Friday, January 17, 2014

मीडिया किसी का गुलाम नहीं

यह कोई नयी बात नहीं है। मीडिया को निशाने पर लेना बडा पुराना चलन है। ऐसे राजनेता कम हैं जो सच का सामना करने का दम रखते हों। अपने खिलाफ चलने वाली हर खबर में इन्हें कोई गहरी साजिश नजर आने लगती है। अपनी उग्र प्रतिक्रिया दर्शाने के लिए यह फौरन सीना तानकर ख‹डे हो जाते हैं। अखिलेश यादव से लोगों को कितनी उम्मीदें थीं। उनको उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए प्रदेश की जनता ने वोटो के अंबार लगा दिये। युवा अखिलेश के वादे ही कुछ ऐसे थे। हर किसी ने फौरन भरोसा कर लिया। पर धीरे-धीरे जो परिणाम सामने आये उनसे मतदाताओं को फिर से एक बार बुरी तरह से ठगे जाने का यकीन हो गया है। उत्तरप्रदेश 'दंगा प्रदेश' बन कर रह गया है। समाजवादी नेताओं और खाकी वर्दी धारियों की गुंडागर्दी ने जनता का जीना हराम कर दिया है। अखिलेश उस कठपुतली की तरह इधर-उधर डोलते नजर आ रहे हैं, जिसकी डोर किन्हीं अदृष्य हाथों में है। मुजफ्फर नगर में हुए दंगों ने उनके 'अपंग' होने के पूरे सबूत पेश कर दिये। उनके पिता मुलायम सिंह यादव दंगा पीडितों को 'अराजक तत्वों का जमावडा' कहने से भी बाज नहीं आए। भरी ठंड में उनके तंबुओं को ही उखडवा दिया गया। सत्ता लोलुप मुलायम सिंह का निष्ठुर और निर्लज्ज होना तो समझ में आता है, लेकिन उनके सुपुत्र अखिलेश सिंह यादव की निर्ममता, नीचता और नालायकी की पठकथा समझ से बाहर है। उन्होंने क्या सोचकर 'सैफई महोत्सव' में करोडों रुपये फूंके? इसी दरम्यान उन्होंने अपने कुछ विधायकों और मंत्रियों के काफिले को तथाकथित अध्यन्न यात्रा के लिए विदेश भी भेज दिया! यह जनप्रतिनिधि हद दर्जे के घटिया इंसान निकले। इन्हें प्रदेश की जनता की बदहाली का ज़रा भी ख्याल नहीं आया। मुजफ्फर नगर के कैंपों में कडकडाती ठंड में अपनी रातें गुजारते बदनसीबों को मंत्री आजमखां ने ऐसे नजअंदाज कर दिया जैसे कि वे कीडे मकोडे हों। ऐसे ही मर-खप कर दुनिया से रुखसत हो जाना उनकी नियति हो। जो मंत्री और विधायक इंसानी पीडा को नहीं समझ सकते उन्हें तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। अखिलेश कहते हैं विधायकों और मंत्रियों का विदेशों में अध्यन्न करने के लिए जाना कोई गलत काम नहीं है। इस नकारे मुख्यमंत्री को कौन समझाये कि यह पढायी नहीं अय्याशी है, हद दर्जे की लंपटता और नालायकी है। अध्यन्न के नाम पर किये जाने वाले सैर-सपाटों में तो शालीनता होती है। फिर ऐसे सैर सपाटे तो तभी शोभा देते हैं जब प्रदेश में अमन और चैन का वातावरण हो। यहां तो समूचा प्रदेश ही जैसे सुलग रहा है। लोगों में गुस्सा भरा है। आजमखां सहित प्रदेश के १७ मंत्रियों को विदेशी मजे लूटने की खुली छूट और सैफई महोत्सव में सलमान खान, माधुरी दीक्षित आदि-आदि फिल्मी सितारों के ठुमकों में करोडों रुपये लूटाने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जब मीडिया ने आईना दिखाया तो वे ऐसे ताव में आ गये जैसे उन्हें भरे चौराहे नंगा कर दिया गया हो। उनकी दादागिरी तो देखिये। उन्होंने उन अखबारों और न्यूज चैनलों पर धडाधड प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी जो हकीकत बयां कर रहे थे। क्या शासक ऐसे होते हैं? यह तो हिटलरशाही है। मीडिया को अपने इशारों पर नचाने की मंशा पालने वाले सत्ताधीशों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि सजग मीडिया अपनी पर आ गया तो उनके मायावी सपनों को चकनाचूर होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। मीडिया किसी का गुलाम नहीं हो सकता।
