Thursday, March 1, 2012

बेचारे मधु कोडा और कृपाशंकर सिं‍ह...!

नागपुर में बहुजन समाज पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष की धुनाई कर अपना रोष जताया। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि महानगर पालिका चुनाव में टिकटें बेची गयीं। पार्टी के समर्पितों का पत्ता सिर्फ इसलिए काटा गया क्योंकि उनकी तीन लाख रुपये देने की हैसियत नहीं थी। ऐसे ही कुछ आरोप पार्टी की सुप्रीमों बहन मायावती पर भी लगते रहे हैं। उनकी निगाह में वही शख्स विधायक और सांसद बनने के लायक होता है जिसकी जेब में दम होता है। वैसे इसके लिए सिर्फ मायावती को ही क्यों दोष दें? हिं‍दुस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा में इस महारोग पर जिस तरह से कलम चलायी है, उससे इस देश की राजनीति और भ्रष्ट राजनेताओं का असली चेहरा अपने आप सामने आ जाता है। गुजराल उन चंद राजनेताओं में शामिल हैं जिन्होंने राजनीति की काजल की कोठरी में वर्षों तक चहल-कदमी करने के बाद भी खुद को दागी नहीं होने दिया। राजनीति के बदनाम खिलाडी लालू प्रसाद यादव के बिहार से तब गुजराल राज्यसभा का चुनाव लडने जा रहे थे। इसी चुनाव के सिलसिले में उनका लालू से मिलना हुआ। उन्होंने गुजराल को सचेत किया कि यदि उन्हें राज्यसभा का चुनाव जीतना है तो विधायकों के लिए थैलियों का इंतजाम करना होगा। बिना धन के काम बन पाना आसान नहीं। साफ-सुथरी राजनीति के हिमायती गुजराल के लिए लालू का यह 'मंत्र' किसी झटके से कम नहीं था। उन्होंने लालू के प्रस्ताव को फौरन नकार दिया। पर कितने हैं जो ऐसा कर पाते हैं? यह जनजाहिर सच है कि कई भ्रष्ट उद्योगपति, धनपति, अखबार मालिक और किस्म-किस्म के अपराधी धन की चमक की बदौलत ही राज्यसभा के सदस्य बनते आये हैं। इन्हें अपनी औकात का पता होता है। जनता तो इन्हें चुनने से रही इसलिए यह लालूमंत्र अपनाते हैं और बडी आसानी से अपने सभी सपनों को साकार कर लेते हैं। इस देश की राजनीति और व्यवस्था लगभग पूरी तरह से लालू मार्का नेताओं के रंग में रंगी नजर आती है। अरबों-खरबों का चारा घोटाला करने वाले लालूप्रसाद यादव की देखादेखी कितनों ने इस देश को लूटा-खसोटा इसका खुलासा धीरे-धीरे होता दिखायी दे रहा है। बताते हैं कि धन लेकर धडल्ले से चुनावी टिकटें बांटने की शुरूआत भी इन्ही महाशय ने की थी। डकैतों, गुंडों, बलात्कारियों और हत्यारों को टिकट देने का कीर्तिमान रचने वाले लालूप्रसाद यादव ने कांग्रेस की मदद से इस देश की राजनीति के सबसे बडे डकैत मधु कोडा को झारखंड का मुख्यमंत्री बनवाया था। मधु कोडा ने झारखंड में हजारों करोड का खनन घोटाला कर सिद्ध कर दिया कि वाकई वे लालू के असली चेले हैं। चेला फिलहाल जेल में है और गुरु अभी तक खुद को बचाये हुए है।मुंबई में हाल ही में संपन्न हुए महानगर पालिका के चुनाव में मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिं‍ह ने भी नोट के बदले टिकटें दीं। वर्षों से पसीना बहाते चले आ रहे कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं ने कृपाशंकर की मनमानी से नाराज होकर हो-हल्ला मचाया। दिल्ली में बैठे कृपाशंकर के खैरख्वाहों की नींद तब टूटी जब मुंबई में कांग्रेस की लुटिया डूब गयी और शिवसेना ने फिर से मुंबई महानगर पालिका पर बडी आसानी से कब्जा कर लिया। कृपाशंकर की भी मधु कोडा से नगदीकियां रही हैं जो यह बताती हैं कि इस देश में भ्रष्टाचारियों के बीच गजब का भाईचारा है। कृपाशंकर सिं‍ह उत्तर भारतीयों के नेता कहलाते हैं‍। इसी लेबल के सहारे उन्होंने दो सौ फीट की झोपडी से आलीशान कोठी, कई फ्लैटों, करोडों के फार्म हाऊस और अरबों की दुकानों तक का सफर तय किया। कृपाशंकर दाल-रोटी के चक्कर में मुंबई आये थे। आलू-टमाटर बेचते-बेचते कांग्रेस की गोद में जा बैठे। कहते हैं देश की सबसे पूरानी पार्टी कांग्रेस किसी को निराश नहीं करती। अपने सेवकों के भाग्य का ताला खोल ही देती है। बशर्ते सेवक लेने और देने तथा पीठ में छुरा भोकने की कला में सिद्धहस्त हो। दिल्ली में बैठे अपने कांग्रेसी आकाओं के आशीर्वाद की बदौलत महाराष्ट्र सरकार में गृहराज्य मंत्री की कुर्सी पर बैठने और फिर बेफिक्री के साथ उसका दोहन करने वाले कृपाशंकर के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में भ्रष्टाचार विरोधी कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज हो चुकी है। गिरफ्तारी का खतरा भी मंडरा रहा है। इस प्रतापी उत्तर भारतीय नेता ने चंद ही वर्षों में चार सौ करोड से अधिक की संपत्ति जमा कर यह भी बता दिया है कि राजनीति से बढि‍या और कोई धंधा नहीं हो सकता है। धोखाधडी, जालसाजी तथा साक्ष्यों को नष्ट करने के आरोपी कृपाशंकर सिं‍ह ने झारखंड के भ्रष्टतम पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा की सरकार के मंत्री कमलेश सिं‍ह को अपना समधी बनाकर उससे अरबों रुपये झटके तथा मधु कोडा की हराम की कमायी से भी मोटी हिस्सेदारी पायी। यह मान लेना भी कृपा के साथ घोर अन्याय होगा कि उसने सारा माल खुद की तिजोरी के हवाले कर दिया होगा। हराम की कमायी के एक नहीं कई दमदार माई-बाप होते हैं। मधु कोडा हों या कृपाशंकर अपने अकेले के दम पर तो दो कदम भी आगे नहीं बढ सकते। यह माई-बाप तब तक साथ देते रहते हैं जब तक सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहता है। भ्रष्टाचारी औलादों को यह सीख भी दे दी जाती है कि किसी भी हालत में पकड में न आना। जो पकडा गया वह चोर कहलाता है। मधु कोडा और कृपाशंकर सिं‍ह जैसे जल्दबाज नेता अपने माई-बाप की सीख पर ढंग से अमल नहीं कर पाये। बदकिस्मती से धर लिये गये। माई-बाप ने भी उन्हें अनाथों की तरह मरने-मिटने के लिए अकेला छोड दिया है। बेचारे मधु कोडा और कृपाशंकर सिं‍ह...!

