Thursday, May 16, 2019

ऐसा क्यों होता है?

मुकेश भाटिया की बारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सभी एक से बढकर एक हैं। यह सभी पुस्तकें पाठकों के सोये हुए आत्मबल को जगा कर उनमें उत्साह, प्रसन्नता और सकारात्मकता का संचार करती हैं। मुकेश भाटिया को मैनेजमेंट गुरू भी कहा जाता है। भाटिया की किताबों से प्रेरणा लेकर न जाने कितने लोग अपने जीवन में बदलाव लाने में सफल रहे। उनके बिगडे काम बन गए। पारिवारिक कलह-क्लेश का खात्मा हो गया। मान-सम्मान के साथ धनवान भी हो गए। इसे अब क्या कहें... कि जिस शख्स ने दूसरों को जागृत रहकर जीवन जीने की कला सिखायी वही आज धोखाधडी का शिकार होकर अपनी पत्नी के साथ आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहा है। उनके जानने वाले उन पर कटाक्ष करते नहीं थकते कि जिसने देश और विदेश में प्रबंधन का ज्ञान बांटा वही पारिवारिक मोर्चे पर बुरी तरह से पिट गया। मात खा गया। वो भी अपनों से...! दिल्ली के चांदनी चौक निवासी भाटिया को अपने बेटे से बहुत लगाव था। आंख मूदकर उस पर भरोसा करते थे। उनकी एक बेटी भी है। बेटे ने किन्हीं मधुर पलों में सारी जमीन-जायदाद अपने नाम करा ली। भाटिया ने भी सभी कागजातों पर यह सोचकर हस्ताक्षर कर दिये कि इकलौता बेटा है। आखिरकार सबकुछ इसी का तो है। हम तो अब कुछ दिनों के मेहमान हैं। क्या पता कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए। इसलिए जो काम कल करना है उसे आज ही कर लेने में कौन-सा हर्ज है। भाटिया बेफिक्र थे। बेटे की खुशी में अपनी खुशी देख रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे बेटे और बहू का व्यवहार बदलने लगा। जो बहू कभी पूरा मान-सम्मान देती थी, अदब का दामन नहीं छोडती थी वह बेशर्मी के साथ बदतमीजी से पेश आने लगी। जिस घर में शांति का वास था वह कलह का अखाडा बन गया। देखते ही देखते घर के हालात इतने खराब हो गये कि उनके लिए एक पल भी रहना मुश्किल हो गया। भाटिया की पत्नी ने तो इसे किस्मत का लिखा मान कर खुद को संभाल लिया, लेकिन भाटिया इस अकल्पनीय सच को स्वीकार नहीं कर पाये। उनकी पागलों जैसी हालत हो गई। माथा पीट-पीटकर रोने और चीखने-चिल्लाने लगते। अपनी पत्नी से बार-बार पूछते कि यह क्या हो गया? मेरा बेटा तो ऐसा न था। वह कैसे बदल गया! मैंने उसे अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढाया-लिखाया और उसकी हर इच्छा पूरी की। कभी किसी कडे अनुशासन की जंजीर में नहीं बांधा। अमूमन माता-पिता के बीच जो अनकही दूरी होती है उसे मिटाते हुए हमेशा यही एहसास दिलाया कि मैं उनका पिता नहीं, दोस्त हूं। हमारे बचपन और किशोरावस्था में तो हमारे मां-बाप अपने बच्चों के बीच एक दूरी बनाकर रखते थे, लेकिन मैंने तो बराबरी के सिद्धांत को अपनाये रखा और उसे अपना एक अच्छा दोस्त मानते हुए उससे न कभी अपनी अच्छाइयां छुपायीं न ही बुराइयां। वो भी तो अपनी हर बात मुझसे शेअर करता था। हम दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी। तो फिर एकाएक यह कैसे हो गया? क्या ज़मीन-जायदाद और पैसा मां-बाप से बढकर होता है। क्या इंसानी भावनाएं कोई अहमियत नहीं रखतीं? क्या आत्मीय रिश्ते महज दिखावा होते हैं? पितृत्व और ममत्व का कोई मोल नहीं है?
भाटिया के करीबी दोस्त बताते हैं कि कई बार ऐसा भी होता था बेटा कोई बडी मांग कर देता था और उनकी जेब खाली होती थी। तब वे अपने यार-दोस्तों से उधार लेकर या पत्नी के जेवर बेचकर उसकी फरमाइश पूरी कर देते थे। बेटे की खुशी उनके चेहरे पर चमक ला देती थी। पत्नी को उनकी यह दरियादिली अच्छी नहीं लगती थी। जाने-माने शायर गुलजार को यह पंक्तियां लिखने की प्रेरणा यकीनन ऐसे दरियादिल पिताओं से ही मिली होगी :
"जेब खाली हो तो फिर भी
 मना करते नहीं देखा,
मैंने पिता से अमीर
इंसान नहीं देखा।"

अस्सी वर्ष से ऊपर के हो चुके भाटिया ने वृद्धाश्रम में आने के बाद एक अजीब-सी चुप्पी ओढ ली है। आश्रम की तरफ से उनके बेटे को कई बार फोन किया जा चुका है कि वह एक बार आकर अपने बीमार पिता को देख जाए। अब वे ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं हैं। बेटा हर बार यही जवाब देता है कि अब उनका उनसे कोई रिश्ता नहीं रहा। बार-बार फोन करके उसका समय बरबाद न करें। भाटिया की बेटी कभी-कभार फोन पर हालचाल पूछ कर अपना फर्ज निभा देती है। वह भी माता-पिता से मिलने के लिए कभी नहीं आई।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ काम कर चुके भारत के पूर्व आर्थिक सलाहकार अमृतलाल कत्यान पिछले छह माह से अपने घर में बंद थे। पडोसियों को रात को उनके घर से जोर-जोर से रोने की आवाज सुनायी देती थी। पडोसी हैरान-परेशान थे। उन्होंने कई बार दरवाजा खटखटाया, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। आखिरकार सजग पडोसियों ने स्टेट लीगल सर्विस अथॉरिटी (सालसा) को सूचित किया। सालसा के अधिकारी पुलिस के साथ किसी तरह से ८५ वर्षीय कत्यान के घर में दाखिल हुए तो पता चला कि वे एकदम अकेले रह रहे हैं और मकान को अंदर से लॉक करके उसकी चाबी भूल चुके हैं। यह सच भी सामने आया कि छह महीने पहले तक उनका बेटा, बहू और दो पोतियां उनके साथ ही रहती थीं। ससुर और बहू में हमेशा टकराव रहता था। बहू अक्सर उम्रदराज ससुर की पिटायी भी कर दिया करती थी। शारीरिक रूप से कमजोर ससुर ने इसे अपनी नियति मान लिया था, लेकिन एक बार जब वे बहू के हाथों पिट रहे थे तो उन्होंने बहू का हाथ पकड कर खुद को बचाने की कोशिश की तो बहू ने वीडियो बनाकर उन पर ऐसे अश्लील आरोप जड दिये, जिससे उनकी आत्मा तक कराह उठी। इतना ही नहीं बहू ने पुलिस स्टेशन में जाकर अपने साथ छेडछाड और बदसलूकी की शिकायत दर्ज भी करवा दी। इसके बाद बहू और बेटे उन्हें अकेला छोडकर अलग रहने के लिए चले गए।

Thursday, May 9, 2019

चांदनी चौक बोल रहा है...

