Thursday, March 6, 2014

सत्ता का लालच और मजबूरी

कहीं भी अपनी दाल गलती न देख आखिरकार रामविलास पासवान ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। रामविलास को दलितों का मसीहा कहलवाने में फख्र होता है। उन्हें यकीन है कि देश के अधिकांश दलित वोटर उनके साथ हैं। मायावती ने भी यही भ्रम पाल रखा है। दलितों और पिछडों के मतों पर अपना अधिकार जताने और उनके हितो की लडाई लडने का ढोल पीटने वाले नेता तो ढेरों हैं पर कुछ नाम हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। चारा घोटाला के नायक और जगजाहिर भ्रष्टाचारी लालू प्रसाद यादव भी दलितों और मुसलमानों के उद्धारकर्ता होने का दावा करते हैं। उदितराज और रामदास आठवले जैसे नेता भी खुद को किसी से कम नहीं मानते! इन्हें भी पिछडों और दलितों के सारे वोट अपनी जेब में नजर आते हैं। यह दोनों दलित नेता भी भाजपा के साथी बन गये हैं। रामविलास, उदितराज और रामदास आठवले को अपने पाले में लाकर भाजपा काफी उत्साहित है। उसे यकीन है कि इन महान दलित नेताओं को भगवा रंग में सराबोर कर देने से देश के सभी दलित मतदाता उसे वोटों से मालामाल कर देंगे। नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने से कोई भी नहीं रोक पायेगा। भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करने वाले लोकजन शक्ति पार्टी के सर्वेसर्वा रामविलास पासवान ने यह शुभ काम पहली बार नहीं किया है। जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब भी उन्होंने अपनी पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन कर रेलमंत्री की आलीशान गाडी की सवारी की थी और सत्ता का भरपूर मज़ा लूटा था। २००२ के गुजरात दंगों के बाद वाजपेयी सरकार से एकाएक समर्थन वापस लेने और नरेंद्र मोदी को हत्यारा करार देने वाले पासवान के अब अचानक हुए हृदय परिवर्तन के पीछे सिर्फ और सिर्फ सत्ता और अपने पुत्र चिराग पासवान को राजनीति में स्थापित करने का स्वार्थ छिपा है। पासवान जैसे लोग दावे चाहे कुछ भी करें, लेकिन सच्चाई यही है कि कुर्सी की चाह उन्हें राजनीति में खींच लाती है। इनकी नीयत समय-समय पर डोल जाती है। मौके के हिसाब से सिद्धांत और विचार भी बदल जाते हैं। तभी तो इन्हें कभी नरेंद्र मोदी गुजरात दंगों के जनक नजर आते हैं और भाजपा घोर साम्प्रदायिक पार्टी प्रतीत होती है। फिर सुहावना चुनावी मौसम आते क्या से क्या हो जाता है...। सत्ता लोलुपता इनसे क्या-क्या नहीं करवाती। कल तक जो इनकी निगाह में हत्यारे थे, अछूत थे, आज पाक-साफ हो गये हैं। एकदम अपने लगे हैं। उनसे किसी किस्म की शिकायत ही नहीं रही...! सभी गिले-शिकवे हवा हो गये हैं।
अफसरी छोडकर राजनीति में आये उदितराज पिछले १३ वर्षों से राजनीति में हैं। यदा-कदा न्यूज चैनलों पर आयोजित होने वाली राजनीतिक परिचर्चाओं में नजर आ जाते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने मायावती से भी ज्यादा नाम कमा लिया है। उनका दावा है कि वे बहुजन समाज पार्टी की मुखिया को कहीं से भी चुनाव में पराजित करने का दमखम रखते हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधकर अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले अंबेडकर के इस अनुयायी का तथाकथित साम्प्रदायिक पार्टी की शरण में आना क्या यह नहीं बताता कि सत्ता का लालच किसी के भी ईमान को डगमगा सकता है। रामदास आठवले भी सत्ता के पुजारी हैं। दलितों की राजनीति की बदौलत उन्होंने बहुत कुछ पाया है। जो पार्टी उन्हें राज्यसभा में पहुंचाने का प्रलोभन देती है वे उसी की शरण में चले जाते हैं। कभी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस तो कभी शिवसेना उनके ठिकाने रहे हैं। भाजपा से बहुत कुछ पाने की उनकी तमन्ना है। जिस तरह से रामविलास को ११ सीटें देने का सौदा हो चुका है उसी तरह से आठवले को भी निराश नहीं करने की भाजपा ने ठानी है। १९९८ में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। पहले जो दल और उनके नेता भाजपा को घोर साम्प्रदायिक घोषित करते नहीं थकते थे वे भी एकाएक पलटी खा गए। दरअसल उन्हें जब यह लगने लगा कि एनडीए की सरकार बनने वाली है तो उन्होंने भाजपा से हाथ मिलाने में जरा भी देरी नहीं लगायी। आज भी लगभग वही दल हैं। वही नेता हैं। दिखावे के लिए भले ही नरेंद्र मोदी को हत्यारा कहते हों, भाजपा को 'देश तोडक' पार्टी करार देते हों, पर जैसे-जैसे ही देश में भाजपा के पक्ष में और अधिक सकारात्मक माहौल बनता और बढता चला जाएगा, मतलब परस्त कुर्सी प्रेमी नेता और दल उसके निकट आते चले जाएंगे। वैसे इसकी शुरूआत तो हो ही चुकी है। सत्ता का आकर्षण होता ही कुछ ऐसा है कि अच्छे-अच्छों का ईमान डोल जाता है। उपदेश और सिद्धांत धरे के धरे रह जाते हैं। कल तक भाजपा को गालियां देने वाले रामविलास पासवान, रामदास आठवले, उदितराज की इस तिकडी ने दलित राग की जगह भाजपा के गीत गाने शुरू कर दिए हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के शर्मनाक हालात तो और भी हैरान कर देने वाले हैं। लालू प्रसाद यादव को सारी दुनिया भ्रष्ट मानती है। चारा घोटाला के चलते वे जेल की यात्रा भी कर आये हैं। फिलहाल जमानत पर हैं। कांग्रेस है कि लालू को अपराधी मानने को तैयार ही नहीं दिखती। कांग्रेस ही क्यों, और भी कई नेता लालू को निर्दोष मानते हैं। कोई उनसे यह तो पूछे कि क्या कोर्ट का फैसला निराधार है? दरअसल ऐसे अंध भक्तों की वजह से ही लालू जैसे भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद हैं। लालू खुद तो कानूनन लोकसभा का चुनाव लडने के काबिल नहीं रहे। लेकिन उन्हें लगता है उनकी आरजेडी पार्टी, जिसके वे सर्वेसर्वा हैं बिहार में सबसे ताकतवर और लोकप्रिय पार्टी है। कांग्रेस ने भी यही मान लिया है। इसलिए वह खुद के दम पर बिहार में लोकसभा चुनाव लडने से कतरा रही है। उसका लालू के साथ चुनावी गठबंधन कहीं न कहीं उसकी कमजोरी और विवशता को ही दर्शाता है।

Saturday, March 1, 2014

सच्चा टूट जाता है...