भारतीय जनता पार्टी के भावी पीएम सहित बहुतों की यह शिकायत है कि आम आदमी पार्टी मीडिया की देन है। अन्य पार्टियों के भी कुछ नेता हैं जिन्हें मीडिया किसी षडयंत्रकारी की भूमिका में दिखायी दे रहा है। बेचारे घबराये हुए हैं कि मीडिया का बहुत बडा हिस्सा उन्हें सत्ता से वंचित करने और आम आदमी पार्टी को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने की भरपूर कोशिशों में जुटा है। इन्हीं नेताओं की बिरादरी में कई ऐसे नेता हैं जो मीडिया पर बिकाऊ होने का आरोप भी लगाते रहे हैं। प्रिंट मीडिया को तो यह ऐसे धमकियां देते हैं जैसे वह इनकी खैरात पर चल रहा हो। इन्हें लगभग सभी अखबार वाले धन के लालची लगते हैं। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों की कमी नहीं है। जो मीडिया संस्थान पूंजीपतियों के कब्जे में हैं उन्हीं की घोर व्यवसायिक प्रवृत्ति के कारण ही भ्रष्टों और बददिमागों को तमाम मीडिया पर उंगली उठाने का अवसर मिलता है। ठग और लुटेरे पूंजीपतियों की जमात ने मीडिया को बाजार के चौराहे पर खडा कर दिया है। लेकिन पाठकों का एक ऐसा विशाल वर्ग है जो अच्छे और बुरे के बीच फर्क करना जानता है। इसलिए अच्छों और सचों पर कभी कोई आंच नहीं आ सकती। देश के सजग मीडिया को जब लगा कि भ्रष्टाचारियों की जमात को अरविंद केजरीवाल जैसे ईमानदार चेहरे ही मात दे सकते हैं तो उसने उसका साथ देने में जरा भी देरी नहीं लगायी। मीडिया का तो काम ही है लोगों को जगाना और होश में लाना। 'आप' का साथ देकर उसने कोई गुनाह नहीं किया। उसने तो पत्रकारिता के धर्म का पालन ही किया है। सच तो यह है कि देश की आम जनता मीडिया की शुक्रगुजार है। नाराज तो वो नेता हैं जिनकी दुकानों पर अब ताले लगने की नौबत आ गयी है। याद किजिए वो दिन जब उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनावों का मौसम था। मायावती के प्रति जनता में जबरदस्त आक्रोश था। ऐसे में जब युवा अखिलेश यादव चुनावी दंगल में उतरे थे तो प्रदेश की जनता उनके साथ हो ली थी। इसके पीछे मीडिया का भी अच्छा-खासा रोल था। देशभर के अखबारों और न्यूज चैनलों में अखिलेश रातों-रात छाते चले गये थे। सभी को उम्मीद थी कि यह युवक कुछ 'खास' करके दिखायेगा और जनता को राहत दिलायेगा। बरबादी के कगार पर पहुंच चुके प्रदेश को खुशहाली नसीब होगी। यह भी काबिलेगौर है कि यदि मुलायम सिंह यादव मायावती के खिलाफ मैदान में उतरते तो प्रदेश की जनता उन्हें नकार देती। उनके पुत्र अखिलेश के वादों पर जनता ने आंख मूंदकर भरोसा किया। पर इस युवक ने तो मायावती के शासन काल की दरिंदगियों को भी मात दे दी। अखिलेश के शासन में समाजवादी गुंडे कुछ भी कर गुजरने को आजाद हैं। महिलाएं पुलिसवालों के हाथो पिट रही हैं। अपराधी कानून को अपने हाथ में लेने से नहीं घबराते। दलितों, शोषितों और अल्पसंख्यकों का जीना मुहाल हो गया है। अखिलेश ने जिस तरह से जनता के भरोसे को तोडा है उससे तो अब तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। वे ईमानदार युवक जो राजनीति में वास्तव में कुछ करके दिखाना चाहते हैं उन्हें भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा है। दरअसल अखिलेश ने तो युवकों की साख को बट्टा लगा दिया है। कथनी और करनी में घोर अंतर रखने वाले ऐसे नेताओं का जब मीडिया पर्दाफाश करता है तो उनके तन-बदन में आग लग जाती है। वे खुद को बदलने और सुधारने की बजाय मीडिया को कटघरे में खडा करने लगते हैं। उन्हें किसी नये नेता और नयी पार्टी का बनना और उभरना तो कतई नहीं सुहाता। मीडिया पर आखें तरेरने वाले कितना भी जोर लगा लें पर मीडिया उनके इशारे पर नहीं नाचने वाला।

