Thursday, June 18, 2015

नशा... नशा और नशा

इसी देश में एक गांव है, नानीदेवती। मात्र पैंतीस सौ के आसपास की जनसंख्या वाले इस छोटे से गांव में देसी शराब के दस अड्डे थे। सभी अड्डों पर जमकर शराबखोरी होती थी। सुबह, शाम गुलजार रहते थे सभी मयखाने। अपने काम धंधे को छोडकर युवक यहीं जमे रहते थे। कुछ बुजुर्ग भी रसरंजन के लिए पहुंच जाते थे। अपराध भी बढते चले जा रहे थे। पांच साल के भीतर १०० से अधिक युवक शराब की लत के चलते मौत के मुंह में समा गए। युवा बेटों की एक के बाद एक कर मौत के सिलसिले ने मां-बाप को तो रूलाया ही, गांव के चिंतनशील तमाम बुजुर्गों को भी झकझोर कर रख दिया। आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा? शराब की लत के शिकार होकर उनके गांव के बच्चे यूं ही अपनी जान गंवाते रहेंगे! शराबखोरी से लगातार हो रही मौतों से शराब कारोबारी भी पूरी तरह से अवगत थे। बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं ने उन्हें कई बार गांव से अपने शराब के अड्डे हटाने की फरियाद की। उनमें इंसानियत होती तो मानते! उनके लिए तो कमायी ही सबकुछ थी। युवकों की बरबादी और बदहाली उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। माल कमाना ही उनका एकमात्र ईमान धर्म था। जागरूक गांव वालों को समझ में आ गया कि धनलोभियों से किसी भी तरह की उम्मीद रखना व्यर्थ है। लगभग एक महीने पूर्व ग्रामवासी एक साथ एकत्रित हुए। शराब से मुक्ति पाने के लिए विचार-मंथन करने के बाद यही निष्कर्ष निकला कि गांव में शराब पीने पर पर प्रतिबंध लगाये बिना युवकों की मौत पर विराम नहीं लगाया जा सकता। सभी ने शराब को हाथ भी न लगाने की कसम खायी। यह भी तय किया गया कि जो भी व्यक्ति शराब पीता पाया गया उसे पांच हजार से लेकर पचास हजार तक का जुर्माना देना होगा। बुजुर्गों की सीख का युवकों पर भरपूर असर पडा। उनकी आंखें खुल गयीं। अब नानीदेवती गांव शराब से मुक्ति पा चुका है। शराब के सभी अड्डे भी बंद हो चुके हैं।
जावद (नीमच) के रहने वाले बंसीलाल बडोला को बीडी पीने का जबरदस्त शौक था। बचपन में ही उन्होंने यह गंदी आदत पाल ली थी। घरवाले उनकी इस लत से बेहद परेशान थे। साठ साल के बंसीलाल ने अपनी वसीयत में यह लिखवा दिया था कि-'अर्थी में दो बंडल बीडी और माचिस जरूर रख देना, अंतिम सफर बडे मज़े से कटेगा।' यही बंसीलाल एक दिन अचानक किसी संत का प्रवचन सुनने के लिए पहुंच गए। संत धूम्रपान से बचने का संदेश देते हुए बता रहे थे कि तंबाकू, बीडी, सिगरेट के इस्तेमाल से अस्थमा, हृदयघात व पक्षाघात की जानलेवा बीमारियां तो होती हैं, इंसान का जीवन भी नर्क बन जाता है। कैंसर जैसी असाध्य बीमारी भी तंबाकू की देन है। तंबाकू में करीब चार हजार खतरनाक रसायन होते हैं, जिसमें ७० रसायन कैंसरवाले होते हैं। बंसीलाल पर उनका इतना प्रभाव पडा कि उन्होंने अपनी जेब से बीडी के बंडल और माचिस को निकाला और संत के सामने तोड दिया। कभी बीडी के गुलाम रहे बंसीलाल बीडी से तौबा कर चुके हैं, उन्होंने खुद को भी बीडी-सिगरेट पीनेवालों को सुधारने के अभियान में झोंक दिया है। वे घूम-घूम कर नुक्कड सभाएं करते हैं। धूम्रपान की बुराइयों से लोगों को अवगत कराते हैं और खुद का उदाहरण भी देते हैं। जो लोग धूम्रपान से मुक्ति पाने को तैयार हो जाते हैं उन्हें मंदिर में ले जाकर बीडी सिगरेट कभी भी नहीं पीने की शपथ दिलवाते हैं। बंसीलाल का यह अभियान खूब रंग ला रहा है। सैकडों लोग उनकी सलाह का अनुसरण कर धूम्रपान से दूरी बना चुके हैं। बंसीलाल ने ठान लिया है कि वे जीवनपर्यंत धूम्रपान विरोधी अभियान में लगे रहेंगे। इसलिए उन्होंने अपना टेंट व्यवसाय पूरी तरह से अपने बच्चों के हवाले कर दिया है।
विगत दो दशकों में हमारे देश में शराब की खपत में ५५ से ६० प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। महानगरों में होने वाली सडक दुर्घटनाओं में शराब के नशे का काफी बडा योगदान रहता है। भारत में सतत घटने वाली बलात्कार की घटनाओं के इजाफे में शराब की बहुत बडी भागीदारी है। मुंबई की एक शराबी महिला को जेल की हवा खानी पडी। यह महिला एक नामी वकील हैं। नाम है जान्हवी गडकर। रिलायंस की टॉप लीगल एग्जीक्यूटिव हैं। नशे ने उनकी जिन्दगी तबाह कर डाली। अच्छे-खासे भविष्य का सत्यानाश हो गया। फिल्म अभिनेता सलमान खान की तरह जान्हवी ने नशे में मदमस्त होकर पांच लोगों को कुचल दिया। दो की मौत हो गयी। अपनी आलीशान ऑडी कार को लिमिट से चार गुना अधिक शराब पीकर चलाने वाली यह मदहोश वकील यातायात के सभी नियमों को भूलकर कार चला रही थी और खूनी दुर्घटना को अंजाम दे बैठीं।
एक जमाना था जब यह माना जाता था कि नशे पर पुरुषों का ही एकाधिकार है। महिलाएं बहुत कम शराब पीती देखी जाती थीं। अब तो अनेक नारियों ने भी शराबखोरी में जैसे बाजी मार ली है। पिछले दिनों मुंबई में ही यातायात पुलिस ने स‹डक पर अंधाधुंध कार दौडाती एक आधुनिक महिला को रोका। महिला ने कार में बैठे-बैठे ही पुलिस वालों पर भद्दी-भद्दी गालियों की बौछार शुरू कर दी। पुरुषों की बेहूदगी के अभ्यस्त पुलिसवाले महिला के मदमस्त व्यवहार से दंग रह गए। ऐसे नजारे अब आम होते चले जा रहे हैं। नशे की लत में अपना तथा परिवार का जीवन नर्क बनाने वालों की असंख्य भयावह दास्तानें हैं। यह सिलसिला यूं ही नहीं थमने वाला। सरकार-वरकार कुछ भी नहीं करने वाली। जब लोग खुद जागेंगे तभी नशे का अंधेरा छंटेगा और उजाला होगा।

Thursday, June 11, 2015

यह कैसा मकडजाल है!

