Thursday, April 21, 2016

आंखों का मरा पानी

जब इंसान नहीं संभला तो कुदरत भी अपना रंग दिखाने लगी। २०१६ के मार्च-अप्रैल महीने के आते-आते पानी तो जैसे गायब हो गया और सूरज आग के गोले में तब्दील हो गया। देशभर के मैदानी इलाके तवे की तरह तपने लगे और सूर्य देवता के उग्र तेवरों ने चेतावनी दे डाली की बहुत कर चुके अपनी मनमानी, अब भुगतने के लिए तैयार हो जाओ। क्या कभी सुना था कि इतनी गर्मी पडेगी कि फर्श चूल्हा बन जायेगा? तेलंगाना में स्थित करीमनगर में एक महिला ने अपने मकान के बरामदे के सुलगते फर्श पर आमलेट बनाया और मजे से खाया और खिलाया। बिना किसी चूल्हे के आमलेट बनाने का यह नजारा अद्भुत था। अकल्पनीय। देश के विभिन्न न्यूज चैनलों पर यह महिला सूरज की आग से जलते फर्श पर जब आमलेट बनाते दिखी तो देखने वाले दंग के दंग रह गये।
महाराष्ट्र के लातूर जिले ने कभी प्रलयकारी भूकंप की मार झेली थी। घर-परिवार तबाह हो गये थे। लातूर को फिर से बनने और संभलने में कई वर्ष लग गये थे। आज उसी लातूर को भयंकर सूखे के चलते पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड रहा है। यह परेशानी उस भूकंप से कम पीडादायी नहीं है। पानी की जानलेवा-किल्लत के कारण उन्हें तकलीफ-दर-तकलीफ का सामना करना पड रहा है। "जल है तो कल है"  और 'पानी बिन सब सून' जैसी जागृत करने वाली कहावतें सटीक और सजीव हो रही हैं कि पानी की बर्बादी से बाज आओ। जल को संग्रहित करना सीखो। यदि ऐसे ही पानी की बर्बादी होती रही तो करीब दो दशक बाद आज की तुलना में पानी आधा रह जाएगा। पीने के पानी के अभाव में होने वाली बीमारियों को रोक पाना मुश्किल हो जायेगा। जल के बिना जीना कैसा होता है इसकी पूरी खबर महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाडा को तो हो ही गयी है, जहां तीन वर्ष से सूखे के चलते लोगों को पानी के लिए तरसना पड रहा है। वैसे भी लातूर में सूखे की मार बनी रहती है और जल संकट पीछा नहीं छोडता। लेकिन इस बार बहुत अति हो गयी। किसानों की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। कुएं और तालाबों में पानी का नामो-निशान नहीं रहा। हजारों पशुओं ने प्यास के मारे तडप-तडप कर प्राण त्याग दिए। न जाने कितने लोग अपना घर-बार छोडकर शहर की तरफ चल दिए। तय है कि यहां के लोगों की दिनचर्या अस्तव्यस्त हो गयी है। लातूर की आबादी है लगभग पांच लाख। इतनी आबादी को रोजाना दो करोड लीटर पानी की जरूरत होती है। हकीकत यह है कि महीने में मात्र एक बार ही पानी मिल पाता है। इस भयावह किल्लत की एक वजह यह भी है... उस बांध का सूख जाना जिससे शहरवासियों को प्रतिदिन काफी पानी मिलता था। हिन्दुस्तान के इतिहास में संभवत: पहली बार पानी के संकट से निपटने के लिए वॉटर ट्रेनें प्यासों की प्यास बुझाने के लिए भेजी जा रही हैं।
हमेशा जल संकट से जूझने वाले राजस्थान में भी अप्रेल महीने से पानी के लिए संघर्ष की नौबत आ गयी। करीब पंद्रह हजार गांव पानी के कमी का शिकार हो गये और लाखों लोगों को पीने के पानी के लिए तरसते देखा गया। सरकार ने लोगों को पानी मुहैया कराने के लिए जो योजनाएं बनायीं, वे नाकाफी सिद्ध हुर्इं। यह भी सच है कि महाराष्ट्र के लातूर की तरह राजस्थान में भी पानी की समस्या कोई नयी बात नहीं हैं। सरकारें आती-जाती रहीं, इस विकट समस्या का हल नहीं हो पाया। व्यवस्था गैरजिम्मेदार बनी रही। सत्ताधीशों की इरादों और नीयत में खोट नहीं होती पानी की समस्या का हल तलाशना मुश्किल नहीं था। जिन बांधो को पांच वर्ष में बन जाना था उन्हें पंद्रह-बीस वर्ष में भी नहीं बनाया जा सका। लागत बढती चली गयी। काम रूक गया। देश में ऐसे कितने बांध हैं जो अधबने हैं। उद्घाटन होने के बावजूद काम शुरू ही नहीं हो पाया। हां कागजी बांधों, की बदौलत सरकारी ठेकेदारों, सत्ता के दलालों और नेताओं ने मनमानी चांदी काट ली।
