Thursday, May 16, 2013

आज के नायक

मंत्री जी उदास थे। गुस्सा आ रहा था। एकांत में जी भरकर रो लेने की इच्छा भी हो रही थी। इस साले भांजे ने क्या कर डाला! रिश्वत लेने का सलीका भी भूल गया। मात्र ९० लाख की घूस लेते दबोच लिया गया। बेवकूफ को समझाया भी था कि रंगे हाथ पकडे जाने से बचना। इसकी जल्दबाजी ने मेरी रेलमंत्री की कुर्सी ही छीन ली। दूसरे मंत्रियों के दामाद और साले अरबों-खरबों खाते हैं और डकार भी नहीं लेते। इसने तो सबकुछ उगल डाला। भरे बाजार मेरे कपडे उतरवा दिये। सोनिया जी और डॉ. मनमोहन को मुझ पर कितना यकीन था। यह भरोसा वर्षों की मेहनत की बदौलत बना था। एक ही झटके में सबकुछ तबाह हो गया। जैसे कोई भूचाल आया हो और कई आलीशान इमारतों को धराशायी कर चलता बना हो। मंत्री जी ने तो कई योजनाएं बना रखी थीं। भारतीय रेल के दोहन के बडे-बडे मंसूबे पाल रखे थे। पांच-सात महीने में अपनी पंद्रह पीढि‍यों के भविष्य को सुरक्षित कर गुजरने की ठानी थी। पार्टी को भी उनसे बहुतेरी उम्मीदें थीं। किसी भी रेल मंत्री के लिए अरबो रुपये का पार्टी फंड जुटाना बाएं हाथ का खेल होता है। रामविलास पासवान से लेकर लालूप्रसाद यादव तक सबने रेल को नोचा है। तभी तो सत्ता से बाहर रहने के बावजूद अपनी राजनीति की दूकानों को शान से चलाते चले आ रहे हैं।
मंत्री जी के दिमाग की सडक पर दौडने वाली रेल की तो जैसे ब्रेक ही फेल हो गयी। वह तो भागे ही चली जा रही थी। उनके शुभचिं‍तको ने उन्हे घेर लिया। परिवार के वर्षों पुराने पुरोहित ने कुर्सी बचाने का एक अचूक उपाय बताया। मंत्री जी ने भी फौरन एक हट्ठा-कट्ठा बकरा मंगवा लिया। उन्हें यकीन था कि बकरे की बलि देने से मैडम सोनिया और पीएम मनमोहन का दिमाग दुरुस्त हो जायेगा और वे अपने रेल मंत्री की बलि लेने का विचार त्याग देंगे। यह तो बकरे की किस्मत अच्छी थी कि न्यूज चैनल वालों की उस पर नजर पड गयी। बकरा कुर्बान होने से बच गया। मंत्री जी ने बडी सज्जनता दिखायी। इस काम में उनकी धर्मपत्नी ने भी पूरा साथ दिया। अपने पति देव को बकरे के सामने नतमस्तक करवा कर मीडिया तक यह संदेश पहुंचा दिया कि हमारा इरादा वैसा नहीं था जैसा वे सोच रहे थे। मंत्री जी न्यूज चैनल वालों की सक्रियता से बौखला उठे। उन्होंने आखिरकार कह डाला कि मीडिया ने ही उनकी बलि ली है। मीडिया अगर उछल-कूद नहीं मचाता तो आलाकमान के दिमाग में उनका इस्तीफा मांगने का विचार ही नहीं आता।
वैसे तो ऐसे मामलों में मीडिया पहले भी कई सफेदपोशों को नाराज कर चुका है। इस सदी के तथाकथित महानायक ने भी तब मीडिया को ही बकवासी ठहराया था जब उन्होंने अपनी होने वाली बहू ऐश्वर्या के मांगलिक दोष निवारण के लिए उसकी शादी पेड से करवायी थी। इस देश में अभिनेता को भगवान मानने वालों की अच्छी-खासी संख्या रही है। उन दिनों एक तरफ उनके नाम पर मंदिर बनाने की खबरें मीडिया में छायी थीं तो दूसरी तरफ खुद भगवान अपने परिवार की सुख-शांति के लिए देशभर के मंदिरों और मजारों पर माथा टेकते घूम रहा था। देश के कुछ बुद्धिजीवियों ने नये भगवान की आलोचना में जमीन-आसमान एक कर दिया था। साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने कटाक्ष करते हुए लिखा था: ''लाखों प्रशंसको के आदर्श पुरुष का दुनियाभर के भगवानों, देवी, देवताओं से आशीर्वाद लेते घूमना दर्शाता है कि यह शख्स दिखावे का नायक है। दरअसल यह तो एक घोर अंधविश्वासी, कायर और भयग्रस्त आम इंसान है। इसके मन में यह बात घर कर गयी है कि अपनी होने वाली बहू की पेड से शादी करवाने और पत्थर की मूर्तियों पर करोडों का चढावा चढाने के बाद संभावित तकलीफों से छुटकारा पा लेगा और दुनियाभर की तमाम खुशियां इसकी झोली में समां जाएंगी।''
कहानीकार राजेंद्र यादव अमिताभ बच्चन के पिताश्री हरिवंशराय बच्चन की पीढी के सजग साहित्यकार रहे हैं। उन्होंने उन्हें करीब से देखा और समझा था। तभी तो वे यह बताने से भी नहीं चूके कि अमिताभ बच्चन तो अपने पिता को अपना आदर्श मानते हैं। ऐसे में वे कैसे भूल गये कि उनके पिता नास्तिक थे। अंधविश्वास से उनका कोई लेना-देना नहीं था। ऐसे कवि पुत्र का विभिन्न देवी-देवताओं से प्रमाणपत्र बटोरने फिरना यही दर्शाता है कि एक ढोंगी बेटा अपने पिता के जीवन मूल्यों का सरासर अपमान कर रहा है। देशभर के और भी कई विद्धानों ने भयग्रस्त नायक पर जमकर तीर चलाये। हर किसी ने यही कहा कि मंदिरों और मजारों को करोडों की दान-दक्षिणा देने वाला यह शख्स वास्तव में अगर सच्चा नायक होता तो इस धन को गरीबों, बदहालों के विकास और उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए अर्पित कर देता। पर्दे के नायक ने घोर आडंबरबाजी कर अपना असली चेहरा दिखा दिया है। बुद्धिजीवियों की आलोचनाओं की तीखी बौछारों ने अमिताभ को इस कदर आहत किया था कि आखिर उन्हें अपने पिता की लिखी कविता की इन पंक्तियों का सहारा लेना पडा था:
''छुपाना जानता तो, जग मुझे साधु समझता
शत्रु बन गया है, छल रहित व्यवहार मेरा''
अमिताभ ने उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से यह बताने की पुरजोर कोशिश की, कि, मुझे लुकाना और छुपाना नहीं आता। मैं ऐसा ही हूं। यह लोग ही हैं जो जब-तब उनकी तुलना उनके महान पिता हरिवंशराय बच्चन से करने लगते हैं। नायक ने इशारों ही इशारों में यह भी कहा कि जो छुपाते हैं लोग उन्हें सिर पर बिठाते हैं और साधु-संत का दर्जा देते नहीं थकते। कोई छल-कपट न करते हुए मैंने वही किया जो मैंने चाहा और मुझे अच्छा लगा। ऐसे में मैं बुरा हो गया...!
बहरहाल, अमिताभ बच्चन तो मंजे हुए अभिनेता हैं। कइयों के भगवान भी हैं जो उन्हें सतत पूजते हैं। भगवान कभी झूठ नहीं बोला करते। भगवान गलत भी नहीं हो सकते। देश के भूतपूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव भले ही राजनीति के जोकर हैं पर वे भी कभी-कभी सच बोल दिया करते हैं। उन्होंने रहस्योद्घाटन किया है कि जब वे देश के रेल मंत्री थे तब उन्होंने रेलभवन में विश्वकर्मा और कृष्ण भगवान की मूर्तियां स्थापित करवायी थीं। उन्होंने उनसे कह रखा था कि मेरी और रेल की देखभाल की जिम्मेदारी आप पर ही है...। विद्वान नेता लालूप्रसाद यादव यकीनन यह कहना चाहते हैं कि अगर पवन बंसल ने मुझे अपना गुरु माना होता और मेरे पदचिन्हों पर चलते तो उनकी सत्ता और इज्जत पर कभी कोई आंच नहीं आती।

