Thursday, December 5, 2019

जंग लडता बचपन

बचपन गुम हो रहा है। बच्चे चिन्तित हैं। उन पर शोषण की तलवारें लटक रही हैं। वे समय से पहले बडे हो रहे हैं। अपने अधिकारों को जानने लगे हैं। अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए खुद सामने आने लगे हैं। इस जद्दोजहद में कहीं अच्छा तो कहीं बुरा हो रहा है। भिवंडी में एक १५ वर्षीय लडकी ने पिता की डांट से बचने के लिए जो रास्ता अपनाया उससे लोग स्तब्ध रह गये। पुलिस की नींद उड गई। नाक में दम हो गया। १५ नवंबर २०१९ की सुबह इस लडकी के हाथ से दूध गिर गया था। उसके पिता अत्यंत गुस्सैल हैं। उसे डर था कि स्कूल से वापस आने पर उसे डांट प‹डेगी। छोटी-मोटी भूल या कोई नुकसान होने पर उसके पिता का पारा चढ जाता है और आसमान सिर पर उठा लेते हैं। मां बीच-बचाव के लिए आती है तो उसकी भी धुनाई हो जाती है। इसीलिए वह स्कूल जाने के बजाय ट्रेन पकडकर आसनगांव चली गई। जब वह निर्धारित समय पर घर नहीं लौटी तो माता-पिता घबरा गये। उन्हें किसी अनहोनी का भय सताने लगा। लडकी एक दिन बाद घर लौट आई, लेकिन उसने जो आपबीती बतायी उसे सुन अभिभावक तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंच गये। लडकी ने अपनी शिकायत में कहा कि वह स्कूल जाने के लिए सवा छह बजे घर से निकली थी। रास्ते में चार युवकों ने उसे जबरन कार में बिठाया और आंख में पट्टी बांधकर किसी पुरानी बंद पडी फैक्टरी जैसी जगह पर ले गए। वहां पर उसके ही जैसी कई और लडकियां थीं। बदमाशों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। बदमाश जब दुष्कर्म कर चले गये तो वह दूसरी लडकियों के साथ वहां से भाग निकली। पुलिस के लिए वाकई यह बहुत गंभीर मामला था, लेकिन उसने जब गहराई से छानबीन की तो ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला, जो लडकी की दुष्कर्म की शिकायत को साबित करता। इस बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया ने लडकी के अपहरण और बलात्कार को लेकर हंगामा बरपा कर दिया। पुलिस पर आरोप लगाये जाने लगे कि वह नाबालिग की यौन उत्पीडन की शिकायत पर लीपापोती कर रही है। इतने गंभीर मामले के सच को सामने लाने की बजाय सुस्ती का दामन थामे है। इसके बाद पुलिस ने महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों के सामने फिर से लडकी से पूछताछ की तो उसने कबूल किया कि न तो उसका अपहरण हुआ था और ना ही बलात्कार। उसने तो बस पिता के गुस्से से बचने और उनका ध्यान भटकाने के लिए यह कहानी गढी और सुना दी...।
पिता के गुस्सैल स्वभाव के कारण घर में होने वाली रोज-रोज की कलह से परेशान एक १६ साल की लडकी सीधे कोर्ट पहुंच गई। भोपाल की इस बेटी ने स्कूल से सीधे जिला विधिक प्राधिकरण में पहुंचकर यहां के जज आशुतोष मिश्रा से शिकायत कर अपना कष्ट और दर्द बयां करते हुए कहा, 'सर मैं अपने घर के झगडे के कारण बेहद डिप्रेशन में जी रही हूं। कई बार मन करता है कि आत्महत्या कर लूं। कृपया आप मेरी मदद करें।' जज के लिए यह बडा अनोखा मामला था। बेटियां ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती हैं। यकीनन यह एक गंभीर मामला था। जज महोदय ने कुछ देर तक विचार करने के पश्चात केस के सकारात्मक निपटारे का निर्णय लिया। सबसे पहले घबराई बच्ची की काउंसलिंग की गई। उसकी चिंता और समस्या को गहराई से जाना गया। उसके पश्चात बेटी को माता-पिता के समक्ष बिठाकर जज महोदय ने कहा कि अब तुम ही बेखौफ होकर अपना फैसला सुनाओ। बेटी ने जो फैसला सुनाया उसे सुनकर कोर्ट में मौजूद माता-पिता के साथ-साथ दूसरों की भी आंखें छलक आई। बेटी ने आदेश में कहा कि माता-पिता आपस में कभी विवाद नहीं करेंगे। पिता को नियमित रूप से स्कूल की फीस भरनी होगी। वे रोज-रोज खाने की थाली नहीं फेकेंगे। उन्हें अपने गुस्से पर पूरी तरह से नियंत्रण करना होगा। राशन समय पर घर पर लाकर देंगे। बच्चों की हर जरूरत को पूरा करते हुए मां के खर्च के लिए कुछ रुपये देंगे। पिता ने भी स्वीकार किया कि वे क्रोधी स्वभाव के हैं। अक्सर तनाव में रहते हैं, जिसकी वजह से परिवार में अशांति बनी रहती है, लेकिन अब वे ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे, जिसकी वजह से उनकी पत्नी और बच्चों को तकलीफ हो। इस जागरूक बेटी ने विभिन्न समाचार पत्रों में जिला विधिक प्राधिकरण के बारे में काफी पढा था, इसलिए वह अपनी शिकायत दर्ज करवाने यहां दौडी चली आई और जज ने अनोखी पहल करते हुए उसके फैसले को आदेश के रूप में जारी कर दिया।
देश के आदिवासी इलाकों के बच्चों में भी परिवर्तन आ रहा है। वे अपने अधिकार के प्रति सचेत हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ में आदिवासी बच्चों ने विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए हाथ-पैर मारने शुरू कर दिये हैं। अपनी और गांव की समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासनिक अधिकारी से लेकर सरपंच तक जाने में नहीं हिचकते। वे इस दाग को धोना चाहते हैं कि आदिवासी अनपढ के अनपढ रहना चाहते हैं। उनमें जागृति नहीं आ सकती। वे अपने बुजुर्गों की तरह दारू में मस्त और निठल्ले नहीं बने रहना चाहते। यह बच्चे उन शैतानों पर आक्रमण करने से भी नहीं घबराते जो उनकी मां-बहनों पर बुरी नज़र रखते हैं। आदिवासी इलाकों में बहन-बेटियां भी सतर्कता की राह पर चलने लगी हैं। वे उन वहशियों को पहचानने में किंचित भी देरी नहीं लगातीं जिनके लिए आदिवासी महिलाएं भोग की वस्तु हैं। यह सच भी सर्वज्ञात है कि आदिवासियों में परिवार चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। वे इस परिपाटी को बदलकर सभी के जीवन को खुशहाल बनाना चाहते हैं। उनमें संवेदनशीलता भी कूट-कूट कर भरी है। धीरे-धीरे कई गांव में स्पष्ट बदलाव नज़र आ रहा है। इन गांव में कुओं के नहीं होने के कारण पानी की बहुत समस्या थी। अब गांव में कुएं बन गये हैं और पानी की समस्या से छुटकारा मिल रहा है। गांव-गांव में मांदल टोली बनायी गई है, जिसमें किशोरों को शामिल किया गया है। वे आपस में बैठकें करते हैं और लाइब्रेरी, पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल जैसी जरूरतों के साथ-साथ बाल विवाह जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं। उनकी कोशिशें रंग ला रही हैं।