दिल्ली मुझे हमेशा लुभाती रही है। इसलिए नहीं कि देश की राजधानी है। दिल्ली में मुझे संपूर्ण भारत की तस्वीर नज़र आती है। देश का यह इकलौता महानगर है जहां पूरा भारत बसा हुआ है। पुरानी दिल्ली के बीचों-बीच बसा चांदनी चौक तो बेमिसाल है। भीड भरे बाजारों, संकरी गलियों और कई ऐतिहासिक धरोहरों से घिरे चांदनी चौक में स्थित गुरुद्वारा शीशगंज साहिब मुझ जैसे नास्तिकों को भी आत्मिक सुख और सुकून की मधुर धारा की तरफ बहाकर ले जाता है। इस गुरुद्वारे के इतिहास में कई देशभक्तों की कुर्बानियों की दास्तानें दर्ज हैं। चांदनी चौक के निकट ही स्थित है १७वीं शताब्दी में निर्मित भारत की सबसे बडी मस्जिद, जामा मस्जिद जो कि लाल और संगमरमर के पत्थरों से बनी है। इसकी ऊंची-ऊंची मीनारें दर्शनीय हैं। देश और विदेश के असंख्य लोग यहां पर इबादत के लिए आते हैं और कई अविस्मरणीय यादें अपने साथ ले जाते हैं। चांदनी चौक से ज्यादा दूर नहीं है लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित आलीशान लाल किला, जिसे पांचवें मुगल बादशाह शाहजहां ने बनवाया था। हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री इसी लाल किला पर झंडा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। चांदनी चौक के बाजार भी बेमिसाल हैं, जहां पर हर समय दौड लगाती भीड नजर आती है। मसालों, मेवों, सोने-चांदी के गहनों, तरह-तरह के कपडों की दुकानों की यहां जहां भरमार है वहीं पारंपरिक मिठाई की दुकानें भी चांदनी चौक की मधुर पहचान हैं। यह कहना गलत नहीं कि चांदनी चौक में जहां-तहां मिठास बिखरी नज़र आती है। चांदनी चौक को सभी धर्मों का संगमस्थल भी कहा जाता है। इस बार की यात्रा में चांदनी चौक कुछ बदला-बदला-सा लगा। एक वर्षों पुरानी मिठाई की दुकान के काउंटर से लगी दीवार पर लगे पोस्टर पर दर्ज इन शब्दों को मैं बार-बार पढता और सोचता रहा :
"अफसोस इस बात का नहीं कि धर्म का धंधा हो रहा है,
साहेब अफसोस तो इस बात का है कि पढा-लिखा भी अंधा हो रहा है।"

मेरा मन हुआ कि दुकान के मालिक से इस पोस्टर को लगाने की वजह पूछूं, लेकिन फिर मन में विचार आया कि यह दर्द तो हर उस भारतवासी का है जो अमन-चैन का पक्षधर है। चांदनी चौक में एक संकरी-सी गली में रहने वाली शगुफ्ता परवीन, जो कि एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल हैं, ने शिकायती लहजे में अपनी चिंता और गुस्सा व्यक्त किया :
"आज जो बात मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह है दिलों को बांटने वाली राजनीति। चांदनी चौक की अपनी पहचान रही है, जहां के लोग बिना किसी भेदभाव के बडी आत्मीयता के साथ सभी एक दूसरे से मिलते और बतियाते हैं। इस प्यार भरे माहौल को खात्मा करने की कोशिशें हो रही हैं। कुछ राजनेता बार-बार पुराने जख्म ताजा करने में लगे हैं। १९४७ वाली तल्खियां, जिन्हें बुरा सपना मानते हुए भूल जाना चाहिए था, वो फिर उभर रही हैं, उभारी जा रही हैं।
खुले विचारों वाली शगुफ्ता हैरान हैं कि इस बार के लोकसभा चुनाव में जरूरी मुद्दे ही गायब हैं। दिल्ली को ही देख लो...। यहां पर प्रति पांच व्यक्तियों में से तीन व्यक्ति बेघर हैं, जिन्हें रेलवे स्टेशनों, फुटपाथों, मंदिरों, बस अड्डों और जाने कहां-कहां पर अपनी रातें गुजारनी पडती हैं। तेज गर्मी, बरसात और ठंड में प्रतिवर्ष सैकडों लोग बेमौत मर जाते हैं। राजधानी में जहां देखो वहीं गुंडागर्दी और अपराध बढ रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री तक को बेखौफ होकर पीट दिया जाता है। महिलाएं खुद को पूरी तरह से असुरक्षित पाती हैं। बेरोजगार युवकों की लंबी कतारें किसी को नजर नहीं आतीं। रोटी, कपडा और मकान हर इंसान की पहली जरूरत है, लेकिन इन समस्याओं को हल करने की कोई बात नहीं करता। लोगों को बांटने में ही पूरी ताकत लगायी जा रही है। इन नेताओं को अब कौन समझाये कि इंसानियत से बडा कोई धर्म नहीं, कोई जाति नहीं। मैं जब इंसानियत को मरता देखती हूं तो बहुत दुख होता है। समझदार समझे जानेवाले लोगों को भी वैमनस्य के बोल बोलते देख दंग रह जाती हूं। मुझे इस बात का गर्व भी है कि हम जिन चांदनी चौक की गलियों में रहते हैं वो तंग भले हैं, लेकिन यहां पर हिन्दू और मुसलमान अपनी ईद और दिवाली मिल-जुलकर मनाते हैं।"
पराठे वाली गली में रहने वाले साठ वर्षीय पत्रकार मित्र श्याम बिहारी भारतीय न्यूज चैनलों के पक्षपाती रवैये से इस कदर व्यथित हैं कि उन्होंने खुद के टीवी को अपने गरीब पडोसी को उपहार में दे दिया है। चांदनी चौक की सर्वधर्म समभाव की आबोहवा में तेजी से फैलाये जा रहे विष और वैमनस्य ने उनकी भी नींद उडा दी है। वे कहते हैं कि न्यूज चैनलों पर ऐसे पत्रकार, संपादक, एंकर कब्जा जमा चुके हैं जो कि घोर पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। उन्हें गडे मुर्दे उखाडने में मज़ा आता है। हिन्दू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक नफरत के बीज बोने के मामले में तो इन्होंने खुद को इतना नीचे गिरा दिया है कि पत्रकारिता ही शर्मसार है। जिस तरह से कई राजनेता राजनीति के डाकू हैं वैसे ही यह लोग पत्रकारिता के डकैत हैं।
लाल किले में भ्रमण के दौरान एक ऐसे शख्स से मिलना हुआ जिसका नाम मलखान सिंह है। यह इंसान कभी खूंखार डकैत था। अनेकों हत्याएं, डकैतियां, लूटमार और अपहरणों को अंजाम दे चुके इस डरावने इंसान की पहचान में तब तब्दीली आ गई जब उसने १९८२ में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। सत्तर के दशक में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में खौफ का पर्याय रहा यह पूर्व डकैत भी लोकसभा चुनाव लड रहा है। ७६ साल के इस पूर्व डकैत को समाजवादी मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी : लोहिया ने चुनावी टिकट देकर अपनी किस्मत आजमाने का मौका दिया है। हमने जब उनसे पूछा कि आप क्या सोच कर चुनाव लड रहे हैं, उनका जवाब था कि आप जो मेरे बारे में सोचते हैं वो पूरी तरह से गलत है। मैं डकैत नहीं, बागी था, जिसने आत्मसम्मान और आत्मरक्षा के लिए बंदूक उठाई थी। मेरे चुनाव लडने का एक ही मकसद है, लोगों को न्याय दिलाना। किसी के साथ बेइंसाफी न होने पाए और हर देशवासी बेखौफ होकर जिए यही मैं चाहता हूं। मुझे अच्छी तरह से पता है कि असली डकैत कौन हैं, जो देश को वर्षों से ठगते और लूटते चले आ रहे हैं। उनसे कैसे निपटना है यह भी मुझे अच्छी तरह से पता है।

