Thursday, September 22, 2016

दिमाग के दरवाजे बंद रखने की जिद

डायन, चुडैल, भूतनी, टोनहिन, प्रेतनी कलंकिनी, डाकिन आदि ऐसे दिल और दिमाग को छलनी कर देने वाले शाब्दिक बाण हैं जिनसे गरीब, असहाय, दबी कुचली महिलाओं को अपमानित किया जाता है। उन्हें मनचाही शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया इसका कोई आंकडा दे पाना कतई संभव नहीं है। डायन घोषित की गई महिलाओं के बाल काटने, उनके साथ बलात्कार करने, उनको नंगा करके गांव में घुमाने, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाने और मुंडन कर देने के साथ-साथ उन्हें समाज के लिए खतरनाक बताने के लिए कई कहानियां और कहावतें गढ ली जाती हैं।
उनकी उम्र है ६३ वर्ष। नाम है बीरूबाला रामा। उन्होंने असम में डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के खिलाफ लडाई लडते हुए कई हमले झेले, अपमान का शिकार हुर्इं, लेकिन फिर भी नहीं घबरायीं। असम के कई गांव आज भी अंधविश्वास की जंजीरों में कैद हैं। झाड फूंक करने वाले बाबाओं पर ग्रामवासी इस कदर विश्वास करते हैं कि यदि कोई उनके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसकी हत्या तक कर दी जाती है। सजग आदिवासी ग्रामीण महिला बीरूबाला ने ढोंगी बाबाओं के खिलाफ अपना स्वर बुलंद किया तो उन्हें तरह-तरह से प्रताडित किया गया। अंधविश्वास के खिलाफ उनकी लडाई की शुरुआत तब हुई जब १९९६ में उनके बडे बेटे को मलेरिया हो गया था। गांव के कुछ लोगों ने उसे देवधोनी (कथित अवतार) के पास ले जाने की सलाह दी। वे उनका कहा मानकर उसके पास चली गयीं। देवधोनी ने बेटे को देखते ही कहा उनके बेटे को किसी पहाडी देवी की आत्मा ने जकड लिया है जिससे छुटकारा मिलना असंभव है। उनका बेटा बस अब तीन दिन का ही मेहमान है। उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकती। वे चुपचाप अपने बेटे को घर ले आयीं। दो दिन के बाद बेटा बिस्तर से उठ खडा हुआ। तभी से वे बाबाओं के खेल को समझ गयीं। उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ कमर कसने की ठान ली। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं था। बीरूबाला के कथित अवतार और भूत प्रेत के खिलाफ मुंह खोलते ही बाबाओं के अनुयायियों में खलबली मच गयी। उन्होंने बीरूबाला के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए समाज से बाहर करने के साथ-साथ गांव से चले जाने का फरमान सुना दिया। उन्हें तीन साल तक गांव से बाहर रहना पडा। वे डायन प्रथा और पाखंडी बाबाओं का पर्दाफाश करने की ठान चुकी थीं, इसलिए उनकी आवाज बुलंद होती चली गयी। कई हमले झेल चुकी इस जुनूनी महिला को गोवाहाटी विश्वविद्यालय ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा है।
यह हकीकत वाकई हैरान-परेशान करने वाली है कि मध्यप्रदेश में १०० में से ४० बच्चे कुपोषित हैं। यह खबर २०१६ के सितंबर महीने की है। देश को आजाद हुए ६९ वर्ष बीत गये, लेकिन हम बच्चों को स्वस्थवर्धक भोजन और चिकित्सा सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करवा पाये! उस पर अंधश्रद्धा के नाग ने लोगों को बुरी तरह से जकड रखा है। इसलिए कई मां-बाप अपने कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए डॉक्टरों के पास ले जाने की बजाय बाबाओं के तंत्र-मंत्र पर ज्यादा भरोसा करते हैं। खांसी और बुखार से ग्रसित बच्चों को लहसुन और पीपल के पत्तों की माला पहनाने तथा पेट पर नाडा बांध देने से वे यह मान लेते हैं कि उनके कमजोर बच्चे तंदुरुस्त हो जाएंगे। यह देखकर घोर ताज्जुब होता है कि इस आधुनिक दौर में भी किस कदर अंधश्रद्धा का बोलबाला है। कई लोगों का यह भ्रम भी निरर्थक है कि अशिक्षित और ग्रामीण ही तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की काली छाया के शिकार हैं। महाराष्ट्र के शहर नागपुर में सैकडों मनोरोगी ऐसे हैं जो घरों में कैद होकर रह गये हैं। यह लोग कभी अच्छे भले थे। अचानक उन्हें मानसिक रोग ने अपनी चपेट में ले लिया तो उनका जीवन नरक से भी बदतर हो गया। परिजन यही समझते रहे कि किसी भूत या बाहरी हवा ने उन्हें अपने चंगुल में ले लिया हैं। २२ साल के रामलाल की जिन्दगी की गाडी बडे मज़े से चल रही थी। वह शहर की नामी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता था। पाच साल पूर्व अचानक उसकी दिमागी हालत गडबडा गयी। अपना काम-धाम छोडकर वह बस्ती की गली में पागलों की तरह गाना गाते घूमता नजर आने लगा। उसकी इस हालत को देखकर लोग अपनी-अपनी राय व्यक्त करने लगे। ज्यादातर का यही कहना था कि किसी ने उस पर जादू-टोना कर दिया है। अब तो कोई पहुंचा हुआ ओझा ही उसे ठीक कर सकता है। परिवार वाले उसे भूत भगाने वाले तांत्रिक के पास ले गये, लेकिन उसकी हालत नहीं सुधरी। उसके इधर-उधर भटकने पर अंकुश लगाने के लिए उसके हाथ-पैर जंजीरों से बांध दिए गए और घर में कैद कर दिया गया। जंजीरों में बंधा रहने से उसकी हालत जब बिगड गयी तो उसे आजाद कर दिया गया। लेकिन इससे तो मामला और भी बिगड गया। एक दिन वह बिजली के ट्रांसफार्मर पर चढ गया तो उसके हाथ-पैर बुरी तरह से जल गए। सरकारी अस्पताल में ले जाने पर डॉक्टर ने कहा कि वह तो मनोरोगी है। भूत का कोई चक्कर नहीं है। उसका समुचित इलाज होने पर वह शीघ्र ठीक हो जाएगा। मगर परिवार वालों को डॉक्टर की सलाह रास नहीं आयी। लोगों की सलाह पर फिर से उन्होंने तंत्र-मंत्र करने वाले किसी बाबा की शरण में जाना उचित समझा।
नागपुर में स्थित कलमना, निवासी संजीवन के पांच में से तीन पुत्रों ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। हालात यह हैं कि तीनों घर में ही पडे रहते हैं। कभी बॉथरूम में छिप जाते हैं तो कभी किसी चीज़ के लिए बच्चों की तरह जिद करने लगते हैं। बुजुर्ग पिता को कुछ तांत्रिकों ने बच्चों पर भूत-प्रेत का साया बताकर ऐसा डराया कि उनसे तीस-चालीस हजार रुपये एेंठ लिए। इसके लिए उन्हें अपनी जमीन गिरवी रखनी पडी। जब तंत्र-मंत्र से कोई फर्क नहीं पडा तो उन्होंने जानकार डॉक्टरों की सलाह पर मनोचिकित्सालय में भर्ती कराया है।
नारंगी शहर नागपुर में कई मनोरोगी उचित इलाज के अभाव के कारण मौत के मुंह में समा चुके हैं। सैकडों मनोरोगी घरों में कैद हैं। उन्हें मनोरोग ने कब जकड लिया इसकी खबर परिवार वालों को भी तब लगी जब मामला बिगड गया। परिवार वाले यही समझते रहे कि किसी ने जादू-टोना कर दिया है। किसी तंत्र-मंत्र के जानकार को दिखाने पर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसी ओझा, बाबा का तंत्र-मंत्र उन्हें ठीक नहीं कर पाया। ऐसा परिवार कम ही है जो मनोरोगी को इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले जाते हैं। उनका तो यही मानना है कि तांत्रिक-मांत्रिक ही भूतप्रेत के साये से मुक्ति दिला सकते हैं।

