Thursday, October 27, 2016

राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र

बात निकलती है तो दूर तक जाती ही है। फिर भी इस हकीकत को नजरअंदाज कर नामी लोग सनसनी फैलाते रहते हैं। वैसे भी इन दिनों देश में गजब की तमाशेबाजी चल रही है। इस खेल में नेता भी शामिल हैं और अभिनेता भी। फिल्म अभिनेता ओमपुरी एक जाने-माने फिल्मी कलाकार हैं। कोई जमीन से जुडा कलाकार ऐसा विवादास्पद बयान नहीं देता जो ओमपुरी ने देकर तमाम भारतीयों का सर शर्म से झुका दिया। उन्होंने बारामूला में शहीद हुए सैनिक नितिन यादव की शहादत का मजाक उडाते हुए कहा कि हमने किसी जवान पर कभी यह दबाव तो नहीं डाला कि वह सेना में जाए और बंदूक उठाए। सैनिकों की शहादत को कटघरे में करते-करते अभिनेता ने सवाल कर डाला कि 'क्या देश में १५-२० लोग ऐसे हैं जिन्हें बम बांधकर पाकिस्तान भेजा जा सके? किसी को जबरदस्ती तो फौज में नहीं भेजा जाता।' ओमपुरी ने खून खौलाने वाले बोल उगल कर पूरे देश में अपनी खूब थू...थू करवायी। न्यूज चैनलों पर भी उनकी खिल्ली उडायी गयी। उनकी अक्ल जब ठिकाने आयी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनकी हिम्मत को दाद देनी पडेगी। जब उन्हें लगा कि देशवासी उन्हें माफ करने को तैयार नहीं हैं तो वे एलओसी में शहीद हुए जवान नितिन यादव के घर इटावा जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने शहीद को न सिर्फ श्रद्धांजलि दी, बल्कि अपने शर्मनाक बयान पर शहीद के माता-पिता के चरणों में गिरकर माफी भी मांगी। इस दौरान फूट-फूट कर रोते हुए उन्होंने कहा कि उनके मुंह से सैनिकों के लिए गलत बात निकल गई थी। श्रद्धांजलि देने के बाद उन्होंने शहीद के घर में हवन करने की इच्छा जतायी। उनका मान रखते हुए घर में हवन की व्यवस्था की गयी जिसमें एक पंडित ने मंत्रोच्चारण किया और अभिनेता समेत पिता एवं अन्य लोगों ने हवनकुंड में आहुतियां डालीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए पाकिस्तान तथा सारी दुनिया को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत सीमा पर आतंकवाद को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देशवासियों में भी अभूतपूर्व उत्साह और जागरूकता दिखायी दी। सर्जिकल स्ट्राइक पर अविश्वास करने वालों को लगभग अनदेखा कर दिया गया। यह भी लोगों की सचेतना का ही परिणाम है कि ऐसी फिल्मों पर निशाना साधा गया जिनमें पाकिस्तानी कलाकारों को काम दिया गया। कई लोगों का यही मत सामने आया कि दुश्मन देश पाकिस्तान के कलाकारों को हिन्दुस्तानी फिल्मों में काम करने की इजाजत देकर देश के लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड नहीं किया जाना चाहिए। कुछ लोगों को पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध रास नहीं आया। उनका मत है कि कला और कलाकार पुल का काम करते हैं, एक दूसरे को करीब लाते हैं। कलाकारों की कोई सरहद नहीं होती। सीमा की लडाई में कलाकारों को घसीटना ठीक नहीं है। लोकतंत्र में मान और मर्यादा के साथ सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है। यही तो हमारे लोकतंत्र की खासियत है। समर्थन और विरोध करने की खुली छूट है। लेकिन कुछ लोग लोकतंत्र को ठोकतंत्र और रोषतंत्र बनाने पर तुले हैं। भारतीय फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकारों के अभिनय करने को लेकर जब विवाद ने बहुत ज्यादा जोर पकडा तो कुछ नेताओं की राष्ट्रभक्ति ने बहुत ज्यादा  जोर मारना शुरु कर दिया। जिन फिल्म निर्माताओं की फिल्मों में पाकिस्तान के कलाकारों ने अभिनय किया उन्हें अपने-अपने तरीके से धमकाया और चेताया गया। सबसे ज्यादा मुश्किल हुई करण जौहर की फिल्म 'ए दिल है मुश्किल' के साथ।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमों राज ठाकरे घोषणा कर दी कि उनकी फिल्म को किसी भी हालत में प्रदर्शित नहीं होने दिया जायेगा। जो पाकिस्तान भारत का कट्टर शत्रु है उसके यहां के कलाकारों की फिल्में भारत में दिखायी जाएं, हमें कतई मंजूर नहीं। जो फिल्म निर्माता दुश्मन देश के फिल्मी कलाकारों को करोडों की फीस देकर अपनी फिल्मों में अभिनय कराते हैं वे भी बख्शने के लायक नहीं हैं। उनका यह कृत्य राष्ट्रद्रोह है। करण जोहर के तो पसीने ही छूट गये। राज ठाकरे को मनाने के लिए उन्होंने हर उस चौखट पर शीश नवाया जो उन्हें इस मुश्किल से निजात दिला सकती थी। आखिरकार मामला प्रदेश के मुख्यमंत्री के दरबार तक जा पहुंचा। मुख्यमंत्री भी जैसे मध्यस्थता करने को तैयार बैठे थे। जिस गंभीर मसले की आसानी से नहीं सुलझने की उम्मीद की जा रही थी वह घण्टे भर में ही सुलझ गया! दरअसल, यह समझौता नहीं डील थी, जिसने राजनेताओं और सत्ताधीशों के काम करने के तौर-तरीकों को उजागर कर दिया। मनसे प्रमुख ने तीन शर्तें पूरी करने पर ही पाकिस्तानी कलाकारों वाली सभी फिल्मों के प्रदर्शन में रोडा नहीं अटकाने की बात मानी। पहली शर्त थी : जिन निर्माताओं ने पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर फिल्में बनायी हैं उन्हें आर्मी रिलीफ फंड में पांच करोड रुपये देने होंगे। दूसरी शर्त थी : पाक कलाकारों वाली फिल्म की शुरुआत में सेना और शहीद सैनिकों के प्रति सम्मान जताने वाला संदेश देना होगा। कोई भी फिल्म निर्माता आगे से पाक कलाकारों को फिल्मों में काम नहीं देगा। यकीनन तीनों शर्तें, शर्तें कम चेतावनी ज्यादा हैं। यह चेतावनी किसी को भी दहशत के हवाले करने में सक्षम है। इस समझौते की खबर के मीडिया में छाते ही मुख्यमंत्री पर भी सवाल दागे जाने लगे कि आखिर उन्होंने बिचौलिए की भूमिका क्यों निभायी? सेना फंड के लिए किसी से भी भीख मांगने नहीं जाती। सेना को जबरन वसूली का मोहरा बनाने वाले यह कैसे भूल गये कि आर्मी वेलफेयर फंड में डोनेशन के लिए किसी को विवश करना सैनिकों का अपमान है। सैनिक तो देश के सच्चे सपूत हैं। भारत मां के कलेजे के टुकडे हैं। भारतीय वीरों की कुर्बानी का लंबा स्वर्णिम इतिहास है। यह इतिहास अनमोल है। जो लोग सैनिकों के सम्मान की बोली लगाने से नहीं हिचकते उनके लिए यकीनन धन ही सबकुछ है। धन से गलत भी सही हो जाता है। इस सोच ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है। जिन नेताओं के हाथों में इस विशाल देश की बागडोर है उन्होंने पता नहीं क्यों असली समस्याओं को नजरअंदाज करने की आदत बना ली है। देश अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है। भुखमरी व कुपोषण के चलते बच्चों की मौतों के आंकडे बढते चले जा रहे हैं। आज भी १९.४ करोड लोग भुखमरी का शिकार हैं। आम आदमी की मूलभूत समस्याएं हैं रोटी, कपडा और मकान। पहले इनका हल होना जरूरी है, लेकिन राजनीति और राजनेता भटकाने के काम में लगे हैं। उत्तरप्रदेश में कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं और राम नाम की लूट मच चुकी है। अभिनेता ने तो अपनी गलती का प्रायश्चित कर लिया, लेकिन इन नेताओं की बिरादरी का क्या... जो जोडना छोड तोडने और बांटने में लगी रहती है। गजलकार अदम गोंडवी की यह पंक्तियां काबिलेगौर हैं :
"हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये
अपनी कुरसी के लिए ज़ज्बात को मत छेडिये
हममें कोई हूण, कोई शक कोई मंगोल है
दफन है जो बात, अब उस बात को मत छेडिये
ग़र गलतियां बाबर की थीं, जुम्मन का घर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेडिये
है कहां हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खां
मिट गये सब, कौम की औकात को मत छेडिये
छेडिये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेडिये।"
'राष्ट्र पत्रिका' के सभी सजग पाठकों, लेखकों, संवाददाताओं, एजेंट बंधुओं, शुभचिंतकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, October 20, 2016

