Thursday, December 15, 2022

वो रक्त से सना मंज़र

     महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में विधानभवन के निकट 23 नवंबर 1994 की शाम जिस तरह से निर्दोषों का खून बहा और उन्हें मौत की नींद मिली, उसकी मिसाल इतिहास में कम ही देखने-पढ़ने को मिलती है। सत्ताधीशों के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और प्रशासकीय अव्यवस्था के कारण देश का लोकतंत्र पहले भी कई बार आहत हुआ है। तब शीत सत्र के दौरान गोवारी समाज का विशाल मोर्चा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरा था। उनकी प्रमुख मांग थी कि उन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए। सुबह से भीड़ जुटने लगी थी, शाम होते-होते तक भीड़ बहुत बढ़ चुकी थी। तभी अचानक विधानभवन से कुछ ही दूर मॉरिस कॉलेज टी प्वॉइंट पर ऐसी भगदड़ मची कि लोग इधर-उधर भागने लगे। बेतहाशा शोर-शराबा होने लगा। शांत मोर्चा अशांति की गिरफ्त में आ गया। तब शाम के लगभग छह बजे थे। बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया फिर गोलीबारी की, जिसमें 114 बेकसूर लोगों की मौत हो गयी और लगभग पांच सौ लोग बुरी तरह से जख्मी हो गए। मृतकों और जख्मी होने वालों में स्त्री-पुरूष, बच्चों, युवक, युवतियों तथा वृद्ध-वृद्धाओं का समावेश था। गोवारी नेता सुधाकर गजबे के नेतृत्व में अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर यह विशाल मोर्चा आयोजित किया गया था। 23 नवंबर की सुबह से ही ट्रकों, बसों एवं पैदल पूरे विदर्भ से बच्चे, बूढ़े, जवान नागपुर आने शुरू हो गये थे। सभी आशान्वित थे कि वे अपनी एकजुटता दर्शाकर सरकार को यह विश्वास दिलाने में सफल होंगे कि अब गोवारी समाज को अनदेखा करना संभव नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात कहने का सभी को हक है और फिर यह तो शासन से एक छोटी-सी गलती सुधारने की मांग के लिए एक शांतिपूर्ण मोर्चा था। ज्ञातव्य है कि महाराष्ट्र शासन के 24 अप्रैल 1985 के जी.आर. में गोंड गोवारी के बीच में मात्र एक कामा नहीं लगने से गोवारी समाज को अनुसूचित समाज में नहीं गिना गया। शासन से कई बार इस छोटी-सी गलती को सुधारने की मांग की गयी। पर शासन ने ध्यान देना कतई जरूरी नहीं समझा। शाम पांच बजे तक गोवारी समाज के लगभग पचास हजार स्त्री-पुरुष एवं बच्चों का यह मोर्चा पूरी तरह से नियंत्रित एवं शांत था। उत्साही भोलीभाली जनता की इस विशाल भीड़ को गोवारी नेता संबोधित कर रहे थे। गोवारी नेताओं के साथ-साथ मोर्चे में शामिल भूखी प्यासी भीड़ को पूरा यकीन था कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उनकी फरियाद सुनने के लिए उन तक अवश्य पहुंचेंगे। वक्त बीतता चला जा रहा था...। मोर्चे के नेताओं ने बार-बार पुलिस अधिकारियों से निवेदन किया कि वे अपनी बात मंत्रियों तक पहुंचाना चाहते हैं, चूंकि प्रदेश के लगभग सभी मंत्रीगण विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भाग लेने के लिए नागपुर आये हुए हैं, यदि अब भी वे हमारे बीच न आ सकें तो फिर उनके यहां होने का क्या फायदा! मंत्रियों की राह देखते-देखते थक और निराश हो चुके मोर्चे में तनाव के लक्षण दिखायी देने लगे और फिर गोवारी नेताओं का आक्रोशभरा भाषण भी प्रारंभ हो गया। तनावपूर्ण वातावरण की गंभीरता को देखकर पुलिस अधिकारियों ने अपने अंतिम प्रयास के रूप में विधानसभा भवन में चर्चाओं में व्यस्त मंत्रियों के पास खबर भेजी कि स्थिति बिगड़ रही है इसलिए एक बार आंदोलनकारियों से आकर मिल लें। पर किसी भी मंत्री के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, जबकि आदिवासी विकास मंत्री मधुकरराव पिचड़ का दायित्व था कि वे आदिवासी भाइयों की फरियाद सुनने के लिए दौड़े चले आते। पर वे तो अपनी ही मस्ती में डूबे थे। उनके चाटुकारों ने उन्हें घेर रखा था। चुटकलेबाजी चल रही थी। मंत्री जी के कमरे में ठहाके गूंज रहे थे। लगभग साढ़े पांच बजे के आसपास नेताओं ने महिलाओं एवं बच्चों को मोर्चे के आगे लाकर खड़ा कर दिया। देखते ही देखते चार हजार से अधिक महिलाएं, छोटी लड़कियां, लड़के तथा निरीह और मासूम बच्चे मोर्चे के आगे एकत्रित हो गये। इसी बीच अचानक भीड़ में से किसी सिरफिरे ने बैरिकेट उठाकर पुलिस कर्मचारियों पर फेंक दिया। इस घटना के तुरंत बाद पुलिस और एस.आर.पी. के जवानों ने बिना कुछ विचारे लाठीचार्ज करना प्रारंभ कर दिया। लाठीचार्ज शुरू होते ही ऐसी भगदड़ मची, जैसे कोई भूचाल आ गया हो। अनियंत्रित और घबरायी भीड़ को जहां रास्ता दिखा वहां भागने लगी। इस भागदौड़ में मोर्चे के आगे एकत्रित हुए छोटे-छोटे बच्चों एवं महिलाओं का बहुत बुरा हाल हुआ। हजारों की भीड़ उन्हें कुचलते-मसलते और रौंदते हुए भागने लगी और सामने चप्पे-चप्पे पर खड़ी पुलिस की गोलियों, लाठियों की मार और भय भी मौत का भयंकर कारण बना। 

    सात बजते-बजते तक कई लाशें बिछ चुकी थीं। लगभग डेढ़ घंटे तक कई घायल कराहते रहे और अंतत: वे मौत के मुंह में समा गये। अब तो खाकी वर्दीधारी भी बेबस नज़र आ रहे थे। कुछ देर के बाद उन्होंने लाशों को जानवरों की तरह एस.टी. की बसों में भरना शुरू कर दिया। एक के ऊपर दूसरी और तीसरी लाश बेरहमी से फेंकी जाने लगी, जिनमें थोड़ी-बहुत जान बची थी, उन्होंने भी मेडिकल कॉलेज पहुंचते-पहुंचते तक दम तोड़ दिया।  23 नवंबर बुधवार की उस रात मेडिकल कॉलेज के परिसर में बिखरी लाशों को देखकर पत्थर से पत्थर दिल इंसान के भी आंसू बहने लगे थे। कई लोगों की रुलाई थमने का नाम नहीं ले रही थी। मौत भी अपनी इस दुर्गति पर छाती पीट रही थी। हजारों रोते बिलखते स्त्री, पुरुषों और बच्चों के कारण पूरा अस्पताल श्मशानघाट लग रहा था। लोग अपने सगे संबंधियों की लाशें तलाश रहे थे और इस पीड़ादायक और रोंगटे खड़े कर देनेवाले मंजर ने साक्षात नरक को नागपुर में लाकर बैठा दिया था। इसी तरह से लाशों और घायलों को नागपुर के मेयो अस्पताल भी पहुंचाया गया। मरने वालों में अधिकांश संख्या महिलाओं एवं बच्चों की थी। पुलिस प्रशासन का कहना था कि नेताओं के उकसावे में आकर मोर्चा देखते ही देखते उग्र तथा अनियंत्रित हो गया था। इसीलिए लाठीचार्ज करने को विवश होना पड़ा। अगर पुलिस लाठियां नहीं चलाती तो स्थिति और भी खतरनाक रूप धारण कर सकती थी। मोर्चे में शामिल कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया, इससे भी स्थिति बिगड़ी। किसी तरह से मौत का निवाला बनने से बच गये भुक्तभोगियों का कहना था कि अगर मोर्चे में शामिल हुए लोगों को हुल्लड़बाजी या पथराव ही करना था तो वह शाम होने का इंतजार क्यों करते! दिन भर सब कुछ शांत रहा और शाम को पुलिस लाठीचार्ज के बाद ही ये दिल दहलाने वाला खूनी मं़जर सामने आया। नागपुर में हर साल दिसंबर के महीने में सरकारी सर्कस यानी शीतकालीन सत्र का आयोजन होता है। इस सत्र को कायदे से चलना तो तीन सप्ताह तक चाहिए पर आठ-दस दिन में ही इसके तंबू उखड़ने शुरू हो जाते हैं। हर वर्ष महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में सरकार का राजधानी मुंबई से आगमन होता है। सच तो यह है कि शीत सत्र के नाम पर विधायकों, मंत्रियों, अधिकारियों और छोटे-बड़े नेताओं का ‘मेला’ लगता है। करोड़ों रुपये फूंक दिये जाते हैं और अंतत: उस विदर्भ को ठेंगा मिलता है, जिसके भले के लिए इतना बड़ा तामझाम किया जाता है। नागपुर में हर वर्ष शीतकालीन सत्र आयोजित किये जाने के पीछे भी दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है। बात उन दिनों की है, जब विदर्भ का महाराष्ट्र में विलय नहीं हुआ था। तब विदर्भ के नेताओं के परामर्श से एक समझौता हुआ था कि नागपुर को उपराजधानी बनाया जाए। नागपुर को यह सम्मान देने के पीछे कई उद्देश्य थे। विदर्भ की विभिन्न समस्याओं पर चर्चा करने और उन्हें सुलझाने के लिए हर साल छह सप्ताह का सत्र आयोजित करने का निर्णय लिया गया था, जो घटते-घटते तीन सप्ताह तक जा पहुंचा। हर साल मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों, अफसरों और कर्मचारियों का बंबई (मुंबई) से नागपुर आगमन होता है। विधानभवन के निकट ही सभी विधायकों के लिए दो कमरों के आवास बनाये गये हैं। हर वर्ष इन आवासों की साफ-सफाई और पुतायी की जाती है। नयी चादरें, गद्दे, तकिये, कंबल खरीदे जाते हैं। कम कीमत पर शाकाहारी तथा मांसाहारी लजीज से लजीज भोजन उपलब्ध कराया जाता है। विधानभवन के बाहर संतरे, मौसम्बी के जूस के स्टॉल भी लगाये जाते हैं। सैकड़ों अस्थायी कर्मचारियों को मंत्रियों, विधायकों की सेवा में झोंक दिया जाता है।