Thursday, May 2, 2019

कटघरे में पत्रकार और अखबार

सीधे और सरल शब्दों में कहूं तो सच यही है कि देश का अधिकांश मीडिया भी आज दो भागों में विभक्त हो चुका है। नफरती न्यूज चैनलों और अखबारों की भीड में चंद सच्चे और अच्छे भी हैं जो स्वच्छ पत्रकारिता करते हुए लोकतंत्र के चौथे खम्भे की सशक्त भूमिका निभा रहे हैं। सत्यता, निष्पक्षता, निर्भीकता तथ्यपरकता, स्वतंत्रता, संतुलन और न्यायसंगता ही पत्रकारिता की रीढ की हड्डी है। पिछले चार सालों में जिस तरह से अधिकांश न्यूज चैनलों ने खुद पर किसी न किसी पार्टी के भोंपू, अंधे भक्त और पक्षधर होने का ठप्पा लगवाया है, उससे सजग देशवासी अच्छी तरह से अवगत हैं। यही सच देश के अधिकांश समाचार पत्रों का भी है! कौन-सा अखबार सत्ता का गुलाम है, किस पार्टी की तरफ उसका झुकाव है और वह किन-किन राजनेताओं के स्तुति गान को प्राथमिकता देता है इसकी खबर उन पाठकों को सदैव रहती है जो अपनी आखें खुली रखते हैं। राष्ट्रीय साप्ताहिक 'राष्ट्र पत्रिका' की दसवीं वर्षगांठ के शुभअवसर पर हम लोकतंत्र में अखबारों के हालात पर बात करना चाहते हैं। यह सबको पता है कि देश में लगभग सभी समाचार पत्र पूंजीपतियों के द्वारा चलाये जा रहे हैं। अखबार चलाने के पीछे की उनकी असली नीयत भी अब बेपर्दा हो चुकी है। अक्सर ऐसा होता है कि जब किसी नये अखबार का स्वामी, संपादक, पत्रकार किसी प्रतिष्ठित हस्ती को अपना परिचय देता है तो उससे सबसे पहला यही सवाल किया जाता है कि आपका अखबार किस राजनीतिक दल से वास्ता रखता है। दरअसल यह उनकी गलती नहीं है। यह तो अखबार और उन्हें चलाने वालों की छवि का नतीजा है, जिससे वे कभी बाहर नहीं निकलते और पाठकों को निरंतर बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं। वैसे भी सच कभी छिपा तो नहीं रहता।
२०१९ के लोकसभा चुनाव में दिखायी दे रही पत्रकारिता की हैरतअंगेज तस्वीर को क्या नजरअंदाज किया जा सकता है? स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि निष्पक्षता का तो जैसे गला घोटने की ठान ली गई है। खुद को पत्रकारिता के शहंशाह कहने वाले अधिकांश पत्रकार, संपादक या तो भाजपा की भक्ति में लगे हैं या फिर घोर विरोध की पताका थामे हुए हैं। कुछ पत्रकारों ने तो अंधभक्ति और चाटूकारिता की सभी सीमाएं लांघ दी हैं। उनकी यह हरकत इन्हें कहां ले जाएगी यह तो आनेवाला वक्त बतायेगा, लेकिन अपनी-अपनी अंधभक्ति के कारण अंतत: इन्हीं का अहित होना तय है। धन और अन्य भौतिक सुख-सुविधाएं भले ही इन्हें मिल जाएं पर वो सम्मान नहीं मिलने वाला जो निष्पक्ष पत्रकारों को मिलता है। देशवासियों की निगाह से गिर चुके हैं ऐसे कलमकार। मैं उन्हें लेकर बहुत भयभीत और चिंतित हूं कि कहीं आने वाले परिणाम उन्हें इस हालत में न पहुंचा दें कि वे शर्मिन्दगी के मारे किसी को अपनी शक्ल ही न दिखा पाएं। पागलखाने में भर्ती होने या फिर आत्महत्या करने की सोचने की नौबत आ जाए। अखबार पाठकों को सच से अवगत कराने के लिए निकाले जाते हैं, न कि किसी की चरणवंदना करने के लिए। राजनेता तो किसी के सगे नहीं होते। फिर सत्ता तो उन्हें अक्सर अंधा बना ही देती है।
ममता बनर्जी जब प्रदेश की सत्ता पाने के लिए छटपटा रहीं थीं तब उनकी शालीनता की कई कहानियां सुनी और सुनायी जाती थीं। उन्हें बंगाल की शेरनी भी कहा जाता था। अखबारों के संपादकों, मालिकों को बेखौफ अपना कर्तव्य निभाने की सीख देते नहीं थका करती थीं। चाटूकार पत्रकारों को ऐसी फटकार लगाती थीं कि वे ममता के समक्ष आने से हिचकिचाते थे। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद वे ऐसी बदलीं कि लोग हैरत में पड गए। प्रदेश में अब वही अखबार पढे जाते हैं, जिन्हें सरकार पसंद करती है। जी हां, सरकार ही तय करती है कि सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त पुस्तकालयों में लोग कौन-सा अखबार पढें, कौन-सा नहीं। ममता दीदी को उन अखबारों तथा उनके मालिकों, संपादकों से सख्त नफरत है, जो उनकी सरकार के खिलाफ लिखते हैं। दीदी को खुद पर किसी भी तरह का कटाक्ष पसंद नहीं। वे तो सिर्फ और सिर्फ अपनी प्रशंसा करने वालों को ही अपने आसपास खडा होने देती हैं। चापलूसी उन्हें अपार सुख देती है। अपनी आरती गाने वाले कई अखबार के संपादकों, मालिकों को राज्यसभा भेज चुकीं ममता के पुरस्कृत करने के इस अंदाज से जहां सच्चे पत्रकार आक्रोश में हैं तो वहीं बिकाऊओं की तो बस यही चाहत है कि ममता ही हमेशा मुख्यमंत्री बनी रहें। अकेली ममता ही ऐसी नहीं हैं। भारतवर्ष के अधिकांश राजनेता और सत्ताधीश इसी आदत के रोगी हैं, जो तरह-तरह से खेल खेलते रहते हैं। गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले नेताओं के समक्ष नतमस्तक होकर पत्रकारिता का अपमान करने वाले पत्रकार, संपादक यह मान चुके हैं कि गुलामी किये बिना अखबार निकाले ही नहीं जा सकते। इनकी बडी-बडी उपदेशात्मक बातें किसी को भी अचंभे में डाल सकती हैं। अपना देश उपदेशकों से भरा पडा है। जब कर्तव्य निभाने की बारी आती है तो यह तरह-तरह की बहानेबाजी पर उतर आते हैं। देश प्रेम और अपना कर्तव्य कैसे निभाया जाता है इनसे सीखें:
गुजरात के अहमदाबाद में एक ऐसे व्यक्ति ने बडे गर्व के साथ मतदान किया जिनके दोनों हाथ नहीं हैं। मतदान से पूर्व पैर के अंगूठे पर मतदानकर्मी ने जब अमिट स्याही लगायी तब उनके चेहरे की चमक कह रही थी कि क्या हुआ मेरे हाथ नहीं हैं, देश प्रेम का ज़ज्बा तो है, जो कभी भी कम नहीं हो सकता। बिहार के मधुबनी में दिव्यांग जगन्नाथ कुमार राय ने भी दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद अपने पैर से ईवीएम का बटन दबाकर अपने मताधिकार का प्रयोग कर भारत के सचेत पुत्र होने का सबूत पेश किया। झारखंड के कामता गांव निवासी जसीमुद्दीन अंसारी ने भी उन सुविधा भोगियों के मुंह पर तमाचा जडा है जो मतदान के दिन सैर-सपाटे पर निकल जाते हैं या फिर घर में बैठकर तरह-तरह के पकवानों का मज़ा लेते हुए राजनेताओं तथा सरकार की कमियां गिनते-गिनाते रहते हैं। बीस वर्ष पूर्व उग्रवादियों ने उन्हें चेताया था कि वोट देने न जाएं, लेकिन वे उनके वोट बहिष्कार के फरमान को नजरअंदाज कर अपने दोस्त महादेव के साथ वोट देने पहुंच गए थे। गुस्साये माओवादियों ने जसीमुद्दीन का हाथ तथा महादेव का अंगूठा काट डाला था। महादेव का देहावसान हो चुका है, लेकिन जसीमुद्दीन जिन्दा हैं और हर चुनाव में नियमित मतदान कर जिन्दा होने का प्रमाण भी पेश करते चले आ रहे हैं।
निष्पक्षता, निर्भिकता और निरंतरता के साथ पत्रकारिता के मूल धर्म को निभाते चले आ रहे राष्ट्रीय साप्ताहिक 'राष्ट्र पत्रिका' की वर्षगांठ पर समस्त पाठकों, संवाददाताओं, अभिकर्ताओं, लेखकों, शुभचिंतकों, विज्ञापनदाताओं को बधाई और अपार शुभकामनाएं।