जंग की तैयारी

देश की राजधानी दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं है मेरठ शहर। इसी बुलंद शहर में एक युवती अपने पति के साथ बाइक पर बाजार में सब्जी खरीदने जा रही थी। रविवार का दिन था। सडक पर अच्छी-खासी चहल-पहल थी। दोनों की नयी-नयी शादी हुई थी। रास्ते में दो बाइक सवार युवकों ने सजी-धजी युवती को देखते ही फब्तियां कसनी शुरू कर दीं। पति ने देखकर भी अनदेखा कर दिया। सडक छाप मजनूओं का हौसला ब‹ढ गया। वे अभद्रता पर उतर आये। पति ने बाइक की रफ्तार धीमी कर दी और उन्हें डांटा-फटकारा। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर युवकों ने दादागिरी करते हुए उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। पति-पत्नी बाइक समेत सडक पर गिर पडे। पति के माथे से खून बहने लगा। उसने एक युवक का कालर पकडा तो दोनों युवकों ने उसकी अंधाधुंध पिटायी शुरु कर दी। आते-जाते लोग तमाशबीन बने रहे। वहां पर मौजूद दो पुलिस जवान भी चुपके से खिसकते बने। पति को पिटता देख युवती का खून खौल उठा। वह घायल शेरनी की तरह युवकों पर टूट पडी। उसने अपनी सैंडिल निकाली और धडाधड उनके माथे और सिर पर वार करने लगी। अंधाधुंध पिटायी से लहुलूहान युवकों ने वहां से भागने में ही अपनी भलाई समझी। मेरठ की इस खबर की तस्वीर अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि महाराष्ट्र के नारंगी शहर नागपुर की विचलित करने वाली खबरों ने हिलाने के साथ-साथ आश्वस्त भी किया कि नारी शक्ति अब संकोच और दकियानूसी सोच की दीवारों को लांघने और तोडने के लिए कमर कस चुकी है। संतरों की स्वास्थ्यवर्धक मिठास वाले शहर में एक मां को दो बेटियों को जन्म देने के कारण आधी रात को घर से निकाल दिया गया। भावना नामक महिला ने पुलिस स्टेशन में पहुंचकर अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उसने अंतरजातीय शादी की है। शादी के बाद पहली पुत्री पैदा हुई। पति तथा समस्त परिवार वालों को पुत्र की चाहत थी। ऐसे में जब उसने दूसरी बार भी बेटी को जन्म दिया तो उस पर प्रता‹डना का दौर शुरू हो गया। महिला का कहना है कि पति के साथ-साथ उसके ससुर ने भी अमानवीय व्यवहार किया। उस पर मायके से ५० हजार रुपये लाने के लिए दबाव डाला गया। यहां तक कि छोटी बच्ची को भी कई मारा-पीटा गया। पडोसियों ने अगर बीच-बचाव नहीं किया होता तो पति अब तक मेरी जान तक ले चुके होते। असहाय समझकर निर्दयी ससुराल वालों ने मुझे आधी रात को घर से बाहर कर दिया। उसके बाद मैंने अपने पिता को बुलवाया और नागपुर छोडकर अपने मायके बालोद (छत्तीसगढ) चली गई।
नागपुर की एक बारह वर्षीय बेटी एक दुष्कर्मी युवक की हवस की शिकार हो गयी। २० जुलाई २०१६ की रात ९ बजे वह कराटे का प्रशिक्षण लेकर अपने घर जा रही थी। रास्ते में उसे एक परिचित युवक मिला। वह उसे जबरन समीप स्थित एक खंडहरनुमा कर्मचारी क्वार्टर में ले गया। वहां पर उसने डरा-धमका कर यौन शोषण किया और फरार हो गया। माता-पिता को जैसे ही बेटी के साथ दुराचार होने की खबर मिली तो उनका मन-मस्तिष्क और आत्मा कराह उठी। किसी भी माता-पिता के लिए इससे ब‹डा दर्द और जख्म और कोई नहीं हो सकता। जिसने भी बालिका के साथ हुए दुराचार के बारे में सुना उसका खून खौल उठा। सभी ने दुष्कर्मी को मौत के घाट उतारने की मांग की। यह बालिका कराटे के प्रति पूरी तरह समर्पित है। कराटे ही उसका जुनून है। उसके साथ जब यह घिनौनी हरकत हुई तो वह कुछ दिनों बाद होने वाली कराटे की राष्ट्रीय स्पर्धा की तैयारी में तल्लीन थी। घरवालों ने मान लिया कि बेटी का भविष्य अंधेरे के हवाले हो गया है। सब कुछ लुट गया है। लेकिन बच्ची ने खुद को संभाल लिया। जब उसके कोच ने बच्ची से कहा कि इस साल तुम आराम करो, अगले साल खेलेंगे, तब बच्ची ने कहा कि सर ऐसा कभी हो नहीं सकता कि इस साल मैं न खेलूं। अगर आप साथ नहीं देंगे