    114 गोवारियों की शहादत और अथाह संघर्ष के बाद मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने गोवारी ‘आदिवासी ही होने’ का फैसला सुनाया था, लेकिन लोकशाही आघाड़ी सरकार ने उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरोध में उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे दी। इस पर उच्चतम न्यायालय ने मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश रद्द करने से गोवारियों के मुंह का निवाला छीनते हुए उन्हें फिर निराशा और चिंता में डाल दिया। शहादत और संघर्ष के 28 वर्ष बीत जाने के बाद भी वे न्याय पाने की राह ताक रहे हैं। गोवारियों की शहादत के बाद कई नये और पुराने जन्मजात मतलबी नेताओं को अपनी राजनीति की दुकानें चमकाने का सुअवसर मिल गया था। मृतकों को श्रद्धांजलि देने और उनके परिजनों को और अधिक मुआवजा राशि देने की मांग वाली प्रेस विज्ञप्तियां लेकर नये-नये चेहरे भी समाचार पत्रों के कार्यालयों में पहुंचने लगे थे। यह महारथी दो-चार किलो सेब, संतरे लेकर अपने फोटोग्राफर के साथ अस्पतालों में जाते और घायलों को मुस्कराते हुए फल प्रदान करते हुए फोटो खिंचवा अखबारों के दफ्तरों में पहुंच जाते थे। अपनी फोटो के साथ विज्ञप्ति छपवाने की उनमें होड़ लग गई थी। उनके लिए लोगों की निगाह में आने और छाने का यह सुनहरा मौका था। एक बार छपे तो फिर नाम और फोटो छपवाने का उन्हें रोग लग गया। कालांतर में यह छपास रोगी खुद को नेता समझने लगे। बड़े नेताओं के आगे-पीछे घूमने लगे। जो ज्यादा चतुर-चालाक थे वे पार्षद और विधायक भी बने। जिनमें लगन थी, जनहित का सच्चा जज़्बा था वे टिके रहे। बाकी अपनी जेबें भरने के बाद गायब हो गये। संतरा नगरी में कर्मठ नेताओं की कभी कमी नहीं रही। कुछ नाम तो ऐसे हैं, जिनका वर्षों से प्रदेश और देश की राजनीति में डंका बज रहा है। हां, कुछ गोवारी नेताओं ने भी कुर्सी का सुख भोगते हुए खूब चांदी काटी। आम गोवारी आज भी ठगे से वहीं के वहीं हैं। नागपुर के जीरो मॉइल परिसर में शहीदों की याद में बनाए गए शहीद स्मारक पर प्रति वर्ष 23 नवंबर को लाखों गोवारी श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए आते हैं। एक बार फिर से न्याय पाने की उम्मीद, आकांक्षा और अटूट संकल्प की भावना के साथ अपने-अपने गांव लौट जाते हैं... श्रद्धांजलि देने के लिए नेताओं का भी अच्छा-खासा जमावड़ा लगता है।

Saturday, December 10, 2022

अब नहीं, तो कब बदलेंगे?

‘‘बहकना मत बेटियों
कुल को समझो खास।
पैंतीस टुकड़ों में कटा
श्रद्धा का विश्वास।
भरोसा मत कीजिए
सब पर आंखें मींच
स्वर्ण मृग के भेष में
आ सकता है मारीच...।’’

    बेटियों के वीभत्स और राक्षसी हत्याकांड की खबरें सिर्फ मां-बाप को ही नहीं दहलाती, डरातीं। हर संवेदनशील इंसान को भी चिंताग्रस्त कर उसकी नींद उड़ा देती हैं। श्रद्धा को अपने मोहपाश में बांधकर आफताब ने जो हैवानियत और दरिंदगी दिखायी, उससे जवान बेटियों के माता-पिता जहां भीतर तक सिहर गए, वहीं सजग कलमकारों ने भी लड़कियों को बहुत सोच समझकर अपने फैसले लेने की सलाह देते हुए बहुत कुछ लिखा। उन्हीं रचनाकारों में से किसी एक ने श्रद्धा हत्याकांड से आहत होकर जो कविता लिखी उसी की ही हैं उपरोक्त पंक्तियां, जिन्हें मैं आप तक पहुंचाने से खुद को रोक नहीं पाया। हर मां-बाप की यही तमन्ना होती है कि उनकी बेटी खुश रहे। उसका ब्याह ऐसे इंसान से हो, जो उसे दुनियाभर की सुख-सुविधाएं, मनचाही खुशियां, सुरक्षा और मान-सम्मान दे। इस पवित्र रिश्ते में जुड़ने के बाद उनकी बेटी को कभी भी यह न लगे कि उसका किसी गलत व्यक्ति से पाला पड़ गया है और उसे मजबूरी में रिश्ते को निभाना पड़ रहा है। हमारे यहां के बुजुर्ग अपनी बेटियों, बहनों, नातिनों, पोतियों के ब्याह के लिए योग्य लड़का तलाशने में जमीन-आसमान एक कर दिया करते थे। बेटी-बहन के भावी पति के बारे में हर तरह की जानकारी जुटाने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेते थे, लेकिन अब जमाना बदल गया है। विचारों में भी परिवर्तन आ गया है। परंपराएं टूट रही हैं। पुरानी परिपाटियां तोड़ी जा रही हैं। 

    अधिकांश मां-बाप की यही ख्वाहिश होती है कि उनके चुनाव और सुझाव की अवहेलना न हो। उन्हें अपने फैसले और चुनाव पर भरपूर यकीन होता है। जल्दबाजी, नासमझी और भावुकता की तेज धारा में बहकर गलत फैसले लेने वाली लड़कियों का हश्र उनसे छिपा नहीं रहता। आफताब के प्यार में पागल हुई श्रद्धा ने जब अपने रिश्ते के बारे में अपने घर वालों को बताया तो उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया। श्रद्धा समझ गई कि आफताब का मुस्लिम होना उनकी अस्वीकृति की प्रमुख वजह है। श्रद्धा ने उन्हें मनाने तथा समझाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन वे जिद पर अड़े रहे। आखिरकार श्रद्धा ने माता-पिता को यह कहकर झटका दे दिया कि वह अब बच्ची नहीं, बड़ी हो चुकी है। वयस्क होने के कारण उसे अपने सभी फैसले लेने का कानूनन हक है। 

    2022 के नवंबर महीने में जब आफताब के हाथों श्रद्धा के पैंतीस टुकड़े किये जाने की खबर देश के तमाम न्यूज चैनलों तथा अखबारों में सुर्खियां बनकर गूंजीं तो देशवासी हतप्रभ रह गये। प्रेमी के हाथों टुकड़े-टुकड़े हुई श्रद्धा भी लोगों के निशाने पर आ गई : अपने मां-बाप की सलाह मान लेती तो इतनी बुरी मौत नहीं मरती। अपनी मनमानी करने वाली नालायक औलादों का अंतत: यही हश्र होता है। अरे भाई, जब इतनी समझदार थी तो अपने लिव-इन पार्टनर के महीनों जुल्म क्यों सहती रही? जिस दिन उसने हाथ उठाया, गाली-गलौच की, उसी दिन उसको अकेला छोड़कर नई राह पकड़ लेती। कॉल सेंटर की अच्छी खासी नौकरी थी। भूखे मरने की नौबत आने का तो सवाल ही नहीं था। कौन नहीं जानता कि आफताब जैसे धूर्त अपनी प्रेमिकाओं को अपने खूंटे से बांधे रखने के लिए कितनी-कितनी चालें चलते हैं, लेकिन पच्चीस साल की यह वयस्क युवती उसके इन साजिशी शब्द जालों के मायने ही नहीं समझ सकी कि यदि तुमने मेरा साथ छोड़ दिया तो मैं खुदकुशी कर लूंगा। ऐसे निर्दयी लोग मरते नहीं, मारा करते हैं। जब सिर पर मौत का खतरा मंडरा रहा था तो अपने मां-बाप के घर भी तो जा सकती थी। वो कोई राक्षस तो नहीं थे, जो बेटी को सज़ा देने पर उतर आते। अपनी गलती को स्वीकार कर माफी मांग लेती तो वे अपनी बेटी को जरूर गले लगा लेते। 

