Thursday, June 3, 2021

वंदन...अभिनंदन

    हमारे एक परिचित वकील थे। कुछ महीने पूर्व हार्ट अटैक से उनका देहावसान हो गया। उनके पास करोड़ों की सम्पत्ति थी। बैंक बैलेंस भी खासा तगड़ा था। उन्होंने अपनी जिन्दगी अपने ही अंदाज में जीते हुए अपनी अधिकांश तमन्नाएं पूरी कीं, लेकिन एक इच्छा अधूरी रह गई। उनकी बड़ी चाहत थी कि जिस बस्ती में वे जन्मे, बड़े हुए और सफलता की सीढ़ियां चढ़े, उसका नामकरण उनके नाम पर हो जाए। इसके लिए उन्होंने कई पापड़े बेले। शहर के पत्रकारों, संपादकों को लिफाफे देकर अपनी तारीफों के लेख छपवाये। कागजी संस्थाओं को पैसे देकर पुरस्कृत हुए। यहां तक कि डॉक्टर की उपाधि भी हथिया ली। उन्हें धनवानों  का वकील कहा जाता था। उनके मन में यह बात घर कर चुकी थी धन, नाम और लोकप्रियता ही सबकुछ है। बस्ती में अपनी आदमकद प्रतिमा और अपने नाम का ठप्पा लगवाने के लिए उन्होंने पक्ष और विपक्ष के नेताओं से नजदीकियां बनायीं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को निवेदन पत्र भेजे। यहां तक कि शहर के महापौर और इलाके के नगरसेवक से न जाने कितनी बार विनती की व हाथ जोड़े, लेकिन आम लोगों के विरोध के कारण उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। अपने नाम को जिन्दा रखने के लिए वे तो दो-चार करोड़ की आहूति देने को भी तैयार थे, लेकिन...बात नहीं बनी। उनकी मौत के बाद उनके करोड़पति बेटे ने एक मंत्री से अपने पिताश्री के सपने को साकार करने के लिए पार्टी फंड में मोटा चंदा देकर आश्वासन का झुनझुना तो हासिल कर लिया और वे उसे जहां-तहां बजाते भी रहते हैं कि वो दिन दूर नहीं जब बस्ती में उनके पिता के नाम के शिलालेख लगे नजर आएंगे। चतुर-चालाक वकील पुत्र ने नोटों की बरसात कर विरोधियों को भी अपने पाले में ले लिया है। अब बस उन्हें कोरोना के भाग खड़े होने का इंतजार है...।
    महाराष्ट्र के एक गांव के बस स्टॉप को एक मेहनतकश के नाम से जाना जाता है। इस शख्स का नाम है राजमणि वीरेंद्र पाली उर्फ अन्ना। अन्ना कोई उद्योगपति, व्यापारी, नेता या अभिनेता नहीं है। वह तो एक अदना सा होटलवाला है, जो लगभग 50 वर्षों से गरीबों को मात्र दस रुपये में भरपेट खाना खिलाता चला आ रहा है। अन्ना की कभी मिलिट्री में भर्ती होने की दिली तमन्ना थी, लेकिन पैर के टेढ़ा होने के कारण जब वह सैनिक नहीं बन पाया तो नीम के पेड़ के नीचे चाय-नाश्ते की टपरीनुमा छोटी सी दुकान खोल ली। शुरू-शुरू में अन्ना ने ट्रक ड्राइवरों तथा गरीब मजदूरों को मात्र तीन रुपये में दाल-चावल भरपेट देना प्रारंभ कर दिया, जिससे टपरी पर भीड़ लगने लगी। कुछ वर्षों के पश्चात जब महंगाई बढ़ी तो उसे मजबूरन भरपेट भोजन की कीमत दस रुपये करनी पड़ी। आसपास के होटलों के मालिकों ने इतने कम दाम पर खाना उपलब्ध कराने का कई बार विरोध भी किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। उसका तो आटे में नमक जैसी कमायी का इरादा था। उसने गरीबी, बदहाली देखी थी। भूख क्या होती है इसका भी उसे पता था। इस दौरान आसपास के होटल वाले लखपति और करोड़पति हो गये। उनके आलीशान मकान बन गये। कारें भी आ गईं। अन्ना धन तो नहीं जोड़ पाया, लेकिन लोगों के दिलों में बसने का कीर्तिमान जरूर बनाया। उन्हीं लोगों ने ही बस स्टॉप को अन्ना के नाम कर दिया। छोटी सी टपरी वाले ने बड़े-बड़े रईसों, समाजसेवकों और नेताओं को मात दे दी, जो अपने नाम का डंका बजवाने के लिए पगलाये रहते हैं। अन्ना की जवानी विदा हो चुकी है। पहले से भी ज्यादा भीड़ उनकी टपरी पर लगी रहती है। अन्ना किसी को निराश नहीं करता। खाना खाने के बाद जब कभी-कभार लोग कम पैसे देकर चले जाते हैं तो भी उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती। कुछ गरीबों की तो जेब एकदम खाली होती है उन्हें भी भरपेट खाना खिलाकर तृप्त कर देता है। अन्ना ने कई बंद आंखों को खोला है। उसने दिखा दिया है कि सच्ची नीयत इंसानियत और गहरी संवेदनशीलता बड़ी से बड़ी महाघमंडी ताकतों को मात दे सकती है। लोगों के दिल जीत सकती है।
    अपने देश में न तो धन की कमी है और न ही धनवानों की। यह अपना हिंदुस्तान ही है, जहां असंख्य मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे हैं, जहां धन-सम्पत्ति के भंडार भरे पड़े हैं। इस अपार धन से मानव कल्याण का इतिहास रचा जा सकता है। असंख्य गरीबों के जीवन को खुशहाल किया जा सकता है। हजारों स्कूल, विद्यालय, अस्पताल बनाये जा सकते हैं, लेकिन अधिकतर वहां भी राजनीति, लालच और तेरी-मेरी चलती है। अपने-अपने धर्म को ऊंचा बताने का राग गाया जाता है। पूजा स्थलों की सम्पत्तियों पर कब्जा करने की चालें चली जाती हैं। यह भी सच है कि समय-समय पर कुछ इबादत...पूजा स्थल के कर्ताधर्ता मानव सेवा का धर्म निभाते रहते हैं। कोरोना की महामारी के वक्त भी कुछ मंदिर, मस्जिद और चर्चों ने पीड़ितों तक भोजन पहुंचाया। दवाइयां भी भिजवायीं। अपने-अपने तरीके से सभी ने जनसेवा का धर्म निभाया, लेकिन सिखों ने तो पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। हमारा किसी को कमत्तर दर्शाने का मकसद नहीं, लेकिन जो सच है..वो सच ही है...। दुनिया के चाहे किसी भी कोने में आपदा के चलते लोग तकलीफों से घिरे हों तो सिख समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के सबसे पहले दिलोजान से सहायता करने के लिए पहुंच जाते हैं। देश और दुनिया को एकता और भाईचारे का प्रबल संदेश देने वाले श्री गुरुनानक देव जी ने 15वीं सदी में जिस लंगर प्रथा की शुरुआत की थी, उसे जुनूनी, परोपकारी सिखों ने अभी भी सतत कायम रखा है। लंगर में बिना किसी भेदभाव के एक ही स्थान पर बैठाकर भोजन कराया जाता है। दुखियारों को अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार रहने वाले सिखों को नाम की भूख नहीं होती। उनका सेवाकार्य ही उनके नाम के डंके बजा देता है और उनके आदर-सम्मान में कालीन बिछ जाते हैं। जब पूरे देश में ऑक्सीजन की जबरदस्त किल्लत थी, इसके अभाव में कोरोना के मरीज तड़प-तड़प कर मर रहे थे तब विभिन्न गुरुद्वारों में ऑक्सीजन लंगर शुरू किया गया। बीमार मरीजों को अस्पताल में बेड मिलने तक ऑक्सीजन उपलब्ध करवायी गई। सिख समाज ने अब फैसला किया है कि गुरुद्वारों की साज-सज्जा में धन खर्च करने की बजाय देश भर में अस्पताल बनाये जाएंगे, जहां कम से कम शुल्क में लोगों के इलाज की उच्चतम सुविधाएं उपलब्ध होंगी। महाराष्ट्र के नांदेड़ में गुरुद्वारा तख्त हजूर साहिब ने तो ऐलान कर दिया है कि उनके यहां पिछले 50 साल से जमा हुए सारे सोने को कोरोना अस्पतालों के निर्माण के लिए अर्पित कर दिया जाएगा।

