Thursday, July 18, 2019

क़ातिलों की भीड में...

कुछ खबरों को पढ-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां रुखसार का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाडले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भूख से चीख रहा था। तडप रहा था। उसने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कुछ भी बाकी नहीं बचा था, जिसे बेचकर खाद्य पदार्थों एवं दूध का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोडकर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तडपन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया। उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे मौत की नींद सुला दिया। एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में 'मां' है, जो अपनी औलाद को बडे लाड-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां की हत्यारिन बनने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! इतनी अधिक परेशानी थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर थोडी-बहुत सहायता तो जरूर कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां रुखसार को हिरासत में ले लिया। उसकी मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहा कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...।
सच कहें तो असली अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भूख से तडप-तडप कर मरने की खबर कभी भी पढने-सुनने में नहीं आई। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गह्ना, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पडती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकडों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।
हमारी इस धरती पर कई लोग ऐसे हैं जो अपने दु:ख कभी उजागर नहीं करते। अपनी कमियों और कमजोरियों को अपना मुकद्दर मानकर योद्धा की तरह लडते रहते हैं। खुद का भोगा हुआ यथार्थ उन्हें अच्छी तरह से यह पाठ पढा देता है कि अगर अपने स्वाभिमान को बरकरार रखना है तो चुपचाप संकटों से सतत जूझते रहना होगा? दूसरों को अपना दुखडा सुनाने पर मज़ाक के पात्र बन जाएंगे। उन्नीस वर्षीय अविंशु पटेल, जिसने बीते सप्ताह समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली, वह अपनी जिन्दगी अपने तौर-तरीकों के साथ जीना चाहता था। उसे बेवजह की दखलअंदाजी और तानेबाजी शूल की तरह चुभती थी। अविंशु समलैंगिक था। शरीर से भले ही लडका था, लेकिन उसका मन था लडकी का। हमारा समाज सिर्फ दो जेंडर्स (लिंग) को ही सम्मान के साथ जीने के लायक मानता है। तीसरे जेंडर को बेइज्जत करने में उसे खुशी मिलती है। अथाह आनंद की अनुभूति होती है। उन्हें हिजडा, नपुंसक कहने के साथ-साथ गंदी-गंदी गालियां देकर खुद की मर्दानगी पर गर्व किया जाता है। भावुक अविंशु ने पढाई करने के बाद चेन्नई की एक कंपनी में नौकरी हासिल कर ली थी, लेकिन फिर भी चौबीस घण्टे उसे यह पीडा सताती रहती थी कि लोग उसका मजाक उडाते हैं। उसे प्रताडित करने के बहाने ढूंढे जाते हैं। उसके माता-पिता ने उसके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं किया। अच्छी तरह से पाला-पोसा और पढाया-लिखाया। सरकार ने भी समलैंगिकों को कानूनी मान्यता दे दी है, लेकिन लोग हैं कि बदलने को तैयार नहीं हैं। मैं मरने के बाद भगवान से पूछूंगा कि आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। शरीर तो मुझे लडके का दिया, मगर सोच और भावनाएं लडकियों सी दे दीं?