    श्रद्धा हत्याकांड को लेकर जितने मुंह उतनी बातों के शोर तथा तरह-तरह की खबरों को सुनते-पढ़ते मेरी आंखों के सामने जूही का चेहरा घूमने लगा। पांच वर्ष पूर्व जूही कॉलेज की पढ़ाई के दौरान एक मुस्लिम युवक के प्रेम पाश में ऐसी बंधी कि कालांतर में दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली। शादी से पूर्व जूही ने अपने मां-बाप को मनाने के भरसक प्रयास किये थे। मां तो मान भी गईं थीं, लेकिन पिता नहीं माने। जूही के पिता कॉलेज में लेक्चरर थे। हिंदी और अंग्रेजी के जाने-माने विद्वान! अंत तक अड़े रहे। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपनी बेटी की शादी किसी दूसरे धर्म के लड़के से हर्गिज नहीं होने दूंगा। शादी के कुछ दिन बाद जूही को जब लगा कि अब पिता शांत हो गये होंगे तो वह उमंग और खुशी में झूमती अपने माता-पिता के घर जा पहुंची। मां जैसे ही दामाद और बेटी के स्वागत के लिए तत्पर हुई तभी जंगली जानवर की सी फुर्ती के साथ पिता ने बेटी पर गंदी-गंदी गालियों की बरसात करते हुए आदेशात्मक स्वर में कहा कि, इस घर में फिर कभी पैर रखने की भी जुर्रत मत करना। बस यह समझ लेना कि हम तुम्हारे लिए मर चुके हैं। 

    जूही को फिर कभी किसी ने उस घर में नहीं देखा, जहां वह जन्मी और पली बढ़ी थी। इस दौरान जूही दो बच्चों की मां भी बन गई। पति ने उस पर प्यार बरसाने में कभी कोई कमी नहीं की। लोग इस आदर्श जोड़ी को देखकर तारीफें करते नहीं थकते। पिछले साल अचानक हार्ट अटैक से पिता के गुजरने पर भी जूही को घर में नहीं घुसने दिया गया। यह बंदिश उसके भाइयों को अपने पिता के कारण लगानी पड़ी थी, जिन्होंने घर के सभी सदस्यों को पहले से ही कह रखा था कि मेरी मौत के बाद भी जूही के कदम घर में नहीं पड़ने चाहिए। श्मशान घाट पर पुरुषों की भीड़ थी। महिलाएं श्मशान घाट पर नहीं जातीं, लेकिन जूही श्मशान घाट पर अपने पिता की जलती चिता के सामने अंत तक आंसू बहाती खड़ी रही थी। यह मार्मिक द़ृष्य देखकर मैं भी अपनी आंखों को नम होने से नहीं रोक पाया था। श्रद्धा के माता-पिता जूही के पिता की तरह जिद्दी और कू्रर रहे होंगे इस पर ज्यादा विचार-मंथन करने का कोई फायदा नहीं। श्रद्धा तो अब लौटने से रही, लेकिन किसी युवती के साथ घर परिवार वालों का ऐसा दुत्कार भरा आहत करने वाला व्यवहार न हो इस पर चिंतन-मनन तो किया ही जा सकता है। न्यूज चैनलों और अखबारों में ऐसी खबरें आती ही रहती हैं। मीडिया इन खबरों को इसलिए प्रचारित-प्रसारित करता है कि बेटियां सतर्क और सावधान हो जाएं। बच्चे कितने ही बड़े क्यों न हो जाएं माता-पिता के लिए तो बच्चे ही रहते हैं। अपनी बेटियों का ऐसा विभत्स अंत उन्हें जीते जी मार डालता है। राजेशों, सुशीलों तथा आफताबों के चंगुल से बचाये रखने का दायित्व सिर्फ मां-बाप का ही नहीं है। 

    यह भी सच है कि आज भी अपने यहां का समाज और परिवार पूरी तरह से इतने खुले दिल के नहीं हुए हैं कि वे लिव-इन-रिलेशन और प्रेम विवाह के लिए तुरंत हामी भर दें। कुछ परिवार तो आज भी लड़के-लड़की की दोस्ती को पसंद नहीं करते। उन्हें वो खबरें डराती रहती हैं, जो अक्सर पढ़ने और सुनने में आती हैं। लेकिन किसी भी श्रद्धा और नैना को अपने प्रेमी का पूरा सच भी कहां पता होता है। साथ रहने के बाद ही हकीकत बाहर आती है। युवकों की तरह युवतियों में भी बगावत की प्रवृत्ति का होना सहज बात है, लेकिन फिर भी अधिकांश मां-बाप बेटियों से कुछ और ही उम्मीद रखते हैं। उनके लिए बेटियों का आज्ञाकारी और संस्कारवान होना जरूरी है। 

लेकिन प्रश्न यह भी है कि लिव-इन में रहने, प्रेम विवाह करने तथा किसी गैर धर्म के युवक से विवाह सूत्र में बंध जाने से संस्कारों की तो हत्या नहीं हो जाती। अपवाद और खतरे कहां नहीं हैं? परिवारों को झूठी शान के घेरे से बाहर आना ही होगा। तभी ऐसी मौतें थमेंगी। कोई भी श्रद्धा आफताब की नीयत को पहचानने के बाद एक मिनट भी उसके नजदीक नहीं रहेगी। फौरन अपने माता-पिता, भाई-बहनों के पास लौट आएगी। ऐसी क्रूर घटनाओं से यदि सबक नहीं लिया जाता तो यह नादानी और बेवकूफी की हद होगी। यह भी सच है कि इस तरह के मोहजाल में फंसने वाली युवतियों में कहीं न कहीं यह उम्मीद बनी रहती है कि उनके साथी में आज नहीं तो कल बदलाव आ ही जाएगा। कई इस इंतजार में उम्र गुजार देती हैं। बगावत कर प्रेम विवाह करने या लिव-इन रिलेशन में रहने वाली महिलाएं जब जान जाती हैं कि उनके साथ जबरदस्त धोखा हुआ है तो उन्हें कई तरह की चिंताएं घेर लेती हैं। कभी परिवार और समाज के सामने शर्मिंदगी की सोच तो कभी जीना भी यहां मरना भी यहां का भाव पैरों में जंजीरें डाल देता है। ऐसी तोड़ देने वाली भयावह स्थितियां अरेंज मैरिज में भी आती हैं। अधिकांश भारतीय परिवार अपनी बेटियों के कान में यह मंत्र फूंकने से नहीं चूकते कि हर हाल में पति से निभाते रहना। शादी के बाद बेटी बेगानी हो जाती है। उस पर मायके का नहीं पति और ससुराल का पूरा हक रहता है। वे जैसा चाहें उनकी मर्जी। अच्छी पत्नी का बस यही फर्ज है कि चुपचाप सहती रहे, उफ... तक न करे। चाहे कितनी भी तकलीफें आएं परिवार और दोस्तों के सामने खुद को खुश और संतुष्ट दिखाती रहे।

चश्मा तो बदलो ज़रा

    पहले बात सुशील शर्मा और नैना साहनी की। हो सकता है आज की नयी पीढ़ी उनके नाम से ही वाकिफ न हो। आज से 27 वर्ष पूर्व इन दोनों का नाम देश और दुनिया में आफताब और श्रद्धा से कहीं ज्यादा जोर से गूंजा था। तब भले ही सोशल मीडिया की धूम नहीं थी फिर भी इनकी खबरें पत्र-पत्रिकाओं में तो महीनों छपती और पढ़ी जाती रही थीं। 1995 के जुलाई महीने में राजधानी दिल्ली गर्मी से परेशान थी। उसी गर्मी की एक रात कांग्रेस का युवा नेता सुशील शर्मा जब अपने घर लौटा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी नैना साहनी टेलीफोन पर मतलूब करीम से हंस-हंसकर बातें कर रही है। मतलूब करीम नैना का पूर्व प्रेमी था। दोनों जी-जान से एक दूसरे को चाहते थे, लेकिन धर्म आड़े आ गया था। नैना के माता-पिता ने दोनों की शादी नहीं होने दी थी। बाद में नैना ने सुशील शर्मा से शादी कर ली। नैना भी सुशील की तरह कांग्रेस की युवा नेता थी। 29 वर्षीय नैना को आज़ाद पंछी की तरह उड़ना पसंद था। सुशील शर्मा से शादी ही उसने यह सोचकर की थी कि भविष्य में उस पर किसी भी तरह की कोई रोक-टोक और बंदिश नहीं होगी। वह जो चाहेगी वही करने के लिए स्वतंत्र होगी, लेकिन सुशील के लिए पत्नी का अर्थ था, ऐसी औरत जो पति को आंख मूंदकर अपना परमेश्वर माने। उसके हर आदेश का सिर झुकाकर पालन करे। वो दिन को रात कहे तो वह किसी भी तरह की आनाकानी न करे। खुले दिल की नैना विवाह के बाद भी अपने पूर्व प्रेमी को नहीं भूली थी। जब भी कोई मौका हाथ आता तो दोनों हंस बोल लेते। एक दूसरे का हालचाल भी जान लेते। यही हकीकत सुशील को बहुत चुभती थी। वह शंका की आग में जलता रहता था कि जिस पर उसका पूरा हक है, वह किसी और के बारे में भी सोचती है। उसका हालचाल लेती है और अपना हालचाल उसे बताती है। इसी बात को लेकर सुशील और नैना में हमेशा जुबानी जंग तो कभी-कभार मारपीट भी होती रहती थी। संदेह की आग में झुलसते सुशील ने अपने जासूसों को भी नैना के पीछे लगा रखा था। उस रात जब वो घर लौटा तो उसने देखा कि नैना टेलीफोन पर किसी से बात कर रही है। अपनी बात खत्म करने के बाद जैसे ही नैना ने फोन रखा तो सुशील ने री-डायल कर दिया। उसकी शंका में जान थी। दूसरी तरफ उसका पूर्व प्रेमी मतलूब करीम ही था। अथाह गुस्से के मारे उसका खून खौल गया। नैना कुछ जान और समझ पाती इससे पहले ही उसने उसे गोलियों से भून डाला। 

