Thursday, September 18, 2014

असली नायक कौन...और खलनायक कौन?

यह देश की आम औरत की कहानी है। एकदम सच्ची। बेरहम हालातों ने उसे ऐसी जगह लाकर खडा कर दिया है जहां उस पर उंगलियां ही उंगलियां उठ रही हैं। उसका नाता है उत्तर प्रदेश के एक गांव से। इस गांव की भी वैसी ही हालत है जैसी कि देश के अधिकांश ग्रामों की। महात्मा गांधी कहते थे कि असली भारत गांव में बसता है। सच कहते थे वे। गरीबी, बदहाली और बेरोजगारी आज भी लगभग हर गांव की पहचान है। इस कहानी की नायिका वह आम औरत है जो अपने दो बच्चों के साथ गांव में रहती है। रोजी-रोटी की तलाश में पति को देश की राजधानी दिल्ली जाना पडा। गांव रोजगार देने में सक्षम नहीं था। कोई भी मां खुद तो भूखी सो सकती है, लेकिन अपने बच्चों को रोटी के लिए तरसता नहीं देख सकती। उस औरत को जब कोई काम-धंधा समझ में नहीं आया तो उसने कच्ची शराब बनानी शुरू कर दी। बापू के गांव में पीने के लिए पानी भले ही न मिले, लेकिन शराब जरूर मिल जाती है। हर गली-कूचे में भरे पडे हैं पीने-पिलाने वाले। इसलिए उस औरत को भी यही धंधा फायदेमंद लगा। अच्छा-बुरा क्या है... इसमें उसने जरा भी अपना दिमाग नहीं खपाया।
वह धडल्ले से कच्ची शराब बनाकर बेचने लगी। बच्चों को पढाने और उनका पेट भरने लायक कमायी होने लगी। उसके यहां पियक्कडों का तांता लगने लगा। उसकी बनायी कच्ची शराब आसपास के गांव के पियक्कडों को भी ललचाने लगी। नशीली शराब बनाने में उसने महारत हासिल कर ली। शराब जब भट्टी पर च‹ढी रहती तो उसे पहले वह चखती और उसके बाद ग्राहकों के हवाले करती। चखते-चखते उसे मज़ा आने लगा। कडवाहट उसे भाने लगी। धीरे-धीरे उसे पीने की ऐसी लत लगी कि वह चौबीस घंटे नशे में धुत रहने लगी। राजधानी से लौटे पति ने पत्नी को बहुतेरा समझाया। दोनों में लडाई-झगडा होने लगा। पति का कहना था कि मां की देखा-देखी बच्चे भी शराबी बन जाएंगे। उनके भविष्य की ऐसी-तैसी हो जाएगी। कभी अपने बच्चों के लिए मर-मिटने वाली मां ने अपने पति की एक भी नहीं सुनी। सुनती तब जब होश में रहती। यहां तो दारू ने मां की ममता ही लूट ली थी। ऐसे में पति को अपनी भूल का एहसास हुआ। अगर उसने पत्नी को तब टोका और रोका होता जब उसने अवैध शराब के धंधे में कदम रखा था तो ऐसे शर्मनाक दिन न देखने पडते। दोषी तो वह भी कम नहीं। धन की चमक ने उसे भी अंधा बना दिया था। जब आंख खुली तब तक बहुत देरी हो चुकी थी।
हताश और निराश पति ने पंचायत का दरवाजा खटखटाया। ज्ञानवान पंचों ने महिला को समझाया और चेताया गया कि अगर घर-परिवार से प्यार है तो शराब छोड दो। शराब ज़हर है। सत्यानाशी है। इसने कभी भी किसी का भला नहीं किया। महिला ने पंचायत भवन में जुटी भीड की तरफ नजर दौडायी। आधे से ज्यादा उसके ग्राहक थे। कभी दिन में तो कभी रात में उसके यहां आ धमकते थे। कितनी पी जाते थे उन्हें भी पता नहीं होता था। उस महिला ने भरी पंचायत में ऐलानिया स्वर में अपना फैसला सुनाया कि वह अपना घर, पति और बच्चे तो छोड सकती है, लेकिन शराब नहीं। यही शराब ही उसकी जिन्दगी है। इसके बिना वह एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकती। पंचायत दंग रह गयी। एक अनपढ औरत से उन्हें ऐसे करारे जवाब की उम्मीद नहीं थी।
एक दूसरी तस्वीर भी है। गुजरात में कहने को तो शराब बंदी है, लेकिन असली सच पीने वाले ही जानते हैं। हर शहर, गांव और कस्बे में असली और नकली शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। आर्थिक नगरी सूरत में तो बाकायदा कई गलियां हैं जहां के घर मयखाने में तब्दील हो चुके हैं। यहां का विशालतम कपडा बाजार और डायमंड मार्केट देश ही नहीं दुनिया के लिए भी आकर्षिण केंद्र है। प्रतिदिन लाखों व्यापारियों का इस शहर में आना-जाना लगा रहता है। स्थानीय लोगों का हूजूम भी यह दर्शाता  है कि इस शहर में दम है। दमदार शहर में पीने वाले न हों...ऐसा कैसे हो सकता है! शराब से सजी-धजी गलियां सभी पीने वालों के स्वागत के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। किसी के लिए कोई बंदिश नहीं है। किसी भी ब्रांड की शराब, रम और बीयर चुटकी बजाते ही हाजिर हो जाती है। नमकीन से लेकर मांस-मटन और अंडों का भी इंतजाम हो जाता है। हर घर के सामने पीने वालों की भीड लगी रहती है। कुछ घरों के अंदर भी मेहमाननवाजी की जाती है। पुरुषों... बच्चों के साथ-साथ महिलाएं भी बडी तन्मयता के साथ साकी की भूमिका निभाती हैं। पियक्कडों को घरों में बैठकर पीने-पिलाने में जहां सुरक्षित होने का एहसास होता है, वहीं नयन सुख भी मिलता है। जिन-जिन घरों में महिलाएं शराब पिलाती हैं वहां पीने वालों की भीड यकीनन ज्यादा रहती है। पियक्कड जब नशे में चूर हो जाते हैं तो उन्हें संभालने का काम भी महिलाएं करती हैं। अधिकांश पुरुषों का बिना शराब पिये काम नहीं चलता। दूसरों को पिलाते-पिलाते वे भी हर दर्जे के नशेडी हो गये हैं। कुछ महिलाएं और युवतियां भी नशे में टुन्न रहती हैं। बच्चों को भी गिरते-पडते देखा जाता है। पुलिस आती है और अपनी मुट्ठी गर्म कर चली जाती है। नेताओं को भी उनका हिस्सा पहुंच जाता है। मय के नशे में सराबोर रहकर सतत आबाद रहने वाले मेले की खबर शासकों को न हो क्या यह संभव है? ऐसे में सोचिए और तय कीजिए कि इस कहानी का असली नायक कौन... और खलनायक कौन है?

