर कोई विकल्प भी नहीं है। आखिर करें तो क्या करें! मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों ने तो जैसे लोगों को जागने के लिए विवश कर दिया है। जागे हुए लोग स्पष्ट देख रहे हैं कि आतंकवादियों से निपटने के लिए यह सरकार खुद को तैयार नहीं कर पा रही है। इच्छाशक्ति का तो जैसे दिवाला ही पिट गया है। देश में जितनी बार भी बम धमाके हुए हैं सभी में कहीं न कहीं इनके पीछे पाकिस्तान खडा दिखायी दिया है पर मनमोहन सरकार हाथ पर हाथ धरे रहने के सिवाय और कुछ भी नहीं करना चाहती। कांग्रेसी जिस राहुल गांधी को येन-केन प्रकारेन देश का प्रधानमंत्री बनाने पर तुले हैं वे कहते हैं कि देश में होने वाली सभी आतंकवादी घटनाओं को रोकना संभव नहीं है। कांग्रेसियों के इस भावी प्रधानमंत्री ने यह कहकर देशवासियों को अचंभे में डाल दिया है। राहुल गांधी से तो लोग कुछ और ही उम्मीद लगाये हुए थे। उनका बयान यह कहता प्रतीत होता है कि सरकार के पास और भी कई काम हैं। यही एक समस्या नहीं है जिसपर वह हर वक्त माथापच्ची करती रहे। देशवासी मनमोहन सरकार की कमजोरी से अच्छी तरह से वाकिफ हो गये हैं। यही कमजोरी है जिसके चलते आतंकियों के मंसूबे आसानी से पूरे होते चले आ रहे हैं और सरकार चलानेवाले जख्मों पर मरहम लगाना छोड पडौसी देश के हौसले बढाने के काम में लगे हैं। १३ जुलाई को हुए मुंबई बम धमाकों में अपनी जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों और घायलों के दिल पर क्या बीती होगी जब उन्होंने कांग्रेस के महान नेता दिग्विजय सिंह के यह बोलवचन सुने होंगे कि इन धमाकों के पीछे हिंदू कट्टरवादियों का हाथ हो सकता है। बिना किसी सबूत के इतनी बडी बात कह गुजरने वाले नेताजी के लिए तो यह रोजमर्रा का काम है पर जिन्होंने अपनों को खोया है उनके लिए तो यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं हो सकती। इस तरह की भ्रामक बयानबाजी करने वाले नेताओं की कौम यह भूल गयी है कि उनके यही बयान आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान तक यह संदेश पहुंचाते हैं कि हिंदुस्तान के नेता तो एक दूसरे पर कीचड उछालते रहते हैं। इनमें एकता का नितांत अभाव है इसलिए इनके देश में बम-बारुद बिछाते रहो और इन्हें आपस में लडाते रहो। पाकिस्तान अपने मकसद में कामयाब होता चला आ रहा हैं। ये नेताओं के ही बयान हैं जो देशवासियों के दिलों में भी एक-दूसरे के प्रति संदेह के बीज बोने का भी काम करते हैं। आतंकवाद से लडने के लिए सही सोच और सही राह पर चलने की बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे नेताओं को अहमदाबाद की रेशमा से सबक लेना चाहिए जिसने देशभक्ति का अद्वितीय उदाहरण पेश किया है। अहमदाबाद में शहजाद नामक एक शख्स को गिरफ्तार किया गया है जो अवैध हथियारों को बेचने के साथ-साथ आतंक और हिंसा फैलाने के लिए अपने घर में ही बम बनाया करता था। यह लगभग निश्चित है कि उसकी इस कारस्तानी से कुछ लोग तो जरूर वाकिफ रहे होंगे पर किसी ने भी उसके इस राष्ट्रद्रोही कृत्य का पर्दाफाश करने की हिम्मत नहीं दिखायी। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त शहजाद का भंडाफोड करने की पहल की उसी की पत्नी रेशमा ने। रेशमा ने पुलिस को फोन पर बताया कि उसका पति बम बनाता है। पुलिस ने शहजाद को आठ बमों के साथ गिरफ्तार भी कर लिया है। रेशमा ने अपने पति को नहीं, एक राष्ट्रद्रोही को सीखंचों के पीछे पहुंचाने में अहम भूमिका निभायी है। इसके लिए उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। यह तो तय हो चुका है कि आतंकवादियों और अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता। न ही उनका किसी से कोई रिश्ता-नाता होता है। पर अक्सर देखा गया है कि अधिकांश लोग अपने आसपास चलने वाली संदिग्ध गतिविधियों को जानबूझकर या फिर भय के चलते नजरअंदाज कर देते हैं। आगे जाकर यही गलती बहुत भारी पडती है। लोग यह मानकर चलते हैं कि किसी को पकडने या पकडवाने का काम तो पुलिस के जिम्मे है। हम क्यों बेकार में आफत मोल लें। पर इस तथ्य को याद रखें कि देश की सुरक्षा एजेंसियां शक के आधार पर विदेशी चेहरों से तो पूछताछ कर सकती हैं पर अपने ही देश के हर नागरिक को संदेह के आधार पर निशाना नहीं बना सकतीं। जयचंद तो कहीं भी हो सकते हैं। हजारों मील बैठे मौत के सौदागरों के हाथ इतने लंबे हैं कि वे जयचंदो तक अपनी पहुंच बना ही लेते हैं। गद्दारों के ईमान को खरीदना बहुत आसान होता हैं। आसपास के गद्दारों की भी शिनाख्त होना निहायत जरूरी है और यह काम हम सबको मिलजुल कर करना होगा। नेताओं की तरह हवा में तीर छोडने से बात नहीं बनेगी...।
Thursday, July 14, 2011
हादसे, दुर्घटनाएं और साजिशें
जिस तरह से यह देश राम भरोसे चल रहा है वैसे ही हाल भारतीय रेल के हैं। दौडते-दौडते कब-कोई ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। बीते रविवार को दो रेल हादसे हो गये। हावडा से दिल्ली आ रही कालका मेल उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में मलवां स्टेशन के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। दूसरी तरफ असम में गुवाहटी-पुरी एक्सप्रेस के छह कोच और इंजन पटरी से उतर गये। इस हादसे में लगभग १०० लोग घायल हुए। कालका मेल के पटरी से उतरने के कारण अस्सी से अधिक यात्रियों को जान गंवानी पडी और तीन सौ से ज्यादा यात्री घायल हुए। देश के हुक्मरानों के लिए ऐसी दर्दनाक दुर्घटनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। उनके लिए यह आम बात है। हर दुर्घटना के बाद वे अपना फर्ज निभा देते हैं। मृतकों के परिवारों को कुछ लाख रुपये और घायलों को पच्चीस-पचास हजार पकडाकर चैन की नींद सो जाते हैं। भारतीय रेल की बदौलत सरकार के खजाने में अपार धन बरसता है पर यह धन पता नहीं कहां चला जाता है? अगर इस धन का सदुपयोग किया जा रहा होता तो रेल यात्रियों को बुनियादी सुविधाओं के लिए न तरसना पडता। सुविधाओं की जगह यातनाएं और मौत बांटने वाले रेलवे के कर्ताधर्ता आखिर हादसों से सबक क्यों नहीं लेते? लोगों की बेशकीमती जान चली जाती है और यह चंद सिक्के फेंककर ऐसे चलते बनते हैं जैसे किसी भिखारी को दान दे रहे हों! यह शर्मनाक सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। देश में जहां-तहां रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं। शोर मचता है। रेल मंत्रालय की तरफ से दुर्घटना के पीछे के कारणों की जांच कराये जाने की घोषणा होती है। पर जांच कभी नहीं होती। घोषणावीर जानते हैं कि जांच करवायेंगे तो खुद ही नंगे नजर आयेंगे। यही हैं जो देशवासियों को सपने दिखाते हैं कि शीघ्र ही भारत वर्ष में भी चीन और जापान की तरह ढाई से तीन सौ किलो मीटर की रफ्तार से दौडने वाली रेलगाडियां नजर आयेंगी। इनसे कोई यह तो कहे कि सपनों के सौदागरों पहले सौ किलोमीटर की रफ्तार को तो संभालो फिर बाद में चीन और जापान के सपने दिखाना।