Thursday, May 17, 2012

कुछ सडी हुई मछलियां

दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश भारत की संसद के साठ वर्ष पूर्ण होने की खुशी में जश्न मनाया गया। साठ साल पूर्व १३ मई १९५२ को संसद के दोनों सदनों की गरिमामय शुरुआत हुई थी। देश के संसदीय लोकतंत्र के साठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर सभी पार्टियों के नेताओं ने अभूतपूर्व उत्साह का प्रदर्शन किया। लालूप्रसाद यादव जैसे नेता आक्रोष दिखाते नजर आये। उन्हें इस बात की पीडा थी कि कुछ लोग सांसदों के चरित्र पर उंगली उठाकर संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाते रहते हैं। लालू मार्का नेताओं को अब कौन समझाये कि वो भी एक जमाना था जब देश की संसद में पंडित जवाहरलाल नेहरु, आचार्य जे.बी. कृपलानी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे निष्कलंक राजनेता विराजमान रहा करते थे। उन पर निशाना साधने की शायद ही कोई जुर्रत कर पाता था। देश का हर नागरिक उन्हें सम्मान देता था। सम्मान आज भी मिलता है, पर सभी को नहीं। यह तो अच्छा है कि हिं‍दुस्तान में अभिव्यक्ति की आजादी है। नहीं तो लालू प्रसाद यादव, पप्पू यादव और शहाबुद्दीन जैसे भ्रष्ट्राचारी और बाहुबलि जिन्हें संसद भवन में पहुंचने का मौका मिलता रहा है अपने खिलाफ बोलने वालों की गर्दन ही दबोच डालते। कुछ बददिमाग नेताओं के सांसद बन जाने के कारण विधि बनाने वाली संस्था के लिए विधि निर्माण का काम गौण हो गया है। वर्तमान समस्याओं की अनदेखी कर उन विषयों पर समय नष्ट किया जाता है जिनसे आम आदमी को कोई फायदा नहीं होता। वर्षों पहले बनाये गये कार्टून में सांसद इस कदर उलझ कर रह जाते हैं कि जैसे देश के सामने और कोई समस्या बची ही न हो।
इस सच से कौन इंकार कर सकता है कि साठ वर्षों के दौरान संसद में अनेकानेक बदलाव आये हैं। अपवादों को छोड दें तो संसद और सांसदों का इतिहास यह विश्वास तो जगाता ही है कि इस देश की एकता को कोई भी खंडित नहीं कर सकता। पडोसी देश पाकिस्तान आजाद होने के बाद भी सही मायने में आजाद नहीं हो पाया। वहां पर लोकतंत्र को मजबूत जडें जमाने का अवसर अभी तक नहीं मिल पाया है। इस मामले में हम कितने खुशकिस्मत हैं, सारी दुनिया जानती भी है और स्वीकारती भी है। जो लोग सांसदों को कटघरे में खडे करते रहते हैं उनकी भी यह मंशा है कि ईमानदार लोग सांसद बन संसद भवन पहुंचे। उन्हीं की बदौलत ही देश की संसदीय प्रणाली मजबूत होगी और देश का सर्वांगीण विकास हो पायेगा। इस चिं‍ता और शिकायत को नकारा नहीं जा सकता कि वर्तमान में लोकसभा का चुनाव लडना हर किसी के बस की बात नहीं है। राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी धन के सामने कमजोर पड जाती है और उन लोगों को भी सांसद बनने का मौका मिल जाता है जो संसद की गरिमा को बरकरार नहीं रख पाते। जिस राज्यसभा में विद्वानों, कलाकारों और राजनीति के धुरंधरों को पहुंचना चाहिए था वहां पर खनिज माफियाओं, शराब किं‍ग तथा तरह-तरह के अवैध धंधे करने वालों की उपस्थिति बढती चली जा रही है। यह भयावह तस्वीर उन्हें बेहद आहत करती है जो निरंतर देशहित में लगे रहते हैं।
साठ वर्ष के जश्न के अवसर पर संसद का एक अलग चेहरा नजर आया। नहीं तो होता यह है कि ज्यादातर समय शोर शराबे और एक दूसरे की टांग खिं‍चाई में निकल जाता है। भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवानी को जिस तल्लीनता और सम्मान के साथ सुना गया वह भी बेमिसाल था। यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी को भी पहली बार बडे इत्मीनान से भाषण देते हुए देखा गया। ऐसा कतई नहीं लग रहा था कि यह वही संसद है जहां कार्यकाही निरंतर बाधित होती रहती है और शोर शराबे और हंगामें का शर्मनाक सिलसिला बना रहता है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिं‍ह ने याद दिलाया कि संसद के काम काज के घंटे घटते चले जा रहे हैं। यानी अधिकांश सांसद अपने दायित्व के प्रति गंभीर नहीं हैं। संसद का एक-एक मिनट कीमती होता है क्योंकि इस पर देश और दुनिया की निगाहें लगी रहती हैं और अच्छा खासा खर्चा होता है। सांसदो के द्वारा नोट लेकर प्रश्न पूछने का मामला सामने आने के बाद निश्चय ही संसद की गरिमा को चोट पहुंची थी। तब यह सवाल भी उठा था कि क्या यह वही संसद है जहां राम मनोहर लोहिया, जार्ज फर्नाडीस और चंद्रशेखर जैसी महान हस्तियां संसद को गौरवान्वित करते हुए आम आदमी की तकलीफों को निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ उठाती थीं। समाज सेवक अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे समाज सेवकों को देश की चिं‍ता हैं इसलिए वे सांसदो के आचरण को लेकर सवाल उठाते रहते हैं। कोई भी यह नहीं कहता कि सभी सांसद भ्रष्ट ओर निकम्मे हैं। कुछ सडी हुई मछलियों के कारण पूरे तालाब की कैसी दुर्गति हो जाती है इससे तो हर कोई वाकिफ है।