Friday, January 10, 2014

इस सच को भी तो जानो

सत्ता पाने के लिए क्या-क्या नहीं हो रहा। सत्ता पर बने रहने के लिए भी हर तरह के दांव-पेंच और नुस्खे आजमाए जा रहे हैं। न्यूज चैनलों पर यह खबर सपाटे के साथ चल रही है कि राहुल गांधी की छवि को चमकाने के लिए ५०० करोड रुपये दांव पर लगाए जा रहे हैं। इस शुभ काम के लिए दो विदेशी एजेंसियों को ठेका दिये जाने की खबर ने चौंका दिया। भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के नाम को मतदाताओं के दिलो-दिमाग तक पहुंचाने का ठेका भी किसी विदेशी कंपनी को बहुत पहले दे दिया गया था। सात समन्दर पार के विज्ञापन प्रबंधकों ने नरेंद्र मोदी को चमकाने के लिए जमीन-आसमान एक करने में देरी नहीं लगायी। जहां देखो वही नरेंद्र मोदी। देश के आधे से ज्यादा अखबार और न्यूज चैनल वाले भी मोदी की आरती गाने में ऐसे जुट गये जैसे वही इस मुल्क के इकलौते मसीहा हों जो डूबती नैय्या को पार लगा सकते हैं। आश्चर्य! यह मसीहा अपनी पार्टी भाजपा को दिल्ली की सत्ता नहीं दिला पाया। एक आम आदमी जिसने मुडे-तुडे कपडे पहन रखे थे और सिर को किसी पुराने मफलर और टोपी से ढंका हुआ था उसने तरह-तरह के नवीनतम वस्त्रों के शौकीन नरेंद्र मोदी को जबर्दस्त मात दे दी। आम आदमी के इर्द-गिर्द किसी भी तरह की कोई पुख्ता सुरक्षा का कोई घेरा नहीं था। वह जहां चाहता, वहीं चला जाता। उसके बोलने का अंदाज भी बडा सादा था। दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी का काफिला था। उनकी चुनावी सभाओं की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी कि परिन्दा भी आसपास न फटक सके। मोदी जहां जाते, वहीं रातों-रात उनके आदमकद पोस्टर लग जाते। आम आदमी तो खुद ही पोस्टर था। मोदी जब मंच पर भाषण देने आते तो ऐसा लगता किसी सल्तनत का राजा आम जनता से मुखातिब होने को आया है। उनके चेहरे की अजब-गजब मुस्कान और गर्व-दर्प देखते बनता था। जैसे कह रहे हों कि मैं ही सबकुछ हूं। बाकी सब तो चींटियां हैं। आम आदमी की तो कोई औकात ही नहीं है। वह तो भीड मात्र है। भीड का कोई वजूद और चरित्र नहीं होता। आश्चर्य! उनके भाषणों को तालियां भी खूब मिलीं। पर दिल्ली की जागरूक जनता ने मनचाहे वोट देने में भरपूर कंजूसी कर दी।
दरअसल, आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने भाजपा और कांग्रेस दोनों के पैरों के नीचे की जमीन खिसका दी है। दोनों पार्टियां बेहद घबरायी हुई हैं। उन्हें यह डर सता रहा है कि यह तीसरा खिलाडी निश्चय हि उनके खेल को बिगाड सकता है। अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी के आकस्मिक उभार की न तो राहुल गांधी ने कल्पना की थी और न ही नरेंद्र मोदी ने। दोनों पार्टियों के विभिन्न नेता अपने-अपने घमंड में चूर थे। अब जब होश ठिकाने आये हैं तो फिर से नयी चुनावी रणनीतियां बनायी जा रही हैं। एक तीसरे सीधे-सादे सहज इंसान ने इन्हें करोडों रुपये फूंकने पर विवश कर डाला है। वो आदमी बडे मजे से मजे ले रहा है। उसे किसी का कोई डर नहीं है। उसका कुछ भी नहीं खोनेवाला। उसे तो पाना ही पाना है। उसके कारवां की भीड बढती चली जा रही है। कल तक लग रहा था कि नरेंद्र मोदी के रथ को रोक पाना असंभव है और आज आम आदमी के प्रतीक अरविंद केजरीवाल के रथ के पहिये को जाम करने के लिए दिमाग खपाया जा रहा है। रंक ने राजा के होश ठिकाने लगा दिए। इस देश की जनता यही चाहती थी। यही तो चाहती है! भोली-भाली जनता को न नरेंद्र से कोई लेना-देना है और न ही राहुल से। उसे तो शिकायत है इनकी पार्टियों से जो बडे-बडे वादे तो करती रहीं पर कहीं भी खरी नहीं उतरीं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अगर नीयत साफ होती तो सदियों से दबे-कुचले, पिछडे और समाज के हाशिये पर पडे लोगों की सबसे पहले सुध लेती। सत्ता के मद में खोयी कांग्रेस ने तो इनकी तरफ देखा तक नहीं। महंगाई पर महंगाई बढाकर इन बदनसीबों को गरीबी रेखा से भी बहुत नीचे जीने को विवश कर दिया गया। न इन्हे कभी ढंग से दो जून की रोटी मिल पायी और न ही पीने के लिए पानी। शिक्षा, रोजगार, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं के लायक तो जैसे इन्हें समझा ही नहीं गया। शहरों और ग्रामों में इतना भेदभाव कि... जैसे शहरों और यहां के रईसों की बदौलत ही देश चल रहा हो। किसानों की आत्महत्याओं के असली कारणों की गहराई में जाने की कभी कोशिश ही नहीं की गयी। उन पर जुल्म ढाने वाले शोषकों और साहूकारों को भी खुले सांड की तरह छोड दिया गया। उद्योगपति बैंको के धन को डुबाते रहे फिर भी सम्मान पाते रहे। असमानता और अराजकता के इस पूरे खेल में मंत्रियों, अफसरों, नेताओं, सत्ता के दलालों ने जमीन, जंगल, पहाड और सरकारी खजाने लूट डाले। किसी भी राजनीतिक ठग और लूटेरे का बाल भी बांका नहीं हुआ। इन्हीं में से कई लोगों ने विधानसभा और लोकसभा में बडी आन-बान और शान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी। केंद्र और प्रदेश की सत्ता संभालने का अच्छा-खासा मौका भारतीय जनता पार्टी को भी मिला। छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश को छोडकर कहीं भी खुशहाली की फसल लहराती नजर नहीं आयी। नरेंद्र मोदी ने गुजरात का कितना विकास किया उसका पूरा सच लालकृष्ण आडवानी उजागर कर चुके हैं। भाजपा के पितामह अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को यूं ही राजधर्म निभाने की सीख नहीं दी थी। सच तो यही है कि यदि कांग्रेस और भाजपा की आम लोगों में बहुत अच्छी छवि होती तो 'आप' का उदय ही नहीं होता। न ही नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को भारत वर्ष में अपना नाम चमकाने के लिए प्रचार एजेंसियों का सहारा लेना पडता। जापान की जिन दो पब्लिक रिलेशन (पी.आर.) एजेंसियों को राहुल गांधी तथा कांग्रेस की धुंधलाती तस्वीर को संवारने और चमकाने का जिम्मा सौंपा गया है, वे अपने काम में लग गयी हैं। यह एजेंसियां प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया को अपने पाले में लेंगी और इस तरह की खबरें छपवायेंगी और चलवायेंगी जिससे देशवासियों को लगे कि राहुल गांधी और कांग्रेस के सिवाय और कोई इस देश को नहीं बचा सकता। अगर किसी और के हाथ में देश की सत्ता गयी तो बहुत बडा अनर्थ हो जायेगा। राहुल गांधी को देश का एकमात्र युवा नेता दर्शाया जायेगा। राहुल की विभिन्न रैलियों की तस्वीरें हर जगह नज़र आयेंगी। सोशल मीडिया पर भी राहुल ही राहुल छा जाएंगे। पर सवाल यह है कि क्या वाकई वे देशवासियों के दिलों में जगह बना पायेंगे?

