Thursday, February 21, 2013

धन, दारू, धमकी-चमकी और गृहमंत्री

खबरों की जबर्दस्त भीड में हो सकता है कि कई पाठक इस खबर को पढने से चूक गये हों। वैसे भी भ्रष्टाचार के इस महादौर में अधिकांश पाठक मित्र नेताओं के अनाचार और भ्रष्टाचार के समाचारों से दूरी बनाने लगे हैं। यह सच्चाई अपनी जगह पर कायम है कि कुछ को छोडकर बाकी लगभग सभी सफेदपोश नेताओं ने शर्म और हया को बेच खाया है।
नागालैंड के गृहमंत्री को शराब की पेटियों, पांच पिस्तोलों, दो रायफलों, अस्सी कारतूसों और एक करोड दस लाख की नगदी के साथ रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। किसी भी प्रदेश में 'गृहमंत्री' की खास अहमियत और रूतबा होता है। गृहमंत्री पर ही अपने प्रदेश की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है। पुलिस की कमान भी उसी के हाथ में होती है। इतने शक्तिशाली शासक का अपराध कर्म आखिर क्या दर्शाता है? ऐसे धूर्त शासक का पुलिस पर क्या असर पडता होगा, इसका जवाब तलाशने के लिए ज्यादा दिमाग खपाने की कतई जरूरत नहीं है। जैसा राजा वैसी पुलिस। नागालैंड के विधानसभा चुनावों में गृहमंत्री ने साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की ठानी थी। नोटों के बंडलों का वोटरों को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। पिस्तौलें और रायफलें अपने विरोधियों को चमकाने, धमकाने और डराने के लिए, तो शराब से वोटरो को मदहोश करने की पूरी तैयारी थी। तय है कि गृहमंत्री से एक करोड दस लाख की जो नगदी बरामद की गयी है वह उसकी या उसके बाप-दादा के खून पसीने की कमायी नहीं हो सकती। छोटे से प्रदेश नागालैंड में दोनों हाथों से लूटमार मचाकर जो दौलत बटोरी गयी होगी उसी से हथियार भी खरीदे गये होंगे। ऐसे काम तो छंटे हुए बदमाश और हत्यारे ही किया करते हैं। प्रदेश की इतनी बडी सफेदपोश हस्ती की गिरफ्तारी राजनीति के अपराधिकरण की जीती जागती मिसाल है। सत्ता का चोला धारण करने के बाद ऐसे सफेदपोश किस तरह से लोकतंत्र के साथ खिलवाड करते हैं उसका भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सरकारी सुरक्षा बलों के घेरे में महफूज रहकर राष्ट्रीय खनिज सम्पदा को पचाने वाले ऐसे उद्दंड भ्रष्टाचारियों के लिए एक करोड दस लाख जैसी नगदी कोई मायने नहीं रखती। अपने शासनकाल में उसने पता नहीं कितना-कितना काला धन अपनी तिजोरियों में ठूंसा होगा। इन पंक्तियों को लिखते-लिखते मुझे जेल में कैद झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौडा की याद आ रही है जिसने अपने छोटे से शासनकाल में हजारों करोड के भ्रष्टाचार को अंजाम देने का कीर्तिमान रचा था। पता नहीं कितने और मधु कौडा लाल बत्ती और वीआईपी की सुरक्षा का उपभोग करते हुए आजाद घूम रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि इस देश में सफेदपोश अपराधी ही सबसे ज्यादा मजे में रहते हैं और खुद सरकार भी उन पर मेहरबान हो उन्हें भरपूर सुरक्षा मुहैय्या कराती है। अक्सर ऐसा लगता है कि नागालैंड में गिरफ्तार किये गये गृहमंत्री इम्कोंग एल इम्चेन जैसे लोग ही सरकारें चला रहे हैं जिन्हें अपने शुभचिं‍तकों, साथियों और शागिर्दों की सतत चिं‍ता रहती है। शासकों ने अगर इतना ख्याल आम लोगों का रखा होता तो देश इस कदर बदहाल न होने पाता।
देश में जहां-तहां कानून व्यवस्था की जो दुर्गति है वह किसी से छिपी नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी तो खासी बदनाम हो गयी है। फिर भी हुक्मरान बेफिक्र निद्राग्रस्त हैं। उनकी चिं‍ता के संकुचित और स्वाथी दायरे में सिर्फ उनके भाई-बेटे-भतीजे, यार-दोस्त और वीआईपी ही हैं। सत्ताधीशों ने यह मान लिया है कि अगर वे और उनके अपने सुरक्षित हैं तो पूरा देश सुरक्षित है। आम आदमी तो सिर्फ मरने के लिए ही पैदा होता है। उसकी हिफाजत का जिम्मा तो उस ऊपर वाले पर है जिसने उसे धरती पर भेजा है। आम आदमियों की भीड में वीआईपी भी खूब पैदा होने लगे हैं। कल का गुंडा, बदमाश और बलात्कारी कब वीआईपी बन जाता है, पता ही नहीं चलता। बेचारी पुलिस करे भी तो क्या करे। उसकी मजबूरी है जिसे कभी हथकडि‍यां पहनायी होती हैं उसी की जी-हजूरी और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालनी पडती है।
२०११ में दिल्ली के जंतर-मंतर में जिस तरह से समाजसेवक अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अनशन-आंदोलन से जागृति सी आयी थी और लगने लगा था कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और तमाम भ्रष्टाचारी होश में आ जाएंगे। पर  कहां रूक पाया भ्रष्टाचार? दरअसल उसे रूकना ही नहीं है। उसे सतत चलते रहना है। चेहरे बदलते रहेंगे पर उसका चेहरा-मोहरा कतई नहीं बदलेगा। जिस देश के प्रदेश का गृहमंत्री ही अपराधियों का प्रतिरूप हों, उसके उज्ज्वल भविष्य की कल्पना ही व्यर्थ लगती है। अनुशासन, नैतिकता, ईमानदारी और जनसेवा सिर्फ और सिर्फ किताबी शब्द बनकर रह गये हैं, जिनका इस्तेमाल अपने-अपने स्वार्थों के हिसाब से किया और करवाया जाता है। आखिर किस-किस को दोष दिया जाए! कोई भी ऐसी राजनीतिक पार्टी नहीं दिखती जिसकी दहलीज पर बेईमानों और रिश्वतखोरों का आना-जाना न लगा रहता हो। धन, दारू, धमकी-चमकी की बदौलत चुनाव जीतने के चलन के रहते देश में कोई सुधार आ पायेगा ऐसे सपना देखना यकीनन बेमानी था, है और रहेगा।