Thursday, May 10, 2012

आग जलनी चाहिए



विभिन्न सामाजिक मुद्दों को उठाने के लिए शुरू किये गये टीवी-शो'‘सत्यमेव जयते' की शुरुआत ही गजब की रही। इस शो में कन्या भ्रूण हत्या जैसे उस बेहद गंभीर मुद्दे को उठाया गया जिसे समय-समय पर देश के कई बुद्धिजीवी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भी उठाते रहे हैं। पर इस इकलौते शो ने तो कमाल ही कर डाला! जिस काम को अनेकों लोग वर्षों की मेहनत के बाद भी नहीं कर पाये उसे एक शो ने कुछ ही घंटों में कर दिखाया! इसे हम फिल्म अभिनेता आमिर खान के व्यक्तित्व के चमत्कार की सफलता भी मान सकते हैं। एक अकेले शख्स ने न जाने कितने लेखकों, पत्रकारों, नेताओं और तथाकथित समाजसेवकों को मात दे दी। कई लोगों को आपत्ति भी हो सकती है। पर जो सच है उसे झुठलाया भी नहीं जा सकता। अपने देश के कुछ ऐसे प्रदेश हैं जहां कन्या भ्रूण हत्या पर लाख प्रयासों के बाद भी रोक नहीं लगायी जा सकी है। शहरों, कस्बों और ग्रामों में भ्रूण लिं‍ग परीक्षण की तो जैसे दूकानें ही खुल चुकी हैं। फौरन पता लगा लिया जाता है कि गर्भवती मां के पेट में लडका है या लडकी। लडकियों के दुश्मन ढेरों हैं इसलिए उनके भ्रूण को येन-केन-प्रकारेण नष्ट करने में देरी नहीं की जाती। लडकों से वंश चलता है इसलिए उनके भ्रूण पर आंच नहीं आने दी जाती। इक्कीसवीं सदी में भले ही बहुत कुछ बदल गया है पर लडकी को लेकर कई लोगों की सोच नहीं बदली है। उनके लिए लडकी का मतलब होता है, एक ऐसा बोझ जो जीवन भर पीछा नहीं छोडता। लडका कमाकर देता है और लडकी कमायी को खाती है। पढाई-लिखायी से लेकर शादी ब्याह तक मजबूरन धन लूटाना पडता है। बदले में कुछ भी मिलता-जुलता नहीं। देश के कई नामी-गिरामी डाक्टर वर्षों से भ्रूण लिं‍ग परीक्षण और गर्भपात के कुकर्म में साथ देते हुए अपनी तिजोरियां भरने में लगे हैं। ये डाक्टर अपने विवेक को बेचने के बाद भी सीना तानकर चलते हैं। वे जानते हैं कि वे हत्यारे हैं। कानून और मानवता के साथ खिलवाड कर रहे हैं। पर जहां कमाने की होड मची हो वहां दिल की कौन सुनता है?
पर इस सच को भी नजअंदाज नहीं किया जा सकता कि दमदार मार्केटिं‍ग के जरिये कुछ भी करवाया जा सकता है। बहरों के कान तक भी आवाज पहुंचायी जा सकती है। शासन और प्रशासन के मुंह पर थप्पड मारा जा सकता है। स्टार टीवी ने अभिनेता आमिर खान के साथ मिलकर वही तो किया है जिसे अभी तक कोई नहीं कर पाया था। अभिनेता ने जैसे ही सत्यमेव जयते कहा सारा देश जाग गया। वैसे यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का वाक्य है जो देश के लगभग सभी पुलिस थानों में नजर आता है। लोग पढते हैं। व्यंग्य से मुस्कराते हैं और आगे बढ जाते हैं। अपने यहां के थानों की साख ही कुछ ऐसी है कि जहां अच्छे-खासे उपदेश अर्थहीन प्रतीत होते हैं। खैर जैसे ही अभिनेता ने सत्यमेव जयते के नारे के साथ कन्या भ्रूण की सच्चाई देश और दुनिया के सामने रखी तो कई लोग ऐसे हतप्रभ रह गये जैसे किसी ने पहली बार इस भयावह हकीकत से पर्दा उठाया हो। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि एक सैलिब्रेटी ने जैसे ही इस पुरातन समस्या को उठाया तो जनता तो जनता मंत्री-संत्री तक जाग उठने का नाटक करते नजर आये। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने तो फौरन अभिनेता को मिलने का बुलावा भेज दिया। दोनों आपस में मिले भी। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अंदाज बता रहे थे कि अपने प्रदेश की इस जगजाहिर समस्या के बारे में उन्हें पहली बार सटीक जानकारी मिली है! मुख्यमंत्री ने अभिनेता को आश्वासन दिया कि कन्या भ्रूण समस्या से पूरी ताकत के साथ निपटा जाएगा। उन डाक्टरों को भी नहीं बख्शा जायेगा जो इस अपराध को रोकने की बजाय बढावा देते चले आ रहे हैं। ध्यान रहे कि शो में राजस्थान को लेकर गर्भपात और बेटियों के साथ होने वाले घोर अन्याय के कई उदाहरण पेश किये गये थे। कांची के शंकराचार्य ने भी गर्भपात पर रोक लगाये जाने की मांग दोहरा दी है। इस शो का असर ही कहेंगे कि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्वास्थ्य विभाग के द्वारा छापा मारकर गर्भपात करने वाले डाक्टर को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया।
देश के दूसरे शहरों में भी डॉक्टरी के नाम पर कसाईगिरी करने वाले बदमाशों के प्रति रोष और धडपकड की खबरें सुर्खियों में हैं। मेरे विचार से यह अच्छे बदलाव के संकेत हैं। जिसका श्रेय अभिनेता आमिर खान को जाता है। भले ही उन्होंने यह सफलता जबरदस्त मार्केटिं‍ग की बदौलत हासिल की हो, पर की तो है। ऐसे में इधर-उधर की बेसिर-पैर की बातों में उलझने की बजाय इस नयी पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। किसी ने तो अपने हाथ में मशाल  थामी। दुष्यंत कुमार की गजल की पंक्तियां हैं:

