Thursday, January 15, 2015

उनकी गुंडागर्दी और नेताओं की चुप्पी

यह नया जमाना है। नयी सोच और नये लोगों का दौर। फिर भी कुछ लोग बदलने को तैयार नहीं। उनका दंभ उन्हें दकियानूसी सोच से बाहर नहीं आने देता। महात्मा गांधी छुआछूत के खात्मे के लिए जीवनभर लडते रहे। आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इस रोग का अंत नहीं हो पाया। आज भी छुआछूत और भेदभाव का विषैला दंश दलितों और शोषितों को लहुलूहान करने और अपमानित करने के मौके तलाश ही लेता है। कर्नाटक का एक छोटा-सा गांव है मारकुंबी। इस गांव में सवर्णों का वर्चस्व है, जो यह मानते हैं कि दलितों और गरीबों को इस दुनिया में सम्मान के साथ जीने का कोई हक नहीं है। कोई दलित यदि पढ-लिख लेता है और ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है तो इनके सीने में सांप लौट जाता है। मारकुंबी गांव में एक नाई की दुकान है जहां बिना किसी भेदभाव के सभी की दाढी और बाल काटे जाते थे। लेकिन एक दिन अचानक नाई ने दलितों के बाल काटने से मना कर दिया। दलितों के विरोध जताने पर नाई ने अपनी पीडा और परेशानी बतायी कि सवर्णों की चेतावनी के समक्ष वह बेबस है। उससे स्पष्ट कह दिया गया है कि वह दलितों को अपनी दुकान की चौखट पर पैर भी न रखने दे। यदि उनकी बात नहीं मानी गयी तो उसकी खैर नहीं। ऐसे में तनातनी तो बढनी ही थी। दलितों के बढते आक्रोश को देख सवर्ण तिलमिला उठे। इनकी इतनी जुर्रत कि हमारे सामने सिर उठाएं। चींटी की हाथी के सामने क्या औकात। दलित और सवर्ण आमने-सामने डट गए। मारापीटी की नौबत आयी। आपसी संघर्ष में २७ लोग घायल हो गए। दलितों के तीन मकान राख कर दिये गये। दरअसल देश के कई ग्रामीण इलाके ऐसे हैं जहां सवर्णों और धनवानों की तूती बोलती है। उन्हीं का शासन चलता है। उनके अहंकार की कोई सीमा नहीं है। उनकी मनमानी दलितों पर मनमाना कहर बरपाती है। उन्हें कानून का भी कोई खौफ नहीं। उनके लिए यह २१ वीं सदी नहीं, सोलहवीं सदी है। वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। उन्हें लगता है कि यह देश सिर्फ उन्हीं का है। सत्ता भी उनकी, शासक भी उनके। शासन प्रशासन भी उनका।
कर्नाटक के बेल्लारी जिले के तलुर गांव में भी मारकुंबी की तरह सवर्णों ने तांडव मचाया। यहां भी सवर्णों के दादागिरी से खौफ खाकर नाईयों ने दलितों के बाल काटने से इंकार कर दिया। यहां भी आपस में जूते और डंडे चले। जमकर हाथापाई हुई। नाईयों के द्वारा दलितों के बाल काटने में असमर्थता जताने में पंचायत के उस आतंकी फरमान का बहुत बडा योगदान है जिसमें साफ-साफ कहा गया कि किसी भी हालत में दलितों के बाल न काटे जाएं। जिस कुर्सी पर बाल कटवाने तथा दाढी बनवाने के लिए सवर्ण बैठते हैं और आइने में खुद को निहारते हैं उस पर दलितों की परछाई भी नहीं पडनी चाहिए। इस ऐलान के विरोध में पांच दिनों तक गांव के पांचों सैलून बंद रहे। सैलून मालिक भी इस भेदभाव की नीति के खिलाफ हैं। उन्हें तो सवर्ण और दलित में कोई फर्क दिखायी नहीं देता। फिर भी उन्हें ऊंचे लोगों का खौफ सताता है। सवर्ण उन्हें धमकाते हैं कि यदि उन्होंने दलितों के बाल काटे तो वे उनकी दुकान पर कदम नहीं रखेंगे। सैलून चलाने वालों के भी बाल-बच्चे हैं। उन्हें भी अपना परिवार चलाना है। गांव में सवर्णों की संख्या तीन हजार से अधिक है। दलितों की जनसंख्या का आंकडा अस्सी-नब्बे के आसपास है। सवर्ण अगर खफा हो गये तो उनके घरो का चूल्हा जलना मुश्किल हो जायेगा। कुछ अन्य गांवों में भी दलितों को इसी तरह से आहत करने और नीचा दिखाने की मर्दानगी दिखायी जा रही है। धारवाड जिले के हुबली तहसील के गांव कोलीवाड के दलितों को बाल कटवाने के लिए मीलों दूर हुबली जाना पडता है। बुजुर्ग शांत हैं, लेकिन दलित युवकों का गुस्सा उफान पर है। पता नहीं वे क्या कर गुजरें। उनका कहना है कि हम इस जुल्म को सहन नहीं कर सकते। हमें कमजोर कतई नहीं समझा जाए। हम भी इसी देश के नागरीक हैं। इस पर जितना हक उनका है, उतना हमारा भी। ऐसे में भेदभाव करने वालों के दबाव में हम क्यों आएं। हम चुप नहीं रहेंगे। उम्रदराज लोग तो गांव से दूर जाकर बाल कटवा सकते हैं, लेकिन बच्चे कहां जाएं? सदियों से सबलों की चलती आयी है। ताकतवर धनवानों ने निर्बलों-गरीबों का गला काटा है। सामंती सोच रखने वालों ने दलितों के शोषण के लिए नये-नये तरीके ईजाद कर रखे हैं। यह आज़ादी का मजाक नहीं तो क्या है?
हैरानी की बात यह भी है कि अभी तक किसी वजनी नेता ने सवर्णों की इस गुंडागर्दी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं की है। सभी के मुंह पर ताले जडे हैं। जैसे बोलना ही भूल गये हों। नेताओं की जन्मजात चालाकी भी किसी से छिपी नहीं है। बहुत नाप-तौल कर अपने कदम आगे बढाते हैं। मौके के हिसाब से उनकी जुबान चलती है। यहां दलित कम हैं और सवर्ण ज्यादा। कौन बेवकूफ होगा जो ज्यादा को छोड कम की तरफ हाथ बढायेगा? राजनीति का मतलब ही पाना और सिर्फ पाना है। जो खोने की भूल करते हैं उनका राजनीतिक वजूद ही मिट जाता है। राजनेता कभी भी घाटे का सौदा नहीं करते। ऊंच-नीच और जात-पात का राग अलापते रहना भी इन सौदागरों का पसंदीदा खेल है। इसी की बदौलत इनकी राजनीति चलती है और वे विधायक, सांसद और मंत्री बनते चले जाते हैं। स्कूलों में दलितों के हाथों बनाया गया खाने से इंकार कर दिया जाता है। मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता। देवी देवताओं पर अपना एकाधिकार जताया जाता है। भेदभाव और छुआछूत के रोग से केवल हिंदु ही ग्रस्त नहीं हैं। मुस्लिम, सिख और ईसाई भी कहीं न कहीं इस दलदल में धंसे हैं।

