Thursday, January 31, 2019

असहायों के लिए जंग

यह कितनी आसानी से कह दिया जाता है कि भारतवर्ष में कानून सभी के लिए समान है। कानून की नजर में कोई छोटा है, न बडा। कानून सभी को एक निगाह से देखता है। सच तो यह है कि यह कथन उन लोगों को मजाक सरीखा लगता है, जिन्होंने न्याय की आस में अपनी उम्र बिता दी है। यह कटु सच है कि गरीब, असहाय और कमजोर वर्ग को न्याय हासिल करने के लिए अथाह तकलीफें झेलनी पडती हैं। जीवन के कई कीमती वर्ष अदालत की दहलीज पर ही एडियां रगडते-रगडते बीत जाते हैं। तारीख पर तारीख का सिलसिला चलता रहता है। लाखों लोग अदालत से न्याय पाने की आस में जवान से बूढे और फिर अंतत: परलोक सिधार जाते हैं। वर्षों से हम यही सुनते चले आ रहे हैं कि अदालतों में दो करोड से ज्यादा केस लंबित हैं। समझ में नहीं आता कि जो सरकारें वोटरों को मुफ्त में चावल, लैपटॉप आदि देकर करोडों रुपये फूंक उन्हें मुफ्तखोर बनाती हैं, उनका इस गंभीर समस्या की तरफ ध्यान क्यों नहीं जाता! क्या आम लोगों के समय की कोई कीमत नहीं है? क्या उन्हें जल्द से जल्द न्याय पाने का अधिकार नहीं है? अदालतों का विस्तार तथा जजों की और नियुक्ति कर इस गंभीर जनसमस्या का समाधान किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने स्वार्थ को साधने के लिए करोडों रुपये उडाने वाले शासकों को इस अति आवश्यक कार्य में खर्च होने वाला धन फिजूलखर्ची लगता है। हमारे यहां कुछ लोगों ने वकालत को भी क्रूर व्यवसाय बनाकर रख दिया है। अधिकांश वकील पैसे के पीछे ही भागते हैं। उन्हें समाज के दबे-कुचले, शोषित, पीडित वर्ग को न्याय दिलाने की कभी भी नहीं सूझती। यह भी सच है कि अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं, जिनमें समाजसेवा की भावना कूट-कूट कर भरी होती है। वकालत के पेशे में कुछ लोग ऐसे हैं जो बिना किसी लालच के अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। ऐसी ही एक मिसाल हैं एडवोकेट इंदिरा दानू जिन्होंने अपने पिता, परिवार, समाज की परवाह किए बगैर नेपाली मूल की दुष्कर्म पीडिता नाबालिग को न्याय दिलाया। साल २०१८ में उत्तराखंड में स्थित खाली गांव में पुल निर्माण का काम चल रहा था। इसके ठेकेदार थे इंदिरा दानू के पिता। पुल निर्माण के दौरान गांव के ही एक दबंग व्यक्ति ने नेपाली मूल की दस वर्षीया बालिका पर बलात्कार कर दिया। बलात्कारी का गांव में काफी वजन था इसलिए मामले को दबाने की भरसक कोशिशें की गर्इं। पुलिस ने नेपाली मूल के होने के कारण पीडिता की ओर से मुकदमा ही दर्ज नहीं किया। जब इस मामले की जानकारी निर्भया प्रकोष्ठ की अधिवक्ता इंदिरा को हुई तो उन्होंने पीडिता को न्याय और अपराधी को सजा दिलाने की ठान ली। इंदिरा के इस फैसले का सभी गांव वालों ने पुरजोर विरोध किया। पिता भी खासे नाराज हुए। उन्हें लगा कि बेटी बगावत पर उतर आई है, लेकिन इंदिरा ने अपने निर्णय पर अडिग रहकर वारदात के एक महीने बाद पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। बिक चुकी पुलिस पर ऐसा दबाव बनाया कि आखिरकार उसे आरोपी को गिरफ्तार करना ही पडा। फिर कोर्ट में उन्होंने ऐसी मजबूत पैरवी की, जिसके परिणाम स्वरूप कुछ ही महीने के बाद दुष्कर्मी को १२ साल की सजा हुई। पीडिता को आर्थिक सहायता के रूप में कोर्ट ने पांच लाख रुपये भी देने का आदेश दिया। एडवोकेट इंदिरा की तरह और भी कई महिलाएं हैं जो जनसेवा को ही अपना धर्म मानती हैं। उन्हें न तो प्रचार की भूख है, न ही पुरस्कारों की। वे निस्वार्थ बेबसों की सहायता में तल्लीन हैं। उन्हीं कर्मठ, जागरूक महिलाओं में से एक हैं निर्मला ठाकुर।
मूलत: काठमांडू की निवासी निर्मला १९९६ में अपने पति के साथ मुंबई आ गर्इं थीं। बचपन से उन्हें अखबार पढने का शौक था। इसे उनकी लत भी कह सकते हैं। ऐसे ही एक रोज अखबार में छपी एक खबर ने उनके जीने का अंदाज ही बदल दिया। वह खबर नेपाल से लाई गई कुछ बच्चियों के बारे में थी, जिन्हें मायानगरी मुंबई में जबर्दस्ती वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया था। बच्चियों से जबरन देह का धंधा करवाने के लिए उन्हें कैसी-कैसी यातनाएं दी जाती हैं इसका विवरण पढकर उनके दिन का चैन और रातों की नींद उड गई। काफी सोचने-विचारने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि वे किसी भी हालत में उन बच्चियों को यातना के पिंजडे से आजाद करवा और अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर ही दम लेंगी।
बीस वर्षों से बच्चियों को देह के धंधे के दलदल और तस्करों के चंगुल से बचाने में लगीं निर्मला ठाकुर को शुरू-शुरू में कई मुश्किलों का सामना करना पडा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। निर्मला को अपने पति के विरोध का भी सामना करना पडा। ऐसा भी होता था कि निर्मला को रात को जिस्म के सौदागरों के चंगुल में फंसी लडकी की खबर मिलती थी तो वे अपनी नवजात बच्ची को घर में छोडकर निकल पडती थीं। पति के गुस्से का पारा आसमान पर चढ जाता था। फिर भी बदनाम बाजार को बंद करवाने की निर्मला की जिद बरकरार रही। जब उन्होंने शुरुआत की थी तब वे अकेली थीं, लेकिन आज उनके कारवां में कई महिलाएं और पुरुष शामिल हो चुके हैं। उन्हें जैसे ही खबर मिलती है कि महानगर के किसी बदनाम बाजार में नेपाल, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल या अन्य किसी जगह की लडकियों को लाकर बेचा गया है तो वे अपने दल-बल के साथ वहां पहुंच जाती हैं। इस काम में पुलिस की भी सहायता लेती हैं। निर्मला ठाकुर को तब बडा गुस्सा आता है जब वे कुछ खाकी वर्दीधारियों को चंद सिक्कों में बिकते देखती हैं। अनेक बच्चियों को तस्करों के चंगुल से बचा और व्यस्क सेक्स वर्करों का पुनर्वास कर चुकीं निर्मला ठाकुर बताती हैं कि कई बार तो उन्हें अपने सहयोगी को ग्राहक बनाकर दलाल के पास भेजना पडता है, जो उससे लडकी का सौदा तय करता है। कमरे में जाने के बाद वह लडकी से उसी की भाषा में बात करता है और उसे योजना की जानकारी देता है। अधिकांश लडकियां कैद से मुक्ति चाहती हैं इसलिए वहां चल रहे देह धंधे की खुफिया जानकारी दे देती हैं। पुख्ता जानकारी मिलने के बाद पुलिस को खबर दी जाती है। अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित निर्मला ठाकुर को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा जा चुका है।