Thursday, February 23, 2012

ऐसे हालातों में...?

दिल्ली की एक अदालत ने एक छह वर्षीय बच्ची के साथ अप्राकृतिक सैक्स करने वाले तीस वर्षीय युवक को उम्र कैद की सजा सुनायी है। न्यायाधीश जब यह सजा सुना रही थीं तब वे किस कदर रोष की गिरफ्त में थीं उसका अंदाजा उनके द्वारा कहे गये इन शब्दों से लगाया जा सकता है: ''बच्चों के यौन शोषण करने वालों का बंध्यकरण करना ही सबसे उपयुक्त सजा है, लेकिन कोर्ट के हाथ बंधे हैं, क्योंकि कानून इसकी इजाजत नहीं देता।'' बलात्कारियों के प्रति ऐसा गुस्सा आम सजग जनों के बीच भी अक्सर देखा जाता है। अबोध बच्ची का अपहरण कर उसका यौन शोषण करने वाला यह दरिंदा कोई गैर नहीं बल्कि उसका रिश्तेदार था। नारी की पूजा करने का ढकोसला करने वाले इस देश में बच्चियों पर कैसे-कैसे कहर ढाये जाते हैं इसका खुलासा तो अखबारों और न्यूज चैनलों के जरिये सामने आने वाली खबरों से हो जाता है। देश में शायद ऐसा पहली बार देखने-सुनने में आया है कि अपना फैसला सुनाते समय किसी जज की व्यक्तिगत पीडा उजागर हुई हो। जज भी तो आखिर इंसान होते हैं। उन्हें भी उतनी ही तकलीफ होती है जितनी कि इस सृष्टि के हर विचारशील शख्स को। वैसे कुछ देशों में बलात्कारियों को नपुंसक बना देने की सजा दी भी जाती है। भारत वर्ष में जब एक न्यायाधीश को यह कहने को विवश होना पडा है कि बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वालों को नपुंसक बना देना चाहिए तो विधायिका को भी इसपर गौर करना चाहिए। न्यायाधीश के समक्ष यकीनन पहले भी ऐसे कई मामले आये होंगे। जब उन्हें लगा कि यह दरिदंगी बेकाबू होती चली जा रही है तभी उन्हें अपना गुस्सा जाहिर करने को विवश होना पडा होगा।कहने को तो यह इकीसवीं सदी है पर अभी भी कई लोग ऐसे हैं जो अपने ही अहंकार, स्वार्थ और नियम-कायदों से बाहर नहीं निकल पाये हैं। महाराष्ट्र के शहर सातारा के रहने वाले एक पिता ने अपनी पढी-लिखी बेटी को इसलिए मार डाला क्योंकि वह अपनी पसंद के युवक से शादी करना चाहती थी। सोलहवीं सदी के विचारों और संस्कारों में रचा-बसा बाप बेटी को अपनी गुलाम समझता था। उसे यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि उसकी औलाद उसके आदेश का पालन न करे। बेटी ने जब उसकी पसंद के लडके से शादी करने से इनकार कर दिया तो उसने वही किया जो अक्सर उत्तरप्रदेश और हरियाना में अपनी तथाकथित आन-बान और शान बचाने के लिए किया जाता है। इस घटना ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि ऑनर किलिं‍ग के मामले में देश का कोई भी प्रदेश किसी से पीछे नहीं हैं। जहां-तहां ऐसे हत्यारे भरे पडे हैं जो बेटियों पर जुल्म ढाने, अस्मत से खेलने और उनकी हत्याएं करने से कतई नहीं घबराते। कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब देश में पांच-सात बलात्कार होने की खबरें न आती हों। जिन महानगरों को कभी महिलाओं के लिए सुरक्षित समझा जाता था वहां भी जोर-जबरदस्ती करने की घटनाओं में निरंतर होता इजाफा यह बताता है कि कामुकता की आग में झुलसते नराधमों के लिए नारी मात्र भोग और खिलवाड की वस्तु है। देश की राजधानी दिल्ली में तो जैसे कानून का खौफ ही गायब हो चुका है। बीते सप्ताह एक चौदह साल की नाबालिग लडकी जब दूध लेने के लिए बाजार जा रही थी तो उसे कुछ अय्याश युवकों ने अपनी गाडी में खींच लिया। चलती गाडी में उसपर बलात्कार किया और फिर देर रात जंगलनुमा इलाके में मरने और तडपने के लिए पटक कर चलते बने। कोई भी दिन खाली नहीं जाता जब दिल्ली में इस तरह के बलात्कार को अंजाम न दिया जाता हो। हैरानी की बात तो यह भी है कि पुलिस के लाख हाथ-पांव पटकने के बावजूद भी बलात्कारी पकड में नहीं आ पाते। न जाने कितने बलात्कार के मामले अनसुलझे पडे हुए हैं। अपने देश में परंपरा, संस्कृति और सभ्यता की बातें करने वाले तो ढेरों हैं पर यह भी कमाल की बात है कि यहां के मंत्री ही विधानसभाओं में ब्ल्यू फिल्म का आनंद लेते देखे जाते हैं। जिन्हें आम लोग अपना आदर्श मानते हैं, अक्सर वही नारी का अपमान करते देखे जाते हैं।पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में गजब का बदलाव आया है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने उन लोगों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है जो कभी अपनी बहू-बेटियों को नैतिकता और मर्यादा का पाठ पढाते नहीं थकते थे। खाओ-पीओ और मौज करो की नीति के साथ जीवन जीने वालों की संख्या के बढते चले जाने के कारण पथभ्रष्ट होने वाली नारियों की संख्या में भी बेतहाशा इजाफा हुआ है। पिछले दिनों पुणे के एक फाइव स्टार होटल में वेश्यावृति करते पकडी गयी एक फिल्म अभिनेत्री के साथ उसके भाई को भी दबोचा गया। तय है कि भाई को बहन के देह धंधे से कोई आपत्ति नहीं थी। यह भी कह सकते हैं कि भाई अपनी बहन की देह की कमायी से मजे लूट रहा था। मुंबई, कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद जैसे कई महानगरों में ऐसे मां-बाप भी देखे-सुने गये हैं जिन्हें अपनी बेटियों से देह व्यवसाय करवाने में कतई शर्म नहीं आती। कई बार तो पति के द्वारा ही पत्नी से वेश्या व्यवसाय कराने की खबरें पढने और सुनने को मिल जाती हैं। यह बडी दुविधाजनक स्थिति है। ऐसे में कोर्ट और कानून भी क्या कर सकता है? जो लोग पवित्रता, शालीनता और नैतिकता के हिमायती हैं उनकी तमाम कवायदें और गुस्सा भी बेअसर होकर रह जाता है।

