Thursday, January 16, 2020

सुलगता सवाल, मांगे जवाब

संपूर्ण देशवासियों को दहला और चौंकाकर रख देने वाले निर्भया सामूहिक दुष्कर्म काण्ड एवं हत्या के चारों आरोपियों को फांसी पर लटकाने की पूरी तैयारियां हो चुकी हैं। दिसंबर २०१२ में हुई इस वीभत्स और शर्मनाक घटना से गुस्साये लाखों भारतीय सडकों पर उतर आये थे। हर किसी की यही मांग थी कि हत्यारों को कडी से कडी सजा दी जाए, जिससे अपराधियों की रूह कांप उठे। भविष्य में कोई भी इन्सान, शैतान बन ऐसा दुष्कर्म करने की हिम्मत न कर पाए। महिलाओं की सुरक्षा के लिए शासन और प्रशासन ने भी न जाने कितने आश्वासन और वायदे किये थे, जिनसे लगा था कि अब देश में बदलाव आयेगा। हालात सुधरेंगे। महिलाएं निर्भय होकर घर से बाहर निकलेंगी। बच्चियां भी पूरी तरह से महफूज़ रहेंगी। निर्भया बलात्कार काण्ड के सात साल बाद भी महिलाएं और बच्चियां अपने ही देश हिन्दुस्तान में कितनी सुरक्षित हैं, इसकी जानकारी देश में कहीं न कहीं प्रतिदिन होने वाले बलात्कारों और हत्याओं से मिल जाती है।
शासन और प्रशासन के साथ-साथ हमारा समाज अभी भी पूरी तरह से नहीं जागा है। आंकडे चीख-चीख कर बताते हैं कि नारियों के पूजे जानेवाले देश में हर बीस मिनट में एक बेटी के साथ हैवानियत हो रही है। हर चौथी दुष्कर्म पीडिता नाबालिग होती है। अस्सी फीसदी बलात्कारी रिश्तेदार या पहचान के ही होते है। ऐसे में यह क्यों न मान लें कि हमारा आक्रोश सतही होता है। रैलियां, भाषण और अखबारों में धडाधड छपने वाले लेख बेअसर रहते हैं। सडक से संसद तक लोगों को जागृत करने की कसरत कोई मायने नहीं रखती। कडा कानून भी शैतानों को नहीं डरा पाता, जिससे स्त्री-हिंसा लगभग जस की तस रहती है।
इस सच को भी जानना जरूरी है कि देश में होने वाले हर बलात्कार की खबर अखबारों में नहीं छपती। कुछ ही खबरें अखबारों तक पहुंचती हैं। अधिकांश खबरों को दबा और छिपा दिया जाता है। न्यूज चैनल वाले तो चुनिंदा बलात्कारों की खबरों को सामने लाना पसंद करते हैं। उन्हें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों में होने वाले दुराचारों को रोचक तरीके से पेश करने में भरपूर आनंद और तसल्ली मिलती है। इस पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान ही एक ऐसा देश है, जहां पर मासूम अबोध बच्चियों को भी हैवानों की वासना का शिकार होना पडता है। गैर तो गैर अपने भी चुप्पी साधे रहते हैं। इतना ही नहीं अपनी ही बेटियों को दुष्कर्मियों और बाजार के हवाले करने में भी नहीं सकुचाते। नये वर्ष २०२० के जनवरी महीने के दूसरे हफ्ते में खबर के रूप में जो हकीकत सामने आयी, उसने भले ही कहीं न कहीं हर संवेदनशील, चिन्तनशील भारतीय को हिलाकर रख दिया, लेकिन अपने देश में तो ऐसा होना आम है :
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक सोलह साल की लडकी की खुलेआम बोली लगी। खरीददारों में बीस साल के युवक से लेकर अस्सी साल तक के वृद्ध शामिल थे। नाबालिग की देह की बोली लगाने वालों के इस जमावडे में कुछ नेता और बुद्धिजीवी किस्म के सफेदपोश चेहरों का भी समावेश था। लडकी को किसी बहुउपयोगी सामान की तरह सजा-धजा कर देह के भूखों के समक्ष बिठा दिया गया था। उसके गोरे रंग, आकर्षक बदन और अंग-अंग की तारीफ में ऐसे-ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिनसे सिर्फ अश्लीलता ही टपक रही थी, जिन्हें सुनकर अय्याशों को अलौकिक आनंद की अनुभूति हो रही थी। सभी लडकी को ललचायी नज़रों से देख रहे थे। बोली लगाने से पहले लडकी के जिस्म के अंग-अंग को ऐसे छू रहे थे, जैसे किसी सामान को खरीदने से पहले जांचा, परखा जाता है और पूरी तसल्ली के बाद कीमत अदा की जाती है। बोली लगाने वालों में ऐसे शैतान भी शामिल थे, जिनके छूने और परखने का अंदाज लडकी को बहुत पीडा दे रहा था। वह रोये जा रही थी और वे अपनी मस्ती में झूमते हुए बोली लगा रहे थे। पचास हजार से प्रारंभ हुई बोली बढते-बढते अस्सी हजार तक जा पहुंची थी। बोली और आगे बढती कि इससे पहले पुलिस वहां पहुंच गई और लडकी उम्रभर शैतानों की हैवानियत को झेलने और खून के आंसू बहाने से बचा ली गई। लडकी की मां का एक साल पहले निधन हो गया था। उसकी सौतेली मां ने उसे मानव तस्कर कलावती को पचास हजार रुपये में बेच दिया था। कलावती ने आसपास के लोगों को लडकी की अधिकतम बोली लगाने के लिए बुलाया था। उम्मीद से ज्यादा खरीददारों की भीड जुटने के कारण उसे यकीन था कि उसकी मोटी कमायी हो जाएगी। कलावती मानव तस्करी की पुरानी खिलाडी है। दो साल पहले जेल भी जा चुकी है। यह शातिर नारी आसपास के इलाकों की लडकियों को नौकरी दिलाने के बहाने बाहर ले जाती है और उन्हें बेच देती है। एक लडकी के बदले उसे चालीस से पचास हजार रुपये तक की कमायी हो जाती है। कभी-कभी तो यह आंकडा लाख-दो लाख तक भी पहुंच जाता है। जिस नाबालिग को बेचते हुए वह पुलिस के हत्थे चढी वह झारखंड की राजधानी रांची के निकट स्थित एक गांव की मूल निवासी है। कलावती झारखंड की पचासों लडकियों को उत्तर प्रदेश के बागपत, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ और बुलंदशहर में बेच चुकी है। गरीब और आदिवासी समाज के परिवारों की लडकियों को कलावती बडी आसानी से अपना शिकार बनाती रही है।