Thursday, January 17, 2019

जानलेवा बने क्रोध और हर्ष

यह कैसा समय है? कुछ समझ में नहीं आता। गुस्से में हत्याएं! खुशी में भी हत्याएं! कुछ लोग छोटी-छोटी बात पर किसी की जान लेने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। वे भूल जाते हैं कि इंसान की जान से बढकर और कुछ भी नहीं होता। हर इंसान अपनी पूरी उम्र जीना चाहता है। मौत की कल्पना ही बडे से बडे जिगर वाले को भयभीत कर देती है। उसके हाथ-पांव फूल जाते हैं। दिल की धडकनें बढ जाती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसी सोच रखने वाले विरले ही इंसान होते हैं जो निर्भीकता और संतुष्टि की मूर्ति होते हैं और बडे साहस के साथ यह कहने की दिलेरी दिखाते हैं, 'मैं जी भर जिया, मैं मौत से क्यों डरूं?।' यहां तो अपनी उम्र के सौ वर्ष के आंकडे के करीब पहुंच चुके मरणासन्न वृद्धों में भी और जीने की लालसा बरकरार रहती है। सबकुछ पा लेने के बाद भी उन्हें अपनी झोली खाली लगती है। यह सच बहुत ही विचलितकारी है कि हिन्दुस्तान में हर वर्ष छोटी-छोटी बातों पर हजारों पुरुषों, स्त्रियों, बच्चों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। उनके अपने जीवनपर्यंत आंसू बहाते रहते हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में कुत्ते को टेम्पो की टक्कर लगने से नाराज उसके मालिक ने चालक की चाकू से गोदकर हत्या कर दी। दिल्ली में ही एक युवक को सिर्फ इसलिए गोलियों से भून दिया गया क्योंकि राहगीर ने उसके पालतू कुत्ते को पत्थर मारा था। हुआ यूं कि आफाक नामक युवक गली से गुजर रहा था। तभी एक घर के पास पालतू कुत्ता तेज आवाज में भौंकते हुए काटने के लिए उसपर झपटा। भयभीत आफाक ने बचने के लिए कुत्ते को पत्थर मार दिया। तब वहीं पर मौजूद कुत्ते के मालिक को इतना गुस्सा आया कि उसने उसे गोली मार दी। आफाक की मौत से उसके परिवार पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा। घर में वही अकेला कमाने वाला था। हत्यारा कुत्ते को लेकर पहले भी कई लोगों से भिड चुका था।
दिल्ली के शकरपुर इलाके में मामूली से कहा-सुनी के बाद चार-पांच लडकों ने एक युवक की चाकू से गोदकर हत्या कर दी। यह हत्या इतने खौफनाक तरीके से की गयी कि शव को देखकर पुलिस वालों के भी रोंगटे खडे हो गए। हत्यारों ने युवक की दोनों आंखें फोड डालीं। उसके शरीर का ऐसा कोई भी हिस्सा नहीं बचा जहां पर उसे गोदा नहीं गया हो।
शाहदरा में अठारह वर्ष का एक युवक अपनी बहन के साथ घर से निकला था। रास्ते में तीन बदमाश बहन के साथ छेडछाड के साथ फब्तियां कसने लगे। भाई ने विरोध किया तो उन्होंने उसे चाकू मार कर बुरी तरह से घायल कर दिया। शालीमार बाग में प्रेमी-प्रेमिका में किसी बात पर बहस हो गई। प्रेमी को लगा कि प्रेमिका उसे नीचा दिखाना चाहती है। प्रेमी उस पर गंदी-गंदी गालियों की बौछार करने लगा तो नाराज प्रेमिका ने उसे थप्पड जड दिया जिससे प्रेमी का खून खौल गया और वह प्रेमिका को चाकू से तब तक गोदता रहा जब तक उसकी मौत नहीं हुई।
आज हम ऐसे दौर में हैं जहां पर कुछ लोगों के गुस्से तो कुछ लोगों की खुशी का अतिरेक निर्दोषों की जान ले रहा है। खुशियों को मातम में बदल रहा है। अपने देश में उत्सवों और खुशी के विभिन्न अवसरों पर जब नाते, रिश्तेदार, दोस्त, पडोसी और अन्य शुभचिंतक आपस में मिलते हैं तो वे खुशी से फूले नहीं समाते। ऐसे समारोहों में ढोल-नगाडे बजाये जाते हैं। आतिशबाजी भी की जाती है। थोडा-बहुत दिखावा भी किया जाता है। एक तरह से यह पुराना दस्तूर है। हर्षोल्लास के मौके बार-बार नहीं आते, लेकिन  पिछले कुछ दशकों में पिस्तोल और बंदूक से गोलियां दागने का चलन देखने में आ रहा है। अपनी शान दिखाने की इस सामंती प्रवृति को हर्ष फायरिंग का नाम दिया गया है।
नए साल के स्वागत का जश्न चल रहा था। सभी नाचते, गाते हुए एक-दूसरे को हैप्पी न्यू ईयर बोल रहे थे। रात के करीब सवा ग्यारह बजे नये वर्ष के आगमन की खुशी में नाचते-झूमते कुछ युवकों ने तमंचे से गोलियां चलायीं। इन्हीं में से एक गोली एक बच्चे के मुंह पर जा लगी। तत्काल उसे अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन उसकी मौत हो चुकी थी। इस बच्चे के पिता मीट का कारोबार करते हैं। बच्चा हमेशा कहता था कि वह पढ-लिखकर बडा आदमी बनेगा। बच्चे की असमय मौत के बाद मां का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। पिता  के लिए भी इस सदमे से उबरना आसान नहीं होगा। इसी तरह से मांडी गांव में एक पूर्व विधायक के फार्म हाऊस में आयोजित की गई पार्टी में जब सभी मेहमान अपनी मस्ती में थे तभी कुछ लोगों ने कई राउंड हवाई फायरिंग कर अपनी-अपनी खुशी का जलवा दिखाया। एक गोली ४२ वर्षीय महिला के सिर में जा लगी जिसके चलते वह लहुलूहान होकर वहीं गिर पडीं। इन सभी खूनी घटनाओं को देश की राजधानी में अंजाम दिया गया। सवाल भी उठे कि दिल्ली वालों को इतना गुस्सा क्यों आता है, जिसके चलते वे अपना आपा खो देते हैं? जवाब यह आया कि दिल्ली ही क्यों, देश के सभी महानगरों के यही हालात हैं। तनाव के कारण लोगों में निराशा की भावना बढ रही है। निराशा हिंसा को उपजा और उकसा रही है। जाम, वाहनों का शोर और प्रदूषण भी लोगों को बेसब्र, हिंसक और चिढचिढा बना रहा है। दिल्ली ही नहीं, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार में सार्वजनिक स्थलों और निजी समारोहों में अपनी रईसी और दबंगई का प्रदर्शन करने के लिए की जाने वाली हर्ष फायरिंग आडंबर होने के साथ-साथ गैर कानूनी भी है। सिर्फ खुद को प्रफुल्लित करने के लिए किसी की जान ले लेने के खेल पर रोक लगाने के लिए प्रशासन को सख्ती बरतनी ही होगी। लोगों को आखिर बडी आसानी से बंदूकें, रिवॉल्वर और तमंचे कैसे हासिल हो जाते हैं? गोलियां दाग कर खुशियां मनाने वालों को भी होश में आना होगा। यह भी जान लें कि पिछले दस-बारह वर्षों के हर्ष फायरिंग से सोलह हजार लोगों की जानें जा चुकी हैं।