Thursday, February 16, 2012

छात्र क्यों बना हत्यारा?

दिल को दहला कर रख देने वाले इस दृष्य की कल्पना करें। एक शिक्षिका क्लासरूम में बडी तन्मयता के साथ छात्रों को पढा रही है। इस बीच अचानक एक छात्र आता है और शिक्षिका पर धडाधड चाकू के वार कर उसका काम तमाम कर देता है। बेचारी शिक्षिका को कुछ सोचने-समझने का समय ही नहीं मिल पाता। वह यह भी नहीं जान पाती कि दरअसल उसका कसूर क्या है। हां ऐसा ही कुछ हुआ बीते सप्ताह चेन्नई के एक स्कूल में। नवीं क्लास के एक छात्र ने चाकू के दस वार कर अपनी शिक्षा की हत्या कर दी। हत्या के बाद वह शहर की सडकों पर टहलता रहा। दरअसल वह पिछले कुछ दिनों से अपने स्कूल बैग में चाकू छुपाये मौके की तलाश में था। आखिरकार उसे मौका मिल ही गया और उसने वो क्रुर हरकत कर डाली जिसकी उम्मीद इतनी कम उम्र के बच्चे से नहीं की जा सकती। यह हत्यारा छात्र एक पढे-लिखे परिवार से है। उसके माता-पिता आर्थिक रूप से भी काफी सक्षम हैं। अपनी टीचर को उसने इसलिए मौत उपहार में दे दी क्योंकि उसके पढाई-लिखाई में फिसड्डी होने के कारण वे अक्सर उसे डांटा-फटकारा करती थीं। शिक्षिका ने जब छात्र के माता-पिता को उसके पढाई-लिखाई में कमजोर होने की रिपोर्ट पहुंचाई तो उसे बहुत गुस्सा आया। स्कूल में शिक्षिका और घर में माता-पिता की फटकार के चलते वह शिक्षिका को अपना सबसे बडा शत्रु समझने लगा। उसके मन में इतनी कडवाहट भर गयी कि उसने उनका कत्ल करने में देरी नहीं की। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। न ही इसे महज खबर मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है। नवीं कक्षा का छात्र जिसकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष है, आखिर इतना हिं‍सक क्यों हो गया कि उसने अपने हाथ खून से रंग डाले? कॉलेज के छात्रों के द्वारा अपने प्राध्यापकों के साथ मारपीट और यदा-कदा हत्या कर गुजरने की खबरें तो अभी तक सुनी और पढी जाती रही हैं पर यह खबर तो वाकई दिल दहला देने वाली सचाई है। जिस बालक ने यह नृशंस कृत्य किया है वह अपनी करनी पर बेहद शर्मिंदा है, वह यह भी मानता है कि उसके हाथों एक ऐसा अपराध हो गया है जो कि अक्षम्य है। छात्र के व्यापारी पिता का कहना है कि शिक्षिका के द्वारा बार-बार शिकायती पत्र भेजने के कारण उन्होंने अपने बेटे के साथ काफी बुरा व्यवहार किया। कई बार मारा-पीटा भी। वे खुद को कोस रहे हैं। काश... उन्होंने अपने बेटे को समझने की कोशिश की होती तो बात यहां तक न पहुंचती। इस अनर्थ की वजह से वे भी शर्मिंदा हैं। इस मामले में शिक्षिका को दोष देने से पहले हमें और भी बहुत-सी बातों पर गौर करना होगा। हमारे यहां की शिक्षा प्रणाली में छात्रों का उचित मूल्यांकन और मार्गदर्शन एक पुरानी समस्या है। जिसका समाधान तलाशने की की कहीं कोई पहल नहीं की गयी। दोष तो उन मां-बाप का भी है जो अपनी संतानों को हमेशा अव्वल देखना चाहते हैं। बच्चे का रूझान किस तरफ है इस ओर ध्यान देने की उनके पास फुर्सत ही नहीं रहती। चेन्नई में घटी इस घटना की तह में जाएं तो हम पाते हैं कि एक मासूम छात्र जो लगातार पढाई में पिछड रहा था, टीचर उसमें सुधार लाने की तमाम कोशिशें कर रही थी इस बीच उसे उसके साथी छात्रों के समक्ष लताडा भी जा रहा था। जिसकी वजह से वह आहत हो उठा। उसे लगा वह किसी काम का नहीं है। वह तो सिर्फ स्कूल और घर में प्रताडि‍त होने और मार खाने के लिए ही है। ऐसे में अगर उसे कोई प्यार से समझाने और सही रास्ता दिखाने वाला मिलता तो यकीनन उसे खूनी नहीं बनना पडता। अपने देश में अक्सर ऐसी खबरें सुनने और पढने में आती रहती हैं कि परीक्षा में फेल होने पर किसी छात्र या छात्रा ने आत्महत्या कर ली। इंजिनियरिंग और मेडिकल के छात्रों के द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं का आंकडा भी कम चौकाने वाला नहीं है। छात्रों के साथ किये जाने वाला भेदभाव भी उनकी आत्महत्या का कारण बनता है। आज भी हमारे यहां जातिवाद का बोलबाला है जिसका खामियाजा बेकसूरों को भुगतना पडता है। नामी-गिरामी कॉलेजों में दलित छात्रों को नीचा दिखाये जाने की खबरें भी अक्सर पढने में आती रहती हैं। यह भी कम चिं‍ता की बात नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में राजनेताओं और पूंजीपतियों ने अपना कब्जा जमा लिया है। इन धुरंधरों के स्कूलों और कॉलेजो में वही होता है जो यह चाहते हैं। तय है कि धन कमाना ही इनका मूल उद्देश्य होता है। धन कमाने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाये जाते हैं इस पर ज्यादा दिमाग खपाना बेमानी है। सन २०१० में कोलकाता में रवनजीत रावला नाम के स्कूली छात्र ने पिटाई से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। तब देशभर में खूब हो-हल्ला मचा था। देश की शिक्षा प्रणाली पर भी उंगलियां उठायी गयी थी। इस घटना के बाद स्कूलों में बच्चों की पिटायी को अपराघ घोषित कर दिया गया। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने जो दिशा निर्देश जारी किये हैं उनमें स्पष्ट कहा गया है कि बच्चों की पिटायी करने वाले शिक्षकों को अब बख्शा नहीं जायेगा। इसके साथ ही अब उन शिक्षकों को सुधरना होगा जो छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। गरीब, दलित, शोषित, काले गोरे, मोटे-पतले और दब्बू छात्रों पर व्यंग्य बाण बरसाने वाले शिक्षकों को नौकरी से भी हाथ धोना पड सकता है। कुछ विद्धान यह भी मानते हैं कि इस तरह के कडे नियम-कायदों से शिक्षकों पर नकारात्मक प्रभाव भी पडना तय है। वैसे हमारे यहां यह परंपरा है कि हर नये कदम का विरोध करने वाले झंडे तान कर खडे हो जाते हैं। अगर इन्हीं के अनुसार चला जाए तो कहीं कोई सुधार नहीं हो सकता।