Thursday, January 2, 2014

निकलो बंद मकानों से...

लाल बहादुर शास्त्री। एक ऐसा प्रेरणास्पद नाम जो देशभक्ति, ईमानदारी, सदाचार और सरलता का प्रतीक है। देश के इतिहास में लाल बहादुर शास्त्री को छोडकर दूसरा और कोई ऐसा प्रधानमंत्री हुआ ही नहीं जो सच्चे मायनों में देशवासियों का आदर्श हो। हर किसी के साथ कोई न कोई विवाद जुडा रहा है। किसी को परिवारवाद ले डूबा तो किसी ने करनी और कथनी में भारी अंतर रख अपनी छवि मलीन कर डाली। जय जवान, जय किसान का नारा लगाने वाले लाल बहादुर शास्त्री देश के ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सच्चे अर्थों में देश की सेवा की और जन-जन पर अपनी अमिट छाप छोडी। आज भी देश उन जैसे प्रतिभावान नेता और प्रधानमंत्री की बेसब्री से बाट जोह रहा है। देखें कभी पूरी होती है भारतमाता की यह इच्छा। यह सुखद खबर आपके पढने और सुनने में आयी होगी कि लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री आम आदमी पार्टी में शामिल हो गये हैं। चलती गाडी की सवारी तो हर किसी को भाती है, लेकिन आदर्श शास्त्री ने अरविं‍द केजरीवाल के उसूलों से प्रभावित होकर ही एक करोड की अपनी लगी-लगायी नौकरी को लात मार दी है। नागपुर के विख्यात चिकित्सक डॉ. उदय बोधनकर ने भी आम आदमी पार्टी की टिकट पर नागपुर लोकसभा चुनाव लडने का मन बना लिया है। डॉ. बोधनकर ने आम आदमी पार्टी से जुडने का यूं ही मन नहीं बनाया। उन्हें इस पार्टी के सुप्रीमो अरविं‍द केजरीवाल का पारंपरिक पार्टियों से एकदम अलग हटकर काम करने का तरीका बेहद भाया है। दूसरे नेताओं की तरह नाटकीय अंदाज अपनाये बिना उन्होंने जो करिश्मा कर दिखाया है उसी के कायल हो गये हैं नागपुर के जाने-माने बालरोग विशेषज्ञ डॉ. बोधनकर। उनके ससुर स्वर्गीय वसंत साठे का नाम देश के कद्दावर नेताओं में शामिल रहा है। बापू की कर्मभूमि वर्धा से दो बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले वसंत साठे ने देश के सूचना प्रसारण मंत्री का दायित्व भी बखूबी से निभाया था। डा. बोधनकर अपने ससुर के चुनाव संचालन की महत्वपूर्ण भूमिका निभा भी चुके हैं। यानी वे राजनीति के अंदरूनी दांव-पेच से वाकिफ हैं। डॉ. बोधनकर को 'आप' पार्टी का उम्मीदवार बनाने के लिए कई सामाजिक संगठनों ने अपनी आवाज बुलंद कर दी है। दूसरी तरफ नागपुर से लोकसभा चुनाव लडने की तैयारी में जुटे तथाकथित दमदार पार्टियों के दमदार नेताओं के चेहरों का रंग उड गया है। बेचारे अभी से बीमार दिखायी देने लगे हैं। अंदर ही अंदर से घबराये इन नेताओं के बयान लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। जिस तरह से शुरु-शुरु में दिल्ली में आम आदमी पार्टी के भविष्य को लेकर बातें की जा रही थीं ठीक वैसे ही बोलवचन सुनने को मिल रहे हैं: इस पार्टी का दिल्ली में तुक्का चल गया। नागपुर के मतदाता इतने अनाडी नहीं हैं कि नौसिखियों को अपना कीमती वोट देने की भूल करें। वैसे भी हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले कागजी शेरों की दहाड सुनने को मिलती ही रहती है। यानी नागपुर के नेताओं की जमीन इतनी पुख्ता है कि उसे कोई हिला नहीं सकता! वैसे यही गुमान दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी था। विधानसभा चुनाव से पहले उन्हे 'आप' पार्टी पानी का बुलबुला लग रही थी। बुलबुले ने समंदर को पानी पिला दिया और मदहोश समंदर के होश ठिकाने आ गये। दिल्ली की तरह महाराष्ट्र को भी बदलाव का इंतजार है। नागपुरवासी तो बेचैन हैं। राह देख रहे हैं। अरविं‍द केजरीवाल जैसा कोई जुनूनी आम आदमी आए और उनके सपने साकार कर दे। इस शहर के साथ हर पार्टी के नेताओं ने लगातार मज़ाक ही किया है। उद्योग धंधे गायब हो चुके हैं। वो एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल कब की बंद हो गयीं जो नागपुर की खास पहचान थीं। इन मिलों के कपडों की अपनी एक अलग शान थी। यह कपडा देश के दूर-दराज के शहरों और गांवों के बाजारों में जाता था। हजारों श्रमिक इनसे जुडे थे। सबके सब एक ही झटके से बेरोजगार हो गये। नेताओं की घटिया राजनीति ने शहर के और भी कई उद्योगधंधों पर ताले जडवाये। मिलों की अरबों रुपयों की जमीनों को भी इन नेताओं के संगी-साथी औने-पौने दामों में खरीदने में कामयाब हो गये। इन पर बडी-बडी इमारतें तान दी गयीं। शहर के भाग्य विधाता कहे जाने वाले कुछ नेताओं का लगभग एक-सा चरित्र है। मिल-बांट कर खाने में यकीन रखते हैं। भले ही पार्टी अलग-अलग हो। इस मामले में सब एक हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो विदर्भ और खासकर नागपुर की इतनी दुर्गति नहीं होती। 'मिहान' का जो सपना दिखाया गया था उसका भयावह सच भी सामने आ चुका है। यहां यह बताना जरूरी है कि सात-आठ वर्ष पूर्व 'मिहान' के नाम पर नागपुरी नेताओं ने जमकर श्रेय लूटा था। यह प्रचारित किया गया था कि इसकी बदौलत पूरे विदर्भ में क्रांति आ जाएगी। कम से कम दस लाख बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। तरक्की और बदलाव की उम्मीद के छलावे के कारण जमीनों के भाव आसमान छूने लगे थे। नेताओं के करीबियों ने प्रापर्टी के धंधे में कूदकर देखते ही देखते अरबों-खरबों की माया जुटा ली। सत्ताधीशों ने भी धन से अपने गोदाम भर लिये। लेकिन 'मिहान' केवल हवाई सपना ही साबित हुआ। आम जनता लुट गयी। किसी के हाथ में कुछ भी नहीं आया। दरअसल, शहरवासी वीआईपी कल्चर से मुक्ति चाहते हैं। वे जातिवादी नेताओं के होश ठिकाने लगाना चाहते हैं। उन्हें धनबल और बाहुबल की बैसाखी के सहारे चलने वाले धंधेबाज नेताओं से नफरत हो गयी है। वे किसी भी हालत में इन्हें 'जीतते' हुए नहीं देखना चाहते। यही भी सच है कि यह पवित्र काम सिर्फ और सिर्फ उस वोट की बदौलत ही हो सकता है जिसे अभी तक हम उनको देते चले गये जो कि इसके काबिल ही नहीं थे। 
आदर्श शास्त्री हों या डॉ. बोधनकर, इन जैसों का राजनीति में आना बहुत जरूरी है। भ्रष्ट नेताओं की मंडली को ऐसे लोग ही मात दे सकते हैं। महात्मा गांधी, विनोबा भावे, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण ने जिस लोकशाही की कल्पना की थी उसी को साकार करने की राह पर निकले अरविं‍द केजरीवाल को तभी पूर्ण सफलता मिलेगी जब पूरी तरह से कर्मठ और ईमानदार लोग उनसे जुडेंगे। अरविं‍द केजरीवाल को मात्र एक व्यक्ति समझ लेना बहुत बडी भूल होगी। वे बदलाव के जीवंत प्रतीक हैं। आज पूरा देश उन पर उम्मीदें लगाये है। नारंगी शहर को भी बदलाव का इंतजार है। शहर के विभिन्न चौक-चौराहों तथा गली-कूचों में अरविं‍द केजरीवाल की तस्वीरों वाले पोस्टर और उन पर लिखे नारे लोगों की चेतना और उम्मीदों को जगाने लगे हैं:
'निकलो बंद मकानों से,
जंग लडो बेइमानों से,
....
'पहले लडे थे गोरों से,
अब लडेंगे चोरों से।

