Thursday, May 25, 2017

मोदी की खुशकिस्मती

एक व्यंग्य चित्र मेरे सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष एक दुबला-पतला हिन्दुस्तानी खडा पूछ रहा है कि साहेब, वो १५ लाख पर ब्याज, साधारण मिलेगा या चक्रवृद्धि... तीन साल हो गये तो सोचा पूछ ही लूं। हां नरेंद्र मोदी को देश की सत्ता पर काबिज हुए पूरे तीन साल हो गए हैं। जिन लोगों की याददाश्त कमजोर नहीं है वे उनसे कई सवाल करना चाहते हैं। भले ही जवाब मिलें या न मिलें। भारतीय लोकतंत्र में जनता की तब तक पूछ है जब तक चुनाव नहीं हो जाते। चुनावों के बाद नेता शासक और जनता प्रजा हो जाती है। बेचारी प्रजा हमेशा शासको के रहमोकरम की राह ताकती रहती है। शासक अपने हिसाब से काम करते हैं। अधिकतर तो अतीत में किये गये अधिकांश वायदों को ताक में रख देते हैं। बेचारी प्रजा उन्हें बार-बार याद दिलाती रहती है। प्रधानमंत्री मोदी जब देशभर में लोकसभा चुनाव का प्रचार करते घूम रहे थे तब उन्होंने कई वादे किए थे और प्रलोभन के जाल भी फेंके थे। चुनावी मंचों पर उन्होंने सीना तान कर कहा था कि जैसे ही वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे, विदेशों में पडा देश का अपार धन वापस लाएंगे और हर भारतवासी के बैंक खाते में कम अज़ कम १५ लाख रुपये तो आ ही जाएंगे। १५ लाख रुपये कोई छोटी-मोटी रकम नहीं होती।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यह कहने में जरा भी देरी नहीं लगायी कि चुनाव के समय जुमलों की बरसात करनी ही पडती है। यह १५ लाख का वादा भी दरअसल जुमला ही था, लेकिन लोग हैं कि भूलने को तैयार ही नहीं हैं। विरोधी दलों के नेताओं को भी जब भाजपा और प्रधानमंत्री पर वार करना होता है तो वे इस पंद्रह लाख का तीर छोड ही देते हैं। मोदी सरकार के कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे होने पर विभिन्न राजनीतिक विद्धान अपने-अपने विचार प्रकट कर रहे हैं। वैसे भी तीन वर्ष का कार्यकाल कम नहीं होता। लोगों को आकलन करने का पूरा अधिकार है। तीन वर्ष पूर्व मोदी जब देश के प्रधानमंत्री बने थे तब देश में गजब की निराशा का वातावरण था। सोनिया-मनमोहन के दस वर्ष के शासन काल में भ्रष्टाचार और घोटालों की खबरों के सिवाय और कुछ सुनने और प‹ढने में नहीं आता था। देशवासी बदलाव चाहते थे। इसी के परिणामस्वरूप २०१४ के आम चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा को ऐसा अभूतपूर्व जनादेश मिला जिसकी कल्पना नहीं की गई थी। मोदी ने सत्ता संभालते ही कहा था कि वे एक जनसेवक के रूप में 'सबका साथ, सबका विकास' की नीति पर चलते हुए शीघ्र ही देश की तस्वीर बदल देंगे। देशवासियों को तो उनपर भरोसा था ही, लेकिन क्या उनका कहा सार्थक हो पाया? क्या देशवासियों के अच्छे दिन आ गए हैं? क्या यह सरकार पहले वाली सरकारों से अलग है?
सबसे पहले तो इस सरकार की इस बात को लेकर तारीफ करनी होगी कि अभी तक कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया। हालांकि विरोधी पार्टियों और नेताओं ने विपक्ष की भूमिका निभाते हुए मोदी सरकार को नकारा साबित करने का अभियान चला रखा है। महागठबंधन बनाकर मोदी को घेरने के तरीके खोजे जा रहे हैं। सरकार और भारतीय जनता पार्टी के नेता विपक्ष को खिसियानी बिल्ली करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि मोदी सरकार का तीन साल का कार्यकाल अत्यंत प्रभावी रहा है। नरेंद्र मोदी की गरीबों के मसीहा की जो छवि बनी है उसे विपक्षी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। देशभर में बजते मोदी के नाम के डंके ने उनकी नींद उडा दी है। मोदी सरकार ने केंद्र की सत्ता संभालते ही बुनियादी बदलाव पर अपना ध्यान केंद्रित किया। मेक इन इंडिया, स्मार्ट इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छता अभियान और नोट बंदी का ऐतिहासिक फैसला लेकर यह संदेश दे दिया है कि वे नये भारत का निर्माण की दिशा में कदम ब‹ढाया जा चुका है। 'बेटी पढाओ, बेटी बचाओ' उनके लिए महज नारा नहीं है। सरकार समाज के हर वर्ग के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। तीन तलाक के मसले पर मोदी सरकार की लडाई को मुस्लिम महिलाओं ने भी बेहद सराहा है और अपना भरपूर समर्थन दिया है। बिजली की बचत के लिए एलईडी बल्ब के प्रयोग को प्रोत्साहन देना, गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस की उज्ज्वला योजना, फसल बीमा योजना, जन धन योजना से करोडों लोगों के लाभान्वित होने का दावा किया जा रहा है। जीएसटी के लागू होने से भी सकारात्मक नतीजों की उम्मीद की जा रही है। नोटबंदी के बाद आयकर दाताओं की संख्या करीब ९० लाख बढी है। फिर भी यह तो कतई नहीं कहा जा सकता कि मोदी सरकार पूरी तरह से जन कल्याणकारी सफल सरकार है और देश का जन-जन उसके क्रियाकलापों से प्रसन्न है। देशभर में सडकों का जाल बिछाने के साथ-साथ मेट्रो आदि का काम भी तेजी से चल रहा है, लेकिन इस देश की आधे से ज्यादा जनता रोटी, कपडा और मकान की समस्या से जूझ रही है। बेरोजगार आज भी रोजगार के लिए तरस रहे हैं। अशिक्षा और अपराध उफान पर हैं। सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का वही पुराना दस्तूर निभाया जा रहा है। महिलाएं अपराधियों के खौफ से डरी-सहमी रहती हैं। दलितों, शोषितों, वंचितों और गरीबों के चेहरे के रंग वैसे ही उडे नजर आते हैं जैसे सोनिया-मनमोहन काल में थे। यह भी सच है कि अधिकांश मीडिया भी मोदी के गुणगान में खुद को समर्पित कर चुका है। भाजपा भाग्यवान है। मोदी खुशनसीब हैं। थके-हारे निराश लोगों के समक्ष और कोई राजनीतिक विकल्प भी नहीं है। इसलिए तो दिल्ली के एमसीडी चुनाव में दस साल बाद भी भाजपा हैट्रिक लगाने में सफल हो गई। जबकि एमसीडी के भ्रष्टाचारी रवैय्ये और नालायकी के चलते दिल्ली की दुर्गति किसी से छिपी नहीं थी। इन दिनों अरविंद केजरीवाल, लालू प्रसाद यादव और चिदम्बरम परिवार के लोग बुरी तरह से भ्रष्टाचारों के आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में जनता यह सोचने को विवश हो जाती है कि इन भ्रष्ट बेइमानों से तो अपने मोदी लाख गुना अच्छे हैं। दरअसल, देशवासियों को तथाकथित लुटेरों की भीड में मोदी एक ऐसे नेता के रूप में दिखायी देते हैं जो निष्कलंक हैं। वे अपने वादे पूरे करने के मामले में भले ही कमतर दिखते हैं, लेकिन एक चरित्रवान नेता की उनकी जो छवि बनी है वो सब पर भारी है। लोग अभी भी उम्मीद लगाए हैं कि अपने दो वर्ष के बचे कार्यकाल में वे कोई चमत्कार जरूर कर दिखाएंगे। कौन नहीं जानता कि भारतवासी आशा का दामन कभी भी नहीं छोडते।