Thursday, May 27, 2021

ऐसे लोग भी हैं यहां

    अपनी जान, समय, धन और दूसरी तमाम बातों और खतरों की परवाह न करने वाले भले ही कम लोग हैं, लेकिन हैं करोडों पर भारी। इनकी वजह से ही मानवता की लाज बची हुई है। रिश्तों की गरिमा भी कायम है। इनकी बस यही चाहत है कि किसी भी मानव को मरने के लिए नहीं छोडा जाए। उसे बचाने, समझाने और जगाने की कोशिशों में कहीं कोई कमी नहीं होने पाए। क्या इस तस्वीर को कभी भुलाया जा सकेगा, जिसमें एक पत्नी ऑक्सीजन की कमी को झेलते पति को बचाने के लिए अपनी जान को खतरे में डालकर अपने मुंह से सांसें देती नज़र आ रही है। यह सच दीगर है कि वह अपने पति को बचा नहीं पाई। कोरोना के चरम-विनाशीकाल में जब लोग अपने करीबी से करीबी कोरोना ग्रस्त को छूना तो दूर सामने जाने से डर रहे थे तब आगरा की इस महिला के अदम्य सहस को कई लोगों ने बेवकूफी और पागलपन की संज्ञा देने में देरी नहीं लगायी। अपनी निगाह में तो यह बेवकूफी नहीं, हां...पागलपन जरूर है जो सच्चे प्रेम की जान और पहचान है। जब अपने प्रियतम की सांस की डोरी टूटने के कगार पर हो तो सच्ची समर्पित प्रिय पत्नी वही करेगी जो इस महिला ने किया। उसने ठान लिया था अपना अंत होता है तो हो, लेकिन किसी भी तरह से मेरा पति बच जाए। इसमें ज़रा भी दिखावा नहीं था। बस प्रेम था। निश्चल और अभूतपूर्व। उसे भी लोगों ने कटघरे में ख‹डा कर दिया!
    एक तो कोविड ने सारी हदें पार कर दीं। वहीं रिश्तों का मज़ाक उडाने वालों ने इंसान और इंसानियत का तमाशा बना कर रख दिया। कोरोना के संक्रमण से जान गंवाने की फिक्र जितनी अपनों को है, इन्हें क्यों नहीं, यह सवाल मुझे बार-बार परेशान करता रहा। अगर इतनी दहशत है तो नाटक और नौटंकियां किसलिए? यह सब वर्षा वर्मा को भी बहुत परेशान किए है जिसके लिए सभी अपने हैं। वर्षा वर्मा कोरोना मरीजों के शवों को श्मशान घाट पहुंचाती हैं। अपने दर्द की किताब का पन्ना खोलते हुए वर्षा बताती हैं कि हमने उन परिवारों के भी मृतकों के शव उठाए हैं, जहां परिवार के सदस्य पीपीई किट में रखी स्वजन की बॉडी को छूने से घबराते रहे, लेकिन बाहर खडे होकर धडाधड वीडियो तथा तस्वीरें खींचकर कृत्रिम अपनापन दर्शाते रहे। वर्षा वर्मा कोविड से अपने प्रियजनों को खोने वालों की सच्ची मददगार बनी हुई हैं। सैकडों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी वर्षा की एक परिचित की पिछले दिनों कोविड संक्रमण के बाद मौत हो गयी। उसके रिश्तेदारों का कहीं अता-पता नहीं था। ऐसे में मृतका को खुद वर्षा ने मुखाग्नि दी। इसी तरह से एक महिला के पति कोरोना से लडने के बाद चल बसे। उसके परिवार के सभी पुरुष भी कोरोना संक्रमित थे। वह महिला मजबूरन श्मशान घाट पर अकेली पति का दाह संस्कार करने पहुंची। एक तरफ पति को खोने का सदमा था तो दूसरी तरफ धू...धू कर जलती कई चिताएं थीं। महिला ने ऐसा भयावह मंजर कभी देखा नहीं था। ऐसे में वर्षा ने उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा, डरो नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूं, जब तक दाह संस्कार संपन्न नहीं हुआ, वर्षा उसके साथ खडी रहीं। उसे बिलकुल भी अकेला महसूस नहीं होने दिया। सैकडों लोगों का दाह संस्कार कर चुकी वर्षा को अब न मुर्दों से डर लगता है और न श्मशान और कब्रिस्तान से। वे तो कोविड से भी खौफ नहीं खातीं। शुरू-शुरू में वर्षा और उनकी टीम के पास शवों को श्मशान घाट ले जाने का कोई साधन नहीं था। लोगों की मदद करने का जज्बा था इसलिए जोड-जुगाड कर एक पुरानी वैन की व्यवस्था की। वैन की सीटें उखाड कर स्ट्रेचर रखने की जगह बनायी। असहायों की मदद कर वर्षा को परम संतुष्टि मिलती है। जिन शवों के निकट आने से परिजन घबराते हैं वर्षा जिस बहादुरी के साथ उनका दाह संस्कार करती हैं उससे कई लोग सहानुभूति जताते हुए उसे इस काम को छोड-छाड कर घर बैठ जाने की सलाह देते हैं। बेगानों के  लिए खुद की जान को खतरे में डालना कहां की अक्लमंदी है। वर्षा की एक १४ साल की बेटी है। पति इंजीनियर हैं। वे भी वर्षा के साथ खडे नजर आते हैं। वे qचतित भी रहते हैं कि कहीं पत्नी कोविड की गिरफ्त में न आ जाए। बेटी के लिए तो वर्षा रोल मॉडल ही हैं।
    कोरोना ने लोगों को वास्तविकता से रूबरू करवाया है। भ्रम के जाल से बाहर निकाला है। लोग जान गये हैं कि फिल्मी पर्दे के हीरो खोखले हैं। असली नायक तो जमीनी लडाई लडने वाले वो चेहरे हैं, जिन्हें कभी भी भुलाना संभव नहीं होगा। हजारों डॉक्टरों ने कोरोना पीड़ितों को भला चंगा करने के लिए अपनी जान तक दे दी। उन्हीं में से एक हैं डॉक्टर .के.के.अग्रवाल। खुद वेंटिलेंटर पर थे फिर भी मरीजों को ऑनलाइन सलाह देने की अपनी जिद्दी परंपरा नहीं तोडी। इस दुनिया से विदा लेने से कुछ दिन पहले जब डॉ.अग्रवाल ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे तब भी जिंदादिली का दामन थामे रहे। 'शो मस्ट गो ऑन पिक्चर अभी बाकी है।' उनका यह कहना करोडों लोगों को कभी भी न थकने और रुकने की सीख दे गया। अग्रवाल कोरोना संक्रमण की नस-नस से परिचित थे। यकीनन उन्होंने तमाम सुरक्षा उपायों को भी अपनाया होगा। उन्होंने दोनों टीके भी लगवा लिए थे फिर भी चल बसे! दिल्ली के ही डॉक्टर रावल वैक्सीन की दोनों खुराक ले चुके थे। तब भी जब उन्हें कोरोना हो गया तो उन्हें किंचित भी किसी खतरे का अंदेशा नहीं था। जब वे वेंटिलेटर पर थे तब बस यही कह रहे थे कि मुझे कुछ नहीं हो सकता। मैंने दोनों टीके जो लगवा लिए हैं। फिर भी वे बच नहीं पाये। मुझे याद है कि जब पिछले वर्ष कोरोना ने बडी तेजी से घेरना प्रारंभ किया था तब हम सब यही कहते थे कि जल्द से जल्द टीका आए और हमें इस महामारी से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिले, लेकिन जो दिख रहा है उससे तो हम यही मान लें कि टीके लगवाने के बाद भी कोरोना का खतरा पूरी तरह से टलता नहीं है। जब जानकार से जानकार डॉक्टर नहीं बचा पा रहे हैं तो हमारी क्या औकात है! इसलिए आशा की तरह बेफिक्र रहें। तीस साल की आशा के जीने के जज्बे ने डॉक्टरों और नर्सोें को नतमस्तक कर दिया। उसने कोविड इमर्जेंसी वार्ड में बिस्तर पर लेटे-लेटे, झूम-झूमकर बार-बार लव यू  जिन्दगी... गीत गाया और हर सुनने और देखने वाले को रुलाया और जगाया। मजबूत इच्छाशक्ति के साथ भरपूर जीवन जीने की अभिलाषा रखने वाली यह लडकी भले ही जिन्दगी की जंग हार गई, लेकिन हर किसी से यह कह गई कि चिन्ता करना व्यर्थ है, जो होगा देखा जाएगा। कभी भी उमंग-तरांग और उम्मीद का दामन मत छोडो...।

