Thursday, December 1, 2016

डायरी का पन्ना

पिता के द्वारा बेटी के साथ बर्बरता और दुराचार की हर खबर व्यथित कर देती है। आज तो हद ही हो गई। एक ही दिन में मानवता को कलंकित करती कई खबरों से रूबरू होना पडा। मन विचलित हो गया। नोएडा के नामी स्कूल में पढने वाली एक छात्रा ने अपने प्रधानाचार्य को रोते हुए बताया कि उसके पिता बीते दो साल से उसके साथ दुष्कर्म करते चले आ रहे हैं। उसकी मां की मौत हो चुकी है। उसके विरोध का पिता पर कोई असर नहीं होता। वे रोज रात को शराब के नशे में धुत होकर आते हैं और हर मर्यादा भूल जाते हैं। एक बेटी के द्वारा उजागर किये इस शर्मनाक सच ने प्रधानाचार्य के पैरों तले की जमीन खिसका दी। उन्होंने तुरंत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवायी और वासना के गुलाम पिता को गिरफ्तार कर लिया गया। पानीपत में एक १७ वर्षीय बेटी ने अपने पिता के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करवायी कि उसके पिता पिछले डेढ साल से उसका तथा उसकी छोटी बहन का यौन शोषण करता चला आ रहा है। छोटी बहन की उम्र मात्र बारह वर्ष है। मेडिकल रिपोर्ट में दोनों बहनों के साथ बलात्कार किये जाने की पुष्टि हुई। राजधानी दिल्ली में अपनी बारह वर्षीय बेटी पर बलात्कार का कहर ढाने वाले एक शैतान पिता को गिरफ्तार किया गया है। पिता शराबी है और मां दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा कर परिवार चलाती है। वह एक शाम को जब घर लौटी तो बेटी का रो-रो कर बुरा हाल था। उसने मां को पिता की दरिंदगी के बारे में बताया। मां ने अपने भाई को खबर दी और दोनों ने यही निर्णय लिया कि ऐसे अधर्मी पिता को हर हालत में सज़ा दिलवायी ही जानी चाहिए। नागपुर में भी एक वहशी पिता ने अपनी मनमानी कर पिता के नाम को कलंकित कर दिया। ५६ वर्षीय रामू नामक पिता की दो पुत्रियां और एक पुत्र है। वह अक्खड शराबी है। पत्नी और बच्चों की हाडतोड मेहनत की बदौलत घर चलता है। छह महीने पूर्व रामू की १६ वर्षीय भतीजी उसके यहां रहने के लिए आई थी। उसके माता-पिता का देहांत हो चुका है। किशोरी छठवीं तक पढी है। गांव में छिछोरे किस्म के लडके छेडछाड करते थे इसलिए वह भयभीत रहती थी। उसे बेहद असुरक्षा का अहसास होता था। इसलिए वह अपने बडे पिता के यहां रहने के लिए आ गई। एक दिन जब पत्नी और बच्चे कहीं बाहर गए हुए थे तब रामू ने उसे अपनी हवस का शिकार बना डाला। किशोरी ने जब अपनी चाची और सौतेली बहनों को अपने साथ हुए दुष्कर्म की जानकारी दी तो उन्होंने उसे परिवार की इज्जत की खातिर मुंह बंद रखने की नसीहत दे डाली। रामू का हौसला बुलंद हो गया। उसने फिर से नीच हरकत को अंजाम देने की कोशिश की तो किशोरी सीधे थाने पहुंच गयी और वहां पर मौजूद पुलिस अधिकारियों को वह सब कुछ बता दिया जिसे घर वाले छुपा कर अपनी इज्जत बचाये रखना चाहते थे। संतरानगरी नागपुर में ही एक पिता ने अपनी १४ वर्षीय बेटी के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया तो बेटी ने उसका मुंह नोंच लिया। यह लडकी सातवीं कक्षा में अध्यन्नरत है। पिता की उम्र है ५६ वर्ष। एक दिन अकेले में पिता की अपनी बेटी पर ही नीयत खराब हो गई और उसने उसे निर्वस्त्र कर डाला। बेटी ने बचाव के लिए शोर मचाया, लेकिन कोई बचाने के लिए नहीं आया। आखिरकार बेटी ने शैतान पिता के चंगुल से बचने के लिए हाथ-पैर चलाने शुरू कर दिये। नाखूनों से उसका मुंह नोंचने के बाद वहां से भागते हुए वह पुलिस की शरण में पहुंच गयी। तब उसके शरीर पर एकमात्र तौलिया लिपटा हुआ था। बेटियों को बचाने के लिए एक ओर केंद्र और प्रदेश की सरकारें अभियान चला रही हैं वहीं दूसरी ओर कुछ लोग अपनी ही बेटियों के शत्रु बने हुए हैं। इस इक्कीसवीं सदी में भी बेटी होने की सज़ा महिलाओं और नवजात बच्चियों को दी जा रही है। दिल्ली के तिमारपुर में रहने वाले एक शख्स ने अपनी पहली बेटी को अल्ट्रासाउंड से जांच कराकर गर्भ में ही मार डाला। दूसरी बेटी पैदा हुई तो पत्नी का जीना हराम कर दिया। पत्नी ने बेटी को जन्म दिया इसलिए उसने अपने ससुर पर २० लाख का प्लाट देने का दबाव बनाया। जब ससुर ने असमर्थता जतायी तो जालिम और लालची पिता ने सारा का सारा गुस्सा अपनी नवजात पर उतारते हुए उसे जमीन पर पटक दिया। नरपशु का इतने में से भी दिल नहीं भरा। उसने अपने मां-बाप के साथ मिलकर पत्नी को जबरदस्ती जहर पिला दिया।
समझदार, संवेदनशील और परिपक्व माता-पिता सदैव अपनी संतान का भला चाहते हैं। उन्हें लगनी वाली छोटी-सी खरोंच उन्हें बेहद पीडा देती है। बच्चों की शरारतें उनमें नयी ऊर्जा का संचार करती हैं। वे अपने आंखों के सामने बच्चों को बडा होता देखना चाहते हैं। हर बेटी अपने पिता को अपना रक्षक मानती है। पिता की छत्रछाया में उसे अपार सुरक्षा की अनुभूति होती है। दुनिया की हर बेटी को यकीन होता है कि पिता के होते दुनिया की कोई काली छाया उसे छू तक नहीं सकती। बेटियां भी बेटों से कमतर नहीं हैं इसका जीता-जागता उदाहरण नागपुर की एक सडक पर देखने को मिला। छोटी उम्र में बडा काम उसका नाम है पारो। उम्र है महज दस वर्ष, लेकिन खेलने कूदने की उम्र में छह मीटर की ऊंचाई पर लटकी रस्सी पर चलकर जब वह हैरतअंगेज करतब दिखाती है तो देखने वालों के दिल की धडकन बढ जाती है। यकीनन यह हैरतअंगेज करतब दिखाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। लेकिन फिर भी यह बच्ची दिन में कई बार जान हथेली पर रखकर तमाशा दिखाती है और अपने पूरे परिवार के लिए दो जून की रोटी जुटाती है। तमाशा दिखाने से पहले सडक पर दोनों तरफ मोटी लकडी के सहारे रस्सी बांधी जाती है। करीब चार मीटर लम्बी व आठ-दस फीट ऊंची इस रस्सी पर पारो बडे सधे पांव से चलती है। तमाशे को और रोमांचक बनाने के लिए वह साइकिल रिंग रखकर पानी भरा लौटा सिर पर रखती है इसके बाद वह जब रस्सी पर चलती है तो देखने वाले स्तब्ध रह जाते हैं और तालियां गूंजने लगती हैं। पारो के पिता को ब्लड कैंसर है। अपनी इस बीमारी का उन्हें साल भर पहले पता चला। पहले वे ही रस्सी पर करतब दिखाते थे। जब उनकी तबीयत ज्यादा बिगडने लगी तो उन्होंने पारो को यह हुनर सिखाया। पिता जानते हैं कि वे कुछ ही दिन के मेहमान हैं। बेटी अपने पिता को स्वस्थ देखना चाहती है, इसलिए बिना थके दिन भर रस्सी पर चलकर इतना कमा लेना चाहती है, जिससे पिता की बीमारी का इलाज भी होता रहे और माता-पिता को दूसरों का मुंह न ताकना पडे। बेटियों को दुनिया में आने से रोकने और उनके साथ दुराचार करने वाले पिताओं की शर्मनाक खबरें वाकई चिन्ता में डाल देती हैं। ऐसे वहशियों के कारण ही पिता की श्रद्धेय छवि कलंकित हो रही है। पिता के अस्तित्व, कर्तव्य और अहमियत की जीवंत तस्वीर पेश करती अज्ञात कवि की यह पंक्तियां यकीनन काबिलेगौर हैं :
"पिता रोटी है
कपडा है, मकान है,
पिता नन्हे से परिंदे का आसमान है।
पिता है तो घर में प्रतिपल राग है,
पिता से मां की चूडी,
बिंदी सुहाग है,
पिता है तो
बच्चों के सारे सपने हैं
पिता है तो... बाजार के
सारे खिलौने अपने हैं...।"

