Thursday, July 2, 2020

अपनी-अपनी भूख

राजधानी दिल्ली के एक छोर पर घनी आबादी से मीलों दूर स्थित 'जलतरंग फार्महाऊस' में दोनों पुराने मित्र रसरंजन में लीन थे। दोनों ने वर्षों की मेहनत से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो जगह बनायी है, उससे ईर्ष्या  करने वाले ढेरों हैं। रविन्द्र और जलतरंग नाम है उनका। जलतरंग ने कुछ साल पूर्व पांच करोड में फार्महाऊस खरीदा था। जलतरंग और रविन्द्र का जाम से जाम टकराने के लिए फार्महाऊस में आना-जाना लगा रहता है। रविन्द्र ने भी गुरुग्राम के निकट कई एकड में फैले फार्महाऊस को खरीदने का सौदा कर लिया है। दोनों अलग-अलग नामी-गिरामी न्यूज चैनल के प्रतिष्ठित एंकर हैं, उन्हें एक-दूसरे का कट्टर विरोधी माना जाता है। एक मोदी भक्त है तो दूसरा राहुल और सोनिया का। उनके प्रशंसक सोच भी नहीं सकते कि यह दोनों हस्तियां कभी एक साथ बैठती-खाती-पीती तथा हर तरह की मस्ती में तैरती-डूबती होंगी। दोनों ने जब दो-दो पैग हलक में उतार लिये तब उनकी बातचीत प्रारंभ हुई। हमेशा की तरह शुरुआत की जलतरंग ने, "मित्र, अब तो महंगी से महंगी स्कॉच का भी असर नहीं होता। वो भी क्या दिन थे, जब मुफ्त की मिलती थी और हम नशे में टुन्न होकर सारी दीन-दुनिया को भूल जाते थे। देश की सत्ता बदलने के बाद सब गुड गोबर हो गया है। एक हमारे वो प्रधानमंत्री थे, जो हर विदेश यात्रा में हम जैसे धाकड एंकरों, संपादकों को बडे आदर- सम्मान के साथ अपने साथ ले जाते थे। हवाई जहाज में हंसते मुस्कराते हुए खुलकर बातें होती थीं। मनमोहक प्रधानमंत्री भले ही बोलते कम थे, लेकिन अहंकार से कोसों दूर थे। उनके साथ की गई विदेश यात्राओं को मीडिया वाले आज भी याद कर गदगद हो जाते हैं। यात्रा के दौरान शराब-कबाब का तो भरपूर आनंद मिलता ही था। लौटते समय भी शराब की बोतलों और महंगे तोहफों से लाद दिया जाता था। एक यह पीएम हैं, जिन्होंने विदेश यात्राओं का रिकॉर्ड ही तोड दिया है, लेकिन जाते अकेले हैं। इन्हें तो मीडिया से ही चिढ है। यह महापुरूष तो धांसू पत्रकारों से मिलना तथा प्रेस कॉफ्रेंस करना तक अपना अपमान समझते हैं। ऐसे अकडबाज सूखे किस्म के शासक की लोकप्रियता का राज़ अपनी तो समझ में नहीं आता...?"
"मित्र तुम अपने दर्द का इलाज क्यों नहीं करते? पिछली बार भी कुछ ऐसी ही बातों में अपना कीमती वक्त बिता दिया था हमने। क्यों न कोई नयी चर्चा छेडी जाए...?"
"जिस पर बीतती है वही अपने 'कष्ट' को समझता है। मेरी समझ में नहीं आता कि देश के पीएम के खिलाफ कुछ भी कहने, बोलने से तुम और तुम्हारे जैसे तमाम अंध भक्त आग बबूला क्यों हो जाते हो! सोशल मीडिया में जहां-तहां फैली उनकी भक्त मंडली गाली-गलौच और धमकियां देने पर उतर आती है। मेरा तो खून ही खौल उठता है। इच्छा होती है एक-एक की गर्दन दबोचूं और कुत्ते की मौत मार डालूं।'
"देखो मित्र, बुरी तरह से आहत करने वाली प्रतिक्रियाओं के लिए आप भी कम दोषी नहीं। जब देखो तब सरकार और असरदार के पीछे पडे रहते हो। आपने कुछ दिन पहले सोशल मीडिया में यह शिकायत दर्ज करायी थी कि यह अलबेला प्रधानमंत्री मेरे जैसे तीखे सवाल करने वाले एंकर से खौफ खाता है और अक्षय कुमार जैसे फिल्मी 'जोकरों' को साक्षात्कार देने के लिए खासतौर पर अपने निवास पर आमंत्रित करता है। आपके लिखने भर की देरी थी कि लाखों लोगों ने आपकी धज्जियां उडा कर रख दी थीं। किसी ने आपको पिछली सरकार का गुलाम तो किसी ने भ्रष्टाचारी, बिकाऊ तथा विदेशी शराब और महंगे तोहफों का लालची कहा था। कई ने तो जबरन भाव दिये जाने की चाह रखने वाले बददिमाग, सनकी, मनोरोगी एंकर की पदवी देते हुए थू...थू की थी! यार, अब तो कम-अज़-कम एकतरफा चलना और सोचना बंद करो। यह रट लगाना छोडो कि आपके विरोध में बोलने, लिखने वाले किसी के अंधभक्त हैं। सच तो यह है कि आम जनता को भी सच की समझ है। अगर ऐसा नहीं होता तो मेरी भी ऐसी-तैसी नहीं की जाती। आपको उनके और मुझे इनके चाटूकारों में नहीं गिना जाता। सच को स्वीकारो और मस्त रहो...बंधु। मुझे अब तुम्हारी हालत देखकर चिन्ता सताने लगी है। चौबीस घण्टे आज के राजा को कोसने और भूतपूर्व महाराजा और महारानी की यशगाथा का बखान कर खिल्ली उडवाते और गालियां खाते रहते हो। पहले की तरह न तो चुटकुले सुनाते हो और न ही हंसते-हंसाते हो। बडे डरे-डरे मानसिक रोगी से लगते हो...। देश में और भी कई मीडिया दिग्गज हैं, न्यूज चैनलों के एंकर हैं, उनपर तो कभी चीखने-चिल्लाने का भूत सवार नहीं रहता। निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ बडी सहजता से अपनी ड्यूटी निभाते हैं। ऑफिस की समस्याएं घर और दोस्तों के बीच नहीं लाते। उन्हें तो धमकियां और गालियां नहीं मिलतीं?
अब जलतरंग की बारी थी, "अब मेरी बात भी ध्यान से सुनो : मेरे लिए पत्रकारिता कोई नौकरी नहीं, जो ऑफिस से निकलते ही अपने मिशन और धर्म को भुला दूं। जिन बडी-बडी बातें करने वाले मक्कारों से देश नहीं संभल रहा, महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और किस्म-किस्म के अपराधों पर काबू पाने का दम नहीं उन्हें सत्ता से बाहर करके ही मैं चैन की नींद सो पाऊंगा। तुम्हें इनकी आरती गानी है, तो गाते रहो। मुझे तो देशवासियों को जगाकर क्रांति लानी ही लानी हैं।" यह कहते ही छह-सात पैग चढा चुका जलतरंग ऐसा लुढका कि उसका प्रिय मित्र नशे में धुत 'क्रांतिदूत' को होश में लाने की विभिन्न कोशियों में लग चुका था..., लेकिन होश तो वापस लौटने को राजी ही नहीं थे।
इस नशे ने पता नहीं कितने शरीफों की शराफत छीन ली है। दो दिन पहले एक लडकी को सोशल मीडिया पर भद्दे, भ्रामक और भडकाऊ वीडियो तथा पोस्ट डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। उसने पहले तो प्रधानमंत्री के प्रति बेहूदा बातें कहीं और खूब चर्चित हुई। कई दिनों तक उसका यह तमाशा सोशल मीडिया पर छाया रहा। फिर अचानक उसने राहुल और प्रियंका गांधी को अपमानित करने वाली शब्दावली भरे वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाकर अपने छिछोरेपन का जो सबूत पेश किया, उससे कई लोग भडक उठे। पुलिस में शिकायत की गयी। पुलिसिया पूछताछ में उसने बताया कि ऐसी हरकतें करने में उसे ब‹डा मज़ा आता है। हजारों लोगों के जो 'लाइक्स' और शानदार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, उनसे उसे लगता है कि वह भी किसी बडी हस्ती से कम नहीं...। पहले मोदी पर अच्छे लाइक्स मिले, जब उनमें कमी आयी तो वह राहुल, प्रियंका पर पिल पडी। विख्यात शायर निदा फ़ाज़ली ने यूं ही तो नहीं कहा, "हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जब भी किसी को देखना-कई बार देखना।"