Thursday, July 11, 2019

चिकित्सा के क्षेत्र में डाकू और साधु

बीस साल के फुरकान को सडक दुर्घटना में बुरी तरह से जख्मी हो जाने के कारण एक प्रायवेट अस्पताल में भर्ती करवाया गया। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित इस अस्पताल के डॉक्टरों ने फुरकान के परिजनों को बताया कि मामला काफी गंभीर है। परिजनों ने डॉक्टरों के कथन के पीछे के आशय को समझते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी तरह से उनके युवा बेटे को बचायें। बिल की कतई चिन्ता न करें। डॉक्टरों ने इलाज प्रारंभ कर दिया। पांच-छह दिन बाद सात लाख रुपये का बिल थमा दिया गया। परिजनों ने अपनी जमा पूंजी और यहां-वहां से जुगा‹ड कर अस्पताल का बिल चुका दिया। अब उनकी जेब में एक फूटी कौडी भी नहीं बची थी। उन्हें तो सिर्फ अपने बेटे की चिन्ता थी। डॉक्टरों ने भी उसके पूरी तरह से भला-चंगा होने का आश्वासन दिया था। दो दिन बाद फिर से फुरकान के पिता से और रकम की मांग की गयी। पिता के यह बताने पर कि अब मेरे पास और पैसे नहीं हैं तो कुछ ही घण्टों के बाद डॉक्टरों ने फुरकान को मृत घोषित कर दिया। इतना ही नहीं उसके शव को एंबुलेंस के जरिए घर भी पहुंचा दिया। घर वाले सीने पर पत्थर रखकर अपने लाडले को दफनाने की तैयारी में जुट गये। कब्र भी खोद ली गई। तभी अचानक उन्हें फुरकान के शरीर में हरकत दिखाई दी। वे लोग उसे फौरन राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले गये। वहां डॉक्टरों ने बेटे को जिन्दा बताया और तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर रख दिया। डॉक्टरों ने बताया कि मरीज की हालत गंभीर जरूर है, लेकिन वह ब्रेन डेड नहीं है। उसकी नाडी, ब्लडप्रेशर और दिमाग काम कर रहा है। ऐसे अस्पतालों और डॉक्टरों के कारण ही ईमानदार डॉक्टरों को भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा है। चिकित्सा के पावन पेशे में भ्रष्टाचार के घर कर जाने के कारण लोगों ने अब चिकित्सकों को 'भगवान का दर्जा' देना लगभग बंद कर दिया है। धन कमाने का सभी को अधिकार है, लेकिन चिकित्सा के पेशे की कुछ मर्यादाएं हैं, जिनका पालन नहीं करने वाले डॉक्टरों के कारण ही उन्हें माफिया भी कहा जाता है। यह धूर्त लोग मरीजों को डराते हैं और उनकी जेबों पर ब‹डी आसानी से डाका डालते हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त डॉक्टरों की दवा कंपनियों, दवाई दुकानों, पैथलैब, साथी डॉक्टरों और पता नहीं कहां-कहां से कमीशन बंधी होती है। यह लोग मरीजों के परिजनों को ब्रांडेड दवाएं खरीदने को विवश करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा कमीशन हासिल हो। मेडिकल कॉलेजों में लाखों रुपये के डोनेशन, रिश्वत देकर डॉक्टर बनने वाले भारत के अधिकांश युवा शहरों में बडे-बडे अस्पतालों में नौकरी बजाते हुए धन कमाने को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें ग्रामों के प्रति कोई लगाव नहीं है। इसकी एक मात्र वजह यही है कि वहां पर उनके धनपति बनने के अरमान पूरे नहीं हो सकते। वहां पर उन्हें शहरों वाली सुख-सुविधाएं नहीं मिल पातीं। भौतिक सुविधाओं के घोर लालची डॉक्टरों की भीड में कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो अपनी जान को जोखिम में डालकर नक्सलग्रस्त इलाको में वर्षों से जनसेवा कर रहे हैं। वे भी अगर चाहते तो डॉक्टरी की डिग्री हासिल करने के बाद शहरों, महानगरों में लूटमार करते हुए मौज की जिन्दगी जी सकते थे। उन्हें किसी ने रोका नहीं था। उनकी सेवा भावना उन्हें आदिवासी क्षेत्रों में ले गयी। जहां पर वे निशुल्क या नाम मात्र की फीस लेकर मरीज और डॉक्टर के सच्चे रिश्ते को और मजबूती प्रदान कर रहे हैं। डॉ. अभय बंग और उनकी धर्मपत्नी डॉ. रानी बंग दोनों कई वर्षों से गडचिरोली के नितांत पिछडे इलाकों में बच्चों के इलाज को अपने जीवन का एक लक्ष्य बना चुके हैं। बंग दम्पति ने अमेरिका के जॉन होपqकग्स यूनिवर्सिटी से जन स्वास्थ्य में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात ही दृढ निश्चय कर लिया था कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित गडचिरोली को ही अपना कार्यक्षेत्र बना कर अपनी पढाई का सदुपयोग करना है। वर्ष १९८८ में नवजातों की मृत्यु की खबरें अखबारों में अक्सर प‹ढने को मिलती थीं। देश में नवजातों की मृत्यु के मामलों में ग‹डचिरोली प्रथम क्रमांक पर था। इंसानियत की पावन भावना से ओतप्रोत बंग दम्पति ने बच्चों का जीवन बचाने के लिए निशुल्क इलाज करने का ऐसा कीर्तिमान रचा कि नवजात शिशु मृत्यु दर काफी घट गई। उनकी इसी निस्वार्थ जन सेवा के फलस्वरूप भारत सरकार द्वारा उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। डॉ. आशीष सातव व डॉ. कविता सातव भी पिछले बीस वर्ष से गडचिरोली में गरीबों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाते चले आ रहे हैं। महज दस रुपये से तीस रुपये तक फीस लेने वाले यह सेवाभावी डॉक्टर पति-पत्नी असमर्थ मरीजों का पूरी तन्मयता के साथ नि:शुल्क इलाज भी करते है। उनकी सार्थक कोशिशों के परिणाम स्वरूप अब गडचिरोली इलाके में मृत्यु दर में ५८ फीसदी और कुपोषण में २५ फीसदी की कमी आई है। डॉक्टर रविन्द्र कोल्हे और डॉक्टर स्मिता कोल्हे दोनों पिछले ३४ वर्षों से अमरावती के ग्रामीण ऐसे इलाके में गरीबों और असहायों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवा रहे हैं, जहां पहुंचने के लिए मुख्य जिले से २५ किमी बस से और फिर ३० किमी पैदल चलकर जाना पडता है। इस गांव का उन्होंने पूरी तरह कायाकल्प कर दिया है। खेती-किसानी में अभिरुचि रखने वाली इस दम्पति को इसी वर्ष यानी २०१९ में भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से नवाजा है। दोनों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में भले ही कमायी नाम मात्र की होती है, लेकिन जो सम्मान, संतुष्टि और खुशी मिलती है उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना असंभव है।
राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर के कोटपूतली में वर्षों से बच्चों का इलाज करते चले आ रहे शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रामेश्वर यादव यदि चाहते तो आज करोडों-अरबों रुपये कमाते हुए ऐश कर रहे होते, लेकिन डॉक्टरी उनके लिए कारोबार नहीं, जनसेवा का पवित्र माध्यम है। उनकी पत्नी भी डॉक्टर हैं। डॉ. रामेश्वर यादव बच्चों के इलाज के लिए नाम मात्र की फीस लेने के लिए दूर-दूर तक जाने जाते हैं। उनकी पत्नी भी समाजसेवा के प्रति पूर्णतया समर्पित हैं। एक दिन जब दोनों पति-पत्नी अपने गांव चूरी जा रहे थे तो उन्होंने चार लडकियों को रास्ते में बारिश में भीगते हुए देखा। उन्होंने तुरंत अपनी कार रोककर लडकियों को अपनी कार में बिठाया। ल‹डकियों से बातचीत में उन्हें पता चला कि परिवहन सेवा के अभाव में कई छात्राओं को हर रोज मीलों पैदल आना-जाना पडता है। गुंडे-बदमाश उन पर निगाहें ग‹डाये रहते हैं। मौका पाते ही अश्लील हरकते करने लगते हैं। पति-पत्नी ने स्कूली और कॉलेज की छात्राओं की रोजमर्रा की समस्या को गंभीरता से समझा और समाधान भी कर दिया। उन्होंने अपने जीवनभर की जमा रकम बैंक से निकालकर बस खरीदी। बावन सीटों वाली यह बस प्रतिदिन छात्राओं को स्कूल-कॉलेज ले जाती है, फिर घर छोडती है। डीजल और ड्राइवर का वेतन अपनी जेब से देने वाली इस दम्पति के पास बारह साल पुरानी मारुति ८०० है। नई महंगी कार लेने की कभी उनकी इच्छा भी नहीं हुई। परिवहन सुविधा उपलब्ध होने से वो माता-पिता भी अपनी बेटियों को सहर्ष कॉलेज भेजने लगे हैं, जो निजी वाहनों में होने वाली छेडछाड की घटनाओं की वजह से कतराते और घबराते थे। डॉ. रामेश्वर यादव के इस सेवा कार्य ने गरीब बेटियों का मनोबल बढाया है। पढ-लिखकर वे भी समाज सेवा करना चाहती हैं।

