जीते जी तो नहीं, मरने के बाद मेरे मित्र अमन का सपना पूरा हो गया। अभी-अभी मैं उसके घर से लौटा हूं। अमन के उम्रदराज पिता ने बाकायदा सभी मित्रों को निमंत्रण-पत्रिका भी भिजवायी थी, जिसमें अमन के सपने का उल्लेख था। अमन मेरा सबसे प्रिय दोस्त था। हमराज था। सुख-दु:ख का पक्का साथी था। भले ही उम्र में वह मुझसे काफी छोटा था। हम दोनों काफी समय एक साथ बिताते थे। एक-दूसरे से कुछ भी नहीं छुपाते थे। पिछले साल बहुतों की तरह कोरोना ने उसे भी अंतिम यात्रा पर भेज दिया। अमन ने अपनी मेहनत के दम पर चंद वर्षों में करोड़ों रुपये कमाये थे। प्रापर्टी और थोक कपड़े के व्यापार में उसका खासा नाम था। सफल व्यापारी होने के बावजूद भी वह बेहद भावुक इंसान था। धन से ज्यादा उसकी नज़र में रिश्तों का मान था। दोस्त भी उसके लिए रिश्तेदार से कम न थे। उसने अपने ही चचेरे भाइयों से विषैला धोखा खाया था। अपनी ही जायदाद के लिए महीनों कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटे थे। जीत आखिर सच की ही हुई थी...।
अपने दस हजार वर्गफुट के पुराने घर को ढहाकर आलीशान बंगला बनाना प्रारंभ कर दिया था उसने। उसकी एक खासियत और भी थी, गीत-गजलों और कविताओं का बेहद दिवाना था। पुरानी फिल्में देखने का भी उसे जबरदस्त शौक था। हिन्दी के विख्यात गजलकार दुष्यंत कुमार के गजल संग्रह ‘साये में धूप’ तथा मुनव्वर राणा की कालजयी कृति ‘मां’ की सैकड़ों प्रतियां दोस्तों तथा रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप अर्पित करने वाला अमन चालीस साल की आयु में अस्सी साल के विविध खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने अंदर समेट चुका था। यह सब हुआ था उन किताबों और पत्रिकाओं की बदौलत, जिन्हें पढ़े बिना उसे चैन नहीं आता था। लोग त्योहारों के अवसर पर नये-नये कपड़े खरीदते हैं, वह नये-पुराने लेखकों की किताबे खरीद कर आनंदित होता था। बड़े से बड़े पढ़ाकू साहित्यकार के यहां आने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं से ज्यादा पत्रिकाएं डाक से अमन के घर के पते पर आती थीं। वह इनका नियमित पाठक और सहृदयी शुल्कदाता था। कला मंच, व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़े मित्र उसकी शेरो-शायरी तथा साहित्य की गहरी समझ से विस्मित रहते थे। अक्सर वे सोचा करते थे कि इतना व्यस्त रहने वाला कारोबारी गीत-गज़लों तथा उपन्यासों को पढ़ने के लिए समय कैसे निकालता होगा। वह वाकई किसी पहेली से कम नहीं था। अमन सिर्फ नाम का ही अमन नहीं था। वह जब धर्म-कर्म के नाम पर लोगों को एक दूसरे पर टूटते देखता तो बिखर कर रह जाता था। शहर के अनाथालयों में गुप्तदान देने और वृद्धाश्रमों में समय-समय पर जाकर सहायता का हाथ बढ़ाने तथा असहाय स्त्री-पुरुषों का आशीर्वाद लेना वह कभी नहीं भूलता था। नये बंगले में उसने अपनी खास प्रायवेट लायब्रेरी बनवानी प्रारंभ कर दी थी। वह अक्सर मुझसे कहता कि अपनी घरेलू लायब्रेरी का उद्घाटन आपसे करवाऊंगा और सभी मित्र छुट्टी के दिनों में गज़लों कविताओं, शेरो-शायरी के रस सागर में डूबने का आनंद लेंगे। कोविड-19 का आतंक जब सभी को डराने लगा था और मौतों की झड़ी लगने लगी थी, तब वह सभी दोस्तों को सतर्क और सुरक्षित रहने के सलाह देता नहीं थकता था, लेकिन किसे पता था कि दूसरों की चिंता-फिक्र करने वाला अमन खुद कोरोना के नुकीले पंजों में ऐसा फंसेगा कि हफ्तों अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी बच नहीं पायेगा। रिश्तेदार, दोस्त, सभी चाहने वाले रोते-बिलखते रह जायेंगे।
उसकी मौत की खबर मेरे लिए अत्यंत असहनीय थी। कई दिनों तक मैं गम में डूबा रहा था। अमन की मोती-सी चमकती आंखें और मुस्कुराता चेहरा आज भी तब मेरे सामने था, जब उसके पिता के साथ खड़ा मैं आलीशान बंगले के विस्तृत बरामदे से जुड़े कमरे में बनी लायब्रेरी के उद्घाटन का फीता काट रहा था। मेरी आंखें दो चेहरों पर जमी थीं। पैंसठ वर्षीय अमन के पिता, जिन्होंने अपने बेटे के सपने को साकार करने के लिए किसी उत्सव की तरह पूरे घर को सजाया था। उनकी आंखों में ठहरे आंसुओं को देखकर मेरी आंखे बार-बार नम हो रही थीं। नये बने बंगले का विशाल बरामदा पीपल के सूखे पत्तों से पटा था, जिन्हें अब कभी भी हरा नहीं होना था। फिर भी बेटे के सपने को एक पिता ने साकार कर दिखाया था। अमन के पिताश्री ने हम सभी का परिचय चाय की ट्रे लिए घूमती उस युवती से करवाया, जिससे उनका दुलारा शादी करने वाला था, लेकिन किस्मत दगा दे गयी। पैंतीस-छत्तीस साल की डॉक्टर रागिनी के बारे में हम सबने खबर पड़ी थी... कि कैसे उसने मौत के कगार पर झूलते एक गंभीर कोरोना मरीज को अपने मुंह से कृत्रिम सांस देकर बचाया था। बाद में वह खुद भी कोरोना की शिकार हो कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रही थी। लायब्रेरी का उद्घाटन सम्पन्न होने के बाद जब सभी मेहमान चले गये थे, तब बुजुर्ग पिता ने मुझे यह भी बताया था कि डॉ. रागिनी उनकी बेटी से भी बढ़कर है। जिस दिन अमन ने अंतिम सांस ली, तब भी वह उसके साथ थी। उन्होंने कई बार उसे अपने घर लौट जाने को कहा, लेकिन वह नहीं मानी। बस यही कहती है, आपको अकेला नहीं छोड़ सकती। इस बेटी ने तो मेरे अंदर नई आशा और ऊर्जा भर दी है। अब तो मैं अमन के फैलाये बड़े कारोबार को धीरे-धीरे समेटने में लगा हूं और मेरी दिली तमन्ना है कि रागिनी की शादी किसी अच्छे नौजवान से हो जाए, जो इसे हर तरह से खुश रख सके। रागिनी के लिए कोई सर्वगुण संपन्न युवक देखने के उनके अनुरोध के जवाब में मैंने कहा था कि रागिनी तो काफी समझदार है। वह अपना जीवनसाथी खुद तलाश कर लेगी। तो उनका जवाब था कि वह तो अब शादी ही नहीं करना चाहती, लेकिन मुझे हर हाल में पिता होने का फर्ज निभाना है। क्या पता कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए। मैंने तो अपनी और बेटे की सारी जायदाद इसके नाम कर दी है। मेरे यह पूछने पर कि दोनों ने समय रहते शादी क्यों नहीं की तो उनका कहना था कि दोनों पिछले दस वर्ष से एक-दूसरे के प्यार में गिरफ्तार तो थे, लेकिन अमन को अपने व्यापार में तो रागिनी को अपने अस्पताल से फुर्सत ही नहीं थी। मैं चिन्तित रहता था। अमन की मां भी कब की स्वर्गवासी हो चुकी है। आखिरकार मैंने ही पिछले साल उनके परिणय सूत्र में बंधने की तारीख पक्की कर दी थी, लेकिन कोविड-19 ने अपनी मनमानी और अनहोनी कर दी।
‘‘अमन ही जब इस दुनिया में नहीं रहा तो इस लायब्रेरी के अब क्या मायने हैं?’’ मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए उन्हें ज्यादा सोचना नहीं पड़ा था।
‘‘यह लायब्रेरी अब उसके सभी दोस्तों और सभी पुस्तक प्रेमियों के लिए हमेशा खुली रहेगी। किताबें पड़ते युवा चेहरों में मैं अपने अमन को देखूंगा। मैंने लायब्रेरी में आने-जाने के लिए अलग रास्ता भी बना दिया है, जिसकी जब इच्छा हो यहां आ सकता है...।’’ मैं जब से उनसे मिलकर लौटा हूं तब से डॉ. रागिनी के बारे में सोच रहा हूं। ताज्जुब... आज भी ऐसे प्रेमी और प्रेमिकाएं जिन्दा हैं, जिन्हें कब का किताबों में कैद किया जा चुका है। आते वक्त मैं खुद से प्रश्न कर रहा था। अमन ने इतनी बड़ी बात मुझसे क्यों छुपाये रखी? वह तो हमेशा डॉ. रागिनी को अपनी अच्छी दोस्त भर बताता था...। अब कुछ और सवाल भी मुझे भटकाये हैं। इस अद्भुत रिश्ते पर मैं लम्बी कहानी लिखना चाहता हूं। पिछले चार घण्टों में बीस-पच्चीस पन्ने लिख-लिख कर फाड़ चुका हूं। कहानी की शुरूआत ही नहीं हो पा रही है। पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ? जब भी लिखने बैठा दिमाग से तेज कलम दौड़ती रही। आज कलम रेंग ही नहीं रही!
