Thursday, February 16, 2023

यहां तो सब चलता है!

    कई तस्वीरें हैं, जो मेरी आंखों से ओझल ही नहीं हो रहीं। एक बच्ची कई घण्टों से मलबे में फंसी है। इस दौरान इस सात साल की बहादुर बच्ची ने अपने छोटे भाई की रक्षा... सुरक्षा के लिए उसके सिर पर हाथ रख रखा है। लगातार 17 घण्टे तक मौत का सामना कर मलबे में दबे रहने वाले बहन-भाई की इस तस्वीर को जिसने भी देखा हतप्रभ रह गया। मौत से जंग ऐसे भी लड़ी जाती है। हर किसी ने बहन की सराहना की। धरती के सभी संवेदनशील इंसानों को भावुकता से ओतप्रोत कर देने वाली इस अभूतपूर्व तस्वीर ने सृष्टिवासियों को यह भी बताया कि लाल खून के रिश्ते का पूरी दुनिया में एक ही रंग है। सोच और भावनाओं में भी कोई फर्क नहीं। कुछ नादान लोग इस सच से मुंह फेरे रहते हैं। इसी वजह से दंगे फसाद होते हैं। भाईचारे का कत्ल होता रहता है और निर्दोषों का खून बहता है। तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप ने लगभग पचास हजार लोगों की जान ले ली। इस प्राकृतिक आपदा तथा इंसानी लालच और नालायकी ने दुनिया को फिर एक बार चेतावनी देते हुए चेताया कि अभी भी वक्त है, होश में आ जाओ। प्रकृति से छेड़छाड़ करना बंद करो। हद से ज्यादा भौतिक सुखों के लालच के गर्त में मत डूबो। याद रखो जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। तुम्हारी गलतियां तुम्हें इससे भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं। 

    तुर्की और सीरिया में आये भयावह भूकंप ने एक से एक विशाल गगनचुंबी इमारतों को जमींदोज कर दिया। मलबे को हटाने के लिए क्रेनें और इंसानी दिमाग चलते और दौड़ते रहे। कड़ाके की सर्दी में राहत कार्यों में रुकावटें आती रहीं। ऐसे-ऐसे चमत्कारों का भी सिलसिला बना रहा, जो यह बताता रहा कि इन हैरतअंगेज चमत्कारों के पीछे कोई तो है, जिसे कई लोग मानने और स्वीकारने को तैयार नहीं होते, लेकिन जब आफत का पहाड़ टूटता है तो नतमस्तक हुए बिना भी नहीं रहते। 

    एक मासूम बच्चा बीते 45 घण्टों से ढेर सारे मलबे के नीचे दबा हुआ है। वह पूरी तरह से चेतन अवस्था में है। आंखें खुली हैं। वह कभी ऊपर तो कभी इधर-उधर ताकता है। एक बचाव कर्मी उसे बोतल के ढक्कन से पानी पिलाता दिखायी देता है। पानी के कुछ घूंट पीते ही बच्चा मुस्कराता है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ऊपर बैठा विधाता मुस्करा रहा हो। उसकी निश्छल हंसी सभी का मन मोह लेती है। बच्चा बड़ों की भाषा नहीं समझता, लेकिन फिर भी बचावकर्मी उसे बार-बार दिलासा देते हैं कि हिम्मत मत हारना। कुछ ही पलों में तुम्हें हम बाहर निकाल लेंगे। भयंकर तबाही मचा देने वाले भूकंप ने जहां कई बलशाली तंदुरुस्त लोगों को एक ही झटके में मार डाला वहीं कई मासूम बच्चों और वृद्धों को खरोंच तक नहीं आयी। क्रेन, हथोड़े, कुदाल, फावड़े के साथ चेन वाली आरी, डिस्क कटर्स और सरिया काटने वाले औजारों के साथ इंसानी जिन्दगियों को बचाने में लगी रेस्क्यू टीम ने कांक्रीट स्लैब के नीचे बुरी तरह से दबी एक नवजात बच्ची को देखा तो देखती ही रह गई। यह कुदरत का आलौकिक चमत्कार ही था कि बच्ची अपनी मां की गर्भनाल से जुड़ी पूरी तरह से सुरक्षित जिन्दा थी और जन्म देने वाली मां की मौत हो चुकी थी। तय है कि मां ने कुछ घण्टे पहले ही बच्ची को जन्म दिया था। उस बच्ची को अपनी गोद में खिलाने के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं बचा था। बच्ची को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। भूकंप आने के 62 घण्टों बाद सात मंजिला इमारत के मलबे से एक बारह साल के बच्चे को किसी तरह से बाहर निकाला गया तो वह हंस रहा था। उस साहसी बच्चे को हाथ में लेते ही बचाव कर्मी उसे चूमते हुए अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाने लगे। भूकंप की भयावहता से रूबरू होने वाले एक शख्स ने पत्रकारों को आपबीती सुनायी कि मैंने भूकंप के बारे में सुना तो बहुत था, लेकिन इसे देखा और महसूसा पहली बार। जब हमारा अपार्टमेंट एकाएक हिलने लगा तब मैंने मान लिया था कि अब हमारे परिवार का बचना असंभव है। अपने-अपने कमरों में रह रहे सभी परिवार के सदस्यों को मैंने अपने पास बुलाया और कहा कि, अब जब हम सब मरने ही वाले हैं तो कम अज़ कम एक साथ एक ही कमरे में एक ही जगह क्यों न मरें। यह तो हमारी किस्मत अच्छी थी कि हम सब बच गए। जब भूकंप थमा तो मैं बाहर निकला। कई गगनचुंबी इमारतें जमीन पर धराशायी हो चुकी थीं। मलबे में दबे लोगों के रोने, कराहने की आवाजें आ रही थीं। रेस्क्यू टीमें बड़ी फुर्ती के साथ बचाव कार्य में लगी थीं। 

