Wednesday, March 4, 2015

रंग उत्सव, कंस उत्सव

कई लोगों के लिए होली और दारू का चोली-दामन का साथ है। उनका मानना है कि बिन पिए कैसी होली! नशे में टुन्न होकर रंगों में डूबने का एक अलग मज़ा है। फिर होली है ही मौज-मज़े का रंगारंग त्यौहार। यही वजह है कि पीने वालों को होली का बेसब्री से इंतजार रहता है। वैसे तो देशभर में अपने-अपने अंदाज के साथ होली के उत्सव को मनाया जाता है। लेकिन बरसाने की लठमार होली की तो बात ही खास है। जिसने भी यहां एक बार होली खेली, उसका हर बार यहां आने को जी चाहता है। देश और विदेश के हजारों लोगों को बरसाने की होली के डंडे खाने और मीठी-मीठी गालियां सुनने का इंतजार रहता है। दूर-दूर से लोग आते हैं, बिना किसी भेदभाव के एक दूसरे को रंग लगाते हैं और मस्ती में डूब जाते हैं। कहीं कोई दुराव-छिपाव नहीं होता। बरसाने में शराब भी पानी की तरह बहती रही है। रंगों की मदमस्ती में कई मतवाले इतनी अधिक च‹ढा लेते हैं कि उन्हें कोई सुध-बुध नहीं रहती। हर पहचान भूल जाते हैं। महिलाएं सज-धज कर मैदान में आती हैं। "ऐसी कसक निकालूंगी... तोय होरी का मज़ा चखाय दूंगी" जैसे गीत गाते हुए हंसी-ठिठोली करती हैं। लाठियों और रंगों की बौछार के साथ खेली जाने वाली यह लठमार होली आधुनिक गोपियों और श्रीकृष्ण के सखाओं को ऐसी अनूठी दुनिया में पहुंचा देती है जहां से बाहर निकलने का उनका मन नहीं करता। कुछ पियक्कड रंग में भंग डालने से बाज नहीं आते। मर्यादा को तिलांजलि दे मां-बहन और बेटी का अर्थ ही भूल जाते हैं। उनका ओछापन आहत कर देता है। इसलिए इस बार महिलाओं ने ऐसे आपा खोने वाले नशेडियों के साथ होली नहीं खेलने की कसम खायी। उन्होंने घोषणा कर दी कि वे तभी लठमार होली खेलेंगी जब शराब के ठेके पर ताले लग जाएंगे। शराबियों के साथ हमें नहीं खेलनी होली। महिलाओं की जिद के आगे आखिरकार प्रशासन को झुकना पडा। तीन दिनों के लिए सभी शराब दुकाने बंद कर दी गयीं। राधा रानी की सखियों की जिद पूरी हुई तो उन्होंने दिल खोलकर श्रीकृष्ण के सखाओं के साथ लठमार होली खेली। श्रीधाम बरसाना की जागरूक महिलाएं कहती हैं कि होली व अन्य पर्वो पर कई लोग शराब पीकर हुडदंग करते हैं। ऐसे में उत्सव का मज़ा किरकिरा हो जाता है। खुशी की बजाय शर्मिंदगी झेलनी पडती है। होली तो कृष्ण-राधा के सात्विक प्रेम का प्रतीक है। यह रंग उत्सव है, कंस उत्सव नहीं। अपनी जीत से उत्साहित महिलाओं ने बरसाना को हमेशा-हमेशा के लिए शराब मुक्त करने का अभियान छेडने की भी तैयारी शुरु कर दी है। क्या ऐसी जिद्दी कोशिश पूरे देश में नहीं हो सकती?