Thursday, July 4, 2019

भक्तों का भयावह चेहरा

कुछ लोग जीते ही इसी मकसद से हैं कि उन्हें प्रचार, पुरस्कार और सहानुभूति मिलती रहे। मीडिया में सुर्खियां पाने की उनकी लालसा कभी खत्म नहीं होती। अपनी इस भूख को मिटाने के लिए वे किसी भी हद को पार करने को तत्पर रहते हैं। उनकी इस उत्कंठा का फैलाव करने के लिए भक्तों और अनुयायियों की सेना ऐसे मोर्चा संभाल लेती है जैसे इन जयकारे लगाने वाले सैनिकों का जन्म ही इसी काम के लिए हुआ हो। इन्हें घोर अंधविश्वासी होने में भी कोई परेशानी नहीं होती। सच तो यह है कि इस दुनिया का सारा कारोबार स्वार्थों की नींव पर टिका है...। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज को पांच साल पहले ही मृत घोषित कर दिया था, लेकिन अभी भी उनका शव डीप फ्रीजर में रखा है। उनके भक्तों को पूरा यकीन है कि आशुतोष महाराज ने समाधि ली है। एक-न-एक दिन महाराज समाधि से वापस आएंगे। पंजाब के जालंधर के नूर महल में स्थित दिव्य ज्योति संस्थान के जिस कमरे में उनका शव रखा है वहां पर चौबीस घण्टे जवानों का पहरा रहता है। हर छह महीने में एक बार डॉक्टर्स उनके शव की जांच करते हैं। मीडिया को भी वहां पर जाने की सख्त मनाही है। २८ जनवरी २०१४ की रात को आशुतोष महाराज को सीने में दर्द हुआ। इसके बाद वे मौन हो गए। उनके अनुयायी एकत्रित हुए। सभी ने यही निष्कर्ष निकाला कि महाराज पहले की तरह इस बार भी समाधि में चले गए हैं। गौरतलब है कि दिव्य ज्योति संस्थान की गतिविधियां अब भी निरंतर वैसे ही चल रही हैं, जैसे महाराज के समाधिस्थ होने से पहले चला करती थीं। आश्रम के प्रबंधकों में पहले जैसा ही उत्साह है। वे श्रद्धालुओं को सतत यही विश्वास दिलाते रहते हैं कि भले ही डॉक्टरों ने महाराज को मृत घोषित कर दिया है, लेकिन महाराज जीवित हैं। उनकी कभी मौत नहीं हो सकती।
आशुतोष महाराज के प्रति अटूट आस्था रखने वाले उनके लाखों भक्तों को उस दिन का बेसब्री से इंतजार है जब उनके आराध्य समाधि से लौटेंगे। बीते वर्ष राजस्थान के भीलवाडा में श्री पंचनाम जूना अखाडे के नागा बाबा श्यामानंद सरस्वती जब भूसमाधि लेने जा रहे थे तब कुछ सजग लोगों ने उनका विरोध किया था। बाबा के कट्टर भक्तों ने तो ९ बाई ९ का गड्ढा  हफ्तों पहले ही खोद कर पूरी तैयारी कर ली थी। वे अपने गुरु के समाधि में जाने के जिस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे आज वो दिन आ गया था। भक्त अपने प्रिय बाबा पर फूलों की बरसात करते हुए जयकारे लगा रहे थे। तमाशबीन भीड बेकाबू होती जा रही थी। बाबा भीड को देखकर गदगद हो रहे थे। उनके चेलों ने पहले से ही प्रचारित कर दिया था कि नागा बाबा देश में बढते सामूहिक बलात्कारों की वजह से आहत होने के कारण समाधि लेने का निर्णय कर चुके हैं। वे जो ठान लेते हैं उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेते हैं। इसी बीच किसी तरह से प्रशासन को बाबा के समाधि-कार्यक्रम की खबर लग गई। कई प्रशासनिक अधिकारी वहां पहुंच गये। बाबा तो शांत खडे रहे, लेकिन भक्त और भीड उनका विरोध करने लगी। उन पर पत्थर बरसाये जाने लगे। काफी मशक्कत के बाद अधिकारी बाबा को अपने साथ ले जाने में सफल हो पाये। बाबा की समाधि तो टल गई, लेकिन भक्तों का गुस्सा बना रहा।
अपने देश में फक्कडवन बाबा भी हैं, जो कई बार समाधि ले चुके हैं। गत वर्ष उन्होंने धार के एक गांव में नर्मदा किनारे १२ फीट गहरे गड्ढे में समाधि लगायी थी और ९ दिन बाद बाहर निकले थे। फक्कडवन बाबा के भक्तों का कहना है कि उनके गुरुजी मानवता को जिन्दा रखने, हर मनुष्य का कल्याण करने और पापों का विनाश करने के लिए समाधि लेते रहते हैं। जन-जन तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए बाबाओं का समाधि लेने का सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। कुछ साधु बाबा तो समाधि का ऐलान करने के पश्चात भाग खडे होते हैं। ऐसे बाबा भी हुए हैं, जो अपने जिद्दी भक्तों के उकसावे में समाधि के गड्ढे में उतर तो गए, लेकिन बाद में उनकी लाश ही बाहर निकली। हवा-पानी के बिना घण्टों गड्ढे में बिताने की 'कला' पूरी तरह से किसी की समझ में अभी तक नहीं आयी है।
अभी हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव के दौरान स्वामी वैराग्यानंद उर्फ मिर्ची बाबा ने भोपाल से दिग्विजय सिंह की जीत के लिए पांच क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करते हुए यह दावा किया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी दिग्गी राजा ही लोकसभा चुनाव जीतेंगे। उनका अपार प्रभावी 'मिर्ची यज्ञ' विरोधियों को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर देगा। अगर दिग्गी राजा चुनाव हार गये तो वे किसी को अपना मुंह नहीं दिखायेंगे और फौरन समाधि ले लेंगे। भाजपा की प्रज्ञा ठाकुर की जीत ने बाबा के पैरों तले की जमीन खिसका दी। उनके भक्त बेसब्री से चुनावी नतीजों का इंतजार कर रहे थे। वे ढोल नगाडे बजाते हुए मिर्ची बाबा के ठिकाने पर जा पहुंचे। अपनी भविष्यवाणी के गलत साबित होने के कारण स्वामी जी तो अपना झोला-झंडा समेट कर गायब हो चुके थे, लेकिन भक्त कहां छोडने वाले थे। उन्होंने फोन पर फोन लगाकर उन्हें अपनी प्रतिज्ञा याद दिलायी। जान हर किसी को प्यारी होती है। स्वामी जी ने जोश ही जोश में दिग्गी राजा के चुनाव हारने पर समाधिस्थ होने का ऐलान तो कर दिया था, लेकिन अब उन्हें यहां-वहां मुंह छिपाने के लिए विवश होना पड रहा था। कई दिनों तक समाधि से डरे फिरते मिर्ची बाबा का भक्तों ने जीना ही मुहाल कर डाला। बाबा पर समाधि में जाने का जबर्दस्त दबाव बनाये जाने की खबर जब मैंने प‹ढी और सुनी तो स्तब्ध रह गया। यह कैसे भक्त हैं, जो अपने गुरु को मौत के मुंह में समाते देखना चाहते हैं! कल तक तो यह लोग उनके नाम के जयकारे लगा रहे थे, उन पर फूल बरसा रहे थे और आज उनकी मौत चाहते हैं! यह इन्सान हैं या दरिन्दे जो दारुण और दर्दनाक मंजर देखने को आतुर हैं।