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

Thursday, May 3, 2012

इसे कहते हैं कलाकारी

तब देश में फिल्म अभिनेता गोविं‍दा का जलवा था। फिल्में खूब चलती थीं। उनके चाहने वालों में हर वर्ग के लोग शामिल थे। राजनीति से उनका कोई लेना-देना नहीं था परंतु कांग्रेस के चतुर, चालाक और शातिर नेता कृपाशंकर सिं‍ह और चाटूकार पत्रकार राजीव शुक्ला उन्हें कांग्रेस में लाने की ठान चुके थे। इन्हें यकीन था कि लोकप्रिय अभिनेता लोकसभा चुनाव जीतने में सक्षम है। उन्हीं दिनों मुंबई में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में गोविं‍दा को आमंत्रित कर सोनिया गांधी के साथ मंच पर विराजमान करा दिया गया। गोविं‍दा गदगद हो गये। उन्होंने अपने भाषण में एक कविता पढी। दरअसल इस कविता में कांग्रेस सुप्रीमों की आरती गायी गयी थी। मैडम को फिल्मी नायक का यह अंदाज भा गया। लोकसभा चुनाव में गोविं‍दा को टिकट थमा दी गयी। यह उनकी लोकप्रियता का चमत्कार था कि वे भाजपा के एक दिग्गज नेता को पराजित कर सांसद बनने में सफल भी हो गये। उनके जीतने से भ्रष्टाचारी कृपाशंकर की साख बढ गयी और फिर धीरे-धीरे उसने इतनी दौलत बटोरी कि राजनीति के पुराने घाघ खिलाडि‍यों की आंखें फटी की फटी रह गयीं। अखबार में कलम घिसायी करने वाले राजीव शुक्ला के यहां भी दौलत बरसने लगी और उन्होंने न्यूज-२४ के कारोबार को अच्छी तरह से जमा लिया।
कृपाशंकर सिं‍ह और राजीव शुक्ला जैसे संदिग्ध नवधनाढ्य उन लोगों के आदर्श हैं जो राजनीति में प्रवेश करने के बाद येन-केन-प्रकारेण करोडों में खेलना चाहते हैं। गोविं‍दा सांसद तो बन गये पर उन वोटरों के लिए कुछ भी नहीं कर पाये जिन्होंने उन पर विश्वास जताया था। कांग्रेस ने उन्हें दूसरे प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार में झोंकने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। अपने देश में अभिनेताओं को देखने के लिए वैसे भी भीड उमड पडती है। कांग्रेस ने अभिनेता का खूब दोहन किया। पर 'हीरो' को दो नाव की सवारी इतनी महंगी पडी कि फिल्मों से भी जाते रहे। राजनीति उनके बस का रोग नहीं था, सो दूसरा लोकसभा चुनाव लडने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाये। जबरदस्ती के सौदे का यही हश्र होता है। राजीव शुक्ला ने फिल्म अभिनेता शाहरुख खान पर भी जाल फेंकने की बहुतेरी कोशिशें की थीं। पर कामयाब नहीं हुए। पर फिर भी कोशिशें जारी हैं। लगभग रिटायर हो चुकी फिल्म अभिनेत्री रेखा को दाना डालने में उन्हीं का हाथ है। रेखा ने भले ही फिल्मों में अभिनय कर नाम कमाया हो, पर जिस तरह से वे कपडों की तरह प्रेमी बदलती रहीं उससे उन्हें चरित्रवान नारी तो कतई नहीं कहा जा सकता। रेखा को राज्यसभा में लाने से यह तो पक्का हो गया है कि सांसद बनने के लिए