Thursday, March 3, 2022

हत्यारे

    कोरोना से अभी पूरी तरह से दुनिया को मुक्ति मिली भी नहीं कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का आगाज हो गया। दो प्रतिद्वंद्वी मुल्कों की आपसी लड़ाई ने पूरे विश्व को भयभीत कर तीसरे विश्वयुद्ध के खतरे की शंका से झकझोर डाला। तोपों, बम-बारूदों वाली अंधी लड़ाई ने फिर से उन युद्धों की याद दिला दी, जिनमें लाखों लोगों की जानें जा चुकी हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे खूनी संघर्ष में एक से बढ़कर एक डरावने मंज़र दिल दहला रहे हैं। देखते ही देखते इंसान को राख में बदलने वाले बम गिराये जा रहे हैं। देश और दुनिया के उन अभिभावकों की नींदें उड़ चुकी हैं, जिनके बच्चे यूक्रेन में फंसे हैं। यह वो बच्चे हैं, जो खुशी-खुशी अपने सपनों को साकार करने के लिए यूक्रेन गये थे। यूक्रेन के जापोरीज्या चिकित्सा महाविद्यालय में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे आशीष ने वीडियो कॉल कर इंदौर निवासी अपने माता-पिता से थरथराते स्वर में बताया कि जहां वह रह रहा है वहां से पांच किलोमीटर दूर हो रहे धमाकों की आवाज उसे डरा रही है। हर तरफ जबर्दस्त अफरा-तफरी का माहौल है। दुकानों में राशन और एटीएम में नगदी पूरी तरह से खत्म हो गई है। दुकानदारों ने कार्ड से भुगतान लेने से मनाही कर दी है। उत्तरप्रदेश के बिजनौर निवासी सना उर्ररहमान जो कि इवानो फ्रेंकविस्क इंटरनेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस में प्रथम वर्ष का छात्र है, उसकी भी आपबीती आशीष से जुदा नहीं। अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर आशंकित सना का कहना था कि सुपर मार्केट में लोगों ने दाल, आटा, फल, ब्रेड, मैगी, जूस सबकुछ खरीद कर अपने-अपने घरों में जमा कर लिया है। ऐसे में हमें मैगी, फल, ब्रेड या जूस से गुजारा करना पड़ रहा है। इनका भी जल्द ही खत्म हो जाने का अंदेशा है। इसके बाद हमारा क्या होगा, हमें नहीं पता। कर्नाटक के 21 वर्षीय नवीन शेखरप्पा की तो जान ही छिन गयी। नवीन खार्किव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में फोर्थ ईयर का छात्र था। वह खाना खाने का सामान लेने के लिए स्टोर के पास खड़ा था। तभी किसी बंदूक की गोली ने उसके प्राण ले लिए। ऐसे हजारों आशीषों और सना उर्ररहमानों की दिल दहला देनेवाली हकीकतों ने उनके परिजनों की भूख और प्यास छीन ली। जब मैंने जाना कि यूक्रेन में भारत के करीब 14,000 मेडिकल छात्र हैं तो मैं स्तब्ध रह गया। अपने देश में तो मेडिकल कॉलेजों की भरमार है, तो कौन-सी वजह उन्हें विदेश तक खींच कर ले गयी? वही राजनेताओं, मंत्रियों, धन्नासेठों की धन की भूख और लूटमार। जिसने भारत देश को गर्त में ले जाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। अपने यहां निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने के लिए मां-बाप को कम से कम एक करोड़ रुपये की रिश्वती कुर्बानी देनी पड़ती है। इतनी बड़ी रकम की व्यवस्था आम परिवारजन तो सपने में भी नहीं कर सकते। इसलिए भारत में गरीब लड़के, लड़कियां डॉक्टर और इंजीनियर बनने के सपने देखते रह जाते हैं। यूक्रेन में डॉक्टर बनने के लिए मात्र बीस से पच्चीस लाख का ही खर्च आता है। यूक्रेन से मिली डॉक्टरी की डिग्री की पूरी दुनिया में मान्यता है। इसलिए भारत के साथ-साथ कई अन्य देशों के छात्र भी यहां अपने सपने पूरे करने के लिए आते हैं। मेडिकल छात्र की मौत के लिए क्यों न उन धनलोलुपों को कसूरवार माना जाए, जिनकी वजह से भारतमाता के लाल डॉक्टर बनने के लिए विदेश जाने को विवश होते हैं? रूस के साथ-साथ यह धनपशु भी भारतीय प्रतिभा के हत्यारे ही हैं। अब वक्त आ गया है, जब शोषक हत्यारों की शिनाख्त कर कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए।
    जब सभी को किसी भी तरह से अपनी जान बचाने और सुरक्षित अपने देश पहुंच की पड़ी थी तब हरियाणा की एक सत्रह वर्षीय लड़की ने तो मानवता का जीवंत ग्रंथ ही लिख डाला। हिंदुस्तान के हजारों छात्र-छात्राओं की तरह दादरी जिले की रहने वाली नेहा सांगवान भी यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रही है। युद्ध के शुरू होते ही उसके परिजनों ने उसकी वापसी की व्यवस्था कर दी थी, लेकिन नेहा ने यूक्रेन छोड़ने से इसलिए स्पष्ट इंकार कर दिया, क्योंकि उसका मकान मालिक युद्ध लड़ने के लिए जा चुका है। अब उसकी पत्नी और तीन बच्चे ही घर में अकेले हैं। नेहा को अपनी तकलीफ से कहीं ज्यादा उनकी तकलीफ का तीव्र अहसास हुआ और उसने उन्हें इस मुश्किल की घड़ी में अकेले छोड़ना कतई मुनासिब न समझते हुए तब तक आग में जलते यूक्रेन में रहने का पक्का इरादा कर लिया जब तक मकान मालिक वापस नहीं लौट आता। नेहा के पिता भी एक वीर सैनिक थे। वह भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चल रही है। उसका मानना है कि यह सारी दुनिया ही एक परिवार है। संकट काल में अपने परिवार के काम आना ही इंसान होने की निशानी है।
    सच तो यह है कि जब अपनी जान खतरे में हो तो इंसान को अपनी जान बचाने के सिवाय और कुछ नहीं सूझता। आज तो सोशल मीडिया के दौर में जब आदमी सामने मर रहा होता है और लोग तमाशबीन बने रहते हैं। अपनी सारी अक्लमंदी उसकी तस्वीरें खींचने और वीडियो बनाने में लुटा देते हैं। ऐसे में नेहा को सलाम करना ही चाहिए, जिसके लिए इंसानियत, कर्तव्य, नैतिकता और मानवीयता महज शब्द नहीं, जीवन जीने के मूलमंत्र हैं। दरअसल, भारत ही ऐसा देश है, जो प्रेम और इंसानियत का दामन कभी भी नहीं छोड़ता। सभी को पता है कि युद्ध के नतीजे कभी भी अच्छे नहीं होते। फिर भी रूस के हुक्मरान पागल कुत्ते की तरह यूक्रेन को खंडहर बनाने पर तुले हैं। रूस के राष्ट्रपति ब्लदिमीर पुतिन की यह धमकी कि कोई बीच में आया तो ऐसा हश्र करूंगा, जो पहले कभी नहीं देखा होगा, उसके घोर जिद्दी और अहंकारी होने का प्रमाण है। हालांकि वह अच्छी तरह से जानता है कि यह युद्ध उसके देश की भी कमर तोड़कर रख देने वाला है। फिर भी बारूद के ढेर पर बैठकर खुद को महाबली दर्शाने की सनक के नशे में वह गहरे तक डूबा है। उसके देश के ही कई लोग उसकी इस जिद का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर चुके हैं। युद्ध किस तरह से सर्वनाशी होता है इसे शासक नहीं सैनिक ही अच्छी तरह से जानते हैं। डॉ. वी.पी. सिंह, जो कि एक बहादुर सैनिक (कर्नल) होने के साथ-साथ सजग कवि भी हैं, लिखते हैं कि यह युद्ध कोई अंतिम युद्ध नहीं। हम विध्वंस से कुछ भी नहीं सीखते। इसलिए युद्ध लड़ने को अभिशप्त हैं...
‘‘फिर कहीं शासक चढ़े हैं अहम रथ पर
फिर कहीं सैनिक बढ़ेंगे मरण पथ पर
फिर चलेंगी चीखती पागल हवाएं
सिर धुनेंगी फिर कहीं झुलसी दिशाएं
फिर कहीं संबंध का व्यापार होगा
फिर धरा का अश्रु से सिंगार होगा
फिर जवानी लड़ेगी, बलिदान देगी
कोई झंडा कहीं रौंदा जाएगा
कोई झंडा गगन में लहराएगा।
खेल यह वर्चस्व का चलता रहेगा
विश्व भीषण आग में जलता रहेगा
निरर्थक बहता रहे, वो रक्त हैं हम।
युद्ध लड़ने के लिए अभिशप्त हैं हम!!’’