Thursday, November 28, 2019

नारी ही होती है दोषी!

'बीवी का सिर काटकर चौराहे पर लटकाने पहुंचा शराबी पति' इस शीर्षक के अंतर्गत छपी खबर ने चौंका और रुला दिया। यह तो इन्सान के खूंखार पशु बनने की पराकाष्ठा है। क्या कसूर था उस पत्नी का, जिसे उसके पति ने ऐसी मौत दी, जिससे लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं। हत्यारे पिता के कारण चार मासूम बच्चों से सदा-सदा के लिए उनकी मां छिन गई। वे दर-दर भटकने को मजबूर हो गये। उन्हें हाथ में भीख का कटोरा थामने को विवश होना पडा? इस दरिंदे हैवान शैतान का नाम है, नरेश बघेल। नरेश की पंद्रह साल पूर्व शांति से शादी हुई थी। तीन बेटियां और एक बेटा है। सबसे बडी बेटी पायल तेरह साल की है। जब शादी हुई थी तब नरेश को शराब पीने का शौक था, लेकिन कालांतर में यह शौक उसकी बरबादी की गंदी आदत बन गया। घर में रोज की कलह का कारण बन गया। उस रात भी नरेश शराब पी रहा था। शांति रसोई घर में खाना बना रही थी। चारों बच्चे डरे-सहमें बैठे थे। नरेश पिछले दो घण्टे से शराब पीते हुए गालीगलौच किए जा रहा था। नरेश बाहर से पीकर तो आता ही था, घर में भी बच्चों के सामने पीने बैठ जाता था। कोई भी रात ऐसी नहीं गुजरती थी, जब उसका हाथ पत्नी पर नहीं उठता था। बच्चे भी नशे में धुत पिता के लात-घूसे और डंडे खाकर दहशत में जीने को विवश थे। वे हंसना भूल चुके थे। उन्हें न ढंग का खाना मिलता था और ना ही कपडे। अनाथों-सी हालत हो गई थी उनकी। पिता अधिकांश कमायी शराब में ही उडा देते थे। बच्चे इतने घबराये रहते थे कि अक्सर पिता के आने से पहले ही सो जाते थे, या सोने का नाटक करते थे। नरेश को शांति का पीने से रोकना-टोकना, समझाना और बडबडाना किसी शूल की तरह चुभता था। उसे लगता था कि शांति उसकी आजादी की शत्रु है। रोज-रोज उसकी पुरुष सत्ता को चुनौती देकर उसे अपमानित करती रहती है। वह उसकी पत्नी है, गुलाम है। उसे रोकने-टोकने का कोई हक नहीं। उसे अपनी कमायी को अपने तरीके से लुटाने का पूरा अधिकार है।
हमेशा की तरह उस रात भी पति और पत्नी में काफी देर तक लडाई-झगडा होता रहा। पतिदेव के हाथों पिटने के बाद पत्नी सोने चली गई। दो दिन पहले नरेश ने अपने एक दोस्त को शराब पीने के लिए घर में आमंत्रित किया था। जब दोनों पीते-पीते लगभग बेसुध हो गए थे तब शांति ने उसके दोस्त को जो नुकीली शाब्दिक फटकार लगायी थी, उससे नरेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया था। तभी उसने बेहद खतरनाक फैसला कर लिया था। बांका (हथियार) भी खरीद कर घर में लाकर रख दिया था। सुबह करीब ५.३० बजे जब शांति गहरी नींद में थी तब नरेश ने उसके गले में ऐसा जोरदार प्रहार किया कि उसका सिर धड से अलग हो गया। शांति को तडपने का मौका ही नहीं मिला। उसके बाद हैवान, शैतान नरेश बीवी के कटे सिर को एक कनस्तर में लेकर हरिपर्वत चौराहे पर जा पहुंचा। वह कटे हुए सिर को ट्राफिक सिग्नल के खंभे में लटकाने की कोशिश में लगा था कि ट्राफिक सिपाही की उस पर नजर पड गई। पहले तो उसे लगा कि कहीं कोई आतंकी बम रखने तो नहीं जा रहा है। दरअसल, प्रदेश में राम मंदिर का फैसला आने के बाद हाई अलर्ट जारी किया गया था। हर कोई सजग और सतर्क था। उत्तरप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी आगरा की पुलिस भी पूरी तरह से मुस्तैद थी। उस सिपाही ने बडी फुर्ती