चरित्रवान होना जरूरी नहीं है। नाम होना चाहिए। भले ही इज्जत पर दाग लगाकर कमाया गया हो। सोनिया गांधी और बच्चन परिवार के बीच की कटुता जगजाहिर है। समाजवादी मुलायम सिं‍ह यादव बच्चन परिवार पर इसलिए मेहरबान रहे हैं क्योंकि उनकी गांधी परिवार से नहीं जमती। अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन को भी वे इसी वजह से राज्यसभा के लिए मनोनीत करते चले आ रहे हैं। कांग्रेस के द्वारा रेखा को राज्यसभा लाने के पीछे भी यहीं राजनीति काम कर रही है। रेखा अमिताभ की पूर्व प्रेमिका हैं। जाहिर है अब उसकी अमिताभ के साथ नहीं पटती। दुश्मन के दुश्मन से दोस्ती करने को भी राजनीति कहते हैं। कांग्रेस ने रेखा को जया बच्चन के सामने खडा कर जो गेम खेला है उसके परिणाम भी शीघ्र सामने आ जाएंगे। देश के जाने-माने क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भी राज्यसभा में लाने वाले यही राजीव शुक्ला ही हैं। हालांकि सचिन का कहना है कि साढे बाइस साल तक क्रिकेट की सेवा के फलस्वरूप उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया है। सचिन की तरह क्रिकेट की सेवा करने वाले और हैं। पर मैडम की उन पर कभी दया-दृष्टि नहीं हो पायी। राजीव शुक्ला का भी उन पर ध्यान नहीं गया। सचिन का यह बयान भी आया कि वे क्रिकेटर ही रहेंगे। राजनीति के दरवाजे से कोसों दूर रहेंगे। सचिन के राज्यसभा के लिए मनोनयन के फौरन बाद भाकपा नेता गुरुदास कामत ने सवाल उठाया कि सौरभ गांगुली ने कौन-सा पाप किया है जो उन्हें इसके लायक नहीं समझा गया। तय है कि क्रिकेट के अलावा और भी खेल इस देश में खेले जाते हैं पर सरकारें क्रिकेटरों पर ही मेहरबान रहती हैं। हॉकी, कबड्डी, फुटबाल जैसे हिं‍दुस्तानी खेलों और खिलाडि‍यों की कोई पूछ-परख नहीं होती। यह कैसा न्याय है? इस मामले में भारतीय जनता पार्टी भी कम नहीं है। उसे भी नामी-गिरामी फिल्म और टीवी वाले ही दिखते हैं। शादीशुदा धर्मेंद्र से सात फेरे लेने वाली हेमा मालिनी और स्मृति ईरानी को राज्यसभा में इसलिए जगह मिल जाती है, क्योंकि वे लोकप्रिय होने के साथ-साथ खूबसूरत भी हैं। वोटरों को लुभा सकती हैं। वैसे भी राजनीति लेन-देन का खेल है। यहां रिकार्ड बनाना आसान नहीं है। टांगे खींचने वाले नाक में दम करके रख देते हैं। सचिन वाकई बहुत भोले हैं।
यह भी हो सकता है कि कांग्रेस सचिन को अपने आंगन में मूर्ति की तरह सजा कर रखने की सोच चुकी हो, क्योंकि उसे मालूम है कि पुरानी मूर्तियां आकर्षण खो चुकी हैं। निष्कर्ष यही है कि देशवासी उन्हें ताउम्र क्रिकेट खेलते देखना चाहते हैं पर राजनीति के सौदागर कुछ और ही ठान चुके हैं। हर कोई जानता है कि राजनीति और मतलबपरस्ती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सचिन कोई दूध पीते बच्चे नहीं जो इतना भी न समझते हों।