Thursday, February 9, 2012

किसी में है हिम्मत?

जो नहीं जानते थे उन्हें भी खबर हो गयी है कि इस देश में एक लाजवाब धन कुबेर है जिसने जोड-जुगाड कर चंद वर्षों में इतनी माया समेट ली है कि जिसकी कल्पना कर पाना आम आदमी के बस की बात नहीं है। वैसे पोंटी चड्ढा भी कभी आम आदमी था। अपने हुनर की बदौलत अब वह 'खास' हो गया है। वैसे इस हुनर की बदौलत और भी कई 'कलाकारों' ने अथाह दौलत का साम्राज्य खडा करने में सफलता पायी है। पर फिर भी पोंटी वाकई लाजवाब है। पोंटी का असली नाम गुरदीप सिं‍ह चड्ढा है। उम्र है लगभग ५६ वर्ष। १० हजार करोड रुपये से अधिक दौलत का मालिक है वह। वैसे तो वह बसपा की महारानी मायावती का खास माना जाता है पर उसकी दोस्ती लगभग देश के हर बडे राजनेता से है। मंत्रियों और अफसरों के साथ उसकी शामें बीतती हैं। उपहार देने के मामले में वह किसी को भी निराश नही करता। इसलिए देश के अधिकांश प्रदेशों में उसे आसानी से अरबो-खरबों के सरकारी ठेके मिल जाते हैं। सरकारी खजाने को चूना लगाने और खनिज संपदा को बेच खाने का उसका अपना एक अंदाज है। पंजाब के कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिं‍ह से लेकर समाजवादी मुलायम सिं‍ह तक उसके अटूट तार जुडे हैं। दरअसल उसने सताधारियों के कंधों पर सवारी कर अपने सपनों को साकार किया है। पोंटी के ठिकानों पर जब छापामारी की गयी तो यह खबरें भी आयीं कि मायावती को झटका देने के लिए जानबूझकर इस छापामारी को अंजाम दिया गया। पोंटी के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंद्र सिं‍ह से पुराने ताल्लुकात होने के कारण पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावो का इंतजार किया गया और जैसे की चुनाव संपन्न हुए तो पोंटी को घेर लिया गया। दरअसल यह घेराबंदी मायावती को उत्तरप्रदेश के चुनावों में घेरने के लिए की गयी। पर माया के चेहरे पर कोई शिकन नजर नहीं आयी। उनके पास ऐसे ढेरों पोंटी हैं। जिनपर वे कृपा बरसाती रहती हैं और अपने आर्थिक साम्राज्य की जडे और मजबूत करती रहती हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास भी कई पोंटी हैं। कर्नाटक के खनिज माफिया रेड्डी बंधु और न जाने कितने सरकारी ठेकेदार और भू-माफिया इस पार्टी ने देश में यहां-वहां पाल रखे हैं। कांग्रेस तो इस मामले में सबकी गुरु है ही। देश का ऐसा कोई बिरला ही नेता होगा जिसके आंगन में पोंटियों की तूती न बोलती हो। सौदागर किस्म के राजनेताओं को तो नित नये पोंटियों की तलाश रहती है। बताते हैं कि नितिन गडकरी जब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बन कर पहली बार दिल्ली पहुंचे तो वे भी पोंटी चड्ढा से मिलने को बेताब थे। गडकरी देश के ऐसे नेता हैं जो राजनीति के साथ व्यापार में भी पारंगत हैं। विदर्भ में उनकी शक्कर मिलें हैं जिनके जरिये वे अपना वोट बैंक बनाने की कवायद में लगे रहते हैं। इसी तंत्र के दम पर पहली बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लडने की ठानी है।पोंटी चड्ढा पर मेहरबान रहने वाले तो बहुतेरे हैं पर मायावती के बारे में हुआ खुलासा यकीनन चौंकाता है। बहन जी ने पोंटी को पांच चीनी मिलें जिनकी वास्तविक कीमत दो हजार करोड रुपये थी, महज २०६ करोड में देकर अपनी दरीयादिली दिखा दी। उन्हीं की मेहरबानी से पोंटी चड्ढा को उत्तरप्रदेश में मनमाने दामों पर शराब बेचने की छूट मिली हुई है। पोंटी का बाप किसी देसी दारू भट्टी के सामने नमकीन बेचा करता था और बेटे ने नेताओं को पटाकर चुपके-चुपके इतनी तरक्की कर ली कि उसका अरबो-खरबों का शराब का कारोबार है। उत्तरप्रदेश तथा पंजाब में कई मल्टीप्लेक्स और मॉल हैं। कांग्रेस के उम्रदराज नेता नारायण दत्त तिवारी, जो राजभवन में अय्याशी करते धरे गये थे, ने सबसे पहले पोंटी के परिवार की 'योग्यता' को परखा था। उन्होंने कमाऊ और पटाऊ परिवार को पहाड के जिलों में जबरदस्त कमायी के ठेके दिलवाये थे। मायावती तो 'परंपरा' को निभाती चली आ रही हैं। पोंटी भी बहन जी के वफादार सिपाही की भूमिका निभाने में कोई कमी नहीं रखता। तभी तो उसे मायावती का 'अमर सिं‍ह' भी कहा जाता है। अमर सिं‍ह और मुलायम सिं‍ह यादव ने मिलकर देश और प्रदेश की राजनीति में कैसे-कैसे गुल खिलाए और चांदी काटी इससे तो हिं‍दुस्तान का बच्चा-बच्चा वाकिफ है ही। अमर सिं‍ह और पोंटी चड्ढा जैसों को सत्ता का दलाल भी कहा जाता है। खोटे सिक्कों को भी सत्ता दिलवाने में यह भरपूर मदद करते हैं। विधानसभा चुनाव लडने के लिए देश के निर्वाचन आयोग ने सोलह लाख रुपये की राशि तय की है। पर इतनी राशि से तो नगरपालिका का चुनाव भी नहीं लडा जा सकता। अधिकांश विधानसभा प्रत्याशी डेढ से दो करोड रुपये खर्च कर विधानसभा चुनाव जीतने के सपने को पूरा कर पाते हैं। फिर सवाल उठता है कि इतना धन आता कहां से है? इसे उपलब्ध कराते हैं पोंटी चड्ढा, अमर सिं‍ह और रेड्डी बंधु जैसे सरकारी डकैत। राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने प्रत्याशियों के किसी भी तरह से विजयश्री दिलाने के लिए पिछले रास्ते से जो अपार धन उपलब्ध कराती हैं वह इन्हीं कमाऊ पुतों की तिजोरियों से आता है। जब पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं तो यह कमाऊ पूत बिगडैल सांड की तरह सरकारी खजाने की लूटमार में लग जाते हैं। भूले से कहीं जब यह पकड में आ भी जाते हैं तो इन्हें बचाने के लिए भी तमाम कानून कायदे और मर्यादाओं को ताक में रख दिया जाता है। वर्षों से सतत चले आ रहे इस चलन को रोक पाने की किसी में है हिम्मत?

