Friday, August 16, 2019

आज़ादी के ७२ साल बाद भी!

निर्भया कांड। जब भी देश में कहीं भी कोई बर्बर बलात्कार होता है तो पत्रकारों और सजग भारतीयों को २०१२ में अंजाम दिये गए निर्भया कांड की याद हो आती है। देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में हुई इस शर्मनाक दिल दहला देने वाली वारदात ने पूरे देश को दहला कर रख दिया था। छह बलात्कारियों में एक नाबालिग था। जो जेल की सजा काटकर बाहर आ चुका है। वहीं मुख्य आरोपी ने खुद जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। निर्भया कांड के आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा फांसी के फैसले पर मुहर लगाने के बाद भी बाकी के चारों आरोपियों को अभी तक फांसी नहीं दी जा सकी है। निर्भया की तरह देश की हजारों बेटियों को अभी तक इंसाफ नहीं मिल पाया है। जब अदालत के फैसले के बाद भी बलात्कारियों को फांसी देने में इतनी ढिलाई है तो बलात्कारियों के हौसले कैसे पस्त हो सकते हैं? हर बलात्कार के बाद देशभर में शोर मचता है। बलात्कारी को बिना देर लगाये फांसी पर लटकाने की मांग उठती है। राजनेताओं और सत्ताधीशों के द्वारा भी बलात्कारियों को शीघ्र से शीघ्र मौत के फंदे में झुलाने का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन सच हमारे सामने है। यही वजह है कि हालात बद से बदतर होते चले आ रहे हैं। छोटी-छोटी बच्चियां तक सुरक्षित नहीं हैं। निर्भया कांड के एक साल बाद ही दिल्ली के गांधीनगर इलाके में करीब ४ साल की एक मासूम के साथ उसी के घर के पास गैंगरेप हुआ था। घर से गायब कर दी गई इस बच्ची के माता-पिता उसकी तलाश में कहां-कहां नहीं भटके थे। बच्ची ४० घण्टे के बाद एक खंडहरनुमा घर में मरणासन्न हालत में पायी गई थी। २०१३ में यह दरिंदगी हुई थी। सघन इलाज के बाद ठीक हो चुकी बच्ची अब दस साल की हो चुकी है, लेकिन उसे किसी ने भी कभी खुलकर मुस्कराते नहीं देखा। पूरे घर में अभी भी मातम-सा छाया रहता है। बलात्कार के आरोप में दो बदमाशों को गिरफ्तार किया गया था। बच्ची के माता-पिता कोर्ट के चक्कर काट-काट कर थक गये हैं, लेकिन न्याय अभी तक उनसे कोसों दूर दिखायी देता है। आरोपियों के चेहरे सदैव खिले-खिले नजर आते हैं। खुद के द्वारा की गई हैवानियत का उन्हें कोई गम नहीं है। पश्चाताप तो बहुत दूर की सोच है।
कुछ दिन पूर्व दिल्ली के बदनाम जीबीरोड के एक कोठे से मात्र सात साल की बच्ची को छुडाया गया। असम में रहने वाली बच्ची की मां को नौकरी का लालच देकर राजधानी में लाया गया था। उसे नौकरी तो नहीं मिली, जबरन देह के धंधे में धकेल दिया गया। उसकी बेटी को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने का झांसा देकर कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाने के साथ-साथ पेनकार्ड, आधारकार्ड आदि भी छीन लिए गए। कुछ दिनों तक उसे बडे-बडे होटलों में भेजने के बाद जीबीरोड के कोठे पर बिठा दिया गया। बच्ची भी उसके साथ थी। कुछ हफ्तों के पश्चात वह किसी तरह से कोठे से भागने में सफल रही, लेकिन उसकी अबोध बच्ची नर्क में ही छूट गई। कोठे की मालकिन की कैद से अपनी बेटी को छुडाने के लिए महिला ने थाने में जाकर भी कई बार फरियाद की, लेकिन बिकाऊ खाकी वर्दीधारी उसे गालियां देकर भगाते रहे। इस दौरान बच्ची भी दुष्कर्म का शिकार होती रही और मां खून के आंसू रोती रही। किसी तरह से वह दिल्ली महिला आयोग की शरण में पहुंची तो बच्ची उसे वापस मिल पायी।
देश की ऐतिहासिक नगरी आगरा के थाने में तीन बलात्कार पीडिताएं जब शिकायत दर्ज करवाने पहुंचीं तो पुलिस वालों ने उनपर बडी गंदी नज़र डालते हुए सवाल-दर-सवाल दागे और बडी बेहयायी के साथ पूछा, "कैसे-कैसे और क्या-क्या हुआ तुम लोगों के साथ। उसका लाइव सीन बताओ। तुम्हारे कपडे कितनी बार उतारे गये? एकाध बार तो जुल्म की शिकार हुई महिलाओं ने उनके सवालों के जवाब देने की कोशिश की, लेकिन वे बार-बार बडी निर्लज्जता के साथ अपने अश्लील सवाल दोहराते रहे। पीडिताओं ने बदमाशों के खिलाफ लडाई लडने का इरादा ही स्थगित कर दिया। चुपचाप अपने-अपने घर चल दीं। देश के महान प्रदेश बिहार में कई नाबालिग बलात्कार पीडिताएं बिन ब्याही मां बनने को विवश हैं। छोटी उम्र में ही गर्भ में बच्चे को ढोए थानों के चक्कर काटती रहती हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं होती। बलात्कारी बडी शान के साथ छाती ताने घूमते देखे जाते हैं। यह कैसी विडंबना है कि जिस खाकी वर्दी पर कानून व्यवस्था बनाये रखने, नागरिकों को सुरक्षा देने और अपराधियों पर नकेल कसने की जिम्मेदारी है, वही अक्सर अपराधियों के साथ खडी नजर आती है। जिस तरह से एक सडी हुई मछली के कारण पूरा तालाब खराब हो जाता है वैसे ही पुलिस विभाग में कुछ पथभ्रष्ट नकारा पुलिस कर्मियों ने पूरे पुलिस विभाग को कलंकित कर दिया है। यह दागी खाकी वर्दीधारी कर्तव्यपरायण कर्मियों पर भी कई बार भारी पडते दिखायी देते हैं। खुद को कानून से ऊपर समझने वाले इन वर्दीधारी बदमाशों की चरित्रहीन राजनेताओं और अपराधियों से सांठगांठ रहती है। कुछ भ्रष्ट पुलिस वाले अपराधियों के एजेंट के रूप में काम करते हैं। निर्दोषों को तंग करने तथा रिश्वतखोरी को ही प्राथमिकता देने की इन्हें आदत पड गई है। पुलिस विभाग के उच्च अधिकारी अगर चाहें तो इन्हें दुरुस्त कर सकते हैं। लेकिन...? आजादी के ७२ वर्ष बीतने के बाद भी हिन्दुस्तान में नारी का यहां भी अपमान और वहां भी घोर दुर्दशा! देश के रहनुमाओं से इस सुलगते सवाल का जवाब मांग रही हैं वे तमाम बेटियां जो हैवानों के भय से डरी-सहमी रहने को विवश हैं...।