Thursday, January 9, 2020

शहीद की नई परिभाषा

लोकतंत्र में विपक्ष का काम ही होता है, सत्ता पार्टी पर नज़र रखना। जो कार्यक्रम और नीतियां उसे जनहितकारी न लगें उनका शांतिपूर्वक तरीके से विरोध करना। सच्चे लोकतंत्र में जितना महत्व जनता के द्वारा चुनी सरकार का होता है, उतना ही विपक्ष का भी होता है, लेकिन भारतवर्ष में काफी अलग मंजर नज़र आ रहा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर जिस तरह से विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं और हंगामा करने वालों का साथ दे रहे हैं, उससे उनकी नीयत पर शक होना स्वाभाविक है। देश के गृहमंत्री अमित शाह बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि नागरिकता संशोधन कानून से किसी भारतीय का कोई लेना-देना नहीं है। यह कानून किसी की नागरिकता नहीं छीन सकता। नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी को नागरिकता संशोधन कानून के साथ जबरन जोडने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि फिलहाल इसे लेकर कोई पहल नहीं हो रही है, लेकिन फिर भी विपक्ष ने अपना रवैया नहीं बदला। देश की जनता को भ्रमित और भयभीत करने का गंदा खेल निरंतर जारी रखा। किसी भी विपक्षी नेता ने हिंसक प्रदर्शन करने वाले उपद्रवियों को रोकने और समझाने की पहल नहीं की, उलटे लोगों को भडकाया और उकसाया। ऐसा लगता है कि विपक्षियों के लिए लोकतंत्र का अर्थ जनता को भ्रमित करना है, उन्हें वास्तविकता से अवगत कराना नहीं। उन्हें आग बुझाने में नहीं, लगाने में दिलचस्पी है।
देशभर में हुए हिंसक प्रदर्शन और आंदोलनों में मारे गए उपद्रवियों को हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने 'शहीद' घोषित कर हर किसी को स्तब्ध कर दिया। हिंसा की अनोखी पक्षधर प्रियंका यह भी भूल गईं कि इसी हिंसा ने उनकी दादी और पिता की जान ली थी। जिस महात्मा के उपनाम 'गांधी' को बडी शान से उनके खानदान और उन्होंने अपने नाम के साथ जोड रखा है, उनकी हत्या भी जिस नाथूराम गोडसे ने की थी वह हिंसा का पुजारी था। शहीद की यह नई परिभाषा पेश करने वाली इस महान अनोखी राजनीतिक हस्ती का अभिनंदन किया जाना चाहिए। फूलमालाओं से लाद दिया जाना चाहिए, ताकि इनका हौसला बरकरार रहे। ये नई-नई परिभाषाएं गढती रहें और देशवासियों का ज्ञानवर्धन होता रहे।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले प्रदर्शनकारियों के होश ठिकाने लगाने और उन्हें सबक सिखाने के लिए एक क्रांतिकारी पहल करते हुए यह घोषणा की, कि अब सरकार चुप नहीं बैठेगी, जिसने सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुंचायी है, उन्हीं से क्षतिपूर्ति की जाएगी। नुकसान की भरपाई नहीं करने पर सरकार उनके खिलाफ कुर्की जब्ती की कार्रवाई करने से नहीं चूकेगी। प्रदेश की पुलिस ने १०० से ज्यादा लोगों की शिनाख्त कर उनकी तस्वीर वाले पोस्टर चौक-चौराहों पर लगवाये और उनके खिलाफ तेजी से कार्रवाई शुरू हो गई। खुद को सच्चे देशभक्त और अत्यंत बुद्धिमान समझने वाले कई बुद्धिजीवियों और नेताओं ने इस पर भी आपत्ति जतायी। उनका कहना था कि यह तो सरासर सरकारी गुंडागर्दी है। विरोध की आवाज़ों को दबाने के लिए सरकार दहशत फैलाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट रही है। लोकतंत्र का अपमान कर रही है।
एक नारी है अरूंधती राय। अंग्रेजी लेखिका है। समाजसेवी होने का खूब ढोल पीटती है। उसने जिस तरह से खिलखिलाते हुए बिल्ला और रंगा जैसे हत्यारों का नाम लेकर देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए घोर अपमानजनक टिप्पणी की उससे पूरे देश में उसकी थू-थू हुई। उल-जलूल बकवास करने और छात्र-छात्राओं को उकसाने वाली भाषा का इस्तेमाल करने वाली यह तथाकथित बुद्धिजीवी अपने नक्सली प्रेम के लिए भी कुख्यात रही है। यह अलग बात है कि अपनी इस कुख्याति को वह ख्याति समझती है। बडी बेशर्मी से अभद्रता और तुच्छता की सभी सीमाएं लांघने वाली यह बददिमाग नक्सलियों और आतंकियों के हाथों जवानों के मारे जाने पर जश्न और आतंकियों, नक्सलियों के ढेर होने पर मातम मनाती है। उनके पक्ष में लेख लिखती है, किताबें छपवाती है और विदेशी पुरस्कार पाती है। इतना ही नहीं, अपने साथियों के साथ उनके लिए अदालतों के दरवाजे भी खटखटाती है। दरअसल हिन्दुस्तान में ऐसे और भी कई चेहरे हैं, जिनका बस एक ही मकसद है, मानवाधिकार की बातें कर अपना उल्लू सीधा करते रहो और सरकार के विरोध करने के बहाने ढूंढते रहो। इनके गिरोह में कुछ पत्रकार भी शामिल हैं, जिन्हें देश में कुछ भी अच्छा होता नहीं दिखता। खुद को छोडकर इन्हें बाकी दूसरे सभी पत्रकार बिकाऊ लगते हैं। नागरिकता कानून में संशोधन के बाद देशभर में हुई हिंसा की वजह से करीब पच्चीस लोगों की मौत हो गई। अरबों-खरबों का नुकसान हुआ। जहां देश की अर्थव्यवस्था पर भी बहुत बुरा प्रभाव पडा, वहीं पूरी दुनिया में भारत की बदनामी भी हुई। दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में पुलिस तथा जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय (जेएनयू) में नकाबपोशों के द्वारा की गई गुंडागर्दी और बेतहाशा हिंसा के बाद तो कई विदेशों के विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने भी अपना तीव्र विरोध जताया और खुलकर निन्दा की। अमेरिका, ब्रिटेन और रूस सहित कई देशों की सरकारों ने भारत में फैली हिंसा की आग के चलते अपने देश के नागरिकों को भारत न जाने की सलाह देकर सतर्क कर दिया। असम में नब्बे फीसदी पर्यटकों ने अपनी बुकिंग कैंसिल कराई। जिन दो लाख से अधिक देशी-विदेशी पर्यटकों ने ताजमहल देखने के लिए आगरा में होटल आदि बुक कराये थे, उन्होंने भी अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया। हर पर्यटक यही चाहता है कि उसकी यात्रा आरामदेय और चिंता मुक्त हो। कोई भी अपने जीवन को खतरे में नहीं डालना चाहता। सभी भारतवासी भी तो यही चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे। कहीं कोई हिंसा और खून खराबा न हो।

Thursday, January 2, 2020

इनकी पीडा को भी तो समझो...