Tuesday, February 7, 2012

ललचाने और भरमाने का खेल

लीडरों को लीडरी करनी है और किसी भी हालत में सत्ता का सुख भोगना है इसलिए वे न जाने कैसे-कैसे वादे करते चले जा रहे हैं। उन्हें इस बात की कतई चिं‍ता-फिक्र नहीं है कि वे इन वादों को कैसे पूरा कर पायेंगे। उन्हें लगता है यदि मतदाताओं को प्रलोभन नही देंगे तो उनकी नैय्या पार नहीं हो पायेगी। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो उत्तरप्रदेश की सत्ता हथियाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। अपनी चुनावी रैलियों में उन्होंने मतदाताओं के समक्ष यहां तक कह डाला कि मायावती की सरकार के कार्यकाल में जिन महिलाओं के साथ दुराचार की घटनाएं हुई हैं उन्हें समाजवादी पार्टी सत्ता में आते ही नौकरियां प्रदान करेगी। साथ में उन्होंने यह भी वादा किया कि वे भुक्तभोगी महिलाओं को जब तक रोजगार नहीं दे पायेंगे तब तक उन्हें एक हजार रुपये प्रतिमाह भत्ता देते रहेंगे। मुलायम सिं‍ह का यह शर्मनाक प्रलोभन दर्शाता है कि सत्ता को पाने के लिए नेता नाम का जीव किस हद तक गिर सकता है। जिन्हें कानून व्यवस्था में सुधार की बात करनी चाहिए और यह भरोसा दिलाना चाहिए कि यदि वे सत्ता में आते हैं तो महिलाओं पर आंख उठाने वालो के हाथ-पैर कटवा कर रख देंगे वही यह कह रहे हैं कि आतंक और दुराचार की शिकार महिलाओं को नौकरी और भत्ता देंगे! आखिर यह कैसा मजाक है? यकीनन रक्षा करने की बजाय असुरक्षा को बढावा देने की नीति ही मुलायम जैसे नेताओं की राजनीति है जिसके चलते उत्तरप्रदेश गुंडों और दुराचारियों का सुरक्षित ठिकाना बनकर रह गया है। मुलायम सिं‍ह के लाडले अखिलेश यादव भी कम नहीं हैं। उन्हें जब और कुछ नहीं सूझा तो वे अपने चुनावी भाषणों में यह कहते नजर आये कि मायावती ने तो शाम की दवा भी महंगी कर दी है। जो गरीब अपनी थकान मिटाने के लिए बडी आसानी से अद्धा या बोतल खरीदने की ताकत रखते थे अब पौए के लिए भी मोहताज हैं। अगर हमारी पार्टी की सरकार आती है तो गरीबों की शामें रंगीन हो जाएंगी। मायावती को तो गरीबों की चिं‍ता नहीं है। हम ही हैं जो हर किसी के असली शुभचिं‍तक हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब चुनाव आते हैं तब-तब हर राजनीतिक पार्टी गरीबों और अल्पसंख्यकों की शुभचिं‍तक बन जाती है। भारतीय जनता पार्टी ने गरीब छात्रों को लैपटॉप देने का वादा किया है। ऐन चुनाव के मौके पर अल्पसंख्यकों के आरक्षण का ऐलान करने वाली कांग्रेस पार्टी ने बीस लाख लोगों को रोजगार देने का डंका पीटा है।यह कितनी गजब की बात है कि उत्तरप्रदेश में अकेले बसपा ही नहीं, कांग्रेस, सपा और भाजपा भी राज कर चुकी हैं। इनके हाथ में जब सत्ता थी तब तो यह पार्टियां कुछ नहीं कर पायीं और अब फिर से सत्ता पाने के सपने को येन-केन-प्रकारेण साकार करना है तो जनता को सपने दिखाये जा रहे हैं। लालच पर लालच दिये जा रहे हैं। भाजपा तथा कांग्रेस की तो देश के अन्य प्रदेशों में भी सरकारें हैं और वहां के गरीब बच्चों को भी लैपटॉप की दरकार है और बेरोजगारों को रोजगार की तलाश है। वहां पर उन्होंने ऐसी पहल और चमत्कार क्यों नहीं दिखाया? यह सचाई जगजाहिर है कि जहां पर यह दल सत्ता पर काबिज हैं वहां के हाल बडे ही बेहाल हैं और जहां की सत्ता इन्हें झटकनी है वहां का कायाकल्प कर देने का दावा करते नहीं थकते हैं। देश की साठ प्रतिशत से अधिक गरीब जनता को सबसे पहले रोटी, कपडा और मकान के साथ-साथ शिक्षा की सख्त जरूरत है। पर इस तरफ किसी पार्टी का ध्यान नहीं है। सस्ता अनाज का प्रलोभन देकर जनता को मोहताज बनाने की साजिश की जा रही है। छत्तीसगढ में गरीबों को तीन से चार रुपये किलो चावल उपलब्ध करवाने के बाद भी प्रदेश में कोई परिवर्तन नहीं हो पाया है। सस्ता अनाज गरीबों तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचारी व्यापारियों तक पहुंच जाता है। सरकारी योजनाओं का असली फायदा तो व्यापारी और अधिकारी उठाते हैं।दरअसल चुनावी दौर में की जाने वाली लगभग सभी घोषणाएं मात्र छलावा साबित होकर रह जाती हैं। जिस पार्टी की जहां सरकार बनती है वहां पर उसके कार्यकर्ताओं और अन्य चहेतों की लूटमारी शुरू हो जाती है। इस लूटमार को करवाना शासकों की मजबूरी होता है। वे चाहकर भी इस पर कोई अंकुश नहीं लगा पाते। आम जनता तो लूट के तमाशों को देखते रहने को विवश होती है।आज की तारीख में देश का ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जो कर्ज से न लदा हो। उत्तरप्रदेश, जहां की सत्ता पर काबिज होने के लिए अंतहीन वादों की बरसात की जा रही है, दो लाख करोड से अधिक के कर्ज में डूबा है। बहन मायावती ने न जाने कितने हजार करोड रुपये पत्थर की मूर्तियां बनाने और सजवाने में फूंक डाले हैं। जिं‍दा इंसानों की चिं‍ता करना कभी उन्होंने जरूरी नहीं समझा। ऐसे प्रदेश में राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए धन कहां से लाएंगी? रास्ता एक ही है कि सरकारी खजाने को लूटा जायेगा और प्रदेश को और अधिक कर्ज में डुबो कर रख दिया जायेगा। तय है कि देश के प्रदेश का विकास तो होने से रहा। पर बर्बादी तो तय ही है...।

Wednesday, January 25, 2012

असली अपराधी कौन है?