Thursday, September 11, 2014

लानत है इन पर

मुख्यमंत्री पता नहीं कौनसी दुनिया में रहते हैं? होश में रहने वाला कोई भी जिम्मेदार नेता ऐसी बातें तो नहीं करता जैसी कि वे करते हैं। अपनी ही मस्ती में अपना राग अलापने वाले बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की सोच पर गुस्सा भी आता है और दया भी। कैसे-कैसे नालायकों को सत्ता हासिल हो जाती है। जनता इन्हें बडी उम्मीदों के साथ वोट देती हैं, लेकिन यह उसके हित का तो कोई काम नहीं कर पाते। ऊल-जलूल बकते हुए लोगों का मनोरंजन करते रह जाते हैं। यकीनन जीतनराम मांझी का सूझबूझ से कोई वास्ता ही नहीं है। हर समस्या का हल अपनी जेब में लिए फिरते हैं। मुंह खोलने में किंचित भी देरी नहीं लगाते। जिस बिहार प्रदेश के मुखिया हैं वहां की तरक्की कर पाना उनके बस की बात नहीं दिखती। इसलिए दलितों और शोषितों को बरबादी के पाठ जरूर पढाने लगे हैं। वे नहीं चाहते कि उनके प्रदेश के लोग होशो-हवास में रहें। उनके नक्कारेपन पर कोई उंगली न उठाए इसलिए बदहाल जनता को दारू में डूबकर तबाह होने की सीख देकर अपने हैरतअंगेज चरित्र के पन्ने खोलते चले जा रहे हैं। उनकी निष्क्रियता की हकीकत उजागर हो गयी है। उनमें जनता के हित में कुछ कर दिखाने का न तो दम है और न ही कोई इच्छा। बस टाइमपास करने में लगे हैं। लालू प्रसाद यादव की राह पर चलकर लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। वे जानबूझकर इस सच्चाई को नजरअंदाज कर रहे हैं कि शराब ने कितने घर उजाडे हैं और कितनों को बेमौत मारा है। पर लगता है कि वे भी उसी सुरा के गुलाम हैं जिसकी हिमायत करते हुए उन्होंने कहा है कि काम के बाद पावभर शराब पीकर सो जाने में कोई बुराई नहीं है। अपने कथन को जायज ठहराने के लिए यह बताना भी नहीं भूले कि असली संकट तो तब खडा होता है जब हमारे दलित भाई दिन-दहाडे बोतल चढाकर सडकों पर इधर-उधर घूमते और गिरते-पडते दिखायी देते हैं।
जिन दलितों के घरों में हफ्तों चूल्हे नहीं जलते और उन्हें खाली पेट सोना पडता है उनकी चिंता-फिक्र करने और उन्हें मेहनत करने की सीख देने की बजाय शराबी बनने के लिए प्रोत्साहित करने वाले मुख्यमंत्री को पत्रकारों ने जब यह बताया कि प्रदेश में इस कदर भुखमरी है कि हजारों लोग अन्न से वंचित हैं। उन्हें हफ्तों खाना नसीब नहीं हो पाता। ऐसे में उन्हें चूहे खाने को विवश होना पड रहा है, तो उन्होंने छाती तानकर कहा कि चूहे खाने में क्या बुराई है? चूहा खाना सेहत के लिए अच्छा है। मैंने भी कई बार चूहे के मांस का आनंद लूटा है। मदिरा के साथ चूहे के मांस खाओ और सभी गम भूल जाओ। वाकई नाटकीयता और बचकानेपन की यह हद है। अपने ही लोगों का भद्दा मजाक!
क्या कभी आपने किसी मुख्यमंत्री को कालाबाजारी और अवैध कारोबार करने वालों की पीठ थपथपाते देखा है? मांझी कहते हैं परिवार के सदस्यों के उदर निर्वाह के लिए लूटपाट और काले धंधे करने में कोई हर्ज नहीं है। जब मेहनत से काम न बने तो लूटमारी पर उतरने में कोई बुराई नहीं है। पापी पेट के लिए कुछ भी कर गुजरना अपराध नहीं, सदाचार है। यकीनन मांझी को पुरस्कृत किया जाना चाहिए। अभी तक तो हम यही पढते आये हैं कि चोरी और हेराफेरी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लूट, लूट होती है, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार होता है और अनाचार और व्याभिचार की और कोई और परिभाषा नहीं हो सकती। काले कारोबार को छोटा व्यापारी अंजाम दे या बडा... है तो अपराध ही। लेकिन बिहार के इस मुख्यमंत्री की विषैली सोच के क्या कहने! इस महाअजूबे मुख्यमंत्री के संस्कारित बेटे को जब एक होटल के कमरे में रंगरेलियां मनाते हुए दबोचा गया तो इनका बयान आया कि इसमें गलत क्या है? जवानी में तो यह सब आम है। मेरे बेटे ने थोडी मौजमस्ती क्या कर ली तो मीडिया ने तूफान खडा कर दिया। मेरा बेटा भी देश का आम नागरिक है। इस देश के हर नौजवान को अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मौजमस्ती की छूट है। यानी मुख्यमंत्री जी को अवैध रिश्तों पर भी कोई आपत्ति नहीं। है न गजब की बात। सोचिए यदि देश के हर प्रदेश का मुख्यमंत्री इन जैसी घटिया सोच वाला हो जाए तो क्या होगा? दरअसल देश के विशाल प्रदेश बिहार की यही बदनसीबी है कि उसे कोई ढंग का मुखिया ही नहीं मिलता। इसलिए यहां के लोगों को दूसरे प्रदेशों में जाकर रोजगार तलाशना पडता है और प्रताडना झेलनी पडती है। लानत है ऐसे सत्ताधीशों पर जिन्हें सत्ता तो चलानी नहीं आती, लेकिन उसे पाने के लिए पगलाये रहते हैं। जनता भी ऐसे बेवकूफों को पता नहीं क्यों अपना कीमती वोट देती है और सतत बेवकूफ बनती रहती है।

Saturday, September 6, 2014

क्या हुआ पापा?