चित्र -१ : हिन्दुस्तान दुनिया का सबसे विशाल लोकतांत्रिक देश है। यहां पर असहमति दर्शाना और विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, परंतु आंदोलन और विरोध के नाम पर अराजकता फैलाना कैसे जायज़ हो सकता है? नागरिकता संशोधन कानून-२०१९ के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में तोडफोड और आगजनी की गई। अरबों रुपये की सरकारी और गैर सरकारी संपत्ति को स्वाहा कर दिया गया। कई पुलिस कर्मी घायल हुए। आम नागरिकों के साथ-साथ छात्र भी बुरी तरह से पिटे और लहुलूहान हुए। नागरिकता संशोधन कानून बनाने के पीछे भारत सरकार का यही संकल्प है कि पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उन गैर मुस्लिम अल्पसंख्यको को भारतीय नागरिकता प्रदान कर उनका जीवन सुखमय बनाया जाए, जिन्हें उपरोक्त देशों में वर्षों तक बदसलूकी और प्रताडना का शिकार होना पडा है। हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध और जैन जैसे अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने वाले इस साहसिक कदम पर विरोध जताने वालों ने समानता के अधिकार की दुहाई देते हुए जहां पूरे देश में उथलपुथल मचायी, लोगों को भडकाया, वहीं घटिया और निकृष्ट शब्दावली का इस्तेमाल करने में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी।
चित्र - २ : जिन्हें ज़हर उगलना है, उगलते रहें, मातम मनाना है, मनाते रहें, लेकिन बंटवारे के बाद पाकिस्तान में लंबे समय तक प्रताडना झेलने के बाद बीते कुछ सालों में भारत लौटे हिन्दू परिवार काफी खुश हैं। इस कलमकार को दिल्ली में स्थित मजनू का टीला एवं मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के निकट स्थित रिफ्यूजी कैंप में रह रहे सैकडों शरणार्थियों से करीब से मिलने और जानने का अवसर मिला। वासनमल २०११ में कुंभ के बहाने टूरीस्ट वीजा पर दिल्ली आए थे। पाकिस्तान में बहुसंख्यक समुदाय के आतंक और जुल्मों-सितम ने उनके पूरे परिवार का जीना दुश्वार कर दिया था। बहन, बहू, बेटियों की आबरू खतरे में पड चुकी थी। रेहडी लगाकर किसी तरह से अपना परिवार पाल रहे वासनमल जैसे हर शरणार्थी का अपना दर्द और अपनी शिकायत है।
ईश्वर तो बोलते-बोलते रूआंसें होकर सवाल करने लगते हैं कि आप ही बताइए कि कोई अपना बसा-बसाया घर कभी छोडता है? मेरी तो वहां पर अच्छी खासी कपडे की दुकान थी। खेती-बाडी भी थी, लेकिन जब बहू-बेटियों के साथ बदसलूकी होने लगी तो सबकुछ छोडकर यहां चले आए। २०११ में ही पाकिस्तान से भारत आए रामनाथ के पास भी किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन बहुसंख्यक समुदाय के गुंडे-बदमाशों की चौबीस घण्टे उनकी बहन-बेटियों पर गंदी नज़रें लगी रहती थीं। कभी भी घर में घुस जाते थे और मारते-पीटते थे। पाकिस्तान में अपने परिवार के साथ हुई बदसलूकी और प्रताडना को याद कर अस्सी वर्षीय रामप्यारी की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं लेते। वे बताती हैं कि पाकिस्तानी गुंडों का हमेशा दबाव बना रहता था कि अगर हमें पाकिस्तान में रहना है, तो अपना धर्म परिवर्तन करना ही होगा। हमारे विरोध करने पर गंदी-गंदी गालियां देते थे और बहू-बेटियों की इज्जत लूटने पर उतारू हो जाते थे। ७५ वर्षीय देवराज का दर्द भी उनकी आंखों से आंसू बन बार-बार छलकता रहा : "हिन्दुओं के लिए पाकिस्तान नर्क से भी बदतर देश है, जहां पर उनके साथ बेहद घटिया बर्ताव किया जाता है। दिनदहाडे हिन्दुओं की बहन-बेटियों को मदरसे से जुडे लडके जबरन उठा ले जाते हैं। फिर कुछ दिनों के बाद यह ऐलान कर देते हैं कि लडकी ने इस्लाम कुबूल करते हुए शादी कर ली है। विगत कुछ वर्षों में हजारों हिन्दू लडकियों का अपहरण हो चुका है। गुंडागर्दी का तो यह आलम है कि कोई लडकी सामने आने की हिम्मत ही नहीं दिखा पाती। वहां पर सामूहिक धर्म परिवर्तन कराये जाने की तो जैसे परंपरा बन गई है। पहले जहां पाकिस्तान में हिन्दू करोडों की संख्या में थे, अब लाखों में सिमटते जा रहे हैं। मजनू का टीला में रहने वाले दादा दयालदास इज्ज़त और सुख-चैन की जिन्दगी जीने के लिए मार्च २०१३ में पाकिस्तान के हैदराबाद (सिंधप्रांत) को छोडकर दिल्ली आए। उनकी बहू ने जब बेटी को जन्म दिया तो उन्होंने अपनी पोती का नाम 'नागरिकता' रखा। 'नागरिकता' की दादी से जब पूछा गया कि उन्होंने अपनी पोती का यह नाम क्यों रखा तो उनका कहना था कि मोदीजी ने कोई कानून बनाया है, जिससे हम लोगों को अब हिन्दुस्तान की नागरिकता मिल जाएगी। इसलिए बिटिया का नाम 'नागरिकता' रख दिया है। वैसे तो हम लोगों के यहां सवा महीने में नामकरण संस्कार किया जाता है, लेकिन कानून जिस दिन बना उसी दिन नामकरण संस्कार कर दिया गया। हमारी आप सभी से हाथ जोडकर विनती है कि कानून का विरोध मत कीजिए। हम लोगों को स्वीकार कीजिए। हम लोग मजदूरी कर गुजर-बसर कर लेंगे। हम लोग आपके हैं, कृपया हमें मत दुत्कारिए। आप लोग हमारी खुशी का अंदाजा नहीं लगा सकते। यह सोचकर हमारे पांव जमीन पर नहीं पड रहे हैं कि अब हमें हिन्दुस्तान में रहने का कानूनी हक मिलने वाला है। अब हमें कोई शरणार्थी नहीं कहेगा। हम और हमारे बच्चे बडे गर्व से कहेंगे, हम हैं हिन्दुस्तानी। सच्चे हिन्दुस्तानी।

Thursday, December 26, 2019

अब नहीं तो कब?