Thursday, November 24, 2016

करे कोई, भरे कोई

"बदलना तो इंसान को है...
नोट तो एक बहाना है...
अगर कुछ लोग
बेइमान नहीं होते,
तो आज इतने लोग
परेशान नहीं होते।"
सीधी-सादी भाषा में लिखी गयी कविता की उपरोक्त पंक्तियां देश के चिंताजनक हालात के असली सच को बयां करती हैं। भारतवर्ष में काले धनवानों और उनकी अमीरी का जो चेहरा है वह बहुत डराता है। गुस्सा भी बहुत आता है। यह कैसी व्यवस्था है जहां करोडों लोग भूखे सोने को विवश हैं और चंद लोग करोडों में खेल रहे हैं। कुछ पढे-लिखे लोगों की अमानवीयता को देखकर उनके इंसान होने पर शंका होने लगती है। देश में पांच सौ और हजार के नोट बंद होने के बाद अपने ही धन को पाने की खातिर कई भारतीयों ने कतार में लगकर अपनी जान गंवा दी। उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में एक डॉक्टर ने इंसानियत की कब्र खोद दी। एक पिता अपने एक साल के बीमार बेटे को लेकर डॉक्टर के पास इस उम्मीद से पहुंचा था कि वह उसे भला चंगा कर देगा। भारत वर्ष में डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है। लेकिन यह डॉक्टर तो धन का भूखा था। उसने बीमार बच्चे का तब तक इलाज किया जब तक पिता के पास उसे देने के लिए छोटे नोट थे। जब उनके पास पांच सौ के नोट रह गए तो डॉक्टर ने नोट लेने से मना कर दिया और इलाज बंद कर दिया। पिता ने लाख मिन्नतें कीं, लेकिन डॉक्टर नहीं पसीजा। उसे हैवान बनने में देरी नहीं लगी। उस शैतान ने बीमार बच्चे और माता-पिता को अस्पताल से बाहर खदेड दिया। इलाज के अभाव में बच्चे की मौत हो गई।
उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ में स्टेट बैंक से दो हजार रुपये बदलवाने पहुंचा एक मजदूर मौत के मुंह में समा गया। ६५ वर्षीय यह शख्स पावरलूम फैक्टरी में मजदूरी करता था। चार घण्टे तक लाइन में लगने पर भी उसका नम्बर नहीं आया। इस बीच खाली पेट होने के कारण उसे चक्कर आया और वह बेहोश होकर गिर पडा। कुछ लोगों ने रिक्शे पर डालकर उसे अस्पताल पहुंचाया जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया? प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने में आम लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पडा है। राजधानी दिल्ली में एक मरीज की मौत के बाद उसके परिजनों को नए नोटों में अस्पताल का बिल न चुका पाने के कारण घण्टों डेडबॉडी का इंतजार करना पडा। अस्पताल वाले पुराने नोट नहीं लेने पर अड गये। मीडिया ने जब बहुत समझाया-बुझाया और दबाव डाला तो तब कहीं जाकर पुराने नोट लिए गए और डेडबॉडी सौंपी गई। गाजियाबाद में परचून की दुकान चलाने वाले हर्षवर्धन त्यागी ने पाई-पाई जुटाकर बैंक में रकम जमा की थी। बेटी की शादी के लिए जीवन बीमा पालिसी के अगेंस्ट लोन लिया और वह रकम भी बैंक खाते में जमा करा दी। शादीवाले परिवारों को बैंक से एक मुश्त ढाई लाख रुपये निकालने की अनुमति के सरकार के आदेश के बावजूद बैंक ने रकम देने से मना कर दिया। बैंक मैनेजर की दलील थी कि अभी सरकार का आदेश नहीं आया है। काफी हील-हुज्जत के बाद बैंक ने मात्र बीस हजार रुपये दिए। हर्षवर्धन ने रिश्तेदारों और दोस्त यारों से उधार लेकर जैसे-तैसे बेटी की शादी निपटायी। नोटबंदी की घोषणा ने अनेकों परिवारों के यहां होने वाली शादियों को बेरौनक कर दिया। सोनीपत में बेटे की शादी में बैंक से नोट नहीं मिलने के कारण एक व्यक्ति ने रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी। रकम जमा करवाने और नोट बदलने के लिए करोडों लोगों को घंटों लंबी लाइनों में खडा होना पडा। बैंकों और डाकघरों के कर्मचारियों ने अपने दायित्व का पालन करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कई कर्मचारी तो सैनिकों की तरह रात-दिन अपने-अपने कार्यस्थल पर डटे रहे। नागपुर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के एक अधिकारी की काम के दौरान मृत्यु हो गई। सेना में काम कर चुके यह अधिकारी जब घर से निकल रहे थे तब उनके सीने में दर्द हो रहा था। पत्नी ने डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने बैंक में पुराने नोट बदलने और जमा कराने वालों की भीड को देखते हुए अपने काम पर जाना जरूरी समझा।
जब देश के करोडों व्यापारी, मजदूर, रिक्शे, रेहडी वाले और छोटे-मोटे कारोबारी बैंकों के समक्ष लगी लाइनों में धक्के खा रहे थे तब एक तबका ऐसा भी था जो अपने काले धन को सोने की चमक में तब्दील कर रहा था। ५०० व १००० रुपये के नोटों पर पाबंदी लगने के बाद देश के कई हिस्सों में सोने के जरीए अरबों का काला धन सफेद हो गया। यह सारा धंधा बेहद गोपनीय तरीके से चला। सच तो यह है कि इस देश के आम आदमी के पास काला धन होने का सवाल ही नहीं उठता। वह तो लगभग रोज कमाने और खाने की स्थिति में जीता है। देश में नब्बे प्रतिशत काली माया सोने, शेयर्स, रियल इस्टेट, काले और नशीले धंधो में लगी हुई है, जिनकी सारी की सारी बागडोर बडे-बडे उद्योगपतियों, व्यापारियों, बिल्डरों, नेताओं और अफसरों के हाथ में है। कर्नाटक के पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी ने अपनी बेटी के विवाह पर ५०० करोड रुपये खर्च कर डाले। इस शाही शादी में पचास हजार से अधिक मेहमानों ने अपनी उपस्थिती दर्ज करायी। उपमहाद्वीप की सबसे महंगी शादियों में शामिल इस शादी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भ्रष्ट कारोबारी कितने निर्मम हैं और उनके यहां कितना-कितना काला धन जमा है। जिसे खर्च करने के लिए वे मौके तलाशते रहते हैं। नोटबंदी के बाद यह तथ्य भी पुख्ता हो गया कि भारतवर्ष में धन की कोई कमी नहीं है। लेकिन यह धन अच्छे लोगों के पास पहुंचने की बजाय वह गलत लोगों के यहां जा पहुंचा है। इन्हीं बेइमानों की वजह से ईमानदार जनता को कई तरह की तकलीफें सहनी पड रही हैं। गौरतलब है कि इस शादी के लिए निमंत्रण पत्र एक बक्से में भेजा गया था, जिसमें एलसीडी स्क्रीन पर प्रकट होकर पूरा परिवार न्योता देता दिखायी दिया था। इस विवाह में बेंगलुरू पैलेस ग्राउंड में बालीवुड के आर्ट डायरेक्टरों की मदद से बडे-बडे आकार के सैट लगाकर खाने-पीने का इंतजाम किया गया। और भी कई शाही नजारे थे जिसके चलते इस शादी ने कुख्याति पायी। जनार्दन रेड्डी की कर्नाटक के सबसे ताकतवर लोगों में गिनती की जाती है। यह खनन माफिया ४० माह तक जेल की सलाखों के पीछे भी रह चुका है।
बिहार के एक व्यवसायी ने अपने काले धन को सफेद करने के लिए एक चार्टर्ड प्लेन किराये पर लिया और उडकर नागालैंड जा पहुंचा। जैसे ही विमान की दीमापुर में लैंडिंग हुई, सुरक्षा बलों ने उसे घेर लिया। जांच के दौरान ५ करोड ५ लाख रुपये बरामद किये गए। व्यापारी के बडी मात्रा में बंद हो चुके नोटों को लेकर उग्रवाद प्रभावित नागालैंड जाने से अन्य गंभीर सवाल भी खडे हो गये। कर्नाटक में ९ ट्रकों में पुराने नोट ले जाए जा रहे थे। तभी एक ट्रक रास्ते में पलट गया। ट्रक के पलटने से ५०० और १००० के नोट सडक पर बिखर गए। ट्रकों में नोटों को रद्दी कागजों से ढका गया था। महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में छह करोड रुपये के बंद हो चुके नोट एक गाडी से बरामद किये गए। पकडे गये लोग शहरी सहकारी बैंक के कर्मचारी हैं। नागपुर के एक फ्लैट में पुलिस ने छापा मार कर एक करोड ८७ लाख रुपये के पुराने नोट बरामद किए। बताया जाता है कि यह किसी नेता का धन है। इस मामले में गिरफ्तार चार लोगों में एक चार्टर्ड अकांउटेंट भी है। नोट बंदी के पश्चात देश में जहां-तहां जिस बडी तादाद में बोरों में, ट्रकों में, नालों और नदियों में पुराने नोट मिले हैं उससे यह तो तय हो गया है कि देश में अपार काला धन है। नब्बे प्रतिशत लोगों ने सरकार के फैसले का समर्थन किया है। कुछ भ्रष्टाचारियों के दुष्कर्मों की सज़ा पूरे देश को भुगतनी पड रही है।