Friday, January 11, 2019

लिखना और मिटाना

लगभग सभी अखबारों में यह खबर छपी 'दिल्ली के द्वारका में स्थित एक निजी शेल्टर होम में बच्चियों को जबरन मिर्ची खाने को दी जाती थीं। जो बच्चियां मिर्ची खाने से इंकार करतीं उनके निजी अंगों में मिर्च डाल दी जाती थी। यह दरिंदगी अपना आदेश और अपनी बात मनवाने के लिए की जाती थी। संचालकों का यह भी कहना है कि बच्चियों को अनुशासन का पाठ पढाने के लिए इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा था। यह खबर पढते ही मुझे बिहार के मुजफ्फरपुर में स्थित उस आश्रय गृह की याद हो आयी जहां पर बेसहारा बच्चियों और युवतियों को आसरा देने के नाम पर यौन शोषण का शिकार बनाया जाता था। अपना काम निकलवाने के लिए उन्हें सरकारी अफसरों और नेताओं की ऐशगाहों में भेजा जाता था। जो लडकियां इंकार करने की जुर्रत करतीं उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। कई-कई दिन तक खाना नहीं दिया जाता था। गंदी-गंदी गालियां दी जाती थीं।
विभिन्न न्यूज चैनलों और अखबारों के माध्यम से यह शर्मनाक सच्चाई जब देश और दुनिया के समक्ष आयी तो जबरदस्त हंगामा मचा था। नारियों को सुरक्षा देने की आड में उनकी अस्मत से खिलवाड करने वाले सफेदपोश व्याभिचारियों को भरे चौराहे पर नंगा कर फांसी के फंदे पर लटकाने की पुरजोर मांग उठी थी। बच्चियों के साथ होने वाले यौन दुव्र्यवहार के विरोध में देश के कई शहरों में जुलूस निकाले गये थे।  वैसे ऐसी प्रतिक्रियाएं हर बलात्कार की घटना के बाद आती हैं। मोमबत्तियां जलायी जाती हैं। बलात्कारियों को नपुंसक बनाये जाने तक की मांग उठती है। कानून में भी बदलाव किया जा चुका है, लेकिन फिर भी यौन हिंसा के मामलों में कमी नहीं आ रही है। किसी भी दिन का अखबार हो उसमें बलात्कार की खबर जरूर होती है। पिछले हफ्ते दिल्ली में एक युवती जब रात को अपने घर लौट रही थी तो चार गुंडे उस पर हिंसक जानवर की तरह झपट पडे। युवती गिडगिडाती रही, लेकिन घंटों उनकी मनमानी चलती रही। युवती जब पुलिस स्टेशन पहुंची तो उस पर गोली की तरह यह सवाल दागा गया कि रात के वक्त वह उस सुनसान सडक पर क्यों घूम रही थी? उसके पहनावे पर भी कटाक्ष किया गया। युवती समझ गई कि उसने यहां आकर भारी भूल की है। वह चुपचाप ऑटो कर अपने घर चल दी। दूसरे दिन एक न्यूज चैनल के संवाददाता से मिली, जिसे उसने अपने साथ हुई हैवानियत और पुलिस वालों के शर्मनाक बर्ताव का सच बताया। तीसरे दिन यह खबर कुछेक अखबारों में छपी। सच तो यह है कि ऐसी न जाने कितनी खबरें होती हैं जो सामने आने से पहले ही दम तोड देती हैं।
बरेली में एक शिक्षिका ने आत्महत्या कर ली। वजह थी असहनीय बदनामी। बदनाम करने वाला था उसका पूर्व प्रेमी। वह भी शिक्षक था। यानी दोनों पढे-लिखे। तीनेक साल पहले दोनों के नैन मिले और प्यार हो गया। दोनों मिलते-मिलाते रहे। शारीरिक मिलन भी हो गया। इसी दौरान युवा शिक्षिका को कहीं से जानकारी मिली कि उसके प्रेमी  का किसी दूसरी के साथ भी चक्कर चल रहा है। वह सतर्क हो गई। मिलना-जुलना बंद कर दिया। मोबाइल आता तो वह काट देती। युवती को अपनी जागीर समझने वाला धोखेबाज प्रेमी बौखला गया। पहले तो उसने उसे सबक सिखाने के लिए तेजाब से नहलाने की सोची। फिर उसका इरादा बदल गया। एक रात उसने अपने पांच-सात खास चेलों को बुलाया और रात के समय शहर भर की कई साफ-सुथरी दीवारों पर युवती के मोबाइल नंबर के साथ बडे-बडे अक्षरों में यह लिखवा दिया कि अपनी रातें रंगीन करने के लिए फौरन इस नंबर पर संपर्क करें। फिर तो वही हुआ जो होना था। सुबह शिक्षिका के स्कूल पहुंचते-पहुंचते अनजान लोगों के फोन आने शुरू हो गए। कोई उससे एक-दो घण्टे तो कोई पूरी रात का रेट जानना चाह रहा था। उसने अश्लील फोन करने वालों को फटकारा लेकिन उनकी बेशर्मी पर किंचित भी विराम नहीं लग पाया। शाम होते-होते तक उसे अपनी साथी शिक्षिकाओं और सहेलियों के माध्यम से शहर की दीवारों पर लिखी अश्लील इबारत की जानकारी मिली तो वह फूट-फूट कर रोयी। उसे यह जानने में जरा भी देरी नहीं लगी कि यह घटिया शरारत किसने की है। सभी ने उसे तसल्ली दी। बहुतेरा समझाया कि चिन्ता मत करो। घटिया लोग ऐसी हरकतें करते रहते हैं। हम सब मिलकर उसे सजा दिलवा कर रहेंगी। इस देश में कानून नाम की भी कोई चीज़ है। लेकिन वह शर्मिन्दगी से उबर नहीं पायी। रात को खबर आई कि शाम को स्कूल से घर पहुंचते ही उसने जहर खा कर आत्महत्या कर ली है।
 यह हमारा ही समाज है जहां पर अपना स्वार्थ पूरा नहीं होने पर महिला को चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है। इससे होता यह है कि किसी भी पुरुष को उसके साथ उसकी मर्जी के बिना संबंध बनाने का लाइसेंस मिल जाता है। बदनाम करना तो साधारण-सी बात है। पुरुष ही महिला के चरित्र के मानक तय करते हैं। महिला जब सुरक्षा की मांग करती है तो उसे नसीहत देने वाले खडे हो जाते हैं। उसे कहा जाता है कि फलां वक्त घर से बाहर न निकले। निकले तो घर के पुरुष सदस्यों के साथ। बोलने, चलने और कपडे पहनने में भी खास सावधानी बरतने के उपदेश दिये जाते हैं।
धनबाद के गांधीनगर में रहते हैं उत्तम सिन्हा। कप‹डे का अच्छा-खासा व्यापार है। इसी कारोबार के सिलसिले में सिन्हा अकसर पटना, छपरा, कोलकाता, रायपुर, लखनऊ, कानपुर, लुधियाना जैसे शहरों में जाते रहते हैं। रेल गाडियों के शौचालयों में अश्लील टिप्पणियां लिखी दिखती है तो वे तत्काल उन्हें मिटा देते हैं। इतना ही नहीं शहर के बाग-बगीचों सरकारी कार्यालयों, बस अड्डों और होटलों के शौचालय में लिखी अश्लील बातों को मिटाने में भी देरी नहीं लगाते। एक साल पहले सिन्हा अपनी पत्नी और आठ साल की बेटी के साथ कोलफील्ड एक्सप्रेस से हावडा से धनबाद आ रहे थे। रेलगाडी कुछ ही दूर चली थी कि बेटी ने टायलेट जाने की इच्छा व्यक्त की। सिन्हा बेटी को शौचालय तक ले गए। बाहर आने पर उसने शौचालय के अंदर लिखी गंदी इबारत के बारे में ऐसे प्रश्न पूछे कि वे स्तब्ध रह गए। बेटी के प्रश्नों ने उन्हें झकझोर दिया। वे फौरन शौचालय के अंदर गए और दीवार में लिखे अश्लील वाक्यों को तुरंत मिटा दिया। तब से लेकर अब तक सिन्हा २५० से अधिक शौचालयों की दीवारों पर लिखे अपशब्द मिटा चुके हैं। अश्लील कमेंट मिटाने के बाद सिन्हा शौचालय की दीवार पर पोस्टरनुमा कागज चिपकाते हैं,जिस पर लिखा होता है स्टॉप राइटिंग। इस शौचालय का प्रयोग आपकी मां-बहन भी करेंगी। उन पर क्या बीतेगी, सोच कर देखिए। आत्मा तक शर्मसार होगी।