Thursday, April 8, 2021

नक्सलियों के पालनहार

"नक्सली और कोरोना
ये दोनों भाई हैं
कैसे इतने
ये आततायी हैं
इनके जुल्मों सितम से
लोग तबाह हो गए
लाखों निरपराध
मौत के आगोश में सो गए
हम...
हमारा समाज...
हमारी सरकार...
देश के तमाम ज्ञानियों के पास
कोई तो
कारगर हल होगा
जिससे भारत
भयमुक्त और
हमारा...
सुनहरा कल होगा...!"
    नागपुर के सजग कवि श्री अनिल मालोकर की उपरोक्त कविता श्रद्धांजलि है उन २३ शहीदों के प्रति, जिनकी कायर, धोखेबाज, षडयंत्रकारी नक्सलियों ने जान ले ली। कवि की तरह और भी अनेकों सतर्क भारतीय हैं, जिनको यह सवाल लगातार चिन्तित और परेशान किये है कि देश में जब कोरोना के कारण लोगों की मौतें हो रही हैं, हर कोई भयभीत है तब छत्तीसगढ के बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा पर नक्सलियों ने क्या सोचकर इस दरिंदगी को अंजाम दिया। जब कोरोना की बीमारी लोगों की जानें लेने पर तुली है, तब नक्सलियों ने यह शैतानी और हैवानी कृत्य कर दिखा दिया है कि उनका मानवता से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह जो इन्सानी हत्याएं की गई हैं वे काफी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। नक्सलियों के इस खूनी खेल में कुछ भी नया नहीं, लेकिन कोरोना के जानलेवा काल में रॉकेट लाँचर और मोर्टार जैसे आधुनिक हथियारों से सुरक्षा बलों पर हमला करना उनकी उस क्षमता और ताकत को भी दर्शाता है, जो लगातार बढ रही है। कहां से आता है नक्सलियों के पास हथियार खरीदने के लिए पैसा। कैसे जुटा लेते हैं वे ऐसे-ऐसे साधन, जिन्हें जुटाना आसान तो कतई नहीं। तय है कि देश के भीतर कुछ ऐसे गद्दार तो हैं, जो नक्सलियों की सहायता करते हैं। कुछ पत्रकारों, वकीलों, स्वयंभू समाजसेवकों का नक्सली प्रेम बार-बार उजागर होता रहता है। उन्हें सुरक्षा बलों के प्राण गंवाने पर कोई गम नहीं होता। नक्सलियों के मारे जाने पर उनकी आंखों से धडाधड आंसू बहने लगते हैं और वे सीना तानकर मानव अधिकार के राग अलापने लगते हैं। इन नक्सली भक्तों के कारण ही नक्सलवाद और आतंकवाद के हौसले बुलंद होते रहे हैं। यह भी शर्मनाक सच है कि जब-जब भी नक्सली हमले होते हैं तब-तब कुछ दिनों तक अपने यहां अच्छी-खासी राजनीति होती है। नेता भाषण पर भाषण दागते हैं कि इस बार जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। नक्सलियों को उनकी औकात दिखाकर ही दम लिया जाएगा, लेकिन असल में होता क्या है किसी से छुपा नहीं है। पूरी तस्वीर हमारे सामने है।
    नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दर्शाने वाले नेता अक्सर कहते रहते हैं कि नक्सली तो भटके हुए क्रांतिकारी हैं। अपने ही देश में ऐसे नेता भी हैं, जो भाजपा को चुनाव में हराने के लिए खूंखार नक्सलियों की सहायता लेने में संकोच नहीं करते। यह घटिया नेता अपने खिलाफ खडे होने वाले प्रत्याशियों को हरवाने तथा ठिकाने लगाने के लिए नक्सलियों को धन मुहैया करवाते हैं। इन्हें हत्यारे नक्सलियों का संरक्षक और पालनहार कहने के साथ-साथ सुरक्षा बलों का हत्यारा कहने में कोई हर्ज नहीं। यह भी अत्यंत शर्म की बात है कि जो नृशंस हत्यारे हैं, सुरक्षाबलों, सैनिकों पर हमले करते रहते हैं और खून की नदियां बहाते रहते हैं, उनके खिलाफ कई बुद्धिजीवी अपनी जुबान तक नहीं खोलते। उलटे सरकार को कोसते रहते हैं कि वह नक्सलियों के साथ सौतेला व्यवहार करती है। नक्सली भी इसी देश की संतान हैं। ऐसे में उनके साथ मिल बैठकर बात क्यों नहीं की जाती? उनकी क्यों नहीं सुनी जाती? जो नक्सली पिछले तीस-चालीस वर्ष से आतंकी और हत्यारे बने हैं, उनके प्रति महानुभावों का सद्भाव कई प्रश्न ख‹डे करता है। उनकी निगाह में जो भटके हुए क्रांतिकारी हैं, उनकी असली हकीकत के पन्ने यही बताते हैं कि कभी नक्सलियों का कोई जनहितकारी मकसद रहा होगा, लेकिन अब तो अधिकांश नक्सली सरगना सौदागर बन चुके हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ रहे हैं। रहने और चलने के लिए उनके पास कोठियां और कारों के काफिले हैं। उनकी लूटमारी और वसूली के तरीके पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। तय है कि न तो वे रहम के काबिल हैं और न ही उनके समक्ष झुकने की जरूरत या कोई मजबूरी है। इनका साथ देने वालों को भी पूरी तरह से नंगा करने का वक्त आ गया है। यह दुष्ट खुद को नायक मानते हैं। खुद को दूसरों से अलग मानकर अपनी ही पीठ थपथपाते रहते हैं। इनसे यह कलम जानना चाहती है कि यह नक्सली भक्त आखिर चाहते क्या हैं? अपने ही देश के जवानों को लहुलूहान और शहीद होने पर तालियां बजाने और खुशी मनाने से इन्हें शर्मिन्दगी का अहसास क्यों नहीं होता? भारत माता को निरंतर जख्मी होते देखने के बाद भी उन्हें नींद कैसे आ जाती है। वे भी तो आखिर इसी देश की मिट्टी से उपजे अन्न, पानी और हवा पर जिन्दा हैं!