Thursday, January 8, 2015

हाथी के दांत

डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसान को विज्ञापनबाजी का जबरदस्त शौक है। देश की महंगी पत्रिकाओं में उनके ज्ञान ऊँडेलने वाले दो-दो पेज के विज्ञापन छपते रहते हैं। इसके लिए वे लाखों की कीमत चुकाते हैं। वे देश के पहले बाबा हैं जो उद्योगपतियों और व्यापारियों की तरह मीडिया को खुश करने के लिए मोटी खैरात बांटते हैं। कई राजनेता और सत्ता के दलाल भी अपनी बदरंग छवि को चमकाने के लिए मीडिया को इसी तरह से अपना बनाते हैं। योगगुरु बाबा रामदेव के आश्रम और कारखानों में बनने वाले विभिन्न सामानों के विज्ञापन भी इन दिनों टीवी चैनलों पर छाने में किसी से पीछे नहीं हैं। रामदेव पहले विज्ञापनबाजी से दूर रहते थे, लेकिन जब से उन्होंने तथाकथित समाजसेवा का चोला ओढा और राजनीति की अलख जगायी तभी से उनकी समझ में आ गया कि यदि वाह-वाही लूटनी है और अपनी दुकानदारी को आबाद रखना है तो मीडिया की झोली सतत भरनी ही होगी। खास कर इलेक्ट्रानिक मीडिया की। इसकी इलेक्ट्रॉनिक आंखें ऐसे सौदागरों पर टिकी रहती हैं जो करते कुछ हैं और दिखते-दिखाते कुछ हैं। आसाराम ने इनसे अक्सर दूरी बनाये रखी। वैसे धंधेबाजी में उनका कोई सानी नहीं था।  उनके कारखानों में च्यवनप्राश, चाय, चूर्ण, आडियो-वीडियो, कैसेट से लेकर यौनवद्र्धक दवाइयों के साथ पता नहीं क्या-क्या बनता था। उन्होंने तो पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन भी प्रारंभ कर दिया था। मासिक पत्रिका ऋषि प्रसाद के कुछ अंक इस लेखक ने देखे और पढे। इस पत्रिका में उनका गुण-गान कुछ इस तरह से गाया जाता था जिससे लगता था कि आसाराम तो इस धरती के सर्वशक्तिमान भगवान हैं। इस पत्रिका के बारे में यह भी प्रचारित था कि देश-विदेश में इसके दस लाख से अधिक स्थायी सदस्य हैं। व्यक्ति विशेष की स्तुती गाने तथा अंधविश्वास फैलाने वाली पत्रिका के साथ इतने अधिक लोगों का जुडा होना विस्मयकारी तो लगता ही है, साथ ही यह भी पता चलता है कि आसाराम को प्रचार की कितनी भूख थी। एक सच यह भी था कि आसाराम जानते थे कि देश के मीडिया ने उनकी असलियत जाननी-समझनी शुरु कर दी है। इसलिए उन्होंने खुद की पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करनी शुरू कर दीं। आसाराम ने अपने बनाये सामानों को बेचने के लिए कभी भी न्यूज चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं का सहारा नहीं लिया। यह सारा काम उन्हीं की पत्रिकाओं के माध्यम से होता था। वे देशभर में होने वाले अपने प्रवचन-कार्यक्रर्मों में ही अपना सारा प्रचार करते थे। उनके आदमी स्टॉल लगाते थे और अनुयायियों को आसाराम निर्मित  दवाइयां और तरह-तरह के सामान बेचने के लिए जाल फेंकते थे। प्रवचनों के साथ-साथ आसाराम का यह धंधा भी खूब चला। उनके अनुयायियों ने उन्हें मालामाल कर दिया। अपने अंधभक्तों की बदौलत आकाशी ऊंचाइयां छूने वाले आसाराम की पत्रकारों से कभी नहीं पटी। पत्रकार उनकी पोल खोलकर रख देते थे और उनके चेले-चपाटे मारा-मारी पर उतर आते थे। आसाराम के द्वारा भी न्यूज चैनलों और अखबार के पत्रकारों और संपादकों को धमकाने का सिलसिला चलता रहता था।
बाबा राम रहीम पर एक पत्रकार की हत्या का संगीन आरोप है। इस बाबा पर चार सौ लोगों को नपुंसक बनाने का मामला भी अदालत में पहुंच चुका है। महिलाओं के यौन शोषण के साथ-साथ पुरुषों को नपुसंक बनाने का अजब कारनामा पहले कभी सुनने में नहीं आया। यह भी पहली बार हुआ है जब विवादों में घिरे किसी बाबा ने एक ऐसी फिल्म बनायी है जिसमें वह खुद ही नायक है। प्रचार प्रेमी गुरु की फिल्म का नाम है 'मैसेंजर ऑफ गॉड।' करोडों रुपये खर्च कर बनायी गयी इस फिल्म में बाबा ने खुद को ऐसा महानायक दर्शाया है जो किसी भी मुश्किल का हंसते-हंसते सामना कर तालियां पाता है। वह तिरंगा लेकर दुश्मनों से लडता है। कभी हेलिकॉप्टर से उतरने-कूदने के करतब दिखाता है तो कभी बर्फ की सिल्लियों का सीना चीर कर बाहर आता है। किसी गीत के मुखडे की तरह यह आवाज भी गूंजती रहती है : 'अगर देश व सृष्टि की सेवा करना पाप है तो मैं यह पाप आखिरी सांस तक करता रहूंगा।' यानी बाबा तो देश की सेवा करते चले आ रहे हैं। और लोग हैं कि उनकी अनदेखी कर रहे हैं। दुश्मनों की साजिशों के चलते उन्हें अदालतों के चक्कर काटने पड रहे हैं। फिल्म के संवादों के जरिए उन्होंने दुश्मनों को ललकारने की पुरजोर कोशिश भी की है : "मजाक नहीं है गुरुजी को मारना। उनको मारने का मतलब है पूरे देश से पंगा लेना।" गुरमीत सिंह यह भी दर्शाना चाहते हैं कि मैं अकेला नहीं हूं। मेरे साथ करोडों भक्तों की भीड है। यह भीड मेरी रक्षाकवच है। इसलिए मेरे शत्रु सावधान हो जाएं। यह फिल्म आम लोगों को कितना प्रभावित करती है यह तो वक्त बतायेगा। लेकिन यह तय है कि इस फिल्म को देखने के लिए उनके कट्टर भक्त तो टूट ही पडेंगे। बाबा का भी तो यही मकसद है। अपने समर्थकों और अनुयायियों को अपने साथ जोडे रखना और आस्था को बनाये और टिकाये रखना। बाबाओं यह खेल कभी बंद होने वाला नहीं है। ऐसे में हमें यह कहावत याद आती है : 'हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और।' आपका क्या विचार है?