Friday, December 27, 2013

एक सच यह भी

एक सत्यकथा के नायक ने आत्महत्या कर ली। अमूमन ऐसा होता तो नहीं है! दुराचारी तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए जमीन-आसमान एक कर देते हैं। तरह-तरह की कहानियां गढते हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे इस सदी के सबसे कुख्यात कथावाचक आसाराम ने बनायी और सुनायीं। उसके कुपुत्र नारायण ने भी बाप का अनुसरण करने में देरी नहीं लगायी। स्टिंग आप्रेशनों की झडी लगाकर राजनीति के धुरंधरों की जमीनें खिसकाने वाला तहलका का सम्पादक तरुण तेजपाल भी जब देहखोरी के चक्कर में पुलिसिया फंदे में फंसा तो उसने भी अपने तमाम उसूलों को सुली पर ऐसे टांगा जैसे उसका इनसे कभी कोई नाता ही नहीं था। ऐसी बेशर्मी और बेशर्मों के मायावी काल में जब यह सच सामने आया कि यौन उत्पीडन के संगीन आरोपों की तेजाबी तपन और जलन को बर्दाश्त न कर पाने के कारण एक शख्स ने मौत को गले लगा लिया, तो हैरानी के साथ-साथ पीडा भी हुई।
दिल्ली निवासी खुर्शीद अनवर का नाता उन लोगों से था जो बुद्धिजीवी कहलाते हैं। समाजसेवा में अभिरूची रखने वाले अनवर की बेबाक और चुभने वाली लेखनी से कई लोग चिं‍तित और परेशान रहते थे। भगवा और इस्लामिक कट्टरपंथ पर उनकी लेखनी एक साथ चलती रही। उनके करीबी दोस्तों का मानना है कि वे बेहद संवेदनशील इंसान थे। मानवाधिकारों की पुरजोर पैरवी करने वाले इस लडाकू इंसान को चरित्रवानों की श्रेणी में शामिल किया जाता था। उनके यार-दोस्त तो यह दावा करते नहीं थकते कि वे फिसलने वाले इंसान नहीं थे। कई छात्राओं का कहना है कि उनकी गरिमामय उपस्थिति तो सुरक्षा का अहसास दिलाती थी।
इस दोस्त, गुरु और सोशल एक्टिविस्ट पर एक युवती ने छेडछाड और दुष्कर्म का आरोप जडा तो सभी सन्न रह गये। युवती का कहना है कि वह १२ सितंबर की रात थी। खुर्शीद के घर पर डिनर पार्टी का आयोजन था। शराब के प्याले खनक रहे थे। उसने भी बहती गंगा में हाथ धोये। ज्यादा चढाने के कारण वह अपने होश खो बैठी। मजबूरन उसे वहीं सो जाना पडा। रात में जब उसे कुछ होश आया तो उसने अनवर को अपने ऊपर पाया। नशे के अतिरेक के कारण वह विरोध ही नहीं कर पायी। अगले दिन सुबह फिर से उसके साथ दुष्कर्म करने की भरपूर चेष्टा की गयी। युवती जो कि छात्रा है और मूलरूप से मणिपुर की रहने वाली है, ने जब यह बात अपने करीबियों को बतायी तो किसी को भी यकीन नहीं हुआ। उसने अपने साथ हुए खिलवाड की जानकारी जब अपने परिवार वालों को दी तो वे उसी पर बिफर उठे। उसे दुत्कारते हुए कहा गया कि वह अपना मुंह काला करने के बाद वापस घर ही क्यों आयी? वहीं मर जाती तो अच्छा था। घर में कैद कर उसकी बार-बार पिटायी की गयी। आगे की पढाई और नौकरी करने से मना कर दिया गया। मामला जब पुलिस तक जा पहुंचा तो एक चौंकाने वाली खबर यह भी सामने आयी कि घटनावाली रात खुर्शीद ने पीडि‍ता के साथ गई एक अन्य युवती को भी अपना शिकार बनाने का षडयंत्र रचा था। उसे भी शराब पीने को मजबूर किया गया था, लेकिन उसने अपनी समझदारी बरकरार रखी। गिलास में भरी शराब वॉशबेसिन में फेंक दी।
इस खबर को लेकर देशभर के न्यूज चैनलवाले वैसा ही हो-हल्ला मचाने और सनसनी फैलाने में जुट गये जिसके लिए वे जाने जाते हैं। खबरों की तह तक जाने से कन्नी काटने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को तो जैसे ऐसी टीआरपी बढाने वाली खबरों का बेसब्री से इंतजार रहता है। ऐसा कोई भी मामला उछला नहीं कि न्यूज चैनल वालों में गला काट प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। हर किसी का यही दावा होता है कि इस खबर को हमने ही सबसे पहले दिखाने का साहस दिखाया है। हद तो यह भी है कि पांच-सात जाने-पहचाने पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं का पैनल बैठाकर ट्रायल शुरू कर दिया जाता है। यही जाने-पहचाने चेहरे हर चैनल पर अपने ज्ञान का बखान करते नज़र आते हैं। इनकी बेसब्री के प्याले छलकने लगते हैं और स्टुडियो में ही फैसला सुना दिया जाता है। आरोपी को दोषी ठहराने में एक पल भी देरी नहीं लगायी जाती। खुर्शीद अनवर के साथ भी यही हुआ। वे अपना पक्ष रखना चाहते थे, लेकिन स्टुडियो में बैठकर अपनी-अपनी अदालतें चलाने वालें 'जजों' ने उनकी सुनी ही नहीं। सोशल मीडिया में भी ऐसी-ऐसी कटु टिप्पणियों का जलजला-सा आया जिनसे अनवर को लगा कि वे अब किसी को अपना मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहे। इसी सोच और भावावेश में उन्होंने १८ नवंबर की सुबह अपने फ्लैट की चौथी मंजिल से छलांग लगा दी। खुर्शीद अब इस दुनिया में नहीं हैं। पूरा सच शायद ही सामने आ पाए। पर यह भी सच है कि निर्भया बलात्कार कांड के बाद महिलाओं में गजब की जागृति आयी है। कुछेक बार ऐसा भी होता है जब महिलाएं आत्मसमर्पण करने को विवश हो जाती हैं। ऐसी नारियों का आंकडा भी अच्छा-खासा है जो भौतिक सुख-सुविधाओं के लालच में वासना के दलदल में फंस जाती हैं और दोष दूसरों पर लगाती हैं। इस तथ्य को भी नहीं नकारा जा सकता कि अधिकांश महिलाएं तथाकथित अपनों की वहशियत का शिकार होती हैं। खुर्शीद अनवर की आत्महत्या ने जो सवाल खडे किये हैं उनके भी जवाब सामने आने ही चाहिएं।