Thursday, April 1, 2021

समयांतर

    बात इंसान की। हर किसी की जान की। बाकी सब कुछ चलता-चलाता रहता है। हम और आप स्वस्थ हैं, चलायमान हैं, खुश और प्रसन्न हैं, तो ही इस दुनिया के होने की सार्थकता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी सोच और प्राथमिकता निजी स्वार्थ पर टिकी है। उनमें अथाह निर्ममता और लालच भरा पडा है। वे धन के लिए हत्यारे बनने से नहीं घबराते। कोरोना की दूसरी अंधी लहर में कुछ अस्पतालों तथा डॉक्टरों की शर्मनाक कारस्तानी सामने आ रही है। वह यही दर्शा रही है कि मौका पाते ही लूटपाट में लग जाना धनपशुओं के जीवन का असली मकसद है। नागपुर के एक अस्पताल में डॉक्टरों की घोर लापरवाही के कारण दो लोगों की मौत हो गई। मृत मरीज का इलाज कर मानवता को शर्मिन्दा करने वाले इस अस्पताल के डॉक्टरों की दरिन्दगी की हकीकत ही भयभीत कर देती है। आखिर हमें किन लोगों के भरोसे कोरोना से लडना पड रहा है! इन हत्यारों को अपने पावन पेशे को कलंकित करने में लज्जा क्यों नहीं आती? यह सवाल तभी से जवाब मांग रहा है, जब से कोविड-१९ की महामारी ने चारों तरफ अपने पैर फैलाकर इंसानों को बताया कि कुदरत के समक्ष वे कितने असहाय और बौने हैं।
कोरोना का इलाज करवाना हर किसी के बस की बात नहीं। यही वजह है कि अस्पताल में फांसी के फंदे पर झूल जाने की खबरें पढने-सुनने में आ रही हैं। नागपुर के मेडिकल अस्पताल व कॉलेज में कोविड वार्ड, ट्रामा सेंटर में भर्ती ८१ वर्षीय वृद्ध की आत्महत्या की खबर वाकई चौंकाने वाली है। सामान्य सर्दी खासी की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में लाया गया था। परिवार के सदस्यों को जैसे ही पता चला कि बुुजुर्ग कोरोना पाजिटिव हो गये हैं, तो वे बिना कोई बातचीत के उन्हें मेडिकल अस्पताल में छोडकर चलते बने। वृद्ध अकेलेपन और असुरक्षा की भावना से टूट गए और चुपचाप बाथरूम में खुदकुशी कर ली। अपनों के एकाएक दूरी बनाने से कई स्वस्थ इंसान भी मौत के मुंह में समा रहे हैं। दरअसल सभी इतने सक्षम नहीं कि कोरोना की बीमारी के चपेट में आये अपने करीबियों के लिए धन की व्यवस्था कर सकें। ऐसा मान लेने वाले भी बहुतेरे हैं कि कोरोना हुआ है तो मौत भी तय है, जबकि यह सच नहीं है। कोरोनाग्रस्तों को हौसले तथा सुरक्षा के अहसास से इतना बलवान तो बनाया ही जा सकता है कि वे अंतिम सांस तक लडते रहें। वैसे तो पूरे देश में कोरोना की आंधी लोगों को अपने लपेटे में ले रही है, लेकिन महाराष्ट्र में कोरोना का आतंक कुछ ज्यादा ही देखने में आ रहा है। लगभग सभी जानते हैं कि कोरोना से बचने के लिए खुद का सतर्क होना जरूरी है, लेकिन ज्यादातर लोग उन नियमों का पालन करने में कंजूसी बरतते हैं, जो अति आवश्यक हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय का ताजा सर्वे बताता है कि पचास फीसदी लोग भीड-भाड में मास्क लगाने की चुस्ती नहीं दिखाते। उन्हें दूसरों का मास्क लगाना जितना जरूरी लगता है, उतना स्वयं का नहीं। विदर्भ के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कोरोना ने जिस तादाद में मौत बांटनी प्रारंभ कर दी है, उससे यह भी माना जा रहा है कि शासन और प्रशासन खुद को असहाय पा रहा है। अस्पतालों में आईसीयू बेड की भारी कमी स्पष्ट दिखायी दे रही है। संतरानगरी नागपुर में कोरोना पॉजिटिव मरीज खुलेआम घूम रहे हैं। कोई भी पाबंदी उनपर असरकारी नहीं हो रही है। कोरोना संक्रमण के मामले में देशभर में नागपुर तीसरे स्थान पर है। नागपुर में हो रही मौतें देशभर में चिन्ता का विषय बन कर रह गई हैं। कोरोना का संकट आज नहीं तो कल खत्म हो जायेगा, लेकिन इस शर्मनाक सच को कभी भुलाया नहीं जायेगा कि जब लोग धडाधड मर रहे थे तब भी प्रदेश के कुछ शासक और प्रशासक जनता की सुरक्षा की चिन्ता की बजाय धन के प्रबंध में तल्लीन थे। उनके लिए इंसानी जानों से कहीं ज्यादा अपना धन-दौलत से भरपूर सुरक्षित भविष्य मूल्यवान था। इसके लिए उन्होंने इंसानियत को भी बेच खाया था...।

Thursday, March 25, 2021

खाकी शैतान... खादी भगवान?