Thursday, June 27, 2019

असहायों की मददगार

तकलीफें और परेशानियां तो हर इंसान के हिस्से में आती हैं। हादसे और दुर्घटनाएं हंसते-खेलते इंसान के जीवन के उजाले को घने अंधेरे में बदल देती हैं। ऐसे लोग भी हैं जो समस्याओं के चक्रव्यूह से बाहर निकल कर दूसरों के अंधेरों को दूर करने में लगे हैं। खुद विकलांग होने के बावजूद भी असंख्य विकलांगों का सहारा बने हुए हैं। हमारी ही दुनिया में ऐसे संवेदनशील लोग भी हैं, जिनसे गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी और बेरोजगारी नहीं देखी जाती। अशिक्षित गरीब माता-पिता के बच्चों का भटकाव और अंधकारमय भविष्य उन्हें विचलित कर देता है। प्रीति श्रीनिवासन की उम्र तब १८ साल की थी जब एक दुर्घटना ने उनको आसमान से जमीन पर लाकर पटक दिया। हंसी-खुशी और उमंगों के दिन अंधेरी रातों में तब्दील हो गये। कुशल तैराक प्रीति उस दिन अपनी क्लास के दोस्तों के साथ स्विqमग पूल में खूब मस्ती के मूड में थी। इसी दौरान अचानक प्रीति ने पानी में करंट-सा महसूस किया। उसने बाहर निकलने की सोची, लेकिन तभी उसने महसूस किया कि उसके शरीर का निचला हिस्सा एकदम सुन्न हो गया है। सहेलियों ने फौरन उसे पानी से बाहर निकाला। प्रीति का शरीर तो जैसे पत्थर हो चुका था। पूरी तरह से अचेतन। उन्हें पॉन्डिचेरी अस्पताल पहुंचाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों को मामला काफी गंभीर लगा। उन्होंने आधा-अधूरा इलाज कर प्रीति को आगे के इलाज के लिए चेन्नै भेज दिया। वहां तक पहुंचने में ही चार घण्टे लग गये। सघन जांच की गयी तो पता चला कि वह गंभीर लकवे का शिकार हो चुकी है। पूरी तरह से ठीक होने की दूर-दूर तक सम्भावना नहीं थी। अगर फौरन सही इलाज मिल जाता तो उनकी ऐसी हालत न होती। अंडर १९ क्रिकेट की कैप्टन रही प्रीति ने अपनी जिन्दगी का हर पल हंसते-खेलते बिताया था। इस हादसे के बाद तो उन्हें अपना भविष्य ही अंधकारमय लगने लगा। कुछ महीने अस्पताल में बिताने के बाद वह अपने घर लौटी। लकवा उम्र भर का साथी बन चुका था। बिस्तर पर लेटे-लेटे वह आंसू बहाती रहती। व्हीलचेयर पर बैठती तो मन-मस्तिस्क में आत्महत्या करने के विचार हावी हो जाते। घर से बाहर निकलने की तो कभी इच्छा ही नहीं होती। ऐसा लगता जैसे सबकुछ लुट गया है। प्रीति के माता-पिता किसी भी तरह से उसे हताशा और निराशा के भंवर से बाहर निकलते देखना चाहते थे। उन्होंने अपने दिन और रात बेटी पर कुर्बान कर दिये। उन्होंने बार-बार उसे याद दिलाया कि खिलाडी कभी भी हार नहीं माना करते। मैदान में सतत डटे रहते हैं। हमारी इसी दुनिया में कई विकलांगों ने ऐसी-ऐसी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, जो अच्छे भले शरीरधारी भी हासिल नहीं कर पाते। शरीर के किसी हिस्से के निष्क्रिय हो जाने से हौसलों और सपनों की मौत नहीं होती। जब तक सांस है, तब तक आस है। यह माता-पिता की सकारात्मक सीख का ही परिणाम था कि प्रीति ने लकवाग्रस्त होते हुए भी खुद को विकलांगों की सहायता तथा देखरेख में झोंक दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि ११ जुलाई १९९८ में हुए हादसे ने प्रीति की सोच और जिन्दगी को ही बदल दिया। वह एक एनजीओ चलाती हैं जो विकलांगों को उत्साहित और प्रोत्साहित कर फिर से पूरे आत्मविश्वास के साथ जीवन की जंग लडने को प्रेरित करता है। लकवा के शिकार मरीजों को रहने की सुविधा के साथ-साथ आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है। वे दूसरों पर आश्रित न रहें इसके लिए उन्हें अपने पैरों पर खडे होने के लायक बनाया जाता है। प्रीति के कारण सैकडों विकलांगों की खोयी हुई खुशियां वापस लौट आयी हैं। उनके एनजीओ के द्वारा दिव्यांगों की प्रतिभा को सामने लाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। उन्हें रेडियो जॉकी, वाइस डबिंग आर्टिस्ट, टेली मार्केटिंग आदि की ट्रेनिंग भी दी जाती है, जिनका रुझान किसी अन्य क्षेत्र के प्रति होता है उन्हें उसी के बारे में शिक्षित और दीक्षित किया जाता है।
अपना भविष्य संवारने के लिए भरपूर मेहनत करने वाले तो ढेरों हैं, लेकिन दूसरों की जिन्दगी में परिवर्तन और खुशहाली लाने वाले गिने-चुने ही लोग हैं। उन्हीं में से एक हैं माही भजनी। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहती हैं। गरीब बच्चों के कल्याण के लिए वर्षों से काम कर रही हैं। माही भजनी ने अपने कुछ साथियों के सहयोग से अनुनन एजुकेशन एवं वेलफेयर सोसाइटी बनाई है, जिसके तहत भोपाल और आसपास के इलाकों में सेंटर खोले गये हैं, जहां पर गरीब बेसहारा बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इनमें से कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो कभी भीख मांगा करते थे। बात करने में सकुचाते और घबराते थे और आज फर्राटे के साथ अंग्रेजी बोलते हैं। सैकडों बच्चों का जीवन संवार चुकी माही को शुरुआती दिनों में काफी परेशानियां झेलनी पडीं। झोपडपट्टी में रहने वाले बच्चों और उनके परिवारों को शिक्षा के लिए तैयार करना आसान नहीं था। यह बच्चे कचरा बीनते थे। चोरी-चकारी भी करते थे। इन्हीं बच्चों की कमायी से कई घरों में का चूल्हा जलता था। अशिक्षित मां-बाप कतई नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे कमाना छोड दें। यह उनकी मजबूरी भी थी। कई शराबी पिता तो अपने बच्चों को अपराध की दुनिया में धकेलने के मंसूबे बना चुके थे। बच्चों को भी आवारागर्दी करने की लत लग चुकी थी। ऐसे में उन्हें पढाई-लिखाई से कोई लगाव नहीं था। वे भी अपने माता-पिता की तरह अशिक्षा और गरीबी के दलदल में ताउम्र फंसे रह जाते। यदि माही येन-केन प्रकारेण उनके मां-बाप को उनके बच्चों को पढाने-लिखाने के लिए तैयार करने में सफल नहीं होती। माही को वो शुरुआती दिन भी भुलाये नहीं भूलते जब उनके पडोसी और जान पहचान वाले उनपर शब्दबाणों की वर्षा करते रहते थे कि तुम भी कैसी बेवकूफ हो जिसे यह भी समझ में नहीं आता कि भिखारी हमेशा भिखारी रहते हैं। झुग्गी-झोपडी में जानवरों की तरह रहने वाले निकम्मे और अपराधी किस्म के माता-पिता के बच्चे होश संभालने के बाद सिर्फ और सिर्फ चोर-लुटेरे, जेबकतरे, हत्यारे और बलात्कारी ही बनते हैं। यही इनका नसीब होता है। भगवान के लिखे को कोई भी नहीं बदल सकता। अभी भी वक्त है अपना इरादा बदल डालो। अपना कीमती वक्त इन पर  बर्बाद मत करो। अपने बाल-बच्चों के भविष्य की चिन्ता करो। अपने इरादों की पक्की माही ने अंतत: असंभव को संभव कर दिखाया है। कल तक ताने मारने वाले आज उन्हें सराहने लगे हैं। तारीफें करते नहीं थकते। दरअसल इस सफलता का श्रेय तो उन बच्चों को भी जाता है, जिन्हें नाली का कीडा कहकर दुत्कारा जाता था, लेकिन उन्होंने दिखा दिया है कि अवसर और साथ मिलने पर वे भी आसमान को छूने का दम रखते हैं। जिन बच्चों के कभी भी नहीं सुधरने के दावे किये जाते थे, उन्हीं बच्चों के परीक्षा परिणाम और अन्य गतिविधियां वाकई स्तब्धकारी हैं। इन बच्चों ने पांचवी की परीक्षा में ९६ से ९८ प्रतिशत अंक हासिल किये हैं। अभी तक पांच सौ से ज्यादा गरीब बच्चों को स्कूल तक लाने में सफल रहीं माही भजनी की तमन्ना है कि इस देश का कोई भी बच्चा पढाई से वंचित न रहे। उन्हें साक्षर बनाना हम सबका दायित्व है।