    अपने देश भारत में भी हमने भूकंपों और बादलों के फटने के बाद हुई तबाही को कई बार देखा और झेला है। हाल ही में देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में स्थित जोशीमठ में जमीन के धसने से लोगों को किस तरह से अपने घर-कारोबार को छोड़ने को मजबूर होना पड़ा, इससे भी हम सभी देशवासी खूब वाकिफ हैं। कई विनाश लीलाएं इंसानों की खुदगर्जी और अनदेखी का प्रतिफल रही हैं। भू-धंसाव का खतरा तो जोशीमठ पर 1970 से मंडराने लगा था। भू-वैज्ञानिकों ने भी कई बार चेताया था कि पहाड़ी जमीन पर धड़ाधड़ घरों, भवनों, होटलों का निर्माण तथा बेतहाशा खनन कार्य अंतत: जानलेवा साबित होगा। संभावित खतरों से वाकिफ होने के बावजूद भ्रष्टाचार और इंसानी लालच ने अपनी मनमानी जारी रखी और 2023 के आते-आते तक पहाड़ों पर स्थित जोशीमठ के घरों, होटलों और सड़कों की बेतहाशा दरारों ने हजारों लोगों को बेमन से बेघर होने को विवश कर दिया। सभी जगह बड़ी तेजी से जनसंख्या में इजाफा हो रहा है। लोगों के रहने के लिए छत तो चाहिए ही, लेकिन उन्हें बनाने, खड़ा करने में जिन सावधानियों की आवश्यकता है, उसकी तो अनदेखी नहीं होनी चाहिए। भारत वर्ष के महानगरों, नगरों में खड़ी की गईं अनेकों बहुमंजिला इमारतें भूकंप रोधी नहीं हैं। तुर्की और सीरिया में भूकंप ने ही हजारों लोगों को मौत की नींद ही नहीं सुलाया, वहां की विशाल इमारतों ने भी कई जानें ले लीं। ऐसा भी नहीं कि सभी इमारतें धराशायी हुई हों। कुछ बिल्डिंगें ऐसी भी रहीं, जिनका भूकंप बाल भी बांका नहीं कर पाया। वहां की सरकार ने उन सैकड़ों भवन निर्माताओं को हथकड़ियां पहनाकर जेल में सड़ने के लिए डाल दिया है, जिन्होंने बिल्डिंग की नींव और दीवारों की मजबूती की ओर ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपनी तिजोरियों का वजन बढ़ाया। तुर्की में एक तरफ वैश्विक मदद से राहत एवं बचाव अभियान चलता रहा तो दूसरी तरफ बेईमानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी शुरू कर दी गई। ‘हिंदुस्तान में तो सब चलता है’ की परिपाटी चलती चली आ रही है। यहां शायद ही किसी बेईमान भवन निर्माता को जेल में डाला गया हो...।

