Thursday, March 21, 2013

न उनसे हुआ भला, न इनसे हुआ भला

देश की राजनीति की दुर्गम राहों पर सतत चलते हुए सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में १५ वर्ष पूर्ण कर एक इतिहास तो रच ही डाला है। कांग्रेस को जीवनदान और सत्ता तक पहुंचाने का श्रेय भी सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी को ही जाता है। यह हकीकत है कि अगर सोनिया गांधी ने जर्जर कांग्रेस की कमान नहीं संभाली होती तो २००४ और २००९ में सत्ता का भरपूर स्वाद चख पाना कांग्रेस के लिए असंभव था। कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज निराशा के अंतहीन गर्त में समा चुके थे। उन्होंने तो केंद्र की सत्ता का सपना देखना भी छोड दिया था। ये सोनिया गांधी ही थीं जिनका जादू चल गया और कांग्रेसियों की किस्मत के बंद दरवाजे खुल गयें। ये सोनिया गांधी का ही दम था जिसने विरोधियों के तमाम आरोपों और तोहमतों को हंसते-हंसते झेला और डूबती कांग्रेस की नैय्या को पार लगाया। असली प्रश्न यह है कि जर्जर कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने वाली सोनिया गांधी से देश की आम जनता को जो आशाएं और उम्मीदें थीं क्या वे पूरी हो पायीं? इसका सिर्फ यही जवाब है, बिलकुल नहीं। भारतीय जनता पार्टी के ऊर्जावान नेता अटलबिहारी वाजपेयी की तरह सोनिया गांधी ने भी लोगों के विश्वास की धज्जियां उडाने का इतिहास रचा है। दलितों, शोषितों और गरीबों की तरक्की और भलाई के लिए ऐसा कोई भी उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया गया जिसका जिक्र किया जा सके। मैडम ने दिखाने को तो डॉ. मनमोहन सिं‍ह को देश का प्रधानमंत्री बनाया पर कोई चमत्कार नहीं हो पाया। वायदे तो ढेरों किये गये पर पूरे नहीं के बराबर हुए। मैडम और डाक्टर साहब की छत्रछाया में हजारों और लाखों-लाखों करोडों के ऐसे-ऐसे घोटाले और भ्रष्टाचार हुए कि बेचारा मीडिया भी खबरें दिखाते और छापते-छापते थक गया। पर भ्रष्टाचार नहीं थमा। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के कार्यकाल में उनके दामाद और महाजन किस्म के नेता मंत्री, दलाल फले-फूले, तो डॉ. मनमोहन सिं‍ह की सरपरस्ती में जिं‍दल, जायसवाल, दर्डा और राबर्ट वाड्रा जैसों ने जी भरकर चांदी काटी। औरों की तो जाने दें पर राबर्ट वाड्रा के गडबडझालों ने देशवासियों को बेहद चौंकाया है।
'गांधी' नाम को भी बट्टा तो लगा ही है। राबर्ट सोनिया के दामाद हैं, और उस प्रियंका के पति हैं जिनमें लोग उनकी दादी प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं। राहुल गांधी, जिन्हें कांग्रेसी एक सुर में प्रधानमंत्री बनाने के गीत गाते रहते हैं, वे भी अपने जीजाश्री की अंधाधुंध कमायी से कैसे अनभिज्ञ रह गये?
राबर्ट तो व्यवसायी हैं और येन-केन-प्रकारेण दौलत के पहाड खडे करना हर शातिर व्यापारी का पहला लक्ष्य होता है। दामाद बाबू ने इतिहास भर दोहराया है और निशाने पर सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी ही हैं। दामाद तो दामाद हैं। उन्हें अपनी सास और साले की साख के दोहन का अघोषित अधिकार है। पर उन नेताओं का क्या करें जिन्होंने मैडम के नाम पर लूट का तांडव मचा रखा है। लोगों को अक्सर यह सवाल परेशान करता है कि किं‍गमेकर होने के बावजूद मैडम हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठी हैं? राजनीति में पंद्रह साल का कार्यकाल कायाकल्प करने के लिए पर्याप्त होता है। देश की जनता ने कांग्रेस गठबंधन को दूसरी बार केंद्र की सत्ता यह सोचकर सौंपी थी कि शायद इस बार कोई चमत्कार हो और देश के बदहाल आम आदमी की किस्मत खुल जाए। पर आज देश की आम जनता बेहद रोष में है। अपना खून पसीना बहाने वाला आम आदमी महज दो वक्त की रोटी, चंद कपडे और सिर पर घर नाम की एक छत ही तो चाहता है। अगर हुक्मरान उसे ये भी मुहैय्या न करा पाएं और उनके संगी-साथी सबकुछ चट कर जाएं तो आम आदमी के खून का खौलना सौ फीसदी जायज है।
राजनेताओं, उद्योगपतियों और ताकतवर भ्रष्ट अफसरों की जमात ने देश का जो अपार धन विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है उसे वापस लाने के लिए देशप्रेमी जनता वर्षों से व्याकुल है। आंदोलन पर आंदोलन होने के बाद भी मनमोहन सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी। इस सरकार की रिमोट कंट्रोलर तो आखिर सोनिया गांधी ही हैं उन्होंने गजब की चुप्पी साधे रखी! वे अगर हिम्मत दिखातीं तो कुछ भी हो सकता था। अभी तो वे मतलबी कांग्रेसियों की मसीहा हैं, अगर देश का विदेशों में जमा अपार धन वापस आ जाता तो देश का बच्चा-बच्चा उन्हें सलाम करता। देश का भी भला हो जाता।
खोजी पत्रकारिता की बदौलत अब तो यह भी रहस्योद्घाटन हो गया है कि देश में ही काले धन का जबरदस्त कारोबार चल रहा है। निजी क्षेत्र के कुछ बैंक मनमाने ढंग से काले धन को सफेद बनाने के गोरखधंधे में लगे हुए हैं। देश में ही चल रहे इस काले धंधे के नायक भी नेता उद्योगपति और बडे-बडे अधिकारी ही हैं। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि सत्ताधीश इससे वाकिफ न हों। अब यह बताने और लिखने की गुंजाइश भी नहीं बची है कि इस देश की राजनीतिक पार्टियां और उनकी आडी-तिरछी राजनीति काले धन के दम पर ही जिं‍दा है। ऐसे में यह मान लेने में यकीनन कोई हर्ज नहीं है कि जिस तरह से विदेशी बैंकों में जमा धन वापस आने से रहा वैसे ही देश में कुछ बैंकों के द्वारा जारी काले धन के कारोबार को नेस्तानाबूत कर पाना सरकार के बस की बात नहीं है।
जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी तो देश के आमजन में यह उम्मीद तो जागी ही कि वे कोई ऐसा करिश्मा जरूर कर दिखाएंगी जिससे उसे राहत मिलेगी। महंगाई, बेरोजगारी, अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से जूझता देश और देशवासी इतने हताश और निराश कभी नहीं हुए जितने कि सोनिया और मनमोहन के राज में हुए हैं। अंत में किसी कवि की ये पंक्तियां :
''न उनसे हुआ भला, न इनसे हुआ भला
काटा है सबने आज तक कमजोर का गला
कुर्सी पर बैठा जो भी उल्लू बन गया
नेता का जिस्म एक ही सांचे में ढला।
वे नागनाथ थे तो ये सांपनाथ हैं
बांबी में हाथ डाला हमको पता चला
बहुरुपिये हुये सब बदले हैं मुखौटे
जनता को खूब आजतक हर एक ने छला
सींचा है जैसे-जैसे यह सूखता गया
जनतंत्र का यह वृक्ष अब तक नहीं फला।''