Thursday, April 26, 2012

प्लास्टिक के सपने

बच्चों को गेंद से बहुत लगाव होता है। गरीबों के बच्चे तो गेंद के साथ खेलते और दौडते हुए अपने आप बडे होते चले जाते हैं। तरह-तरह के महंगे खिलौने से खेलने वाले अमीरों के बच्चों की बात ही अलग होती है। न जाने कितने ऐसे रईस हैं जो अपने बच्चों के खिलौनों पर हजारों रुपये चुटकियों में लुटा देते हैं। बच्चों की जैसे-जैसे मांग बढती चली जाती हैं, वे और उदार होते चले जाते हैं। गरीबों के बच्चे तो अमीरों के दुलारों के महंगे-महंगे खिलौनों को दूर से ताक मन मसोस कर रह जाते हैं। सरकार का कहना है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। पर सवाल यह है कि कौन से बच्चे?
तीसरी कक्षा में पढने वाली आठ साल की मासूम तेजस्विनी अपने माता-पिता की चहेती थी। खेलने के लिए उसके पास एक ही गेंद थी जो खेलते-खेलते फट गयी। कम उम्र की होने के बावजूद भी उसे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। वह जानती थी कि दूसरी गेंद उसे आसानी से नहीं मिल पायेगी। किसी पैसे वाले की संतान होती तो गेंद को फौरन कचरे के हवाले कर देती। पर तेजस्विनी तो गरीब की बेटी थी। जब सभी काम पर चले गये तो उसके मन में गेंद को सुधारने का विचार आया। बेचारी माचिस की तीली जलाकर फटी गेंद को चिपकाने की कोशिश में जुट गयी। इसी दौरान उसकी फ्रॉक जलती तीली की चपेट में आ गयी और वह इस कदर जल गयी कि उसे अस्पताल में ले जाने के बावजूद बचाया नहीं जा सका। बच्ची की मां पालनाघर में बच्चों को संभालने का काम करती थी। उस दिन भी वह दूसरों के बच्चों की सेवा में लगी थी। अपनी बच्ची की देखरेख करने का उसके पास वक्त नहीं था। पर उसे यह जरूर मालूम था कि उसकी बिटिया गेंद के फट जाने से काफी आहत है। तेजस्विनी को मौत के बाद उसके माता-पिता शहर छोडकर अपने गांव लौट गये हैं। वे शहर में कमाने-खाने आये थे पर शहर ने तो उनकी तमाम खुशियां ही छीन लीं। इस देश में दो वक्त की रोटी के लिए गरीब मां-बाप अपना खून-पसीना बहाते ही हैं, बच्चों को भी कम कुर्बानी नहीं देनी पडती। संतरानगरी से लगभग दस-बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कोराडी गांव। कोराडी के जगदंबा मंदिर का बडा नाम है। दूर-दूर से श्रद्धालू यहां पर पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। मंदिर के आसपास हार-फूल की दूकानें हैं जो कई लोगों को रोजी-रोटी देती हैं। इसी रोजी-रोटी के चक्कर में एक १२ वर्षीय बालक को अपनी जान की आहूति देनी पडी। हुआ यूं कि बालक राहुल पेड पर चढकर पूजा के हार में पिरोयी जाने वाली पत्तियां तोड रहा था कि अचानक उसका संतुलन बिगड गया। वह बीस फुट नीचे जमीन पर आ गिरा। अस्पताल में उसने दम तोड दिया। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की पूजा-अर्चना के उपयोग में आनेवाली पत्तियों की बदौलत बच्चा दस-बीस रुपये कमा लेता था। खेलने-कूदने की उम्र में पेडों की ऊचाई नापना उसका रोजमर्रा का काम था। कहीं न कहीं उसे खुशी भी मिलती थी कि उसकी तोडी हुई पत्तियां देवी-देवताओं के चरणों में अर्पित होती हैं। इसी अर्पण की बदौलत कई उदास चेहरे खिल उठते हैं। राहुल अब इस दुनिया में नहीं है। उसी की तरह और भी कई नाबालिग बच्चे अपनी जान को जोखिम में डालकर अशोका के पेड की पत्तियां और फूल तोडकर अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाते हैं। अपने साथी की मौत के बाद दहशत में होने के बावजूद उनका पेडों पर चढना बदस्तूर जारी है। आखिर पापी पेट का सवाल है...।
दिल को दहलाकर रख देने वाले ये दोनों हादसे उस नागपुर में हुए हैं जहां के एक उद्योगपति ने हाल ही में लगभग पांच सौ करोड खर्च कर खुद का हवाई जहाज खरीदा है। शहर के पांच-सात और धनाढ्य भी अपना-अपना जहाज खरीदने की तैयारी में हैं। महानगर की शक्ल अख्तियार कर चुके इस शहर में अरबों-खरबों में खेलने वाले उद्योगपतियों और नेताओं की भरमार है। आकाश में उडने वालों के इस नारंगी शहर में अपराधों का ग्राफ निरंतर ऊचाइयां छू रहा है। पच्चीस-पचास रुपये के लिए हत्या तक हो जाना आम बात है। चंद लोगों की जिं‍दगी में आया जबर्दस्त बदलाव वाकई चौंकाता है। उनकी शान और शौकत ऐसी है कि राजा-महाराजा भी शर्मिंदा हो जाएं। नेताओं और उद्योगपतियों में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया है। दाल-रोटी के चक्कर में अपने खून को पसीना करती वो भीड जो 'वोटर' कहलाती है जहां की तहां अटकी है। उसके लिए 'परिवर्तनङ्' नाम की कोई बात है ही नहीं। कवि, व्यंग्यकार श्री अक्षय जैन की कविता की यह पंक्तियां काबिले गौर हैं:

नहीं लिखा तकदीर में तेरे, एक वक्त का खाना जी
राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...

मेले में हमको ले जाना, करना नहीं बहाना जी
पैसे हों तो नई चप्पलें, हमको भी दिलवाना जी
राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...

रोजी, रोटी, बिजली, पानी, इनका नहीं ठिकाना जी
अपनी जेबें हरदम खाली, उनके पास खजाना जी
राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...