यह तो साफ-साफ दिख रहा है कि यह आईना देखने का नहीं, आईने तोडने का दौर है। कहने को लोकतंत्र है, लेकिन जिनके हाथ में सत्ता है, उनकी ही मनमानी चल रही है। आदर्शो और सिद्धांतो के ढोल की पोल खुलती चली जा रही है। इस देश के अधिकांश अधिकारी अपने मन के राजा हैं। जनता की तकलीफों का हल करना तो दूर, उनकी सुनने में भी आनाकानी की जाती है। जब यही जनता सडकों पर उतरती है, तोडफोड करती है तो शासन और प्रशासन सक्रिय होने का नाटक करता है। आंध्रप्रदेश स्थित गुंटुर के अधिकांश लोग, खासकर महिलाए शराब की घोर विरोधी हैं। यहां के कई घर शराब की वजह से बरबाद हो चुके हैं। इसी गुंटुर में कुछ दिनों पूर्व ऐन महात्मा गांधी की प्रतिमा के समीप एक शराब खाने का शुभारम्भ हो गया। लोग हक्के-बक्के रह गये। उनके गांव में यह क्या हो गया? बापू की प्रतिमा के एकदम निकट मयखाना! यह तो उस महात्मा का घोर अपमान है जिसने जीवनपर्यंत शराब की खिलाफत की। शराब विरोधी जागरूक जनता सडकों पर उतर आयी। सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की गयी। खूब शोर मचा। जब प्रशासन ने देखा कि गुस्साये लोग आसानी से मानने वाले नहीं हैं तो उसने रातों-रात एक अजब-गजब रास्ता निकाला। मयखाने पर ताले लगवाने के बजाय महात्मा गांधी की प्रतिमा को ही वहां से हटा कर दूसरी जगह स्थापित कर दिया।
प्रशासन की इस शर्मनाक हरकत से लोग हैरान-परेशान हैं। नाराज लोगों का कहना है कि शराब बार के १०० मीटर के दायरे में एक मंदिर और मस्जिद भी है, तो क्या उन्हें भी वहां से हटाया जाएगा? तय है कि लोगों का विरोध थमने वाला नहीं है। इस देश में ऐसे मज़ाक होते ही रहते हैं। इस खेल में उद्योगपति, व्यापारी, राजनेता, अभिनेता, खिलाडी, अफसर, योगी-भोगी आदि सभी शामिल हैं। इन दिनों मैगी को लेकर खूब हंगामा मचा है। वर्षों से खायी, पकायी जाने वाली मैगी के एकाएक खतरनाक होने के खुलासे के भीतरी सच को भी समझना जरूरी है। एक विदेशी कंपनी अरबो-खरबों का विषैला धंधा करती है और प्रशासन सोया रहता है। वह कंपनी अखबारों और न्यूज चैनल वालों को अरबों रुपये के विज्ञापन देकर मैगी के फायदेमंद होने का ढिंढोरा पीटते हुए कहा से कहां पहुंच जाती है। मैगी के प्रचार में नामी-गिरामी, हीरो-हीरोइन को भी शामिल कर लिया जाता है। कोई भी यह पता लगाने की कोशिश नहीं करता कि आखिर मैगी की हकीकत क्या है। सब अपना-अपना हिस्सा लेकर अंधे और बहरे बने रहते हैं। कंपनी चाहे देशी हो या विदेशी वह तो अपने ब्रांड को प्रचारित करने के लिए सभी तरीके आजमाती हैं। दोषी तो वो लोग हैं जो लालच के वशीभूत होकर हकीकत को नजरअंदाज कर देते हैं। न्यूज चैनलों और अखबारों में शराब के विज्ञापन बडी चालाकी से दिखाये और छापे जाते हैं। सोडा की आड में खुल्लम-खुला शराब का ही प्रचार किया जाता है। दुनिया की नामी-गिरामी कंपनी नेस्ले का कारोबार दो सौ से ज्यादा देशों में चलता है। ऐसी कंपनियां धंधे के सभी गुर जानती हैं। उन्हें यह भी पता होता है कि किस-किस को कैसा-कैसा चारा डालकर अपने बस में करना है। सत्ता को साधने में तो इन्हें महारत हासिल होती है। राजनेता और नौकरशाह इनके लालच के जाल में बडी आसानी से फंस जाते हैं। मैगी बनाने वाली विदेशी कंपनी नेस्ले ने यूं ही भारत में अपना कारोबार नहीं जमाया। सभी के भरपूर साथ और सहयोग की बदौलत ही उसने जहरीली मैगी को घर-घर तक पहुंचाने में ऐतिहासिक सफलता पायी।
अपने यहां मिलावटखोरी की असंख्य खबरें सुर्खियां पाती हैं। लोगों की जान से खिलवाड करने वाले मिलावटखोर बडी आसानी से बच निकलते हैं। खाद्य और औषधि विभाग के अधिकारी अपने कर्तव्य को रिश्वतखोरी पर कुर्बान कर देते हैं। देश में कहने को तो पुलिस, आबकारी, अन्न औषधि विभाग से लेकर ढेरों जांच एजेंसियां हैं, लेकिन इनकी कार्यप्रणाली किसी अबूझ पहेली से कम नहीं। भारत दुनिया का ऐसा अजूबा देश है जहां अवैध शराब पीने वालों की मौतों का सिलसिला सतत चलता रहता है। हालात यह हैं कि अब तो मीडिया भी ऐसी मौतों को नजरअंदाज करने लगा है। कौन नहीं जानता कि त्यौहारों के निकट आते ही देशभर में मिलावटी मिठाइयों की बाढ आ जाती है। जितना दूध नहीं होता उससे हजार गुना दूध की मिठाइयां दुकानों के शोकेस में सज जाती हैं। कई मिलावटखोर पकडे जाते हैं, लेकिन दान-दक्षिणा देकर छूट जाते हैं।
दरअसल, देशवासी मिलावटखोरों के जिस मकडजाल में फंस चुके हैं उससे बच निकलना आसान नहीं है। न जाने कितने ऐसे उत्पाद हैं जिनकी बिक्री के लिए संबंधित विभाग से स्वीकृति ही नहीं ली जाती। अपने देश में सब चलता है कि नीति वर्षों से चलती चली आ रही है। दुनिया के अधिकांश देशों में किसी भी खाद्य पदार्थ के बाजार में आने से पहले उसकी कडी जांच होती है। वहां पर अपने फर्ज की अनदेखी करने वालों को कतई नहीं बख्शा जाता। देश में मैगी नुडल्स पर बैन लगने की खबरों के फौरन बाद यह खबर भी आयी कि रामदेव बाबा शीघ्र ही 'पतंजलि ब्रांड' की मैगी बाजार में उतारने जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि योगी रामदेव को मैगी के रूखसत होने की पहले से ही जानकारी मिल चुकी थी। कहने को तो वे योगी हैं, लेकिन उनका व्यापार के प्रति प्रगाढ लगाव सर्वविदित है। उनके कारखानों में बनने वाले कई सामानों पर उंगलियां उठती रही हैं। अभी तो रामदेव ने ही बच्चों को सेहतमंद मैगी उपलब्ध कराने का ऐलान किया है। वो दिन दूर नही जब अंबानी और अदानी भी मैगी, दूध पाउडर, चाकलेट और अन्य जंक फूड के साथ देश के तमाम बाजारों में खडे नजर आयेंगे। नयी सरकार है तो कुछ नया भी तो होना चाहिए। अपनों को धन कमाने का भरपूर सुअवसर अब नहीं तो कब मिलेगा! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूं ही तो नहीं 'मेक इन इंडिया' के नारे को उछाला है।