Thursday, August 8, 2019

जुडाव और अलगाव के बीच

चित्र - १ : तमिलनाडु का मदुरई शहर। हर शहर की तरह मदुरई के भी कई रंग हैं। अथाह अमीरी की चमक देखते बनती है, तो गरीबी भी बेइन्तहा है, जो किसी भी भावुक, संवेदनशील और चिन्तनशील इनसान की नींद उ‹डा देती है। वैसे भी शहरों में अधिकांश लोग अपनी समस्याओं के चक्रव्यूह में कैद रहते हैं। आसपास कौन रह रहा है, कैसे रह रहा है, क्या हो रहा है, इसकी उन्हें खबर नहीं रहती। अपनों से मिलने-मिलाने का वक्त भी कम मिल पाता है। ऐसे में किसे पडी है, जो उन असहाय गरीबों की तरफ देखे, जो नगरों, महानगरों में कीडे-मकोडों की तरह रहते हैं। दो वक्त की रोटी उनके लिए सपना है। अंधी बेरहम भूख कभी भी उन पर मौत बनकर टूट पडती है। उनकी मौत की खबर किसी अखबार में नहीं छपती। शासन और प्रशासन के बही-खाते में उनका नाम ही दर्ज नहीं रहता। इसी मदुरई में एक दिन नारायण कृष्णन घूमने के लिए निकले। उनकी नज़र कुछ विक्षिप्त लोगों पर पडी जो कूडेदान में फेंका गया खाना निकालकर खा रहे थे। युवा नारायण यह दृश्य देखकर दंग रह गये। उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि इनसानों को जानवरों की तरह कचरे में फेंका गया भोजन खाना पडता होगा। खडे-खडे काफी देर तक सोचते रहे...। यह कैसी दुनिया है, जहां पर इनसानों को भोजन तक नसीब नहीं है? उन्होंने वहीं खडे-खडे निर्णय कर डाला कि वे बेसहारा लोगों की भूख मिटाने के लिए अपनी पूरी जिन्दगी और ताकत लगा देंगे। घर में माता-पिता नारायण का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे। नारायण को उदास और परेशान देखकर पिता से रहा नहीं गया। पूछने पर नारायण ने अपने इरादे के बारे में उन्हें अवगत करा दिया। पिता के लिए यह निर्णय किसी बम फटने जैसा था। जिस बेटे को स्विटजरलैंड के पांच सितारा होटल में अच्छी-खासी नौकरी मिली है और दो दिन बाद जाने की टिकट भी कट चुकी है, वह गरीब और बेसहारा लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए लाखों की तनख्वाह वाली नौकरी को लात मारने की ठान चुका है! बेटे के इस फैसले से पिता तो गुस्से से आग-बबूला हो गये। मां अगर नहीं रोकती तो वे दो-चार थप्पड भी जड देते। पिता का कहना था कि शहर में हजारों गरीब ऐसे हैं जो हर रात भूखे सोने को विवश हैं। तुम अकेले किस-किस का सहारा बनोगे? नारायण ने पिता के समक्ष नतमस्तक होते हुए कहा, "मैं विदेश जाकर भी चैन से जी नहीं पाऊंगा। मेरा आपसे निवेदन है कि मुझे मेरे मन की कर लेने दीजिए।" पिता फिर भी नहीं माने। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे उसकी कोई मदद नहीं करेंगे। जिस समस्या का समाधान शासन और प्रशासन नहीं कर पाता उसे यह बेवकूफ करने चला है। दो-चार दिन में ही भूखों की लम्बी कतारें देखकर होश ठिकाने आ जाएंगे।
नारायण कृष्णन को खुद पर यकीन था। उनके पास तब डेढ-दो लाख रुपये थे। नारायण ने शहर के भोजनालय से खाना खरीद कर विक्षिप्तों और ऐसे अपंगों को खिलाने की शुरुआत कर दी, जो काम करने में असमर्थ थे। यह लगभग दस वर्ष पूर्व की बात है। कृष्णन के इस अभूतपूर्व सेवा कार्य की शहर में चर्चाएं होने लगीं। जहां-तहां सराहना होने लगी। लोग जानने-पहचानने लगे, लेकिन इधर उनकी आर्थिक स्थिति डगमगाने लगी। वर्षों से यह कहा और माना जाता रहा है कि जहां चाह होती है, वहां राह भी निकल ही आती है। पिता ने जब बेटे की तारीफें सुनीं तो वे नाराजगी को भूलकर आर्थिक सहायता करने लगे। उनकी देखादेखी उनके मित्रों ने भी दिल खोलकर धन देना प्रारंभ कर दिया। फिर तो देखते ही देखते नारायण के साथ कई लोग जुडते चले गये। अब खाना भोजनालय से खरीदने की बजाय घर में ही बनाने का निर्णय लिया गया। माता-पिता ने पुराने मकान की जगह इस्तेमाल करने के लिए दे दी।
कृष्णन अपने साथियों के साथ रोज सुबह चार बजे उठकर खाना बनाते हैं, जिसे वैन के जरिए बीमारों, अपंगों, बेघरों, बेसहारा और विक्षिप्तों को बडे आदर और स्नेह से खिलाया जाता है। बेसहारा लोगों की भूख मिटाने के इस सद्कार्य ने कृष्णन को सच्चे समाजसेवक की ख्याति दिला दी है। कृष्णन को कई सामाजिक संस्थाओं के द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है। कृष्णन ने अपने साथियों के साथ एकजुट होकर 'अक्षय ट्रस्ट' नाम की संस्था बनाई है। जिसे खुले हाथों सहयोग देने वालों की अच्छी खासी तादाद है। मदुरई के करीब दो सौ किलोमीटर के दायरे में जरूरतमंदों को नियमित खाना उपलब्ध कराने वाले कृष्णन कभी भी इस सोच के गुलाम नहीं हुए कि सामने जो भूखा इनसान है, वह हिन्दू, मुस्लिम या सिख, ईसाई है। वे कहते हैं कि भूख का कोई धर्म नहीं होता और इन्सानियत से बडा तो कोई धर्म हो ही नहीं सकता।
चित्र - २ : मध्यप्रदेश के जबलपुर निवासी अमित ने जोमैटो से खाना मंगवाया। जब उसने देखा कि खाना लाने वाला डिलिवरी ब्वॉय दूसरे धर्म का है तो उसने खाना लेने से मना कर दिया। उसने कंपनी से दूसरे लडके को खाना लेकर भेजने को कहा। कंपनी ने दूसरा डिलिवरी ब्वॉय भेजने से सरासर इनकार कर दिया और उसे फटकार भी लगायी। खुरापाती दिमागधारी अमित ने किसी जंग में विजयी योद्धा की तरह ट्वीट किया, "अभी-अभी मैंने एक आर्डर रद्द किया है। उन्होंने मेरा खाना गैर-हिन्दू के हाथ भेजा था। वे इसे न तो बदल सकते हैं और न ही पैसा वापस कर सकते हैं। मैंने कहा कि आप मुझे खाना लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। मुझे पैसा वापस नहीं चाहिए, आर्डर रद्द करो।" अगर गौर से सोचें तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह शख्स धन के अभिमान के नशे में चूर है, जो मेहनतकश इनसान में हिन्दू, मुसलमान देखता है। ऐसे लोग यहां भी हैं, वहां भी हैं, इधर भी हैं, उधर भी हैं, जो अलगाव और कट्टरवाद के विष बीज बो कर आनंदित होते हैं। ऐसे बददिमाग हुडदंगियों की शिनाख्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इनकी हरकतें ही इन्हें बेपर्दा कर देती हैं। खाना लाने वाले लडके के धर्म को निशाना बनाकर उसे अपमानित करने वाले इस घटिया इनसान को सजग भारतीयों ने जिस तरह से जीभरकर लताडा और दुत्कारा उससे उसे और उस जैसे सभी अक्ल के अंधो को सतर्क हो जाना चाहिए। चंद लोग भले ही वाहवाही करते नजर आते हों, लेकिन अधिकांश भारतवासी ऐसे घटिया बर्ताव और अमानवीय सोच के पक्षधर कतई नहीं हैं...।