Thursday, May 9, 2013

जनता किसके साथ है?

देश अब क्या करे? कितना रोये और कितनी बार अपना माथा पीटे! जिन लोगों के हाथों में सत्ता है उनमें से आधे से ज्यादा भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हैं। यह इतने जिद्दी और बेशर्म हैं कि इन्होंने कभी भी न सुधरने की कसम खायी हुई है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही सवालों के घेरे में हो वहां के मंत्रियों और संत्रियों को भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का नंगा तांडव मचाने से कौन रोक सकता है? देश की वर्तमान केंद्र सरकार अपना एक पाप धोने की कोशिश करती है कि दूसरा सिर तानकर खडा हो जाता है। सरकार की असली मंशा तो यही दिखती है कि वह अपने इर्द-गिर्द के भ्रष्टाचारियों को बेनकाब होते देखना ही नहीं चाहती। पारदर्शिता से तो जैसे उसने अपना नाता ही तोड लिया है। सीबीआई को भी उसने अपनी कठपुतली बनाकर रख दिया है। ऐसे में मंत्री तो मंत्री उनके रिश्तेदार भी बहती गंगा में हाथ धोने का कोई मौका नहीं छोड रहे हैं।
कभी किसी का दामाद तो कभी किसी का भतीजा और बेटा अरबों-खरबों के घोटाले कर गुजरता है तो कभी खुद मंत्री महोदय ही अपने काले चेहरे के साथ मीडिया में सुर्खियां पाते हैं और फिर बडी निर्लज्जता के साथ बयानबाजियों पर उतर आते हैं। कुछ माननीय सांसद और राज्यसभा सदस्य खुद तो कोयले की खदाने हडपते ही हैं, अपने मित्रों को भी नामी-बेनामी कंपनियों का मालिक दिखाकर हजारों करोड की खदानों की सौगात दिलाने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे ही राष्ट्रीय संपदा के लुटेरों ने रेलवे को भी नहीं बख्शा। रेलमंत्री के भांजे के रिश्वतकांड के सामने आने के बाद कई सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल गये हैं। रेलमंत्री की कुर्सी हथियाने के लिए राजनेता क्यों जमीन-आसमान एक कर देते हैं इसके पीछे छिपे असली मकसद का भी पर्दाफाश हो गया है। वैसे तो हर रेलयात्री जानता-समझता है कि रेलवे में जमकर भ्रष्टाचार होता है। टी.सी. की रिश्वतखोरी एकदम आम बात है। मंत्री-अधिकारी भी खूब मिल-बांटकर खाते हैं। पर रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे ने तो उस रहस्य से भी पर्दा हटा दिया है जो अभी तक पूरी तरह से उजागर नही हुआ था। मात्र कयास लगाये जाते थे। रेलमंत्री के भांजे के रंगे हाथ दबोचे जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रेलवे में वरिष्ठता और योग्यता कोई मायने नहीं रखती। चाटुकारिता और संबंध काम आते हैं। पदों की बोलियां लगती हैं जिनकी जेब में दम होता है वही बाजी मार ले जाते हैं। वैसे तो यह फार्मूला हर कमाऊ विभाग में अपनाया जाता है। पर रेलवे में रेलें धीमीं और थैलियां बडी तेजी से दौडती हैं जो बैठे-बिठाये थैलीशाहों को मनचाही मंजिल तक पहुंचा देती हैं।
रेलमंत्री के भांजे को रेलवे के एक अफसर से ९० लाख रुपये की घूस लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया पर मंत्री महोदय यह कहकर बचने की कोशिश में लग गये कि मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है। उनका बस चलता तो भांजे को पहचानने से ही इंकार कर देते। अपनी बहन को मुंह दिखाना था इसलिए संवेदनशील रिश्ते को नकार नहीं पाये। भांजे और मामा में जबर्दस्त तालमेल नजर आता है। तभी तो रिश्वत देने वाले अफसर को पदोन्नति का जो पत्र थमाया गया उस पर मंत्री जी के ही हस्ताक्षर हैं। यानी सबकुछ पहले से ही मिल-बैठकर तय कर लिया गया था। यह भी बताया जा रहा है कि भांजा और मामा बडे ही मंजे हुए खिलाडी हैं। मामा के इशारे पर नाचने वाला यह कमाऊ भांजा तरह-तरह के गुल खिलाता रहा है। शातिर भांजे के हाथ काफी लंबे हैं। वह रेलवे प्रशासन में काफी अंदर तक अपनी पहुंच रखता है। रेलवे में स्थानांतरण, नियुक्तियां और अन्य कार्य करवाना उसके बायें हाथ का खेल रहा है। भांजा ही मामा के सभी आडे-तिरछे लेन-देन का काम देखता था। यह कोई छोटी-मोटी रिश्वत का मामला नहीं था। दरअसल यह दस करोड की रिश्वत का खेल था जिसका पर्दाफाश हो गया और रेलमंत्री पवन बंसल का असली चेहरा सामने आ गया। जिस महेश कुमार नामक अधिकारी ने यह सौदेबाजी की और ९० लाख की किश्त देते वक्त धर लिया गया उसका इरादा भी ढेर सारा माल कमाने का था। रेलवे में अरबों-खरबों के विद्युत-सामानों की आपूर्ति के ठेके दिये जाते हैं। महेश कुमार रेलवे में मेंबर इलेक्ट्रिकल बनकर पचासों करोड कमाने के मंसूबे बना चुका था। कई सप्लायरों से उसने पहले से ही मामला तय कर लिया था। किसको कितना देना है और भारतीय रेलवे को कितना चूना लगाना है उसकी भी पूरी तैयारी कर ली गयी थी। रेलवे को मनचाहा चूना लगाने का यह खेल भी कोई नया नहीं है। जितने के विद्युत उपकरण सप्लाई किये जाते हैं उससे कई गुणा ज्यादा के बिल बनाये जाते हैं। इसलिए तो रेलवे वहीं का वहीं है और मंत्री-अधिकारी और कर्मचारियों के ठाठ देखते बनते हैं। रेलमंत्री पवन बंसल तो वैसे भी पुराने घुटे हुए खिलाडी हैं। सांसद और रेलमंत्री बनने के बाद उन्होंने बेहिसाब धन कमाया और सम्पतियां बनायीं। उनके तमाम रिश्तेदारों की संपत्ति में लगातार जो इजाफा हुआ वह भी कम चौंकाने वाला नहीं है। २००६ में बंसल के वित्त राज्यमंत्री बनते ही उनके करीबी रिश्तेदारों की तो जैसे लाटरी ही खुल गयी। सभी ने दोनों हाथों से दौलत बटोरी और आलीशान कोठियों और तमाम सुख-सुविधाओं का साम्राज्य खडा कर लोगों को हैरत में डाल दिया। बदकिस्मती से भांजा सीबीआई की चपेट में आ गया और मक्कार मामा की पोल खुल गयी। इतना सबकुछ होने के बाद भी मनमोहन सरकार भ्रष्ट रेलमंत्री के साथ खडी है! उन्हें पाक-साफ बताया जा रहा है। अपने भ्रष्ट मंत्रियों का साथ देना कांग्रेस के लिए कोई नयी बात नहीं है। कर्नाटक में मिली जीत ने उसके हौसले बढा दिये हैं। उसे लग रहा है कि देश की जनता उसके साथ है...।