कभी किसी ने सोचा भी नहीं था कि विदर्भ के शहर चंद्रपुर में महिलाओं की जंग रंग लाएगी। यहां की सजग महिलाएं वर्षों से चंद्रपुर जिले में शराब बंदी की मांग करती चली आ रही थीं। सरकार सुनने को तैयार ही नहीं थी। सरकार को शराब की कमायी ललचाती। उसे शराब पीकर बरबाद होने और बेमौत मरने वालों से क्या लेना-देना! विधानसभा और लोकसभा के चुनाव आते-जाते रहे। हर चुनाव के समय शराब बंदी के वायदे तो किये जाते, लेकिन उन्हें पूरा करने का साहस गायब हो जाता। इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं ने उसी उम्मीदवार को जितवाने की कसम खायी जो चंद्रपुर जिले में जगह-जगह आबाद शराब दुकानों और बीयरबारो को बंद करवाने का दम रखता हो। वायदे का पक्का हो। वर्षों से जिले में शराब बंदी लागू करने की मांग करने वाले सुधीर मुनगंटीवार पर महिलाओं ने भरोसा किया। उन्होंने भी अपने वायदे पर खरा उतरने में जरा भी देरी नहीं लगायी। महाराष्ट्र में जैसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी, वे शराब बंदी की जिद पर अड गये। अंतत: नक्सलग्रस्त चंद्रपुर जिले को शराब से मुक्ति दिलाने का ऐलान कर दिया गया। दृढ प्रतिज्ञ सुधीर मुनगंटीवार की हिम्मत को दाद देनी होगी। उन्होंने शराब बंदी करवाने में असफल होने पर अपने मंत्री पद से ही इस्तीफा देने का पक्का मन बना लिया था। उनके चंद्रपुर आगमन पर शराब विक्रताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाए। शराब बंदी की खिलाफत करने वालों का तर्क है कि वर्धा में महात्मा गांधी के नाम पर ४० सालों से और गडचिरोली में २२ सालों से शराब पर प्रतिबंध लगा हुआ है फिर भी इन दोनों जिलों में पीने वालों को भरपूर शराब मिल जाती है। दरअसल जिनका धंधा मार खाता है उनके पक्ष हमेशा कुछ इसी तरह के ही होते हैं। शराब आखिर है तो ज़हर ही। इस जहर के कहर से उन महिलाओं से ज्यादा और कौन वाकिफ हो सकता है। जिनके पति दारू चढाकर हैवान बन जाते हैं। घर परिवार तबाह हो जाते हैं।१ अप्रैल २०१५ से चंद्रपुर जिले में देसी-विदेशी शराब बिकनी बंद हो जाएगी। दरअसल यह उन महिलाओं की जीत है, जिन्होंने लगातार नौ वर्षों तक शराब के खिलाफ अपनी लडाई जारी रखी। किसी की धमकी-चमकी से भयभीत नहीं हुर्इं।
सच्ची भारतीय नारी तो देश के हर शहर और गांव को 'कसही' जैसा देखना चाहती है। छत्तीसगढ के बालोद जिले में स्थित है, गांव कसही। इस गांव का शराब और शराबियों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। पूरी तरह से साक्षर यह गांव अपराधमुक्त है। आपसी भाईचारा भी देखते बनता है। यहां की बेटी उसी घर में ब्याही जाती है जहां शराब को नफरत की निगाह से देखा जाता हो। यह सब हुआ है कसही गांव के रहने वालों की जागरूकता की वजह से! आसपास के शहरों और गावों के लोग भी हैरत में पड जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि इस गांव में पिछले १०० सालों से किसी ने शराब नहीं चखी। कसही की आबादी छह सौ के आसपास है। पूरी तरह से शाकाहारियों के इस गांव में बहू लाने के पहले यह खोज-खबर ली जाती हैं कि कहीं समधियों के परिवार का कोई सदस्य मदिरा प्रेमी तो नहीं है। पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही रिश्ता जोडा जाता है। यानी इस गांव के लोग तो लोग, रिश्तेदार भी शराब से कोसों दूर रहते हैं।