Thursday, August 1, 2019

सच तो सच है

हम लोग बहुत कुछ छुपाकर रखने की कला में सिद्धहस्त हैं। हम किसी भी हालत में यह नहीं चाहते कि हमारी कोई ऐसी कमजोरी जगजाहिर हो, जिससे बदनामी हो। अपने यहां के कई घरों-परिवारों में बहुत कुछ आपत्तिजनक घटता रहता है, जिसे अपराध की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। फिर भी मुंह बंद रखा जाता है। अनदेखी का नाटक किया जाता है। अपने आसपास रहने वाले अपराधियों और अपराधों को भी नजरअंदाज करने के अभ्यस्त हो चुके है हम। लोकायुक्त की टीम ने बीते हफ्ते मध्यप्रदेश के सीधी जिले के सिंचाई विभाग के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर के भोपाल और सीधी स्थित ठिकानों पर छापे मारे। करोडों की जमीनें, फार्म हाऊस, फ्लैट, कारें और लाखों के शेयर मिले। इसके साथ ही उसके यहां इतना अधिक सोना-चांदी था कि जिसे तोलने के लिए टीम को तराजू मंगाना पडा। ज्वैलरी में कई तरह के सोने के हार और अंगुठियां थीं। इसके साथ सोने-चांदी की मूर्तियों और सोने के सिक्कों के अंबार के साथ सोने के गिलास, चांदी के डिनर सेट और दर्जनों चमकती चांदी की कटोरियां भी मिलीं। वर्षों से भ्रष्टाचार में लिप्त इंजीनियर साहब इन्हीं सोने-चांदी के बर्तनों में ठाठ से खाना खाते थे। अपने खास मेहमानों को भी वे इन्हीं सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खिलाते थे। उनके घर में अक्सर सजने वाली महफिलों में मंत्री, विभिन्न विभागों के उच्च अधिकारी, उद्योगपति, पत्रकार, संपादक शामिल होते थे, जो सोने के गिलासों में विदेशी स्कॉच भर-भर के पीते थे और भ्रष्ट इंजीनियर की मेहमाननवाजी का भरपूर मज़ा लूटा करते थे।
राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर में बीते दिनों एक ६५ वर्षीय पिता अपने कुकर्मी बेटे की शिकायत करने के लिए कलेक्ट्रेट जा पहुंचा। इस उम्रदराज सजग पिता ने बाकायदा लिखित अर्जी दी, जिसमें बेटे की शर्मनाक कारस्तानियों का स्पष्ट उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि उनका तीस वर्षीय नालायक बेटा तमाम गंदी आदतों के दलदल में धंस चुका है। महिलाओं का सम्मान करने में उसे तौहीन महसूस होती है। घोर आपराधिक मानसिकता वाले अपने इस बेटे के कारण मैं बेहद शर्मसार हूं। राह चलती लडकियों के साथ अश्लील हरकतें करने वाले इस बदमाश से उसकी बहनें भी खौफ खाने लगी हैं। उन्हें अपनी अस्मत लुटने का भय सताने लगा है। चौबीस घण्टे डरी-सहमी रहती हैं। गली-मुहल्ले की लडकियों का तो इसने वर्षों से जीना-दुश्वार कर रखा है। जिस तरह से उसकी करतूतें बेलगाम होती चली जा रही हैं, उससे मुझे यकीन है कि वह कभी भी किसी भयावह काण्ड को अंजाम दे सकता है। वैसे भी देश में महिलाओं पर बलात्कार और तरह-तरह के अत्याचार बढते चले जा रहे हैं। इसलिए मेरी आपसे हाथ जोडकर विनती है कि उसे फौरन गिरफ्तार करें। जब तक वह सुधर न जाए तब तक जेल की सलाखों में ही रहने दें। ऐसे खतरनाक लोगों के स्वतंत्र घूमने-फिरने से समाज और परिवार में जो भय बना रहता है, उसे इस अर्जी में बयां कर पाना बेहद मुश्किल है। ऐसी पथभ्रष्ट औलादें असंख्य हंसते-खेलते परिवार बर्बाद कर चुकी हैं। जन्मदाताओं के नाम पर बट्टा लगाने वाली संतानें किसी के घर में भी पैदा हो सकती हैं। पर कितने लोग हैं जो अपनी शैतान औलाद के खिलाफ पाती लिखकर प्रशासन तक पहुंचाने की हिम्मत रखते हैं?
महात्मा गांधी का एक बेटा बेहद नालायक था। उसके शराबी-कबाबी होने के कारण बापू को बेहद पीडा होती थी। इसी बेटे ने जब इस्लाम धर्म अपना लिया तो बापू और बा के दिन का चैन और रातों की नींद पूरी तरह से लुट गई थी। पंजाब केसरी के यशस्वी संपादक श्री अश्विनी कुमार लिखते हैं कि 'कलकत्ते के कुछ मुसलमान मौलाना बापू के मुसलमान बने बेटे को उठाकर ले गए।  उन दिनों बापू और बा दिल्ली की हरिजन कालोनी वाल्मीकि भवन, जिसे आज बापू निवास कहा जाता है, में एक झोंपडी में रहा करते थे। बापू और बा के समक्ष यह एक विकट समस्या थी कि आखिर करें तो क्या करें। उन दिनों दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा यानी आर्य समाज के अध्यक्ष श्री रामगोपाल शालवाले हुआ करते थे। उधर लाला जगत नारायण पूरे पंजाब के आर्य समाज के अध्यक्ष थे। बापू को लगा कि ये आर्य समाजी ही उनके बेटे को वापिस हिंदू धर्म में ला सकते हैं। चुनांचे आनन-फानन में गांधी जी ने लालाजी और रामगोपाल शालवाले को बुलावा भेजा। दोनों ही नेता कांग्रेसी थे। लालाजी तो पंजाब प्रदेश कांग्रेस पार्टी के बेहद शक्तिशाली सीनियर जनरल सेक्रेटरी थे। जब ये दोनों महात्मा की कुटिया में पहुंचे तो गांधीजी और बा ने उनके समक्ष फूट-फूट कर रोना शुरू कर दिया। उन्हें अपने बेटे की पूरी दास्तां सुनाई और प्रार्थना करने लगे कि हमारे बेटे को किसी भी तरह से मुसलमानों के चंगुल से छुडाओ और हिंदू धर्म में वापिस लाओ। लालाजी और शालवाले अपने करीब ५० समर्थकों के साथ कलकत्ता रवाना हो गए। वहां उन्होंने उस जगह का पता लगाया जहां महात्मा गांधी के बेटे को कैद कर रखा गया था। बस लालाजी और रामगोपाल शालवाले के नेतृत्व में आर्य सेना मुसलमानों पर पिल पडी, काफी मारधाड हुई, लेकिन आर्यों ने महात्मा के बेटे को सकुशल बरामद कर लिया और उसे अपने साथ कलकत्ता से दिल्ली ले आए। दिल्ली के ऐतिहासिक मंदिर मार्ग के आर्य समाज मंदिर में पहले उसकी मुस्लिम दाढी काटी गई, फिर उसे गंगा जल से नहलाया गया। यज्ञ करके उसे यज्ञोपवीत पहनाया गया। उसके माथे पर चन्दन का तिलक लगाया गया और उसकी मुस्लिम सलवार-कमीज उतार कर खादी का सफेद कुर्ता-पायजामा पहनाया गया। फिर उससे १० बार गायत्री मंत्र का उच्चारण करवाया गया। बाद में लालाजी और शालवाले उसको लेकर गांधी जी की हरिजन कालोनी वाली कुटिया में आए। पूज्य लालाजी बताते थे, फिर उन्होंने गुमसुम पडे गांधीजी और बा के समक्ष उनके बेटे को झटके से फेंका और बोले गांधी जी आज के बाद हिन्दू-मुसलमान भाईचारे की बातें छोड दो, हम आपके बेटे को इस्लामी फंडा मैंटल्स के चंगुल से वापिस ले आए हैं। लालाजी यहां भी नहीं रुके। महात्मा गांधी को बोले ये जो आप हिन्दू और मुस्लिम मेरे दाहिने और बाएं हाथ हैं यह बातें करनी छोड दें। अगर हिन्दू और मुस्लिम आपके दो बच्चे हैं तो फिर अगर आपके बेटे ने इस्लाम धर्म अपना लिया था तो आप इतना रो क्यों रहे हो? गौरतलब है कि अश्विनी कुमार के दादाश्री लाला जगत नारायण ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस आदि के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था।