Thursday, February 9, 2023

तेल देखो, तेल की धार देखो

    प्रवचनकार आसाराम का एक जमाने में गजब का नाम और दबदबा था। उसके प्रवचन सुनने के लिए लाखों की भीड़ जुटा करती थी। नेता, मंत्री, अभिनेता, समाजसेवक, धर्म प्रेमी... सभी उसके दरबार में नतमस्तक होने के लिए उत्सुक रहते थे। उसके प्रवचनों में मनुष्य को धैर्यवान तथा चरित्रवान बने रहने की सीखें दी जाती थीं। दूसरों की मां-बहनों का आदर-सम्मान करने का पाठ पढ़ाया जाता था। उनके बोलने, मटकने और नाचने-कूदने का अंदाज लोगों को लुभाता था। इसलिए दूर-दूर से भीड़ खिंची चली आती थी। नेता, अभिनेता, पत्रकार, संपादक, अखबार तथा न्यूज चैनल वाले उसके लिए आदरसूचक शब्दावली का इस्तेमाल कर गर्वित हुआ करते थे। तब देश और दुनिया के लाखों भक्तों के प्रिय रहे आसाराम को अभी हाल ही में बलात्कार के एक और केस में उम्रकैद की सजा होने पर उसके कट्टर अनुयायियों को भले ही एक और झटका लगा हो, लेकिन देश के लाखों आम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा। यह वही लोग हैं, जिन्हें यह ढोंगी इंसान नहीं भगवान लगता था। अपने कुकर्मों के कारण लोगों के मन और दिमाग से उतर चुका यह यौनाचारी किसी भी तरह की सहानुभूति का अधिकारी नहीं, क्योंकि इसने करोड़ों सीधे सच्चे अपने ही भक्तों, शिष्य-शिष्याओं की पवित्र आस्था और असीम भरोसे का कत्ल करने का अक्षम्य अपराध किया है। 

    इस व्याभिचारी के कारण देश के सच्चे साधु-संतों को भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा है। 2018 में जोधपुर की अदालत में जिस 16 साल की नाबालिग लड़की की अस्मत लूटने की वजह से इसे उम्रकैद की सजा सुनायी गई थी, वह तथा उसका पूरा परिवार इस दुराचारी का अंधभक्त था। वासना के इस खिलाड़ी ने उनकी बेटी को रोग मुक्त करने का भरोसा दिलाया था और अपनी कुटिया के एकांत में जंगली जानवर की तरह टूट पड़ा था। लड़की के माता-पिता को जब अपने भगवान के शैतान होने की सच्चाई का पता चला तो एकबारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ था। इस शर्मनाक घिनौने सच की तह तक पहुंचने के लिए उन्होंने उससे गहन पूछताछ की थी। उसके बाद ही उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। 

    अभी गुजरात के गांधीनगर की एक अदालत ने जिस महिला से बलात्कार करने के कारण इस बलात्कारी को उम्रकैद की सजा सुनायी है, वह भी इसकी परम आस्थावान शिष्या थी। उसने कभी कल्पना नहीं की होगी कि जिसे वह देवता मानती है, वह तो आदतन दुराचारी है। आसाराम के देशभर में फैले आश्रमों तथा प्रवचन कार्यक्रमों के मंचों पर एक से एक दिग्गज हाजिरी लगाते थे, इसलिए तो उसे यह भ्रम था कि कानून उसकी मुट्ठी में है। वह कितने भी दुराचार करता रहे, कोई उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं करेगा। इन अहंकार भरी मदमस्ती में वह लगातार अपने आश्रमों में एक तरफ भोग विलास करता रहा, तो दूसरी तरफ विभिन्न मंचों पर मायावी-प्रभावी प्रवचनों का जाल फेंक कर अपने भक्तों की संख्या बढ़ाता रहा। जब उसकी गिरफ्तारी हुई तो कई अंध भक्त उसके समर्थन में सड़कों पर उतर आये। उन्होंने जहां-तहां हंगामा बरपा किया कि हमारे पूज्यनीय बापू निर्दोष हैं। उन्हें किसी साजिश के चलते फंसाया गया है। वे किसी की बहन, बेटी और बहू पर गलत निगाह डाल ही नहीं सकते। 