महान देश के महान नेता महान बोलवचनों से लोगों का ज्ञानवर्धन करते रहते हैं। हाल ही में एक सत्ताखोर ने फरमाया कि जब तक दुनिया है तब तक बलात्कार होते ही रहेंगे। उनकी मानें तो हिन्दुस्तान की धरती का बलात्कारों से कभी भी नाता नहीं टूटने वाला। बडा अटूट रिश्ता है। जहां देखो, वहां बलात्कार। न रिश्तों की परवाह और ना ही उम्र की कोई लाज शर्म!
हरियाणा के शहर रोहतक में बदमाशों की छेडछाड से तंग आकर दो लडकियों को आत्महत्या करने को मजबूर होना पडा। अपनी अस्मत को बचाने के लिए मौत को गले लगाने की यह घटना बताती है कि हमारे यहां की पुलिस कितनी निकम्मी है। उसने अपनी साख ही खो दी है। महिलाओं का तो उस पर से भरोसा ही उठ चुका है। अगर ऐसी बात नहीं होती तो गुंडो की सतायी युवतियां पुलिस थाने पहुंचतीं और अपनी फरियाद सुनातीं। लेकिन उन्हें खाकी वर्दी के नकारेपन का पता था। ऐसे में आत्महत्या ही उन्हें आखिरी रास्ता नजर आया।
देश की राजधानी दिल्ली में एक वासनाखोर शिक्षक की हैवानियत ने इंसानियत और भरोसे की चूलें हिला कर रख दीं। मां-बाप ने अपनी लाडली बिटिया को ज्ञान अर्जन के लिए इस शिक्षक के पास ट्यूशन के लिए भेजा था। लेकिन ट्यूटर ने सातवीं कक्षा में पढने वाली छात्रा को कोर्स की किताबों का पाठ पढाने और सिखाने की बजाय कुछ और ही हरकतें करनी शुरू कर दीं। वह उसे अपने कम्प्यूटर पर पार्न फिल्में दिखाते हुए सेक्स का पाठ पढाने लगा। मौका पाते ही उसने बलात्कार कर अपनी मंशा पूरी कर ली। फिर तो इसका सिलसिला-सा चल पडा। कुकर्मी ट्यूटर दो साल तक बालिका को धमका-चमका कर बलात्कार करता रहा। लडकी पढाई में पिछडती चली गयी। बीते सप्ताह लडकी की मां ने मोबाइल फोन में ट्यूटर द्वारा भेजे गए अश्लील मैसेज पढे तो उसके पैरों तले की जमीन ही खिसक गयी। ट्यूटर के विश्वासघात और गंदी हरकत पर उसे गुस्सा भी आया और रोना भी। उसने पति को पूरी कहानी बतायी। पिता गुस्से में आग बबूला हो उठे। उन्होंने लडकी को डांटा-फटकारा। शर्म के मारे लडकी का चेहरा उतर गया। वह इस कदर भयभीत हो गयी कि उसने घर में रखा डिटॉल पीकर खुदकुशी करने की कोशिश की। उसे अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने किसी तरह से उसे बचा लिया।
पिछले वर्ष उत्तराखंड में आयी प्राकृतिक आपदा ने कितनी तबाही मचायी, कितनी जानें लीं और कितनों को अनाथ किया इसका पूरा लेखा-जोखा तो किसी के पास नहीं है। सरकारें तो कभी पूरा सच उजागर नहीं करतीं। इसी भीषण प्राकृतिक आपदा की शिकार हुई एक दस वर्षीय बच्ची अपने माता-पिता को खोने के बाद इधर-उधर भटक रही थी। उसे किसी ने सहारा नहीं दिया। बर्बादी और तबाही के बाद क्षेत्र में मचे हाहाकार के बीच सेना के एक फौजी ने उसे हेलीकॉप्टर में बैठाकर हरिद्वार पहुंचा दिया। जहां उसे एक महिला मिली। महिला उसे मेरठ ले गयी और जबरन कचरा बिनने के काम में झोंक दिया। बच्ची को यह काम रास नहीं आया तो वह फिर हरिद्वार जा पहुंची और भीख मांगने लगी। इसी दौरान एक उम्रदराज अय्याश ने उसे अपनी वासना का शिकार बना डाला। उसने यह भी नहीं सोचा कि यह अनाथ उसकी बिटिया जैसी है। वैसे गैरों को यह सीख देने से क्या फायदा...। अपने देश की धरती पर ऐसे नराधम भी हैं जो अपनी बेटियों की इज्जत को तार-तार करने से बाज नहीं आते। अपनी बहू-बेटियों से कुकर्म करने में उन्हें कोई शर्म नहीं आती। ऐसे दुश्चरित्र पिताओं की खबरें जब बाहर आती हैं तो न जाने कितने संवेदनशील भारतीयों कर कलेजा कांप जाता है। उनका बस चले तो वे ऐसे जानवरों को भरे चौराहे पर गोली से उडा दें। इस अनंत पीडा और तकलीफ का आखिर हल क्या है? ऐसी तमाम खबरें जब सूर्खियां पाती हैं तो दिमाग जैसे काम करना बंद कर देता है। ऐसे में यह लघुकथा दिमाग में कौंधने लगती है। इसकी लेखिका हैं... गायत्री शर्मा। उन्होंने इसे बंगलुरु में ६ साल की बच्ची के साथ स्कूल में हुए बलात्कार की घटना से दुखी, क्रोधित, शर्मसार और अपराधबोध से ग्रसित होने पर लिखा है :
"बच्ची से बलात्कार के एक केस में अदालत तारीख पर तारीख देती रही। हर तरफ शक, सवाल, संदेह, गुस्सा, हडबडी, हिकारत... इतने साफ और उलझे केस के फैसले में भी इतना समय? और अंतत: एक दिन भरी अदालत में सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश ने बेहद अजीब और खौफनाक हरकत करते हुए अपना फैसला सुनाया। पैन के तेजवार से अपनी दोनों आंखों को फोडते हुए जज साहब ने दर्द से भरी, लेकिन ऊंची आवाज में कहा...'मैं अदालत में दर्ज हुए इस केस और कहीं भी दर्ज ना हुए ऐसे तमाम केसों के सभी दोषियों को दृष्टिहीन होने और लिंग भंग की सजा सुनाता हूं।'
अदालत के अंतिम फैसले के बाद पता नहीं ऐसा क्या हुआ, कि वहां खडे लगभग सारे पुरुषों ने हडबडाते हुए एक हाथ अपनी आंखों पर और दूसरा बैल्ट के नीचले हिस्से पर रखा! ...और मासूम पीडिता ने अपने हडबडाए पिता को झिंझोड़कर पूछा... "क्या हुआ पापा???"