Thursday, July 25, 2019

ये कैसा अंधेरा है?

कहानी, उपन्यास, कविताएं, गजलें, निबंध, आत्मकथाएं, यात्रा संस्मरण, लघुकथाएं आदि-आदि। कितना कुछ लिखा जा रहा है। किताबें भी धडाधड छप रही हैं। उनके लोकार्पण के कार्यक्रम की खबरें अखबारों में छपती रहती हैं। हर रचनाकार यही चाहता है कि किसी न किसी तरह से उसकी रचनाओं का संग्रह प्रकाशित हो। देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में नये-पुराने लेखकों की कविताएं, गजलें, कहानियां और व्यंग्य प्रकाशित होते रहते हैं। प्रश्न यह है कि क्या सभी लेखकों का लिखा पठनीय होता है? कहीं ऐसा तो नहीं शौकिया लिखने वालों की भीड बढती चली जा रही है? इनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में भले ही न छपें, लेकिन इनकी किताबों के प्रकाशन में कोई बाधा नहीं आती। ऐसा इसलिए भी अति संभव हो पाता है क्योंकि ऐसे अधिकांश तथाकथित लेखकों की जेबें भरी रहती हैं। इनकी लिखी कहानी, कविताओं गजलों और व्यंग्य रचनाओं में भले ही कोई दम न हो, पत्र-पत्रिकाओं के संपादक बार-बार लौटा देते हों, लेकिन फिर भी यह धनवान लोग अपना रुतबा दिखाने के लिए पुस्तक छपवा कर साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। इन धनवानों में व्यापारी, उद्योगपति, चार्टर्ड अकाउंटेंट, सरकारी अधिकारी और भी पता नहीं कैसे-कैसे लोग शामिल हैं। जेल में बंद कुछ माफिया सरगनाओं की भी आत्मकथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं और प्रकाशित होने की तैयारी में हैं।
अधिकांश प्रतिभावान लेखकों को अपने प्रभावी लेखन के कारण पत्र-पत्रिकाओं में तो जगह मिल जाती है, लेकिन उन्हें अपनी रचनाओं के संग्रह की पुस्तक छपवाने के लिए बेइन्तहा पापड बेलने पडते हैं। अनेक बदनसीबों को यह सौभाग्य उन्हें इस दुनिया से विदा होने के बाद मिल पाता है। अपने देश में ज्ञानवान लेखकों को उनके जीवनकाल में कितना सम्मान दिया जाता है यह तो वही बता सकते हैं, लेकिन उनके फटे जूते बहुत कुछ बता देते हैं। अपने देश में तो मंचों पर आसीन होकर नौटंकियां करनेवाले चुटकलेबाज प्रतिष्ठा के साथ-साथ धन पाते हैं। मानवीय चेतना को झकझोरने वाले लेखकों को नजरअंदाज करने का दुष्चक्र चलता रहता है। हिंदी की अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाओं के भी बडे बुरे हाल हैं। कुछ साहित्यकार इनका प्रकाशन करते हैं, जो उन लेखकों में बंट जाती हैं, जिनकी रचनाएं इनमें प्रकाशित होती हैं। यानी इन्हें लेखक ही निकालते हैं, लेखक ही पढते हैं और लेखक ही समीक्षा करते हैं।
यही हाल देशभर में थोक के भाव से प्रकाशित होने वाली किताबों का है। यह किताबें भी आम पाठकों तक कम ही पहुंचती हैं। धन के लालची प्रकाशक लेखकों से छपायी की रकम वसूलने के बाद पच्चीस-पचास प्रतियां थमा कर उन्हें अपने उपकार और अहसान तले दबाये रहते हैं। लेखक जान भी नहीं पाते कि उनकी किताबों को सरकारी ग्रंथालयों में सप्लाई कर प्रकाशक मालामाल होते रहते हैं। अधिकांश प्रकाशक नये लेखकों की कृतियों को बेचने में कतई रूचि नहीं लेते। वैसे यह भी सच है कि आज भी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिवंशराय बच्चन, अमृता प्रीतम, यशपाल, निर्मल वर्मा जैसे पुराने रचनाकारों की ही मांग बनी हुई है। नयों में वो दम ही नहीं है जो पाठकों को आकर्षित कर पाये। हां नाम मात्र के कुछ अपवाद जरूर हैं, जिनका नाम है। पाठक उनकी कृतियों को खरीदते भी हैं। ९५ प्रतिशत लेखक तो अपने दोस्तों, लेखकों, रिश्तेदारों को अपनी कृतियों को भेंट स्वरूप देकर मस्त रहते हैं। मुफ्त में मिली किताबें ना सम्मान पाती हैं और ना ही पढी जाती हैं।
सजग पाठकों तक कभी न पहुंचने वाली किताबों को जब कोई सरकारी पुरस्कार मिल जाता है तो सजग पाठक स्तब्ध हो सोचते रह जाते हैं कि जिस किताब का उन्होंने नाम ही नहीं सुना, कहीं देखा भी नहीं उसे नामी-गिरामी पुरस्कार कैसे मिल गया? यह भी सच है कि नये दौर के अधिकांश लेखक सजग पाठकों का सामना ही नहीं कर पाते। उन्हें वास्तविक आईना दिखाने वाली समीक्षा और आलोचना से भय लगता है। इसलिए अपने ही गिरोह के रचनाकारों में खुश और संतुष्ट रहते हैं। अपनी पुस्तक के लोकार्पण पर भी यह आत्ममुग्ध लेखक ऐसे साहित्य के डॉक्टरों को सादर निमंत्रित कर मंच पर शोभायमान करते हैं, जिन्हें सिर्फ तारीफों के पुल बांधने में महारत होती है। ये अजूबे डॉक्टर कभी भूले से भी मरीज को उसकी कमियों और कमजोरियों से अवगत नहीं कराते। यह महारथी, जो समीक्षक कहलाते हैं, किताब को पढे बिना ही उस पर घण्टों बोलने का हौसला रखते हैं। अगर किसी कहानी संग्रह का विमोचन हो तो उसके लेखक को मुंशी प्रेमचंद्र, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश जैसे विद्वान कहानीकारों के समकक्ष और कविता और गजल संग्रह के रचनाकार को वर्तमान का हरिवंशराय बच्चन, दिनकर, दुष्यंत कुमार, बालकवि वैरागी और नीरज घोषित करने में जरा भी नहीं सकुचाते।
कई लेखक हैं, जो यह मान चुके हैं कि लोगों का पुस्तकों के प्रति पहले जैसा लगाव नहीं रहा। किसी के पास किताबें पढने का समय ही नहीं है। क्या वाकई यह सच है? नगरों, महानगरों के पढे-लिखे लोग कल्पना भी नहीं कर सकते कि घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी भी गजब के पुस्तक प्रेमी हो सकते हैं। देश के प्रदेश केरल के इडुक्की जिले में स्थित एक छोटे से गांव में रहते हैं पी.वी. चिन्नातम्बी। वे अपनी आजीविका के लिए चाय की दुकान चलाते हैं। उन्हें बचपन से ही नयी-नयी ज्ञानवर्धक किताबें पढने-पढाने का शौक रहा है। वे प्रतिदिन अपनी चाय की दुकान के सामने ही दरी बिछाकर किताबें फैला देते हैं। यह किताबें रोमांचक, बेस्टसेलर या मनोरंजक चटपटी सामग्री से परिपूर्ण कतई नहीं हैं। बल्कि इनमें तमिल महाकाव्य सिलापट्टीकरम का मलयालय अनुवाद और महात्मा गांधी, वाईकोम मुहम्मद बशीर, एम.टी. वासुदेवन नायर, कमलादास, एम.मुकुंदन, ललिताम्बिका, अनंतराजनम आदि की ऐसी-ऐसी प्रेरक,ज्ञानवर्धक पुस्तकें शामिल हैं, जिन्हें आदिवासी बडे चाव से पढने के लिए ले जाते हैं। नये लेखकों को भी बडे चाव से पढा जाता है। सच्चे साहित्य अनुरागी चिन्नातम्बी के कारण स्वयं भी आदिवासी समुदाय के यह पाठक उन लोगों को पुस्तक पढने के लिए प्रेरित करते हैं, जो अभी तक आधुनिक दुनिया से दूर हैं। भौतिक सुख-सुविधाओं से वंचित हैं। शिक्षा के क्षेत्र में पिछडे हुए हैं। पुस्तक लेने के लिए लोग पहाडों के बीच दुर्गम रास्ते पार कर चिन्नातम्बी की चाय की दुकान पर नियमित आते हैं। वे पुस्तक लेने के लिए आने वाले आदिवासियों के नाम एक रजिस्टर में लिखते हैं। किताब कब ले गए, कब लाए इसका पूरा विवरण दर्ज रहता है। उनके इस पुस्तकालय में सिर्फ एक बार २५ रुपये शुल्क जमा करना होता है। उसके बाद कोई शुल्क नहीं लिया जाता। उलटे पुस्तक प्रेमियों को मुफ्त में चाय जरूर पिलायी जाती है। क्या शहरों के पाठक आदिवासियों से भी गये-बीते हैं, जो विभिन्न किताबों को पढकर अपना ज्ञानवर्धन नहीं करना चाहते?

Thursday, July 18, 2019

क़ातिलों की भीड में...