Thursday, February 26, 2015

छल-कपट का स्मारक

कई जनसेवक ऐसे होते हैं जो जनसेवा करते ही इसलिए हैं कि उनके नाम का डंका बजता रहे। मीडिया उनके गुणगान गाता रहे। लोग भी सतत उनकी चर्चा करते रहें। कर्नाटक की रहने वाली मंगला सोनाबणे की सोच सबसे जुदा है। वे चुपचाप काम करने में यकीन रखती हैं। कुछ वर्ष पूर्व उत्तराखंड में आयी भारी तबाही ने पूरे देश को विचलित कर दिया था। हजारों जानें चली गयी थी। कुदरत का वैसा तांडव पहले कभी देखने में नहीं आया था। न जाने कितने हंसते-खेलते परिवारों की खुशी सदा-सदा के लिए छिन गयी थी। पीडितों की मदद के लिए कई लोग आगे आए थे। इन्ही में शामिल थीं हुबली, कर्नाटक की मंगला सोनाबणे। मंगला ने जैसे ही देवभूमि पर आयी विपदा के तूफान की खबर सुनी तो वह अपना घर-बार छोडकर देवभूमि पहुंच गयीं। वहां तक जाने के लिए उनकी जेब में रेल की टिकट के पैसे नहीं थे। मंगला का मन तो बस आपदा पीडितों का हाल-चाल जानने और उनकी सहायता करने को बेचैन था। इसलिए उन्होंने अपने गहने तक बेच डाले और पहुंच गयीं उन मुसीबत के मारों के बीच जिनका देखते ही देखते सबकुछ लुट गया था। संवेदनशील मंगला आपदा पीडितों की अथक सेवा में लग गयीं। अपनी भूख-प्यास को भूल कई हफ्तों तक पीडितों की सेवा करती रहीं। अपना घर-बार छोडकर दुखियारों की सेवा के लिए निकल पडना मंगला की आदत में शुमार है। वे इसे अपना कर्तव्य मानती हैं। इंसानियत का फर्ज निभाने में उन्हें बेहद सुकून मिलता है। २००६ में जब मुंबई धमाके हुए तो मंगला ने वहां पहुंचने में भी देरी नहीं लगायी थी। उसने घायलों को अस्पताल पहुंचाने में जो भूमिका निभायी उससे कइयों ने प्रेरणा ली। वे मृतकों के परिजनों से मिलीं और उन्हें ऐसे सांत्वना देती रहीं जैसे उन्हीं की परिवार की सदस्य हों। २००८ में बिहार में कोसी नदी की बाढ से बेघर और बर्बाद हुए लोगों की सेवा में भी दिन-रात एक करने वाली यह भारतीय नारी इंसानियत की सेवा के लिए मर मिटने को तैयार रहती है। मंगला को जब भी कहीं पीडित और परेशान लोगों की खबर लगती है तो वह फौरन उनके पास पहुंच मदद में जुट जाती हैं।
जमींदार घराने से ताल्लुक रखने वाले हरपाल राणा भी असहायों और गरीबों के मसीहा हैं। दिल्ली के निकट स्थित बुरादी इलाके के कादीपुर गांव के रहने वाले हरपाल ऐसे खुशकिस्मत हैं जिनके पास अच्छी-खासी पुश्तैनी संपत्ति है। ऐसे में तो अक्सर एक आम इंसान खुद को और अधिक सम्पन्न बनाने के लिए सारे दांव अजमाता है। उसकी यही कोशिश होती है कि वह अपने परिवार के साथ मस्त रहे। दुनिया के सारे सुख भोगे। किसी भी गम का उसके परिवार पर साया न पडे।  बस जिन्दगी बडे मजे से कट जाए, लेकिन हरपाल की सोच ऐसी नहीं थी। तभी तो उन्होंने एक ऐसी डगर पकडी जिस पर धनवान चलने से कतराते हैं। हरपाल की जब अपने इर्द-गिर्द के गरीबों और मजलूमों पर नजर गयी तो उन्होंने उनकी तकलीफों को जाना। उन्होंने ठान लिया कि उन्हें खुद का तथा धन का सदुपयोग करना है। जिन्दगी ऐसे ही जाया नहीं करनी। हमारे देश में सरकारी कामकाज कैसे चलता है यह तो सभी जानते हैं। बिना रिश्वत के काम हो जाए तो मानो लाटरी खुल गयी। हरपाल  गरीबों और असहायों के साथ खडे हो गये। अनाधिकृत कालोनियों में रहने वाले लोगों को आवासीय प्रमाणपत्र नहीं होने की वजह से राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र आदि पाने में न जाने कितनी दिक्कतो का सामना करना पडता है। हरपाल ने ऐसे लोगों की मदद का बीडा उठाया है। पर्याप्त दस्तावेज नहीं होने के कारण शिक्षा से वंचित परिवारों के बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलवाकर हजारों बच्चों का भविष्य संवार चुके हैं हरपाल। असंख्य गरीबों के राशन कार्ड बनवाने, कानूनी सहायता दिलवाने और उन्हें विभिन्न सुविधाएं दिलवाने वाले हरपाल को नाम की कतई भूख नहीं है।
 गुजरात दंगों के बाद तीस्ता सीतलवाड के नाम का डंका भी दूर-दूर तक बजा। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष चेहरों ने तीस्ता को महिमामंडित करने का जबरदस्त अभियान चलाया। तीस्ता ने भी गुजरात दंगा पीडितों के लिए लडने-मरने का ऐसा ढिंढोरा पीटा कि मीडिया भी उसके 'दयावान' होने के गीत गाने लगा। दंगा पीडितों के कल्याण और उन्हें न्याय दिलाने के लिए तीस्ता सीतलवाड ने एनजीओ की स्थापना की। इसका सच बडा चौकाने वाला है। दंगा पीडितों की सेवा के नाम पर जुटाये गये धन ने तीस्ता और उसके परिवार के दिन ही बदल डाले। रंक को राजा बना दिया। तीस्ता सीतलवाड ने अपने पति के साथ मिलकर 'सबरंग ट्रस्ट एंड सिटीजन फार जस्टिज एंड पीस' की स्थापना तो लोगों को निस्वार्थ भाव से न्याय दिलवाने के लिए की थी, लेकिन इनकी चालाकी देखिए कि यह इसी ट्रस्ट से तनख्वाह के तौर पर मोटी रकम अंदर करती रहीं। सितलवाड को अपनी छोटी बेटी पर इतना दुलार आया कि उसने उसे फाइल तैयार करने और सूचनाओं के प्रसार के लिए करोडों रुपये उपहार में दे दिए। बेटी ने भी मुफ्त में मिले धन को होटलों की मौजमस्ती, डिजाइनर कपडों और इधर-उधर की यात्राओं में सिगरेट के धुएं की तरह उडाया। दंगा पीडितों के धन से ऐशो-आराम करने वाली तीस्ता सीतलवाड की यह तस्वीर दंगा पीडितो को आहत और निराश कर गयी है। दंगा पीडितों के लिए स्मारक बनाने का ऐलान कर इस परोपकारी समाजसेविका ने करोडों की माया जुटायी। तेरह वर्ष बीत गये। स्मारक तो नहीं बना। तीस्ता जरूर बेनकाब हो गई।