    कई तस्वीरें नि:शब्द करते हुए देश प्रेम के असली मायने बता रही हैं। सैनिक हाथ में बंदूक थामे गली से गुज़र रहा है। एक ढाई-तीन साल का मासूम दीवार से लगे खंभे की ओट में खुद को बचाने के लिए दुबका खड़ा है। इसी तस्वीर के साथ विख्यात गज़लकार राजेश रेड्डी की ये पंक्तियां हैं,
‘मिरे दिल के किसी कोने में
इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया
बड़ा होने से डरता है...।’

    सोशल मीडिया पर एक बच्ची का वीडियो वायरल हो रहा है। गुस्से में उबलती बच्ची विदेशी सैनिक से चीख-चीखकर कह रही है, यह मेरा देश है। तुम्हारा मेरे देश में क्या काम...! फौरन भागो यहां से नहीं तो मैं तुम्हारा मुंह नोच लूंगी। देश और दुनिया का हर सजग लेखक, कवि बहुत दूर की सोचता है। उसे आज के साथ आने वाले कल की चिंता भी सतत घेरे रहती है। कालजयी कवि, गीतकार गोपालदास नीरज ने तीसरे युद्ध की आशंका को देखते हुए वर्षों पूर्व एक लंबी कविता लिख दी थी। उसी कविता की कुछ पंक्तियां...
‘‘मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ तो,
इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा।
मैं सोच रहा हूं गर जमीं पर उगा खून,
इस रंगमहल की चहल-पहल का क्या होगा।
किलकारी भरते हुये दूध से ये बच्चे,
निर्भीक उछलती हुई जवानों की ये टोली।
रति को शरमाती हुई चांद सी ये शकलें,
संगीत चुराती हुई पायलों की ये बोली।
क्या इन सब पर खामोशी मौत बिछा देगी,
क्या धुंध धुआं बनकर सब जग रह जायेगा।
क्या कूकेगी कोयलिया कभी न बगिया में,
क्या पपीहा फिर न पिया को पास बुलायेगा।
मैं सोच रहा हूं क्या उनकी कलम न जागेगी,
जब झोपड़ियों में आग लगायी जायेगी।
क्या करवटें न बदलेंगी उनकी कब्रें जब,
उनकी बेटी भूखी पथ पर सो जायेगी।’’