के साथ नरेश के करीब पहुंच कर उसे दबोच लिया। उसके मुंह से शराब की तीखी गंध आ रही थी। सिपाही ने कनस्तर को खोला तो सन्न रह गया। आटे के कनस्तर में नारी का कटा हुआ सिर था। सिपाही ने तुरंत पुलिस थाना में फोन कर सूचना दी। ३५ वर्षीय इस नृशंस हत्यारे ने जो कहानी सुनाई उसे सुनकर पुलिस अधिकारी भौंचक रह गए। उसके चेहरे पर पश्चाताप की जगह किसी युद्ध को जीतने के बाद की खुशी थी। उसका कहना था कि चौराहे पर पत्नी के सिर को टांगकर वह सभी महिलाओं को सतर्क करना चाहता था कि कभी भूले से भी अपने पतिदेव की मौजमस्ती और शराबखोरी में बाधक न बनें। जो औरतें यह भूल करती हैं, वे सावधान हो जाएं। पुरुष को हैवान बनने और उसके दिमाग को पटरी से उतरने में देरी नहीं लगती...।
दिल्ली से सटे गुरुग्राम में एकतरफा प्यार में पगलाये पहलवान सोमवीर ने ताइक्वांडो खिलाडी सरिता की हत्या कर दी। एक साल पहले २५ वर्षीय सरिता रोहतक में एक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए गई थी। वहीं पर उसकी मुलाकात सोमवीर से हुई। राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर नाम कमाने वाला सोमवीर पहली ही मुलाकात में सरिता पर लट्टु होकर एकतरफा मुहब्बत करने लगा था। कुछ दिनों के बाद ही पहलवान ने सरिता से शादी करने की जिद पकड ली, लेकिन सरिता ने पूरी तरह से इनकार कर दिया, लेकिन वह नहीं माना। वह सरिता को तरह-तरह से परेशान कर जान से मारने की धमकियां देने लगा। पुलिस में उसकी शिकायत दर्ज करवाई गयी, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पडा। एक दिन वह सुबह चार बजे दीवार फांदकर उसके घर में जा घुसा और वही जिद पकड ली। घर के लोगों के विरोध करने पर उसने बरामदे में खडी सरिता पर गोली चलाई और भाग खडा हुआ। सरिता जयपुर के एक कॉलेज से फिजिकल एजुकेशन में ग्रैजुएशन की पढाई कर रही थी। करीब ४ साल तक ताइक्वांडो खेलने के बाद वह खेलों को ही अपना कैरियर बनाना चाहती थी, लेकिन एकतरफा प्यार में अंधे हुए पहलवान ने उसके सपने एक ही झटके में खत्म कर दिए और अपना भी वर्तमान और भविष्य चौपट कर दिया।
लगभग दो वर्ष पूर्व विक्की और ज्योति की दोस्ती फेसबुक पर हुई थी। विक्की से दस वर्ष बडी ज्योति के दस और सात साल के दो बेटे थे। कुछ वर्षों से पति से अलग रह रही थी। जब दोनों की पहली मुलाकात हुई तो विक्की ने प्यार का इज़हार कर दिया। उसके बाद उनका होटल के कमरे में मिलने का दौर शुरू हो गया। वे अक्सर सुबह नौ-दस बजे होटल आते और रात को ११ बजे तक चले जाते थे। इसलिए होटल स्टाफ दोनों को अच्छी तरह से जानता था। हमेशा की तरह उस दिन भी दोनों ने जमकर शराब पी और काफी देर तक मौजमस्ती करते रहे। इसी बीच नशे में धुत ज्योति ने किसी बात पर विक्की को थप्पड जड दिया। इससे पहले विक्की भी कई बार नशे में ज्योति की पिटायी कर चुका था। ज्योति के लिए तो यह भी प्रेमी के प्यार करने का एक अंदाज था, लेकिन विक्की प्रेमिका के थप्पड को सह नहीं पाया। उसके तन-बदन में आग लग गई। उसे लगा कि एक अदनी-सी औरत ने उसके पौरुष को चुनौती दी है। सीना तानकर ललकारा है। उसकी इज्जत की धज्जियां उडा कर रख दी हैं। प्रेमिका शराब के नशे के खुमार में डूबी थी और प्रेमी उसका गला घोंट होटल से भाग खडा हुआ। और अब... कमरे में तेज आवाज में कोई पुराना फिल्मी गाना चल रहा था और बिस्तर पर एक लाश पडी थी।