तो मैं अकेले खेलने जाऊंगी। यह बहादुर बेटी भले ही बदनामी के भय और पी‹डा के चलते घर में रोती-बिलखती रही, लेकिन चौथे दिन उसने यह निश्चय कर लिया कि किसी भी हालत में कुछ दिनों बाद होने वाली राष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लेकर जीत हासिल करनी ही है। उसने पसीना बहाने में दिन-रात एक कर दिया और घटना के दसवें दिन राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतकर यह बता दिया कि भारतीय बेटियां किस मिट्टी की बनी हैं। इसके पश्चात वह विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए दक्षिण अफ्रीका रवाना हो गई। इस बेटी का यही कहना था कि मैं सबकुछ भूलना चाहती हूं। केवल यही याद रखना है कि मुझे हर हाल में विजयी होना है। मुझे किसी भी हालत में अपने सपने पूरे करने हैं। अपनी शिष्या के ल‹डाकू तेवर देखकर कोच ने कहा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा ज़ज्बा नहीं देखा। यह लडकी सदैव जीत की बात करती है। खेल के मैदान में प्रशिक्षण के दौरान उसका व्यवहार ऐसा रहता है मानो वह किसी जंग की तैयारी कर रही हो।
असीम आत्मबल, आत्मविश्वास और जागृति का ही परिणाम है कि कई भारतीय नारियां घुट-घुट कर मरने की बजाय अपने अधिकारों के लिए मर-मिटने से नहीं घबरातीं। फिर भी यही सच है कि इस देश में नारी आज भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। इतनी बडी संख्या में बलात्कार, दहेज प्रताडना, एसिड अटैक और आनरकिqलग की शर्मनाक खबरें असली सच बयां कर देती हैं। यह हकीकत भी बेहद परेशान करने वाली है कि दुष्कर्म की अधिकांश घटनाएं दलित, गरीब और पिछ‹डे वर्ग की महिलाओं के साथ ही हो रही हैं। यह जानकर भी बेहद ताज्जुब होता है कि बेटियों की तुलना में बेटों को बेहतर मानने वालों में सम्पन्न और प‹ढे-लिखे लोग भी शामिल हैं। तामिलनाडु की मशहूर अभिनेत्री खुशबू लिखती हैं : 'मैं जब पैदा हुई तो अस्पताल में मुझे देखने के लिए पिता नहीं आए क्योंकि मैं कन्या थी। यह तब हुआ जब मैं तीन भाइयों के बाद पैदा हुई थी। इस देश में महिलाओं के लिए सम्मान क्यों नहीं है? उन्हें उपेक्षा की नजरों से क्यों देखा जाता है? पुरुष का मन होता है तो कभी उन्हें लक्ष्मी, कभी सरस्वती और कभी शक्ति का अवतार बता देता है...'
यह लोगों के न सुधरने का ही परिणाम है कि देश में सख्त दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद दहेज लोभी बहुओं को आतंकित करने से बाज नहीं आते। यह भी अत्यंत चिंतनीय बात है कि ल‹डकियां अपने परिजनों के द्वारा ही ज्यादा शोषित और प्रताडित की जाती हैं। आंक‹डे बताते हैं कि नब्बे प्रतिशत बलात्कार परिचितों के द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। गर्भ में लडकी को उसके परिवार वाले ही मारते हैं ल‹डके की चाहत में यदि लडकी हो जाए तो कूडे के ढेर के हवाले करने और कुत्तों से नुचवाने जैसी क्रूरता करने से भी बाज नहीं आते। बलात्कारियों के होश ठिकाने लगाने के लिए जो नया कानून बनाया गया है उसके अनुसार न्यूनतम सात वर्ष और अधिकतम उम्रकैद की सजा हो सकती है। फिर भी बलात्कार हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे। कानून के रखवाले अपना कर्तव्य किस तरह से निभाते हैं उसका पता मेरठ की घटना से चल जाता है। यदि वहां पर मौजूद खाकीवर्दी वाले घटनास्थल से भाग खडे होने के बजाय गुंडों पर डंडे बरसाते तो पुलिस की छवि कलंकित नहीं होती। उसके प्रति विश्वास जागता। अदालत के फैसलों में होने वाली देरी भी अराजकतत्वों का मनोबल बढाती है। जब तक समाज के लोग जागृत नहीं होंगे, अपराधों में कमी नहीं आएगी। तमाशबीन बने रहना भी अपने कर्तव्यों से भागना है और इस भयावह सच से मुंह मोडना है कि कल को हमारे घर की बहन-बेटियों पर भी शैतानों की गाज गिर सकती है। तब हम किसी को कोसने के भी अधिकारी नहीं होंगे।