प्लास्टिक के सपने


बच्चों को गेंद से बहुत लगाव होता है। गरीबों के बच्चे तो गेंद के साथ खेलते और दौडते हुए अपने आप बडे होते चले जाते हैं। तरह-तरह के महंगे खिलौने से खेलने वाले अमीरों के बच्चों की बात ही अलग होती है। न जाने कितने ऐसे रईस हैं जो अपने बच्चों के खिलौनों पर हजारों रुपये चुटकियों में लुटा देते हैं। बच्चों की जैसे-जैसे मांग बढती चली जाती हैं, वे और उदार होते चले जाते हैं। गरीबों के बच्चे तो अमीरों के दुलारों के महंगे-महंगे खिलौनों को दूर से ताक मन मसोस कर रह जाते हैं। सरकार का कहना है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। पर सवाल यह है कि कौन से बच्चे?
तीसरी कक्षा में पढने वाली आठ साल की मासूम तेजस्विनी अपने माता-पिता की चहेती थी। खेलने के लिए उसके पास एक ही गेंद थी जो खेलते-खेलते फट गयी। कम उम्र की होने के बावजूद भी उसे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। वह जानती थी कि दूसरी गेंद उसे आसानी से नहीं मिल पायेगी। किसी पैसे वाले की संतान होती तो गेंद को फौरन कचरे के हवाले कर देती। पर तेजस्विनी तो गरीब की बेटी थी। जब सभी काम पर चले गये तो उसके मन में गेंद को सुधारने का विचार आया। बेचारी माचिस की तीली जलाकर फटी गेंद को चिपकाने की कोशिश में जुट गयी। इसी दौरान उसकी फ्रॉक जलती तीली की चपेट में आ गयी और वह इस कदर जल गयी कि उसे अस्पताल में ले जाने के बावजूद बचाया नहीं जा सका। बच्ची की मां पालनाघर में बच्चों को संभालने का काम करती थी। उस दिन भी वह दूसरों के बच्चों की सेवा में लगी थी। अपनी बच्ची की देखरेख करने का उसके पास वक्त नहीं था। पर उसे यह जरूर मालूम था कि उसकी बिटिया गेंद के फट जाने से काफी आहत है। तेजस्विनी को मौत के बाद उसके माता-पिता शहर छोडकर अपने गांव लौट गये हैं। वे शहर में कमाने-खाने आये थे पर शहर ने तो उनकी तमाम खुशियां ही छीन लीं। इस देश में दो वक्त की रोटी के लिए गरीब मां-बाप अपना खून-पसीना बहाते ही हैं, बच्चों को भी कम कुर्बानी नहीं देनी पडती। संतरानगरी से लगभग दस-बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है कोराडी गांव। कोराडी के जगदंबा मंदिर का बडा नाम है। दूर-दूर से श्रद्धालू यहां पर पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। मंदिर के आसपास हार-फूल की दूकानें हैं जो कई लोगों को रोजी-रोटी देती हैं। इसी रोजी-रोटी के चक्कर में एक १२ वर्षीय बालक को अपनी जान की आहूति देनी पडी। हुआ यूं कि बालक राहुल पेड पर चढकर पूजा के हार में पिरोयी जाने वाली पत्तियां तोड रहा था कि अचानक उसका संतुलन बिगड गया। वह बीस फुट नीचे जमीन पर आ गिरा। अस्पताल में उसने दम तोड दिया। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की पूजा-अर्चना के उपयोग में आनेवाली पत्तियों की बदौलत बच्चा दस-बीस रुपये कमा लेता था। खेलने-कूदने की उम्र में पेडों की ऊचाई नापना उसका रोजमर्रा का काम था। कहीं न कहीं उसे खुशी भी मिलती थी कि उसकी तोडी हुई पत्तियां देवी-देवताओं के चरणों में अर्पित होती हैं। इसी अर्पण की बदौलत कई उदास चेहरे खिल उठते हैं। राहुल अब इस दुनिया में नहीं है। उसी की तरह और भी कई नाबालिग बच्चे अपनी जान को जोखिम में डालकर अशोका के पेड की पत्तियां और फूल तोडकर अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाते हैं। अपने साथी की मौत के बाद दहशत में होने के बावजूद उनका पेडों पर चढना बदस्तूर जारी है। आखिर पापी पेट का सवाल है...।
दिल को दहलाकर रख देने वाले ये दोनों हादसे उस नागपुर में हुए हैं जहां के एक उद्योगपति ने हाल ही में लगभग पांच सौ करोड खर्च कर खुद का हवाई जहाज खरीदा है। शहर के पांच-सात और धनाढ्य भी अपना-अपना जहाज खरीदने की तैयारी में हैं। महानगर की शक्ल अख्तियार कर चुके इस शहर में अरबों-खरबों में खेलने वाले उद्योगपतियों और नेताओं की भरमार है। आकाश में उडने वालों के इस नारंगी शहर में अपराधों का ग्राफ निरंतर ऊचाइयां छू रहा है। पच्चीस-पचास रुपये के लिए हत्या तक हो जाना आम बात है। चंद लोगों की जिं‍दगी में आया जबर्दस्त बदलाव वाकई चौंकाता है। उनकी शान और शौकत ऐसी है कि राजा-महाराजा भी शर्मिंदा हो जाएं। नेताओं और उद्योगपतियों में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया है। दाल-रोटी के चक्कर में अपने खून को पसीना करती वो भीड जो 'वोटर' कहलाती है जहां की तहां अटकी है। उसके लिए 'परिवर्तनङ्' नाम की कोई बात है ही नहीं। कवि, व्यंग्यकार श्री अक्षय जैन की कविता की यह पंक्तियां काबिले गौर हैं:

नहीं लिखा तकदीर में तेरे, एक वक्त का खाना जी

राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...

मेले में हमको ले जाना, करना नहीं बहाना जी

पैसे हों तो नई चप्पलें, हमको भी दिलवाना जी

राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...


रोजी, रोटी, बिजली, पानी, इनका नहीं ठिकाना जी

अपनी जेबें हरदम खाली, उनके पास खजाना जी

राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा... तुम्हीं भरो हर्जाना जी...

Thursday, April 19, 2012

कौन घंटी बांधेगा?