Thursday, June 4, 2015

पत्रकारिता का धर्म

सबसे पहले उन लाखों पाठकों का वंदन, अभिनंदन और शुक्रिया जिनकी बदौलत 'राष्ट्र पत्रिका' अपने सफलतम प्रकाशन के सातवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है। हम अपने सभी शुभचिंतकों, सहयोगियों के भी तहे दिल से आभारी हैं, जिनकी आत्मीयता और अटूट सहयोग ने हमारा मनोबल बढाया। इस सच से हर कोई वाकिफ है कि आज के जमाने में अखबार निकालने के लिए भरपूर धन चाहिए। 'राष्ट्र पत्रिका' यकीनन देश का पहला समाचार पत्र है जिस पर किसी धनवान का वरदहस्त नहीं है। किसी राजनीतिक पार्टी और राजनेता से भी कोई करीबी रिश्ता नहीं है। 'राष्ट्र पत्रिका' के तो देश के लाखों पाठक और शुभचिंतक ही असली साथी हैं। इन्हीं की बदौलत हम निष्पक्षता और निर्भीकता की पत्रकारिता के धर्म को निभाने में सक्षम हो पाये हैं। 'राष्ट्र पत्रिका' की सफलता ने इस धारणा की भी धज्जियां उडा कर रख दी हैं कि सिर्फ पूंजीपति ही अखबार निकाल सकते हैं। समर्पित पत्रकारों के लिए तो उनके यहां चाकरी करने के अलावा और कोई चारा ही नहीं है।
पिछले दस-बारह वर्षों से जो मंजर सामने आये हैं वे चीख-चीख कर बता रहे हैं कि जिन अखबार मालिकों, संपादकों और पत्रकारों को सत्ता और राजनेताओं से भरपूर पोषण मिलता है उनसे निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अखबारों का स्वतंत्र होना जरूरी है। उन पर किसी के दबाव का मतलब है पत्रकारिता का दिशाहीन होकर किसी खतरनाक ताकत का गुलाम हो जाना। 'राष्ट्र पत्रिका' का दावा है कि इसका झुकाव सिर्फ और सिर्फ पाठकों की ओर है। देश और देशवासी ही हमारे लिए सर्वोपरि हैं। कोई भी प्रलोभन और ताकत इसे डिगा नहीं सकती। 'राष्ट्र पत्रिका' की निष्पक्षता के साथ एक सच और भी जुडा है कि इसमें पूर्वाग्रह से ग्रस्त खबरों के लिए कोई जगह नहीं है। 'राष्ट्र पत्रिका' में हर तरह की खबरें छापी जाती हैं। इसमें सिर्फ महानगरों को ही प्राथमिकता नहीं दी जाती। छोटे-बडे, ग्रामों और कस्बों की खबरें भी सुर्खियां पाती हैं। किसानों, मजदूरों, कलाकारों, अभावों में रहकर इतिहास रचने वाले चेहरों, दलितो-शोषितों और अन्याय ग्रस्त तमाम हिन्दुस्तानियों का मंच है 'राष्ट्र पत्रिका'। यहां किसी से कोई भेदभाव नहीं किया जाता।
आज मीडिया पर अविश्वास के काले बादल छाये हैं। कुछ बिकाऊ पत्रकारों और संपादकों के द्वारा पत्रकारिता के पवित्र पेशे को कलंकित कर दिए जाने के कारण पत्रकारिता को बाजारू और वेश्या तक का दर्जा दिया जाने लगा है। 'राष्ट्र पत्रिका' किसी को बख्शने और किसी को दबोचने की नीति पर चलने में यकीन नहीं रखता। पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे नाटककार भी है जो गणेश शंकर विद्यार्थी, सुरेंद्र प्रताप सिंह, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर जैसे मूर्घन्य संपादकों को अपना आदर्श घोषित करते नहीं थकते, लेकिन इनका असली सच कुछ और ही देखने में आता है। यह कलमकार उन संपादकों को जानता है जिनका सत्ता की दलाली करना एकमात्र पेशा है। यह महान बुद्धिजीवी किसी नौकरशाह का स्थानांतरण करवाने, किसी उद्योगपति को सरकारी जमीन दिलवाने और कारखानों का लायसेंस दिलवाने आदि...आदि के लिए कमीशनखोरी करते हैं। यह धुरंधर अपने संबंधों को भुनाने के लिए यहां से वहां सतत उडते रहते हैं। फिर भी प्रगतिशील संपादक कहलाते हैं। ऐसे संपादकों की अच्छी खासी सेना तैयार हो चुकी है जो सिर्फ और सिर्फ इन्हें अपना आदर्श मानते हुए दिन रात सत्ताधीशों, राजनेताओं, दलालों, भ्रष्ट समाजसेवकों और काले कारोबार के सरगनाओं से रिश्ते बनाने में लगी रहती है।