Thursday, January 1, 2015

यही होता चला आ रहा है

जब आप किसी से लेते हैं तो देने से बच नहीं सकते। दाता और पाता का रिश्ता होता ही कुछ ऐसा है। इस हाथ दे, उस हाथ ले। ऊंचे लोगों के बीच लेन-देन चलता ही रहता है। इन धुरंधरों में शामिल हैं राजनेता, उद्योगपति, माफिया, साधु-संत, अखबारीलाल और किस्म-किस्म के दलाल और सत्ता के खिलाडी। इतिहास गवाह है कि इस देश में जितनी तेजी से राजनेताओं, तथाकथित समाज सेवकों और उनकी शातिर जमात ने आर्थिक तरक्की की है उतनी और किसी ने नहीं। इनका आपसी मायावी गठजोड भी स्पष्ट नजर आता है। ऐसे राजनेता बहुत कम हैं, जिन्होंने गुंडे, बदमाश न पाल रखे हों। रेत माफिया, कोल माफिया, दारू माफिया और तमाम तरह के आराजक तत्व इनके यहां पनाह पाते हैं और वक्त पडने पर एक-दूसरे के काम आते हैं। तथाकथित साधु-संतों, प्रवचनकारों और चिटफंडियों से भी इनकी करीबी कई गुल खिलाती है। पिछले कुछ वर्षों से सत्ताधीशों के द्वारा मीडिया के दिग्गजों का दुलारने और पुचकारने का चलन भी बढा है। पिछले डेढ साल से जेल के सीखचों के पीछे अपने दुष्कर्मों का फल भुगतते स्वयंभू संत आसाराम को यदि राजनेताओं की शह नहीं मिलती तो वह इस कदर बेखौफ होकर अबलाओं की इज्जत पर डाका नहीं डाल पाता। यह क्या किसी चमत्कार से कम है कि चंद वर्षों में उसने देश के दस से ज्यादा प्रदेशों में हजारों एकड जमीन जुटा और दबा ली। सरकारों ने भी उसे मुफ्त में जमीनें देकर अपनी दरियादिली दिखायी। यह वही सरकारें हैं जिनकी निगाहें सडकों और फुटपाथों पर जिन्दगी बसर करने वाले गरीबों पर नहीं जातीं। अमीरों की इमारतों के लिए उनकी झोपडियां जमींदोज कर दी जाती हैं। उनकी फरियाद सुनने वाला भी कोई नहीं होता। शातिरों और ढोंगियों का इशारे में काम हो जाता हैं। उनके कर्मकांड उजागर होने के बाद भी पर्दा डालने की भरपूर कोशिशें की जाती हैं। आसाराम एक ही दिन में तो नहीं पनपा। अपने देश में अंधभक्ति किसी को भी भगवान बना देती है। तथाकथित देवता की हैवानियत दिखकर भी नहीं दिखती। आसाराम को बडा घमंड था कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड सकता। बडे-बडे राजनेता उसके मंचों पर विराजमान होकर उसके नाम की आरती गाते थे। शासन और प्रशासन उसकी नकली संतई के समक्ष नतमस्तक होने के कारण गूंगा और बहरा बना रहा। आसाराम आश्रमों के नाम पर भव्य भवन बनाता चला गया। इन विशाल भवनों में होने वाले कुकर्मों को अनदेखा किया गया। प्रवचन कम और दुष्कर्म ज्यादा होते रहे। नारियों की अस्मत लुटती रही। अनुयायियों ने भी देखकर अनदेखा कर दिया। देहभोगी पिता-पुत्र पंद्रह हजार करोड रुपये से अधिक की दौलत के मालिक बन गए। जेल में भी आसाराम की अकड नहीं गयी। अपनी बेटी-पोती की उम्र की बच्चियों का यौन शोषण करने में ढोंगी नहीं लज्जाया, उसके चेले भी लज्जाहीन हो गए। उनके लिए आसाराम कल भी भगवान था, आज भी महान है।
देश के लाखों लोगों के खून-पसीने की कमायी को पचाने वाले सहारा प्रमुख सुब्रत राय का हश्र भी आसाराम जैसा होगा ऐसी तो कभी किसी ने सोचा ही नहीं था। हालाकि दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन तौर-तरीकों में गजब की समानता है। १९७८ में मात्र दो हजार रुपये से चिटफंड आदि का धंधा करने वाले सुब्रत राय ने सबसे पहले उन मेहनतकशों को अपने जाल में फांसा जिनकी दिनभर की कमायी पच्चीस-पचास रुपये के आसपास थी। सुब्रत राय ने उन्हें बडे-बडे सपने दिखाये और देखते ही देखते चौंकाने वाली तरक्की का इतिहास रच दिया। चतुर सुब्रत राय ने भी राजनेताओं और सत्ताधीशों से नजदीकियां बनायीं और ऐसी छलांगें मारीं कि एक लाख करोड से भी ऊपर का साम्राज्य खडा कर आर्थिक जगत के जानकारों को विस्मय में डाल दिया। देश-विदेश में पांच और सात सितारा होटलों की कतार लगाने वाले इस जादूगर ने अखबारों के प्रकाशन के साथ ही टीवी चैनल भी खडे कर लिए। यानी वह मीडिया का बादशाह बन गया। उसके संदिग्ध कारोबार में राजनेताओं और फिल्मी कलाकारों के काले धन के लगने का भी खूब शोर मचा। समाजवादी मुलायम सिंह और सत्ता के दलाल अमर सिंह जैसे अनेक चेहरे उसकी रंगीन महफिलों की शोभा बढाते रहे। इससे सुब्रत का मनोबल बढता चला गया। सुब्रत ने भी आसाराम की तरह भोग-विलास में डूबने का ऐसा कीर्तिमान रचा कि आखिरकार उसकी पोल खुल ही गयी। सुब्रत के पास क्या नहीं था। कमी थी तो बस ईमानदारी की। उसके हवाई जहाज नेताओं और फिल्मवालों की सेवा में ऐसा लगे रहते थे जैसे दैनिक भास्कर ग्रुप के विमान छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और उनके परिवार की चाकरी में लगे रहते हैं। मीडिया की आड में कोयले की खदाने हथियाने, धडाधड करोडों के सरकारी विज्ञापन पाने और अपने उद्योग धंधों को चमकाने की कला तो इन्हीं कलाकारों से सीखी जा सकती है। वैसे इनका अनुसरण करने वाले और भी कई चेहरे हैं। यह सभी लोग आसाराम और सुब्रत राय के जीवंत प्रतिरूप हैं। राजनेताओं, नौकरशाहों और मंत्रियों-संत्रियों के चरण चूमो-चाटो और अपने स्वार्थ साधते रहो। नरेंद्र मोदी से लेकर नितिन गडकरी तक लगभग सभी राजनेताओं का प्रायवेट विमान मालिकों से जबरदस्त याराना है। चुनाव के समय इनकी सेवाएं ली जाती हैं और चुनाव जीतने के बाद सरकारी जमीनें, ठेके, दारू की फैक्ट्रियां, मेडिकल कॉलेज आदि-आदि की खैरात देकर पाता का फर्ज़ निभाया जाता है। मनचाही यात्राएं होती रहती हैं। आदान-प्रदान चलता रहता है। आसाराम और सुब्रत राय जैसों के नये-नये अवतार पनपते रहते हैं। मीडिया शोर मचाता रहता है और साल-दर-साल बीत जाते हैं।