Thursday, January 3, 2019

अपराधी बनाते मोबाइल ने उडायी नींद

मोबाइल की लत बडों को ही नहीं बच्चों को भी अपराधी बना रही है। मोबाइल के प्रति बच्चों का लगाव और जिद्दीपन सभी सीमाएं लांघता चला जा रहा है। माता-पिता की रोक-टोक उन्हें बर्दाश्त ही नहीं होती। मोबाइल की जुदायी में तो किशोर और युवक आत्महत्या करने से भी नहीं हिचक रहे हैं। नागपुर के महल इलाके में एक मां ने अपने पंद्रह वर्षीय बेटे को घंटों मोबाइल से चिपके रहने के कारण डांटा-फटकारा और जब जिद्दी बेटा नहीं माना तो उसने उससे मोबाइल छीनकर अपने पास रख लिया। बेटे ने मां का जबरदस्त विरोध किया। रोया-गि‹डगि‹डाया, लेकिन मां नहीं मानी तो बेटे ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। नागपुर के ही छठवीं और नौवीं कक्षा में पढने वाले दोनों भाई प्रतिदिन स्कूल से आते ही अपने पिता के मोबाइल पर कब्जा कर वीडियोज देखने में तल्लीन हो जाते। घंटों यह सिलसिला चलता रहता। एक दिन दोनों की किसी निहायत ही अश्लील वीडियो पर नज़र पड गयी। फिर तो उन्हें ऐसे वीडियो देखने का चस्का ही लग गया। स्कूल से आते और घंटों ब्लू फिल्में देखते रहते। किताबों की जगह स्त्री-पुरुष की नग्न तस्वीरें उनके मन-मस्तिष्क में घूमती रहतीं। किसी लडकी को देखते ही गंदे-गंदे विचार घेर लेते। एक दिन दोनों ने स्कूल के वॉशरूम में आठवीं में पढने वाली लडकी को दबोचा और बलात्कार कर खिसक गये। नागपुर की ही एक आठवीं कक्षा की छात्रा का अपने फेसबुक फ्रेंड से ऐसा कुछ चक्कर चला कि वह एक दिन ट्यूशन के बहाने घर से भाग गई। कुछ दिनों के बाद घर वालों को खबर मिली कि वह पंजाब के शहर पटियाला में है। उसे नागपुर लाया गया तो पता चला कि नाबालिग ल‹डकी ने उस दोस्त से विवाह कर लिया हैं।
नागपुर के निकट स्थित गोंदिया में भी 'मोबाइल रोग' बुरी तरह से फैल चुका है। पढाई-लिखायी भूलकर जब देखो तब मोबाइल पर गेम खेलने और फेसबुक में खोये रहने वाले एक युवक को माता-पिता ने लताड लगायी तो वह आत्महत्या करने को उतारू हो गया। माता-पिता भयभीत हो गए। उन्हें लगा कि उन्होंने पुत्र को समय का सदुपयोग करने की सीख देकर कोई भारी भूल कर दी है। उत्तराखंड में एक स्कूल के चार नाबालिग छात्रों को स्कूली छात्रा के रेप में पक‹डा गया। पूछताछ में चारों ल‹डकों ने कहा कि उन्होंने कई दिनों तक पॉर्न साइट्स देखीं और उसके बाद वे अनियंत्रित हो गये। जैसे ही मौका मिला उन्होंने अपनी इच्छा पूरी कर ली। सच तो यह है कि पॉर्न वीडियो की इंटरनेट पर सहज उपलब्धता के कारण बच्चे, किशोर और युवक अपराध के रास्तों की ओर तेजी से अग्रसर हो रहे हैं। मार्केट में २० लाख से ज्यादा पॉर्न वीडियो उपलब्ध हैं और लाखों साइट्स हैं, जहां से इन्हें डाउनलोड किया जा सकता है। महिलाओं के प्रति बढते अपराधों में पॉर्न साइटस का बहुत बडा योगदान है।
मुंबई के लीलावती अस्पताल के डॉक्टरों ने गहन अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि मोबाइल फोन की लत बच्चों के हार्मोन सिस्टम को बर्बाद कर रही है। वासना की सोच उनपर इस कदर हावी हो रही है कि वे हिंसक होते चले जा रहे हैं। अधिकांश बच्चे स्कूल से आने के बाद घंटों मोबाइल में गेम खेलते हैं, तो माता-पिता इस तरफ ध्यान ही नहीं देते, रोकना-टोकना तो दूर की बात है। मोबाइल का अत्याधिक प्रयोग बच्चों की रीढ की हड्डी के अलावा शारीरिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर रहा है। सात से दस वर्ष के बीच के लाखों बच्चे मोबाइल के लती हो गये हैं। दो से पांच साल तक के बच्चों के लिए भी मोबाइल फोन एक सहज खिलौना बन गया है, जिससे चिपके रहने में उन्हें भरपूर खुशी मिलती है। मां-बाप अगर उनसे मोबाइल से दूरी बनाने को कहते भी हैं तो उन्हें गुस्सा आ जाता है। हल्की-सी डांट-फटकार पर घर छोडने और आत्मघाती कदम उठाने को तत्पर हो जाते हैं। इस तरह की खबरों में निरंतर होता इजाफा यही बताता है कि बात बहुत आगे बढ चुकी है। यह पंक्तियां लिखते समय मुझे ब्लू व्हेल गेम जैसे हत्यारे खेल की याद आ रही है जो देश और दुनिया के सैकडों बच्चों, किशोरों और युवाओं की जान ले चुका है। एक जमाना था जब बच्चे मस्त रहा करते थे। गर्मी की छुट्टियों में अपने नाना-नानी, बुआ, मौसी और अन्य रिश्तेदारों के यहां जाकर तरह-तरह के खेल खेला करते थे। खेतों, बाग-बगीचों में लगे कच्चे-पक्के फलों का लुत्फ उठाया करते थे। नयी-नयी जानकारियों से वाकिफ होने का अवसर मिलता था। रिश्तों की अहमियत भी पता चलती थी, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। बच्चे प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। एक जाने-माने समाजशास्त्री कहते हैं कि पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे, जहां बडे-बुजुर्ग बच्चों पर हर समय नजर रखा करते थे, उन्हें अच्छे संस्कार देते थे, लेकिन आज बस धन कमाने और अपने में सिमट कर रहने के दौर में तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों से जुडाव नहीं होने के कारण बच्चे खुद को बहुत अकेला समझने लगे हैं। इस आधुनिक युग ने तो उनका मोबाइल से ऐसा नाता जोड दिया है कि वे इससे दूर ही नहीं होना चाहते। 
सभी माता-पिता यही चाहते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, उनके बच्चे पढाई में अव्वल रहें। इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को कडी प्रतिस्पर्धा में झोंक दिया है। पांचवीं-छठवीं क्लास के बच्चे अपनी पीठ पर वजनी बस्ता लादे ट्यूशन की भागमभाग में देखे जा रहे हैं। न उन्हें खेलने का वक्त मिलता है और ना ही उन शैतानियां को करने का जो कभी बचपन की पहचान हुआ करती थीं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि कम्प्यूटर के इस युग ने बच्चों को अपनी उम्र से भी बडा बना दिया है। अधिकांश माता-पिता खुद तो बच्चों की पढाई-लिखायी पर ध्यान देने के लिए समय नहीं निकालते या निकाल नहीं पाते, लेकिन यह जरूर चाहते हैं कि स्कूल के शिक्षक यानी मास्साब बच्चे की हर कमी को दूर कर दें। अधिकांश शिक्षक भी शिक्षा को धंधा मानने लगे हैं। उनके लिए छात्र ग्राहक हैं। जो थोडे-बहुत शिक्षक गंभीरता से अपने छात्रों को पढाते हैं और उन्हें सुधारने के लिए डंडा चलाते हैं उनपर अब पालकों की गाज गिरने में भी देरी नहीं लगती। नागपुर में एक स्कूल के शिक्षक ने सातवीं के एक छात्र को उसकी किसी कमी को दूर करने के लिए दंडित किया तो इसके विरोध में उसके परिजन छलांगे लगाते हुए स्कूल जा पहुंचे और शिक्षक की ही पिटाई कर डाली। स्कूल की महिला शिक्षकों को भी नहीं बख्शा गया। आखिरकार मामला पुलिस थाने तक पहुंच गया और अखबारों की सुर्खियां भी बना।