Thursday, March 14, 2013

पत्रकारिता के कलंक

अखबार मालिकों और पत्रकारों को अपने पाले में लाने और निरंतर बनाये रखने के लिए सरकार को भी कम पापड नहीं बेलने पडते। कुछ सफेदपोश गुरुघंटाल किस्म के अखबारीलालों को दोनों हाथों में लड्डू रखने की लत लग चुकी है। ऐसे घोर लालची कलमवीरों के कारण ही पत्रकारिता आज चौराहे पर है।
उत्तरप्रदेश के कई पत्रकार लालबत्ती के लिए दिन-रात एक किये रहते हैं। सरकार के समक्ष झोली फैलाने में उन्हें कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं होती। जब दाल नहीं गलती तो अपनी पर उतर आते हैं। दरअसल ये वो कलमवीर हैं जो हर सरकार के मंत्रियों और संत्रियों के दरबारों की परिक्रमा करने में सिद्धहस्त हैं। सरकार भी अपने कुछ आज्ञाकारी संपादकों और अखबार मालिको को चारा डालने में कोई कंजूसी नहीं करती। ऐसे बहुतेरे जाने-पहचाने पत्रकार हैं जो मायावती के दरबार में भी हाजिरी लगाते थे और अखिलेश और मुलायम सिं‍ह यादव के भी करीबी हैं। ऐसी कला हर किसी के नसीब में नहीं होती। कुछ पत्रकारो का एकमात्र लक्ष्य है चाटुकारिता करो और ईनाम पाओ। लखनऊ के उस पत्रकार को कई नये-पुराने पत्रकार अपना गुरु मानते हैं और चरणवंदना करते हैं जिसने मायावती के गुणों का बखान करने वाली किताब लिखकर बसपा सरकार में अपनी धाक जमायी थी और मीडिया सलाहकार के महान पद को सुशोभित किया था। इस महान हस्ती के रंग-ढंग देखकर यह पता लगाना मुश्किल था कि ये बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ता हैं या पत्रकार हैं। बहन मायावती के आशीर्वाद से इसके घर-आंगन में इतनी धनवर्षा हुई कि उसे संभाल पाना भी दूभर हो गया। अपनी कम पढी-लिखी पत्नी के लिए भी इसने अच्छी-खासी सरकारी नौकरी का जुगाड कर अपना दबदबा दिखाया था।
दरअसल पत्रकारिता को धंधे में तब्दील करने का श्रेय ऐसे ही महापुरुषों को जाता है। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में कई ऐसे कल के छुटभइये नेता हैं जो आज पत्रकार कहलाते हैं इनके अपने अखबार हैं और अपनों की ही खबरें छापते हैं। जिनसे दाल नहीं गलती उन्हें धूल चटाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। राजनीति, शासन और प्रशासन के बाजार के कागजी शेर इनसे खौफ खाते हैं तो इनकी छाती और भी चौडी हो जाती है। सरकारें पत्रकारो को कौडी के दाम जमीनें और आवास उपलब्ध करवाती हैं पर अक्सर देखने में यही आता है कि जुगाडु ही बाजी मार ले जाते हैं। निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ पत्रकारीय दायित्व निभाने वाले कलम के पुजारी मिलीभगत का तमाशा देखते रह जाते हैं। लखनऊ में नामी पत्रकारों को सरकार की तरफ से दिये गये घरों में शराब की दुकानें, होटल, ड्राइविं‍ग स्कूल और ब्युटी पार्लरों का चलना यही दर्शाता है कि नैतिकता और सिद्धांत का ढिं‍ढोरा पीटकर प्रतिष्ठा पाने वाले पत्रकार भी कितने खोखले और बाजारू हैं। ऐसे स्वार्थी पत्रकारों का भ्रष्ट नेताओं और बिकाऊ अफसरशाही पर कलम चलाने और भडास निकालने का कोई हक नही बनता। वैसे भी ऐसे पत्रकार आरती गाने या फिर तटस्थ रहने को मजबूर होते हैं। इनमें और देश को बेच खाने को उतारू नेताओं, अधिकारियों में ज्यादा अंतर नहीं है। दोनों ही धोखा और छल-कपट के ऐसे भयावह प्रतिरूप बनकर उभरे हैं, जिनसे देशवासियों का मोहभंग होता चला जा रहा है। ऐसे शर्मनाक दौर में प्रेस की आजादी पर हमला और पत्रकारों, संपादकों, अखबार मालिकों के साथ अन्याय की खबरें भी सुर्खियां पाते नहीं थकतीं। पत्रकार बिरादरी के कुछ लोग बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार से खासे नाराज हैं। मुख्यमंत्री दावा तो सुशासन का करते है पर उनके ढोल में बडी पोल है। इसी पोल को खोलने का खामियाजा कुछ अखबार वालों को भुगतना पड रहा है।