    अभ्यस्त देहभोगी की शिकार हुई नारियों के परिजनों पर तरह-तरह के दबाव डाले गये। उन्हें डराया और धमकाया गया। कुछ की हत्या करने की कोशिश तो कुछ को मौत के मुंह में भी सुलाया गया। मुंह बंद रखने के लिए करोड़ों रुपये के प्रलोभन दिये गए। इस नकाबपोश नराधम को कभी कोई अपराधबोध भी नहीं हुआ! अगर हुआ होता तो भावी परिणाम के बारे में जरूर सोचता। अपनी वर्षों की तपस्या के बाद बनायी साख पर घोर कलंक नहीं लगने देता। इसमें नारी देह की अथाह भूख के साथ अपार धन की प्रबल लालसा भी भरी हुई थी। नारी जिस्मों पर गिद्ध की तरह झपट पड़ने वाले इस शैतान ने मर-मर कर अंधाधुंध पैसा कमाया, लेकिन वो भी इसके काम नहीं आया। चोर का माल चांडाल खा गये। स्वयंभू बाबा, ढोंगी धूर्त और पाखंडी प्रवचनकार आसाराम का बस चलता तो सारे जहान की धन-दौलत अपनी झोली में समेट लेता। आसाराम में चतुर और घाघ कारोबारी के सभी गुण-दुर्गुण विद्यमान रहे हैं। उसका जिस शहर में भी प्रवचन तथा तथाकथित सत्संग का कार्यक्रम होता था, वहां पर भव्य मंच और विशालतम पंडाल अहमदाबाद से लाकर खड़ा किया जाता था। आसाराम अपने नाम का डंका बजवाने के लिए अपनी तस्वीरों वाले बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर, स्टीकर, कैलेंडर अपने ही कारखाने में बनवाता था। च्यवनप्राश, यौन उत्तेजक दवाओं, चूर्ण, चाय, साबुन, बिस्किट, पेन, आडियो-वीडियो कैसेट, घड़ियों, चाबी के छल्लों आदि को खपाने के लिए अपना पूरा प्रचार तंत्र लगा देता था। खुद को महान संत दर्शाने के लिए ‘ऋषि प्रसाद’, ‘दरवेश दर्शन’, -लोक कल्याण सेतु’ आदि पत्र-पत्रिकाओं को लाखों की संख्या में छपवा और बिकवा कर रातों-रात करोड़ों की कमायी कर लेता था। दरअसल, आसाराम आम भोले-भाले लोगों को अंधविश्वासी बनाने और उनकी हर कमजोरी का फायदा उठाने की सभी धूर्त कलाओं में जन्मजात पारंगत रहा है। इस असंत ने चंद वर्षों में अरबों-खरबों की दौलत जुटायी। दुष्ट सौदागर आसाराम के पास जब धन को अपने पास रखने की जगह नहीं बची तो उसने विभिन्न नगरों-महानगरों में रहने वाले अपने खास शिष्यों के द्वारा उस धन को ब्याज पर चलवाना प्रारंभ कर दिया। उसके यह चेले-चपाटे उस रकम को मोटे ब्याज पर चलाकर खुद भी मालामाल होते रहे और अपने ‘लालची आका’ की तिजोरी का भी वजन बढ़ाते रहे। कुकर्मी आसाराम और उसके बेटे नारायण के जेल में जाने के बाद उस सारी की सारी काली धन दौलत पर उन्हीं चेले-चपाटों का हमेशा-हमेशा के लिए कब्जा हो गया। उम्रकैद के बाद तो उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि उनके पास अमानत के तौर पर रखवायी गयी अपार माया को अब कोई भी वापस नहीं मांगने वाला। दोनों यौन रोगी जेल में ही मर-खप जाने वाले हैं। दिल्ली, पुणे, इन्दौर, अहमदाबाद, सूरत, मुंबई, नागपुर, पानीपत, कटनी जैसे नगरों-महानगरों में रहने वाले जिन चेलों के पास आसाराम एंड कंपनी की काली दौलत जमा थी वे अंदर ही अंदर बहुत खुश हैं। वे भी यही चाहते हैं कि बाप-बेटा कैद में ही परलोक सिधार जाएं। अपने ‘बापू’ के धन से इन्होंने बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर ली हैं। विशाल फार्म हाऊस के साथ कारों की कतारें भी लग गई हैं। इनकी शान-शौकत देखते बनती है। ‘चोर का माल खाए चांडाल’ कहावत को चरितार्थ कर दिखाने की इनकी हिम्मत, ‘प्रताप’ और मक्कारी का लोहा शहरवासी भी मानने लगे हैं।