Thursday, December 27, 2018

कैसे-कैसे सच

भारत के इतिहास में ऐसे कई महापुरुषों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने देशवासियों को जागृत करने के अभियान में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। किताब का पन्ना-पन्ना उनकी कर्मठता और त्याग की गाथा सुनाता है। उन्होंने लीक के फकीरों के हर विरोध और अपमान का हंसते-हंसते सामना कर जिन संदेशों के तराने गाए उनकी गूंज आज भी सुनायी देती है। अपनी उम्र के चालीस वर्ष भी पूरे न कर पाने वाले स्वामी विवेकानन्द की प्रेरक जीवनी दुर्बलों को सबल बनाती है। उनके प्रेरणादायक विचार सदियों तक जिन्दा रहेंगे। उनका मानना था कि "बिना संघर्ष के कुछ भी नहीं मिलता। जिन्दगी में हमें बने बनाए रास्ते नहीं मिलते। आगे बढने के लिए खुद ही अपने रास्ते बनाने पडते हैं। हर नये और बडे काम को पहले उपहास तथा विरोध का सामना करना पडता है और उसके बाद ही स्वीकृति मिलती है। लोग तुम्हारी प्रशंसा करें या आलोचना, तुम्हारे पास धन हो या नहीं हो, तुम्हारी मृत्यु आज हो या बडे समय बाद हो, तुम्हें पथभ्रष्ट कभी नहीं होना है।"
अपने कर्तव्य से मुंह चुराने वाले कामचोरों ने हर सदी में विचारवानों को चिंतित और परेशान किया है। आपसी रिश्तों में कडवाहट का होना भी कोई नयी समस्या नहीं है। आपसी कलह के कारण सदियों पहले भी परिवार टूट जाया करते थे। अगर ऐसा नहीं होता तो शांतिदूत श्री गुरुनानक देवजी को यह नहीं कहना पडता : "अपने घर में शांति से निवास करने वालों का यमदूत भी बाल बांका नहीं कर सकता।" ओशो भी यही तो कहते हैं,  "पारिवारिक मोर्चे पर हारा हुआ व्यक्ति कहीं भी सफल नहीं हो सकता। अगर कहीं हो भी गया तो भयावह अधूरापन उसका कभी पीछा नहीं छोडता। अधिकांश लोग दूसरों की कमियों और बुराइयों की गिनती करने में ही अपना बहुत सारा कीमती समय बर्बाद कर देते हैं। अपने दुगुर्ण छिपाते हुए खुद को जीवन पर्यंत धोखा देते रहते हैं।
कबीर दास ने लिखा है :
"बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना
मुझसे बुरा न कोय।।"
ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो एक ही झटके में बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं। सब्र करना तो उन्हें आता ही नहीं। ऐसा लगता है कि इस रोग की जडें भी बडी पुरानी हैं। तभी तो सदियों पहले संत कबीर को यह संदेश देना पडा :
"धीरे-धीरे रे मना
धीरे-धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घडा,
ऋतु आए फल होय।"
यानी... धैर्य रखना बहुत जरूरी है। हर काम अपने तय समय पर ही होता है। पेड को सैकडों घडे पानी से सींचने पर कुछ नहीं होगा। पेड पर फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा। इतिहास गवाह है सपने उन्हीं के पूरे होते हैं जो उन्हें साकार करने में कोई कसर नहीं छोडते। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम हमेशा युवाओं को प्रेरित करने के उद्देश्य में कहा करते थे : सपने वो नहीं होते जो आपको नींद में आते हैं बल्कि वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते। आदरणीय अब्दुल कलाम सिर्फ उपदेश ही नहीं देते थे। जैसा कहते थे, वैसा करते ही थे। उनका मानना था कि पिता, माता और शिक्षक ही देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सकते हैं। वे छात्र-छात्राओं को प्रेरित करने के लिए ऐसे-ऐसे उदाहरण देते थे। जिन्हें नजरअंदाज कर पाना आसान नहीं होता था। वे टालमटोल और समय को बरबाद करने वालें लोगों को कतई पसंद नहीं करते थे। उनके इस कथन में कितनी बडी सीख छिपी है : "इंतजार करने वालों को केवल उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले छोड देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लोगों का उत्साह जगाने वाले प्रेरणा गुरुओं की बन आई है। हताशा और निराशा के शिकार लोगों का मनोबल बढाने वाले इन ज्ञानियों को परामर्शदाता तथा 'मोटिवेशन स्पीकर' भी कहा जाता है। कुछ मोटिवेशन गुरु अच्छी खासी भीड जुटाने में कामयाब हो रहे हैं। यह अपने बोलने के अंदाज और भव्यता के कारण भी जाने जाते हैं। इनको सुनने वालों कीं भीड में युवाओं की संख्या ज्यादा देखी जा रही है। दूसरों का मनोबल बढाने का दावा करने वाले इन 'गुरूओं' में कितने असली हैं, कितने नकली इसका पता लगा पाना बेहद मुश्किल है। फिर भी लगभग सभी की चांदी है। यह धुरंधर स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, गुरुनानक देवजी, कबीरदास, लाल बहादूर शास्त्री, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा कुछ अन्य नामी-गिरामी हस्तियों की संघर्ष गाथा और उनके संदेशों और उपदेशों के उदाहरण देकर लाखों-करोडों की कमायी कर रहे हैं। कुछ का तो सोशल मीडिया पर भी अच्छा-खासा डंका बज रहा है। बीते वर्ष ऐसे ही एक भीड जुटाऊ युवा 'मोटिवेशन स्पीकर' की किताब 'हिम्मत से करें मुश्किलों का सामना' बाजार में आई तो खरीददारों की लाइन लग गई। इस चमत्कार ने प्रकाशक को भी हैरान कर दिया। इस किताब की देशभर में चर्चा होती रही। इसी बीच किसी जोरदार धमाके की तरह देश और दुनिया को विस्मित कर देने वाली यह खबर आई कि इस युवा 'मोटिवेशन स्पीकर' ने खुद पर गोली चला कर आत्महत्या कर ली है। उनकी आत्महत्या को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि ऐसी कौन सी मुश्किले थीं जिन्होंने तेजी से उभरते परामर्शदाता, लेखक, प्रवचनकार को आत्महत्या करने को विवश कर दिया। इस विस्मयकारी आत्महत्या को लेकर कई दिनों तक मेरे मन-मस्तिष्क में हलचल मची रही और तरह-तरह के सवाल नींद उडाते रहे। इसी दौरान मुझे कई बीमारियों, तकलीफों और चलने-फिरने में असमर्थ होने के बावजूद प्रसन्नता, जीवंतता का मंत्र फूंकने वाले स्पर्श शाह से रूबरू होने का अवसर मिला। मूलरूप से गुजरात के सूरत के निवासी माता-पिता की संतान स्पर्श ने जब जन्म लिया तो उनके शरीर में चालीस फ्रैक्चर थे। डॉक्टरों ने कह दिया था कि यह बच्चा दो दिन से ज्यादा जिंदा नहीं रहेगा। लेकिन आज वे न केवल जिन्दा हैं बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी हैं। स्पर्श के शरीर में अबतक १३५ फ्रेक्चर हो चुके हैं और कई बार सर्जरी हो चुकी है। उनके शरीर में आठ रॉड और बाईस स्कू्र लगे हैं। फिर भी वे खुद ठहाके लगाते हैं और दूसरों को भी हंसाते और जगाते हैं। हमेशा बिस्तर और व्हीलचेयर पर रहने वाले स्पर्श बहुत अच्छे गायक होने के साथ-साथ ऐसे गजब के मोटिवेशन स्पीकर हैं जिन्हें देखते ही लोगों में ऊर्जा का संचार हो जाता है। उन्हें कम से कम शब्दों का सहारा लेना पडता है। उनका शरीर ही बहुत कुछ कह देता है। यही वजह है कि उन्हें देखने और उनकी स्पीच सुनने के लिए आम और खास लोग उमड पडते हैं। वर्तमान में न्यूयार्क में रह रहे स्पर्श को दुनिया भर के देशों से स्पीच देने के लिए निमंत्रण मिलता रहता है। अभी तक वे ६ देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके है। मोटिवेशन स्पीच और गायन से होने वाली सारी की सारी कमायी को स्पर्श विभिन्न जनसेवी संस्थाओं को दान कर देते हैं।