कुछ खबरों को पढ-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां रुखसार का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाडले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भूख से चीख रहा था। तडप रहा था। उसने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कुछ भी बाकी नहीं बचा था, जिसे बेचकर खाद्य पदार्थों एवं दूध का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोडकर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तडपन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया। उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे मौत की नींद सुला दिया। एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में 'मां' है, जो अपनी औलाद को बडे लाड-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां की हत्यारिन बनने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! इतनी अधिक परेशानी थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर थोडी-बहुत सहायता तो जरूर कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां रुखसार को हिरासत में ले लिया। उसकी मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहा कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...।
सच कहें तो असली अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भूख से तडप-तडप कर मरने की खबर कभी भी पढने-सुनने में नहीं आई। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गह्ना, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पडती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकडों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।
हमारी इस धरती पर कई लोग ऐसे हैं जो अपने दु:ख कभी उजागर नहीं करते। अपनी कमियों और कमजोरियों को अपना मुकद्दर मानकर योद्धा की तरह लडते रहते हैं। खुद का भोगा हुआ यथार्थ उन्हें अच्छी तरह से यह पाठ पढा देता है कि अगर अपने स्वाभिमान को बरकरार रखना है तो चुपचाप संकटों से सतत जूझते रहना होगा? दूसरों को अपना दुखडा सुनाने पर मज़ाक के पात्र बन जाएंगे। उन्नीस वर्षीय अविंशु पटेल, जिसने बीते सप्ताह समुद्र में कूदकर आत्महत्या कर ली, वह अपनी जिन्दगी अपने तौर-तरीकों के साथ जीना चाहता था। उसे बेवजह की दखलअंदाजी और तानेबाजी शूल की तरह चुभती थी। अविंशु समलैंगिक था। शरीर से भले ही लडका था, लेकिन उसका मन था लडकी का। हमारा समाज सिर्फ दो जेंडर्स (लिंग) को ही सम्मान के साथ जीने के लायक मानता है। तीसरे जेंडर को बेइज्जत करने में उसे खुशी मिलती है। अथाह आनंद की अनुभूति होती है। उन्हें हिजडा, नपुंसक कहने के साथ-साथ गंदी-गंदी गालियां देकर खुद की मर्दानगी पर गर्व किया जाता है। भावुक अविंशु ने पढाई करने के बाद चेन्नई की एक कंपनी में नौकरी हासिल कर ली थी, लेकिन फिर भी चौबीस घण्टे उसे यह पीडा सताती रहती थी कि लोग उसका मजाक उडाते हैं। उसे प्रताडित करने के बहाने ढूंढे जाते हैं। उसके माता-पिता ने उसके साथ कभी कोई भेदभाव नहीं किया। अच्छी तरह से पाला-पोसा और पढाया-लिखाया। सरकार ने भी समलैंगिकों को कानूनी मान्यता दे दी है, लेकिन लोग हैं कि बदलने को तैयार नहीं हैं। मैं मरने के बाद भगवान से पूछूंगा कि आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। शरीर तो मुझे लडके का दिया, मगर सोच और भावनाएं लडकियों सी दे दीं?