Thursday, May 18, 2017

पहले बेटों को सुधारो

फिर वही। बार...बार वही। निर्दयता और हैवानियत की पराकाष्ठा। पढने और सुनने वाले थक गये पर यही नहीं थकते। यह नहीं सुधरते। क्या यह लोग अखबार नहीं पढते। टीवी नहीं देखते। क्या इन्हें निर्भया के कुकर्मियों के हश्र की जानकारी नहीं? एक और चुभती खबर १३ मई २०१६ की है और उसी दिल्ली की है जो बलात्कारों के मामले में बेहद कुख्यात हो गयी है। एक सरकारी स्कूल में छात्राओं की काउंसलिंग के दौरान आठवीं की एक छात्रा ने आखिरकार अपने गमों का पिटारा खोल ही दिया। उसने बिलखते हुए काउंसलिंग कर रही अधिवक्ता को बताया कि उसके पिता बीते सात वर्ष से उसके साथ दुष्कर्म करते चले आ रहे हैं। उसने पिता की इस हैवानियत के बारे में उस मां को भी बताया जिसने उसे जन्म दिया और उस शिक्षिका को भी जिसे ज्ञान और प्रकाश का स्त्रोत माना जाता है। दोनों ने उसकी कोई  सहायता नहीं की।
अपना दर्द बयां करते-करते यह १७ वर्षीय किशोरी जोर-जोर से रोने लगी। छात्र-छात्राओं को कानून एवं उनके अधिकारों की जानकारी देती अधिवक्ता हतप्रभ रह गर्इं। उन्होंने ऐसे हैवान पिता को सजा दिलाने की ठान ली और फौरन किशोरी को थाने लेकर गर्इं लेकिन लापरवाह पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझने की कोशिश नहीं की। किशोरी को वापस फिर उसी घर में भेज दिया गया जहां नराधम पिता रहता है। आखिरकार पुलिस की घोर लापरवाही की शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंचायी गई तब कहीं जाकर गंभीरता के साथ मामला दर्ज किया गया।
बहुचर्चित और बहुप्रचारित निर्भया मामले में फैसला सुनाए जाने के मात्र चार दिन बाद ही हरियाणा के शहर रोहतक में ड्यूटी पर जाने के लिए घर से निकली एक युवती को अगवा कर उस पर सामूहिक बलात्कार किया गया। मानवता को शर्मिंदा कर देने वाले इस बलात्कार कांड में सात लोग शामिल थे। युवती के साथ दुष्कर्म करने के बाद उसके प्राइवेट पार्टस को नुकसान पहुंचाया गया और उसकी पहचान मिटाने के लिए उसकी खोपडी पर कार चढा दी गयी। जिनकी वजह से उसकी खोपडी की हड्डियां चूर-चूर हो गर्इं और पूरा शरीर क्षत-विक्षत हो गया। सोनीपत की रहने वाली यह युवती तलाकशुदा थी। दरअसल, एक युवक इस युवती से जबरन शादी करना चाहता था। युवती के इनकार करने पर युवक गुंडागर्दी पर उतर आया और एक दिन अपने साथियों को साथ लेकर उसके घर जा पहुंचा। वह और उसके साथी बदतमीजी करने लगे तो युवती ने युवक के मुंह पर तमाचा जड दिया। इसी तमाचे का बदला लेने के लिए युवक ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस शर्मनाक घिनौने काण्ड को अंजाम दे डाला।
१२ मई २०१७ की शाम गुडगांव की एक  युवती अपने दोस्त के साथ कनॉट प्लेस मूवी देखने गई थी। फिर दोनों एक रेस्तरां में चले गए और वहां से रात १ बजे निकले। युवती के दोस्त ने उसे ओला बुक करा दी। जब वह कैब से उतर कर घर की तरफ जा रही थी, तब तीन युवकों ने तेज रफ्तार कार में जबरन बिठा लिया। तीनों ने कार में ही बारी-बारी से उस पर बलात्कार किया और सुबह चार बजे के करीब नजफगढ बार्डर इलाके में छोड दिया। एक बाइक सवार की मदद से वह गुडगांव पुलिस के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंची। युवती विधवा है और उसका एक पांच साल का बेटा है।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब राजस्थान के शहर जयपुर में एक युवती को नौकरी दिलाने का झांसा देकर एक नामचीन होटल के कमरे में रखा गया और नशीला पेय पिलाकर बेसुध कर दिया गया। २४ घंटे में २७ लोगों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। जिनमें होटल के मैनेजर से लेकर वेटर तक शामिल थे। इस होटल का मालिक कोई बडा राजनेता है। इसलिए यहां पर ऐसे कुकर्म होते रहते हैं और पुलिस गूंगी और बहरी बनी रहती है। वैसे भी राजस्थान महिलाओं पर अत्याचार के मामले में अग्रणी है। यहां पर एक महिला के मुख्यमंत्री होने के बावजूद बच्चियों और महिलाओं पर अंधाधुंध अत्याचारों का होना बेहद चिंतित और भयभीत करता है। उम्मीद तो यह की गई थी कि प्रदेश की बागडोर वसुंधरा राजे के हाथों में आने पर नारियों का उद्धार होगा। लेकिन जो हो रहा है वह बेहद शर्मनाक है। पुलिस में दर्ज होने वाले आंकडे बताते हैं कि इस प्रदेश में हर दिन पांच-छह बच्चियां दुष्कर्म का शिकार होती हैं। जबकि असली सच यह है कि बहुतेरे मामले तोे थाने में दर्ज ही नहीं होते। हकीकत यह कि यहां पर प्रतिदिन पंद्रह से बीस बेटियों की अस्मत लूटी जाती है। पुलिस के प्रति अविश्वास और भय के चलते लोग थानों में कदम ही नहीं रखते। बूंदी जिले के देई कस्बे में एक नाबालिग दलित छात्रा के साथ गांव के दो दबंग युवकों ने बलात्कार कर घने जंगल में फेंक दिया। उन्होंने तो उसे मृत मान लिया था। लेकिन छात्रा की किस्मत अच्छी थी इसलिए बच गई। उनके चले जाने के बाद वह किसी तरह से पुलिस थाने पहुंची। ड्यूटी पर विराजमान वर्दी वालों ने पहले तो रिपोर्ट दर्ज करने में टालमटोल की, लेकिन जब लोगों ने दबाव बनाया तो पीडिता का छह-सात घंटे के बाद मेडिकल करवाया गया। इस दौरान लज्जाहीन पुलिस वालों ने अश्लील सवालों की बौछार कर उसे मानसिक रूप से परेशान करने में कोई कमी नहीं की। 
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस इक्कसवीं सदी में भी महिला मुख्यमंत्री के प्रदेश में कुरीतियों और अंधविश्वास का बोलबाला है। प्रेतबाधा, डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं पर जुल्म ढाए जा रहे हैं। किसी गांव में किसी की बकरी, गाय, भैंस, बैल आदि मर जाए तो उसका ठिकरा किसी न किसी औरत पर फूटता है। गांव के तांत्रिक को जिस महिला से दुश्मनी निकालनी होती है उसे ही वह डायन घोषित कर देता है। उसके बाद तो उस पर जुल्मों का कहर टूट प‹डता है। उसे गांव में नंगा कर घुमाया जाता हैं। हाथों में जलते अंगारे रख तडपाया जाता है और तालियां पीटी जाती हैं।
फिरोजाबाद में एक महिला को उसके शौहर ने इसलिए मारा-पीटा और तलाक दे दिया क्योंकि उसने बेटी के लिए बीस रुपये मांगे थे। इतना ही नहीं इस हिंसक शौहर ने पत्नी और अपनी दोनों बेटियों को भी घर से धक्के मार कर निकाल दिया। पत्नी का कहना था कि उसके शौहर का किसी दूसरी के साथ चक्कर चल रहा है। देश में लगातार बढते दुव्र्यवहार और दुष्कर्म की वारदातों पर चिंता जताते हुए पुड्डुचेरी की उपराज्यपाल किरण बेदी ने देशभर के माता-पिताओं को नसीहत दी है कि वे बेटों को अच्छे संस्कार दें और उन पर कडी नजर रखें। बेटों की चाहत रखने वाले मां-बाप को यह भी सोचना और देखना चाहिये कि वो सोसायटी को क्या दे रहे हैं। उनके बच्चे बडे होकर क्या कर रहे हैं। और किन लोगों के साथ उठते-बैठते हैं। बेदी ने बडे दुखी मन से यह भी कहा कि अब नये भारत का स्लोगन 'बेटी बचाओ, बेटी पढाओ' की जगह 'बेटी बचाओ, अपनी-अपनी' कर देना चाहिए। अगर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाएं तो दुष्कर्म और हत्या जैसी बर्बरता पर लगाम लग सकती है। लोगों को बेटा चाहिए, लेकिन कैसा? जो भविष्य में उनका ख्याल रखे और सोसाइटी में अपनी अहमियत रखे या वो जो हिंसक हो जाए। समाज के लिए खतरा हो। समाज के डर से बेटियों पर नजर रखी जाती है तो दूसरी तरफ बेटों को मनमानी करने की छूट दे दी जाती है। बेटे के बिगड जाने पर भी मां-बाप चुप्पी साधे रहते है। उन्हें डर रहता है कि बेटे के घर छोड देने पर उनके बुढापे का सहारा कौन होगा। जब बेटे मां-बाप पर भारी पडने लगते हैं, उनका अनादर करने लगते हैं। तब कहीं जाकर असली सच समझ में आता है। बेटियों को कमतर समझने की महाभूल उनकी नींद उडा देती है।