Thursday, December 20, 2018

समुंदर के असली तैराक

वे अपंग हैं। देख और सुन नहीं सकते। चलने-फिरने में भी लाचार हैं। कुदरत ने यकीनन उनके साथ कहीं न कहीं अन्याय तो किया ही है। फिर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। उनकी ऊर्जा और कार्यक्षमता स्तब्ध कर देती है। दूसरों को कुछ कर गुजरने के लिए उकसाती है। उन्होंने यह भी आसानी से आत्मसात कर लिया है कि कमियों और गमों की चादर ओढने से तकलीफें और बढेंगी। अंधेरा और घना होता चला जाएगा। धार्मिक नगरी ऋषिकेश में रहती है ३२ वर्षीय अंजना मलिक जो दोनों हाथों से दिव्यांग है। वह अपने पैरों से ऐसी-ऐसी मनोहारी पेंटिंग बनाती है जिसे कला के कद्रदान खुशी-खुशी हजारों रुपये में खरीद लेते हैं। पंद्रह साल पहले अंजना सडक के किनारे खडे होकर भीख मांगा करती थी। कई घंटे सर्दी, धूप और बरसात झेलने के बाद उसके भीख के कटोरे में बीस-पच्चीस रुपये ही जमा हो पाते थे। धार्मिक नगरी ऋषिकेश में विदेशी पर्यटकों का भी आना-जाना लगा रहता है। सन २०१५ में घूमने आई एक अमेरिकी कलाकार स्टीफेनी की नजर अपने पैर की अंगुलियों से चार कोल का एक छोटा टुकडा थामे फर्श पर 'राम' शब्द उकेरने का प्रयास करती दिव्यांग अंजना पर पडी तो वह रूक गर्इं और काफी देर तक उसे निहारती रहीं। चित्रकार स्टीफेनी को अंजनी के भीतर छिपा कलाकार नज़र आ गया। वे अंजना के निकट जाकर बैठ गर्इं। उसके घर-परिवार के बारे में जाना। उन्होंने अंजना को स्वाभिमान से जीने के लिए अपने हुनर को विकसित करने का सुझाव दिया। इतना ही नहीं उस परोपकारी विदेशी महिला ने कुछ दिन ऋषिकेश में रूककर अंजना को चित्रकला का प्रशिक्षण भी दिया। यह अंजना की लगन ही थी कि वह देखते ही देखते देवी, देवताओं, पशु, पक्षियों और प्रकृति की सुंदरता को कागज़ पर साकार और आकार देने लगी। धीरे-धीरे उसके बनाये आकर्षक चित्रों के कद्रदान बढते चले गये और अच्छे दाम भी मिलने लगे। कभी फटे-कटे लिबास में भीख मांगने वाली अंजना आज चेहरे पर मुस्कान लिए पैरों की अंगुलियों से तूलिका थामे तरह-तरह के चित्र बनाती है तो नामी-गिरामी चित्रकार भी उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। कभी अंजना और उसके परिवार को फुटपाथ पर रातें काटनी पडती थीं, लेकिन अब पूरा परिवार सर्व सुविधायुक्त किराये के घर में सुख-चैन के साथ रहता है। अंजना का अपने घर का सपना भी शीघ्र साकार होने जा रहा है। पेंटिंग बेचकर हजारों रुपये कमाने वाली अंजना को स्टीफेनी की बहुत याद आती है। वह उनसे मिलकर धन्यवाद... शुक्रिया अदा करना चाहती है। अगर उन्होंने उसे चित्रकला का हुनर न सिखाया होता तो वह आज भी सडक पर भीख मांग रही होती। हां, स्टीफेनी भी अंजना को नहीं भूली हैं तभी तो पिछले वर्ष उन्होंने अंजना को अमेरिका से एक पार्सल भेजा जिसमें उनके चित्रों का एक शानदार एलबम और कुछ उपहार थे।
पूरी तरह से दृष्टिहीन हैं अनिल कुमार अनेजा। इनका संघर्ष आंख वालों की भी आखें खोल देता है। वे दिल्ली यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। समझौते की बजाय संघर्ष की पगडंडी में चलने की जिद का दामन तो उन्होंने तभी थाम लिया था जब उनकी स्कूल जाने की उम्र हुई थी। माता-पिता ने स्कूल भेजने से इनकार कर दिया था, लेकिन उन्होंने जिद पकड ली थी कि हर हालत में स्कूल जाएंगे और खूब पढेंगे-लिखेंगे। उनकी एक बहन भी थी जो उन्हीं की तरह दृष्टिहीन थी। उसने माता-पिता की बात मान ली थी। जब उन्होंने दो दिन तक खाना नहीं खाया और किसी से बातचीत नहीं की तो माता-पिता ने उनका स्कूल में दाखिला करा दिया। आगे का सफर तो और भी मुश्किल था, लेकिन अनिल की लगन और जिद हर संकट से टकराती रही। तब ब्लाइंड स्कूलों में म्यूजिक और हैंडिक्राफ्ट्स जैसी चीजों पर ही फोकस किया जाता था, लेकिन अनिल ने यहां भी जिद की, कि उन्हें सामान्य बच्चों की तरह दूसरे विषय पढने हैं। उन्हें दूसरों से कमतर न आंका