Thursday, December 19, 2013

'नक्सलवादी' की जंग

शहीद भगत सिं‍ह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपतराय, महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का देश हिन्दुस्तान सर्वांगीण 'सफाई' का अभिलाषी है। पंजा, कमल, हाथी, सायकल, घडी आदि-आदि सबको देख लिया। परख लिया। सब में भ्रष्टाचार के पोषक भरे पडे हैं। कहीं कम, नहीं ज्यादा। खोटे सिक्कों ने असली सिक्कों का जामा ओढकर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, रिश्वतखोरी, अंधेरगर्दी और लूटपाट का जी भरकर तांडव मचाया। जनता बेबस तमाशा देखती रही। सफेदपोशों ने अपनी-अपनी तिजोरियां भरीं और किनारे हो गए। देश लुटा-पिटा खुद के जर्जर हालात पर रोता रहा। शातिर राजनेताओं ने आम आदमी के वोटों की बदौलत सत्ता का भरपूर सुख भोगा, अपनी आने वाली दस-बीस पीढि‍यो के भविष्य को सुरक्षित किया और उस भारत माता को भूल गये जिसकी वे कस्में खाते थे। आम आदमी की तो कोई चिं‍ता-फिक्र ही नहीं की गयी। उसके हिस्से में तो सिर्फ और सिर्फ बदहाली, गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी ही आयी। भरोसे और इंतजार की भी कोई सीमा होती है। इस हकीकत को देश के झांसेबाज सत्ताधीशों की शातिर जमात नहीं समझ पायी। जब दिल्ली में 'झाडू' लहरायी तो उनके होश उड गये। फिर भी नाटक जारी हैं। जो सभी को दिख रहा है उसी को कई चालाकों के द्वारा नकारा जा रहा है। अरविं‍द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास और उनके समर्पित योद्धाओं ने वो करिश्मा कर दिखाया है जिसकी नकाबपोश नेताओं को तो कतई उम्मीद नहीं थी। सोच और हालात ही कुछ ऐसे बना दिये गये हैं कि अधिकांश लोगों ने यह मान लिया है कि इस देश की तस्वीर नहीं बदली जा सकती। हालात जस के तस रहने वाले हैं। अब क्रांतिकारियों ने इस देश की धरती पर जन्म लेना बंद कर दिया है। इसलिए जो चल रहा है, उसे चलने दो। इसी में भलाई है। लेकिन दिल्ली के चुनाव परिणामों ने उन सबकी जमीनें हिला दी हैं जो आम आदमी पार्टी के उदय के पक्षधर नहीं थे। उन्हें तो यह क्रांतिकारी दल पानी का बुलबुला लग रहा है। उन्हीं की निगाह में यह तो एक कन्फ्यूस पार्टी है, जिसका कोई भविष्य नहीं है। राजनीति के महाबलियों ने केजरीवाल की तुलना 'नक्सलवादी' से कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिये हैं। इन्हें अब यह याद दिलाना भी जरूरी है कि बम और बारुद बिछाकर निर्दोषों की जान लेने वाले 'वो' नक्सली अंधे और लालची सत्ताखोरों की देन हैं। उन्हें तो देश के लोकतंत्र पर ही भरोसा नहीं है। ऐसे में उनका तो किसी भी हालत में समर्थन नहीं किया जा सकता। यह नक्सली(?) भी देश के शोषकों और लुटेरों के सताये हुए हैं। यह नये तथाकथित नक्सली भ्रष्टाचारियों और अनाचारियों को सबक सिखाने और उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए ही राजनीति के मैदान में उतरे हैं। इन्हें देश के लोकतंत्र के प्रति पूरी आस्था है। दिल्ली के वो लाखों मतदाता भी इन्हें अपना मसीहा मानते हैं जिन्होंने अपने कीमती वोट देकर विधायक बनाया है। देश का काया-कल्प करने को आतुर ऐसे 'नक्सलियो' की देश को आज बहुत जरूरत है। कोई माने ना माने, यही आज के असली नायक हैं। एक थके हारे नेता ने बयान दागा है कि अरविं‍द केजरीवाल ने अन्ना हजारे के कंधे पर रखकर बंदूक चलायी है। ऐसे अक्ल के अंधो को यह कहने में पता नहीं शर्म क्यों आ रही है कि केजरीवाल ने अपने दम पर ही वो झाडू चलायी है जिसने भ्रष्टाचारियों के चेहरों का रंग उडा दिया है। झाडू के खौफ से घबराये नेताओं को यह गम भी जिन्दगी भर सताता रहेगा कि एक आम आदमी देखते ही देखते राष्ट्रीय परिदृष्य पर छा गया और वे खिसियानी बिल्ली की तरह खम्भा नोचते रह गये। दरअसल, देशवासियों को वर्षों से ऐसे ही किसी साफ-सुथरे चेहरे की तलाश थी जो सत्ता के मद में चूर नेताओं के होश ठिकाने लगाये। शीला दीक्षित से उकतायी जनता को केजरीवाल का जिद्दी जूनून और सरल स्वभाव इस कदर भाया कि उसने मौका पाते ही घमंडी मुख्यमंत्री को उसकी औकात दिखा दी। झाडू और केजरीवाल तो एक प्रतीक हैं। आज देश को एक नहीं अनेक केजरीवालों की सख्त जरूरत है। जिस दिन इनके हाथों की झाडू जहां-तहां फैले भ्रष्टाचार के सफाये में लग जाएगी उसी दिन से खुद-ब-खुद भ्रष्टाचारी मिट्टी में दफन होते नजर आएंगे। गुस्से में उबलती आम जनता को ऐसे केजरीवालों का बेसब्री से इंतजार है जो भ्रष्ट तंत्र का सफाया कर सकें। दिल्ली के चुनावों में आम आदमी की पार्टी ने सिद्ध कर दिया है कि काले धन की बरसात किये बिना भी चुनाव जीता जा सकता है। इस देश की जनता भ्रष्टाचार-मुक्त शासन चाहती है। अरविं‍द केजरीवाल पर लोगों ने विश्वास किया। स्वच्छ शासन देने का आश्वासन तो कांग्रेस और भाजपा ने भी दिया, लेकिन मतदाताओं ने उनकी सुनने की बजाय 'आप' पार्टी पर भरोसा करने में ही अपनी भलाई समझी।
यही अरविं‍द केजरीवाल की असली अग्नि परीक्षा है। उन्हें कुछ अलग करके दिखाना ही होगा। उन्हें भ्रष्ट नौकर शाही में आमूलचूल परिवर्तन लाकर लोगों को राहत दिलानी होगी। यदि वे भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में कामयाब होंगे तो उनके चाहने वालों की कतार और लम्बी होनी तय है। दिल्ली से शुरू हुए उनके कारवां को देश के कोने-कोने में पहुंचने और अपना परचम लहराने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। पूरा देश उन्हें हाथों-हाथ लेने को आतुर है। क्योंकि ऐसी कोई भी जगह नहीं बची जहां रिश्वतखोरों और बेइमानों का वर्चस्व न हो। देशवासी किसी भी हालत में इनसे मुक्ति चाहते हैं और उन्हे यकीन है कि 'झाडू' ही उनके दिमाग ठिकाने लगा सकती है।
वर्षों से लटकते चले आ रहे लोकपाल बिल के पास होने के पीछे भी अरविं‍द केजरीवाल, योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास और मनीष सिसोदिया का अभूतपूर्व योगदान है। भले ही आज उनकी मेहनत पर पानी फेरने की साजिशें की जा रही हैं। यदि यह लोग न होते तो अन्ना का आंदोलन केन्द्र सरकार की तंद्रा को भंग नहीं कर पाता। दरअसल झाडू की धमाकेदार जीत ने कांग्रेस को लोकपाल बिल पास करवाने के लिए विवश कर दिया। यदि 'आप' नहीं जीतती तो लोकपाल भी अटका रहता।