Thursday, November 17, 2016

जैसा राजा, वैसी प्रजा

एक हजार और पांच सौ के नोटों के चलन पर एकाएक प्रतिबंध लगाकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने प्रशंसा भी पायी है और विरोध भी झेलना पड रहा है। देश के अधिकांश लोगों ने सरकार के फैसले के प्रति सहमति जतायी है। हर समझदार शख्स जानता है कि यह फैसला देशहित में ही लिया गया है। विरोधी पार्टी के नेताओं की तो विरोध करने की आदत है। दरअसल, रातोंरात हुई नोटबंदी ने काले धन के पोषक नेताओं और उद्योगपति और तरह-तरह के धनपतियों को गहन चिन्ता में डाल दिया। वे हक्के-बक्के रह गए हैं। काले धन के भंडारों के मालिक व्यावसायियों ने हैरतअंगेज चुप्पी साध ली है और नेता अंदर ही अंदर बौखला गए हैं। भ्रष्ट नौकरशाहों का भी यही हाल हुआ है। सारा देश जानता है कि नेताओं, नौकरशाहों और कारोबारियों की तिकडी के यहां अधिकांश काला धन भरा पडा है। उद्योगपति और व्यापारी तो मेहनत भी करते हैं, लेकिन भ्रष्ट अफसरों और नेताओं को तो हाथ-पैर भी नहीं हिलाने पडते फिर भी उनकी तिजोरियां भरती चली जाती हैं। उनकी काली कमायी के कई रास्ते हैं। गरीबों के हिन्दुस्तान में पचासों ऐसे नेता हैं जिनके यहां हजारों करोड रुपये बोरों में पडे सड रहे हैं। उद्योगपतियों और व्यापारियों के यहां छापामारी करने वाला तंत्र नेताओं के यहां छापामारी करने का कब साहस दिखायेगा इसी का देशवासियों को बेसब्री से इंतजार है।
आमजनों की बैंको के सामने भीड लगी है, लेकिन जिनके यहां हजार पांच सौ करोड की काली माया का भंडार है वे अंदर ही अंदर जोड-जुगाड में लगे हैं। चलन से बाहर हो चुके नोटों यानी काले धन को कैसे सफेद करना है इसके लिए कई तरह की कलाकारियां शुरू हो चुकी हैं। नोट बदलने के लिए बैंको के सामने उमड रही भीड में काले धन के सरगना तथाकथित समाजसेवक और धनपतियों का नजर नहीं आना यही बताता है कि वे कितने ताकतवर हैं और आम आदमी कितना बेबस है। सभी कष्ट उसी के नाम लिखे हैं जिन्हें उसे किसी भी हाल में सहते रहना है। अगर सरकार वाकई काले धन का खात्मा करना चाहती है, भ्रष्टाचार को जड से समाप्त करना चाहती है तो उसे सबसे पहले अपने इर्द-गिर्द डेरा जमाये सफेदपोशों की नकेल कसनी होगी। उन नेताओं को नानी याद दिलानी होगी, जिन्होंने सत्ता पर काबिज होने के बाद अपार दौलत कमायी है और लोकतंत्र को बाजार बना दिया है। ऐसे कुख्यात बाजीगरों को सारा देश जानता है। इस देश का आम आदमी इस सच से पूरी तरह से वाकिफ है कि अधिकांश नेता चुनाव के समय कैसे-कैसे करतब दिखाते हुए काले धन की बरसात कर येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने में कामयाब हो जाते हैं। भूमाफियाओं, बिल्डरों, खनन माफियाओं, दारू माफियाओं, सरकारी ठेकेदारों, शिक्षा माफियाओं के सहयोग और साथ के बिना इस देश के अधिकांश नेताओं का पत्ता भी नहीं हिलता। मतदाताओं को लुभाने और उन्हें खरीदने के लिए बांटी जाने वाली शराब, साडियां, कंबल और नगदी धन यही लोग मुहैया कराते हैं। जब नेताजी काले धन की बदौलत चुनाव जीतने के बाद सत्तासीन हो जाते हैं तो इन्हें डंके की चोट पर लूटपाट मचाने की छूट मिल जाती है। यह सिलसिला वर्षों से चलता चला आ रहा है। काले धन की ताकत के चलते पता नहीं कितने खोटे सिक्के विधायक और सांसद बन जाते हैं। सभी राजनीतिक पार्टियां यह दावा करते नहीं थकतीं कि उनमे कोई खोट नहीं है। वे अपराधियों, बेईमानों और लुटेरों को अपनी पार्टी में घुसने नहीं देतीं। लेकिन सच तो सभी के सामने है। देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जिसका चक्का बिना काले धन के बिना चलता हो। नोट लेकर टिकटे बांटने के आरोप राजनीतिक दलों पर लगते ही रहते हैं। चुनावी चंदे की अधिकांश राशि नगदी में ली जाती है जिसमें पारदर्शिता का अभाव रहता है। २०१४ के लोकसभा चुनाव के दौरान करोडों रुपये आयोग द्वारा जब्त किये गये जो नेताओं और विभिन्न दलों के थे। इस देश में ईमानदार नेताओं की कमी नहीं है। फिर भी उन्हें समझौते करने को विवश होना प‹डता है। हमारा दावा है कि यदि भारतवर्ष के सभी राजनेता और राजनीतिक पार्टियां काले धन का इस्तेमाल करना बंद कर दें तो जनता भी काले धन से लगाव रखने से घबरायेगी। हमारे यहां एक दूसरे का अनुसरण करने की गजब की परिपाटी है। लोग बडे गर्व के साथ 'ऊंचे लोगों' को अपना आदर्श मानने लगते हैं। आज की तारीख में ऊंचे लोगों में शामिल हैं, सत्ताधारी, नेता, राजनेता, समाजसेवक, अभिनेता और तरह-तरह के माफिया आदि। इनकी लीक पर चलने से लोगों की छाती तन जाती है। एक कहावत भी है 'जैसा राजा, वैसी प्रजा।' इसलिए शासकों को सबसे पहले खुद में बदलाव लाना ही होगा। जनता अब पूरी तरह से सफाई चाहती है। ऊपर दिखावे से काम नहीं चलने वाला।
देश के अधिकांश राजनीतिक दल अवैध धंधेबाजों और अपराधियों को चुनाव लडवाने के लिए बेहद उत्सुक रहते हैं। उनके लिए चरित्र कोई मायने नहीं रखता। अगर उनमें धन की बरसात करने की क्षमता है तो उनके सभी दुर्गणों की अनदेखी कर दी जाती है। यही वजह है कई राजनीतिक दल और उनके सर्वेसर्वा नोट बंदी का विरोध कर रहे हैं। जनता को हो रही असुविधाओं का शोर मचाकर वे सरकार को कोस रहे हैं। नोटबंदी के बाद कुछ-कुछ परिवर्तन के आसार भी नजर आने लगे हैं। झारखंड, छत्तीसगढ और ओडिसा में नक्सलियों के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी है। उनके द्वारा लोगों को डरा-धमकाकर लेवी के तौर पर वसूले गए छह सौ करोड रुपये रद्दी कागज बनकर रह गए हैं। नक्सली भ्रष्ट नेताओ, अवैध कारोबारियों, ठेकेदारों, लकडी तस्करों और बीडी निर्माताओं को डरा-धमकाकर हर वर्ष सैकडों करोड की वसूली करते हैं। कश्मीर में पत्थरबाजी कम हो गयी है। अलगाववादी पत्थरबाजों को ५००-१००० के नोट देकर पत्थर फेंकवाने के साथ-साथ आगजनी करवाते रहे हैं। काले धनपतियों को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। उन्हें छापों का डर सताने लगा है। काले धन को सफेद करने के लिए उनके सीए काम में लग चुके हैं। अपराधियों के हौसले पस्त हो रहे हैं। हवाला कारोबार में अस्सी प्रतिशत तक की गिरावट आई है। मिर्जापुर में स्थित नरघाट किनारे गंगा में लाखों रुपये तैरते देखे गये। यह नोट ५०० और १००० के थे। मिर्जापुर में जैसे ही यह खबर फैली तो यह नजारा देखने के लिए लोगों की भीड उमड पडी। कुछ जोशीले लोगों ने नदी में छलांग लगा दी। लेकिन निराशा ही उनके हाथ लगी। दरअसल, इन नोटों को नदी में फाडकर फेंका गया था। इससे पहले बरेली तथा देश के विभिन्न शहरों में नोट जलाने की खबरें आयीं। नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना उन्हें करना पड रहा हैं जिनके परिजन अस्पताल में भर्ती हैं। कोलकाता में एक निजी अस्पताल में भर्ती डेंगू मरीज के परिजनों ने छोटे नोट नहीं होने पर अस्पताल का चालीस हजार का बिल उन सिक्कों से चुकता किया जो घर की महिलाओं और बच्चों की गुल्लक में कई वर्षों तक जमा किये गये थे। मेरठ में एक ७० वर्षीय महिला की तब मौत हो गयी। मृतक के बेटों के पास बडे नोट थे, जो बेकार थे। ऐसे में मां के दाह संस्कार का संकट उनके सामने खडा हो गया। ऐसे में मोहल्ले के कुछ लोगों ने चार हजार रुपये जुटाए तब कहीं जाकर अंतिम संस्कार सम्पन्न हो पाया। नये नोटों को पाने की जद्दोजहद में कई मौतें हो चुकी हैं। आम आदमी को अपार तकलीफें हो रही है। लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि सरकार ने इतना बडा कदम तो उठा लिया, लेकिन उससे होने वाले परेशानियों के समुचित समाधान की तैयारी पहले से नहीं की।