Thursday, November 21, 2019

धरती के फरिश्ते

हमारी इस दुनिया में भले ही कितना अंधेरा हो, अनाचार हो, हैवानियत हो, लालची और स्वार्थी लोगों की भीड हो और रिश्तों के कातिलों की कतारें लगी हों, लेकिन इस सच को कभी भी ना भूलें कि हर दौर में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मानव होने के नाते धर्म को निभाने में कोई कसर नहीं छोडते। वे अपने शरीर को ईश्वर का दिया उपहार मानते हैं। उन्हें खुद से ज्यादा दूसरों की चिंता रहती है...। दरअसल यह इंसान नहीं फरिश्ते हैं, जो अपनों को ही नहीं, गैरों को भी नई जिन्दगी का उपहार देकर बडी खामोशी के साथ इस दुनिया से विदा हो जाते हैं। वे माता-पिता, पति, भाई, बहन एवं अन्य रिश्तेदार भी महान हैं, जो हर गम को भूलकर अपनी संतानों के अंगदान की पहल करते हैं। इन्हें किसी पुरस्कार और प्रचार की कतई भूख नहीं। २४ वर्षीय हरीश नाजप्पा अपने गांव में छुट्टियां मनाने के बाद मोटर साइकल से बेंगलुरु लौट रहा था। इसी दौरान अंधी रफ्तार से दौडते एक ट्रक ने उनकी मोटर साइकल को इतनी जोर की टक्कर मारी कि हरीश का शरीर दो हिस्सों में बंट गया। मौत से चंद मिनट पहले हरीश ने न सिर्फ मदद की गुहार लगाई बल्कि लोगों से बार-बार यही कहा कि अब उसका बचना असंभव है इसलिए उसके शरीर के अंगों को दान कर दिया जाए। भीड तो अपने में मस्त थी। उसे तो लहुलूहान तडपते हरीश की तस्वीरें लेने और वीडियो बनाने के अलावा और कुछ सूझ ही नहीं रहा था। आखिरकार एक एम्बूलेंस में हरीश को अस्पताल में ले जाया गया। वह रास्ते में ही दम तोड चुका था। उसने हेल्मेट पहना हुआ था, जिसके कारण उसकी आखें सुरक्षित थीं। जिन्हें जरूरतमंद को दान कर दिया गया।
नागपुर के २१ वर्षीय युवा अमित को एक सडक दुर्घटना में सिर में गहरी चोट लगने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। दो दिन इलाज के बाद डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। डॉक्टरों और समाज सेवकों ने अमित के भाइयों को अंगदान करने की सलाह दी और उसका महत्व समझाया तो वे सहर्ष मान गये। १२ नवंबर २०१९ को गुरुनानक जयंती पर अमित की दोनों किडनियां और लीवर डोनेट कर तीन लोगों को नया जीवन प्रदान किया गया। इसके साथ ही अमित के हार्ट और लंग्स डोनेशन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सूचना जारी की गई, ताकि जरूरतमंद को लाभ मिल सके तथा किसी और का जीवन बच सके।
उत्तरप्रदेश के झांसी का रहने वाला २१ वर्षीय जसवंत आज भले ही इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसने तीन लोगों को नई जिन्दगी देकर अंतिम सांस ली। जसवंत दिल्ली स्थित झंडेवालान में फूलों की दुकान में काम करता था। छत से गिरने से उसके सिर में गंभीर चोट पहुंची थी। हादसे के समय मौके पर मौजूद लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाया। जसवंत के परिजनों की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। इधर अस्पताल के प्रत्यारोपण काउंसलरों को जब जसवंत के ब्रेन डेड होने का पता चला तो वे उसके परिजनों के पास पहुंचे और उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि उनका बेटा भले ही इस दुनिया से चला गया हो, लेकिन वह तीन लोगों को नई जिन्दगी दे सकता है। एक बार तो परिजन अंगदान करने में हिचके, लेकिन कुछ देर बाद उन्होंने सहमति जता दी। जसवंत की दोनों किडनी और लीवर से जहां तीन लोगों को नई जिन्दगी मिली, वहीं उसके परिवार के सदस्यों के चेहरे भी गौरव भरी तसल्ली से चमक रहे थे।
मुंबई का पवई निवासी लोमेश पटेल कच्छ जिले के गांधीग्राम नगर में एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने गया था, जहां वह दुर्घटना का शिकार हो गया। तीन दिन के इलाज के बाद लोमेश को ब्रेन डेड यानी दिमागी रूप से मृत घोषित कर दिया गया। लोमेश के पिता की सहमति से उसके दो गुर्दे, दो आंखें (कार्निया) और लीवर पांच जरूरतमंदों को दान कर नई जिन्दगी दी गई।
देश की राजधानी दिल्ली की पूजा के साहस ने तो उन लोगों के मुंह पर तमाचा जड दिया जो आज भी घर में लडकियों के जन्मने पर मातम मनाते हैं। इस बहादुर बेटी ने अपना लीवर दान कर अपने पिता की जान बचायी। डॉक्टरों ने भी पूजा की तारीफ करते हुए कहा कि इस लडकी ने तो लडकों को भी मात दे दी। वह इतनी बडी सर्जरी करवाने में किंचित भी नहीं घबराई। भोपाल की ६२ वर्षीय विमला एक सडक दुर्घटना में चल बसीं। उन्होंने तीन लोगों को नवजीवन प्रदान किया, जिसमें एक बारह वर्षीय बच्चा भी शामिल है। उनके बेटे के भावुकता भरे इन शब्दों ने जहां लाखों लोगों की आंखें नम कीं, वहीं अंगदान के लिए भी प्रेरित किया : मेरी मां ने एक बारह साल के बच्चे को नया जीवन दिया है। उनका दिल इस बच्चे के सीने में धडकता रहेगा। मेरी मां इस दुनिया में नहीं रहकर भी अमर है। इस बच्चे की जिन्दगी को हम अपनी मां की ही जिन्दगी समझेंगे। हम इस बच्चे की बहुत लम्बी उम्र की कामना करते हैं। जब तक वह दुनिया में रहेगा हम यही मानेंगे कि मां जीवित है। हमारा पूरा परिवार सतत इस बच्चे से मिल मां के दिल की धडकन को महसूस करता रहेगा।
जेपी अस्पताल के डॉक्टर अमित देवडा ने बताया कि पिछले पांच साल में हुए ५०० से अधिक ट्रांसप्लांट में ६५ फीसद महिलाएं ही डोनर रहीं। वह कई सालों से किडनी ट्रांसप्लांट कर रहे हैं। कई मामले ऐसे आते हैं, जब नारी के त्याग की प्रतिमूर्ति होने की बात सच साबित होती है। सुरेश कुमार डायबिटीज के मरीज हैं। उन्हें कुछ समय पहले गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनका पहले भी किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका था। पहली बार उन्हें उनकी मां ने किडनी दी, लेकिन कुछ समय बाद पता चला कि ट्रांसप्लांट प्रक्रिया विफल रही। दूसरी बार उनकी पत्नी ने किडनी देने का फैसला किया, लेकिन इस बार भी उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया और प्रत्यारोपण सफल नहीं हो पाया। सभी परीक्षण के बाद डॉक्टरों ने एक बार फिर ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया। अब समस्या थी कि किडनी कौन देगा। सुरेश की दो बेटियां और एक बेटा है। इस बार बेटी ने बिना कुछ विचार किए पिता को किडनी दी। पिता अब पूरी तरह से स्वस्थ हैं।