देश की राजधानी में एक युवक जबरन पिट गया। उसका कसूर था कि वह दलित था। वह जब घुड चढी की रस्म निभाने के लिए बग्घी पर सवार हो रहा था तो उसी दौरान दो दबंग युवक अपनी दादागिरी दिखाने लगे। उन्होंने दुल्हे पर अपशब्दों की तेजाबी बौछार की और घोडे पर चढने से रोका। विरोध किये जाने पर दुल्हे तथा उसके परिजनों को भी मारा-पीटा गया। दबंगों को दलित की तामझाम वाली शादी और घुड चढायी शूल की तरह चुभ गयी। ऐसे में उन्होंने अपना आपा खोने में जरा भी देरी नहीं लगायी और अपनी औकात पर उतर आये। ऐसे कितने ही मामले अक्सर पढने और सुनने में आते हैं। देश को आजाद हुए ६६ वर्ष बीत गये पर दलितों और शोषितों पर अभी भी जुल्म ढाये जाते हैं। यह सब कुछ उन राजनेताओं की आंखों के सामने होता रहता है जो दलितों के मसीहा कहलाते हैं। वे तो इनके वोट झटक कर कहां से कहां पहुंच गये पर ये वहीं के वहीं हैं। आजादी का असली मज़ा तो दलित नेता ले रहे हैं। एक बार सत्ता पाते ही राजा-महाराजाओं को मात देने लगते हैं। पूंजीपति राजनेताओं और धन्नासेठों के साथ उठना-बैठना शुरू हो जाता है और उनके रंग में रंगकर दलितों और गरीबों को पूरी तरह से भूल जाते हैं।
वैसे भी इस देश के अधिकांश नेताओं का आम आदमी से कभी कोई खास लेना-देना नहीं रहा। खास आदमी के आतंक और लूटपाट की तलवारें आम आदमी पर चलती ही रहती हैं। कानून के रखवाले देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। इसलिए तो कहा जाता है कि भारत में दो देश बसते हैं। एक अमीरों का, दूसरा गरीबों का। यह शर्मनाक बंटवारा उन नेताओं की देन है जो अवसरवाद की राजनीति करते चले आ रहे हैं। इन्होंने समस्त देशवासियों को एक सूत्र में जोडने की कभी कोई ईमानदार कोशिश नहीं की। इनकी नीयत ही इनकी कलई खोल देती है। इन्होंने देश की अस्सी प्रतिशत जनता को बेमौत मरने के लिए छोड दिया है। कोई तो होता जो उनकी पैरवी करता जिन्हे आजादी कभी आजादी नहीं लगी। जिनकी वेदना, पीडा, गरीबी, बदहाली और बर्बादी के गीत तो कइयों ने गाये पर तस्वीर बदलने की किसी ने नहीं सोची। वे अपनों के बीच रहकर भी बेगाने बने रहे। उसके वोटों की बदौलत कितनों की तकदीर बदल गयी पर वे वहीं के वहीं रहे। इन्हीं के बारे में किसी शायर ने कहा है :
''जुबां रसीद सी चेहरा लगान जैसा है,
वो सिर से पांव तक हिं‍दुस्तान जैसा है।''
धर्मवाद, जातिवाद, अवसरवाद, आतंकवाद और छल- फरेब की राजनीति करने वालों के लिए आम इंसान की तकलीफें कोई अहमीयत नहीं रखतीं। उनके निजी स्वार्थ इतने ज्यादा हैं कि उनकी पूर्ति करने में ही उनका सारा वक्त जाया हो जाता है। चुनाव जब करीब आते हैं तो यह लोग धडाधड ऐसे-ऐसे आश्वासन देने लगते हैं जिनको पूरा कर पाना इनके बस की बात नहीं होती। दरअसल, सवाल नीयत का है। इनकी नीयत में अगर खोट नहीं होती तो देश इस कदर टूटा-फूटा और बदहाल न होता। बडे से बडे वायदे भी कभी अधूरे न रह पाते। यहां तो आदिवासियों, दलितों और हर वर्ग के गरीबो के हिस्से का धन कुछ शातिर चेहरे लूट ले जाते हैं। वर्षों पहले देश के एक प्रधानमंत्री ने कहा था कि गरीबों के विकास के लिए भेजा जाने वाला ८५ प्रतिशत धन बिचौलिए निगल जाते हैं। हालात आज भी वैसे के वैसे हैं। यह बिचौलिए कोई और नहीं, सत्ताधीशों और नौकरशाहों के वो गिरोह हैं जिनकी संवेदनाएं मर-खप चुकी हैं। देश की धन सम्पदा को लूटना ही इनका पेशा है। इस चुनावी मौसम में भी कैसे-कैसे कलाकार अपनी जादूगरी दिखाने को उतावले हैं। कोई चाय के तराने गा रहा है तो किसी को पुराने गडे मुर्दे उखाडने में मज़ा आ रहा है। किसी को इस देश का वो भूखा, नंगा गला-कटा इंसान नजर नहीं आता जो वोट देते-देते थक गया है। बुरी तरह से हताश हो गया है। वह बेहद गुस्से में है। उसका बस चले तो वह देश के तमाम झूठे और मक्कार नेताओं को ठिकाने लगा दे। यह भी कोई बात हुई कि आज भी उन्ही के वोटों के लिए घमासान मचा है जिनको बार-बार छला गया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मानना था कि राजनीति में सच और सिद्धांतों का होना बहुत जरूरी है। झूठे लोगों के लिए राजनीति में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन आज का सच यही है कि सच्चे हाशिये में हैं और झूठे सुर्खियां बटोर रहे हैं। जहां देखो वहां छल-कपट और फरेब का बोलबाला है। नेताओं की करनी और कथनी में जमीन आसमान का अंतर इस देश को बेहाल कर चुका है। बापू के नाम की कसमें खाने वाले नेताओं की राजनीति के उसूल समय-समय पर बदलते रहते हैं। सच से तो उनका दूर-दूर तक नाता नहीं रहा। गज़लकार हसीब सोज की यह पंक्तियां काबिले गौर हैं :
''यहां मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
कई झूठे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है।''