दूसरी तरफ नितीश के तथाकथित सुशासन और सफलता के गीत गाने वाले समाचार पत्रों की भरे चौराहे पर होली भी जलायी जा रही हैं। होली जलाने वालों में जागरूक नागरिक, स्वयंसेवी संस्थाएं और वे बुद्धिजीवी शामिल हैं जिन्हें विहार की बदहाली स्पष्ट दिखायी देती है। प्रदेश में भ्रष्टाचार, अपराध पर अपराध और बदमाशों की रंगदारी परवान पर है पर मुख्यमंत्री कहते हैं कि प्रदेश में अमन और शांति है। ऐसे अखबारियों की कमी नहीं है जो मुख्यमंत्री की ताल पर नाचते हैं और उन्हें वही दिखता है जो नितीश कहते और बताते हैं। सरकारी विज्ञापनों के लालच में बिहार के कई अखबार मालिकों ने अपने संपादकों और पत्रकारों को सरकार के भाई-भतीजावाद, तमाम कमजोरियों, घोटालों और रिश्वतखोरी के समाचारों की पूरी तरह से अनदेखी करने का कडा आदेश दे रखा है। यही वजह है कि मंत्रियों के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी अपनी मनमानी का तांडव मचाये हैं। उनका आतंक इतना जबर्दस्त है कि जनहित के लिए कलम चलाने वालों का टोटा पड गया है। बुद्धिजीवी कहलाने वाले संपादकों ने अपनी कलम और बुद्धि सत्ता के हाथों गिरवी रख दी है और मालिकों के दलाल बनकर रह गये हैं। जिन समाचार पत्रों में नितीश सरकार की आरती गायी जाती है उन्हीं पर सरकारी विज्ञापनो की बरसात की जा रही है। कई अखबार ऐसे हैं जिनका जनहित की खबरों से दूर-दूर तक नाता नहीं है। जो अखबार निष्पक्षता और निर्भीकता के मार्ग पर चलते हुए पत्रकारिता कर रहे हैं उन्हें आपातकाल के नज़ारों से रूबरू होना पड रहा है। कोई भी सजग पत्रकार अगर सरकार की गडबडि‍यों पर लिखता है तो उसे प्रताडि‍त करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। पहले तो अखबार मालिकों पर दबाव डाला जाता है कि ऐसे पत्रकार की फौरन हकालपट्टी कर दें। नहीं मानने पर उन्हें सरकारी विज्ञापन देने बंद कर दिये जाते हैं। ऐसे बिरले ही मालिक हैं जो सरकार के हुकुम की अनदेखी कर सकें। अधिकांश का मकसद तो करोडों के सरकारी विज्ञापनों को बंटोरना ही है। उनके लिए समर्पित पत्रकार कोई अहमियत नहीं रखते। किसी भी एक पत्रकार के नौकरी से हकाले जाते ही नये चाटुकारों की लाइन लग जाती है। मुख्यमंत्री नितीश कुमार का बस चले तो वे सरकार और उनके खिलाफ लिखने वालों को ही प्रदेश से बाहर उठवा कर फेंक दें।
दरअसल देश के लगभग सभी प्रदेशों में ऐसे ही हालात हैं। किसी भी मुख्यमंत्री को निष्पक्ष पत्रकारिता रास नहीं आती। कोई भी अखबार उनकी कमजोरियां उजागर करता है तो वे उसे अपना शत्रु मानने लगते हैं। बिकाऊ अखबार मालिकों, पत्रकारों, संपादकों को तो किसी भी शासक के समक्ष दंडवत होने में कोई तकलीफ नहीं होती। असली कष्ट तो उन्हें होता है जो बिकना और झुकना नहीं जानते। निश्चय ही चरणवंदना और पूरी तरह से बिछकर चाटुकारिता करने वालों ने निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के समक्ष कई संकट खडे कर दिये हैं। आम आदमी भी इस सच्चाई को समझने लगा है कि उसे किस तरह की खबरें किस-किस के इशारो पर कैसे परोसी जा रही हैं।
जिन कलंकित चेहरों ने पत्रकारिता को शर्मनाक पेशा बना कर रख दिया है उन्हें सुधारना आसान नहीं है। फिर भी जो पत्रकार, संपादक बिकने से परहेज करते हैं वे बिकाऊओं का डटकर विरोध करें। उनकी जमात से ही किनारा कर लें। आखिर अखबार सिर्फ और सिर्फ जनता के लिए प्रकाशित किये जाते हैं। जनता भी इतनी नासमझ नहीं है कि ईमानदारों का साथ न दे। जो सिर्फ सरकारी विज्ञापनों की बैसाखी के सहारे सच्ची पत्रकारिता करना चाहते हैं उन्हें भी चतन-मनन करना होगा। आम जनता के दम पर भी दमदार अखबार निकाले जा सकते हैं। सरकार के भरोसे तो कतई नहीं। सरकारें तो इस हाथ दे और उस हाथ ले के उसूल पर चलती हैं। देश में ऐसे व्यापारी, उद्योगपति भरे पडे हैं जो साहसी पत्रकारिता के पक्षधर हैं और उसके लिए वे हर तरह का सहयोग और साथ देने को तत्पर रहते हैं।