Thursday, June 20, 2019

कौन किसके साथ?

मालगाडी के डिब्बे पटरी से उतर गये थे। एक न्यूज चैनल के पत्रकार अमित शर्मा इस घटना को कवरेज कर रहे थे। तभी जीआरपी यानी रेलवे पुलिस के कुछ कर्मी वहां पहुंचे और उन्हें लात-घूसों से पीटने लगे। जब उनके साथी पत्रकार ने खाकी वर्दी वाले गुंडों को रोका तो उन पर भी डंडों की बरसात कर दी गयी। यह डंडेबाज नशे में धुत थे। उन्होंने पत्रकार का मोबाइल छीनकर तोड दिया। जेब में रखे लगभग तीन हजार रुपये और घडी भी छीन ली। यही नहीं उसके मुंह में पेशाब कर हवालात में डाल दिया। बर्बरता से की गई इस पिटायी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही पूरे देश में खाकी की गुंडागर्दी की चर्चाएं होने लगीं। अपने यहां की पुलिस में कुछ अपराधी भी घुसपैठ कर चुके हैं, जिनकी वजह से बार-बार खाकी को कटघरे में खडा होना पडता है। कई पुलिस वालों के संगीन अपराधों में लिप्त होने के अनेकों उदाहरण हैं। इसी वजह से अपराध बढ रहे हैं और वर्दी लाचार नजर आती है। यह हकीकत भी हर सजग भारतीय को परेशान किये है कि पुलिस के अधिकांश उच्च अधिकारी सत्ताधीशों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गये हैं। राजनेता और शासक उन्हें जैसे नचाते हैं, वे वैसे ही नाचते और तांडव मचाते हैं। उत्तरप्रदेश के शामली में हुए इस कांड से ऐन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बारे में एक ट्वीट पर पत्रकार प्रशांत को प्रदेश की पुलिस ने जेल भेजने में जैसी फुर्ती दिखायी वैसी आम जनता की सुरक्षा के मामले में बहुत कम दिखती है। पत्रकार कनौजिया ने कोई डाका, बलात्कार या लूटमारी नहीं की थी, उन्होंने तो बस किसी महिला के उस वीडियो को ट्वीट कर दिया था, जिसमें महिला ने दावा किया था कि उसने योगी को शादी का प्रस्ताव भेजा है। इस तरह के ट्वीट सोशल मीडिया पर धडल्ले से वायरल होते रहते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर शरीफों की पगडी उछालने की मनमानी भी चलती रहती है। सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों की बरसात कर कई संदिग्ध प्राणी अब पत्रकार भी कहलाने लगे हैं। पत्रकार प्रशांत के द्वारा किये गए ट्वीट का जुडाव यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री से नहीं होता तो इसकी कहीं चर्चा भी नहीं होती। कहा गया कि इससे उत्तरप्रदेश के भगवाधारी मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने की साजिश की गई है। सारी दुनिया जानती है कि मुख्यमंत्री योगी  आदित्यनाथ ब्रम्हचारी हैं। संन्यासी हैं। ऐसे महापुरुष का किसी नारी से क्या लेना-देना। किसी प्रचार की भूखी अज्ञानी महिला ने अनाप-शनाप बकवास की, जिसे उन लोगों ने खबर बना दिया, जिन्हें लोकतंत्र के चौथे खंभे का सजग प्रहरी माना जाता है। सच्चे पत्रकार तो पहले पता लगाते हैं कि सच क्या है। ऐसे विवेकहीन, जल्दबाजी करने वाले पत्रकारों के कारण पत्रकारिता भी बदनाम हो रही है। कनौजिया की गिरफ्तारी के बाद न्यूज चैनलों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असली और नकली पत्रकारों को लेकर युद्ध छिड गया। विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों के संपादक, बुद्धिजीवी आदि-आदि  आपस में ही उलझने लगे। सभी विद्वानों ने काफी माथापच्ची की। ऐसी माथापच्ची तब भी हुई थी जब चुनाव के दौरान प्रियंका नाम की युवती ने पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक मीम सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था, जिसे उनकी फोटो के साथ छेडछाड कर बनाया गया था। प्रियंका को प.बंगाल की पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल में डालने की अभूतपूर्व फुर्ती दिखायी थी। मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया था। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रियंका को जेल से रिहा कर दिया गया था। इस गिरफ्तारी ने सत्ता और राजनीति का असली चेहरा भी दिखाया था। वोटों की खातिर अपने विरोधियों का अपमान करने का कोई भी मौका नहीं छोडने वाली ममता, जो शेरनी कहलाती हैं वह एक मीम यानी कार्टून से बौखला उठीं और अपनी पुलिस को एक महिला को ही गिरफ्तार करने का आदेश दे डाला। जैसे वह महिला कोई खतरनाक आतंकवादी हो। प्रदेश को उससे बहुत बडा खतरा हो।
उत्तरप्रदेश के शामली में पत्रकार की निर्वस्त्र कर की पिटायी और मुंह में पेशाब करने की शर्मनाक घटना के बाद भी पत्रकारों की बिरादरी में कहीं कोई हंगामा नहीं हुआ। जनता में भी चुप्पी बनी रही। सभी ने यह माना कि ऐसा तो होता ही रहता है। इस बार भी हुआ तो हुआ। देश का हर सजग नागरिक यह भी जान चुका है कि निर्भीक और ईमानदार पत्रकार ऐसी तमाम गुंडागर्दियों के शिकार होने को अभिशप्त हैं। यह भी सच्चाई है कि जो पत्रकार सत्ता और व्यवस्था को साध कर चलते हैं उन पर कभी भी इस तरह कोई खतरा नहीं मंडराता। बडे अखबारों और नामी न्यूज चैनलों के पत्रकार ऐसी पुलिसिया बदमाशी के कभी शिकार होते नहीं देखे जाते। बिजली तो छोटे पत्रकारों पर गिरायी जाती है और उनका साथ देने के लिए उनकी बिरादरी के लोग भी सामने आने में झिझकते हैं। दरअसल पत्रकारों में विभाजन हो चुका है। एक तरफ तथाकथित बडे पत्रकार, संपादक हैं, जिनके अपने गिरोह बने हुए हैं। इनका खबरों से नाता कम रहता है। यह तो हर वक्त सत्ता से करीबियां बनाने में लगे रहते हैं। राजनेताओं की चाटूकारिता और दलाली करते-करते इन्होंने वो सभी सुख-सुविधाएं हासिल कर ली हैं, जो मेहनतकश करोडपतियों को भी मुश्किल से हासिल होती हैं। देश के हर नगर, महानगर में ऐसे पत्रकारों, संपादकों की दुकानदारी चल रही है। यह लोग अभ्यस्त घोटालेबाजों, भ्रष्टाचारी मंत्रियों, सांसदों के स्वागत के लिए हवाई अड्डों पर सबसे पहले पहुंचते हैं। बडी आन-बान और शान के साथ उनके बंगलों पर गुलदस्ते लेकर जाते हैं, जिनमें खास तौर पर एक पर्ची लगी होती है, जिस पर लिखा होता है, "आप घबरायें नहीं, हम आपके साथ हैं।" खाकी भी इन बिकाऊ पत्रकारों को सलाम करती है। अधिकांश राजनेता और शासक कतई नहीं चाहते कि पत्रकार सच के साथी बन उनकी आलोचना करें। जो पत्रकार उनके अनुकूल नहीं चलते, समझौते नहीं करते उन्हें शासन और विकास विरोधी बताकर तरह-तरह से अपमानित और प्रताडित करने का चलन अब किसी से छिपा नहीं...।