Thursday, July 11, 2019

चिकित्सा के क्षेत्र में डाकू और साधु

बीस साल के फुरकान को सडक दुर्घटना में बुरी तरह से जख्मी हो जाने के कारण एक प्रायवेट अस्पताल में भर्ती करवाया गया। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित इस अस्पताल के डॉक्टरों ने फुरकान के परिजनों को बताया कि मामला काफी गंभीर है। परिजनों ने डॉक्टरों के कथन के पीछे के आशय को समझते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे किसी भी तरह से उनके युवा बेटे को बचायें। बिल की कतई चिन्ता न करें। डॉक्टरों ने इलाज प्रारंभ कर दिया। पांच-छह दिन बाद सात लाख रुपये का बिल थमा दिया गया। परिजनों ने अपनी जमा पूंजी और यहां-वहां से जुगा‹ड कर अस्पताल का बिल चुका दिया। अब उनकी जेब में एक फूटी कौडी भी नहीं बची थी। उन्हें तो सिर्फ अपने बेटे की चिन्ता थी। डॉक्टरों ने भी उसके पूरी तरह से भला-चंगा होने का आश्वासन दिया था। दो दिन बाद फिर से फुरकान के पिता से और रकम की मांग की गयी। पिता के यह बताने पर कि अब मेरे पास और पैसे नहीं हैं तो कुछ ही घण्टों के बाद डॉक्टरों ने फुरकान को मृत घोषित कर दिया। इतना ही नहीं उसके शव को एंबुलेंस के जरिए घर भी पहुंचा दिया। घर वाले सीने पर पत्थर रखकर अपने लाडले को दफनाने की तैयारी में जुट गये। कब्र भी खोद ली गई। तभी अचानक उन्हें फुरकान के शरीर में हरकत दिखाई दी। वे लोग उसे फौरन राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले गये। वहां डॉक्टरों ने बेटे को जिन्दा बताया और तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट पर रख दिया। डॉक्टरों ने बताया कि मरीज की हालत गंभीर जरूर है, लेकिन वह ब्रेन डेड नहीं है। उसकी नाडी, ब्लडप्रेशर और दिमाग काम कर रहा है। ऐसे अस्पतालों और डॉक्टरों के कारण ही ईमानदार डॉक्टरों को भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा है। चिकित्सा के पावन पेशे में भ्रष्टाचार के घर कर जाने के कारण लोगों ने अब चिकित्सकों को 'भगवान का दर्जा' देना लगभग बंद कर दिया है। धन कमाने का सभी को अधिकार है, लेकिन चिकित्सा के पेशे की कुछ मर्यादाएं हैं, जिनका पालन नहीं करने वाले डॉक्टरों के कारण ही उन्हें माफिया भी कहा जाता है। यह धूर्त लोग मरीजों को डराते हैं और उनकी जेबों पर ब‹डी आसानी से डाका डालते हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त डॉक्टरों की दवा कंपनियों, दवाई दुकानों, पैथलैब, साथी डॉक्टरों और पता नहीं कहां-कहां से कमीशन बंधी होती है। यह लोग मरीजों के परिजनों को ब्रांडेड दवाएं खरीदने को विवश करते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा कमीशन हासिल हो। मेडिकल कॉलेजों में लाखों रुपये के डोनेशन, रिश्वत देकर डॉक्टर बनने वाले भारत के अधिकांश युवा शहरों में बडे-बडे अस्पतालों में नौकरी बजाते हुए धन कमाने को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें ग्रामों के प्रति कोई लगाव नहीं है। इसकी एक मात्र वजह यही है कि वहां पर उनके धनपति बनने के अरमान पूरे नहीं हो सकते। वहां पर उन्हें शहरों वाली सुख-सुविधाएं नहीं मिल पातीं। भौतिक सुविधाओं के घोर लालची डॉक्टरों की भीड में कुछ डॉक्टर ऐसे भी हैं जो अपनी जान को जोखिम में डालकर नक्सलग्रस्त इलाको में वर्षों से जनसेवा कर रहे हैं। वे भी अगर चाहते तो डॉक्टरी की डिग्री हासिल करने के बाद शहरों, महानगरों में लूटमार करते हुए मौज की जिन्दगी जी सकते थे। उन्हें किसी ने रोका नहीं था। उनकी सेवा भावना उन्हें आदिवासी क्षेत्रों में ले गयी। जहां पर वे निशुल्क या नाम मात्र की फीस लेकर मरीज और डॉक्टर के सच्चे रिश्ते को और मजबूती प्रदान कर रहे हैं। डॉ. अभय बंग और उनकी धर्मपत्नी डॉ. रानी बंग दोनों कई वर्षों से गडचिरोली के नितांत पिछडे इलाकों में बच्चों के इलाज को अपने जीवन का एक लक्ष्य बना चुके हैं। बंग दम्पति ने अमेरिका