Thursday, March 7, 2013

रोगी और भोगी जन्मदाता

कुछ खबरें ऐसी होती हैं जिन्हें पढते ही खून खौल उठता है। बेइंतहा शर्मिंदगी भी महसूस होती है। दिमाग में कई सवाल कौंधने लगते हैं। पर फिर भी हम कुछ भी नहीं कर पाते। खुद को एकदम बेबस और असहाय पाते हैं। इस सच्चाई से भला कौन इंकार कर सकता है कि बेटियां अपने पिता के काफी करीब होती हैं। जितना लगाव उन्हें अपने जन्मदाता से होता है उतना और किसी से नहीं। हर पिता की भी यही चाहत होती है कि उसकी लाडली को दुनियाभर की खुशियां नसीब हों। उसकी हर राह फूलो भरी हो। बेटियों के लिए सतत उजालों की चाहत रखने वाले पिताओं की छवि को कलंकित करने वाले उन नराधमों के बारे में क्या कहा जाए और क्या किया जाए जो अपनी हैवानियत से बाज नहीं आ रहे हैं!
शुक्रवार १ मार्च २०१३ को शहर के विभिन्न दैनिक अखबारों में छपी इस खबर ने स्तब्ध करके रख दिया:
शहर के निकट स्थित कोराडी में एक ऐसे हैवान पिता को पुलिस ने गिरफ्तार किया है जो गत कई महीनों से अपनी ही बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाता चला आ रहा था। बेटियों की उम्र १६ और १३ वर्ष के आसपास है। इस व्याभिचारी का नाम रोशन है, जो कि मूलत: मध्यप्रदेश का रहने वाला है। रोजीरोटी की तलाश में कुछ वर्ष पूर्व वह नागपुर आया था और फिर यहीं का होकर रह गया। उसकी पहली पत्नी की बेहद संदिग्ध हालातों में मौत हो चुकी हैं। ५ जुलाई २०१२ को जब उसकी दूसरी पत्नी मायके गयी थी तब वह और उसकी बडी बेटी घर में अकेले थे। वासनाखोर बाप की अपनी ही संतान प‍र नीयत डोल गयी और उसने उस पर बलात्कार कर डाला। यह शर्मनाक जुल्म ढाने के साथ-साथ उसे चाकू और ब्लेड का भय दिखाकर चेतावनी भी दे डाली कि यदि किसी के सामने मुंह खोला तो उसका भी वही हश्र होगा जो उसकी मां का हुआ था। जालिम बाप के खौफ से आतंकित बेटी ने इसे अपना मुकद्दर मान लिया और कुकर्मी बाप की हवस का शिकार होती रही। महीनों तक यह सिलसिला चलता रहा। पाप का घडा एक दिन फूटना ही था। एक रात छोटी बहन ने कामुक बाप को बडी बहन के साथ जबर्दस्ती करते देखा तो वह स्तब्ध रह गयी। उसका बाप उसके साथ भी तो यही कुकर्म करता चला आ रहा था! यानी वह दोनों बेटियों को अपनी जुल्म का शिकार बनाये हुए था! रोशन ने अपनी छोटी बेटी को भी चेताया। उसे भी ऊपर पहुंचा देने की धमकी दी।
छोटी ने जब बडी को सच्चाई से अवगत कराया तो वह बौखला उठी। उसने कभी कल्पना नहीं की थी कि उसका व्याभिचारी बाप इस हद तक नीचे गिर सकता है। अपने साथ हुए अनाचार को तो उसने जैसे-तैसे बर्दाश्त कर लिया था पर छोटी बहन के साथ हुए जन्मदाता के दुष्कर्म ने उसे मुंह खोलने को विवश कर दिया। दोनों बहनों ने एक समाजसेवी को अपने बाप की हैवानियत के बारे में अवगत कराया तो मामला पुलिस स्टेशन तक पहुंच गया और हवसखोर बाप को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। दूसरी खबर ६ मार्च २०१३ की है। इसमें भी अपनी ही बेटी के बलात्कारी बाप की कलंकित दास्तान है। नारंगी शहर नागपुर के निकट के कापसी गांव के रहने वाले आसिफ शेख हफीज शेख की बारह वर्षीय बेटी ने आरोप लगाया है कि उसके बदचलन बाप ने उसे कहीं का नहीं छोडा। पांच माह पूर्व उसे घर में अकेला पाकर अपनी घिनौनी हवस का शिकार बना डाला। उसके बाद तो एक सिलसिला-सा चल पडा। जैसे कि वह अपने ही जन्मदाता के हाथों शोषित होने के लिए ही इस धरती पर जन्मी हो। असहाय बेटी ने कई बार मिन्नतें की। हाथ-पैर जोडे पर निर्लज्ज बाप का कलेजा नहीं पसीजा। उस पर तो वासना का ऐसा भूत सवार था जो दंश पर दंश देने को उतारू था। आखिरकार बेबस बेटी ने मां के सामने अपना मुंह खोला तो उसके भी पैरों तले की जमीन खिसक गयी। बिना कोई देरी लगाये संतप्त मां थाने जा पहुंची।
तीसरी खबर तो और भी चौंकाने और आंख खोलने वाली है। इसी हफ्ते पंजाब के फरीदकोट में एक युवती के साथ कुछ बदमाशों ने उसी के पिता की मौजूदगी में छेडछाड कर दी तो वह इतनी अधिक शर्मसार हुई कि खुद पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली। दरअसल इसी सुलगती खबर में पावन रिश्तों का असली सच और दर्द छुपा हुआ है। जब एक बेटी पिता के समक्ष की गयी छेडछाड से इतनी आहत हो सकती है कि वह खुद को आग के हवाले कर देती है तो सोचिए, जब कोई नराधम बाप अपनी बेटी को हम बिस्तर बनने को मजबूर करता होगा तब उस मासूम पर क्या बीतती होगी। क्या वह जिं‍दा लाश बनकर नहीं रह जाती होगी...?
दरअसल बच्चियों और बेटियों पर ऐसे तमाम जुल्मों के ढाये जाने का असली सच और पीडा कभी भी सामने नहीं आ पाता। कुछ ही मांएं ऐसी होती हैं जो अपने पति परमेश्वर के खिलाफ खडे होने का साहस दिखाती हैं। ज्यादातर तो मामले को दबाने और छुपाने का ही काम करती हैं। अपने घर की बहू-बेटियों की इज्जत अपनों के ही हाथो तार-तार होने की जानकारी होने के बावजूद न जाने कितने तथाकथित उच्च घराने भी इसलिए चुप्पी अख्तियार किये रहते हैं क्योंकि मुंह खोलने से उन्हें अपनी इज्जत लुट जाने का भय सताता है। इज्जत बचाने के लिए इज्जत लूटाने का यह खेल पता नहीं कितने छोटे-बडे परिवारों में सतत चलता ही रहता है...।