नये रेलमंत्री गद्दी संभालते ही देशवासियों को यह बताना नहीं भूले कि रेल दुर्घटनाएं तो अमेरिका और यूरोप में भी होती रहती हैं। यानी ऐसे में अगर भारत में हो रही हैं तो कौन-सा तूफान टूट पडा है। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी के पिट्ठू दिनेश त्रिवेदी रेलमंत्री के रूप में क्या गुल खिलायेंगे उसका अंदाजा उनके उपरोक्त बयान से सहज ही लगाया जा सकता है। वैसे भी रेलमंत्री का पद अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने और माल कमाने का सहज ठिकाना है। जो भी नेता रेलमंत्री बनता है उसे देश की चिंता कम और अपने प्रदेश की चिंता ज्यादा रहती है। लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और ममता बनर्जी जैसों का रेलमंत्री के रूप में किया गया कामकाज इसका गवाह है। होना तो यह चाहिए था कि देश की इस सबसे बडी यातायात सेवा पर देशवासी नाज करते। पर रेलवे को तो राजनीतिक हितों के हवाले कर दिया गया है। जो भी आता है अपने हिसाब से इसका दोहन कर चलता बनता है। किसी भी रेल मंत्री ने आंखें खोलकर हकीकत से रूबरू होने की कोशिश नहीं की। रेलवे की आधी से अधिक पटरियां इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उन्हें कबाडखाने के हवाले कर दिया जाना चाहिए। अनेकों पुल भी ऐसे हैं जिनके समीप पहुंचते ही रेल के ड्राइवरों का संभावित खतरे के भय के मारे पसीना छूटने लगता है। यह जर्जर पुल कभी भी धोखा दे सकते हैं। देश भर में ऐसे रेल फाटकों की संख्या लगभग बीस हजार के आसपास होगी जहां पर चौकीदारों की नियुक्ति नहीं की गयी है। ऐसे अंधे स्थानों पर अंधाधुंध दुर्घटनाएं होती रहती हैं और रेल मंत्रालय धन की कमी का रोना रोता रहता है और रेल मंत्री मौज मनाते रहते हैं। दरअसल मंत्रियों और नौकरशाहों की जमात इतने संवेदनहीन हो चुकी है कि उन पर बडी से बडी दुर्घटना कोई असर नहीं डालती। हर बार जब रेलवे का बजट बनता है तो नयी-नयी गाडियां चलाने की घोषणा करने में कोई भी रेलमंत्री पीछे नहीं रहता, लेकिन वर्षों से सिर ताने खडी मूलभूत समस्याओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। पटरियों पर होने वाली टक्कर को रोकने के लिए टक्कर रोधी उपकरण लगाने की पहल करना किसी भी रेलमंत्री ने जरूरी नही समझा।मंत्रीजी को तो दुर्घटनाओं में मर-खप जाने वालों के परिवारों को मुआवजा राशि थमा कर शांत कर देने का चलन फायदे का सौदा नजर आता है। यात्रियों को बुलेट ट्रेन मुहैय्या कराने के सपने दिखाने वालों की पोल कालका मेल हादसे ने पूरी तरह से खोल कर रख दी हैं। रेलवे विभाग के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई ट्रेन के डिब्बों में फंसे यात्रियों तक पहुंचने, डिब्बों की दिवारों को काटकर फंसे हुए यात्रियों