    पत्नी की लाश कमरे के फर्श पर पड़ी थी और पति उसे ठिकाने लगाने की तरकीबें खोजने में लग गया। इसी दौरान उसने अपने किसी खास शातिर दोस्त को भी वहां बुलवा लिया। दोनों ने मिलकर पहले तो नैना के मृत शरीर को बड़े से प्लास्टिक में लपेटा फिर उसे चादर में बांधकर अपनी कार की डिक्की में रख अशोक यात्री निवास जा पहुंचे। यह होटल सुशील शर्मा का ही था। लाश को फौरन तंदूर पर रखा गया। तंदूर का मुंह छोटा होने के कारण लाश का एक साथ तंदूर में समाना संभव नहीं था, इसलिए उसे चाकू से धड़ाधड़ टुकड़ों में काटा गया। नारी जिस्म के टुकड़ों पर मक्खन का लेप लगाकर दोनों कसाई उन्हें जलते तंदूर में धड़ाधड़ डालने लगे, जिससे धधकते तंदूर की आग की लपटें तेज होती चली गयीं। इंसानी जिस्म के जलने की तीखी गंध और धुआं भी ऊपर की तरफ उठने और फैलने लगा। तभी किसी सब्जी बेचने वाली महिला का ध्यान उस तरफ गया तो वह आग...आग कहकर शोर मचाने लगी। महिला के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज जैसे ही वहां गश्त लगा रहे पुलिस कर्मी ने सुनी तो वह तुरंत मौके पर जा पहुंचा। उसे यह कहकर अंदर जाने से जबरन रोका गया कि यह नेताजी का होटल है, किसी ऐरे-गैरे का नहीं। अंदर पुराने कागजात और पार्टी के झंडे, बेनर, पोस्टर जलाये जा रहे हैं। लेकिन उस सजग और कर्तव्यपरायण खाकी वर्दीधारी ने उनकी एक भी नहीं सुनी। वह दिवार फांदकर अंदर जा पहुंचा। तंदूर में मानव शरीर को जलता देखकर उसके होश उड़ गये। पांव तले जमीन ही खिसक गई। 

    अपनी प्रेमिका-पत्नी का क्रूर हत्यारा सुशील शर्मा 23 साल की सज़ा भुगतने के बाद अपनों के साथ अब बड़े मजे से रह रहा है। जब वह जेल से बाहर निकला तो उसका तिरस्कार नहीं, स्वागत किया गया। कई मीडिया वालों ने उसके प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए उसकी तारीफों के पुल बांधने का अभियान चला दिया।

    देश के एक नामी-गिरामी अखबार ने प्रथम पेज पर हत्यारे की तारीफ करते हुए उसकी ताजी तस्वीर के साथ छापा कि जेल में रहकर शर्मा ने दिन-रात नैना की याद में आंसू बहाए। रिहाई के बाद भी नैना को याद कर उसकी आंखों से पश्चाताप के आंसू बरसने लगते हैं। वह साईं बाबा और देवी दुर्गा का कट्टर भक्त है। ऐसे धार्मिक इंसान के हाथों पता नहीं कैसे इतना बड़ा अपराध हो गया। अपनी प्रिय पत्नी की हत्या करने की उसकी कोई मंशा नहीं थी। गुस्सा अच्छे-अच्छों के दिमाग पर ताले जड़ देता है। फिर होनी तो होनी है, उसे भला कौन टाल पाया है। देश के एक और चर्चित अखबार ने पहले पेज पर उसकी तथा उसके उम्रदराज पिता की भावुक कर देनेवाली तस्वीर लगाते हुए अपने लाखों पाठकों को बताया कि सुशील बचपन से ही अपने माता-पिता का आज्ञाकारी बेटा रहा है। अपने बेटे की रिहाई की खबर सुनकर सुशील की मां घंटों खुशी के आंसू रोती रही। उसने गद्गद् होते कहा कि अब हमारी उम्र दस साल और बढ़ गई। हमारा दुलारा बेटा हमारी सेवा में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा। देश के ही किसी और दैनिक ने अपने पाठकों को जानकारी दी कि सुशील शर्मा अपार मनोबल वाला है। हिंद देश को आज ऐसे ही नेताओं की जरूरत है। सुशील ने जेल में मानसिक तनाव से बचने के लिए पांच साल में पांच करोड़ बार गायत्री मंत्र का जाप कर अन्य कैदियों में प्रेरणा का दीप जलाया। शैतान की तारीफों के पुल बांधकर उसके प्रति अपार हमदर्दी दर्शाने वाले मीडिया ने न तो नैना साहनी को याद किया और ना ही उसके परिजनों का हालचाल जानने की सोची। उसके लिए तो नैना साहनी बस किसी के भी हाथों मरने के लिए ही जन्मी थी और यह भूल सुशील जैसे महात्मा के हाथों हो गई। 

    जब-जब सन 2022 की बात होगी तो श्रद्धा हत्याकांड और कुछ अन्य दिल दहला देने वाले ऐसे पाप काण्डों का भी जिक्र जरूर निकलेगा। श्रद्धा भी अपने प्रेमी... पति के हाथों गला घोंटकर मार डाली गयी। मुंबई की 27 वर्षीय श्रद्धा वालकर ने आफताब पूनावाला से बड़ी शिद्दत के साथ प्यार किया था। उसके साथ लिव-इन में रहने के लिए उसने अपने मां-बाप की भी नहीं सुनी थी। श्रद्धा और आफताब दोनों कॉल सेंटर में नौकरी बजाते थे। आफताब की फेमिनिस्ट, समलैगिकता का समर्थक, फोटोग्राफर, फूड ब्लॉगर तथा शेफ होने की खुबियों ने श्रद्धा को अपना अंधभक्त बना दिया था। घूमना-फिरना दोनों को पसंद था। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की मदमस्त हरियाली के सैर-सपाटे के साथ और भी कई जगह दोनों खूब घूमे थे। दोनों में तीखे मनमुटाव तथा झगड़े भी होते रहते थे। श्रद्धा कई बार उसके हाथों पिटी, लहूलुहान हुई। एक बार मुंबई के पुलिस थाने में उसके खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करवायी। फिर रजामंदी होने पर ठंडी पड़ गई। 10 मई, 2022 को आफताब श्रद्धा को दिल्ली ले आया। आफताब और हिंसक हो गया। फिर भी नैना को कहीं न कहीं यह भरोसा भी था कि आफताब सुधर जाएगा। लेकिन उसने तो अपनी उस प्रेमिका के 35 टुकड़े कर डाले जो उसे मेरी जान... मेरी जान कहते नहीं थकती थी। सुशील शर्मा की तरह आफताब ने भी जल्लाद होने का जो भयावह सबूत पेश किया उस पर सोचने भर से ही रूह कांप जाती है। नैना और श्रद्धा दोनों आजादी पसंद भी थीं और बोल्ड भी। अच्छी-खासी समझदार और पढ़ी-लिखी होने के बावजूद पिटती रहीं। लांछन, आरोप तथा अवहेलना झेलती रहीं। दोस्तों ने बार-बार कहा कि ऐसे शंकालु वहशी प्रेमी...पति के साथ एक दिन भी रहना ठीक नहीं। पढ़ी-लिखी हो। अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता है। क्यों जुल्म सह रही हो? दोनों ने फैसला लेने में देरी कर दी और शैतानों ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर अपना असली रूप दिखा दिया। आफताब और सुशील में कोई फर्क नहीं। दोनों की हैवानियत एक जैसे तिरस्कार और दुत्कार की हकदार है, लेकिन जब कुछ लोग हत्यारों को धर्म के चश्मे से देखते हुए चीखते-चिल्लाते हैं तो किसी गहरी साजिश की शंका होने लगती है। आफताब क्रूर हत्यारा है। उसने एक ऐसी नारी के टुकड़े कर जंगली जानवरों को खिला दिए जो उस पर बेइंतहा भरोसा करती थी। भरोसे का बड़ी बेरहमी से कत्ल करने वालों की बहुत बड़ी फेहरिस्त है, जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि सभी के कलंकित नाम हैं। श्रद्धा मर्डर केस में ‘लव जिहाद’ के एंगल पर माथापच्ची करने वालों का ध्यान हिंसा और हिंसक प्रवृत्तियों की तरफ क्यों नहीं जाता? श्रद्धा वालकर हत्याकांड के बाद एक वीडियो ने सजग संवेदनशील भारतीयों को चिंता में डाल दिया, जिसमें राशिद नाम का व्यक्ति यह कहता नज़र आया कि गुस्से में आदमी 35 तो क्या 36 टुकड़े भी कर सकता है। बाद में पुलिसिया पूछताछ में यह सच सामने आया कि इस वीडियो को बनाने और उसमें नजर आने वाले शख्स का नाम राशिद नहीं, विकास कुमार है...। आदतन अपराधी विकास के खिलाफ पहले से पांच मुकदमें दर्ज हैं।