Thursday, November 10, 2016

हैवानियत का चेहरा

दूसरों की मासूम बहन, बेटियों का यौन शोषण करने और उन पर दानवी बर्बरता बरपाने वालों के दिल क्या पत्थर के होते हैं? क्या उनके घर-परिवार में मां, बहन, बहू, बेटियां नहीं होतीं? देश के प्रदेश महाराष्ट्र में स्थित बुलढाणा की एक आश्रमशाला में बारह नाबालिग आदिवासी लडकियों को नराधमों ने अपनी अंधी वासना का शिकार बना डाला। खुद आश्रमशाला के प्राचार्य, टीचर और अन्य कर्मचारी लडकियां का यौनशोषण कर मानवता को कलंकित करते रहे। कई महीनों तक जिन लडकियों पर जुल्म ढाया जाता रहा उनकी उम्र मात्र १२ से १४ वर्ष के बीच है। शोषित लडकियां किसी के सामने मुंह न खोलने पाएं इसके लिए उन्हें सतत तरह-तरह से दबाने और यातनाएं देने का दुष्चक्र चलता रहा। बेबस लडकियां दुराचारियों के हाथों का खिलौना बनी रहीं। तीन लडकियों के गर्भवती होने की शर्मनाक खबर जब बाहर आयी तो शासन और प्रशासन के होश उड गये। लोगों का गुस्सा भी सातवें आसमान पर पहुंच गया। महाराष्ट्र सरकार ने बच्चों के सर्वांगीण विकास और उत्थान के लिए आश्रमशालाओं की शुरुआत की है। इन आश्रमशालाओं पर सरकार प्रतिवर्ष करोडों रुपये खर्च करती है। महाराष्ट्र में ५२९ सरकारी और ५५० अनुदानित आश्रमशालाओं में करीब चार लाख पैंतालीस हजार विद्यार्थी हैं। इनमे एक लाख ९९ हजार छह सौ सत्तर आदिवासी छात्राएं हैं। इन शालाओं में विभिन्न संदिग्ध कारणों से बच्चों की मौतों और लडकियों के यौन शोषण की खबरें निरंतर आती रहती हैं। अधिकांश आश्रमशालाएं नेताओं और उनके शागिर्दों के द्वारा चलायी जाती हैं। जिस सरकारी धन को आदिवासी बच्चों के कल्याण के लिए खर्च किया जाना चाहिए उसका बहुत बडा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाता है। आश्रमशालाओं के कामकाज पर नज़र रखने की जिनकी जिम्मेदारी है, वे बहती गंगा में हाथ धोकर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं। यही वजह है कि कई आश्रमशालाएं अय्याशी का अड्डा बनकर रह गयी हैं। बुलढाना की आश्रम शाला का सच अचानक उजागर हो गया। तीन लडकियां दीपावली की छुट्टी पर अपने घर जलगांव गयीं थीं। उनके माता-पिता को उनका चेहरा उतरा-उतरा और व्यवहार बदला-बदला-सा लगा। उन्होंने अपने-अपने तरीके से पूछताछ की। बहुत कुरेदने पर लडकियों ने हकीकत बयां करते हुए बताया कि शाला में उनकी अस्मत लूटी जाती है। पिछले कुछ दिनों से वे पेट दर्द से परेशान हैं। यह सुनते ही घर वालों के पैरोंतले की जमीन ही खिसक गयी। आश्रमशाला के भयावह सच ने उनकी नींद उडा दी। उन्होंने अपनी बच्चियों को वहां कभी भी न भेजने का निर्णय ले लिया।
महाराष्ट्र के प्रगतिशील नगर नागपुर में भी छात्राओं के यौन क्रूरता का शिकार होने से लोग चिंतित हैं। फेसबुक पर हुई दोस्ती भी लडकियों के लिए मुसीबत का कारण बनती चली जा रही है। एक इक्कीस वर्षीय कालेज छात्रा, जो कि होस्टल में रहती है ने पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज करवायी कि उसके फेसबुकी प्रेमी ने उसका जीना दुश्वार कर दिया है। तीन साल तक उसे यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का शिकार होना पडा। छात्रा की २०१३ में फेसबुक के माध्यम से कोलकाता निवासी २४ वर्षीय युवक से पहचान हुई थी। वह फेसबुक पर डाली गयी युवक की तस्वीरों से प्रभावित हो गई। दोनों में चैटिंग शुरू हो गयी। धीरे-धीरे मामला यहां तक पहुंच गया कि युवक उससे मिलने के लिए नागपुर आने लगा। शहर के विभिन्न होटलों में शामें बीतने लगीं और युवक ने जबरन छात्रा से शारीरिक संबंध भी बना लिए। वह छात्रा से धन भी एेंठने लगा। छात्रा को जब उसकी असलियत समझ में आयी तो उसने उससे दूरी बनानी शुरु कर दी। युवक अपनी असली औकात पर उतर आया। तिरस्कार से बौखलाये युवक ने छात्रा का फर्जी फेसबुक और जी-मेल अकाउंट बनाया और फिर इसके माध्यम से उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें उसके मित्रों और रिश्तेदारों को भेजने लगा। बदनामी की वजह से छात्रा का जीना दूभर हो गया। उसने कई बार युवक को मुंहमांगी रकम दी, लेकिन ब्लैकमेलिंग का सिलसिला बंद नहीं हुआ। बेटी के द्वारा घर से बार-बार पैसे मंगवाये जाने के कारण माता-पिता को शंका होने लगी। मां ने भरोसे में लेकर जब बेटी से पूछताछ की तो उसने आपबीती बता कर स्तब्ध कर दिया। फरेबी प्रेमी के चक्कर में चार लाख लुटा चुकी छात्रा ने जब थाने पहुंचकर अपने साथ हुई धोखाधडी की सारी दास्तान सुनायी तो पुलिस वाले भी हैरान रह गये। फेसबुक पर दोस्त बनाकर शारीरिक शोषण का शिकार होने वाली इस छात्रा की तरह शहर की अन्य कई युवतियां ऐसे छल, कपट का शिकार हो चुकी हैं। यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
देश का ही प्रदेश है केरल। यहां पर शिक्षितों की तादाद दूसरे प्रदेशों की तुलना में कहीं बहुत ज्यादा है, लेकिन यहां की पुलिस के सोचने और काम करने का रंगढंग दूसरे प्रदेशों से जुदा नहीं है। केरल के त्रिचूर की रहने वाली एक महिला पर उसके पति के ही चार दोस्तों ने सामूहिक बलात्कार कर इंसानियत का गला घोंट दिया। इस घिनौने अपराध में एक स्थानीय नेता भी शामिल था। पीडिता पति के दोस्तों को भाई मानती थी। उसे उनपर बहुत भरोसा था, लेकिन एक रात उन्होंने अपना असली चेहरा दिखा दिया। नराधमों ने बलात्कार का वीडियो भी बनाया और किसी के सामने मुंह न खोलने की धमकी दी। लेकिन उसने बलात्कारियों को सबक सिखाने की ठान ली और पुलिस की शरण में जा पहुंची। चारों बलात्कारी दोस्तों को थाने बुलवाया गया। वहां पर उनकी इज्जत के साथ मेहमाननवाजी की गयी और पीडिता को जलील करते हुए शर्मनाक सवालों की बौछार लगा दी गयी। उससे पूछा गया कि बलात्कार के दौरान उसे किसने ज्यादा संतुष्ट किया। वह पुलिस का यह घिनौना रूप देखकर पानी-पानी हो गई। उसका खून खौल गया। लाचारी और बेबसी ने उसे अधमरा कर दिया। दरिंदे धनवान थे। उनकी ऊपर तक पहुंच और पहचान थी। इसलिए पुलिस ने पीडिता को अपमानित करने के लिए नीचता की सभी हदें पार कर दर्शा दिया कि उसका महिलाओं के साथ कैसा शर्मनाक व्यवहार रहता है। जिन अपराधियों की ऊपर तक पहुंच होती है उन्हें मान-सम्मान और असहायों और गरीबों की इज्जत के परखच्चे उडा दिये जाते हैं।