हमारे देश की बडी अजीब हालत हो गई है। सभी शुद्ध, स्वस्थ हवा में सांस लेना चाहते हैं, लेकिन पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व का सतर्कतापूर्वक पालन नहीं करना चाहते। हमें सुरक्षा तो चाहिए, लेकिन नियम-कायदों की अवहेलना करने से बाज नहीं आते। जो राह हमें लाभदायक लगती है उसी पर चलना पसंद करते हैं। दूसरे मरें या जिएं हमें इससे कोई सरोकार नहीं। यह कितना हैरतअंगेज सच है कि देश में हर आठ में से एक व्यक्ति की मौत वायू प्रदूषण से हो रही है। दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में १२ शहर हमारे ही देश में हैं। इन्सानों को जीने के लिए शुद्ध हवा चाहिए। हवा में आक्सीजन का होना निहायत आवश्यक है, तभी जिन्दा रहा जा सकता है। पेड पौधों और वृक्षों से आक्सीजन मिलती है, लेकिन हम इनके प्रति कितने निर्दयी हैं इसकी पूरी खबर होने के बावजूद अंधे बने हुए हैं। सरकार ने प्रदूषण पर काबू पाने के लिए पिछले कुछ वर्षों से काफी सक्रियता दिखायी है, लेकिन हम कितने जागरूक हुए हैं? हमारी इस संपूर्ण दुनिया में प्राणियों और पेड-पौधों को जीवित और स्वस्थ रहने के लिए आसपास के वातावरण का स्वच्छ होना बहुत जरूरी है, लेकिन हमने अपने निजी स्वार्थों के चलते पर्यावरण को प्रदूषित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। प्रदूषण का एकदम सरल-सा अर्थ है, गंदगी। हमारी सोच और विचारों पर भी 'प्रदूषण' ने अपनी जबरदस्त पकड बना ली है।
वायू प्रदूषण और जल प्रदूषण से तो हम सभी वाकिफ हैं। ध्वनि प्रदूषण भी कम अहितकारी नहीं है, लेकिन पता नहीं क्यों इसे नजरअंदाज किया जाता रहा है। प्रदूषित हवा, पानी और ध्वनि एकाएक अवतरित नहीं हुए। अगर हमने प्रारंभ से ही इनकी तरफ ध्यान दिया होता तो आज हालात इतने घातक नहीं होते। हाल ही में आया एक सर्वे बताता है कि देश की राजधानी दिल्ली सहित अधिकांश महानगरों, शहरों में प्रदूषण बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच चुका है। बेतहाशा बढते वाहनों के ईंधन के जलने से होने वाले धुएं, रिहाइशी इलाकों में बडे पैमाने पर चलाई जा रही अवैध फैक्टरियों, खुले में होने वाले निर्माण कार्यों और सडकों पर कूडे-कर्कट को जलाये जाने से फैलने वाला प्रदूषण अत्याधिक जानलेवा है। इससे जो वायु प्रदूषित हो रही है, वही तो सभी के फेफडों में जा रही है। यह कोई हवा में उडा देने वाली बात नहीं है कि ऐसे विषाक्त वातावरण में हर दिन हर व्यक्ति चालीस सिगरेट पीने जितना धुआं अपने फेफडे में भरने को विवश है। ऐसे में वह कैंसर और अन्य गंभीर जानलेवा बीमारियों से कब तक बचा रह सकता है? आज भले ही यह महानगरों और बडे शहरों का भयावह सच है, लेकिन धीरे-धीरे छोटे शहर भी इस संकट की जद में आ रहे हैं। आज पानी खरीद कर पिया जा रहा है, अगर तुरंत नहीं संभले तो सांस लेने के लिए आक्सीजन भी कीमत देकर हासिल करने की नौबत आ सकती है।
इन्सानी तबाही का कारण बन चुके प्रदूषण ने कृषि वैज्ञानिकों को चिन्ता और परेशानी में डाल दिया है। कृषि पैदावारों में भी विष घुलने लगा है। वायुमंडल में रच-बस चुके धूल और धुएं के कारण इन्सानों की उम्र तो घट ही रही है, फसलें भी चौपट होने लगी हैं। पैदावार में कमी देखी जा रही है। फल-सब्जियों में पहले जैसी पौष्टिकता और स्वाद नहीं रहा। फूल खिलने से पहले ही गिरने और मुरझाने लगे हैं। सरकार की प्लास्टिक से मुक्ति पाने की अनवरत कोशिशों के बाद भी इसका चलन पूरी तरह से बंद नहीं हो पा रहा है, जबकि यह समय की मांग है कि प्लास्टिक की थैलियों के स्थान पर कपास और जूट के बने थैलों का उपयोग किया जाए। निजी और सरकारी कार्यक्रमों में प्लास्टिक की जगह मिट्टी-धातु के बर्तन प्रयोग में लाये जाएं। पॉलीथिन पर प्रतिबंध के बावजूद अधिकांश लोग इसका उपयोग कर कहीं भी फेंक देते हैं, जबकि वे इस हकीकत से वाकिफ हैं कि प्लास्टिक इन्सानों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी अत्यंत हानिकारक है। पिछले दिनों फरीदाबाद में एक सांड के पेट से ८० किलो पॉलीथिन, पानी की बोतलें और ढक्कन आदि का विषैला कचरा पशु चिकित्सकों ने निकाला। गाय जिसे हम माता का दर्जा देते हैं, उसके पेट में भी यही कचरा समाता रहता है और हम गाय की सुरक्षा के नाम पर इन्सानों की गर्दनें उडाने में नहीं सकुचाते... घबराते। भारत में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पेड-पौधों की अंधाधुंध कटाई पर अंकुश लगाना अत्यंत जरूरी है। अपने देश में ऐसे लोग भी हैं, जो समाज को बदलने के लिए अनुकरणीय पहल कर रहे हैं।
खरगौन जिले के ब‹डवाह ग्राम में एक जागरूक बेटे ने अपने प्रकृति प्रेमी पिता की पगडी रस्म पर वर्षों से चली आ रही परंपरा से हटकर चलते हुए बर्तन की जगह नीम, सीताफल, आम, बिल्वपत्र, आंवला सहित ३०० पौधे मंगवाकर स्वजनों को न सिर्फ बांटे, बल्कि उन्हें रोपकर बडा करने का भी आग्रह किया। बेटा अपने पर्यावरण प्रेमी पिता के पेड-पौधों के प्रति असीम लगाव से बचपन से ही बेहद प्रभावित रहा था। दमोह में अपने २५ साल के जवान बेटे की सडक हादसे में मौत के बाद उसकी तेरहवीं में शिक्षक पिता ने ५१ युवाओं को हेलमेट बांटे और उन्हें अपनी जान की रक्षा के लिए यह संदेश दिया कि कभी भी अंधाधुंध बाइक न चलाएं और हेलमेट जरूर पहनें। २० नवंबर २०१९ की रात थी। रिहाइशी इलाके में चल रही फैक्टरियां काला जहरीला धुआं उगल रही थीं। रात के दस बजे थे। तभी शिक्षक के इकलौते बेटे की बाइक एक भैंसे से टकरा गई थी, जिससे मौके पर ही उसकी दर्दनाक मौत हो गई थी। उसका शव रात भर सडक पर ही पडा रहा था। उम्रदराज शिक्षक की कांपती आवाज़ और दुख भरे गले से निकले इन शब्दों ने हर किसी की आंखें नम कर दीं, "वायु प्रदूषण और हेलमेट न लगाने की नादानी की वजह से मेरा जवान बेटा इस दुनिया से चला गया। मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि किसी को भी कभी इस तरह से अपना बच्चा न खोना पडे।" उन्होंने हेलमेट बांटने के साथ-साथ बच्चों के माता-पिता से भी अपील की, कि कृपया वायुमंडल को विषाक्त होने से बचाएं। जब भी वे अपने बच्चों को बाइक खरीदकर दें तो उन्हें हेलमेट भी दें और उसे लगाने के लिए भी बाध्य करें।