हम उत्सव प्रेमी हैं। इसलिए त्योहार मनाना हमारी आदत में शुमार है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को भी त्योहारों में शामिल किया जा चुका है। त्योहारों में सिर्फ खुशी तलाशी जाती है। अपनी-अपनी तरह से मौज मजा और आनंद लूटा जाता है। आसपास कौन भूख से कराह रहा है और किसकी अर्थी उठने वाली है, इस पर माथामच्ची करना बेवकूफी माना जाता है। हिं‍दुस्तान के नेताओं ने आम जनता को सपनों के संसार में जीने का हुनर सिखा दिया है। फिर भी सचाई तो सचाई है। उसे कोई कैसे बदल सकता है! हालांकि इस देश के शासक कतई नहीं चाहते कि लोग इस सच को जानें और समझें कि देश की एक चौथाई आबादी भूख और कुपोषण के नुकीले पंजों में फंसी हुई है। मात्र २३ करोड लोगों को ही प्रतिदिन भरपेट भोजन मिल पाता है। जब कि देश की आबादी १२५ करोड से ऊपर पहुंच चुकी है। यानी १०० करोड जनता रईसों के तमाशों के बीच जैसे-तैसे अपने दिन काट रही है। विदेशियों के लिए इस देश की गरीबी किस तरह से मनोरंजन का साधन बन चुकी है उसे जानने के लिए इस खबर से रू-ब-रू होना भी जरूरी है। अंडमान-निकोबार में आदिवासी महिलाओं को गरीबी और भुखमरी के चलते विदेशियों के समक्ष नग्न होकर नाचने को मजबूर होना पडता है। विदेशी इन दृश्यों की वीडियोग्राफी अपने देश में जाकर दिखाते हैं और यह भी बताते हैं दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र का एक चेहरा यह भी है। इस देश के नेता कहते हैं कि देश निरंतर तरक्की कर रहा है। यूनीसेफ के आंकडों के अनुसार तीन साल तक के भारतीय कुपोषित बच्चों की तादाद ४७ प्रतिशत है। देश के ४२ प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम है। हिं‍दुस्तान के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिं‍ह इसे राष्ट्रीय शर्म के रूप में स्वीकार भी कर चुके हैं। पर इस घोर समस्या का हल शायद उनके पास नहीं है। तभी तो वे यह कहने में संकोच नहीं करते कि देश से गरीबी और भ्रष्टाचार भगाने के लिए मेरे पास कोई जादू की छडी नहीं है। मनमोहन सिं‍ह से देश की निरीह जनता यह जानना चाहती है कि चंद ताकतवर लोगों के पास ऐसी कौन सी जादू की छडी है कि उन्होंने उन्हें तथा उनकी सरकार को सम्मोहित कर रखा है। वे देश की सारी की सारी दौलत समेटे चले जा रहे हैं और आप मुकदर्शक बने हुए है! आपके राज में अमीरों के लिए तो चांदी काटने के अवसर ही अवसर हैं पर मर रहा है देश का आम आदमी। वह स्पष्ट देख रहा है कि उसके खून-पसीने की कमायी भ्रष्टाचार की भेंट चढ रही है। भ्रष्टाचारी फलफूल रहे हैं और कहीं न कहीं कानून व्यवस्था भी उनका साथ देती चली आ रही हैं। धर्म और जाति की राजनीति करने वाले नेता इस हकीकत से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि हिं‍दुस्तान में मुसलमान और जन जातीय परिवार ही सबसे ज्यादा गरीबी के शिकार हैं। इन्हीं के परिवारों के बच्चों को कुपोषण का शिकार होकर असमय मौत के मुंह में समाना पडता है।राजनीति के खिलाडि‍यों को चुनाव के समय ही दलितों और पिछडों की याद आती है। इसी मौसम में ही उन्हें दलितों, शोषितों और मुसलमानों की तमाम समस्याएं दिखायी देने लगती हैं। वे हमेशा इस हकीकत से मुंह मोडे रहते हैं कि यह गरीबी ही है जो अच्छे भले परिवार के युवकों को अपराधी बना रही है। किसी के हाथ में बम तो किसी के हाथ में बंदूक थमा रही है। आज देश जिन नक्सलियों से आहत और परेशान है वे भी गरीबी और बदहाली की देन हैं। पुरानी कहावत है कि पेट की भूख इंसान को शैतान बना देती है। अच्छा भला इंसान कानून को अपने हाथ में लेने को विवश हो जाता है। काश! इस देश के शासक इस सच को समझ पाते और उनका हर कदम देश की गरीबी, भूखमरी, असमानता और बदहाली को मिटाने की राह की तरफ बढता। यहां तो राजनेताओं को घपलों और घोटालों से ही फुर्सत नहीं मिलती। पहले लाखों के भ्रष्टाचार की खबरें लोगों को चौंकाती थी पर अब अरबों-खरबों की लूट किसी चेहरे पर कोई शिकन नहीं लाती। दरअसल लोग अंदर ही अंदर खौल रहे हैं। नेताओं पर जहां-तहां बरसते जूते-चप्पल आम लोगों के गुस्से की निशानी हैं। वो दौर बहुत पीछे छूट गया है जब जनता समाज सेवकों और नेताओं को फूल की मालाओं से लाद दिया करती थी। ऐसा नहीं है कि देश का हर नेता बेईमान है। पर ईमानदारों को भी भ्रष्टों के पाप का फल इसलिए भुगतना पड रहा है, क्योंकि वे तटस्थ हैं। देखकर भी चुप हैं!आकडे चीख-चीख कर बता रहे हैं कि जब से देश आजाद हुआ है तब से लेकर अब तक लगभग ५० बडे घोटाले हो चुके हैं और ६५ लाख करोड रुपये भ्रष्टाचारी नेताओं और नौकरशाहों की तिजौरियों और बैंकों में समा चुके हैं। यह धन अगर देश के विकास में लगा होता तो कहीं भी गरीबी, बदहाली, लूटपाट, मारकाट और तरह-तरह की अपराधगिरी नजर नहीं आती। आज देश के हालात यह हैं कि एक तरफ ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी तरफ झुग्गी झोपडि‍यों का अनंत संसार है जहां बदहवास, भूखे नंगे भारतवासी अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। अट्टालिकाओं में रहने वालों को अपने आसपास की सचाई से कोई लेना-देना नहीं है। यह भी गजब की विडंबना है कि इस देश का हर नागरिक तीस हजार के विदेशी कर्जे से लदा हुआ है। इस कर्जे की रकम को डकारने वाले मजे से जी रहे हैं और जिन्होंने कुछ लिया-दिया नहीं है उन्हें सजा भुगतनी पड रही हैं। यह भी कम चौंकाने वाली बात नहीं है कि हर नेता दूसरे पर उंगली उठाता है और खुद को पाक-साफ और सामने वाले को अखंड भ्रष्टाचारी बताता है। देश में चल रहे इस तमाशे पर हास्य व्यंग्य कवि घनश्याम अग्रवाल की यह पंक्तियां कितनी सटीक बैठती है:
''बेताल के
इस सवाल पर
विक्रम से लेकर
अन्ना तक
सभी मौन हैं,
कि जब सारा देश
भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तब स्साला,
भ्रष्टाचार करता कौन है?''