Thursday, April 25, 2019

राजनीति की डरावनी तस्वीर

"किसी मुल्क को बर्बाद करना हो तो लोगों को धर्म के नाम पर लडा दीजिए, मुल्क अपने आप बर्बाद हो जाएगा।" लगभग सवा सौ साल पूर्व विश्व विख्यात लेखक, चिन्तक लियो टालस्टाय ने उपरोक्त शब्द कहे थे। प्रगा‹ढ विद्वान कभी काल्पनिक बातें नहीं किया करते। वे जो देखते-समझते और अनुभव करते हैं उसी का सार देश और दुनिया के समक्ष पेश कर रुखसत हो जाते हैं। लोग उनकी सीख का कितना पालन करते हैं यह उन्हें तय करना होता है। मुझे यह लिखते हुए अत्यंत गर्व और पीडा हो रही है कि कई धर्म के ठेकेदारों ने भारत के जनमानस में लाख जहर घोलने की कोशिशें कीं, लेकिन उन्हें मुंह की खानी पडी। फिर भी उनकी साजिशें और हरकतें थमी नहीं हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने भोपाल संसदीय सीट से जिस साध्वी प्रज्ञा भारती को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतारा है, उनकी ज्वलंत योग्यता और खासियत तो यही है कि वे २९ दिसंबर २००८ में नासिक के मालेगांव शहर में एक बाइक में बम लगाकर किये गये विस्फोट के आरोप में ९ साल तक जेल में रह चुकी हैं। फिलहाल सेहत ठीक न होने के कारण जमानत पर हैं। इस बम कांड में ७ लोगों की मौत हुई थी और करीब १०० लोग जख्मी हुए थे। प्रज्ञा सिंह को भोपाल सीट का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद से ही देशभर में तरह-तरह की बातें हो रही हैं। भारतीय जनता पार्टी पर भी सवाल दागे जा रहे हैं कि इस विवादास्पद साध्वी को ही क्यों उसने लोकसभा के चुनावी मैदान में उतारा? कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा को भोपाल जैसी सीट खोने का भय बुरी तरह से सता रहा था, इसीलिए मोदी-शाह की चालाक जोडी ने सोचा कि साध्वी प्रज्ञा को दिग्विजय सिंह की टक्कर में उतारकर क्यों न चुनाव को हिन्दू बनाम मुसलमान का धर्मयुद्ध बना दिया जाए। भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ हुई बैठकों में प्रज्ञा ने बार-बार हेमंत करकरे को कोसा, जिन्हें बमकांड की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनकी दास्तान ने अच्छे-अच्छों को भावुक बना दिया। उनके द्वारा पेश की गई पुलिसिया अत्याचार की कहानी वाकई अत्यंत लोमहर्षक है : "मालेगांव ब्लास्ट के आरोप में १५ दिनों तक मुझे गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया। बिना पूछताछ किए ही मोटी बेल्ट से लगातार मारा जाता था। शरीर पर नमक मिला पानी डाला जाता था। भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती थीं और दिन-रात उल्टा लटका कर यातनाएं दी जाती थीं। निर्वस्त्र करने की भी कोशिशें की जाती थीं। पीटने वाले बदल जाते थे, बस पिटने वाली वही अकेली होती थीं।" प्रज्ञा ने इस जुल्म के लिए एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को असली खलनायक बताते हुए उन पर कई-कई आरोप लगाये। वे यहां तक कह गयीं कि करकरे की मौत उनके श्राप के कारण हुई थी।
यह भी सच है कि प्रज्ञा बचपन से लडाकू प्रवृत्ति की रही हैं। पढाई के दौरान ही प्रज्ञा विद्यार्थी परिषद से जुड चुकी थीं। एक बार उन्हें किसी ने बताया कि भिंड जिले के कस्बे लहर में सरकारी अस्पताल की बहुत बुरी हालत है। वहां पर मरीजों के इलाज के लिए न पर्याप्त  डॉक्टर हैं और न ही साफ-सफाई की व्यवस्था है। मरीज वहां जाते हैं, लेकिन निराश वापस लौट जाते हैं। कोई उनकी सुनने वाला ही नहीं है। प्रज्ञा ने फौरन अपनी दसेक सहेलियों को इकट्ठा किया और अस्पताल के सामने धरना देकर बैठ गईं और तब तक डटीं रहीं जब तक डॉक्टर नहीं आए और व्यवस्था दुरुस्त नहीं की गई। भिंड के लोग आज भी प्रज्ञा के नेतृत्व में हुए उस आंदोलन को याद कर गर्वित होते हैं, जिसमें केवल लडकियां शामिल थीं। प्रज्ञा को जब कहीं से खबर मिलती कि किसी गुंडे-बदमाश ने उनकी सहेली या किसी भी लडकी को छेडा अथवा तंग किया है तो वह शेरनी की तरह उस पर झपट पडतीं। स्कूल और कॉलेज वाला जोश आज भी प्रज्ञा में बरकरार है। हां वे जोश के अतिरेक में होश भी खो बैठती हैं। कहां क्या कहना है इसका ध्यान नहीं रख पातीं। लगता है यह बीमारी तो हर उस साधु और साध्वी को है जो राजनीति में हैं, या आने को इच्छुक हैं। माना कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है, लेकिन इन बाबा और बाबियों (साध्वियों) को सीमाएं लांघने में ज़रा भी संकोच क्यों नहीं होता? साक्षी महाराज ने मतदाताओं को धमकी दी थी कि संन्यासी को वोट नहीं दोगे तो पाप लगेगा। प्रज्ञा तो उनसे भी सौ कदम आगे निकल गईं। उनका यह दावा है कि मैंने ही मुंबई एटीएस के प्रमुख रहे हेमंत करकरे को श्राप दिया था कि तेरा सर्वनाश होगा। यह तो देश के सच्चे सपूत की शहादत का अक्षम्य अपराध है जो उस नारी ने किया है जो लोकतंत्र के सबसे बडे मंदिर संसद भवन में सांसद के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने को लालायित है। ध्यान रहे कि २६ नवंबर २००८ को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के दौरान तत्कालीन मुंबई एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के अलावा एसीपी अशोक कामटे, एनकाउंटर विशेषज्ञ विजय सालस्कर सहित १७ पुलिस कर्मी शहीद हुए थे। उस दिन पाकिस्तानी आतंकियों की गोलीबारी से कुल १६६ लोग मारे गये थे। कालांतर में उनकी पत्नी कविता करकरे की ब्रेन हेमरेज के कारण मौत हो गई। बच्चे भी अपना घर छोडकर अपने चाचा के यहां रहने चले गए। साध्वी की करकरे को लेकर की गई विषैली और शर्मनाक शब्दावली से भोपाल निवासी करकरे की बहन एवं अन्य परिजन काफी आहत और गमगीन हैं। चुनावी लडाई को 'धर्मयुद्ध' मान चुकीं साध्वी दिग्विजय सिंह  की भी कट्टर विरोधी हैं। वे उनकी शक्ल तक देखना पसंद नहीं करतीं। हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा जोर-शोर से उठाने वाले इस कांग्रेस के पुराने नेता के प्रति एक साध्वी में ऐसी कटुता और द्वेष का होना यकीनन चिंतित करता है। अपने देश की राजनीति में विरोधियों का भी आदर-सम्मान करने की अनुकरणीय परंपरा रही है। अभी हाल ही में जब पूर्व विदेश राज्यमंत्री व कांग्रेस के नेता शशि थरूर अस्पताल में भर्ती थे तब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने वहां जाकर उनका हाल जाना और शीघ्र स्वस्थ होने की मनोकामना की। ध्यान रहे कि शशि थरूर को भाजपा का घोर विरोधी नेता माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने का भी वे कोई मौका नहीं छोडते।