Thursday, February 2, 2023

पुरुष-सत्ता

      रविवार की सुबह मॉर्निंग वॉक कर घर लौट रहा था। वॉक पर निकलने से पहले ही मैंने अंजली से मिलने का मन बना लिया था। लगभग आठ बजे जैसे ही अंजली के किराये के घर के सामने पहुंचा तो वहां आठ-दस लोगों की भीड़ लगी थी। अंजली भीड़ के बीच अपराधी की तरह चुपचाप सिर झुकाये खड़ी थी। अंजली का मकान मालिक जोर-जोर से चिल्लाते हुए कह रहा था, ‘‘मैं तो पहले से ही तुम्हें किराये पर रखने को तैयार नहीं था। तुमने मिन्नते कीं, एक-दो इज्जतदारों से सिफारिश करवायी, तो मैंने तुम्हें अच्छी और नेक औरत समझकर हां कर दी, लेकिन मैंने तुम्हें तभी वार्निंग दे दी थी कि रात को ज्यादा देरी से आना बिलकुल नहीं चलेगा। शुरू-शुरू में तो तुम रात को दस-साढ़े दस बजे तक बाहर से लौट आया करती थीं, लेकिन अब कई दिनों से रात-रात भर गायब रहती हो। किस्म-किस्म के पुरुषों का भी तुम्हारे कमरे में आना-जाना लगा रहता है। तुम्हारी वजह से हमें आसपास के लोग कितना कुछ सुनाते रहते हैं। कुछ लोगों के मुंह से तुम्हारी बदचलनी के किस्से भी सुनने में आये हैं। लगता है, तभी तुम्हारे शरीफ पति ने हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें घर से बाहर कर चैन की सांस ली है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी देखा-देखी मेरी जवान बेटी भी हमारे हाथ से निकल जाए।’’ 

    ‘‘अंकल आप जो सोच रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं। अखबार में साथ काम करने वाली सहेली के अनुरोध पर उसके यहां एक-दो बार रात को ठहरना पड़ा, लेकिन अब आगे से आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।’’ 

    ‘‘तुम्हारे लाख हाथ जोड़ने पर भी मैं नहीं पिघलने वाला। यहां अब ज्यादा तमाशा न करते हुए अपना सामान उठाओ और तुरंत चलती बनो।’’ 

    मकान मालिक को मेरा समझाना भी बेअसर रहा। हां, उसने अंजली को शाम तक की मोहलत जरूर दे दी। शहर के दैनिक समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत रहने के साथ-साथ अंजली एक अच्छी कहानीकार तथा कवयित्री भी है। उसे कवि सम्मेलनों के मंचों पर छा जाने का भी खूब हुनर हासिल है। कभी-कभार दूसरे शहरों में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में बड़े मान-सम्मान के साथ आमंत्रित होती रहती है। अंजली ने शहर के नामी कॉलेज के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर से लव मैरीज की थी। दोनों एक दूसरे को कॉलेज के जमाने से जानते थे। शादी के कुछ महीनों के बाद अंजली को पति के माता-पिता से बड़ी परेशानी होने लगी। पहले तो उन्हें अपनी बहू का मंचीय कवयित्री होना पसंद नहीं था। उसकी लोकप्रियता और मिलनसारिता की वजह से जब देखो तब कवि, लेखक, पत्रकार और प्रशंसक उससे मिलने के लिए घर आ टपकते थे और सास और ननद को उनकी मेहमान नवाजी करनी पड़ती थी। अंजली का सभी से खुलकर हंस बोल लेना भी उन्हें शूल की तरह चुभता था। शादी के तीन-चार वर्ष बीतते-बीतते उस पर बच्चा पैदा करने का दबाव भी बनाया जाने लगा। सास-ससुर पोते के सुख से वंचित रहने की वजह से बेचैन हो चुके थे। उधर अंजली ने सात फेरे लेने से पहले ही अपने पति देव को बता दिया था कि पत्रकारिता और साहित्य में अच्छी तरह से स्थापित होने के पश्चात ही वह फैमिली के बारे में सोचेगी। तब पति महोदय ने भी कोई ऐतराज नहीं जताया था। बस मुस्करा कर रह गए थे। हद तो तब हो गई जब उनके करीबी रिश्तेदार भी सवाल दागने लगे कि आखिर वह बच्चा कब पैदा करेगी? अंजली के लिए सबसे ज्यादा आहत करने वाली बात थी अपने बुद्धिजीवी पति देव का पूरी तरह से चुप्पी साधे रहना। कई बार अंजली का मन होता कि वह सभी को मुंहतोड़ जवाब दे, लेकिन...! 