Thursday, September 15, 2016

राष्ट्रभक्तों का खून खौलता है

समय बदल रहा है। तारीखें बदल रही हैं। लेकिन भारतीय राजनीति के रंग-ढंग नहीं बदल रहे हैं। कई नेता ऐसे हैं जिन्हें हमेशा धनपतियों, बाहुबलियों, कट्टरपंथियों, माफियाओं, इंसानियत के शत्रुओं और किस्म-किस्म के गुंडों-बदमाशों की जरूरत बनी रहती है। राजनीति के रंग में रंगे अराजक तत्वों का भी नेताओं की छत्रछाया के बिना काम नहीं चलता। ११ साल बाद शहाबुद्दीन जेल से बाहर निकला तो हजारों समर्थकों का हुजूम उसके स्वागत के लिए उमड पडा। सैकडों कारों के काफिले के साथ जब उसकी सवारी सडकों से गुजरी तो उसके चाहने वालों के चेहरे की चमक को देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे किसी क्रांतिकारी नेता की रिहायी हुई है जिसका वर्षों से बडी बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था। कई वर्दीवाले भी दहशतगर्द शहाबुद्दीन के करीबी हैं। इसलिए उन्होंने भी अपने अंदाज में उसका स्वागत किया। बाहुबलि के काफिले की किसी भी कार ने टोल प्लाजा पर टोल टैक्स देने के लिए रूकना जरूरी नहीं समझा। कहते हैं मेहरबान पुलिस ने टोल नहीं लेने का आदेश जारी कर दिया था। कभी पूरे बिहार को थर्रा देने वाले सीवान के इस हत्यारे, लुटेरे डॉन पर कई गंभीर मामले दर्ज हैं। १३ मई २०१६ को ४२ साल के पत्रकार राजदेव रंजन की सीवान रेलवे स्टेशन के पास हत्या कर दी गयी थी। शहाबुद्दीन के अपहरण, उद्योग और घातक कारगुजारियों के खिलाफ सजग पत्रकार रंजन बेखौफ कलम चलाया करते थे। माफिया से नेता बने पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने अपने खिलाफ लिखने और आवाज उठाने वालों को ठिकाने लगाने में कभी कोई देरी नहीं की। निर्भीक कलमकार रंजन को अपनी खोजबीन में २०१४ में राजनीतिक कार्यकर्ता श्रीकांत भारती की हत्या में जेल में बंद शहाबुद्दीन का हाथ होने के पुख्ता संकेत मिल चुके थे। रंजन हत्याकांड के तुरंत बाद हिरासत में लिए गए तीन लोगों में हिस्ट्रीशीटर अपराधी उपेंद्र सिंह था, जिसके तार शहाबुद्दीन से जुडे पाये गये। जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सक्रिय नेता चंद्रशेखर की हत्या के पीछे भी शहाबुद्दीन का हाथ माना जाता है। आपराधिक तत्वों के इस सरगना की यह खुशकिस्मती है कि बिहार में उसके आका लालू की पार्टी सत्ता में है और उनके पुत्र बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं। ऐसे में शहाबुद्दीन को उडने के लिए खुला आसमान मिल गया है। उसके द्वारा सताये गये अनेकों लोगों को चिन्ता और दहशत ने घेर लिया है। यह सच भी जगजाहिर है कि जहां लालू अपराधियों को संरक्षण देने के लिए जाने जाते हैं वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आपराधिक तत्वों से समझौता न करने वाले सिद्धांतवादी नेता के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन यह भी सच है कि नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए क्या से क्या हो जाते हैं यह भी देशवासी बखूबी जानते हैं। कुर्सी के लिए नीतीश कुमार ने जब भ्रष्ट लालू की पार्टी से गठबंधन करने में परहेज नहीं किया तो ऐसे में उनपर भी शंका होने लगी है।
यह देश की बदकिस्मती ही है कि चुनाव जीतने के लिए और सत्ता पर बने रहने के लिए शहाबुद्दीन जैसे गुंडे बदमाशों को पाला-पोसा जाता है। यह वो आतंकी हैं, जिनके एक इशारे पर पुलिस अधिकारियों को गोली मार दी जाती है। बसे-बसाये परिवार उजाड दिये जाते हैं। आपसी भाईचारे की हत्या कर दी जाती है। सरकारें इनपर हाथ डालने से कतराती हैं। क्योंकि इनके चंदे, धंधे और गुंडो की फौज की बदौलत सत्ता पायी और हथियायी जाती है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने विवादित इस्लामी उपदेशक जाकिर के एनजीओ 'इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन' (आरजीएफ) से ५० लाख रुपये का चंदा लेकर एक बार फिर से यह स्पष्ट कर ही दिया कि देश में राजनीति दल अपना कामकाज कैसे करते हैं। आतंकियों को अपने भडकाऊ उपदेशों से प्रेरित करने वाले डॉ. जाकिर ने यह चंदा राजीव गांधी फाउंडेशन को समर्पित किया था। गौरतलब है कि नाइक धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाला ऐसा शख्स है जो कई सालों से समूचे भारत में धर्मांध राष्ट्रद्रोही ताकतों को बढावा देने का काम करता चला आ रहा है। कथित तौर पर अमन और शांति का संदेश देने वाले जाकिर के ये भडकाऊ भाषण उसकी असलियत बयां कर देते हैं, "मैं सारे मुस्लिमों को कहता हूं कि हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए। आतंकी का मतलब ऐसा आदमी, जो भय फैलाए।" पुलिस की जांच और गिरफ्तारी के डर से विदेश में जा दुबका जाकिर अपने भाषणों में हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित कर गर्व महसूस करता है। गीता के श्लोक की गलत व्याख्या कर कट्टरवाद को बढावा देते-देते वह चर्चित होता चला गया। आतंक का यह अध्यापक कभी दक्षिण मुंबई के भिंडी बाजार की तंग गलियों में एक छोटे से घर में रहता था। लेकिन उसने धर्म का गलत प्रचार और हिन्दू देवी-देवताओं का घोर अपमान करते-करते इतनी दौलत और शोहरत कमा ली कि वह आज मुंबई के एक पॉश इलाके में खडी की गयी आलीशान कोठी में रहता है। उसने कई मदरसे भी खोल रखे हैं। आतंक का परचम लहराने के लिए उसे भारत और दुनियाभर के देशों से करोडों रुपये का डोनेशन मिलता है। वह पीस टीवी (चैनल) का कर्ताधर्ता भी है जिसके २० करोड दर्शक हैं और इसे १०० से अधिक देशों में देखा जाता है। बेगुनाहों के कत्ल को जायज ठहराने वाले जाकिर पर कांग्रेस के बडे नेता काफी मेहरबान रहे हैं। २०१२ के एक कार्यक्रम में कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह उसके साथ एक मंच पर नजर आये थे। यह कहना गलत तो नहीं लगता कि राजीव गांधी फाउंडेशन को जो चंदा दिया गया वह दरअसल रिश्वत ही था जिसकी बदौलत जाकिर बेखौफ होकर युवकों को आतंक के मार्ग पर जाने और कट्टरपंथी बनने की शिक्षा-दीक्षा देता रहा और तब की सरकार तमाशबीन बनी रही। शहाबुद्दीन और जाकिर जैसे चेहरे आखिर हैं तो समाज और देश के दुश्मन ही। राजनीतिक दलों का इनसे किसी भी तरह का जुडाव हर राष्ट्रभक्त के खून को खौलाता है।