Thursday, December 25, 2014

दिलों में बसता है हिन्दुस्तान

सन्नाटा जब चीखता है तो बहरों के कान भी कांपने लगते हैं। आज देश में कुछ ऐसे ही हालात हैं। लोग देख भी रहे हैं और चिंतन-मनन भी कर रहे हैं। चुप्पी भी ऐसी है कि कभी भी तीखे शोर में तब्दील हो जाए। धर्मान्तरण और घर वापसी को लेकर जो बवाल मचा है वह कहीं तूफान में न बदल जाए इसका भी भय सताने लगा है। सवाल यह भी उठने लगे हैं कि असल में देश में किसकी सत्ता है? भाजपा के नरेंद्र मोदी की या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उन तमाम हिन्दू संगठनों की जो धर्मान्तरण को लेकर एकाएक ऐसे सक्रिय हो गये हैं जैसे उन्हें इन्हीं दिनों का ही बेसब्री से इंतजार था। ऐसे में याद आते हैं वो दिन जब नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान देश के सर्वांगीण विकास के आश्वासन देते नहीं थकते थे। मतदाताओं को लुभाने के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया। भ्रष्टाचार को जड से खात्मा करने का उनका गगन भेदी नारा था और विदेशों में जमा काला धन १०० दिनों में वापस लाने का उनका अभूतपूर्व वायदा था। रिश्वतखोरी, महंगाई, बेरोजगारी, हिंसा और नारियों पर होने वाले अत्याचारों की पूरी तरह से खात्मे की तो जैसे उन्होंने कसम खायी थी। ऐसे में देशवासियों ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा करने में कहीं कोई कमी और कंजूसी नहीं की। उन्हें देश की सत्ता सौंप दी। उन्हें लगा कि कोई फरिश्ता ज़मीन पर उतरा है जो उन्हें उनके तमाम कष्टों से मुक्ति दिला देगा। वैसे इस धरती पर पहले भी कई फरिश्ते आते रहे हैं और तथाकथित जादू की खोखली छडी घुमाते रहे हैं। लेकिन मोदी के अनूठे अंदाज ने लोगों को फिर से एक बार यकीन करने को मजबूर कर दिया। लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद धीरे-धीरे मौनी-मुद्रा अपनानी शुरू कर दी। लोगों को लगा यह तो कुर्सी का तकाजा है। शालीनता का जामा ओढना ही पडता है। चुप्पी साधनी ही पडती है। पर सब्र की भी हद होती है। तभी तो कई संशय और सवाल उठने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि खेल और खिलाडियों को नरेंद्र मोदी की अंदर ही अंदर रजामंदी हासिल है। जहां समस्याओं का अंबार लगा हो। लोगों का जीना मुहाल हो। आतंकी फिर सिर उठा रहे हों... वहां गडे मुर्दे उखाडने की कोशिशों पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा रहा! देश में जिस तरह का धार्मिक और राजनीतिक बवाल मचा है उससे यह चिंता भी होने लगी है कि कहीं नरेंद्र मोदी का पूरा का पूरा कार्यकाल हंगामों में ही तो नहीं बीत जाने वाला। देशवासी फिर एक नये धोखे के शिकार होकर हाथ मलते तो नहीं रह जाएेंगे?