Thursday, February 20, 2014

इन्हें वोट मत देना

यह हकीकत है। कई नेता, नेता कहलाने के लायक नहीं हैं। कोई भी अपराध इनसे अछूता नहीं है। गुंडे मवालियों की फौज इनके इर्द-गिर्द खडी नजर आती है। किस्म-किस्म के अराजक तत्व इनके रक्षा कवच हैं। संसद को मंदिर की संज्ञा दी गयी है। इस मंदिर से धीरे-धीरे पुजारी नदारद होते चले जा रहे हैं। अपराधियों का वर्चस्व बढता चला जा रहा है। देश की वर्तमान लोकसभा में १६२ ऐसे सांसद हैं जिनका कहीं न कहीं अपराध और अपराधियों से करीबी नाता रहा है। इन पर दर्ज विभिन्न आपराधिक मामले इनकी कलई खोल देते हैं। लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा को कलंकित कर रहे ७६ सांसद तो हद दर्जे के ऐसे गुंडे बदमाश हैं कि बडे-बडे डकैत और हत्यारे भी उनके सामने बौने नजर आते हैं। जिन-जिन राजनीतिक पार्टियों ने इन्हें लोकसभा और राज्यसभा में भेजा है उनके लिए इनका अपराधी होना कोई मायने नहीं रखता। इनकी संपत्ति और काली-पीली दौलत ही इनकी एकमात्र योग्यता है। दलों के मुखिया इनकी तमाम खासियतों से वाकिफ हैं। येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने की क्षमता रखने वालों को हाथों-हाथ लिया जाता है। उनके सभी गुनाह नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। देश की लगभग हर बडी पार्टी यही नीति अपनाती है। थैलीशाहों को संसद और विधानसभाओं में पहुंचाती है। ईमानदार मूकदर्शक बने रह जाते हैं।
इस देश के बेईमान नेताओं और नौकरशाहों ने मुल्क को पतन के कगार पर ले जाकर खडा कर दिया है। जिन जनप्रतिनिधियों पर युवा पीढी को सुधारने का दायित्व था वही अपराधों को बढावा दे रहे हैं। यह सच्चाई क्या कम चौंकाने वाली है कि पंजाब के कई नेता ड्रग माफियाओं के साथ हिस्सेदारी कर युवा पीढी को बर्बाद करने में लगे हैं। सफेदपोशों की नशा के कारोबार में लिप्तता के कारण खाकी वर्दी भी बहती गंगा में हाथ धो रही है। पिछले दिनों पंजाब में जगदीश भोला नामक एक बडा ड्रग तस्कर पकड में आया। यह तस्कर कभी डीएसपी रह चुका है। राष्ट्रद्रोही दाऊद इब्राहिम की तरह दबदबा बनाने और धनवान बनने के लालच में इसने अपनी वर्दी नीलाम कर दी। नशे के खिलडि‍यों को दबोचने के बजाय खुद भी उनका साथी बन गया और देखते ही देखते अरबों-खरबों की माया जुटा ली। अपराधी चाहे कोई भी हो, एक-न-एक दिन पकड में आता ही है। जगदीश भोला ने पुलिसिया शिकंजे में आने के बाद कई रहस्योद्घाटन किये हैं, जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अगर भारत माता को बचाये रखना है तो नेताओं और नौकरशाहों के शर्मनाक गठजोड को तोडना-फोडना होगा। नहीं तो यह लोग देश को बेच खाएंगे और हम और आप कुछ भी नहीं कर पायेंगे। जगदीश भोला के इन शब्दों को तो कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि वह तो मामूली आदमी है। असली मास्टर माइंड तो नेता हैं जो ड्रग और अन्य अवैध धंधों की कमायी से आज कहां से कहां जा पहुंचे हैं। पंजाब में जितने भी नशे के बडे कारोबारी हैं वे नेताओं के यहां थैलियां पहुंचाते हैं। उनकी जनसभाओं के खर्चे उठाते हैं। चुनावी मौसम में उन्हें जिताने के लिए धन के साथ-साथ गुंडे-बदमाश भी उपलब्ध कराते हैं। यह सबको पता है कि आज की तारीख में पंजाब नशे का अवैध कारोबार करने वालों की जन्नत बन चुका है। बीस हजार करोड के पार जा पहुंचे इस नशीले कारोबार से जहां युवा पीढी बर्बाद हो रही है वहीं कई मंत्री, सांसद, विधायक और अफसर मालामाल हो रहे हैं। यह लिखना, कहना और सोचना भी गलत है कि सिर्फ पंजाब में ही ऐसी गडबड है जो पूरे देश के लिए तबाही का सबब बन रही है।
हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और गुजरात में भी राजनीति और अपराध एक दूसरे के हमजोली हैं। कहीं कम, कहीं ज्यादा। कहीं दबे-छिपे तो कहीं खुलेआम। गुजरात में दारूबंदी है, लेकिन यहां पीने वालों के लिए इसकी कोई कमी नहीं है। नेताओं और दारू माफियाओं के वर्षों से चले आ रहे इस गठबंधन को 'ईमानदार' और 'ब्रम्हचारी' मुख्यमंत्री ने भी तोडने और नेस्तनाबूत करने की कोई कोशिश नहीं की। महाराष्ट्र की मायानगरी मुंबई तो तरह-तरह के आतंकी माफियाओं की जैसे कर्मस्थली ही है। इनके फलने-फूलने और टिके रहने में कई नेताओं के साथ और आशीर्वाद की अहम भूमिका रही है। मुंबई में खूनी धमाके कर पूरे देश को दहलाने वाले खूंखार आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को अगर कुछ राजनेताओं और पुलिसवालों की शह नहीं मिली होती तो वह अपराधजगत में उभर ही नहीं पाता। मुंबई तो मुंबई है। महाराष्ट्र के पुणे, नागपुर और अन्य कई शहरों में भी दाऊद इब्राहिम के अनुगामी बदमाशों का आतंक देखते बनता है। यह बदमाश कई रूपो-प्रतिरूपों के साथ सक्रिय हैं। कोई भू-माफिया है तो कोई दारू किं‍ग है। किसी ने सरकारी ठेकों तो किसी ने शिक्षा की दुकानों के जरिए लूटमार मचा रखी है। हर किसी के माथे पर किसी-न-किसी राजनीतिक पार्टी का बिल्ला चमकता नजर आता है। अपने-अपने इलाके में भाईगिरी करने वाले हर बडे-छोटे महारथी पर भी किसी-न-किसी नेता का हाथ दिखता है। इस हाथ की कीमत भी चुकायी जाती है। अगर आप इन्हें नहीं जानते-पहचानते हैं तो वक्त रहते सचेत और सावधान हो जाएं। देश में लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। जिन प्रत्याशियों के इर्द-गिर्द आपको ऐसे लुटेरों और गुंडे-बदमाशों का हुजूम नजर आए तो उन्हें किसी भी हालत में अपना कीमती वोट देने की भूल न करें। ऐसे प्रत्याशी आम जनता के भले के लिए चुनाव नहीं लडते। चुनाव जीतने से पहले यह खुद को सत्यवादी हरिशचंद्र दर्शाते हैं और पता नहीं कितने मुखौटे अपने चेहरे पर सजाते हैं। चुनाव जीतने के बाद सिर्फ और सिर्फ अपना तथा अपने वालों का ही घर भरते हुए डकैत बन जाते हैं। कोई भी इनका बाल भी बांका नहीं कर पाता। इसलिए सावधान!

