Thursday, July 21, 2016

इन्हें कब होश आयेगा?

कांग्रेस देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी है। उसने कई वर्षों तक देश और प्रदेशों की सत्ता का सुख भोगा है। लेकिन पराजय पर पराजय ने उसके जोश को एकदम ठंडा कर दिया है। इस पार्टी के कर्ताधर्ताओं की सोचने-समझने की ताकत पर ग्रहण लगता चला जा रहा है। अपने पैरों पर चलने का साहस खो चुकी पार्टी को बैसाखियों की तलाश में दिमाग खपाना पड रहा है। फिर भी कोई बैसाखी उसके काम नहीं आ रही है। राहुल गांधी कभी शोर मचाते थे कि कांग्रेस में युवाओं की तूती बोलने का समय आ गया है। राहुल फेल क्या हुए कि कांग्रेस युवा नेताओं को हाशिए में डालने के लिए मजबूर हो गयी! अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली में करारी हार झेल चुकी ७४ साल की शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार घोषित कर कांग्रेस को अपनी खिल्ली नहीं उडवानी पडती। मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी घोषित होने के बाद शीला तो आकाश पर उडने लगीं हैं। उन्हें गरूर है कि वे तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। यूपी फतह करना तो उनके बायें हाथ का खेल है।
कपूरथला में जन्मी और दिल्ली में पली-बढी शीला दीक्षित रिश्ते जोडने में माहिर हैं। जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड रही थीं तब उन्होंने मतदाताओं को लुभाने के लिए यह तीर छोडा था कि उनकी देश की राजधानी में जान बसती है। अब कह रही हैं कि मैं तो उत्तर प्रदेश की लाडली बहू हूं। इस देश में बहू को कभी निराश नहीं किया जाता। वैसे रिश्ते जोडकर वोट बटोरने का नेताओं का यह जगजाहिर तरीका है। शीला दीक्षित, इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री रहे स्व. उमाशंकर दीक्षित की बहू हैं। उन्हें लगता है कि इसका उन्हें भरपूर फायदा मिलेगा। इंदिरा गांधी के कहने पर राजनीति में पदापर्ण करने वाली यूपी की यह बहू कन्नोज से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद तीन साल तक केंद्र सरकार में मंत्री रहीं। फिर बाद में धीरे-धीरे उन्हें दिल्ली ऐसे भायी कि यूपी से दूर होती चली गयीं। उम्रदराज शीला को उत्तर प्रदेश में अपना चेहरा बनाकर कांग्रेस ने यह संदेश तो दे ही दिया है कि उसके आंगन में युवा नेताओं के लिए कोई स्थान नहीं है। यहां तो उन्हीं को सत्ता का सुख हासिल हो सकता है जिन्हें मतदाताओं को जाति-धर्म और रिश्ते-नातों की भूल-भुलैया में भटकाने की कला का ज्ञान हो। उत्तर प्रदेश में करीब १३ फीसदी ब्राह्मण वोटर हैं। कांग्रेस को लगता है कि शीला के दम पर वह ब्राह्मणों से काफी हद तक जुडने और उनके वोट पाने में सफल हो जाएगी। मुसलमान वोटर भी कांग्रेस के निशाने पर हैं। मुसलमान और ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए ब्राह्मण शीला दीक्षित को सामने खडा करने वाली कांग्रेस इस सच को भूल गयी है कि आज की तारीख में उत्तर प्रदेश में उस युवा आबादी का वर्चस्व है जो धर्म और जात-पात की भावनाओं में बहकर वोट नहीं डालती। आज देश और हर प्रदेश के युवा जागृत हो गये हैं। उन्हें राजनीतिक दलों का चुनावी खेल भटका नहीं सकता। उन्हें जात-पात और अपने-पराये के रंग में रंग पाना आसान नहीं। दरअसल, भारतवर्ष के अधिकांश प्रगतिशील युवाओं की यही सोच है कि हम सभी भारतीय हैं। ऐसे में हमें अलग-अलग हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई का डंका पीटने की क्या जरूरत है! फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने बहुत प्रासंगिक सवाल उठाया है कि यदि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है तो यहां हर फार्म में धर्म और जाति का कॉलम क्यों है? उत्तर प्रदेश में चुनाव अगले वर्ष होने हैं। भाजपा और बसपा की तरह कांग्रेस को भी लग रहा है कि युवा अखिलेश सिंह यादव मतदाताओं की उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं इसलिए उसकी किस्मत का ताला खुल सकता है। इसलिए कांग्रेस ने तो शीला दीक्षित को घर-घर तक प्रचारित करने के लिए यह नारा उछालने की ठानी है, 'मेरा आखिरी सपना, उत्तर प्रदेश में दिल्ली जैसा विकास करना।' उधर भाजपा, सपा और बसपा वाले शीला के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए टैंकर, मीटर व कॉमनवेल्थ स्ट्रीट घोटाले सहित अन्य विभिन्न मामलों में लगे संगीन भ्रष्टाचार के आरोपों को उछालकर कांग्रेस पर हमलों की बरसात करने की तैयारी में हैं।
दिल्ली की सत्ता से हाथ धोने के बाद शीला केरल की राज्यपाल बनायी गयीं, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते वे इस सम्मानजनक पद पर ज्यादा दिनों तक काबिज नहीं रह पायीं। उन्हें वापस दिल्ली लौटना पडा। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के विधानसभा के चुनावी मौसम में चीख-चीखकर कहा था कि आम आदमी पार्टी के सत्ता में आते ही शीला को उनके कर्मों की सजा दिलाते हुए जेल में ठूंस दिया जायेगा। केजरीवाल भी पेशेवर और चालाक नेताओं की तरह अपने चुनावी वायदे को भूल गए। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में १९८९ से सत्ता से बाहर है। नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे। आज की तारीख में कांग्रेस सपा, बसपा और भाजपा के बाद चौथे नंबर की पार्टी है। सोनिया गांधी एंड कंपनी ने अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और राज बब्बर को भी यूपी में इसलिए आगे किया है ताकि मुस्लिम वोटरों को लुभाया जा सके। फिल्मी कलाकार के तौर पर नाम कमाने वाले राज बब्बर पहले समाजवादी पार्टी में थे। वे खुद को राम मनोहर लोहिया का अनुयायी बताते थे। मुलायम सिंह यादव कितने सच्चे समाजवादी हैं इसकी खबर तो राज को भी थी, लेकिन राजनीति के आकाश में चमकने के लिए उन्होंने नेताजी की चाकरी करने में परहेज नहीं किया। नेताजी ने 'समाजवाद'  के नाम पर 'परिवारवाद'  को किस तरह बढावा दिया और अरबो-खरबों की धन-सम्पति जुटायी उससे भी  बेखबर नहीं थे बब्बर। नेताजी के खासमखास अमर सिंह से मतभेद होने के बाद अभिनेता ने समाजवादी पार्टी से नाता तोडकर उस कांग्रेस का दामन थाम लिया जिसे दिन-रात कोसा करते थे। आज वे कांग्रेसियों को भले ही पसंद हों, लेकिन उन्हें जननेता तो कतई नहीं कहा जा सकता। शीला, आजाद और बब्बर में कांग्रेस को जितवाने की क्षमता तो कहीं भी नजर नहीं आती।