Thursday, February 14, 2013

पुलिस का ये भी एक चेहरा

यह पढकर कतई नहीं चौंकिएगा कि अपने देश में पुलिस बेखौफ होकर अपराध करती है और धडल्ले से अपराधी भी पैदा करती है। जिन लोगों का भूले से भी खाकी से वास्ता पडता है, उन्हें इसके असली चाल-चरित्र को जानने-समझने में ज्यादा देरी नहीं लगती। ऐसा भी नहीं है कि सभी पुलिसिये एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं, परंतु इस कहावत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कुछ सडी मछलियां सारे तालाब को इस कदर गंदा और विषैला करके रख देती हैं कि उसकी दमघोटू सडांध लोगों का जीना दूभर कर देती है। खाकी के सागर में तो एक से बढकर एक मगरमच्छ भरे पडे हैं जिनके निगलने की क्षमता की कोई सीमा नहीं है।
कई निर्दोषों का सिर काटकर हत्याएं करने और दहशत फैलाने वाले सिरियल किलर चंद्रकांत झा का बयान पुलिस की बदरंग तस्वीर को बखूब पेश करता है।
चंद्रकांत को फांसी की सजा सुनायी जा चुकी है। ये नृशंस हत्यारा बिहार का मूल निवासी है। कभी वह बेहद सहज और सरल इंसान था। बेरोजगारी के चलते उसे अपना गांव छोडना पडा। रोजी-रोटी की तलाश उसे दिल्ली ले आयी। उसे यकीन था कि देश की राजधानी उसकी हर समस्या का समाधान कर देगी। उसने फुटपाथ पर सब्जी बेचनी शुरू कर दी। कुछ ही दिन में उसने जान लिया कि फुटपाथ पर धंधा करना बच्चों का खेल नहीं है। यहां पर इलाके के बीट कांस्टेबल की सत्ता चलती है। कमायी हो या न हो पर उसे खुश रखना जरूरी है। दूसरों की तरह चंद्रकांत भी इस दस्तूर को निभाने लगा। पर कई बार ऐसे मौके भी आते जब नहीं के बराबर कमायी होती। चंद्रकांत हफ्ता देने में असमर्थ रहता। खाकी वर्दी वाले का माथा सनक जाता। चंद्रकांत को तरह-तरह से परेशान करने के हथकंडे अपनाने के साथ-साथ झूठे मामले भी दर्ज करवा दिये जाते। ऐसे में कई बार उसे जेल की हवा खानी पडी। बेवजह की जेल यात्राओं ने उसे धीरे-धीरे इतना विद्रोही और गुस्सैल बना दिया कि वह बेकसूरों की हत्याएं करने लगा, जैसे पुलिस वालों से बदला ले रहा हो। हत्यारे चंद्रकांत ने अदालत में स्वीकार किया है कि बेलगाम और भ्रष्ट हो चुकी पुलिस व्यवस्था को चुनौती देने के लिए ही वह खूंखार हत्यारा बनने को मजबूर हुआ। उसने तो मेहनत-मजदूरी कर जीवनयापन का सपना देखा था पर पुलिस ने उसे क्या से क्या बना दिया। चंद्रकांत के इस बयान को अदालत ने काफी गंभीरता से लिया और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यकीनन यह मामला पुलिस के उस चेहरे को सामने लाता है जो लोगों को न्याय दिलाना छोड अपराधी बनाता है।
यकीनन खाकी वर्दी के दुरुपयोग का यह जीता-जागता उदाहरण है। समाज के कमजोर वर्ग को वर्दी की धौंस दिखाना, अवैध वसूली करना, झूठे मामलों में फंसाना यही दर्शाता है कि देश के पुलिस महकमें में बहुत बडे स्तर पर राक्षसी प्रवृति और घोर अराजकता का बोलबाला है। अपराधियों की तो शिनाख्त हो जाती है और वे पकड में भी आ जाते हैं। खाकी वर्दी में छिपे शैतानों का आसानी से पता नहीं चल पाता।
यह कितनी शर्मनाक सच्चाई है कि पुलिस थानों में ही महिलाओं के साथ बलात्कार हो जाता है। कोई वहशी वर्दीधारी सैर-सपाटा करती युवती की अस्मत लूट लेता है। ऐसी न जाने कितनी खबरें मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। शोर-शराबा मचाता है पर होता-जाता कुछ नहीं। पिछले महीने धुले में दंगे हुए। दंगाइयों और पुलिस वालों में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया। पुलिस वाले दंगाइयों को पकडना छोड खुद लूटपाट करने लगे। छह पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार किया गया। खाकी का कवच पहन कर अराजकता का तांडव मचाने वालों ने सारे के सारे पुलिस विभाग को कटघरे में खडा कर दिया है। जिस पुलिस पर आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वह इतनी भ्रष्ट और लापरवाह कैसे बन गयी है? पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी अपने में ही मस्त रहते हैं। उनकी नाक के नीचे क्या हो रहा है इसकी उन्हें या तो खबर नहीं होती या फिर जानबूझकर नजरअंदाज करने की परंपरा निभाते रहते हैं। ऐसे वरिष्ठ अधिकारी भी हैं जो राजनेताओं और चुनिं‍दे दलालनुमा अखबारियों से मेल-मुलाकात कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
बीते वर्ष मध्यप्रदेश से नागपुर आये दो कांग्रेसियों को पुलिस वालों ने ही अपनी 'डकैती' का शिकार बना डाला। वे इस नये शहर में बेखौफ होकर घूम रहे थे कि पुलिस वालों की गिद्ध दृष्टि उनपर पड गयी। उन्हें धमकाया-चमकाया गया और पांच-सात हजार रुपये झटक लिये गये। कोई आमजन होते तो चुपचाप अपने शहर लौट जाते। वे भी अपने शहर के नेता थे। दूसरे शहर में पता नहीं कैसे अपनी जेब ढीली करने को विवश कर दिये गये थे? उन्होंने फौरन शहर के एक बडे कांग्रेस नेता को अपनी आपबीती सुनायी तो वे नेता भी भौचक्के रह गये। उन्होंने फौरन पुलिस के उच्च अधिकारी तक शिकायत पहुंचायी और उनकी रकम वापस दिलवायी। यही है इस देश की पुलिस का वो चेहरा जो आम आदमी को बेहद डराता है और लुट-पिट जाने के बाद भी खामोश रहने को मजबूर करता है। यह भी सच है कि यह भयावह चेहरा देश के लगभग सभी महानगरों, शहरों और कस्बों में अपना आतंक मचाये है और खाकी को कहीं न कहीं यह यकीन है कि कोई भी उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता...।