Thursday, February 13, 2014

यह भी तो गद्दारी है

नारों पर नारे। बातें भी कितनी बडी-बडी।
मेरा देश महान। यहां सब हैं एक समान।
अनेकता में एकता हमारी असली पहचान।
सर्वत्र सद्भाव और भाई चारा।
पर सच तो है कुछ और। अपने ही देश में अपनों का अपमान। अपनों का खून। अपनों की ही लाशें। कुछ जख्म कभी भरते नहीं। भयावह सच्चाइयां भी हमेशा याद रहती हैं। नौकरी की तलाश में आर्थिक नगरी मुंबई में खुशी-खुशी जाने और अपनों के ही हाथों लहुलूहान होकर लौट आने वाले कई उत्तर भारतीय युवकों के जख्म आज भी ताजा हैं। मायानगरी मुंबई उन्हें डराती है। इस महानगर का नाम सुनते ही उनकी कंपकंपी छूट जाती है।
इस कलमकार को दिल्ली पर बडा नाज़ था। यह भी यकीन था कि दिल्ली सबको अपना मानती है। कहीं कोई भेदभाव नहीं है। मुंबई की आक्रामक, भडकाऊ और तोड-फोड वाली राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह सबको एक सूत्र में बांध कर सतत आगे बढने वाली राजधानी है। जिस पर हर भारतवासी को गर्व है। पर इस गर्व की धज्जियां उड गयी हैं। दिल्ली वालों ने यह क्या कर डाला! सपने में भी कभी यह ख्याल नहीं आया था कि दिलवालों की दिल्ली इतनी बेदर्द हो जाएगी। अपने ही अपनों का खून बहाने लगेंगे। वो भी बिना किसी वजह। मेरी निगाह में हर वो अपना है जो इस देश और किसी भी प्रदेश का वासी है। अपने देश के लोगों से नफरत करना, उनका कत्ल करना, उन्हें अपमानित करना और प्रताडि‍त करना भी राष्ट्रद्रोह है। हद दर्जे की गद्दारी है। अरुणाचल भी हिं‍दुस्तान का ही एक प्रदेश है। इस प्रदेश के कांग्रेस विधायक नीडो पवित्रा के बेटे को दिल्ली वालों ने जंगली जानवरों की तरह पीट-पीट कर मार डाला। वो कोई नेता या डकैत नहीं था जो दिल्ली को लूटने आया था। वह तो अपने देश की राजधानी में पढने और संवरने आया था। उसके माता-पिता ने उसके लिए कई सपने संजोये थे। उसके लिए सब कुछ नया था। नये रास्तों और नयी सडकों की भूल भुलैया में वह अपने गंतव्य स्थल को भूल गया। महानगरों में भटक जाना आम बात है। उसने कुछ दुकानदारों से अपनी समस्या का हल पाने के लिए पूछताछ की। दुकानदारों ने उसे रास्ता बताने की बजाय उस पर नस्लीय टिप्पणियों की बौछार शुरू कर दी। उसके बालों का मज़ाक उडाया गया। देखते ही देखते सामान्य सी बात आक्रामक बहस में तब्दील हो गयी। नीडो को कुछ भी समझ में नहीं आया। नयी भाषा नये लोग। पर देश तो अपना था। लेकिन उन अभद्र, अराजक और हिंसक सोच वाले दुकानदारों का तो कोई और ही इरादा था। तभी तो उन्होंने नीडो की थप्पडों, जूतों और घूसों से ऐसी निर्मम पिटायी की, कि अगले दिन उसकी मौत हो गयी। दिल्ली की पुलिस भी तमाशबीन बनी रही। पुलिस की यही आदत अपराधियों, आतंकियों, बलात्कारियों और हत्यारों के हौसले बढाती है और निर्दोषो को मौत के घाट पहुंचाती है। समृद्ध और पढे-लिखों की राजधानी में पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ दुरव्‍‍यहार की घटनाएं इतनी आम हैं कि कुछ कहते नहीं बनता। जनवरी में निडो को मार डाला गया तो फरवरी में मणिपुर की रहने वाली एक १४ वर्षीय किशोरी की अस्मत लूट ली गयी। किशोरी को रात में अकेले जाते देख दुष्कर्मी की नीयत डोल गयी। उसने उसे जबर्दस्ती दबोचा और अपने घर के भूतल पर स्थित कमरे में ले जाकर बलात्कार कर डाला। विरोध करने पर नाबालिग लडकी की उसने पिटायी भी कर डाली। पीडि‍त युवती काफी देर तक इधर-उधर भटकती रही! अपनी फरियाद सुनाने के लिए उसके पास शब्द नहीं थे। वह हिं‍दी नहीं जानती थी। उसके परिजन उसे तलाशने के लिए हलाकान होते रहे। जैसे-तैसे मामला पुलिस तक पहुंचा। बलात्कारी युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। यह भी खुलासा हुआ है कि वह पहले भी बलात्कार कर चुका है। यानी वह आदतन अपराधी है। तय है ऐसे अपराधियों को पुलिस का भय नहीं होता। तभी तो उत्तर-पूर्व के लोगों पर दरिंदगी और दादागिरी का कहर ढाने का सिलसिला बढता ही चला जा रहा है।
दिल्ली में स्थित कोटला मुवारकपुर में मणिपुर की दो युवतियां पांच बदमाशों की छेडछाड का शिकार बनीं तो देशबंधु गुप्ता रोड इलाके में असम की युवती से जबरन वेश्यावृत्ति कराने के मामले ने भी कम सुर्खियां नहीं पायीं। दूसरे प्रदेशों से आने वाले नागरिकों के साथ अभद्र और अपमानजनक व्यवहार करने वाले दिल्लीवासी शायद इस तथ्य को भूल गये हैं कि राजधानी दिल्ली सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि भारत के हर नागरिक की है। दिल्ली वालों को किसी भी इंसान की इज्जत की धज्जियां उडाने और उसकी जान लेने का कोई हक नहीं है। फिर मेहमान तो मेहमान होता है। चाहे देशी हो या विदेशी। उसका तो आदर सत्कार किया जाना चाहिए। यही भारतीय संस्कृति है।