जाए। शिक्षकों ने तो मान लिया था कि यह अंधा सामान्य बच्चों की तरह पढाई नहीं कर पायेगा, लेकिन अनिल ने साबित कर दिखाया कि वह किसी से कम नहीं है। जैसे दूसरे छात्र हिन्दी, अंग्रेजी, इतिहास, पालिटिकल साइंस और संस्कृत पढते हैं वैसे ही उसने उन्हें न सिर्फ जाना और समझा बल्कि दक्षता भी हासिल की। अपने मेहनत के बलबूते पर सीबीएसआई की मेरिट लिस्ट में आने वाले अनिल ने शिक्षकों की सोच को बदल दिया। उन्हें दिल्ली के सेंट स्टीफंस में इंगलिश ऑनर्स में एडमिशन मिल गया। पढाई के साथ-साथ उन्होंने नाटकों और भाषण प्रतियोगिताओं में भी जमकर हिस्सा लिया और नाम कमाया। दिल्ली यूनीवर्सिटी से एमफिल और पीएचडी करने के बाद वे १९७७ में रामजस कॉलेज में अंग्रेजी पढाने लगे। यह गरिमामय पद उन्हें आसानी से नहीं मिला। अधिकतर लोग यही मानते थे कि जो देख नहीं सकता वह दूसरों को पढा-लिखा भी नहीं सकता। यह तो मात्र एक पडाव था। उसके बाद उन्होंने और भी कई डिग्रियां हासिल करते हुए दृष्टिहीनों के अधिकारों की लडाई के प्रति खुद को समर्पित कर दिया। कई किताबे भी लिखीं। इस संघर्ष के महारथी को २०१४ में 'नैशनल अवार्ड' से सम्मानित किया गया। प्रोफेसर अनिल का कहना है कि यह तो अभी शुरुआत है। आगे बहुत कुछ करना बाकी है।
एस. रामकृष्णन की नौसेना में जाने की प्रबल तमन्ना थी। अपनी चाहत को पूरा करने के लिए उन्होंने खूब मेहनत की। सैन्य परिक्षण के दौरान उन्हें एक पेड से नीचे प्लेटफॉर्म पर कूदना था, लेकिन संतुलन बिगड गया। तय जगह के स्थान पर जमीन पर जा गिरे। इस दुर्घटना ने उन्हें अपंग बना दिया। शरीर के अधिकांश हिस्से निष्क्रिय हो गये। सभी सपनों की मौत हो गई। जीवन चुनौती-सा लगने लगा। जो युवक सैनिक बनकर देश की सेवा करना चाहता था उसकी दूसरों पर आश्रित रहने की नौबत आ गयी। ऐसे विकट काल में घर-परिवार और रिश्तेदारों ने पूरा साथ दिया। कुछ समय गुजरने के बाद उन्होंने दाल-रोटी के लिए अपने गांव में ही प्रिंटिंग प्रेस शुरू की, लेकिन लोगों के अविश्वास और असहयोग के कारण शीघ्र ही प्रेस पर ताला लगाना पडा। इस हकीकत ने उन्हें बेहद आहत किया कि अधिकांश लोग शारीरिक रूप से अक्षम इन्सान को पूरी तरह से नाकाबिल समझ लेते हैं। उस पर भरोसा ही नहीं करते। समाज की इसी बेरूखी ने उन्हें हिलाकर रख दिया और उनके मन-मस्तिष्क में यह विचार आया कि अपने देश में जो हजारों-लाखों दिव्यांग हैं क्यों न उनके लिए कुछ किया जाए। उनकी निराशा को आशा में बदला जाए। वे भी हंसते-खेलते हुए स्वाभिमान के साथ जीवन जी सकें। लोगों को भी बताया और समझाया जाए कि विकलांगता कोई बाधा नहीं है। यह तो हालातों का थोपा एक पडाव है जिसे दिव्यांग आसानी से पार कर सकते हैं। जहां चाह होती है वहां राह निकल ही आती है। उन्होंने अपने विचार को सार्थक करने के लिए 'अमर सेवा संगम' नामक संस्था की स्थापना की जिसका सेवा कार्य अनवरत फैलता ही चला गया। किसी भी अच्छे काम की शुरूआत रंग लाती ही है। संगठन पूरी तरह से दिव्यांगों के प्रति समर्पित है। संगठन के लोगों के द्वारा हर उम्र और हर तरह के दिव्यागों की उनकी जरूरत के अनुसार मदद की जाती है। दिव्यांग शिशुओं की उनके जन्म से ही विशेष देखभाल करने वाली 'अमर सेवा संस्था' का काम आज आठ सौ से ज्यादा गांवों तक पहुंच चुका है। दिव्यांगों के लिए पूरी तरह से अपना जीवन समर्पित कर चुके एस. रामकृष्णन बताते हैं - हमारे पारदर्शी व्यवहार के कारण संस्था को देखते ही देखते सफलता मिलती चली गई और पता ही नहीं चला कि कैसे तीस वर्ष बीत गये। मैं मानता हूं कि अक्षमता की अवधारणा धीरे-धीरे खत्म हो रही है। पूरी तरह से अक्षम लोग भी खुलकर जीना चाहते हैं। उनकी इस भावना की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उन्हें यह कतई नहीं लगना चाहिए कि ईश्वर ने उन्हें इस रूप में धरती पर भेज कोई बेइन्साफी की है।

Thursday, December 13, 2018

क्यों भयभीत हैं देशवासी?