Saturday, May 4, 2013

अहसान फरामोश पाकिस्तान

मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर पाकिस्तान हिं‍दुस्तान का शुभचिं‍तक होता तो उसका नाम दुनिया के खुशहाल देशों में शुमार होता। पाकिस्तान के खुदगर्ज शासकों ने भारत में बम-बारूद बिछवाने और आतंक का कहर बरपाने को इस कदर प्राथमिकता दी कि वे अपने ही देशवासियों के हित को नजरअंदाज कर गए। उन्हें भारत की खुशहाली तो कभी रास ही नहीं आयी। अपने देश की बदहाली भी दूर नहीं कर पाये। भारतवर्ष के हुक्मरानों ने पाक के शासकों को अमन के रास्ते पर लाने की लाख कोशिशें कीं। पर कुत्ते की पूंछ टेढी की टेढी ही रही। दरअसल हमारे देश के सत्ताधीश शातिर पडौसी मुल्क को जानने-परखने के बाद भी मौके पर मौके देते रहे और वह अहसान फरामोश इसे उनकी कमजोरी ही समझता रहा। उसने हमारी संसद पर हमला कराया। मुंबई पर आतंकी आक्रमण करवाकर निर्दोषों का लहू बहाया, जानें लीं। देश में जहां-तहां उसी ने बम-बारूद बिछवाये और खून खराबे करवाये। यह पाकिस्तान ही है जिसने मुंबई धमाकों को अंजाम देने वाले राष्ट्रद्रोही दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों को पनाह दी। यह झूठा और फरेबी मुल्क हमेशा यही कहता आया है कि भारतवर्ष में होने वाली आतंकी गतिविधियों में उसका कभी कोई हाथ नहीं रहा। पर जैसे ही अजमल कसाब को फांसी पर लटकाया तो वहां के शैतान शासको में खलबली मच गयी। उन्हे अपने लिखाये-पढाये अजमल कसाब को कुत्ते की मौत मार दिये जाने पर बेहद पीडा हुई। वे और तो कुछ कर नहीं सकते थे। इसलिए कायरों ने पाकिस्तान के लाहौर की जेल में सजा काट रहे भारतीय कैदी सरबजीत सिं‍ह को बुरी तरह से पिटवा कर मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया और आखिरकार उसकी मौत हो गयी। कुछ दिन पहले एक अन्य हिं‍दुस्तानी कैदी चमेल सिं‍ह को भी ऐसी ही खूंखार जानलेवा दरिंदगी का शिकार बनाकर मौत के घाट उतार दिया गया था। गिद्धों की तरह उसके शरीर के कुछ अंग भी नोच खाये गये। यह है पाकिस्तान का असली चेहरा। दूसरी तरफ हिं‍दुस्तान है कि जिसने पाकिस्तान के ९० हजार सैनिकों को गिरफ्तार करने के बाद भी माफ कर दिया था और सही-सलामत उनके देश भेज दिया था। ऐसे मामलों में हम भारतवासी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अनुयायी हैं। अहिं‍सा के सच्चे पुजारी हैं और वो दो टक्के का देश पाकिस्तान उस जिन्ना को अपना आदर्श मानता है जिसने भारत के विभाजन के बीज बोये थे। उसके अंदर तो हिं‍दुस्तान के प्रति नफरत ही भरी हुई थी। वही नफरत आज भी पाक के हुक्मरानो में जिन्दा है।
२६ जून २०१२ को देश के तमाम अखबारों और न्यूज चैनलों पर यह खबर आयी थी कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सरबजीत सिं‍ह की मौत की सजा को उम्र कैद में बदल दिया है। पहले से ही २२ साल की सजा काट चुकने के कारण उसकी रिहाई तय मानी जा रही थी। उसके गांव के लोगों ने खुशियां मनायी थीं। भारत सरकार ने भी खुशी जाहिर की थी। बाद में कोई ऐसी खिचडी पकी कि उसकी रिहाई अटकी की अटकी रह गयी। गौरतलब है कि १९९० में लाहौर और फैसलाबाद जिले में सीरियल धमाके हुए थे जिनमें कुल मिलाकर १४ लोग अल्लाह को प्यारे हो गये थे। धमाकों की जांच के दौरान पाकिस्तान की पुलिस को पता चला था कि इन धमाकों के पीछे किसी मनजीत सिं‍ह नामक शख्स का हाथ है। इन धमाकों के तीन महीने बाद सरबजीत सिं‍ह शराब के नशे में रास्ता भटक कर पाकिस्तानी क्षेत्र में जा पहुंचा। पुलिस ने उसे मनजीत करार देकर हथकडिं‍यां पहना दीं। १९९१ में सरबजीत को फांसी की सजा सुना दी गयी। पाकिस्तान की सरकार चाहती तो सरबजीत पर रहम दिखा सकती थी पर उसके मन में भडकने वाली प्रतिशोध की आग कभी ठंडी नही हो पायी। उसकी हमेशा तमन्ना रही है कि उसके द्वारा भेजे जाने वाले अजमल कसाब जैसे आतंकी हत्यारे भारत के लोगों की जानें लेते रहें और हमारी सरकार चुपचाप बैठी रहे। कानून भी उन्हें माफ कर दे। पर ऐसा कैसे हो सकता है? पाकिस्तानी सरकार वहां के उग्रपंथियों के हाथों का खिलौना बन कर रह गयी है। हाल ही में जिन अपराधियों ने सरबजीत पर जानलेवा हमला कर उसकी जान ले ली, वे पहले भी उसे अपना शिकार बना चुके हैं। ऐसे में यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि सरबजीत को मौत के घाट उतारने की साजिश रची गयी। अगर वहां की सरकार की नीयत साफ होती तो सरबजीत को पूरी सुरक्षा दी जाती। पाकिस्तान के ही कुछ अखबारों में छपी खबरें हकीकत से रूबरू करा देती हैं। सरबजीत सिं‍ह लाहौर की जिस जेल में बंद था वहां पर बिना अधिकारियों की मिलीभगत के हमला हो पाना संभव ही नहीं था। सरबजीत पर कातिलाना हमला संसद पर हमले के दोषी आतंकवादी अफजल गुरु को नई दिल्ली के तिहाड जेल में दी गयी फांसी की प्रतिक्रिया है...।
दरअसल पाकिस्तान की मंशा तो सरबजीत को फांसी पर लटकाने की थी। अफजल की फांसी के विरोध में पाकिस्तान में भारत विरोधी प्रदर्शन भी हुए थे। यहां तक कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अफजल को श्रद्धांजलि भी दी थी। भारत की संसद पर हमला करने वाला आतंकी पाकिस्तानी जनता और वहां के राष्ट्रपति के लिए कितना प्रिय था उसका भी इससे पता चलता है। मुंबई आतंकी हमलों के दोषी आमिर अजमल कसाब को भी भारत में फांसी दिये जाने के बाद बिलकुल ऐसा ही माहौल बना और बनाया गया था। ऐसे में यह मान लेना गलत होगा कि सरबजीत पर किया गया जानलेवा हमला कोई सामान्य घटना थी।