Thursday, April 18, 2019

राजनीति में अहंकार और गुंडागर्दी

वोटों के लिए धमकी-चमकी, गुंडागर्दी। यह कोई नई बात नहीं है। इस हथियार का इस्तेमाल पहले पर्दे के पीछे किया जाता था। शरीफ प्रत्याशी बहुत नाप-तौल कर बोला करते थे। गुंडे-बदमाश किस्म के प्रत्याशी गुंडई की सभी सीमाएं लांघ दिया करते थे। लाठी, डंडों, तलवारों और किस्म-किस्म के हथियारों का भय दिखाकर वोटों की फसल काटा करते थे, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। नैतिकता और मर्यादा के पक्षधर माने जाने वाले राजनेता भी अपना आपा खोने लगे हैं। शालीनता की होली जलाने लगे हैं। जबकि वे इस सच से वाकिफ हैं कि, उग्र तेवर भारी पड सकते हैं। लेने के देने पड सकते हैं। यूपी के जगजाहिर घटिया नेता आजम खां, जो कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, ने जयाप्रदा को लेकर इतनी शर्मनाक बात कह दी जिसकी वजह से चारों तरफ उनकी थू-थू होने लगी। इस लंपट नेता को फिर भी कोई फर्क नहीं पडा। इस गंदे इंसान ने भीड के समक्ष यह कह कर सिद्ध कर दिया कि वह छंटा हुआ गुंडा और बदमाश है : "आप लोगों को अधिकारियों से डरने की जरूरत नहीं। हमारी सरकार आई तो कलेक्टर से जूते साफ करवायेंगे। यह तनखैया हैं इनकी कोई औकात नहीं है। आपने मायावती की वो तस्वीरें तो जरूर देखी होंगी, जिनमें बडे-बडे अफसर उनके जूते साफ करते दिखायी देते हैं। इस बार तो उन्हीं मायावती से हमारा गठबंधन हुआ है। तुम लोग बेफिक्र रहो। किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।
मेनका गांधी की छवि एक शालीन राजनीतिज्ञ की रही है। उन्हें ऊंची आवाज में भी बोलते नहीं देखा गया, लेकिन २०१९ के लोकसभा चुनाव में वे मुस्लिम मतदाताओं को मेमना और खुद को अजगर मान दहाडती और ललकारती नज़र आईं। अपने लोकसभा क्षेत्र की एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मुसलमान मतदाताओं को धमकाते हुए कहा कि अगर आप हमारा साथ नहीं दोगे तो हम भी आप लोगों के काम नहीं करेंगे। पोलिंग बुथ पर आपके १०० या ५० वोट निकले तो उसी हिसाब से आपका काम किया जाएगा। आप इस सच को जान लो कि हम महात्मा गांधी की छठी औलाद तो हैं नहीं कि देते ही चले जाएं और इलेक्शन में मार खाते चले जाएं। मैंने विभिन्न मुस्लिम संस्थाओं को एक हजार करोड की सहायता प्रदान की है। ऐसे में जब मुस्लिम मतदाता वोट नहीं देते हैं तो दिल को ठेस लगती है। भाजपा प्रत्याशी मेनका गांधी जो कि केंद्रीय मंत्री भी हैं, ने कार्यकर्ताओं और वोटरों को साफ-साफ कहा कि जहां से उन्हें ज्यादा वोट मिलेंगे वहां का पहले विकास किया जाएगा। यानी जिसका जितना वोट, उसका उतना विकास। मेनका गांधी राजनीति की कोई नई-नवेली खिलाडी नहीं हैं। उनका मुस्लिम मतदाताओं को चेताने का अंदाज हंगामा बरपा गया। उन्हें इस सवाल का तो जवाब देना ही होगा कि उन्होंने मुस्लिम संस्थाओं को जो करोडों की रकम देने का दावा किया है, वह उनकी जेब की तो नहीं थी। पूरी तरह से सरकारी थी। सरकार का फर्ज ही होता है कि वह बिना किसी भेदभाव के हर किसी की सहायता करे। मेनका ने हिन्दुओं एवं अन्यों की संस्थाओं को जो सहायता राशि उपलब्ध करायी उसका जिक्र क्यों नहीं किया? लगता है वे यह मानकर चल रही हैं कि हिन्दुओं तथा अन्य धर्म के मतदाताओं के सारे के सारे वोट उन्हें मिलते आये हैं। वे उनके साथ धोखा नहीं कर सकते। धोखेबाज तो बस मुसलमान ही हैं, जिन्हें उन्होंने बडी आसानी से धमकाते हुए कटघरे में खडा कर दिया! वे इस सच को कैसे भूल गईं  कि मुसलमान भी हिन्दुओं की तरह देश के सम्मानित नागरिक और वोटर हैं। उन्हें किसी भी पार्टी को वोट देने की पूरी आजादी है। मेनका की तरह एक और वजनदार केंद्रीय मंत्री हैं जो हमेशा अपने भाषणों में यह कहते रहते हैं कि मैंने हजारों करोड के काम करवाए हैं। मतदाता मुझे वोट देंगे ही। कोई इनसे कहे कि जनाब आपने कोई अहसान नहीं किया है। यह जो आप मैं...मैं लगाये रहते हैं उससे जबरदस्त अहंकार झलकता है। आपने जनसेवा में जो धन खर्च किया वह आपकी निजी तिजोरी का नहीं, सरकारी है जनाब। इसलिए मैं... नहीं हम और हमारी सरकार कहना सीखिए...। सरकार जनता से जो टैक्स वसूलती है उसी से उसकी तिजौरी भरती है। देशवासियो के खून पसीने की कमाई को उन्हीं के हितार्थ खर्च करने में ही उसकी सार्थकता और जरूरत है। ऐसे में कोई बडबोला नेता मैं...मैं करते हुए मंचों पर दहाडता है तो सचेत भारतीयों को बहुत गुस्सा आता है।