देश के नब्बे प्रतिशत अखबारों पर उद्योगपतियों, बिल्डरों, खनिज माफियाओं, अपराधियों और घुटे हुए राजनेताओं का कब्जा है। उनके अखबारों पर भी किसी न किसी राजनीतिक दल का ठप्पा लगा रहता है। यह अखबारीलाल सत्ता के इशारे पर ही नाचते है। जिधर दम, उधर हम की नीति से चलना इनकी फितरत है। चाटुकारिता की पत्रकारिता की बदौलत ही इनके सभी सपने पूरे हो जाते हैं। उद्योगधंधे लग जाते हैं। अरबो-खरबों की कोयले की खदानें मिल जाती हैं। राज्यसभा में पहुंचने का सपना भी पूरा हो जाता है। इन्हीं कुटिल धंधेबाजों के कारण ही कुछ प्रबुद्धजन पत्रकारिता को बिकाऊ और वेश्या का दर्जा देने से नहीं हिचकते। अभी हाल ही में एक व्यवसायी अखबार मालिक की खिलखिलाती तस्वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देखने में आयी। यह महाशय कांग्रेस की मेहरबानी के चलते राज्यसभा का सदस्य भी बनते चले आ रहे हैं। कांग्रेस, सोनिया गांधी और राहुल गांधी का महिमामंडन कर इन्होंने महाराष्ट्र में अखबारों की कतार लगा दी। एक न्यूज चैनल पर भी कब्जा कर लिया। डॉ. मनमोहन के शासन काल में इस सफेदपोश ने अरबों-खरबों की कोयला खदाने हथिया कर अच्छी-खासी सुर्खियां पायी थीं। जेल जाने की नौबत भी आ गयी थी। अब देश में आयी परिवर्तन की लहर के चलते भाजपा और नरेंद्र मोदी की सरकार है। पिछले एक वर्ष से इस धनपति अखबारीलाल को भाजपा, कांग्रेस से बेहतर नजर आने लगी है। इसलिए जैसे ही नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक वर्ष पूर्ण किया तो इस 'हुनरबाज' ने एक विशेषांक निकाला जिसे नाम दिया- 'मोदी महान'। भाजपा सरकार की आरती से परिपूर्ण इस विशेषांक को दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके कंधे पर हाथ रखकर ऐसी धांसू तस्वीर खिंचवायी और अपने सभी अखबारों में छपवायी कि देखने वालों को बस यही लगा कि मोदी से तो इनकी काफी घनिष्ठता है, बडा पुराना याराना है। भाजपा के शासन काल में भी इनका बाल भी बांका नहीं होने वाला। इसे कहते हैं दोनों हाथों में लड्डू रखना और हर किसी को खुश रखते हुए अपना काम निकालते जाना।
हम ऐसे अखबार मालिकों, संपादकों और पत्रकारों को पत्रकारिता का सबसे बडा शत्रु मानते हैं। इनके होते हुए पत्रकारिता की पवित्रता बरकरार नहीं रह सकती। आज देश बहुत बडे संकट से जूझ रहा है। प्रांत, जाति, धर्म, पहनावे और खानपान के आधार पर विभाजन की रेखाएं खींची जा रही हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में साप्ताहिक 'राष्ट्र पत्रिका' अपने कर्तव्य और दायित्व को नजरअंदाज नहीं कर सकता। मनमोहन सरकार की तरह नरेंद्र मोदी सरकार में भी कई खामियां हैं। इसमें भी ऐसे भ्रष्ट और दागी हैं जो लूटपाट के मौकों की तलाश में हैं। ईमानदारी से जनसेवा करना इन 'पूर्ति कुमारों' के बस की बात नहीं है। इन्होंने करोडों रुपये लुटाकर लोकसभा चुनाव जीता है। जब खर्च किया है तो किसी भी हालत में वसूलेंगे भी। भाजपा के कुछ सांसदो, साध्वी-साधुओं के बयान भी साम्प्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की हत्या करने का ताना-बाना बुनते दिखायी देते हैं। उन्हें किसी का भी भय नहीं दिखता। ऐसे में देश के अल्पसंख्यकों में दहशत व्याप्त है। इस देश पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सबका बराबर का अधिकार है। किसी की भी अवहेलना, अपमान और नजरअंदाजी लोकतंत्र का अपमान है। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। देश और देशवासियों को जगाए और जोडे रखना इसका फर्ज भी है और धर्म भी। 'राष्ट्र पत्रिका' की वर्षगांठ के शुभअवसर पर सभी पाठकों, विज्ञापनदाताओं, संवाददाताओं, एजेंट बंधुओं, सहयोगियों, शुभचिंतकों को असीम शुभकामनाएं... बधाई...।