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक हिन्दू सम्मेलन में ऐलानिया स्वर में कहा कि जवानों की जवानी जाने से पहले हिन्दू राष्ट्र बना दिया जाएगा। हम एक मजबूत हिन्दू समाज बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जो भटक गए हैं, उन्हें फिर से अपने घर वापस लाना है। उन बेचारों का कोई दोष नहीं था। उनका तो जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया था। उत्तरप्रदेश में आगरा का धर्मान्तरण का मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि टुडला के नगला क्षेत्र में २० हिन्दू महिलाओं के धर्मान्तरण का हल्ला मच गया। इन महिलाओं को एक लाख रुपये का लालच देकर ईसाई बनाया गया। वैसे आगरा में जिन मुसलमानों को हिन्दू बनाया गया उन्होंने भी स्वीकारा कि उन्हें आधारकार्ड, राशनकार्ड दिलाने का झांसा देकर धर्म परिवर्तन करवाया गया। आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनिरियो के द्वारा धर्मांतरण का खेल वर्षों से चल रहा है। दरअसल, देश के आजाद होने के बाद से ही ईसाई मिशनरियां हिन्दुओं के धर्मान्तरण के लिए लगातार सक्रिय होती गयीं। आदिवासियों को विभिन्न प्रलोभन देकर ईसाई बनाने का ऐसा कुचक्र चलाया गया कि सरकारें भी मूकदर्शक बनकर रह गयीं। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड और ओडिसा में आज भी विभिन्न ईसाई मिशनरियां हिन्दूओं के धर्म परिवर्तन में लगी हैं। कांग्रेस के शासन काल में तो उन पर अंकुश लगाने की सोची ही नहीं गयी। वैसे भी देश पर सबसे ज्यादा समय तक शासन कांग्रेस ने किया है। उसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी तो पनपे, लेकिन आम जनता का कोई भला नहीं हो पाया। आदिवासियों की तो पूरी तरह से अनदेखी ही गयी। जहां पेट भरने के लिए अन्न का दाना नसीब न होता हो वहां धर्म के क्या मायने रह जाते हैं? ऐसे हालात में ईसाई मिशनरियों को भी ज्यादा कसरत नहीं करनी पडी।
कांग्रेस तो आदिवासियों और तमाम गरीबों के साथ छल करती रही और हिन्दू... ईसाई और मुसलमान बनने को मजबूर होते रहे, लेकिन मोदी सरकार क्या कर रही है? उनकी पार्टी से जुडे संगठन बिना कोई आगा-पीछे सोचे फौरन धर्मान्तरण और घर वापसी के काम में लग गये हैं। होना तो यह चाहिए था कि सबसे पहले गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा के अंधेरे को दूर करने में अपनी पूरी ताकत लगा दी जाती। इतिहास गवाह है कि निर्धनों, शोषितों और अशिक्षितों का धर्म परिवर्तन करवाना बहुत आसान होता है। इसलिए सबसे पहले तो असली समस्याओं की तह तक जाकर उनका निवारण होना जरूरी है। वैसे भी हमारे संविधान ने हर भारतीय नागरिक को अपनी पसंद के धर्म में रहने और अपनाने की आजादी दी है। जिस धर्म में भेदभाव के हालात और तरह-तरह की बंदिशें न हों और सर्वत्र खुशहाली का आलम हो तो उसे भला कौन छोडना चाहेगा? अपना घर हर किसी को अच्छा लगता है, बशर्ते उस घर में घर-सा सुकून और सुविधाएं भी तो होनी चाहिए। बिना छत और टूटी-फूटी दिवारों वाले घर किसी को भी नहीं सुहाते। वैसे भी यह दौर जबरन धर्मान्तरण करवाने, देश में संस्कृत की पढाई को अनिवार्य करवाने और गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ बनाने का नहीं है। देश जाग चुका है और देशवासी भी। उनकी भावना और सोच को 'चांद शेरी' की यह पंक्तियां खूब दर्शाती हैं :
"मैं गीता, बाइबल, कुरआन रखता हूं।
सभी धर्मों का मैं सम्मान रखता हूं।।
ये मेरे पुरखों की जागीर है लोगों।
मैं अपने दिल में हिंदुस्तान रखता हूं।।"

Thursday, December 18, 2014

यह क्या हो रहा है?