देश की राजनीति में एक से एक नमूने हैं। भगवाधारी साक्षी महाराज ने मतदाताओं को वोट नहीं देने पर श्राप देने की धमकी दे डाली। मतदाताओं को श्राप देने की जुर्रत करने वाले यह महाराज उन्नाव संसदीय सीट से भाजपा के प्रत्याशी हैं। एक जनसभा में ये ऐंठकर बोले कि मैं संन्यासी हूं। आपके दरवाजे पर भीख मांगने आया हूं। अगर मना किया तो आपकी गृहस्थी के पुण्य ले जाऊंगा और अपने पाप दे जाऊंगा।
इस बार के चुनावी युद्ध में अपने वादों और नारों के साथ उतरे प्रमुख सियासी दलों के नेता लोगों का मनोरंजन करने में भी काफी आगे हैं। राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव जेल में बिन पानी की मछली की तरह तडप रहे हैं। उनकी जमानत की सभी कोशिशें व्यर्थ साबित हो चुकी हैं। करोडों रुपये के चारा घोटाले के मामले में दोषी ठहराये जाने के बाद भी लालू खुद को एक ईमानदार और क्रांतिकारी नेता मानते हैं। कहने को तो उन्हें जेल हुई है, लेकिन वे अस्पताल में मजे लूट रहे हैं। हमारे यहां के भ्रष्टाचारी नेता, अस्पताल में इलाज की सुविधा बडी आसानी से पाने में सफल हो जाते हैं। लालू की पत्नी राबडी देवी, बेटी मीसा और बेटे तेज प्रताप यादव, तेजस्वी यादव भी अपने पिता की तरह भ्रष्टाचार के धन को ठिकाने लगाने की सभी कलाएं सीखने के बाद गजब की नौटंकी करने में लगे हैं। भ्रष्ट लालू ने लूटमारी कर जो धन बटोरा था उससे अपनी पत्नी, पुत्रों, बेटियों और दामादों के नाम करोडों की जमीन-जायदाद खरीदी। फिर भी लालू का यह 'गिरोह' खुद को देश सेवा के प्रति समर्पित बताता है। किसी ने सच ही कहा है कि राजनीति निर्लज्जों और अपराधियों के लिए सुरक्षित स्थल है। मुंह पर कालिख पुते होने के बावजूद भी विरोधियों के मुंह पर थूकते रहो और जाति-धर्म की राजनीति करते हुए सीधी-सादी जनता की आंखों में धूल झोंकते रहो। यह भारत में ही संभव है जहां जन्मजात भ्रष्टाचारी भी चुनावों में ऐसे नारे लगाने का दमखम दिखाते नहीं सकुचाते जिन्हें सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि इनसे बडा तो और कोई देशभक्त है ही नहीं। राजद के नये खिलाडी तेजस्वी यादव का नारा है :
"दुश्मन होशियार, जागा है बिहार
किया है ये यलगार, बदलेंगे सरकार
उन्नति के उजियार के खातिर,
लालटेन के जले के बा
करे के बा... लडे के बा... जीते के बा।"
दरअसल, चुनावी वादों की तरह नारे भी वोटरों को आकर्षित करने और छलने के ऐसे औजार बन गये हैं जिनका इस्तेमाल सभी दल बखूबी कर रहे हैं। यह भी माना जाता है कि नारे ही चुनाव की जान होते हैं। भारत वर्ष में तो नारों के बिना अभी तक कोई चुनाव हुआ ही नहीं। ये नारे हीं हैं जो मंचासीन नेताओं और मैदान में जुटी भीड में जोश का संचार करते हैं। कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान की एक सभा में नारा उगला था : "गली-गली में शोर है, देश का चौकीदार चोर है।"
महाराष्ट्र के बुलढाणा में चुनावी मंच से शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जवाबी तीर छोडा, "बेटा राहुल! हिन्दुस्तान में नामर्दों के लिए कोई जगह नहीं है।" अशालीनता, अमानवीयता, कुतर्क और असहिष्णुता के ऐसे नजारे पहले कभी नहीं देखे गये थे। देश की गरीब जनता को भिखारी और निकम्मा बनाने के इस षडयंत्री चुनाव दौर में हर पार्टी दमखम के साथ वास्तविक जनसमस्याओं के समाधान के आश्वासन देने से कतरा रही है। बढती जनसंख्या, गरीबी, सरकारी सेवाओं का गिरता स्तर, ठग और लुटेरों की तरह कुर्सियों से चिपके कर्मचारी, अधिकारी, बढती सडक दुर्घटनाएं, जानलेवा प्रदूषण, नक्सली समस्या, अपराध और आतंकवाद जैसे और भी कई मुद्दे हैं जिनकी अब बात ही नहीं हो रही। अपने देश में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी तादाद है जो वोट डालने के लिए घर से ही नहीं निकलते। उनपर किसी भी जनजागरण अभियान और समझाइश का असर नहीं होता। उनका मानना है कि-"कोउ नृप होउ हमहि का हानी, चेरि छाडि अब होब कि रानी।" यानी देश की सत्ता कोई भी संभाले यह अपने में मस्त रहने वाले लोग हैं। ऐसी सोच की एक वजह यह भी है कि इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक उन्होंने वादों और नारों की गूंज तो सुनी, लेकिन उन्हें साकार होते नहीं देखा है...।