Thursday, December 19, 2019

ऊपर वाले के भरोसे

देश की राजधानी दिल्ली में रिहायशी क्षेत्र की तंग गली में चलने वाली एक बैग फैक्टरी में हुए भीषण अग्निकांड में पांच नाबालिग सहित ४३ श्रमिकों की जलने, झुलसने और दम घुटने से मौत हो गई। लगभग पच्चीस लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। मरने और घायल होने वालों में से अधिकांश श्रमिक उत्तरप्रदेश, बिहार से कमाने-खाने आये थे, लेकिन उन्हें खाली हाथ कफन में अपने-अपने गांव-घर लौटना पडा। दिल्ली ने उनका सबकुछ छीन लिया। इस हादसे ने एक बार फिर से उस कुंभकर्णी और रिश्वतखोर प्रशासन की पोल खोल दी, जो चंद सिक्कों में बिक कर अपनी आंखें मूंद लेता है, जिससे अवैध धंधेबाजों की बन आती है। वे लाखों-करोडों में खेलते हैं और खून-पसीना बहाने वाले मजदूरों के हिस्से में सिर्फ मौत आती है। जिस फैक्टरी में आग लगी वह चार मंजिला इमारत में अवैध रूप से चलायी जा रही थी। सैकडों मजदूरों के लिए एक ही सीढी थी। इस इमारत में आग बुझाने के उपकरण नदारद थे। फैक्टरी को अग्निशामक विभाग की तरफ से एनओसी जारी नहीं थी। अन्य किसी विभाग से भी कोई लाइसेंस नहीं लिया गया था। इसके बावजूद धडल्ले से फैक्टरी चल रही थी। रात में सोते समय श्रमिक नीचे और छत का दरवाजा बंद कर लेते थे। इसलिए जब आग लगी तो धुआं बाहर नहीं निकल पा रहा था और अधिकांश मजदूर दम घुटने से चल बसे। फायर कर्मियों को भी आग बुझाने में भारी दिक्कतों का सामना करना प‹डा। आवासीय इलाके में जहां हजारों लोग रहते हैं, वहां पर इस फैक्टरी का चलना और बिजली विभाग से कनेक्शन का मिलना यही दर्शाता है कि इसे बेईमानी और भ्रष्टाचार की नींव पर खडा किया गया था। २५ वर्षीय मुस्तफा उन चंद खुशकिस्मत लोगों में हैं, जो काफी जद्दोजहद के बाद मौत की फैक्टरी से बच निकले। उस भयावह आग और दमघोटू धुएं के मंजर को वह कभी नहीं भूल पाएंगे, जिसने उन्हें कंपकंपा कर रख दिया था। सुबह चार बजकर दस मिनट पर बेतहाशा शोर सुनकर वे हडबडा कर उठे। हर तरफ धुआं ही धुआं था। लोग शोर मचा रहे थे कि आग लग गई है। इस बीच कुछ लोग बेहोश होकर गिरने लगे। मुस्तफा अपनी जान बचाने के लिए भागे। एक तो घना अंधेरा और फिर नीचे जाने के लिए एक ही सीढी...। हडबडी में उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कोई रास्ता सूझता इससे पहले ही वे बेहोश हो गये। जब होश आया, तो खुद को अस्पताल में पाया।
फैक्टरी में आग का तांडव चरम पर पहुंचने के बाद वहां का कैसा मंजर था, आग में फंसे मजदूरों की कैसी हालत थी, वे किस तरह से छटपटा रहे थे, जब मौत उन्हें दबोचने को खडी थी तब वे अपने घर-परिवार को लेकर कितने चिन्तित थे, इन सवालों का जवाब जानने के लिए भीषण आग की लपटों से घिरे मुशर्रफ नामक युवक का तडके करीब पांच बजे अपने दोस्त मोनू को किया गया कॉल काबिलेगौर है : हैलो मोनू, भैया आज सबकुछ खत्म होने वाला है। आग लग गई है। आ जाइयो करोलबाग। टाइम कम है और भागने का कोई रास्ता नहीं है। खत्म हुआ भैया मैं तो, मेरे घर का ध्यान रखना। अब तो सांस भी नहीं ली जा रही है।
मोनू - आग कैसे लग गई?
मुशर्रफ - पता नहीं कैसे, सारे लोग दहाड रहे हैं। अब कुछ नहीं हो सकता। मेरे घर का ध्यान रखना भाई।
मोनू - फायर ब्रिगेड को तो फोन करो।
मुशर्रफ - कुछ नहीं हो रहा अब तो।
मोनू - पानी वाले को तो कॉल करो।
मुशर्रफ - कुछ नहीं हो सकता है, लेकिन मेरे घर का ध्यान रखना। किसी को एकदम से नहीं बताना। पहले बडों को बताना, मेरे परिवार को लेने पहुंच जाना। तुझे छोडकर और किसी पर भरोसा नहीं...।