Saturday, November 26, 2022

 दिल दहलाने वाला क्रूर सच

    संतरा नगरी नागपुर का रहने वाला था, भरत कालीचरण उर्फ अक्कु यादव। हवस का पुतला, जिसकी नस-नस में वहशियत और हैवानियत समायी हुई थी। जवानी की दहलीज पर पैर धरने से पहले ही उसने जुर्म की दुनिया में अपनी धाक जमा ली थी। जहां वह रहता था, वहीं उसने बलात्कारों और हत्याओं की झड़ी लगा दी। अपनी हवस मिटाने के लिए न तो उसने कभी उम्र देखी और ना ही समय का ध्यान रखा। उसकी अंधी वासना का शिकार बनने वाली महिलाओ में दस साल की बच्चियों से लेकर साठ-सत्तर वर्ष की नारियों तक का समावेश रहता था। जब भी वह अपने इलाके में निकलता तो युवतियां अपने घरों में कैद हो जातीं। माताएं अपनी बच्चियों को घरों में छिपा लेतीं। उसकी जिस महिला पर भी बुरी नज़र पड़ती, वह उसे अपना शिकार बना कर ही दम लेता। पहले तो वह बड़ी निर्दयता से उसकी अस्मत लूटता फिर हवस की आग ठंडी हो जाने पर उसकी राक्षसी क्रूरता के साथ हत्या कर देता। अपने शिकार को तड़पा-तड़पा कर मारने में उसे मनचाहे सुख और आनंद की अनुभूति होती थी। मासूम पोती के सामने दादी पर बलात्कार कर गुजरने वाले अक्कु यादव के अंतहीन गुनाहों की हर खबर खाकी वर्दीधारियों को थी, लेकिन कानून के अधिकांश रखवाले अंधे और बहरे बने हुए थे। कई पुलिस वाले उसके साथ बैठकर खाते-पीते, मौज मनाते और मनचाही रिश्वत की सौगात पाते थे। बलात्कार, डकैती, फिरौती, लूटपाट और खून की नदियां बहाने में माहिर अक्कु यह मान चुका था कि नागपुर की धरती पर उसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। कानून-कायदे उसके लिए नहीं बने हैं। शहर के लोग उससे खौफ खाते हैं। वक्त पड़ने पर वह कई नेताओं के काम आता है और वे भी उसका साथ निभाते हैं। अक्कु की पहुंच और दहशत के चलते हद से ज्यादा त्रस्त और परेशान हो चुकी महिलाओं ने ही आखिरकार उससे हमेशा-हमेशा मुक्ति पाने की राह निकाल ली।
    वो 13 अगस्त 2004 की दोपहर थी, जब अक्कु को पुलिस के शाही संरक्षण में अदालत में पेश करने के लिए लाया गया था। अक्कु अपनी ही मस्ती में बेफिक्र और बेखौफ था। पुलिस वालों की छत्रछाया में काफी देर तक वह अपने शुभचिंतकों से बोलता-बतियाता रहा। घरवालों तथा अपने खास दोस्तों का हाल-चाल भी जाना। तभी एकाएक कोर्ट का गेट तोड़ लगभग 200 महिलाएं वहां आ पहुंची और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता अक्कु पर अंधाधुंध मिर्च पावडर और पत्थरों की बरसात होने लगी। हाथों में तीक्ष्ण हथियार लिए भीड़ देखते ही देखते उस पर टूट पड़ी। किसी ने उसके हाथ-पैर काटे तो किसी ने उसके गुप्तांग का ही सफाया कर अपना गुस्सा उतारा। उसके जिस्म पर तब तक चाकू, छुरियां घोंपी जाती रहीं, जब तक उसने अंतिम सांस नहीं ली। कुछ ही मिनटों में 32 वर्षीय खौफनाक हत्यारे, बलात्कारी का काम तमाम कर भीड़ वहां से चलती बनी। ‘अक्कु कांड’ ने शहर के गुंडे बदमाशों की आंखें खोल दीं। कुछ वर्ष तक अक्कु यादव की तरह गुंडई दिखाने वाला कोई नया चेहरा डर के मारे सामने नहीं आया। छोटे-मोटे बदमाश जरूर आतंक मचाते रहे। अक्कु की पागल कुत्ते की तरह की गई हत्या के ठीक 18 साल बाद फिर एक बदमाश ने जैसे ही सिर उठाया तो महिलाएं मौका पाते ही अपनी पर उतर आईं। वर्ष 2022 के नवंबर महीने में फिर एक नराधम भीड़ के हाथों कुत्ते की मौत मरने जा रहा था, लेकिन उसकी किस्मत अच्छी थी, बच गया। उन्तालीस वर्षीय बाल्या जनार्दन कई तरह के नशे करता। नशे में धुत होते ही वह नग्न हो जाता और राह चलती महिलाओं से अश्लील छेड़छाड़ करने लगता। उसके मुंह से बलात्कार की धमकियां और गंदी-गंदी गालियां फूटने लगतीं। पहले तो महिलाएं नजरअंदाज करती रहीं, लेकिन उसकी गुंडई नहीं थमी। वह भी अक्कु की तरह लड़कियों तथा औरतों के जिस्म पर गंदी निगाहें गढ़ाये रहता था। मौका पाते ही उन्हें दबोच भी लेता था। एक रात एमडी के नशे में जब वह एक 65 वर्षीय महिला के साथ अश्लील हरकतें करते हुए जबरदस्ती कर रहा था तभी महिलाओं की भीड़ ने उसे घेर लिया। इस भीड़ में कुछ ऐसी थीं, जिन्हें बाल्या अकसर परेशान करता रहता था। वे उसे सबक सिखाना चाहती थीं। आज उनके लिए अच्छा मौका था। सभी छिछोरे बाल्या की धुनाई में जुट गईं। इसी दौरान उसने अपने एक बदमाश नशेड़ी दोस्त को भी वहां बुला लिया था। भीड़ ने तो बाल्या के घर को भी फूंकने का इरादा कर लिया था। भीड़ में से ही जोर-जोर से आवाजें आने लगीं, ‘‘अब ज्यादा मत सोचो, इसका भी अब अक्कु जैसा हाल कर दो। यह भी कभी नहीं सुधरने वाला।’’ बाल्या को महिलाओं के हाथों बुरी तरह से पिटता देख उसका साथी वहां से भाग खड़ा हुआ। इसी दौरान किसी ने पुलिस तक खबर पहुंचा दी। पुलिस ने बड़ी मुश्किल से उसे गुस्सायी महिलाओं से मुक्त करवाया, जिससे एक और ‘अक्कु हत्याकांड’ होते-होते रह गया।
    भीड़ ने अच्छा किया, बुरा किया इस पर अपने-अपने मत हैं, लेकिन एक प्रश्न यह भी है कि जब कानून के रखवाले बिक जाएं और गुंडे-मवाली लोगों का जीना हराम कर दें, महिलाओं को अपनी इज्जत लुटती और खतरे में पड़ती नजर आने लगे तो वे क्या करें? यह तो हुई बाहर के अपराधियों की बात। बाहर के अपराधी दिख जाते हैं। जैसे-तैसे उन्हें सबक भी सिखा दिया जाता है, लेकिन घर के भीतर, अपनों की शर्मनाक अक्षम्य बर्बरता और वहशी दरिंदगी का क्या?
महाराष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी पुणे की 12वीं कक्षा की छात्रा की आपबीती किसी भी संवेदनशील इंसान का माथा घुमा सकती है और इस सुलगते सवाल में उलझा सकती है कि क्या खून के रिश्ते इतनी नीचता और गंदगी भरे हो सकते हैं? यह किशोरी जब मात्र बारह-तेरह वर्ष की थी तब उसके 33 वर्षीय चाचा ने कई बार उस पर बलात्कार किया। किशोरी ने चाचा की काली करतूत के बारे में अपने 70 वर्षीय दादा को बड़े आहत मन से फफक-फफक कर बताया, तो उन्होंने भी अपने कपूत को डांटने-फटकारने की बजाय अपनी ही पोती से छेड़खानी और बलात्कार करना प्रारंभ कर दिया। तब किशोरी उत्तरप्रदेश में अध्ययनरत थी। उसी दौरान उसने चिट्ठी के माध्यम से अपने पिता को चाचा और दादा की हैवानियत की जानकारी दी, लेकिन उन्होंने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। 2018 में उसने चाचा और दादा के घर को छोड़ा और पुणे अपने पिता के पास आ गई। बाप तो चाचा और दादा से भी बदतर नीच निकला। वह भी जब-तब बड़ी बेहयायी के साथ उसके शरीर से खेलने लगा। रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली इस वहशियत का हाल ही में तब खुलासा हुआ जब किशोरी ने छह सालों से हो रहे यौन शोषण की जानकारी अपनी कॉलेज की यौन उत्पीड़न के मामले को देखने के लिए बनाई गई ‘विशाखा कमेटी’ को दी। अपना अथाह दर्द बयां करते वक्त एक बेटी रो रही थी और सुनने वाले भी बड़े गहरे सदमे में थे...।