Thursday, February 7, 2013

सब कुछ जनता के हाथ में

अच्छे काम की तारीफ तो हर कोई करता है। हर देशवासी की यही तमन्ना है कि सरकार जनहित के कार्य करने में फुर्ती दिखाये। पर ऐसा होता नहीं दिखता। इतिहास गवाह है कि धरने, आंदोलन और शोर-शराबे ही सरकार को यदाकदा जगा पाते हैं। वर्ना सरकार का सारा कारोबार अपने तौर-तरीकों के साथ चलता रहता है। दिल्ली गैंगरेप मामले में कानून बदलने के लिए अध्यादेश जारी करने की सरकार ने जो स्फूर्ति दिखायी उसकी प्रशंसा विदेशी मीडिया भी कर रहा है। अमेरिकी अखबार वाशिं‍गटन पोस्ट ने लिखा है कि कानून बदलने की इतनी तेज कार्रवाई किसी-किसी देश में ही संभव है। भारत ने साबित किया है कि लोगों की मांग पर किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था किस तरह काम कर सकती है। सोनिया एंड मनमोहन कंपनी इस प्रशंसा पर फूलकर कुप्पा हो सकती है। काफी अरसे बाद किसी विदेशी मीडिया ने सरकार की पीठ थपथपायी है। वैसे सच यही है कि अगर आम जनता सडकों पर नहीं आती तो सरकार की नींद कतई नहीं खुल पाती। लोगों के बागी तेवरों ने जब नाक में दम करके रख दिया तो सरकार को घडि‍याली आंसू बहाने पडे और वो करके दिखाना पडा जिसकी आज विदेशी मीडिया प्रशंसा कर रहा है।
विदेशी मीडिया इस सच्चाई से यकीनन बेखबर है कि भारतवर्ष में अधिकांश फैसले राजनीति और राजनेताओं के नफे-नुकसान के आधार पर लिये जाते हैं। कई बार तो बडी से बडी भूख हडतालें और विद्रोह की चिं‍गारियां भी शासकों को टस से मस नहीं कर पातीं। इस देश के हुक्मरानों ने हाथी की सी मदमस्त चाल चलने की कसम खायी हुई है। इस वर्ष कई राज्यों में विधान सभा तो अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार का कीर्तिमान रच चुकी मनमोहन सरकार के सिर पर नंगी तलवारें लटक रही हैं। उसे भय सताने लगा है कि अगर उसने ऐसे ही अपना कारोबार जारी रखा तो उसकी गर्दन को कटने से कोई नहीं बचा पायेगा। हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है। राजनेताओं के लिए तो सत्ता के बिना सांस ले पाना भी दूभर हो जाता हैं। उनके लिए सत्ता ही उनकी जान है और प्राण है। जिस लोकपाल विधेयक को लगभग ४५ वर्षों तक लटकाया-भटकाया गया उसी के लागू होने के आसार नजर आने लगे हैं।
संसद के आगामी सत्र में लोकपाल विधेयक के पारित होने का ढिं‍ढोरा पीटा जा चुका है। पर अन्ना हजारे नाखुश है। २०११ में अन्ना आंदोलन के दबाव में ही सरकार ने मन मारकर लोकपाल बिल लोकसभा में किसी तरह से पास कराया था। बाद में राज्यसभा में इस बिल को इस तरह से लटकाया गया जैसे कि ये विधेयक देश और राजनेताओं के लिए बहुत बडा खतरा हो। फिर भी इस बीच राज्यसभा की प्रवर समिति के सामने इस बिल को विचारार्थ रखा गया। समिति की १६ सिफारिशों में दो को छोडकर सरकार ने सभी सुझावों को मान लिया हैं। अन्ना हजारे ने प्रस्तावित लोकपाल विधेयक को मज़ाक और बेमतलब करार देने में जरा भी देरी नहीं की। उनका कहना है कि सरकार की यह सरासर धोखाधडी है। उन्होंने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीवीआई) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को भी निर्वाचन आयोग की तरह स्वतंत्र संस्था बनाने की अपनी पुरानी मांग दोहरा दी है और यह ऐलान भी कर दिया है कि अगर ऐसा नहीं होता है तो वे प्रभावी लोकपाल की मांग को लेकर फिर से रामलीला मैदान का रुख कर सरकार की नींद उडा देंगे। यकीनन अन्ना के हौसले बुलंद हैं पर दूसरी तरफ उन्हीं की सहयोगी किरण बेदी ने संशोधित लोकपाल का समर्थन कर दिया है। उनका कहना है कि कुछ नहीं से कुछ अच्छा। सरकार ने अब जब कुछ कदम आगे बढाये हैं तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए। किरण बेदी का यह आशावादी रवैय्या अन्ना को यकीनन रास नहीं आया है। इस लोकपाल को सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होने से भी अन्ना खफा हैं। उनका कहना है कि देश में भ्रष्टाचार की गंदगी फैलाने में इन्ही का ही तो असली योगदान है। जब असली लुटेरे ही बचे रहेंगे तो फिर लोकपाल किस काम का?
यह अच्छी बात है कि अन्ना अपनी जिद पर अडे हैं। पर सरकार इतनी जल्दी कहां मानने वाली है। सीबीआई एक ऐसा हथियार है जो सदैव उसकी रक्षा करता है। अपने विरोधियों से निपटने और अपनों को बचाने के लिए सीबीआई का जिस कदर दुरुपयोग होता है उसकी भी हर किसी को खबर है। इस सरकार के रहते तो अन्ना की मंशा पूरी नहीं हो सकती। देश के इस सच्चे और ईमानदार जनसेवक की तमन्ना तभी पूरी हो सकती है जब मौजूदा सरकार को उखाड फेंका जाए। जब उनकी पसंद की सरकार होगी तब यकीनन वैसा लोकपाल आने में देरी नहीं लगेगी जैसा कि अन्ना और तमाम देशप्रेमी जनता चाहती है। ऐसे में सब कुछ इस देश की आम जनता के हाथ में ही है...।