Thursday, April 11, 2019

लोकतंत्र की बंद और खुली आँखें

''कुछ कहते, ‘फिर कमल खिलाना दिल्ली में।
कुछ कहते, ‘हाथी पहुंचाना दिल्ली में।
कुछ पंजा, कुछ झाडू लेकर निकले हैं
कुछ चाहें साइकिल से जाना दिल्ली में।
जाति-धर्म की रौ में फिर से भटक न जाना वोटर जी!
सोच-समझकर अब चुनाव में बटन दबाना वोटर जी।''
मतदाताओं को सचेत करती अशोक अंजुम की लिखी उपरोक्त पंक्तियां पढने के बाद मेरे मन में कई विचार आते रहे। अंतत: मैंने यही निष्कर्ष निकाला जो काम देश के पत्रकारों और संपादकों को बडी निर्भीकता के साथ करना चाहिए था उसे देश के कुछ सजग कवि, गजलकार और व्यंग्यकार बखूबी कर रहे हैं। मुझे यह लिखने में भी कोई संकोच नहीं हो रहा है कि जहां अधिकांश पत्रकार अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं वहीं साहित्यकारों की लेखनी और सोच काफी असरकारी हो रही है। २०१९ के लोकसभा चुनावों को कई कारणों से याद किया जायेगा। २०१४ का लोकसभा चुनाव परिवर्तन का चुनाव था। देश के सजग वोटरों ने अपना फर्ज निभाया, लेकिन उनके हिस्से क्या आया? जिन उम्मीदों के साथ पुरानों को दरकिनार कर नयों को सत्ता सौंपी गयी, वे लगभग धरी की धरी रह गईं। सरकार ने पुल, सडकें, मेट्रो, शौचालय निर्माण, उज्जवला योजना, बैंक खातों की आधी-अधूरी सौगातें देकर यही मान लिया कि उसने अपने सभी वादे पूरे कर दिये। बेरोजगारी, भूखमरी, दलितों, शोषितों और महिलाओं पर अत्याचार जस के तस बने रहे। नागपुर के एक चुनावी मंच पर एक युवा नेता ने डंका बजाने के अंदाज में कहा कि मुझे पता चला है कि पति बदलने वाली महिला की बिंदी भी बढती चली जाती है। उनका यह शर्मनाक प्रहार केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पर था। भेदभाव और भ्रष्टाचार का भी खात्मा नहीं हो पाया। सच तो यह है कि जिन जनहित कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी, उनकी अनदेखी की गई। भारत के करोडों लोग रोजगार तथा रोटी, कपडा और मकान की जिस गंभीर समस्या से वर्षों से त्रस्त हैं उसका हल करने की पहल ही नहीं की गई। हां दावे और बडी-बडी बातें जरूर की गईं। ऐसे में लोग यह कहने और सोचने को मजबूर हो गये :
 "न उनसे हुआ भला, न इनसे हुआ भला
काटा है सबने आज तक कमजोर का गला
कुर्सी पर बैठा जो भी उल्लू बन गया
नेता का जिस्म एक ही सांचे में ढला
वो नागनाथ थे तो ये सांपनाथ हैं
बाँबी में हाथ डाला हमको पता चला
बहुरुपिये हुये सब बदले हैं मुखौटे
जनता को खूब आज तक हर एक ने छला
सींचा है जैसे-जैसे यह सूखता गया
जनतंत्र का यह वृक्ष अब तक नहीं फला।"
देश के वातावरण में ज़हर घोलने की राजनीति ने हर उस देशवासी को आहत किया जो यह मानता है कि आपसी सदभाव ही हिन्दुस्तान की मूल पहचान है। भाईचारे के हत्यारे नेता और सत्ताधीश पता नहीं क्यों इस भ्रम में जीते हैं कि उनके लिए चुनाव जीतना बहुत आसान है। अधिकांश वोटर उनके साथ हैं। दुनिया की कोई ताकत उन्हें पराजित नहीं कर सकती। वे सिर्फ और सिर्फ शासन करने के लिए ही जन्मे हैं। ऐसी अंधी सोच रखने वालों पर ही शायर राहत इंदौरी ने जो शाब्दिक चोट की है, दरअसल यह आक्रोश में डूबे उन भारतीयों की चेतावनी है जिन्हें सत्ता के भूखे अहंकारी शासक शूल की तरह चुभते हैं:
"जो आज साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे
किराएदार हैं, जाती मकान थोडी है...
सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दुस्तां थोडी है..."

देशवासी असली सच से अनजान रहें इसके लिए नेताओं की जमात तरह-तरह के नाटक करते नहीं थकती। बंद कमरों में यह एक हो जाते हैं। मिल बांटकर खाते-खिलाते हैं और मंचों पर जनता को खूब बेवकूफ बनाते हैं। दिखावे के लिए एक-दूसरे पर कीचड उछालने और खुद को ईमानदार घोषित करने की कला तो जैसे इन्होंने विरासत में पायी है। यह ऐसे जादूगर हैं जो होते कुछ हैं, दिखाते कुछ हैं। २०१९ के लोकसभा चुनाव में खूब धन बरसा और बरसाया जा रहा है। काले धन की बरामदी के लिए छापेमारी भी हो रही है। पूरे देश में अभी तक चार सौ करोड के आसपास काला धन पकड में आया है, जिसे चुनाव में फूंका जाना था। शराब के जखीरे और बेहिसाब सोना-चांदी की बरामदगी यही बताती है कि इस देश में कुछ भी नहीं बदलने वाला। जनता के साथ छल-कपट करने का सिलसिला सतत बना रहने वाला है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमल नाथ के रिश्तेदारों और करीबियों के विभिन्न ठिकानों से करोडों-करोडों रुपये की बेहिसाबी रकम, सोने-चांदी और शराब के जखीरे मिलना तो यही बताता है कि अपवादों को छोडकर बाकी सब सफेदपोश ऐसे चोर-लुटेरे हैं जो प्रदेश और देश को दीमक की तरह चाटने और खोखला करने के लिए राजनीति में घुसपैठ कर चुके हैं। यह भी सच है कि कमल नाथ का काला सच सामने आने के बाद भी लोगों को अधिक हैरानी नहीं हुई। उन्हें पता है जो पक‹डा गया वही चोर- बाकी सभी ईमानदार और साहूकार। यहां कोई राजनेता और पार्टी दूध की धुली नहीं। यहां का कोई नेता बुद्धू नहीं। चालाकी उनमें कूट-कूट कर भरी है। भावना ने सच ही तो लिखा है:
"दाने से मछलियों को लुभाता रहा,
क्या हकीकत थी, क्या दिखाता रहा,
था अजब उसके कहने का अंदाज भी,
कुछ बताता रहा, कुछ छिपाता रहा।"

सच तो यह भी है कि अधिकांश राजनीतिक दल और उनके मुखिया बेनकाब हो चुके हैं। चुनावों में हर दल धनबल की बैसाखी का सहारा लेता है। मीडिया और मतदाताओं को खरीदने में प्रतियोगिता होती है। येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने के लिए सभी हथकंडे आजमाना भी राजनीति का दस्तूर बन गया है। जाने-माने व्यंग्यकार सुभाष चंदर की यह पंक्तियां नितांत गहरी हकीकत को बयां कर रही हैं :
"चुनाव में जादू है साहब! इस जादू में कुछ मुर्दे भी ज़िन्दा हो जाते हैं। फिर वोट डालकर अंगुलियों की स्याही मिटाकर, फिर मर जाते हैं।"
हमारे देश के राजनीतिक दल हर चुनाव में नया घोषणा पत्र पेश करते हैं, जिसमें नये-नये वादों, प्रलोभनों की भरमार होती है। विख्यात व्यंग्यकार अविनाश बागडे की निम्न पंक्तियां उन दलों पर तमाचा हैं जो पुराने वादे तो पूरे नहीं करते और नया 'वादा पत्र' पेश करने में कतई नहीं लज्जाते।
"काश! सियासी दल सभी, करते इतना काम
गत चुनाव का घोषणा पत्र भी, कर देते आम।"