Thursday, June 25, 2020

खुद के कातिल

कुछ वर्ष पूर्व जब आध्यात्मिक गुरु, राष्ट्र संत भैय्यू महाराज ने इंदौर स्थित अपने घर में खुद को गोली मारकर हमेशा-हमेशा के लिए मौत के मुंह में सुला दिया था, तब किसी ने ब‹डी सरल भाषा में यह पंक्तियां लिखी थीं,
"दिखायी नहीं देता, शामिल जरूर होता है
हर खुदकुशी करने वाले का, कोई न कोई कातिल जरूर होता है...।"

देश के हजारों लोगों की तरह मुझे भी भैय्यू महाराज की उस आत्महत्या की खबर ने स्तब्ध और विचलित किया था, जो देश का खासा जाना-पहचाना चेहरा थे। अपनी विभिन्न समस्याओं का समाधान जानने के इच्छुक आमजन उनके दरबार में पूरे यकीन के साथ पहुंचा करते थे। वे किसी का चेहरा देखकर उसका हाल जानने का दावा करते थे। उनके भक्तों, प्रशंसकों को भरपूर यकीन रहता था कि उनके 'गुरु' अपार शक्तियों के स्वामी हैं, दूरदर्शी हैं। वे उनकी पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं का हल निकालने में पूरी तरह से सक्षम हैं। बस उनके चरणों में जाने भर की देरी है कि हर कष्ट का नाश होना तय है...। हमेशा मुस्कराते रहने वाले भैय्यू महाराज का असली नाम उदय qसह देखमुख था। पांच फीट ११ इंच के ऊंचे पूरे इस आध्यात्मिक गुरु के पास करोडों की दौलत थी। देश के नामी उद्योगपतियों, मंत्रियों, नौकरशाहों, समाजसेवकों के बीच उठना-बैठना था। सभी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए जब-तब उनके पास दौडे चले आते थे। उपेक्षितों, कमजोरों, गरीबों के जीवन में बदलाव लाने के लिए मॉडलिंग जैसी चकाचौंध की दुनिया को त्यागने वाले भैय्यू महाराज के प्रति लाखों लोगों का सम्मान तब और बढ गया था, जब उन्होंने जाना कि इस आधुनिक संत ने महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पंढरपुर में रहने वाली सेक्स वर्करों के ५१ बच्चों को पिता के रूप में अपना नाम दिया है। हर किसी के दुख-दर्द को समझने और उनका निवारण करने के लिए जाने जानेवाले भैय्यू महाराज की आत्महत्या की जो वजहें गिनायी गयीं, वे बडी आम थीं। उन्हें भी वही बीमारी लग गई थी, जिसने कई साधु-संतों को कहीं का नहीं रखा। कुछ को तो जेल की हवा भी खानी पडी। वर्षों की कमायी इज्जत मिट्टी में मिलकर रह गई। जो महापुरुष लोगों को खुशहाल रहने के प्रवचन देता था। घर-परिवारों को एक सूत्र में बंधे रहने के उपाय सुझाना था। दुराचार और वासना के अंधड को मनुष्य का सबसे बडा शत्रु बतलाना था वही इसके समक्ष नतमस्तक था। एकदम लाचार था! उसकी आत्महत्या ने बंद किताब के सभी पन्ने खोल दिये।
'एम एस धोनी - द अनटोल्ड स्टोरी' फिल्म से अपनी पहचान बनाने वाले फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने तो जैसे पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उनकी मौत के गम में उनके दो प्रशंसकों ने तो अपनी जान भी दे दी। अपने फिल्मी किरदारों की बदौलत दर्शकों के दिलों में बसे सुशांत की आत्महत्या के लिए कुछ फिल्मी चेहरों को दोषी ठहराया जा रहा है। बिहार के लोग तो खासे गुस्से में हैं। इसमें दो मत नहीं कि सुशांत का भविष्य उज्जवल था। उन्हें बहुत दूर तक जाना था। उनके इरादे भी बुलंद थे। फिल्मों में अभिनय करने के साथ और भी बहुत कुछ करने की उनकी तमन्ना थी। पहले भी कई चमकते सितारों ने अचानक मौत को गले लगाकर इस दुनिया से विदायी ली, लेकिन सुशांत का जाना बडा सवाल बन गया। भैय्यू महाराज जहां संत और समाज सुधारक थे तो वहीं सुशांत एक जीवंत कलाकार थे। दोनों का भावुकता और संवेदनशीलता से भी गहरा नाता था। भैय्यू महाराज उस मौलिक सोच के धनी थे, जिसने कई लोगों पर गहरी छाप डाली थी। अभिनेता सुशांत ने अपनी फिल्मों में वही किया जो कहानी और किरदार के लिए जरूरी था। उन्हें दूसरों के लिखे डायलॉग बोलने पर तारीफें और तालियां मिलती रहीं। पर्दे के नायक को अपना असली हीरो मानने वाले लाखों प्रशंसकों को उनकी आत्महत्या ने रूला दिया। गौर से अगर देखा और समझा जाए तो भैय्यू महाराज और सुशांत की आत्महत्या में गजब की समानता दिखायी देती है। दोनों ने 'मंच' पर विचार और शाब्दिक कलाकारी के दम पर उन ऊंचाइयों को छुआ, जिसकी शायद उन्हें भी उम्मीद नहीं थी। दोनों का ही अभिनय तथा प्रेरित करने का अंदाज जबरदस्त था। इस खेल में अभिनेता सुशांत आध्यात्मिक गुरु भैय्यू महाराज पर भारी पडे। संत की मौत पर मातम मनाने वालो की संख्या जहां हजारों में थी, वहीं अभिनेता के चाहने और सहानुभूति रखने वालों की गिनती करना भी मुश्किल हो गया। इतिहास गवाह है कि आमजन कभी भी अपने नायक, प्रेरणास्त्रोत के टूटने-बिखरने-डगमगाने तथा हारने की कल्पना नहीं करते। उन्हें हमेशा यही लगता है कि उनके आदर्श आत्मबल के धनी हैं। वे ऐसे शक्तिमान हैं, जिन्हें हराना असंभव है।
जिन पर इतनी अटूट आस्था हो, दृढ विश्वास हो, उनकी खुदकुशी की खबर सुनकर उनके प्रशंसकों को ही नहीं, हर किसी को आघात तो लगता ही है। सच तो यह है कि दोनों कलाकारों ने अपने प्रशंसकों, भक्तों के उस भरोसे का कत्ल किया है, जिसे उन्होंने अपने-अपने तरीके से हासिल किया था। फिल्मी और धर्म-कर्म की दुनिया के धुरंधर अपनी असल जिन्दगी के सच का सामना ही नहीं कर पाये। इनसे तो वो कई आम लोग अच्छे हैं, जो तरह-तरह के संकटों, तनावों, साजिशों, अवसादों, बीमारियों, अवरोधों का सामना करते हुए भी जूझते और लडते रहते हैं। कभी हार नहीं मानते। यह नामी-गिरामी खुद के हत्यारे तो यह संदेश भी छोड जाते हैं कि जब तक परिस्थितियां आपके अनुकूल रहें तब तक छाती ताने रहो और हालात बिगडने पर खुद को गोली मारो या फांसी के फंदे पर झूल जाओ। इस अंदाज से खुद ही अपने कातिल बन जाओ कि जमाना मातम मनाता रहे। जिस-तिस पर उंगलियां उठती रहें। उनके जाने के बाद लोग उन्हें बुजदिल और कायर कहें, या कुछ और...! उनकी तो जिन्दगी अभिनय थी और मौत भी...।