Thursday, November 17, 2022

 यादों की संदूक

    वो दिन ही अजीब था। सुबह से ही उदासी ने घेर रखा था। फिर भी मैं अपने ‘राष्ट्र पत्रिका’ के कार्यालय में खबरों पर नज़रें गढ़ाये था। जैसे-तैसे सम्पादकीय भी लिख ली थी। दोपहर ने शाम की तरफ सरकना प्रारंभ कर दिया था। यही कोई पांच बजे के आसपास मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर गिरीश पंकज का नाम चमक रहा था। उन्होंने बड़े गमगीन स्वर में बताया कि श्री रमेश नय्यर नहीं रहे। अभी कुछ देर पहले ही मुझे उनके निधन का समाचार मिला है। इस अत्यंत दु:खद को सुनते ही दिल धक्क से रह गया। यह कैसे हो गया? अभी पांच दिन पहले ही उनका फोन आया था! मैंने तुरंत श्री रमेश नय्यर जी के सुपुत्र संजय नय्यर को फोन लगाया। मेरी आवाज भी भर्रायी हुई थी। उधर संजय का भी यही हाल था। उन्होंने बताया कि पापा पिछले कुछ हफ्तों से काफी बीमार थे। आज चार बजे के आसपास तबीयत कुछ ऐसी बिगड़ी कि यह अनहोनी हो गयी।
    हर वर्ष की तरह इस वर्ष की दीपावली के दिन भी शुभकामनाएं और बधाई देने के लिए मैंने श्री रमेश नय्यर को फोन लगाया था, लेकिन उन्होंने नहीं उठाया। ऐसा बहुत कम होता था। उसके बाद एक बार फिर और अगले दिन तीन-चार बार फोन लगाने पर जब उनसे बातचीत नहीं हो पायी तो मैं चिंतित हो गया। दिवाली के पांचवें दिन मेरे मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर नय्यर भाई साहब का नाम देखकर बहुत खुशी हुई। मेरे अभी नमस्कार कहा ही था कि वे शिकायती अंदाज में कहने लगे कि इस बार दीपावली पर मेरी याद नहीं आयी! मेरे यह बताने पर कि मैंने तो पांच-छह बार मोबाइल लगाया, लेकिन आपने ही नहीं उठाया। कुछ पलों तक दीपावली की शुभकामनाएं...बधाई के बाद उन्होंने मेरी पत्नी और बहू से भी कुछ देर तक बातचीत की। मैंने उन्हें भाभी जी के साथ नागपुर आने का अनुरोध किया तो उन्होंने कहा कि मुझे नागपुर आना, तुमसे मिलना हमेशा अच्छा लगता है, लेकिन अभी तुम मिलने आ जाओ। उन्होंने यह नहीं बताया कि वे बीमार हैं। यही उनका स्वभाव था। अपनी तकलीफ को छुपाये रखते हुए दूसरों की उलझनों और मुसीबतों को दूर करने में अपनी जी-जान लगा देते थे।
    वो 1993 का साल था। बिलासपुर में स्थित धर्म अस्पताल में जिस रात मेरे पिताजी ने अंतिम सास ली उस दिन भी सुबह से ही मैं बहुत उदास और घबराया हुआ था। रमेश नय्यर मेरे लिए सगे भाई से भी बढ़कर थे। जब भी मिलते अभिभावक की तरह स्नेह और आशीर्वाद की अमृत धारा की बरसात कर देते। रात को बिस्तर पर नींद नहीं आयी। आखों के सामने नय्यर भाई साहब का चेहरा घूमता रहा। यादों की संदूक में संजोकर रखी किताब के पन्ने खुलते चले गए। वो सन 1978-79 के दिन थे, जब बिलासपुर से दैनिक ‘लोकस्वर’ का प्रकाशन प्रारंभ होने वाला था। तब मैं कटघोरा में रायपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘देशबंधु’ का संवाददाता था। मेरी लिखी कहानियां देश-प्रदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। परिवार के कपड़ा व्यवसाय में मेरा मन नहीं लगता था। साहित्य की दुनिया से लगाव होने के कारण बिलासपुर और रायपुर जाना और लेखकों-पत्रकारों से मिलना-मिलाना होता रहता था। बिलासपुर के व्यंग्यकार, पत्रकार स्वर्गीय विजय मोटवानी उम्र में तो मुझसे छोटा था, लेकिन समझ के मामले में बड़ों को भी मात देने की क्षमता रखता था। उसके बड़े भाई ओम मोटवानी ने ही मुझे विजय से मिलवाया था। ओम और मैं सीएमडी कॉलेज में सहपाठी रहे थे। एक दिन शाम को जब मैं सदर बाजार स्थित मोटवानी बंधुओं की रेडिमेड कपड़े की दुकान पर पहुंचा तो उसने मुझे एक दुबले-पतले पत्रकार युवक से मिलवाया। यह गिरीश पंकज थे, जिन्होंने बाद में खुद को पूरी तरह से साहित्य के प्रति समर्पित करते हुए अनूठा कीर्तिमान रचा। यह सिलसिला अभी सतत बना हुआ है। उसी शाम हम तीनों पुराने बस स्टैंड के पास स्थित दैनिक लोकस्वर कार्यालय गये। वहां नय्यर जी से मेरी प्रथम भेंट हुई। पहली मुलाकात में ही नय्यर जी ऐसे मिले जैसे वर्षों के परिचित हों। लगभग घंटा भर तक अखबारी जगत और इधर-उधर की बातें होती रहीं। चाय-कॉफी का दौर भी चला। कटघोरा, पौड़ी उपरोड़ा का संवाददाता तथा लोकस्वर में नियमित कॉलम लिखने का मौखिक अनुबंध भी हो गया। तब के मध्यप्रदेश और अब के छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से दैनिक लोकस्वर का प्रकाशन होते ही उसकी दूर-दूर तक चर्चाएं होने लगीं। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता का डंका बजने लगा। जिस सच को दूसरे अखबार छिपाते थे, उसे बेखौफ उजागर करने की वजह से प्रचार-प्रसार के मामले में लोकस्वर ने अल्पकाल में जो इतिहास रचा उसकी चर्चा आज भी होती है। लोकस्वर की अल्पकाल में अभूतपूर्व प्रगति की एक खास वजह संपादक श्री रमेश नय्यर की संपादकीय भी रही, जिसे पढ़ने के लिए कई सजग पाठक खास तौर पर लोकस्वर खरीदते थे। कुछ दुकानदार तो उनकी कलम के इतने मुरीद हो गये कि उनकी लिखी संपादकीय की कटिंग को फ्रेम करवाकर दुकानों में लगाते थे। अत्यंत प्रभावी संपादक, लेखक होने के साथ-साथ नय्यर जी एक कुशल वक्ता भी थे। दुबले-पतले हाजिर जवाब नय्यर जी से किसी भी विषय पर बातचीत की जा सकती थी। लतीफों... चुटकलों तथा शेरो-शायरी से उन्हें मौसम बदलना भी खूब आता था। अपने उसूलों के पक्के श्री नय्यर जी बिलासपुर में मात्र डेढ़-दो साल रहे, लेकिन उनके मित्रों की तादाद देखकर यही लगता था कि वे तो यहीं के बाशिंदे हैं। व्यक्ति को पहचानने की भी उनमें अद्भुत क्षमता थी। बहुत ही शांत, सहज और सरल जीवन जीने वाले नय्यर जी को कभी भी ऊंची आवाज में बोलते नहीं देखा गया। उनका कोई सहयोगी यदि कभी कोई गलती भी कर देता तो उस पर इस अंदाज से गुस्सा होते कि उसे बुरा नहीं लगता था। नये पत्रकारों को मार्गदर्शन देने तथा प्रोत्साहित करने में सदैव अग्रणी रहे नय्यर जी जब भी कार्यालय की केबिन में होते तो उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता था। वे हर किसी से समभाव से मिलते। देशबंधु, युगधर्म, एमपी क्रानिकल, लोकस्वर, ट्रिब्यून, नवभास्कर, संडे ऑबजर्वर, समवेत शिखक में कार्यरत रहने के दौरान उन्होंने नये पत्रकारों तथा लेखकों का पूरे मन से मार्गदर्शन किया। उन सभी के दिलों में आज भी नय्यर जी के प्रति अपार श्रद्धा और सम्मान है। नय्यर जी जब बिलासपुर में थे तभी मेरा दैनिक श्रम बिंदु के संपादक शिव श्रीवास्तव से परिचय हुआ, जो कालांतर में पक्की और सच्ची मित्रता में तब्दील हो गया। शिव श्रीवास्तव भी नय्यर जी को अपना आदर्श तथा गुरू मानते थे। नय्यर जी के लोकस्वर छोड़कर रायपुर जाने के बाद जब भी मैं रायपुर जाता तो उनसे मिलकर ही चैन पाता। व्यापार में अभिरूचि नहीं होने के कारण मैं कटघोरा छोड़ने का मन बना चुका था। शिव श्रीवास्तव को जब मेरी तकलीफ के बारे में पता चला तो उन्होंने नय्यर जी से कोई हल निकालने का अनुरोध किया। नय्यर जी ने तुरंत हल भी पेश कर दिया। रायपुर के सत्ती बाजार में उनकी दुकान, जिसमें कभी ‘महानदी प्रकाशन’ चलता था, उसकी चाबी मुझे थमा दी। मैंने नाहटा बिल्डिंग में स्थित इस दुकान पर कपड़े का व्यवसाय प्रारंभ कर दिया तथा पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में पूरी तरह से सक्रिय हो गया। अखबार की नौकरी से परिवार चलाना संभव नहीं था। जब नय्यर जी नवभास्कर के संपादक थे, तब उन्होंने मुझे कुछ पंजाबी के कथाकारों की किताबें देते हुए कहा कि इनका हिंदी अनुवाद कर नवभास्कर में भेजते रहो। हर महीने तीन-चार पंजाबी कहानियों का हिंदी अनुवाद नवभास्कर में प्रकाशित होने से मुझे प्रतिमाह लगभग पांच-छह सौ मिलने लगे। यह सिलसिला उनके नवभास्कर छोड़ने तक बना रहा। रायपुर में सात-आठ साल तक व्यवसाय और पत्रकारिता की दो नावों की सवारी करते-करते निराशा ने मुझे घेर लिया। तनाव और हताशा ने मुझे इतना अस्वस्थ कर दिया कि महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। तब नय्यर जी ने मुझे समझाया कि खुलकर पत्रकारिता करना ही मेरे लिए हितकारी होगा। तब नागपुर में मेरा इलाज चल रहा था। जब मैं काफी हद तक स्वस्थ हो गया तो मैंने दो-ढाई वर्ष तक विभिन्न अखबारों में नौकरी करने के बाद पहले साप्ताहिक ‘विज्ञापन की दुनिया’ और उसके बाद ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। अवरोध और तकलीफे तो कई आयीं, लेकिन हिम्मत को जिन्दा रखे रहा। नागपुर से दोनों साप्ताहिकों के सफलतापूर्वक संचालन पर श्री नय्यर जी को वैसी ही खुशी और तसल्ली हुई, जो एक पिता को होती है। उनके आकस्मिक निधन के बाद मैंने यह भी जाना कि वे तो अनेकों पत्रकारों, लेखकों के लिए ऐसे घने वृक्ष थे, जिसकी छाया कड़ी से कड़ी धूप से बचाये रखती है। यह उनकी सर्वप्रियता का ही सुखद परिणाम है कि राजकुमार कॉलेज से प्रगति कॉलेज तिराहा (चौबे कॉलोनी) मार्ग का नामकरण उनके नाम पर करने की घोषणा कर दी गई है।