Thursday, June 13, 2019

क्या कहती हैं ये खबरें?

नेताओं को हिन्दुस्तान की अधिकांश जनता बहुत मान-सम्मान देती है। ब‹डी उम्मीदों और गर्व के साथ उन्हें विधायक और सांसद बनाती है, लेकिन जब यही जनप्रतिनिधि इंसानियत को अपमानित और शर्मिंदा करने वाली हरकतें करते हैं तो जनता की निगाह में उनकी कीमत दो कौडी की भी नहीं रह जाती। ऐसा तो हो नहीं सकता कि वे इस सच से वाकिफ न हों। कुछ नेता आखिर बार-बार ऐसी हरकतें क्यों करते हैं, जिनकी वजह से उन्हें लोगों की निगाहों से गिरना पडता है। देशवासी तो यह मानकर चलते हैं कि उनके नेता, विधायक, मंत्री चरित्रवान हैं। उनका आचरण पारदर्शी है, लेकिन सच तो यह है कि देश के कुछ नेता तो हद दर्जे के गिरे हुए इन्सान हैं। मतदाता उन्हें अपना कीमती वोट देकर शर्मिंदा हैं। वे अक्सर ऐसी-ऐसी घटिया हरकतें करते रहते हैं, जिनसे साधू नहीं, शैतान, राम नहीं, रावण बनने की प्रेरणा मिलती है। चरित्रहीनता तो गुंडे बदमाशों की निशानी है। उनके इसी दुर्गुण के चलते लोग उन्हें आसानी से पहचान लेते है।
गुजरात के एक विधायक ने एक महिला को लात-घूसों से पीटने की दरिंदगी दिखाकर देशवासियों के खून को खौला दिया। अहमदाबाद शहर में नरोदा से भाजपा विधायक बलराम थवानी में यह हैवानियत तब जागी जब वह महिला उनके पास पानी की व्यवस्था करने की गुहार लगाने के लिए आई थी। विधायक महोदय महिला को देखते ही गुस्से से आग बबूला हो गये। एक महिला का इतना साहस कि उनके घर में आकर उनके दरबारियों के सामने पानी की मांग करे। जहां पर अच्छे-अच्छे उनके सामने खडे होने की हिम्मत नहीं करते, बस हाथ बांधे ख‹डे रहते हैं वहां पर एक अदनी-सी नारी ऐसे मुंह खोलने का साहस दिखाए जैसे नेतागिरी करने की ठान कर आई हो! यह तो सरासर उनकी विधायकी का अपमान है। खुद को सर्वशक्तिमान समझने वाले अहंकारी विधायक ने कल्पना ही नहीं की थी कि महिला को पीटना उन्हें बहुत भारी पड जाएगा। लोग उनपर थू...थू करने लगेंगे। उन्होंने अपने बचाव में तरह-तरह की बातें कीं और सफाई दी। महिला से हाथ जोड कर माफी भी मांगी, लेकिन उनका अफसोस जताना और गिडगिडाना असरहीन रहा। वो नेता ही क्या जो आसानी से अपने सभी हथियार डाल दे। फिर भारतीय नेता तो जन्मजात कलाकार हैं।
विधायक ने अपनी दाल ना गलती देख शातिर खलनायकों वाला वही पुराना तीर चलाते हुए महिला से राखी बंधवा ली। यानी उसे अपनी बहन मान लिया। भीड का गुस्सा भी शांत हो गया। विधायक के इस नुस्खे का गुंडे-बदमाश बखूबी इस्तेमाल करते हैं। शरीफ दिखने वाले उम्रदराज शख्स भी मौका तलाशते हुए किसी राह चलती युवती को यह सोचकर अपने जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं कि वह चालू किस्म की होगी। अनुमान हर बार तो सही नहीं होता। सजग युवती जब उन कामुकों पर शेरनी की तरह झपटती है और धुनाई के लिए चप्पल अपने हाथ में ले लेती है तो सारी की सारी कामुकता धरी रह जाती है। शालीनता और बुजुर्गियत का नकाब ओढ मिमियाते हुए वे यह कहने लगते हैं कि तुम तो मेरी बेटी जैसी हो। बहन के समान हो। हाथ जोडकर माफी मांगता हूं। मुझसे अनजाने में बहुत बडी भूल हो गई। अब कभी ऐसी गलती नहीं होगी...। यह हमारी ही दुनिया का काला सच है कि जहां पर कुछ बहन-बेटियों की अस्मत उनके सगे भाई और पिता तक लूट लेते हैं। घर की इज्जत का तमाशा न बने इसलिए किसी शोर और विरोध का स्वर नहीं उभरता। जहां असली रिश्ते अपनी मौत मर रहे हों वहां नकली रिश्तों की क्या औकात और कैसा मोल!
साक्षी महाराज का नाम तो मेरे पाठक मित्रों ने अवश्य सुना होगा। उन्नाव से भाजपा के सांसद हैं। भगवाधारी हैं। चुनाव में विजयी होने के बाद यह भगवाधारी बलात्कार के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से जेल में जाकर ऐसे मिले जैसे वर्षों से बिछडे भाई से मिले हों। उनका यह मिलन जब 'तूफानी खबर' बना तो उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि विधायक ने चुनाव में उनकी मदद की थी इसलिए वे उनका शुक्रिया अदा करने गये थे।
देश की राजधानी दिल्ली में पुलिस ने एक ऐसे नाबालिग को धर दबोचा जो अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बनना चाहता था। उसकी चाहत थी कि अपराध जगत में उसका ऐसा डंका बजे कि जहां से वह गुजरे लोग खौफजदा होकर सिर झुका लें। इसके लिए उसने बडा ही अनोखा रास्ता चुना। वह लूटपाट, हत्या, मारपीट को अंजाम देते समय अपने दोस्तों से वीडियो बनवाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर देता था। कुछ ही महीनों में पचासों अपराधों को अंजाम देने वाले इस नाबालिग ने एक महिला से रंगदारी मांगी और नहीं देने पर उसके बेटों के सामने ही उसकी हत्या कर दी। लोगों में दहशत पैदा करने के लिए जहां-तहां पिस्तौल से फायरिंग करने में उसे बडा मज़ा आता था। दिल्ली का डॉन बनने के लिए वह कोई भी अपराध करने से नहीं घबराता था। अपराध कथाओं वाले टीवी सीरियल उसे काफी भाते और लुभाते हैं। विवादास्पद नेताओं के बारे में भी जानने और पढने को उत्सुक रहता है यह अनोखा नृशंस अपराधी...। यह अपराधी यदि पुलिस की पकड में न आता तो उसका कहर पता नहीं कितनी लूटपाट की वारदातें कर गुजरता और जानें ले लेता। पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तो उसके पास से पिस्तौल और कारतूस बरामद किए गए।