Thursday, August 28, 2014

मीडिया और मोदी मंत्र

इन दिनों मीडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खफा है। सभी को पता है कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में मीडिया का कितना बडा योगदान है। मीडिया ने यूपीए-२ के कार्यकाल के गडबड घोटालों का पर्दाफाश किया। मीडिया ही कई महीनों तक महंगाई, भ्रष्टाचार की खबरों की सुर्खियां बनाता रहा और जनता को बताता रहा कि अक्षम और भ्रष्ट कांग्रेस के चंगुल से अगर देश को नहीं निकाला गया तो देश पूरी तरह से गर्त में समा जाएगा। चाहे न्यूज चैनल हों, अखबार हों, सोशल मीडिया हो सभी ने नरेंद्र मोदी के पक्ष में जबरदस्त माहौल बनाया। लेकिन पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया को तो अपनी सफलता का श्रेय देते हैं, लेकिन अखबारों और न्यूज चैनलों से दूरी बनाकर जैसे उनका तिरस्कार करते दिखायी देते हैं। जो लोग मोदी को करीब से जानते हैं उनका कहना है कि गुजरात दंगों के बाद मीडिया के द्वारा जिस तरह से नरेंद्र मोदी को लगातार कटघरे में खडा किया गया उससे उनके दिल में मीडिया के प्रति खटास आ गयी। उन्होंने लगभग सभी न्यूज चैनलों और अखबार वालों से दूरी बनानी शुरू कर दी। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी इलेक्ट्रानिक मीडिया और प्रिंट मीडिया से मित्रता बनाये रखने में यकीन रखते थे। उस दौर में वे पत्रकारों के साथ बतियाते और चुटकलेबाजी करते देखे जाते थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनमें बदलाव आता चला गया। गुजरात दंगों के बाद जब उन्हें 'खलनायक' के तौर पर पेश किया जाने लगा तो उनकी सहनशीलता भी जवाब देने लगी। एक बार उन्होंने कहा था कि अखबारों में छपने वाली कैसी भी खबर हो, बीस मिनट बाद तो वह रद्दी में तब्दील हो जाती है। दरअसल मोदी की यही चाहत और नीति रही है कि मीडिया उन पर किसी भी हालत में हावी न होने पाए।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी अपने उसूल पर चल रहे हैं। आमतौर पर सभी प्रधानमंत्री किसी जाने-माने पत्रकार को अपना मीडिया सलाहकार बनाते हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी ने अभी तक किसी को मीडिया सलाहकार नियुक्त नहीं किया है। नरेंद्र मोदी परम्पराओं में यकीन नहीं रखते। इसीलिए ही उन्होंने विदेशी दौरों में पत्रकारों को साथ ले जाना बंद कर दिया है। इससे पत्रकारों के उस जमात को धक्का लगा है जो जोड-जुगाड कर प्रधानमंत्रियों के साथ विदेश यात्राएं करने की आदी रही है। कई अखबारों के संपादक और मालिक प्रधानमंत्रियों के दौरों की राह देखा करते थे, क्योंकि उन्हें मुफ्त में यात्राएं करने और मौजमस्ती का अवसर मिलता था। नरेंद्र मोदी की देखा-देखी मंत्री और सांसद भी मीडिया से कतराने लगे हैं। बताते हैं कि मंत्रियों और नौकरशाहों को यह कहा गया है कि वे मीडिया से तभी बात करें जब बहुत जरूरी हो। दरअसल नरेंद्र मोदी को सोशल मीडिया से ज्यादा लगाव है। लोकसभा चुनाव से पहले ही वे सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग कर लोगों से जुडते रहे हैं। उन्होंने मंत्रियों और पार्टी के सांसदों को निर्देश दे दिया है कि सरकारी योजनाओं और अन्य क्रियाकलापो की लोगों को जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से देने की अधिकतम कोशिश करें।
मीडिया मोदी पर यह आरोप लगाने से भी नहीं चूक रहा है कि चुनाव के दौरान तो उन्होंने मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया। साक्षात्कारों की झडी लगा दी जिनकी वजह से देशवासियों ने उन्हें जाना और समझा और उनके प्रधानमंत्री बनने के सपने को पूरा किया। लेकिन अपना काम निकल जाने के बाद मोदी का मीडिया से आंखें फेर लेना अचंभित करने वाली बात है। जाने-माने पत्रकार एच.के. दुआ कहते हैं कि सरकार और मीडिया एक दूसरे के बगैर नहीं रह सकते। सरकार, मीडिया की सूचना की भूख मिटाने का एकमात्र बडा माध्यम है तब सरकार के लिए भी उसकी महत्ता इसलिए है क्योंकि मीडिया के जरिए ही वह जनता तक पहुंचती है। भारत में अब तक इंदिरा गांधी को छोड दिया जाए तो लगभग सभी प्रधानमंत्रियों के मीडिया के साथ बहुत ही मधुर संबंध रहे हैं। उन्होंने आपातकाल के दौरान मीडिया पर सेंसरशिप लगा दिया गया था। हालांकि बाद में इंदिरा गांधी ने अपने संबंध मीडिया से सुधारने की कोशिश की। अटल बिहारी वाजपेयी समय-समय पर मीडिया के जरिए जनता से संवाद कायम करते थे। उन्होंने मीडिया का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया। हालांकि इसके बाद मनमोहन सिंह पर मीडिया से दूरी बनाने का जरूर आरोप लगा। मनमोहन सिंह ने बहुत कम बार प्रेस कांफ्रेंस की जिससे उनकी छवि मीडिया से मुंह छिपाने वाली बन गई थी। हमें यहां यह समझने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री का जनता के प्रति उत्तरदायित्व है। जब आप मीडिया से रूबरू होते हैं तो जनता तक आपकी बात पहुंचती है। देश के लिए नीतियां बनाने और गर्वर्नेंस में भी मीडिया काफी सहयोगी साबित होती है। जनता के मूड को पता करने के लिए मीडिया एक सशक्त साधन है। सरकार और मीडिया एक-दूसरे के साथी हैं। इस साथ और भरोसे के सतत बने रहने में ही देश की भलाई है। १५ अगस्त के दिन लाल किले पर दिये गये मोदी के भाषण ने आम जनता को आश्वस्त किया है कि वे देश का कायाकल्प करके ही दम लेंगे। उनका यह कहना है कि न तो मैं खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा... करोडों देशवासियों के दिल को छूने का काम कर गया। उनके इस कथन के बाद मंत्री, सांसद और नौकरशाह सतर्क हो गये हैं। फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। उनकी विदेश यात्राओं पर भी बंदिश लग गयी है। यानी मोदी का असर तो दिखायी देने लगा है।