Thursday, May 11, 2017

न्याय की ज्योति

जिस निर्भया बलात्कार और हत्याकांड की बर्बरता ने पूरे देश को सिहरा और हिलाकर रख दिया था उसका आखिरकार ५ मई २०१७ को फैसला आ ही गया। देश के सबसे भयावह और चर्चित अपराधों में एक इस बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चारों दरिंदों की फांसी की सजा को बरकरार रखा। निर्भया के पिता ने इस फैसले को पूरे देश की बेटियों के लिए एक अच्छा फैसला बताया। वहीं मां आशादेवी ने कहा कि यह केस का अहम पडाव था जिसमें उनकी जीत हुई है। अब उन्हे रात को चैन की नींद आएगी। दोषियों को फांसी की सजा मिलने के बाद उनकी बेटी की आत्मा को भी शांति मिलेगी। यदि वह जीवित होती तो १० मई को वह २८ साल की होती। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसके लिए जन्मदिन का उपहार है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि नाबालिग बलात्कारी को उसके किए की सजा नहीं मिली। ज्योति की ९५ वर्षीय दादी परमेश्वरी देवी को जब फैसले के बारे में बताया गया तो उन्होंने डबडबाई आंखों से कहा कि अपनी बहादुर बिटिया की याद उन्हें हर रोज सताती है। वह आज भी १६ दिसंबर २०१२ की वह काली रात नहीं भूल पातीं। अब बिटिया रानी तो वापस नहीं आ सकती पर इस फैसले से उसकी आत्मा को शांति अवश्य मिलेगी। दादा बोले कि कलेजे को ठंडक मिली है। अब मैं चैन से मर पाऊंगा कि मेरी पोती को इंसाफ मिला।
वारदात के वक्त निर्भया के साथ मौजूद उसके मित्र अवनींद्र पाण्डेय ने फैसले को न्याय की जीत बताया। उन्होंने भरी आंखों से कहा कि यह फैसला निर्भया के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। इस तरह के फैसले से पीडित परिवार को न्याय मिलने के साथ-साथ ऐसे दरिंदों में डर भी पैदा होगा। उस घटना के बाद दिल्ली को छोड पुणे को अपना ठिकाना बनाने वाले अवनींद्र को वो अंधेरी डरावनी रात भुलाये नहीं भूलती। बलात्कार की बर्बर वारदात के पांच दिन बाद मौत से जूझ रही २३ वर्षीय फिजियोथेरेपी छात्रा ने २१ दिसंबर २०१२ को एसडीएम के समक्ष अपना बयान दर्ज करवाते हुए कहा था कि बलात्कारियों को फांसी पर लटका दो या जिन्दा जला दो। निर्भया की यह इच्छा कुकर्मियों के प्रति उसके अंदर के अथाह गुस्से को बयां कर गई। उसने जब अपने साथ हुई हैवानियत को शब्दों में व्यक्त किया तो एसडीएम की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। निर्भया का इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना था कि ऐसी हैवानियत उन लोगों ने अपने चिकित्सीय जीवन में पहले कभी नहीं देखी। निर्भया में अंतिम सांस तक जीने का ज़ज्बा था। उसने आखिर तक अपनी हिम्मत बनाये रखी। दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस राक्षसी तरीके से इस अपराध को अंजाम दिया गया उससे हर कोई व्यथित है। ऐसा लगता है कि यह शर्मनाक और डरावनी हकीकत किसी ऐसी दुनिया की है जहां इंसान नहीं, शैतान बसते हैं। दरिंदो ने युवती के साथ न सिर्फ बलात्कार किया, बल्कि क्रुरता की हर हद ही पार कर दी। युवती को बडी निर्दयता के साथ इधर-उधर घसीटा गया। उसके बाल पकड कर खींचे, कपडे फाड डाले। दोषियों ने युवती को मनोरंजन का साधन समझ उसके शरीर के विभिन्न हिस्सों को दांत से काटा। युवती के सारे शरीर पर दांत के निशान थे। अप्राकृतिक संबंध भी बनाए गए। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को बर्बरता की हद करार देते हुए कहा कि दोषियों ने युवती के गुप्तांगों में लोहे की रॉड भी घुसाई और आंत तक को बाहर निकाल दिया। बाद में यही युवती की मौत की वजह बनी। इतने से भी इन दोषियों का मन नहीं भरा तो उन्होंने युवती और उसके दोस्त को नग्न अवस्था में चलती बस से फेंक दिया। वे तो युवती और उसके दोस्त को बस से कुचल कर मार देना चाहते थे, जिससे कि सबूत नष्ट हो जाए।