Thursday, May 28, 2015

बेचैनी और बौखलाहट

नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल। इनकी बेतहाशा प्रचार की लालसा और कुछ कर गुजरने के जुनून को देखते हुए यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि यह दोनों धुरंधर आसानी से राजनीतिक हाशिए में जाने वाले नहीं हैं। एक को हम वर्षों से राजनीति में देखते चले आ रहे हैं, दूसरा नया है, लेकिन उसका हौसला भी अटूट है। यह नरेंद्र और अरविंद का दौर है। दोनों का दावा है कि उनके राज में भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया है। भ्रष्टाचारियों को सांप सूंघ गया है। उनकी घिग्गी बंध चुकी है। एक दिल्ली की तरक्की के ढोल पीट रहा है, दूसरा पूरे देश में बुरे दिनों की विदायी के दावे कर रहा है। दोनों अखबारों और न्यूज चैनलो में छाये हैं। दोनों ने सत्ता पर काबिज होने के लिए वादों की झडी लगाने में एक दूसरे को मात देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
नरेंद्र मोदी आज भारत वर्ष के प्रधानमंत्री हैं तो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री। मोदी की सत्ता का पहला साल पूरा होने पर देशभर में जश्न मनाया गया। सरकार की उपलब्धियां गिनायी गयीं। विरोधियों ने मजाक उडाया तो प्रशंसकों ने तारीफों के पुल बांधे। मोदी की सरकार को सूट-बूट वाली लुटेरी सरकार कहने वाले मानते हैं कि इस सरकार ने मीडिया को साधने और खोखला प्रचार पाने के अलावा और कुछ नहीं किया। नरेंद्र मोदी को तो अखबारों और न्यूज चैनल वालो को पटाने में महारत हासिल है। इस कला में यदि कांग्रेसी पारंगत होते तो उन्हें यह दिन नहीं देखने पडते। भाजपा में ऐसे कलाकारों की भरमार है जो तिल को ताड बनाना जानते हैं। नरेंद्र मोदी उनके गुरु हैं। कांग्रेस ने जो योजनाएं बनायी थीं उन्हीं को नयी पैकिंग के साथ पेश कर दिया गया है। स्वच्छता अभियान, जनधन योजना, बीमा, पेंशन योजना, आदर्श ग्राम, सडकों और रेल की नई योजनाओं में कोई दम नहीं है। देश की सबसे बडी समस्या बेरोजगारी है। मोदी सरकार के पास इस समस्या का कोई हल नहीं है। इस सरकार के राज में अल्पसंख्यक भी खुश नहीं हैं। नरेंद्र मोदी भारत वर्ष को चीन के समकक्ष खडा करना चाहते हैं। वे बार-बार 'मेक इन इंडिया' की बात करते हैं, लेकिन इसे साकार करने की दिशा में कोई प्रभावी कदम उठाते नहीं दिखते। बातें करने से क्या होता है?
दरअसल, विरोधियों को मोदी पर भरोसा नहीं। लेकिन देश की आधी आबादी तो यह मानती है कि अच्छे दिनों के आने का अहसास तो होने लगा है। महंगाई काबू में है। भ्रष्टाचार पर भी कुछ-कुछ अंकुश लगा ही है। भ्रष्टाचारियों का सतर्क हो जाना कहीं न कहीं यह दर्शाता है कि उन्हे सरकार का डर है। डॉ. मनमोहन सिंह के राज में भ्रष्टाचारी बेखौफ थे। मंत्री और अफसरों तक को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट मिली हुई थी। तब भ्रष्टाचार की खबरें ही छायी रहती थीं। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार के किसी भी मंत्री पर भ्रष्टाचार के किसी भी आरोप का न लगना उम्मीद और यकीन का सकारात्मक भाव तो जगाता ही है। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, अटल पेंशन योजना और स्वच्छता अभियान आदि में विरोधियों को भले ही कोई दम नजर नहीं आता हो, लेकिन करोडो देशवासी यह मानते हैं कि कम से कम मोदी ने अच्छी शुरुआत तो की। मोदी के विदेशों के दौरों को लेकर विपक्षी हल्ला मचाये हैं। वे यह भूल जाते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के विदेश के दौरों का एक बडा मकसद यह भी है कि भारत में निवेश के लिए भारी मात्रा में विदेशी धन आए। इसमें सफलता भी मिलती दिखायी दे रही है। सकारात्मक माहौल बनने लगा है। मोदी की मंशा अपने ही देश में अधिकतम कारखाने लगाकर वो सभी सामान बनाने की है जिनका हम आजादी के बाद से निर्यात करते चले आ रहे हैं। वर्षों से दूसरे देशों के मोहताज रहे देश के स्वावलंबी बनाने से निश्चय ही देश का मान बढेगा! अच्छे काम की प्रशंसा में कंजूशी जचती नहीं।
दिल्ली के शासक के रूप में अरविंद केजरीवाल भी कहीं कमतर नजर नहीं आते। उनकी राह में कंटक बिछाने की साजिशें उनके हौसले को पस्त नहीं कर पायीं। दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल नजीब जंग के बीच की लडाई के चलते केंद्र सरकार पर जो उंगलियां उठ रही हैं, वह नरेंद्र मोदी की छवि को धूमिल करती हैं। उस भाजपा को भी कठघरे में खडा करती हैं, जिसकी दिल्ली में दाल नहीं गल पायी। केजरीवाल की ऐसी छवि बनाने की कोशिश की जा रही है कि यह शख्स सरकार चलाने के बजाय केंद्र से टकराने को लालायित है। इसे सिर्फ धरना-प्रदर्शन करना ही आता है। सरकार चलाना इसके बस की बात नहीं। लेकिन विरोधियों ने इस तथ्य को क्यों भूला दिया है कि दिल्ली का भरोसा जीतने के मामले में आम आदमी पार्टी शीर्ष पर रही है। ७० में से ६७ विधानसभा की सीटें जीतना मज़ाक नहीं। केजरीवाल का मजाक उडाने वाले दिल्ली के मतदाताओं को हलके में लेकर खुद का ही नुकसान कर रहे हैं। प्रबुद्धजनों को यही लगता है कि केंद्र सरकार उपराज्यपाल को सामने खडा कर दिल्ली पर अपना शासन चलाना चाहती है। भाजपा के बडे नेता भी केजरीवाल को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोडते। उनका बस चले तो वे उन्हें फौरन दिल्ली की सत्ता से बाहर कर दें। कल तो जो न्यूज चैनल वाले आम आदमी पार्टी के साथ खडे थे, केजरीवाल और उनके साथियों की वाह-वाही करते नहीं थकते थे, आज अपना पाला बदल चुके हैं। यह तो अरविंद का दम है कि वे किस्म-किस्म के विरोधों और विरोधियों का सामना करते हुए मैदान में डटे हुए हैं। कोई और होता तो पता नहीं उसका क्या हश्र हो चुका होता। अरविंद केजरीवाल दिल्ली वालों के नायक हैं। उन्हें अभूतपूर्व बहुमत से चुना गया है। इसलिए उन्हें खुलकर काम करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। किसी भी चुनी हुई सरकार को अफसरों की नियुक्ति स्थानांतरण और बर्खास्तगी का अधिकार है। केजरीवाल के साथ नाइंसाफी क्यों? यह सवाल उस जनता का है जिसने आम आदमी पार्टी को ऐतिहासिक जीत और कांग्रेस तथा भाजपा को शर्मनाक पराजय का मुंह दिखाया है। केजरीवाल सरकार कानून व्यवस्था, नारी सुरक्षा, पानी, बिजली, स्कूल, कॉलेज और स्वास्थ्य सेवाओं में काम करती दिखायी दे रही है। दिल्ली वाले जब सरकार से खुश हैं तो उसके खिलाफ माहौल बनाने को आतुर भाजपा वाले इतने बेचैन क्यों हैं? आखिर यही भाजपा ही तो थी जिसने २०१३ के दिल्ली विधानसभा चुनाव तथा २०१४ के लोकसभा चुनाव में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का वायदा किया था। आज उसने चुप्पी क्यों साध ली है? सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल की सरकार को बदनाम करने में लगी है।