Thursday, February 19, 2015

उनकी भी तो सुनो

खबर बडी अच्छी है। हौसला और विश्वास जगाने वाली शुरुआत। इसी का तो इंतजार था। दिल्ली के कई ठेलेवालों, ऑटोवालों और अन्य छोटे-मोटे कारोबारियों ने पुलिस वालों को हफ्ता देने से मना कर दिया है। कल तक जो खाकी वर्दी से घबराते थे, आज छाती तानकर सवाल-जवाब करने लगे हैं। बहुत सह ली खाकी की गुंडागर्दी। अब नहीं सहेंगे। डटकर मुकाबला करेंगे। आदतन रिश्वतखोर पुलिस वाले स्तब्ध हैं। उन्हें यह सच्चाई डराने लगी है कि अब उन्हें अपनी तनख्वाह से ही गुजारा करना होगा। हराम की कमायी से मौज मनाने के दिन गये। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसी भी नौबत आयेगी। वर्षों से चली आ रही परंपरा पर एकाएक ब्रेक लग जाएगी। कैसे वर्षों से चली आ रही परिपाटी के टूटने के बने पुख्ता आसार? दबे-कुचले दिल्ली वालो में कहां से आयी इतनी ताकत? भाजपा वीर नरेंद्र मोदी ने भी हुंकार भरी थी कि न खुद खाऊंगा और ना ही किसी को खाने दूंगा। फिर भी बादल नहीं छंटे। बदलाव भी नहीं दिखा। भ्रष्टों पर कोई फर्क नहीं पडा। आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के फौरन बाद कहा कि 'कोई आपसे रिश्वत मांगे तो मना मत करना। सेटिंग कर लेना। जेब में हाथ डालना। अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लेना। मुझे लाकर देना। हम उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करेंगे।' यकीनन रिश्वतखोरों को कानूनी फंदे में फंसाने के उनके उम्दा सुझाव ने लोगों की हिम्मत बढा दी। रिश्वतखोरों के भी हौसले पस्त हो गये। दरअसल, हुंकार तो मोदी ने भी भरी थी, लेकिन उसमें वजन नज़र नहीं आया। सुनने वालों को यह महज रस्म अदायगी लगी। वैसे भी जुमलेबाजी में उनका कोई सानी नहीं। इसलिए न लेने वालों पर कोई असर पडा और न ही देने वालों पर। अरविंद के बुलंद इशारे ने लेने वालों की नींव हिला दी। देने वालों को गहरी नींद से जगा दिया। वैसे भी दोनों नेताओं में बहुत फर्क है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में धनवानों की छवि दिखायी देती है तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सामान्य जनता के जीवंत प्रतिरूप लगते हैं। अरविंद की बोलचाल की भाषा और पहनावा लोगों को अपने निकट लाता है। ऑटोवाले, पानठेले वाले, खोमचे वाले, सब्जी वाले और तमाम मेहनतकश उनके करीबी लगते हैं। प्रधानमंत्री के हाव-भाव और कीमती पोशाकें उन्हें अंबानी, अदानी और जिन्दल जैसे पूंजीपतियों के साथ खडा कर देती हैं।
यह भी तय है कि चंद ठेलेवालों और ऑटो वालों के रिश्वत देने से मना करने भर से तो दिल्ली नहीं बदलनी वाली। राजधानी में हजारों उद्योगपति, व्यापारी, तरह-तरह के बडे कारोबारी और तथाकथित ऊंचे लोग बसते हैं। यह लोग भ्रष्टाचारियों और रिश्वतखोरों के खिलाफ खडे होने में कतराते हैं। इनमें से अधिकांश की तरक्की की इमारतें इन्हीं की बदौलत ही खडी होती हैं। यह वो तबका है जिसे भ्रष्टाचार में कोई बुराई नजर नहीं आती। अपने फायदे के लिए बिकने और खरीदने में इन्हें कभी कोई परहेज नहीं रहता। यह लोग धीरुभाई अंबानी जैसों को अपना आदर्श मानते हैं जिसने भ्रष्ट शासकों और नौकरशाहों को थैलियां थमाकर अपना विशालतम आर्थिक साम्राज्य खडा करने में सफलता पायी थी। उसी विरासत को उनके बेटे भी आगे बढा रहे हैं। नरेंद्र मोदी के खासमखास अंबानी परिवार ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उनका चैनल दिन-रात आम आदमी पार्टी के पिटने की भविष्यवाणी करता रहा। भारतीय जनता पार्टी के लिए तिजोरियों के मुंह खोल दिए गए। अंबानी हों या अदानी, हर किसी को सत्ताधीशों को साधने की हर कला आती है। नौकरशाह तो खुद-ब-खुद इनके इशारों पर नाचने लगते हैं। आम जनता के काम हों या न हों, लेकिन थैलीशाहों के काम कभी भी नहीं रूकते। उनके काले-पीले धंधों पर कोई उंगली नहीं उठती। हर डंडा गरीबों पर ही चलता है। खाकी उनके दिलों में खौफ पैदा करती है। उनकी झुग्गी-झोपडियों को नेस्तनाबूत करने की धमकियां देकर रिश्वत वसूली जाती है। उनके लिए न स्कूल हैं और न ही अस्पताल। पानी, बिजली उनके हिस्से में नहीं आती। उनकी पूरी जिन्दगी ही है खस्ताहाल। कितनी सरकारें आयीं और चली गयीं, लेकिन दबे-कुचले लोग वहीं के वहीं रहे। अरबों-खरबों के सरकारी ठेकों में मुंहमांगी रिश्वतें दी जाती हैं और आधे-अधूरे विकास कार्यों को कागजों में पूरा हुआ दिखा दिया जाता है। इस देश को कमीशनखोरी के दीमक ने खोखला कर दिया है। इसे खुद बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने भी कबूला है। जब वे मंच पर खडे होकर, डंके की चोट पर कहते हैं कि हां मैं सरकारी ठेकेदारों से रिश्वत खाता रहा हूं। तो ऐसे में ज्यादा माथा खपाना बेमानी है। मांझी ने तो खुद के रिश्वतबाज होने की सचाई भी नहीं छुपायी। भले ही यह अनायास हो गया। भावावेश में सच बोल गये। सीधे और निष्छल इंसान अक्सर सच को दबा नहीं पाते। बस उन्हें मौके का इंतजार रहता है। यह तो जीती-जागती हकीकत हैं कि भ्रष्टाचार, बेइमानी और रिश्वतखोरी के दम पर जहां राजनीति की अधिकांश दुकानें चलती हैं वहीं सत्ताधीश भी अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए वो सब करते हैं जिसके खिलाफ चुनावी मंचों पर शेर की तरह दहाडते हैं। आम लोग इस सच को पूरी तरह से जान गये हैं। इसलिए वे अपना वोट जाया नहीं करते। आम आदमी पार्टी की जीत के बहुत बडे मायने हैं। दिल्ली के वोटरों ने हारे हुए दलों और नेताओं को यह तो समझा ही दिया है कि अब तुम्हें बदलना ही होगा। उनकी अनदेखी कतई नहीं चलेगी। जिनके वोट लेकर सत्ता का सुख भोगा जाता है।