Thursday, October 13, 2016

धूर्त और मौकापरस्त नेता

"मेरे पांव के छालों जरा
लहू उगलो... सिरफिरे
मुझसे सफर के निशान मांगेंगे!!"
जिसने भी यह पंक्तियां लिखी हैं उसके दर्द को समझा जा सकता है। वैसे इन शब्दों में देश के हर सैनिक की पीडा छिपी है। वाकई बडा शर्मनाक दौर है यह। सैनिकों की शहादत पर राजनीति करने वाले नेताओं को तो डूब मरना चाहिए। पर यह मोटी चमडी वाले इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि इन्हें शहीदों का अपमान और उन्हें कठघरे में खडा करने में भी लज्जा नहीं आती। इन्हें हमेशा अपने चुनावी फायदे की चिन्ता रहती है। यकीनन यह निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बनते-बनते चूक गए। शायद इसी पीडा ने उन्हें बेहद मुंहफट बना दिया है। कुछ लोग इसे आक्रमकता कहते हैं, जो हर नेता में होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी आक्रमकता किस काम की जो आपको शर्मिन्दा होने को विवश कर दे। कहते हैं कि नेताओं की चमडी बहुत मोटी होती है। उन पर लोग स्याही फेंके, जूते-चप्पलें चलाएं, गंदी-गंदी गालियों से नवाजें, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। राजनीति में प्रवेश करने से पहले उन्हें यही घुट्टी पिलायी जाती है कि विरोधी दल के नेताओं की ऐसी-तैसी करने में कोई कमी नहीं करना। सत्ता पानी है तो आकाश पर भी थूकते रहना। भले ही थूक वापस खुद पर ही आकर क्यों न गिरे।
पाक अधिकृत कश्मीर में २९ सितंबर २०१६ को आतंकी शिविरों में सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर राहुल गांधी ने जब यह कहा कि जवानों ने अपना खून दिया और आप (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) शहीदों के खून की दलाली कर रहे हैं... तो देश के अधिकांश सजग देशवासी हतप्रभ रह गये। उन्होंने खुदा का शुक्र माना कि अच्छा हुआ कि यह गांधी-नेहरू परिवार का चिराग देश का प्रधानमंत्री नहीं बना। इनका तो अपनी जुबान पर भी नियंत्रण नहीं। वैसे सर्जिकल स्ट्राइक के और भी कई नेताओं ने सबूत मांग कर अपनी खिल्ली उडवायी और सजग देशवासियों का गुस्सा झेला। कभी शिवसेना में उछलकूद मचाने वाले कांग्रेस के नेता संजय निरुपम ने भी सर्जिकल स्ट्राइक को नितांत फर्जी बता कर अपनी राजनीति की दुकानदारी चमकाने की भरपूर कोशिश की। लेकिन सोशल मीडिया पर उन्हे इतना लताडा गया की नानी याद आ गयी और मुंह छिपाने की नौबत आ गयी। गैंगस्टर रवि पुजारी ने भी उन्हें सोच समझ कर बोलने और माफी न मांगने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे डाली। संजय तो नेता हैं इसलिए अंदर से भयभीत होने के बावजूद उन्होंने अपनी मोटी चमडी की चमक कम नहीं होने दी। लेकिन उनकी धर्म पत्नी इतनी घबरायीं कि उन्होंने प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा कि वह भारत में खुद को बेहद असुरक्षित महसूस कर रही हैं। उन्हें और उनके परिवार को न केवल सोशल मीडिया पर गालियां दी जा रही हैं बल्कि फोन करके उनके खिलाफ अश्लील टिप्पणी भी की जा रही हैं। हमारा परिवार बहुत खौफ में जी रहा है। हमें सुरक्षा प्रदान की जाए। परेशानी यह है कि सत्ता के भूखे इस देश के अधिकांश नेताओं को बयान के गोले दागने की बहुत जल्दी रहती है। मीडिया में छाने के लिए कौन पहले विष उगलता है इसकी भी प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। राहुल गांधी से पहले आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक का प्रूफ मांगकर अपनी जमकर किरकिरी करवायी। राहुल गांधी और अरविंद जैसे तमाम नेताओं के सैनिकों की शहादत पर सवाल खडे किये जाने से आम लोगो को बहुत चोट पहुंची। सबकी समझ में यह सच आ गया कि सत्ता के भूखे नेताओं का कोई ईमान-धर्म नहीं है। सजग लेखकों और कवियों ने भी ऐसे नेताओं पर शब्दवार कर अपनी भडास निकाली। कवि पंकज अंगार की कविता की यह पंक्तियां तो सोशल मीडिया में छा गयीं :
 फिर सेना के स्वाभिमान पर
जयचंदों ने वार किया।
राजनीति ने फिर बलिदानी
पौरुष को धिक्कार दिया।
कायरता की भाषा बोली
वोट के ठेकेदारों ने
कुर्बानी को खेल बताया
कुछ ओछे किरदारों ने।
जिस तरह से भारत के बहादुर सैनिकों ने पाकिस्तान के घर में घुसकर सात आतंकी कैम्पों को ध्वस्त कर ३० से ३५ आतंकियों को ढेर करने के साथ-साथ सात सैनिकों को मार गिराया उससे तो हर देशवासी को सैनिकों की जय-जयकार करनी चाहिए थी। लेकिन घटिया मनोवृति के कुछ नेता यहां भी राजनीति करने से बाज नहीं आए! एक-दूसरे के कपडे उतारने पर तुल गये। सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जगजाहिर नहीं करने को लेकर सरकार पर उंगलियां उठाने वालों ने पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल शंकर राय चौधरी के बयान को ही नजरअंदाज कर यह दर्शा दिया कि उन्हें किसी भी हालत में नरेंद्र मोदी का विरोध करते रहना है। श्री चौधरी के कथनानुसार यह वीडियो पाकिस्तान की सेना और उनकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए अनमोल खजाना है। विरोधी दलों के नेता चाहे कितना भी शोर मचाएं, लेकिन हिन्दुस्तान की सरकार को इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। दुनिया की कोई भी फौज ऐसी भूल नहीं करती। जो लोग सर्जिकल स्ट्राइक पर शंका कर रहे हैं उनके दिमाग का दिवाला निकल चुका है। वे परले दर्जे के धूर्त भी हैं और मौकापरस्त भी।