Thursday, May 21, 2015

ज़ख्म...जो भर नहीं पाए

४२ वर्ष तक अटूट बेहोशी में रहने के बाद अंतत: अरुणा शानबाग ने इस दुनिया को त्याग दिया। वह कोई फिल्म अभिनेत्री या किसी बडे नेता, उद्योगपति की दुलारी नहीं थी। उसका जीवन तो बडा ही सीधा-सादा था। चमक-धमक से कोसों दूर। दीन-दुखियों और तकलीफों से जूझते लोगों की सेवा और चिंता करना उसकी आदत में शुमार था। अपनी इसी परोपकारी सोच के चलते उसने नर्स बनने का निर्णय लिया था। २३ साल की हंसती खेलती शानबाग मान और शान की जिन्दगी जीना चाहती थी। उसे छल-कपट और हेराफेरी करने वाले लोगों से नफरत थी। वह जिस अस्पताल में नर्स थी, उसी में चोर और धोखेबाज सोहन लाल वाल्मीकि, वार्ड ब्वॉय का काम करता था। यह उसकी नीचता की पराकाष्ठा थी कि कुत्तों के लिए आने वाला मांस वह खुद खा-पचा जाता था। अरुणा ने उसे कई बार समझाया। सचेत किया, लेकिन कुत्ते की पूंछ भी कभी सीधी हुई है...। वह चोरी करने से बाज नहीं आया। अरुणा ने भी उसे डांटना और टोकना नहीं छोडा। ऐसे में वह अरुणा से खार खाने लगा। बडी आयी ईमानदार कहीं की। इसे जब तक सबक नहीं सिखाया जायेगा, इसके होश ठिकाने नहीं आयेंगे। उसने अरुणा को ऐसी सजा देने की ठानी जिसकी मिसाल मिलनी मुश्किल हो। अरुणा की खूबसूरती भी उसके निशाने पर आ गयी। वह उसकी अस्मत को लूटने का मौका तलाशने लगा।
वो २७ नवंबर १९७३ का दिन था जब ड्यूटी खत्म कर अरुणा कपडे बदलने के लिए चेंजिंग रूम में पहुंची। बौखलाया सोहन लाल वहां पहले से ही ताक लगाये बैठा था। उसने भूखे खूंखार भेडिए की तरह अरुणा पर झपटा मारा। देखते ही देखते कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से उसका गला घोंटा और फिर निर्मम बलात्कार कर डाला। जंजीर के कसाव से अरुणा के दिमाग तक खून पहुंचाने वाली नसें फट गयीं। आंखों की रोशनी जाती रही। शरीर को लकवा मार गया। अरुणा की साथी नर्स जब कमरे में पहुंची तो उसने देखा कि अरुणा शानबाग बुत बनी बैठी थी। गले में जंजीर लटक रही थी। चारों तरफ खून बिखरा हुआ था। नर्स के होश उड गये। वह फौरन मैट्रन को बुलाने के लिए दौडी। मैट्रन को देखते ही अरुणा बिलख-बिलख कर रोने लगी। उसने बोलने-बताने का बहुतेरा प्रयास किया, लेकिन नाकाम रही। उसके बाद वह जो बेहोश हुई कि कभी होश में नहीं आ पायी। पूरे ४२ वर्षों तक वह एक सुलगता हुआ सवाल बनी रही। अरुणा के हिंसक बलात्कारी को मात्र सात साल की सजा हुई। दरअसल उसे बलात्कार के घिनौने गुनाह को अंजाम देने की सजा ही नहीं हो पायी। चोरी और हत्या करने की कोशिश का मामला दर्ज केस को कमजोर कर दिया गया। सजा तो अरुणा ने पायी। खुद पर हुए हिंसक हमले और क्रुर बलात्कार की सजा। उसके जख्म आखिर तक नहीं भर पाये। पूरे ४२ साल तक वह मुर्दा बन पडी रही। अरुणा की सगाई हो चुकी थी। उसका होने वाला पति डाक्टर था। दोनों एक खुशहाल जिन्दगी जीना चाहते थे। उनके कई सपने थे, जिनकी एक दरिंदे ने बडी बेरहमी से हत्या कर दी। डाक्टर ने चार वर्ष तक अपनी होने वाली पत्नी के ठीक होने का बेसब्री से इंतजार किया। वह घंटो उसके बिस्तर के पास बैठकर बातें करता, पता नहीं क्या-क्या बुदबुदाता और फिर बच्चों की तरह रोने लगता। आखिरकार जब उसकी समझ में आ गया कि अरुणा कभी भी होश में नहीं आने वाली तो उसने किसी अन्य युवती से शादी कर यह देश ही छोड दिया। करीबी रिश्तेदारों ने भी उसे भुला दिया। इतने वर्षों तक किसी ने भी उसका हालचाल जानने की कोशिश नहीं की। अस्पताल ही उसका स्थायी ठिकाना बना रहा। उसके जिन्दा लाश बन जाने के बावजूद भी अस्पताल के डाक्टरों और नर्सों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें पता था कि कोई चमत्कार ही अरुणा की बेहोशी को खत्म कर सकता है। ऐसा भी होता था कि जब भी वह किसी मर्द की आवाज सुनती तो उसका शरीर कांपने लगता। अजीब-सी चीखें उभरने लगतीं। नर्स जब उसे थपकी देती तब कहीं जाकर उसे चैन मिलता। इंसानियत के धर्म को निभाने में अस्पताल के डाक्टरों और नर्सों ने कोई कसर बाकी नहीं रखी। इतने वर्षों तक तो घर-परिवार के लोग भी देखभाल नहीं कर पाते। उकता जाते हैं। उन्हें बीमार की मौत का इंतजार रहता है। अरुणा की सेवा और देखभाल करने में गैरों ने अपनों को मात दे दी। इस तथ्य को हमेशा-हमेशा के लिए पुख्ता कर दिया कि संवेदनहीनता के किसी भी दौर में मानवता कभी भी नहीं मर सकती। मानवता के पुजारी जिन्दा हैं, और रहेंगे।
इस देश की असली दुश्मन तो वो हवस के पुजारी हैं जो बार-बार दुष्कर्म करते नहीं थकते। अरुणा के बिस्तर पर कोमा में पडे रहने के दरम्यान सोहन लाल वाल्मीकि के कई-कई प्रतिरूप जन्मते रहे। निर्भया, दीपिका, दामिनी जैसी हजारों युवतियों की चलती बसों, चौराहों, स्कूलों, कालेजों, अस्पतालों और पुलिस थानों में इज्जत लुटती रही। खाकी मूकदर्शक बनी रही। कानून के हाथ बंधे रहे बलात्कारियों के हौसले बुलंद होते चले गये। कानून भले ही सख्त बना दिया गया हो, लेकिन फिर भी महिलाओं पर होने वाले अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहे। ऐसा क्यों है... इसका जवाब हर किसी के पास है...कि देर और अनदेखी ही अंधेर का कारण है। एक तो बलात्कारी को सजा नहीं होती, अगर कही होती भी है तो वर्षों लग जाते हैं।

Thursday, May 14, 2015

कौन जीता, कौन हारा?