Thursday, May 2, 2013

कहां से आते हैं बलात्कारी?

पांच साल की बच्ची को तो कुछ भी पता नहीं होता। वह तो सिर्फ अपने मां-बाप, भाई-बहनों और अपने करीबी रिश्तेदारों के ही करीब होती है। उन्हीं के दुलार-प्यार और ममता की छाया में खेलते-कूदते हुए धीरे-धीरे बढी होना शुरू करती है। उसे तो इस बात की कल्पना भी नहीं होती कि उसके इर्द-गिर्द हैवान और शैतान भी बसते हैं। शैतानों को ऐसी मासूम बच्चियों के साथ दुराचार करते समय अपने घर-परिवार की बेटियां याद क्यों नहीं आतीं? हवस की आग में वे यह क्यों भूल जाते हैं कि वे जानवर की नहीं, इंसान की औलाद हैं? वैसे ऐसे दरिंदो की तुलना जानवरों से करना भी बेमानी है क्योंकि जानवर भी ऐसी नीच हरकतें नहीं करते। दिल्ली में पांच वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाले मनोज और प्रदीप ने ब्लू फिल्म देखने के बाद बडी आसानी से क्रुर कर्म को अंजाम दे डाला। मनोज को तो अपने गांव के घर में बेफिक्री की नींद भी आ गयी थी।
बलात्कार पीडि‍ता बच्ची के पिता की नींद उड चुकी है। उन्हें बदनामी का डर सता रहा है। एक असहाय पिता का कहना है कि अब हम गांधीनगर का इलाका ही छोड देंगे। इतनी बदनामी के बाद वहां रहना मुश्किल है। गांधीनगर की वह गली, घर और उस दरिंदे का कमरा देखकर मन विचलित होने लगता है। असहनीय पीडा के पहाड के बोझ तले दबे पिता को अपनी बिटिया के ठीक होने का बेसब्री से इंतजार है। बेटी के स्वस्थ होने के बाद वह इस इलाके की परछायी से भी दूर रहना चाहता है। कामुक दरिंदों ने उसकी बेटी को ऐसा दर्द दिया है जिसे वह शायद ही कभी भूल पाए। पिता को इस बात की भी चिं‍ता है कि कहीं लोग उसकी बेटी का जीना हराम न कर दें। स्कूल में पढाई-लिखायी के दौरान ताने मारे जाने का भय भी पिता को डराता है। पिता को यह चिं‍ता भी खाये जा रही है कि अगर बेटी इस हादसे को नहीं भूल पायी और उसके दिलो-दिमाग पर बलात्कारी दरिंदे की हैवानियत हावी रही तो वह अपनी उम्र कैसे काट पायेगी? दूसरी तरफ बलात्कारी मनोज अपने किये पर कतई शर्मिंदा नहीं है। उसे जब तिहाड जेल में लाया गया तो उसके चेहरे पर शातिराना मुस्कान थी। मनोज के प्रति कैदियों में जबरदस्त गुस्सा है। कुछ कैदियों ने उसकी पिटायी भी कर दी। गुस्साये कैदी तो इस हैवान को ऐसा सबक सिखाना चाहते हैं कि जिसे वह आखिरी सांस तक भूला न पाए। दिल्ली तो बलात्कारों की कालिख से सतत दागदार होती चली आ रही है, अब तो छोटे-छोटे शहर भी बच्चियों के साथ होने वाले बलात्कार के कहर की मार झेलने को विवश होने लगे हैं।
मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के घनसौर थाना क्षेत्र में एक वहशी ने चार साल की मासूम बच्ची पर बलात्कार कर उसे मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया। बच्ची नागपुर के एक अस्पताल में मौत से जंग लड रही है। अबोध बच्चियों के साथ हो रहे दुराचारों ने आम और खास लोगों में आक्रोश भर दिया है। फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन को कभी आपा खोते नहीं देखा गया। पर ऐसे बलात्कारों ने उन्हें भी स्तब्ध कर दिया है। उनका कहना है कि ऐसे व्याभिचारियों को जनता के बीच छोड देना चाहिए। वही इनके साथ सही न्याय करेगी। महानायक ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि ऐसी घटनाओं से मैं स्तब्ध हूं। मेरी आवाज नहीं निकल रही है। यह दरिंदे जानवर कहलाने के लायक भी नहीं हैं। जानवरों के भी कुछ नियम-कायदे होते हैं। आखिर क्या हो गया है हमारे समाज और समुदाय को? हम कैसे और क्यों इन नृशंस और वीभत्स कृत्यों के सामने असहाय हैं? कौन हैं ये लोग और कहां से आते हैं? किस मां ने इन्हें जन्म दिया है और ये कैसे पले बढे हैं? किस वातावरण में रहे हैं यह?
देश के लोग बलात्कारियों के प्रति किस कदर गुस्से में उबल रहे हैं इसका ज्वलंत उदाहरण बीते सप्ताह राजस्थान के भीलवाडा शहर में देखने में आया। एक युवती बाडे में गाय का दूध निकालने के लिए गयी थी। उसे अकेली देख दो जाटों ने उसे दबोच लिया और दुष्कर्म कर भाग खडे हुए। लोगों को जैसे ही इसकी खबर लगी तो वे आग-बबूला हो उठे। एक बलात्कारी किसी तरह से पीडि‍ता के पिता और भाई के हाथ लग गया। उन्होंने उसे पीट-पीटकर मार डाला और कान और नाक भी काट डाले।
दिल्ली में पांच वर्षीय बालिका को अपनी हैवानियत का शिकार बनाने वाले मुख्य आरोपी मनोज के वृद्ध दादा-दादी भी अपने इस व्याभिचारी पोते को फांसी पर लटकते देखना चाहते हैं। मनोज की गिरफ्तारी के बाद उसके गांव के लोगों में भी आक्रोश है। आसपास के गांव वाले तो बलात्कारी के रिश्तेदारों को भी कोस रहे हैं। गांव के मुखिया की अध्यक्षता में बैठक कर मनोज और उसके घरवालों का हुक्का-पानी बंद करने का निर्णय भी ले लिया गया है।
यकीनन बच्चियों के साथ लगातार हो रही दरिंदगी ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। देशवासी भी शर्मसार हैं। देश की राजधानी में चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य घटना के बाद जिस तरह से लोग सडकों पर उतरे थे और सत्ताधीशों ने आश्वासन दिये थे उससे स्थिति में सुधार होने की उम्मीद जागी थी। पर दुराचारियों को तो 'कडा कानून' भी डरा नहीं पाया। तभी तो पिछले चार माह में दिल्ली में ही बलात्कार के ४०० मामले सामने आये हैं। बच्चियों पर होने वाले बलात्कारों में राजधानी जिस तरह से अव्वल नंबर पर है उससे तो यही लगता है कि लोगों के दिलो-दिमाग से पुलिस और कानून का भय नदारद हो चुका है। जो पुलिस बलात्कार के मामले दर्ज करने में आनाकानी करती हो और बलात्कार पीडि‍ता के परिवार को दो हजार रुपये की रिश्वत देकर हमेशा-हमेशा के लिए मुंह बंद कर लेने की हिदायत देती हो उससे कानून के पालन की उम्मीद भी कैसे की जा सकती है?