Thursday, September 8, 2016

भ्रमित करने का खेल

अब तो जब भी किसी बडे नेता, मंत्री, उपदेशक, प्रवचनकार और समाज सेवक आदि के दुराचारी और व्याभिचारी होने की खबरें सुर्खियां पाती हैं तो उतनी हैरानी नहीं होती। आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार के महिला और बाल विकास मंत्री संदीप कुमार का सैक्स स्कैडल सामने आने के बाद भले ही देश की राजनीति गरमा गयी, लेकिन सजग देशवासियों के लिए यह रोजमर्रा की खबर थी। अखबारों और न्यूज चैनलों पर छा जाने वाली ऐसी खबरों को पढने और सुनने के अभ्यस्त हो चुके हैं देशवासी। इस खबर ने संदीप कुमार को कम और 'आम आदमी पार्टी' को ज्यादा नुकसान पहुंचाया। पार्टी के सर्वेसर्वा यह दावा करते थे कि उन्होंने काफी जांचने-परखने के बाद चरित्रवान, पाक-साफ लोगों को पार्टी में जगह दी है। ऐसे में संदीप कुमार जैसे पथभ्रष्ट चेहरे पार्टी के टिकट से चुनाव लडकर विधायक और मंत्री बनने में कैसे कामयाब हो गये? यह सवाल उन मतदाताओं से भी जवाब मांगता है जो भावुकता के पाश में बंधकर किसी भी ऐरे-गैरे को अपना कीमती वोट देने की भूल कर देते हैं और बाद में पछतावे के सिवाय और कुछ नहीं पाते।
२०१५ में राजनीति में आने से पहले वकील रह चुके संदीप को लोगों की आंखों में धूल झोंकने और अपनी छवि चमकाने के सभी तौर तरीके आते हैं। तभी उसने यह प्रचारित कर रखा था कि वह अपनी पत्नी के पैर छूकर अपने दिन की शुरुआत करता है। जब उसकी सेक्स सीडी में ९ मिनट लंबा वीडियो और दो महिलाओं के साथ विभिन्न आपत्तिजनक तस्वीरें सामने आयीं तो लोगों को यह भी पता चल गया कि उसमें शातिर नेताओं वाले सभी गुण मौजूद हैं। बेशर्म संदीप ने सबसे पहला बयान दागा कि मैं दलित हूं और मैंने अपने निवास स्थान पर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित की है। जिसकी वजह से कुछ लोग मुझसे ईर्ष्या करते हैं और वही मुझे बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं। मैं तो महिलाओं का अपार सम्मान करता हूं ऐसे में भला मैं किसी की मां-बहन के साथ दुष्कर्म कैसे कर सकता हूं!
आम आदमी के मुखर प्रवक्ता आशुतोष जो कभी पत्रकारिता में अपना परचम लहरा चुके हैं और बेडरूम में झांकने की गुस्ताखी के चलते बसपा के संस्थापक स्वर्गीय कांशीराम से थप्पड भी खा चुके हैं, ने जोश में होश खोते हुए अपने शोध और आधुनिक बोध से आग में घी डालते हुए कुछ यूं फरमाया कि, संदीप तो भोला-भाला इंसान है। उसने जो कुछ भी किया है उसकी प्रेरणा उसे इस देश के नेताओं से ही मिली है। भारतीय इतिहास ऐसे नेताओं और नायकों के उदाहरणों से भरा पडा है, जिन्होंने अपनी सामाजिक सीमाओं के आगे जाकर अपनी इच्छाओं के मुताबिक भरपूर जीवन जीया। संदीप के मौज-मज़ा करने पर इतना हंगामा क्यों? आशुतोष ने यह सवाल उठाते हुए लिखा कि, अगर दो व्यस्क सहमति से आपस में सेक्स करते हैं तो क्या यह अपराध है? वैसे भी सेक्स हमारी मूल प्रवृत्ति का हिस्सा है। जैसे हम खाते हैं, पीते हैं और सांस लेते हैं... ठीक उसी तरह से सेक्स भी इंसान की जरूरत है। जो लोग संदीप पर उंगलियां उठा रहे हैं उन्हें इस ऐतिहासिक सच का भी ज्ञान होना चाहिए कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विभिन्न सहयोगी महिलाओं से प्रेम के किस्से चटखारे लेकर सुने-सुनाये जाते थे। एडविना माउंटबेटेन के साथ उनके अंतरंग रिश्तों की खूब चर्चा हुई। पूरी दुनिया इसके बारे में जानती थी। नेहरू का आखिरी सांस तक उनसे लगाव बना रहा। क्या यह पाप था? इतिहास इस तथ्य का भी गवाह है कि १९१० में कांग्रेस के बडे नेता सरला चौधरी से महात्मा गांधी के रिश्तों को लेकर बेहद चिंतित थे। महात्मा गांधी ने खुद स्वीकारा था कि सरला उनकी आध्यात्मिक पत्नी हैं। बाद के दिनों में अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग के लिए गांधी अपनी दो भतीजियों के साथ नग्न सोते थे। पंडित नेहरू एवं अन्य कुछ बडे नेताओं ने बापू से कहा था कि वे ऐसा न करें। इससे