को बाहर लाने के लिए पर्याप्त संख्या में गैस कटर तक नहीं थे। यही वजह थी कि कई यात्री जिन्हें बचाया जा सकता है देखते ही देखते मौत के चंगुल में जा फंसे। अगर गैस कटर होते तो मौत के आकडे को कम किया जा सकता था। गैस कटर कोई ऐसी कीमती चीज नहीं है कि जिन्हें भारतीय रेलवे खरीदने की औकात न रखता हो। यही हाल अन्य सहायता सुविधाओं का भी है। दुर्घटना घट जाती है तो रेलवे की सहायता ट्रेनों का अता-पता नहीं रहता। कालका मेल की दुर्घटना के शिकारों को जिन सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया गया वहां पर बुनियादी सुविधाएं ही नदारद थीं। कुछ घायल तो अस्पताल में ही चोरों के शिकार हो गये। सरकार ने जो सहायता राशि दी थी उसे ही उडा लिया गया। कई घायलों को सरकारी अस्पतालों को छोड प्रायवेट अस्पतालों की शरण लेनी पडी। अस्पताल में राहुल गांधी के पहुंचने की खबर सुनकर बिस्तरों पर धुली हुई चादरें बिछायी गयीं। एक घायल पर तो पंखा जा गिरा। सरकारी अस्पतालों के लिए यह रोजमर्रा का खेल है। जब सरकार ही नकारा हो तो सुधार की अपेक्षा रखना बेवकूफी से ज्यादा और कुछ नहीं है। कमजोर और निकम्मी सरकारें ही हादसों को निमंत्रण देती हैं और इन्हीं के कारण पडोसी देश पाकिस्तान के पाले-पोसे आतंकवादी बेखोफ बम बारुद बिछाकर निर्दोष भारतवासियों का खून बहाने से नहीं हिचकिचाते।
Thursday, July 7, 2011
कुछ तो करो सरकार!
विदेशों में जमा कालाधन वापस न लाने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगायी है। फटकार तभी लगायी जाती है जब कोई सुन कर भी अनसुना कर देता है। देश की सरकार के भी यही हाल हैं। अंधी और बहरी सरकार के मुंह पर तमाचा मारते हुए उच्चतम न्यायालय ने विदेशों में जमा काले धन की जांच और उसे वापस लाने के उपायों की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय विशेष जांच दल का गठन कर यह संकेत भी दे दिये हैं कि अगर शासक इसी तरह से सोये रहे तो उसे ही पहल करनी पडेगी। वैसे सरकार भी कम चालाक नहीं है। वह भी हमेशा यही कहते नहीं थकती कि उसे भी देश की चिंता है और वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और काले धन को वापस लाने की मंशा रखती है। सरकार यह संकेत देना भी नहीं भूलती कि भ्रष्टाचार को रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता। सरकार कहती तो बहुत कुछ है पर करती कुछ खास नहीं। पहाड को हिलाने के लिए उंगली लगाना काफी नहीं होता। पर सरकार का तो कुछ ऐसा ही रवैय्या दिखायी देता हैं। सरकारें पता नही इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों हो जाती हैं कि वे अपने ही देश के करोडों लोगों की गरीबी और बदहाली को नजर अंदाज कर चंद लोगों की तिजोरियां भरने के स्वार्थ में फंस कर रह जाती हैं! यह देश गरीब तो कतई नहीं है। अगर गरीब होता तो इसकी दौलत विदेशों में नही सड रही होती। अगर यह गरीब होता तो मंदिरों और देवालयों में अरबों-खरबों के हीरे-जवाहरात और सोना-चांदी ना भरे पडे होते। दरअसल इस देश को गरीब बनाया है उस सोच ने जो इंसानों को तो कुचल डालना चाहती है पर बाबाओं और पत्थर की मूर्तियों को पूजते रहना चाहती है। उसके लिए जीते जागते इंसानों की कोई कीमत नहीं है। इस