Monday, April 29, 2013

डोलता ईमान और धराशायी होती इमारतें

मायानगरी मुंबई से सटे शहर ठाणे में एक निर्माणाधीन अवैध बहुमंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गयी और मलबे के नीचे दब और कुचल कर ७० से अधिक लोग मौत के मुंह में समा गये। यह मौतें इंसानी लालच, लापरवाही और अंतहीन भ्रष्टाचार की देन हैं। अगर इन्हें हत्या की संज्ञा दी जाए तो भी गलत नहीं होगा। यह हत्याएं उन भू-माफियाओं, अधिकारियों और नेताओं के शर्मनाक गठजोड का नतीजा हैं जिनके लिए धन-दौलत के अलावा और कोई चीज मायने नहीं रखती। इंसान तो इनके लिए महज कीडे-मकौडे हैं जिन्हें मिटाना और मसलना इनकी आदत में शुमार हो गया है। क्या यह हैरत की बात नही है कि शहर के बीचों-बीच देखते ही देखते एक बहुमंजिला इमारत का अवैध निर्माण हो जाता है और उन्हें बनाने वालों को कोई रोकता-टोकता नहीं! यह भी बताया जा रहा है कि यह इमारत दलदली जमीन पर बनायी गयी थी, जहां ऐसा गगनचुंबी निर्माण किया ही नहीं जा सकता। यानी जो नहीं हो सकता उसे भी बेखौफ होकर अंजाम दे दिया गया और कई निर्दोषों की जान ले ली गयी! आखिर हम कैसी व्यवस्था में रह रहे हैं जहां शासन और प्रशासन अपने आंख और कान बंद किये रहता है और जब कोई बडी दुर्घटना घटती है तो एकाएक जागने का नाटक शुरू हो जाता है! हां ठाणे में भ्रष्टों के आशीर्वाद से ऐसा ही हुआ। पहले तो बिल्डिंग तन गयी। जब अचानक धराशायी हो गयी तो बिल्डरों को दुत्कारने और लताडने की नौटंकी चल पडी। उनकी पकडा-धकडी भी हुई। पर जिनकी जानें चली गयीं उनका क्या? सरकार हमेशा यही मानकर चलती है कि मरने वालों के परिवारों को मुआवजा दे देने से उसके कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है। उसे यह चिं‍ता कभी नहीं सताती कि कहीं न कहीं यह उसी की घोर लापरवाही और भूल का ही दुष्परिणाम हैं। हमारा तो यही मानना है कि उन राजनेताओं को शासन चलाने का कोई हक नहीं है जो प्रशासन नाम के घोडे की नकेल को ही न कस पाएं। इस देश की भ्रष्ट नौकरशाही की जेब में नोट ठूंस कर कोई भी अवैध काम करवाया जा सकता है। भू-माफियाओं और बिल्डरों ने अफसरों को अपनी जेब में रखने के सभी तौर-तरीके सीख लिये हैं। चांदी के चंद सिक्कों में बिकने के बाद महानगर पालिका और नगर निगम के अधिकारी बिल्डरों के इशारों पर नाचने लगते हैं। ठाणे के भीड-भाड वाले इलाके में गैर कानूनी इमारत बन जाती है और जब ध्वस्त होकर लोगों की जान ले लेती है तो ठाणे नगर निगम के अधिकारियों की यह सफाई आती है कि जिस इलाके में इमारत बन रही थी वह वन विभाग के अंतर्गत आता है। ऐसे में वे इस अवैध निर्माण पर चाहकर भी कार्रवाई नहीं कर सकते थे। यह तो बडे कमाल का जवाब है! गौरतलब है कि न तो इस बिल्डिंग का नक्शा बनाया गया था और न ही किसी जानकार इंजिनियर की देखरेख में इस कातिल इमारत का निर्माण किया जा रहा था। इमारत को बनाने में भी घटिया से घटिया सामग्री का इस्तेमाल हो रहा था। यह कोई नयी बात नहीं है। ऐसा हर जगह हो रहा है। मुंबई और दिल्ली जैसे तमाम महानगरों में भी घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर धडाधड बहुमंजिला इमारतें तानी जा रही हैं। जनसंख्या बढती चली जा रही है और जमीनें कम पडने लगी हैं। इसलिए गगनचुंबी इमारतें खडी करना भी जरूरी हो गया है। पर इन आकाश को छूती इमारतों को बनाने वाले अधिकांश लोगों की नीयत साफ नहीं है। वे तो रातोंरात करोडपति-अरबपति बन जाना चाहते हैं। इस चक्कर में गुणवत्ता को नजर अंदाज कर धडाधड इमारतें खडी की जा रही हैं। ऐसे बिल्डरों की भी भरमार है जो विज्ञापनों में तो बडे-बडे दावे करते हैं पर असल में लोगों को टोपी पहनाना ही उनका एकमात्र मकसद है। दिखाते कुछ हैं और थमाते कुछ हैं। मद्रास आईआईटी के प्रोफेसर ए.