प्रकृति की हकीकत और रहस्य भी बडे निराले हैं। जहां लगभग पूरे देश में पानी के लिए हाहाकार मचा है वहीं सूखे प्रदेश के रेगिस्तानी जिलों में शामिल जैसलमेर में दो स्थानों पर जमीन से अपने आप पानी निकलने से लोग हतप्रभ रह गये। एक जगह पर पिछले तीन वर्ष से लगातार पानी के निकलने से इसे दैवीय कृपा माना जा रहा है। अपने देश की अधिकांश आबादी प्राकृतिक आपदाओं को ऊपर वाले का प्रकोप और मर्जी मानती है। अक्सर धर्म, विज्ञान पर भारी पड जाता है। भूजल वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से यहां जो वर्षा हुई है, उसका पानी जमीन में जिप्सम की परत होने के कारण नीचे नहीं जा पाया और अब इस तरह से जमीन से अपने आप बाहर निकल रहा है, लेकिन गांव वाले इसे ऊपर वाले का चमत्कार मान नमस्कार कर रहे हैं। वहां पर मंदिर बनाने की तैयारी के साथ चंदा जुटाने का अभियान शुरू हो चुका है।
जनता पानी और सूखे की मार से आहत होती रहे नेताओं को कोई खास फर्क नहीं पडता। यह तो वोटों की चिन्ता है जो उनके होश ठिकाने लगा देती है और उन्हें अपने वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने को विवश कर देती है। बेचारे जैसे-तैसे भरी गर्मी में लोगों का हाल-चाल जानने के लिए पहुंच जाते हैं। वहां भी उनका मन परिंदे की तरह भटकता रहता है। महाराष्ट्र की ग्राम विकास एवं जल संचय मंत्री पंकजा मुंडे पानी की भयंकर समस्या से जूझ रहे सूखाग्रस्त लातूर के दौरे पर ऐसे पहुंचीं जैसे भ्रमण का मज़ा लूटने आयी हों। वे सूखे से लडते गांववासियों के आंसू पोछने की बजाय सेल्फी लेती रहीं। पंकजा ने अपनी कुछ तस्वीरें ट्विटर अकाउंट पर शेयर कर खुद की पीठ थपथपायी। सेल्फी लेने के बाद वे जिस तरह से अफसरों और पुलिसवालों से मुस्कराते हुए मिलीं उससे वे भी जान गए कि मंत्री महोदया को सूखा पीडितों से कोई सहानुभूति नहीं है। यह तो रस्म अदायगी है जो उन्हें यहां खींच लायी है। पंकजा महाराष्ट्र के जाने-माने नेता स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे की पुत्री हैं। गोपीनाथ भाजपा के धनवान और बलवान नेता थे। फिर भी जनसेवा की भावना के भी धनी थे। उन्हें नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री बनाया गया था। दिल्ली में हुई कार दुर्घटना में उनका देहावसान हो गया था। पंकजा को राजनीति तो विरासत में मिली है, लेकिन उन गुणों का नितांत अभाव है जो उनके पिताश्री की पहचान थे। पंकजा जब गर्मी से पसीना-पसीना हो गयीं तो उन्हें अपने मेकअप की चिन्ता सताने लगी। किस्मत की धनी पंकजा -पहली बार मंत्री बनी हैं। उनकी मंशा तो मुख्यमंत्री बनने की थी। भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों के चलते मीडिया की सुर्खियां पाने वाली पंकजा को विदेश यात्राएं करने का खासा शौक है। पहले भी जब महाराष्ट्र में सूखा पडा था तब वह विदेश यात्रा का आनंद ले रही थीं। उनके पति चारुदत्त पालवे मराठवाडा में स्थित एक शराब फैक्टरी के मालिक हैं। जहां मराठवाडा पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहा है वहीं मंत्री महोदय के पतिदेव के शराब कारखाने को भरपूर पानी मुहैया कराया जा रहा है। पंकजा यथार्थ की जनसेवा में यकीन नहीं रखतीं। वे उन नेताओं में शामिल हैं जो कागजों पर तालाब, हैंडपंप, बोरवेल, कुएं और बांध बनाने की परिपाटी को जिन्दा रखने के हिमायती हैं। ऐसे नेताओं को होश में लाने और उन्हें उनके कर्तव्य के प्रति सचेत कराने के उद्देश्य से ही युवा कवि आनंद सिंगीतवार ने यह पंक्तियां लिखी हैं :
बस्तियों में ला पानी,
प्यासों को पिला पानी।
कागजों से उतार कर,
नदियों में बहा पानी।
गांव, शहर, झोपडी, महल,
हरेक को दिला पानी।
दौलत के वास्ते दोस्त,
रिश्तों पे ना फिरा पानी।
वो मर गया जिसकी,
आंखों का मरा पानी।