Thursday, July 14, 2016

बेटियों के पंख मत काटो

पिता ने छह वर्ष की बेटी को गिनती बताने को कहा। बेटी ने एक से १२ तक की गिनती सुनाई। इसके बाद वह गिनती बोलना भूल गई। उसकी जबान लडखडाई और वह पिता का चेहरा इस उम्मीद से ताकने लगी कि अब वे उसकी पीठ थपथपाते हुए आगे कि गिनती बताएंगे। लेकिन उनका तो पारा ही चढ गया। अपना आपा खोकर बच्ची को गुस्से से घूरने लगे जैसे उसने ऐसा कोई बहुत बडा गुनाह कर दिया हो जो माफ करने के लायक ही न हो। पिता के तमतमाये चेहरे को देखकर मासूम बेटी कांपने लगी। पिता ने लाड-प्यार से आगे की गिनती बताने की बजाय थप्पड मारा और फिर उसके मुंह में जबरन प्याज ठूंस दिया। छोटे से मुंह में बडा प्याज ठूंसे जाने के कारण बच्ची का दम घुट गया और फिर उसकी वहीं मौत हो गयी। इसके बाद पिता ने बेटी का शव कब्रिस्तान में दफनाया और ऐसे बेफिक्र हो गये जैसे कुछ हुआ ही न हो। बच्ची की मां की शिकायत पर मुंबई के इस गुस्सैल पिता को गिरफ्तार किया गया। इस पिता को आप क्या कहेंगे? दरिंदा, हैवान, शैतान और हत्यारा आदि...आदि? मेरे विचार से इस पापी के अमानवीय कृत्य ने तो इन सभी शब्दों को ही शर्मसार कर पिता के संबोधन को ही कटघरे में खडा करने का गुनाह किया है। इस गुनाहगार को कोई भी सजा मिले, कम ही होगी। इस दुनिया में एक से बढकर एक दुष्ट भरे पडे हैं। उनकी निर्ममता हतप्रभ करके रख देती है। मां-बाप के निर्मोही होने की खबरें पूरे वुजूद को हिलाकर रख देती हैं। मन में तरह-तरह के सवाल कौंधते हैं।
मध्यप्रदेश में स्थित शिवपुरी निवासी एक मां-बाप ने चार लोगों के साथ मिलकर अपनी ही बेटी को देहमंडी में ६० हजार रुपये में बेच दिया। बेटी रोती रही। गिडगिडाती रही। पर उन्हें रहम नहीं आया। वे रुपयों को अपनी जेब में डालकर ऐसे चलते बने जैसे उन्होंने बाजार में कोई सामान बेचा हो। बेटी को बेचने के बाद वे निश्चिंत हो गए। लेकिन कुछ दिन बाद किशोरी देह की मंडी से सौदागरों के चंगुल से छूटकर भागने में सफल हो गयी। लालची मां-बाप के पास जाने के बजाय उसने पुलिस की शरण में जाना बेहतर समझा। फिरोजाबाद में पुत्र की चाहत में एक पिता ने तांत्रिकों के चक्कर में आकर अपनी १२ साल की बेटी को मौत की नींद सुला दिया। ऐसी खबरें रोजमर्रा का हिस्सा बन चुकी हैं। फिर भी आस और विश्वास की किरणें अंधेरे में उजाला फैलाती रहती हैं।
छत्तीसगढ के महासमुंद में रहते हैं ट्रांसपोर्ट कारोबारी किशोर चोपडा और उनकी पत्नी पुष्पा चोपडा। दोनों को बेटों की चाहत थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। उनके यहां एक के बाद एक पांच बेटियों ने जन्म लिया। घर में जब भी बेटी जन्मती, पति-पत्नी उदास और निराश हो जाते। परिवार में ऐसा मातम छा जाता जैसे किसी की मौत हो गयी हो। हताश और निराश माता-पिता आंसू बहाने लगते। लडकियों को पालने-पोसने, पढाने-लिखाने और उनके शादी-ब्याह की अथाह फिक्र उनके मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से हावी हो जाती। घर का हर सदस्य वारिस न होने की चिन्ता में डूबा नजर आता। रिश्तेदार और आसपास के लोग भी पांच-पांच बेटियों के होने पर तानाकशी करने से बाज नहीं आते। आखिरकार चोपडा दंपति ने बेटे की आस छोडकर बेटियों के अच्छे पालन-पोषण का निर्णय लिया। उन्हें पढाया-लिखाया और उस शिखर तक पहुंचाया जहां तक लडके भी बहुत मुश्किल से पहुंच पाते हैं। इसके लिए भी उन्हें लोगों के तानें सुनने पडे। कहा गया कि लडकियां तो पराया धन होती हैं। उन पर इतना खर्च करने से क्या फायदा...। फिर भी उन्होंने परवाह नहीं की। बेटियों को बाहर पढने के लिए भेजा। दरअसल, उन्होंने बेटियों की बेटों की तरह खुलकर परवरिश दी। आज चोपडा परिवार की पांचों बेटियां