आर. सांथा कुमार का कहना है कि जो बिल्डिंग जल्दबाजी और घटिया सामग्री का इस्तेमाल कर बनायी जाती है उसका बुरा हाल होना तय है। गुजरात में कुछ समय पहले एक उपभोक्ता संगठन ने सरकारी और निजी एजेंसियो द्वारा निर्माणाधीन १८ हाउसिं‍ग प्रोजेक्ट के ४५०० यूनिट का सर्वे कराया था। इन इमारतों के निर्माण में दोयम दर्जे की निर्माण वस्तुओं का बेखौफ होकर उपयोग करने के साथ-साथ किसी भी तरह के तकनीकी सुपरविजन की जरूरत ही नहीं समझी गयी। इस कर्मकांड में जिन्हें माल कमाना था, वे अपना काम कर चलते बने। असली कष्ट तो उन लोगों को उठाना पडा जो यहां रहते हैं। इमारतों की छतों में सीलन की भरमार है। दीवारों में प्लास्टर झडते रहते हैं। बिजली के तार बेतरतीब ढंग से उलझ जाते हैं और नलो में लगातार पानी रिसता रहता है। खिडकियां ऐसे टूट-फूट गयी हैं जैसे वर्षों पुरानी इमारत हो। देश में जहां-तहां घरों की बेहद तंगी है। लोगों को येन-केन-प्रकारेण अपना घर पाने की जल्दी रहती है। इसी चक्कर में कीमत भी अंधाधुंध चुकानी पडती है और सुरक्षित और मजबूत फ्लैट या घर भी नहीं मिल पाते। पिछले कुछ वर्षों से भू-माफियाओं और बिल्डरों की खूब चांदी कट रही है। इनके घरों में जमकर धन की बरसात हो रही है। यह लोग किस तेजी से अपना आर्थिक साम्राज्य खडा करते हैं इसे जानने के लिए बीते सप्ताह अपने ही कुपूत के हाथों मौत की नींद सुला दिये गये बसपा नेता और बिल्डर दीपक भारद्वाज से बेहतर और कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दीपक भारद्वाज कभी बाबूगिरी करता था। डेढ-दो हजार की पगार के भरोसे अपने जीवन की गाडी खींचने को मजबूर था। दिल्ली और हरियाणा में जब प्रापर्टी के भाव एकाएक बढने लगे तो दीपक ने इस क्षेत्र में किस्मत आजमाने की सोची। वह विवादित जमीनें खरीदने लगा और आडे-तिरछे सौदे करने लगा। देखते ही देखते उसके दिन बदल गये। कुछ ही वर्षों में वह करोडों रुपये का आसामी बन गया। दिल्ली में उसने नेतागिरी शुरू कर दी और उसने बसपा की टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लडा। उस समय उसके पास ६०० करोड से अधिक की धन-दौलत थी। यानी वह सबसे अमीर प्रत्याशी था। पर चुनाव में मात खा गया। उसे असली मात तो तब मिली जब उसके ही बेटे ने उसकी सुपारी देकर उसका काम तमाम करवा दिया। यह उदाहरण देने के पीछे हमारा यह मकसद कतई नहीं है कि सभी बिल्डरों का ऐसा ही अंत होता है। हम तो सिर्फ यही बताना चाहते हैं भवन निर्माण और प्रापर्टी के क्षेत्र में जबरन घुसपैठ कर चुके बेइमानों के छल-कपट से देश के लाखों लोग आहत हैं। इस धंधे की अंधी कमायी के चलते कई लोगों का ईमान डोलने में देरी नहीं लगती। ऐसी कमायी करने वालों का आम आदमी की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं होता। इसीलिए इमारते बनने के साथ-साथ ढहनी भी शुरू हो जाती हैं और मरते है वो आम लोग जो फरेब और धोखे के शिकार होते हैं।