 वर्षों बाद महाराष्ट्र का एक वजनदार मंत्री अपने ही जाल में फंस चुका है। उसे लपेटे में लेने का दम दिखाने वाला कोई और नहीं वो भारतीय पुलिस सेवा का १९८८ के बैच का उच्च अधिकारी है, जिस पर कल तक गृहमंत्री विश्वास, स्नेह और कर्तव्यनिष्ठ होने के पुरस्कार लुटा रहे थे। सालभर से दोनों की प्यार-मोहब्बत मजबूत जंजीरों से बंधी दिखायी दे रही थी। लग रहा था दोनों में बेहतरीन तालमेल बना हुआ है। इस मुंबई पुलिस कमिश्नर जिसका नाम परमबीर सिंह हैं, ने मंत्री जी के दमदार आशीर्वाद से कितनी माया समेटी यह तो अबूझ पहेली ही बनी रहेगी। ऐसे रहस्य कभी पूरी तरह से नहीं खुल पाते। २०२१ के फरवरी माह में परमबीर सिंह ने अपने परम आका देशमुख पर यह आरोप जडकर तहलका मचा दिया है कि साहब बहादुर उस पर प्रतिमाह १०० करोड की अवैध वसूली कर उनकी झोली में डालने का दबाव डाल रहे थे, जो उसे रास नहीं आया। ५८ साल के इस खाकी अधिकारी को इस बात का भी घोर मलाल था कि उसके नीचे काम करने वाले साथी को भी बेवजह निलंबित कर दिया गया। वो भी पुलिसिया दस्तूर की तमाम वफादारियां निभाता चला आ रहा था। उनकी तरह वह भी सरकार तथा मंत्री के इशारों पर नाचते हुए कानून का रक्षक होने की आड में भक्षक बना हुआ था। फिर भी उसकी कद्र नहीं की गई। यह तो सरासर नादिरशाही है, कर्तव्यपरायणता की बेकद्री है। मंत्री पर अफसर के आरोप लगाये जाते ही सभी 'ईमानदार नेता' उनकी तरफ खडे हो गये। अफसर अकेले पड गये। मंत्री के भक्त नारे उछालते दिखे, नेताजी आप आगे बढो, हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे साथ थे। डरो नहीं। देशभक्त नेताओं पर तो भारत में भ्रष्टाचार के आरोप तो लगते ही रहते हैं। इन छोटे-मोटे आरोपों से काहे का घबराना। जब काजल की कोठरी में पांव धर ही दिए हैं, तो कालिख भी सफेद खादी को कहां बख्शने वाली है। हर सफेदपोश नेता को ऐसे बुरे दिन देखने ही पडते हैं। फिर आपके साथ तो अपने शरद पवार जी का भी पूरा आशीर्वाद है। उनके होते हुए आपकी राजनीति पर कभी आंच नहीं आ सकती। कुछ ही वर्ष पूर्व जब महाराष्ट्र में कांग्रेस, राष्ट्रवादी गठबंधन की सरकार थी तब तक एक अत्यंत ही सभ्य और ईमानदार पुलिस कमिश्नर ने तब के गृहमंत्री छगन भुजबल पर आरोप लगाया था कि साहब बहादुर मोटी रिश्वतें खाते हैं। नोटों की थैलियां लेकर उनकी वहां नियुक्ति की जाती है, जहां धन की बरसात होती है। अपराधियों को शह देने का पाठ पढाने वाले धनखोर मंत्री इसी कोशिश में रहते हैं कि भले ही चोर, हत्यारे छूट जाएं, लेकिन उनके यहां थैलियां पहुंचती रहें। कई अफसरों को हर माह उनके यहां देन पहुंचाना परिपाटी बन चुका है। उस कर्तव्यपरायण अधिकारी को छगन का चलन इतना चुभा था कि उसने रातों-रात नौकरी को लात मार दी थी। आज भी बीस साल बाद सच्चे कर्मयोद्धा की तरह वे अदालतों से गरीबों, असहायों के लिए लडाई लडते हैं। छगन भुजबल को बाद में अपने काले कारनामों के कारण जेल जाना पडा था। कई महीने जेल में रहे इस राष्ट्रभक्त की पीडा थी कि बुरे वक्त में उसका किसी ने साथ नहीं दिया। आका शरद पवार भी मुंह मोडकर बैठ गये। छगन के शब्द थे कि यहां दलित नेताओं का यही हश्र होता है। वो मालदार बन जाएं तो सही और हम धनवान बनते ही गुन्हेगार हो जाते हैं। यह तो भेदभाव ही है, जो राजनीति में चलाया जा रहा है और दलितों को रुलाया जा रहा है...। कभी सडक किनारे सब्जी का ठेला लगाकर पच्चीस-पचास के लिए तरसने वाला यह दलित नेता आज हजारों करोड का स्वामी है। कहां से आया इतना माल? इसका उत्तर न कभी छगन देंगे, न मायावती, और न ही वो सभी दलित तथा सवर्ण नेता, जिनके भाई, बंधु, अरबपति, खरबपति बन चुके हैं। उन्हीं की चमत्कारिक राजनीति की बदौलत जिसपर ज़रा-सी आंच आने की कल्पना तक उन्हें डराने लगती है। तरह-तरह के कवच ओढने लगते हैं, बहाने बनाने लगते हैं। अपने अनुयायियों के कानों में मंत्र फूंकने में जुट जाते हैं कि हम पर होने वाला अन्याय तुम पर किसी वार से कम नहीं। इसलिए एक हो जाओ। जो हमें भ्रष्टाचारी कहें उन्हें पीट-पीटकर अधमरा कर दो। बाकी हम देख लेंगे। एक सुलगता सच यह भी जनाब कि... छगन भुजबल वर्तमान महाराष्ट्र सरकार में दमदार मंत्री हैं। किस बात के ईनाम स्वरूप मंत्री बने हैं आप ही तय करें...।