Thursday, November 10, 2022

राजनीति का खूनी चक्का

    नेताओं के प्रलोभनों और बड़े-बड़े सपनों के मायाजाल में फंसकर न जाने कितने लोग पाते तो कुछ भी नहीं, उल्टे अपना सब कुछ गंवा और लुटा बैठते हैं। कपटी नेताओं और समाजसेवकों को दूसरों की जिन्दगी से खेलने और अपनों की जिंदगी को संवारने का भरपूर हुनर आता है। नकाब पर नकाब और मुखौटे लगाने में भी कोई उनका सानी नहीं। कभी-कभी उनकी चालाकी उन्हीं पर भारी भी पड़ जाती है। उन्हीं के विश्वासपात्र उन्हें ऐसी गहरी चोट दे देते हैं कि वे उनके खिलाफ कुछ भी नहीं कर पाते।
    कश्मीर को अशांत बनाये रखने में वहां के धूर्त नेताओं तथा अलगाववादियों की खासी भूमिका रही है। अपने मतलब को साधने के लिए इन्होंने कितने खून खराबे करवाये, बचपन लूटे और जवानियों को नेस्तनाबूत किया उसका किसी के पास कोई हिसाब नहीं। इन्हीं के बहकावे में आकर अपनी जिंदगी के कई साल मटियामेट करने वाले फारूख की जब आंखें खुलीं तो उसके पैरोंतले की जमीन ही खिसक गयी। तब फारूख मात्र सोलह वर्ष का था, जब अलगाववादियों ने उस पर अपना मायाजाल फेंका और वह भी उसमें ऐसा फंसा कि पढ़ाई-लिखायी छूट गई। कई अन्य कश्मीरी किशोरों और युवकों की तरह फारूख का ब्रेनवाश कर पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकवाद की ट्रेनिंग के लिए ले जाया गया। ट्रेनिंग देने वालों में पाकिस्तानी सेना के अफसर भी थे और आतंकी भी। ग्रेनेड फेंकने तथा हर तरह के हथियारों को चलाने के साथ-साथ मार्शल आर्ट्स और पहाड़ों पर चढ़ने की ट्रेनिंग देते हुए दिन-रात उसके दिमाग में भरा गया कि जहां तुम जन्मे हो... रहते हो वो कश्मीर गुलामी की जंजीरों में जकड़ा है और गुलामी से बड़ा और कोई अभिशाप नहीं होता। किसी का गुलाम होने से अच्छा है मर जाना। कश्मीर की आजादी के लिए अपनी कुर्बानी देने से बड़ा पुण्य और कोई हो ही नहीं सकता। इस फर्ज को निभाते हुए मरने वालों को हमेशा याद रखा जायेगा।
    कश्मीर में तैनात भारतीय सेना पर हमला करने वाले आतंकियों के जत्थे में शामिल रहे फारूख को शुरू-शुरू में तो हत्याएं और खून खराबा करते हुए यही लगता रहा कि वह यह सब अपने कश्मीर की बेहतरी के लिए कर रहा है। कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति मुशिर उल हक की हत्या के बाद उसे हकीकत का आभास हुआ। फारूख की तब तो आंखें खुली की खुली रह गईं जब उसने देखा कि कश्मीर की आजादी के लिए उकसाने वाले अलगाववादी नेताओं के यहां तो धन की बरसात हो रही है। उन्होंने आलीशान होटल बनवा लिए हैं। वे महंगी कारों में चलते हैं। आलीशान कोठियों में भोग-विलास भरा जीवन जी रहे हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं और दूसरों के बच्चों के हाथों में बंदूकें पकड़वाकर आम कश्मीरियों की हत्याएं करवा रहे हैं। फारूख ने 1991 में आत्मसमर्पण कर दिया। आठ साल की जेल काटी। जेल से बाहर आने के बाद फारूख ने भटके कश्मीरी युवाओं को नेताओं का असली चेहरा दिखाते हुए समझाना प्रारंभ कर दिया कि अलगाववादी नेता और पाकिस्तान ने पढ़ाये-लिखाये आतंकी सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए तुम्हें गुमराह कर रहे हैं। इनका मकसद कश्मीर की भलाई करना नहीं, कश्मीर को किसी भी तरह से भारत से अलग करना है। इसलिए इनके बहकावे में आने का मतलब है, अपनी बर्बादी और मौत। कश्मीर में बीते वर्षों में मतलबी नेताओं ने जिस तरह से बच्चों, किशोरों और युवकों के हाथों में पत्थर और हथियार थमा कर अपनी दुष्टता दिखाने का चक्र चलाये रखा और खुद तमाशा देखते हुए सुरक्षित मौजमस्तीवाला जीवन जीते रहे उसका पर्दाफाश हो चुका है।
    आजादी के बाद यही कपटी काम पूरे भारत में किस्म-किस्म के नेताओं की स्वार्थी कौम ने अपने-अपने अंदाज से करने में कोई कमी नहीं की है। राजनीतिक दलों के मुखियाओं से लेकर उनके छोटे-बड़े नेताओं ने जिन कार्यकर्ताओं की बदौलत सत्ता का स्वाद चखा वे तो वहीं के वहीं रह गए, उनकी जवानी बुढ़ापे में बदल गई, लेकिन नेताओं तथा उनके परिजनों के हिस्से में इतना अधिक धन और सुख-सुविधाएं आयीं कि देखने वालों की आंखें तक चुंधिया गईं। सत्तालोलुप नेताओं ने नैतिकता और ईमानदारी को भी ताक पर रख दिया। बहुत कम नेताओं ने आमजन के हित की सोची। महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और अपराधी अंकुशहीन हो गए। पुल और पटरियां उखड़ती रहीं। अफसर, ठेकेदार मालामाल होते रहे। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मोरबी में नवनिर्मित पुल के ध्वस्त होने से लगभग डेढ़ सौ जिन्दा इंसान मुर्दों में तब्दील हो गये। इनमें पुरुष भी थे। महिलाएं भी थीं। बच्चे, युवा और बूढ़े सभी थे। पुल को बनाने का ठेका अपने ही खास आदमी को दिया गया था, जिसकी पुल के निर्माण से ज्यादा सरकारी धन पर नज़र थी। उसकी तिजोरी में तो करोड़ों रुपये जमा हो गए, लेकिन किस कीमत पर?
    अभी कुछ दिन पहले यह कलमकार देश के प्रदेश छत्तीसगढ़ में कुछ सजग पत्रकार मित्रों के बीच बैठा था। वे डंके की चोट पर बता रहे थे कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को चौबीस घंटे अपनी कुर्सी बचाये रखने की चिंता खाये रहती है। आम जनता की चिंता करने से ज्यादा दिल्ली में बैठे अपने आकाओं को हर तरह से प्रसन्न रखने की कवायद में लगे रहते हैं। उनकी कुर्सी को छीनने की तिकड़में लगाने वालों ने उनकी रातों की नींद ही उड़ा रखी है। बातों ही बातों में स्वर्गीय अजीत जोगी की काली दास्तानों का भी जिक्र चल पड़ा। जिन्होंने कलेक्टर, सांसद और मुख्यमंत्री रहते इतनी काली माया बटोरी, जिसे संभाल पाना मुश्किल हो गया। करोड़ों-अरबों रुपयो को सुरक्षित ठिकाने पर लगाने के लिए कई तिकड़में करनी पड़ीं। कुछ विश्वासपात्रों को उन्होंने करोड़ों रुपये यह सोचकर अमानत के तौर पर सौंपे कि वक्त आने पर इशारा करते ही वापस मिल जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विश्वासपात्रों को विश्वासघाती बनने में देरी नहीं लगी। हराम की कमायी ऐसे ही लुटती है। कुदरत ने भी जोगी को अपंग कर ऐसी सज़ा दी कि चलने-फिरने के लायक ही नहीं रहे। अभी हाल ही में फेसबुक पर मैंने रायपुर के साहित्यकार मित्र स्वराज करुण के भेजे किसी फिल्म के अल्पांश को देखा। उसे देखते ही माथे की नसें फटती-सी लगीं। सरकारी पुल के टूट जाने पर कई लोग मारे गये। उन्हीं में शामिल है एक पिता का मासूम बेटा। पिता अथाह गुस्से, गैस सिलेंडर और पिस्टल के जोर पर कुछ सफेदपोशों को अपने कब्जे में किये हुए है। नेता, मंत्री, इंजीनियर, सरकारी ठेकेदार इनमें शामिल हैं। वह उनसे जानना चाहता है कि करोड़ों रुपयों से बना यह पुल एकाएक कैसे ढह गया? पहले तो कोई भी कुछ भी उगलने को तैयार नहीं होता, लेकिन जब आंखों से अंगारे उगलती आंखें और जुबान उन्हें मौत के मुंह में सुलाने का भय दिखाती है तो ठकेदार बताता है कि खिलाने-पिलाने के कारण मजबूत पुल का निर्माण नहीं हो पाया। पिता पूछता है कि किसे खिलाना पड़ा? तो उसकी उंगली मंत्री की ओर इशारा करती है। भय से कांपता मंत्री अपनी सफाई देता है कि सारा धन अकेले मैंने नहीं खाया। जिस राजनीतिक पार्टी की बदौलत हम सत्ता का स्वाद चखते चले आ रहे हैं उसे चलाने के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों के फंड की जरूरत पड़ती है। फिर हम भी तो चुनाव के वक्त मतदाताओं को रिझाने के लिए क्या कुछ नहीं करते। कई बार अपनी सारी जमा पूंजी दांव पर लगा देते हैं। इस सारी सर्कस और धंधे को चलाने के लिए जो अपार धन लगता है वह सब इसी मौत के खेल के भ्रष्टाचार से ही तो आता है। इसमें अकेले हम कसूरवार नहीं। देश की जनता भी तो है, जो सबकुछ देखती-समझती है, लेकिन फिर भी हम जैसों को जीत का सेहरा पहनाकर विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी पर बैठाती है...।

Thursday, November 3, 2022

उनका कसूर? ...हैं बेकसूर!!