Thursday, October 6, 2016

अंधभक्तों का तमाशा

महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल का नाम प्रदेश और देश के चतुर और दबंग नेताओ में शुमार रहा है। मुंबई के फुटपाथ पर आलू-प्याज बेचते-बेचते उनके मन में नेता बनने का ख्याल आया और वे राजनीति में कूद पडे। उन दिनों राजनीति के मैदान में सपने बेचने वाले नये नेताओं के लिए काफी गुंजाइश थी। दलितों और शोषितों के उद्धार के नारे लगाकर छगन ने सबसे पहले शिवसेना का दामन थामा। तब मुंबई में शिवसेना का सिक्का चलता था। शिवसेना सुप्रीमों बालासाहेब ठाकरे की एक दहाड पर गुंडे-बदमाशों की घिग्गी बंध जाती थी। बडे-बडे माफिया उनकी चौखट पर मस्तक झुकाते थे। भुजबल ने शिवसेना में रहकर राजनीति के सभी गुर सीखे और कमायी के रास्तों की खोज कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी। जब शिवसेना की नैय्या डूबने लगी तो शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। पवार ने भी दबे-कुचले लोगों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने वाले इस मजबूत कद-काठी वाले नेता को हाथों-हाथ लिया। जब महाराष्ट्र में कांग्रेस, राकां गठबंधन की सरकार बनी तो भुजबल की निकल पडी। उन्हें महाराष्ट्र का उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री बनने का सौभाग्य हासिल हो गया। उन्होंने अपने मंसूबों को पूरा करने के लिए रात-दिन एक कर दिया। मालामाल होने के लिए सभी तरह के हथकंडे आजमाने शुरू कर दिये। उन्हीं के कार्यकाल में तेलगी का अरबों-खरबों रुपयों का स्टैम्प घोटाला सामने आया। यह भी रहस्योद्घाटन हुआ कि इस 'क्रांतिकारी नेता' के नकली स्टाम्प घोटाला के नायक से बेहद करीबी रिश्ते हैं। तेलगी को तो जेल भेज दिया गया, लेकिन भुजबल पर कोई आंच नहीं आयी। वे भ्रष्टाचार की सभी हदें पार करते चले गये। मुंबई, पुणे, ठाणे नासिक में करोडों की जमीने, बंगले, फार्म हाऊस बनते चले गए। कई उद्योगधंधे शुरू हो गए। आयात-निर्यात के कारोबार में भी पांव पसार लिए। अपने भाई-भतीजों, रिश्तेदारों, यार-दोस्तों के नाम से सरकारी ठेके लेने के लिए हर मर्यादा को ताक पर रख दिया गया। मीडिया में उनके भ्रष्टाचार की खबरें छपती रहीं, लेकिन अपनी सरकार होने के कारण उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। प्रदेश की नयी सरकार ने जब अपना शिकंजा कसा तो पूरी दुनिया जान गयी कि छगन और उसके परिवार के पास हजारों करोड की धन-दौलत है। यह सारी माया सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होने के बाद जुटायी गयी। कोई आंख का अंधा भी समझ सकता है कि छगन कोई धर्मात्मा नहीं है। उसने राजनीति को भ्रष्टाचार का अखाडा बनाकर अपार धन-दौलत के अंबार खडे किये। ऐसे लुटेरे की असली जगह तो जेल ही है। लेकिन उसके अंध भक्त बडे भोले बनकर सवाल करते हैं कि जब दूसरे भ्रष्टाचारी बाहर हैं तो दलितों और शोषितों का यह मसीहा सलाखों के पीछे क्यों सड रहा है? छगन को जेल से छुडाने की मांग को लेकर नाशिक में एक विशाल मोर्चा निकाला गया। मोर्चों में एक लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। जगह-जगह अपने नेता के समर्थन में बैनर और पोस्टर लगाये गये थे। समर्थक बेहद गुस्से में थे। उनका कहना था कि ओबीसी नेता पर सरकार अन्याय कर रही है। यदि उन्हें नहीं छोडा गया तो इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे। वे पूरी तरह से निर्दोष  हैं। उन्हें उन लोगों ने फंसाया है जो उनके राजनीतिक उत्थान से जलते हैं।
राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को भी दोबारा जेल में भेजे जाने से उनके समर्थकों के तन-बदन में आग लग गयी। ऐसा कम ही देखने में आता है कि सरकार में शामिल कोई पार्टी सरकार के खिलाफ ही प्रदर्शन करने पर उतारू हो जाए। बाहुबली, हत्यारे, लुटेरे, आतंकी शहाबुद्दीन के जबरदस्त प्रभाव का ही कमाल कहेंगे कि आरजेडी समर्थकों ने सरकार पर शहाबुद्दीन को एक साजिश के तहत दोबारा जेल भेजने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ नारेबाजी की। शहाबुद्दीन के अंध भक्तों ने मीडिया को भी अपना निशाना बनाया। उनका मानना था कि शहाबुद्दीन के जमानत पर छूटने के बाद जिस तरह से मीडिया ने हो-हल्ला मचाया उनके पुराने इतिहास के पन्ने खोलकर दहशत पैदा की, उससे उन्हें फिर से जेल जाना पडा। अपराधियों के लिए राजनीति वाकई कवच का काम करती है। राजनीति में पदार्पण करने के बाद शातिर से शातिर अपराधी लोगों को भ्रमित करने की कला में पारंगत हो जाते हैं। कब क्या बोलना और बुलवाना है इसका उन्हें पूरा ज्ञान हो जाता है। वे यह भी जानते हैं उनके चहेतों को छोडकर दूसरे उनकी बातों पर यकीन नहीं करते। पटना हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से छूटे शहाबुद्दीन का जिस तरह से आदर सत्कार किया गया उससे उसने खुद को बहुत बडा नेता मान लिया। बदनामी और लोकप्रियता के अंतर को वह समझ ही नहीं पाया। सच तो यह है  कि राजनीति में पैठ जमाने वाले अपराधियों के हौंसले बुलंद करने की बहुत बडी वजह होते हैं उनके वे अंधभक्त जो हर वक्त पलक पावडे बिछाने को तत्पर रहते हैं और किसी भी हालत में उनका साथ नहीं छोडते। शहाबुद्दीन जितने दिन भी बाहर रहा, उसके घर मेला-सा लगा रहा। सैकडों लोग उसके इर्द-गिर्द बने रहे। भ्रष्टाचारियों के सरगना लालू प्रसाद यादव को अपना एकमात्र नेता मानने वाला शहाबुद्दीन भी यही कहता है कि मीडिया ने मुझे बेवजह बदनाम कर दिया है। मैंने तो एक चिडिया तक नहीं मारी। छगन भुजबल के समर्थकों की तरह उसके समर्थक भी उसे मसीहा ही मानते हैं...।