देश में न जाने कितने ऐसे मंदिर और अखाडे हैं जहां अरबों-खरबों के भंडार भरे पडे हैं। कुछ पाखंडी साधु-संन्यासी और पंडे इस अपार धन-दौलत का सुख भोग रहे हैं और देश की गरीबी को चिढा रहे हैं। इन दिनों श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर का नाम देश और दुनिया में छाया हुआ है। अभी तक तो यह मंदिर देश में भी उतना जाना-पहचाना नहीं था। इस मंदिर से मिले खरबों रुपये के खजाने ने हर किसी को चौंका कर रख दिया है। एक लाख करोड रुपये कम नहीं होते। इनसे लाखों लोगों का जीवन संवर सकता है। इस मंदिर के तहखानों में से जो बेहिसाब दौलत निकली है वह तो कुछ भी नहीं है। अभी तो असली रहस्य से पर्दा उठना बाकी है। मंदिर के खजाने को लेकर देश भर में बहसबाजी का दौर भी चल पडा है। कई लोग यह चाहते हैं कि इस धन का जन कल्याण हेतु सदुपयोग होना चाहिए। तर्कशास्त्री यू. कलनाथन जैसे लोगों का मानना है कि यह धन भी इस देश के लोगों का है इसलिए इसे उनके कल्याण के लिए खर्च करने में कोई हर्ज नहीं है। वैसे भी जो धन किसी के काम न आए और पडे-पडे सड जाए उसका क्या फायदा? हीरे-जवाहरात, स्वर्ण मुद्राएं, सोने की ईटों और नोटों की गड्डियां किसी संग्रहालय या प्रदर्शनी में रखने की चीज़ नहीं हैं। परंतु इस देश में अपने ही तौर तरीकों के साथ चलने वालों की भरमार है। तभी तो लोगों के कल्याण की बात करने वाले तर्कशास्त्री का विरोध किया जाता है और उन्हें ठिकाने लगाने की कोशिश में उनके घर में तोडफोड और आगजनी की जाती है। तर्क शास्त्री को यह बात भी समझा दी जाती है कि इस देश में अपने दिल की बात उजागर करना गुनाह है। सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से अभी तो एक ही मंदिर के तहखानों ने इतनी दौलत उगली है जिससे देश के प्रदेश केरल, जहां पर यह मंदिर स्थित है का सारा कर्ज चुका कर प्रदेश के चेहरे की रौनक बढायी जा सकती है। इसी देश में शिरडी का साई मंदिर, मुंबई का सिद्धि विनायक, तिरुपति बालाजी, माता वैष्णोदेवी, श्री सबरीमाला संस्थान जैसे सैकडों मंदिर और पूजालय हैं जहां हीरे-जवाहरात, स्वर्ण मुद्राओं, सोने की इंटों और नोटों के अंबार लगे हैं। इसी देश का दूसरा चेहरा है जहां गरीबी, बदहाली और भूखमरी का साम्राज्य है। न जाने कितने युवक रोजगार न मिलने के कारण अपराधी बनने को विवश हो जाते हैं। देश में आज समस्याओं का अंबार लगा है। अधिकांश समस्याएं धन के अभाव के चलते बनी हुई हैं। देश के साधु-संतो और बाबाओं के साथ-साथ मंदिरों में जो दौलत भरी पडी है उसे उजागर करना और जनहित के काम में लाया जाना वक्त की मांग है। यह धन और दौलत इस देश का कायाकल्प कर सकते हैं। इंसानों की दुनिया में इंसानों से बढकर और भला कौन हो सकता है! जो लोग यह कहते हैं कि मंदिरों की तमाम दौलत भगवान की है तो वे यह क्यों भूल जाते हैं कि इंसानों को भी तो भगवान ने ही पैदा किया हैं। कोई भी पिता अपनी औलादों को भूख से बिलबिलाते नहीं देख सकता। अब यह सरकार सोचे कि उसे क्या करना है। जनता को भी जागना होगा। विदेशों में जमा काला धन तो जब आयेगा तब आयेगा पर देश में जहां-तहां बेकार पडे धन की अनदेखी कब तक होती रहेगी?
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