सोचें तो दिल बैठने लगता है कि एक ही परिवार के आठ लोग अग्नि की भेंट चढ गए। उनके परिजनों के समक्ष यह परेशानी खडी हो गई कि आखिर वह इतने शव लेकर अपने गांव कैसे जाएं। उनके पास एम्बूलेंस की व्यवस्था के लिए पैसे ही नहीं थे।
हादसे में मारे गये १४ साल के रशीद आलम की मौत की खबर सुनकर उसकी बुआ को हार्ट अटैक आया और उसकी भी मौत हो गई। एक बहन अपने भाई का शव लेने के लिए अपनी मां के साथ सहरसा बिहार से दिल्ली पहुंची थी। दोनों का रो-रोकर बुरा हाल था। अथाह गम में डूबी मां का लाडला बेटा रविवार को घर आने वाला था, लेकिन उससे पहले उसकी मौत की खबर आ गई। उसकी बहन का तीन महीने बाद निकाह होने वाला था। इसलिए वह एक माह से निकाह की तैयारियों में जुटा था। रात-दिन खून-पसीना बहाकर उसने जो रुपये इकट्ठे किये थे, उन्हें लेकर वह रविवार को दिल्ली से सहरसा के लिए रवाना होने वाला था। सहरसा का ही रहने वाला मोहम्मद हुसैन भी उन ४३ बदनसीबों में शामिल था, जिन्होंने आग में जलकर तडप-तडप कर अपनी जान गंवाई। दो माह पहले ही उसकी मां एक सडक हादसे में चल बसी थी। इसके बाद रोजगार की तलाश में वह दिल्ली आया। काफी दिन तक बहन के घर में रहकर काम की तलाश में भटकता रहा। इस हादसे से मात्र तीन दिन पहले ही उसे इस मौत की फैक्टरी में नौकरी मिली थी। अपने इकलौते बेटे का शव लेने पहुंचे गमगीन पिता का कहना था कि मैं अब कैसे जीऊंगा। मेरा तो बुढापे का सहारा ही छिन गया। दिल्ली में पहले भी इस तरह के कई अग्निकाण्ड हो चुके हैं। हर मौत काण्ड के बाद एक-दूसरे पर दोष मढने की राजनीति के सिवाय कुछ नहीं किया गया।
मेरे पाठक मित्रों को कुछ माह पूर्व सूरत में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग की तो याद होगी, जिसमें बीस छात्र-छात्राओं की दर्दनाक मौत हो गई थी। कई बच्चों को अपनी जान बचाने के लिए तीसरी-चौथी मंजिल से कूदना पडा था। घायल बच्चों को इलाज के लिए कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पडा था। सूरत के कोचिंग सेंटर में हुआ यह हादसा कोई नया नहीं था। इससे पहले भी स्कूलों और कोचिंग सेंटर में कई दुर्घटनाएं हो चुकी थीं। कई मासूम छात्र-छात्राओं की मौत के बाद चिल्ला-चिल्ला कर कहा गया था कि लापरवाही और सुरक्षा के साधनों के अभाव के कारण यह मौतें हुईं। होना तो यह चाहिए था हादसे से ही सबक लेकर तुरंत सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता कर दी जाती, लेकिन हम तो हमेशा यही मानकर चलते हैं कि हमारे साथ कभी कोई हादसा नहीं होगा, जिनके साथ हुआ वे बदनसीब थे। हम तो बहुत नसीब वाले हैं। ऊपरवाला हमेशा हम पर मेहरबान रहेगा। यह पंक्तियां लिखते-लिखते एकाएक मुझे उस हजारों लोगों की भीड की याद हो आयी है, जो अमृतसर में रेल पटरी पर खडे होकर रावण दहन देखने में मग्न थी। सभी को पता था कि यह व्यस्त रेलपथ है, जहां से अनवरत गाडियों का आना-जाना लगा रहता है। नेताओं के भाषण और रावण दहन के उत्साह और शोर-शराबे के चलते उन्हें कुछ भी याद नहीं रहा और इसी दौरान अपने तय समय पर ११० किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से दौडती ट्रेन भीड को जब रौंदती हुई निकल गई, तो हाहाकार मच गया। घोर लापरवाही, मनमानी और अनुशासनहीनता के कारण ६१ हंसती-खेलती इन्सानी जिन्दगियां मौत की भेंट चढ गईं, लेकिन उनकी दर्दनाक मौत की जिम्मेदारी लेने को कोई भी तैयार नहीं था।