गौरतलब है कि १६ सितंबर, रविवार की रात २३ वर्षीय मेडिकल की छात्रा निर्भया अपने दोस्त अवनींद्र के साथ पिक्चर देखकर लौट रही थी। उसे मुनीरका से द्वारका जाना था। दोनों रात ९ बजे ऑटो से मुनीरका पहुंचे थे और बस स्टैंड के पास खडे होकर बस का इंतजार करने लगे। सवा नौ बजे एक सफेद प्रायवेट बस वहां पहुंची। बस में बैठने के लिए यात्रियों को आमंत्रित किया जाने लगा। ज्योति और अवनींद्र उसमें सवार हो गए। उनके बस में सवार होते ही बस का दरवाजा बंद कर दिया गया। बस में चालक सहित छह लोग सवार थे। कुछ दूर आगे जाने पर बस के परिचालक और उसके साथियों ने निर्भया के साथ छेडखानी शुरु कर दी। विरोध करने पर उन्होंने दोनों की रॉड से बुरी तरह से पिटायी की। इसके बाद बेखौफ होकर सामूहिक बलात्कार को अंजाम दे दिया। इस दरिंदगी के बाद दोनों को निर्वस्त्र हालत में चलती बस से नीचे फेंक दिया। दोनों सडक पर बेहोश पडे थे। इस बीच कई लोगों ने दोनों को देखा, लेकिन चुपचाप आगे बढ गए। कुछ समय बीतने के बाद कुछ लोगों की मानवता जागी और उन्होंने पुलिस को वारदात की सूचना दी। इस घटना के उजागर होने के बाद पूरा देश आंदोलित हो उठा। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने इस कांड की तीखी निंदा की थी।
वतन को कलंकित करने वाले इस मामले के सभी दोषियों को १४ सितंबर २०१३ को निचली अदालत में बनी फास्ट ट्रेक कोर्ट ने सजा-ए-मौत सुनाई थी। गौरतलब है कि छह दोषियों में से एक नाबालिग था। हालांकि वह कुछ ही महीनों बाद १८ साल का होने वाला था। उसे जुबेनाइल कोर्ट भेजा गया जहां उसे तीन साल की अधिकतम सजा के साथ बालगृह सुधार केंद्र भेजा गया था। फिलहाल वहां से सजा काटने के बाद उसे खुली हवा में सांस लेने की पूरी आजादी मिल गयी है। इस नाबालिग को लेकर देश में लंबी बहस छिड गई थी। जिसके बाद कानून में संशोधन किया गया और जघन्य अपराध में आरोपी १६ से १८ वर्ष के बीच के किशोरों पर सामान्य अदालत में मुकदमा चलाने के दरवाजे खोले गए। इस मामले में एक अभियुक्त रामसिंह ने अपराधबोध के चलते जांच के दौरान जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह मामला जब हाई कोर्ट गया तो वहां भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ दोषियों ने अपील दायर की थी जिसपर ५ मई २०१७ को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। इस सामूहिक बलात्कार के दोषियों की मानसिकता कितनी गंदी थी इसका पता बलात्कारी मुकेश सिंह के उस इंटरव्यू से चलता है जो उसने बी.बी.सी. की एक डाक्युमेंट्री में दिया था। उसने बडी गुंडई, नंगई और बेहयायी के साथ कहा था कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। किसी रेप में एक लडके से ज्यादा लडकी जिम्मेदार होती है। कोई चरित्रवान लडकी रात के ९ बजे के बाद बाहर नहीं घूमती। लडका और लडकी बराबर नहीं हो सकते। लडकियां घर का काम करने के लिए बनी होती हैं न कि गलत कपडे पहन कर इधर-उधर घूमने के लिए। सिर्फ बीस प्रतिशत लडकियां अच्छी होती हैं। हम जब बलात्कार कर रहे थे तब उसे हमें रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। उसे चुपचाप जो हो रहा था, होने देना था। तब हम अपना काम करने के बाद उसे छोड देते। उसे खरोंच तक नहीं लगने देते। ऐसा लगता है कि इस वहशी के दिल और दिमाग पर उस आसाराम बापू ने अपना पूरा कब्जा जमा लिया था जिसका मत था कि यदि बलात्कृता बलात्कारियों के पैर पकड कर गिडगिडाती और कोई विरोध नहीं करती तो उसकी जान बच जाती। आसाराम ने भी यह कहा था कि ताली दोनों हाथ से बजती है। यह अत्यंत ही दुखद है कि निर्भया के केस में फॉस्ट ट्रेक कोर्ट ने भी फैसला सुनाने में काफी समय लगा दिया। ऐसी वारदातों का फैसला शीघ्र से शीघ्र आना जरूरी है। निर्भया कांड के सामने आने के बाद लोगों में सरकार के खिलाफ भी भयानक रोष था। राजधानी दिल्ली और देश के विभिन्न शहरों में निकाले गये कैंडल मार्च के दौरान हजारों लोगों की आंखों में आंसू और गुस्सा देखा गया था। लोगों ने ऐसा आंदोलन चलाया कि अंतत: सरकार भी हिल गई। देश के कोने-कोने से बस यही आवाज उठ रही थी कि निर्भया के दोषियों को भरे चौराहे पर फांसी पर लटकाया जाए। दुराचारियों को नपुंसक बनाने की मांग भी जोर-शोर से उठी थी! देश के हजारों लोगों को यही लगा था कि उसके घर-परिवार की ही बेटी के साथ यह वहशियत की गई है। हजारों सजग पुरूषों और महिलाओं की रातों की नींद उड गई थी। ऐसी ही दिल्ली की एक अनाम महिला हैं जो महीनों तक सो नहीं पार्इं। सुप्रीम कोर्ट में दोषियों की फांसी बरकरार रहने पर जितनी खुशी निर्भया यानी ज्योति के माता-पिता को मिली उतनी ही खुशी उस महिला को मिली जो निरंतर सार्थक न्याय का इंतजार कर रही थी। इस महिला ने जंतर-मंतर पर निर्भया को लेकर प्रतीकात्मक जगह पर बनाये गए 'दामिनी चौक' पर १५९४ दिन तक लौ जलाए रखी। वह प्रतिदिन यहां आती थी और प्रभु से न्याय की प्रार्थना करती थी।