Thursday, February 24, 2022

रिश्ते... रिश्ते

    पति का नाम सौरभ, पत्नी का स्वाति। छह साल की एक बेटी। देहरादून के रहने वाले। सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक अवतरित हुए कोरोना ने गड़बड़ कर दी। सौरभ की नौकरी जाती रही। कुछ महीने जमा धन काम आया। बाद में इधर-उधर से कर्ज लेकर गृहस्थी की गाड़ी खींचते रहे। इसी दौरान सौरभ की बहन की शादी भी तय हो गई। सौरभ ने किसी साहूकार से मोटे ब्याज पर पांच लाख का कर्जा ले लिया। घर में आई इस लक्ष्मी को देखकर पत्नी ने विवाह में पहनने के लिए सोने के हार की मांग कर दी। सौरभ को बड़ा गुस्सा आया। कैसी जीवनसाथी है, जिसे बस अपने शौक की पड़ी है। उसने गुस्से में पत्नी को फटकारा, लेकिन वह सोने का हार दिलाने की जिद पर अड़ी रही। इतना ही नहीं उसने बिना हार के ननद की शादी में शामिल होने से भी इंकार कर दिया। पति और पत्नी के बीच कहा-सुनी इस कदर गर्मा-गर्म हो गई कि दोनों के बीच हाथापायी  की नौबत आ गयी। स्वाति का आक्रामक होना सौरभ से सहा नहीं गया। उसने अपना आपा खोते हुए बेटी के सामने स्वाति को बिस्तर पर पटका। पहले तो बेल्ट और आयरन की तार गले में कसी फिर चाकू से गला रेतकर हत्या कर दी।
    नागपुर में एक 28 वर्षीय शराबी पति की पत्नी जब शारीरिक संबंध बनाने से मना करती तो वह उसके हाथ-पाव बांधकर अपनी वासना की आग बुझाता था। पत्नी शोर न मचाए, इसलिए वह उसके मुंह में कपड़ा भी ठूंस देता था। पति की हैवानियत से त्रस्त हुई पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय की शरण ली। कानून तो यही कहता है कि बिस्तर पर पत्नी के साथ पूरे सम्मान के साथ पेश आना चाहिए। वह गुलाम नहीं, इंसान है। उसकी भी अपनी भावनाएं हैं।  
    मेरठ शहर में एक युवक ने अपनी वर्षों पुरानी प्रेमिका की भरे चौराहे पर इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से वह उससे मिलने में आनाकानी कर रही थी। दो हफ्ते बाद ही उनकी शादी होने वाली थी। ब्याह हुए एक महीना भी नहीं हुआ था कि पत्नी बिना बताये पति का घर छोड़कर भाग खड़ी हुई। कुछ दिनों के बाद उसने तलाक का नोटिस भी भिजवा दिया। मामला कोर्ट में पहुंच चुका है। युवती पचास लाख रुपये की मांग कर रही है। कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते युवक और उसके मां-बाप को अभी तक अपने कसूर का पता नहीं चला है। ऐसे पता नहीं कितने तलाक के मामले कोर्ट में फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इनमें कई तलाक के मामले तो ऐसे जोड़ों के हैं, जिनकी शादी वर्षों पहले हुई थी, लेकिन अंदर ही अंदर पता नहीं क्या हुआ कि अलग होने का निर्णय ले लिया गया। यह भी देखा जा रहा है कि कुछ माता-पिता अपनी बेटियों की शादीशुदा जिंदगी में जहर घोलने में लगे हैं। हां यह भी सच है कि अधिकांश मां-बाप अपनी बेटी को दु:खी नहीं देखना चाहते। उन्हें अपनी बेटियों को दूर ब्याहने में भी डर लगता है। मांओं की तो हमेशा अपनी बेटियों को अपने नजदीक रखने की इच्छा रहती है। देश के प्रदेश झारखंड के दो गांवों के लोगों ने तो अपनी बेटियों से नजदीकी बनाये रखने के लिए अपने गांव के निकट ही दामादों यानी जमाइयों का पूरा गांव ही बसा दिया। 54 साल पहले तीन परिवारों ने यह अनोखी पहल की थी। जमाइयों के इस गांव को जमाईपाड़ा नाम दिया गया है, जहां पर 100 परिवारों में से 60 परिवार जमाइयों के ही हैं। बेटी को लक्ष्मी और जमाई को राजा का सा मान-सम्मान देने वाले माता-पिता बेफिक्र हैं। गांव के नाम को लेकर जब लोगों ने मजाक उड़ाना प्रारंभ किया तो अब जमाईपाड़ा को लक्ष्मीनगर कहा जाने लगा है। ऐसी कई खबरें हैं, जो इंसानी बर्बरता का दस्तावेज हैं। वहीं कुछ हकीकतें ऐसी भी हैं, जो आग-सी तपती धूप में ठंडक का एहसास कराती हैं...।
    नब्बे वर्ष के हो चुके भोलानाथ आलोक साहित्यकार हैं। उन्होंने कई कथाएं और कविताएं लिखी हैं, लेकिन उनकी सबसे अच्छी रचना जो अभूतपूर्व है और यादगार बन कर रहने वाली है, वह है उनका अपनी पत्नी के प्रति अटूट प्रेम और पवित्र समर्पण भाव। आलोक और उनकी पत्नी की बस यही चाहत थी कि उनकी एक साथ ही इस दुनिया से विदायी हो, लेकिन ईश्वर ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं होने दी। 25 सितंबर, 1990 को उनकी पत्नी की अचानक मौत हो गई। तब आलोक के मन में आत्महत्या करने का भी विचार आया, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों के अनाथ हो जाने की चिंता ने उनकी इच्छा का गला घोट दिया। फिर उन्होंने वो किया, जिसने हर किसी को यह कहने और मानने के लिए मजबूर कर दिया कि प्रेम एक पवित्र एहसास है, जो दिमाग से नहीं दिल से होता है। सच्चे प्रेमी अपनी जिन्दगी को एक-दूसरे के नाम कर देते हैं। जब तक मौत नहीं आती तब तक एक-दूसरे के बने रहते हैं। भावुक साहित्यकार ने उसी पल पत्नी की अस्थियों को जीवन के अंतिम क्षणों तक संभालकर रखने का निर्णय ले लिया। उनकी पत्नी को गुजरे 32 वर्ष हो चुके हैं। घर के बरामदे में लगे पेड़ पर उन्होंने पत्नी की अस्थियां लटका रखी हैं। उन्होंने अपने बच्चों को कसम दी है कि जब उनकी मौत हो तो पत्नी की अस्थियों के साथ ही उनका दाह-संस्कार कराएं। आलोक तो रोज अस्थियों की पूजा करते ही हैं, उनके परिजन भी भगवान की पूजा के बाद पेड़ पर टंगी अस्थियों की पूजा करना नहीं भूलते। घर में जब भी बाहर से कोई रिश्तेदार आते हैं या घर के कोई भी सदस्य बाहर जाते हैं, तो पेड़ के पास में जाकर प्रणाम करते हैं। घर-परिवार में होने वाले मांगलिक कार्यों में उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
    प्यार तो प्यार होता है। हिंदुस्तान हो या अमेरिका। इसकी पवित्रता और तड़प कहीं भी नहीं बदलती। जब पूरी दुनिया कोरोना के चंगुल में थी तब कई जोड़ों को अपने साथी को खोना पड़ा। उनकी जुदाई में बिलख-बिलख कर रोना पड़ा। ऐसी ही एक तस्वीर आज भी मेरे दिल-दिमाग में ताजा है...। 89 साल के एक पति को 87 साल की पत्नी से कोरोना की वजह से मजबूरन अलग रहना पड़ा। पूरे चालीस दिनों के बाद दोनों जब मिले तो उनके आंसू रुक नहीं रहे थे। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर वादा किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब बाकी बची जिंदगी का एक-एक पल एक साथ जीएंगे। उनके मिलन की तस्वीर जिसने भी देखी वह अपने जज्बात पर काबू नहीं रख पाया। बरबस आखें गीली होती रहीं...।