उनकी छवि खराब होती है। लेकिन फिर भी वे नहीं माने। आशुतोष ने संदीप को सही ठहराने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया, जार्ज फर्नाडीस, चीनी नेता माओ के महिला सहयोगियों के साथ के रिश्तों को कठघरे में खडा कर खुद को निष्पक्ष और निर्भीक बुद्धिजीवी दर्शाने की भरपूर कोशिश करते हुए यह भी कह डाला कि उस समय के नेता खुशनसीब थे। क्योंकि तब न टीवी चैनल थे, कोई स्टिंग भी नहीं होता था और तो और किसी नेता का राजनीतिक जीवन भी प्रभावित नहीं होता था। आशुतोष का यह भी कहना था कि जब संदीप के खिलाफ किसी महिला ने कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं करायी है तो इससे तय हो जाता है कि आपसी सहमति से ही हमबिस्तरी की गयी। ऐसे में संदीप को बलात्कारी और व्याभिचारी की संज्ञा देने वाले लोग हद दर्जे के अज्ञानी हैं। चार-पांच दिन तक संदीप के पक्ष और विपक्ष में बयानबाजी के तीर चलते रहे। विभिन्न विद्वान आपस में भिडते रहे। फिर अचानक आपत्तिजनक सीडी में दिखायी देने वाली महिला ने सामने आकर जैसे बाजी ही पलट दी। थाने में शिकायत करने पहुंची महिला ने बताया कि यह घटना लगभग एक वर्ष पहले की है। वह मंत्री के कार्यालय में राशन कार्ड बनवाने के लिए गई थी। मंत्री ने उसे एक कमरे में बैठने का निर्देश दिया। जहां उसे कोल्ड ड्रिंक पीने के लिए पेश की गयी। इसे पीते ही वह अपने होश खो बैठी। इसके बाद उसके साथ दुष्कर्म किया गया। होश में आने के बाद ही उसे पता चला कि उसकी अस्मत लूटी जा चुकी है। उसने मंत्री को कहा कि यह आपने ठीक नहीं किया। यह तो बहुत बडा गुनाह है, धोखाधडी है। मंत्री ने उसे समझाते हुए कहा कि वह यह क्यों भूल रही है कि उसे राशन कार्ड भी तो बनवाना है। महिला के अनुसार इस दुष्कर्म कांड को खुफिया कैमरे में कैद किये जाने की उसे कतई कोई जानकारी नहीं थी। उसे तो समाचार चैनलों से ही पता चला कि उस पर हुए बलात्कार की वीडियो बनायी गयी। यह भी गौरतलब है कि मंत्री ने जिस राशन कार्ड को बनवा कर देने के नाम पर कुकर्म किया वह भी उसे नहीं मिला।
जब यह सवाल उठाया गया कि वह इतने महीनों तक चुप्पी क्यों साधे रही तो उसका कहना था कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। मुझे उनकी परवरिश करनी हैं। मैं नहीं चाहती मेरे परिवार की बदनामी का ढोल पीटा जाए। मैं तो अपना नाम और पहचान भी किसी हालत में उजागर नहीं करना चाहती। इसे विडंबना कहें या कुछ और कि अपने देश में मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नारी को यौन शोषण का शिकार होना पडता है। इस पर शासकों को जरूर चिन्तन-मनन करना चाहिए। वैसे यह उनकी ही जबरदस्त चूक और अनदेखी का नतीजा है। एक सवाल यह भी कि कुछ महिलाएं इतनी आसानी से कैसे शोषकों के हाथों का खिलौना बन जाती हैं? संदीप कुमार जैसे नकाबपोशों के कुकर्मों का ढिंढोरा पिट चुकने के बाद भी उनकी मंशा आसानी से पूरी हो जाती है!! अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भी अपने देश में बहुत खतरनाक खेल खेला जा रहा है। जिसके मन में जो आता है, बोल देता है। कई तथाकथित बुद्धिजीवी उंगलियां उठाने में माहिर हैं। उनके लिए बडा आसान है किसी दूसरे की मिसाल देकर अपने आपको तथा अपने संगी-साथियों को साफ-सुथरा बताना। यह भी सच है कि हमारे समाज में अनैतिकता को स्वीकृति दिये जाने की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही है। बडी से बडी हस्ती को नैतिक पतन का न कभी बर्दाश्त किया गया है, न कभी किया जायेगा। ढोंगी प्रवचनकार आसाराम के दुष्कर्मों की पोल खुलने के बाद उनका कैसा हश्र हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस के उम्रदराज दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने के चक्कर में ऐसे बदनाम हुए कि उन्हें राजनीतिक वनवास भोगने को विवश होना पडा। और भी ऐसे कई नाम हैं जिनका कभी दौर था, लेकिन अय्याशी के भंवर में फंसने के बाद सदा-सदा के लिए अपनी इज्जत गंवा बैठे।