Thursday, November 3, 2016

दलालों की दिलेरी

उत्तरप्रदेश में चले राजनीतिक तमाशे ने एक बार फिर से सत्ता के लालची नेताओं को बेनकाब कर दिया। यह सच भी पूरी तरह से उजागर हो गया कि सत्ता और राजनीति में चापलूसों और दलालों की कितनी अहमियत है। नेताजी को वाकई बधाई जो उन्होंने राजनीति में दलालों की जरूरत और नेताओं की मजबूरी का पर्दाफाश करते हुए कबूला कि बुरे वक्त में अमर सिंह ने उनकी बडी मदद की थी। अगर वह साथ नहीं देते तो उन्हें जेल जाना पडता। वह मेरे भाई जैसे हैं।
नेताजी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उन्होंने ऐसा कौन-सा अपराध किया था जो उन पर जेल जाने की नौबत आ गयी थी और उन्हें उनके तथाकथित छोटे भाई ने सलाखों के पीछे जाने से बचाया था। वैसे यह सर्वविदित है कि नेताजी और अमर सिंह पर वर्षों से आय से अधिक संपत्ति के मामले अदालतों में घिसट-घिसट कर चल रहे हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया ने सत्ता और राजनीति के दबदबे की बदौलत हजारों करोड की जो दौलत कमायी है उसकी इसलिए ज्यादा बात नहीं होती क्योंकि भारत के अधिकांश राजनेता भ्रष्टाचार के हमाम में इस कदर नंगे हैं कि वे एक दूसरे पर उंगली नहीं उठा सकते। 'तेरी भी चुप, मेरी भी चुप' के सिद्धांत पर चलने के सिवाय उनके पास और कोई चारा नहीं है। चापलूसों, दरबारियों और दलालों में यह खासियत तो होती ही है कि वे किसी को भी प्रभावित और चमत्कृत करने की कला में पारंगत होते हैं। उनमें जोडने और तोडने का गुण भी कूट-कूट कर भरा होता है। अमर सिंह को इस कला में महारत हासिल है। उन्होंने अपने और नेताजी के आर्थिक साम्राज्य को विस्तार देने के लिए कई कलाकारियां कीं। वे १९९६ में औपचारिक रूप से समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। उसके बाद समाजवादी मुलायम सिंह का चेहरा-मोहरा बदलता चला गया। समाजवादी पार्टी विचारधारा विहीन पार्टी बनती चली गयी। आदर्श और सिद्धांतों का गला घोंटना शुरू कर दिया गया है। अमर सिंह ने यूपी में बहुजन समाज पार्टी में दल-बदल करवाते हुए समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाने का जब चमत्कार कर दिखाया तभी नेताजी की निगाह में उनका कद और बढ गया। समाजवादी पार्टी के लिए धन जुटाने के लिए अमर सिंह ने देश के तमाम बडे-बडे उद्योगपतियों से मधुर संबंध बनाये और समाजवादी पार्टी के लिए मोटे चंदे बंटोरने के साथ खुद को भी मालामाल कर दिया। उन्होंने मुलायम को भी भ्रष्टाचार करने के नये-नये गुर सिखाए। देखते ही देखते दोनों ने ऐसी आर्थिक बुलंदी हासिल कर ली, कि बडे-बडे उद्योगपति उनके सामने बौने नजर आने लगे। उनके यहां अंधाधुंध बरसी लक्ष्मी का असली सच जब धीरे-धीरे बाहर आया तो उनके लूटतंत्र की खबरें मीडिया में सुर्खियां पाने लगीं।
मनमोहन सरकार के कार्यकाल में तो सीबीआई ने नेताजी पर आय से अधिक सम्पत्ति मामले में ऐसा शिकंजा कसा कि उनका बचना मुश्किल हो गया। सिर पर गिरफ्तारी की नंगी तलवार लटकने लगी। ऐसे संकट के काल में अमर सिंह ने दिमाग दौडाया। परमाणु समझौते पर केंद्र सरकार को सपा की सहमति दिलाकर नेताजी को सीबीआई जांच से राहत दिलवायी। समाजवादी पार्टी में मची कलह ने सत्ता के भूखे यादव परिवार की पोल खोल दी हैै। देशवासी इस सच से अवगत हो गये हैं कि नेताजी का समाजवाद पूरा का पूरा ढकोसला है। उसका मूल विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। राममनोहर लोहिया ने जिन उद्देश्यों के लिए समाजवाद की नींव रखी थी और जन-जन के उद्धार के जो सपने देखे थे, वे सब चूर-चूर हो चुके हैं। लोहिया तो ईमानदारी और सादगी की जीती-जागती मिसाल थे। लेकिन मुलायम तो भौतिक सुखों के गुलाम हो चुके हैं। उन्हें तरह-तरह के समझौते करने वाले मौकापरस्त नेता के रूप में जाना जाने लगा है। यह भी सच हैै कि उन्होंने सच्चे समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के सानिध्य में रहकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। लेकिन सत्ता और परिवार मोह ने उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया। चापलूस, बाहुबली और भ्रष्टाचारी उन्हें भाने लगे। परिवारवाद के चक्कर ने तो उन्हें कहीं का नहीं छोडा। आज हालात यह हैं कि जिस पार्टी की उन्होेंने स्थापना की वही उनके हाथ से छूटती नजर आ रही है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी वे उस अमर सिंह का साथ छोडने को तैयार नहीं हैं जिनका काम ही परिवारों को तोडना और आपस में लडाई-झगडे करवाना है।
मुलायम के दरबार में बाहुबलियों और तरह-तरह के अपराधियों को मान-सम्मान मिलता है। वे घोर विवादास्पद चेहरों को भी अपनी पार्टी में लेने में गुरेज नहीं करते। आज परिवार की लडाई के कारण उनकी जगहंसाई हो रही है। सिद्धांतों को दर किनार कर चुके नेताजी की लोकप्रियता का ग्राफ घटता जा रहा है और उनके बेटे अखिलेश यादव एक ईमानदार जननेता के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। जनता यह समझ चुकी है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भ्रष्टों और बेईमानों को घास नहीं डालते, जबकि नेताजी का उनके बिना काम नहीं चलता। मुलायम सिंह को अपना आदर्श मानने वालों ने प्रदेश में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार करने के अनेकों कीर्तिमान रचे हैं जिनका मुलायम पुत्र अखिलेश विरोध करते चले आ रहे हैं। यह अखिलेश सिंह का ही दम है जो उन्होंने अपने पिता के प्रिय भाई को 'दलाल' कहने की हिम्मत दिखायी हैै। अमर सिंह मात्र एक व्यक्ति का नाम नहीं है। यह तो पाखंड, धूर्तता और स्वार्थ का प्रतीक है जो राजनीति को कलंकित करने के साथ-साथ देश को खोखला कर रहा है।
अमर सिंह को अपना आदर्श मानने वाले भी ढेरों हैं। यह भी कह सकते हैं कि देश में कई अमर सिंह पैदा हो चुके हैं। इनके कई प्रतिरूप हैं। कुछ मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के कई पीए भी बखूबी  दलालों की भूमिका निभा रहे हैं। दलाली की अपार कमायी अच्छे-अच्छों को ललचाती है। सत्ता के दलाल छोटी-मोटी दलाली नहीं करते। करोडों-अरबों के वारे-न्यारे किये जाते हैं। अरबों के बोफोर्स सौदे में ६४ करोड की दलाली ने राजीव गांधी की खटिया खडी कर दी थी। ऐसी सौदेबाजी और दलाली आज भी खायी और पचायी जाती है और इसे अंजाम देते हैं अमर सिंह जैसे दलाल। केंद्र में मोदी सरकार के बनने पर जब शहर के एक सांसद को केंद्रीय मंत्री बनाया गया तो उनका पीए बनने के लिए कुछ तथाकथित समाजसेवकों, पत्रकारों और संपादकों में होड मच गयी। शहर के एक दैनिक अखबार के संपादक ने तो मंत्री जी का पीए बनने के लिए उनकी चरणवंदना ही शुरु कर दी। शहर की सफेद, काली, पीली वजनदार हस्तियों से अपनी भरपूर सिफारिश करवायी। लेकिन मंत्री जी ने घास नहीं डाली। दरअसल, उन्हें पता था कि यह संपादक पुलिस और अपराधियों के 'मध्यस्थता के धंधे' का पुराना खिलाडी है। घाट-घाट का पानी पी चुके मंत्री जी 'आ बैल मुझे मार' की कहावत से भी वाकिफ हैं। इसलिए अमर सिंह को अपना आदर्श मानने वाले संपादक की दाल नहीं गल पायी। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी है। ऐसे लोग लाख दुत्कारे जाने के बाद भी दुम हिलाते रहते हैं और 'मान-न-मान मैं तेरा मेहमान' की तर्ज पर कहीं भी पहुंच जाते हैं।