Thursday, January 31, 2013

क्या ऐसा हो पायेगा?

वक्त तथाकथित बडे-बडों का रंग-रोगन उतार कर उनका असली चेहरा दिखा ही देता है। जो धुरंधर राजनीति को लूटपाट और उठा-पटक का सुरक्षित जरिया मानते हैं उनके संभलने और सतर्क होने का वक्त आ गया है। पांच बार देश के प्रदेश हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे भ्रष्टाचारी ओमप्रकाश चौटाला ने यह भ्रम पाल लिया था कि कानून उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में ओमप्रकाश चौटाला ने भ्रष्टाचार के न जाने कितने कीर्तिमान रचे। उसके पिता चौधरी देवीलाल ने राजनीति में रच-बस कर नैतिकता और ईमानदारी की जो मिसालें पेश कीं उन्हें उनके इस नालायक पुत्र ने कभी भी अनुकरणीय नहीं माना और वो सब गलत हथकंडे अपनाये जिनसे सिद्धांतवादी पिता के नाम पर बट्टा ही लगा।
अपने पिता के जीवनकाल में विदेशी घडि‍यों की तस्करी के संगीन आरोप में धरा गया ओमप्रकाश शुरू से ही अपराधी प्रवृत्ति का रहा है। पर यह राजनीति ही है जो अपराधियों को भी बडी आसानी से अपना लेती है। यह भी देश के लोकतंत्र की विडंबना ही है कि अपराधियों को सफलता की सीढि‍यां चढते देरी नहीं लगती। जानते-समझते हुए भी लोग अक्सर इन्हें हाथों-हाथ लेते हैं। ठग और लुटेरे ओमप्रकाश के साथ तो उसके ईमानदार पिता देवीलाल का नाम जुडा था, इसलिए हरियाणा के वोटरों ने उस पर वोटों की बरसात करने में कभी कोई कंजूसी नहीं की। उसे एक बार नहीं, पांच बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया। पर इस मुख्यमंत्री ने जनता के साथ इतने छल किये कि भ्रष्टाचार और चौटाला परिवार एक दूसरे के पर्यायवाची बनकर रह गये। हरियाणा के ग्रामों और शहरों में चौटाला की धन की अथाह भूख पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। कई भुक्तभोगियों ने मीडिया तक अपनी फरियाद पहुंचायी पर बात आयी-गयी हो गयी। पूरे प्रदेश में एक ही परिवार की दादागिरी का यह आलम था कि उद्योगपति और व्यापारी आलीशान कोठियां खडी करने और महंगी कारों की सवारी से परहेज करने लगे। ओमप्रकाश चौटाला और उनके बेटे को जो भी कोठी और कार अच्छी लगती उसी को पाने के लिए लालायित हो उठते। कई लोग तो खुद-ब-खुद अपनी कोटी या कार हरियाणा के इन राजनीतिक गुंडो को सौंप देने में ही अपनी भलाई समझते थे। आज भी हरियाणा में ऐसे कई किस्से लोगों की जबान पर हैं। हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला जैसा लालची और लुटेरा दूसरा और कोई पैदा नहीं हुआ। इसे लालच और धन की भूख की इंतिहा ही कहेंगे कि जिस मुख्यमंत्री को अपने प्रदेश में शिक्षा की गंगा बहानी चाहिए थी, उसी ने शिक्षकों की नियुक्ति में करोडों की रिश्वतखोरी कर प्रदेश की सबसे बडी कुर्सी की गरिमा पर कालिख पोत डाली। सन १९९९-२००० में ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री