अमेरिका की बडी कंपनियों में कार्यरत होकर बुलंदियों के शिखर पर हैं। चोपडा परिवार को अपनी कामयाब बेटियों के नाम से पहचाना जाता है। जो लोग बेटियों को बेटा बनाने वाले मां-पिता पर तानों की बौछार करते थे, आज तारीफों की बरसात करते नहीं थकते। सोचिए अगर चोपडा दंपत्ति ने बेटियों को नजअंदाज करने की भूल की होती तो क्या उनके नाम की जयजयकार हो पाती? यकीनन नहीं। उन्हें भी गैरजिम्मेदार माता-पिताओं की तरह दुत्कारते हुए विस्मृति के गर्त के हवाले कर दिया जाता। यह भी सच है कि हमारे समाज में आज भी ऐसे लोग भरे पडे हैं जो लडकियों को परम्परा की बेडियों में जकड कर रखना चाहते हैं। आज भी हमारे समाज में अधिकांश बेटियों को अपनी मनचाही राह पर अकेले डर-डर कर चलना पडता है। अपनों के अविश्वास और संशय के दंशों को झेलना पडता है। चोपडा परिवार ने अपनी बेटियों पर भरोसा किया। उनके मन की बात को जाना-समझा। हर मोर्चे पर उनका साथ दिया तो बेटियों ने भी मेहनत और लगन के बलबूते पर अभूतपूर्व कामयाबी हासिल कर दिखायी। यह भी अक्सर देखने में आता है कि सगे-संबंधी भी लडकियों को बार-बार लडकी होने का अहसास कराते हुए उनके मनोबल को तोडने का गुनाह करने से बाज नहीं आते।
जबकि बेटियां बेटों से किसी भी मामले में कमतर नहीं होतीं। इस हकीकत पर देश की बेटियां लगातार मुहर लगाती चली आ रही हैं। पिछले दिनों कानपुर से लगे एक गांव की बेटी ने जान की बाजी लगाकर अपने पिता की जान बचायी। पिता हृदय नारायण घर के बाहर पुराने कुएं के पास कुछ जरूरी कागजात सुखा रहे थे। तभी हवा में कुछ कागजात उडकर कुएं में गिर गए। वे कागजात निकालने के लिए रस्सी के सहारे कुएं में उतर गए। कुआं काफी गहरा था। आक्सीजन की कमी के कारण वह बेहोश हो गए। बेटी ने मदद के लिए आसपास निगाहें दौडायीं। किसी ने भी घुटन भरे कुएं में उतरने की हिम्मत नहीं दिखायी। २२ वर्षीय बेटी ने खुद को रस्सी से बांधा और गहरे कुएं में उतर गयी। उसने भी जानलेवा घुटन महसूस की, लेकिन अपनी जान की परवाह न करते हुए बेटी ने बेहोश पडे पिता को कुएं से बाहर निकालकर ही दम लिया। राधा उर्फ रक्षा जब पिता को रस्से से बांधकर कुएं से बाहर खींच कर बाहर लायी तो वहां तमाशबीन बनकर खडे युवकों के चेहरे का रंग उड गया और शर्मिंदगी के मारे उनका वहां खडा रहना मुश्किल हो गया।
छत्तीसगढ के नक्सली समस्या से ग्रस्त दंतेवाडा जिले के नकुलनार गांव की अंजली सिंह गौतम की अभूतपूर्व वीरता की कहानी को पांचवीं की किताब में पढाया जा रहा है, ताकि छात्र-छात्राएं उससे प्रेरणा ले सकें। ७ जुलाई २०१० की आधी रात १२ बजे के आसपास अंजली के घर पर ५०० नक्सलियों ने उसके पिता की हत्या के इरादे से धावा बोल दिया। नक्सलियों की बेतहाशा गोलीबारी में उसके मामा और घर के एक कर्मचारी की मौत हो गई। पिता किसी तरह से बच गये। अंजली के छोटे भाई के पैर में गोली जा लगी और वह दर्द के मारे कराहने लगा। घायल भाई को नक्सलियों से बचाने के लिए अंजली ने उसे अपने कंधे पर लादा और सरपट दौड पडी। नक्सली लगातार चेतावनी देते रहे कि वह फौरन रूक जाए वर्ना गोली मारकर उसका खात्मा कर दिया जाएगा। नक्सली उसके पिता का पता भी पूछ रहे थे, लेकिन अंजली बस भागती ही चली गयी। उस पर लगातार गोलियों की बरसात होती रही, लेकिन किस्मत से उसे एक भी गोली नहीं छू पायी। उसने अपने घायल भाई को कंधे पर लादे-लादे अपने दादा के घर में सुरक्षित पहुंच कर ही दम लिया। गांववासी उसकी वीरता के कायल हो गये और अब तो उसकी कहानी को पूरा देश पढ रहा है। अंजली को राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार समेत कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। अंजली तब मात्र १४ वर्ष की ही थी।