Thursday, October 27, 2016

राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र

बात निकलती है तो दूर तक जाती ही है। फिर भी इस हकीकत को नजरअंदाज कर नामी लोग सनसनी फैलाते रहते हैं। वैसे भी इन दिनों देश में गजब की तमाशेबाजी चल रही है। इस खेल में नेता भी शामिल हैं और अभिनेता भी। फिल्म अभिनेता ओमपुरी एक जाने-माने फिल्मी कलाकार हैं। कोई जमीन से जुडा कलाकार ऐसा विवादास्पद बयान नहीं देता जो ओमपुरी ने देकर तमाम भारतीयों का सर शर्म से झुका दिया। उन्होंने बारामूला में शहीद हुए सैनिक नितिन यादव की शहादत का मजाक उडाते हुए कहा कि हमने किसी जवान पर कभी यह दबाव तो नहीं डाला कि वह सेना में जाए और बंदूक उठाए। सैनिकों की शहादत को कटघरे में करते-करते अभिनेता ने सवाल कर डाला कि 'क्या देश में १५-२० लोग ऐसे हैं जिन्हें बम बांधकर पाकिस्तान भेजा जा सके? किसी को जबरदस्ती तो फौज में नहीं भेजा जाता।' ओमपुरी ने खून खौलाने वाले बोल उगल कर पूरे देश में अपनी खूब थू...थू करवायी। न्यूज चैनलों पर भी उनकी खिल्ली उडायी गयी। उनकी अक्ल जब ठिकाने आयी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उनकी हिम्मत को दाद देनी पडेगी। जब उन्हें लगा कि देशवासी उन्हें माफ करने को तैयार नहीं हैं तो वे एलओसी में शहीद हुए जवान नितिन यादव के घर इटावा जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने शहीद को न सिर्फ श्रद्धांजलि दी, बल्कि अपने शर्मनाक बयान पर शहीद के माता-पिता के चरणों में गिरकर माफी भी मांगी। इस दौरान फूट-फूट कर रोते हुए उन्होंने कहा कि उनके मुंह से सैनिकों के लिए गलत बात निकल गई थी। श्रद्धांजलि देने के बाद उन्होंने शहीद के घर में हवन करने की इच्छा जतायी। उनका मान रखते हुए घर में हवन की व्यवस्था की गयी जिसमें एक पंडित ने मंत्रोच्चारण किया और अभिनेता समेत पिता एवं अन्य लोगों ने हवनकुंड में आहुतियां डालीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए पाकिस्तान तथा सारी दुनिया को यह संदेश तो दे ही दिया है कि अब भारत सीमा पर आतंकवाद को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देशवासियों में भी अभूतपूर्व उत्साह और जागरूकता दिखायी दी। सर्जिकल स्ट्राइक पर अविश्वास करने वालों को लगभग अनदेखा कर दिया गया। यह भी लोगों की सचेतना का ही परिणाम है कि ऐसी फिल्मों पर निशाना साधा गया जिनमें पाकिस्तानी कलाकारों को काम दिया गया। कई लोगों का यही मत सामने आया कि दुश्मन देश पाकिस्तान के कलाकारों को हिन्दुस्तानी फिल्मों में काम करने की इजाजत देकर देश के लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड नहीं किया जाना चाहिए। कुछ लोगों को पाकिस्तानी कलाकारों का विरोध रास नहीं आया। उनका मत है कि कला और कलाकार पुल का काम करते हैं, एक दूसरे को करीब लाते हैं। कलाकारों की कोई सरहद नहीं होती। सीमा की लडाई में कलाकारों को घसीटना ठीक नहीं है। लोकतंत्र में मान और मर्यादा के साथ सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है। यही तो हमारे लोकतंत्र की खासियत है। समर्थन और विरोध करने की खुली छूट है। लेकिन कुछ लोग लोकतंत्र को ठोकतंत्र और रोषतंत्र बनाने पर तुले हैं। भारतीय फिल्मों में पाकिस्तानी कलाकारों के अभिनय करने को लेकर जब विवाद ने बहुत ज्यादा जोर पकडा तो कुछ नेताओं की राष्ट्रभक्ति ने बहुत ज्यादा  जोर मारना शुरु कर दिया। जिन फिल्म निर्माताओं की फिल्मों में पाकिस्तान के कलाकारों ने अभिनय किया उन्हें अपने-अपने तरीके से धमकाया और चेताया गया। सबसे ज्यादा मुश्किल हुई करण जौहर की फिल्म 'ए दिल है मुश्किल' के साथ।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमों राज ठाकरे घोषणा कर दी कि उनकी फिल्म को किसी भी हालत में प्रदर्शित नहीं होने दिया जायेगा। जो पाकिस्तान भारत का कट्टर शत्रु है उसके यहां के कलाकारों की फिल्में भारत में दिखायी जाएं, हमें कतई मंजूर नहीं। जो फिल्म निर्माता दुश्मन देश के फिल्मी कलाकारों को करोडों की फीस देकर अपनी फिल्मों में अभिनय कराते हैं वे भी बख्शने के लायक नहीं हैं। उनका यह कृत्य राष्ट्रद्रोह है। करण जोहर के तो पसीने ही छूट गये। राज ठाकरे को मनाने के लिए उन्होंने हर उस चौखट पर शीश नवाया जो उन्हें इस मुश्किल से निजात दिला सकती थी। आखिरकार मामला प्रदेश के मुख्यमंत्री के दरबार तक जा पहुंचा। मुख्यमंत्री भी जैसे मध्यस्थता करने को तैयार बैठे थे। जिस गंभीर मसले की आसानी से नहीं सुलझने की उम्मीद की जा रही थी वह घण्टे भर में ही सुलझ गया! दरअसल, यह समझौता नहीं डील थी, जिसने राजनेताओं और सत्ताधीशों के काम करने के तौर-तरीकों को उजागर कर दिया। मनसे प्रमुख ने तीन शर्तें पूरी करने पर ही पाकिस्तानी कलाकारों वाली सभी फिल्मों के प्रदर्शन में रोडा नहीं अटकाने की बात मानी। पहली शर्त थी : जिन निर्माताओं ने पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर फिल्में बनायी हैं उन्हें आर्मी रिलीफ फंड में पांच करोड रुपये देने होंगे। दूसरी शर्त थी : पाक कलाकारों वाली फिल्म की शुरुआत में सेना और शहीद सैनिकों के प्रति सम्मान जताने वाला संदेश देना होगा। कोई भी फिल्म निर्माता आगे से पाक कलाकारों को फिल्मों में काम नहीं देगा। यकीनन तीनों शर्तें, शर्तें कम चेतावनी ज्यादा हैं। यह चेतावनी किसी को भी दहशत के हवाले करने में सक्षम है। इस समझौते की खबर के मीडिया में छाते ही मुख्यमंत्री पर भी सवाल दागे जाने लगे कि आखिर उन्होंने बिचौलिए की भूमिका क्यों निभायी? सेना फंड के लिए किसी से भी भीख मांगने नहीं जाती। सेना को जबरन वसूली का मोहरा बनाने वाले यह कैसे भूल गये कि आर्मी वेलफेयर फंड में डोनेशन के लिए किसी को विवश करना सैनिकों का अपमान है। सैनिक तो देश के सच्चे सपूत हैं। भारत मां के कलेजे के टुकडे हैं। भारतीय वीरों की कुर्बानी का लंबा स्वर्णिम इतिहास है। यह इतिहास अनमोल है। जो लोग सैनिकों के सम्मान की बोली लगाने से नहीं हिचकते उनके लिए यकीनन धन ही सबकुछ है। धन से गलत भी सही हो जाता है। इस सोच ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया है। जिन नेताओं के हाथों में इस विशाल देश की बागडोर है उन्होंने पता नहीं क्यों असली समस्याओं को नजरअंदाज करने की आदत बना ली है। देश अनेकानेक समस्याओं से जूझ रहा है। भुखमरी व कुपोषण के चलते बच्चों की मौतों के आंकडे बढते चले जा रहे हैं। आज भी १९.४ करोड लोग भुखमरी का शिकार हैं। आम आदमी की मूलभूत समस्याएं हैं रोटी, कपडा और मकान। पहले इनका हल होना जरूरी है, लेकिन राजनीति और राजनेता भटकाने के काम में लगे हैं। उत्तरप्रदेश में कुछ महीने बाद विधानसभा चुनाव हैं और राम नाम की लूट मच चुकी है। अभिनेता ने तो अपनी गलती का प्रायश्चित कर लिया, लेकिन इन नेताओं की बिरादरी का क्या... जो जोडना छोड तोडने और बांटने में लगी रहती है। गजलकार अदम गोंडवी की यह पंक्तियां काबिलेगौर हैं :
"हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेडिये
अपनी कुरसी के लिए ज़ज्बात को मत छेडिये
हममें कोई हूण, कोई शक कोई मंगोल है
दफन है जो बात, अब उस बात को मत छेडिये
ग़र गलतियां बाबर की थीं, जुम्मन का घर क्यों जले
ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेडिये
है कहां हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज खां
मिट गये सब, कौम की औकात को मत छेडिये
छेडिये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के खिलाफ
दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेडिये।"
'राष्ट्र पत्रिका' के सभी सजग पाठकों, लेखकों, संवाददाताओं, एजेंट बंधुओं, शुभचिंतकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, October 20, 2016