नेता ही नहीं गुंडे-बदमाश हत्यारे भी अब भीड का सहारा लेकर अपनी ताकत दिखाने लगे हैं। उस दिन सरे बाज़ार तीन लोगों की हत्या करने वाले कुख्यात बदमाश को पुलिस पेशी के लिए अदालत में लायी तो वहां पर उसके उत्साहवर्धन के लिए अच्छी-खासी भीड जुटी थी, जो नारे लगा रही थी- "दादा मत घबराना हम तुम्हारे साथ हैं। कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता।" भीड में शामिल हट्टे-कट्टे बदमाशों के सामने पुलिसवाले दबे-दबे लग रहे थे। ऐसा लग रहा था कि अगर उन्होंने हत्यारे के समर्थकों को रोकने-टोकने की कोशिश की तो वे उन्हीं पर टूट पडेंगे। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में बेकाबू भीड के द्वारा एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दिये जाने के बाद कुछ खाकी वर्दीधारियों का मनोबल टूटा है और वे भीड से खौफ खाने लगे हैं। यह भी सच है कि जो पुलिस वाले अपने कर्तव्य के पालन के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार रहते हैं उन्हें भले ही इंस्पेक्टर की हत्या ने चिन्ता और दहशत में न डाला हो, लेकिन जिन्होंने खाकी वर्दी महज नौकरी बजाने के लिए पहनी है उन्हें कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। वे ऐसा कोई भी जोखिम लेने से बचना चाहेंगे, जिससे उनकी जान को खतरा हो। हालांकि भीड के हाथों पुलिसकर्मी को मौत के घाट उतार देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। आए दिन वर्दीधारियों के पिटने और अपमानित किये जाने के वीडियो और तस्वीरें सामने आती रहती हैं, जिनमें किसी वर्दीधारी पर कोई नेता थप्पडबाजी करते तो भीड उनकी वर्दी फाडती दिखायी देती है। यहां तक छुटभैय्ये नेता भी उन्हें धमकाते और गाली-गलोच करते नजर आते हैं।
यह हकीकत यही दर्शाती है कि लोगों का कानून के प्रति भय और सम्मान कम होता चला जा रहा है। प्रश्न यह भी है कि जब पुलिस वाले ही असुरक्षित हैं तो वे जनता की सुरक्षा कैसे कर पाएंगे? यह बहुत ही चिन्तनीय सच्चाई है कि भारतवर्ष में ऐसे लोग लोकतंत्र को लगातार आहत कर रहे हैं, जो कानून के रास्ते पर चलना पसंद नहीं करते। उन्हें थाने में जाकर शिकायत दर्ज करवाना समय की बर्बादी लगता है। दरअसल उन्होंने मान लिया है कि कानून की कमजोरी और वर्दीवालों की ढिलायी चरमसीमा पर है। भरे बाजार जब कोई मासूम बच्चा छोटी-मोटी चोरी करता पकडा जाता है तो उसे दंडित करने के लिए फौरन लोग एकत्रित हो जाते हैं और उसे पीट-पीटकर लहुलूहान कर देते हैं। इसी तरह से किसी सडकछाप मजनूं को सबक सिखाने के लिए आजकल महिलाएं उसकी ऐसे चप्पलों और थप्पडों से धुनायी करने लगती हैं जैसे इस देश में कानून-कायदों का खात्मा हो चुका हो। हम और आप वर्षों से देखते चले आ रहे हैं कि अपनी मांगें मनवाने के लिए जब लोग भीड बनकर सडक पर उतरते हैं तो सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने में जरा भी देरी नहीं लगाते। यहां तक कि आम नागरिकों की कारें और दूकानें तक फूंक दी जाती हैं। भीड जानती है कि वह कितनी भी हिंसा कर ले, उसका कुछ नहीं बिगडने वाला। भीड को सज़ा मिलने के बहुत ही कम उदाहरण हैं। बडे-बडे अपराधों को अंजाम देकर भी भीड में शामिल लोग बच जाते हैं। उनकी शिनाख्त ही नहीं हो पाती। अगर होती भी है तो उनके 'आका' उन्हें बचा ले जाते हैं। यही वजह है कि ऐसे अराजक किस्म के लोगों को न तो कानून का भय बचा है और न ही पुलिस-प्रशासन का। उत्तर प्रदेश में जब योगी ने सत्ता संभाली थी तब उन्होंने बडे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि अब जनता बेखौफ हो जाए। सूबे के गुंडे-बदमाश अगर खुद में सुधार नहीं लाएंगे तो उन्हें खदेडने में किंचित भी देरी नहीं लगायी जाएगी। कानून का पालन करने वालो का सम्मान होगा। उन्हें पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी और कानून तोडने वालों की हड्डी-पसलियां तोडकर रख दी जाएंगी। आज लोग पूछ रहे हैं कि योगी जी आखिर आपका वादा पूरा क्यों नहीं हो पाया? प्रदेश में गो-भक्ति के नाम पर बेकाबू भीड हत्याएं और मारपीट करने में जरा भी नहीं सकुचाती! अमन चैन के आकांक्षी नागरिकों के चेहरे उतरे हुए हैं। उन्हें हर पल यही डर सताता रहता है कि कहीं वे भीडतंत्र का शिकार न हो जाएं। क्या यही है असली रामराज्य जिसके आपने सपने दिखाये थे? आपको तो प्रदेश की जनता की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने की बजाय 'राम मंदिर' और गाय की ज्यादा चिन्ता है। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कि गोवध निषेध होने के बावजूद भी गोवंश के काटे जाने के मामले सामने आते रहते हैं। कुछ पेशेवर लोग गोवंश की हत्या करने से बाज नहीं आ रहे। ऐसा होना यकीनन सरकार तथा पुलिस प्रशासन की विफलता को दर्शाता है। यह भी जान लें कि गाय को अगर करोडों लोग माता मानते हैं, पूजते हैं तो अन्य वर्गों के लोगों को भी उनकी भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। आखिर देश को किस रास्ते पर चलाया जा रहा है? गाय के नाम पर इन्सानों का दानव बनने के चित्र अच्छे भविष्य के संकेत नहीं दे रहे। भारत के प्रधानमंत्री तक कह चुके हैं कि "गोरक्षा के नाम पर अस्सी प्रतिशत लोग गोरखधंधा करते हैं। ऐसे संगठनो की शिनाख्त कर सरकार को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।"  प्रधानमंत्री ने तो सच कहने में देरी नहीं लगायी। फिर भी गोरक्षा के नाम पर हिंसा होती रही। गोरक्षकों ने कानून को अपने हाथ में लेना नहीं छोडा।