Thursday, August 21, 2014

खोटे सिक्कों की अहमियत

भारतीय राजनीति के कुछ चेहरे ऐसे हैं जो बद और बदनाम होने के बावजूद अपना असर बनाये रखते हैं। उन्हें चाहने वालों की संख्या घटती-बढती रहती है, लेकिन फिर भी उनकी राजनीति का सूरज अस्त नहीं होता। लालूप्रसाद यादव को ही लें। इस शख्स ने कितनी जेल यात्राएं कीं मीडिया का निशाना बनता रहा, फिर भी उसे कभी शर्म नहीं आयी। अभी कुछ महीने पहले ही जब चारा घोटाला के मामले में लालू को जेल भेजा गया था तो यह अनुमान भी लगने लगे थे कि इनका अब जेल में ही स्थायी ठिकाना रहेगा। लेकिन शातिर राजनेता जेल से बाहर आने के रास्ते निकाल ही लेते हैं। फिर लालू जैसे चालू नेता की तो हर राजनीतिक पार्टी को जरूरत होती है। इनका किसी एक दल से तो कभी स्थायी जुडाव होता नहीं। 'जहां दम वहां हम' की नीति पर चलते हुए जनता को बेवकूफ बनाते रहते हैं और अपनी खिचडी पकाते रहते हैं। खैर जेल से बाहर आते ही लालू फिर ऐसे सक्रिय हो गये जैसे वे जेल नहीं, किसी तीर्थ यात्रा पर गये थे। लोकसभा चुनाव में भले ही लालू को करारी मात मिली हो, लेकिन उनके लटके-झटके कायम हैं। कम ही ऐसे नेता हैं जिनमें लालू जैसी बेशर्मी और नाटकीयता की भरमार हो। मतलबपरस्ती भी उनमें कूट-कूट कर भरी हुई है। कुर्सी के लिए मर मिटने तक का जज्बा है उनमें। सिद्धांतों से कभी उनका कोई नाता नहीं रहा। ऐसे लोगों के कारण ही इस कहावत को बल मिलता है कि राजनीति में कोई भी दुश्मनी स्थायी नहीं होती। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितिश कुमार से फिर लालू ने दोस्ती कर उपरोक्त कहावत को चरितार्थ कर ही दिया है। अब दोनों मिलकर सत्ता सुंदरी की बाहों में समाने को आतुर हैं। लेकिन उनका यह सपना आसानी से पूरा होने वाला नहीं।
लालू प्रसाद यादव की तरह ही अमर सिंह भी सत्ता के जबरदस्त भूखे हैं। वे किसी जमाने में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के दायें हाथ कहलाते थे। इस दायें हाथ ने समाजवादी का मुखौटा ओढकर अरबों-खरबों की अवैध माया जुटायी। भ्रष्टाचार और बेइमानी का ऐसा रिकार्ड बनाया कि जिसके सामने लालू प्रसाद भी बेहद बौने हैं। दरअसल अमर सिंह का भी राजनीति में आने का एक ही मकसद था, जैसे-तैसे माल कमाना और अपार धन का मालिक बन जाना। अपने इस मकसद में उन्होंने भरपूर कामयाबी पायी। उन्होंने उद्योगपति अनिल अंबानी से लेकर अमिताभ बच्चन तक के साथ करीबी रिश्ते बनाये। अमर सिंह रिश्ते बनाने में जितने माहिर हैं तोडने में भी उतने फुर्तीले हैं। अमिताभ बच्चन के तो भाई कहलाने लगे थे अमर सिंह। अमिताभ भी उन्हें अपना बडा भाई कहते नहीं थकते थे। लेकिन जो दोस्ती स्वार्थों पर टिकी होती हैं उसमें स्थायित्व होने का सवाल ही नहीं उठता। इन दिनों अमर सिंह न्यूज चैनलों पर अमिताभ और उनकी पत्नी को कोसते नजर आते हैं। वे जया बच्चन को तो हद दर्जे की मतलबी महिला घोषित कर चुके हैं। जया की वजह से ही मुलायम सिंह और उनकी दोस्ती में दरार पडने का भी रोना रोते रहते हैं। अमर सिंह के हिस्से में भी जेलयात्रा आयी थी। लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पडा। लालू अगर बेशर्म हैं तो अमर महा बेशर्म। ऐसे लोगों के कारण राजनीति को 'वेश्या' तक कहा जाता है और नेताओं पर गालियों की बौछार होती रहती है। जिस अमर सिंह को मुलायम सिंह ने अपनी पार्टी से बाहर कर दिया था उसी को उन्होंने पिछले दिनों हंसते-हंसते गले लगा लिया। समाजवादी पार्टी के ही कार्यक्रम में अमर सिंह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। यानी बिछडे यार फिर से एक हो सकते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि मुलायम सिंह अमर सिंह को पार्टी से निकालना ही नहीं चाहते थे। कमाऊ पूत हमेशा प्यारा होता है। अमर सिंह तो कमाऊ यार थे जो खुद भी खा रहे थे और मुलायम का भी घर भर रहे थे। लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि मजबूरन मुलायम सिंह को कडा निर्णय लेना पडा। अपने नेता से अलग होने के बाद अमर सिंह ने यहां-वहां काफी हाथ-पैर मारे, लेकिन मुंह की खानी पडी। अमर सिंह ने मुलायम सिंह की कमियों को उजागर करने का कोई भी मौका नहीं छोडा। जहां जाते वहीं मुलायम तथा उनके परिवार की बेवफाई की दास्तान के पन्ने खोल देते। पर अमर सिंह को किसी ने भी घास नहीं डाली। सभी दल और नेता जिस थाली में खाने, उसी में छेद करने की उनकी नीति से वाकिफ हैं। फिर भी नेताजी को अमर की कमी खलती रही। लोकसभा के चुनावों में हुई शर्मनाक हार ने मुलायम सिंह को अपनी गलती का अहसास करा दिया।
दरअसल, गलती अमर सिंह की भी थी। वे खुद को पार्टी से बडा मानने लगे थे। उन्हें लगता था कि उनके बिना नेताजी चार कदम भी नहीं चल पायेंगे। चार साल के अलगाव ने दोनों को एक-दूसरे की अहमियत का अहसास दिला दिया है। वैसे अमर सिंह जमीनी नेता तो कतई नहीं हैं। सत्ता के बदनाम दलालों में उनकी गिनती की जा सकती है। जोड-तोड में माहिर हैं। अपना काम निकालने के लिए किसी भी पार्टी के नेता, उद्योगपति, माफिया से दोस्ती गांठ सकते हैं। बिफरने और दंडवत होने की कला में उनका कोई सानी नहीं है।
मुलायम सिंह यादव को अपने लाडले अखिलेश सिंह यादव पर बडा नाज था। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने प्रदेशवासियों को इतना अधिक निराश किया है कि अब शायद ही वे दोबारा सत्ता पा सकें। प्रदेश की जनता तो विधानसभा के चुनावों का इंतजार कर रही है। वह बेटे और बाप को ऐसा करारा सबक सिखाना चाहती है कि जिसे वे उम्र भर न भूल पाएं। ऐसे में मुलायम को लगता है कि अमर सिंह ही उनके कोई काम आ सकते हैं। यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा कि  सत्ता का दलाल अमर सिंह मुलायम की बिगडी तकदीर संवारता है या फिर घिसी-पिटी लुटिया को पूरी तरह से डूबो कर रख देता है। वैसे इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि राजनीति के बाजार में खोटे सिक्कों की भी अहमियत बनी रहती हैं।