Thursday, February 17, 2022

खुद को मुसलमान और हिन्दू दिखाने की होड़

    जब देखो तब कोई न कोई सनसनी फैलाती फिल्म, तस्वीरें, वीडियो और अशांति फैलाती भाषणबाजी। राजनीति और धर्म के अलावा जैसे और कुछ बचा ही नहीं है! नारों पर नारे, शोर शराबा, धमकियां और चेतावनियां ही क्या भारत देश की पहचान बनती चली जा रही हैं? देश की तो छोड़िए अब विदेशों में भी यही संदेश जा रहा है कि यहां का आपसी भाईचारा और एकजुटता बेहद खतरे में है। लड़कियों की आजादी छीनी जा रही है। महिलाओं पर जुल्म ढाये जा रहे हैं। हर कोई सकते में है। जिस पार्टी के हाथ में केंद्र की सत्ता है वह अंधी और बहरी बनी हुई है। क्या वाकई यह सच है? अपने देश भारत में नामवर होने का सबसे आसान तरीका है, जलती आग में तेल नहीं, पेट्रोल डालो ताकि हजारों मील दूर बैठे लोगों को भी उसकी तपन का एहसास हो।
    कर्नाटक के कॉलेज की छात्रा मुस्कान जानती थी कि कॉलेज में हिजाब पहनकर जाने की पाबंदी है फिर भी वह डंके की चोट पर पहुंची तो वहां पर पहले से मौजूद भगवा गमछा और स्कार्फ पहने छात्रों के उग्र झुंड ने जय श्रीराम के नारे लगाते हुए मुस्कान का रास्ता रोक लिया। अति उत्साह से भरी मुस्कान ने भी उन्हें ललकारने के अंदाज में ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगाते हुए सवाल किया कि वे मेरे हिजाब के पीछे क्यों पड़े हैं। यह हक उन्हें किसने दिया है? सोशल मीडिया पर मुस्कान के वीडियो के वायरल होने भर की देरी थी कि मौके की तलाश में बैठे इधर और उधर के अपने-अपने धर्म के कुछ ठेकेदारों ने अपने अस्त्र-शस्त्र बाहर निकाल लिए। राजनीति और सोशल मीडिया के पेशेवर खिलाड़ी भी छाती तानकर कूदने-फादने लगे। रातोंरात उनके आकाओं ने उन्हें पढ़ा और रटा दिया कि उन्हें किस तरह से चीखना-चिल्लाना है। देखते ही देखते कर्नाटक से निकले हिजाब विवाद की सात-समंदर पार तक तेजाबी बरसात होने लगी। अमेरिका तथा अन्य कुछ देशों को भारत पर उंगली उठाने और चेताने का मौका मिल गया। यह बात दीगर है कि भारत के ताकतवर हुक्मरानों ने उसे अपना घर संभालने और दूसरे के यहां नहीं झांकने का तीखा सुझाव देकर बेजुबान कर दिया। देश के कई नगरों-महानगरों की कॉलेज गर्ल हिजाब पहन कर पहुंचने लगीं। मध्यप्रदेश के सतना के एक कॉलेज की छात्रा जब परीक्षा देने पहुंची तब उसने मुस्कान के अंदाज में हिजाब पहन रखा था। यहां भी छात्रों ने उसका पुरजोर विरोध किया। महाराष्ट्र के पुणे में हिजाब के समर्थन में निकाले गये जुलूस में महिलाओं के अलावा छोटी-छोटी बच्चियों को भी शामिल कर लिया गया। उनके हाथ में जबरन बैनर भी थमा दिये गए जिन पर लिखा था कि हिजाब पहनना हमारा अधिकार है। धार्मिक नगरी चित्रकूट में चुनाव प्रचार करने गईं कांग्रेस की एक महिला प्रत्याशी मुस्लिम बहुल क्षेत्र पहुंचीं तो उनका सोया जोश जाग गया और उन्होंने एक मुसलमान को भगवा टोपी पहना दी। इसके बाद वहां जय श्रीराम के नारे गूंजवाये गये।
भारत के अधिकांश मौकापरस्त नेता देश के बंटवारे के बाद से ही ऐसी नाटक-नौटंकियां करते चले आ रहे हैं। कोई हिंदुओं को खुश करना चाहता है, कोई मुसलमानों को। तो किसी को दलित अति प्रिय हैं। हिजाब भी उनके लिए जलती आग की भट्टी है, जिस पर वे अपनी राजनीति की रोटियां सेंक रहे हैं। इन्हें संविधान से भी कुछ नहीं लेना और देना। सच तो यह भी है कि यदि इन्होंने भारतीय संविधान का आदर किया होता तो कि किसी की क्या मजाल जो वह अपनी मनमानी और दादागिरी दिखा पाता। हिजाब के पक्ष और विपक्ष में अपने-अपने तर्क हैं...। हिजाब पहनने से लड़कियां बदमाशों की गंदी निगाहों से बची रहती हैं। देश में आज जो हालात हैं वे महिलाओं के लिए सुरक्षित और सुखद नहीं हैं। कदम-कदम पर वहशी-बलात्कारी चहल-कदमी करते नजर आते हैं। अकेली लड़कियों और औरतों के लिए हिजाब और बुर्का किसी मजबूत कवच से कम नहीं। जब उनका बदन और चेहरा ही नहीं दिखेगा तब दुष्कर्म भी नहीं होंगे। हिजाब के विरोधी कहते हैं कि शिक्षा के मंदिरों में नारियों पर खतरे की बात वही लोग करते हैं, जिन्हें अपनी बेटियों पर भरोसा नहीं और उनके भविष्य की भी कतई चिंता नहीं। दरअसल वे पूरे मन से बेटियों को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते। ऐसे लोग आज भी बाबा आदम के जमाने की जमीन पर ठिठके खड़े हैं। इन्हें पता ही नहीं है कि आज नारियां पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। पग-पग पर उन्हें चुनौती और टक्कर दे रही हैं। ऐसे में उन्हें पर्दे में कैद करना, उन पर पहरे लगाना घोर अपराध ही है। दुनिया के जिन-जिन देशों में सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढंकने या इस्लामिक नकाबों पर रोक लगायी गई वहां पर महिलाओं में काफी उत्साह तथा परिवर्तन आया है। पुरुषों की तरह वे भी बेझिझक कहीं भी आना-जाना करती हैं और ऊंची से ऊंची शिक्षा अर्जित करते हुए सफलता के नये-नये शिखरों को छू रही हैं।
    हिजाब को लेकर जो शोर-शराबा और अशांति फैली और बड़े ही सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी उस पर कलम चलाना व्यर्थ है। कलमकार को तो उन हुक्मरानों पर गुस्सा आता है, जिनकी प्राथमिकताएं ही समझ में नहीं आतीं। जो काम पहले करना चाहिए उसे तो करना ही भूल जाते हैं। जिस देश में बेइंतहा गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और अशिक्षा का घनघोर अंधेरा है, वहां पर सरकारें जनता की आंख में धूल झोंकती चली आ रही हैं। तरह-तरह के सपनों और जुमलों से दिल बहलाती चली आ रही हैं। कोरोना काल में हम सबने देख ही लिया है कि स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में हम कितने गरीब और नकारा हैं। डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी की वजह से हजारों मौतें हो गईं और हम बेबस देखते रह गये। ऐसी और भी कितनी-कितनी गंभीर समस्याएं हैं, जो देश के विकास में बाधा बनी हुई हैं। शासकों का तो पहला कर्तव्य है कि जन-जन की नींद उड़ाती समस्याओं का पहले हल खोजा जाए। देश में कानून व्यवस्था की जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है। कोई भी मां-बाप अपनी बेटियों को किसी तरह की बंदिशों की बेड़ियां पहनाकर खुश नहीं होते, लेकिन लगभग हर रोज सामने आने वाली बलात्कार और व्याभिचार की खबरें उन्हें डराती हैं। शासन-प्रशासन की कमी और कमजोरी ने ही गुंडे-बदमाशों के हौसलों को बेलगाम कर रखा है। यह देखने में आया है कि जिन देशों में शासन-प्रशासन लुंज-पुंज नहीं, बेरोजगारी नहीं, गरीबी नहीं, शिक्षा का भरपूर उजाला है, वहां पर किसी भी बदलाव और पहल को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया जाता है। भारत में  बरगलाने और उकसाने वालों की कतारें लगी हैं। मैंने जो जाना और समझा है वह यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी की बजाय कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक पार्टी की प्रदेश सरकार ने हिजाब पर रोक लगाने का निर्णय किया होता तो इतना हो-हल्ला नहीं होता। इस पार्टी की मुस्लिम विरोधी छवि बनाने में इसी पार्टी के कुछ मुंहफट नेताओं का भी खासा योगदान रहा है, जो किसी की भी राष्ट्रभक्ति पर सवाल खड़े करने लगते हैं। यह देश समावेशी विकास बदलाव और व्यवहार चाहता है, लेकिन कुछ लोग विनाश के सपने देख रहे हैं। उन्हें तो बस खुद को हिंदु और मुसलमान दिखाने के महारोग ने जकड़ रखा है। जहां मन पहले से शंकाग्रस्त हो, आहत हो, भरोसे की डोर कमजोर हो चुकी हो, वहां पर अपने हित में हुए फैसलों में भी साजिश की शंका होती है...और यही भारत देश में हो रहा है।

Thursday, February 10, 2022

पहेली...