Thursday, June 6, 2019

रोष में रघु, होश में रघु

चित्र - १ : नेताजी दूसरी बार लोकसभा चुनाव में विजयी हुए। इस बार जीत का हार पहनने के लिए उन्हें ऐसे-ऐसे पापड बेलने पडे, जिसकी उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी। उन्हें धूल चटाने के लिए सभी विरोधी दल एकजुट हो गये थे। उनका एक ही मकसद था कि नेताजी किसी भी हालत में सांसद न बन पाएं, लेकिन पिछले चुनाव की तरह इस बार भी धनबल ने अंतत: अपना चमत्कार दिखा ही दिया। उनकी हजारों कार्यकर्ताओं की भीड ने भी कम दम नहीं लगाया। नेताजी ने अपने सभी कार्यकर्ताओं को उनकी हैसियत के अनुसार थैलियां थमाने में भरपूर दरियादिली दिखायी। इन कार्यकर्ताओं में विधायक और पार्षद भी शामिल थे, जिन्हें आगामी महानगर पालिका और विधानसभा के चुनाव में टिकट देने का आश्वासन देकर अपने खूंटे से ऐसे बांधा गया था, जैसे बैल और बकरी के सामने चारा डालकर उन्हें इधर-उधर न ताकने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। नेताजी की चुनावी जीत का जश्न चार दिन पहले मनाया जा चुका था। आज उनके केंद्रीय मंत्री बनने पर गुलदस्तों और मिठाई के डिब्बों के साथ कार्यकर्ताओं और तरह-तरह के लोगों का हुजूम कोठी को खचाखच कर चुका था। कुछ अति उत्साही कार्यकर्ता कई एकडों में फैली कोठी की बाउंड्रीवॉल पर चढकर नेताजी के नाम का जयकारा लगा रहे थे। नेताजी के सुरक्षाकर्मी भीड को संयमित होने का पाठ पढा रहे थे, लेकिन जीत का जोश उन्हें बेकाबू और बेचैन किये था। भीड को बार-बार यह भी बताया जा रहा था कि नेता जी आज सुबह ही मंत्री पद की शपथ लेकर दिल्ली से लौटे हैं। उन्हें तैयार होकर आने में कम अज़ कम दो घण्टे लग सकते हैं। मस्तायी भीड के लिए दो घण्टे दो मिनट समान थे। उसे इन्तजार करने और नारे लगाने की जन्मजात आदत थी। जैसे-जैसे समय बीत रहा था, भीड को संभालना मुश्किल होता चला जा रहा था। शहर के जाने-माने-उद्योगपति, व्यापारी, ठेकेदार और अखबारों और न्यूज चैनलों के वो संपादक और मालिक, जिन्होंने नेता जी के आरती गान की सभी पराकाष्ठाओं को लांघ कर पत्रकारिता और चापलूसी के अंतर की निर्ममता से हत्या कर दी थी, गुलदस्तों और हारों के साथ पहुंच चुके थे। कुछ तो पांच सौ और दो हजार के नोटों के हार भी लाये थे। उन्हें नेताजी के निजी कमरे में शोभायमान कर दिया गया था। उनके लिए किशमिश, काजू-बादाम के साथ-साथ तरह-तरह के पेय पदार्थों की भी व्यवस्था थी।
नेताजी की एक झलक पाने को लालायित भीड का साम्राज्य कोठी के सामने की मुख्य सडक पर भी अपना कब्जा जमाने लगा था। इस भीड में पसीने से तरबतर रघु भी खडा था। उसके हाथ में एक बडा गुलदस्ता था। नेताजी के जीतने की खुशी में मनाये गये जश्न की भीड में भी रघु शामिल हुआ था, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी उसका नेताजी के निकट जाना संभव नहीं हो पाया था। रघु रिक्शा वाला उस दिन तो खुशी से फूला नहीं समाया था, जब उसकी जर्जर झोपडी में नेताजी के चरण पडे थे। उनके साथ क्षेत्र के पार्षद तथा कई और पार्टी कार्यकर्ता थे, जिन्हें रघु अच्छी तरह से पहचानता था। पार्षद ने रघु की तारीफ करते हुए नेताजी को बताया था कि यह बंदा बडे काम का है। झोपडपट्टी के सभी लोग इसी के इशारे पर चलते हैं। यह जिसे वोट देने को कहेगा उसी को उनके वोट मिलेंगे। नेताजी के चेहरे पर चमक आ गई थी। उन्होंने झट से रघु से हाथ मिलाया था। पीठ भी थपथपायी थी। उनके साथ आये एक कार्यकर्ता ने चुपके से पांच-पांच सौ के दस नोट उसकी तरफ बढाये थे, जिन्हें रघु ने यह कहते हुए लेने से इन्कार कर दिया था कि मैंने कभी भी अपना वोट नहीं बेचा। वोट बेचने वालों से मैं नफरत करता हूं। नेताजी उसका चेहरा देखते रह गये थे। उन्होंने जाते-जाते कहा था कि तुम्हारे जैसे ईमानदार वोटरों की बदौलत ही मैंने पिछला चुनाव जीता था। इस बार भी कोई माई का लाल मुझे हरा नहीं सकता। पिछली बार की तरह इस बार भी मेरा मंत्री बनना तय है। चुनाव का परिणाम आने के पश्चात तुम मुझसे जरूर मिलना। तुम सभी झोपडपट्टी के निवासियों के लिए शीघ्र ही पक्के घरों की व्यवस्था करवा दूंगा।