Thursday, November 14, 2019

अपनी समस्या, अपना समाधान

प्रदूषण की मार से बचने के लिए कई लोग दिल्ली-एनसीआर छोडना चाहते हैं। किसी जमाने में जिन्हें राजधानी बहुत भाती थी, अब उनका यहां दम घुटने लगा है। वे अब विषैली हवा में सांस लेने की बजाय इसे अलविदा कहना चाहते हैं। मटियाला क्षेत्र में रहने वाले रामचेत यादव ने २०१९ की दीपावली से पहले ही अपनी चार वर्षीय बेटी को टाटानगर स्थित उसकी नानी के घर भेज दिया। पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव यादव की पुत्री की वायु प्रदूषण के कारण हमेशा तबीयत खराब रहने लगी थी। वर्षों तक नोएडा में स्थित एक जिम में दूसरों को बलिष्ठ बनाने वाले राज नामक नौजवान को ऐन दीपावली के समय शहर छोडने को मजबूर होना पडा। उसके लिए भी यहां सांस लेना दूभर हो गया था। दिल्ली कभी सीमा शर्मा का पसंदीदा शहर था। कई वर्षों तक यहां रहने के बाद २००६ में सीमा अपने पति के साथ मुंबई चली गई। कुछ वर्ष तो अच्छे गुजरे, फिर वे अक्सर बीमार रहने लगीं। ऐसे में वे अपने पति के साथ दिल्ली लौट आई। सीमा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि मेरे खयालों में तो २००६ वाली दिल्ली बसी थी, लेकिन २०१७ में जब हम यहां वापस रहने आए तब तक यहां की हवा बहुत बिगड चुकी थी। मेरी यादों की जिस दिल्ली में सर्दियों में फॉग होती थी, उसकी जगह अब धुंध ने ले ली थी। बार-बार की बीमारी से तंग आकर उन्हें फिर से दिल्ली छोडने का फैसला करना पडा। कई जानी-मानी हस्तियों और आम लोगों ने प्रदूषित जहरीली हवा के लिए सत्ताधीशों को दोषी ठहराते हुए प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को कोसने में कोई कसर नहीं छोडी। फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इंस्टाग्राम पर लिखा, 'रात के ढाई बजे... सूनसान सडक... धुंध और प्रदूषण से फेफडे जम गए हैं... सांस ले पाने में बेहद मुश्किल हो रही है।' विख्यात क्रिकेटर हरभजन सिंह ने भी चुटीले अंदाज में ट्वीट किया, 'आज बहुत दिनों बाद उससे बात हुई। उसने पूछा कैसे हो। हमने कहा, आंखो में चुभन, दिल में जलन, सांसें भी हैं कुछ थमी-थमी-सी।' दिल्ली की धुंध की फोटो साझा करते हुए एक महिला ने लिखा, 'सुबह से ही गंभीर सिर दर्द। हम सब जल्द ही मरेंगे। प्रधानमंत्री जी, कुछ तो कीजिए।'
प‹डौसी राज्यों में पराली जलाए जाने के कारण उसके धुएं से भी दिल्ली की हवा बदतर हो जाती है। वैसे किसानों के द्वारा खेतों की सफाई के लिए पराली के जलाए जाने का चलन कोई नया नहीं है। वैसे भी पराली हमेशा तो नहीं जलायी जाती। इसका एक खास समय होता है। फैक्टरियों, निर्माण कार्यों और विभिन्न वाहनों का धुआं चौबीस घंटे की समस्या है। यह भी सच है कि दिल्ली के प्रदूषण की जितनी चर्चा होती है, उतनी दूसरे नगरों महानगरों की नहीं। वास्तविकता तो यह है कि देश के तकरीबन हर शहर के यही हाल हैं। लोग अब गांवों में नहीं रहना चाहते। इसके पीछे उनकी मजबूरी भी है और शौक भी। नेताओं ने वादे तो बहुत किये, लेकिन ग्रामों का विकास नहीं कर पाये। ऐसे में रोजगार, शिक्षा, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए गरीब ग्रामीण नगरों, महानगरों में आकर रहने को विवश हैं। प्रदूषण की काफी बडी वजह घनी आबादी तथा कांक्रीट के बेतहाशा बढते जंगल हैं। शहरों को प्रदूषित करने में हर किसी का बहुत बडा योगदान है, लेकिन इस सच को स्वीकारने को कोई भी तैयार नहीं। हम तो बस दूसरों को ही दोष देने के आदी हो चुके हैं। स्वयं कोई पहल करना ही नहीं चाहता।
महानगर बेंगलुरु में एक इलाका है काडुगोडी। यहां के लोगों ने एक अनुकरणीय पहल कर कमाल ही कर दिया। यहां पर एक टूटी हुई सडक पिछले चार साल से आने-जाने वालों की परेशानी का सबब बनी हुई थी। इस इलाके में करीब आठ सौ लोग रहते हैं, जिन्हें रोजाना यहां से गुजरना होता था। बारिश के मौसम में तो यहां से निकलने के बारे में सोचना भी मुश्किल था। सर्दियों-गर्मियों में यहां उडने वाली धूल ने जीना दूभर कर रखा था। कई लोग घायल भी हो चुके थे। स्कूल जाने वाले बच्चे और उनकी वैन काफी मुश्किल से निकल पाती थी। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन से अनेकों बार शिकायतें की जा चुकी थीं, लेकिन हर जगह से निराशा हाथ लगने पर अंतत: यहां के निवासियों ने खुद ही इस खस्ता हाल जानलेवा सडक को दुरुस्त करने की ठान ली। उन्होंने मिलजुलकर २ लाख रुपये इकट्ठे कर सडक निर्माण की सामग्री के लिए एक ठेकेदार से संपर्क किया। एक रोड रोलर और मात्र तीन मजदूरों के साथ लोग खुद ही सडक निर्माण में जुट गये और मात्र दो ही दिन में सिर्फ २ लाख रुपये में एक किलोमीटर सडक तैयार हो गई! इस सडक को यदि निगम बनाती तो कम-अज़-कम १५ लाख का बजट पास करवाती। सभी लोग अपनी मदद कर काफी खुश हैं। इस खबर को पढने के बाद बालकवि बैरागी की कविता 'सूर्य उवाच' की यह पंक्तियां लगातार दिमाग की बंद खिडकियों और दरवाजे पर हथोडे बरसाते हुए पूछती रहीं कि आखिर कब तक संदिग्ध, सौदागर प्रवृति वाले नेताओं को सत्ता सौंपते रहोगे और फिर उन्हीं पर आश्रित रहोगे?
आज मैंने सूर्य से बस जरा सा यूं कहा,
'आपके साम्राज्य में इतना अंधेरा क्यूं रहा?'
तमतमाकर वह दहाडा- 'मैं अकेला क्या करूं?
तुम निकम्मों के लिए मैं ही भला कब तक मरूँ?
आकाश की आराधना के चक्करों में मत पडो
संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लडूँ कुछ तुम लडो।

Thursday, November 7, 2019

कब और कैसे खुलेंगी आंखें?