Thursday, May 4, 2017

'राष्ट्र पत्रिका' की वर्षगांठ और आज का सच

राष्ट्रीय साप्ताहिक 'राष्ट्र पत्रिका' की ९वीं वर्षगांठ के इस विशेषांक की सम्पादकीय लिखते वक्त मन में कई विचार आ रहे हैं। वैसे भी जन्म दिवस आत्मविश्लेषण और चिन्तन-मनन का एक बेहतरीन अवसर होता है। यह अवसर तब और अनमोल हो जाता है जब यात्रा रोमांचक संघर्षों और अवरोधों से भरी हो। अपनी पत्रकारिता के लगभग ३९ वर्ष के कार्यकाल में इस कलमकार ने प्रिंट मीडिया के सफरनामे को बहुत करीब से देखा है। देश के विभिन्न अखबारों में नौकरी करने के बाद महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर से २१ वर्ष पूर्व राष्ट्रीय साप्ताहिक 'विज्ञापन की दुनिया' के प्रकाशन ने पत्रकारिता के क्षेत्र के और नये-नये अनुभवों से रूबरू कराया। सच के मार्ग पर चलने में कैसी-कैसी तकलीफें आती हैं इसका भी पता चल गया। सजग पत्रकारिता की निष्पक्ष और निर्भीक राह पर चलने की जिद ने ही कालांतर में 'विज्ञापन की दुनिया' के साथ-साथ 'राष्ट्र पत्रिका' के प्रकाशन की प्रेरणा दी। आज दोनों साप्ताहिक आप सबके सामने हैं। पत्रकारिता के इतने वर्षों के खट्टे-मीठे अनुभवों ने हमें यकीनन और मजबूत बनाया है। जिस तरह से नदी अपने प्रवाह के मार्ग में मौजूद पत्थरों से टकराकर उनसे आक्सीजन ग्रहण करती है उसी तरह से हमने भ्रष्ट राजनेताओं, भूमाफियाओं, सरकारी ठेकेदारों, सत्ता के दलालों और तमाम काले कारनामों के सरगनाओं से टकराकर विभिन्न चुनौतियां का डटकर सामना करना सीखा है। इससे निश्चय ही हमारा मनोबल बढा है। संघर्ष करने की इच्छाशक्ति में भी अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। सर्वधर्म समभाव... हमारी पत्रकारिता का मुख्य लक्ष्य है। देशहित हमारे लिए सर्वोपरि है।  साम्प्रदायिक ताकतों से निरंतर लोहा लेकर भी हमने नई ऊर्जा और शक्ति जुटायी है। वैसे यह भी सच है कि हमारी वास्तविक ताकत का स्त्रोत देशभर में फैले हमारे लाखों पाठक, शुभचिन्तक और विज्ञापनदाता हैं जिनकी बदौलत इस यात्रा में कभी व्यवधान नहीं आया। हमारी यात्रा निरंतर जारी है।
कई अखबारीलाल अक्सर प्रलाप करते रहते हैं कि पत्रकारिता और अखबार-प्रकाशन की राह में संकट ही संकट हैं। उनके आर्थिक संकट कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेते। दरअसल, यह वो कागजी प्रकाशक, संपादक, पत्रकार हैं जिनका आम पाठकों से कोई जुडाव ही नहीं होता। उनके अखबार में प्रकाशित होने वाले खबरें आमजन से कोई वास्ता नहीं रखतीं। उन्हें अपने आकाओं की चमचागिरी से ही फुरसत नहीं मिलती। ऐसे में उनके अखबार सिर्फ उनके घर और कार्यालय की शोभा बढाते रह जाते हैं। सजग पाठक उन्हें छूना भी पसंद नहीं करते।
किसी भी समाचार पत्र को टिकाए रखने के लिए बुनियादी जमीनी सरोकार, निष्पक्ष खबरें, निर्भीक कलम और नैतिकता की पूंजी का होना बहुत जरूरी है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, उडीसा और आंध्रप्रदेश में सफलता और लोकप्रियता के कीर्तिमान रचता चला आ रहा 'राष्ट्र पत्रिका' आज देश के जन-जन की आवाज़ बन चुका है। दलितों, शोषितों, वंचितों के साथ-साथ भूख, भुखमरी, कर्ज में डूबे किसानों के सवाल उठाने में अग्रणी इस साप्ताहिक पर हमने कभी किसी भी धन्नासेठ, भूमाफिया और राजनीतिक दल का ठप्पा नहीं लगने दिया। शासकों, राजनेताओं, नौकरशाहों और पूंजीपतियों की चाकरी करना हमारे उसूलों के खिलाफ है। हमारी कलम हमेशा उन जनसेवकों व जनप्रतिनिधियों के भी खिलाफ चलती आई है जो सत्ता और पद के अहंकार में चूर होकर अपने असली फर्ज से विमुख हो जाते हैं। यही वजह है कि 'राष्ट्र पत्रिका' ऐसे तत्वों की आंखों में खटकता रहता है। हां, हमने अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाने वाले नेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों, उद्योगपतियों आदि की तारीफ में लिखने में कभी कोई कंजूसी नहीं बरती।
वर्तमान में अधिकांश मीडिया की भूमिका समझ से परे है। खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया सिर्फ भक्तिराग के रंग में रंगा नजर आता है। ऐसे में मुझे आपातकाल की याद हो आती है जिसे १९७५ में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश पर जबरन थोपा था। कई विरोधी नेताओं, समाजसेवकों और बुद्धिजीवियों को पकड-पकड कर जेल में कैद कर दिया गया था। तब वतन के अधिकांश संपादकों, पत्रकारों और अखबारों के मालिकों ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं और मुंह सिल लिए थे। नामी-गिरामी संपादकों ने भी लोकतंत्र को रोंदने वाली अहंकारी प्रधानमंत्री की आरती गानी शुरू कर दी थी। उनकी प्रशंसा में कविताएं और लेख लिखने की झडी लगा दी गई थी। नाम मात्र के ही संपादक, पत्रकार निष्पक्षता और निर्भीकता का दामन थामे नज़र आए थे। मीडिया के आचरण से हैरान-परेशान लालकृष्ण आडवाणी ने पत्रकारों को कोसते हुए कहा था-
"उन्हें झुकने को कहा गया था,
पर वे तो रेंगने लगे!"
आज देश में आपातकाल नहीं हैं फिर भी पता नहीं ऐसा कौन-सा खौफ (लालच कहें तो ठीक होगा) है कि अधिकांश पत्रकारों ने निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करनी छोड दी है। जिसे देखो वही 'मोदी गान' और भाजपा की तारीफों के पुल बांधने में लगा है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो वादे किये थे उनकी पूर्ति कर दी गई है। रोटी, कपडा और मकान की समस्या का समाधान हो गया है। देश में अब किसी को खाली पेट नहीं सोना पडता। देश में चारों तरफ खुशहाली ही खुशहाली है। भाजपा के राज में पाकिस्तान के हौसले ठंडे पड गये हैं। नक्सलियों ने अपने हथियार फेंककर शांति के गीत गाने शुरू कर दिए हैं। चारों तरफ अमन-चैन है और हर तरफ विकास की गंगा बहने लगी है।
भाजपा शासित प्रदेशों से निकलने वाले लगभग सभी अखबार सरकारों के पक्ष में खडे नजर आ रहे हैं। उनके निकम्मेपन और भ्रष्टाचार की कहीं कोई चर्चा नहीं होती। पहले और आखिरी पन्ने पर वहां के मुख्यमंत्री की तारीफों के सिवाय और कुछ भी नहीं छपा नजर आता। शासकों की आरती में अपनी सारी ऊर्जा खपाकर पत्रकारिता को कलंकित करने पर तुले सफेदपोश, चापलूस संपादकों की बस यही चाहत दिखायी देती है कि किसी तरह से मुख्यमंत्री, मंत्रियों और बडे-बडे अफसरों की निगाह में आ जाएं और मनचाही मुराद पा जाएं। इस मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने सारी हदें ही पार कर दी हैं। चौबीस घण्टे सत्ताधीशों के महिमामंडन में तल्लीन रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो उनके भगवान हो गये हैं। वे उन्हें खुश रखने के लिए पत्रकारिता की गरिमा को रसातल में ले जाने के लिए कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। मीडिया के इस शर्मनाक पतन पर नरेंद्र मोदी भी यकीनन मन ही मन मुस्कारते होंगे। 'राष्ट्र पत्रिका' कभी भी अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं हुआ और न ही होगा। स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि बेरोजगारी, अशिक्षा, महिलाओं के साथ दुराचार और तमाम अपराधों में लगातार बढोतरी हो रही है। टुच्चे पडोसी पाकिस्तान के खिलाफ देशवासी बेहद गुस्से में हैं। यह अहसानफरामोश देश अपनी कमीनगी से बाज़ नहीं आ रहा है। जवानों के सिर काटने की पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बरता ने भारतवासियों के खून को खौला कर रख दिया है। देश प्रधानमंत्री से गुहार लगा रहा है कि-"न बात करो, न ललकार, अब तो बदला लो सरकार।" नक्सली समस्या भी विकराल रूप धारण करती जा रही है। कश्मीर के हालात भी जस के तस हैं। वतनवासी अब परिणाम चाहते हैं। नारों को क्रियान्वित होते देखना चाहते हैं। घिसे-पिटे आश्वासनों और खोखली तसल्ली के गीत सुनते-सुनते लोगों के कान पक चुके हैं। ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि उनके सब्र का बांध ही फूट जाए। इसलिए पूरी तरह से जागो सरकार, अपने सारे वादे निभाओ और पाकिस्तान और नक्सलियों को ऐसा सबक सिखाओ कि वे फिर कभी सिर उठाने की कल्पना ही न कर सकें। और हां कश्मीर की समस्या का समाधान भी आपको ही करना होगा। इसके लिए कोई फरिश्ता आकाश से नहीं टपकनेवाला। 'राष्ट्र पत्रिका' की वर्षगांठ पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, April 27, 2017