फिर एक चमत्कार हो गया। जयललिता बरी हो गयीं। उनके सभी पाप धुल गये। वे फिर गाजे-बाजे के साथ राजनीति में अपने तेवर दिखायेंगी। उनके प्रशंसकों के लिए यह तोहफा दिवाली से कम नहीं। जमकर फटाके फोडे गये। नाच-गाना हुआ। बेंगलुरु की विशेष अदालत ने जे. जयललिता को २०१४ में आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में चार साल की जेल और १०० करोड रुपये जुर्माने की सजा सुनायी थी। तब लोगों को तसल्ली हुई थी कि अमीर-गरीब, नेता-अभिनेता, दबंग-कमजोर कानून की नजर में सब बराबर हैं। देर है, अंधेर नहीं। महारानी को मजबूरन मुख्यमंत्री की कुर्सी त्यागनी पडी थी। विधानसभा सदस्यता रद्द होने का गम भी झेलना पडा था। उनके चाहने वाले माथा पीट-पीटकर रोये थे। बसें और रेलगाडियों के सामने कूद कर जान देने की कोशिशें हुई थीं। छह तो इस दुनिया से कूच भी कर गये थे। दस-बारह को हार्ट-अटैक आया था। चमक-धमक वाले नेताओं के प्रशंसक बडे भावुक तथा अंधभक्त होते हैं। राजनीति में पदार्पण करने से पूर्व जयललिता कई फिल्मों में नायिका की भूमिका निभा चुकी हैं। राजनीति में भी लटके-झटके दिखाने में अग्रणी रही हैं। १९९१ में मुख्यमंत्री बनने के बाद नायिका ने अपनी तीन करोड रुपये की संपत्ति घोषित की थी। यानी तब उनके पास इतनी ही माया थी, लेकिन मुख्यमंत्री के कार्यकाल के खत्म होते-होते तक वे ६६ करोड ६० लाख की मालकिन बन चुकी थीं। मज़े की बात यह भी है कि जयललिता ने मुख्यमंत्री बनने के बाद घोषणा की थी कि वे सरकारी धन लेने और खर्च करने के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए उन्होंने मात्र एक रुपये मासिक वेतन लेने का निर्णय लिया है। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में मात्र एक रुपये महीने की पगार लेने वाली जयललिता की आर्थिक तरक्की का रहस्य वाकई समझ से परे था। यकीनन यह चमत्कार राजनीति में ही संभव है। आय से ज्यादा संपत्ति का यह मामला १८ साल पुराना है। नायिका के घर और फार्म हाउस में मारे गये छापे में ८२ किलोग्राम सोना, १० हजार साडियों के अलावा इतनी अधिक तरह-तरह की चप्पलें बरामद हुई थीं कि जिनसे लेडिस चप्पलों की एक अच्छी-खासी दुकान खोली जा सकती थी। चेन्नई, हैदराबाद में फार्म हाउस, तामिलनाडु में करोडों की कृषि भूमि और नीलगिरी में चाय बागान के खुलासे ने भी आयकर अधिकारियों को बेहद चौंकाया था। सब कुछ आइने की तरह साफ था। भ्रष्टाचार के महानतम कीर्तिमान रचे गये। निचली अदालत में वर्षों तक मामला चलता रहा। जब पिछले वर्ष फैसला आया तो जयललिता के पैरों तले की जमीन खिसक गयी। राजनीति के धुरंधरों और उनके विरोधियों ने मान लिया था कि अब तो अम्मा गयी काम से। हो गया उनका खेल खत्म, लेकिन अम्मा जैसे राजनीतिबाज आसानी से हार नहीं मानते। उनकी अथाह दौलत और अपार पहुंच उन्हें हारने नहीं देती। फिल्म स्टार सलमान खान के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ। वर्ष २००२ में 'हिट एंड रन' मामले में मुंबई की सेशन कोर्ट द्वारा दबंग खान को पांच साल की सजा सुनाये जाने के फौरन बाद हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगा कर जो जल्दबाजी और रहमदिली दिखायी वह सजग देशवासियों को रास नहीं आयी। सवाल उठे कि क्या कानून इतना अंधा है? यह भी पता चल गया कि त्वरित न्याय भी मिल सकता है। पैसा फेंको और तमाशा देखो। वो लोग बेवकूफ हैं जो हमेशा चीखते-चिल्लाते रहते हैं कि इस देश की अदालतों के फैसले आने में वर्षों लग जाते हैं। दरअसल उन्हें न्याय पाने का असली तरीका ही नहीं आता। कानून को अपनी उंगलियों पर नचाने के दांव पेंच जानने वाले किसी विद्वान ने अदालतों को साधने का नुस्खा बताया है : जिस तरह से कोई मालदार मरीज जल्द से जल्द ठीक होने के लिए नामी-गिरामी डॉक्टर की शरण में जाता है और अच्छी-खासी रकम चुका कर मौत के मुंह से भी बाहर आ जाता है ठीक वैसे ही किसी महंगे धुरंधर वकील के पास जाकर कानून के बडे से बडे फंदे से राहत और मुक्ति पायी जा सकती है। इस देश में ऐसे वकीलों की कमी नहीं है जो लाखों की फीस लेते हैं और चुटकी बजाते ही निचली अदालतों के फैसलों को पलटवाने की कला को अंजाम देने का अद्भुत हुनर दिखाते हैं। डॉक्टरी की तरह वकालत भी अनुभव और समझदारी वाला पेशा है। जिस तरह से गरीब आदमी आलीशान अस्पतालों के महंगे डॉक्टरों के पास नहीं जा पाता वैसे ही नामी-गिरामी, धुरंधर काले कोटधारी उसकी पहुंच से कोसों दूर होते हैं। यही वजह है कि बेचारा गरीब हर बार कानूनी दांवपेंच के खिलाडियों और बीमारी से हार जाता है। यह सिलसिला तब तक चलते रहने वाला है जब तक गरीब येन-केन-प्रकारेण अमीर नहीं हो जाता। मुश्किल तो यह भी है कि इस देश का मेहनतकश आम आदमी तुरत-फुरत मालामाल होने के गुर नहीं जानता। वह तो ईमानदारी से अपना खून-पसीना बहाकर दो वक्त की रोटी का जुगाड कर संतुष्ट हो जाता है। यह सच भी हैरान-परेशान कर देता है कि जब जयललिता और सलमान खान जैसों को सजा होती है तो उनके प्रशंसक हाय-तौबा मचाने लगते हैं। उनके रोने-धोने से यही लगता है कि इन्हें अदालत ने सजा देकर कोई गलत काम कर दिया है। जिस तरह से पूर्व अभिनेत्री को जेल भेजे जाने पर उनके कट्टर प्रशंसक मरने-मारने पर उतर आये थे, वैसा ही कुछ सलमान को सजा सुनाये जाने पर देखा गया। अभिनेता के एक फैन ने आत्महत्या तक की कोशिश कर सुर्खियां बटोर लीं। उस प्रशंसक को अपने हीरो के जेल जाने से खुद का नुकसान होता दिखायी दे रहा था। वह बालीवुड में पटकथा लेखक बनना चाहता था। उसने सलमान को कुछ कहानियां भी भेजी थीं। अगर सलमान पांच साल के लिए अंदर हो जाते तो उसके सपने धरे के धरे रह जाते, इसलिए उसने जहर पीकर आत्महत्या करने की नौटंकी की। अभिनेता अपने ऐसे प्रशंसक को तो भूलने से रहे। फैन यानी अंधभक्तों की बदौलत ही तो सलमान और जया जैसों की छाती चौडी रहती है।

Thursday, May 7, 2015

ईश्वर की मर्जी...