थे तभी तीन हजार अध्यापकों की भर्ती में गडबड घोटाला किया गया। भ्रष्ट और नीयतखोर चौटाला ने शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी पर दबाव डाला कि वे चुने हुए योग्य उम्मीदवारों की सूची बदल डालें और उनके मनपसंद लोगों की नियुक्ति कर दें। अधिकारी ने मुख्यमंत्री के आदेश का पालन किया और योग्य उम्मीदवार किनारे कर दिये गये और नालायक चेहरों को शिक्षक के पद से नवाज दिया गया। चौटाला और उसके गिरोह ने पढे-लिखे उम्मीदवारों के नंबर कम करवाये और अपने चहेतों के नंबर बढवाकर सैकडों करोड की काली कमायी कर ली। अंधेरगर्दी और भ्रष्टाचार के इस खतरनाक खेल पर पर्दा पडा रह जाता यदि संबंधित अधिकारी को उसका हिस्सा मिल जाता। पूरा माल अकेले ही हजम करने की चाल चौटाला को बहुत महंगी पडी। मिल-बांट कर खाने के सिद्धांत पर चलने वाले अधिकारी ने चौटाला को बेनकाब करने की ठान ली और वह योग्य उम्मीदवारों की मूल सूची के साथ अदालत की शरण में जा पहुंचा। वैसे भी हर कोई जानता है कि राजनेताओं और नौकरशाहों में गजब की जुगलबंदी चलती है। इनके द्वारा सत्ता की मलाई खाने का कोई मौका नहीं छोडा जाता। अगर चौटाला ने अफसर को खुश कर दिया होता तो उसे आज इतने बुरे दिन नहीं देखने पडते। बाप-बेटे और उनके संगी साथियों को दस वर्ष की कैद की सजा सुना दी गयी है। हालांकि यह भ्रष्टाचार का मामला १९९९ में सामने आया था। इसे अदालत तक पहुंचने में ही लगभग नौ साल लग गये। भ्रष्टाचारी चौटाला ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे जेल की हवा खानी पडेगी। जब इस कांड को अंजाम दिया गया तब केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी जिसे चौटाला का सहयोग प्राप्त था। अपने ही सहयोगी पर कार्रवाई करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता। अब जब कांग्रेस के राज में चौटाला को जेल की यात्रा करनी पडी है तो उसका मुंह भी खुल गया है कि यह तो कांग्रेस की राजनीतिक साजिश है। वैसे भी कांग्रेस पर सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप लगते ही रहते हैं। इस देश का हर भ्रष्टाचारी नेता भी खुद को पाक-साफ बताने में लगा रहता है। सत्ता की यह रीत भी सर्वविदित है कि वह अपनों को बचाने में पूरी ताकत लगा देती है। कौन नहीं जानता कि अपने देश में बहुत से राजनीतिक लूटेरों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं और उन पर अदालतों में मामले भी चल रहे हैं, पर उनकी गति इतनी धीमी है कि वे दुनिया से विदा हो जाएंगे पर फैसले नहीं आ पाएंगे। खुफिया ब्यूरो की फाइलों में भी कई मामले वर्षों से कैद हैं। यह तो अच्छा हुआ कि जैसे-तैसे चौटाला गिरोह को सजा हो गयी है और देशवासियों में कुछ उम्मीद जगी है कि धीरे-धीरे सभी का नंबर लगेगा। पर क्या वाकई ऐसा हो पायेगा?