Thursday, February 6, 2014

जूते-चप्पल और थप्पड

जूते और थप्पड। इनका चलन ज्यादा पुराना नहीं है। इन दिनों इनके चलने और बजने की आवाजें बडी तेजी के साथ सुनायी देने लगी हैं। एक जमाना था जब अंडे और टमाटर बरसा करते थे। महंगाई की मार के चलते वक्त ने ऐसा पलटा खाया और दूभर हालातों ने ऐसा असर दिखाया कि अपनी मांगें मनवाने, सत्ताधीशों को जगाने, अपने बेकाबू गुस्से को दिखाने के तौर-तरीके ही बदल गये!
आज के अखबार में छपी इस खबर ने स्तब्ध करके रख दिया। शीर्षक ही कुछ ऐसा था: 'राष्ट्रपति से नहीं मिलने दिया तो हो गये नंगे'। दरअसल, हुआ यूं कि एक युवक और युवती देश के राष्ट्रपति से मिलने और उन्हें अपनी फरियाद सुनाने के इरादे से राष्ट्रपति भवन के मुख्य गेट पर पहुंचे। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। अपनी मंशा पूरी नहीं होने पर दोनों ने फौरन अपने कपडे उतार फेंके और नंग-धडंग हालत में चहलकदमी करने लगे। यह अजीबो-गरीब नज़ारा देख सुरक्षा कर्मी भौचक्के रह गये। बिलकुल वैसे ही जैसे मैं और देश और दुनिया के तमाम सजग पाठक जिन्होंने इस खबर को पढा, सुना और जाना। मुझे तो बरबस दुष्यंत कुमार की लिखी यह पंक्तियां याद हो आयीं:
 'कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।'
इन दिनों मेरे मन और मस्तिष्क में अक्सर यह सवाल गूंजता रहता है कि इस देश के राजनेता मुल्क की तस्वीर को बदलना क्यों नहीं चाहते? सभी साधनों के होने के बावजूद भी यह बदहाली का आलम क्यों है? चंद लोग खुश हैं। सत्ता और व्यवस्था से नाखुश करोडों देशवासियों में निराशा और हताशा घर कर चुकी है। इन हताश और उदास लोगों में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मरने-मारने पर उतारू होने के करतब दिखाने में कोई संकोच नहीं करते। बीते हफ्ते हरियाना के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गाल पर एक बेरोजगार युवक ने भरे चौराहे पर तमाचा जड दिया। युवक चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था कि पैसे देने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली। यानी युवक ने सरकारी नौकरी पाने के लिए अच्छी-खासी रिश्वत दी थी। फिर भी उसे अंगूठा दिखा दिया गया। गुस्साया युवक मुख्यमंत्री हुड्डा को ही इसका असली जिम्मेदार ठहरा रहा था। हुड्डा पर अगस्त २०१० में भी एक २१ वर्षीय युवक ने जूता फेंका था। निशाना सही नहीं होने के कारण वे बच गये थे। भूपेंद्र सिंह प्रदेश के विकास के बडे-बडे दावे करते हैं। उनका दावा है कि उनका प्रदेश विकास के युग में प्रवेश कर चुका है। वे अपनी सरकार की उपलब्धियों के बखान करने वाले लुभावने विज्ञापनों पर करोडों रुपये लुटाने के कीर्तिमान रचते चले आ रहे हैं। अपने प्रचार के लिए सरकारी खजाने को अंधाधुंध लुटाने वाले इस महारथी के विज्ञापन प्रदेश में दो लाख करोड रुपये की पूंजी के निवेश का दावा करते हैं, जबकि इसका असली आंकडा मात्र ३१८९ करोड रुपये ही है। प्रदेश में २० लाख बेरोजगार युवकों को रोजगार देने का ढोल पीटने वाले झूठे और फरेबी मुख्यमंत्री बडी मुश्किल से ३६ हजार लोगों को ही रोजगार दे पाये हैं। हुड्डा के झूठे वायदों और दावों की पोल खुल गयी है। लोकायुक्त ने भी उनसे जवाब मांगा है। जिन्हें जनता के जूते-चप्पल और थप्पड विचलित नहीं करते उनके लिए लोकायुक्त का डंडा भी कोई मायने नहीं रखता। वैसे भी नेताओं की अस्सी फीसदी कौम लज्जाहीन हो चुकी है। धन की बरसात कर चुनाव जीतना, सत्ता पाना और फिर लूट मचाना इनका पेशा है। नाराज़ नौजवानों के हाथों पिटने, जूते-वूते खाने और थप्पडों के वार हंसते-हंसते झेल जाने के इनके अनेकों सच्चे किस्से हैं। इन किस्सों में तथाकथित योगी और हद दर्जे के भोगी किस्म के साधु-संतो के नाम भी शामिल हो चुके हैं। इस सदी के सबसे बडे धूर्त प्रवचनकार आसाराम को भी जब एक पत्रकार का सवाल शूल की तरह चुभ गया था तो उसने भी उसे थप्पड मार कर अपनी 'शिष्टता' और 'विद्वता' दिखायी थी। खोखली संतई के मद में चूर आसाराम ने तो टीवी पत्रकार का कैमरा ही चूर-चूर कर डाला था। धर्म और राजनीति के मैदान में उछलकूद मचाते-फिरते बाबा रामदेव पर स्याही फेंकने का मामला ज्यादा पुराना नहीं है। नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन पर चमकदार जूता भी चल चुका है। फिर भी उनकी शान में कोई कमी नहीं आयी है। वे ठाठ से धर्म, योग और राजनीति का धंधा कर रहे हैं।
द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती देश और दुनिया के जाने-माने संत हैं। हर संत को शांति, सहृदयता और सहनशीलता की प्रतिमूर्ति माना जाता है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक नगरी जबलपुर में स्वरूपानंद सरस्वती ने एक पत्रकार के गाल पर ऐसा धारदार तमाचा मारा, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनी और सुनायी गयी। इस झन्नाटेदार थप्पड की जो वजह सामने आयी वो भी कम विस्मयकारी नहीं। पत्रकार ने उनसे पूछा था कि क्या नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं? जवाब में बेचारे पत्रकार ने गाल को लाल कर देने वाला चांटा पाया। स्वरूपानंद को यह प्रश्न ही रास नहीं आया। वे कांग्रेस प्रेमी हैं। नेहरू और गांधी परिवार से उन्हें खास लगाव है। भाजपा उन्हें नहीं भाती। मोदी से भी किसी बात को लेकर खफा हैं। ऐसे में उनके मुख्यमंत्री बनने के सवाल को वे कैसे बर्दाश्त कर लेते! उन्होंने भी वही किया जो अभी तक होता आया है। मुख्यमंत्री हुड्डा को निराश बेरोजगार नौजवान ने थप्पड मारी। पत्रकार को उस स्वामी जी ने थप्पड रसीद कर दिया जो पूरी दुनिया को संयम, शांति और अहिंसा का पाठ पढाते हैं!