Thursday, June 18, 2020

नई पहल की गूँज

कम उम्र के बच्चों के अपराधी बनने की खबरें इतनी आम हैं कि अब लोग देखने-पढने और जानने के बाद भी ज्यादा चिंतित नहीं होते। उनकी तरफ से कोई गंभीर प्रतिक्रिया भी नहीं आती। सडक पर भीख मांगते, चोरी-चक्कारी करते तथा कोई अन्य गंभीर अपराध करते बच्चे कौन हैं, किनके हैं, इससे भी वास्ता रखने की नहीं सोची जाती। उनके अपराध कर्म में लिप्त होने के कारणों को जानने की तो जैसे किसी के पास फुर्सत ही नहीं! बस कठोर से कठोर सज़ा देने की जल्दी है। देश की आर्थिक हालात बुरी तरह से लडखडा गये हैं। धनपशु सुधरने को तैयार नहीं। आज सुबह ही अखबार में यह खबर पढने में आयी है कि संतरानगरी नागपुर में शराब के अवैध कारोबार में बारह से सोलह वर्ष के किशोरों को झोंका जा चुका है। उनके अवैध शराब बिकवायी जा रही है। यह वो बच्चे हैं, जिनके माता-पिता इस दुनिया से चल बसे हैं या फिर उनकी आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय है। कई किशोर ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने परिवार की बदहाली में सुधार लाने के लिए मजबूरन इस गलत राह को चुना है तो कुछ ऐसे भी है, जिन्हें कम उम्र में परिवार की चिन्ता तथा आसानी से अच्छी कमाई होने का लालच इस ओर खींच लाया है।
नागपुर देश का एक ऐसा शहर हैं, जहां पर मुख्य सडकों, चौराहों के साथ-साथ गली-कूचों में भी देसी विदेशी शराब की दुकानें तथा बीयरबार हैं। यहां पर हमेशा भीड लगी रहती है। इस तेजी से बढते शहर में वर्षों से वैध से ज्यादा अवैध शराब बिक रही है। जानकारों का तो यहां तक कहना है कि इसकी पूरी खबर आबकारी विभाग को भी है तथा पुलिस वालों को भी। यहां तक कि नेता और समाज सेवक भी करोडों-अरबों के इस काले कारोबार से अनभिज्ञ नहीं हैं। दरअसल जिनके हाथों में अवैध शराब के कारोबार की कमान है वे कोई मामूली लोग नहीं हैं। अधिकांश वर्दी वालों को तो वे अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। बडे-बडे नेता भी उनके अपने ही हैं। कोई सजग शरीफ शहरी यदि थाने में शिकायत करने के लिए जाता है तो उसे बहुत जल्दी अपनी गलती का अहसास करा दिया जाता है। लठैत, गुंडे-बदमाश लाठी-डंडे, तमंचे, चाकू, तलवारें लेकर उसके घर पहुंच जाते हैं। यह आतंकी महामारी पूरे देश में फैली है। चिन्ता तो इस बात की है कि बच्चों को अपराधी, नशेडी और नकारा बनाने के षडयंत्रों को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह जो बच्चे भीख मांगते है, जेबें काटते हैं, ड्रग्स और शराब बेचते हैं उनका ताल्लुक कहीं न कहीं गरीबी और गरीब परिवारों से है। उनके मां बाप भी उन्हें अपराधकर्म करते देख जश्न नहीं मनाते। पीडा तो उन्हें भी होती ही है। पेट भरने की विवशता उन्हें खामोशी की जंजीरों से मुक्त नहीं होने देती। उनका जीवन भी यदि सीधी रेखा की तरह होता, विपत्तियों की भरमार नहीं होती तो वे कभी भी अपने छोटे-छोटे बच्चों को बडे-बडे अपराध करने के लिए खुला नहीं छोड देते। अपने ही देश में ऐसे गरीब माता-पिता हैं, जो अपने बच्चों को बेच देते हैं। चंद रुपयों के लालच में अपनी बच्चियां मानव तस्करों के हवाले कर देते हैं। कुछ दिन पहले मेरी मुलाकात १६ साल के एक ल‹डके से हुई। वह अपनी दस और आठ वर्ष की बहनों की पढाई का खर्चा निकालने के लिए महुआ की शराब बेचता है। उसे मालूम है कि इस काम की बदौलत उसका भविष्य नहीं संवारने वाला। उसकी बस यही चाहत है कि, बहनें पढ-लिख जाएं तो उसे लगेगा कि उसका जीवन सार्थक हो गया है। ऐसे न जाने कितने बच्चे हैं, जो छोटी उम्र में बडे दायित्व निभा रहे हैं। उन्हें अपनी नहीं, अपनों की चिन्ता है, लेकिन उनकी किन्हें चिन्ता है?
नालंदा जिले के इस्लामपुर थाना क्षेत्र के एक सोलह वर्षीय किशोर को बीते मार्च महीने में एक महिला का पर्स चुराने के आरोप में पक‹डा गया। पुलिस जांच में किशोर ने अपना गुनाह स्वीकार करने में देरी नहीं लगायी। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के प्रिंसिपल मजिस्ट्रेट मानवेंद्र मिश्र को जब पता चला कि किशोर के पिता की मृत्यु हो चुकी है। उसकी विधवा मां ने मानसिक अवसाद की शिकार होने की वजह से बिस्तर पकड लिया है। उसका एक चार-पांच वर्ष का छोटा भाई है। उसने कूडा बीनने का काम कर मां और भाई के खाने का जुगाड करने की भरसक कोशिश की, लेकिन निराशा और असफलता ही उसके हाथ लगी। बीमार, असहाय मां और मासूम छोटे भाई के खाने का इंतजाम न कर पाने के कारण उसने एक महिला का बैग चुराने की हिम्मत कर डाली। माननीय जज ने परिस्थितियों और अपराध के पीछे के असली कारण को देखते हुए जो फैसला सुनाया, पहले कभी जानने, पढने और सुनने में नहीं आया। उन्होंने न केवल किशोर को चोरी के आरोप से मुक्त किया, बल्कि सरकारी सहायता दिलाने का आदेश देते हुए राशन कार्ड बनाने, मां को विधवा पेंशन देने और किशोर को रोजगार मूलक प्रशिक्षण देने को कहा, जिससे आगे की जिन्दगी ठीक से गुजर सके। उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पडे। माननीय जज के इस अभूतपूर्व फैसले के बाद किशोर और उसके परिवार के लिए कपडे, राशन की व्यवस्था तो की ही गयी, नया घर बनाने के लिए २० हजार उपलब्ध भी करवाये गये। १० हजार रुपये ते स्वयं जज महोदय ने अपनी जेब से दिये। इतना ही नहीं उन्होंने थाने के प्रभारी को किशोर के परिवार की नियमित देखरेख और हालचाल जानने की जिम्मेदारी भी सौंपी। आज किशोर का परिवार खुश है। घर भी बन गया है। खाने-पीने के भी पुख्ता इंतजाम हो गये हैं।

Thursday, June 11, 2020

इतनी मनमानी और जल्दी क्यों?