जंग की तैयारी

देश की राजधानी दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं है मेरठ शहर। इसी बुलंद शहर में एक युवती अपने पति के साथ बाइक पर बाजार में सब्जी खरीदने जा रही थी। रविवार का दिन था। सडक पर अच्छी-खासी चहल-पहल थी। दोनों की नयी-नयी शादी हुई थी। रास्ते में दो बाइक सवार युवकों ने सजी-धजी युवती को देखते ही फब्तियां कसनी शुरू कर दीं। पति ने देखकर भी अनदेखा कर दिया। सडक छाप मजनूओं का हौसला ब‹ढ गया। वे अभद्रता पर उतर आये। पति ने बाइक की रफ्तार धीमी कर दी और उन्हें डांटा-फटकारा। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर युवकों ने दादागिरी करते हुए उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। पति-पत्नी बाइक समेत सडक पर गिर पडे। पति के माथे से खून बहने लगा। उसने एक युवक का कालर पकडा तो दोनों युवकों ने उसकी अंधाधुंध पिटायी शुरु कर दी। आते-जाते लोग तमाशबीन बने रहे। वहां पर मौजूद दो पुलिस जवान भी चुपके से खिसकते बने। पति को पिटता देख युवती का खून खौल उठा। वह घायल शेरनी की तरह युवकों पर टूट पडी। उसने अपनी सैंडिल निकाली और धडाधड उनके माथे और सिर पर वार करने लगी। अंधाधुंध पिटायी से लहुलूहान युवकों ने वहां से भागने में ही अपनी भलाई समझी। मेरठ की इस खबर की तस्वीर अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि महाराष्ट्र के नारंगी शहर नागपुर की विचलित करने वाली खबरों ने हिलाने के साथ-साथ आश्वस्त भी किया कि नारी शक्ति अब संकोच और दकियानूसी सोच की दीवारों को लांघने और तोडने के लिए कमर कस चुकी है। संतरों की स्वास्थ्यवर्धक मिठास वाले शहर में एक मां को दो बेटियों को जन्म देने के कारण आधी रात को घर से निकाल दिया गया। भावना नामक महिला ने पुलिस स्टेशन में पहुंचकर अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उसने अंतरजातीय शादी की है। शादी के बाद पहली पुत्री पैदा हुई। पति तथा समस्त परिवार वालों को पुत्र की चाहत थी। ऐसे में जब उसने दूसरी बार भी बेटी को जन्म दिया तो उस पर प्रता‹डना का दौर शुरू हो गया। महिला का कहना है कि पति के साथ-साथ उसके ससुर ने भी अमानवीय व्यवहार किया। उस पर मायके से ५० हजार रुपये लाने के लिए दबाव डाला गया। यहां तक कि छोटी बच्ची को भी कई मारा-पीटा गया। पडोसियों ने अगर बीच-बचाव नहीं किया होता तो पति अब तक मेरी जान तक ले चुके होते। असहाय समझकर निर्दयी ससुराल वालों ने मुझे आधी रात को घर से बाहर कर दिया। उसके बाद मैंने अपने पिता को बुलवाया और नागपुर छोडकर अपने मायके बालोद (छत्तीसगढ) चली गई।
नागपुर की एक बारह वर्षीय बेटी एक दुष्कर्मी युवक की हवस की शिकार हो गयी। २० जुलाई २०१६ की रात ९ बजे वह कराटे का प्रशिक्षण लेकर अपने घर जा रही थी। रास्ते में उसे एक परिचित युवक मिला। वह उसे जबरन समीप स्थित एक खंडहरनुमा कर्मचारी क्वार्टर में ले गया। वहां पर उसने डरा-धमका कर यौन शोषण किया और फरार हो गया। माता-पिता को जैसे ही बेटी के साथ दुराचार होने की खबर मिली तो उनका मन-मस्तिष्क और आत्मा कराह उठी। किसी भी माता-पिता के लिए इससे ब‹डा दर्द और जख्म और कोई नहीं हो सकता। जिसने भी बालिका के साथ हुए दुराचार के बारे में सुना उसका खून खौल उठा। सभी ने दुष्कर्मी को मौत के घाट उतारने की मांग की। यह बालिका कराटे के प्रति पूरी तरह समर्पित है। कराटे ही उसका जुनून है। उसके साथ जब यह घिनौनी हरकत हुई तो वह कुछ दिनों बाद होने वाली कराटे की राष्ट्रीय स्पर्धा की तैयारी में तल्लीन थी। घरवालों ने मान लिया कि बेटी का भविष्य अंधेरे के हवाले हो गया है। सब कुछ लुट गया है। लेकिन बच्ची ने खुद को संभाल लिया। जब उसके कोच ने बच्ची से कहा कि इस साल तुम आराम करो, अगले साल खेलेंगे, तब बच्ची ने कहा कि सर ऐसा कभी हो