Friday, March 19, 2021

बस... सावधान

"हां मारा है, तो...? उत्तर प्रदेश के एक फाइव स्टार होटल में पत्रकारों की पिटायी के बाद यही जवाब दिया प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने। पुराने समाजवादी बाप के इस बेटे की तरह अकडने, झगडने वाले नेता और भी हैं, जिन्हें पत्रकारों को लताडने और अपमानित करने में बडा मजा आता है। अपने यहां के अधिकांश पत्रकार फिर भी बददिमाग लडाकू गुंडे किस्म नेताओं के आगे-पीछे डोलने से बाज नहीं आते। जिस युवा राजनेता के इशारों पर उनकी पार्टी के बेलगाम कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों को लाठी, डंडों, घूसों और थप्पडों से अंधाधुंध मारा-पीटा आजकल उनका पारा काफी चढा रहता है। भारत के नेता सत्ता से बाहर होने के बाद बौखलाये रहते हैं। जब सत्ता पर काबिज रहते हैं, तब तो पत्रकारों को जमीनें, लिफाफे, महंगे उपहारों से नवाजते रहते हैं। हां मारा है, तो...? के धमकी भरे अंदाज और उग्र तेवर दिखाने की बजाय पत्रकारों की सुरक्षा का जिम्मा अपने सिर पर ओढे रहते हैं। इस बहादुर धमकीबाज ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने पिता का अनुसरण कर अपनी आरती गाने वाले पत्रकारों, संपादकों की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहने दी। इस दरियादिली का यही मकसद था कि मीडिया के ये चेहरे हमेशा उनके प्रति वफादार बने रहेंगे। सत्ता आज है कल नहीं। इस अटल सच से हर नेता वाकिफ है, लेकिन सत्ता के छिनने के बाद समाजवादी बाप के समान बेटे ने कभी कल्पना नहीं की थी उनकी जी-हजूरी करने वाली फौज बागी हो जाएगी। उन्हीं से ऐसे-ऐसे सवाल करने लगेगी, जिनका जवाब देना मुश्किल होगा। पिछले कई महीनों से पत्रकारों को कोसने का चलन तेजी से बढा है। उन्हीं की बिरादरी में विभाजन की रेखाएं खिंच चुकी है। अखबारनवीसों को तो सम्मान मिल जाता है, लेकिन न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं ने खुद को लोगों की निगाह से गिराते हुए तमाशा बना कर रख दिया है। अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर तथा संवाददाता और संपादक इस भ्रम में जीने लगे थे कि वे अपने आप में बहुत बडी हस्ती हैं। उनके भीतर इस भ्रम को पनपाने में राजनीति, राजनेताओं का अहम योगदान है। अपने देश में कई चैनली बाबू करोड में खेल रहे हैं। भ्रष्ट नेताओं की इनकी काली कमायी के असली स्त्रोतों का पता लगाना आसान नहीं है। यही वजह है कि अधिकांश चैनल वाले यारी दोस्ती के चलन दस्तूर पर चल रहे हैं। वे किसी से पंगा नहीं लेते। अपने दोनों हाथों में लड्डू रखकर पत्रकारिता का आनंद लूट रहे हैं। उनपर कभी भी किसी नकली समाजवादी को अकड दिखाते नहीं देखा जाता। वे तो आज भी शाम को उनकी महफिलों का हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद में एक बारह साल के बच्चे ने मंदिर का पानी क्या पिया कि उसे अपराधी मान लिया गया। मासूम को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपतराय, महात्मा गांधी ने इसी दिन के लिए तो अपनी शहादत नहीं दी थी। वे तो किसी बर्बरता की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। वोटों के लिए इंसानों को जाति-धर्म, समाज, अपने परायों में बांटने वाले लालुओं, भालुओं, मुलायमों, अखिलेशों ने राजनीति को युद्ध के मैदानों में तब्दील करके रख दिया है। चुनावों के मौसम से पहले ही हिंसा और मारकाट शुरू हो जाती है। अब तक चुनाव जगाते कम डराते ज्यादा हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले हिंसा का जो दौर चला है, उससे हर सजग भारतीय हैरान है। ताज्जुब की बात तो यह भी है कि हिंसा में भी फायदे तलाशे जा रहे हैं। पच्चीस-पचास की कुर्बानी से यदि बाजी पलटी जा सकती है या दोबारा सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है तो खून की नदियां बहाने में कोई हर्ज नहीं... ऐसा वो राजनेता भी मान चुके हैं। भले ही खुलकर दिखाते नहीं, लेकिन उनके इशारे सब कह रहे हैं। नेता और व्यक्ति विशेष के विरोध की राजनीति हर किसी के लिए डराने वाली है। नेता की मौजूदगी में उसी के गुंडों के द्वारा पत्रकारों को पीटने के पीछे एक बडा कारण यह भी है कि इस नेता और उसकी तरह के अधिकांश नेताओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी दे रहा है। वे जितना विरोध करते हैं, बकवासबाजी करते हैं उससे वो 'कर्मवादी' और बलशाली होता चला जा रहा है। जनता को इतनी समझ तो है ही कि कौन सच्चा देश सेवक है और किस-किस ने भारत को निरंतर लूटा-खसोटा है।