Thursday, July 7, 2016

गलत और सही का फैसला

राजस्थान के उदयपुर के निकट स्थित एक गांव की रहने वाली शांता को अपने पति के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण अलग रास्ता चुनने को मजबूर होना पडा। वह कब तक शराबी, कबाबी, जालिम पति के साथ बंधी रहती। एक दिन वह अपने लिव-इन पार्टनर लालूराम के साथ घर से भाग गई। उसका पति भंवरलाल आग-बबूला हो उठा। मेरी घरवाली ने किसी गैर के संग रफू-चक्कर होने की सोची कैसे... कौन मर्द अपनी बीवी पर हाथ नहीं उठाता। यही तो मर्दानगी की निशानी है। इसको तो ऐसा सबक सिखाऊंगा कि इसका हश्र देखकर कोई दूसरी जनानी पति के साथ बेवफाई करने की कल्पना करने से पहले लाख बार सोचेगी। साली बदजात। गांववालों को भी भंवरलाल के साथ हमदर्दी थी। उनका भी यही सोचना था कि सात फेरे लेने के बाद पत्नी की चिता पति के घर से ही उठनी चाहिए। पत्नी पर हाथ उठाना और बेइज्जत करना तो पति का जन्मसिद्ध अधिकार है। पति के डंडे से ही पत्नियां काबू में आती हैं। २० जून २०१६ को शांता और लालूराम को ढूंढकर गांव लाया गया। भीड ने दोनों के कपडे उतारे, नग्न परेड कराई और दो दिनों तक जानवरों की तरह खूंटे से बांधे रखा। दोनों ने एक बहुत बडी गलती यह भी की थी कि उन्होंने एक साथ रहने की शुरुआत करने से पहले गांव के बुजुर्गों की स्वीकृति नहीं ली थी। मीणा जनजाति के 'नाता' रिवाज के मुताबिक कोई भी अपने वैवाहिक संबंध को तभी समाप्त कर सकता है जब वह क्षतिपूर्ति दे। शांता ने तो अपने पति भंवरलाल को छोडने से पहले उसको पैसे नहीं दिए थे और समुदाय के लोगों को भी अपने फैसले से अवगत नहीं कराया था। शांता का लिव-इन पार्टनर और उसका पति, दोनों ही मीणा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और दोनों का एक ही गोत्र है, इसके चलते ही मीणा समुदाय के नियमों के मुताबिक शांता के दूसरे रिश्ते को अस्वीकार कर दिया गया। शांता को नग्नावस्था में उसके पति के कंधे पर लादकर तीन किलोमीटर तक दौडाया गया। जहां भी वह थक कर रूकता वहीं ग्रामीण उसपर हमला बोल देते और डंडे, जूते-चप्प्ल बरसाते। एक अकेली नारी को अमानवीय बर्बर  सजा देकर ग्रामीणों को बेइंतहा खुशी हुई तो पति भंवरलाल का भी गर्व से सीना और चौडा हो गया। उसकी मर्दानगी भी तृप्त और संतुष्ट हो गयी। शांता फिर भी नहीं झुकी। उसने अपना फैसला बदलने से इंकार कर दिया। बहुत कम नारियां शांता की तरह अपनी राह और किस्मत बदलने का साहस दिखा पाती हैं। इज्जत की खातिर उन्हें बिना मुंह खोले घुट-घुट कर मरना मंजूर होता है। अपने देश में आज भी कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में शादी ब्याह के मामले में युवतियों को खुद का निर्णय लेने की आजादी नहीं है। अपवादों को छोड दें तो यही सच्चाई है।
घर वाले जो फैसला लेते हैं उसे लडकियों को मानना ही पडता है। बाद में उनके साथ कैसी बीतती है इसकी कतई चिन्ता नहीं की जाती। मां-बाप की तरह लडकियां भी धनवान खाता-पीता परिवार देखकर लडके को बिना जांचे-परखे शादी के बंधन में बंध जाती हैं और फिर जीवनभर चुपचाप खून के आंसू पीते हुए नर्क भोगती रहती हैं। दरअसल वे इसे ही अपना मुकद्दर मानते हुए कोई दूसरा निर्णय लेने की हिम्मत ही नहीं कर पातीं।
आदिवासी युवती ममता की हासंदा के झारखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी के बेटे के साथ शादी की बात पक्की हो गयी थी। विधायक के बेटे के साथ शादी होने की कल्पना ने ही ममता को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था। उसकी खुशियों का कोई पार नहीं था। उसके परिजनों के साथ-साथ सारा गांव गर्वित और प्रफुल्लित था। पहली बार किसी गांव की बेटी का ब्याह किसी बडे नेता के बेटे के साथ सम्पन्न होने जा रहा था। शादी की निमंत्रण पत्रिका बांटने के दौरान ममता को कहीं से खबर लगी कि उसका होने वाला पति मुन्ना अय्याश प्रवृत्ति का है। उसके किसी लडकी से जिस्मानी रिश्ते हैं यह खबर भी ममता तक पहुंची कि वह लडकी मुन्ना पर यौन शोषण के आरोप लगा रही है। ममता के मन-मस्तिष्क में विचारों और सवालों की आंधी चल पडी। अब वह क्या करे? क्या वह सब कुछ भूल-भालकर चरित्रहीन लडके से शादी कर ले? संथाली समाज में शादी तोडना बहुत बुरा माना जाता है। परिवार की भी बदनामी होती है। समय बहुत कम था और ममता को बहुत बडा फैसला लेना था। सोचने-विचारने के बाद ममता ने यही निष्कर्ष निकाला कि भले ही मुन्ना के पिता विधायक हैं, धनवान हैं पर उनका पुत्र तो चरित्रहीन और नालायक ही है। ऐसे लडके के साथ वह कभी खुश और संतुष्ट नहीं रह पायेगी। उसने मुन्ना से शादी न करने का फैसला लेकर सभी को चौंका दिया। यह २० जून २०१६ की बात है। २७ जून की शादी सम्पन्न होनी थी। पिता ने विधायक तक बात पहुंचा दी। नेताजी ने दबाव तंत्र भी अपनाया, लेकिन ममता नहीं मानी। पूरा परिवार उसके साथ था। ममता कहती है शादी के लिए न कहना आसान नहीं था। फिर लगा कि यह जिंदगी का सवाल है, अभी चुप रह गई तो कभी खुद को माफ नहीं कर पाऊंगी। मैट्रिक तक की पढाई कर चुकी ममता को स्कूल में भी यही पढाया गया था कि गलत और सही का फैसला सही समय पर करना जरूरी है। गलत का विरोध करने में सकुचाना और घबराना नहीं चाहिए। समय बीत जाने के बाद पछतावे के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। देश में जगह-जगह नारियों के उद्धार के लिए नारी निकेतन खोले गए हैं। अधिकांश नारी निकेतन नेताओं और समाज सेवकों के द्वारा संचालित किये जाते हैं। बीते सप्ताह मध्यप्रदेश के शहर सतना में स्थित नारी निकेतन से भागने को मजबूर हुई दो युवतियों ने वहां के सच को इन शब्दों में बयां किया :
"नारी निकेतन में हम लोगों पर देहव्यापार करने का दबाव बनाया जा रहा था। आधी रात के बाद असमाजिक तत्व आकर हमारे साथ जबरदस्ती करते थे। उनसे बचने के लिए हम बाथरूम में छिप जाते थे। एक रात कुछ बदमाश घुस आए और हमारे यौन शोषण पर उतारू हो गए। खुद को बचाने के लिए हमने सब्जी काटने वाली हंसिया को अपना हथियार बनाया और उन पर टूट पडीं। हमारा उग्र रूप देखकर आखिरकार वे भागने को मजबूर हो गए। नारी निकेतन के वार्डन, सहायक वार्डन और चौकीदार पहले भी यहां लडकियों से देह व्यापार कराते रहे हैं।"
ये युवतियां अगर हिम्मत नहीं दिखातीं तो नारियों के उद्धार और सुधारगृह कहलाने वाले नारी निकेतन की शर्मनाक सच्चाई सामने नहीं आ पाती। युवतियों ने बताया कि नारी निकेतन में रात को वार्डन व अन्य कर्मचारी घर चले जाते थे। एक वृद्ध महिला व चौकीदार रहती थीं। रात को सीसीटीवी कैमरा भी बंद कर दिया जाता था। वासना के खिलाडी बेखौफ आते थे और लडकियों का देहशोषण करते थे। नारी निकेतन में देह व्यापार के लिए दबाव बनाये जाने के साथ-साथ युवतियों को बेचने के अपराध को भी अंजाम दिया जा रहा था। डेढ-दो लाख रुपये में बेबस युवतियों को दरिंदों के हवाले करने के बाद रजिस्टर में लिख दिया जाता था कि उनकी शादी हो गई है। नारी निकेतन के दुष्कर्मों का पर्दाफाश करने वाली युवतियों को भी दो-दो लाख में बेचने का सौदा कर दिया गया था। व्यापारी उन्हें लेने के लिए आने ही वाले थे। इसकी भनक लगने पर वे फौरन भाग निकलीं।