Thursday, August 14, 2014

ऐसे गूंगे और बहरे सांसद किस काम के?

हुक्मरानों की मेहरबानी से कैसे-कैसे लोग राज्यसभा में पहुंचा दिये जाते हैं। उनका राज्यसभा का सदस्य बनना और बनाया जाना प्रबुद्धजनों को बेहद चौंकाता है। राष्ट्रीय पुरस्कार देने में कौन सा मापदण्ड अपनाया जाता है, वो भी लोगों को समझ में नहीं आता। सैफ अली खान, जैसे हद दर्जे के लुच्चों को जब 'पद्मश्री' मिल जाती है तब माथा पीटने को जी चाहता है। सैफ अली खान फिल्म अभिनेता हैं। फिल्मी कलाकार के तौर पर उन्होंने ऐसा कोई परचम नहीं लहराया कि उन्हें इतना बडा पुरस्कार दे दिया जाता। इस देश में ऐसा ही चलता है। बडे-बडे शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, समाजसेवियों, साहित्यकारों कलाकारों और विद्वानों की पूछ नहीं होती और जोड-जुगाड में माहिर लोगों को हाथोंहाथ लिया जाता है। देश की आजादी का असली आनंद यही लोग उठा रहे हैं। फिल्म अभिनेत्री रेखा को राज्यसभा की सदस्यता दे दी गयी। क्यों दी गयी, इसका जवाब न दाता के पास है और न ही पाता के पास। रेखा ऐसी अभिनेत्री हैं जिनका विवादों में चोली-दामन का साथ रहा है। ऐसी ढेरो अभिनेत्रियां हुई हैं जिन्होंने रेखा से कई गुना अच्छा अभिनय कर दर्शकों को अपना मुरीद बनाया। लेकिन उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत करने लायक नहीं समझा गया। घोर विवादास्पद रेखा में कांग्रेस के महारथियों ने पता नहीं कौन से ऐसे गुण देखे कि वे उस पर मेहरबान हो गये। रेखा ने कितने घर उजाडे और कितनी शादियां कीं इसकी गिनती उसे भी याद नहीं होगी। भारतीय कानून को अपंग समझने वाली फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी शादीशुदा फिल्म अभिनेता धर्मेंद्र से शादी कर कितनी नारियों की आदर्श बनी होंगी और उन्होंने भी पता नहीं कितने बसे-बसाये घर उजाडे होंगे। ऐसी नारी को भाजपा ने पहले राज्यसभा की सदस्यता और अब मथुरा से सांसदी दिलवाकर भले ही चुनावी लाभ पाया हो, लेकिन युवा पीढी के लिए अच्छा आदर्श तो नहीं प्रस्तुत किया। घाट-घाट का पानी पी चुकी रेखा को कांग्रेस की मेहरबानी से सांसद बनाये जाने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि इतनी बडी उपलब्धि के लिए अच्छे चरित्र का होना कतई जरूरी नहीं है। कुख्यात और चरित्रहीन चेहरे भी लोकतंत्र के सभी बडे मंदिर में चहलकदमी करने के हकदार हो सकते हैं।
क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर चरित्र के मामले में यकीनन निष्कलंक हैं फिर भी उन्हे राज्यसभा का सांसद बनाना समझदार देशवासियों को रास नहीं आया। सचिन को 'भारतरत्न' देने पर किसी ने आपत्ति नहीं उठायी थी। वे इसके हकदार थे। लेकिन उनका सांसद बनाया जाना हैरतअंगेज और शर्मनाक खेल था, जो इस देश के साथ खेला गया। यह महान कार्य कांग्रेस ने तब किया जब उसका पतन काल था। कुछ कांग्रेसियों ने अपनी पार्टी की सुप्रीमों सोनिया गांधी को यह पाठ पढाया कि सचिन पर यह मेहरबानी करने के कई फायदे होंगे। युवा वर्ग तो पार्टी से जुडेगा ही, सचिन पार्टी के चुनाव प्रचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे। सोनिया गांधी ने हामी भरने में जरा भी देरी नहीं लगायी और रेखा के साथ-साथ सचिन का नाम भी