Thursday, September 23, 2021
अमन लायब्रेरी
Thursday, September 16, 2021
फूट डालो, राज करो
पटना से नई दिल्ली जा रही तेजस राजधानी एक्सप्रेस में अजीब तमाशा चल रहा था। तमाशेबाज थे बिहार के विधायक गोपाल मंडल। तेज रफ्तार से दौड़ती रेलगाड़ी में जब सभी यात्री सोने की तैयारी में थे, तब पता नहीं उन्हें क्या सूझी कि उन्होंने अपने कपड़े उतार फेंके। अखाड़े के पहलवान की तरह चड्डी-बनियान में वे कंपार्टमेंट से कंपार्टमेंट का सैर-सपाटा करने लगे। उनकी नंग-धड़ंग घुमायी को देखकर सहयात्री हैरान-परेशान हो गये। महिलाओं ने शर्म से अपनी नज़रें इधर-उधर टिकानी प्रारंभ कर दीं। फिर भी घंटों विधायक के अश्लील दीदार होते रहे। काफी देर बाद भी जब उनका रेल गाड़ी में बदमाशों की तरह टहलना बंद नहीं हुआ तो पुरुष सहयात्रियों ने उन्हें कम अज़ कम गमछा या टावेल लपेट लेने को कहा, तो वे भूखे शेर की तरह गुर्राते हुए बदतमीजी पर उतर आए, ‘यह रेलगाड़ी तुम लोगों के बाप की नहीं, जो मुझे रोक-टोक रहे हो। फिर मैं कोई आम इंसान नहीं, विधायक हूं। वो भी उस पार्टी का, जिसका बिहार में शासन चल रहा है।’ सत्ता के नशे में चूर विधायक ने शराब भी जम कर पी रखी थी। उसकी डगमगाती चाल और बेकाबू जुबान बता रही थी कि वह जनप्रतिनिधि होने के काबिल बिलकुल नहीं है। बाहुबल, जात-पात और धनबल के दम पर यह दंभी और ओछा शख्स विधायक बनने में कामयाब तो हो गया है, लेकिन इंसानियत इससे कोसों दूर है। ये जनप्रतिनिधि खुद को सर्वशक्तिमान माने है और दूसरों को कीड़ा-मकोड़ा। जिसे लोगों के साथ उठने-बैठने और व्यवहार करने का सलीका नहीं पता वो अपने क्षेत्र की उस जनता के खाक काम आता होगा, जिसने इसे अपना कीमती वोट दिया है। सारी रात सहयात्रियों को अपनी नंगाई दिखाने और उन्हें गोली से उड़ा देने की धमकी देने वाले घटिया विधायक के खिलाफ थाने में रिपोर्ट तो दर्ज करवा दी गयी है, लेकिन सभी जानते हैं कि उसका बाल भी बांका नहीं होने वाला।
सरकारी संपत्ति को अपने बाप-दादा, परदादा की जागीर समझने और खुलेआम हेकड़ी दिखाने की गुंडे बदमाशों वाली गंदगी और भी कई राजनेताओं के खून में समायी हुई है। देशभर के दलितों के खैरख्वाह होने का दावा करने और सिर्फ और सिर्फ मंत्री की कुर्सी के लिए जीवनपर्यंत पगलाये रहने वाले स्वर्गीय राम विलास पासवान के सांसद बेटे चिराग पासवान को भी घमंड हो गया है कि वह दलितों और शोषितों का एकमात्र मसीहा है। यह हकीकत दीगर है कि वह अपने बाप के नाम की बैसाखी पकड़ कर राजनीति के मैदान में कूदने-फादने के लायक बन पाया है। सभी को पता है कि देश की राजधानी में नेताओं को उतने समय तक सरकारी बंगला दिया जाता है, जब तक कि वे सांसद रहते हैं। चुनाव में पिट जाने अथवा निधन के पश्चात उस बंगले पर उनका या उसके परिजनों का कोई हक नहीं रहता, लेकिन अहंकारी और मंदबुद्धि वाले चिराग तो खुद को दूसरों से ऊंचा मानते हैं तभी तो अपने पिता केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के गुजर जाने के बाद भी 12, जनपथ बंगले पर खूंटा गाड़ कर जमे हुए हैं। हद तो ये भी कि बंगले को अपने पिताश्री के नाम का स्मारक बनाने के लिए उन्होंने ‘राम विलास पासवान स्मृति’ बोर्ड तक टांग दिया है। उनका कहना है कि उनके पिताश्री इस देश के महान राजनेता थे, इसलिए उनके नाम को अमर रखने के लिए ही उन्होंने बोर्ड लगाने का करिश्मा किया है। यानी चिराग बाबू को पता था कि सरकार तो यह महान काम करने से रही इसलिए उन्होंने ही यह ‘पुण्य’ कर दिखाया! लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि जबरन अपनों की याद में ‘स्मृतिभवन’ अपनी ही जमीन पर बनाये जाते हैं। सरकारी जमीन पर नहीं।
येन-केन-प्रकारेण सरकारी बंगलों को हथियाने की ऐसी कलाकारियां हिंदुस्तान में ही दिखायी जाती हैं। विदेशों में तो मंत्री, सांसद, विधायक अपना कार्यकाल समाप्त होते ही सरकारी बंगले खाली कर चलते बनते हैं, लेकिन यहां एक बार सांसद, मंत्री बन क्या जाते हैं कि सरकारी जमीनों को कब्जाने और हथियाने में दिमाग खपाने लगते हैं। देश के प्रदेश झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने विधानसभा के प्रांगण में गले में जयश्री राम लिखा अंगवस्त्र पहनकर हनुमान चालीसा का पाठ किया। विधानसभा भवन में इस पूजा-पाठ की वजह बनी सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की चालाकी, जिससे वशीभूत होकर विधानसभा में नमाज अदा करने के लिए एक अलग कमरा निर्धारित कर दिया गया। विधानसभा तो जनहित के लिए चिंतन-मनन करने और कानून बनाने के लिए है, लेकिन झारखंड की सरकार ने लोकतंत्र के मंदिर में मुसलमान विधायकों को नमाज के लिए अलग कमरा आवंटित कर पाखंडी राजनेताओं की असली नीयत और मंशा उजागर कर दी है। पूजा, अर्चना और नमाज के लिए देश में मंदिरों और मस्जिदों की कोई कमी नहीं है। यदि प्रदेश की सरकार को अपने विधायकों, मंत्रियों, संत्रियों के पूजा-पाठ की इतनी ही चिन्ता-फिक्र थी तो अन्य सभी को भी खुले मन से कमरे आवंटित कर देती, जिससे झमेला और हंगामा तो नहीं होता, लेकिन सत्ताधीशों को ऐसे खेल खेलने में मज़ा आता है। लोगों के बीच उन्माद फैलाये बिना उन्हें खुद के नेता होने की अनुभूति ही नहीं होती। जहां मौका पाते हैं, वहीं मजहबी दीवारें खड़ी करने की साजिशें करने लगते हैं, ताकि देशवासी बंटे रहें। एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहें। कट्टरता पनपती रहे। खून-खराबा होता रहे। लाशें बिछती रहें और इनके वोटों की फसल पकती रहे...।
Thursday, September 9, 2021
गंगा-जमुना महिला गृह उद्योग