Thursday, June 30, 2016

नपुंसकता की नुमाइश

बडे लोगों की घटिया और ओछी बातें। घात-प्रतिघात। कुछ बातें और घटनाएं मन को विचलित कर देती हैं। ऐसे लोगों की तादाद बढती चली जा रही जो अपने मंसूबो को पूरा करने के लिए किसी भी गंदगी के गर्त में गिरने में देरी नहीं लगाते। आखिर यह कैसा दौर है? एक दिल दहलाने वाली घटना से उबर भी नहीं पाते कि दूसरी पीडा पहुंचाने वाली खबर सीना तान कर खडी हो जाती है। ऐसा भी लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भी तकलीफें और चोटें पहुंचाने का दुष्चक्र चलाया जा रहा है। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। वैसे भी जिन्होंने बेहयायी की चादर ओढ ली है उन पर कोई भी शिक्षा-दीक्षा और समझाइश असर नहीं डालती। फिल्म अभिनेता सलमान खान को ऊल-जलूल बकने की आदत है। जब-तब वे कुछ भी बक देते हैं और उनके पिता सलीम खान हाथ जोड कर खडे हो जाते हैं कि बच्चों से भूल हो जाती है। सलमान भी अभी बच्चा है। बिना सोचे-समझे मुंह खोल देता है और बात का बतंगड बन जाता है। हर बच्चा अपने पिता का दुलारा होता है। बिगडैल बच्चे पर भी उसके पिता का वरदहस्त होता है। ५२ वर्षीय सलमान इस मामले में बहुत ज्यादा खुशकिस्मत हैं। वे गलती पर गलती करते चले जाते हैं और जब हंगामा मचता है तो पिता ढाल बन कर खडे हो जाते हैं। कई वर्षों से फिल्मों में नायक की भूमिका निभाते चले आ रहे सलमान की खलनायिकी इस बार कुछ ऐसे शब्दों में सामने आयी- 'सुल्तान फिल्म की शुटिंग के दौरान छह घंटो तक जो पटका-पटकी चलती थी उससे मेरे बदन का अंग-अंग लस्त पड जाता था। १२० किलो के पहलवान को दसियों बार उठाने और पटकने की यह क्रिया कोई आसान काम नहीं थी। शुटिंग के बाद जब मैं रिंग से बाहर निकलने को होता तो लगता था कि कोई दुष्कर्म पीडिता चल रही है। मैं कदम भी नहीं उठा पाता था।' इस अशोभनीय सोच के जगजाहिर होने के बाद वही हुआ जो बदनीयत अभिनेता चाहता था। चारों तरफ से निन्दा का सैलाब उमड पडा। हिसार (हरियाणा) की एक दुष्कर्म पीडिता इतनी आहत हुई कि उसने मानहानि का दावा करते हुए दस करोड रुपये की क्षतिपूर्ति का नोटिस भिजवा दिया। अपने नोटिस में उसने लिखा कि वह भी दुष्कर्म पीडिता है। सलमान के अपमानजनक बयान ने उसके जख्म हरे कर दिये हैं। उसे अपने साथ हुई भयानक व रोंगटे खडे कर देने वाली घटना की यादें ताजा हो गयी हैं। उसे डर है कि कहीं लगातार सोचते रहने से उसके दिमाग की नसें ही न फट जाएं। उसका मन कर रहा है कि वह आत्महत्या कर ले और ऐसे जहां से मुक्ति पा ले जहां पर सलमान जैसी घिनौनी सोच वाले लोग रहते हैं।
जयपुर की एक बलात्कार पीडिता ने कहा कि सलमान फिल्मों के हीरो हो सकते हैं। असल जिन्दगी में उनसे नीच इंसान और कोई नजर नहीं आता। असली नायक तो वो होता है जो लोगों की पीडा को देखकर चिंतित होता है। जख्मों पर मरहम लगाता है, नमक नहीं छिडकता। देशभर की जागृत महिलाओं ने सलमान को कोसा और चुल्लू भर पानी में डूब मरने के साथ-साथ बद्दुआओं की झडी लगा दी। जहां एक तरफ पूरा देश महिलाओं का अपमान करने की जुर्रत करने वाले सलमान पर लानतों की बरसात करता रहा वहीं सलमान के कुछ अंध भक्त तिलमिला उठे। उन्हें परदे के चमकदार हीरो की आलोचना बर्दाश्त नहीं हुई और वे अपनी असली औकात पर उतर आये। सलमान पर थू...थू करने वालों में गायिका सोना महापात्रा का भी समावेश है। उन्होंने छिछोरे अभिनेता के रेप पीडित जैसी हालत वाले बयान को सोशल मीडिया में उछाला तो उन्हें बलात्कार की धमकियां मिलने लगीं। खलनायक के प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर गायिका को लेकर ऐसे-ऐसे भद्दे कमेंट्स किए जिन्हें शरीफों के दिमाग की उपज तो कतई नहीं कहा जा सकता। बलात्कारी, गुंडे मवाली ही ऐसी गंदी सोच वाले हो सकते हैं। विख्यात गायिका  महापात्रा को नग्न तस्वीरें भेजकर हजार बार उस पर बलात्कार करने की धमकी देने वालों की गुंडागर्दी को देखने के बाद इस कलमकार को जेल में बंद आसाराम के उन अंधभक्तों की याद हो आयी जिन्होंने अपने दुष्कर्मी 'गुरु' के खिलाफ गवाही देने वाले निर्भीक भुक्तभोगियों को तरह-तरह से प्रताडित किया और अपनी गोलियों का निशाना बनाया।
व्याभिचारियों, बलात्कारियों, महिलाओं का अपमान करने वालों तथा दहेज लोभियों के दिमाग को दुरुस्त करने के लिए लगता है कि कानून कहीं न कहीं कमजोर पड रहा है। आज भी हमारे समाज में बेटी और बहू में भेदभाव कर इंसानी दरिंदगी के भयावह तमाशे दिखाये जा रहे हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी भी न बदलने की कसम खा रखी है। उनके लिए धन-दौलत ही सर्वोपरि है। माया के लिए वे हैवानियत को भी शर्मिंदा करने से नहीं कतराते। ऐसे शैतानों की कमी नहीं है जो अपने बेटों की बोली लगाते हैं। उनकी बस यही चाह होती है कि उनके घर में जो भी बहू आए वो सोने-चांदी से लदी हो और लाखों-करोडो रुपये अपने साथ लाए। जब उनकी यह मंशा पूरी नहीं होती तो वे वहशी दरिंदे बन जाते हैं। दहेज के लिए बहूओं को मारने, पीटने और जलाने की खबरों की कोई सीमा नहीं है। लेकिन जयपुर के रहने वाले एक दहेजलोभी परिवार ने तो इंसानियत, मानवता और रिश्तों की ही नाक ही काट डाली। दहेजलोभियों ने अपनी बहू को जानवरों की तरह मारा-पीटा। जब वह बेहोश हो गयी तो उसके शरीर पर सात जगह गोदना (टैटू) करवा दिया और गंदी-गंदी गालियां लिखवा दीं। उसके माथे पर बनाए गए टैटू पर लिखवाया गया, 'मेरा बाप चोर है।' बहू का आरोप है कि ससुराल वालों ने उसे नशीला पदार्थ पिलाया और उसके साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया। एक जेठ ने तो उसकी जांघोें पर गालियां गुदवाकर अपनी नपुंसकता का नंगा नाच दिखाया।