अंततोगत्वा इसका हश्र अच्छा हो ही नहीं सकता। गलती, गलती है। गुंडागर्दी, गुंदागर्दी ही है। चाहे नेता करे या वर्दीवाला। औरत करे या मर्द। आज अपने देश में बेहिसाब मनमानी चल रही है। कई लोगों पर इन दिनों खबरों में बने रहने का जबरदस्त भूत तथा जूनून सवार है। उनकी बुद्धि ने सोचना, जानना, समझना ही बंद कर दिया है। उन्होंने कहीं न कहीं यह भी मान लिया है कि उनकी ऊल-जलूल हरकतें उन्हें नामवर बनाने के साथ-साथ नायक, नायिका का शानदार तमगा भी दिलवा रही हैं। सोशल मीडिया के तो वे ही ऐसे इकलौते बादशाह हैं, जिनके 'ताज' को कोई भी नहीं छीन सकता। स्वयं को भारतीय जनता पार्टी की महान नेता तथा टिकटॉक स्टार समझने वाली एक नारी, जिसका नाम सोनाली फोगाट है, ने हिसार की बाजार समिति के एक कर्मचारी की थप्पडों और चप्पल से ऐसी जोरदार पिटायी की, कि कई दिन तक अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया में धूम मचाती रहीं। चप्पल और थप्पडबाज सोनाली से जब पूछा गया कि आपने कानून अपने हाथ में क्यों लिया? उसने यदि कोई अभद्र टिप्पणी की भी है तो भी उसे इस तरह से सरेआम पीटना क्या जायज है? यह तो सरासर गुंडागर्दी है? खुद को दबंग कहने वाली नारी का जवाब था कि अगर मैं आज उसे सबक नहीं सिखाती तो कल वह किसी और महिला के साथ भी ऐसी बेहूदी हरकत करने से बाज नहीं आता। यह न्याय करने का तरीका है उस नारी का जो विधायक, सांसद बनना चाहती है। इस अजब नारी ने अपनी थप्पड और चप्पलबाजी की तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए पहले से ही अपने सेवकों की तैनाती कर रखी थी। आज्ञाकारी सेवकों ने धडाधड हर कोने से तस्वीरें लीं, वीडियो बनाये, जो देखते ही देखते न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया पर छा गये। घोर जिद्दी और अहंकारी नारी को शेरनी की पदवी मिल गई। पिटनेवाला गीदड कहलाया, लेकिन यही गीदड यदि अपनी पर आ जाता, ईंट का जवाब पत्थर से देता तो नारी सम्मान और उसकी सुरक्षा का ढोल पीटने वाले संगठन तन कर खडे हो, हो-हल्ला मचाते।
राजस्थान के जोधपुर में पुलिस वाले बिना मास्क पहने लोगों का चालान काट रहे थे, तभी एक युवक ने जेब से मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने की कोशिश की। वर्दीवालों को युवक का यह दुस्साहस बर्दाश्त नहीं हुआ।  उन्होंने युवक को जमीन पर पटका और फिर काफी देर तक अपने घुटने से उसकी गर्दन को दबाये रखा। यह तो अच्छा हुआ कि युवक की जान बच गई। कू्रर पुलिस वालों ने अपनी इस हरकत को जायज ठहराने के लिए सफाई दी कि एक तो उसने मास्क नहीं पहना था, दूसरे टोकने पर हम से ही उलझने लगा! एक की तो उसने वर्दी ही फाड दी! आसपास खडे जिन लोगों ने पूरी घटना को मोबाइल कैमरों में कैद किया, उनका कहना है कि अडियल अविवेकी वर्दी वालों के घुटनों से आज़ाद होने के बाद ही उस युवक ने हमला किया। कौन सच्चा है, कौन झूठा, इसका पता चलने से रहा, लेकिन अंदाज देहलवी की यह पंक्तियां जरूर काबिलेगौर हैं :
"वो जख्मी परिंदा है, वार मत करना
पनाह मांग रहा है, शिकार मत करना
इरादा सामने वाला बदल भी सकता है
मुकाबला ही सही, पहले वार मत करना।"
नेतागिरी और वर्दी की धौंस दिखाने वालों ने सीधे-सादे लोगों को कई बार दबाने, मारने, कुचलने तथा आहत करने का इतिहास रचा है। आम लोगों की चुप्पी, सहनशीलता और बर्दाश्त करने की ताकत का मज़ाक उडाने वालों को अपनी नासमझी का खामियाजा भी भुगतना पडा है। एकदम ताजा उदाहरण है, ताकतवर देश अमेरिका का, जहां जार्ज फ्लॉयड नामक अश्वेत की पुलिस के हाथों हुई निर्मम हत्या के विरोध में असंख्य लोग सडकों पर उतर आये। पुलिस, सेना व सुरक्षा एजेंसियों के लिए हिंसक भीड पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो गया। उपद्रवियों व अराजक तत्वों को भी आगजनी व लूटमार करने का अच्छा-खासा अवसर मिल गया। उसके बाद हमारे अपने अमन-पसंद देश में ऐसे बारूदी सोच वालों के उभरने का दौर-सा चल पडा जो देशवासियों को एक-दूसरे से लडते-मरते देखना चाहते हैं। देश में बदहाली के जो नजारे हैं उनके लिए केंद्र सरकार काफी हद तक जिम्मेदार है। सबकुछ कोरोना महामारी के माथे मढकर बचने की उसकी कोशिशें भी दिख रही हैं, लेकिन यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद कुछ चेहरे हद से ज्यादा बौखलाये हैं। मछली की तरह फडफडाते कुछ बेचैन आत्माधारी स्वप्नजीवी, असली-नकली बुद्धिजीवी, पत्रकार, समाजसेवक, इसके, उसके मसीहा यही चाहते हैं कि अमेरिका की तरह भारत में भी विद्रोह की आग सुलगे। लोग सडकों पर उतर आएं और लूटमार करते नजर आएं। यह महान लोग कोरोना की चिन्ता छोड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने के सपने देखने के चक्कर में ऐसे एकजुट हो गये हैं, जैसे उन्हें इससे अच्छा अवसर फिर कभी नहीं मिल पायेगा। उनकी सबसे बडी समस्या और बीमारी मोदी हैं। नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर होते देखना उनका सपना भी है, प्राथमिकता भी और एकमात्र लक्ष्य भी...।