Thursday, April 14, 2016

यह कैसी बेइंसाफी?

आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी छुआछूत और भेदभाव की आतंकी सोच का पूरी तरह से अंत नहीं हो पाया है। दलित समाज के लोग सामाजिक रूप से सजग और प्रभावी भी हुए हैं, लेकिन आज भी उनको अपमानित कर विषैले दंश देने की बेखौफ हरकतें की जा रही हैं। अभी कुछ समय पहले आदिवासी सोनभद्र जिले में एक वृद्धा और उसकी बेटी को डायन बताकर उनके बाल काट डाले गये। इससे पहले भी उत्तरप्रदेश के बुदेलखंड समेत कई इलाकों में डायन बताकर महिलाओं को लज्जित और उत्पीडित करने की शर्मनाक घटनाएं सामने आयीं।
कर्नाटक का एक छोटा-सा गांव है मारकुंबी। इस गांव में सवर्णों का वर्चस्व है, जो यह मानते हैं कि दलितों और शोषितों को इस दुनिया में सम्मान के साथ जीने का कोई हक नहीं है। कोई दलित यदि पढ-लिख जाता है और ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है तो सवर्णों के सीने में सांप लोट जाता है। मारकुंबी गांव में एक नाई की दुकान है जहां बिना किसी भेदभाव के सभी के दाढी और बाल काटे जाते थे, लेकिन एक दिन अचानक नाई ने दलितों के बाल काटने से मना कर दिया। दलितों के विरोध जताने पर नाई ने उन्हें अपनी पीडा और परेशानी बतायी उसे चेतावनी दे दी गयी है कि वह दलितों को अपनी दुकान की चौखट पर पैर ही न रखने दे। यदि उनकी बात नहीं मानी गयी तो उसकी खैर नहीं। ऐसे में तनातनी तो बढनी ही थी। दलितों के बढते आक्रोश को देख सवर्ण तिलमिला उठे कि इनकी इतनी जुर्रत कि हमारे सामने सिर उठाएं। चींटी की हाथी के सामने क्या औकात। दलित और सवर्ण आमने-सामने डट गए। मारापीटी की नौबत आ गयी। आपसी संघर्ष में २७ लोग घायल हो गए। दलितों के तीन मकान राख कर दिये गये।
दरअसल देश के कई ग्रामीण इलाके ऐसे हैं जहां सवर्णों और धनवानों की तूती बोलती है। उन्हीं का शासन चलता है। उनके अहंकार की कोई सीमा नहीं है। उनकी मनमानी दलितों पर मनमाना कहर बरपाती है। उन्हें कानून का भी कोई खौफ नहीं। उनके लिए यह २१ वीं सदी नहीं, सोलहवीं सदी है। वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। उन्हें लगता है कि यह देश सिर्फ उन्हीं का है। प्रशासन उनका, सत्ता भी उनकी, शासक भी उनके। ऐसे में फिर डर काहे का?
मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के निकट स्थित पीथमपुर से १५ किलोमीटर दूर बसा है सुलवाड गांव। इस गांव में किसी दलित की शवयात्रा सवर्णों की गली से नहीं गुजर सकती। दलितों की शवयात्रा गांव के कच्चे रास्ते से निकलती है। दलित डामर वाली सडक से जुलूस आदि भी नहीं निकाल सकते। वर्ष २००८, १४ दिसंबर का दिन था। ८० साल की कुवरा पूनम की मौत की अंतिम यात्रा की तैयारी हो चुकी थी। बेटों ने मां की अंतिम यात्रा के लिए बैंड-बाजे बुलवाए। जैसे ही यात्रा गांव के भीतर पहुंची तभी एकाएक पथराव हुआ और सवर्णों ने दलितों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। बेटों और उनके परिजनों को यात्रा पलट कर गांव के बाहरी गंदे रास्ते से ले जानी पडी। पुलिस, कलेक्टर और सरकार तक शिकायत पहुंचायी गयी, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। गुस्साए सवर्णों ने दलितों का हुक्का-पानी बंद कर दिया। आखिरकार दलितों को ही झुकना पडा। तब से आज तक यही परंपरा चली आ रही है। दलितों की न खुशियां अपनी हैं और न ही गम। सवर्ण जैसा चाहते हैं वैसा उन्हें नचाते हैं।
गत वर्ष रामकिशन के बेटे की शादी थी। लडकी वाले घर कपडे चढाने आए थे। उन्होंने गांव की मुख्य सडक से ढोल बाजे के साथ त्योहारी का सामान चढाने की तैयारी की। जैसे ही सवणों को खबर लगी तो वे रामकिशन के घर आ धमके और उसे चेताया और धमकाया कि अपनी औकात मत भूलो। ज्यादा उचकने की कोशिश की तो ठीक नहीं होगा। इसी गांव के धुल जी ने जब अपने परिवार की एक बारात को गांव के मंदिर से दर्शन करवाते हुए दूसरे गांव ले जाना चाहा तो उसे रोक दिया गया। तब भी जमकर हंगामा हुआ और मारपीट भी हुई।
बददिमाग दबंगों और रसूखदारों के अहंकार की कोई सीमा नहीं है। अपनी मनमानी करने और जुल्म ढाने के लिए दलित और शोषित उनके लिए सर्वसुलभ साधन हैं। देश की राजधानी दिल्ली में एक युवक जबरन पिट गया। उसका बस यह कसूर था कि वह दलित था। वह जब घुडचढी की रस्म निभाने के लिए बग्घी पर सवार हो रहा था तो उसी दौरान दो दबंग युवक अपनी दादागिरी दिखाने लगे। उन्होंने दुल्हे पर अपशब्दों की बौछार की और घोडे पर चढने से रोका। विरोध किये जाने पर दुल्हे तथा उसके परिजनों को भी मारा-पीटा गया। दबंगों को दलित की तामझाम वाली शादी और घुड चढायी शूल की तरह चुभ गयी। ऐसे में उन्होंने मर्यादा और आपा खोने में जरा भी देरी नहीं लगायी और अपनी पर उतर आये। ऐसी न जाने कितनी घटनाएं घटती रहती हैं, लेकिन सभी को मीडिया में जगह नहीं मिलती।
चुनाव के दौरान भी दलितों और महादलितों पर आतताइयों के आतंक की नंगी तलवार टंगी रहती है। ८ मार्च २०१२ को उत्तरप्रदेश एक गांव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी की जीत के बाद दलितों के १३ घर फूंक दिये गये। इस कहर के टूटने का कारण था दलितों के द्वारा समाजवादी पार्टी को वोट न देना। दलित खुद अपने फैसले लें और मनचाही राह चुनें, यह सामंतवादी सोच के शोषकों को बर्दाश्त नहीं होता। वर्ष २०१६, ऐन होली के दिन केंद्रीय कृषि मंत्री एवं मोतिहारी के सांसद राधामोहन सिंह द्वारा गोद लिए गए आदर्श ग्राम खैरीमाल में दबंगों ने ५०, महादलित परिवारों पर अमानवीय जुल्म ढाते हुए न सिर्फ उन्हें मारापीटा बल्कि लूटपाट मचाते हुए उनके घर तक उजाड डाले। नशे में धुत दबंग उनके मवेशी हांक कर ले गए और महिलाओं से छेडछाड करने की गलीच मर्दानगी भी दिखायी। यह सब कुछ उन राजनेताओं की आंखों के सामने होता  चला आ रहा है जो दलितों और शोषितो के मसीहा कहलाते हैं।
दलितों और शोषितो के हित की लडाई लडने के नाम पर राजनीति करने वाले यह तथाकथित मसीहा फर्श से अर्श तक पहुंच जाते हैं। सत्ता पाते ही यह राजा-महाराजाओं को मात देने लगते हैं। उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और चाटूकार राजनेताओं के रंग में रंग जाते हैं। कोई छगन भुजबल देखते ही देखते अथाह भ्रष्टाचार की जादुई छडी घुमाकर हजारों करोड के वारे-न्यारे करता है और जेल पहुंच जाता है। फिर भी उसके चेहरे पर शर्मिंदगी की हल्की-सी लकीर नजर नहीं आती। अधिकांश पाला बदलने वाले सत्तालोलुप दलित नेताओं का इतिहास उठाकर देख लीजिए... बहुत कम ऐसे हैं जो वाकई दलितों के प्रति पूरी तरह से ईमानदार हैं।