शहर के बदनाम गंगा-जमुना इलाके में एक बहुत पुराना-सा हवेलीनुमा मकान। ढहने और बिखरने को आतुर पुरानी ईंटो की थकी हुई दीवारें। कुछ दिन पहले तक इस विशाल कोठे में रौनक की रोशनी थी। आज सन्नाटा, अंधेरा और ठहरापन है, जो किसी को भी खौफज़दा कर सकता है। पंद्रह कमरों वाले इस कोठे के तेरह कमरों के दरवाजों पर ताले जड़े जा चुके हैं। वेश्याएं यानी वारांगनाएं खाली कर इधर-उधर जा चुकी हैं। मजबूरन अपने वर्षों के ठिकाने को छोड़कर जा चुकी वारांगनाओं का यहां से पीठ करके जाने का बिलकुल मन नहीं था। अब इस कोठे में चार वारांगनाएं बची हैं। इनमें से एक बीस वर्षीय युवती है, जिसे कुछ महीने पूर्व ही अपने प्रेमी की दगाबाजी के चलते जिस्म बेचने के धंधे को अपनाना पड़ा है। इन चारों का यहां से रुखसत होने का कोई इरादा नहीं, लेकिन जो हालात हैं, वो शायद ही इन्हें यहां चैन से टिकने दें। चारों अपने-अपने भविष्य को लेकर बीते बीस दिनों से माथापच्ची कर रही हैं। कोठे की मालकिन कल्याणी अस्सी वर्ष की हो चुकी है। चारों का भविष्य अनुभवी, उम्रदराज कोठे की मालकिन कल्याणी के निर्णय पर टिका है। वे हमेशा कल्याणी की हर बात मानती आयी हैं। कल्याणी भी उन्हें अपनी संतान से कम नहीं चाहती। कल्याणी की एक सगी बेटी और जवान बेटा कोविड-19 की भेंट चढ़ चुके हैं। लॉकडाउन में भले ही ग्राहक कम आते थे, लेकिन भूखे सोने की नौबत नहीं आती थी, लेकिन अब तो कभी चूल्हा जलता है, कभी नहीं। जबसे गंगा-जमुना में आने वाले रसिकों का रास्ता रोकने के लिए पुलिस का पहरा लगा है और बेरीकेट्स लगाये गये हैं, तब से कल्याणी गहरे सदमें में है। उसने अपने बेटी-बेटे को सदा-सदा के लिए खोने के गम को तो किसी तरह से बर्दाश्त कर लिया, लेकिन देहमंडी की सैकड़ों वेश्याओं पर आये जानलेवा संकट की चिंता और तकलीफ उसे दिन-रात खाये जा रही है। उसने कई दिनों से किसी से बातचीत नहीं की है। बस चुपचाप खटिया पर लेटी पता नहीं क्या-क्या सोचती-विचारती रहती है।
सुबह से दोपहर होने को है। युवती ने सुबह बड़ी मुश्किल से उसे चाय पीने को राजी किया था। खाना तो पता नहीं उसने कितने दिनों से नहीं खाया। ऐसे में चारों ने भी बिना खाये रहना सीख लिया है। गंगा-जमुना रोड पर दोनों तरफ कच्चे-पक्के मकानों की लंबी कतारें हैं, जिनमें कुछ वेश्याएं ही अभी तक टिकी हुई हैं। पुलिस की तीखी निगाहें हर पल इनकी लाल ईंटों वाले घरों पर गढ़ी रहती हैं। उनके होते कोई ग्राहक तो आने से रहा। बेरोजगारी और भूख अब लगभग हर छोटी-बड़ी वेश्या का मुकद्दर है, क्योंकि इस बदनाम बस्ती के वजूद के खात्मे के लिए शासन-प्रशासन ने पूरी तरह से कमर कस ली है। तब की बात अलग थी, जब लगभग ढाई सौ वर्ष पहले इस बस्ती का उत्कर्ष काल था। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि देहमंडी से पहले यहां पर भोसले राजा की घुड़साल थी। भोसले राज नागपुर से लेकर मध्यभारत, झारखंड और उड़ीसा तक फैला था। थके-हारे सैनिक जब यहां आते थे, तो घुड़साल के निकट आराम फरमाते थे। उनके मन बहलाने के लिए कई राज्यों की तवायफों को यहां पर निमंत्रित किया जाता था। यही तवायफें नाच, गीत गायन और मुजरे से दिल बहलाकर सैनिकों की थकान उतारती थीं। तब एक लड़की थी गंगा, जिसका तब जबरदस्त जलवा था। उसकी थिरकन हर किसी का मन मोह लेती थी। जब उसकी उम्र जवाब देने लगी तो उसकी जगह उसकी छोटी बहन जमुना ने ली। उन्हीं नर्तकियों में कुछ ऐसी भी होती थीं, जो मौका देख अपनी देह तक अर्पित कर देती थीं। वर्ष दर वर्ष बीतने के बाद नाचने-गाने वाली तवायफों की जगह वेश्याओं का वर्चस्व बढ़ता चला गया। हवसखोरों को देह-सुख देने वाली इस देहमंडी को दूर-दूर तक ‘गंगा-जमुना’ के नाम से जाना जाने लगा।
अपने उदय काल में यह बस्ती वीराने में थी, दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा रहता था, लेकिन धीरे-धीरे बस्ती में मस्ती खोरों की बड़ी संख्या में आवाजाही और शहर के फैलने के साथ-साथ लोगों ने इसी बस्ती के आसपास कौड़ी के मोल जमीनें खरीदकर अपने आशियाने तान लिए। दुकानें भी खुल गईं। शराबखाने भी आबाद होते चले गये, जहां मेलों-सी भीड़ लगने लगी। कालांतर में इसी भीड़ ने शरीफों को चिंतित और विचलित करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें अपनी बहन, बहू, बेटियों की इज्जत खतरे में पड़ती नजर आने लगी। फिर तो धड़ाधड़ विरोध के स्वर उठने लगे। समाजसेवक और नेता इस बदनाम बस्ती की हस्ती मिटाने या कहीं बहुत दूर ले जाने की मांग का बिगुल बजाने और बजवाने लगे, लेकिन इस बार का नगाड़ा कुछ ज्यादा ही तेज और कर्कश हो गया है। गंगा-जमुना के कोठों और विभिन्न ठिकानों पर ताले जड़वाने वाले पुलिस आयुक्त का फूल-मालाएं पहनाकर आदर-सत्कार और अभिनंदन किया गया। किस्म-किस्म के नेता और समाजसेवक भी आमने-सामने आ गये। कुछ को बाजार में बेरीकेट्स लगवाना अन्याय लगा, तो कुछ को अत्यंत हितकारी।
दोपहर धीरे-धीरे शाम की ओर खिसकती जा रही है। चारों वारांगनाओं को कल्याणी के निर्णय का बेसब्री से इंतजार है। शहर के कुछ दैनिक समाचार पत्रों तथा न्यूज चैनल के संवाददाता कोठी के बरामदे में जमा होने लगे हैं। चारों देहजीवाएं अपने-अपने भविष्य को लेकर आशंकित और घबरायी हुई हैं। देह के धंधे में कुछ ही महीने पहले धकेली गयी युवती को आज बार-बार उस युवक की याद आ रही है, जो लगभग रोज उसके पास आता और नोट लुटाता था। दरअसल, वह उसकी खूबसूरती पर मर मिटा था और युवती उसकी मासूमियत पर। उसे पता नहीं क्यों पक्का भरोसा हो चला था कि यही नौजवान उसे इस दलदल से बाहर निकाल सकता है, इसीलिए उसने एक रात अपने मन की बात कह दी थी, ‘‘जब तुम मुझे इस कदर चाहते हो तो मुझे अपनी पत्नी क्यों नहीं बना लेते?’’ युवक ने ऐसे चौंकाने वाले प्रस्ताव की कभी उम्मीद नहीं की थी। फिर भी उसने जवाब देने में देरी नहीं लगायी, ‘‘यदि तुमने अपना कुंआरापन नहीं खोया होता तो मैं तुमसे शादी करने में एक पल भी देरी न लगाता।’’ उसके इस जवाब ने उसपर ऐसी बिजली गिरायी कि उसका पूरा बदन ही नहीं दिल-दिमाग भी झुलस कर रह गया।