Thursday, February 12, 2015

सत्ता और दौलत का नशा

नशों में नशा। सत्ता और धन का नशा। कभी उतरता ही नहीं। कुछ लोगों को एक नशा रास नहीं आता। कई-कई नशे पाल लेते हैं। खुमारी कभी टूटती नहीं। उसी में मस्त रहते हैं। असलियत उन्हें डराती है। इसलिए बेसुध रहना उन्हें बेहद भाता है। यह भी सच है कि हर दुष्कर्मी अपने करनी की सजा इसी दुनिया में ही पाता है। अरबों रुपये के सारधा चिटफंड घोटाले में ममता सरकार के कई मंत्री, सांसद लिप्त पाये गये। जिसको मौका मिला, उसी ने करोडों रुपये अंदर कर लिए। यह भी नहीं सोचा कि इस कंपनी में उस जनता के खून-पसीने की कमायी लगी है जिसने उन्हें बडे यकीन के साथ सत्ता सौंपी है। जनप्रतिनिधि घोटालेबाज चिटफंड कंपनी के कर्ताधर्ताओं का साथ देने की ऐवज में अपनी तिजोरियां भरते रहे। उन्होंने यह मान लिया कि लुटेरी कंपनी का भांडा कभी नहीं फूटेगा। अगर कहीं फूट भी गया तो वे कवच बन उसकी रक्षा करेंगे। प्रदेश में उन्हीं की सरकार है। मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी अपनी हैं। रिश्वत के रसगुल्लों से उन्हें भी परहेज नहीं है।
सारधा चिटफंड की नींव बदनीयती और बेईमानी की नींव पर रखी गयी थी। ऐसे में एक न एक दिन तो उसे तबाह होना ही था। आखिरकार वो वक्त आ ही गया। कंपनी के संचालकों को दबोच कर जेल में डाल दिया गया। ठग कंपनी से हिस्सा पाने वाले ममता सरकार के मंत्री और सांसद भी कानून के फंदे से नहीं बच पाये। एक-एक कर उन्हें जेल जाना पडा। उन्हीं में शामिल हैं पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री मदन मित्रा। उन्हें १२ दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। रिश्वतखोर और भ्रष्टाचारी होने के साथ ब‹डे गुस्सैल भी हैं मदन मित्रा। हमेशा गुस्से से तमतमाये रहते हैं। जेल तो जेल होती है। हर अपराधी खुद को निर्दोष बताता है। वैसे भी कोई खुद को खुदा माने तो उसकी मर्जी। जेल में जब कोई नया तथाकथित बडा कैदी आता है तो उसके कारनामों का काला-चिट्ठा भी अन्य कैदियों तक पहुंच जाता है। यही वजह कि कई बार जेल में कैदियों के द्वारा बलात्कारियों की पिटायी की खबरें सुर्खियां पाती हैं।
अहंकारी मंत्री मदन मित्रा जब जेल में टहल रहे थे तब एक कैदी ने उन्हें चोर कहकर चिढाया तो वे आग-बबूला हो उठे। उनका खून खौल गया। एक अदना-सा कैदी उन्हें चोर की पदवी से नवाजे। वे पश्चिम बंगाल के जाने-माने नेता हैं। हजारों लोग उनके समक्ष नतमस्तक होते हैं। उनके कई चाहने वाले हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जो उनके इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमों ममता दीदी के भी वे बेहद करीबी हैं। यहां बहती गंगा में कौन हाथ नहीं धोता? लगभग सभी तो रिश्वत खाते और भ्रष्टाचार करते हैं। उन्होंने बहती गंगा में हाथ धोये तो कौन सी अनहोनी कर डाली। यह तो किस्मत खराब थी इसलिए पकड में आ गये। अगर आज बाहर होते तो कालर तने रहते। किसी की क्या मजाल कि जो कोई उन्हें चोर कहने की जुर्रत कर पाता।
जेल की घुटन ने नेताजी को जकड लिया और वे बीमार पड गये। जेल के डाक्टरों की फौज उनके इलाज में लग गयी। अच्छे-खासे नेता को आखिर कौन-सा नया रोग लग गया? वे छटपटाने लगे। डाक्टरों ने जब गहन जांच-पडताल की तो एक नया चौंकाने वाला सच सामने आया। मंत्री जी की तबीयत तो अत्याधिक शराब पीने से बिगडी थी। मंत्री आम कैदी नहीं। इसलिए जेल का खाना नहीं खाते। उनके घर से प्रतिदिन लजीज पकवान और पीने का पानी आता था। इसी पानी में शराब मिली होती जिसे वे पीते और बेफिक्र हो जाते। हफ्तों तक ऐसे ही पीने का दौर चलता रहा। उन्होंने खुद स्वीकार किया कि वे अखंड पियक्कड हैं। बिना पीये उनके दिन नहीं कटते। रातें भी बेचैन कर देती हैं। ऐसे में शराब ही उन्हें राहत देती है। उन्होंने तिकडम लडायी। जेल अधिकारियों को पटाया और घर से पानी मिली शराब मंगवाने लगे। यही है हमारे देश के नेताओं और जेलों की हकीकत।
हमारा संविधान कहता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं। लेकिन होता क्या है? दबंग और धनवान जेल अधिकारियों और डॉक्टरों को सम्मोहित कर जेल में ही मनचाही सुविधाए पाते हैं। उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार छुट्टी मनाने और बाहर घूमने-फिरने के मौके भी मिल जाते हैं। नीतीश कटारा हत्याकांड को अंजाम देने वाले हत्यारों को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनायी है। बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटे विकास यादव व उसकी बुआ के बेटे विशाल यादव ने २००२ में नीतीश कटारा का अपहरण कर उसकी निर्मम हत्या कर दी थीं। नीतीश विकास की बहन भारती यादव का दोस्त था। विकास और विशाल को अपनी बहन भारती का नीतीश से मिलना कतई पसंद नहीं था। इसकी सबसे बडी वजह थी, नीतीश का धनवान न होना तथा दूसरी जाति का होना। सत्ता और झूठी शान के नशे में चूर  हत्यारों को अपने रसूख और धनबल का गुमान था। उन्हें यह यकीन भी था कि कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड पायेगा। गवाहों को धमकाने और खरीदने की जबरदस्त कोशिशें की गयीं। सफल भी हुए। लेकिन आखिरकार कुबेरों की चालबाजी धरी की धरी रह गयी। कोई दांव भी काम न आया। यह सब हुआ एक नारी... एक मां की जिद्दी लडाई के चलते। अगर नीतीश की मां नीलम कटारा ने अपनी लडाई नहीं लडी होती तो धन बल की जीत पक्की थी। पिछले तेरह सालों से नीलम अदालतों के चक्कर पर चक्कर काट रही हैं। इकलौते बेटे की हत्या के मामले में हाईकोर्ट द्वारा बतौर मुआवजा ४० लाख रुपये देने के फैसले पर आहत मां के जख्म फिर ताजा हो गए। हत्यारों के लिए यह रकम कोई मायने नहीं रखती। लेकिन एक मां जो अपने बेटे की हत्या से अंदर तक लहुलूहान है वह खून से सना यह मुआवजा कैसे ले सकती है?