Thursday, April 4, 2019

वादों का चुनाव

लीडर के मुंह पे वादों का तूफान-सा क्यूं है?
जनता के लिए फिर भी ये अनजान-सा क्यूं है?
दे वोट किसे, किसको चुने, ये ही सोचकर-इस
शहर में हर शख्स परेशान-सा क्यूं है?
चिंतनशील कवि गजलकार अशोक अंजुम की उपरोक्त पंक्तियां आज के चुनावी मौसम का सच बयां कर रही हैं। देश की आम जनता जिसे राजनेता, सत्ताधीश महज वोटर मानते हैं, आज वह असमंजस के जाल में जकडी है। लोकसभा का चुनाव लड रहे प्रत्याशी उसके जाने-पहचाने होने के बावजूद भी अनजाने से हैं। उनका संदिग्ध चाल-चलन उसे परेशान किये है। देश को आजाद हुए सत्तर से ज्यादा साल बीत गये, लेकिन आम देशवासियों को मूलभूत सुख-सुविधाएं तक हासिल नहीं हो पायीं। हर पांच साल बाद विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होते हैं। लगभग वही खिलाडी अपनी-अपनी पार्टी का झंडा थामकर वोट मांगने के लिए उनके द्वार आ खडे होते हैं। अब तो वोटर थक गये हैं। धोखाधडी और छल-कपट की इंतहा हो चुकी है। नेताओं ने भले ही वादे पर वादे करने के बाद भी गरीबी का खात्मा न किया हो, बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध न कराये हों, लेकिन वोटरों ने उन्हें विधायक और सांसद बनाकर उनके हुलिये को बदल दिया है। खाकपति करोडपति हो गये हैं। उन्हें स्थायी रोजगार मिल गया है। सच कहें तो भारत वर्ष में नेताओं के लिए राजनीति ऐसा रोजगार है जिससे उनकी कई पीढ़ियां तर जाती हैं। जैसे ही चुनावी शंखनाद होता है इस देश के अधिकांश नेता अपने चेहरे पर कोई नया नकाब लगा लेते हैं। इनकी टीम नये-नये नारे गढने में लग जाती है। १९७१ में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' के नारे को उछालकर चुनाव जीता था। आज उनका पोता राहुल गांधी देश के पांच करोड परिवारों को सालाना ७२००० रुपये देने के वादे के साथ लोकसभा के चुनावी मैदान में छाती तानकर खडा है। बडे-बडे अर्थशास्त्री राहुल के इस ऐलान से हैरान-परेशान हैं, लेकिन राहुल कहते हैं कि उन्होंने विश्व के बडे-बडे धुरंधरों के साथ सलाह-मशविरे के बाद ही यह घोषणा की है। राहुल यह तो बताने और समझाने से रहे कि अभी तक वे कहां सोये थे। नरेंद्र मोदी की भाजपा के केंद्र की सत्ता पर आने से पहले पूरे दस साल तक उनकी सरकार थी। दरअसल सत्ता खोने के बाद ही उनके दिमागी घोडे कुछ ज्यादा ही दौडने लगे हैं। अब उनका पूरा ध्यान फिर से केंद्र की सत्ता पाने में लगा है। उनका बस यही सपना है चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री न बन पाएं। नरेंद्र मोदी एंड कंपनी भी ठाने है कि वह राहुल गांधी के ख्वाब को किसी भी हालत में साकार नहीं होने देगी। दरअसल, यह कुर्सी की लडाई है, जिसमें इस देश की आम जनता पिस रही है। पिसती आई है। देश की ही एक अन्य राजनीतिक पार्टी सीपीआईएम ने मतदाताओं को अपने जाल में फंसाने के लिए यह ऐलान किया है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो न्यूनतम वेतन १८,००० रुपये प्रतिमाह कर दिया जायेगा। राजनीतिक पार्टियों के द्वारा मतदाताओं को प्रलोभित करने का यह अंदाज यही बताता है कि राजनीति उनके लिए कोई भव्य मॉल है, मंडी है और मतदाता उसके ग्राहक हैं, जिन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए वे उन्हें तरह-तरह के ऑफर दे रहे हैं। सच तो यह है कि यह व्यापारिक सोच छल-कपट और भ्रष्टाचार वो चेहरा है जिसने देशवासियों को सतत छला और लूटा है। कौन नहीं जानता कि भ्रष्टाचार भारत वर्ष के विकास के मार्ग की सबसे ब‹डी बाधा है। इस बाधा को दूर करने के लिए वर्षों से राजनेता और सत्ताधीश ढोल बजाते चले आ रहे हैं, लेकिन सच क्या है उसे जनता अच्छी तरह से जानती है। फिर ऐसे में सवाल उठता है कि वह कौन-सी मजबूरी है कि वह बार-बार चोर-उचक्कों, लुटेरों, ठगों और बेईमानों को अपना वोट दे देती है? इस बार के लोकसभा के चुनाव में गरीबी, भुखमरी, किसान आत्महत्या, बेरोजगारी, दलितों पर बढते अत्याचार पर कोई दल बात नहीं कर रहा है। हैरतअंगेज उत्तेजना का वातावरण बना दिया गया है। प्रत्याशी तो उत्तेजित हैं ही, मतदाताओं की उत्तेजना भी देखने बन रही है। चुनावी मैदान में धनपतियों का धनपतियों से मुकाबला है। जो गरीब लोकसभा का चुनाव ल‹ड रहे हैं उनकी किसी को खबर ही नहीं है। बस मालदारों का ही डंका बज रहा है। मेरे पाठक मित्रों, आपको यह जानकर घोर अचंभा हो सकता है कि राजनीति की बदौलत करोडों-अरबों की दौलत जुटाने वाले विधायकों, सांसदों की भीड में कुछ ऐसे अजब-गजब जनप्रतिनिधि भी हैं जिन्होंने सच और ईमानदारी का दामन कभी भी नहीं छोडा। भ्रष्टाचार क्या होता है इसका भी उन्हें पता नहीं है। अपने इरादों पर अटल रहने वाले एक नेक नेता हैं उत्तर प्रदेश के आलम बदी। ८२ वर्षीय आलम बदी समाजवादी पार्टी की टिकट पर निजामबाद से चुनाव लड कर विधायक बने हैं। पहले भी तीन बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके आलम सुबह से शाम तक जनता के बीच रहते हैं। किसी भी चुनाव में उन्होंने दो लाख रुपये से ज्यादा खर्च नहीं किए। उनकी सहजता और सादगी ही उनकी पूंजी है। हाथ में १२०० रुपये का मोबाइल, बीस रुपये मीटर के टांडे के कपडे का कुर्ता पायजामा, मामूली-सी चप्पल, छरहरा बदन और चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास उनकी ईमानदारी की गवाही देता प्रतीत होता है। वे विधायक निधि के एक-एक पैसे का हिसाब रखते हैं। जहां उन्हें लगता है कि ठेकेदार ने काम में कोई गडबडी की है तो उसका भुगतान रुकवा देते हैं। सही मायने में यही वो राजनेता हैं जो न खाते हैं, न खाने देते हैं। २००७ में प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने उन्हे मंत्री बनाना चाहा था, लेकिन उन्होंने यह कहकर स्पष्ट इनकार कर दिया था कि मैं जिस साधारण से कमरे में रहता हूं उसका त्याग नहीं कर सकता। मुझे लालबत्ती की गाडी और बंगले का शौक नहीं है। मैं तो उसी जनता के बीच रहकर उसकी सेवा करना चाहता हूं जो चुनाव में मेरे कार्यकर्ता बन मुझे हर बार विजयश्री दिलवाते हैं। आज के इस ठाठ-बाट के दौर में कोई यदि पार्षद भी बन जाता है तो एक अजीब तरह का गरूर उसके चेहरे से झलकने लगता है। वह उन लोगों को भी अपने से कमतर मानने लगता है, जो उसे वोट देकर यह सम्मान दिलाते हैं। विधायक-सांसद बनने के बाद तो नेताजी के वारे-न्यारे हो जाते हैं। बंगलों, फार्म हाऊसों, स्कूल-कॉलेजों और कारों की कतार-सी लग जाती है। ऐसा लगता है जैसे इन्हीं को पाने के लिए ही बंदे ने राजनीति का दामन थामा है। बलरामपुर से माले के विधायक हैं महबूब आलम। हकीकत में यह भी नेता हैं, लेकिन आम नेताओं जैसे यह बिलकुल नहीं हैं। यह विधायक महोदय जैसे पहले थे वैसे ही आज हैं। रिक्शे पर चलते हैं। सरकार हर विधायक को दो बॉडीगार्ड देती है। रिक्शे पर उनके साथ एक बॉडीगार्ड बैठ पाता है इसलिए उन्होंने दूसरे बॉडीगार्ड को सरकार के पास वापस भेज दिया है। इनका कहना है कि वह आम जनता के विधायक हैं, इसलिए ताउम्र उसी की तरह रहना और जीना चाहते हैं। अगर उन्हें धन कमाना होता तो कोई धंधा करते, राजनीति में नहीं आते।