घना अंधेरा होने से पहले कल्याणी ने भी अपना निर्णय सुनाते हुए सभी को हतप्रभ कर दिया है, ‘‘बहुत सोचने-विचारने के पश्चात मैंने अंतिम फैसला किया है कि अब मेरे इस कोठे में कभी भी वेश्यावृत्ति नहीं होगी। मेरी अभी तक की पूरी जिन्दगी इसी बदनाम पेशे में बीती है। मैं यह भी जानती हूँ कि इस बस्ती की सैकड़ों वारांगनाएं शहर से दूर जिस वीराने में भी अपना ठिकाना बनायेंगी, वहां पर कुछ ही महीनों में एक नयी देह की मंडी आबाद हो जाएगी। हवस के पुजारी बिना किसी विज्ञापन के अपने आप वहां पर पहुंचने लगेंगे। ऐसी कई बस्तियों को बनते और उजड़ते हुए मैंने अपनी आंखों से देखा है। आज जब सरकार हमें इस कीचड़ से निकालना चाहती है, तो हमें इस मौके को गंवाने की भूल नहीं करनी चाहिए। कब तक हम पुलिस के डंडे की मार के साथ इस नर्क को झेलती रहेंगी! यह हकीकत कितनी पीड़ादायी है कि चंद सिक्कों के बदले जिन्हें हम अपनी अस्मत और जवानी सौंप देती हैं वही अंतत: हमें अछूत करार दे देते हैं। ऐसा जीना किस काम का? अपना नहीं तो अपने बाल-बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए सम्मानजनक तरीके से मेहनत-मजदूरी कर जीने-खाने से धीरे-धीरे हर कलंक धुल जाएगा। मैंने अपनी करोड़ों की कोठी जिसे कोठा कहा जाता है, किसी बिल्डर को बेचने की बजाय अपनी वारांगना बहनों, बेटियों को सौंपने का निर्णय लिया है। सरकार ने वेश्याओं के पुनर्वास के जो इरादे दर्शाये हैं उनके पूरे नहीं होने पर मैं खुद सड़क पर उतरूंगी। कुछ ही दिनों में गंगा-जमुना का एक नया चेहरा सभी के सामने होगा। इसकी शुरुआत हम सब मिलकर करने जा रही हैं। कोठे में ही महिलाओं को अपने पैरों पर अच्छी तरह से खड़े होने का प्रशिक्षण दिया जायेगा। यहीं पर रेडिमेड कपड़ों के निर्माण के लिए सिलाई मशीनें लगेंगी। आचार, पापड़, नूडल्स, मैगी, मसाले, नमकीन, साबुन, सर्फ आदि का निर्माण कर बस्ती की हर बहन-बेटी को आत्मनिर्भर बनाया जाएगा। मेरा दावा है कि, वो दिन दूर नहीं जब इसी बदनाम इलाके गंगा-जमुना को नारी शक्ति तथा हस्तकला उद्योग की शानदार बस्ती के रूप में जाना-पहचाना जाएगा। हम सभी बहनें साथ थीं और हमेशा साथ रहेंगी।’’
Thursday, September 2, 2021
विषैले कसाई
विश्वास, अंधविश्वास, श्रद्धा, अंधश्रद्धा, शंका, कुशंका, प्यार, नफरत। कहने को तो ये शब्द हैं, लेकिन इनके भाव, प्रतिभाव समुद्र से भी गहरे हैं, जिन्हें नापना और अनुमान लगाना कभी भी आसान नहीं रहा। सदियां बीत गयीं कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आ पायी। फिर भी उलझन बरकरार है। किसी पर विश्वास होने पर इनसान सब भूल जाता है। अपना सबकुछ दांव पर लगा देता है, लेकिन जिनकी धोखा देने की फितरत है वे तो अपनी आदत से बाज नहीं आते। बिहार के सारण में सांपों से खेलने, उनपर भरोसा रखने और उन्हें पालने का शौक रखने वाले 24 वर्षीय मनमोहन उर्फ भुंअर ने रक्षाबंधन के दिन जिद पकड़ ली कि बहन उसके प्रिय सांप को भी राखी बांधे। बहन ने भाई के अनुरोध का मान रखते हुए नाग को राखी तो बांध दी, लेकिन इसी दौरान उसने मनमोहन को ऐसा डसा कि उसकी हालत बिगड़ने लगी। अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते उसकी सांसों की डोर टूट गयी। मनमोहन बीते दस साल से झाड़-फूंक करता चला आ रहा था। पूरे इलाके में जहरीले नागों को पकड़ने के लिए उसे बुलाया जाता था। सांप के द्वारा डसे गये कई लोगों की उसने जान बचायी थी। सांपों को पालने का शौकीन मनमोहन नाग-नागिन के जोड़े को हमेशा अपने साथ रखता था। नाग को तो वह अपना भाई मानता था, इसलिए उसने बहन से राखी बंधवायी थी। झाड़-फूंक कर दूसरों की जिंदगी बचाने वाले मनमोहन पर कोई झाड़-फूंक और जादू-टोना काम नहीं आया। इस हकीकत में असंख्य कहानियां कैद हैं। यह मात्र विषैले सांप का जाना-पहचाना सच नहीं है। कई इनसानों की भी यही फितरत है, जो साथ और सहारा देता है उसी के भरोसे का कत्ल करने में देरी नहीं लगाते। अपने भले के लिए दूसरों पर शंका की उंगली नंगी तलवार की तरह तान देते हैं।
महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के एक गांव के चौराहे पर दिनदहाड़े वृद्ध पुरुष और महिलाओं को खंभो से बांधकर पीटा गया। वजह थी, जादू-टोने का शक, जिसने गांव वालों को इस बार भी अंधा और निर्दयी बना दिया। इन अक्ल के अंधों में अनपढ़ों के साथ-साथ पढ़े-लिखे भी शामिल थे, जिन्होंने कितनी बार पढ़ा और सुना होगा कि ‘जादू-टोना’ महज बकवास है। कुछ बेवकूफ धूर्तों की सोच की घटिया उपज है, लेकिन फिर भी इनकी मंदबुद्धि इन्हें जगाने की बजाय विषैली नींद में सुलाये रखती है। गांव की दो-तीन औरतों का दावा था कि उन्हें देवी आती है। उसी ‘देवी’ ने सपने में उन्हें बताया कि गांव के आठ-दस दलित जादू-टोना कर गांव वालों की जान लेने पर तुले हैं। उन्हीं के जादू-टोने से ही बीमारियां फैल रही हैं और मौतें हो रही हैं। उन देवीधारी महिलाओं के रहस्योद्घाटन पर शत-प्रतिशत यकीन करते हुए गुस्सायी भीड़ तुरंत वहां जा पहुंची, जहां तथाकथित जादू-टोना करने वाला परिवार रहता था। गंदी-गंदी गालियां और मौत की नींद सुला देने की धमकियां देते हुए दलित उम्रदराज पुरुष और महिलाओं को घर से खींचकर बाहर निकाला गया और उनका जुलूस निकालते हुए गांव के चौराहे पर लाकर खंभे से बांधकर निर्दयता के साथ पीटा गया। दलितों, असहायों, गरीबों, शोषितों पर यह जुल्म पता नहीं कब से होता चला आ रहा है। कमजोर और सहनशील होना भी अपने आप में किसी पाप से कम नहीं। इस सच को भारतीय महिलाओं से बेहतर और कौन जान पाया है। हो सकता है कि कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लगे, लेकिन आज भी ऐसे कई मर्द हैं, जिन्हें नारी का सिर उठाकर चलना आहत करता है। उन्हें नज़रें झुका कर चलने वाली नारियां ही चरित्रवान लगती हैं। किसी दूसरे पुरुष से बात करने का मतलब है कुलटा और पथभ्रष्ट होना।