वीआईपी कल्चर की चोट

सुखदायी खबर है। आपने भी पढी और सुनी होगी। बहुत अच्छा भी लगा होगा। अब १ मई से सडकों पर लालबत्ती वाली गाडियां नजर नहीं आएंगी। सत्ताधीशों, मंत्रियों, राजनेताओं और नौकरशाहों आदि के रूतबे और अहंकार की पहचान बन चुकी लालबत्ती की एकाएक ऐसे रवानगी हो जाएगी इसकी तो कल्पना ही नहीं की गई थी। इस लालबत्ती को पाने के लिए देशभर के वीआईपी और वीवीआईपी लालायित रहते थे। इसकी विदायी का सबसे ज्यादा झटका भी इसी जमात को लगा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि वीआईपी कल्चर की देन ही है यह लालबत्ती। अपने यहां तो लालबत्ती धौंस जमाने का माध्यम भी मानी जाती रही है। देश और प्रदेशों में सरकार बदलने पर लालबत्ती पाने की होड मच जाती थी। असमाजिक तत्व और छुटभइया किस्म के नेता भी इसे पाने में कामयाब हो जाते थे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर ही यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। अंग्रेजों ने अपनी अलग पहचान दर्शाने के लिए लालबत्ती की परम्परा शुरू की थी। देश की आजादी के बाद भी इसे बडी शान के साथ अपनाये रखा गया। देश पर सबसे अधिक समय तक राज करने वाली पार्टी कांग्रेस के नेताओं के मन में तो इससे मुक्ति पाने का कभी विचार ही नहीं आया। लालबत्ती को हटाने की खबर के आते ही भाजपा शासित प्रदेशों में तो लालबत्ती को हटाने की प्रभावी शुरुआत भी हो गई है। केंद्र और कई राज्यों के मंत्रियों ने अपने हाथों से लालबत्ती उतार दी है। गैर भाजपा शासित राज्यों के कुछ मंत्रियों और विधायकों ने इस नियम के खिलाफ आवाज उठायी है।
यह भी सच है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी गाडी में कभी लालबत्ती नहीं लगाई। लालू-राबडी भी बिना लालबत्ती की कार में चलना पसंद करते हैं। कुछ नये-नवेले विधायकों, सांसदों और मंत्रियों को ही लालबत्ती ज्यादा लुभाती रही है। उन्हें लालबत्ती लगी गाडी में बैठने पर वीआईपी होने का एहसास भी होता है और गरूर भी। जब कर्पुरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उनकी कार में भी लालबत्ती नहीं लगती थी। उनके पास एम्बेसेडर कार हुआ करती थी जिसमें सात-आठ लोग बैठ जाते थे। उनसे जो लोग मिलने आते थे वे उससे बात करते और फिर पूछते कहां जाना है? वे अपनी कार में सबको बिठा लेते। जिसको जहां जाना होता उसे वहीं उतारते हुए बढ जाते। आज के दौर में ऐसे मुख्यमंत्री हैं ही कहां जिनसे लोग आसानी से मिल सकें। मंत्रियों के बडे काफिले की वजह से भी जनता को उनसे मिलने में बेहद परेशानी होती है। वीआईपी होने की सोच के साथ जीने वाले हमेशा भीड से घिरे रहते हैं। यह भीड उन चापलूसों की होती हैं जो उनको जमीन पर पैर नहीं रखने देती। काबिलेगौर है कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपनी सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही यह निर्णय ले लिया था कि उनका कोई मंत्री अपनी गा‹डी पर लालबत्ती नहीं लगाएगा। कैप्टन एक अनुभवी राजनेता हैं। उन्हें दूसरी बार पंजाब का मुख्यमंत्री बनने का सुअवसर मिला है। पटियाला राजघराने की दसवीं पीढी के इस शख्स को राजसी ठाठबाट के साथ जीने की आदत रही है। राजशाही से ताल्लुक रखने के बावजूद जनता का दिल जीतने की कला में भी कैप्टन पारंगत हैं। इसी अच्छाई के चलते ही उन्हें जनता चुनती रही है। उन्होंने भी इस सच को जान लिया है कि अब वो जमाना नहीं रहा जब राजा-महाराजा अहंकार में डूबे रहकर अपनी मनमानी करते थे।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। आम जनता ऐसे शासकों को कतई पसंद नहीं करती जो जबरन वीआईपी कल्चर को ब‹ढावा देते हैं। इतिहास गवाह है कि देश और प्रदेश में जो पार्टी सत्ता पर काबिज होती है उसके विधायकों, सांसदों की तो चांदी हो जाती है। उन्हें स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि चलाने के नाम पर करोडों रुपये की जमीनें भेंट में मिल जाती हैं। कोई भी बंदा विधायक, सांसद बनने के बाद गरीब नहीं रहता। एक ही झटके में आने वाली सात पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है। अब वक्त आ गया है कि खैरातें बांटने और सुविधाएं देने पर भी रोक लगनी चाहिए। अपने देश में तरह-तरह के वीआईपी भरे पडे हैं जो अपने संबंधों का फायदा उठाते हुए देश की आम जनता के खून-पसीने की कमाई पर डाका डालते रहते हैं। देश में बहुतेरे वीआईपी बाबाओ, संतों, प्रवचनकारों के मंचों पर राजनेता और सत्ताधीश अपनी हाजिरी लगाकर गर्वित होते हैं और उन्हें आश्रमों के नाम पर अरबों-खरबों की जमीनें उपहार स्वरूप देकर यह सोचते हैं कि इससे उनके लाखों अनुयायियों और भक्तों पर अच्छा प्रभाव पडेगा। वे उनकी पार्टी के मुरीद हो जाएंगे। जाने-माने अध्यात्मिक गुरु और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर की गिनती भी देश की अति महत्वपूर्ण शख्सियतों में की जाती है। सरकारें उन्हें हाथोंहाथ लेती हैं। २०१६ के मार्च महीने में 'आर्ट ऑफ लिविंग' ने दिल्ली में यमुना किनारे विश्व सांस्कृतिक महोत्सव मनाया था। शासन और प्रशासन उनपर मेहरबान था इसलिए उन्हें यह सुविधा मिली थी। उनके इस कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई केंद्रीय मंत्री और नौकरशाहों ने कार्यक्रम की शोभा ब‹ढायी थी। इस महाआयोजन से पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचाया गया था। यमुना नदी के पश्चिम भाग का करीब ३०० एकड और नदी के पूर्वी भाग का १२० एकड क्षेत्र तहस-नहस होने के कारण करोडों रुपये का नुकसान हुआ था। पेड-पौधों की उखाडबाजी और खोदा-खादी में जमीन की उपजाऊ क्षमता लगभग खत्म हो गई। एक आकलन के अनुसार इस नुकसान की भरपाई करने में सरकार के ४२ करोड रुपये खर्च होंगे और इसमें १० वर्ष का समय लगेगा। श्रीश्री को इतनी बडी बर्बादी से कोई फर्क नहीं पडा। उनका तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर बयान आया कि अगर पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचा है तो इसके लिए सरकार ही जिम्मेदार है। न जाने कितने वीआईपी इसी तरह से सरकारी सम्पत्ति को लूटने के साथ-साथ उसकी बर्बादी करते रहते हैं। सरकार फिर भी उनपर मेहरबान रहती है।