नागपुर के धंतोली में स्थित कोलंबिया कैंसर अस्पताल के डाक्टरों ने मानवता को शर्मिंदा करने वाला कारनामा कर डाक्टरी पेशे को कलंकित कर दिया है। यह लालच की इंतहा ही है कि मर चुकी मरीज को जिं‍दा बताया गया। पहले तो इलाज के दौरान पंद्रह लाख पचास हजार रुपये झटक लिये गये। बकाया चार लाख रुपये वसूलने के लिए मौत के मुंह में समा चुकी मरीज को आईसीयू में कैद कर दिया गया। रिश्तेदारों को वेंटीलैटर में रखी महिला के करीब इसलिए नही जाने दिया गया क्योंकि अस्पताल का बिल बकाया था! डाक्टर को लग रहा था कि परिवार वाले अब और बिल भर पाने में अक्षम हैं। वह बेचैन हो उठा। उसने फौरन सौ रुपये के स्टाम्प पेपर पर परिजनों के हस्ताक्षर लिये जिस पर लिखा था कि किसी भी हालत में एक माह के भीतर बकाया बिल का भुगतान कर दिया जायेगा। इस लिखा-पढी के बीस मिनट बाद मरीज की हार्ट अटैक से मौत होने की सूचना दे दी गयी!महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में इस तरह की कुछ घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। इस शहर के अस्पतालों में दूर-दूर से लोग इलाज करवाने के लिए आते हैं। ऐसा नहीं है कि नागपुर का हर अस्पताल ठगी और ठगों का अड्डा है। कुछ अस्पताल हैं जहां के डाक्टरों में नैतिकता, मानवता और ईमानदारी रची बसी हुई है। इन्हीं की साख है, जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और उडीसा तक के मरीजों के परिजनों को यहां खींच लाती है। पर उनका क्या किया जाए जिनके लिए धन ही सब कुछ है। धन के भूखे डाक्टरों ने अस्पताल के नाम पर ऊंची-ऊंची ईमारतें तो खडी कर ली हैं पर अपने ईमान को ताक पर रख दिया है। यह इलाज से पहले मरीजों के घर-परिवार वालों की हैसियत का आकलन करते हैं। उसके बाद हद दर्जे के लालची व्यापारी बन जाते हैं। जब तक मनचाही फीस मिलती रहती है तब तक मरीज को अस्पताल में भर्ती रखते हैं। मर चुके मरीजों को भी फीस के लालच में जिं‍दा दर्शाने से बाज नहीं आते। हमारे यहां डाक्टर को भगवान का दर्जा भी दिया जाता है। ऐसे ठगों और लुटेरों को क्या नाम दिया जाए? यकीनन हैवान और शैतान हैं यह लोग जिनकी वजह से अच्छे और सच्चे डाक्टरों को भी संदेह की नजरों से देखा जाने लगा है। धनखोर डाक्टरों की देखा-देखी नागपुर तथा आसपास के ग्रामीण इलाकों में झोलाछाप डाक्टरों की संख्या में भी अच्छा-खासा इजाफा होता देखा जा रहा है। हर मरीज के परिजनों की जेब में इतना दम नहीं होता कि वे महंगा इलाज करवा सकें। न जाने कितनों को मजबूरन नादान और अनाडी डाक्टरों की शरण लेनी पडती है क्योंकि इन्हें जितना दो रख लेते हैं। यह बात दीगर है कि इनकी उल्टी-सीधी दवाइयों और इंजेक्शनों से कई बार मरीज की मौत भी हो जाती है। पर इससे झोलाछाप डाक्टरों को कोई फर्क नहीं पडता। उनका एक ही जवाब होता है कि जब बडे-बडे अस्पतालों में लाखों रुपये की फीस देने के बाद भी मरीज ईश्वर को प्यारे हो जाते हैं तो हम किस खेत की मूली हैं। यानी झोला छाप डाक्टरों को तो और भी सौ खून माफ हैं। यह भी कम चिं‍ता की बात नहीं है कि जब झोलाछाप डाक्टरो का भंडाफोड होता है तो मीडिया उनके पीछे हाथ धोकर पड जाता है। दूसरी तरफ नामी-गिरामी अस्पतालों में चलने वाली लूट और अंधेरगर्दी उजागर होने के बाद भी किसी बडे अखबार और पत्रकार के कान पर जूं नहीं रेंगती। फाईव स्टार अस्पतालो को चलाने वाले धनपति अखबारों और न्यूज चैनलों को विज्ञापन देकर मरीजों की जान के साथ खेलने का जैसे अधिकार पा चुके हैं। यह शर्मनाक धंधा देश के लगभग हर शहर में चल रहा है। इस धंधे से होने वाली अपार कमाई को देखकर उन लोगों ने भी हाई-फाई अस्पताल खोलने शुरू कर दिये हैं, जिनका डाक्टरी पेशे से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। उद्योगपतियों और धनासेठों के अस्पतालों में नौकरी बजाने वाले डाक्टरों को ऊंची तनख्वाहें दी जाती हैं और उनसे मनचाहा काम लिया जाता है। मरीजों की फीस अस्पताल के मालिक तय करते हैं। डाक्टर तो सिर्फ अपनी ड्यूटी बजाते हैं। ऐसे डाक्टर भी कम नहीं जिन्हें मरीजों के परिजनों से मोटी रकम ऐंठने के ऐवज में तगडी कमीशन मिलती है। इसी कमीशन के लालच में अच्छे-खासे डाक्टर हैवान बनने लगे हैं। ऐसे अस्पतालों में मालिक को अधिक से अधिक कमायी करवाने के चक्कर में मरीजों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है। परिजनों से सीधे मुंह बात नहीं की जाती। जिन डाक्टरों को भगवान कहा जाता है उन्हीं के कुछ संगी-साथियों का सिर्फ यही लक्ष्य होता है कि मालिक प्रसन्न रहेगा तो उनकी नौकरी भी बनी रहेगी और अथाह कमायी भी होती रहेगी। ऐसी खतरनाक स्थिति को सुधारने का है किसी में दम? कई-कई डिग्रियां समेटे हाई-फाई डाक्टरों से तो बडे-बडे खौफ खाते हैं तो फिर कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा?