Thursday, January 17, 2013

इस हकीकत को भी तो समझो...

सत्ता के शातिर खिलाडी अभी भी अपनी मस्ती में हैं। वे तो ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि देश की अधिकांश जनता जाग चुकी है। वह अब हर हालत में बदलाव चाहती है। इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने की उसने ठान ली है। लोकतंत्र और गणतंत्र के मायूस चेहरों पर टंगी तख्तियों पर लिखे सुलगते नारे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अब सत्ताधीशों की खुदगर्जी और संवेदनहीनता को बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है। इस देश के लगभग सभी राजनेता कटघरे में हैं। लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभाओं में आम आदमी के मुद्दे उठने बंद हो गये हैं और तमाशेबाजी हावी हो चुकी है। वो दिन भी हवा हो गये हैं जब स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर गौरव और खुशी की लहर दौड जाया करती थी। अब तो सरासर शर्मिंदगी और लुट जाने की पीडा सताने लगती है। दगाबाजी और भ्रष्टाचार के कीर्तिमान रचने वाले नेताओं को अगर आम जनता की चिं‍ता होती तो वे अभी तक अपनी चाल और ढाल को बदल चुके होते। उनपर किसी आंदोलन का असर नहीं होता। अन्ना हजारे, अरविं‍द केजरीवाल जैसे तमाम समाजसेवकों की सही और जन हितकारी मांगों की बडी निर्दयता के साथ अनदेखी कर दी जाती है। राजनेताओं को इस बात की भी कतई चिं‍ता नहीं कि आज देश का आमजन उनकी सुनने को तैयार नहीं है। सत्ता के मद में चूर अधिकांश सत्ताधीश इस भ्रम का शिकार हैं कि देश की जनता कितनी भी एकजुटता दिखाए, नारे लगाये पर कुछ होने-जाने वाला नहीं है। जब चुनाव होंगे तब बाजी उन्हीं के हाथ में ही होगी। मतदाताओं को अपने बस में करने और चुनाव जीतने की कला में उन्हें जो महारत हासिल है उसका तोड तलाश पाना अन्ना और केजरीवाल जैसे फकीरों के बस की बात नहीं है। चुनाव तो सिर्फ और सिर्फ थैलियों की बदौलत ही लडे और जीते जाते हैं। वर्षों से विधानसभाओं और लोकसभा पर कब्जा जमाते चले आ रहे नेताओं ने यह धारणा भी पाल रखी है कि अन्ना और केजरीवाल की सभाओं में जुटने वाली अपार भीड कोई मायने नहीं रखती। भीड का क्या? वह तो कहीं भी किसी डमरू बजाने वाले बहुरूपिये को देखने और सुनने के लिए भी जमा हो जाती है।
यह कितनी हैरतअंगेज बात है कि जिस आम जनता का तंत्र से मोहभंग हो चुका है, वह अगर खुद-ब-खुद सडकों पर उतरती है तो भी भ्रष्ट व्यवस्था उसका मजाक उडाने से बाज नहीं आती। दरअसल नेताओं को अपनी सभाओं में जुटने वाली भीड तो सार्थक लगती है, लेकिन सच्चे समाज सेवकों को सुनने और उनका दूर तक साथ देने को आतुर जनता महज तमाशबीन लगती है। यह तो उस आक्रोश का ही घोर अपमान है जो देशभर में सुलग रहा है। यह आक्रोश एकाएक नहीं उपजा। सरकार की जबरदस्त अक्षमता और नजरअंदाजी की देन है ये उबलता गुस्सा, जिसने पिछले दो-ढाई वर्षों में आकार और विस्तार पाया और आज अपने उफान पर है। आखिर बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है। यहां तो हदों का ही अता-पता नहीं है। न जाने कितने भ्रष्टाचारी सत्ता पर काबिज हैं। राष्ट्रीय संपदा के लुटेरे भी लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में पहुंच गये हैं। विपक्ष सोया था, सोया है। इसीलिए समाजसेवक अन्ना हजारे और उनके साथियों को देश में व्याप्त असीम भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाना पडा। उनका साथ देने के लिए सडकों पर जो भीड उमडी उसने सरकार की नींद उडा दी। दिल्ली गैंग रेप के विरोध में युवतियों, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं ने विरोध और आक्रोश की जो मशाल जलायी उससे भी शासन और प्रशासन की नींद हराम हो गयी है। युवतियों और महिलाओं की इज्जत पर डाका डालने वालों को पुलिस और कानून का कोई खौफ नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली पूरे देश को डराने लगी है। महिलाओं को रात में घर से निकलने में कंपकंपी छूटने लगती है। अगर मजबूरन निकलती हैं तो हवस के भूखे भेडि‍यों की शिकार हो जाती हैं। इन हुक्मरानों की विभिन्न कमजोरियों का ही नतीजा है कि दो कौडी के पाकिस्तान के फौजी हमारी सेना पर हमला कर देते हैं और हमारे जवानों की बर्बरतापूर्वक हत्या कर उनका सिर काट डालते हैं।
दरअसल दुश्मन भी ज़ान गये हैं कि हिं‍दुस्तान के अधिकांश नेता हद दर्जे के भ्रष्टाचारी हैं। उन्हें सिर्फ सत्ता चाहिए। जो भी पार्टी सत्ता में आती है वही अपने असली रंग दिखाने लगती है। सत्ता और विपक्ष दोनों चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते हुए आम जनता की आंखों में धूल झोंकते चले आ रहे हैं। ऐसे सत्ता के खिलाडि‍यों और घोर खुदगर्जों के कारण ही जब-तब घर में छिपे गद्दार भी बम-बारूद बिछाने और निर्दोषों का खून बहाने में कामयाब हो जाते हैं। फिर पाकिस्तान तो एक ऐसा जहरीला मुल्क है जिसे भारत के अमन-चैन और खुशहाली से जन्मजात वैर है। किसी हिं‍दी फिल्म का बडा ही चर्चित डायलाग है : ''वो दो कौडी का पडोसी मुल्क जो आने वाले समय में शायद दुनिया के नक्शे से मिट जायेगा, जिसका आटा भी विदेशी चक्की से पिसकर आता है, एक सुई बनाने की भी औकात नहीं है, पर हमारे देश को तोडने के सपने देखता है। वह जानता है कि यह मुर्दों का देश है। वतन के लिए किसी को हमदर्दी नहीं...।'' इस डायलाग को 'फिल्मी' कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हां यह भी सच है कि यह देश मुर्दों का नहीं बल्कि जीते-जागते देश प्रेमियों का देश है और इसी की मिट्टी में पलने और बढने वाले कई ऐसे अहसान फरामोश भी हैं जिन्हें वतन से कोई लगाव नहीं है।