Thursday, April 7, 2016

सत्ता और शराब

बिहार में पूरी तरह से शराब बंदी करने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अभिनंदन। बहुत वर्षों बाद वो दिन आया जब किसी नेता ने जोखिमभरे वादे को निभाने का भरपूर साहस दिखाया। बिहार जैसे प्रदेश में शराब बंदी करना कोई बच्चों का खेल नहीं था। प्रदेश में शराब बंदी लागू होने से महिलाएं तो गदगद हो गयीं। ढोल-नगाडों के बीच जमकर जश्न मनाया गया। राजधानी पटना समेत पूरे प्रदेश में महिलाओं ने होली और दिवाली एक साथ मनायी। ऐसा भी पहली बार हुआ जब शराब के विरोध में जुलूस निकले और सभाएं की गयीं। सभी विधायकों और मंत्रियों ने मय से दूरी बनाये रखने की कसम खायी।
कौन नहीं जानता कि शराब की वजह से महिलाओं को ही सबसे ज्यादा कष्ट झेलना पडता है। लाख समझाने पर भी पियक्कड पति, भाई, पिता, बेटे शराब से तौबा करने का नाम नहीं लेते। अच्छे-खासे घर बरबाद हो जाते हैं, लेकिन शराबियों की नींद नहीं खुलती। औरतें तो बस खून के आंसू बहाती रह जाती हैं। बिहार की महिलाओं पर अपार उपकार किया है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने। शराब बंदी कर उन्होंने महिलाओं को वो खुशी और तसल्ली दे दी जिसकी उन्हें वर्षों से चाह थी। बिहार में शराबबंदी को लेकर उठाया गया यह कदम कितना सफल होता है यह तो आने वाला वक्त बतायेगा, लेकिन अभी से हताश और निराशा की बातें करना तर्कसंगत नहीं लगता। अभी तो पीठ थपथपाने का वक्त है।
१९७७ में बिहार में ऐसा ही प्रयोग तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने भी किया था, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पायी थी। उनकी शराब बंदी के पीछे मंशा यही थी कि प्रदेश में होने वाले अपराधों में कमी आयेगी। लोगों के खून-पसीने की कमायी का सदुपयोग हो सकेगा, लेकिन सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाये। अवैध शराब तस्करों की चांदी हो गयी। मिलावटी और जहरीली शराब की वजह से पियक्कडों की जान पर बन आयी। प्रसिद्ध अभिनेता स्वर्गीय एनटी रामाराव ने आंध्रप्रदेश में शराब बंदी के पुख्ता वादे के साथ राजनीति में कदम रखा था। महिलाओं में खासे लोकप्रिय एनटी रामाराव गरीब प्रदेशवासियों को शराब के भयावह प्रकोप से बचाना चाहते थे। अभिनेता से नेता बने रामाराव के शराब बंदी आंदोलन में किसी को कोई खोट नज़र नहीं आया था। वैसे भी उनकी छवि परंपरागत जुमलेबाज नेताओं से जुदा थी। अंतत: उनका आंदोलन रंग लाया और वे आंध्रप्रदेश की सत्ता पाने में सफल हो गये। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होते ही उन्होंने अपना वादा निभाया, लेकिन जब उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने प्रदेश की सत्ता संभाली तो बंदी को एक ही झटके से हटा दिया। १९९६ में हरियाणा में मुख्यमंत्री बंसीलाल ने भी शराबबंदी के वादे को साकार कर लोकप्रियता पायी थी, लेकिन बाद में प्रदेश में अवैध शराब की अंधाधुंध तस्करी होने के कारण उनका प्रयोग टांय-टांय फिस्स हो गया।
१ अप्रैल २०१६ को जैसे ही बिहार में देसी शराब पर बंदिश लगाये जाने का ऐलान किया गया तो अवैध शराब माफिया कुछ ही घंटो के भीतर सक्रिय हो गये। कहीं भी सहज उपलब्ध होने वाली ताडी में अवैध देसी शराब मिलायी जाने लगी। इससे ताडी की बिक्री में अभूतपूर्व इजाफा हो गया। नियमित देसी पीने वाले ताडी पर टूट पडे। जब भी किसी प्रदेश या शहर में शराब पर पाबंदी लगायी जाती है तो अवैध शराब कारोबारियों के साथ-साथ तस्कर भी पियक्कडों को शराब उपलब्ध कराने में लग जाते हैं। यह माना कि पुराने अनुभव अच्छे नहीं रहे। जिन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शराब पर बंदिशें लगायी गयीं, वो पूरी तरह से सफल नहीं हो पाये। इस सच को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि नीतीश कुमार ने चूनाव पूर्व शराब बंदी की घोषणा की बदौलत ही सत्ता पायी। बिहार में महागठबंधन की बडी जीत का कारण महिलाओं द्वारा उनके पक्ष में किया गया अभूतपूर्व मतदान ही है। नीतीश कुमार ने पहले देसी शराब पर प्रतिबंध लगाया और जब उन्होंने देखा और समझा कि उनके इस कदम को सराहा जा रहा है तो उन्होंने ५ अप्रैल २०१६ को अंग्रेजी शराब के बेचने और पीने पर भी पाबंदी लगाकर अपने चुनावी वादे को पूरी तरह से पूरा कर दिखाया। ऐसा तो हो नहीं सकता कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराब बंदी के पुराने इतिहास से वाकिफ न हों। यकीनन उनका साहस अनुकरणनीय है। उन्होंने शराब बिक्री की बदौलत सरकारी खजाने में आने वाले लगभग पांच हजार करोड रुपयों की परवाह न करते हुए अपने वादे और सर्वजनहित को प्राथमिकता दी। अगर पूर्व में शराब के खिलाफ चलाये गये अभियान असफल रहे तो इसका यह मतलब तो नहीं कि अब भी शराब बंदी का वही हश्र होगा। ऐसा सोचना बेवकूफी भी है और नादानी भी। शासन और प्रशासन के यदि इरादे नेक हों तो शराब की तस्करी और अवैध शराब के धंधेबाजों को दबोचना कोई मुश्किल काम नहीं है।
यह भी बहुत अच्छी खबर है कि बिहार सरकार शराब की लत को छुडवाने के लिए व्यसन मुक्ति केंद्र की स्थापना करने जा रही है। यदि कोई अवैध शराब बेचता हुआ पकडा जाता है तो उसे कडा दण्ड और इसे पीकर यदि किसी की मौत हो जाती है तो ऐसी स्थिति में अवैध शराब निर्माता, विक्रेता, तस्कर को १० साल की सज़ा से लेकर उम्र कैद तक का प्रावधान रखा गया है। बिहार प्रशासन के पूरी तरह से जागरूक रहने पर निश्चय ही बिहार का चेहरा बदलेगा और अपराधों में काफी कमी आयेगी। देश के प्रदेश गुजरात की तरक्की और अपराधों की कमी में शराब बंदी ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। देश को आज नीतीश कुमार जैसे शासकों की जरूरत है।
अपने देश के एक प्रदेश में ऐसे मुख्यमंत्री भी हैं जिन्हें लगता है कि शराब की नदिया बहा देने से उनका वोट बैंक और पुख्ता होगा और उनकी सत्ता पर कभी कोई आंच नहीं आयेगी।  वे बडे गर्व के साथ कहते हैं कि भले ही दूसरी जरूरी चीजों के दाम बढ गये हैं, लेकिन हमने शाम की दवा की कीमतें कम कर आम आदमी को बहुत बडी राहत पहुंचायी है...।