जिन्दगी बडी छोटी है। कुछ लोग लगातार बडी-बडी भूलें कर रहे हैं। आवेश में आगा-पीछा भूल गये हैं। एक अजीब-सा सन्नाटा छाया है। भय की लकीरें नज़र आने लगी हैं। यह कट्टरता और फिसलन कहां ले जाने को आतुर है? भारतीय जनता पार्टी के कुछ सांसद किसकी शह पर चुभने वाले बोल उगलने से बाज नहीं आ रहे? एक को चुप कराया जाता है तो दूसरा जहर उगलने के लिए छाती तानकर खडा हो जाता है। कौन देगा जवाब? साधु-संत तो मर्यादा का पाठ पढाने के लिए जाने जाते हैं। उन संतो से तो अपेक्षाएं और बढ जाती हैं जिन्हें जनता बडे यकीन के साथ चुनाव जितवा कर सांसद बनाती है। ऐसे में इन पर ऐसे जनहितकारी कार्य करने की जिम्मेदारी बढ जाती है जिन्हें दूसरे सांसद नहीं कर पाते।
नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में अपनी सरकार बनाने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाने की राह पर है। इसके लिए उसने अपनी पूरी फौज लगा दी है। किसी भी हालत में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को मात देने का जिद्दी इरादा है। इसी उद्देश्य के मद्देनजर केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति बीते हफ्ते एक सभा में पहुंचीं। अच्छी-खासी भीड देखकर उनके जोश ने होश खो दिए। उन्होंने मतदाताओं पर सवाल दागा कि वे दिल्ली विधानसभा में रामजादों को चुनेंगे अथवा हरामजादों को? साध्वी की नजर में रामजादे कौन हैं और हरामजादे कौन... बताने की जरूरत नहीं है। एक साध्वी के मुख से ऐसे गालीनुमा शब्द सुनकर तालियां भी बजीं। हां कुछ लोग सन्न भी रह गये। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए नेता कई हथकंडे अपनाते हैं। भाषा के निम्न स्तर पर उतर आते हैं। पर एक भगवाधारी साध्वी का इतना गिर जाना हर समझदार को हैरान-परेशान कर गया। आखिरकार वही हुआ। उनके भडकाऊ और जलाऊ बोलवचनों ने हंगामा बरपा कर दिया। यह सवाल भी गूंजा कि क्या राजनीति के चोले ने साध्वी को निष्कृष्ट शब्दावली का सहारा लेने को मजबूर कर दिया? इसका जवाब भी सामने आ गया। साध्वी उमा भारती की तरह ही साध्वी निरंजन ज्योति भी कथावाचक रही हैं। हालांकि उमा भारती के तरह उन्होंने संपूर्ण देश में ख्याति नहीं पायी। फिर भी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में उनके प्रवचनों को सुनने के लिए भीड तो जुटती ही रही है। साध्वी निरंजन ज्योति का आक्रामक भाषा से भी बडा पुराना नाता है। उनके प्रवचनों में 'हरामजादे' से भी अधिक चुभने वाले अपशब्द तालियों पर तालियां पाते रहे हैं। राजनीतिक दलों को भीड जुटाने वाले चेहरों की हमेशा तलाश रहती है। उन्हें उनके इसी गुण के चलते विधानसभा और लोकसभा की टिकट थमा दी जाती है। भारतीय जनता पार्टी इसमें सबसे आगे है। साध्वी ने तो दिल्ली के वोटरों को लुभाने के लिए अपना राग छेडा था। उन्हें सपने में भी सडक से संसद तक हंगामा मचने की उम्मीद नहीं थी। दरअसल साध्वी भूल गयीं कि वे अब केंद्रीयमंत्री हैं, कथावाचक नहीं। मंत्री को एक-एक शब्द सोच-समझकर बोलना होता है। कथाओं और प्रवचनों में जो खप जाता है वह राजनीति में नहीं खपता।
महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को राष्ट्रभक्त कहकर शोर-शराबे और हंगामे को न्योता देने वाले भाजपायी सांसद साक्षी महाराज भी भगवाधारी हैं। संतई के पेशे से राजनीति में आने के बाद उनके विवादास्पद बयान अक्सर सुर्खियां पाते रहते हैं। गोडसे को देशभक्त बताकर साक्षी महाराज ने विरोधी दलों का निशाना बनने के साथ ही देश की सजग जनता को भी निराशा के हवाले कर दिया। यह निराशा तब गहन चिंता में बदल गयी जब इस खबर ने मीडिया में सुर्खियां पायीं कि देश के सबसे पुराने हिंदु संगठनों में से एक हिंदु सभा ने राजस्थान के किशनगढ से नाथूराम गोडसे की प्रतिमा तैयार करवा कर दिल्ली में वहीं स्थापित करने की तैयारी कर ली है जहां बापू की हत्या की योजना के दौरान वह समय-समय पर ठहरा करता था। संगठन देश के कम से कम पांच शहरों में गोडसे की प्रतिमाएं लगाने का अभिलाषी है। यदि सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी तो खुद के लॉन में प्रतिमा स्थापित करने का उसका इरादा है। प्रतिमा को स्थापित करने के लिए राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक स्थल की तलाश के साथ-साथ सही समय का इन्तजार किया जा रहा है। यह तथ्य भी गौरतलब है कि गोडसे हिंदु महासभा का सदस्य था। १९४८ में बापू की हत्या से एक दिन पहले उसने दिल्ली के कार्यालय का दौरा किया था। जिस कमरे में वह ठहरा था उसे काफी सहेजकर रखा गया है। संगठन के अध्यक्ष यह भी कहते हैं कि जब हमारे यहां सभी महापुरुषों की प्रतिमाएं हैं तो गोडसे की क्यों नहीं? इसका जवाब तो देश का बच्चा-बच्चा दे सकता है। नाथूराम गोडसे तो मानवता का हत्यारा था। उसने अहिंसा के पुजारी की हत्या कर जो पाप किया वह अक्षम्य है। देश और दुनिया को सदाचार का पाठ पढाने वाले बापू के हत्यारे की कुछ लोग भले ही कितनी तारीफ कर लें, प्रतिमाएं लगा लें लेकिन बापू तो बापू हैं जो तमाम भारतीयों के दिलों में बसते हैं और बसते रहेंगे। एक सवाल यह भी लगातार परेशान किए है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही क्यों खलबली मचाने वाले लगातार सुर्खियों में हैं। इन पर कोई अंकुश क्यों नहीं है? दूसरों से खुद को अलग बताने वाली भाजपा के शासन में क्या ऐसे ही गर्मागर्म वातावरण बना रहने वाला है?