Thursday, January 19, 2012

नोटतंत्र के शिकंजे में लोकतंत्र

कहने को तो देश के पांच प्रदेशों में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं पर हर तरफ चर्चा सिर्फ और सिर्फ उत्तरप्रदेश और पंजाब की हो रही है। हर राजनीतिक पार्टी का लगभग सारा ध्यान इन दोनों प्रदेशों पर केंद्रित है। काला धन भी यहां खूब बरस रहा है। अभी तक लगभग सौ करोड रुपयों की जब्ती हो चुकी है जिन्हें चुनाव में खर्च किया जाना था। नोटों के बंडलों के साथ शराब से भरे ट्रक जिस तरह से लगातार पकड में आ रहे हैं उससे मुल्क की राजनीतिक पार्टियों और उनके सूरमाओं की कमीनगी का भी धडाधड पर्दाफाश हो रहा है। आम मतदाताओं को खरीदने के लिए नोट, शराब और कंबल बांटने की प्रतिस्पर्धा देखते बन रही है। एक तरफ राजनीतिक पार्टियां और प्रत्याशी जनता के ज़मीर की बोली लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ बडे-बडे औद्योगिक घरानों और माफिया सरगनाओं ने भी अपने-अपने दांव लगाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखने की ठान ली है। हर थैलीशाह की अपनी-अपनी पसंद की पार्टी है जिसे वह हर हाल में जीतते हुए देखना चाहता है। इस जीत के साथ उनकी कई उम्मीदें बंधी हुई हैं। चुनावों के समय थैलीशाहो का धन मतदाताओं पर बरसता है और उसके बाद जनता के खून-पसीने की कमायी थैलीशाहों की तिजोरियों में पहुंचा दी जाती है। इस देश के अधिकांश विधायक और सांसद यही काम करते हैं। दौलतमंदों के हाथों बिकने के बाद ही चुनाव लड पाते हैं, इसलिए उनकी वफादारी देश की जनता के प्रति कम और अपने दाताओं के प्रति ज्यादा रहती है।देश की जो तस्वीर आज हमारे सामने है उसे बनाया और बिगाडा भी हम और आप ने ही है। फिर भी एक दूसरे पर दोष मढते रहते हैं। हमेशा यही रोना रोया जाता है कि नेताओं की बिरादरी देश को बरबाद करने में लगी हैं। पर हम क्या कर रहे हैं? अगर देने वाला दोषी है तो लेने वाला भी माफी के काबिल नहीं हो जाता। आज की सचाई यही है कि यदि कोई साफ सुथरे ढंग से राजनीति करना चाहे तो उसकी चलने ही नहीं दी जाती। साफ-सुथरे व्यक्ति का चुनाव मैदान में जीतना तो दूर खडा रह पाना भी मुश्किल हो जाता है। नेताओं के हथकंडों की तो जमकर चर्चा होती है पर आम जनता में रच-बस चुके फरेब और लालच को नजर अंदाज कर दिया जाता है। यह जनता ईमानदारों की प्रशंसा के गीत तो गाती है पर उन्हें चुनाव में विजयश्री दिलवाने में कतराती है। ऐसे में जब बेईमान छा जाते हैं तो चीखना-चिल्लाना शुरू हो जाता है। चुनाव कोई भी हो पर उसमें धनबल, बाहुबल, जाति और धार्मिक समीकरण चुनावी जीत दिलवाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। अच्छे-खासे पढे-लिखे मतदाता भी जाति और धर्म के नाम पर वोट देते हैं। अपनी जाति और धर्म वाला लाख भ्रष्टाचारी और अनाचारी हो पर उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया जाता है। दूसरी जाति और धर्म के ईमानदार शख्स को हरवाने और नकारने में जरा भी देरी नहीं लगायी जाती। मुलायम सिं‍ह यादव, लालूप्रसाद यादव, ओमप्रकाश चोटाला, रामविलास पासवान और मायावती जैसे हुक्मरान भले ही देश को लूट खाएं पर उनकी चुनावी जीत पर