Thursday, February 28, 2013

नेताओं के घडि‍याली आंसुओं की अंतर्कथा

महाराष्ट्र के एक मंत्री हैं भास्कर जाधव। अपने बेटे-बेटी की शादी में पचासों करोड रुपये फूंकने के तमाशे के चलते उन्हे अपनी पार्टी के सुप्रीमों शरद पवार की ऐसी फटकार सुनने को मिली कि उनकी जुबान पर ही ताले लग गये। इन मंत्री महोदय का अतीत बडा ही बुलंद रहा है। शिवसेना की पैदाइश हैं। पर जब शिवसेना में दाल गलनी बंद हो गयी तो शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस का दामन थाम लिया। अपने खिलाफ कलम चलाने वाले एक पत्रकार को कार्यालय की तीसरी मंजिल से नीचे फेंककर अपनी दादागिरी और उद्दंडता का भी परचम लहरा चुके हैं। यही वजह है कि अधिकांश पत्रकार उनसे बेहद खौफ खाते हैं। मंत्री जी कितनी भी नंगाई कर लें पर पत्रकार तो पत्रकार अखबार मालिकों की भी चुप्पी बनी रहती है। वैसे मंत्री जी का कहना है कि विवाह समारोह में अंधाधुंध धन फूंक कर उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया। मेहमानों की मेहमान-नवाजी और शाही ठाटबाठ दिखाने का यही तो एक मौका होता है। ऐसे अवसर बार-बार तो नहीं आते। बच्चों के जन्म दिवस और शादियों पर दोनों हाथों से दौलत उडाना राजनेताओं का पुराना शगल है। महाराष्ट्र के नेता और मंत्री इस मामले में कुछ ज्यादा ही रंगदार हैं। रंग-रंगीले कार्यक्रमों को अंजाम देने और उनमें शामिल होने में उन्हें बेहद फख्र महसूस होता है और छाती भी तन जाती है। सभी शरद पवार नहीं हैं जो अपनी इकलौती लाडली बिटिया की शादी में हाजिरी बजाने वाले दो लाख बरातियों को एक-एक पेडा परोस कर विदा कर दें। वैसे भी महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार के बारे में यह मशहूर है कि वे दिखने-दिखाने में यकीन नहीं करते। रजाई ओडकर घी पीने वालों में उनकी गिनती की जाती है। घडि‍याली आंसू बहाने में उनका कोई सानी नहीं माना जाता। उन्हें दुख तो होना ही था! उन्ही की पार्टी के मंत्री ने ऐसा खुला खेल खेला कि वे रातभर जागते रहे और पता नही क्या-क्या सोचते रहे। यकीनन सिर पर खडे लोकसभा चुनावों की चिं‍ता ने भी परेशान किया होगा। ऐसे ही दिखावटबाजों के कारण पार्टी की साख भी दांव पर लगती है। पवार को अपने भतीजे अजीत पवार की भी याद आयी होगी जो महाराष्ट्र के दबंग मंत्री हैं और मुख्यमंत्री की नाक में दम किये रहते हैं। मीडिया ने तो उनकी दुलारी सुप्रिया को भी नहीं बख्शा जो राकां की सांसद हैं और उन करोडों रुपयों की मालकिन हैं जिनकी जादूई कमाई को लेकर कई तरह की बातें की जाती हैं। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सुप्रीमो नितिन गडकरी ने भी रूतबा दिखाने के लिए नागपुर में अपने लाडले बेटे की शादी में ऐसा ही शाही करिश्मा दिखाया था। लोगों ने आलोचनाएं भी की थीं। पर नेताओं के लिए यह रोजमर्रा की बातें हैं। उन्हें लोगों की कानाफूसी और मीडिया में छपने वाली खबरों से कोई ज्यादा फर्क नहीं पडता। यह भी पता चला है कि भास्कर जाधव के बच्चों की शाही शादी के लिए प्रदेश के एक बडे ठेकेदार ने अपनी तिजोरियां खोल दी थीं। यानी शादी प्रायोजित थी। माल दूसरे का और शान मंत्री की...। वैसे ठेकेदारों और मंत्रियों के रिश्तो की महिमा भी बडी अपरंपार है। मंत्रीजी अपने चहेते ठेकेदार को एक तरफा सरकारी ठेके दिखाते हैं और ठेकेदार भी वक्त आने पर यारी निभाकर वफादारी का भरपूर सबूत पेश करते हैं। गडकरी ने अपने मंत्रित्व काल में जिस ठेकेदार को अरबों-खरबों के ठेकों की सौगात दी थी उसी ने गडकरी के धंधों में करोडों रुपये की 'पूर्ति' कर अपना फर्ज निभाने में कोई कोताही नहीं की। महाराष्ट्र सरकार के वर्तमान मंत्री जाधव के लिए नोटों की बरसात करने वाले शहा नामक बिल्डर पर आयकर का शिकंजा कसा जा चुका है। बेचारे को जवाब देते नहीं बन रहा है। पूर्व मंत्री गडकरी की कंपनियों में जान फूंकने वाला ठेकेदार भी खुद को कानूनी शिकंजे से बचाने की तिकडमों में लगा है। अपने बच्चों की शादियों में अरबों रुपयों का तामझाम दिखाकर बडे-बडे उद्योगपतियों को मात देने वाले राजनेताओं की कथनी और करनी का यही अंतर उनके असली चरित्र को दर्शाता है। यही नेता जब जनता के बीच जाते हैं तो इनके घडि‍याली आंसू देखकर कोई भी विचलित हो जाता है। इन घडि‍याली आंसुओं की हकीकत तो यदा-कदा ही सामने आ पाती हैं। कोई व्यापारी और उद्योगपति यदि 'शाही शादी' का तमाशा दिखाए तो किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होती। ये नेता जो आम जनता के मसीहा कहलाते हैं और उसके जनप्रतिनिधी बन सत्ता पाते हैं, आखिर कैसे भूल जाते हैं कि लोगों को उनका यह मायावी चरित्र बहुत तकलीफ पहुंचाता है। लोग इतने बेवकूफ नहीं हैं कि वे हकीकत को न समझ पाएं। जो शख्स कल तक फटेहाल रहा हो वही सत्ता पाते ही कैसे मालामाल हो गया, इसकी पहचान उसे फौरन हो जाती है।
वो वक्त बहुत पीछे छूट चुका जब देश का आम आदमी हर 'तमाशा' देखकर खामोश रहता था। आज उसे बडी पीडा होती। खुद पर गुस्सा भी आता है। उसने कैसे-कैसे सौदागरों को अपना कीमती वोट देकर विधानसभा और लोकसभा में भेजने की भारी भूल की है...।