    जब अंजली को लगा कि उसके लिए दकियानूसी और रूढ़िवादी रिश्ते को और निभा पाना संभव नहीं तो उसने हमेशा-हमेशा के लिए पति के घर को ही त्याग दिया। कुछ शुभचिंतकों ने अंजली के इस निर्णय को उसकी नासमझी कहा तो कुछ ने हद दर्जे की बेवकूफी। उसे अकेली औरतों पर मंडराने वाले खतरों के कई किस्से सुनाकर डराया भी गया, लेकिन अंजली अपने निर्णय पर अडिग रही। अखबारी नौकरी से उसे इतनी तनख्वाह तो मिल ही रही थी, जिससे उसके रहने और जीने-खाने पर किसी संकट का कोई खतरा नहीं था। पति का घर छोड़ने के पश्चात बड़ी मुश्किल से उसे रहने के लिए यह किराए का कमरा मिला था। उसे नहीं पता था कि उसका आजादी पसंद तथा खुले दिल-दिमाग का होना नयी आफत का कारण बन जाएगा। जिस शहर में वह जन्मी वहीं उसे किराए के छोटे से कमरे के लिए कितनी ठोकरें खानी पड़ीं। जहां भी जाती कहा जाता कि अकेली औरत के लिए घर खाली नहीं है। 

    इस घर के मालिक ने भी बड़ी मुश्किल से इस शर्त पर मनमाने किराए पर कमरा रहने को दिया था कि 9 से 10 बजे तक ही घर से बाहर रह सकती हो। किसी भी पुरुष को उसके कमरे में आता देखा गया तो अच्छा नहीं होगा। तुरंत कमरा खाली करवा लिया जाएगा। कुछ पत्रकार तथा साहित्यकार मित्रों के अलावा मकान मालिक की बीए पास लड़की यदा-कदा उससे मिलने आ जाती थी। उसकी साहित्य और पत्रकारिता में खासी अभिरुचि है। पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण की अभिलाषी इस महत्वाकांक्षी लड़की से अंजली को इधर-उधर की बातें करने में बहुत अच्छा लगता था। एक शाम लड़की ने उसे यह बताकर चौंकाया था कि वह अपनी एक खास सहेली से बेइंतहा प्यार करती है। दोनों की शीघ्र ही हमेशा-हमेशा के लिए एक साथ रहने की पक्की तैयारी है। इस बात का पिता को तो नहीं, मां को जरूर पता है। मां अक्सर उसे चेताती भी है कि वह इस अप्राकृतिक रिश्ते से फौरन बाज आए नहीं तो पिता को बताकर तूफान बरपा करवा देगी। गुस्सैल पिता उसकी ऐसी दुर्गति करेंगे, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की होगी। जब लड़की की मां ने देखा कि उसकी बेटी घण्टों उस किराएदार महिला के साथ कमरे में बंद रहती है, जो अपने पति से अलग हो चुकी है तो उसने अपने पति के कान भरने शुरू कर दिए। संकीर्ण सोचवाले मकान मालिक को अंजली को अपने घर से खदेड़ने का सटीक बहाना मिल गया।