Thursday, December 11, 2014

परिवार, समाज और दुष्कर्मी

फिर वही सवाल। कब तक लुटती रहेगी महिलाओं की आबरू? वो दिन कब आएंगे जब युवतियां जब चाहें तब बेफिक्र घूम-फिर सकेंगी? क्या कभी ऐसा भी होगा जब नारियां पुरुषों की भीड में खुद को पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करेंगी। अनाचारी और व्याभिचारी कब तक कानून के डंडे से भयमुक्त होकर दानवी कुकृत्यों को अंजाम देते रहेंगे? १६ दिसंबर २०१२ में दिल्ली में दरिंदगी की शिकार बनी निर्भया की याद आज भी लोगों के दिलों में ताजा है। तब जिस तरह से देश के लोग सडकों पर उतरे थे और सरकार ने अपने कडे इरादे जताये थे उससे लगा था कि दुष्कर्मियों के हौसले पस्त हो जाएंगे। निर्भया कांड को दो साल होने जा रहे हैं। इन दो सालों में दिल्ली तो दिल्ली पूरा देश बलात्कारों से दहलता रहा। बदलाव की उम्मीदें जगायी गयीं। पर कुछ भी नहीं बदला। नयी सरकार भी मूकदर्शक बनी रही। सारे दावे धरे के धरे रह गये। भ्रष्टाचार भी वहीं का वहीं है और अनाचारियों का तांडव भी लगभग जस का तस है। २०१२ के दिसंबर की तरह २०१४ के दिसंबर में भी देश की राजधानी में एक युवती बलात्कारी की हवस का शिकार हो गयी। तब चलती बस में दुष्कर्म हुआ था, अब टैक्सी में हुआ है। कहीं भी सुरक्षा तय नहीं। हवस के पुजारियों की गिद्ध नजरें हर जगह जमी रहती हैं। बसें हों, रेलगाडियां हों, बाजार हों या फिर गली-मोहल्ले ही क्यों न हों। इनके आतंक का शासन जहां-तहां बना रहता है।
गुड़गांव की एक फाइनांस कंपनी में काम करने वाली एक युवती ने रात के समय घर जाने के लिए एक नामी-गिरामी कंपनी की कैब बुक करायी। रात दस बजे कार चालक उसके पास पहुंचा। युवती कार में बैठ गयी। रास्ते में उसकी आंख लग गयी। कार चालक को ऐसे ही मौके की तलाश थी। वह उससे छेडछाड करने लगा। युवती ने विरोध किया तो वह अपनी पर आ गया। उसने उसे डराया, धमकाया और फिर निर्मम बलात्कार कर डाला। उसने युवती को धमकाया और चेताया कि यदि वह चीखी-चिल्लायी तो वह उसका भी निर्भया जैसा हश्र करने से नहीं चूकेगा। तय है कि उसे निर्भया कांड की पूरी जानकारी थी। इस दिल को दहला देने वाले कांड को अंजाम देने वाले बलात्कारियों की हुई थू...थू और दुर्गति की भी उसे पूरी खबर थी। फिर भी वह बलात्कार करने से नहीं घबराया। कानून का उसे ज़रा भी भय नहीं लगा। यह बलात्कारी पहले भी कई महिलाओं की अस्मत लूट चुका है। वह जिस गांव का रहने वाला है उसमें ऐसा कोई घर नहीं जहां की महिलाओं के साथ उसने छेडखानी और बदसलूकी न की हो। उसके गांव वाले उसकी चरित्रहीनता की शर्मनाक दास्तानें सुनाते नहीं थकते। आश्चर्य है कि एक जगजाहिर अभ्यस्त बलात्कारी अमेरिका की जिस नामी कंपनी की कैब चलाता था, उसने भी उसका अतीत खंगालने की जरा भी कोशिश नहीं की। गिरफ्तारी के बाद उसने खुद कबूला है कि उसने पीडित युवती की गला दबाकर मारने की कोशिश की थी। पीडित युवती के पुरजोर विरोध के चलते वह सफल नहीं हो पाया।
अब इस सच पर भी गौर किया जाना चाहिए बलात्कारी शिवकुमार यादव के वृद्ध माता-पिता अपने इस बलात्कारी बेटे को फांसी पर लटकता देखना चाहते हैं। वे कतई नहीं चाहते कि कानून उस पर रहम दिखाये। क्या हर बलात्कारी के माता-पिता और उसके परिजन अपनी औलाद को दुत्कारने और सजा दिलाने की दिलेरी दिखा पाते हैं। जवाब है... बिलकुल नहीं। अधिकांश मां-बाप को अपनी संतान का कोई ऐब नजर नहीं आता। आता भी है तो छुपाने की हजार कोशिशें की जाती है। धनासेठों, उद्योगपतियों, सत्ताधीशों और नेताओं की बिगडैल औलादों के बलात्कारी होने की कितनी ही खबरें आती रहती हैं। किसी भी मां-बाप ने अपने बेटे को फांसी पर लटकाने की मंशा व्यक्त नहीं की। होता यह है कि अपने नालायक अय्याश बेटे को बचाने के लिए ताकतवर और सक्षम लोग महंगे से महंगे वकीलों की फौज खडी कर देते हैं। सभी जानते हैं इस देश में धन की माया अपरमपार है। अपने गंदे खून को सजा दिलवाने और दुत्कारने की हिम्मत न होने की वजह से ही तथाकथित ऊंचे लोगों के नीच कर्म मीडिया की सुर्खियां तो बनते हैं, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। समाज में भी उनकी इज्जत यथावत बनी रहती है। वाकई हमारा समाज बडा विचित्र है। जानबूझकर अंधा बना रहता है। जब कोई बडा धमाका होता है तो चौंकने का अभिनय करता हैं। जहां घरों में बहू-बेटियों की इज्जत पर डाका डाला जाता हो और डकैत भी अपने ही होते हों वहां पुलिस भी क्या कर सकती है? ऐसी न जाने कितनी खबरें अक्सर चौंकाती हैं कि पिता ने बेटी के साथ तो भाई ने बहन के साथ मुंह काला कर रिश्तों को कलंकित कर डाला। ताज्जुब है कि इसके लिए भी शासन और प्रशासन को दोषी ठहराया जाता है। निर्भया को जब बलात्कारियों ने चलती बस से सडक पर फेंक दिया तब वह घंटों वहीं पडी कराहती रही थी। आते-जाते लोग तमाशबीन बने रहे। दरअसल, लोग सामने आने से डरते हैं। उन्हें तरह-तरह का खौफ सताता है। ऐसे में हालात बदलने से रहे। दिखावटी इज्जत को बचाने से कहीं बहुत जरूरी है असली इज्जत को बचाना। मां-बहन, बहू-बेटी की आबरू से बढकर और कुछ होता है क्या?