    अमेरिका के न्यूयार्क में रहते हैं शौकीन मस्तमौला पुरुष माइकल अमोइया। माइकल को अपने शरीर पर टैटू बनवाने का ऐसा भूत सवार हुआ कि उन्होंने अपने शरीर पर कीड़ों के 864 टैटू बनवाकर गिनिज वर्ल्ड रिकॉर्ड बुक में अपना नाम दर्ज करा लिया। माइकल का पूरा शरीर टैटू से भर चुका है। फिर भी अपने शरीर पर टैटू बनवाने की उनकी तमन्ना में विराम नहीं लगा है। जब वे मात्र इक्कीस बरस के थे, तब उन्होंने पहली बार अपनी बांह पर लाल चींटी का टैटू बनवाया था। फिर उसके बाद तो उन्हें इसका चस्का ही लग गया। माइकल के बारे में बड़ी दिलचस्प और चौंकाने वाली जानकारी यह भी है कि उन्हें कीड़ों से सख्त घृणा है। बचपन में किसी कीड़े ने उनके जिस्म को काट खाया था, तभी से उनके मन में कीड़ों के प्रति भय और नफरत ने स्थायी जगह बना ली। माइकल के शरीर पर इतने अधिक कीड़ों के टैटू देखकर कोई भी यह मानने लगता है कि इस शख्स को कीड़ों से बेइंतहा प्यार... मुहब्बत है, लेकिन माइकल हर किसी को बता नहीं सकता कि असली सच क्या है...। सच तो यह भी है कि वह सभी को हकीकत से रूबरू नहीं कराना चाहता।
    सीताराम दास जैसा इंसान मैंने तो कभी नहीं देखा था। जब मिला तो बस देखता ही रह गया। उसका एक हाथ गायब है। इस हाथ को पंद्रह वर्ष पूर्व एक मगरमच्छ ने खा-पचा लिया था। कोई और होता तो वह मगरमच्छों का जानी दुश्मन बन जाता। सत्तर की उम्र पार कर चुका सीताराम तो किसी अलग मिट्टी का बना है। जिस मगरमच्छ ने उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपंग बना दिया उसी की सेवा और देखभाल करना उसके जीवन का एकमात्र मकसद बनकर रह गया है। सीताराम से अगर आपको रूबरू मिलना है, तो छत्तीसगढ़ के कोटमी सोनार गांव में पहुंच जाएं। वह आपको यहां के भरे-पूरे तालाब के किनारे ‘‘आओ, आओ’’ की धीमी आवाज़ें लगाते दिख जाएगा। किसी मंत्र की तरह हवा में तैरने वाली उसकी स्वर लहरी के जादू का कुछ ऐसा असर होता है कि देखते ही देखते तीन मगरमच्छ उनकी तरफ इस तरह से मस्त-मस्त अंदाज में बढ़ने लगते हैं, जैसे उसके चरणों में लोटपोट हो जाना चाहते हों। इनमें एक मगरमच्छ, जिसकी लंबाई लगभग 10 फुट है वह किसी के भी मन में खौफ पैदा कर देता है, लेकिन सीताराम को अपना जन्मों-जन्मों का दोस्त... हितैषी मानता है। मगरमच्छों के करीब जाने से सभी को डर लगता है। सीताराम सभी को आश्वस्त करता रहता है, कि यदि हम जानवरों को नहीं छेडें तो वे भी अपने में मस्त रहते हैं। सीताराम को गांव के लोग बाबाजी कहकर बुलाते हैं। बाबाजी पक्षियों पर भी खूब जान छिड़कता है। घायल पक्षियों की जान बचाने के लिए अपने सुख-चैन की कुर्बानी देने में ज़रा भी देरी नहीं लगाता। बाबाजी मंदिर में पुजारी भी है। गायें पालने का भी उसे खासा शोक है। यह उसकी प्रेम भावना ही है, जो हिंसक जानवरों को भी अपना बना देती है। खूंखार से खूंखार जानवरों को प्यार-दुलार से अपने काबू में लाते देखकर अधिकांश लोग भी समझने लगे हैं कि यदि जानवरों को उकसाया नहीं जाए तो वे किसी पर भी आक्रमण नहीं करते।
    ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ जिसने भी इस कहावत को सबसे पहले गढ़ा, रचा और प्रचलन में लाया होगा उसका कहीं न कहीं ऐसे लोगों से वास्ता पड़ा होगा, जिन्हें दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। बेगाने महान और अपने कमतर लगते हैं। मैंने जब 85 वर्षीय कात्सू सान के महात्मा गांधी और भारतवर्ष के प्रति अटूट समर्पण भाव के बारे में पढ़ा और जाना तो मुझे बरबस उपरोक्त कहावत याद हो आयी। अपने यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो महात्मा गांधी की कमजोरियों का ढिंढोरा पीटते हुए खुद को बेहद अक्लमंद दर्शाते रहते हैं। जिस देश का अन्न खाते हैं उसी से गद्दारी करने से भी नहीं चूकते। भारत माता की गोद में जन्मने को वे अपनी बदकिस्मती मानते हैं। जापान में जन्मीं कात्सू सन 1956 में भारतवर्ष में आईं तो थीं भगवान बुद्ध की खोज में, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों से इस कदर प्रभावित हुईं कि अपने देश जापान को ही भुला बैठीं। उन्होंने यहीं बसने का पक्का इरादा कर लिया। अब तो कात्सू ने हिंदुस्तान को अपना देश मान लिया है, यहीं जीना और मरना है। वे हर वर्ष 30 जनवरी को राजघाट जाती हैं। शाम को गांधी दर्शन में होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभा में जाना भी नहीं भूलतीं। उन्हें साफ-सुथरी हिंदी बोलते देख कोई भी उन्हें विदेशी नहीं कह सकता। जबसे उनका भारत भूमि पर आगमन हुआ है, तभी से गांधी साहित्य के गहन अध्ययन में लगी हैं। सच्ची गांधीवादी कात्सू कहती हैं, कि गांधी का यह भारत देश सारे संसार का आध्यात्मिक गुरु है। मुझे तो दुनिया में और कोई देश नज़र ही नहीं आता, जहां भारत की तरह सभी धर्मों का जी-जान से सम्मान किया जाता हो। यहां के लोगों में जो सादगी और सहनशीलता है वह और कहीं दुर्लभ है। हिन्द के अनेकों ग्रामों, कस्बों, नगरों, महानगरों में भ्रमण करने वाली कात्सू सान लिखती हैं कि भगवान बुद्ध और गांधी के रास्ते एक जैसे ही हैं। इन दोनों ने ही दीन-दुखियों का कल्याण करने तथा अन्याय को मिटाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जब तक यह सृष्टि है, तब तक दोनों जिन्दा रहेंगे। हमेशा नौजवानों की तरह उत्साहित रहने वाली गांधीवादी कात्सू बहन दिल्ली में स्थित विश्व शांति स्तूप में अक्सर दिखायी दे जाती हैं। उनका नमस्कार कहने और करने का अंदाज हर मिलने वाले पर अपना अटूट प्रभाव छोड़ जाता है।