Thursday, March 31, 2016

किसी की मौत, किसी की मौज

चित्र -१ : होशंगाबाद जिले में स्थित चांदौन गांव के किसान अशोक शर्मा ने १९ नवंबर, २०१४ को अपने खेत में सल्फास खाकर प्राण त्याग दिये। कहीं कोई हलचल नहीं हुई। मीडिया को इस खुदकुशी में कोई नयी बात नजर नहीं आयी। नेता भी चुप्पी साध गये। यह तो रोजमर्रा का किस्सा है। एक किसान चुपके से दुनिया में आता है और इंसानी व कुदरत की मार को न सह पाने के कारण खुदकुशी कर लेता है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में तो किसानों की आत्महत्याओं की खबरें आम हो चुकी हैं। किसानों की अंधाधुंध मौतों पर सत्ताधीशों और दमदार नेताओं के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। नौकरशाह तो मन के राजा हैं, उनके लिए अन्नदाता की कोई अहमियत नहीं है। दो एकड जमीन के मालिक अशोक पर बैंक का लगभग ६० हजार रुपये का कर्जा था। बारिश की वजह से खेत में लगी सोयाबीन की खेती के नष्ट हो जाने के कारण वह हताश और निराश हो गया था। बैंक के वसूली अधिकारियों के चलाये गये आतंकी अभियान ने उसे इस कदर भयभीत कर दिया कि उसने अंतत: आत्मघाती रास्ता चुन लिया।
चित्र - २ : साल २०१५ का सितंबर महीना। राजाराम उर्फ रज्जू आदिवासी ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। उसकी उम्र थी महज तीस वर्ष। वह सागर जिले के देवरी तहसील के डोंगर सलैया गांव का निवासी था। उसे भी फसल की बरबादी ने कहीं का नहीं छोडा। उस पर मात्र ५० हजार रुपये का कर्ज था। ऐसा नहीं था कि उसकी कर्ज अदा करने की नीयत नहीं थी। सोयाबीन और धान की फसल के सूख जाने के कारण वह कर्ज की रकम लौटा पाने में असमर्थ था, लेकिन बैंक वाले ब्याज सहित रकम वसूलने पर अडे थे। उसकी मजबूरी उन्हें बहाना लगती थी। खुद्दार रज्जू आदिवासी को यह तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई। उसने चुपचाप विष निगला और सदा-सदा के लिए विदा हो गया। उसका खपरैल वाला कच्चा घर उदासी की कब्र बन कर रह गया है। मां-बाप की गीली आंखें सूखने का नाम नहीं लेतीं। कुछ पत्रकार जब उसके गांव पहुंचे तो उन्होंने देखा कि रज्जू का घर एकदम खुला पडा था। कहीं कोई ताला नहीं। वैसे भी ताले तो धनवानों के घरों के दरवाजों पर ही लगते हैं। रज्जू का घर तो खाली था और खाली है। यहां तक कि चुल्हा भी तब जलता है जब घर में आटा-चावल आता है, लेकिन ऐसा चमत्कार भी रोज तो नहीं होता।
चित्र - ३ : बैंको के अरबों रुपये के कर्जदार के जीने का अपना निराला अंदाज है। वह अकेला नहीं चलता। उसके साथ आठ-दस नौकर-चाकर और अंगरक्षक चलते हैं। एक नौकर तो चांदी की तश्तरी में तीन-चार मोबाइल फोन सजाकर चलता है। उसके किसी न किसी फोन की घण्टी हमेशा बजती रहती है। कभी-कभी तो सभी फोन एक साथ बजने लगते हैं। जिससे उसे बात करनी होती है, उसी से ही वह बात करता है। उसके नौकर-चाकर जानते हैं मालिक की किससे बात करवानी चाहिए। यह शाही ठाठ-बाट वाला चित्र है विजय माल्या का जो उद्योगपति होने के साथ-साथ देश का सम्मानित सांसद भी है। वह विभिन्न बैंको को ९ हजार करोड रुपये से अधिक रकम की चपत लगाकर सात समंदर पार भाग गया और बैंको के कर्ताधर्ता हाथ पर हाथ धरे रह गये। किसी जांच एजेंसी को भनक तक नहीं लगी। फिर सरकार तो सरकार है जो जगाने पर ही जागती है। सभी को पता था कि मस्तीखोर विजय माल्या की कंपनियां घाटे में चल रही हैं। देश और विदेशों में वह सम्पत्तियों पर संपत्तियां खरीदता चला जा रहा है। वह बैंको का कर्ज लौटाने में असमर्थ है। कर्ज लेकर घी पीने की उसकी आदत पड चुकी है फिर भी उस पर सभी मेहरबान रहे। एक आम आदमी को रहने को एक घर मिल जाए तो वह खुद को मुकद्दर का सिकंदर मान लेता है, लेकिन विजय माल्या के पास कई घर और अपार जमीन, जायदादों की भरमार है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू, गोवा और पता नहीं कहां-कहां उसके आलीशान ठिकाने हैं जहां वह रंगरेलियां मनाता रहा है। बैंक अधिकारी सबकुछ देख-समझ रहे थे कि यह प्ले ब्वॉयनुमा कारोबारी कर्ज में ली गयी रकमों को धंधे में लगाने की बजाय जहां-तहां लुटा रहा है। इसके इरादे नेक नहीं हैं। फिर भी उन्होंने अपने बैंकों की तिजोरियां उसके लिए खोले रखीं। जितना धन चाहो ले लो। तुम भी मस्त रहो और हमारा भी उद्धार करते रहो। दरअसल शातिर माल्या इस देश का आम नहीं खास आदमी है जो इस सोच के साथ जीता है कि कल किसने देखा है। हाथ आये मौके को लपक लेना ही समझदारी है। यह जिन्दगी सिर्फ और सिर्फ एक बार मिली है। जितनी ऐश करनी है कर लो। भले ही दिवाला ही क्यों न पिट जाए।
यह अपने देश में ही संभव हैं कि कोई कर्जदार राजा-महाराजाओं को मात देने वाली शानोशौकत भरी शाही जिन्दगी जी सकता है। माल्या के पास क्या नहीं था...? तीन आलीशान सर्वसुविधायुक्त हवाई जहाज जिनमें एक बोइंग ७२७, एक गल्फ स्ट्रीम और एक हाल्कर ७०० विमान के साथ कई फार्म हाऊस, द्वीप और २५० से अधिक विंटेज कारें। इनका मजा वह अकेले नहीं लूटता था। नेता, नौकरशाह, सत्ताधीश, सत्ता के दलाल, कई पत्रकार, संपादक, अखबारों और न्यूज चैनलों के मालिक आदि...आदि बहती गंगा में डूबकियां लगाते थे।
चित्र - ४ : बैंको से कर्ज लेकर चम्पत हो जाने वालों में और भी कई नामीगिरामी उद्योगपति शामिल हैं। भूषण स्टील के उच्च प्रतिभावान मालिकों ने देश के बैकों को ४० हजार करोड का चूना लगाया तो एस्सार स्टील ने ३० हजार करोड को चपत लगाकर चम्पत हो जाने में ही अपनी भलाई समझी। भारती शिपयार्ड, एबीजी शिपयार्ड, होटल लीला, विनसन डायमंड एंड ज्वेलरी, सूर्य विनायक इंडस्ट्रीज लि., जूम डेवलपर्स आदि ने भी विजय माल्या की राह पर चलते हुए अरबों-खरबों खाये, पचाये और फुर्र हो गये। यह परम्परा अभी भी बरकरार है। दिल्ली, मुंबई, नागपुर, पुणे, सूरत, अहमदाबाद, बेंगलुरू, रायपुर, इंदौर जैसे नगरों, महानगरो के कई धनपति सरकारी बैंको से लिये गये करोडों-करोडों रुपयों के कर्ज को चुकाने में आनाकानी कर रहे हैं। मजे की बात यह भी है कि इनकी शानो-शौकत में कहीं कोई कमी नहीं आयी है। यह भी कम हैरत की बात नहीं कि जहां कर्जदार किसानों की आत्महत्याओं की एक के बाद एक खबरें सुनने-पढने में आती हैं वहीं किसी भी दिवालिया हुए कारोबारी की आत्महत्या की खबर शायद ही सुनने में आती हो। इस जमात को डिफाल्टर होने के बाद भी फलते-फूलते देखा जाता है। कुछ चतुर व्यापारी तो शौकिया अपना दिवाला पिटवाते हैं।