Thursday, April 11, 2013

मदहोश मंत्री के विषैले बोलवचन

''वह कौन देशमुख ५५ दिनों से आजाद मैदान पर आमरण अनशन पर बैठा है! ...कहता है बांध से पानी छोडा जाए। अरे भाई जब बांध में पानी ही नहीं है तो छोडा कहां से जाए? क्या मूत कर बांध को लबालब कर दूं?''
यह शब्द किसी शराबी, गुंडे मवाली के नहीं, प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और राज्य के सिं‍चाई मंत्री के हैं। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त किसानों की बदहाली का मजाक उडाने वाले इस नेता का नाम है अजीत पवार। अजीत पवार की असली पहचान यही है कि वे उस शरद पवार के लाडले भतीजे हैं जो मर्द मराठा कहलाते हैं। जिन्होंने चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद का सुख भोगा है। देश के रक्षामंत्री भी रह चुके हैं। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री हैं। कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने रहस्योद्घाटन किया था कि भारतवासी ज्यादा खाते हैं इसलिए देश को अनाज की कमी झेलनी पडती है। कहावत है कि 'खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलता है।' फिर अजीत तो शरद पवार के भतीजे हैं।
बीते सप्ताह मंत्री महोदय पुणे की इंद्रापुर तहसील में एक रैली को संबोधित कर रहे थे। वैसे भी अपने इलाके में पैर रखते ही नेताओं पर उत्तेजना और जोश हावी हो जाता है और सीना भी चौडा हो जाता है। अजीत तो जन्मजात जोशीले हैं। गुस्सा तो उनकी रग-रग में भरा है। गुस्से और जोश में वे अक्सर होश खो देते हैं। जब उन्होंने अनशनरत किसान की खिल्ली उडाते हुए मूतने...मातने की बातें कीं तो कई श्रोताओं ने खूब तालियां पीटीं। तालियों के शोर के साथ-साथ मंत्रीजी भी नैतिकता और मर्यादा को ताक पर रखते चले गये। शालीनता को तो उन्होंने थूक कर फेंक दिया। पानी तो पानी, बिजली की कमी और कटौती पर भी उन्होंने कटाक्ष भरी भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि बिजली नहीं होती तो रात में उस काम (मौजमस्ती और बिस्तरबाजी) के अलावा और काम नहीं बचता। जिस तरह से धडाधड आबादी बढ रही है उसे देखकर तो यही लगता है...।
सत्ताधीशों की नाइंसाफी और प्रकृति की मार झेलते लाचार किसानों की खिल्ली उडाने वाले इस मदहोश और मगरूर मंत्री के अमर्यादित भाषण को सुनकर उनके चम्मचों ने भले ही जमकर तालियां बजायीं पर बेचारे किसान खुद को ठगा-सा महसूस करते रह गए। उन्हें अपने नसीब पर रोना आ गया। पछतावा भी हुआ कि उन्होंने कितने गैर जिम्मेदार इंसान को अपना कीमती वोट देने की भूल कर दी!
सत्ता के मद में चूर अजीत पवार को यह भी याद नहीं रहा कि किसानों की फरियाद सुनना उनका फर्ज है। जनता की समस्याओं के निवारण के लिए ही उन्हें इतने बडे पद पर सुशोभित किया गया है। सूखे की मार झेल रहे किसान को तसल्ली देने की बजाय उन्होंने जिस बेहयायी के साथ यह कहा कि बांधों में पानी नहीं है तो क्या पेशाब करें? उससे देश के बुद्धिजीवी स्तब्ध रह गये। कई लोग इस चिं‍ता में पड गये कि अगर ऐसा अविवेकी और दंभी शख्स राकां सुप्रीमो शरद पवार की विरासत संभालेगा तो पार्टी का क्या होगा! अजीत पवार के बोलवचनों की गूंज दूर-दूर तक गयी है। अभी तक तो चाचाश्री भतीजे को बचाते आये हैं पर इस बार भतीजे के बाण से छूटे विषैले तीर ने प्रदेश ही नहीं देश के करोडो किसानों को वो जख्म दिये हैं जिनका भर पाना बहुत मुश्किल है।
क्या शासकों को ऐसी अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए? क्या उन्हें सिं‍चाई मंत्री इसलिए बनाया गया है कि वे पानी और बिजली की मांग करने वाले निरीह किसानों के जख्मों पर नमक छिडकें? उन पर अश्लील शब्दों की बौछार करें? क्या प्रदेश की प्यासी जनता को मंत्री महोदय पेशाब पिलाना चाहते हैं? अजीत पवार में अगर थोडी भी इंसानियत होती तो वे अपना दायित्व निभाते हुए तुरंत उस किसान तक जा पहुंचते और उसके पैर पकड कर माफी मांगते। पर आत्ममुग्ध और अहंकारी अजीत पवार ने बेबस किसान का अपमान कर स्पष्ट कर दिया है कि वे किस मिट्टी के बने हैं। आम आदमी के प्रति उनमें कोई सम्मान नहीं है। किसानों को दुत्कारना और फटकारना उनकी फितरत है। विचारशीलता और मानवीय संवेदनाओं से उनका कोई सरोकार नहीं है। महाराष्ट्र के भोले-भाले किसानों ने सत्ता के नशे में मदहोश नेता तो कई देखे होंगे पर ऐसा बेशर्म और मुंहफट मंत्री नहीं देखा होगा। अजीत पवार ने तो कोई भी कसर बाकी नहीं रखी। अजीत पवार के अभद्र और अशोभनीय व्यवहार से महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के लोग क्षुब्ध, आहत और आक्रोशित हैं। डॉ. कुमार विश्वास ने अपने अंदाज में शब्दबाण छोडे हैं और कहा है कि अजीत पवार साहब आप बहुत बडे आदमी हैं। आप मूतने का कष्ट क्यों करते हैं, चुनाव आने दिजिए आपके नाम पर हम सब मूत देंगे। यानी मतदाता फैसला कर ही देंगे। किसी के कपडे फाड देने के बाद माफी मांगने का नाटक कोई मायने नहीं रखता। देश के चर्चित व्यंग्यकार, कवि, उपन्यासकार गिरीश पंकज की कविता की यह पंक्तियां भी बता रही हैं कि बुद्धिजीवियों के साथ-साथ मुल्क के आम लोग कितने आक्रोश में हैं:
''अंट-शंट इतना ज्यादा मत बोल जमूरे
घटियापन अपने तू मत खोल जमूरे
तुम कुर्सी पर बैठे हो तो खुदा नहीं हो
भ्रम में इतना इधर-उधर मत डोल जमूरे
अब तो तय है तुमको 'जाना' ही होगा
विष तुमने ही दिया आज यूं घोल जमूरे
लाख छिपाओ कभी नहीं छिप सकती
खुल ही जाती है अक्सर पोल जमूरे...।''