Thursday, February 3, 2022

जय हिन्द

    इन तीन खबरों ने मन-मस्तिष्क में जो तस्वीर बनाई उसे मैं आपको भी दिखाने को आतुर हूं। इन बोलती तस्वीरों ने जितना कुछ बताया और समझाया उतनी क्षमता तो विद्वानों की लिखी पचासों किताबों में भी नहीं दिखी। अपने छोटे-बड़े जीवनकाल में मनुष्य कहां-कहां नहीं भटकता। दिन-रात पता नहीं कैसे-कैसे विचार उसके मन-मस्तिष्क में हलचल मचाये रहते हैं। आज के दौर की भागदौड़ की जिन्दगी और आगे बढ़ने की अंधी प्रतिस्पर्धा में शामिल रहने की ललक ने आम इंसान के जीवन को तनाव और अवसाद से भर दिया है। जिसे देखो, वही असंतोष और घबराहट की कैद में छटपटाता प्रतीत होता है। भगवद गीता कहती है कि जो जिन्दा है उसकी मौत भी तय है। इसलिए जो होना है उसके लिए चिंतित और दुखी होना व्यर्थ है। फिर भी अनेकों इंसान मौत के भय में जकड़े हैं। ऐसे लोगों की भीड़ में ऐसे लोग भी हैं, जो कल की चिंता का त्याग कर आज के पल-पल का आनंद लेने में यकीन रखते हैं। वे खूब मेहनत कर कमाते हैं। अच्छा भोजन करते। अपने मनपसंद कपड़े पहनते हैं। देश-दुनिया की यात्राएं करते हैं। प्रकृति की अलौकिक सुंदरता का आनंद उठाते हैं और अपने परिवार की खुशियों के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तत्पर रहते हैं। उनके पास लोगों की बातें और शिकायतें सुनने की फुर्सत नहीं।
    किसे क्या अच्छा लगता है, बता पाना आसान नहीं। यहां हर जिन्दा इंसान की अपनी-अपनी इच्छा, चाहत, जरूरत और पसंद है। छत्तीसगढ़ के शहर राजनांदगांव के करोड़पति डाकलिया परिवार के पांच सदस्यों ने बीते हफ्ते अपने तमाम सुख, धन, दौलत और सम्पत्ति का त्याग कर दीक्षा ले ली। देश के महान साधु-संत हमेशा कहते आये हैं कि यह सारा संसार मिथ्या है। क्षणभंगुर है। यहां की घोर आपाधापी में मनुष्य करोड़ों की माया जुटाता है। इसके लिए कई बार मान-मर्यादायें भी दांव पर लगा देता है, लेकिन जब ऊपर वाले का बुलावा आता है, तो उसे सबकुछ छोड़कर खाली हाथ ही जाना पड़ता है। इसी तरह के उपदेशों को सुनते-सुनाते तो कई लोग हैं, लेकिन अपनी खून-पसीने की कमायी और भौतिक सुख-सुविधाओं को सदा-सदा के लिए त्यागने की हिम्मत विरले ही दिखाते हैं। कोई भी त्याग बहुत बड़ा हौसला और धैर्य मांगता है, जो हर किसी में नहीं होता।
    डाकलिया परिवार का 2011 में जब रायपुर स्थित कैवल्यधाम की यात्रा पर जाना हुआ था, तभी उनके परिवार के सबसे छोटे बच्चे हर्षित के मन में दीक्षा लेने का विचार आया था। मात्र छह साल के मासूम बच्चे के मन-मस्तिष्क में मायावी संसार से दूरियां बनाने का भाव कालांतर में भी बना रहा। उसने तब गुरु के सानिध्य में खुशी-खुशी अपना केशलोचन कराया था। साहसी और सहनशील हर्षित से ही प्रेरित होकर परिवार के अन्य चार बच्चों के मन में भी दीक्षा लेने की इच्छा बलवति हुई थी। तब बच्चों की उम्र दीक्षा लेने के लायक नहीं थी इसलिए उनके और परिपक्व होने की राह देखी गई। दस साल बाद जब वे सभी सबकुछ जानने-समझने लगे और उनकी दीक्षा लेने की ललक में कोई कमी नहीं आयी तो परिवार के पांच सदस्यों ने दीक्षा लेने का अंतिम फैसला करते हुए जगत की मोहमाया का हमेशा-हमेशा के लिए त्याग करते हुए संयम के पथ को अपना लिया। उन्होंने अपनी 30 करोड़ की संपत्ति भी समाज कल्याण के लिए दान कर दी।
ब्रिटेन के निवासी ब्रायन चोर्ले 83 साल के हो चुके हैं। यह वो उम्र है जब लगभग हर आदमी खुद को थका पाता है। हाथ-पांव जवाब दे देते हैं। कई तो बिस्तर ही पकड़ लेते हैं, लेकिन ब्रायन आज भी भागदौड़ करते नज़र आते हैं। वे थकना नहीं सतत चलना चाहते हैं। धन कमाने की अपार चाह में सत्तर वर्ष पूर्व जिस जूता फैक्टरी में 15 साल के ब्रायन ने काम करना शुरू किया था आज उसका चेहरा-मोहरा बदल चुका है, लेकिन ब्रायन नहीं बदले। कितनी भी ठंड हो, गर्मी हो या फिर बरसात और आंधी तूफान का बवंडर हो, लेकिन ब्रायन कभी छुट्टी नहीं लेते। आठ साल पहले पत्नी को हमेशा-हमेशा के लिए खोने के बाद भी इस उम्रदराज ने मातम और अकेलेपन की स्याह चादर ओढ़ने की बजाय अपने कार्य और कर्तव्य को ही अपना धर्म मानने की परंपरा से मुंह नहीं मोड़ा। लॉकडाउन में जब कुछ समय के लिए फैक्टरी का काम बंद हुआ था तब भी वे हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहे। तब फैक्टरी के शापिंग सेंटर में तब्दील होने पर वे कतई नहीं घबराये। उन्होंने युवकों की तरह नये काम को ठीक से समझा और भरपूर ट्रेनिंग लेने के बाद शापिंग सेंटर में युवकों की तरह काम करने लगे।
    कई सवाल ऐसे होते हैं, जिनके जवाब भी जीते-जागते इंसान होते हैं। डॉक्टर जयदीप शर्मा से वाकिफ होने के बाद मैंने तो यही माना है। 29 वर्ष पूर्व ट्रक से कुचले जाने के बाद उनका पूरा परिवार खत्म हो गया। वे स्वयं बच तो गये, लेकिन वह बचना नहीं था। उनके शरीर के अंग-अंग के चिथड़े उड़ चुके थे। आखों की रोशनी भी चली गई थी। जब उन्हें अस्पताल में लाया गया तब डॉक्टरों ने उनकी हालत देखकर उन्हें मृत मान लिया था, लेकिन उनकी सांसें चल रहीं थीं। इन्हीं चलती सांसों ने ही डॉक्टरों को कुछ हौसला दिया। शर्मा तो बेहोश थे। मेडिकल साइंस ने इस बेहोशी को ‘कोमा’ का नाम दे रखा है, जिसकी गिरफ्त में आने के बाद कम ही किस्मत वाले होते हैं, जो फिर से आंखें खोल पाते हैं। पूरे साढ़े नौ साल तक लगभग मृत रहे डॉ. शर्मा को डॉक्टरों ने अथाह मेहनत कर एक नया चेहरा दिया, जो पहले वाले चेहरे से एकदम जुदा था। उनका अंग-अंग नकली है। यहां तक कि हाथ-पैर भी। किस्मत से आंखों की रोशनी भी वापस मिल गई।
घर लौटने पर उन्होंने जब आइना देखा, तो खुद को पहचान ही नहीं पाये। डॉ. जयदीप शर्मा को फिर से जिंदा करने के लिए छप्पन लोगों ने अपना खून दिया। खून देने वालों को पता ही नहीं था कि वे किसे खून दे रहे हैं। वे सभी भारतीय थे। उनका किसी धर्म और मजहब से कोई वास्ता नहीं था। इंसानियत ही उनका धर्म था। हिन्द के शरीर की नस-नस में इन्हीं भारतीयों का खून दौड़ रहा है। अपने हिंदुस्तान में कुछ विघ्न संतोषी, अंधे और बहरे लोग हैं, जिनकी निगाह इस तस्वीर पर कभी नहीं जाती। उन्हें तो बस यही लगता है कि देश जातीयता, धर्मांधता, नफरत और भेदभाव के गर्त में समाता चला जा रहा है, जबकि सच तो यही है कि चंद लोग ही अलगाव और हिंसा प्रेमी हैं, जो नाथूराम गोडसे के नाम की पताका फहराने की दुष्टता करते रहते हैं। लेकिन फिर भी महात्मा गांधी की प्रतिष्ठा और कद दिन-ब-दिन ऊंचा और ऊंचा होता चला जा रहा है। निष्पाप, निस्वार्थ, अमनप्रेमी और आत्मीयता से लबालब असंख्य भारतीयों की बदौलत ही लाख षडयंत्रों के बाद भी हिंद में इंसानियत जिन्दा है और भविष्य में भी उसका कभी बाल भी बांका नहीं हो सकता।