Thursday, June 4, 2020

आगे की राह

कुछ खबरें ऐसी होती हैं, जो विचलित कर देती हैं। उन्हें नजरअंदाज करना बेहद मुश्किल हो जाता है। कोरोना के इस महासंकट काल में तो ऐसी-ऐसी खबरें सुनने-पढने में आ रही हैं, जो दिल को दहला रही हैं। सोचने-विचारने और महसूसने की हिम्मत कहीं दगा न दे जाए इसकी भी चिन्ता सताने लगी हैं। मन में बार-बार यह प्रश्न और विचार भी आता है कि यह सब हमारे ही जीवनकाल में होना था! विद्वान कहते हैं कि किसी भी इंसान के स्वभाव और उसके असली चरित्र की पहचान संकट के समय होती है। कोरोना काल में हमारे समक्ष कैसे-कैसे भयावह पिटारे खुल रहे हैं! दर्द और तसल्ली की असंख्य गाथाओं के पन्ने हमारे सामने हैं... एक मां ही होती है, जो अपने बच्चों के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं घबराती। इसलिए तो कहा गया है कि मां से बढकर कुछ नहीं होता। उसकी ममता, उदारता और त्याग की कहानियों से न जाने कितने ग्रंथ भरे पडे हैं। कोरोना के दुष्ट समय में देश के कई शहरों-महानगरों में कुछ माओं ने कैसे अपने बच्चों को यहां-वहां तडपने, मरने के लिए छोड दिया, समझ से परे है। अकेले नागपुर में ही तीन-चार नन्हे मासूम बच्चे लावारिस हालत में मिले। पुलिस ने उनके माता-पिता को खोजने की भरपूर कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। अंतत: यह मान लिया गया कि गरीबी, बदहाली के कारण मां-बाप को अपने छोटे-छोटे बच्चों को इस तरह त्यागने को विवश होना पडा हैं।
मध्यप्रदेश के बालाघाट में एक युवक ने अपने आठ वर्षीय बेटे के दोनों हाथ बांधकर उसे वैनगंगा नदी में फेंक दिया। इस हत्यारे पिता के पास कमायी का कोई साधन नहीं था। बेरोजगारी और गरीबी के कारण पिछले कई दिनों से मानसिक रूप से वह बेहद परेशान था। जिस दिन उसने बेटे का नदी में डुबोकर खात्मा किया, उसी दिन उसकी १० वर्षीय बिटिया का जन्मदिन था। भरी दोपहर वह अपनी पत्नी को यह कह कर निकला कि बेटी के बर्थ-डे के लिए केक लेने जा रहा हूं। करीब दो घण्टे बाद वह अकेला लौटा और पत्नी व परिवारजनों को दिल को दहला देने वाली यह हकीकत बताकर रुला-रुला दिया।
कोरोना के खूंखार दौर में हुए लॉकडाउन में कई खुद्दारों को हाथ फैलाने के लिए मजबूर होना पडा है। भूख भी उनके सब्र का इम्तहान लेने को उतारू है। नागपुर में ही है पदमावतीनगर। जब देशभर में लॉकडाउन की घोषणा हुई तब यहां का रहने वाला ट्रक चालक भिवक्षु कोरे गुजरात में था। लॉकडाउन के दौरान कुछ दिन तो उसकी पत्नी ने जमापूंजी से काम चलाया, लेकिन जब हाथ खाली हो गये तो उसके होश उड गये। घर मालिक ने दो-तीन दिन खाना भिजवाया। पास-पडोस की कुछ महिलाओं ने भी थोडी-बहुत मदद की, लेकिन बाद में सबने हाथ खींच लिया। ऐसे में भूखे जागने और सोने की नौबत आ गई। मेहनतकश ड्राइवर की पत्नी को खुद से ज्यादा अपने छोटे-छोटे बच्चों की चिन्ता खाती रही। पूरे परिवार ने चार-पांच दिन सिर्फ पानी और चाय पीकर निकाले। बच्चों को भूख की तडपन से विचलित देख असहाय मां के मन में अपने मायके से मदद लेने का विचार आया तो वह रेल और बसों के बंद होने के कारण पैदल ही नब्बे किमी की दूरी पर स्थित भंडारा शहर जाने को निकल पडी, लेकिन रास्ते में ही पुलिस ने उसे रोक दिया। पुलिस के काफी समझाने के बाद वह घर वापस लौटी। बस्ती के कुछ युवाओं को जब मुसीबत की मारी इस मां की जानकारी मिली तो उसे राशन किट उपलब्ध कराई गयी। उसका ट्रक ड्राइवर पति करीब ४७ दिन तक लॉकडाउन में फंसे रहने के बाद जब नागपुर लौटा तो वह पत्नी और बच्चों के गले लगकर घण्टों रोता रहा।