Thursday, September 1, 2016

शराब बंदी की हकीकत

बिहार में जहरीली शराब पीने से १८ लोग मौत के मुंह में समा गए। कुछ को अपनी आंखों की रोशनी गंवानी पडी। नीतीश कुमार ने प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर अपनी पीठ थपथपायी थी। वे यकीनन इस सच को भूल गये थे कि शराबबंदी की घोषणा करना आसान है, उसे यथार्थ का जामा पहनाना बेहद मुश्किल है। इतिहास गवाह है कि पहले भी जिन-जिन प्रदेशों में शराब बंदी की गयी, वहां वास्तव में शराब मिलनी बंद नहीं हो पायी। अवैध शराब बनाने और बेचने वालो की निकल पडी। ऐसा तो हो नहीं सकता कि बंदी के बाद खुलने वाले विभिन्न दरवाजों के असली सच से मुख्यमंत्री अनभिज्ञ रहे हों। गोपालगंज में विषैली शराब पीने से १८ लोगों की हुई मौत ने यह संकेत तो दे ही दिये हैं कि बिहार में भी शराब बंदी का वही हश्र हो रहा है जो कभी हरियाणा में हुआ था और गुजरात तथा अन्य बंदी वाले प्रदेशों और शहरों में होता चला आ रहा है। लोग अवैध शराब पीकर मरते रहते हैं और शासन और प्रशासन की जिद और अकड का तंबू तना रहता है।
गोपालगंज में जब जहरीली शराब पीने की वजह से लोगों के मौत के मुंह में समाने और बीमार पडने की खबरें आयीं तो जिला प्रशासन ने पहले तो यही प्रचारित किया कि यह आम मौते हैं। इनका नकली शराब से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया ने जब प्रशासन को बेनकाब करने का अभियान चलाते हुए विषैली शराब को ही मौतों की असली वजह बताया तो सरकार को मजबूरन सच को स्वीकार करना पडा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी उस हकीकत को उजागर कर दिया जिसे दबाया और छिपाया जा रहा था। यह कहना कतई गलत नहीं कि विषैली शराब के कहर से हुई मौतों की असली दोषी सरकार और पुलिस ही है। लोग शराब से तौबा कर लें इसके लिए सरकार ने कानून तो यकीनन बहुत क‹डा बनाया है, लेकिन लोगों में उसकी दहशत का नितांत अभाव है। बिहार के निवासी घर या बाहर शराब नहीं पी सकते। घर में शराब का रखना भी घोर अपराध है। किसी दूसरे प्रदेश से बिहार में जाने वालों के लिए शराब लेकर जाने पर भी बंदिश है। बिहार में शराब बंदी का उल्लंघन करना बहुत महंगा पड सकता है। अगर शराब के उत्पादन और विक्रय के चलते किसी ग्राहक की मौत हो जाती है तो उत्पादक और विक्रेता को फांसी तक की सजा हो सकती है। अवैध शराब पीने की वजह से यदि कोई शारीरिक अपंगता का शिकार हो जाता है तो भी फांसी की सजा या दस लाख रुपये जुर्माना देना पड सकता है। सार्वजनिक जगहों पर शराब पीने वालों को एक लाख रुपये तक का जुर्माना और पांच से सात साल तक की जेल हो सकती है। ताज्जुब है कि इतना कडा कानून भी शराब बंदी को सफल नहीं बना पाया। एक सच यह भी खुलकर सामने आया है कि शराब पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद से भ्रष्ट पुलिस वालों और नेताओं की चांदी हो गयी है। कई आबकारी विभाग वाले भी मालामाल हो रहे हैं। जब शराब पर पाबंदी नहीं थी तब विभिन्न करों के रूप में धन सरकारी खजाने में आता था, अब शराब के अवैध धंधेबाजों की तिजोरियों में समा रहा है। अवैध शराब के निर्माता, विक्रेता तस्करी के नये-नये तरीके इजाद कर प्रशासन की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। यह भी देखने में आ रहा है कि प्रशासन के कई बिकाऊ चेहरों की अवैध शराब के धंधे में सहमति और साझेदारी है। शराब माफियाओं को नेताओं का भी भरपूर संरक्षण मिला हुआ है। रेलगाडियों, बसों, ट्रकों, कारों आदि से जहां-तहां शराब पहुंचाने के परंपरागत तरीकों के साथ-साथ जलमार्ग से भी शराब तस्करी को अंजाम दिया जा रहा है। शराब तस्कर गंगा व कोसी के अलावा अन्य नदियों के रास्ते बंगाल, झारखंड, उत्तरप्रदेश तथा नेपाल से शराब मंगाकर बिहार के कोने-कोने में पहुंचा रहे हैं। मरीजों के अस्पताल पहुंचाने वाली एम्बुलेंस भी शराब तस्करी का सुरक्षित माध्यम बन चुकी हैं। गत माह कुछ प्राइवेट नर्सिंग होम के एम्बुलेंस चालकों को पुलिस के द्वारा गिरफ्तार करने के बाद यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि अनेकों प्राइवेट नर्सिंग होम के एम्बुलेंस चालक शराब माफिया के हाथों का खिलौना बन चुके हैं। शराब माफिया जानते हैं कि अस्पतालों की एम्बुलेंस मरीजों की सुविधा के लिए चलायी जाती हैं। इसलिए पुलिस उन्हें रोकती-टोकती नहीं है। हमारे देश की पुलिस का काम करने का तरीका किसी से छिपा नहीं है। जब से बिहार में शराब बंदी हुई है, पुलिस की मनमानी में अभूतपूर्व ईजाफा हुआ है। ईमानदार वर्दीधारी तकलीफ में हैं और बेइमानों की तानाशाही ने कानून का पालन करने वाले नागरिकों का जीना हराम कर दिया है। नये-नये माफियाओं का जन्म हो रहा है जो साम, दाम, दंड, भेद की नीति पर चलने में यकीन रखते हैं। इन्हें अवैध धंधों को अंजाम देने में महारत हासिल है। शराब बंदी का फायदा उठाने वाले एकजुट हो चुके हैं ऐसे में यह तय है कि शराब पर प्रतिबंध से दबंगों की किस्मत खुल गयी है। सरकार अगर सख्त नहीं हुई तो बिहार का भी हरियाणा जैसा हश्र होगा जहां पर शराब बंदी के लागू होने के बाद ऐसा राजनीतिक विद्रोह हुआ था, जिसके चलते मुख्यमंत्री बंसीलाल को मुंह की खानी पडी थी।