Thursday, January 27, 2022

डॉक्टर भी इंसान ही हैं

    मेडिकल साइंस कहां से कहां तक का सफर तय कर चुकी है। उसके कदम सतत आगे बढ़ते ही चले जा रहे हैं। उसका इरादा तो इंसान को अमरत्व प्रदान करने का है, लेकिन यह इंसान ही है, जो अक्सर अंधा हो जाता है। विवेकशून्य होने के कगार पर जा खड़ा होता है। अमानवीयता का नृशंस दामन थाम लेता है। जहां बड़ा दिल दिखाने की जरूरत होती है, वहां निजी स्वार्थ का गुलाम होकर रह जाता है। क्या कभी कल्पना की गई थी कि इंसान के अंदर सुअर का दिल धड़केगा? इंसान को इंसान का दिल लगाये जाने की उत्साहवर्द्धक हकीकत से तो सभी वाकिफ हैं। बहुतों की तरह मेरे लिए भी यह खबर चौंकाने और हिलाने वाली रही कि, ‘अमेरिका के मेरीलैंड अस्पताल में एक इंसान की जान को बचाने के लिए सुअर का हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया है। जिस शख्स को सुअर का दिल लगाया गया है वह बहुत अच्छा महसूस कर रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि ‘ये अभूतपूर्व प्रक्रिया है। इससे अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे लाखों लोगों में नई आशा का संचार हुआ है। जीने की उम्मीद जागी है।’ इस खबर को पढ़ने और जानने के चंद दिनों बाद ही यह खबर भी पढ़ने में आयी है कि वाशिंगटन में चिकित्सकों ने सुअर की किडनियों को ब्रेन-डेड व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया और काफी सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। जानवरों के अंगोें को मानव शरीर में लगाने की कई कथाएं कभी सुनी-सुनायी जाती थीं, लेकिन उन पर कम ही यकीन होता था, लेकिन अब तो जीती-जागती सच्चाई हमारे सामने है।
    जिस इंसान के हृदय ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया हो, मौत सिरहाने खड़ी ठहाके लगा रही हो, पल-पल डरा रही हो, उसे विज्ञान की इस नई पहल, नये प्रयोग ने कितनी आत्मिक खुशी दी होगी उसे शब्दों में तो कतई व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस सच को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विदेशों में इंसानों की जान को बचाने के लिए किए जानेवाले विभिन्न प्रयोगों को शंका की निगाह से नहीं देखा जाता। दूसरों के लिए अपने सुखों और खुशियों की कुर्बानी देने वाले डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का आदर-सत्कार किया जाता है, लेकिन अपने देश में...!?
    आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व असम में रहने वाले डॉक्टर धनीराम बरूआ ने एक बत्तीस वर्ष के दिल और फेफड़ों के मरीज को सुअर का दिल और फेफड़े ट्रांसप्लांट किए थे। हांगकांग के एक कुशल डॉक्टर के साथ मिलकर की गई इस थका देने वाली सर्जरी में 15 घंटे लगे थे। जिस मरीज पर यह अभूतपूर्व प्रयोग किया गया था वह काफी खुश और संतुष्ट था। यह सच्चाई अपनी जगह है कि एक हफ्ते के भीतर उसकी मौत हो गई थी, लेकिन उसने डॉक्टरों के अथक परिश्रम की बदौलत उपहार में मिले जो दिन जिए थे वे यकीनन अनमोल थे।
    अमेरिका में तो इंसान की जान बचाने के लिए किये गए ऐतिहासिक प्रयोग की वाहवाही हुई, लेकिन भारत में शक्की और अहसानफरामोशों की कतार लग गई। एक हिंदुस्तानी डॉक्टर ने यह कैसा अपराध कर डाला? इंसान को सुअर का दिल! यह भी कोई बात हुई? लगाना था तो किसी अच्छे-साफ सुथरे जानवर का दिल लगाते। सुअर तो उस गंदगी और कीचड़ में जीता-खाता है, जिससे इंसानों की जात को घोर नफरत है। ऐसे में उसका दिल इंसान को... तौबा...तौबा। यह तो घोर अनर्थ है। अक्षम्य अपराध है। अधर्म है। अमेरिकी डॉक्टरों को जहां पुरस्कृत किया गया वहीं भारतीय डॉक्टर को चालीस दिन तक हत्या के जुर्म में जेल की हवा खानी पड़ी। उनके अस्पताल में तोड़फोड़ की गई। जेल से बाहर आने के बाद भी उन्हें लोगों के तंज, ताने सुनने पड़े। अपमान के नुकीले दंशों से बार-बार आहत होना पड़ा। डॉक्टर बरूआ ने तो खुद को कोसा होगा। किसी की जान बचाने चले थे, कातिल घोषित कर दिये गए। अपने देश में डॉक्टरों के साथ ऐसे अमानवीय और अभद्र व्यवहार का होना कोई नयी बात नहीं है। अस्पताल में भर्ती करवाने के पश्चात मरीज बच गया तो डॉक्टर भगवान और यदि कहीं मर गया तो वो हो गया हत्यारा और शैतान। भूल-चूक तो कहीं भी हो सकती है। होती ही रहती है, लेकिन डॉक्टरी के पेशे में यदि सतर्कता और मानवता नहीं होगी तो लोग डॉक्टर को धरती का भगवान मानना ही छोड़ देंगे। बीमार बड़े भरोसे के साथ डॉक्टर की शरण में जाता है और लगभग हर सच्चा डॉक्टर अपने मरीज की रक्षा-सुरक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। कोई भी डॉक्टर अपने नाम पर बट्टा नहीं लगाना चाहता। हम भले ही डॉक्टर को भगवान मानें, लेकिन सच तो यही है कि वह भी इंसान है, जो अपना कर्तव्य निभाता है। कोरोना जब चरम पर था, तब हमारे यहां अधिकांश डॉक्टरों, नर्सों एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों ने दिन-रात अपनी सेवाएं दीं, लेकिन कुछ लोगों ने जानबूझकर अपनी नीचता और वैमनस्य का प्रदर्शन किया। अस्पतालों और डॉक्टरों पर भेदभाव के आरोप लगाये गए। कई कोरोना से जंग लड़ते योद्धाओं को इसलिए मारा, पीटा और अपमानित किया कि उनके अपने करीबी बच नहीं पाये। कुछ मकान मालिकों ने उन्हें अछूत मानते हुए घर खाली करने का जिद्दी फरमान सुनाये तो कुछ ने उनका सामान ही सड़क पर फेेंक दिया। उनके आसपास रहने वाले लोग भी यह सोचकर उनसे दूरी बनाते रहे कि उनके निकट जाने से कहीं वे भी कोरोना के शिकार न हो जाएं। सोचिए जिन्हें सेवा के बदले सजाएं झेलनी पड़ें उनके दिल पर क्या बीतती होगी?