कोई साधन न मिलने की वजह से एक मजदूर परिवार हैदराबाद से पैदल ही चले जा रहा था। उन्हें सैकडों मील दूर मध्यप्रदेश के शहर बालाघाट जाना था। हैदराबाद में मजदूरी करने वाले इस माता-पिता ने अपने तीनों बच्चों को आग उगलते सूरज की तपन से बचाने की हर कोशिश की, लेकिन भूख, प्यास और लम्बे रास्ते की थकान भारी पड गई। उनके चार वर्षीय बच्चे का बेहाल हो गया। बीच रास्ते अस्वस्थ होकर वह बेहोश हो गया। असहाय माता-पिता ने सडक से गुजरते वाहनों और जीते-जागते इंसानों से हाथ जोड-जोड कर मदद मांगी, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। अपने सामने दम तोडते बच्चे की मां की चीखें सुनकर कुछ लोग रुके भी, लेकिन उन्हें 'अपने देस' जाने की जल्दी थी। अपनी जरूरत ने उन्हें इन्सान से पत्थर बना दिया था। इस दौरान घण्टों बच्चा मौत से जूझता रहा। अंतत: उसने मां की गोद में ही दम तोड दिया। दुखियारी मां ने खुद ही अपने आंसू पोंछे। नदी किनारे गह्ना खोदकर बेटे को दफनाया और आगे की राह पर चल पडी।
नोएडा की बारह साल की निहारिका को जब पता चला कि तीन प्रवासी मजदूर बहुत बडी विपदा में हैं। एक तो कैंसर का मरीज भी है। उसने अपनी बचत के ४८ हजार रुपये खर्च कर हवाई जहाज से उन्हें झारखंड भिजवाया। इस छोटी उम्र की बडी सोच रखने वाली बालिका का कहना है कि समाज ने हमें बहुत कुछ दिया है। अब हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि संकट के दौर में समाज के काम आएं। पूणे का ऑटोचालक अक्षय। इस शख्स की उदारता और दरियादिली तो देखिए...। इसने अपनी शादी के लिए जमा किये दो लाख रुपये उन बेसहारा मजदूरों को खाना खिलाने में खर्च कर दिये, जो सडकों पर भूखे-प्यासे भटक रहे थे। बलराम और रहमान जैसे जाने कितने भारतीय चेहरे हैं जो फरिश्तों की भूमिका में हैं। उनकी सहायता के हाथ न किसी की जात पूछ रहे हैं, न ही किसी का धर्म। बस मानवता का धर्म निभाये जा रहे हैं। उन्हें प्रचार और शोहरत की भी कोई भूख नहीं है। इन्हीं नायकों की वजह से ही आगे की राह के भी आसान होने का देशवासियों को पूरा-पूरा भरोसा है...।

Thursday, May 28, 2020

फिर आयेंगे लौटकर!

ऐसे मंजर पहले कभी नहीं देखे। भय, चिन्ता, अकेलापन, मजबूरी, दूरी, बीमारी, गरीबी और बदहवासी। इन सबके बीच अपनी तथा अपनों की बेइन्तहा फिक्र। ऐसे चिन्ताजनक समय में वे लोग क्या करें, कहां जाएं जो नितांत अकेले हैं, खाने-पीने की व्यवस्था नहीं, रहने का कोई ठिकाना नहीं। बेबसी और बदहाली ऐसी कि उससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल। कितने-कितने ऐसे दृष्य, जिन्हें देखकर कलेजा कांपा, मन की बेचैनी बढती ही चली गई। अपनी ही धडकनों पर काबू कर पाने की शक्ति जवाब देती लगी। कोरोना के शिकार २७ साल के जवान बेटे की लाश महज दस मीटर दूर सिर से पांव तक पॉलीथिन में लिपटी पडी थी। लाचार मां-बाप अंतिम बार अपने लाडले का चेहरा तक देखने को तरसते रहे। इस बेबसी, मजबूरी, तडप और छटपटाहट को व्यक्त करने के लिए दुनिया के सारे शब्दों ने खुद को एकदम बौना तथा असहाय पाया। दिलासा देनेवाले लगभग नदारद। खुलकर रो भी नहीं सकते। खुली सजग आंखों से देखने और पहचानने वालों की संवेदनशील नज़रों से हकीकत कभी छिपती नहीं। इस दौर में जब करोडो श्रमिकों की भीड सडकों पर है। उनके पैरों में चप्पलें नहीं फिर भी पैदल, भूखे, प्यासे तपती धरती पर ऐसे चलते चले जा रहे हैं, जैसे यही उनका मुकद्दर हो। उन्हें देख बरबस गजलकार माधव कौशिक याद हो आए,
"खुल के रोएंगे नहीं तो,
सिसकियां लेंगे जरूर
लोग इस माहौल में तो
मुस्कराने से रहे।"