Thursday, August 25, 2016

अब तो आंखें खोलो

१५ अगस्त २०१६ का दिन। पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस की धूम थी। हर चेहरा प्रफुल्लित था। देश की राजधानी से सटे ग्रेटर नोएडा में भी खुशी और उत्साह का माहौल था। ऐसे प्रेरक वातावरण में नोएडा के जिला न्यायालय के बार रूम में वकीलों के दो गुट आपस में भिड गये। उनकी तनातनी और आमने-सामने होने का कारण था स्वतंत्रता दिवस पर फहराया जाने वाला तिरंगा। सभी के मन में देशभक्ति और राष्ट्राभिमान की भावनाएं उछल-कूद मचा रही थीं। इसलिए तिरंगा फहराने की होड मची थी! जबरदस्त मारपीट के बीच एक गुट ने जबरन बार रूम के सामने झंडा तो फहरा दिया, लेकिन दर्जनों वकील और अन्य लोग लहुलूहान हो गये। कुछ को अस्पताल की शरण लेनी पडी। एक गुट ने दूसरे गुट पर तिरंगे का अपमान करने का आरोप लगाया तो दूसरे ने स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने को अपना एकमात्र अधिकार बताते हुए विरोधियों को ही कटघरे में खडा कर दिया। अपने देश में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण को लेकर खींचातानी होती ही रहती है। नेताओं की बिरादरी में यह रोग कुछ ज्यादा ही पाया जाता है। हर छोटा- बडा नेता खुद को झंडा फहराने का एकमात्र हकदार समझता है।
झारखंड में लातेहर-चतरा सीमा पर स्थित है गांव करामूं। इस गांव के लोगों में आजादी और तिरंगे के प्रति अटूट आदर, एकता और सम्मान का ज़ज्बा देखते बनता है। नक्सलियों के आतंक के तांडव के कारण ग्रामवासी सहमे-सहमे रहते हैं। फिर भी उनका तिरंगा फहराने और आजादी का जश्न मनाने का अंदाज अभूतपूर्व और निराला है। इस ग्राम में बुजुर्गों को भरपूर सम्मान दिया जाता है। हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बुजुर्गों को ही झंडा फहराने का सुअवसर मिलता है। गांव में जब तक तिरंगा नहीं फहरा दिया जाता, तब तक किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता। ध्वजारोहण के बाद सामूहिक रूप से राष्ट्रगान गाया जाता है। महापुरुषों की जयजयकार की जाती है। इसके बाद राष्ट्रध्वज की पूजा कर घी के दीपक से आरती उतारी जाती है। भोग लगाकर पूरे गांव में महाप्रसाद का वितरण किया जाता है। गौर करने वाली बात यह भी है कि तिरंगा फहराने के बाद ही गांव के बच्चे स्कूल जाते हैं। बच्चों का स्कूल जाने या किसी काम धंधे में कोई अवरोध न आए इसके लिए समय का पूरा-पूरा ख्याल रखा जाता है। राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत इस गांव के निवासी आज भी बुनियादी सेवाओं के लिए तरस रहे हैं। सरकारी तंत्र का इस गांव की तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया। गांव के बुजुर्गों का कथन है कि १५ अगस्त को तिरंगा फहराने की यह परंपरा उनके पूर्वजों ने बहुत साल पहले शुरू की थी, जिसका आज भी निर्बाधरूप से पालन होता चला आ रहा है। गांव का जन-जन इस परंपरा का पालन कर गर्व महसूस करता है।
उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद के रहने वाले थे शहीद वीर सिंह। वीरसिंह जम्मू-कश्मीर के पंपोर में आतंकियों के हमले में शहीद हो गये। उनकी शहादत पर अनेकों देशवासियों की आंखें भीग गयीं, लेकिन उनके गांव में रहने वाले उच्च जाति के लोगों ने शहीद को सम्मान देने के बजाय अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोडी। देश की आन-बान और शान के लिए मर मिटने वाले वीर सिंह के परिवार वाले चाहते थे कि गांव की सार्वजनिक जमीन पर अंतिम संस्कार हो और वहीं उनकी स्मृति में मूर्ति स्थापित की जाए। उच्च जाति के लोगों के लिए वीर की कुर्बानी से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी जाति थी। अहंकार के नशे में चूर उच्च जाति के लोगों ने विरोध का स्वर बुलंद कर दिया। शहीद वीर सिंह नट समुदाय से आते हैं जो कि उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जाति में शामिल है। दबंगों की आपत्ति के चलते तनातनी का वातावरण बन गया। आखिरकार प्रशासन को सतर्क होना पडा। बलिदानी का अपमान करने पर तुले सामंतवादी अहंकारियों को समझाया-बुझाया गया। बहुत मुश्किल के बाद वे वीर के परिवार की बात को मानने के लिए ऐसे सहमत हुए जैसे शहीद पर बहुत बडा अहसान कर रहे हों। शहीद वीर सिंह १९८५ में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे। वे कश्मीर में तैनात थे। शहीद वीर सिंह के पुत्र रमनदीप का कहना है कि पिता की शहादत पर उन्हें गर्व है। वह भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहता है। उसके मन में आतंकियों के प्रति रोष भरा हुआ है। उसका बस चले तो वह एक-एक आतंकवादी को गोलियों से भून डाले।
अपने यहां खिलाडियों की जीत पर खूब जश्न मनाया जाता है। क्रिकेट के खिलाडियों के लिए तो देशवासी कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें अपना भगवान मानने वालों की भी कमी नहीं है। दो-चार क्रिकेट मैच खेलते ही खिलाडी करोडपति हो जाता है। दूसरे खेलों की दुर्गति का सच भी जगजाहिर है। इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं कि ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारत की दो महिला एथलिटों पर करोडों के पुरस्कारों की बौछार कर दी गयी। केंद्र सरकार, प्रदेशों की सरकारों, खेल संगठनों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपनी तिजोरियों के मुंह खोल कर यह संदेश देने की भरपूर कोशिश की, कि देश की शान बढाने वालों के लिए धन और सम्मान की कोई कमी नहीं है। फिर ऐसे में शहीद वीर सिंह के साथ बेइंसाफी क्यों? उन्होंने भी तो तिरंगे की शान की खातिर ही अपने प्राणों को न्योछावर करने में जरा भी देरी नहीं लगायी। देश की आन, बान और शान के लिए कुर्बान होने वाले सैनिक को जात-पात के शूल चुभोने वाले भूल गए कि उनकी इस घटिया सोच ने भारत माता को कितना आहत किया है।
दरअसल, हिन्दुस्तान में ऐसे दबंगों की भरमार है जो झंडा फहराने और अपने नाम का डंका बजवाने में तो सतत आगे रहते हैं, लेकिन यदि इनसे सरहद पर जाकर दुश्मनों का सामना करने को कहा जाए तो यह घर के किसी कोने में दुबक कर ऐसे बैठ जाते हैं जैसे सांप सूंघ गया हो। परंपरा, अंधविश्वास, जाति और धर्म की आबोहवा में पलने-बढने वाले इन चेहरों को दलितों और नारियों का आगे बढना कतई नहीं सुहाता। इन्हें तो देश के शांत वातावरण को बिगाडने और विषैला बनाने के मौकों की बेसब्री से तलाश रहती है।

Thursday, August 18, 2016

यही तो हो रहा है...