मध्यप्रदेश के सिंगरोली जिले के निवासी रामलाल को दूसरी औरतों से मिलना और बोलना-चालना तो पसंद था, लेकिन अपनी पत्नी पर उसने बंदिशें लगा रखीं थीं। दो-तीन बार उसने अपनी पत्नी को किसी के साथ मुस्कुराते हुए बातचीत करते क्या देखा कि उसका खून खौल गया। पत्नी ने लाख कस्में खायीं कि उसका किसी गैर मर्द से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं, लेकिन रामलाल के लिए उसकी पत्नी का किसी गैर के साथ खुलकर बतियाना... उसकी मर्दानगी को ललकारने और उसपर चोट करने वाला ऐसा दुस्साहस था, जिसने उसे पूरी तरह से विवेकशून्य कर दिया। वह इस निष्कर्ष पर जा पहुंचा कि पत्नी बेवफा है। भरोसे के कतई लायक नहीं। एक रात शराब खाने में उसने जीभरकर शराब पी। नशे में धुत होकर घर में पहुंचते ही पत्नी को बेतहाशा पीटने लगा। बेबस पत्नी अपना कसूर पूछती रही, लेकिन उस पर तो शक का भूत सवार था। उसने रोती-बिलखती, दया की भीख मांगती पत्नी को जमीन पर पटका और पूरी ताकत लगाते हुए उसके प्राइवेट पार्ट को सुई धागे से सिल दिया।
अपनी ही पत्नी के साथ इस तरह की हैवानियत करने की यह पहली शर्मनाक करतूत नहीं है। उत्तरप्रदेश के रामपुर में भी एक पुरुष की दो साल पहले शादी हुई थी। एक दिन पत्नी को उसने किसी पुरुष के साथ बातचीत करते देखा तो उसका माथा घूम गया। उसे शक हो गया कि दोनों में टांका भिड़ा हुआ है। उसकी खूबसूरत बीवी उसकी गैर मौजूदगी में अपने आशिक के साथ गुलछर्रे उड़ाती है। फिर तो दोनों के बीच कहा-सुनी और झगड़ा होना रोजमर्रा की बात हो गई। एक दिन जब पत्नी गहरी नींद में थी, तब शक्की पति ने पहले तो उसके मुंह में कपड़ा ठूंसा फिर उसके गुप्तांग में तांबे की तार से टांके लगा दिये। पत्नी असहनीय पीड़ा से चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन विषैला शैतान ठहाके लगाता रहा। पुलिस हिरासत में भी वह एक ही पहाड़ा रटता रहा कि उसकी पत्नी आवारागर्दी करती है। जब देखो तब किसी भी गैर मर्द से बोलने-हंसने लगती है, जिसे देख उसका खून खौल जाता है। आखिर वह मर्द है... उसकी बर्दाश्त करने की भी कोई हद है। जब उसे अति पर अति होते दिखी तो उसने उसका प्राइवेट पार्ट ही सिल दिया, ताकि वह अपने किसी भी नये-पुराने आशिक के साथ जिस्मानी रिश्ता न बना पाए।
पुणे जिले की खेड़ तहसील के एक छोटे से ग्राम में रहने वाले अवध की दो बेटियां हैं। बेटे को जन्म नहीं देने के कारण आये दिन पत्नी को प्रताड़ित करना उसकी आदत बन गया। अवध के माता-पिता भी आये दिन बहू को कोसते रहते। बेटे की देखा-देखी हाथ भी उठा देते। इसी बीच पति किसी तांत्रिक की शरण में जा पहुंचा। तांत्रिक ने उसके कान में जो मंत्र फूंका उसी का पालन करते हुए उसने घर जाकर पहले तो पत्नी को निर्वस्त्र किया फिर उसके शरीर पर भस्म और हल्दी-कूंकू मल दिया। काफी दिनों से जुल्म सहती पत्नी ने पुलिस स्टेशन पहुंचने में देरी नहीं की। अवध अब जेल की हवा खा रहा है।
Thursday, August 26, 2021
सिद्धि और मुक्ति
यह कोई चलचित्र है, कहानी है या खबर है? पूरे बाइस साल बाद भटकते-भटकते उदय अपने गांव आया था। जब वह लापता हुआ था, तब आम इंसानों जैसा उसका हुलिया था। आज वह जोगी के भेस में था। तब से एकदम अलग जब दो बच्चों का पिता होने के बावजूद एक रात अचानक उसने अपना घर-बार त्याग दिया था। क्यों किया था उसने ऐसा? कोई भी नहीं जानता। पत्नी भी नहीं, जो उसे जी-जान से चाहती थी। सबकुछ ठीक चल रहा था। दोनों एक बेटे और बेटी के माता-पिता बन चुके थे। एक रात उदय के मन में कौन से विचार ने खलबली मचायी कि वह भगौड़े की तरह घर-बार को छोड़ चलता बना। तब बेटा तीन और बेटी मात्र एक साल की थी। उदय की पत्नी सविता और माता-पिता ने उसकी बहुतेरी खोजबीन की। उसके इंतजार में कई रातें जागकर काटीं, लेकिन वह नहीं लौटा। रांची के निकट स्थित सेमोरा गांव के लोगों के बीच वह कई महीनों तक चर्चा का विषय बना रहा। हर किसी के अपने-अपने शक और अनुमान थे। दूसरी औरत के चक्कर में गायब होने की अफवाहों का शोर जब उदय की पत्नी सविता के कानों तक पहुंचता तो उसकी आंखें छलछला आतीं। दोनों एक दूसरे को टूट कर प्यार करते थे। कभी कोई मनमुटाव नहीं हुआ। लड़ाई झगड़ा तो बहुत दूर की बात थी। दोनों अपने बेटी-बेटे के अच्छे भविष्य के सपने को साकार करने के लिए कितनी-कितनी योजनाएं बनाते नहीं थकते थे। सविता ने धीरे-धीरे लोगों की बातों की तरफ ध्यान देना बंद कर अपने बच्चों की अच्छी परवरिश में खुद को झोंक दिया। उसने दिन-रात परिश्रम करते हुए इतने पैसे कमाने शुरू कर दिये, जिससे दोनों बच्चों को किसी ठीक-ठाक स्कूल, कॉलेज में पढ़ा सके। बच्चों ने भी कर्मठ मां के परिश्रम को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्हें तो अपने जन्मदाता का चेहरा तक याद नहीं था। मां ही उनकी पिता थी।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोग भी उदय को भूलते चले गये। अधिकांश रिश्तेदारों तक ने यही मान लिया कि वह अब इस दुनिया से विदा हो चुका है। अगर जिन्दा होता तो कहीं तो नजर आता! सविता ने अपने पति की चिता तो जलते नहीं देखी, लेकिन उसका चित्त जरूर राख हो गया। उस राख में दबी चिंगारियों की तपन उसके बदन को सतत जलाती रही, लेकिन फिर भी उसने कभी हार नहीं मानी। अपने सास-ससुर की भी पूरी देखभाल करती रही। समय ने घर के हर सदस्य को उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था, जहां उदय का कोई नामो-निशान नहीं था। अपने काम में हरदम व्यस्त रहने वाली सविता बहुत कम इधर-उधर जाती थी, लेकिन एक दिन उसने अपने हाथ में सारंगी लिए एक जोगी को गोरखनाथ के भजन गाते... अपने घर के इर्द-गिर्द चक्कर काटते देखा। उसे वो चेहरा काफी जाना-पहचाना लगा। फिर भी पहले दिन तो उसने अपने दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं दिया, लेकिन दो-तीन दिन तक बार-बार देखने के बाद उसके दिल-दिमाग ने ऐलान कर दिया कि भिक्षा मांगने वाला जोगी और कोई नहीं, उसका पति उदय ही है। एक ही झटके में वह उसके सामने जाकर खड़ी हो गयी। वह भी एकाएक उसे सामने खड़ा पा स्तब्ध रह गया, लेकिन फिर भी उसने खुद को संभाले रखा। सविता उसके पांव पकड़ बिलख-बिलख कर रोने लगी। पहले तो उदय जिद पर अड़ा रहा कि वह उसे बिलकुल नहीं जानता। वह तो जन्मजात संन्यासी है। उसका इस दुनिया में कहीं कभी भी कोई स्थायी ठिकाना नहीं रहा। दोनों की बातचीत सुनकर धीरे-धीरे आते-जाते लोगों की भीड़ लग गई। गांव वाले सविता के सम्मानजनक चरित्र और संघर्ष से वाकिफ थे। कभी भी उसे किसी से उलझते नहीं देखा गया था। बस अपने काम से काम रखने वाली सविता के पक्ष में पूरा गांव खड़ा हो गया। लाख अपना पक्ष रखने के बावजूद उदय की जब दाल नहीं गली तो उसने स्वीकारा कि वही उसका भगौड़ा पति है, लेकिन अब वह उसके साथ नहीं रह सकता। जोगी धर्म अब उसे गृहस्थ जीवन जीने की आज्ञा नहीं देता। वह तो अपनी पत्नी से भिक्षा लेने आया था, ताकि उसे सिद्धि मिल सके। पत्नी से भीख प्राप्त करने के बाद ही उसे पूरी तरह से सांसारिक जीवन से मुक्ति मिलेगी। एक तरफ सिद्धि पाने के लिए उदय ‘मुक्ति’ मांग रहा था, वहीं सविता उससे अपना पति धर्म निभाने की जिद पर अड़ी थी। समझदार हो चुके बच्चे भी अपने उस पिता का रास्ता रोककर खड़े हो गये, जिसे वे परलोकवासी मानते थे।