के जॉन होपqकग्स यूनिवर्सिटी से जन स्वास्थ्य में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात ही दृढ निश्चय कर लिया था कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित गडचिरोली को ही अपना कार्यक्षेत्र बना कर अपनी पढाई का सदुपयोग करना है। वर्ष १९८८ में नवजातों की मृत्यु की खबरें अखबारों में अक्सर प‹ढने को मिलती थीं। देश में नवजातों की मृत्यु के मामलों में ग‹डचिरोली प्रथम क्रमांक पर था। इंसानियत की पावन भावना से ओतप्रोत बंग दम्पति ने बच्चों का जीवन बचाने के लिए निशुल्क इलाज करने का ऐसा कीर्तिमान रचा कि नवजात शिशु मृत्यु दर काफी घट गई। उनकी इसी निस्वार्थ जन सेवा के फलस्वरूप भारत सरकार द्वारा उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। डॉ. आशीष सातव व डॉ. कविता सातव भी पिछले बीस वर्ष से गडचिरोली में गरीबों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाते चले आ रहे हैं। महज दस रुपये से तीस रुपये तक फीस लेने वाले यह सेवाभावी डॉक्टर पति-पत्नी असमर्थ मरीजों का पूरी तन्मयता के साथ नि:शुल्क इलाज भी करते है। उनकी सार्थक कोशिशों के परिणाम स्वरूप अब गडचिरोली इलाके में मृत्यु दर में ५८ फीसदी और कुपोषण में २५ फीसदी की कमी आई है। डॉक्टर रविन्द्र कोल्हे और डॉक्टर स्मिता कोल्हे दोनों पिछले ३४ वर्षों से अमरावती के ग्रामीण ऐसे इलाके में गरीबों और असहायों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवा रहे हैं, जहां पहुंचने के लिए मुख्य जिले से २५ किमी बस से और फिर ३० किमी पैदल चलकर जाना पडता है। इस गांव का उन्होंने पूरी तरह कायाकल्प कर दिया है। खेती-किसानी में अभिरुचि रखने वाली इस दम्पति को इसी वर्ष यानी २०१९ में भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से नवाजा है। दोनों का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में भले ही कमायी नाम मात्र की होती है, लेकिन जो सम्मान, संतुष्टि और खुशी मिलती है उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना असंभव है।
राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर के कोटपूतली में वर्षों से बच्चों का इलाज करते चले आ रहे शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रामेश्वर यादव यदि चाहते तो आज करोडों-अरबों रुपये कमाते हुए ऐश कर रहे होते, लेकिन डॉक्टरी उनके लिए कारोबार नहीं, जनसेवा का पवित्र माध्यम है। उनकी पत्नी भी डॉक्टर हैं। डॉ. रामेश्वर यादव बच्चों के इलाज के लिए नाम मात्र की फीस लेने के लिए दूर-दूर तक जाने जाते हैं। उनकी पत्नी भी समाजसेवा के प्रति पूर्णतया समर्पित हैं। एक दिन जब दोनों पति-पत्नी अपने गांव चूरी जा रहे थे तो उन्होंने चार लडकियों को रास्ते में बारिश में भीगते हुए देखा। उन्होंने तुरंत अपनी कार रोककर लडकियों को अपनी कार में बिठाया। ल‹डकियों से बातचीत में उन्हें पता चला कि परिवहन सेवा के अभाव में कई छात्राओं को हर रोज मीलों पैदल आना-जाना पडता है। गुंडे-बदमाश उन पर निगाहें ग‹डाये रहते हैं। मौका पाते ही अश्लील हरकते करने लगते हैं। पति-पत्नी ने स्कूली और कॉलेज की छात्राओं की रोजमर्रा की समस्या को गंभीरता से समझा और समाधान भी कर दिया। उन्होंने अपने जीवनभर की जमा रकम बैंक से निकालकर बस खरीदी। बावन सीटों वाली यह बस प्रतिदिन छात्राओं को स्कूल-कॉलेज ले जाती है, फिर घर छोडती है। डीजल और ड्राइवर का वेतन अपनी जेब से देने वाली इस दम्पति के पास बारह साल पुरानी मारुति ८०० है। नई महंगी कार लेने की कभी उनकी इच्छा भी नहीं हुई। परिवहन सुविधा उपलब्ध होने से वो माता-पिता भी अपनी बेटियों को सहर्ष कॉलेज भेजने लगे हैं, जो निजी वाहनों में होने वाली छेडछाड की घटनाओं की वजह से कतराते और घबराते थे। डॉ. रामेश्वर यादव के इस सेवा कार्य ने गरीब बेटियों का मनोबल बढाया है। पढ-लिखकर वे भी समाज सेवा करना चाहती हैं।