Thursday, January 10, 2013

बंद करो ये नसीहतबाजी

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि नारी पर कोई भी कुछ भी बोलने और बेहूदा शब्दबाण चलाने को स्वतंत्र है। समाज के कई ठेकेदारों ने स्त्रियों को सीख देने और उनके चरित्र का पोस्टमार्टम करने का जबरन ठेका ले रखा है? वैसे तो पिछले पच्चीस-तीस वर्षों से नारी की स्वतंत्रता का जबरदस्त ढोल पीटा जा रहा है पर फिर भी अधिकांश भारतीय नारियों को घर-परिवार में बांधकर रखने में ही अपनी भलाई समझने वालों का अच्छा-खासा आंकडा है। दुनिया बदल गयी है, पर वे बदलने को तैयार नहीं हैं। खुद भले ही दुष्कर्मी हों पर उन्हें पत्नी वही भाती है जो सति-सावित्री से कम न हो। उनके यहां की बच्चियां जैसे-जैसे उम्र की सीढियां चढने लगती हैं, उनकी आत्मा बेचैन होने लगती है। उनकी सदियों पुरानी सोच बलवति हो उठती है: नारी की लज्जा ही उसका असली गहना है। खिलखिलाकर हंसना-बोलना और सवालों के जवाब देना लडकियों को शोभा नहीं देता। लडकियां पराया धन होती हैं। उन्हें सहनशील होना ही चाहिए। दरअसल भारतीय समाज है ही कुछ ऐसा जहां स्त्री को सदैव पराधीन और दबा कर रखने की कोशिश की जाती रही है। हर स्त्री पर किसी न किसी पुरुष का अधिकार और अंकुश बना रहता है। इस पुरुष का चेहरा समय के साथ-साथ बदलता चला जाता है। शादी के पूर्व नारी पिता या भाई के दबाव तले तो शादी के बाद पति या पुत्र के अधिकार क्षेत्र में रहती है। हर पुरुष की सदैव यही मनोकामना होती है कि उसे ऐसी जीवन संगिनी मिले जो तथाकथित भारतीय संस्कारों में रची-बसी हो। पुरुष को बंदिशें रास नहीं आतीं। पर नारी को बांध कर रखना या फिर अपने स्वार्थ के लिए थोडी बहुत आजादी दे देना उसकी फितरत है। इस यथार्थ को युवा कवि आशीशकुमार अंशु की एक कविता की इन पंक्तियों में बखूबी दर्शाया गया है:
''स्त्री जो घर में छुपाई गई
बाजार में उघाडी गई,
ना छुपना स्त्री की नीयत थी,
ना उघाडना उसकी मर्जी,
उसका छुपना पुरुष की इच्छा थी,
और उघाडना पुरुष की कुंठा।''
इज्जत, मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा और पवित्रता आदि-आदि के नाम पर निरंतर छली गयी नारी आज जाग गयी है। उसे अपने भले-बुरे की पहचान हो गयी है फिर भी उपदेश और सीख का जाल फेंकने वालों की चालबाजी थमने का नाम लेने को तैयार नहीं है। उनकी आदिम इच्छा और कुंठा किसी न किसी रूप में सिर उठाकर खडी हो ही जाती है। अब इन आसाराम बापू के बारे में क्या कहें, जो संत कहलाते हैं, जिन्हें देश के लाखों लोग भरपूर आदर और सम्मान देते हैं। पर पता नहीं ये कैसे महात्मा हैं कि जिनकी जबान बार-बार सजग देशवासियों को आहत कर जाती है। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की शिकार बनायी गयी युवती के प्रति सहानुभूति दर्शाने और बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने की मांग करने की बजाय आसाराम ने युवती को ही कटघरे में खडा कर देश को हैरत और गुस्से के हवाले कर दिया है। उनके चेले-चपाटे भी उसी रंग में रंगे नजर आये। किसी ने भी अपने 'गुरु' के बोलवचनों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं उगला। इसे ही तो अंधभक्ति कहते हैं। जिसके दम पर ही आसाराम यह कह गये कि अगर वह लडकी बलात्कारियों के आगे नतमस्तक होकर गिडगिडाती और उन्हें अपना भाई बना लेती तो उनका नशा फौरन काफूर हो जाता। अगर युवती ने 'गुरु दीक्षा' ली होती तो भी उसके साथ यह अनर्थ कतई नहीं होता। आसाराम ने अपने ज्ञान का एक और पिटारा खोलते हुए यह भी कहने में देरी नहीं लगायी कि ताली कभी भी एक हाथ से नहीं बजती। यानी जितना दोष बलात्कारियों का है उतना ही बलात्कृत युवती का भी। इस तरह की अनर्गल बयानबाजी करने का श्रेय अकेले आसाराम ने ही नहीं लूटा। इस मामले में भी कई प्रतिस्पर्धियों ने अपनी-अपनी हांक कर सिर्फ और सिर्फ नारी जाति को गाली देने और उसे नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोडी। किसी ने शहरी लडकियों के पथभ्रष्ट होकर ब्वायफ्रेंड तलाशते देखा तो किसी को शादी पति और पत्नी के बीच एक सौदा नजर आया। नारियों को ही कोसने और उन्हें गालियों से नवाजने में कई सफेदपोश अपनी मर्दानगी के करतब दिखाते नजर आये। ऐसे में युवा कवि अंशु की कविता की यह पंक्तियां बरबस दिलो-दिमाग में हलचल मचाने लगीं:
''गालियों का अपना संस्कार है
अपना मनोविज्ञान है
उनमें आता है हमेशा
मां का नाम और बहन का नाम
कैसे बच जाते हैं हर बार
आते-आते भाई और बाप लोग
अब गालियों को बदलो
क्योंकि बदल रहा है वक्त।''
हां वक्त बदल गया है, वक्त तेजी से बदल रहा है। कोई और वक्त होता तो आसाराम बापू की इन शर्मनाक नसीहतों को भी हाथों-हाथ ले लिया जाता। इस बदले वक्त में उन सभी भाषणबाजों के प्रति चारों तरफ गुस्सा ही गुस्सा है जो औरतों को लक्ष्मण रेखा के अंदर सिमटे रहने के उपदेश देते नहीं थकते और अपने रावणी चेहरे को छुपाये और बचाये रखना चाहते हैं। अफसोस तो इस बात का भी है कि बलात्कारियों को असली मर्द और बलात्कृता को कुलटा मानने वाले चमकते-दमकते चेहरे सत्ता के शिखर पर भी काबिज हैं। आज इन सबके विरोध में देश की सडकों, चौराहों और सत्ता के गलियारों तक जो तीखे नारे गूंज रहे हैं उन सबका एक ही सार है कि होश में आओ सामंती साधु-संतो, समाज सुधारको और शातिर भाषणबाजो... और इनके तमाम अंध भक्तो...।

Thursday, January 3, 2013

इन बेवकूफों का क्या करें?