Thursday, June 23, 2016

यही तो है असली चेहरा

महाराष्ट्र में वर्धा, गढचिरोली के बाद चंद्रपुर जिले में शराब बंदी की जा चुकी है। शराब बंदी के बाद सरकारें सोचती हैं कि पियक्कड पीना छोड देंगे और शराब माफिया भी किसी दूसरे धंधे में लग जाएंगे। सोचने और होने में बहुत फर्क होता है। इस लम्बे फासले को पाटना आसान नहीं। यही वजह है कि शराब पर बंदिश लगने के बाद भी पीने वालों को शराब उपलब्ध हो ही जाती है। इसके लिए भले ही उन्हें दुगनी-तिगुनी कीमत देनी पडती हो। ऐसी किसी भी बंदिश का सबसे ज्यादा फायदा अवैध धंधेबाज नेता-अधिकारी और खाकी वर्दी वाले उठाते हैं। कानून इनके पीछे रेंगता रहता है और यह नये-नये तरीके ईजाद कर छलांगे लगाते हुए दौडते चले जाते हैं। काली दौलत और काली कमायी जहां पेशेवर अपराधियों को लुभाती है वहीं अच्छे-अच्छों के ईमान को डगमगा देती है और उन्हें अपराधी के कठघरे में खडा कर देती है। फिर भी उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। पिछले महीने अहमदाबाद में गुजरात के विभिन्न शहरों और कस्बों में अवैध शराब की सप्लाई करने वाले एक बडे गिरोह का पर्दाफाश हुआ। उस गिरोह का सरगना एक बडे अखबार का पत्रकार था। देश के प्रदेश गुजरात में वर्षों से शराब पर पाबंदी लगी हुई है! अभी हाल ही में चंद्रपुर में अवैध शराब ले जा रहे दो शराब तस्करों को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में एक तस्कर पुलिस से भिड गया। वह धौंस दिखाने लगा कि वह पत्रकार होने के साथ-साथ एक बडी राजनीतिक पार्टी का सक्रिय कार्यकर्ता है। उसकी पहचान बहुत ऊपर तक है। खाकी वर्दी वाले भी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बदलती भूमिका पर सोचने को विवश हो गये। जिन्हें अपराधियों को बेनकाब करने और पकडवाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए वही अगर आसानी से धन बनाने के लालच की नदी में डुबकियां लगाने लगेंगे तो देश का क्या होगा? असली तो असली, नकली पत्रकार भी देशभर में सक्रिय हैं। शहरों और गांवों में ऐसे कई पत्रकार हैं जिनके ठाठ देखते ही बनते हैं। कमाऊ सरकारी अधिकारियों, अवैध कारोबारियों और सरकारी ठेकेदारों को धमकाना और वसूली करना इनका पेशा है। इनके वाहनों पर 'प्रेस' लिखा होता है इसलिए पुलिस वाले इन पर हाथ नहीं डालते। आपसी मिलीभगत के खेल से भी इंकार नहीं किया जा सकता।
देश में नयी सरकार बनने के बाद यह उम्मीद बलवती हुई थी कि देश के चहुंमुखी विकास और भ्रष्टाचार के खात्मे में अवरोध पैदा करने वाली ताकतें पूरी तरह से कमजोर पड जाएंगी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। मौका पाते ही बहती गंगा में हाथ धोने वालों की भीड बढती चली जा रही है। कोई भी किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। पकडे गए तो चोर, नहीं तो साहूकार और पूरी तरह से ईमानदार और धर्मात्मा। यह भी सच है कि सभी चोर और डकैत पकड में नहीं आते। मुंबई में एक बहुत बडा सडक घोटाला कर ठेकेदारों ने बीएमसी को ३५२ करोड की चोट दे दी। घटिया सामग्री से घटिया सडक और पुल बनाने वाले ठेकेदार शातिर भी हैं और चालाक भी। इस लूटमारी को ठेकेदारों ने बीएमसी के कई अधिकारियों के साथ मिलकर अंजाम दिया। सडकों के निर्माण की गुणवता की जांच का काम दो कंपनियों को सौंपा गया। यह कंपनियां भी भ्रष्ट निकलीं। इनके इंजीनियरों और जानकारों ने सडक बनाने वाले ठेकेदारों को ईमानदार होने का प्रमाणपत्र देते हुए घोषित कर दिया कि सडक निर्माण में कहीं कोई घोटाला नहीं हुआ है। हर काम दुरुस्त हुआ है। ठेकेदारों के खिलाफ शिकायत करने वालों के निजी स्वार्थ पूरे नहीं हुए इसलिए उन्होंने सडकों के घटिया निर्माण का हल्ला मचा दिया।
महाराष्ट्र में चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, भ्रष्टाचार होना आम बात है। ऊंचे भ्रष्टाचारियों के कारनामों को दबाने की भरपूर कोशिशें होती हैं, लेकिन कुछ 'लडाकूओं' के कारण सच बाहर आ ही जाता है। कई नेता कुछ ऐसी मिट्टी के बने हैं कि हकीकत को नकारने में ऐढी-चोटी का जोर लगा देते हैं। वैसे भी अपनी पार्टी के बेईमानों और बिकाऊ लोगों को बचाने के लिए हर राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत लगाने में कोई कसर नहीं छोडता। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के लिए चुनौती बनने वाले सरकार के वरिष्ठ मंत्री एकनाथ खडसे को कहीं न कहीं अपने मंत्री होने का गुमान तो था ही इसलिए उन्होंने ऐसे-ऐसे काम कर डाले जिनके कारण उन्हें कुर्सी से हाथ धोना पडा। पहले खडसे के पीए की तीस करोड रुपये की रिश्वत लेने पर गिरफ्तारी हुई। मंत्री जी ने सफाई दी कि इस कांड से उनका कोई लेना-देना नहीं है। सवाल यह कि क्या कोई पीए अपने बलबूते पर इतनी बडी रिश्वत लेने की जुर्रत कर सकता है? सच तो यह है कि अधिकांश भ्रष्ट मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के पीए उनके दलाल की तरह काम करते हैं। अपने आका के इशारे पर मोटे ग्राहक फांसते हैं और आका को मालामाल कर मोटी दलाली पाते हैं। आपको ऐसे कई पेशेवर पीए मिल जाएंगे जिनके पास महंगी कारें और आलीशान कोठियां हैं तथा दुनिया भर की सुख-सुविधाओं की भरमार है। अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम से मंत्री खडसे की फोन पर बातचीत होने की धमाकेदार खबर ने भी ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। इस खबर को दबाने की कोशिशें चल ही रही थीं कि यह विस्फोट हो गया कि मंत्री महोदय ने अपनी पत्नी और दामाद के नाम पर करोडों की सरकारी जमीन एकदम माटी के दाम पर खरीदी है। महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने वाले खडसे ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देने को विवश कर दिया जाएगा। उन्हें बेनकाब करने में आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता अंजली दमानिया ने जो हिम्मत दिखायी उसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है! अंजली अगर साहस नहीं दिखातीं तो खडसे का असली चेहरा सामने नहीं आ पाता।