जिस वक्त उदय को सभी अपने घर-परिवार में लौट आने के लिए मनाने में लगे थे, ठीक उसी वक्त संतरानगरी नागपुर में एक अस्सी वर्षीय वृद्ध माता-पिता को अपने बासठ वर्ष के बेटे को वृद्धाश्रम में छोड़ने को विवश होना पड़ रहा था। वृद्धाश्रम चलाने वाले भी इस अद्भुत नजारे को देखकर हैरान थे। अभी तक तो उन्होंने बेटों को ही अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में जबरन छोड़कर खुशी-खुशी ऐसे जाते देखा था, जैसे उनके सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो, लेकिन यहां तो माता-पिता रो-रोकर बेहाल थे। अपने कलेजे के टुकड़े को वृद्धाश्रम में छोड़कर जाते समय उनके चेहरे पर तसल्ली का जो भाव था उसे पढ़ पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। वे अब पूरी तरह से आश्वस्त थे...। उनके बेटे की पत्नी ने सभी का जीना दुश्वार कर दिया था। शादी के कुछ दिनों के बाद लड़ने-झगड़ने लगी। सास-ससुर का सम्मान करना तो उसे कभी आया नहीं। पति को भी अपना गुलाम समझने लगी। सास-ससुर का हस्तक्षेप उसे शूल की तरह चुभता। उन्हें कुछ ही वर्ष में समझ आ गया कि बहू को उनका घर में साथ रहना नापसंद है। इसलिए उन्होंने अपने रहने की अलग व्यवस्था कर ली। बेटा कभी-कभार जब अपने मां-बाप से मिलने जाता तो वह घर में हंगामा खड़ा कर देती। दो बेटों की मां बनने के बाद भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया। उलटे अब तो वह और भी खूंखार हो गई और पति पर हाथ उठाने लगी। मां की देखा-देखी बच्चे भी पिता को मारने-पीटने लगे। समाज में बदनामी के भय से सीधा सरल पति वर्षों तक पत्नी और बेटों की गुंडागर्दी सहता रहा। जब वह सरकारी नौकरी में था तब उसकी तनख्वाह के पूरे पैसे छीन लिए जाते। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन पर भी पत्नी और बेटों का ही हक था। उसे तो बस भिखारी की तरह अपमानित होकर जैसे-तैसे दिन काटने पड़ रहे थे। एक दिन तो सबने मिलकर उसे लाठी-डंडों से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। कपड़े खून से रंग गये। अब तो उम्रदराज माता-पिता को बेटे की हत्या का डर सताने लगा। अंतत:, जालिम पत्नी और बेटों से ‘मुक्ति’ दिलाने के लिए वे उसे वृद्ध आश्रम लेकर आ गये...।
Thursday, August 19, 2021
पुलिस जिन्दाबाद
कोरोना की वजह से लगे लॉकडाउन ने सभी के लिए तकलीफें खड़ी कीं। अपने ही घर में कैदी होना पड़ा। कुछ लोग कभी भी नियम-कायदों का पालन करने में यकीन नहीं रखते। इन्हें लॉकडाउन की बंदिशें बेकार लगीं। यह लोग गली-कूचों, सड़कों-चौराहों पर सैर-सपाटा करने के लिए जब-तब निकलते देखे गये। खाकी वर्दीधारियों ने पहले तो उन्हें प्रेम से समझाया, लेकिन जब वे नहीं माने तो सख्ती भी करनी पड़ी। लोगों की सुरक्षा और शांति बनाये रखना पुलिस का कर्तव्य है। हर नागरिक कानून का पालन करे और अपराधियों के हौसले बुलंद न होने पाएं यह देखना भी पुलिस के जिम्मे है। अधिकांश खाकी वर्दीधारी अपना दायित्व निभाने की भरसक कोशिश करते हैं। अपवाद तो हर जगह होते हैं। कोरोना काल में पुलिस की कर्तव्यपरायणता और उदारता की कई तस्वीरें सामने आयीं, जिन्हें देखकर लोग बरबस नतमस्तक होने को विवश हो गये।
पुलिसवाले भी आखिर इंसान हैं। उनसे भी लोगों की मजबूरी छिपी नहीं रहती। कोरोना महामारी के चरमकाल में असंख्य लोगों का रोजगार छिन गया था। रोज कमाने-खाने वालों के घरों में चूल्हे नहीं जल रहे थे। झुग्गी बस्तियों में तो हाहाकार मचा था। पुलिस अधिकारियों ने स्वयं कई विपदा के मारों के यहां जाकर खाने के पैकेट्स, दूध, दवाएं बांटीं। फुटपाथ पर अपना जीवन-बसर करने वालों को भी उन्होंने भूखे नहीं सोने दिया। खाकी वर्दी की सेवा भावना, संवेदनशीलता और दरियादिली को देखकर लोग बार-बार ‘पुलिस जिन्दाबाद’ के नारे लगाकर आभार जताते देखे गये।
भारतीय पुलिस विभाग में एक से एक उदार, कर्मठ जुनूनी वर्दीधारी हैं, जो जाने-अनजाने लोगों की भरपूर मदद कर चौंकाते रहते हैं। देश के विशाल प्रदेश उत्तरप्रदेश में एक पुलिस वाला ‘मोहब्बत का रखवाला’ कहलाता है। मात्र 9 महीने में 18 प्रेमी युगलों के प्यार को शादी के मुकाम तक पहुंचा चुके कोतवाल देवेंद्रकुमार शर्मा के पास वो प्रेमी जोड़े बड़ी उम्मीद के साथ पहुंचते हैं, जिनके परिजन उन्हें परिणय सूत्र में बंधता नहीं देखना चाहते। शर्मा किसी को भी निराश नहीं करते। वे स्वयं प्रेमी-प्रेमिका के माता-पिता को समझा-बुझाकर मनाते हैं। उसके बाद उनकी मंदिर में परिजनों की उपस्थिति में खुशी और उत्साहपूर्ण वातावरण में शादी करवा देते हैं। शर्मा कहते हैं कि मैंने जिद्दी माता-पिता के विरोध के कारण कई प्रेमी-प्रेमिकाओं को मौत का आलिंगन करते देखा है। प्यार करने वालों का दुखद अंत मुझसे नहीं देखा जाता। शुरू-शुरू में तो मैं भी प्रेमी जोड़ों को फटकार और दुत्कार दिया करता था, लेकिन एक बार एक जोड़े ने मुझसे हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया कि प्लीज हमारी शादी करवा दीजिए नहीं तो हम रेल के नीचे आकर कट मरेंगे, तो मैं कांप गया। तभी मैंने सच्चे प्रेमियों की शादी करवाने की ठान ली। तब से चला सिलसिला आज भी जारी है और आगे भी सतत चलता ही रहेगा। मेरी निगाह में प्रेमियों को मिलाने से बड़ा और कोई पुण्य नहीं।