Thursday, April 20, 2017

थोथा चना बाजे घना

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में बुरी तरह से पराजित होने के बाद बहन मायावती ने अपनी कमियों पर ध्यान देने की बजाय यह बयान देकर देशवासियों को आश्चर्यचकित कर दिया : बसपा की हार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में की गयी हेराफेरी के कारण हुई है। बसपा जैसी मजबूत पार्टी के हारने का सवाल ही नहीं उठता था। यूपी के अधिकांश वोटर हमारे साथ थे। इसके बाद दूसरे दलों के नेताओं ने भी अपनी हार की वजहों को नजरअंदाज कर ईवीएम पर ही खीज उतारने का अभियान चला दिया। मोदी लहर में भी प्रचंड बहुमत हासिल कर दिल्ली में सरकार बनाने वाले आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने भी पंजाब में हुई अपनी हार के लिए ईवीएम को निशाने पर लेकर मायावती की तर्ज पर राग छेड दिया कि बटन किसी का भी दबाएं, वोट कमल को ही जाता है। अरविंद ने सत्ता पर काबिज होने के लिए दिल्ली के मतदाताओं से कई वादे किए थे। मतदाताओं ने उनपर भरोसा कर अभूतपूर्व मतदान किया। लेकिन अरविंद तो हवा में उडने लगे। केजरीवाल अगर दिल्लीवालों की कसौटी पर खरे उतरते तो उन्हें यह दिन नहीं देखने पडते। दिल्ली के मतदाता उन्हें सत्ता सौंपकर बुरी तरह से पछता रहे हैं। यही हाल मायावती का भी है। उन्होंने भी बसपा को अपनी जागीर समझ कर अपना धनबल बढाने के सिवाय और कोई खास जनहितकारी काम नहीं किया। यूपी के मतदाताओं ने उन्हें बार-बार मौका दिया, लेकिन वे मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद की ही प्रतिमाएं बना कर हंसी की पात्र बनती रहीं। उन्होंने सत्ता में रहते हुए दलितो, शोषितों, अल्पसंख्यकों को भी विस्मृत कर दिया जिनकी बदौलत वे राजनीति के आकाश में चमकी थीं। आज का मतदाता सजग हो गया है। भरोसा टूटते ही वह तथाकथित बडे-बडे रहनुमाओं को कूडेदान में डालने में देरी नहीं लगाता। कांग्रेस का हश्र आज सबके सामने है। देश की यह सबसे पुरानी पार्टी जल बिन मछली की तरह तडप रही है। इस पार्टी ने सबसे ज्यादा देश पर राज किया है। हर तरफ से मुंह की खाने के बाद उसे भी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन भाजपा के इशारों पर काम करती नजर आने लगी है। गौरतलब है कि भारतवर्ष में चुनावों में ईवीएम मशीनों के उपयोग की शुरुआत १९९६ में हुई। तब से सतत इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। अपनी कमियों को छिपाने के लिए ईवीएम का विरोध करने वाले राजनीतिक दल और नेताओं को तब तक ईवीएम मशीनें सही लगती रहीं जब तक वे चुनाव जीतते रहे। चुनाव हारते ही उन्हें गडबड घोटाला नजर आने लगा। कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी की अगुवाई में १३ प्रमुख दलों ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को स्पष्ट कहा है कि अपने पक्ष में नतीजे लाने के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार वोटिंग मशीनों से छेडछाड कर लोकतंत्र के साथ धोखाधडी कर रही है। उनका कहना है कि यूपी में भाजपा की प्रचंड जीत मशीनों में की गई तकनीकी गडबडी की वजह से ही संभव हो पायी है। यहां पर यह सवाल भी किया जा सकता है कि यदि भाजपा को बेईमानी ही करनी होती तो हर प्रदेश में करती। पंजाब और मणिपुर में कांग्रेस कतई नहीं जीत पाती। यहां यह भी काबिलेगौर है कि २०१० में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी ईवीएम पर सवाल उठाए थे। लेकिन इस बार जब पंजाब में उनकी पार्टी को सरकार बनाने का बहुमत मिला है तो उनकी सोच में तब्दीली आ गई है। अब वे वोqटग मशीन के बचाव में खडे नेताओं की हां में हां मिला रहे हैं। मतलब साफ है कि जब हार होती है तो मशीन में गडबडी और जब जीत तो सबकुछ ठीकठाक। यह सोच भारत के अधिकांश नेताओं के चरित्र को दर्शाती है। ईवीएम का विरोध करनेवाले नेता अब मतपत्र से चुनाव कराने की मांग करने लगे हैं। उनका यह भी कहना है कि ईवीएम से चुनाव कराना बडा महंगा भी पडता है। देश को बैलगाडी युग में ले जाने की धारणा रखने वाले यह विद्वान नेता ईवीएम पर संदेह जता कर कहीं न कहीं जनता को बरगलाना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि इनकी राजनीति ही इसी तरह से चलती आयी है। कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी जिस तरह से ईवीएम पर अविश्वास जता रही है उससे उनका बचकानापन, कमअक्ली ही जाहिर होती है। उन्हें यह तो नहीं भूलना चाहिए था कि अतीत में जब उन्होंने चुनावी जीत हासिल की थी तब भी ईवीएम का उपयोग हुआ था। ईवीएम को अपनी हार की वजह मानने वाले विपक्षी दलों के नेताओं को चुनाव आयोग ने खुली चुनौती दी है कि वे मशीन में छेडछाड करके दिखाएं। चुनाव आयोग ने कहा है कि मई के पहले हफ्ते से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और तकनीकविद एक हफ्ते या दस दिन के लिए आकर मशीनों को हैक करने की कोशिश कर सकते हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में इस्तेमाल मशीनें चुनौती के लिए लाई जाएं। आम आदमी पार्टी ने चुनौती स्वीकार कर ली है। गौरतलब है अरविंद केजरीवाल का दावा था कि अगर आयोग अपने अधिकारी की निगरानी में उन्हें ईवीएम दें तो वे साबित कर देंगे की छेडछाड होती है। केजरीवाल मानते हैं कि मशीन तैयार करते वक्त जब प्रोग्रामिंग की जाती है उसी वक्त डाटा में गडबडी की जा सकती है। चुनाव में पटखनी खाने वाले कुछ नेताओं के द्वारा पहले भी मशीन में तकनीकी गडबडी करने का आरोप लगाया जा चुका है। २००९ में भी चुनाव आयोग ने मशीन में छेडछाड करके दिखाने के लिए नेताओं को निमंत्रित किया था। लेकिन कोई भी माई का लाल यह साबित नहीं कर पाया था कि मशीन के साथ कोई कलाकारी की जा सकती है।