राष्ट्रपति के पास राज्यसभा की सदस्यता हेतु नामांकन के लिए भिजवा दिया। दोनों महारथी राज्यसभा में पहुंच गए। कांग्रेस को उम्मीद थी यह दोनों सांसद लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के धुआंधार प्रचार अभियान में अपना करिश्मा दिखाएंगे। यानी उसके बडे काम आएंगे। पर इनके पास न तब समय था और न ही अब कोई समय है। यह तो शौकिया सांसद बने हैं। इन अहंकारियों को राज्यसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में अपनी कमतरी का अहसास होता है। यह तो खुद को सांसद से कहीं बहुत ऊंचा और महान समझते हैं। गौरतलब है कि संविधान निर्माताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों की १२ श्रेष्ठतम हस्तियों को राज्यसभा की सदस्यता के लिए मनोनीत करने की व्यवस्था की थी। लेकिन इस व्यवस्था में भी राजनीति हावी होती चली गयी। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चलायी जिसके चलते अपने-अपने क्षेत्र में पूरी तरह से काबिल और प्रतिष्ठित लोगों को राज्यसभा में पहुंचने का उतना अवसर मिल ही नहीं पाया, जितने के वे हकदार थे। रेखा और सचिन तेंदुलकर की राज्यसभा में लंबे समय से अनुपस्थिति के बाद हंगामा मचा और यह मांग भी की गयी कि इन दोनों को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर देश पर उपकार करना चाहिए। साथ ही सरकार चलाने वालों तक यह आवाज पहुंचाने की कोशिश की गयी कि इस देश में ऐसी प्रेरक हस्तियों की कमी नहीं है जो वाकई बेहतरीन राज्यसभा सांसद साबित हो सकते हैं। गूंगों और बहरों को राज्यसभा में भेजने से अंतत: देश का ही नुकसान  होगा।
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो और बाकी सबकुछ भूल जाओ। सोचिए जब राज्यसभा की सदस्यता के लिए ऐसे महारथियों को मनोनीत किया जाएगा जिनके कई और भी कामधंधे है तो वे राज्यसभा के प्रति कैसे समर्पित रह पाएंगे। उनका ध्यान तो अपने मूल कार्य पर केंद्रित रहेगा। सचिन ने भले ही क्रिकेट से संन्यास ले लिया हो, लेकिन उनके दीगर काम-धंधे बंद नहीं हुए हैं। उनका अधिकांश वक्त कमायी के चक्कर में बीत जाता है। रेखा की भी यही सच्चाई है। वे भी यदि कभी-कभार राज्यसभा में अपनी उपस्थिति दर्शाती हैं तो गूंगी गुडिया की तरह बैठी नजर आती हैं। दूसरे सांसद उनसे मिलने और बातचीत करने को लालायित रहते हैं। राज्यसभा में भेजे जाने वाले अभिनेता हों या खिलाड़ी उन्हें देखने को सभी आतुर रहते हैं। वे भी अपनी झलक ऐसे दिखाते हैं जैसे इस धरती के भगवान हों।
राजनीतिक पार्टियों को भी राज्यसभा में उन्हीं लोगों को राज्यसभा में भेजना चाहिए जो देश के प्रति समर्पित हों। ज्ञानवान हों। प्रतिभाशाली हों। अपने क्षेत्र की विशेषताओं और समस्याओं पर बातचीत कर सकें। उनमें मौलिक चिंतन-मनन की क्षमता हो। राज्यसभा के प्रति सम्मान की भावना हो। उनकी योग्यता और विचारों से दूसरे सदस्यों के साथ-साथ देशवासी भी प्रभावित और लाभान्वित हों। विजय माल्या जैसे दारू के धंधेबाजों, अखबारों के जुगाडू मालिकों और शोषक किस्म के उद्योगपतियों ने राज्यसभा में पहुंचकर देश को ही लूटा है। उनसे देश के भले की उम्मीद करना बेमानी है। आजादी की ६८वीं वर्षगांठ पर क्या इस गंभीर विषय पर भी शासक कोई ध्यान देंगे?