Thursday, July 4, 2019

भक्तों का भयावह चेहरा

कुछ लोग जीते ही इसी मकसद से हैं कि उन्हें प्रचार, पुरस्कार और सहानुभूति मिलती रहे। मीडिया में सुर्खियां पाने की उनकी लालसा कभी खत्म नहीं होती। अपनी इस भूख को मिटाने के लिए वे किसी भी हद को पार करने को तत्पर रहते हैं। उनकी इस उत्कंठा का फैलाव करने के लिए भक्तों और अनुयायियों की सेना ऐसे मोर्चा संभाल लेती है जैसे इन जयकारे लगाने वाले सैनिकों का जन्म ही इसी काम के लिए हुआ हो। इन्हें घोर अंधविश्वासी होने में भी कोई परेशानी नहीं होती। सच तो यह है कि इस दुनिया का सारा कारोबार स्वार्थों की नींव पर टिका है...। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज को पांच साल पहले ही मृत घोषित कर दिया था, लेकिन अभी भी उनका शव डीप फ्रीजर में रखा है। उनके भक्तों को पूरा यकीन है कि आशुतोष महाराज ने समाधि ली है। एक-न-एक दिन महाराज समाधि से वापस आएंगे। पंजाब के जालंधर के नूर महल में स्थित दिव्य ज्योति संस्थान के जिस कमरे में उनका शव रखा है वहां पर चौबीस घण्टे जवानों का पहरा रहता है। हर छह महीने में एक बार डॉक्टर्स उनके शव की जांच करते हैं। मीडिया को भी वहां पर जाने की सख्त मनाही है। २८ जनवरी २०१४ की रात को आशुतोष महाराज को सीने में दर्द हुआ। इसके बाद वे मौन हो गए। उनके अनुयायी एकत्रित हुए। सभी ने यही निष्कर्ष निकाला कि महाराज पहले की तरह इस बार भी समाधि में चले गए हैं। गौरतलब है कि दिव्य ज्योति संस्थान की गतिविधियां अब भी निरंतर वैसे ही चल रही हैं, जैसे महाराज के समाधिस्थ होने से पहले चला करती थीं। आश्रम के प्रबंधकों में पहले जैसा ही उत्साह है। वे श्रद्धालुओं को सतत यही विश्वास दिलाते रहते हैं कि भले ही डॉक्टरों ने महाराज को मृत घोषित कर दिया है, लेकिन महाराज जीवित हैं। उनकी कभी मौत नहीं हो सकती।
आशुतोष महाराज के प्रति अटूट आस्था रखने वाले उनके लाखों भक्तों को उस दिन का बेसब्री से इंतजार है जब उनके आराध्य समाधि से लौटेंगे। बीते वर्ष राजस्थान के भीलवाडा में श्री पंचनाम जूना अखाडे के नागा बाबा श्यामानंद सरस्वती जब भूसमाधि लेने जा रहे थे तब कुछ सजग लोगों ने उनका विरोध किया था। बाबा के कट्टर भक्तों ने तो ९ बाई ९ का गड्ढा  हफ्तों पहले ही खोद कर पूरी तैयारी कर ली थी। वे अपने गुरु के समाधि में जाने के जिस दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे आज वो दिन आ गया था। भक्त अपने प्रिय बाबा पर फूलों की बरसात करते हुए जयकारे लगा रहे थे। तमाशबीन भीड बेकाबू होती जा रही थी। बाबा भीड को देखकर गदगद हो रहे थे। उनके चेलों ने पहले से ही प्रचारित कर दिया था कि नागा बाबा देश में बढते सामूहिक बलात्कारों की वजह से आहत होने के कारण समाधि लेने का निर्णय कर चुके हैं। वे जो ठान लेते हैं उसे अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लेते हैं। इसी बीच किसी तरह से प्रशासन को बाबा के समाधि-कार्यक्रम की खबर लग गई। कई प्रशासनिक अधिकारी वहां पहुंच गये। बाबा तो शांत खडे रहे, लेकिन भक्त और भीड उनका विरोध करने लगी। उन पर पत्थर बरसाये जाने लगे। काफी मशक्कत के बाद अधिकारी बाबा को अपने साथ ले जाने में सफल हो पाये। बाबा की समाधि तो टल गई, लेकिन भक्तों का गुस्सा बना रहा।
अपने देश में फक्कडवन बाबा भी हैं, जो कई बार समाधि ले चुके हैं। गत वर्ष उन्होंने धार के एक गांव में नर्मदा किनारे १२ फीट गहरे गड्ढे में समाधि लगायी थी और ९ दिन बाद बाहर निकले थे। फक्कडवन बाबा के भक्तों का कहना है कि उनके गुरुजी मानवता को जिन्दा रखने, हर मनुष्य का कल्याण करने और पापों का विनाश करने के लिए समाधि लेते रहते हैं। जन-जन तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए बाबाओं का समाधि लेने का सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। कुछ साधु बाबा तो समाधि का ऐलान करने के पश्चात भाग खडे होते हैं। ऐसे बाबा भी हुए हैं, जो अपने जिद्दी भक्तों के उकसावे में समाधि के गड्ढे में उतर तो गए, लेकिन बाद में उनकी लाश ही बाहर निकली। हवा-पानी के बिना घण्टों गड्ढे में बिताने की 'कला' पूरी तरह से किसी की समझ में अभी तक नहीं आयी है।
अभी हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव के दौरान स्वामी वैराग्यानंद उर्फ मिर्ची बाबा ने भोपाल से दिग्विजय सिंह की जीत के लिए पांच क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करते हुए यह दावा किया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी दिग्गी राजा ही लोकसभा चुनाव जीतेंगे। उनका अपार प्रभावी 'मिर्ची यज्ञ' विरोधियों को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर देगा। अगर दिग्गी राजा चुनाव हार गये तो वे किसी को अपना मुंह नहीं दिखायेंगे और फौरन समाधि ले लेंगे। भाजपा की प्रज्ञा ठाकुर की जीत ने बाबा के पैरों तले की जमीन खिसका दी। उनके भक्त बेसब्री से चुनावी नतीजों का इंतजार कर रहे थे। वे ढोल नगाडे बजाते हुए मिर्ची बाबा के ठिकाने पर जा पहुंचे। अपनी भविष्यवाणी के गलत साबित होने के कारण स्वामी जी तो अपना झोला-झंडा समेट कर गायब हो चुके थे, लेकिन भक्त कहां छोडने वाले थे। उन्होंने फोन पर फोन लगाकर उन्हें अपनी प्रतिज्ञा याद दिलायी। जान हर किसी को प्यारी होती है। स्वामी जी ने जोश ही जोश में दिग्गी राजा के चुनाव हारने पर समाधिस्थ होने का ऐलान तो कर दिया था, लेकिन अब उन्हें यहां-वहां मुंह छिपाने के लिए विवश होना पड रहा था। कई दिनों तक समाधि से डरे फिरते मिर्ची बाबा का भक्तों ने जीना ही मुहाल कर डाला। बाबा पर समाधि में जाने का जबर्दस्त दबाव बनाये जाने की खबर जब मैंने प‹ढी और सुनी तो स्तब्ध रह गया। यह कैसे भक्त हैं, जो अपने गुरु को मौत के मुंह में समाते देखना चाहते हैं! कल तक तो यह लोग उनके नाम के जयकारे लगा रहे थे, उन पर फूल बरसा रहे थे और आज उनकी मौत चाहते हैं! यह इन्सान हैं या दरिन्दे जो दारुण और दर्दनाक मंजर देखने को आतुर हैं।