Thursday, February 21, 2013

धन, दारू, धमकी-चमकी और गृहमंत्री

खबरों की जबर्दस्त भीड में हो सकता है कि कई पाठक इस खबर को पढने से चूक गये हों। वैसे भी भ्रष्टाचार के इस महादौर में अधिकांश पाठक मित्र नेताओं के अनाचार और भ्रष्टाचार के समाचारों से दूरी बनाने लगे हैं। यह सच्चाई अपनी जगह पर कायम है कि कुछ को छोडकर बाकी लगभग सभी सफेदपोश नेताओं ने शर्म और हया को बेच खाया है।
नागालैंड के गृहमंत्री को शराब की पेटियों, पांच पिस्तोलों, दो रायफलों, अस्सी कारतूसों और एक करोड दस लाख की नगदी के साथ रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। किसी भी प्रदेश में 'गृहमंत्री' की खास अहमियत और रूतबा होता है। गृहमंत्री पर ही अपने प्रदेश की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी होती है। पुलिस की कमान भी उसी के हाथ में होती है। इतने शक्तिशाली शासक का अपराध कर्म आखिर क्या दर्शाता है? ऐसे धूर्त शासक का पुलिस पर क्या असर पडता होगा, इसका जवाब तलाशने के लिए ज्यादा दिमाग खपाने की कतई जरूरत नहीं है। जैसा राजा वैसी पुलिस। नागालैंड के विधानसभा चुनावों में गृहमंत्री ने साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की ठानी थी। नोटों के बंडलों का वोटरों को खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। पिस्तौलें और रायफलें अपने विरोधियों को चमकाने, धमकाने और डराने के लिए, तो शराब से वोटरो को मदहोश करने की पूरी तैयारी थी। तय है कि गृहमंत्री से एक करोड दस लाख की जो नगदी बरामद की गयी है वह उसकी या उसके बाप-दादा के खून पसीने की कमायी नहीं हो सकती। छोटे से प्रदेश नागालैंड में दोनों हाथों से लूटमार मचाकर जो दौलत बटोरी गयी होगी उसी से हथियार भी खरीदे गये होंगे। ऐसे काम तो छंटे हुए बदमाश और हत्यारे ही किया करते हैं। प्रदेश की इतनी बडी सफेदपोश हस्ती की गिरफ्तारी राजनीति के अपराधिकरण की जीती जागती मिसाल है। सत्ता का चोला धारण करने के बाद ऐसे सफेदपोश किस तरह से लोकतंत्र के साथ खिलवाड करते हैं उसका भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सरकारी सुरक्षा बलों के घेरे में महफूज रहकर राष्ट्रीय खनिज सम्पदा को पचाने वाले ऐसे उद्दंड भ्रष्टाचारियों के लिए एक करोड दस लाख जैसी नगदी कोई मायने नहीं रखती। अपने शासनकाल में उसने पता नहीं कितना-कितना काला धन अपनी तिजोरियों में ठूंसा होगा। इन पंक्तियों को लिखते-लिखते मुझे जेल में कैद झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौडा की याद आ रही है जिसने अपने छोटे से शासनकाल में हजारों करोड के भ्रष्टाचार को अंजाम देने का कीर्तिमान रचा था। पता नहीं कितने और मधु कौडा लाल बत्ती और वीआईपी की सुरक्षा का उपभोग करते हुए आजाद घूम रहे हैं। यह कितनी अजीब बात है कि इस देश में सफेदपोश अपराधी ही सबसे ज्यादा मजे में रहते हैं और खुद सरकार भी उन पर मेहरबान हो उन्हें भरपूर सुरक्षा मुहैय्या कराती है। अक्सर ऐसा लगता है कि नागालैंड में गिरफ्तार किये गये गृहमंत्री इम्कोंग एल इम्चेन जैसे लोग ही सरकारें चला रहे हैं जिन्हें अपने शुभचिं‍तकों, साथियों और शागिर्दों की सतत चिं‍ता रहती है। शासकों ने अगर इतना ख्याल आम लोगों का रखा होता तो देश इस कदर बदहाल न होने पाता।
देश में जहां-तहां कानून व्यवस्था की जो दुर्गति है वह किसी से छिपी नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी तो खासी बदनाम हो गयी है। फिर भी हुक्मरान बेफिक्र निद्राग्रस्त हैं। उनकी चिं‍ता के संकुचित और स्वाथी दायरे में सिर्फ उनके भाई-बेटे-भतीजे, यार-दोस्त और वीआईपी ही हैं। सत्ताधीशों ने यह मान लिया है कि अगर वे और उनके अपने सुरक्षित हैं तो पूरा देश सुरक्षित है। आम आदमी तो सिर्फ मरने के लिए ही पैदा होता है। उसकी हिफाजत का जिम्मा तो उस ऊपर वाले पर है जिसने उसे धरती पर भेजा है। आम आदमियों की भीड में वीआईपी भी खूब पैदा होने लगे हैं। कल का गुंडा, बदमाश और बलात्कारी कब वीआईपी बन जाता है, पता ही नहीं चलता। बेचारी पुलिस करे भी तो क्या करे। उसकी मजबूरी है जिसे कभी हथकडि‍यां पहनायी होती हैं उसी की जी-हजूरी और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालनी पडती है।
२०११ में दिल्ली के जंतर-मंतर में जिस तरह से समाजसेवक अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले अनशन-आंदोलन से जागृति सी आयी थी और लगने लगा था कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और तमाम भ्रष्टाचारी होश में आ जाएंगे। पर  कहां रूक पाया भ्रष्टाचार? दरअसल उसे रूकना ही नहीं है। उसे सतत चलते रहना है। चेहरे बदलते रहेंगे पर उसका चेहरा-मोहरा कतई नहीं बदलेगा। जिस देश के प्रदेश का गृहमंत्री ही अपराधियों का प्रतिरूप हों, उसके उज्ज्वल भविष्य की कल्पना ही व्यर्थ लगती है। अनुशासन, नैतिकता, ईमानदारी और जनसेवा सिर्फ और सिर्फ किताबी शब्द बनकर रह गये हैं, जिनका इस्तेमाल अपने-अपने स्वार्थों के हिसाब से किया और करवाया जाता है। आखिर किस-किस को दोष दिया जाए! कोई भी ऐसी राजनीतिक पार्टी नहीं दिखती जिसकी दहलीज पर बेईमानों और रिश्वतखोरों का आना-जाना न लगा रहता हो। धन, दारू, धमकी-चमकी की बदौलत चुनाव जीतने के चलन के रहते देश में कोई सुधार आ पायेगा ऐसे सपना देखना यकीनन बेमानी था, है और रहेगा।