गर्मी की तपन बढती जा रही थी। रघु का दम घुटने लगा था। उसके कपडे पसीने से गीले होकर उसके बदन से चिपक गये थे। एकाएक रघु पर उसी की झोपडपट्टी में रहने वाले विद्रोही नामक पत्रकार की नजर पडी तो उसने रघु पर सवाल दागा कि क्या तुम भी नेताजी को उनका वादा याद दिलाने आये हो? रघु हैरान होकर पत्रकार को देखता रह गया। फिर पत्रकार ने बताया कि वोट हथियाने के लिए मतदाताओं से तरह-तरह के वादे करना और मनमोहक प्रलोभनों के जाल फेंकना तो नेताजी का पुराना पेशा है। वोटरों को बेवकूफ बनाने की इसी कला की बदौलत ही तो आज वे सत्ता की बुलंदियों पर हैं। इस भीड में तुम जैसे हजारों लोग शामिल हैं जो नेताजी से मिलने की आस में पहुंचे हैं। चुनाव जीतने के बाद नेताजी को अपने खास लोगों के काम करवाने और उन्हें मालामाल करने से कभी फुर्सत नहीं मिलती। ऐसे में वे तुम जैसे आम लोगों से क्या खाक मिलेंगे! रघु पत्रकार का चेहरा देख रहा था और पत्रकार खिलखिला रहा था। रघु ने विद्रोही की निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के कई किस्से सुने थे। यह भी सुना था कि शहर का यह पत्रकार दूसरे पत्रकारों की तरह नेताओं और मंत्रियों के दरबार में माथा टेकने की बजाय उनकी पोल खोलने के अभियान में लगा रहता है। उनकी बातचीत चल ही रही थी कि वहां पर पुलिस वाले भीड को खदेडने लगे। नेताजी अपने खास लोगों से मेल-मुलाकात करने के बाद सुरक्षाकर्मियों के घेरे में कोठी से निकले और अपनी चमचमाती कार में बैठकर फुर्र हो गये। रघु को बडा गुस्सा आया। उसने गुलदस्ते को तोडा-मरोडा और वहीं सडक पर फेंक दिया।  यह देश के नब्बे प्रतिशत से अधिक नगरों, महानगरों और वहां के सांसदों की कडवी हकीकत है इसलिए किसी एक शहर और नेता का नाम लिखना बेमानी है।
चित्र - २ :  कहते हैं हिन्दुस्तान चमत्कारों का देश है। यकीनन यह चमत्कार ही है कि ओडिसा के बालासोर लोकसभा क्षेत्र से एक एकदम आम शख्स ने लगभग एक भी पैसा खर्च किए बिना चुनाव लडा और करोडपति को मात दे दी। इस आम... महान शख्स का नाम है प्रतापचंद्र सारंगी। पैदल या साइकिल पर चलने वाले ६४ वर्षीय सारंगी संन्यासियों की तरह जीवन जीते हैं। ओडिशा के मोदी कहलाते हैं। पिछले पच्चीस वर्षों से भुवनेश्वर से एक छोटा-सा साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित करते चले आ रहे रघु राय तो सारंगी के दिवाने हैं। उनकी निगाहें हमेशा सारंगी का पीछा करती रहती हैं। अच्छा करने पर तारीफ तो गलत करने पर उनकी खिंचाई करने से कभी नहीं चूकते। सारंगी की बेमिसाल सादगी को प्रणाम करते हुए वे सवाल करते हैं कि आप ही बतायें कि अपने देश में कितने ऐसे नेता, विधायक, सांसद, मंत्री हैं, जो आपको शहर और गांवों की सडकों पर पैदल चलते नजर आते हों। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर आम आदमी की तरह बस और रेल का इंतजार करते हों और किसी झोपडीनुमा होटल में बडे मजे से खाना खाने में कतई न सकुचाते हों। रघु का मानना है कि यदि देश के सभी नेता सारंगी जैसे हों तो इस देश की तस्वीर को बदलने में ज़रा भी समय नहीं लगेगा। सारंगी दो बार विधायक भी रह चुके हैं, लेकिन आज भी मिट्टी और बांस के घर में रहते हैं, जिसके दरवाजे चौबीस घण्टे जनता जनार्दन के लिए खुले रहते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में कई स्कूल और अस्पताल बनवा चुके सारंगी के लिए राजनीति सिर्फ और सिर्फ जनसेवा का माध्यम है। लोकसभा चुनाव जीतकर जब वे संसद भवन पहुंचे तो हर कोई उनसे मिलने को उत्सुक था। यह उनके सच्चे जननेता होने का पुरस्कार ही है कि पहली बार सांसद बनने के बावजूद उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह दी गयी। सबसे ज्यादा तालियां भी उनके द्वारा मंत्रीपद की शपथ लेने पर बजीं।