Thursday, September 29, 2016

तमाशबीन भीड

ऐसा लगता है कि कुछ लोगों ने कभी न सुधरने की कसम खा रखी है। निर्भया कांड के बाद लगा था कि काफी परिवर्तन आयेगा, लेकिन आया नहीं। दिल्ली से सटे गुडगांव में एकतरफा प्रेम में शादी का प्रस्ताव ठुकराये जाने पर प्रेमी ने लडकी पर गोली चला दी। नोएडा में ट्यूशन पढकर घर लौट रही ११ वीं की छात्रा का दो युवकों ने अपहरण कर लिया। कार में उनके साथ एक महिला भी थी। युवकों ने छात्रा को कुछ सुंघाया जिससे वह बेहोश हो गयीं। सुबह होश आने पर उसने खुद को एक मकान में पाया। बाद में आरोपी कार में बैठाकर एनएच-२४ पर फेंक कर चलते बने। हरियाणा के शहर रोहतक में कार में सवार पांच बदमाशों ने तीन बेटियों की मां को घर से अगवा किया और ११ घण्टे तक अपनी हैवानियत का शिकार बनाया। दुष्कर्मियों का इरादा तो महिला को मौत के घाट उतारने का था। बेटियों की परवरिश का हवाला देकर महिला ने दरिंदो से तो मुक्ति पा ली, लेकिन कुछ घण्टों के बाद खुद ही मौत को गले लगा लिया। देश की राजधानी दिल्ली में दिन-दहाडे बीच सडक पर २१ साल की एक युवती को ३४ साल के एक युवक ने बाईस बार कैंची घोंपी। युवती ने भीड के समक्ष दम तोड दिया। हत्यारे का कहना था कि वह युवती से बेइंतहा प्यार करता था। उसकी इच्छा थी कि युवती उसकी पत्नी बने, लेकिन उसने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो उसका खून खौल उठा। वह अपनी प्रेमिका को किसी और की होते नहीं देख सकता था, इसलिए उसकी हत्या कर दी।
देश के विभिन्न नगरों, महानगरों और ग्रामों तक में ऐसी घटनाओं को अंजाम दिये जाने की खबरें आम हो गयी हैं। न जाने कितनी ऐसी और भी वारदातें होती हैं जिनकी खबर हमें नहीं लग पाती। निर्भया कांड के बाद २०१३ में बने कानून के तहत किसी लडकी का पीछा करना अपराध है। मगर एक तो यह जमानती अपराध है। दूसरे इसमें पीडिता की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। कानून की इसी कमजोरी का फायदा उठाते चले आ रहे हैं सिरफिरे प्रेमी और छंटे हुए अपराधी। राह चलती लडकियों को छेडने, स्कूल, कॉलेज, घर में प्रेम पत्र भेजने, दुपट्टा खींचने जैसी कई घटनाओं को बेखौफ अंजाम देकर युवतियों का सुख-चैन छीनना आज के बेलगाम आशिकों का मनपसंद खेल बन गया है। भीड भरी सडकों, गलियों-चौराहों पर जबरन लडकियों का रास्ता रोका जाता है। प्यार का इजहार किया जाता है जैसे जिन्दगी कोई फिल्म हो कोशिश करते रहो, लडकी पट ही जाएगी। आज नहीं तो कल उसे हां कहनी ही पडेगी। ना कहेगी तो उसे सबक भी सिखा देंगे। आजकल यही हो तो रहा है। अब यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि चाहे दिल्ली हो, रोहतक हो, नोएडा हो या फिर देश का कोई भी शहर-कस्बा हो महिलाएं असुरक्षित हैं। पुरुष आज भी महिलाओं को खुद से कमतर समझते हैं। उन्हें अपने विवेक पर चलने वाली नारियों को दबाने और सताने में असीम खुशी हासिल होती है। यह भी तो नहीं माना जा सकता कि सभी पुरुषों एक जैसी मानसिकता वाले होते हैं। फिर ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि महिलाओं पर बर्बरता होते देख संवेदनशील और सभ्य पुरुषों का खून क्यों नहीं खौलता? उनका तमाशबीन बने रहना उनकी संवेदना और मर्दानगी पर सवाल तो खडे करता ही है। यह भी जान लें कि तमाशबीन सिर्फ पुरुष ही नहीं होते, महिलाएं भी होती हैं। इतिहास गवाह है कि खुद महिलाओं ने ही जितना नुकसान, अपमान महिलाओं का किया उतना तो पुरुषों ने भी नहीं किया। यदि स्त्री और पुरुषों की भीड मिलकर किसी दुराचारी हत्यारे को ललकारे तो उसके हौसले ठंडे होने में देरी नहीं लगेगी। हत्यारों, व्याभिचारियों में मनोबल का नितांत अभाव होता है उनमें अपने पांव पर खडे होने की ताकत ही नहीं होती। वे बाहर से शेर और अंदर से गीदड होते हैं। इस सच को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि घर परिवार में युवाओं को मिलने वाली शिक्षा-दीक्षा और वातावरण भी ऐसी घटनाओं के लिए उत्तरदायी है। प्यार में असफल तथाकथित प्रेमियों की हिंसक प्रवृत्तियां सभ्य समाज के मुंह पर तमाचा हैं। आज कुआंरी लडकियां तो निशाने पर है ही शादीशुदा महिलाओं को भी नहीं बख्शा जा रहा है। पहले अंधेरे में अपराध होते थे, अब उजाले में, दिन दहाडे किसी राह चलती लडकी और महिला की आबरू लूट ली जाती है, हत्या कर दी जाती है, लेकिन कोई हलचल नहीं होती। प्रेमी से हत्यारे बने ऐसे नौजवानों से पूछताछ करने वाले कुछ पुलिस अफसर काफी हद तक उनकी मानसिकता को समझने में सफल हुए हैं। दिल्ली के राजौरी गार्डन के अस्पताल की लेडी डॉक्टर पर दो लडकों को रकम का लालच देकर तेजाब डलवाने के आरोप में एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया गया था। उस डॉक्टर की मानसिकता का अध्ययन करने वाले एक पुलिस अधिकारी ने स्पष्ट किया कि ऐसे लोग रिजेक्शन यानी इनकार स्वीकार नहीं कर सकते। यह साइको-एनालिसिस का मामला है। यह लोग अचानक ऐसा भीषण अपराध नहीं करते, बल्कि काफी लंबे वक्त तक सोच विचार करने के बाद जुर्म करते हैं। इन पर आसपास के समाज का भी प्रभाव पडता है। इन नौजवानों के मन में यह बात घर कर जाती है कि लडकी अगर मेरी नहीं हो सकती तो किसी और की भी नहीं हो सकती। कुछ नौजवानों पर जैसे जुनून सवार हो जाता है। उनकी हालत पूरी तरह फियादीन आतंकवादी जैसी होती है। उन्हें आसपास की भीड की भी चिन्ता नहीं रहती। उन्हें यह भी अच्छी तरह से मालूम होता है कि उनकी गिरफ्तारी तय है। भीड से पिटने का भय भी उन्हें नहीं सताता। कई आशिक ऐसे होते हैं जो अकेलेपन का शिकार होते हैं। एकतरफा प्यार करते हैं। सोशल साइटस पर लडकी को फॉलो करते हैं। उन पर नजर रखते हैं ब्लैंक कॉल करते हैं। अनजान लडकी को देर रात फोन करने में उन्हें सुकून मिलता है। थोडी सी जान-पहचान होते ही प्रेमपत्र और उपहार भेजने लगते हैं। मानसिक रूप से बीमार होने के कारण ये इस भ्रम को पालने में देरी नहीं लगाते कि कहीं न कहीं लडकी उनसे प्यार करती है इस तरह के लोगों को समझाना या इनका इलाज करना बहुत मुश्किल होता है। यह लोग शिकार तलाशते रहते हैं और मौका पाते ही यौन उत्पीडन कर आनंदित होते हैं।