Thursday, April 12, 2012

उद्दंड नक्सली, नतमस्तक सरकार

देश के प्रदेश महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिसा वर्षों से नक्सली हिं‍सा के चलते लहुलूहान होते चले आ रहे हैं। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं पर शासको ने नक्सली समस्या की जड तक जाने और उसका खात्मा करने की कभी कोई ईमानदार कोशिश नहीं की। आज हालात यह हैं कि नक्सली बेकाबू हो चुके हैं। उनके हौसले इस कदर बढ गये हैं कि सरकार को दंडवत होना पड रहा है। हुक्मरानों को तो शर्म आने से रही पर देश और दुनिया जान गयी है कि कैसे-कैसे नकारा और नालायक नेताओं के हाथों इस देश की बागडोर जा चुकी है। इनकी कमीनगी का फल देश और देशवासियों को भुगतना पड रहा है। पता नहीं यह सिलसिला कब तक चलेगा? जब देश की इज्जत दांव पर लग चुकी हो और उसे शर्मसार होना पड रहा हो तब किसी तरक्की-वरक्की के क्या मायने!ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को खुद पर बडा नाज है। वे मानते हैं कि उन्होंने अपने शासन काल में प्रदेश का अभूतपूर्व विकास किया है। हो सकता है वे सच बोल रहे हों पर उन्हीं की नाक के नीचे फल-फूल रही नक्सलियों की हिम्मत और ताकत को क्या नाम दें? नक्सलियों ने अपने साथियों को रिहा करवाने के लिए जिस तरह से नवीन पटनायक को झुकाने का अभियान चला रखा है उससे पता चल जाता है कि उनकी नजर में सरकार की दो कौडी की भी कीमत नहीं है। अगवा किये गये बीजद के विधायक झिना हिकाका और इतालवी नागरिक पाओले बोसुक्को की रिहाई के नाटक को चलते हफ्ते भर से ज्यादा का समय बीत चुका है। नक्सलियो के द्वारा नयी-नयी शर्तें ऐसे रखी जा रही हैं जैसे वे साहूकार हों और सरकार चोर। अपनी ही शर्तों पर बंधकों की रिहाई करने पर अडे नक्सली जानते हैं कि ओडिसा सरकार पहले भी उनके हाथों बंधक बनाये गये लोगों की रिहाई के बदले उनके साथियों को आजाद कर चुकी है। नक्सली सरकार की कमजोरी को पहचान चुके हैं। पर सरकार ने अतीत से कोई भी सबक लेने की जरूरत नहीं समझी। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर इटली के नागरिक और विधायक को बचाने का जबर्दस्त दबाव है, लेकिन क्या देश की मान-मर्यादा कोई मायने नहीं रखती? ओडिसा के मुख्यमंत्री ने जिस तरह से खूंखार नक्सलियों के समक्ष घुटने टेके हैं उससे ओडिसा पुलिस बल विभाग ने अपने सुर बदल लिए हैं। उनकी तरफ यह कहा जा रहा है कि यदि दोहरे बंधक संकट को समाप्त करने के प्रयास के तहत राज्य सरकार ने कट्टर माओवादियों को रिहा किया तो वो वह नक्सली विरोधी अभियान का बहिष्कार करेंगे। पुलिस वालों का गुस्सा किसी भी तरह से नाजायज नहीं है। आखिरकार नक्सलियों की गोलियों का शिकार पुलिस वाले ही तो होते हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि नक्सली उन पर भारी पडते हैं इसकी वजह भी है। प्रशिक्षित नक्सलियों के हाथों में स्टेनगन होती है और बेचारे पुलिस वाले थ्रीनाट थ्री की पुरानी बंदूक से उनका सामना करते-करते ढेर भी हो जाते हैं। यानी कुर्बानी तो पुलिस को ही देनी पडती है। राजनेता तो भाषणबाजी और दंडवत होने के सिवाय और कुछ करते नहीं। २००८ से २०११ के दौरान नक्सली हिं‍सा में लगभग ३५०० लोगों की जान जा चुकी है। इनमें अधिकांश पुलिस वाले ही थे। इस देश के सत्ताधीश यह कतई कबूल नहीं करेंगे कि उनके भ्रष्ट शासन और निकम्मेपन के चलते नक्सली और नक्सलवाद जन्मा है। अगर गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, शोषण और अराजकता न होती तो यकीनन नक्सली भी नहीं होते। सत्ता के खिलाडि‍यों ने इन बीमारियों का खात्मा करने की कभी सीधी और सच्ची पहल की ही नहीं। पिछले कई वर्षों से नक्सलवाद देश को बुरी तरह से हिलाए हुए है। सरकारे चलाने वालों की अकर्मणयता और ढुलमुल नीति के चलते आज नक्सली इतने ताकतवर हो गये हैं कि सरकारों को झुकाने और अपनी शर्तें मनवाने लगे हैं। एक तरफ नक्सली गरीबो-बेरोजगारों को बरगला कर उनके हाथों में बंदूकें थमा देश पर हुकुमत करने का सपना तक देख रहे है और दूसरी तरफ सत्ताधीश जागने को तैयार नहीं हैं। यह इतने उद्दंड होते चले जा रहे हैं कि किसी का भी खून बहाने से परहेज नहीं करते। जिलाधीश और विधायक का आसानी से अपहरण कर लेते है। रेलें जाम कर देते हैं। रेल पटरियां उडा देते हैं। स्कूलों को फूंकने और पुलों को नेस्तानाबूत करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। हत्या, लूट, अपहरण, और फिरौती वसूलने वाले नक्सलियों पर रहम खाना या फिर उनकी मांगों के समक्ष नतमस्तक हो जाना यही दर्शाता है कि सरकारें नक्सलियों से हार मान चुकी हैं। क्या ऐसी सरकारों को शासन करने का कोई नैतिक अधिकार है?