मेरे जैसे बहुत से लोगों की यही मनोकामना है कि यह गुस्सा सतत बना रहे। इसकी आग कभी बुझने न पाए। जब बर्दाश्त करने की हदें खत्म हो जाती हैं तो आम जनता को सडक पर उतरने को मजबूर होना ही पडता है। गूंगे-बहरे शासकों को जगाने के लिए आक्रोश के नगाडे बजाने ही पडते हैं। हो सकता है कि यह हकीकत देश की तपती नारियों को बहुत देर बाद समझ में आयी हो। पर जब आ ही गयी है तो इस लडाई को अंजाम तक पहुंचना ही चाहिए। अब अगर कदम रूक गये तो पहले से भी ज्यादा अनर्थ हो सकता है। एक अनजान और बेनाम लडकी वो काम कर गयी जिसका आधी आबादी को वर्षों से इंतजार था। कुछ बेवकूफ यह कहते हैं कि नारियों के नारों और प्रदर्शनों से कुछ भी हासिल नहीं होगा। पिछले साल अन्ना हजारे ने 'लोकपाल' को लेकर कितना हल्ला मचाया था। फिर भी आखिरकार उन्हें मुंह की खानी पडी। सत्ता जीत गयी और वे हार गये। इतिहास गवाह है, जब भी कोई आंदोलन अपनी शक्ल लेना शुरू करता है तब उसे नाकाम करने के लिए तरह-तरह की स्वार्थी ताकतें एकाएक सक्रिय हो जाती हैं। अहिं‍सा के पुजारी महात्मा गांधी के गर्म हौसलों को सर्द करने के लिए भी ऐसे ही अवरोध खडे किये जाते थे। पर उन्होंने धरने-प्रदर्शनों, नारों और भूख हडतालों की बदौलत अंग्रेजों की नींद हराम की, देशवासियों को जगाया और वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद उनके आलोचकों और जन्मजात विरोधियों को तो कतई नहीं थी। इससे ज्यादा और अधिक शर्मनाक बात और क्या होगी कि समाज के कुछ ठेकेदार कानून के लुंज-पुंज रखवालों को लताडने और दुराचारियों को दुत्कारने की बजाय महिलाओं को ही तरह-तरह की नसीहतें देने से बाज नहीं आ रहे हैं।
आंध्रप्रदेश के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बोत्सा नारायण राव की बदअक्ली ने लोगों के गुस्से को तब और सुलगा दिया जब उन्होंने फरमाया कि आखिर रात के वक्त युवती कहां घूम रही थी? दरअसल यह प्रश्न नहीं है, यह तो शंका का वो नुकीला तीर है जो हर नारी की छाती पर उतारा गया है जो अपने पैरों पर खडी होकर बहुत कुछ कर दिखाना चाहती है। मध्यप्रदेश की महिला कृषि वैज्ञानिक अनीता शुक्ला ने तो जख्मों पर नमक छिडकते हुए यह तक कहने में देरी नहीं लगायी कि गैंग रेप की शिकार हुई युवती को दुराचारियों का विरोध ही नहीं करना चाहिए था। उसके विरोध के चलते ही उसकी ऐसी दुर्गति हुई। यदि वह खुद को बलात्कारियों के हाथों सौंप देती तो उसका जीवन बच जाता।
क्या आपको नहीं लगता कि यह एक बहादुर लडकी का सरासर अपमान है? यह मोहतरमा तो युवतियों को बलात्कारियों के हाथों लुट जाने की सीख देने और दुराचारियों के हौसलों को बढाने वाली ऐसी अपराधी दिखती हैं जिसका खुली हवा में घूमना-फिरना अपराधियों और अपराधों को जन्म दे सकता है। 
यह वो देश है जहां विधायक विधानसभा में जन समस्याओं पर चर्चा करना छोड अश्लील विडियो देखने का शौक फरमाते हैं। देश के राष्ट्रपति के शहजादे को धरना प्रदर्शन करने वाली तमाम लडकियां और महिलाएं हद दर्जे की नकली और ढोंगी लगती हैं :
''आजकल हर मुद्दे पर कैंडलमार्च निकालने का फैशन हो गया है। लडकियां दिन में रंग-पुतकर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात को डिस्को में जाती हैं।'' यह महाशय सांसद भी हैं। यह महान उपलब्धि इन्होंने अपने पिताश्री के नाम और काम की बदौलत हासिल तो कर ली पर लगता नहीं है कि ये सांसद बनने के काबिल हैं। इनके अंदर तो कोई सडक छाप मवाली विचरण कर रहा है जिसे पुलिस वालों के डंडों से पिटने वाली लडकियों का असली चेहरा नजर नहीं आया। पानी की बौछारों और अश्रु गोलों के सामने डटी रहने वाली लडकियों की बहादुरी पर घटिया कटाक्ष करने वाले ऐसे सांसद के दिल और दिमाग में यकीनन कीचड भरा हुआ है। ऐसे जनप्रतिनिधि देश में बहुतेरे हैं जिन्हें नारियों का विद्रोही रूप खतरे की घंटी लगता है। यह लोग कतई नहीं चाहते कि महिलाएं घर से निकलें। यह लोग सतत उन्हें डराये रखना चाहते हैं। ये वो लोग हैं जो किसी भी महिला के चरित्र पर उंगली उठाने में संकोच नहीं करते। बलात्कार की शिकार युवतियों को एक ही झटके से चरित्रहीन घोषित कर देने में भी इन्हें कभी कोई शर्म नहीं आती। युवतियों को बलात्कारियों के समक्ष घुटने टेक देने की शिक्षा देने वाली अनीता शुक्ला उस वर्ग से ताल्लुक रखती दिखती हैं जो घर परिवार तथा समाज में होने वाले नारी शोषण को नजरअंदाज करने में ही अपनी भलाई समझता है। महिलाएं पति के हाथों चुपचाप पिटती रहें तो इन्हें संतुष्टि मिलती है। इस वर्ग को बहू-बेटियों और बच्चियों के साथ होने वाले दुराचार आहत नहीं करते। ऐसे लोगों के कारण ही स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों में भी वासना के भूखे सफेदपोश बलात्कारी बनने में देरी नहीं लगाते। भाई और पिता के हाथों लुट जाने वाली लडकियों की आहत कर देने वाली खबरों को पढने के बाद भी इनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। दरअसल इन्हें तो हमेशा अपनी 'नाक' की चिं‍ता रहती है। तथाकथित इज्जत और मान-मर्यादा के चक्कर में रिश्तों की पवित्रता को भी इन लोगों ने सूली पर चढा दिया है...।