Thursday, February 5, 2015

सच की किताब का पन्ना

कर्नल एम.एन. राय। मैं नहीं जानता कि इस नाम से कितने देशवासी वाकिफ हैं। आतंकवादियों के साथ मुठभेड में शहीद हुए कर्नल एम.एन. राय मेरी निगाह में इस देश के असली नायक हैं। जिन्हें भुला पाना असंभव है। कर्नल राय को २६ जनवरी २०१५ को युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। मात्र एक दिन बाद वे कश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकवादियों के छक्के छुडाते हुए शहीद हो गए। मातृभूमि के सच्चे सुपूत ने पुरस्कार का जश्न अपनी अमर शहादत देकर मनाया। सभी की आंखों में आंसू थे। जिसने भी यह खबर सुनी, दंग रह गया। वृद्ध पिता ने अपना दुलारा खो दिया। मां की आंखों का तारा चला गया। पत्नी और बच्चों के गम को शब्दों में नहीं बयां किया जा सकता। कर्नल के अपनों के लिए यह सबसे कठिन समय था। कल वो दोस्तों के साथ खिलखिला रहे थे, और दोस्त भी यह कहते नहीं थक रहे थे कि अगली बार तो अशोक चक्र पक्का है। आज अपने जिगरी दोस्त का शव उनके सामने पडा था। चेहरे पर वही देशभक्त वाली तसल्ली थी। भारत माता के लिए कुछ कर गुजरने का ज़ज्बा था। आंसू बहाती भीड से अभी भी जैसे वे कह रहे थे मैंने तो अपना फर्ज निभा दिया। अब देश तुम्हारे हवाले है। शहीद बेटे की बोलती खामोशी को पीडा के अथाह सागर में डूबे उम्रदराज पिता ने यह कहकर गुंजा दिया कि वे कर्नल राय की दोनों बेटियों और एक मात्र बेटे को सेना में ही भेजेंगे। ताकि बच्चे भी भारत माता की सेवा कर अपने पिता के सपनों को पूरा कर सकें।
यह पिता और दादा जी की दी गयी शिक्षा और संस्कारों का ही प्रतिफल है कि शहीद कर्नल की बडी बेटी अलका ने बडी दिलेरी के साथ अपने पिता के शव के समक्ष खडे होकर सैल्यूट किया और जिस तरह से पिता के रेजीमेंट की रण हुंकार भरी उससे पूरी सृष्टि में यही संदेश गया कि भारत की बहादुर बेटियां बडी से बडी कुर्बानी देने को तैयार हैं। उन्हें किसी से कमतर न समझा जाए। इस देश की नारियां बडे से बडा आघात सहने का भी दम रखती हैं। मुश्किल की घडी में उन्हें स्वजनों और खुद को भी संभालना आता है।
गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब शहीद मेजर मुकुंद वरद राजन की पत्नी को अशोक चक्र प्रदान कर रहे थे तब उनका चेहरा खुशी और गर्व से चमक रहा था। इंदु मुकुंद कहती हैं कि यह मेरे पति के शौर्य का दिन था। गौरवान्वित होने का अभूतपूर्व समय। ऐसा मौका हर किसी को कहां नसीब होता है। मैं एक बहादुर सैनिक की हिम्मती पत्नी हूं। मुझे उन पर गर्व है। वे मेरे प्रेरणास्त्रोत थे। हमेशा कहते थे जीवन एक जंग है। जंग में घबराना कैसा। इस दुनिया में हर इंसान को एक योद्धा की तरह जीना और समस्याओं का सामना करना चाहिए। मैं अपनी बेटी को भी उन्हीं की तरह बहादुर बनाऊंगी। मैंने अभी तक उसे हकीकत से अवगत नहीं कराया है। वह तो यही समझती है कि उसके प्यारे पापा आफिस गए हैं। वह हर शाम पापा की राह देखती है और इंतजार करते-करते सो जाती है। उसने अभी अपनी उम्र के चार साल भी पूरे नहीं किए हैं। जब उसका सच से सामना होगा तो मुझे यकीन है कि वह मायूस नहीं होगी। उसका सीना भी गर्व से तन जाएगा। बहादुर माता-पिता की ताकतवर बेटी। हां यदि यह शौर्य सम्मान मेरे पति खुद लेते तो मुझे जो खुशी होती उन्हें मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती।
इस देश के हर सैनिक के लिए राष्ट्र भक्ति और राष्ट्र सेवा सर्वोपरि रही है। कुछ लोग भले ही खुद को हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के फ्रेम में बांधते रहे हों, लेकिन फौजियों का एक ही धर्म होता है। वक्त पडने पर देश के लिए कुर्बान हो जाना। द्वितीय विश्वयुद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले शाहपुर के फौजी मेहमूद खान की असहाय बूढी पत्नी दर-दर भटकने को मजबूर है। फौजी मेहमूद खान ने १९३९ से १९६१ तक सेना में रहकर देश सेवा की। उन्हें दस मेडल मिले थे। युद्ध में लडाई के दौरान सिर में गोली लगने से वे बुरी तरह से घायल हो गये। वर्षों तक इलाज चलता रहा। आज उनका कोई अता-पता नहीं है। बीस साल पहले घर से निकले थे, अभी तक नहीं लौटे। उनकी बहादुरी के कई किस्से हैं। आज उनके परिवार को दर-दर की ठोकरें खानी पड रही हैं। लाचार पत्नी ऐसी जर्जर झोपडी में रहती है जो धूप में जलाती है और पसीने से तरबतर कर देती है। बरसात के मौसम में जब झोपडी तालाब बन जाती है तो फौजी की बीवी आंसू पर आंसू बहाती है। उसे अपने पति पर नाज़ है। उसका हर पल उनके इंतजार में बीतता है। पति ने उसे एक तोहफा दिया था। ऐसा तोहफा शायद ही कभी किसी ने किसी को दिया हो। जंग में जब  फौजी की अंगुली कटी तो उन्होंने उसे अपनी जेब में रख लिया। बाद में वही कटी अंगुली उन्होंने उसे यह कहकर दे दी कि यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए तोहफा है। इसे रख लो। अस्सी वर्ष की अमीना के दो बेटे हैं। एक भीख मांगता फिरता है तो दूसरा हम्माली और कुलीगिरी कर बडी मुश्किल से एकाध वक्त की रोटी का जुगाड कर पाता है।