अपराधियों के हौसले पस्त करने के लिए खाकी वर्दीधारियों के द्वारा की जाने वाली कसरत से तो सभी वाकिफ हैं, लेकिन उनके और भी कई वंदनीय, अभिनंदनीय और प्रेरक चेहरे हैं...। नागपुर पुलिस में डीसीपी के पद पर कार्यरत हैं, लोहित मतानी। कुछ दिन पूर्व उन्हें मीरा नामक एक 45 वर्षीय महिला के घोर संकटग्रस्त होने का पता चला। सड़क दुर्घटना का शिकार होने के पश्चात मीरा को महीनों बिस्तर पर रहना पड़ा था। उसके बाद भी वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पायी। चलने और खड़े रहने तक में तकलीफ होने लगी। जहां पर काम करती थी, वहां से भी हमेशा-हमेशा के लिए उसकी छुट्टी कर दी गयी। डीएसपी मतानी ने मीरा की सहायता करने में देरी न करते हुए शहर के भीम चौक पर फूड स्टॉल लगवा दिया। उसकी तो जिन्दगी ही बदल गई। उसने तहे दिल से कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए स्टॉल के पोस्टर पर अधिकारी और उनके परिवार की तस्वीरें लगा रखी हैं। उसके लिए मतानी परिवार भगवान से कम नहीं। दरअसल, उसकी बहन पुलिस अधिकारी मतानी के यहां काम करती है। उसी ने मतानी की पत्नी को अपनी बहन के कष्ट में होने के बारे में बताया था। श्रीमती मतानी ने पति से मीरा की सहायता करने की पुरजोर सिफारिश की थी...। मीरा के स्टॉल पर पहुंचने वाले ग्राहक भी नतमस्तक हो जाते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि मीरा की खुशहाली में पुलिस अधिकारी का अभूतपूर्व योगदान है। मतानी इससे पहले भी आठ बेसहारा महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवा चुके हैं। इनमें से दो पर तो अपराध के मामले दर्ज हैं। ये सभी महिलाएं अपने रोजगार को बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए रात-दिन परिश्रम कर रही हैं।
रवि खडसे नागपुर में किराए का ऑटो चलाकर अपने भरे-पूरे परिवार का भरण पोषण करता है। बीते हफ्ते किसी गलती के कारण वह यातायात पुलिस की पकड़ में आ गया, जिसकी वजह से उस पर दो हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया गया। उसके पास इतने पैसे नहीं थे। इसलिए उसका ऑटो जब्त कर लिया गया। रवि गहन चिंता में पड़ गया। एकाएक इतने रुपये की व्यवस्था करना उसके लिए संभव नहीं था। घर पहुंचने के बाद वह और उसकी पत्नी इसी आफत से उबरने को लेकर बातचीत कर रहे थे। उनकी बातचीत को उनके दस वर्षीय बेटे ने सुना तो वह तुरंत अपनी गुल्लक उठा लाया, जिसमें उसकी वर्षों की बचत जमा थी। मासूम ने तुरंत अपनी गुल्लक फोड़ी और सारे सिक्के पिता को सौंप दिए। माता-पिता की आंखें नम हो गईं। रवि ने अपनी पत्नी और बेटे के साथ यातायात कार्यालय पहुंचकर एक, दो, पांच, दस रुपये के सिक्कों से भरी प्लास्टिक की थैली पुलिस अधिकारी को सौंपते हुए ऑटो वापस देने का निवेदन किया। चिल्लर पैसों ने अधिकारी अजय मालवीय को हैरानी में डाल दिया। रवि ने जब उन्हें बताया कि यह सारे पैसे बेटे ने अपनी गुल्लक में जमा करके रखे थे, तो मालवीय का दिल भर आया और उन्होंने थैली बच्चे के हाथ में थमाते हुए उसकी पीठ थपथपायी और खुद की जेब से दो हजार रुपये का जुर्माना भरकर ऑटो रवि के हवाले कर दिया। पांचवीं की पढ़ाई कर रहा बच्चा खाकी वर्दीधारी की सहृदयता देख दंग होकर सोचता रह गया। उसने तो पुलिस वालों के बारे में कितनी डरावनी और बात-बात पर गाली-गलौच करने, धमकाने, डंडे बरसाने की बातें सुनी थीं, लेकिन ये अधिकारी तो वैसा बिलकुल नहीं! घर लौटते समय सभी के चेहरे चमक रहे थे। तेजी से ऑटो दौड़ाते पिता से बच्चे ने धीरे से कहा, ‘पापा मैं भी खूब पढ़-लिखकर अंकल जैसा पुलिस वाला बनूंगा।’
पत्नी और बेटे को घर में छोड़कर रवि फौरन ऑटो चलाने के लिए निकल गया। रात को लौटते समय उसके हाथ में एक मजबूत लोहे की गुल्लक थी। रवि ने बेटे को कुछ सिक्कों के साथ गुल्लक देते हुए कहा, ‘‘प्लास्टिक की थैली में रखे चिल्लर के साथ इन्हें भी नयी गुल्लक में डाल दो। अब तुम्हें गुल्लक खोलने और तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे भी यह बहुत मजबूत है। बिलकुल तुम्हारी सोच, सपनों और इरादों की तरह...।’’
Thursday, August 12, 2021
इनकी भी तो सोचें
कोरोना की आपदा ने पढ़ने-लिखने वाले बच्चों को भी नहीं बख्शा। स्कूल-कॉलेज, कोचिंग क्लास सब बंद हो गये। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई करने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं बचा। मुसीबत की बिजली गिरी गरीबों के बच्चों पर, जिनकी लैपटॉप और मोबाइल खरीदने की हैसियत ही नहीं। दूर-दूर तक इंटरनेट कनेक्शन नहीं। इन बच्चों की संख्या हजार दो हजार नहीं, बल्कि करोड़ों में है। इनके मां-बाप इतना कमा ही नहीं पाते कि हजारों रुपये की कीमत वाले लैपटॉप, मोबाइल खरीद सकें। जो बच्चे इस देश का भविष्य हैं, उनकी शिक्षा की फिक्र सरकार को भी नहीं है। सरकार के समक्ष और कई बड़ी-बड़ी समस्याएं हैं, जिनके समाधान की चिन्ता उसे चौबीस घंटे खाये रहती है। वैसे भी अपना हिन्दुस्तान दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जहां के नेता अपनी कुर्सी को बचाये रखने की लड़ाई में ही हमेशा उलझे रहते हैं। गरीबों की तो बस उन्हें चुनावों के मौसम में ही याद आती है। तब वोटों के लिए मुफ्त में मोबाइल, लैपटॉप भी बांट दिये जाते हैं। कोरोना ने बिना परीक्षा दिए विद्यार्थियों को पास होने का जो मौका दिया है, वह भी देश को भविष्य में भारी पड़ने वाला है। जिन छात्र-छात्राओं ने किताबों का चेहरा नहीं देखा, खेलकूद और इंटरनेट के मायावी जाल में उलझे रहे उन्हें भी पास होने की खुशी मिल गयी। तीस-चालीस प्रतिशत अंक पाने की काबिलियत रखने वाले दसवीं-ग्यारहवीं-बारहवीं के विद्यार्थी बड़ी आसानी से साठ-सत्तर प्रतिशत अंक पाने में सफल हो गये। ऑनलाइन पढ़ाई के इस दौर को हमेशा याद रखा जाएगा। घर में बैठे-बैठे नकलें मारी और मरवायी गयीं, जिससे किसी विद्यार्थी पर भी फेल होने का ठप्पा नहीं लग पाया। ऐसे छल, कपट और धोखे भरे शत-प्रतिशत