Thursday, April 13, 2017

कुछ भी नहीं मुश्किल

ऐसा लग रहा है कि अब भारतवासी नशों से मुक्ति चाहते हैं। देश के कोने-कोने से उठती शराबबंदी की मांग तो यही दर्शा रही है कि सजगजन शराब के दुष्परिणामों से अच्छी तरह से अवगत हो गये हैं। सरकारों को भी राजस्व की चिन्ता छोड जागने को विवश किया जा रहा है। शराबबंदी को लेकर महिलाओं की जागरूकता और आक्रामकता देखते बन रही है। यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि पुरुषों से ज्यादा महिलाएं शराब बंदी के लिए एकजुट हो रही हैं। शराब की सहज उपलब्धता ने जहां पुरुषों को नशेडी बनाया वहीं असंख्य हंसते-खेलते परिवार तबाह हो गए। परिवार की बर्बादी की सबसे ज्यादा पीडा तो महिलाओं को ही झेलनी पडती है। शराबी पति, पुत्र घरों के अंदर परिवारों पर अत्याचार करते हैं। कुछ तो इतने नशाखोर हो जाते हैं कि महिलाओं की मेहनत की कमाई पर भी डाका डालने से नहीं चूकते। नशे की लत को पूरा करने के लिए उन्हें अपने बच्चों का भविष्य अंधकारमय करने में भी लज्जा नहीं आती। शराब का नशा अक्सर सामाजिक और आपसी रिश्तों के लिए भी घातक साबित होता है। न जाने कितनी हत्याएं नशे के अतिरेक में कर दी जाती हैं। २०१७ के अप्रैल महीने की आठ तारीख को लुधियाना में एक नशे में धुत दोस्त ने दूसरे की नाक ही काट दी। बासठ साल का जंग सिंह मजदूरी करता है। रात को घर वापस लौट रहा था कि श्मशान घाट के निकट उसका दोस्त बलदेव शराब पी रहा था। इस दौरान बलदेव ने उसे शराब पीने के लिए जबरन बिठा लिया। दोनों पैग पर पैग चढाते चले गए। देखते ही देखते शराब की पूरी बोतल खाली हो गई। बलदेव ने उसे एक अन्य बोतल खरीद कर लाने को कहा। लेकिन जंग सिंह की तो जेब ही खाली थी। उसने अपनी मजबूरी बतायी तो बलवंत आग-बबूला हो उठा। विरोध करने पर पिटाई के साथ-साथ जंग सिंह की तेजधार हथियार से नाक भी काट दी। जंग सिंह बेहोश हो गया और शराबी दोस्त बलदेव वहां से भाग खडा हुआ। शराब के नशे में नाक कटने और काटने का बडा पुराना चलन है। अखंड शराबियों को वैसे भी समाज में अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। हर काम को करने का एक सलीका होता है। अपने देश में कई लोग अंधाधुंध पीकर ऐसे-ऐसे उत्पात मचाते हैं कि बेचारी शराब ही बदनाम हो जाती है। राष्ट्रीय और राज्य महामार्गों पर शराब बिक्री व सेवन पर लगी रोक से भले ही हजारों लोगों का धंधा चौपट हुआ हो, लाखों लोगों का रोजगार छिन गया हो, लेकिन यह तय है कि अब शराबी वाहन चालकों के कारण राजमार्गों पर होने वाली भीषण दुर्घटना में काफी कमी आएगी। इंसान की जान से बढकर और कुछ नहीं हो सकता। वैसे भी धन से इंसान की जान की कीमत कतई नहीं आंकी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट के अभूतपूर्व फैसले से ही यह संभव हो पाया हैं, सरकारें तो राजस्व के लालच में नागरिकों की सुरक्षा को ही नजरअंदाज करने से नहीं कतरातीं। कई राजनेता और बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि भारतवर्ष में शराबबंदी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती। हमारा तो यही मानना है कि यदि शासकों की नीयत में खोट न हो और कानून का कडाई से पालन करने की इच्छाशक्ति हो तो पूर्णत: शराबबंदी को लागू किया जा सकता है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी का एक साल पूरा हो चुका है। इसी एक वर्ष में शराब पीने के मामले में ४४ हजार लोगों को जेल की हवा खिलायी गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब बिहार में शराब बंदी का ऐलान किया था तो उन्हें जबर्दस्त विरोध का भी सामना करना पडा, लेकिन वे अडिग रहे। आज बिहार में पूरी तरह से शराब बंदी हो चुकी है। अवैध शराब की बिक्री करने की खबरें भी आती रहती हैं। उनपर कडी कार्रवाई की तलवार चलाने में देरी नहीं की जाती। काबिलेगौर सच्चाई यह भी है कि जो लोग शराब के लती थे, उनमें से अधिकांश ने इससे तौबा कर ली है। पहले जो धन शराब पर खर्च किया जाता था आज घर-परिवार पर खर्च होने से बदहाली के बदले खुशहाली के नजारे हैं। दरअसल किसी भी बुराई से मुक्ति पाना कतई मुश्किल नहीं होता। निश्चय और आत्मबल से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। दरअसल लोग पहला कदम आगे बढाने से ही घबराने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वर्षों की आदत से छुटकारा पाना मुश्किल होगा। लेकिन बिहार में इस सच पर मुहर लग गई है कि यदि शराब सहजता से मिलनी बंद हो जाए तो इससे सदा-सदा के लिए छुटकारा पाया जा सकता है।
देश के कई शहरों में बीयर शॉपी खोली गई हैं। नारंगी नगर नागपुर में भी कई गली-कूचों में खुली बीयर शॉपी देखते ही देखते लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गर्इं। बीयर शॉपी के संचालकों को सिर्फ बीयर बेचने की अनुमति दी गयी है, लेकिन यहां तो दिन भर नशेडियों का जमावडा लगा रहता है। ग्राहकों के लिए आराम से बैठकर पीने-पिलाने के पुख्ता इंतजाम कर दिए गये हैं। कुछ बीयर शॉपी के मालिकों ने बीयर पीने के लिए विशेष कमरों की भी व्यवस्था उपलब्ध करायी है। ताज्जुब की बात तो यह भी है कि कई बीयर शॉपी फ्लैट स्कीम व अपार्टमेंट्स में हैं जहां बच्चों और महिलाओं का आना-जाना लगा रहता है। ज्यादा बीयर चढा लेने के बाद कई नशेडी हर मर्यादा को ताक में रखकर युवतियों के साथ अभद्र व्यवहार करने से भी बाज नहीं आते। कम उम्र के बच्चे भी इस नशे की तरफ आकर्षित होते देखे जा रहे हैं। राजमार्गों पर शराब दुकानों पर ताले जडे जाने के बाद तो इन बीयर शॉपी पर जैसे मेला-सा लगने लगा है और लोगों की परेशानी बढती चली जा रही है। राजमार्गों की शराब दुकानों और बीयर बारों पर तालाबंदी के बाद रिहाइशी इलाकों में दुकानें और बार खुलने के खतरे भी मंडराने लगे हैं। महिलाएं तो जागृत हैं ही... शासन और प्रशासन का भी चौकन्ना रहना जरूरी है।