Thursday, December 4, 2014

अब आप ही सोचें और तय करें

खाने वाले भी हैं और खिलाने वाले भी। यह सिलसिला टूटे तो बात बने। वर्ना रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार का खात्मा होने से रहा। कोई अन्ना आता है। भ्रष्टों के खिलाफ मजमा लगता है। कुछ दिन शोर मचता है। भ्रष्टाचारियों की थू-थू होती है। पर आखिर क्या होता है? हुआ क्या है?
देश में कहां नहीं है भ्रष्टाचार? कुछ भी तो नहीं बदला। वही रिश्वतखोरी की परंपरा। वही रस्म अदायगी। कहीं स्वार्थवश तो कहीं मजबूरी और दबाव के चलते। हो तो वही रहा है जो वर्षों से होता चला आ रहा है। कहीं कोई खौफ नहीं। मान-सम्मान के खोने की भी कतई चिन्ता नहीं। सौ में से एकाध का ही पर्दाफाश हो पाता है। बाकी यह सोचकर बेफिक्र रहते हैं कि वो जो रंगे हाथ धरा गया वह तो बदकिस्मत था, बेवकूफ था। हम जैसा चालाक और सूझबूझ वाला होता तो हर आफत से बचा रहता। इस देश में भ्रष्टाचार के कई किस्से हैं। भ्रष्टाचारी भी किस्म-किस्म के हैं। इस मामले में राजनेताओं और नौकरशाहों की जुगलबंदी भी खूब चलती है। इनके आपसी 'भाईचारे' ने देश का कबाडा करके रख दिया है। फिर भी देश की बिगडी तस्वीर को संवारने का वादा भी यही लोग करते हैं।
नोएडा विकास प्राधिकरण के मुख्य अभियंता यादव सिंह ने रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की जो पताका फहरायी उससे यह तो साफ हो ही गया है कि कैसे और किस तरह से देश की जडों को बेखौफ होकर खोखला किया जा रहा है। छापेमारी के दौरान यादव सिंह के ठिकाने से एक डायरी बरामद हुई है जिसमें कई सत्ताधीशों, नेताओं, ठेकेदारों और सत्ता के दलालों के नाम दर्ज हैं। नोएडा प्राधिकरण में परियोजना विभाग में प्रमुख अभियंता के पद पर लंबे समय तक तैनात रहा यह महाभ्रष्टाचारी हर दल के नेताओं से दोस्ती गांठने का जादूगर रहा है। उसके यहां से एक ही झटके में १०० करोड के हीरे और करोडों की नगदी का मिलना यही तो बताता है कि भ्रष्टाचारियों ने देश को बेच खाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। जिसे मौका मिलता है वही लूटपाट करने वाला भेडिया बन जाता है। चंद वर्षों में हजारों करोड रुपये बटोर लिए जाते हैं न नेता पीछे हैं और न नौकरशाह। पहले इनकी काली कमायी का आंकडा सौ-पचास करोड तक सिमट जाता था... अब हजार करोड को पार कर चुका है। दूसरे को पछाडने की जैसे प्रतिस्पर्धा चल रही है।
यादव सिंह के अथाह भ्रष्टाचार की दास्तान तो यही कहती है कि भ्रष्ट नेता और अफसर एकजुट हो गये हैं। कहा तो यह भी जाता है राजनेताओं को भ्रष्टाचार का पाठ पढाने में नौकरशाहों की अहम भूमिका होती है। राजनेता तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन नौकरशाह सतत बने रहते हैं। उनका सिंहासन आसानी से नहीं डोलता। सत्ता के बदलने के साथ ही इनकी निष्ठा भी बदल जाती है। अथाह भ्रष्टाचार की बदौलत सैकडों करोड की माया जुटाने वाला यादव सिंह हर पार्टी के शासन काल में खूब पनपा। बसपा, समाजवादी, कांग्रेस और भाजपा की उस पर किसी न किसी तरह से मेहरबानी बनी ही रही। दरअसल, इस देश में राजनीति, समाज सेवा और सरकारी सेवा को भ्रष्टाचार का अड्डा बनाकर रख दिया गया है। जिस देश में विधानसभा और लोकसभा चुनाव लडने के लिए करोडों रुपये फूंक दिये जाते हों वहां भ्रष्टाचार के न होने की कल्पना करना ही बेमानी है। राजनीतिक पार्टियों भी धन की बदौलत ही चलती हैं। यह धन कहां से आता है इसकी जानकारी लेने और देने का दम किसी में भी नहीं है। इस देश में कम ही नेता हैं जिनका सच से करीबी नाता हो। राजनीतिक दलों की तमाम भव्य इमारतें झूठ और फरेब की नींव पर टिकी हुई हैं। कोई इस सच को माने या न माने पर यही पहला और अंतिम सच है।
इतिहास बताता है कि ईमानदारों की राजनीति में दाल ही नहीं गल पाती। उन्हें तरह-तरह की तकलीफो से गुजरना पडता है। ऐसे में बिरले ही अपने उसूलों पर टिके रह पाते हैं। देश के एक विख्यात पत्रकार हैं शेखर गुप्ता। वे लिखते हैं कि सन २००७ में लिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे से जब यह पूछा कि उन्होंने सुरेश प्रभु को वाजपेयी मंत्रिमंडल से क्यों हटवाया तो वे पहले तो जवाब देने से बचते रहे, फिर आखिरकार उन्होंने सच उगल दिया। उनका कहना था कि उनकी पार्टी को भी दूसरों की तरह धन की जरूरत होती है। प्रभु कहते थे कि वे बिजली विभाग में कुछ नहीं कमा सकते। बालासाहेब ने ही रहस्योद्घाटन किया कि उन्होंने प्रभु से पूछा था कि क्या उनका मंत्रालय नींबू की फांक है जिसे उनसे पहले का मंत्री पूरी तरह से निचोड गया। यह साक्षात्कार जब चल रहा था तब भाजपा के दिग्गज नेता प्रमोद महाजन का वहां आगमन हुआ तो बालासाहेब ने उनसे पूछा कि क्या प्रभु की बात सही है तो महाजन ने ठहाका लगाते हुए कहा कि अगर कोई केंद्रीय मंत्री दावा करता है कि पैसा कमाना नामुमकिन है तो या तो वह झूठा और चोर है या नाकाबिल है। गौरतलब है कि वही सुरेश प्रभु वर्तमान में नरेंद्र मोदी की सरकार में रेलमंत्री हैं। उन्होंने शिवसेना को छोडकर भाजपा का दामन थाम लिया है। रेलमंत्री की कुर्सी ऐसी है जिसे पाने के लिए होड मची रहती है। रेलवे में जो मलाई है वह और कहीं नहीं। पिछली सरकार के एक रेलमंत्री ने तो अपने भांजे को ही रेलवे की कमायी चाटने के लिए 'सौदेबाजी' और 'दलाली' के काम में लगा दिया था। बदकिस्मती से वह पकडा गया और भांडा फूट गया।