Thursday, August 7, 2014

बदल रहे हैं बलात्कार के मायने

अब खबरों और कहानियों में फर्क कर पाना मुश्किल हो गया है। कई बार तो खबरों की रोचकता कहानियों को भी मात दे देती है। पहले छोटी सी खबर आती है फिर वही खबर धीरे-धीरे एक बडी कहानी बन जाती है। कितनी खबरें तो ऐसी भी होती हैं जो फौरन आयी-गयी हो जाती हैं। लेकिन बलात्कार की खबरों का तो जलवा ही खास होता है। नामी-गिरामी लोगों के द्वारा किये जाने वाले बलात्कारों पर खूब शोर मचता है। बडे-बडे चिन्तक बलात्कार पर दिमाग खपाते हैं। कुछ जाने-पहचाने विद्वान न्यूज चैनलों पर धडाधड जुबान लडाते हैं। पर बलात्कार हैं कि खत्म होते ही नहीं। सतत चलते रहते हैं। कभी यहां, कभी वहां। १२५ करोड की जनसंख्या वाले देश में बलात्कार सभी खबरों पर भारी पडते हैं। इन खबरों को बडी चतुराई से छापा और दिखाया जाता है। यही वजह है कि यह लोगों के दिलो-दिमाग में जोंक की तरह चिपकी रहती हैं। कइयों को पीडिता और बलात्कारी का नाम भी कंठस्त हो जाता है। स्कूल-कालेजों में फिसड्डी रहने वाले लडके लडकियां भी इनसे खूब मनोरंजित होते हैं। पढने तो पढने, पढाने वाले भी इससे अछूते नहीं रहते। मुंबई की एक २५ वर्षीय खूबसूरत मॉडल ने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी पर बलात्कार का आरोप जड दिया। यह खबर पलक झपकते ही देशभर के अखबारों और न्यूज चैनलों पर ऐसे छा गयी जैसे कहीं बहुत बडा तूफान आया हो। यह खबर रोज आनेवाली बलात्कारों की खबरों से ज्यादा अलग नहीं थी। इसमें भी वही सबकुछ था जो आजकल अक्सर होने वाले यौन शोषण के किस्सों में होता है। मामला एक बडे पुलिस अधिकारी से जुडा था। वैसे भी मुंबई पुलिस का बलात्कारों से पुराना नाता रहा है। मुंबई को मायानगरी भी कहा जाता है। यहां की माया बडी निराली है। जिसे समझ पाना हर किसी के बस की बात नहीं है। यहां सपने देखने वालों की भीड बसती है। पर सभी के सपने पूरे नहीं हो पाते। इस खबर की नायिका भी एक स्वप्नजीवी मॉडल है। दोनों की पुरानी जान-पहचान थी। मेल-मुलाकातें होती रहती थीं। एक दूसरे को उपहारों का आदान-प्रदान भी होता रहता था। अधिकारी ने मॉडल को साडी के विज्ञापन वाली फिल्म में काम भी दिलवाया था। ऐसी मेहरबानियों और करिबियो के बावजूद एकाएक मॉडल ने यह धमाका किया कि पुलिस अफसर ने उसे मुंबई के पांच सितारा होटल में मिलने के लिए बुलाया और एक कमरे में ले जाकर बलात्कार कर डाला। इसके बाद भी मॉडल अधिकारी से मिलती-जुलती और यौन शोषण करवाती रही। लगभग सात महीने बाद मॉडल की नींद टूटी कि उसकी इज्जत लूटी जा चुकी है। वह कहीं की नहीं रही। उसने फौरन पुलिस स्टेशन पहुंच कर अधिकारी की कारगुजारी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। इस अनोखे बलात्कार पर तरह-तरह की बातें होती रहीं। पुलिस अधिकारी और मॉडल की कई आपत्तिजनक हालत की तस्वीरें सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि अधिकारी ने मॉडल से यौन संबंध बनाए। मोबाइल से भेजे गए मैसेज, विडियो क्लिप ने भी अधिकारी के वासना के दलदल में धंसे होने के पुख्ता सुबूत दे दिए। लेकिन एकाएक बलात्कार का बम फोडने वाली मॉडल को पाक-साफ मानने वालों ने अधिकारी को ही अकेला दोषी मानकर चिल्लाना शुरू कर दिया। यह तो अच्छा हुआ कि अचानक सच बाहर आ गया। उसी के वकील ने ही रहस्योद्घाटन कर दिया कि मॉडल ने रिएलिटी शो 'बिगबॉस' में पहुंचने के लिए ही यह सारा का सारा ड्रामा रचा। अधिकारी की किसी अन्य मॉडल से निकटता भी उसे खलने लगी थी।
चरम भोग के इस परम दौर में कई सच कभी भी उजागर नहीं हो पाते। उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश पर एक महिला जज ने यौन उत्पीडन का संगीन आरोप लगाकर गजब की सनसनी फैलायी। महिला जज के अनुसार न्यायाधीश उन्हें आइटम डांस करने को मजबूर करते थे। जब उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई तो उन्होंने और भी घटिया व्यवहार करना शुरू कर दिया। न्यायाधीश की मनचाही इच्छा को पूर्ण करने से इनकार करने पर उनका काफी उत्पीडन किया गया। उनका सुदूरवर्ती स्थान पर तबादला कर दिया गया। जिससे वे इतनी अधिक आहत हुर्इं कि अंतत: उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया।
कोलकाता की ४२ वर्षीय महिला की फेसबुक के माध्यम से वीरभूमि में रहने वाले एक ३३ वर्षीय युवक से दोस्ती हो गयी। युवक ने फेसबुक पर अपनी विभिन्न फोटो डाल रखीं थीं। सभी में वह स्मार्ट और खूबसूरत नजर आता था। महिला युवक पर लट्टु हो गयी। फेसबुक पर कुछ दिनों की चैट के बाद महिला ने अपने अनदेखे दोस्त को कोलकाता आने और जश्न मनाने का निमंत्रण दे दिया। उसने उसे पूरी तरह से आश्वस्त कर दिया कि उसका भरपूर स्वागत किया जाएगा। उसके मन की सभी इच्छाएं भी पूरी कर दी जाएंगी। युवक भी महिला से मिलने को उतावला था। निमंत्रण पाते ही वह महिला के घर जा पहुंचा। महिला उसे देखते ही घोर निराशा की चादर में लिपट कर रह गयी। उसे लगा जैसे किसी ने उसके साथ बहुत बडा धोखा किया हो। जिस युवक को वह अपना सबकुछ सौंपने के लायक समझ रही थी वह तो जैसे छल और धोखे का प्रतिरूप निकला। उसका मोटापा, नाटापन और बदसूरती महिला को इस कदर खली कि उसने उसे दुत्कार दिया। वासना के बुखार में तपता युवक येन-केन-प्रकारेण उससे शारीरिक संबंध बनाने की जिद पर अड गया। जब उसकी मंशा पूरी नहीं हुई तो उसने उसकी चाकू मार कर हत्या कर दी। इस खबर को पढने के बाद मैं बहुत देर तक सोचता रहा। मेरे मन में यह विचार आया कि यदि कहीं युवक फेसबुक की फोटो की तरह ही हट्टा-कट्टा और खूबसूरत होता तो महिला उसके साथ रंगरेलियां मनाने में देरी नहीं लगाती। अपनी वासना की भूख को मिटाने के लिए लंबा सफर तय कर कोलकाता पहुंचे आशिक की सभी मुरादें पूरी हो जातीं। लेकिन इस अवैध रिश्ते का अन्तत: तो वही हश्र होता जो अभी तक होता आया है। देह की भूख के लिए कत्ल कर देने से बडी कोई दरिंदगी नहीं हो सकती। ऐसे दिल को दहला कर रख देने वाले मंजर देख और सुनकर घबराहट होने लगती है। दिल बैठ जाता है। ऐसे में न प्यार की परिभाषा समझ में आती है और न ही व्याभिचार और बलात्कार की। सबकुछ जैसे गडमड हो गया है...।