कोई आंच नहीं आती। इस कटु सच को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है कि दलितों, शोषितों और जाति के नाम पर राजनीति करने वाले सभी नेता देखते ही देखते अरबों-खरबों के मालिक कैसे बन जाते हैं और उन्हें अपना वोट देने वाले जहां के तहां क्यों खडे रह जाते हैं! ऐसे में व्यवस्था को बदलने के नारे लगाना बेमानी है। खुद को धोखा देना है। कई अन्ना हजारे आएंगे और चले जाएंगे। भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी फलते-फूलते रहेंगे। इन्हें हर तरह का खाद-पानी देश की आम जनता ही देती है और इनके खिलाफ नारे लगाने में भी वही आगे रहती है! तमाम राजनीतिक पार्टियां और चुनाव लडने वाले नेता जानते हैं कि इस देश की गरीब जनता को किसी न किसी तरीके से अपने पक्ष में किया जा सकता है। उन्हें चुनाव में मात नहीं खानी है। इसलिए वे वही कर रहे हैं जो वर्षों से होता चला आ रहा है। चुनाव आयोग द्वारा पंजाब और उत्तरप्रदेश के विभिन्न स्थानों से करोडों रुपयों के काले धन की जब्ती कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यह एक तरह से शेर के मुंह में हाथ डालकर उसका आहार बाहर निकालने का कारनामा है। हालांकि जो काला धन पकड में आया है वो तो नाममात्र का है। धनबलियों ने तो हजारों करोड रुपये चुनावों में लुटाने की तैयारी कर ली है। वे अपनी जीत के प्रति निश्चिंत हैं। उनका विश्वास तभी तहस-नहस हो सकता है जब मतदाता किसी भी तरह के प्रलोभन में न आएं। अगर ऐसा हो जाता है तो दुनिया की कोई भी ताकत हिं‍दुस्तान की किस्मत को बदलने और चमकने से नहीं रोक सकती। व्यवस्था को बदलने के लिए ऊपर से कोई फरिश्ता नहीं टपकने वाला। जो कुछ भी करना है, हमें यानी जनता को ही करना है। यह धारणा भी सरासर गलत है कि सिर्फ गरीब मतदाता ही बिकते हैं। गरीब जहां कंबल, साडी और नोट पाकर खुश हो जाते हैं वहीं तथाकथित पढे-लिखे लोग कम्प्यूटर, लैपटॉप और टेलिविजन का उपहार पाकर हंसते-खेलते अपना वोट किसी पर भी न्यौछावर कर देते हैं। चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनाव में एक प्रत्याशी की खर्च सीमा १६ लाख रुपये तय की है पर कई प्रत्याशी तो २५ से ३० करोड तक फूंक देते हैं। तय है कि काले धन का जमकर इस्तेमाल होता है। ऐसे में साफ-सुथरे लोकतंत्र की उम्मीद क्यों और कैसे? देश के प्रदेशो के चुनावों में काले धन और भ्रष्टाचार की गंगोत्री फूटते देख पडौसी देश पाकिस्तान भी अपनी औकात पर उतर आया है। उसने भी नकली नोटों का जखीरा भेजना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान में बैठे षड्यंत्रकारियों के हौसले इसलिए भी बुलंद हैं क्योंकि हिं‍दुस्तान के कुछ चेहरे अपनी मातृभूमि के प्रति वफादार नहीं हैं। खबरें तो यह भी हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में पाकिस्तान ने १६०० करोड की नकली करेंसी भेजनी की साजिश रची है। सरहद पार के शत्रु के कुछ शुभचिं‍तक निश्चय ही भारत की जमीन पर अठखेलियां कर रहे हैं। इसलिए उसे नाकामी से ज्यादा सफलता मिलती चली आ रही है। ऐसे में दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश भारतवर्ष तमाशा देखने को विवश है...।