Wednesday, March 23, 2016

विवादों की फसल

देश के कुछ नेता आए दिन कोई न कोई विवादित बयान देते रहते हैं। उनके शब्द शूल की तरह चुभते हैं। वे तो नये-नये विवादों का तमाशा खडा कर चैन की नींद सो जाते हैं, लेकिन सजग देशवासियों की नींद उड जाती है। ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने तो यह मान लिया है कि विवादाग्रस्त भडकाऊ शब्दावली ही उनकी राजनीति को शिखर पर पहुंचा सकती है। ठंडक और शीतलता प्रदान करने वाली सीधी-सादी भाषा बोलने में उन्हें कमतरी का एहसास होता है। वैसे ओवैसी इकलौते नेता नहीं हैं जो तरह-तरह के पीडादायक, भडकाऊ बयानों को उछालकर सुर्खियां पाते रहते हैं। बीते दिनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि युवकों में देशप्रेम पैदा करने के लिए उन्हें भारत माता की जय के नारे लगाना सिखाना चाहिए। हमें नहीं लगता कि इसमें उनकी कोई गलत भावना छुपी है, लेकिन सांसद ओवैसी ऐसे उछल पडे जैसे उन्हें बिजली का करंट लग गया हो। उनका तमतमाता बयान आया कि भले ही मेरी गर्दन पर चाकू रख दें, लेकिन मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा, क्योंकि भारतीय संविधान में ऐसा नहीं लिखा है। नेताजी को मालूम था कि उनके यह अभद्र और अविवेकी बोल देशभर में चर्चा का विषय बनेंगे। विवादों को जन्म देने और उन्हें तूफान बनाने की दुष्टता में माहिर ओवैसी के बयान को लगभग सभी न्यूज चैनल वालो ने कई-कई घण्टों तक ऐसे दिखाया और सुनाया जैसे उनके पास हितकारी समाचारों का घोर अकाल पड गया हो। उनकी निगाह में इस उग्र नेता का बयान इतना महत्वपूर्ण था, जिसका जन-जन तक पहुंचना नितांत जरूरी था। सांसद ओवैसी तो गदगद हो गये, लेकिन लाखों देशवासी आहत होकर रह गए। ओवैसी की अजूबी बयानबाजी कि खबर को विभिन्न न्यूज चैनलों पर बार-बार देखने के बाद बिहार में स्थित गोपालगंज की एक उम्रदराज महिला सादिकन खातून के दिलो-दिमाग पर ऐसा असर पडा कि वे बेहोश हो गयीं। होश में आने के बाद उन्होंने अपनी पीडा और चिन्ता अपने परिजनों को बतायी। अहिंसावादी युगपुरुष महात्मा गांधी को अपना आदर्श माननेवाली सादिकन खातून कोई आम भारतीय नारी नहीं हैं। वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले चुकी हैं। अपनी उम्र के सौवें वर्ष के पडाव पर होने के बावजूद वे देश और दुनिया की खबरों से सतत रूबरू रहती हैं। वे इस हकीकत को नहीं भूली हैं कि देश को स्वतंत्र करवाने में कैसी-कैसी तकलीफें आयीं और कुर्बानियां देनी पडीं। भारत माता की जय का नारा लगाकर शहादत देने वाले भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और लाजपतराय आदि तमाम शहीदों के किस्से उन्हें अच्छी तरह से याद हैं।
असदुद्दीन का कहना है कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि भारत माता की जय बोली जाए। उनकी इस सफाई से तो यही लगता है कि वे संविधान का अक्षरश: पालन करते हैं। वे ऐसा कोई भी काम नहीं करते जो संविधान के खिलाफ हो। मुसलमानों का मसीहा बनने के लिए हर तरह का जोर लगाते इस सांसद के छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने हैदराबाद में घोर आपत्तिजन आग उगलने वाला भाषण दिया था। जिसका सार यही था कि यदि पुलिस अपने हाथ बांध ले तो देश के पंद्रह करोड मुसलमान १२५ करोड हिन्दुओं का सफाया करने की हिम्मत दिखा सकते हैं। ऐसे शर्मनाक उत्तेजक बोल कोई सिरफिरा ही बोल सकता है जो हिन्दुस्तान के कानून से खेलने की सोच के साथ-साथ हिन्दु-मुसलमानो को युद्ध की आग में झोंक देने की ठाने हो। अकबरुद्दीन विधायक हैं। मुसलमानों को हिन्दुओ से लडाकर आपसी सदभाव की हत्या करने के मंसूबे पालने वाला और कुछ भी हो, लेकिन संविधान का पालन करने वाला तो नहीं हो सकता। दोनों भाई एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। मुसलमानों को उकसा कर अपनी राजनीति की रोटियां सेकना ही इनका एकमात्र मकसद है। जावेद अख्तर का यह कथन काबिलेगौर है- 'जिन्हें गुमान हो गया है कि वह राष्ट्रीय नेता हैं, जिनकी हैसियत एक शहर या मुहल्ले के छुटभइये नेता से ज्यादा नहीं है। वे कहते हैं कि किसी भी कीमत पर भारत माता की जय नहीं बोलेंगे... क्योकि यह संविधान में नहीं लिखा है। वह बताएं कि संविधान में शेरवानी और टोपी पहनने की बात कहां लिखी है? जावेद कहते हैं कि भारत माता की जय बोलना मेरा अधिकार है। मैं कहता हूं कि - भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय...।' दरअसल, यही सोच हर उस भारतवासी की है जो देश में अमन चैन और भाईचारा चाहता है। देश को विकास के पथ पर अग्रसित होते देखना चाहता है न कि विवादों के दलदल में धंसते। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत माता की जय कहने से इंकार करने वालो की जीभ काटने पर लाखों रुपये के इनाम की घोषणा कर वही बेवकूफी की जाए जो अधिकांश न्यूज चैनल वाले इनकी खबरें बार-बार दिखा कर करते चले आ रहे हैं।
भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करवाने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी भी शाब्दिक हिंसा का सहारा नहीं लिया। बापू के नाम की माला जपने वाले आज के नेता इतने बडे मुखौंटेबाज हैं कि एक दूसरे को नीचा दिखाने के मौके तलाशते रहते हैं। बापू जैसी शालीनता, सहनशीलता, त्याग और सादगी उनमें कहीं भी नजर नहीं आती। अहिंसा के पुजारी बापू के समूचे जीवन की वास्तविक तस्वीर देखनी हो तो सेवाग्राम में स्थित बापू कुटी आश्रम से बेहतर और कोई जगह नहीं हो सकती। विवादों के भूखे और भौतिक सुख सुविधाओं को पाने के लिए अपना ईमान तक बेचने वाले नेताओं को एक बार जरूर बापू के इस आश्रम में  जाना चाहिए। यकीनन उनकी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी कि देश के महानायक ने बिना विवादों की फसल बोये, कम से कम सुविधाओं के साथ कैसे जीवनयापन करते हुए बडी से बडी अहिंसक लडाइयां लडीं और सफलता पायी। पत्रकार मित्र डॉ. सुधीर सक्सेना तथा राजेश यादव के साथ सेवाग्राम में स्थित बापू कुटी को करीब से देखने का अवसर मिला तो मन में विचार आया कि नागपुरवासी होने के बावजूद मैंने यहां आने में इतनी देरी क्यों लगा दी! हम तीनों को बापू की सादगी ने अपने मोहपाश में ऐसा बांधा कि उससे मुक्त होने को जी ही नहीं चाहता। कुटिया के प्रांगण में ही लगे फलक पर लिखी इन पक्तियों ने तो जैसे मंत्रमुग्ध ही कर दिया :
"धरती की माटी
धरती का जल,
हवा धरती की
धरती के फल
सरस बनें, प्रभु सरस बनें
धरती के तन और
धरती के मन
धरती के सारे भाई-बहन
विमल बनें, प्रभु विमल बनें"