नया युग है। नयी सोच वालों के बीच पुरानी परंपराओं, अंधविश्वासों, आदतों में जकडे कई लोगों के कारण पूरी तरह से बदलाव नहीं आ पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की हिदायत के बावजूद इस बार भी राजधानी दिल्ली में पटाखों की जबरदस्त आवाजें गूंजती रहीं। लगभग यही हाल पूरे देश का रहा। जहां देखो वहां दमघोटू धुआं। लोग वायु और ध्वनि प्रदूषण से जूझते रहे। २०१९ की दिवाली में भी जहरीली हवा को निगलने को विवश हजारों लोगों को अस्पतालों की शरण लेनी पडी। विषैले, धमाकेदार पटाखों ने सैकडों मूक परिंदों की भी जान ले ली। पटाखों से हुए प्रदूषण से हजारों पक्षी जमीन पर आ गिरे। उनके लिए फिर से आकाश को छूना मुश्किल हो गया। देश की राजधानी में तो बच्चों के स्कूलों की छुट्टी कर दी गई। अमीरों ने अपने घरों से निकलने में कई सावधानियां बरतीं। मरना तो उन गरीबों का हुआ, जिनका घर से निकले बिना गुजारा नहीं होता। जिन बदनसीबों के पास अपना घर नहीं उन्हें तो अपनी सांसों की कभी फिक्र ही नहीं रही। उनके लिए सब दिन एक समान हैं। बेचैनी और खांसी तो गरीबों की हमेशा साथी बनी रहती है। यह समस्या तब तक बनी रहेगी जब तक प्रकृति की ओर नहीं लौटा जाएगा, आत्मसंयम को अपने जीवन में उतारा जाएगा, लेकिन हम तो मेलों में मग्न हैं। नौटंकियों और कुरीतियों के मकडजाल में उलझे हैं। तमाशेबाजी में ही खुशियां तलाशते हैं। इंसानी खून हमें मनोरंजित करता है।
देश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल शिमला से करीब ३० किमी की दूरी पर स्थित है धामी, जहां पर प्रतिवर्ष दिवाली के अगले दिन एक अनोखा मेला लगता है। इस मेले में सैकडों समझदार लोगों की उपस्थिति में दो समुदायों के बीच पत्थरों की जबरदस्त बरसात होती है। इस बार भी वर्षों से चली आ रही परंपरा को निभाया गया। धामी रियासत के राजा जगदीप qसह पूरे शाही अंदाज में मेला स्थल पर पहुंचे। दोपहर बाद मेला शुरू हुआ और दोनों ओर से पत्थरों की बारिश का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक किसी का सिर नहीं फटा। जिस व्यक्ति के सिर से खून का फव्वारा छूटा उसके खून का तिलक माता के मंदिर में बने चबूतरे में लगाया गया और माता का आशीर्वाद लिया गया। बताते हैं, पहले यहां हर वर्ष नरबलि दी जाती थी। एक बार रानी यहां सती हो गई। इसके बाद नरबलि पर तो विराम लग गया, लेकिन पशुबलि शुरू हो गई। कई दशक पहले इसे भी बंद कर दिया गया। इसके बाद पत्थर यानी खून बहाने का मेला शुरू किया गया।
छियासठ वर्षीय चिंताहरण पिछले तीस वर्षों से प्रतिदिन दुल्हन की तरह श्रृंगार कर घर से निकलते हैं। पहले लोग उन पर हंसा करते थे, व्यंग्यबाण भी छोडा करते थे, लेकिन अब जौनपुर और आसपास के स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों को उम्रदराज चिंताहरण को लाल साडी, बडी-सी नथ और झुमके पहने देख कतई भी अटपटा नहीं लगता। दुल्हन की तरह सजने-संवरने वाले चिंताहरण को अंधविश्वास की जंजीरों ने बुरी तरह से जकड रखा है। वे मानते हैं कि यह अनोखा वेश उनका सुरक्षा कवच है, जिससे उन्हें तथा उनके परिवार को सुरक्षा मिली हुई है। उनके किसी भी करीबी का बाल भी बांका नहीं हो सकता। उनका कहना है कि बीते सालों में मेरे परिवार के १४ सदस्य एक-एक कर इस दुनिया से विदा हो गये। ऐसे में मुझे बाकी बचे अपने बच्चों, अपने परिजनों और खुद के खत्म होने का भय सताने लगा था। मेरी रातों की नींद ही उड गई थी। जब कभी नाममात्र की नींद आती भी थी तो सपने में दूसरी पत्नी रोती-बिलखती दिखायी देती, जिससे मैंने बेवफाई की थी। इस गम ने ही उसे आत्महत्या करने को विवश कर दिया था। एक दिन सपने में मैंने पत्नी से माफी मांगी और मेरे परिवार को बख्श देने का निवेदन किया। तब उसने मुझसे यह वेश धारण कर बाकी की जिन्दगी गुजारने को कहा तो मैंने प्रतिदिन दुल्हन की तरह सजना-संवरना प्रारंभ कर दिया। पहले लोग मुझ पर हंसा करते थे, लेकिन जब उन्हें मेरी विवशता का भान हुआ तो हमदर्दी जताने लगे। अब मेरी तथा बच्चों की जिन्दगी बडे मजे से कट रही है।
ओडिशा में गंजाब के जिलाधिकारी विजय अमृत कुलंगे ने जादू-टोना और अंधविश्वास से जुडी प्रथाओं से उबारने और लोगों को जागरूक करने के लिए यह ऐलान किया है कि जो व्यक्ति भूतों के अस्तित्व को साबित कर देगा उसे बडे आदर-सम्मान के साथ ५० हजार रुपये का इनाम दिया जायेगा। जिलाधिकारी को गंजाब जिले में जादू-टोने के नाम पर हुई हिंसा के बाद यह कदम उठाना पडा। कुछ सप्ताह पूर्व ग्रामीणों ने जादू-टोने के शक में छह लोगों के दांत तोड दिए थे। उन्हें जबरदस्ती अपशिष्ट पदार्थ खिलाया गया था। डंडे, लाठियों और हाकियों से तब तक पीटा गया था, जब तक वे बेहोश नहीं हो गये थे। पीटने वाले ग्रामीण बस एक ही रट लगाये थे कि उनके द्वारा किये जाने वाले जादू-टोना के कारण ही उनके रिश्तेदार बीमार होते रहते हैं। यह भी काबिलेगौर है कि यह पिटायीबाज जादू-टोने से बीमार होने वाले अपने प्रियजनों को इलाज के लिए तंत्र-मंत्र और झाडफूंक करने वाले बाबाओं के पास ले जाते हैं। उन्हें डॉक्टरों पर भरोसा नहीं है। जिलाधिकारी कुलंगे को हर सप्ताह आयोजित होने वाली जनसुनवाई में अंधविश्वास के जाल में फंसे लोगों की दलीलें और जादू-टोना संबंधी शिकायतों ने स्तब्ध कर दिया था। उन्होंने अंधविश्वासियों को बहुतेरा समझाया कि यह उनका भ्रम है कि जादू-टोना करने से कोई बीमार होता है। दरअसल, जादू-टोना और भूतों का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। फिर भी जब अंधविश्वासी नहीं माने तो उन्होंने यह घोषणा कर दी, "भूत को ढूंढकर लाओ, ५० हजार इनाम पाओ।