Thursday, February 14, 2013

पुलिस का ये भी एक चेहरा

यह पढकर कतई नहीं चौंकिएगा कि अपने देश में पुलिस बेखौफ होकर अपराध करती है और धडल्ले से अपराधी भी पैदा करती है। जिन लोगों का भूले से भी खाकी से वास्ता पडता है, उन्हें इसके असली चाल-चरित्र को जानने-समझने में ज्यादा देरी नहीं लगती। ऐसा भी नहीं है कि सभी पुलिसिये एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं, परंतु इस कहावत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कुछ सडी मछलियां सारे तालाब को इस कदर गंदा और विषैला करके रख देती हैं कि उसकी दमघोटू सडांध लोगों का जीना दूभर कर देती है। खाकी के सागर में तो एक से बढकर एक मगरमच्छ भरे पडे हैं जिनके निगलने की क्षमता की कोई सीमा नहीं है।
कई निर्दोषों का सिर काटकर हत्याएं करने और दहशत फैलाने वाले सिरियल किलर चंद्रकांत झा का बयान पुलिस की बदरंग तस्वीर को बखूब पेश करता है।
चंद्रकांत को फांसी की सजा सुनायी जा चुकी है। ये नृशंस हत्यारा बिहार का मूल निवासी है। कभी वह बेहद सहज और सरल इंसान था। बेरोजगारी के चलते उसे अपना गांव छोडना पडा। रोजी-रोटी की तलाश उसे दिल्ली ले आयी। उसे यकीन था कि देश की राजधानी उसकी हर समस्या का समाधान कर देगी। उसने फुटपाथ पर सब्जी बेचनी शुरू कर दी। कुछ ही दिन में उसने जान लिया कि फुटपाथ पर धंधा करना बच्चों का खेल नहीं है। यहां पर इलाके के बीट कांस्टेबल की सत्ता चलती है। कमायी हो या न हो पर उसे खुश रखना जरूरी है। दूसरों की तरह चंद्रकांत भी इस दस्तूर को निभाने लगा। पर कई बार ऐसे मौके भी आते जब नहीं के बराबर कमायी होती। चंद्रकांत हफ्ता देने में असमर्थ रहता। खाकी वर्दी वाले का माथा सनक जाता। चंद्रकांत को तरह-तरह से परेशान करने के हथकंडे अपनाने के साथ-साथ झूठे मामले भी दर्ज करवा दिये जाते। ऐसे में कई बार उसे जेल की हवा खानी पडी। बेवजह की जेल यात्राओं ने उसे धीरे-धीरे इतना विद्रोही और गुस्सैल बना दिया कि वह बेकसूरों की हत्याएं करने लगा, जैसे पुलिस वालों से बदला ले रहा हो। हत्यारे चंद्रकांत ने अदालत में स्वीकार किया है कि बेलगाम और भ्रष्ट हो चुकी पुलिस व्यवस्था को चुनौती देने के लिए ही वह खूंखार हत्यारा बनने को मजबूर हुआ। उसने तो मेहनत-मजदूरी कर जीवनयापन का सपना देखा था पर पुलिस ने उसे क्या से क्या बना दिया। चंद्रकांत के इस बयान को अदालत ने काफी गंभीरता से लिया और पुलिस की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यकीनन यह मामला पुलिस के उस चेहरे को सामने लाता है जो लोगों को न्याय दिलाना छोड अपराधी बनाता है।
यकीनन खाकी वर्दी के दुरुपयोग का यह जीता-जागता उदाहरण है। समाज के कमजोर वर्ग को वर्दी की धौंस दिखाना, अवैध वसूली करना, झूठे मामलों में फंसाना यही दर्शाता है कि देश के पुलिस महकमें में बहुत बडे स्तर पर राक्षसी प्रवृति और घोर अराजकता का बोलबाला है। अपराधियों की तो शिनाख्त हो जाती है और वे पकड में भी आ जाते हैं। खाकी वर्दी में छिपे शैतानों का आसानी से पता नहीं चल पाता।
यह कितनी शर्मनाक सच्चाई है कि पुलिस थानों में ही महिलाओं के साथ बलात्कार हो जाता है। कोई वहशी वर्दीधारी सैर-सपाटा करती युवती की अस्मत लूट लेता है। ऐसी न जाने कितनी खबरें मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। शोर-शराबा मचाता है पर होता-जाता कुछ नहीं। पिछले महीने धुले में दंगे हुए। दंगाइयों और पुलिस वालों में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया। पुलिस वाले दंगाइयों को पकडना छोड खुद लूटपाट करने लगे। छह पुलिस कर्मियों को गिरफ्तार किया गया। खाकी का कवच पहन कर अराजकता का तांडव मचाने वालों ने सारे के सारे पुलिस विभाग को कटघरे में खडा कर दिया है। जिस पुलिस पर आम जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वह इतनी भ्रष्ट और लापरवाह कैसे बन गयी है? पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी अपने में ही मस्त रहते हैं। उनकी नाक के नीचे क्या हो रहा है इसकी उन्हें या तो खबर नहीं होती या फिर जानबूझकर नजरअंदाज करने की परंपरा निभाते रहते हैं। ऐसे वरिष्ठ अधिकारी भी हैं जो राजनेताओं और चुनिं‍दे दलालनुमा अखबारियों से मेल-मुलाकात कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
बीते वर्ष मध्यप्रदेश से नागपुर आये दो कांग्रेसियों को पुलिस वालों ने ही अपनी 'डकैती' का शिकार बना डाला। वे इस नये शहर में बेखौफ होकर घूम रहे थे कि पुलिस वालों की गिद्ध दृष्टि उनपर पड गयी। उन्हें धमकाया-चमकाया गया और पांच-सात हजार रुपये झटक लिये गये। कोई आमजन होते तो चुपचाप अपने शहर लौट जाते। वे भी अपने शहर के नेता थे। दूसरे शहर में पता नहीं कैसे अपनी जेब ढीली करने को विवश कर दिये गये थे? उन्होंने फौरन शहर के एक बडे कांग्रेस नेता को अपनी आपबीती सुनायी तो वे नेता भी भौचक्के रह गये। उन्होंने फौरन पुलिस के उच्च अधिकारी तक शिकायत पहुंचायी और उनकी रकम वापस दिलवायी। यही है इस देश की पुलिस का वो चेहरा जो आम आदमी को बेहद डराता है और लुट-पिट जाने के बाद भी खामोश रहने को मजबूर करता है। यह भी सच है कि यह भयावह चेहरा देश के लगभग सभी महानगरों, शहरों और कस्बों में अपना आतंक मचाये है और खाकी को कहीं न कहीं यह यकीन है कि कोई भी उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता...।