Thursday, March 17, 2016

तेल देखो...तेल की धार देखो

लिखने के लिए मोर्चा संभालते-संभालते एकाएक फेसबुक पर झांकने की चाहत जाग उठी। कोरबा निवासी पत्रकार मित्र वेद प्रकाश मित्तल के द्वारा शेयर की गयी आर्थिक अपराधी, राज्यसभा सांसद विजय माल्या और जी न्यूज के जुगाडू कर्ताधर्ता सुभाष चंद्रा की आपस में गले मिलती तस्वीर पर नजरें अटक गयीं। तस्वीर ही बता रही थी दोनों में गजब का याराना है। एक डिफाल्टर उद्योगपति, दूसरा ऐसा मीडिया मालिक जिसने सत्ता की चाकरी कर अपार दौलत बनायी और आजकल उपदेशक बना फिरता है। इन शातिर पूंजीपतियों की आलिंगनबद्ध मुस्कराती तस्वीर के ऊपर लिखा पाया:
"कुम्भ में मिले दो भाई,
एक कसाई दूसरा हरजाई!"
उपरोक्त पंक्तियां बताती हैं कि लोगों में सत्ता के दलालों और आर्थिक दानवों के प्रति कितना गुस्सा है। वे खुलकर गाली नहीं दे सकते, लेकिन क्या यह शब्द किसी गाली और तमाचे से कम हैं? तय है कि अंदर ही अंदर आग जल रही है। अभी भी सब्र के पैमाने पूरी तरह से नहीं छलकें हैं, लेकिन विरोध के जो स्वर गूंज रहे हैं वे आने वाले भयंकर तूफान के संकेत तो दे ही रहे हैं।
इस तस्वीर ने यह भी बता दिया कि माल्या की मीडिया के धुरंधरों से कैसी नजदिकियां रही हैं। देश के अधिकांश नामी-गिरामी पत्रकार और संपादक उसकी महफिलों में जाम छलकाते हुए कमसिन बालाओं के साथ गुल्छर्रे उडाते हुए महंगे उपहार पाते रहे हैं। ऐसे में जब  अहसानफरामोश न्यूज चैनल वालों ने 'दोस्ती' का लिहाज नहीं किया तो माल्या को गुस्सा आ गया। उसने धमकाने के अंदाज में मीडिया को चेताया कि मैंने तुम लोगों पर इतने उपकार किये हैं जिनका कर्जा तुम कभी नहीं उतार सकते। मैंने तुम्हें सुख-सुविधाओं के समंदर में गोते लगवाये, विदेशों की सैर करवायी, सुरा और सुंदरी से लेकर हर वो अय्याशी का सामान उपलब्ध करवाया जिसकी तुमने मांग की। आज जब मेरा बुरा वक्त आया तो तुम लोग गिरगिट की तरह रंग बदलने पर उतर आये। मुझे ठग और लुटेरा कहने लगे। मैं अगर तुम लोगों की पोल खोलूंगा तो पता नहीं कहां-कहां मुंह छिपाते फिरोगे। मैंने तुम मतलबपरस्तों को जो खैरातें दी हैं उनके सभी सबूत मेरे पास हैं।
सरकारी बैकों का हजारों करोड रुपये कर्ज लेकर नहीं चुकाने और फिर रातों-रात देश छोडकर भाग जाने वाले माल्या के बचाव में भी कुछ राजनीतिक दिग्गज उतर आये। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुला ने कहा कि वे भगौडे नहीं हैं, बल्कि सम्मानित कारोबारी हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा ने फरमाया कि माल्या देश के सपूत हैं, वह देश छोडकर नहीं भागे हैं। उन्होंने यह सवाल भी दागा कि ६० अन्य प्रमुख कर्जदार हैं जो कर्ज अदायगी में आनाकानी करते चले आ रहे हैं। ऐसे में अकेले माल्या पर ही क्यों निशाना दागा जा रहा है। विपक्ष और मीडिया तो हाथ धोकर उनके पीछे पड गया है? दरअसल ऐसे भाई-भतीजावाद के हिमायती नेताओं के कारण ही आजादी के इतने वर्षों बाद देश में असमंजस की स्थिति है। बैंकों से मोटे कर्ज लेकर उन्हें शराब-कबाब की भेंट चढा देने वाला शख्स सम्मानित कारोबारी कैसे हो सकता है? जब सरकारी बैंके छोटे-मोटे कर्जदाताओं को सूली पर लटकाने को उतर आती हैं तो माल्या जैसों के साथ ढिलायी और हमदर्दी गुस्सा तो दिलाती ही है। सात समंदर पार निकल जाने वाले विजय माल्या ने भी चोरी उस पर सीना जोरी के अंदाज में ट्वीट किया कि मैं भगौडा नहीं हूं। मैं भारतवर्ष का सम्मानित राज्यसभा सदस्य और उद्योगपति हूँ।
देशवासियों के खून-पसीने के ९ हजार करोड से ऊपर के धन का गबन करने वाला यह अय्याश आखिर सांसद बनने में कैसे सफल हो गया? माल्या को देवगौडा की पार्टी जेडीएस के समर्थन के चलते वर्ष २००२ और २०१० में कर्नाटक में दो कार्यकाल के लिए राज्यसभा की सदस्यता की सौगात हासिल हुई। कांग्रेस और भाजपा ने भी उसे साथ देने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। तय है कि यह उपकार मुफ्त में तो नहीं किया गया होगा। इसकी पूरी फीस वसूली ही गयी होगी। राज्यसभा सांसद बनने के बाद माल्या का रूतबा बढता चला गया। बैंको के खजाने की मोटी रकमें कर्ज के रूप में उसकी तिजोरियों में समाती चली गयीं। अब यह बताने की जरूरत तो नहीं है कि अपने देश में विधायकों और सांसदों का कैसा-कैसा जलवा रहता है। अदना-सा विधायक भी पांच साल में करोडपति तो बन ही जाता है। भ्रष्ट सांसदों को अरबपति बनने में देरी नहीं लगती। सांसदों को अपने व्यक्तिगत काम निकालने के लिए सिर्फ इशारे की जरूरत होती है। विजय माल्या ने अपने नाम के आगे सांसद लगवाने के लिए हजारों करोड यूं ही नहीं फूंके। इस पदवी का उसे भरपूर लाभ मिला। जो बैंक अधिकारी व्यापारी माल्या को लोन देने से कतराते थे, वही अधिकारी उसके सांसद बनते ही दण्डवत होने लगे और फिर कर्ज की बौछार शुरु कर दी। अंधा मांगे दो आंखें की तर्ज पर माल्या ने जी भरकर लोन हथियाये और रकम को अंदर करने के साथ-साथ दोनों हाथों से लुटाता चला गया।
अभी तक हम यही देखते और सुनते आये हैं कि व्यापारी, उद्योगपति कर्ज लेकर इतनी मेहनत करते हैं कि अपने विकास के साथ-साथ कर्ज को नियमित पटा कर साख में बढोत्तरी करना अपना दायित्व मानते हैं, लेकिन माल्या ने कर्जें लिए ही डुबाने के लिए। माल्या आश्वस्त था कि वह इस देश का सांसद है और उसकी तूती हमेशा बोलती रहेगी। नौ हजार करोड तो क्या ९० हजार करोड का कर्ज लेने के बाद भी उस पर कोई आंच नहीं आयेगी। जब सत्ताधीश, नौकरशाह और अधिकांश मीडिया वाले उसके साथी हैं, खैरख्वाह हैं तो उसके बुरे दिन आने का तो सवाल ही नहीं उठता। वह देश और दुनिया की सुंदरियों को अपनी बाहों में समेटे कैलेंडर पर कैलेंडर निकालने में मगन रहा। अभिनेताओं, अभिनेत्रियों, नेताओं, सांसदों, मंत्रियों-संत्रियों को अपने निजी हवाई जहाजों से देश और दुनिया की सैर करवाता रहा। शबाब और शराब की बरसातें कर सभी को मदमस्त करता रहा। उसके सभी 'कृपापात्र' मुंह और आंखें बंद किये रहे। उसके यहां काम करने वाले लाखों कर्मचारी तनख्वाह के लिए भी तरसते रहे, लेकिन माल्या को इससे कोई फर्क नहीं पडा। उसे तो देश और विदेशों में आलीशान फार्म हाऊस, बंगले और महंगी से महंगी कारों को खरीदने और अय्याशी में डूबने से फुर्सत ही नहीं मिली। कल तक जिनकी जुबान पर ताले जडे थे आज वे चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं कि विजय माल्या सरकार की आंखों में धूल झोंककर भाग गया! उसे पकडा क्यों नहीं गया? यह तमाशेबाजी नयी नहीं है। ढोल पीटने वाले भी बडे पुराने खिलाडी हैं...।