Thursday, October 31, 2019

संत और सत्ता

आज मेरे सामने देश के विभिन्न अखबारों में छापी दो खबरें हैं। एक खबर है, समीना बानो के बारे में, जिन्होंने गरीब बच्चों को शिक्षा देने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनी से नाता तोड लिया। पुणे की रहने वाली समीना जो कि पेशे से कम्प्यूटर इंजीनियर हैं, अमेरिका में अच्छी-खासी पगार वाली नौकरी कर रही थीं। जिन्दगी काफी अच्छी दौड रही थी। तब भी समीना के मन में अक्सर यह विचार आता कि माता-पिता ने मुझे इतनी अच्छी शिक्षा दी, जिसकी बदौलत आज मैं यहां तक पहुंची हूं, लेकिन मेरे ही देश भारत के कई हिस्सों में अब भी बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं, जिनको अच्छी शिक्षा मिलना तो दूर, वे तो स्कूल भी नहीं जा पाते। अचानक एक दिन समीना अपने देश लौटीं और गरीब बेसहारा बच्चों को पढाने-लिखाने लगीं। उन्होंने अपने इस काम की शुरुआत झुग्गी-झोपडियों में रहने वाले बच्चों से की है।
दूसरी खबर यानी दास्तान है क्लर्क से भगवान बन सैकडों करोड की बेहिसाबी दौलत जुटाने वाले विजय कुमार नायडू की जो कभी चेन्नई की बीमा कंपनी में था तो अदना-सा क्लर्क, लेकिन बिना मेहनत किए करोडों-अरबों कमाने की उसकी हसरत थी। वह चौबीस घण्टे धनवान बनने के रास्ते ढूंढता रहता था। इसी दौरान उसने श्रीमद् भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण के कहे इन शब्दों को पढा तो वह खुशी के मारे नाचने लगा, "जब कलयुग में अधर्म बढ जाएगा तब धर्म की स्थापना के लिए मैं यानी विष्णु भगवान कल्कि के रूप में अवतार लूंगा। अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करूंगा।" विजय कुमार ने तय कर लिया कि उसे अब खुद को विष्णु का दसवां अवतार भगवान कल्कि घोषित कर अपने सभी मायावी सपनों को पूरा करके ही दम लेना है।
शातिर विजयकुमार अच्छी तरह से जानता-समझता था कि देश और दुनिया में धर्म और अध्यात्म का रंगीन चोला ओढ कर कई धूर्तों ने अथाह माया बटोरने में सफलता पायी है। चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन धर्म का धंधा कभी मंदा नहीं होता। धोखे-पर-धोखे खाने के बाद भी अंधभक्त श्रद्धालुओं की आंखें नहीं खुलतीं। एक धूर्त का नकाब उतरता है तो दो-चार और 'उद्धारकर्ता' जन्म ले लेते हैं। हिन्दुस्तान तो वैसे भी देवी-देवताओं की धरती है, जहां इंसान कम और 'भगवान' ज्यादा हैं। आसाराम, रामपाल, राम-रहीम जैसे धूर्तों की तरह ही देखते ही देखते विजय कुमार ने देश और विदेश में भोले-भाले लोगों को सीधे मोक्ष यानी भगवान से मिलवाने का दावा करने वाली दुकानें शुरू कर दीं। बडे-बडे उद्योगपति, व्यापारी, राजनेता, मंत्री, अभिनेता उसके चरणों में माथा टेकते हुए चढावा चढाने लगे। करोडों श्रद्धालुओं के मन में यह बात बिठा दी गयी कि यह आधुनिक भगवान उनके सभी कष्टों का निवारण कर सकता है। वे भी दिल खोलकर धन की बरसात करने लगे। कुछ ही वर्षों में वह इतना मालामाल हो गया कि जमीनों की अंधाधुंध खरीदी करने लगा और टैक्स चोरी के लिए विदेशी कंपनियों में धन का निवेश करने लगा। चंद ही वर्षों में देश और विदेश में अपने लूट तंत्र का मायाजाल फैलाने वाले इस भगवान के देशभर के ४० आश्रमों में १६ अक्टूबर २०१९ को आयकर विभाग ने छापामारी की तो ५०० करोड से अधिक की बेनामी संपत्ति उजागर होने के साथ-साथ ४४ करोड नगदी, २५ लाख अमेरिकी डालर, पांच करोड के हीरे तथा और भी बहुतेरा चौंकाने वाला ऐसा कीमती सामान मिला।
इतिहास गवाह है कि अपने देश में धनलोभी, सौदागर प्रवृत्ति के प्रवचनकारों, योग गुरुओं, तांत्रिकों और तथाकथित भगवानों को सत्ता और राजनेताओं का भरपूर साथ मिलता है। जेल में बंद आसाराम के प्रवचनों के कार्यक्रमों के मंचों पर बडे-बडे राजनेता, मुख्यमंत्री, मंत्री और प्रधानमंत्री तक शोभायमान होकर उसकी तारीफों के पुल बांधा करते थे। आसाराम उनके साथ ली गई तस्वीरों का विज्ञापन की तरह इस्तेमाल कर अपने कारोबार का विस्तार करता था। कहीं न कहीं यह काम योग गुरु बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर ने भी बडी चालाकी से किया है और अरबों-खरबों का व्यावसायिक साम्राज्य खडा कर देश और विदेश के नामी-गिरामी उद्योगपतियों, व्यापारियों को चिंता और हैरत में डाल दिया है। गनीमत है कि यह धुरंधर दवाएं, बिस्कुट, टूथपेस्ट, शैम्पू, साबुन, क्रीम, पाउडर, तेल, घी, शर्बत, चाकलेट, च्यवनप्राश, यौनवर्धक कैप्सूल आदि बनाते और बेचते हैं। जबकि इनके असली प्रेरणास्त्रोत योग गुरु धीरेंद्र ब्रम्हचारी तो बंदूकें बनाया और बेचा करते थे। जम्मू में उनकी गन बनाने की फैक्टरी थी। यह अनोखे स्वामी स्व. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खास राजदार और राजनीतिक गुरु थे। साउथ दिल्ली में स्थित फ्रेंडस कॉलोनी में धीरेंद्र की आलीशान कोठी थी, जहां पर उस जमाने के शक्तिशाली नेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, अभिनेताओं का दिन-भर आना-जाना लगा रहता था। उन्हें पता होता था कि ब्रह्मचारी प्रधानमंत्री के खास हैं। मुश्किल से मुश्किल काम को आसानी से करवा सकते हैं। उस दौर में प्रधानमंत्री आवास सफदरजंग रोड तक उन जैसी किसी और की पहुंच नहीं थी। वे प्रतिदिन सुबह इंदिरा गांधी को योग करवाने जाते थे। इसी दौरान उन्हें दूसरे 'हाल-चाल' से अवगत करवाकर उन कामों की भी स्वीकृति हासिल कर लेते थे, जिनसे उन्हें करोडों की दक्षिणा मिलती थी। उस जमाने में जहां नाम-मात्र के लोग ही हवाई सफर किया करते थे, वहीं इस सत्ता के दलाल के पास अपना लग्जरी जेट था। तब के उद्योगपति, व्यापारी और सेलिब्रिटीज उनके आलीशान जीवन जीने के तौर-तरीकों के सामने खुद को काफी बौना पाते थे और उनसे मिलना अपना सौभाग्य समझते थे।