कोरोना काल में हुए लॉकडाउन ने कई शब्दों और रिश्तों को नये ढंग से परिभाषित किया। अपनों की निष्ठुरता और बेगानों की आत्मीयता को पूरी तरह से उजागर कर भारत का एक अलग ही दयावान चेहरा दिखाया। हिन्दू तथा मुसलमानो की सदभावना, एकता और मानवता की एक से एक हकीकतें सामने आयीं। महाराष्ट्र के अकोला में एक बेटे ने अपने पिता की लाश लेने से ही इंकार कर दिया। जब यह स्तब्धकारी सच इलाके के कुछ मुस्लिम युवकों तक पहुंचा तो उन्होंने कोरोना की भेंट चढे 'इंसान' की लाश का हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। आंधप्रदेश की महिला आईपीएस अधिकारी जब पूरे दिन ड्यूटी करने के बाद घर जाने ही वाली थीं कि तभी भूख से बेहाल एक श्रमिक महिला ने उन्हें फोन कर बताया कि वह, उसके पति और कुछ अन्य लोग नेल्लूर से ७०० किलोमीटर का पैदल सफर तय करके नाके पर आकर रूके हैं और भूख से तडप रहे हैं। महिला की याचना और दर्दभरी आवाज ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। उन्होंने फौरन घर जाकर पहले उनके लिए खाना बनाया और रात करीब डेढ बजे पच्चीस किलोमीटर दूर नाके पर जाकर सभी को अपने हाथों से खिलाया। फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार के इन शब्दों ने कितनों को प्रेरित किया, यह बताना तो कठिन है, लेकिन उन्होंने देशवासियों का दिल जरूर जीत लिया, "जब मैंने कॅरियर शुरू किया था तब मेरे पास कुछ नहीं था। आज जब मैं बहुत अच्छी स्थिति में हूं। करोडो-अरबों का मालिक हूं तब मैं उन दुखियारों की मदद करना मेरा पहला फर्ज बनता है, जिनके पास कुछ भी नहीं हैं।" लॉकडाउन के दौरान कई पुलिस वाले जरूरतमंदों के मसीहा बन कर उभरे। इस कलमकार ने कई ऐसी तस्वीरे देखी, जिनमें प्रवासी मजदूर भावविह्वल होकर पुलिस कर्मियों के पैर छू-छू कृतज्ञता जता रहे हैं। धन्यवाद और शुक्रिया का इज़हार कर रहे हैं।
देश में जगह-जगह पर भूखे-प्यासे श्रमिकों को खाना खिलाने तथा पानी पिलाने वालों का हुजूम किसी की जोर जबरदस्ती या प्रेरणा का प्रतिफल नहीं हैं। फिल्म अभिनेता सोनू सूद को किसी ने विवश नहीं किया कि वे मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा और कमायी खर्च कर दें। सोनू तो एक चेहरा हैं उन अनेक परोपकारी भारतीयों का, जिन्होंने कोरोना, लॉकडाउन में परेशानियां झेल रहे तमाम लोगों की मदद में खुद को पूरी तरह से झोंक दिया है। इन महामानवों के अदम्य साहस तथा निस्वार्थ जनसेवा की ऐसी-ऐसी दास्तानें हैं, जिन्हें सदियों तक याद रखा जायेगा।
कई लोग चिंतित हैं कि यदि श्रमिक वापस नहीं लौटे तो उद्योगधंधों, कारखानों और निर्माण कार्यों आदि-आदि का क्या होगा। मजदूरों के दम पर ही तो देश का व्यवहार, कारोबार टिका है। शहरों से श्रमिको के महापलायन से ग्रामों में भी रोजगार के संकट पैदा हो गये हैं। भारतीय गांव-कस्बों में दम नहीं कि वे लाखों-लाखों मजदूरों को कामधंधे उपलब्ध करवा सकें। इस भूल में न रहें कि देश भर के नगरों, महानगरों से मजदूरों के अपने-अपने गृहग्रामों में पहुंचने के बाद गांववाले तथा उनके रिश्तेदार उन्हें गले लगा रहे हैं। उन्हें वहां रोजी-रोटी कमाने के साधन मिलने जा रहे हैं। अगर ऐसा होता तो वे अपना घर छोडकर हजारों मील दूर क्यो जाते? सरकारें यदि उन्हीं के प्रदेशों, नगरों में फैक्ट्रियां लगातीं, रोजगार और नौकरियां उपलब्ध करवातीं तो उन्हें अपनी जडों से दूर जाना ही नहीं पडता। भीतर तक छूती यह कविता जिसने भी लिखी यकीनन बहुत विचार कर लिखी है :
जिन्दा रहे तो फिर से आयेंगे बाबू, तुम्हारे शहर को आबाद करने।
वहीं मिलेंगे, ऊंची-ऊंची इमारतों के नीचे
प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियों में।
चौराहों पर अपने औजारों के साथ, फैक्ट्रियों से निकलते काले धुएं जैसे...
होटलों और ढाबों पर खाना बनाते। बर्तनों को धोते।
हर गली, हर नुक्कड पर फेरियों से रिक्शा खींचते, ऑटो चलाते,
पसीने से तरबतर होकर तुम्हें तुम्हारी मंजिलों तक पहुंचाते।
फिर हम मिल जायेंगे तुम्हे पानी पिलाते, गन्ना पेरते।
कपडे धोते, प्रेस करते, सेठ से किराये पर ली हुई रेहडी पर
समोसा तलते या पानी पूरी बेचते।

ईंट-भट्टों में काम करते, अनाज मंडियों में माल ढोते,
हर जगह हम होंगे, मत रोको... हमें अब, बस जाने दो,
बाबू चिन्ता न करो, विश्वास अगर जमा पाए तो, फिर आयेंगे लौटकर...।