Friday, March 11, 2016

लम्हों की खता

"जनता का शोषण करने वाले नेताओं, अफसरों और दलालों को फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए... या गोलियों से भून दिया जाना चाहिए।" यह कहना है राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का। यह महाशय बिहार के माधोपुर से सांसद होने के साथ जन अधिकार पार्टी के संरक्षक हैं। इनका मानना है कि भारत में सुधार का कोई और रास्ता नहीं बचा है। दस फीसदी नेता-अफसर नब्बे फीसदी लोगों का शोषण कर रहे हैं। कोई उनका कुछ भी नहीं बिगाड पा रहा है। पप्पू यादव ने उस लालू प्रसाद यादव को फांसी पर लटकाने की ललकार लगायी है जिनको कभी वे अपना सर्वेसर्वा और बिहार का मसीहा कहते नहीं थकते थे। चारा-चोर लालू के भ्रष्ट होने की जानकारी तो उन्हें तब भी थी जब वे उनके महिमामंडन में कोई कसर नहीं छोडते थे। मतभेद होने और साथ छूटने के बाद शब्द भी आक्रामक हो जाते हैं। अपने यहां की राजनीति और नेताओं की यह जगजाहिर परिपाटी है। वैसे भी पप्पू यादव जैसे नेताओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता। कुकरमुत्ते की तरह उगने वाले ऐसे नेता बडी आसानी से पाला बदल लेते हैं। ताज्जुब है कि फिर भी यह लोग चुनाव जीत कर देश के सबसे बडे मंदिर संसद भवन पहुंच जाते हैं। समर्पित, ईमानदार, शालीन और सुलझे हुए नेताओं के लिए इन्हें चुनावी मैदान में पटकनी देना टेढी खीर हो जाता है। अपने विरोधियों के खिलाफ इनकी जुबान तेजाब उगलते हुए कैंची की तरह चलती रहती है। इनके विरोधियों के चेहरे बदलते रहते हैं। जिधर दम उधर हम की नीति पर चलते हुए इनकी राजनीति का सफर जारी रहता है।
वक्तृत्व कला में पारंगत नये चेहरों की राजदलों को सतत जरूरत रहती है। उनकी गिद्ध दृष्टि शाब्दिक आग उगलने वाले विवादास्पद चेहरों पर गढी रहती है। मौका पाते ही वे उन्हें अपने पाले में ले लेते हैं। अभी तक हम यही सुनते और देखते आ रहे थे कि लोग देशद्रोहियो से पूरी तरह से नफरत करते हैं, लेकिन पिछले दिनों जिस तरह से संसद हमले के दोषी अफजल गुरु और आतंकी मकबूल बट्ट के चहेतों के नारे सुने तो स्तब्ध रह गये। इन्हीं नारों के शोर के बीच कन्हैया का नाम किसी तूफान की तरह सामने आया और चर्चा का विषय बन गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को सात समंदर पार तक ख्याति, कुख्याति दिलवाने में मीडिया के साथ-साथ चतुर बयानवीरों की भूमिका हैरत में डाल देती है। देशद्रोह के आरोप में जमानत पर जेल से बाहर आए कन्हैया को कुछ राजनैतिक दलों ने ऐसे दुलारा-पुचकारा जैसे पिता अपने बेटे की पीठ थपथपाता है। ऐसा भी लगा कि इस देश में एक नये क्रांतिकारी नेता ने जन्म ले लिया है। कन्हैया ने अपनी भाषणबाजी से उनका दिल जीत लिया जिन्हें मोदी सरकार खटकती रहती है। उसे जेल भेजा तो गया था देशद्रोह के आरोप में, लेकिन वह जेल से नायक बनकर निकला। क्या कन्हैया और उसे 'हीरो' बनाने को आतुर लाल चेहरेधारी इस सच को नकार सकते हैं कि कन्हैया जिस जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष है उसी में यह भडकाऊ नारे नहीं लगे? : 'कितने अफजल मारोगे, घर घर से अफजल निकलेगा... भारत तेरे टुकडे होंगे, इंशा अल्ला... इंशा अल्ला... भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी, जंग रहेगी।'
आम आदमी को रोष और आक्रोश की आग में झुलसा देने वाले इन नारों के पक्ष में चाहे कितनी भी दलीले दी जाएं, कन्हैया को बेकसूर, नादान, भोला और मासूम बताया जाए, लेकिन इस कलम को यह कतई मंजूर नहीं। सच को छुपाना भी छल है, देश से गद्दारी है। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वह इन नारों को ईजाद करने वालों और गुंजाने वालों से अनभिज्ञ हो। कन्हैया की तस्वीर को येन-केन-प्रकारेण भावी नेता के फ्रेम में सजाने को आतुल नक्सलवादियों के हितैषी बुद्धिजीवी अपने होश खो चुके लगते हैं या फिर साजिशन आखें बंद किये हैं। सजग देशवासी यह कैसे भूल सकते हैं कि जेएनयू के कारण देश के अन्य विश्वविद्यालओं के छात्र भी उत्तेजक और अलगाववादी नारेबाजी पर उतर आये। उन्हें भी आतंकी याकूब मेनन, मकबूल और अफरोज बेगुनाह नजर आने लगे। उसके बाद तो जैसे सिलसिला सा चल पडा। जेएनयू के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय में छात्रों की भीड के द्वारा यह नारे लगाना... 'हर अफजल बोले आजादी, गिलानी बोले आजादी, हम छीन के लेंगे आजादी- आखिर कौन से सच और सोच को दर्शाता है? ...इन्हें प्रेरणा तो कन्हैया के विश्वविद्यालय से ही मिली। इन नारों को उछालकर देश का वातावरण बिगाडने की कोशिश से इंकार तो नहीं किया जा सकता।
कौन राष्ट्रद्रोही है और कौन देशप्रेमी... इस सवाल में उलझने की बजाय यह जानने-समझने की भरसक कोशिश की जानी जरूरी है कि ऐसे हालातों के बनने और बनाने के पीछे कौन सी बाहरी और अंदरूनी ताकतें काम कर रही हैं। आस्तीन के सांपों को तो हर हालत में कुचला ही जाना चाहिए। हवा में हाथ उछालने, गुस्सा दर्शाने और फतवे जारी करने से कुछ भी हासिल नहीं हेने वाला। इससे तो देश के दुश्मनों के हौसले और बुलंद होंगे। उनके हितैषी और खुद वे भी यही तो चाहते हैं। कन्हैया जैसे ही जमानत पर बाहर आया तो उसके कट्टर विरोधी पोस्टरबाजी पर उतर आये। पूर्वांचल सेना नाम के संगठन की ओर से लगाए गए पोस्टर में कन्हैया को गोली मारने वाले को ११ लाख रुपये का इनाम देने का ऐलान कर उत्तेजना और सनसनी फैलाने की भरपूर कोशिश की गयी। वहीं बदायूं के भाजपा नेता कुलदीप ने कन्हैया की जीभ काटने वाले को पांच लाख के पुरस्कार से नवाजने की घोषणा कर भारत के टुकडे करने के सपने देखने वाले अफजल प्रेमियों के सीनों को और चौडा कर दिया। एक तरफ जहां कन्हैया पर जुबानी हमलों के बारुद दागे जा रहे थे वहीं दूसरी तरफ लुधियाना की रहने वाली पंद्रह साल की जाह्नवी ने कन्हैया को खुली बहस की चुनौती देकर नारेबाजों के खिलाफ गुस्से में तमतमाते भारतीयो को आइना दिखाया कि यह वक्त होश में रहने का है, बेहोश होने का नहीं। दसवीं की पढाई कर रही इस छात्रा को कन्हैया के द्वारा प्रधानमंत्री की खिल्ली उडाना कतई रास नहीं आया। उसका मानना है कि कन्हैया और उसका गिरोह राजनीति से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री और देश की साख को बट्टा लगाने पर तुला है।
नरेंद्र मोदी भारत वर्ष के प्रधानमंत्री हैं न कि भाजपा के। कन्हैया जैसे लोग भाजपा के खिलाफ कुछ भी बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। अभिव्यक्ति की उन्हें पूरी आजादी है, लेकिन देश के प्रधानमंत्री का अपमान कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कन्हैया वक्तृत्व कला में माहिर है। राजनीतिक दलों को ऐसे चेहरे हमेशा लुभाते रहे हैं। इसलिए उसे अपने-अपने जाल में फंसाने की पूरी तैयारियां हो चुकी हैं। राजनेता हमेशा अपना फायदा देखते हैं। वोटों के लालच में देश भी दांव पर लग जाए तो उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। अपने मन-मस्तिष्क के दरवाजों और खिडकियों पर ताले जड चुकी मुखौटेबाज मतलबपरस्तों की टोली क्या निम्न पंक्तियों के अर्थ को समझने की कोशिश करेगी? :
'वो दौर भी देखा है
तारीख की आंखों ने
लम्हों ने खता की थी
सदियों ने सज़ा पायी।'