कितना कुछ बदल गया! लेकिन जिस परिवर्तन की आस थी, उसका करोडों देशवासियों को आज भी बेसब्री से इंतजार है। बेबस चेहरों पर सवालों की तख्तियां टंगी हैं। आजादी के ६९ वर्ष बाद भी उत्तर नदारद है। कितनी सरकारें बदल गयीं। शासक बदल गये। सत्ता और व्यवस्था का वो चेहरा-मोहरा नहीं बदला जो आम आदमी को डराता है। अंतहीन चिन्ता के गर्त में धकेल देता है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि भारत वर्ष गांवों में बसता है। ग्राम ही इस देश की आत्मा हैं। यह जानकर हैरानी होती है कि हिन्दुस्तान के करोडों गांव आज भी अंधेरे और अशिक्षा से जूझ रहे हैं। कई ग्रामों में बिजली के खंभे तो तन गये हैं, लेकिन बिजली नदारद है। स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का अभाव गांधी के गांवों का सच बता देता है। साफ-साफ दिखता है कि शहर तो चमक रहे हैं, लेकिन ग्राम पिछडेपन के दर्द को भोगने को विवश हैं। ग्रामीण इलाके रोजगार से वंचित हैं। देश का अन्नदाता कर्ज के बोझ तले दबा है। रोजगार की तलाश में उसे तथा उसकी संतानों को शहर की तरफ भागना पडता है। शहर उसका शोषण करने का कोई मौका नहीं छोडते। किसानों को सरकारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराने का ढिंढोरा तो वर्षों से पीटा जा रहा है, लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में भी संपन्न किसान ठीक वैसे ही बाजी मार ले जाते हैं जैसे शहरी धनवान देश के सभी साधनों और सुख-सुविधाओं पर कब्जा जमाये हैं। छोटे और मध्यमवर्ग के किसानों को कर्ज से अंत तक मुक्ति नहीं मिल पाती। उन्हें सरकारी बैंक भी आतंकित करते है और साहूकार भी। इस देश में चंद हजार रुपयों के कर्ज के कारण किसानों को आत्महत्या करनी पडती है और हजारों करोड का कर्जदार विजय माल्या कानून को ठेंगा दिखाते हुए विदेश फुर्र हो जाता है और राजा-महाराजाओं-सी जिन्दगी जीता है। ऐसे कई धन्नासेठ हैं जिनपर सरकारी बैंकों का अरबों-खरबों रुपया बकाया है, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। बिजली तो सिर्फ गरीबों और असहायों पर ही गिरायी जाती है। यह वे दबे-कुचले लोग हैं जिनके वोटों से सरकारें बनती है। अदना से नेता कहां से कहां पहुंच जाते है। यह लिखने में संकोच कैसा कि अफसरों ने भी आजाद भारत को लूटने में कोई कसर नहीं छोडी। आज अगर सरकार काले धन की पकडा-धकडी का ईमानदारी से अभियान छेडती है तो सबसे ज्यादा काला पैसा नेताओं और अधिकारियों की तिजोरियों में पडा नजर आयेगा। लेकिन जो लोग सरकार चला रहे हैं, सरकारों के साथी हैं उन पर हाथ डालना आसान नहीं है। उन धनवानों पर भी शिकंजा कसना मुश्किल है जो चुनावों के मौसम में नेताओं और राजनीतिक दलों को फंड मुहैया कराते हैं। असली आजादी तो इन्हीं लोगों के हिस्से में आयी है। आजादी का असली मज़ा राजनेता, सरकारी अधिकारी, सत्ता के दलाल, काले कारोबारी और सरकारी व गैर सरकारी लुटेरे लूट रहे हैं। नेताओं और करोडों-करोडों लोग आज भी अपने-अपने तरीके से आजादी की जंग लड रहे हैं। यह योद्धा खुद की हार का तमाशा देखते-देखते थक गये हैं। कुछ के बगावती स्वर भी देखने और सुनने को मिल जाते हैं। जब देश गुलाम था तब विदेशी लूटमार किया करते थे। आज उन लोगों ने कई रूपों-बहुरूपों के साथ ठगी और भ्रष्टाचार की दुकानें खोल रखी हैं जिन्हें शासक, नेता, अफसर और बाहुबलि आदि-आदि के नामों से जाना-पहचाना जाता है। कहने को देश में लोकतंत्र है, लेकिन लूटतंत्र का ही बोलबाला है। सफेदपोशों, नकाबपोशों ने आतंकवाद, अपहरण, चोरी-डकैती को अपना पेशा बना लिया है। दिखता जरूर है कि शासक बदल गये हैं, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। एक बार जिनके हाथ में सत्ता आ जाती है, बार-बार उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। अपनों के ही सिर पर सत्ता का ताज रखने वालों ने लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील कर दिया है। वोटों की बदौलत चुने गए विधायक, सांसद और मंत्री किसी सम्राट से कम नज़र नहीं आते। राजनीति आज सबसे बडे फायदे वाला धंधा बन चुकी है। इसके धंधेबाज अपने हित के चक्कर में हद दर्जे के मतलब परस्तों को कोसों पीछे छोड चुके हैं। जनता महंगाई की मार से मरती है तो मरती रहे। जनप्रतिनिधियों को अपनी आर्थिक तरक्की की चिन्ता सताती रहती है। महाराष्ट्र में विधायकों की तनख्वाह में एकाएक बढोत्तरी कर दी गयी। विधायकों के पीए के वेतन में भी इजाफा कर दिया गया। मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों ने भी अपनी तनख्वाहें और सुविधाए दुगनी-तिगुनी करवा लीं। सत्ताधीश मानते हैं जनता को महंगाई से कोई फर्क नहीं पडता। वह बदहाली की अभ्यस्त हो चुकी है। इससे पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार भी विधायकों और मंत्रियों की तनख्वाहों और सुख-सुविधाओं में अभूतपूर्व इजाफा कर अपनी दरिया-दिली दिखा चुकी है। उत्तरप्रदेश में भी यही खेल खेला गया। यह भी काबिलेगौर है कि अपने देश में अधिकांश विधायक और सांसद करोडपति हैं। कईयों के तो अरबों, खरबों के उद्योगधंधे चलते हैं। यानी वे सत्ताधारी भी हैं और व्यापारी भी। देश इन्हीं के हाथों का खिलौना बन कर रह गया है। यह धरती माता का मनमाना दोहन कर रहे हैं। जब शोषक ही सत्ता पर काबिज हों और भ्रष्टाचारी नौकरशाही के हाथों में पूरी व्यवस्था हो तो देश में बदलाव की उम्मीद बेमानी है। फिर भी बदलाव के सपने देखे जा रहे हैं। जनता के खून पसीने की कमाई ऐशो-आराम में लुटायी जा रही हैं। गरीबों का हक छीनकर अमीरों को और अधिक ताकतवर बनाया जा रहा है। यकीनन आजादी के बाद यही तो हो रहा हैं...। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की भी लाटरी खुल चुकी है। बस बेचारा आम आदमी वहीं का वहीं है। उसकी कोई सुनने वाला नहीं है।