Thursday, January 30, 2014

अराजक और अराजकता

कुछ बातें, वारदातें, घटनाएं, हादसे और समाचार, खुशी, भय और चिं‍ता के कगार पर पहुंचा देते हैं। अरविं‍द केजरीवाल के उदय ने लोगों के उत्साह को बढाया। नयी उम्मीदें जगायीं। लोकप्रियता के मामले में अन्ना हजारे को पछाडने वाले अरविं‍द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के देखते ही देखते छा जाने पर पेशेवर राजनेताओं से त्रस्त करोडों देशवासियों को अथाह प्रसन्नता और तसल्ली हुई। केजरी की आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता संभाले हुए अभी तीस दिन ही बीते थे कि मीडिया तरह-तरह के सवाल दागने लगा। विरोधी पार्टी के नेता तो ऐसे उछलने लगे जैसे उनके मन की चाहत पूरी हो गयी है। उन्होंने 'आप' को फ्लॉप घोषित करने में जरा भी देरी नहीं लगायी। यह वही नेता हैं जो कुर्सी हथियाने के बाद पांच साल तक निष्क्रिय रहने की परंपरा निभाते रहे हैं। जैसे-तैसे पांच साल पूरे होते ही फिर से सत्ता पाने के जोड-जुगाड लगाते रहे हैं। इन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एकाएक कोई 'आम आदमी' आयेगा जो लोगो का दिल जीत ले जायेगा। हां, यही तो हुआ है। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के साथ-साथ दूसरी सभी राजनीतिक पार्टियों के दिग्गजों को कभी सपने में भी ख्याल नहीं आया कि यह देश जागने की राह पर है। लोग इनके झूठे वादों से उकता चुके हैं। सजग मतदाताओं के सब्र का पैमाना टूट चुका है। अरविं‍द केजरीवाल और उनके साथियों ने किस तरह से आम आदमी पार्टी बनायी, वो कहानी भी ज्यादा पुरानी नहीं है। इस नयी पार्टी ने कैसे दिल्ली की सत्ता पायी वो भी जगजाहिर है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब सभी 'आप' के ही गीत गा रहे थे। मीडिया यह दिखाने और बताने की होड में लग गया था कि अब पीएम की कुर्सी का एक और नया दावेदार सामने आ चुका है। जैसे ही दिल्ली पुलिस की नालायकी और नाफरमानी के खिलाफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविं‍द केजरीवाल ने फिर से अपने धरने के पुराने हथियार को चलाने के लिए सडकों पर डेरा डाला तो राजनीति के पुराने खिलाडी ऐसी-वैसी बातें करने लगे: कभी किसी मुख्यमंत्री ने अपनी मांग मनवाने के लिए अनशन-हडताल का सहारा नहीं लिया। केजरीवाल तो नौटंकीबाज है। इसे सत्ता चलानी नहीं आती। मुख्यमंत्री को अपने वातानुकूलित कमरे में बैठकर हुक्म चलाना चाहिए। यह तो खुद को आज के युग का महात्मा गांधी समझने लगा है। इसे अब कौन समझाए कि आज अगर खुद गांधी भी होते तो वे अपने ही बनाये उसूलों से पल्ला झाड लेते। इस शख्स ने मतदाताओं को जो सपने दिखाये उन्हें पूरा करने में इसे नानी याद आ रही है।
देश का निम्न और मध्यमवर्ग अभी भी केजरीवाल से निराश नहीं हुआ है। देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए अरविं‍द केजरीवाल और 'आप' पर निशाना तो साधा ही, उन्हें भी सचेत कर दिया जो अरविं‍द केजरीवाल पर रातों-रात कोई करिश्मा कर दिखाने का जबरन दबाव बनाये हुए हैं। उन्होंने कहा कि, 'लोकप्रिय अराजकता किसी भी रूप में प्रशासन का विकल्प नहीं हो सकती। झूठे वायदे मोहभंग पैदा करते हैं, जिससे गुस्सा उपजता है और उस गुस्से के वाजिब शिकार सत्ता में बैठे लोग ही होते हैं। इस विशाल देश की तमाम समस्याएं रातों-रात खत्म नहीं हो सकतीं।'
देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिं‍दे एक उम्रदराज नेता हैं। उनसे गंभीरता और संजीदगी की उम्मीद की जाती है। उन्हें भी अरविं‍द केजरीवाल रास नहीं आ रहे। शिं‍देजी का बस चले तो वे केजरीवाल की सीएम की कुर्सी को फौरन अपने कब्जे में ले लें और दिल्ली से उनकी रवानगी कर दें। इन्हीं गृहमंत्री महोदय ने कभी पुणे के एक सम्मान समारोह में यह रहस्योद्घाटन किया था कि इस देश की जनता मूर्ख है। इसकी याददाश्त का दिवाला पिट चुका है इसलिए बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाती है। लेकिन इस बार उन्होंने जनता को कोसने की बजाय दिल्ली के मुख्यमंत्री पर शब्दबाण चला कर अपनी हताशा और पीडा को उजागर कर दिया। उन्होंने फरमाया कि केजरीवाल तो 'येडा' मुख्यमंत्री है। येडा यानी मुर्ख या पागल। लोकसभा के चुनाव निकट हैं इसलिए आम जनता शिं‍देजी निशाने से बच गयी। फिर भी यह विषैली चोट तो उन सजग मतदाताओं पर ही की गयी है, जिन्होंने अरविं‍द केजरीवाल को विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व विजयश्री दिलवायी और शीला दीक्षित जैसी मगरूर मुख्यमंत्री को वहां पटक दिया जहां की वे हकदार थीं। अरविं‍द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनावों में जितवा और दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाकर मतदाताओ ने मूर्खता की है या अक्लमंदी का परिचय दिया है यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा। लेकिन राजनीति के भुलक्कड और बेशर्म खिलाडी बहुत जल्दी में हैं। किसी को अरविं‍द केजरीवाल और उनके साथी नक्सली लगते हैं तो कोई उन्हें अराजक और दंगई घोषित करने में लगा है।
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि दिल्ली के मतदाताओं का मिजाज देश से जुदा नहीं है। वे न तो मूर्ख हैं और ना ही भुलक्कड। नक्सली, दंगई, अराजक और अराजकता के असली मायने भी उन्हें पता हैं। आप को लेकर फैसले पर फैसले सुनाने की इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं। अरविं‍द केजरीवाल और उनकी जुझारू टीम को वक्त दिया जाना चाहिए। यही मौका है जब देश की बदरंग तस्वीर बदल सकती है। अगर यह काम २०१४ में नहीं हो पाया तो फिर कभी भी नहीं हो पायेगा। शोर-मचाने वाले नेताओं को अपने दुष्ट कर्मों की पडताल करनी चाहिए। यही लोग जब अपने गिरेबान में झांकेंगे तो इनकी बोलती बंद हो जाएगी। देश के कुछ तथाकथित महान नेता भले ही खुद के द्वारा बार-बार उच्चारित किये जाने वाले शब्दों के अर्थ भूल गये हों पर आम आदमी नहीं भूला। वह २००२ में हुए उस हत्याकांड को भी नहीं भूला जिसमें साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आग लगाकर ५८ कार सेवकों को जिं‍दा फूंक दिया गया था। दंगाइयों के इस अमानवीय कृत्य के पश्चात पूरे गुजरात में साम्प्रदायिक हिं‍सा के बेखौफ तांडव के चलते हजारों लोगों के मारे जाने का खूनी मंजर आज भी लोगों के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है। देश का इतिहास ऐसे न जाने कितने रक्तिम पन्नों से भरा पडा है जिन्हें पढकर आने वाली पीढि‍यां भी शर्मसार होती रहेंगी। कौन भूल पायेगा १९८४ का वह भयावह काल जब इंदिरा गांधी की हत्या के पश्चात पूरी दिल्ली को ज्वालामुखी में तब्दील कर दिया गया था। सिख विरोधी हिं‍सा के तांडव में कुछ कांग्रेसियों को नाचते-गाते देखा गया था। सैकडों सिख जिं‍दा जला दिये गये। न जाने कितनों की खून-पसीने से कमायी गयी लाखों-करोडों की सम्पति को लूटा और फूंका गया। यह अराजक और आतंकी खेल दिल्ली के साथ-साथ लगभग पूरे देश में तीन-चार दिन तक निरंतर चलता रहा। धूएं के बादलों के साथ-साथ खून का बदला खून के नारे गुंजते रहे। सत्ताधीश, प्रशासन और पुलिसवाले मूकदर्शक बने रहे। देश और दुनिया के इतिहास में हिं‍सा और अराजकता का ऐसा और कोई उदाहरण दर्ज नहीं है।