नहीं सकता कि इस साल मैं न खेलूं। अगर आप साथ नहीं देंगे तो मैं अकेले खेलने जाऊंगी। यह बहादुर बेटी भले ही बदनामी के भय और पी‹डा के चलते घर में रोती-बिलखती रही, लेकिन चौथे दिन उसने यह निश्चय कर लिया कि किसी भी हालत में कुछ दिनों बाद होने वाली राष्ट्रीय स्पर्धा में भाग लेकर जीत हासिल करनी ही है। उसने पसीना बहाने में दिन-रात एक कर दिया और घटना के दसवें दिन राष्ट्रीय प्रतियोगिता जीतकर यह बता दिया कि भारतीय बेटियां किस मिट्टी की बनी हैं। इसके पश्चात वह विश्व स्तरीय प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए दक्षिण अफ्रीका रवाना हो गई। इस बेटी का यही कहना था कि मैं सबकुछ भूलना चाहती हूं। केवल यही याद रखना है कि मुझे हर हाल में विजयी होना है। मुझे किसी भी हालत में अपने सपने पूरे करने हैं। अपनी शिष्या के ल‹डाकू तेवर देखकर कोच ने कहा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा ज़ज्बा नहीं देखा। यह लडकी सदैव जीत की बात करती है। खेल के मैदान में प्रशिक्षण के दौरान उसका व्यवहार ऐसा रहता है मानो वह किसी जंग की तैयारी कर रही हो।
असीम आत्मबल, आत्मविश्वास और जागृति का ही परिणाम है कि कई भारतीय नारियां घुट-घुट कर मरने की बजाय अपने अधिकारों के लिए मर-मिटने से नहीं घबरातीं। फिर भी यही सच है कि इस देश में नारी आज भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। इतनी बडी संख्या में बलात्कार, दहेज प्रताडना, एसिड अटैक और आनरकिqलग की शर्मनाक खबरें असली सच बयां कर देती हैं। यह हकीकत भी बेहद परेशान करने वाली है कि दुष्कर्म की अधिकांश घटनाएं दलित, गरीब और पिछ‹डे वर्ग की महिलाओं के साथ ही हो रही हैं। यह जानकर भी बेहद ताज्जुब होता है कि बेटियों की तुलना में बेटों को बेहतर मानने वालों में सम्पन्न और प‹ढे-लिखे लोग भी शामिल हैं। तामिलनाडु की मशहूर अभिनेत्री खुशबू लिखती हैं : 'मैं जब पैदा हुई तो अस्पताल में मुझे देखने के लिए पिता नहीं आए क्योंकि मैं कन्या थी। यह तब हुआ जब मैं तीन भाइयों के बाद पैदा हुई थी। इस देश में महिलाओं के लिए सम्मान क्यों नहीं है? उन्हें उपेक्षा की नजरों से क्यों देखा जाता है? पुरुष का मन होता है तो कभी उन्हें लक्ष्मी, कभी सरस्वती और कभी शक्ति का अवतार बता देता है...'
यह लोगों के न सुधरने का ही परिणाम है कि देश में सख्त दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद दहेज लोभी बहुओं को आतंकित करने से बाज नहीं आते। यह भी अत्यंत चिंतनीय बात है कि ल‹डकियां अपने परिजनों के द्वारा ही ज्यादा शोषित और प्रताडित की जाती हैं। आंक‹डे बताते हैं कि नब्बे प्रतिशत बलात्कार परिचितों के द्वारा अंजाम दिए जाते हैं। गर्भ में लडकी को उसके परिवार वाले ही मारते हैं ल‹डके की चाहत में यदि लडकी हो जाए तो कूडे के ढेर के हवाले करने और कुत्तों से नुचवाने जैसी क्रूरता करने से भी बाज नहीं आते। बलात्कारियों के होश ठिकाने लगाने के लिए जो नया कानून बनाया गया है उसके अनुसार न्यूनतम सात वर्ष और अधिकतम उम्रकैद की सजा हो सकती है। फिर भी बलात्कार हैं कि थमने का नाम नहीं ले रहे। कानून के रखवाले अपना कर्तव्य किस तरह से निभाते हैं उसका पता मेरठ की घटना से चल जाता है। यदि वहां पर मौजूद खाकीवर्दी वाले घटनास्थल से भाग खडे होने के बजाय गुंडों पर डंडे बरसाते तो पुलिस की छवि कलंकित नहीं होती। उसके प्रति विश्वास जागता। अदालत के फैसलों में होने वाली देरी भी अराजकतत्वों का मनोबल बढाती है। जब तक समाज के लोग जागृत नहीं होंगे, अपराधों में कमी नहीं आएगी। तमाशबीन बने रहना भी अपने कर्तव्यों से भागना है और इस भयावह सच से मुंह मोडना है कि कल को हमारे घर की बहन-बेटियों पर भी शैतानों की गाज गिर सकती है। तब हम किसी को कोसने के भी अधिकारी नहीं होंगे।