इंडिया में सत्ताधीश कुछ भी बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। समय और मौका देखकर अपनी भाषा और तेवर बदलने का भी इन्हें खूब हुनर आता है। खुद को समझदार और जनता को बेवकूफ समझना इनकी फितरत है। मंत्री और नेता जो कहें, वही सही। बाकी सब बकवास और झूठ। पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के परिवार की तूती बोलती है। पूरा परिवार राजनीति का मंजा हुआ खिलाडी है। प्रकाश सिंह बादल खुद मुख्यमंत्री हैं और उनके बेटे सुरजीत, उपमुख्यमंत्री। पिता-पुत्र का अच्छाखासा कारोबार है। वैसे राजनीति भी उनके लिए एक धंधा है। उनकी एक परिवहन कंपनी है जिसकी सैकडों बसें चलती हैं। पंजाब के मोगा-बठिंडा हाइवे पर बादल परिवार की एक बस में एक तेरह साल की ल‹डकी और उसकी मां से छेडछाड और बलात्कार करने की धृष्टता की गयी। वहशियों के चंगुल से बचने के लिए मां-बेटी ने चलती बस से छलांग लगा दी। बेटी चल बसी और मां अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही है। बस मालिक पंजाब के राजा हैं इसलिए पुलिस भी कुछ भी नहीं कर पायी। वैसे भी राजा के सामने नौकर की क्या औकात। उसे तो उसकी आज्ञा का पालन करना होता है। वह उसके खिलाफ जा ही नहीं सकता। पंजाब के शिक्षामंत्री सुरजीत सिंह राखडा ने मृतक लडकी के प्रति संवेदना व्यक्त करने और दुराचारियों को फटकारने के बजाय कहा कि यह तो ईश्वर की मर्जी थी। ऊपरवाला जो चाहता है, वही होता है। कोई भी दुर्घटना का शिकार हो सकता है। दुर्घटना कहीं भी हो सकती है। आप कुदरत की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सकते। ऐसे ही उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी बलात्कारियों के प्रति नरमी दर्शाते हुए बयान दिया था कि लडकों से गलती हो जाती है। यानी बलात्कार कोई गंभीर अपराध नहीं है। यह तो बस हो जाता है। जैसे लोग दूसरी गलतियां करते हैं वैसे ही लडके वासना के वशीभूत होकर लडकियों पर बलात्कार करने की भूल कर गुजरते हैं। इसमें उनका कोई दोष नहीं होता। उनकी इस गलती को ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। १६ दिसंबर २०१२ की काली रात जब दिल्ली में पैरामेडिकल की छात्रा चलती बस में दुराचारियों की वासना की शिकार हुई थी तब भी कुछ साधु-संतों और नेताओं ने छात्रा को कठघरे में खडा किया था। लडकी से बलात्कार करने वालों में एक नाबालिग था और बाकी भी ज्यादा उम्र के नहीं थे। उन पर नेताजी जैसों को कुछ ज्यादा ही दया आयी थी।
पूरे देश में कई हफ्तों तक यही मामला छाया रहा। जब भी कहीं बलात्कार होता है तो लोगों के मन में निर्भया बलात्कार कांड की याद ताजा हो उठती है। लेकिन इससे हासिल क्या? कुछ भी तो नहीं। मुंबई, दिल्ली, गुडगांव, बेंगलुरु में मोमबत्तियां लेकर जुलूस निकाले गये। गुस्सा दिखाया गया। कुछ भी तो नहीं बदला। निर्भया कांड के बलात्कारियों को फौरन फांसी पर लटकाने की मांग भी धरी की धरी रह गयी। वे आज भी बडे मजे से जेल में सुरक्षित जीवन जी रहे हैं। दरअसल जब भी किसी ब‹डे शहर में बलात्कार होता है तो खूब हो-हल्ला मचता है। पीडिता के प्रति सहानुभूति दिखाने वालों का तांता लग जाता है। न्यूज चैनलों और अखबारों में बस एक ही खबर छायी रहती है। तमाशेबाजी चलती रहती है। मुख्यमंत्री की जिस बस में नाबालिग से बलात्कार करने की कोशिश की नीचता की गयी उसमे और भी कई सवारियां थीं। लेकिन किसी ने भी बदमाशों को रोकने-टोकने और उनका डटकर मुकाबला करने की पहल नहीं की। सभी तमाशा देखते रहे। लडकी और उसकी मां को अपनी अस्मत बचाने के लिए दौडती बस से छलांग लगाने पर विवश होना पडा। पुलिस हर जगह तो हाजिर नहीं रह सकती। जब लोग अपना दायित्व नहीं निभायेंगे और कायरी दिखायेंगे तो फिर नारियों की इज्जत के लुटने के सिलसिले खत्म होने वाले नहीं हैं। यह तय है कि कितनी भी मोमबत्तियां जला लीजिए। गुस्से की मशालें हाथों में उठा लीजिए अंधेरा दूर नहीं हो सकता। अपराधियों के हौसले पस्त नहीं हो सकते। दरअसल, बलात्कारियों को ताकतवर बनाने के दोषी वो सब तमाशबीन हैं जो पहले तो मूक बने रहते हैं और बाद में चीखते चिल्लाते हैं। इन्हीं की कायरता के चलते भरी स‹डकों, चलती बसों, गाडियों और सार्वजनिक स्थलों में भी बलात्कार होते रहते हैं।
दिल्ली के फतेहपुर बेरी गांव में स्थित नगर निगम के एक स्कूल के पीटी टीचर में इतनी हिम्मत कहां से आ गयी कि उसने अपने ही स्कूल की छात्राओं की अस्मत लूटने की जुर्रत कर दी? एक नराधम एक्सरसाइज कराने के बहाने छात्राओं का बेखौफ यौन शोषण करता रहा और स्कूल के बाकी लोग अनजान रहे! एक दिन जब एक छात्रा ने स्कूल जाने से इंकार कर दिया तो उसके अभिभावकों ने वजह पूछी। छात्रा ने झिझकते हुए शिक्षक की करतूत का खुलासा करते हुए बताया कि पीटी टीचर एक महीने से जान से मारने की धमकी देकर उसकी इज्जत के साथ खिलवाड कर रहा था। स्कूल तो स्कूल अब तो मंदिरों में भी दुष्कर्म होने लगे हैं। मंदिर में अपने पति के साथ पूजा करने आयी एक महिला, पुजारी की छेडछाड से इतनी आहत हुई कि उसने उसकी चप्पलों से पिटायी कर डाली। इसी तरह से दिल्ली के ही एक मंदिर का पुजारी तीस वर्षीया युवती को बदनाम करने की धमकी उसके साथ महीनों दुष्कर्म करता रहा। तो यह हालात हैं उस देश के जहां नारी को पूजने के ढिंढोरे पीटे जाते हैं! निर्भया कांड के बाद लगा था कि देश में बलात्कारों का सिलसिला थमेगा। लेकिन सच हम सबके सामने है। अब एक सवाल जो बडी बेसब्री से जवाब मांग रहा है। सोचिए कि यदि कहीं मंत्री जी और नेता जी की बहन-बेटी या किसी करीबी रिश्तेदार महिला के साथ बलात्कारी अपनी मनमानी कर गुजरते हैं तो क्या तब भी वे यह कहने की हिम्मत दिखायेंगे कि यह कोई बडी बात नहीं है। यह तो ऊपरवाले की मर्जी है। वह जो चाहता था, वही हुआ। नादान लडकों से बलात्कार जैसी छोटी-मोटी भूल हो जाती है। इन्होंने भी कर दी। माफ कर दो बच्चों को...।