Thursday, December 12, 2013

सत्ता की नाइंसाफी

बेटा कफन में लिपटा है। दाह संस्कार के लिए पिता का बेसब्री से इंतजार है। लाख मिन्नतों के बाद भी जेल में कैद पिता को अपने बेटे के अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति नहीं मिल पाती। कानून के रखवाले कहते हैं कि कानून सबके लिए बराबर है। मरना-जीना तो लगा ही रहता है। इसके लिए जेल के कायदे और कानून तो नहीं बदले जा सकते। ऐसी कई खबरें अक्सर पढने और सुनने में आती हैं। मृत पत्नी के अंतिम दर्शन के लिए पति फरियाद पर फरियाद करता रहा पर उसकी किसी ने नहीं सुनी। जेल में बंद बेटे को अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए चंद घंटे देने से भी जेल प्रशासन ने मना कर दिया। यही मेरे देश की असली तस्वीर है जिसमें आम आदमी के लिए रहम की कोई गुंजाईश नहीं है। फिर ऐसे में सवाल यह है कि कुछ लोगों के साथ इतनी रहमदिली क्यों? फिलहाल, हम बात कर रहे हैं उस संजय दत्त की जो फिल्म अभिनेता है। उसके पिता स्वर्गीय सुनील दत्त अभिनेता होने के साथ-साथ कांग्रेस सांसद थे। मां भी राज्यसभा की सम्मानित सांसद थीं। उसकी बहन प्रिया दत्त भी कांग्रेस की कमान थामे हुए है और सांसद भी है। इतने महान परिवार से ताल्लुक रखनेवाले अपराधी संजय दत्त पर महाराष्ट्र सरकार खासी मेहरबान है।
अच्छे इंसान के प्रति तो हर किसी को सद्भावना होती है। कानून की नजरों में संजय एक ऐसा अपराधी है जिसकी चारों तरफ थू...थू... होनी चाहिए। वह किसी तरह की इज्जत और सम्मान के भी काबिल नहीं है। १९९३ के मुंबई बम विस्फोटों के दौरान खून-खराबा करने के मकसद से लाये गये अवैध हथियारों के जखीरों में शामिल एक राइफल को रखने के मामले में शस्त्र कानून के तहत दोषी करार दिया गया संजय दत्त पूणे की यरवदा जेल में पांच वर्ष की सजा काट रहा है। उसने जो कृत्य किया है वह तो राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है। उसके देशद्रोही आतंकी दाऊद इब्राहिम जैसों से करीबी रिश्तों का भी खुलासा हो चुका है। देश की आर्थिक नगरी मुंबई में सिलसिलेवार बम-बारूद बिछाकर सैकडों निर्दोषों की जान और हजारों को गंभीर रूप से घायल करने वाले राष्ट्रद्रोहियों से मित्रता रखने वाले संजय को कानून के शिकंजे से बचाने के लिए कई महारथियों ने अपने विवेक को सूली पर टांग दिया था। एक भूतपूर्व जज ने तो इस भयावह खलनायक को बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। फिर भी आखिरकार उसे जेल जाना ही पडा। यहां भी वह नाटकबाजी पर उतर आया। वीआईपी कैदी की नौटंकियों काम कर गयीं। जेल में अभी कुछ माह ही गुजरे थे कि बीते अक्टुबर माह में उसे १४ दिनों के पैरोल पर रिहा कर दिया गया। सजग लोग हैरान थे। उसने इस मनचाही छुट्टी का भरपूर मज़ा लिया। जैसे ही जेल वापस जाने के दिन आए उसने फौरन खुद को बीमार बताकर और १४ दिनों का पैरोल हासिल कर लिया। ऐसी छूट आम कैदियों को सपनों में भी नसीब नहीं हो पाती। उन्हें तो कायदे-कानून का हवाला देकर जेल की काल कोठरी में दुबकने-सुबकने को विवश कर दिया जाता है। जब बात रसूखदारों की आती है तो हर कानून-कायदा उन्हीं के चरणों का दास हो जाता है। २८ दिन की छुट्टियों का आनंद लेने के बाद संजय ३० अक्टुबर को जेल लौटा ही था कि फिर से उसने अपने सत्ता के रिश्तों को भुनाना शुरू कर दिया। आश्चर्य... इसमें भी वह सफल हो गया। पिछली बार उसने अपनी बीमारी का ढोल पीटा था। इस बार उसने अपनी पत्नी मान्यता की बीमारी का दर्दीला गीत सुनाकर एक महीने के पैरोल की सौगात हासिल कर ली। दो माह में दूसरी बार पैरोल पर अभिनेता के बाहर आने के जादू ने सजग देशवासियों को सोचने के लिए विवश कर दिया है कि इस देश का यह कैसा कानून है? संजय को अपनी पत्नी मान्यता दत्त की बीमारी के कारण एक महीने का पैरोल दिया गया है। जबकि उसे हाल ही में एक फिल्मी पार्टी में देखा गया। जहां वह ठुमकती और मस्ती करती नजर आ रही थी।
मुंबई बम कांड के और भी कई आरोपी हैं जिन्होंने संजय की तरह ही आतंकियों से रिश्ते निभाये और खून-खराबा करने में उनका पूरा साथ दिया। उनके घर-परिवार के लोग भी बीमार पडते रहते हैं। कई तो खुद भी गंभीर बीमारी से पीडि‍त हैं। पर उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। इसी बात को लेकर विरोध के स्वर भी गूंज रहे हैं। अपराधी अभिनेता को गलत तरीके से राहत और सुविधा दिये जाने के कारण प्रदेश के गृहमंत्री आर.आर. पाटील पर भी उंगलियां उठ रही हैं। कहा जा रहा है कि-जहां हजारों जरूरतमंदों के आवेदन तो अक्सर ठुकरा दिये जाते हैं वहीं मुंबई की कांग्रेस सांसद के भाई की पलक झपकते ही हर मांग पूरी कर दी जाती है! यह कहां का न्याय है? खतरनाक अपराधी की पैरवी करने वालों को क्या पता नहीं है कि इस देश की जेलों में हजारों ऐसे कैदी वर्षों से बंद हैं जो बेकसूर हैं। उन्हें साजिशों के तहत फंसाया गया है। न जाने कितने कैदी तो ऐसे भी हैं जो दमदार वकील और जमानत की रकम का इंतजाम न कर पाने के कारण जेलों में मरने और सडने को विवश हैं। उनकी चिं‍ता तो किसी को नहीं होती! कोई भूतपूर्व जज और गृहमंत्री उनके लिए तो नहीं पसीजता। यह तो सरासर नाइंसाफी है। ढोंग है। कानून के साथ बहुत बडा खिलवाड है। फिर भी हुक्मरान यह कहते नहीं थकते कि कानून की निगाह में सब एक जैसे हैं। क्या ऐसे मक्कारों के हाथों में देश और प्रदेशों की कमान रहनी चाहिए?