Thursday, September 22, 2016

दिमाग के दरवाजे बंद रखने की जिद

डायन, चुडैल, भूतनी, टोनहिन, प्रेतनी कलंकिनी, डाकिन आदि ऐसे दिल और दिमाग को छलनी कर देने वाले शाब्दिक बाण हैं जिनसे गरीब, असहाय, दबी कुचली महिलाओं को अपमानित किया जाता है। उन्हें मनचाही शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में डायन बताकर अब तक कितनी महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया इसका कोई आंकडा दे पाना कतई संभव नहीं है। डायन घोषित की गई महिलाओं के बाल काटने, उनके साथ बलात्कार करने, उनको नंगा करके गांव में घुमाने, उनके जननांगों को क्षति पहुंचाने और मुंडन कर देने के साथ-साथ उन्हें समाज के लिए खतरनाक बताने के लिए कई कहानियां और कहावतें गढ ली जाती हैं।
उनकी उम्र है ६३ वर्ष। नाम है बीरूबाला रामा। उन्होंने असम में डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के खिलाफ लडाई लडते हुए कई हमले झेले, अपमान का शिकार हुर्इं, लेकिन फिर भी नहीं घबरायीं। असम के कई गांव आज भी अंधविश्वास की जंजीरों में कैद हैं। झाड फूंक करने वाले बाबाओं पर ग्रामवासी इस कदर विश्वास करते हैं कि यदि कोई उनके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसकी हत्या तक कर दी जाती है। सजग आदिवासी ग्रामीण महिला बीरूबाला ने ढोंगी बाबाओं के खिलाफ अपना स्वर बुलंद किया तो उन्हें तरह-तरह से प्रताडित किया गया। अंधविश्वास के खिलाफ उनकी लडाई की शुरुआत तब हुई जब १९९६ में उनके बडे बेटे को मलेरिया हो गया था। गांव के कुछ लोगों ने उसे देवधोनी (कथित अवतार) के पास ले जाने की सलाह दी। वे उनका कहा मानकर उसके पास चली गयीं। देवधोनी ने बेटे को देखते ही कहा उनके बेटे को किसी पहाडी देवी की आत्मा ने जकड लिया है जिससे छुटकारा मिलना असंभव है। उनका बेटा बस अब तीन दिन का ही मेहमान है। उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकती। वे चुपचाप अपने बेटे को घर ले आयीं। दो दिन के बाद बेटा बिस्तर से उठ खडा हुआ। तभी से वे बाबाओं के खेल को समझ गयीं। उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ कमर कसने की ठान ली। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं था। बीरूबाला के कथित अवतार और भूत प्रेत के खिलाफ मुंह खोलते ही बाबाओं के अनुयायियों में खलबली मच गयी। उन्होंने बीरूबाला के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए समाज से बाहर करने के साथ-साथ गांव से चले जाने का फरमान सुना दिया। उन्हें तीन साल तक गांव से बाहर रहना पडा। वे डायन प्रथा और पाखंडी बाबाओं का पर्दाफाश करने की ठान चुकी थीं, इसलिए उनकी आवाज बुलंद होती चली गयी। कई हमले झेल चुकी इस जुनूनी महिला को गोवाहाटी विश्वविद्यालय ने मानद डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा है।
यह हकीकत वाकई हैरान-परेशान करने वाली है कि मध्यप्रदेश में १०० में से ४० बच्चे कुपोषित हैं। यह खबर २०१६ के सितंबर महीने की है। देश को आजाद हुए ६९ वर्ष बीत गये, लेकिन हम बच्चों को स्वस्थवर्धक भोजन और चिकित्सा सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं करवा पाये! उस पर अंधश्रद्धा के नाग ने लोगों को बुरी तरह से जकड रखा है। इसलिए कई मां-बाप अपने कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए डॉक्टरों के पास ले जाने की बजाय बाबाओं के तंत्र-मंत्र पर ज्यादा भरोसा करते हैं। खांसी और बुखार से ग्रसित बच्चों को लहसुन और पीपल के पत्तों की माला पहनाने तथा पेट पर नाडा बांध देने से वे यह मान लेते हैं कि उनके कमजोर बच्चे तंदुरुस्त हो जाएंगे। यह देखकर घोर ताज्जुब होता है कि इस आधुनिक दौर में भी किस कदर अंधश्रद्धा का बोलबाला है। कई लोगों का यह भ्रम भी निरर्थक है कि अशिक्षित और ग्रामीण ही तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की काली छाया के शिकार हैं। महाराष्ट्र के शहर नागपुर में सैकडों मनोरोगी ऐसे हैं जो घरों में कैद होकर रह गये हैं। यह लोग कभी अच्छे भले थे। अचानक उन्हें मानसिक रोग ने अपनी चपेट में ले लिया तो उनका जीवन नरक से भी बदतर हो गया। परिजन यही समझते रहे कि किसी भूत या बाहरी हवा ने उन्हें अपने चंगुल में ले लिया हैं। २२ साल के रामलाल की जिन्दगी की गाडी बडे मज़े से चल रही थी। वह शहर की नामी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करता था। पाच साल पूर्व अचानक उसकी दिमागी हालत गडबडा गयी। अपना काम-धाम छोडकर वह बस्ती की गली में पागलों की तरह गाना गाते घूमता नजर आने लगा। उसकी इस हालत को देखकर लोग अपनी-अपनी राय व्यक्त करने लगे। ज्यादातर का यही कहना था कि किसी ने उस पर जादू-टोना कर दिया है। अब तो कोई पहुंचा हुआ ओझा ही उसे ठीक कर सकता है। परिवार वाले उसे भूत भगाने वाले तांत्रिक के पास ले गये, लेकिन उसकी हालत नहीं सुधरी। उसके इधर-उधर भटकने पर अंकुश लगाने के लिए उसके हाथ-पैर जंजीरों से बांध दिए गए और घर में कैद कर दिया गया। जंजीरों में बंधा रहने से उसकी हालत जब बिगड गयी तो उसे आजाद कर दिया गया। लेकिन इससे तो मामला और भी बिगड गया। एक दिन वह बिजली के ट्रांसफार्मर पर चढ गया तो उसके हाथ-पैर बुरी तरह से जल गए। सरकारी अस्पताल में ले जाने पर डॉक्टर ने कहा कि वह तो मनोरोगी है। भूत का कोई चक्कर नहीं है। उसका समुचित इलाज होने पर वह शीघ्र ठीक हो जाएगा। मगर परिवार वालों को डॉक्टर की सलाह रास नहीं आयी। लोगों की सलाह पर फिर से उन्होंने तंत्र-मंत्र करने वाले किसी बाबा की शरण में जाना उचित समझा।
नागपुर में स्थित कलमना, निवासी संजीवन के पांच में से तीन पुत्रों ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है। हालात यह हैं कि तीनों घर में ही पडे रहते हैं। कभी बॉथरूम में छिप जाते हैं तो कभी किसी चीज़ के लिए बच्चों की तरह जिद करने लगते हैं। बुजुर्ग पिता को कुछ तांत्रिकों ने बच्चों पर भूत-प्रेत का साया बताकर ऐसा डराया कि उनसे तीस-चालीस हजार रुपये एेंठ लिए। इसके लिए उन्हें अपनी जमीन गिरवी रखनी पडी। जब तंत्र-मंत्र से कोई फर्क नहीं पडा तो उन्होंने जानकार डॉक्टरों की सलाह पर मनोचिकित्सालय में भर्ती कराया है।
नारंगी शहर नागपुर में कई मनोरोगी उचित इलाज के अभाव के कारण मौत के मुंह में समा चुके हैं। सैकडों मनोरोगी घरों में कैद हैं। उन्हें मनोरोग ने कब जकड लिया इसकी खबर परिवार वालों को भी तब लगी जब मामला बिगड गया। परिवार वाले यही समझते रहे कि किसी ने जादू-टोना कर दिया है। किसी तंत्र-मंत्र के जानकार को दिखाने पर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन किसी ओझा, बाबा का तंत्र-मंत्र उन्हें ठीक नहीं कर पाया। ऐसा परिवार कम ही है जो मनोरोगी को इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले जाते हैं। उनका तो यही मानना है कि तांत्रिक-मांत्रिक ही भूतप्रेत के साये से मुक्ति दिला सकते हैं।