Thursday, June 16, 2016

शैतान की उडान

मथुरा का कंस। रावण वृक्ष। आधुनिक डाकू और लुटेरा। शातिर राजनेताओं की नाजायज़ औलाद। उसे न जाने और भी कितने नाम दिये गए। दरअसल, उसे किसी भी नाम के दायरे में कैद करना आसान नहीं। ऐसे लोग कई-कई बहुरूपों के साथ बडे मजे से जिंदा रहते हैं। एक मरता है तो दस पैदा भी हो जाते हैं। समाज और देश के शत्रुओं से इन्हें खाद पानी मिलता रहता है और देखते ही देखते यह बीज से दरख्त बन जाते हैं। एक हवा-हवाई संगठन... स्वाधीन भारत सुभाष सेना के कर्ताधर्ता रामवृक्ष यादव ने जब धार्मिक नगरी मथुरा के जवाहरबाग में डेरा डाला तो देखने वालों ने भी अनदेखा कर दिया। उसने प्रशासन से मात्र तीन दिन तक ठहरने की इजाजत मांगी थी लेकिन उसके इरादे कुछ और ही थे। धीरे-धीरे उसने २७० एकड में फैले पूरे बाग पर अपने तीन हजार से अधिक चेले-चपाटों के साथ ऐसा कब्जा जमाया, जैसे यह बाग सरकारी न होकर उसकी खरीदी हुई सम्पत्ति हो। जनता तो जनता है। शासन और प्रशासन भी भविष्य के खतरे को भांप नहीं पाये। रामवृक्ष खुद को सुभाषचंद्र बोस का अनुयायी, सत्याग्रही और जयगुरुदेव का कट्टर चेला प्रचारित करता था। वह देश में सोने के सिक्के चलाने और पानी की कीमत से भी कम दाम पर पेट्रोल और डीजल दिलाने के सपने दिखाता था। ऐसे सपने किसे अच्छे नहीं लगते। यही वजह थी कि लोग उससे प्रभावित होने लगे। वह उन्हें इस सदी का मसीहा लगने लगा। उसकी टकराने की हिम्मत देखकर कई लोगों को यह भ्रम भी हुआ कि वह देश का कायाकल्प करने के लिए भारत की धरा पर आया है। शासन और प्रशासन भी इसकी मुट्ठी में है। तभी तो इसने सरकारी जमीन पर बेखौफ कब्जा जमा लिया है और बडे-बडे अधिकारी उससे खौफ खाते हैं। कई नेता और मंत्री उसके यहां हाजिरी लगाने के लिए आते हैं। मथुरावासियों ने बहुत से नेता देखे थे, लेकिन ऐसा अनोखा 'क्रांतिकारी' पहले कभी नहीं देखा था जो डंके की चोट पर कहता था कि अंग्रेजों के समय के कानून खत्म किए जाएं। पूरे देश में आजाद हिन्द बैंक करेंसी से लेन-देन हो और मांसाहार पर पूरी तरह से पाबंदी हो। यह रामवृक्ष के अजूबे बोलवचन और बगावती तेवर ही थे जिनकी वजह से उसके समर्थकों की संख्या में सतत इजाफा होता चला गया। सत्याग्रह के नाम पर रामवृक्ष अपनी मनमानी करने पर उतर आया। उत्तरप्रदेश में उसका डंका बजने लगा। धीरे-धीरे उसने पूरे देश में अपना नेटवर्क फैलाना शुरू कर दिया। एक समय ऐसा भी आया जब बिहार में भी उसकी तगडी पकड बन गयी। उसके हजारों समर्थक ऐसे थे जो उसकी एक आवाज पर कुछ भी करने को तैयार रहते थे। जिस तरह से आतंकी धर्म से जोडकर जिहाद के नाम पर हिंसा करते हैं ठीक उसी राह पर चल रहा था वह। उसके कई प्रभावशाली लोगों को भी अपना दास बना लिया था। छत्तीसगढ, झारखंड, महाराष्ट्र और उडीसा के नक्सलग्रस्त इलाकों से उसके यहां लोगों का आना-जाना शुरू हो गया था। वह सत्ता परिवर्तन की बात कर लोगों को उकसाता था। उसके यहां जुटने वाली भीड को भी यकीन था कि यह शख्स जो कहता है, वो करके दिखायेगा। एक दिन ऐसा जरूर आयेगा जब भारतवर्ष में एक रुपये में चालीस लीटर पेट्रोल और ६० लीटर डीजल  मिलने लगेगा। रामवृक्ष सत्ता हासिल करने में सफल होगा। देश में उसकी करेंसी चलेगी। सबकुछ बदल जायेगा। चारों तरफ खुशहाली होगी। कोई भी बेरोजगार और गरीब नहीं होगा।
सत्तर साल के रामवृक्ष की अकड देखते बनती थी। वह था तो अनपढ लेकिन उसमें नेताओं वाले सभी दुगुर्ण थे। उसे नक्सलियों और देश के अन्य शत्रुओं से हर माह लाखों रुपये की देन मिलती थी जिससे वह अपने संगठन का खर्चा चलाता था। जवाहर बाग को उसने अच्छी-खासी रिहायशी बस्ती में तब्दील कर दिया था। सबकुछ था यहां। यहां का एकमात्र राजा था रामवृक्ष। वह बेफिक्र और बेखौफ अपनी सत्ता चला रहा था। लेकिन हर शैतान का एक न एक दिन अंत तो होता ही है। १४ मार्च २०१४ को मथुरा के सरकारी बाग में कब्जा जमाकर आतंक का पर्याय बने इस कपटी के नेतृत्व में २ जून २०१६ को मथुरा में ऐसा खून-खराबा हुआ जिसमें दो पुलिस अधिकारियों सहित लगभग तीस लोग मारे गये और पचास से ज्यादा लोगों को लहुलूहान होकर अस्पताल की शरण लेनी पडी। देश का भाग्य बदलने  के नाम पर दहशतगर्दी करने वाले इस बाहुबलि को यह भ्रम भी था कि वह लोगों को जो सपने दिखाता है उससे उसकी प्रतिष्ठा शिखर पर जा पहुंची है। वक्त आने पर लाखों लोग आंखें मूंदकर उसके साथ चल पडेंगे। लेकिन सच तो यह है कि उसकी मौत के बाद उसके परिवार के लोगों ने ही उसका शव लेने से इंकार कर दिया। लगता है कि भले ही उसके हजारों समर्थक उस पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे, लेकिन उसके परिवार वाले उसके असली चरित्र से वाकिफ थे। उसकी मौत के बाद कई चौंकाने वाले सच सामने आये। दूसरों को आलीशान भविष्य के सपने दिखाने वाला यह सरगना अपने वर्तमान को रंगीन बनाये हुए था। मुफ्त में बरसने वाले धन ने उसकी नीयत खराब कर दी थी। बाग के बीचों-बीच उसने अपना आलीशान आवास बना रखा था। जहां ब्युटी पार्लर था, जिसमें फेसवाश से लेकर विभिन्न ब्रांड के तेल और भी बहुत सी ऐसी-ऐसी महंगी अय्याशी की चीज़ें थीं जो रईसों के शौक का अहम हिस्सा हुआ करती हैं। उसके अनुयायी झोपडियों में गर्मी के मारे बेहाल होकर आधी-अधूरी नींद ले पाते थे, लेकिन वह वातानुकूलित आवास के मजे लूटता था! वह बीयर की बोतलें खाली करने का जबर्दस्त शौकीन था। वह स्वीमिंग पुल में नहाता था। और उसके समर्थकों को शुद्ध पीने के पानी के लिए तरसना पडता था। रामवृक्ष के दानवी कृत्यों की भी दास्तान बहुत लम्बी है। अच्छा हुआ जो उसका अंत हो गया। नहीं तो भविष्य में एक और कपटी और फरेबी नेता इस देश की छाती पर मूंग दलता नजर आता और आप और कुछ भी नहीं कर पाते...।