Thursday, January 29, 2015

मरना और जीना

बिहार ने एक से बढकर एक शख्सियतें दी हैं। शिक्षाविद्, साधु-महात्मा, लेखक, पत्रकार, सम्पादक, उद्योगपति, अभिनेता और धुरंधर राजनेता। अधिकांश की गाथाओं से लोग वाकिफ हैं। उन पर बहुत कुछ लिखा और सुना-सुनाया जा चुका है। बिहार की राजधानी पटना की भी अपनी एक खास पहचान है। देश की नामी-गिरामी शहरों की तरह उसका भी अपना रूतबा है। जब रूतबे की बात आती है तो एक ताकतवर तस्वीर उभरती है। जुनूनी और मेहनती लोगों की बदौलत ही कोई शहर बुलंदियों को छूने में सफल होता है। कमजोर और मुफ्तखोर शहर की शान में बट्टा लगाते हैं। निकम्मे और भ्रष्ट नेता यह काम बखूब करते आये हैं। उन्हें अपना आदर्श मानने वाले भी कम नहीं। पटना की यात्रा के दौरान एक युवक को जाना और समझा। यूं तो हर यात्रा में कई किस्म के लोगों से वास्ता पडता है। कुछ याद रहते हैं। अधिकांश आये-गए हो जाते हैं। इस युवक को भूला पाना आसान नहीं। दरअसल, यह मात्र कोई युवक नहीं, एक चुभने वाला सवाल है जिससे न मैं बच पाया और न ही आप बच पाएंगे। पहेली बुझाने और भूमिका बांधने का मेरा कोई इरादा नहीं। जो सच है उसी से आपको रूबरू करवा रहा हूं। जब कभी आप रेल से पटना जाएं तो पटना जंक्शन पर वह आपको सहज ही भीख मांगता दिख जाएगा। आप कहेंगे यह तो आम बात है। इस देश में जब भिखारियों और लुटेरों की भरमार है तो उसके भीख मांगने पर अचंभा कैसा?
बत्तीस साल का भिखारी पप्पु कुमार शहर के भीखमंगों का आदर्श है। उसने अपने इसी करतब से दो एकड जमीन, आलीशान घर, और लाखों की नगदी जुटा ली है। पप्पू ऐसा करोडपति है जिसने दस लाख रुपये से ज्यादा की रकम ब्याज पर चढायी हुई है और अच्छा-खासा मुनाफा पाता है। उसके चार बैकों में खाते हैं। जिनकी रकम का आंकडा कभी भी ढलान पर नहीं जाता। उसके हाथ मुडे-तुडे हैं। इसी खासियत की बदौलत वह अपनी दीनता दर्शाता है और सतत मोटी भीख पाता है। उसके करोडपति होने का खुलासा तब हुआ जब उसे रेलवे स्टेशन से 'भिखारी भगाओ' अभियान के तहत हिरासत में लिया गया। उसकी रईसी ने आरपीएफ के अधिकारियों को भी हैरत में डाल दिया। इतनी दौलत तो उनकी किस्मत में भी नहीं आयी जितनी पप्पू भिखारी ने हाथ फैलाकर कमायी। उसे कई बार भगाया गया, लेकिन वह अडियल टट्टू की तरह पटना जंकशन के फुट ओवर ब्रिज पर आकर जम जाता है। इस जगह को वह अपने लिए बेहद लक्की मानता है। आने-जाने वाले हजारों लोग उसकी हालत पर तरस खाकर उसकी मुराद पूरी कर देते हैं। इस धनवान भिखारी को कई लोगों ने अपना इलाज करवाने की सलाह दी। डॉक्टर भी कहते हैं कि समुचित इलाज होने पर वह पूरी तरह से सही-सलामत हो सकता है। उसके हाथ-पैर आम लोगों की तरह दिखने और काम करने लग सकते हैं। लेकिन वह साफतौर पर मना कर देता है। कहता है कि यदि उसने अपने हाथ पैरों को दुरुस्त करवा लिया तो फिर उसे भीख कौन देगा? उसका तो धंधा ही चौपट हो जाएगा। यही अपंगता ही उसकी पूंजी है जिस पर तरस खाकर लोग अपनी अंटी ढीली करते हैं। इसलिए वह अपनी अपंगता को खोना नहीं चाहता। मुफ्तखोर पप्पू को अपना आदर्श मानने वालों की तादाद बढती चली जा रही है। कुछ ने तो अपने हाथ-पैर तुडवा कर पप्पू की तरह भीख के धंधे में उतरने की ठान ली है। अपने नाम का डंका बजने से पप्पू गदगद है। उसने एक स्कूल खोलने की भी सोची है जिसमें बेरोजगारों को भीख मांगने की कला से परिचित कराया जाएगा। वैसे भी पप्पू एक चलती-फिरती अनोखी पाठशाला है। इस पाठशाला के विद्यार्थी दूसरों की जेबों पर नजर रखते हैं। यह लोग मेहनतकशों और ईमानदारों को बेवकूफ समझते हैं।
अगर नीयत में खोट न हो और अपने बलबूते पर कुछ कर गुजरने की जिद्दी तमन्ना हो तो हर तकलीफ और मुश्किल को चुटकियां बजाते हुए मात दी जा सकती है। भोपाल की सांत्वना आरस ने हाथ-पैर से लाचार होते हुए भी वो कर दिखाया है जिससे सार्थक प्रेरणा लेकर हालात के घने से घने अंधेरे को उजाले में बदला जा सकता है। सांत्वना बचपन से ही एक ऐसी बीमारी से पीडित हैं जिसने उसे लाचार बनाकर रख दिया। लेकिन वह टूटी और हारी नहीं। वह अपने दम पर खडी हो पाने में अक्षम हैं। किसी सहारे के बिना हाथ ऊपर नहीं उठ पाता। शारीरिक निर्बलता के चलते वह टेबल पर हाथ रखने में असमर्थ हैं। इसके लिए दूसरे का सहारा लेना पडता है। तब कहीं जाकर लिख और पढ पाती हैं। माता-पिता ने उसके इलाज के लिए ढेरों कोशिशें कीं। बडे से बडे काबिल डाक्टरों ने आखिरकार असमर्थता जता दी। सांत्वना ने बचपन में ही चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का सपना देखा था। अपने सपने को साकार करने के लिए सांत्वना ने मजबूत इरादों का हाथ थामा और आखिरकार चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने में सफल हो गयीं। जो लडकी खडी भी नहीं हो पाती उसका सीए बनने का सफर वाकई काफी चौंकाने वाला है। सांत्वना अपनी मनपसंद कोचिंग में पढायी करने से भी वंचित रहीं। भोपाल में सीए की ज्यादातर कोचिंग दूसरे या तीसरे माले पर हैं और उस पर लिफ्ट का भी अभाव। जिसके लिए अपने पैरों पर खडे होना नामुमकिन है, वह कष्टदायक सीढियां कैसे चढ पाती। बार-बार तबीयत बिगडने के कारण सांत्वना के समक्ष कई अडचने आयीं। पर उन्होंने अपनी जिद नहीं छोडी, अपने सपने को पूरा कर ही दम लिया।
पप्पू कुमार कितनी भी माया जुटा ले, लेकिन अंतत: उसे ऐसी मौत मरना है जहां कोई दो आंसू भी नहीं बहाने आता। कर्मठ और जुनूनी सांत्वना आरस की दास्तान हमेशा लोगों को प्रेरणा देती और उन्हें जगाती रहेगी।