Thursday, September 15, 2016

राष्ट्रभक्तों का खून खौलता है

समय बदल रहा है। तारीखें बदल रही हैं। लेकिन भारतीय राजनीति के रंग-ढंग नहीं बदल रहे हैं। कई नेता ऐसे हैं जिन्हें हमेशा धनपतियों, बाहुबलियों, कट्टरपंथियों, माफियाओं, इंसानियत के शत्रुओं और किस्म-किस्म के गुंडों-बदमाशों की जरूरत बनी रहती है। राजनीति के रंग में रंगे अराजक तत्वों का भी नेताओं की छत्रछाया के बिना काम नहीं चलता। ११ साल बाद शहाबुद्दीन जेल से बाहर निकला तो हजारों समर्थकों का हुजूम उसके स्वागत के लिए उमड पडा। सैकडों कारों के काफिले के साथ जब उसकी सवारी सडकों से गुजरी तो उसके चाहने वालों के चेहरे की चमक को देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे किसी क्रांतिकारी नेता की रिहायी हुई है जिसका वर्षों से बडी बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था। कई वर्दीवाले भी दहशतगर्द शहाबुद्दीन के करीबी हैं। इसलिए उन्होंने भी अपने अंदाज में उसका स्वागत किया। बाहुबलि के काफिले की किसी भी कार ने टोल प्लाजा पर टोल टैक्स देने के लिए रूकना जरूरी नहीं समझा। कहते हैं मेहरबान पुलिस ने टोल नहीं लेने का आदेश जारी कर दिया था। कभी पूरे बिहार को थर्रा देने वाले सीवान के इस हत्यारे, लुटेरे डॉन पर कई गंभीर मामले दर्ज हैं। १३ मई २०१६ को ४२ साल के पत्रकार राजदेव रंजन की सीवान रेलवे स्टेशन के पास हत्या कर दी गयी थी। शहाबुद्दीन के अपहरण, उद्योग और घातक कारगुजारियों के खिलाफ सजग पत्रकार रंजन बेखौफ कलम चलाया करते थे। माफिया से नेता बने पूर्व सांसद शहाबुद्दीन ने अपने खिलाफ लिखने और आवाज उठाने वालों को ठिकाने लगाने में कभी कोई देरी नहीं की। निर्भीक कलमकार रंजन को अपनी खोजबीन में २०१४ में राजनीतिक कार्यकर्ता श्रीकांत भारती की हत्या में जेल में बंद शहाबुद्दीन का हाथ होने के पुख्ता संकेत मिल चुके थे। रंजन हत्याकांड के तुरंत बाद हिरासत में लिए गए तीन लोगों में हिस्ट्रीशीटर अपराधी उपेंद्र सिंह था, जिसके तार शहाबुद्दीन से जुडे पाये गये। जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सक्रिय नेता चंद्रशेखर की हत्या के पीछे भी शहाबुद्दीन का हाथ माना जाता है। आपराधिक तत्वों के इस सरगना की यह खुशकिस्मती है कि बिहार में उसके आका लालू की पार्टी सत्ता में है और उनके पुत्र बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं। ऐसे में शहाबुद्दीन को उडने के लिए खुला आसमान मिल गया है। उसके द्वारा सताये गये अनेकों लोगों को चिन्ता और दहशत ने घेर लिया है। यह सच भी जगजाहिर है कि जहां लालू अपराधियों को संरक्षण देने के लिए जाने जाते हैं वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आपराधिक तत्वों से समझौता न करने वाले सिद्धांतवादी नेता के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन यह भी सच है कि नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए क्या से क्या हो जाते हैं यह भी देशवासी बखूबी जानते हैं। कुर्सी के लिए नीतीश कुमार ने जब भ्रष्ट लालू की पार्टी से गठबंधन करने में परहेज नहीं किया तो ऐसे में उनपर भी शंका होने लगी है।
यह देश की बदकिस्मती ही है कि चुनाव जीतने के लिए और सत्ता पर बने रहने के लिए शहाबुद्दीन जैसे गुंडे बदमाशों को पाला-पोसा जाता है। यह वो आतंकी हैं, जिनके एक इशारे पर पुलिस अधिकारियों को गोली मार दी जाती है। बसे-बसाये परिवार उजाड दिये जाते हैं। आपसी भाईचारे की हत्या कर दी जाती है। सरकारें इनपर हाथ डालने से कतराती हैं। क्योंकि इनके चंदे, धंधे और गुंडो की फौज की बदौलत सत्ता पायी और हथियायी जाती है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने विवादित इस्लामी उपदेशक जाकिर के एनजीओ 'इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन' (आरजीएफ) से ५० लाख रुपये का चंदा लेकर एक बार फिर से यह स्पष्ट कर ही दिया कि देश में राजनीति दल अपना कामकाज कैसे करते हैं। आतंकियों को अपने भडकाऊ उपदेशों से प्रेरित करने वाले डॉ. जाकिर ने यह चंदा राजीव गांधी फाउंडेशन को समर्पित किया था। गौरतलब है कि नाइक धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाला ऐसा शख्स है जो कई सालों से समूचे भारत में धर्मांध राष्ट्रद्रोही ताकतों को बढावा देने का काम करता चला आ रहा है। कथित तौर पर अमन और शांति का संदेश देने वाले जाकिर के ये भडकाऊ भाषण उसकी असलियत बयां कर देते हैं, "मैं सारे मुस्लिमों को कहता हूं कि हर मुसलमान को आतंकवादी होना चाहिए। आतंकी का मतलब ऐसा आदमी, जो भय फैलाए।" पुलिस की जांच और गिरफ्तारी के डर से विदेश में जा दुबका जाकिर अपने भाषणों में हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित कर गर्व महसूस करता है। गीता के श्लोक की गलत व्याख्या कर कट्टरवाद को बढावा देते-देते वह चर्चित होता चला गया। आतंक का यह अध्यापक कभी दक्षिण मुंबई के भिंडी बाजार की तंग गलियों में एक छोटे से घर में रहता था। लेकिन उसने धर्म का गलत प्रचार और हिन्दू देवी-देवताओं का घोर अपमान करते-करते इतनी दौलत और शोहरत कमा ली कि वह आज मुंबई के एक पॉश इलाके में खडी की गयी आलीशान कोठी में रहता है। उसने कई मदरसे भी खोल रखे हैं। आतंक का परचम लहराने के लिए उसे भारत और दुनियाभर के देशों से करोडों रुपये का डोनेशन मिलता है। वह पीस टीवी (चैनल) का कर्ताधर्ता भी है जिसके २० करोड दर्शक हैं और इसे १०० से अधिक देशों में देखा जाता है। बेगुनाहों के कत्ल को जायज ठहराने वाले जाकिर पर कांग्रेस के बडे नेता काफी मेहरबान रहे हैं। २०१२ के एक कार्यक्रम में कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह उसके साथ एक मंच पर नजर आये थे। यह कहना गलत तो नहीं लगता कि राजीव गांधी फाउंडेशन को जो चंदा दिया गया वह दरअसल रिश्वत ही था जिसकी बदौलत जाकिर बेखौफ होकर युवकों को आतंक के मार्ग पर जाने और कट्टरपंथी बनने की शिक्षा-दीक्षा देता रहा और तब की सरकार तमाशबीन बनी रही। शहाबुद्दीन और जाकिर जैसे चेहरे आखिर हैं तो समाज और देश के दुश्मन ही। राजनीतिक दलों का इनसे किसी भी तरह का जुडाव हर राष्ट्रभक्त के खून को खौलाता है।