Thursday, June 9, 2016

हालात बदल भी सकते हैं

राजा अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। उनकी खुशी की कोई सीमा नहीं है। जनता खुश भी है, निराश भी। राजा उसकी उम्मीदो पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरे हैं। राजा ने जो वादे किये थे उनके पूरे होने पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं। राजा का कहना है कि अभी तो तीन साल बाकी हैं। दो वर्ष में जितना कर सकते थे उससे कहीं अधिक करने का उन्होंने कीर्तिमान बनाया है। पहले वाले राजा से उनकी तुलना करके देख लो। हम उनसे लाख बेहतर हैं। वे तो अपनी मालकिन के इशारे पर चलते थे। हम अपने दिल और दिमाग के साथ दौड रहे हैं। उनके राज में बेईमानो की चांदी थी। भ्रष्टाचारियों का बोलबाला था। हमने तो सत्ता पर काबिज होते ही ऐलान कर दिया था कि न खाएंगे और ना ही खाने देंगे। कोई माई का लाल मेरी सरकार पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजा वाद का आरोप नहीं लगा सकता। मेरे सभी मंत्री-संत्री गंगाजल की तरह पवित्र हैं। बस अपने काम से मतलब रखते हैं। किसी के फटे में टांग नहीं अडाते।
विरोधी कहते हैं वे तो खुद को शहंशाह समझते हैं, लेकिन वे खुद को प्रधानसेवक की पदवी से नवाज कर बार-बार यही उलाहना देते हैं कि मेरे शत्रुओं को एक चाय वाले का देश की सत्ता पर काबिज होना रास नहीं आ रहा है। उनके शोर मचाने और माथा पीटने से सच नहीं बदलने वाला। जो काम करेगा वो ढिंढोरा तो पीटेगा ही। यह प्रचार का जमाना है। लोगों तक अपनी उपलब्धियों की जानकारी पहुंचाने के लिए ढोल पीटना जरूरी है। जिन्हें विरोध करना है, करते रहें। किसानों के सच्चे हमदर्द एक फिल्म अभिनेता ने सरकार की कार्यप्रणाली से नाराज होकर कहा है कि सरकार ने अपने दो साल के कामकाज के प्रचार के लिए १००० करोड फूंकने से पहले कम-अज़-कम इस तथ्य का तो ध्यान रखा होता कि भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहां अन्नदाता को कर्ज की मार के चलते आत्महत्या करनी पडती है। शासक यह कैसे भूल गये कि महज सात सौ करोड के कर्ज के कारण महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं का अनवरत सिलसिला चला आ रहा है। यदि सरकार ने सर्व जनहित के कामों को अंजाम दिया हो तो उसे अपनी उपलब्धियों को गिनाने के लिए इतनी बैंड-बाजे बजाते हुए करोडों रुपये स्वाहा नहीं करने पडते। इन रुपयों से तो दो राज्यों के किसानों का कर्जा माफ हो सकता था। वैसे भी देश इन दिनों सूखे से जूझ रहा है। इस सरकार को भी अपने भविष्य की चिन्ता खाये जा रही है। वह भी पहले वाली सरकार के रास्ते पर चल रही है। खुद को प्रजा का सेवक कहने वाले राजा ने परदेस में तो अपनी शानदार छवि बनायी है, लेकिन देश के अधिकांश लोग नाखुश हैं। ऐसे में किसी विद्वान की यह पंक्तियां याद हो आती हैं कि पारिवारिक मोर्चे पर असफल व्यक्ति बाहर कितने भी झंडे गाड ले, कितना ही नाम कमा ले, निरर्थक है। पहले घर यानी देश में जय-जय होना जरूरी है। यकीनन मोदी इस मामले में पिछड गए हैं। साफ-साफ दिखायी दे रहा है कि लोकतंत्र पर राजतंत्र हावी हो चुका है। सांसद खुद को राजा-महाराजा से कम नहीं समझते। जनता की तकलीफों को अनदेखी करने की उन्हें आदत पड चुकी है। कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। प्रशासन भी उनकी जी-हजूरी करने में जमीन आसमान एक कर देता है। सत्ताधारी दल की सांसद पूनम महाजन को बीना से तत्काल भोपाल पहुंचाने के लिए स्पेशल ट्रेन दौडाने वालों को आम यात्रियों की तकलीफें कभी दिखायी नहीं देतीं। जनता कष्ट भोगती रहे और सांसद-मंत्री मौज करते रहें यही आज का लोकतंत्र है। लोग सब जानते-समझते हैं। बार-बार छले जाने की पीडा ने लोगों की नींद हराम कर दी है। पिछले दो सालों में दलितों, शोषितों, अल्पसंख्यकों पर हमले बढे हैं। सत्ताधारी दल के ही कुछ सांसदों और उनके चेले चपाटों ने देश में दहशत का वातावरण बनाने में कोई कसर नहीं छोडी है। इस सच से मुंह नहीं मोडा जा सकता कि जब तक देश के जन-जन को सुरक्षित होने का यकीन नहीं होता तब तक हर तरक्की बेमानी है। देश का हर नागरिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहता है। वह क्या खाना चाहता है क्या उसे पहनना पसंद है इसका फैसला दूसरे करें यह भला कैसे हो सकता है? खाद्य पदार्थों की कीमतों में अंधाधुंध वृद्धि, रुपये की कीमत में गिरावट और रोजगार न बढने से लोगों में अपार निराशा है। राजा का यह दावा भी खोखला साबित होकर रह गया है कि उनके राज में खाने और खिलाने की परिपाटी का खात्मा होगा। देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके बेटे व सांसद दुष्यंत सिंह पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजा वाद के संगीन आरोपों के साथ-साथ छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमन सिंह का ३६ हजार करोड का घोटाला सामने आया, लेकिन राजा चुप्पी साधे रहे। कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री पंकजा मुंडे के करोडों रुपये के भ्रष्टाचारी कांड पर भी कोई हलचल नहीं हुई। महाराष्ट्र के ही राजस्वमंत्री एकनाथ खडसे का भ्रष्टाचारी कारनामा सामने आने के बाद भी उन्हें बचाने की कोशिशें की गयीं। यह भी सच है कि सरकार ने कई जनहितकारी योजनाओं को लागू करने की घोषणा तो की हैं, लेकिन उनका वास्तविक प्रतिफल दिखायी नहीं दे रहा है। यकीनन क्रियान्वयन में कहीं न कहीं बहुत बडी कमी है। इसलिए देश का गरीब तबका, किसान, मजदूर और युवा वर्ग बेहद आहत है। अभी तो दो ही साल बीते हैं। सरकार के पास तीन साल का समय बाकी है। वह अगर लोगों के सपनों को पूरा करने में अपनी पूरी ताकत लगा देती है तो यकीनन हालात बदल भी सकते हैं।