Friday, October 25, 2019

कैसी-कैसी पाठशालाएं

भारत में सब चलता है। कानून तोडने वाले दबंग और मालदार मस्त रहते हैं। खाकी उनकी दासी बन मलाई खाती रहती है। यहां संस्कारों और संस्कृति का भी खूब ढोल पीटा जाता है। घर की चारदिवारी में ऐसे-ऐसे अपराध होते रहते हैं, जिन्हें इज्जत की खातिर कभी उजागर नहीं होने दिया जाता। अपने घरों को ही नशाखोरी और नारी देहशोषण के लिए सुरक्षित स्थल मान कर  मनमानी चलती रहती है, जिन्हें विरोध करना चाहिए वे भी खामोश रहने में अपनी भलाई समझते हैं।
दुनिया में थाईलैंड एक ऐसा देश है, जहां पर अपने ही घर में सिगरेट पीना कानूनन अपराध माना जाता है। यहां पर यदि कोई नागरिक घर में सिगरेट पीते पकडा जाता है तो उसे जेल में डाल दिया जाता है। साथ ही स्मोकर पर घरेलू हिंसा का केस भी चलाया जाता है। घर के बच्चों और परिवार वालों की सेहत का ख्याल रखने के लिए थाईलैंड की सरकार को इतना कडा फैसला लेने को मजबूर होना पडा। जब यह हकीकत सरकार की समझ में आयी कि सिगरेट और सिगार पीने का चलन अपनी हदें पार कर चुका है और इनके धुएं की चपेट में आकर हर साल छह लाख लोग अपनी जान गंवा रहे हैं, जिनमें साठ प्रतिशत तो मासूम बच्चे ही हैं तो उसने यह कानून बनाया और फिर लागू करने में किंचित भी देरी नहीं लगायी। विशेषज्ञों का मानना है कि धूम्रपान की लत इमोशनल और फिजिकल वायलेंस का कारण बनती है। एक सर्वे में पता चला कि परिवार के सदस्यों की देखा-देखी बच्चे भी धूम्रपान के प्रति आकर्षित होते हैं। एक समय ऐसा भी आता है, जब वे धूम्रपान करने लगते हैं। थाईलैंड की जेलों में कैदियों को अनुशासन के सूत्र में बांध कर रखा जाता है। जेल के अधिकारी बडी सख्ती के साथ पेश आते हैं। उन्हें किसी भी प्रलोभन के जाल का शिकार नहीं बनाया जा सकता। 
जेलें अपराधियों के सुधार के लिए बनी हैं। हर सुधारगृह सुरक्षा  और अनुशासन का भी बोध कराता है। इनकी स्थापना का एकमात्र उद्देश्य होता है अपराधियों को नेक इंसान बनने के लिए प्रेरित करना। उन्हें यह बताना और समझाना कि आजादी और कैद में क्या फर्क होता है, लेकिन कई भारतीय जेलों में रिश्वत की परिपाटी को निभाते हुए किस तरह से कैदियों को सुविधाभोगी बनाया जाता है, इसका पता इस खबर को पढकर चलता है : "अक्सर कहा और सुना जाता है कि जेल में बंद कैदियों को तरह-तरह की यातनाएं झेलनी पडती हैं। उनके जीवन में खुशी के पल तो कभी आते ही नहीं। उन्हें हमेशा घुट-घुट कर रहना पडता है, लेकिन यह बात मंडोली जेल नंबर -१३ में बंद कैदियों पर लागू नहीं होतीे, क्योंकि यहां के कैदी जेल के वरिष्ठ अधिकारी को मोटी रकम चुका कर भरपूर विलासिता का आनंद लूट रहे हैं। रिश्वतखोर अधिकारियों की शह पर धनवान और खूंखार कैदी बडे मजे से स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। जब भी किसी कैदी को अपना जन्मदिन या अन्य खुशी का जश्न मनाना होता है तो वह अपने घर में पेटीएम या फोन-पे पर पैसे मंगवाता है। उसके बाद दारू और चिकन पार्टी के लिए मोटी रकम जेल के अधिकारी को देकर इसका ऑर्डर करता है। इसके बाद तय समय पर उस कैदी को सबकुछ उपलब्ध करा दिया जाता है, जिससे कैदी अपने दोस्तों के साथ मिलकर जमकर जश्न मनाते हैं।"
कोटला में नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की गई है। यहां पर नशेडियों को नशे की आदत से मुक्त कराने के लिए भर्ती किया जाता है, लेकिन यह मुक्ति केंद्र उन लोगों के लिए सिर दर्द बन गया है, जो इसके आसपास रहते हैं। महिलाएं तो इसके पास जाने से ही खौफ खाती हैं। दरअसल यह नशा मुक्ति केंद्र तो नाम का है। असल काम तो यहां पर लोगों को नशे की और आदत डालना है। यहां जिन लोगों को नशा छुडाने के लिए भर्ती कराया जाता है उन्हें यहां पुराने ड्रग्स के नशाखोरों का साथ मिल जाता है, जो उन्हें नशा करने के ऐसे-ऐसे गुर सिखाते है, जिनके बारे में उन्हें पहले पता ही नहीं होता। सुबह-शाम केंद्र के बाहर ही ये लोग एक-दूसरे को ड्रग्स के इंजेक्शन लगाते रहते हैं। कोई उन्हें रोकता-टोकता नहीं। ड्रग्स खरीदने के लिए यह नशेडी इलाके में चोरी-चकारी करते हैं। महिलाओं और ऑटोवालों से लूटपाट करते हैं। कुछ हफ्ते पूर्व नशा मुक्ति केंद्र के अंदर चाकू से गोदकर एक युवक की हत्या कर दी गई। हत्यारा इसी सेंटर में रहता था। वह ड्रग्स का लती था। उसके पिता ने २०१५ में उसे नशा मुक्ति केंद्र में यह सोचकर भर्ती कराया था कि वह कुछ महीनों में सुधर जाएगा, लेकिन पुराने नशेडियों की संगत में उसने और भी कई दुर्गुण अपना लिए। नशा करने के बाद वह इस कदर हिंसक हो उठता था कि किसी पर भी हाथ उठा देता था। नशा केंद्र के अधिकारियों से मारपीट करने के बाद उसे गिरफ्तार भी किया गया था। कई महीनों तक जेल में रहने के बाद जब वह जमानत पर बाहर आया तो उसका हौसला और बुलंद हो चुका था। जेल में उसे हत्यारों और बलात्कारियों की भरपूर संगत मिली थी। नशा मुक्ति केंद्र में उसने अपने एक साथी की हत्या को ऐसे अंजाम दिया जैसे यह कोई बच्चों का खेल हो। इंसानी जान का कोई मोल ही न हो।