Thursday, December 5, 2013

ऐसे बनता है कारवां

अपने देश में आम आदमी को रोजी-रोटी के जुगाड में अपनी सारी उम्र खपा देनी पडती है। जहां दो वक्त की रोटी दुश्वार हो वहां बीमार होने पर अस्पतालों के खर्चे उठा पाना आसमान के तारे तोडने वाली बात है। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। प्रायवेट अस्पतालों ने तो भव्य होटलों को भी पीछे छोड दिया है। यहां के हाई-फाई डाक्टरों की फीस को चुकाने में मध्यम वर्ग के भी पसीने छूट जाते हैं। ऐसे में गरीब तो वहां पांव धरने की भी नहीं सोच सकते। किसी भी सरकार ने कभी गरीबों की चिं‍ता नहीं की। उनकी बीमारियों और मौतों को सदैव अनदेखी की गयी। गरीब तो गरीब हैं। तरह-तरह की बीमारियां और दुर्घटनाएं उन्हें जब-तब दबोच लेती हैं। ऊंची कीमतों के कारण दवाइयां उनकी पहुंच से दूर रहती हैं। दवा विक्रेताओं की अपनी कमायी से मतलब है। मनमाने दाम वसूलने में उन्हें कोई शर्म नहीं आती। ऐसे में बेचारे गरीब जाएं तो जाएं कहां? न बीमारियां उन पर रहम करती हैं और न सरकारें और राजनेता। हां, फिर भी नेताओं को बीमारों की कभी-कभार याद आ जाती है।
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और अपने जन्मदिन पर कई नेता बडे ताम-झाम के साथ अस्पतालों में अपने चेले-चपाटों के साथ मरीजों से मिलने के लिए पहुंच जाते हैं। अपने इस अभियान में वे पत्रकारों को भी अपने साथ ले जाना नहीं भूलते। उनके हाथ में पांच-सात सौ के फल और मिठाइयां होती हैं जिन्हें वे मुस्कराते हुए मरणासन्न मरीजों को वितरित करते हैं। उनकी इस सहृदयता और दानवीरता की तस्वीरें न्यूज चैनलों और अखबारों की शोभा बढाती हैं। नेताजी चंद रुपये खर्च कर लाखों की प्रसिद्धि बटोर लेते हैं। ऐसे खोखले और मायावी दौर में यदि किसी शख्स ने जरूरतमंदों को मुफ्त में दवाइयां और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का अभियान चला रखा हो तो उसे आप क्या कहेंगे?
बीते सप्ताह इस कलमकार की एक ऐसे इंसान से मुलाकात हुई जो मानवता और इंसानियत की जीती-जागती मिसाल है। उसमें नेताओं और तथाकथित समाज सेवकों वाला कोई भी अवगुण नहीं है। दीन-दुखियों के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर कर देने वाले इस मानव को नाम कमाने की बीमारी भी नहीं है। लोग उन्हें 'मेडिसन बाबा' के नाम से जानते हैं। नारंगी रंग का कुर्ता-पायजामा उनकी खास पहचान में शामिल है। खुद का परिचय देते समय अक्सर वे यह कहने और बताने में भी संकोच नहीं करते कि वे तो सडक छाप भिखारी हैं। यह भिखारी रुपया-पैसा नहीं मांगता। दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाने और बीमारों को चंगा करने के लिए घर-घर जाकर दवाइयां मांगने वाले इस इंसान को जरूरतमंदों की मदद करने में जो सुकून मिलता है उसे किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। नारंगी कुर्ते पर सफेद लिखावट चमकती रहती है। 'चलता-फिरता मेडिसिन बैंक... मुफ्त दवाइयों के लिए सम्पर्क करें...०९२५०२४०९०८।' दिल्ली जैसे महानगर में जहां करीबी रिश्तों का कोई अता-पता नहीं है, वहां ऐसे परोपकारी का मिलना विस्मित कर गया। दोनों पैरों से अपंग इस शख्स को अक्सर इस चिं‍ता से रूबरू होना पडता था कि कई गरीब और बेसहारा लोगों को दवाइयों के अभाव में बेमौत मर जाना पडता है। धन के अभाव में कई बार अपने भी साथ छोड देते हैं। जब उन्हें दो वक्त की रोटी ही नसीब नहीं हो पाती तो महंगी दवाइयां खरीदना तो उनके लिए संभव ही नहीं हो सकता। उन्हें इस हकीकत का भी पता था कि कई लोगों के घरों में दवाइयों का अंबार लगा रहता है। जब उन्हें यह बेकाम की लगती हैं तो वे उन्हें कूडे-कचरे के हवाले कर देते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं होता कि यही दवाइयां कई असहाय जरूरतमंदों के लिए संजीवनी साबित हो सकती हैं।
मेडिसन बाबा रोज सुबह अपने घर से निकलते हैं। घर-घर जाकर दवाइयां मांगते हैं। यह सिलसिला वर्षों से चल रहा है। शुरु-शुरु में लोग उनका मजाक उडाते थे। अब उनका साथ देने लगे हैं। कई सच्चे समाजसेवक और मानवता प्रेमी लोग भी उनके इस अभियान में शामिल हो गये हैं। वे उनकी सहायता करते हैं और दवाओं के साथ-साथ इलाज में काम आने वाले विभिन्न साधन-सामान उपलब्ध कराते हैं। इस फरिश्ते के घर के कमरों में दान की दवाएं, हास्पिटल बेड, सिलेंडर, वाकिं‍ग स्टिक, व्हील चेअर, रजाई, कम्बल जैसी तमाम चीजें भरी पडी हैं। जिन्हें भी सहायता की जरूरत होती है वे बेझिझक उन तक पहुंच जाते हैं। यदि कोई उनसे फोन पर सम्पर्क करता है तो उसकी समस्या का भी फौरन समाधान कर दिया जाता है। मेडिसन बाबा कहते हैं कि मेरा एक ही सपना है कि इस देश में दवाओं के अभाव में किसी गरीब को मौत के मुंह में न समाना पडे। मैं गरीबों और असहायों के लिए एक मेडिसन बैंक की स्थापना करना चाहता हूं जहां से जरूरतमंदों को मुफ्त में इलाज की तमाम सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। राजधानी के लोग मेडिसन बाबा को पहचानने लगे हैं। मेडिसन बाबा खुद अस्पतालों में जाते हैं और जरूरतमंदों का पता लगाकर उनकी सहायता करते हैं। इस काम में वे डाक्टरों की भी सहायता लेते हैं, ताकि किसी मरीज को गलत दवाई का शिकार न होना पडे। मदर टेरेसा को अपना आदर्श मानने वाले मेडिसन बाबा की कीर्ति विदेशों तक जा पहुंची है। दीन-दुखियों से सहानुभूति रखने वाले कई विदेशी भी उनसे खासे प्रभावित हैं। वे भी उन्हें निरंतर दवाएं भेजते रहते हैं। उनका हालचाल भी पूछते रहते हैं। दिल्ली के कई पढे-लिखे युवक-युवतियों को भी उनकी सहायता कर आत्मिक संतुष्टि मिलती है। यकीनन, कारवां ऐसे ही बनता है। पहल करने वाला चाहिए।