Thursday, December 12, 2019

अब इन्हें कौन सुधारे?

क्या दुराचारी, व्याभिचारी और किस्म-किस्म के बदमाश अखबार नहीं पढते। न्यूज चैनल नहीं देखते। क्या यह मान लें कि यह सब हद दर्जे के अनपढ और गंवार होते हैं, जिनका खबरों से कोई लेना-देना नहीं होता। जिनके लिए इंसानी रिश्ते कोई मायने नहीं रखते, लेकिन उनके बारे में क्या कहा और सोचा जाए, जो विद्वान हैं, स्कूल, कॉलेजों में पढाते हैं फिर भी दूसरों की मां-बहन और बेटियों पर जुल्म ढाते हैं तथा उनके साथ दुराचार करने में ज़रा भी नहीं लज्जाते हैं। आम लोगों के गुस्से का भी उन पर कोई असर नहीं होता। बेखौफ होकर मासूम बच्चियों पर बलात्कार करते हैं और फिर घिनौने दुराचार के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड भी कर देते हैं। हैदराबाद में पुलिसिया एनकाउंटर में पशु चिकित्सक डॉ. प्रियंका के बलात्कारियों और हत्यारों को ६ दिसंबर की सुबह ढेर किये जाने पर पूरे देश ने खुशियां मनाई। सभी के मन में कहीं न कहीं यह विश्वास बलवति हुआ कि अब तो बलात्कारों में कमी आएगी। कोई भी बदमाश महिलाओं पर बुरी नजर डालने से पहले सौ बार सोचेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। देशवासी अभी हैदराबाद और उन्नाव की दिल दहलाने वाली खबरों से पूरी तरह से उबरे भी नहीं थे कि उन्हें ७ दिसंबर के अखबार और बलात्कारों की खबरों से भरे नज़र आए। फिर तो जैसे उनकी उम्मीदों पर पानी ही फिर गया। बलात्कारियों ने एनकाउंटर के उत्साह को ठंडा कर दिया।
दरभंगा में दो मासूम बच्चियां ऑटोरिक्शा के पास खेल रही थीं। एक की उम्र तीन साल तो दूसरी की पांच साल। खेलते-खेलते दोनों ऑटो में चढ गईं। ऑटो चालक के अंदर का शैतान जाग उठा। उसने बच्चियों को घुमाने का प्रलोभन दिया तो वे खुशी के मारे नाचने लगीं। गरीब मां-बाप की बेटियों को मुफ्त में ऑटो की सवारी और घूमने का जो मौका मिल रहा था। ऑटो चालक ने दोनों को थोडी देर तक इधर-उधर घुमाने के पश्चात तीन वर्षीय बच्ची को रास्ते में उतार दिया और पांच वर्षीय बच्ची को सुनसान जगह पर ले जाकर उसपर बडी बर्बरता के साथ बलात्कार कर लहुलूहान कर दिया। बच्ची को बेहोशी की हालत में जब अस्पताल में भर्ती कराया गया तो डॉक्टरों का खून खौल उठा। उनका बस चलता तो वे बलात्कारी की गर्दन उडा देते। अश्रूपुरित आंखों से अपनी बिटिया की दुर्दशा से रूबरू होते माता-पिता तो कुछ भी बोलने की स्थिति में ही नहीं थे। वे बस यही फरियाद कर रहे थे कि उनकी बच्ची बच जाए।
बिहार के शहर सुपौल में पांच दिसंबर की रात ९ बजे एक नाबालिग लडकी अपने घर के पास पिता के आने की राह देख रही थी तभी उसकी पहचान के एक शिक्षक सहित दो युवक उसके पास आए और पिता से मिलवाने के बहाने निकट स्थित एक कमरे में ले गए और वहां रात भर उसपर बलात्कार करते रहे। देश के प्रदेश ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित एक सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा की छात्रा कई महीनों तक एक नराधम की अंधी वासना का खिलौना बनी रही। घोर आश्चर्य भरा सच यह भी है कि इस कुकर्मी की पत्नी ही स्कूल की प्रधान अध्यापिका है, जिसने अंधी और बहरी बनकर अपने शैतान पति का पूरा साथ देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। दुराचारी लडकी को स्टाफ क्वार्टर में बुलाता था और बेखौफ होकर बच्ची का यौन शोषण करता था। लडकी के तीन माह की गर्भवती होने का पता चलते ही लोग भडक गये। विद्वान शिक्षिका के अय्याश पति का मुंह काला कर गधे पर बिठा पूरे शहर में घुमाया गया। छत्तीसगढ के रायगढ जिले के लैलूंगा नामक गांव में पुलिस ने पंद्रह वर्षीय लडके को एक छह वर्ष की बच्ची के घर में घुसकर बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया। यह लडका बालिका का पडोसी है। उसने जब देखा कि घर में और कोई नहीं है, बच्ची अकेली है तो वह भूखे जानवर की तरह उस पर टूट पडा।
महाराष्ट्र की नारंगी नगरी नागपुर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम लिंगा में ८ दिसंबर की दोपहर एक खेत में पांच साल की बालिका का शव मिलने से लोग गुस्से से तमतमाते हुए सडक पर उतर आए। यह बच्ची शुक्रवार ६ दिसंबर की शाम पांच बजे से गायब थी। ८ दिसंबर की सुबह गहन खोज के दौरान ११ बजे सुबह एक खेत में उसका शव अस्तव्यस्त हालत में मिला। उसके मुंह में कपडा और लकडी ठुंसी हुई थी। सिर पर पत्थर मारने के निशान थे। पुलिस ने पुख्ता संदेह के आधार पर खेत में काम करने वाले नौकर को गिरफ्तार किया। उसने स्वीकारा कि पहले तो उसने बालिका से दुष्कर्म किया, फिर सिर कुचलकर उसकी हत्या कर दी। बालिका की नृशंस हत्या के विरोध में सडक पर उतरी भीड हैदराबाद की तर्ज पर हत्यारे का एनकाउंटर कर उसे मौत के घाट उतारने की मांग कर रही थी। भीड में शामिल स्त्री, पुरुष और बच्चों में कोई चेहरा ऐसा नहीं था, जिसके दिल में हत्यारे के प्रति हमदर्दी हो। सभी उसकी इस दुनिया से फौरन विदायी चाहते थे। महाराष्ट्र में ही स्थित गढचिरोली के एक निजी अस्पताल में कार्यरत युवा नर्स ड्यूटी खत्म होने के बाद अपने गांव जाने के लिए बस अड्डे पर खडी थी। उसी दौरान उसका एक परिचित वहां बाइक लेकर पहुंचा। युवती ने उससे अनुरोध किया कि वह बाइक से उसे गांव छोड दे। युवक उसे लेकर गांव की ओर निकला, लेकिन बीच रास्ते में उसकी नीयत खराब हो गई। वह युवती को जबरन खेत में ले गया, जहां उससे बलात्कार करने के बाद उसका गला भी दबा दिया। युवती बेहोश हो गई। बलात्कारी को यकीन हो गया कि वह मर गई है। सबूत मिटाने के लिए उसने युवती के मोबाइल और अन्य सामान को बाइक की डिक्की में डाला और वहां से भाग गया। कई घण्टों तक खेत में बेहोश रहने के बाद जब उसे होश आया तो उसने कुछ लोगों की सहायता से थाने पहुंच कर शिकायत दर्ज करवाई। कर्नाटक के कुलबर्गी जिले में नौ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी गई। उत्तरप्रदेश के महाराज गंज के निकट स्थित एक गांव में घर में शौचालय नहीं होने के कारण एक २३ वर्षीय युवती सुबह छह बजे शौच के लिए घर से निकली तो वापस नहीं लौटी। परिजनों ने ढूंढना शुरू किया। इस दौरान पास में बच्चे गेंद से खेल रहे थे। उनकी गेंद खेत में चली गई। बच्चे गेंद को ढूंढते हुए पहुंचे तो वहां गन्ने के खेत में युवती का शव देख शोर मचाया। यह तो चंद खबरें हैं, जो अखबारों में छपीं और हमारे पढने में आईं। पूरे देश में न जाने ऐसी कितनी घटनाएं हुई होंगी। वैसे भी हर बलात्कार की खबर अखबार में प्रकाशित नहीं होती। आधी से ज्यादा बलात्कार की शिकायतों की रिपोर्ट तो थाने में ही दर्ज नहीं हो पाती।