Thursday, February 7, 2013

सब कुछ जनता के हाथ में

अच्छे काम की तारीफ तो हर कोई करता है। हर देशवासी की यही तमन्ना है कि सरकार जनहित के कार्य करने में फुर्ती दिखाये। पर ऐसा होता नहीं दिखता। इतिहास गवाह है कि धरने, आंदोलन और शोर-शराबे ही सरकार को यदाकदा जगा पाते हैं। वर्ना सरकार का सारा कारोबार अपने तौर-तरीकों के साथ चलता रहता है। दिल्ली गैंगरेप मामले में कानून बदलने के लिए अध्यादेश जारी करने की सरकार ने जो स्फूर्ति दिखायी उसकी प्रशंसा विदेशी मीडिया भी कर रहा है। अमेरिकी अखबार वाशिं‍गटन पोस्ट ने लिखा है कि कानून बदलने की इतनी तेज कार्रवाई किसी-किसी देश में ही संभव है। भारत ने साबित किया है कि लोगों की मांग पर किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था किस तरह काम कर सकती है। सोनिया एंड मनमोहन कंपनी इस प्रशंसा पर फूलकर कुप्पा हो सकती है। काफी अरसे बाद किसी विदेशी मीडिया ने सरकार की पीठ थपथपायी है। वैसे सच यही है कि अगर आम जनता सडकों पर नहीं आती तो सरकार की नींद कतई नहीं खुल पाती। लोगों के बागी तेवरों ने जब नाक में दम करके रख दिया तो सरकार को घडि‍याली आंसू बहाने पडे और वो करके दिखाना पडा जिसकी आज विदेशी मीडिया प्रशंसा कर रहा है।
विदेशी मीडिया इस सच्चाई से यकीनन बेखबर है कि भारतवर्ष में अधिकांश फैसले राजनीति और राजनेताओं के नफे-नुकसान के आधार पर लिये जाते हैं। कई बार तो बडी से बडी भूख हडतालें और विद्रोह की चिं‍गारियां भी शासकों को टस से मस नहीं कर पातीं। इस देश के हुक्मरानों ने हाथी की सी मदमस्त चाल चलने की कसम खायी हुई है। इस वर्ष कई राज्यों में विधान सभा तो अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हैं। महंगाई और भ्रष्टाचार का कीर्तिमान रच चुकी मनमोहन सरकार के सिर पर नंगी तलवारें लटक रही हैं। उसे भय सताने लगा है कि अगर उसने ऐसे ही अपना कारोबार जारी रखा तो उसकी गर्दन को कटने से कोई नहीं बचा पायेगा। हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है। राजनेताओं के लिए तो सत्ता के बिना सांस ले पाना भी दूभर हो जाता हैं। उनके लिए सत्ता ही उनकी जान है और प्राण है। जिस लोकपाल विधेयक को लगभग ४५ वर्षों तक लटकाया-भटकाया गया उसी के लागू होने के आसार नजर आने लगे हैं।
संसद के आगामी सत्र में लोकपाल विधेयक के पारित होने का ढिं‍ढोरा पीटा जा चुका है। पर अन्ना हजारे नाखुश है। २०११ में अन्ना आंदोलन के दबाव में ही सरकार ने मन मारकर लोकपाल बिल लोकसभा में किसी तरह से पास कराया था। बाद में राज्यसभा में इस बिल को इस तरह से लटकाया गया जैसे कि ये विधेयक देश और राजनेताओं के लिए बहुत बडा खतरा हो। फिर भी इस बीच राज्यसभा की प्रवर समिति के सामने इस बिल को विचारार्थ रखा गया। समिति की १६ सिफारिशों में दो को छोडकर सरकार ने सभी सुझावों को मान लिया हैं। अन्ना हजारे ने प्रस्तावित लोकपाल विधेयक को मज़ाक और बेमतलब करार देने में जरा भी देरी नहीं की। उनका कहना है कि सरकार की यह सरासर धोखाधडी है। उन्होंने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीवीआई) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को भी निर्वाचन आयोग की तरह स्वतंत्र संस्था बनाने की अपनी पुरानी मांग दोहरा दी है और यह ऐलान भी कर दिया है कि अगर ऐसा नहीं होता है तो वे प्रभावी लोकपाल की मांग को लेकर फिर से रामलीला मैदान का रुख कर सरकार की नींद उडा देंगे। यकीनन अन्ना के हौसले बुलंद हैं पर दूसरी तरफ उन्हीं की सहयोगी किरण बेदी ने संशोधित लोकपाल का समर्थन कर दिया है। उनका कहना है कि कुछ नहीं से कुछ अच्छा। सरकार ने अब जब कुछ कदम आगे बढाये हैं तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए। किरण बेदी का यह आशावादी रवैय्या अन्ना को यकीनन रास नहीं आया है। इस लोकपाल को सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होने से भी अन्ना खफा हैं। उनका कहना है कि देश में भ्रष्टाचार की गंदगी फैलाने में इन्ही का ही तो असली योगदान है। जब असली लुटेरे ही बचे रहेंगे तो फिर लोकपाल किस काम का?
यह अच्छी बात है कि अन्ना अपनी जिद पर अडे हैं। पर सरकार इतनी जल्दी कहां मानने वाली है। सीबीआई एक ऐसा हथियार है जो सदैव उसकी रक्षा करता है। अपने विरोधियों से निपटने और अपनों को बचाने के लिए सीबीआई का जिस कदर दुरुपयोग होता है उसकी भी हर किसी को खबर है। इस सरकार के रहते तो अन्ना की मंशा पूरी नहीं हो सकती। देश के इस सच्चे और ईमानदार जनसेवक की तमन्ना तभी पूरी हो सकती है जब मौजूदा सरकार को उखाड फेंका जाए। जब उनकी पसंद की सरकार होगी तब यकीनन वैसा लोकपाल आने में देरी नहीं लगेगी जैसा कि अन्ना और तमाम देशप्रेमी जनता चाहती है। ऐसे में सब कुछ इस देश की आम जनता के हाथ में ही है...।