Thursday, March 11, 2021

उदास शहर का दर्द

    शहर हैरान है। वह बोलता नहीं। देखता तो है। अपने चेहरे-मोहरे में लाये जा रहे अच्छे बदलाव से उसे प्रसन्नता होती है। मन खिल उठता है, लेकिन यह जो शर्मनाक तमाशे हो रहे हैं, उसे कतई नहीं सुहाते। उसकी भी अपनी संस्कृति है। संस्कार हैं। जिनकी बदौलत पूरे देश में उसके नाम का डंका बजता है। दूर-दूर से लोग बार-बार उससे मिलने आते हैं। कई लोगों को तो यह शहर इतना भाता है कि वे यहीं बस जाते हैं। शहर भी उन्हें भरपूर मान-सम्मान के साथ अपनाता है। उसकी नजर में सभी एक समान हैं। जात-पात-धर्म, गरीबी, अमीरी उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। मायने रखती है तो बस इंसानियत, भाईचारा, मेल-मिलाप और अपराधमुक्त स्वच्छ और पवित्र वातावरण। शहर को ऐसी बेवकूफियों, घटिया हरकतों और ऐसी खबरों से सख्त नफरत है, जो बार-बार उसकी साख पर बट्टा लगाती हैं...।
   "पैसों की बारिश का झांसा, लडकियों से निर्वस्त्र पूजा" ...हां यही शीर्षक है उस पहली खबर का, जिसने शहर को गमगीन कर दिया। फिर से निराशा के गर्त में धकेल दिया। इस आधुनिक युग में कुछ जादू-टोना का जाल फैलाने वाले शैतानों ने १६ से १८ वर्ष की ल‹डकियों को ५ करो‹ड रुपये दिलाने का लालच देकर अपने जाल में फांस लिया। कम उम्र की लडकियों से मेलजोल ब‹ढाकर उन्हें शहर से दूर ले जाया जाता था। पैसों के लालच में वे भी सहर्ष तैयार हो जाती थीं। ल‹डकियों को धूर्त यह कहकर अपने मजबूत घेरे में ले लेते थे कि वे चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास महाकाली की अपार शक्ति है। यह तो अच्छा हुआ कि एक किशोरी की सजगता के कारण ५० करोड के कडकते नोटों की बारिश करने का लालच देनेवाले ल‹डकियों की अस्मत के लुटेरे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिये गये हैं। उनके मोबाइल में कई कम उम्र की ल‹डकियों की निर्वस्त्र तस्वीरें मिली हैं।
कोविड की दूसरी लहर आने की वजह से शहर में लॉकडाउन लगा था। पुलिस वाले ब‹डी सतर्कता के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। स‹डक पर सन्नाटा था। सभी अपने-अपने घरों में बंद थे। होटल और पान ठेले भी बंद हो चुके थे। ऐसे में जब गश्ती दल को एक घर के सामने से गुजरते समय कोई हलचल होते दिखी तो वह चौकन्ना हो गया। घर के बाहर महंगी-महंगी मोटर साइकलों तथा आलीशान कारों की कतारें लगी थीं। तब पुलिस ने वही किया जो उसे करना चाहिए था। घर के अंदर का नज़ारा देखकर पुलिस वाले दंग रह गये। वहां तो युवक-युवतियों का मेला लगा था। मौजमस्ती की जबरदस्त पार्टी चल रही थी। किसी के हाथ में शराब का गिलास तो किसी के हाथ में बीयर की बोतल थी। नशीले तंबाकू वाला हुक्का भी अपने जलवे दिखा रहा था। यानी हर नशे का भरपूर आनंद लिया जा रहा था। रात के दो बजे के बाद घर से बाहर नशे में मदमस्त होकर कानफाडू डीजे के शोर में झूमने, चूमने-चाटने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ कर गुजरने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। यह कोई मामूली परिवारों की बिगडी हुई औलादें नहीं। किसी का बाप ब‹डा कारोबारी तो किसी का पुलिस अधिकारी है। इन्हीं के शागिर्दों ने शहर के आशादीप शासकीय महिला आश्रय गृह बनाम सुधार गृह में लडकियों तथा महिलाओं को निर्वस्त्र नाचने को मजबूर कर दिया। इस आश्रय स्थल बनाम सुधार गृह में दुनियाभर की उन सतायी नारियों को पनाह दी जाती है, जिनका दूर-दूर तक कोई अपना नहीं। कुंवारी माताएं, विधवाएं और पारिवारिक हिंसा की शिकार असहाय महिलाएं यहां आती तो हैं, शांति और सुरक्षा के साथ स्वावलंबी बनने के लिए, लेकिन उनका अक्सर