Thursday, December 5, 2019

जंग लडता बचपन

बचपन गुम हो रहा है। बच्चे चिन्तित हैं। उन पर शोषण की तलवारें लटक रही हैं। वे समय से पहले बडे हो रहे हैं। अपने अधिकारों को जानने लगे हैं। अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए खुद सामने आने लगे हैं। इस जद्दोजहद में कहीं अच्छा तो कहीं बुरा हो रहा है। भिवंडी में एक १५ वर्षीय लडकी ने पिता की डांट से बचने के लिए जो रास्ता अपनाया उससे लोग स्तब्ध रह गये। पुलिस की नींद उड गई। नाक में दम हो गया। १५ नवंबर २०१९ की सुबह इस लडकी के हाथ से दूध गिर गया था। उसके पिता अत्यंत गुस्सैल हैं। उसे डर था कि स्कूल से वापस आने पर उसे डांट प‹डेगी। छोटी-मोटी भूल या कोई नुकसान होने पर उसके पिता का पारा चढ जाता है और आसमान सिर पर उठा लेते हैं। मां बीच-बचाव के लिए आती है तो उसकी भी धुनाई हो जाती है। इसीलिए वह स्कूल जाने के बजाय ट्रेन पकडकर आसनगांव चली गई। जब वह निर्धारित समय पर घर नहीं लौटी तो माता-पिता घबरा गये। उन्हें किसी अनहोनी का भय सताने लगा। लडकी एक दिन बाद घर लौट आई, लेकिन उसने जो आपबीती बतायी उसे सुन अभिभावक तुरंत पुलिस स्टेशन पहुंच गये। लडकी ने अपनी शिकायत में कहा कि वह स्कूल जाने के लिए सवा छह बजे घर से निकली थी। रास्ते में चार युवकों ने उसे जबरन कार में बिठाया और आंख में पट्टी बांधकर किसी पुरानी बंद पडी फैक्टरी जैसी जगह पर ले गए। वहां पर उसके ही जैसी कई और लडकियां थीं। बदमाशों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। बदमाश जब दुष्कर्म कर चले गये तो वह दूसरी लडकियों के साथ वहां से भाग निकली। पुलिस के लिए वाकई यह बहुत गंभीर मामला था, लेकिन उसने जब गहराई से छानबीन की तो ऐसा कोई भी सबूत नहीं मिला, जो लडकी की दुष्कर्म की शिकायत को साबित करता। इस बीच सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया ने लडकी के अपहरण और बलात्कार को लेकर हंगामा बरपा कर दिया। पुलिस पर आरोप लगाये जाने लगे कि वह नाबालिग की यौन उत्पीडन की शिकायत पर लीपापोती कर रही है। इतने गंभीर मामले के सच को सामने लाने की बजाय सुस्ती का दामन थामे है। इसके बाद पुलिस ने महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं और अभिभावकों के सामने फिर से लडकी से पूछताछ की तो उसने कबूल किया कि न तो उसका अपहरण हुआ था और ना ही बलात्कार। उसने तो बस पिता के गुस्से से बचने और उनका ध्यान भटकाने के लिए यह कहानी गढी और सुना दी...।
पिता के गुस्सैल स्वभाव के कारण घर में होने वाली रोज-रोज की कलह से परेशान एक १६ साल की लडकी सीधे कोर्ट पहुंच गई। भोपाल की इस बेटी ने स्कूल से सीधे जिला विधिक प्राधिकरण में पहुंचकर यहां के जज आशुतोष मिश्रा से शिकायत कर अपना कष्ट और दर्द बयां करते हुए कहा, 'सर मैं अपने घर के झगडे के कारण बेहद डिप्रेशन में जी रही हूं। कई बार मन करता है कि आत्महत्या कर लूं। कृपया आप मेरी मदद करें।' जज के लिए यह बडा अनोखा मामला था। बेटियां ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचती हैं। यकीनन यह एक गंभीर मामला था। जज महोदय ने कुछ देर तक विचार करने के पश्चात केस के सकारात्मक निपटारे का निर्णय लिया। सबसे पहले घबराई बच्ची की काउंसलिंग की गई। उसकी चिंता और समस्या को गहराई से जाना गया। उसके पश्चात बेटी को माता-पिता के समक्ष बिठाकर जज महोदय ने कहा कि अब तुम ही बेखौफ होकर अपना फैसला सुनाओ। बेटी ने जो फैसला सुनाया उसे सुनकर कोर्ट में मौजूद माता-पिता के साथ-साथ दूसरों की भी आंखें छलक आई। बेटी ने आदेश में कहा कि माता-पिता आपस में कभी विवाद नहीं करेंगे। पिता को नियमित रूप से स्कूल की फीस भरनी होगी। वे रोज-रोज खाने की थाली नहीं फेकेंगे। उन्हें अपने गुस्से पर पूरी तरह से नियंत्रण करना होगा। राशन समय पर घर पर लाकर देंगे। बच्चों की हर जरूरत को पूरा करते हुए मां के खर्च के लिए कुछ रुपये देंगे। पिता ने भी स्वीकार किया कि वे क्रोधी स्वभाव के हैं। अक्सर तनाव में रहते हैं, जिसकी वजह से परिवार में अशांति बनी रहती है, लेकिन अब वे ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे, जिसकी वजह से उनकी पत्नी और बच्चों को तकलीफ हो। इस जागरूक बेटी ने विभिन्न समाचार पत्रों में जिला विधिक प्राधिकरण के बारे में काफी पढा था, इसलिए वह अपनी शिकायत दर्ज करवाने यहां दौडी चली आई और जज ने अनोखी पहल करते हुए उसके फैसले को आदेश के रूप में जारी कर दिया।
देश के आदिवासी इलाकों के बच्चों में भी परिवर्तन आ रहा है। वे अपने अधिकार के प्रति सचेत हो रहे हैं। मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ में आदिवासी बच्चों ने विभिन्न समस्याओं के निदान के लिए हाथ-पैर मारने शुरू कर दिये हैं। अपनी और गांव की समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासनिक अधिकारी से लेकर सरपंच तक जाने में नहीं हिचकते। वे इस दाग को धोना चाहते हैं कि आदिवासी अनपढ के अनपढ रहना चाहते हैं। उनमें जागृति नहीं आ सकती। वे अपने बुजुर्गों की तरह दारू में मस्त और निठल्ले नहीं बने रहना चाहते। यह बच्चे उन शैतानों पर आक्रमण करने से भी नहीं घबराते जो उनकी मां-बहनों पर बुरी नज़र रखते हैं। आदिवासी इलाकों में बहन-बेटियां भी सतर्कता की राह पर चलने लगी हैं। वे उन वहशियों को पहचानने में किंचित भी देरी नहीं लगातीं जिनके लिए आदिवासी महिलाएं भोग की वस्तु हैं। यह सच भी सर्वज्ञात है कि आदिवासियों में परिवार चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। वे इस परिपाटी को बदलकर सभी के जीवन को खुशहाल बनाना चाहते हैं। उनमें संवेदनशीलता भी कूट-कूट कर भरी है। धीरे-धीरे कई गांव में स्पष्ट बदलाव नज़र आ रहा है। इन गांव में कुओं के नहीं होने के कारण पानी की बहुत समस्या थी। अब गांव में कुएं बन गये हैं और पानी की समस्या से छुटकारा मिल रहा है। गांव-गांव में मांदल टोली बनायी गई है, जिसमें किशोरों को शामिल किया गया है। वे आपस में बैठकें करते हैं और लाइब्रेरी, पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल जैसी जरूरतों के साथ-साथ बाल विवाह जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं। उनकी कोशिशें रंग ला रही हैं।