Thursday, April 4, 2013

लोकतंत्र के असली दुश्मनों को पहचानो

''कुछ राजनीतिक घरानों ने लोकतंत्र को अपने कब्जे में ले रखा है। नब्बे फीसदी भारतीय जाति और धर्म के नाम पर भेड-बकरियों की तरह झुंड बनाकर मतदान करते हैं। इसी कारण कई अपराधी संसद तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में मैं अपना वोट जाया नहीं करना चाहता। इसलिए मतदान भी नहीं करूंगा।'' यह शब्द हैं इसी देश के सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश के, जिनका नाम है मार्कंडेय काटजू। काटजू साहब वर्तमान में भारतीय प्रेस परिषद के सम्मानित अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने जो कुछ भी कहा है उसे पूरा सच नही माना जा सकता। यह कौन नहीं जानता कि इस देश की राजनीति में धनपतियों और दबंगों का बोलबाला है। यह भी सच है कि कुछ राजनीतिक घरानों ने देश की सत्ता और लोकतंत्र पर अपना कब्जा जमा रखा है। साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर वोट हथियाये जाते हैं। जाति और धर्म का खेल भी खुलकर खेला जाता है। काफी हद तक राजनीति का अपराधीकरण भी हो चुका है। कई बार तो अपराधी और राजनेता में फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता है। पर यह कहना सरासर अनुचित है कि देश के नब्बे प्रतिशत मतदाता धर्म और जाति के नाम पर भेड-बकरियों की तरह झुंड बनाकर मतदान करते हैं। यह अतिरंजित आंकडा उन देशवासियों का सरासर अपमान है जो देश में बदलाव चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ भी करने और मर-मिटने को तैयार हैं। काटजू का यह कहना कि मैं वोट नहीं डालूंगा... यही दर्शाता है कि वे मान चुके हैं कि देश के हालात जस के तस रहने वाले हैं। मुल्क के मतदाता इतने बेवकूफ हैं कि उन्हें बदल पाना रेत में से तेल निकालने की कहावत को चरितार्थ करने की कसरत से ज्यादा और कुछ नहीं है।
वैसे भी अपने देश के अधिकांश रईस, उद्योगपति, अफसर और अपराधी प्रवृत्ति के लोग वोट डालने से कतराते हैं। जिस दिन वोट डाले जाते हैं उस दिन वे छुट्टी मनाने के जुगाड में लग जाते हैं। कुछ तो सैर-सपाटे पर निकल जाते हैं तो कई विभिन्न मनोरंजन स्थलों और मदिरालयों की शोभा बढाते हैं। यही वजह है कि हिं‍दुस्तान में कभी पचास तो कभी साठ प्रतिशत तक ही वोटिं‍ग हो पाती है। ऐसे लोगों को भी लोकतंत्र का हिमायती नहीं कहा जा सकता।
काटजू जैसे विद्वानों के बोलवचन अक्सर मुझे परेशान करते हैं। यह इतने घोर निराशावादी क्यों हैं? इन्हें अपने देशवासियों पर भरोसा क्यों नहीं है? इन्होंने यह बात क्यों गांठ बांध ली है कि देश की नब्बे प्रतिशत जनता लकीर की फकीर है और उसने बदहाल हालात के समक्ष घुटने टेक दिये हैं। अब उसका तनकर खडा हो पाना नामुमकिन है! इन्हें देश की फिज़ाओं में गूंजने वाले क्रांति-गीत क्यों नहीं सुनायी देते? क्या इन्हें खबर नही है कि आम आदमी ने महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शोषण और अत्याचार के असली जन्मदाताओं की शिनाख्त भी कर ली है? वह आर-पार की लडाई लडने के लिए अपनी कमर भी कस चुका है। उसे मालूम है कि यही फैसले की असली घडी है। इस बार भी चूक गये तो आने वाली पीढि‍यां उसे कोसते नहीं थकेंगी।
आज देश के आमजन को सच्चे नेतृत्व की तलाश है। तभी तो वह अन्ना हजारे और अरविं‍द केजरीवाल के आंदोलन के साथ जुडने में देरी नही लगाता। अपना घर-बार छोडकर फौरन दिल्ली पहुंच जाता है। दिल्ली उसे दुत्कारती है, फटकारती है, फिर भी वह हिम्मत नहीं हारता।
ऐसे बदलते हालात में तो देशवासियों का मनोबल बढाने की जरूरत है। काटजू को तो लोकतंत्र के दुश्मनों की जडें उखाड फेंकने की अपील करनी चाहिए थी। उन्हें उन मतदाताओं को सचेत करना चाहिए था जो अपने वोट का इस्तेमाल नहीं करते। उन्हें उन वोटरों को भी लताडना चाहिए था जो नोट, दारू, कंबल, साडी जैसे उपहारों की ऐवज में अपना कीमती वोट बेच देते हैं। उन्हें तो लोगों को यह भी बताना चाहिए था कि जाति-धर्म के नाम पर होने वाले मतदान ने देश का कितना अहित किया है। पर वे तो वोट ही न डालने की वकालत पर उतर आये! पूर्व जज काटजू इस तथ्य से भी अंजान लगते हैं कि आज देश का युवा वर्ग जाग चुका हैं। उसे जगह-जगह फैला भाई भतीजावाद शूल की तरह चुभता है। सत्ताधीशों की हेराफेरी, लूटमार और राष्ट्रीय संपदा की बंदरबांट के समाचार उसे हिलाकर रख देते हैं। देश की किसी भी मां, बेटी, बहन की अस्मत लुटती है तो उसका खून खौल जाता है।
आज जब हिं‍दुस्तान के लोकतंत्र को चौराहे पर लाकर खडा कर दिया गया है और विकास और बदलाव के मार्ग अवरुद्ध कर दिये गये हैं तब देशवासियों को अफीम खिलाकर सुलाने की नही, चेतना के गीत सुनाकर जगाने की जरूरत है। देश के कुछ सच्चे बुद्धिजीवी, समाज सेवक, नेता, लेखक, पत्रकार और कवि इस दायित्व को बखूबी निभा रहे हैं। किसी देशभक्त कवि की कविता की ये पंक्तियां काबिलेगौर हैं:
''अभी समय है सुधार कर लो
ये आनाकानी नहीं चलेगी,
सही की नकली मुहर लगाकर
गलत कहानी नही चलेगी।
घमंडी वक्तों के बादशाहो,
बदलते वक्त की नब्ज देखो
महज तुम्हारे इशारों पे अब,
हवा सुहानी नही चलेगी।
किसी की धरती, किसी की खेती,
किसी की मेहनत, फसल किसी की
जो बाबा आदम से चल रही थी,
वो बेईमानी नहीं चलेगी।
समय की जलती शिला के ऊपर,
उभर रही है नयी इबारत
सितम की छाँहों में सिर झुकाकर,
कभी जवानी नही चलेगी!''