नतीजे देश को कैसे इंजीनियर, डॉक्टर और अधिकारी देंगे सोच कर ही चिन्ता होने लगती है। वैसे भी अपने देश में आरक्षण के चलते बहुतेरे जीरो भी हीरो बनते चले आ रहे हैं। कोरोना ने इस तादाद को और बढ़ाने के स्पष्ट संकेत दे दिये हैं। हालांकि कोरोना की मजबूरी सब पर भारी रही, लेकिन जिस तरह से आरक्षण के बलबूते पर छलांगे लगाने वालों पर तीर चलाये जाते हैं, उसी तरह से कोरोना काल में पिछले एसेसमेंट के आधार पर पास कर दिये गये छात्रों को भी शंका की निगाह से देखा जायेगा। कोई भी देश अच्छी और सच्ची शिक्षा के बिना बेहतर भविष्य की राह पर नहीं चल सकता। सरकारों का प्रथम कर्तव्य यही है कि हर बच्चे को पढ़ने-लिखने और खेलकूद के भरपूर अवसर मिलें, लेकिन इस महान देश में तो शिक्षा को लेकर घोर नजरअंदाजी का बोलबाला है। साठ प्रतिशत से अधिक स्कूलों, विद्यालयों में खेलकूद के मैदान ही नहीं हैं। उस पर यह रोना भी रोया जाता है कि यहां के युवा तरसा-तरसा कर ओलिंपिक में मेडल लाते हैं। दूसरे देशों के युवाओं की तुलना में ये एकदम फिसड्डी हैं।
यह सच ही तो है कि, धनवानों की नालायक औलादें डोनेशन और रिश्वत की बदौलत डॉक्टर, इंजीनियर आदि-आदि बनने में सफल हो जाती हैं। आरक्षण और धन के झुनझुने ने काबिलों को पीछे छोड़ने का सतत अपराध किया है। इसीलिए आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश वहां नहीं पहुंच पाया, जहां पर उसे होना चाहिए था। पिछले कई वर्षों ने देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की जा रही है, लेकिन सत्ता की कुर्सी के खिलाड़ियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। उन्हें तो देश के भविष्य की निरंतर होती दुर्गति को नजरअंदाज कर अपने सुखद भविष्य के सपनों को साकार करने में अपार संतुष्टि मिलती है। इंटरनेट, लैपटॉप और मोबाइल की चिन्ताजनक कमी से जूझने के मामले में बिहार पहले नंबर पर है, जहां पर 1 करोड़ 43 लाख छात्रों ने अभी तक अपने खुद के लैपटॉप और मोबाइल का चेहरा तक नहीं देखा है। इसी तरह से झारखंड में 35 लाख 32 हजार, कर्नाटक में 31 लाख 31 हजार, असम में 31 लाख 6 हजार छात्रों के पास डिजिटल डिवाइस नहीं हैं। उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, अरुणाचल, गोवा आदि में भी हर बच्चे के हाथ में मोबाइल लैपटॉप हो ऐसा कतई नहीं है। स्कूलों के बेबस मास्टरों का भी दिमाग चक्कर खाता रहता है। वे जानते-समझते हैं कि जो मां-बाप गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई की जानलेवा मार से त्रस्त हैं, वे अपने बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप कहां से लाकर दें। कोरोना की आपदा के खूनी पंजों से आहत अभिभावक नासमझ नहीं। वे जानते हैं कि पहले भी उनके बच्चों के ज्यादा अच्छे भविष्य के आसार नहीं थे, इस महामारी ने तो उन्हें और भी निराश कर दिया है। जो लोग साधन सम्पन्न हैं उन्हीं के बच्चों के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, टेक्नोक्रेट, प्रशासक अर्थशास्त्री तथा नेता मंत्री-संत्री बनने के सभी दरवाजे खुले थे और खुले हैं। गरीबों, असहायों की औलादें तो क्लर्क, स्कूल मास्टर, चपरासी और सेवक बनने के लिए ही जन्मती हैं। उनके लिए इससे आगे सोचना मना है। लोग सरकार से जानना चाहते हैं कि उनकी तिजोरी का धन आखिर जाता कहां है? दरअसल, सरकारों ने अपने खर्चे बेतहाशा बढ़ा लिये हैं। सरकारी कर्मचारियों के वेतन में ही औसतन चालीस से पचास प्रतिशत धन खत्म हो जाता है। केरल में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में 70 प्रतिशत आय खर्च हो जाती है और तमिलनाडु में 71 प्रतिशत। उस पर भी मोटी-मोटी तनख्वाहें झटकने वाले छोटे-बड़े नौकरशाह रिश्वतें खाने से बाज नहीं आते। अधिकांश राजनेताओं, प्रशासकों को वर्षों से भ्रष्टाचार की जो बीमारी लगी है, उसे खत्म करना फिलहाल तो असंभव दिखायी देता है। हर बार जब कोई नया शासक आता है तो अपने भाषणों में भ्रष्टाचार को नेस्तनाबूत करने की उम्मीदें जगाता है, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं।
सरकारों से ज्यादा उम्मीद रखना बेमानी है। ऐसे में सजग देशवासियों को ही सामने आना होगा। कोरोना काल में सभी ने देखा है कि अपने यहां के लोगों में सहायता और सेवा की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यहां एक नहीं अनेक सोनू सूद हैं, जो वक्त पड़ने पर अपनी जान तक की बाजी लगाते हुए संकटग्रस्त लोगों की तकलीफें दूर कर सकते हैं। महाराष्ट्र के पुणे से सटे पिंपरी-चिचवड की एक वर्षीय मासूम वेदिका शिंदे को एक ऐसी दुर्लभ बीमारी ने अपने शिकंजे में दबोच लिया था, जिसके लिए दुनिया के सबसे महंगे इंजेक्शन की जरूरत थी, जिसकी कीमत है, सोलह करोड़ रुपये। बच्ची के गरीब मां-बाप के लिए इतना महंगा इंजेक्शन खरीद पाना असंभव था। उन्होंने अपनी मासूम बेटी की जान बचाने के लिए अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया के जरिए वेदिका की बीमारी और महंगे इंजेक्शन की जानकारी देशवासियों तक पहुंचायी तो संवेदनशील दानवीरों ने कुछ ही दिनों में 16 करोड़ रुपयों की व्यवस्था कर दी। ये सच भी अत्यंत दुखदायी है कि दुनिया का महंगा इंजेक्शन लगाये जाने के बाद भी बच्ची चल बसी। यहां पर उन दानदाताओं की तो तारीफ तो करनी ही होगी, जिन्होंने एक अनजान बच्ची की जान बचाने के लिए दिल खोलकर आर्थिक सहायता देने में देरी नहीं की। हमारे देश में एक से एक समाजसेवक और दानवीर भरे पड़े हैं। वे यदि ठान लें तो गरीब छात्र-छात्राओं की मोबाइल और लैपटॉप की समस्या का भी चुटकी बजाते समाधान हो सकता है। सरकार को कुछ करना होता तो इस समस्या को जन्मने ही नहीं देती। देशभर की सामाजिक संस्थाओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों और तमाम सक्षम लोगों के बिना किस भेदभाव के सहायता के लिए सामने आने से निश्चय ही सरकारों के मुंह पर तमाचा पड़ेगा। हो सकता है तब उनकी आंखें खुल जाएं और अपने प्राथमिक कर्तव्य को निभाने लगें।