Thursday, January 20, 2022

थूको... थूको, जीभरकर थूको

    हो सकता है कि आपने भी कुछ महीने पूर्व अखबारों में छपी इस खबर को पढ़ा हो, ‘‘बड़े शहर के एक रिहायशी इलाके में एक गुपचुप का ठेला लगाने वाला भइया खुद को थका महसूस कर रहा था। कुछ देर पहले उसके ठेले पर ग्राहकों की भीड़ थी। अब उसके लिए सुस्ताने और आराम करने का समय था। स्टूल पर बैठे-बैठे उसे अचानक ख्याल आया कि खट्टे-मीठे-तीखे जायकेदार पानी वाली मटकी लगभग खाली हो चुकी है। वो बाल्टी भी खाली थी, जिसमें वह घर से ग्राहकों को पिलाने के लिए पानी भरकर लाया था। यदि अभी कहीं भूले-भटके कोई गुपचुप प्रेमी आ धमका तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इस इलाके की लड़कियां और औरतें तो उसके जलजीरे और खट्टे और तीखे-मीठे पानी की दिवानी हैं। उन्हें यह मसालेदार पेय खास तृप्ति देता है। सार्वजनिक नल भी नजदीक नहीं था। फिर आज उसका नौकर भी छुट्टी पर था। सोचते-सोचते उसने इधर-उधर देखा।
    जब आसपास उसे कोई नज़र नहीं आया तो उसने अपनी धोती ऊपर की और कच्छे का नाड़ा खोलकर खाली लोटे में अपने पेशाब की धार छोड़ने लगा। वह बड़ी सतर्कता के साथ पानी की समस्या का हल करने में लीन था कि इसी दौरान अचानक एक युवती वहां आ पहुंची। उसकी आंखों के सामने ही उसने अपने द्रव्य को मटकी में उंड़ेल दिया था। युवती के लिए यह बेहद हतप्रभ कर देने वाला नज़ारा था। वह अपने मोबाइल से तस्वीरें लेने के पश्चात वीडियों बना चुकी थी। जैसे ही भइये ने युवती को देखा तो वह हक्का-बक्का रह गया। बुरी तरह से गुस्सायी युवती के समक्ष उसने अपनी मजबूरी का रोना रोया, लेकिन युवती ने ऐसा शोर मचाया कि देखते ही देखते अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गयी। लोगों ने उसके ठेले का कचूमर निकालने के साथ उसकी भी अंधाधुंध धुनायी कर लहुलूहान कर दिया। बड़े ही सतर्क और जोशीले अंदाज में ‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है’ की कहावत को चरितार्थ करने वाला भइया हाथ-पांव जोड़कर माफी मांगता रहा, लेकिन भीड़ ने उसकी वो गत बनायी कि उसने जमीन पर नाक रगड़कर सपने में भी कभी गोलगप्पे का ठेला नहीं लगाने की कसम खायी और चुपचाप अपने गांव खिसक गया।’’
    फैशन की रंगारंग दुनिया से वास्ता रखने वाले हर शख्स ने मशहूर हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब का नाम जरूर सुना होगा। मिलना-मिलाना भी हुआ होगा। देश और विदेश के कई शहरों में उसके नाम पर सैलून चलते हैं। सच तो यह है कि यह किसी फिल्मी हीरो-सा दिखने वाला हाई-फाई रंगीला नाई बड़ा पहुंचा हुआ व्यापारी और खिलाड़ी है। अभी हाल ही में इस खानदानी नाई का मुजफ्फरनगर में एक सेमिनार चल रहा था। इसी चमकदार सेमिनार में कई ब्यूटीपार्लर चलाने वाली महिलाएं आमंत्रित थीं। सेमिनार में फैशनपरस्त महिलाओं से घिरा जावेद हेयर कटिंग के जब नये-नये गुर सिखा रहा था तभी एक महिला के सूखे बालों को उसने अपनी थूक से गीला कर वाहवाही लूटनी चाही। यहां पर भी पानी की कमी इस नये अविष्कार की जननी बनी। थोड़ी देर बाद बाल कटवाने वाली महिला की छठवीं इंद्री जागी और वह कुर्सी छोड़ जावेद पर बरसने लगी। उसकी देखा-देखी दूसरी महिलाओं और पुरुषों ने भी उसे भला-बुरा कहा, लेकिन किसी ने भी उसकी वैसी पिटायी करने की हिम्मत नहीं की जैसी गुपचुप बेचने वाले की धुनाई कर दिखायी। अमीर हर जगह फायदे में रहता है। रंगीले नाई ने पानी की समस्या के समाधान के लिए एक नई परंपरा की नींव रखने की सोची थी, लेकिन होशियार महिला ने उसके मंसूबे पर पानी फेर डाला। बदनामी भी करवा दी। मैं जहां तक जानता और समझता हूं कि किसी पर थूकने की जुर्रत तब की जाती है, जब उससे घोर नफरत होती है। उसने कोई दगाबाजी, व्याभिचार और अत्याचार किया होता है। थूक से नवाजी गई महिला तो कुछ नया सीखने को आई थी। क्या सीखा उसने? उत्तरप्रदेश के किसी जोशीले नेता ने एलान कर दिया है कि, ‘नाई के मुंह पर थूकने वाले को अपनी जेब से इक्यावन हजार रुपये का इनाम दूंगा।’
    यह तो ठीक है, लेकिन यही नेता कभी यह भी तो डंके की चोट पर कह दें कि वे सभी नेता चुल्लू भर पानी में डूब मरें, जिनका जनता को बेवकूफ बनाना ही एकमात्र पेशा है। जब वोट लेने आते हैं तो हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हैं। विधायक, सांसद, मंत्री बनते ही अपनी असली औकात पर आ जाते हैं। यह बहुरूपिये मतदाताओं को पहचानते तक नहीं। चुनावी वादे भी कभी पूरे करते नहीं। उन सफेदपोशों के मुंह पर थूको, जिन्हें दूसरों की बहन, बेटियो की कद्र करनी नहीं आती। भारत की बरबादी के सपने देखने वाले जयचंदो और भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाकर देशभक्तों का खून खौलाने वाले ‘कन्हैया छाप’ जमूरों तथा नक्सलियों के हितैषी नालायक बुद्धिजीवियों की थू-थू करने की बजाय थूक की बोछारें करो। उन्हें भी कतई नजरअंदाज मत करो, जो बार-बार हिंदू देवी-देवताओं और हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का मज़ाक उड़ाते हैं। उन्हें भी सबक सिखाते रहो, जो खुद के धर्म को महान और दूसरे के धर्म और आस्था को नीचा दिखाने में लगे हैं। सच को छिपाने और झूठ को सिंहासन पर बैठाने वाले खोखले क्रांतिवीर पत्रकारों, संपादकों और मीडिया मालिकों को भी थूक की बरसात से नहला दो, जिससे वे अपना चेहरा तक न पहचान सकें। आपसी भाईचारे, ईमानदारी और इंसानियत के किसी भी शत्रु को बिलकुल मत बख्शो। यह भी जान लो कि महज शाब्दिक तीरों से कुछ भी नहीं होने वाला। लातों के भूत बातों से नहीं मानते।