Thursday, January 22, 2015

जिधर दम... उधर हम

"यह चुनाव का समय है। दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा के होश उड चुके हैं। ऐसे में इन दोनों पार्टियों के चेहरे आपका वोट खरीदने के लिए नोटों की बरसात करेंगे। आप उनसे नोट लेने में कोई संकोच न करना। बस चुपचाप नोटों को जेब के हवाले कर देना। यदि कहीं यह लोग नोट देने नहीं आते तो आप उनके कार्यालयों में जाना और बेझिझक नोट मांगना। मेरा आप सभी को यही सुझाव है कि इन दोनों दलों से कडकते नोट जरूर लेना और अपना कीमती वोट सिर्फ और सिर्फ झाडू को ही देना।"
यह वो ज्ञान का भंडार है जो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के द्वारा दिल्ली विधानसभा के चुनावी मंचों पर खडे होकर बांटा गया। आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल बहुत बडे विद्धान हैं। ज्ञानी-ध्यानी हैं। देश और दुनिया के जाने-माने समाजसेवक अन्ना हजारे के प्रिय शिष्य रहे हैं। अन्ना आंदोलन से पूरी सक्रियता के साथ जुडे रहे हैं। इसी आंदोलन के जरिए ही उन्होंने तथा किरण बेदी और कुमार विश्वास आदि ने सुर्खियां पायीं और नायक बन गये। अरविंद केजरीवाल ने तो महानायक का दर्जा हासिल कर लिया। एक समय ऐसा था जब अन्ना के बिना चेलों का पत्ता भी नहीं हिलता था। आज वही चेले बहुत आगे निकल गये हैं। गुरु ने गुमनामी की चादर ओढ ली है। अलग-थलग पड गये हैं। कभी-कभार उनके हिलने-डुलने के समाचार आ जाते हैं। वो दौर तो अब सपना हुआ जब देशभर में अन्ना हजारे के ढोल की थाप सुनायी देती थी। सभी न्यूज चैनल वाले उनके आगे-पीछे दौडते थे। सत्ता उन्हें सलाम करती थी। बडे-बडे राजनेता उनके मंच पर विराजमान होने के लिए तरसते थे। अन्ना किसी को भाव नहीं देते थे। उन्हें तो लगभग सभी नेता भ्रष्ट नजर आते थे। दरअसल, उन्हें तो राजनीति से भी चिढ थी। तभी तो वे अपने सभी शिष्यों को राजनीति के निकट भी न फटकने की सीख देते रहते थे। उन्हें अपने चेलों पर बडा नाज था। उन्हें यकीन था कि चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन उनके चेले भटकेंगे नहीं। उनके पढाए पाठ को सदैव याद रखेंगे। दरअसल गुरु भूल गए थे कि यह भ्रमयुग है, धर्मयुग नहीं। यहां अपना काम निकालने के लिए मुखौटे लगाए जाते हैं। अंदर ही अंदर छल-कपट के ऐसे-ऐसे जाल बुने जाते हैं कि किसी को भनक भी नहीं लगती। अन्ना के चेलों ने वही किया जो उन्हें करना था। उन्हें पता था कि गुरु की नाव में इतना दम नहीं जो उन्हें वहां तक पहुंचा सके, जहां तक की उनकी चाह है। इसलिए उन्हें सीढी बनाया गया। ऊपर चढते ही सीढी जमीन पर धराशायी कर दी गयी। अन्ना स्तब्ध रह गये। धोखे पर धोखे खाना उनकी नियति है। मस्तमौला। कोई आगे न पीछे। चेलों का भरा-पूरा परिवार। एक छोटी-सी जिन्दगी और सपने अपार। आज अन्ना की बस्ती खाली है। इधर अन्ना के चेले राजनीति के समंदर में छलांग लगा कर मोती तलाशने में लगे हैं। उधर रालेगण सिद्धि में अन्ना अपना माथा पीट रहे हैं। दिल्ली की सत्ता को पाने के लिए उनके शार्गिद आमने-सामने हैं। उनका अब तो एक ही लक्ष्य है किसी भी तरह से सत्ता सुंदरी की बांहों में सिमटकर अपनी तमाम महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति कर गुजरना।
अन्ना का भ्रष्टाचारियों से लडने और भ्रष्टाचार को जड से खत्म करने का नारा था। उनके अनुयायी अरविंद केजरीवाल वोटरों को भ्रष्ट होने की सीख देते फिर रहे हैं। केजरीवाल जैसा आचरण कर रहे हैं वैसे लगते तो नहीं थे। क्या अब यही मान लें कि सत्ता की चाह सोच और इरादे बदलने को मजबूर कर देती है? भ्रष्टाचार से परेशान और आहत करोडों लोगों ने उन्हें ऐसा क्रांतिदूत माना था जिसमें भ्रष्टाचार से लडने और देश की तस्वीर बदलने का माद्दा दिखता था। उन्होंने वोटरों को नोट लेने की सलाह देकर खुद की छवि पर आडी-टेढी लकीरें खींच दी हैं। उनकी पहचान ही धुंधला गयी है। कौन नहीं जानता कि इस देश में मतदाताओं को खरीदने की बडी पुरानी परिपाटी है। कई नेताओं ने इस रास्ते पर चलकर सत्ता का भरपूर स्वाद चखा है। लोग उन्हें पहचानते हैं। उन्हें कोसते और गालियां भी देते हैं। लेकिन कुछ कर नहीं पाते। क्या केजरीवाल ऐसे बेइमानों की कतार लगा देना चाहते हैं? शुरु-शुरु में तो केजरीवाल की सादगी और स्पष्टवादिता लोगों को खूब भायी थी। ऐसा लगा था कि वाकई आम लोगों के हकों की लडाई लडने के लिए किसी सच्चे इंसान ने अपनी कमर कस ली है। लेकिन वो सपना अपनी मौत मरता दिखायी दे रहा है।
यह किरण बेदी ही थीं जो कभी गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्वीट पर ट्वीट किया करती थीं। भारतीय जनता पार्टी को सांम्प्रदायिकता के रंग में रंगी और भ्रष्टाचार की कालिख में डूबी पार्टी बताया करती थीं। तब उनके लिए मोदी हत्यारे थे। मोदी यदि प्रधानमंत्री नहीं बनते तो किरण बेदी की सोच नहीं बदलती। चढते सूरज को सभी सलाम करते हैं। किरण ने भी वही किया। आज मोदी उनके लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं। उन्हीं ने तो उन्हें वो सम्मान दिलाया है जिसके लिए वे तरस रही थीं। यकीनन यह राजनीतिक अवसरवादिता की पराकाष्ठा है। अन्ना के मंचों पर उछलती-कूदती रहीं किरण ने यह दिखावा भी किया था कि उन्हें राजनीति से कोई लगाव नहीं है। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने जब राजनीति की राह पकडी तो वे उन्हें भटके हुए लोगों का कारवां बताती रहीं। दरअसल, किरण को अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व स्वीकार नहीं था। वे किसी के नीचे रहकर काम कर ही नहीं सकतीं। अफसरी वाला अहंकार और रूतबा आज भी उन पर हावी है। इस पूर्व महिला अधिकारी ने हमेशा अपने आप को दूसरों से ऊपर समझा है और जिधर दम उधर हम के उसूल पर चलती रही हैं। उनका दिली लगाव और जुडाव कभी किसी से नहीं रहा। लगता है दिल्ली ऐसे अवसरवादियों के नेतृत्व को झेलने को विवश है।