Saturday, January 25, 2014

खादी और खाकी के कलंक

खाकी और खादी के गठबंधन को तोड पाना आसान नहीं है। मुंबई के एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी वाय.के.सिं‍ह ने अपनी पुस्तक में इन दोनों के मजबूत रिश्तों पर इतना कुछ लिखा है कि हर पढने वाला स्तब्ध रह जाता है। जिस देश में खादी और खाकी एक हो जाएं उसका तो भगवान ही मालिक है। बडी से बडी क्रांति इनके चेहरे पर शिकन नहीं ला सकती। क्या यह चौंकानेवाला सच नहीं है कि इस देश में थानों की बोली लगती है! यह बोली पच्चीस-पचास हजार में सिमट कर नहीं रह जाती। इसका आंकडा तो लाखों और करोडों तक जाता है। जिस इलाके में जितने ज्यादा अपराध और अपराधी होते हैं उतनी ही उसकी कीमत बढ जाती है। इसलिए तो कहा जाता है कि पुलिस वालों की रजामंदी के बिना कहीं भी सतत अवैध कारोबार नहीं चल सकते। शहरों और महानगरों में अपराध और अपराधियों की एक अपनी दुनिया आबाद हो चुकी है। किस-किस इलाके में अवैध शराब बनती है, देह व्यवसाय होता है, जुए के अड्डे चलते हैं और दिन के उजाले में तमाम काले धंधे होते हैं इनकी पूरी खबर चतुर और कमाऊ पुलिसवालों को रहती है। जब तक उन्हें अपना हिस्सा मिलता रहता है तब तक कोई छापेमारी नहीं की जाती। इस कमाई का हिस्सा ऊपर तक पहुंचता है। ऊपर वालों का जिन मंत्रियों-विधायकों से टांका भिडा रहता है उनकी सारी मुरादें पूरी कर दी जाती हैं। तभी तो पुलिस अधिकारियों को मनचाहे थाने की गद्दी मिलती है। जब कभी किसी समाजसेवक अथवा ईमानदार नेता के द्वारा अराजक तत्वों और उनके ठिकानों के खिलाफ आवाज उठायी जाती है और खाकी वर्दीवालों को कानूनी कार्रवाई करने के लिए कहा जाता है तो वे बडी चालाकी के साथ आनाकानी करते नज़र आते हैं। ऐसे में अक्सर यह भी होता है कि कुछ जिम्मेदार नागरिक अपराधियों को सबक सिखाने के लिए ऐसा कदम उठाने को विवश हो जाते हैं जिसे गैर कानूनी कहा जाता है। जहां कानून के रक्षक अपने कर्तव्य ईमानदारी और नैतिकता को रिश्वतखोरी की मंडी में नीलाम कर चुके हों वहां ऐसी तथाकथित अवैधानिक पहल और कोशिश को आम जनता के द्वारा सराहा जाता है। किसी के हिस्से की तालियां कोई और बटोर ले जाता है और इससे जो परिदृष्य बनता है उससे वो 'कोई' नायक बन जाता है। पुलिस विभाग की नस-नस में घर कर चुके भ्रष्टाचार और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के चलते आमजनों को जहां मुसीबतें झेलनी पडती हैं, वहीं उन वर्दीधारियों का भी दम घुटने लगता है जो कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ काम करना चाहते हैं। उन्हें अपने उच्च अधिकारियों और नेताओं, मंत्रियों की दखलअंदाजी शूल की तरह चुभती है। अपने उसूलों पर टिके रहने का खामियाजा उन्हें भुगतना पडता है। भ्रष्ट उन पर भारी पड जाते हैं। तरक्की दर तरक्की पाते चले जाते हैं। ईमानदार पुलिस कर्मी मन मसोस कर रह जाते हैं। इनकी हर स्तर पर अवहेलना की जाती है। आखिरकार एक वक्त ऐसा भी आता है जब स्वाभिमानी खाकी वर्दीधारी को नौकरी छोड देनी पडती है। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो आत्महत्या कर 'दुखद खबर' बन जाते हैं। पर ऐसी खबरें किसी को नहीं चौंकाती। पुलिसवाले के फांसी पर झूल जाने या खुद के हाथों खुद को गोली का शिकार बनाने के पीछे भ्रामक कारण गिनाये जाते हैं। असली सच को छुपा लिया जाता है।
एक असली सच यह भी है कि पुलिस वालों को १६ से १८ घंटे तक कोल्हू के बैल की तरह खून-पसीना बहाना पडता है। खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं होता। वे जिन सरकारी घरों में रहते हैं उनकी जर्जर हालत दबे हुए सच को उजागर करती है। जिन्हें धन कमाने का हुनर आता है और अफसरों की चाटूकारिता करनी आती है उनके यहां तमाम सुख-सुविधाओं के सामान भरे रहते हैं। जो इस कला से नावाकिफ हैं या जिनकी खुद्दारी ने उन्हें बिकाऊ नहीं बनाया वे तमाम असुविधाओं के बीच जैसे-तैसे दिन काटते रहते हैं। २०१४ एक नयी दास्तान लिखने को आतुर है। जागरूक जनता ने कमर कस ली है। हिं‍दुस्तान की पुलिस को बदलना ही होगा। अगर उसने खुद का नहीं सुधारा तो लोग उसे सुधरने के लिए मजबूर कर देंगे। बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है। यहां तो सभी हदें पार कर दी गयी हैं। सीधा-सादा आदमी, अनपढ आदमी, मेहनतकश आदमी, बेसहारा आदमी पुलिस थाने जाता है तो उसकी सुनी नहीं जाती। उसे दुत्कार कर भगा दिया जाता है। अधिकांश पुलिस वालों का नैतिकता, कर्तव्य और संवेदना से कोई लेना-देना नहीं है। वे हमेशा अपनी मुट्ठी गर्म करने की ताक में लगे रहते हैं। हुक्मरानों, सत्ता के दलालों, माफियाओं, छटे हुए बदमाशों और सफेदपोशों के सामने अधिकांश पुलिसवालो की घिग्गी बंधी रहती है और आम आदमी पर उसके आतंकी डंडे का जबर्दस्त जोर चलता है। यह हमारा नहीं, उन लाखों भुक्तभोगियों का कहना है जो तथाकथित वर्दी वाले गुंडों के सताये हुए हैं। रिश्वतखोर पुलिस वालों की दादागिरी आम लोगों पर ज्यादा ही चलती है। पिछले वर्ष एक खूंखार हत्यारे ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा था कि उसे बेईमान खाकी वर्दी वालों ने अपराधकर्म करने को विवश किया। वह तो अपनी रोजी-रोटी के लिए सडक के किराने सामान बेचता था। पुलिस वाले उसे 'हफ्ता' देने के लिए मजबूर करते थे। उसकी इतनी कमायी नहीं थी कि हर पुलिस वाले की मांग को पूरा कर पाता। उसने 'खाकी' का अपराधी चेहरा देखकर अपराधी बनने की ठान ली। अपराधी से हत्यारा बनने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा। इस देश में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें पुलिस ने गलत मार्ग पर चलने को विवश किया और आज अपराध जगत में उनकी तूती बोलती है। कई नेता और पुलिस वाले उनके दरबार में हाजिरी लगाते हैं। ऐसे शर्मनाक हालातों को बदलने के लिए किसी न किसी नायक को तो सामने आना ही पडेगा।