Thursday, August 4, 2016

खौफनाक सच

उत्तरप्रदेश का बुलंदशहर। २९ जुलाई २०१६। शुक्रवार की रात। राष्ट्रीय राजमार्ग पर कार सवार परिवार को बंधक बनाकर मां-बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म की रोंगटे खडे कर देने वाली घटना ने यह दर्शा दिया कि हमारे समाज में आज भी ऐसे वहशी दरिंदे बेखौफ विचरण कर रहे हैं जिनके लिए मां-बहनों की अस्मत कोई मायने नहीं रखती। जिला शाहजहांपुर के एक गांव निवासी दो भाई राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में परिवार सहित रहते हैं। कुछ दिन पूर्व ही बीमारी के चलते उनकी मां का देहांत हो गया था। उनकी तेरहवीं में शरीक होने के लिए वे परिवार सहित शाहजहांपुर के लिए रवाना हुए थे। बुलंदशहर से दो किलोमीटर पहले कार पर पत्थर आकर लगा, लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। करीब २०० मीटर आगे जाने पर फिर से कार के सामने कुछ फेंकने से बहुत जोर की आवाज आयी तो उन्होंने कार रोक दी। वे कार से नीचे उतरकर देख ही रहे थे कि आधा दर्जन बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। अपराधी पूरे परिवार को गन प्वाइंट पर लेकर कार को फ्लाई ओवर के नीचे ले गये। तीनों पुरुषों को उतारकर बंधक बना लिया। दोनों महिलाओं व लडकी को कार सहित हाइवे के नीचे संपर्क मार्ग पर ले जाया गया और मां-बेटी के साथ एक के बाद एक बदमाशों ने दुष्कर्म किया। पूरा परिवार तीन घंटे तक बंधक बना रहा। बदमाश तडके करीब तीन बजे नगदी, चेन, अंगूठी आदि लूटकर भाग गए। वे जब मां-बेटी से जबरदस्ती का प्रयास कर रहे थे तब पिता ने उनका पुरजोर विरोध किया। जिस पर तीन बदमाशों ने उन्हें और उनके भतीजे को सरियों से इस कदर पीटा कि वे लहूलुहान हो गये। मां के सामने बेटी और बेटी के सामने मां की अस्मत लूटकर दरिंदो ने इंसानियत का कत्ल कर दिया। १०० मीटर की दूरी पर बंधक बनाये गये पिता के सामने पत्नी और बेटी का बलात्कार हो रहा था और वे बेबस थे। बदमाश तीन घण्टे तक मनमानी और दरिंदगी करते रहे, लेकिन पुलिस का सायरन और हूटर एक बार भी नहीं बजा।  बदमाशों ने हथियारों के बल पर पूरे परिवार को बेबस कर दिया था। दो बदमाश बंदूक की नोक पर मां और बिटिया को दुष्कर्म का शिकार बनाने के लिए ले जाने लगे तब मार्शल आर्ट सीखी बिटिया ने दरिंदों का आधे घण्टे तक जमकर सामना किया। जब हैवानों ने देखा कि उसे नियंत्रित करना आसान नहीं है तो उन्होंने पूरे परिवार को गोलियों से भून डालने की धमकी देकर उसे समर्पण करने को विवश कर दिया। कुकर्मी लुटेरों के भागने के बाद पीडितों ने मोबाइल से १०० नम्बर पर कॉल किया मगर फोन नहीं उठाया गया। करीब पौन घंटे तक फोन नहीं उठने पर एक पत्रकार दोस्त को कॉल कर घटना से अवगत कराया गया। पत्रकार ने बुलंदशहर के एसीपी को कॉल किया तो कुछ देर के बाद वे फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे और जांच शुरू की। पूरा परिवार बेहद सदमे में था। पुलिस को आपबीती का बयान करते समय मां-बेटी कांप रही थीं। उनकी जुबान ही नहीं खुल पा रही थी। बलात्कारी शैतानों की हैवानियत का शिकार हुई बेटी और पत्नी के बारे में बताते-बताते पिता सुबक-सुबक कर रोने लगे। उन्होंने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, 'बदमाशों ने जो किया, उससे ज्यादा खौफनाक कुछ हो ही नहीं सकता। अब तो दिल करता है कि पूरे परिवार के साथ जहर खा लूं।' यकीनन बदमाशों की कोई जात नहीं होती। बदमाश तो बदमाश होते हैं। लेकिन यह तो तय है कि इस देश की पुलिस और कानून व्यवस्था की शर्मनाक स्थिति का नतीजा है यह घटना। खाकी की निष्क्रियता के चलते अपराधियों में किसी किस्म का खौफ नहीं रहा। जब राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलिस की मुस्तैदी का यह हाल है तो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों का तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। तभी तो अपना शिकार फांसने में माहिर लुटेरे और वासना के खिलाडी हमेशा यही मानकर चलते हैं कि उनकी मनमानी हमेशा ऐसे ही चलती रहेगी। कोई उनका कुछ भी नहीं बिगाड पायेगा।
बुलंदशहर काण्ड के महज पांच दिन बाद बरेली में दिल्ली हाईवे के किनारे एक निजी स्कूल की शिक्षिका को तीन दरिंदो ने अगवा कर अपनी अंधी वासना का शिकार बना डाला। शिक्षिका १९ वर्षीय युवती है जो अपने घर से सुबह सात बजे स्कूल के लिए निकली थी। रास्ते में वैन सवार तीन युवकों ने उसे रोका और मुंह पर हाथ रखकर वैन में डाल दिया। वहां से वे उसे लखनऊ दिल्ली हाइवे के निकट स्थित एक खेत में ले गए। वैन में ही शिक्षिका की अस्मत तार-तार कर दी गयी। उसके कपडे भी फाड दिए गये। इसी दौरान उसके फोटो भी खींचे गये। यह धमकी भी दी गयी यदि किसी को घटना के बारे में बताया तो तस्वीरें इंटरनेट में डाल दी जाएंगी।
दिल्ली में रहने वाले स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अवकाश प्राप्त अधिकारी विजय कुमार ने नौकरी का झांसा देकर एक युवती को फांसा और फिर कई बार अपनी वासना की आग बुझायी। युवती का कहना है कि वह मजबूर थी? इसलिये चुप्पी साधे रही! एक बार तो उम्रदराज विजय कुमार ने हद ही कर दी। उसने अपने दो दोस्तो को अपने घर में आमंत्रित किया और युवती का सामूहिक बलात्कार किया गया। इस शर्मनाक कुकृत्य की फिल्म भी बना ली गयी। लडकी शादीशुदा है। विजय कुमार के जब-तब फोन करने के कारण उसके पति को शक होने लगा था। नौकरी पाने के चक्कर में अपनी अस्मत लुटा चुकी युवती निरंतर ब्लैकमेल हो रही थी! उस दिन विजय कुमार ने फिल्म और सीडी देने उसे अपने फ्लैट पर बुलाया था। युवती भी किसी अंतिम निर्णय पर पहुंच चुकी थी। जब विजय कुमार ने सीडी देने के बजाय उससे जबरदस्ती करने की कोशिश की तो उसका सब्र जवाब दे गया। उसने रसोई से चाकू उठाया और अय्याश विजयकुमार पर इतने वार किये कि उसका काम तमाम हो गया। लेखक के मन में कुछ सवाल गूंज रहे हैं। बुलंदशहर के सामूहिक बलात्कार काण्ड पर किसी को भी संशय नहीं हो सकता। देश का हर नागरीक चाहता है कि बलात्कारियों को मौत की सज़ा से कम सज़ा तो मिलनी ही नहीं चाहिए। लेकिन राजधानी दिल्ली की तथाकथित बेबस युवती पर हुआ अनाचार कई सवालों के घेरे में दबोच लेता है। युवती ने नौकरी के लालच में अधेड अय्याश के समक्ष खुद को परोस कर कोई अच्छा उदाहरण पेश नहीं किया है। युवती को अपने नैतिक साहस की कमी की वजह से ही दुराचारी के दुराचार का शिकार होना पडा। ऐसे में उसके प्रति सहानुभूति दर्शाना बेमानी लगता है। अगर वह चाहती तो शुरुआत में ही डटकर प्रतिकार कर सकती थी। पर उसने ऐसा नहीं किया! ऐसे में जिस्म के भूखे भेडिये की तरह युवती भी कसूरवार तो है ही...।