Thursday, May 21, 2020

हमका नहीं देखना शहर

"तीन सडक हादसों में ३२ प्रवासी मजदूरों की गई जान, कई लोग घायल, ट्रक की टक्कर से पति का पैर टूटा, मदद के लिए रोती-गिडगिडाती रही पत्नी, दिव्यांग बेटे को १२०० किमी ले जाने को बेबस पिता ने साइकिल चुराई, खाली जेब ट्रेन पकडने दौडते श्रमिक की मौत, परिवार को रिक्शे में बिठाकर की पांच सौ किमी यात्रा, प्रवासी श्रमिकों की रेलवे स्टेशन पर गुंडागर्दी। बेखौफ होकर स्नैक्स, कोल्डड्रिंक और पानी की बोतलें लूटीं। प्रवासी मजदूरों को मिल रहा है मुफ्त अनाज, सरकार का दावा। घर लौट रहे मजदूर के चार वर्षीय बेटे ने दम तोडा, नदी किनारे कर दिया दफन, उद्योगपतियों में तोडा प्रवासी श्रमिकों का भरोसा, जिगर के टुकडे को मां ने सूटकेस पर सुलाया... फिर उस सूटकेस को घसीटते हुए तय किया ८०० किमी का सफर। अपने गांव पहुंचने के लिए पिता को बेचना पडी अपनी मासूम बच्ची की कान की बाली, मजदूरों, किसानों के लिए सरकार ने खोली तिजोरी, भोजन, पानी और परिवहन की समुचित व्यवस्था न होने से भडके सैकडो प्रवासी।"
इन शीर्षकों को पढ, सुन और देखकर आप भी जरूर चौंके होंगे। यह तो कुछ भी नहीं। सभी खबरें अखबारों में नहीं छपतीं। हर खबर न्यूज चैनलों में जगह नहीं पाती। इसलिए उसके शीर्षक बनने का सवाल ही नहीं उठता। जाहिर है यह खबरें देश के मजदूरों की हैं, किसानों, दलितों और शोषितों, गरीबों, बेबसों की हैं, जिनके आजादी के ७२ साल बाद भी हाथ खाली के खाली हैं। इनके संघर्षों को देख-सुनकर दिल बैठने लगता है। यह तमाम हृदय विदारक शीर्षक और उनके अंतर्गत प्रकाशित खबरें हिन्दुस्तान के उस असली सच को बताती हैं, जिन्हें हुक्मरान छिपाये रखना चाहते हैं, लेकिन कोरोना नामक महामारी ने उसे सारी दुनिया के समक्ष उजागर कर दिया है। इस भयावह चिन्ताजनक 'कोरोना काल' ने इस देश के राजनेताओं, सत्ताभोगियों और प्रशासनिक फरेबियों को कटघरे में खडा कर दिया है। हमेशा की तरह अब ये कपटी कोई सही जवाब देने से रहे, लेकिन सच तो यही है कि कितने-कितने जगजीवनराम, मायावती, रामविलास पासवान, मीरा कुमार, राम आठवले आदि-आदि दलितों, शोषितों, श्रमिकों के उद्धार और विकास के झूठे वायदे कर वोट हथियाते रहे और सत्ता का सुख और मज़ा लूटते रहे। जीरो से हीरो होते ही उनकी कोठियां तन गईं। महल खडे हो गये। लग्जरी कारों के काफिले के साथ हवाई जहाजों की यात्राएं भी होने लगीं। जिनके वोटों की बदौलत यह चमत्कार हुआ उन लाखों-करोडों लोगों को तो रहने के लिए न कोई छत मिली और न ही रोजी-रोटी का स्थायी ठिकाना। उनकी कई पीढ़ीयां ही ऐसे ही चल बसीं। यह बदनसीब भी दो वक्त रोटी के लिए इस उम्मीद के साथ बनवास भोगते चले आ रहे हैं कि कभी तो उनके दिन बदलेंगे। अपने गांव से बेटे के पास शहर में रहने आयी एक मां ने जब इसी कोरोना काल में वापस अपने गांव जाने की जिद पकडी तो उसे अपने बेटे की बेबसी पर बडा रोना आ गया। कई दिनों के इन्तजार के बाद शहर की एक बडी निर्माण कंपनी में मजदूरी करने वाले बेटे, उसकी पत्नी, दो बच्चे, भतीजे के साथ बडी मुश्किल से बस में जब बैठी तो उसका कहना था कि मैं पहली बार अपने गांव से बाहर आई हूं और यह अंतिम बार है। मां बेटे को यह कहने से भी नहीं चूकी, 'बेटुआ, अब हम कभी नहीं आई, तू बेशक हमका कांधा देने भी मत आई। हमका नहीं देखना शहर।' बेटा तो यह सोचकर मां को शहर लाया था कि वह खुश होगी। उसका दिल बहल जाएगा। लेकिन....। वैसे कोई भी बेटा मां-बाप और अपना गांव छोड तब तक नगरों तथा महानगरों की तरफ नहीं जाना चाहता जब तक रोजी-रोटी की मजबूरी न हो। गांव में खेती घाटे का सौदा होकर रह गयी है। कमाने-खाने के अन्य कोई पुख्ता साधनों का न होना शहरों में जाने को विवश कर देता है। अपने देश के करोडों लोग वर्षों से अपना घर-बार छोड शहरों में जाकर मजदूरी करने को अभिशप्त हैं। कौन चाहेगा कि उसे रिक्शा चलाना पडे, ईंट, सीमेंट, गारा ढोना पडे तथा वो सभी काम करने पडें, जो नाम मात्र की मजदूरी की रकम के बदले जीवन की लगभग सभी खुशियां छीन लेते हैं। वे इनसे इतने पैसे भी नहीं बचा पाते जो उनके आडे वक्त में काम आ सकें। दिन-रात खून-पसीना बहाकर जो हाथ आता है वह जरूरी खर्चों में फुर्र हो जाता है। असुरक्षित हालातों में जीने वाले इन करोडों भारतवासियों को कोरोना ने जिस भयावह सच से रूबरू कराया है उसे वे कैसे भूल पायेंगे!
कोविड-१९ के चलते हुए लॉकडाउन ने करोडो भारतीयों को गृहग्राम, गृहनगर तथा अपनी छत की अहमियत बता दी है। इस महासंकट ने उनके दिमाग पर लगे तालों को खोला है। वे यह तो जान-समझ गये हैं कि राजनीति, सत्ता और सत्ताधीश उन्हें किस तरह से छलते चले आ रहे हैं। वर्षों पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' के नारे को उछालकर सत्ता तो पा ली, लेकिन गरीबी खत्म नहीं कर पायीं। उसके बाद कितने मुखौटेधारी सपने दिखा-दिखाकर देश की सत्ता पर काबिज होकर देशवासियों को छलते रहे, जनता खुद को ठगा पाकर भी कुछ नहीं कर पायी। आज भी वह रोटी-रोजी के चक्कर में ऐसे उलझी है कि तमाशे पर तमाशा देखने को मजबूर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी अच्छे दिन लाने का चुनावी वायदा कब पूरा होगा, राम जाने...। यह पंक्तियां लिखते समय बार-बार मेरी आखों के सामने अपने उम्रदराज माता-पिता के कंधो पर बैठे कई बच्चे तथा सूटकेस पर लटका बच्चा आ-जा रहा है। सोच रहा हूं इनका भविष्य कैसा होगा? मां-बाप तो उम्र भर भटकते रहे, लेकिन क्या इनके हिस्से में अच्छे दिन आयेंगे?