चीरहरण होता रहता है। सरकारी आशादीप में रात के अंधेरे में लडकियों के शोषण की जानकारी अखबारों को भी होती है, न्यूज चैनलों के धुरंधर भी अनभिज्ञ नहीं होते, लेकिन उनके लिए अब ऐसी खबरें कोई अहमियत नहीं रखतीं। वे भी 'याराना' निभाने की परिपाटी के गुलाम हैं। जब लडकियों ने जान-समझ लिया कि मीडिया उनकी नहीं सुनने वाला तो उन्होंने आखिरी दांव के तौर पर कुछ तेजतर्रार युवा कार्यकर्ताओं को अपना दुखडा कह सुनाया तथा उन्हें निर्वस्त्र नचाने वाला वीडियो भी वायरल हो गया तो जहां-तहां हंगामा मच गया। मंत्री और राजनीति के सोये शेर जाग गये।
    खाकी वर्दी वालों की तरह कुछ डॉक्टर भी शैतान बनने के मौके तलाशते रहते हैं। उन्हें भी वासना की आंधी इस कदर बेकाबू तथा अंधा करती रहती है कि क्या कहें...। वह महिला कोरोना उपचार केंद्र में बडे भरोसे के साथ इलाज के लिए भर्ती हुई थी। वहां के एक डॉक्टर ने उसे अपने जाल में फांसने के लिए पहले तो उससे मीठी-मीठी बातें कीं। उसे जल्दी स्वस्थ हो जाने का विश्वास दिलाते हुए मोबाइल नंबर भी ले लिया। सडक छाप लोफरों की तरह आधी-आधी रात को उसके स्वास्थ्य की जानकारी लेने के बहाने फोन पर फोन करने लगा। इसी दौरान उसने अपनी असली मंशा प्रकट करते हुए सीधे-सीधे देह सुख की मांग कर दी। बीमार महिला को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। अय्याश डॉक्टर ने चुप्पी को ‘हांङ्क मान लिया। रात के दो बजे धडधडाते हुए उसने अस्पताल पहुंचकर जबरदस्ती बीमार महिला को छत पर ले जाने की मर्दाना कसरत की। महिला विरोध करते हुए जोर-जोर से चीखी-चिल्लायी तो सोये हुए दूसरे मरीज भी जाग गए। पूरे अस्पताल में सनसनी फैल गई। रिश्तेदार भी अस्पताल पहुंच गए। सभी ने उसे जूतों, चप्पलों, मुक्कों, तमाचों से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। अस्पताल के कर्मचारियों ने किसी तरह से बीच-बचाव कर उसे मुर्दा होने से बचाया।
    अपनों के गम से उबरना बहुत मुश्किल होता है। उस पर बेटी को खोने का गम! वो भी दहेज लोभी दामाद के हाथों! २६ फरवरी, २०२१ को साबरमती नदी में कूदकर जान देने वाली आयशा रोज़ शहर के सपनों में आती है। उसका बस यही सवाल होता है कि पुरुषों का लालच कब खत्म होगा! पत्नी को सामान नहीं इंसान मानने की भावना कब पूरी तरह से जागेगी? यह पहली आयशा नहीं, जिसने धनलोलुप पति के आतंक से तंग आकर मौत को गले लगाया हो। यह ऐसा शर्मनाक सिलसिला है, जो थम ही नहीं रहा है। अपनी बेटी को खोने के गम में डूबे पिता के इन शब्दों ने शहर को रुला दिया, "मेरी बेटी तो सदा-सदा के लिए चली गई। कम अज़ कम अब तो होश में आओ। दूसरी बेटियों को तो बचा लो। कब तक हिन्दू-मुसलमान करते हुए नफरत के बीज बोते रहोगे। हुक्मरानों देश की असली समस्याओं से नज़रे चुराना बंद करो।"
    ८ मार्च २०२१, विश्व महिला दिवस की सुबह जब शहरवासी जागे तो उन्होंने शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर लगे होर्डिंग्स पर यह संदेश लिखा पाया तो दंग रह गये, "लडकियो डरो नहीं, लडो। धन के लालची पतियों से शेरनी की तरह भिड जाओ। मौत के हकदार वे हैं, तुम नहीं। तुम तो इस सृष्टि की रचयिता हो। बेटी, आयशा यदि तुम बेरहम पति के गाल पर तमाचे जड उससे अलग होने का ऐलान करती और बहादुर नारी की तरह हर जंग के मैदान में डटी रहती तो कितना अच्छा होता। बिटिया, कोई भी परिवार अपनी बेटी को खोना नहीं चाहता। बेटियां भटकाव के लिए नहीं, सही राह के लिए हैं। मेरी हर बेटी से यही विनती है कि, कोई भी गलत कदम उठाने से पहले हजार बार सोचना...।" शहर में लगे इन पचासों होर्डिंग्स को किसने लगाया, अभी तक पता नहीं चल पाया है...।