    अरुण और गोपाल की हैरतअंगेज आपबीती जानकर मैं घंटों सोचता रहा कि यदि मैं उनकी जगह होता तो क्या करता। यही चिंता... यही सवाल आपके मन में भी हिलौरें मार सकता है। ज़रा इनके साथ हुए घोर अन्याय के बारे में गंभीरता से सोचें और जानें तो! हां यह भी जान लें कि अरुण और गोपाल जैसे न जाने कितने बेकसूरों को ऐसी ही अन्याय की सुलगती भट्टी में जलना पड़ता है। इन्होंने तो अपनी कह दी, लेकिन न जाने कितने बेकसूर अपने जख्मों को अपने अंदर समेटे घुट-घुट कर अनाम मौत का कफन ओढ़ अपराधी होने के कलंक के साथ इस दुनिया से ही चल देते हैं। किसी को कोई खबर नहीं होती। नागपुर के रेलवे स्टेशन पर उस दिन भी रेलगाड़ियों के आने और जाने, यात्रियों के चढ़ने और उतरने की गहमागहमी थी। हमेशा की तरह उस दिन भी कई लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य करीबियों को छोड़ने और लेने आए थे। इसी भीड़ में खड़े थे एक्टिविस्ट अरुण फरेरा, जो किसी अपने पुराने प्रिय मित्र के आने की राह देख रहे थे। जिस ट्रेन से मित्र का आगमन होने वाला था उसके शीघ्र प्लेटफार्म पर आने की घोषणा हो चुकी थी। तभी अचानक अरुण ने खुद को 15 लोगों से घिरा पाया। वे कुछ जान-समझ पाते इससे पहले ही उन्हें धक्के मारकर स्टेशन से बाहर ले जाया गया और एक कार में धकेल दिया गया। चलती कार में उन पर धड़ाधड़ मुक्के, थप्पड़ और डंडे बरसते रहे। उनके शरीर से लहू बहता रहा। इसी दौरान उन्हें बताया गया कि वह नागपुर की एंटी नक्सल सेल की गिरफ्तारी में हैं। हतप्रभ अरुण उन्हें बताने की कोशिश में लगे रहे कि वे किसी गलतफहमी के शिकार हैं। उन्हें किसी ने झूठी जानकारी दी है, लेकिन उनकी जरा भी नहीं सुनी गई। दूसरे दिन शहर और देश के अधिकांश अखबारों और न्यूज चैनलों की यही खास खबर थी, ‘एक खूंखार नक्सली को एंटी नक्सल सेल ने धर दबोचा है। कई वर्षों से नक्सली गतिविधियों में शामिल इस देशद्रोही के संगीन अपराधों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है...।’
    पुलिस कस्टडी में मुंह खुलवाने के लिए अरुण को राक्षसी तरीके से दिन-रात मारा-पीटा गया। गंदी-गंदी गालियों के साथ-साथ वो सारे हथकंडे भी अपनाये गये, जिनके लिए पुलिस खासी बदनाम है। अरुण यही कहते रहे कि हिंसा, मारकाट और नक्सलियों से उनका कभी कोई रिश्ता नहीं रहा। वह तो बस गरीबों, दलितों, शोषितों और हर वर्ग के वंचितों के हितैषी और मददगार हैं। जो इनके साथ अन्याय करते हैं, इनपर जुल्म ढाते हैं, उन्हीं के खिलाफ उनका वर्षों से युद्ध जारी है। जो पुलिसिये पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे, अरुण के बारे में पहले से ही अपनी पुख्ता राय और सोच बनाये हुए थे, वे कहां कुछ सुनने वाले थे। कुछ दिनों के पश्चात अरुण को जेल की उस अंडा सेल में डाल दिया गया, जिसका नाम सुनते ही अपराधी कांपने लगते हैं। पांच-छह फीट की इस सेल का आकार अंडे जैसा होता है, इसलिए इसे अंडा सेल कहा जाता है। पूरी तरह से बॉम्बप्रूफ इस सेल में हमेशा घुप्प अंधेरा रहता है। सांस लेने के लिए हवा की कमी 24 घंटे कैदी को अपने गुनाहों की याद दिलाने के साथ-साथ जानलेवा घुटन से भी रूबरू कराती रहती है।
प्रतिबंधित कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओइस्ट) का सदस्य होने समेत कुल 10 आरोपों के चक्रव्यूह में फंसाये गये अरुण चार साल आठ महीने बाद जमानत पर जेल से बाहर तो आ गए, लेकिन देशद्रोही होने के कलंक ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अपनों ने भी दूरियां बना लीं। जमानत के दो वर्ष बाद जब उनपर कोई आरोप सिद्ध नहीं हो पाया तो उन्हें बरी कर दिया गया, लेकिन लोगों की उनके प्रति नक्सली वाली धारणा नहीं बदली। बेकसूर होने के बावजूद जेल की कड़ी सज़ा भुगतने वाले अरुण ने अपने कटु अनुभवों पर एक किताब भी लिखी। वंचितों की सहायता करने का उनका हौसला अभी भी जस का तस बना हुआ है। मुंबई में रहते हुए उन कैदियों को कानूनी सहायता दिलवाकर बाहर निकालने के अभियान में लगे हैं, जिन्हें आतंकवादी और नक्सली होने के झूठे आरोप में जेल में डाल दिया जाता है। अरुण को आज भी इस गम से छुटकारा नहीं मिला, जो वर्षों की अंधी कैद ने उन्हें दिया। कहीं न कहीं उनका कानून से भी भरोसा तो उठा ही है। एकदम निर्दोष होने पर भी दोषी मानते हुए प्रताड़ित किये गए अरुण फरेरा का क्षोभ कभी भी नहीं मिटने वाला। कानून के रक्षकों की बेइंसाफी भी शूल की तरह चुभती रहेगी।
    गोपाल शेंडे के साथ भी ऐसी ही बेइंसाफी हुई। उन्होंने जो अपराध किया ही नहीं था उसकी सात साल की सज़ा काटी। नागपुर में रहने वाले गोपाल मायानगरी मुंबई में स्थित एक होटल में व्यवस्थापक के पद पर कार्यरत थे। 19 जुलाई, 2009 को घाटकोपर रेलवे स्टेशन पर एक मतिमंद महिला किसी बलात्कारी की अंधी हवस का शिकार हो गई। देश की अत्यंत सतर्क, होशियार और उम्दा माने जाने वाली महाराष्ट्र पुलिस ने गोपी नाम के आरोपी के स्थान पर गोपाल को बलात्कार के आरोप में हथकड़ियां पहना दीं। उनकी सुनने की बजाय अपनी मनमानी कर डाली। जेल में जाने के बाद उनका पूरा परिवार ही बिखर गया। पत्नी ने किसी और का दामन थाम लिया। दोनों बेटियों को अनाथालय में पनाह लेनी पड़ी। मां की पागलों जैसी हालत हो गई। पिता को बेटे के बलात्कार के आरोप में जेल जाने के सदमे ने इस कदर आहत किया कि उनकी मौत हो गई। सत्र न्यायालय ने बलात्कार के संगीन आरोप में गोपाल को सात साल की सजा भी सुना दी! उन्होंने इसके विरोध में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, तो 10 जून, 2015 को उन्हें निर्दोष रिहा कर दिया गया। सात साल बाद जब गोपाल जेल से बाहर आये तो पूरी तरह से तन्हा, बेबस और खाली हाथ थे। अदालत ने तो बेकसूर मानते हुए बरी कर दिया था, लेकिन लोगों की निगाह में गोपाल अभी भी बलात्कारी थे। कोई उन्हें नौकरी देने को तैयार नहीं था। कई दिन भूखे-प्यासे भटकते रहे। सब्र भी जवाब देता चला गया। किसी ने भी उनके साथ खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखायी। आज भी उन्हें यही लगता है कि वे किसी ऐसी रेलगाड़ी पर सवार हैं, जो दिल को कंपकंपाते हुए धड़...धड़...धड़...धड़ करती किसी अंधेरी सुरंग से गुजर रही है और सुरंग है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही! पुलिस प्रशासन की महाभूल और नालायकी की वजह से अपने जीवन के अनमोल सात साल लुटा चुके गोपाल को सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली है। समाज का वो तथाकथित सजग तबका भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधे है, जो अन्याय के खिलाफ आंदोलन करने के लिए जाना जाता है। खुद को एकदम लाचार, हारा और लुटा हुआ महसूस करते गोपाल शेंडे की दोनों बेटियां अभी भी अनाथाश्रम में रह रही हैं!