    अंजली के नये ठिकाने की व्यवस्था कर दोपहर को जब मैं घर लौटा तो पुरुष सत्ता का परचम लहराती यह खबर जैसे मेरा ही इंतजार कर रही थी... कब्र में पैर लटकाये एक 70 वर्षीय वृद्ध ने 28 वर्ष की लड़की से विवाह कर लिया है। यह लड़की और कोई नहीं उसकी ही विधवा बहू है। उसका पति चार साल पहले गुजर गया था। कालांतर में दो-तीन अच्छे-भले युवकों ने लड़की से शादी करने की इच्छा जतायी थी, लेकिन ससुर महाराज ने उन्हें नजरअंदाज कर खुद ही मंदिर में ले जाकर अपने मृतक बेटे की पत्नी से विवाह कर लिया। अब यह बताने की जरूरत तो नहीं कि ससुर बहू के लिए पिता की तरह होता है, लेकिन इसे तो अपने बेटे का भी ख्याल नहीं आया, जो इस लड़की को कभी बड़े अरमानों के साथ ब्याह कर अपने घर लाया था। इस लड़की को तो हर किसी से सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए था, लेकिन इस देह के भूखे ससुर ने बहू से शादी कर पवित्र रिश्ते को कलंकित करने के साथ-साथ शर्मिंदा भी कर दिया। उसकी पत्नी बारह साल पहले दिवंगत हो गई थी। उसकी देखरेख की कमी को बहू पूरा कर सकती थी। बेटियां अपने मां-बाप की सेवा करती ही हैं। वह उसका किसी बेघर युवक से ब्याह करवाने के बाद दोनों को अपने घर में रखकर एक अच्छा प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत  कर देता तो लोग नतमस्तक हो जाते। थू...थू, तो नहीं होती। नेक नीयत वाला होता तो बहू के साथ सात फेरे लेने की बजाय उसे अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाकर अपना कद भी बढ़ा सकता था, लेकिन उसके अंदर दुबक कर बैठी लूली-लंगड़ी, अंधी वासना ने उसे विवेकशुन्य कर उसके चेहरे पर कालिख ही पोत दी।

Wednesday, January 25, 2023

भोग और योग की तस्वीर

    चित्र - 1 : सुकेश चंद्रशेखर। जैकलीन फर्नाडींस। पहला इस धरती का अत्यंत शातिर कुख्यात ठग और लुटेरा। दूसरी भारत देश की चर्चित खूबसूरत फिल्म अभिनेत्री। दोनों में दूर-दूर तक कोई रिश्तेदारी नहीं। एक हकीकत यह भी कि करोड़ों रुपये की ठगी करने वाला चोर-लुटेरा सुकेश जेल में है। अभिनेत्री आजाद पंछी की तरह उड़ती रही है। ऐसे में दोनों में किसी किस्म की करीबी...यारी की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी दोनों में खिंचाव, जुड़ाव और लगाव हो गया। इन दो विपरीत ध्रुवों के मिलन का माध्यम बना वो अपार धन, रुपया, पैसा जो हमेशा अपना चमत्कार दिखाता आया है...। अनहोनी को होनी बनाता आया है। दोनों में एक और समानता है। दोनों को ऐशो-आराम की लत है। इस लत के लिए किसी भी हद तक गिरने में कोई संकोच नहीं। हर अय्याश ठगी और लूटमारी के धन को शाही अंदाज से लुटाता है। सुकेश ने भी यही किया। नेताओं की झोली भरने के साथ-साथ हुस्नपरियों को भी खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 200 करोड़ की ठगी के मामले में जेल में कैद इस ठगराज ने जैकलीन को जो उपहार दिए उनमें शामिल हैं पांच महंगी घड़ियां, जिनकी कीमत लगभग एक करोड़ रुपये है। इसके साथ ही उसने जैकलीन को 32 डिजाइनर बैग गिफ्ट किए, जिनकी कीमत 50 हजार से लेकर 9 लाख तक की है। तकरीबन बीस ज्वेलरी आइटम, जिनमें अंगूठी से लेकर चार महंगे सनग्लासेज, तीन मसाज चेयर, डिश वॉशर, कई बेल्ट, डिनर सेट एवं पेंटिंग्स उपहार में दीं, जिनकी कीमत भी करोड़ों में है। खूबसूरती के पीछे पगलाये शातिर अपराधी ने एक ही साल में 47 डिजाइनर कपड़े, 62 जूते और सैंडल्स भी गिफ्ट किए। चार्जशीट के मुताबिक जैकलीन और उसके परिवार को 7 करोड़ 62 लाख 78 हजार के उपहार दिये गए। 

    ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब ठग जेल में बंद था तो यह चमत्कार कैसे संभव हो पाया? दावा तो यह भी किया जाता है कि जैकलीन फर्नांडीस के अलावा दो और अभिनेत्रियां भी महाठग के उपहारों के मोहपाश में बंध कर पतन के गर्त में समाती रहीं। तिहाड़ जेल जहां हर तरह की चौकसी और सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया जाता है, वहां पर सुकेश से मिलने-जुलने के लिए धन की भूखी अभिनेत्रियां टहलते और मटकते हुए बड़ी आसानी से पहुंच जाया करती थीं। सुकेश ने जेल के उच्च अधिकारियों को मोटी रिश्वत देकर खरीद रखा था। जब भी कोई हीरोइन उससे मिलने के लिए आती, तो उसे एक खास कमरे में बड़े आदर-सत्कार के साथ ले जाकर बैठा दिया जाता था। वहां पर सोफासेट, टीवी, एसी, फ्रिज और भोग विलास के अन्य सभी सामान सजे रहते थे। आलीशान कमरे के एकांत में घण्टों सुकेश और नायिकाओं की मिलन-मस्ती चलती रहती थी। जब वे सुकेश को ‘तृप्त’ कर जेल से जाती थीं, तो कभी खाली हाथ नहीं होती थीं। हर आनंददायक मुलाकात के ऐवज में उन्हें लाखों रुपये दिए जाते थे। फिल्मी परी जैकलीन के अनुसार सुकेश चंद्रशेखर से उसकी पहली पहचान उसके मेकअप आर्टिस्ट के जरिए हुई थी। उसे बताया गया था कि वह दक्षिण भारत के एक बड़े न्यूज चैनल का सर्वेसर्वा होने के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री का बहुत नामी-गिरामी प्रोड्यूसर है। दरअसल, यह तो खुद को भोली-भाली तथा अनाड़ी दर्शाने की अभिनेत्री की चाल है। अखबारों तथा न्यूज चैनलों के माध्यम से कुख्यात ठग सुकेश चंद्रशेखर की काली दास्तान का देश के बच्चे-बच्चे को पता चल चुका था। मुफ्तखोरी की रोगी अभिनेत्री की हर बहानेबाजी धरी की धरी रह गई है। अब उसे वकीलों को महंगी फीस देते हुए अदालतों के चक्कर पर चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

    चित्र-2 : देश के रेतीले प्रदेश राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में स्थित त्रिवेणी नगर के एक श्मशान घाट में बने दो छोटे से कमरों में रहती हैं मायादेवी बंजारा। वर्तमान में उनकी उम्र है लगभग पचपन वर्ष। मायादेवी श्मशान घाट की देखरेख करने के साथ-साथ यहां आने वाले शवों का अंतिम संस्कार भी करवाती हैं। मेहनत की कमायी पर गुजर बसर करती चली आ रही मायादेवी की दो बेटियों की शादी हो चुकी है। दो बेटियां और एक बेटा स्कूल में पढ़ता है। एक बेटी अच्छी तरह से पढ़-लिखकर कलेक्टर बनना चाहती है। मायादेवी की मां भी श्मशान घाट पर शवों का अंतिम संस्कार कर घर चलाया करती थीं। मायादेवी जब मात्र 10 वर्ष की थीं तभी अपनी मां के काम में हाथ बंटाने लगी थीं। तभी से उसने अपनी परिश्रमी मां की कही यह बात गांठ बांध ली थी कि कभी भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना और मेहनत करने में भी कभी नहीं शर्माना। खून-पसीने से कमाया पैसा ही असली खुशी तथा सम्मान का अधिकारी बनाता है। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। किसी की दया पर जीने से अच्छा है, मर जाना। 

    शुरू-शुरू में तो मायादेवी और उसके बच्चों को श्मशान घाट पर देखकर लोग हतप्रभ रह जाते थे, लेकिन अब लोग उन्हें पहचानने लगे हैं। उनकी कर्तव्यपरायणता की सराहना भी करते हैं। जैसे ही शव श्मशान घाट पर पहुंचता है तो मायादेवी अपने काम में लग जाती हैं। अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां नीचे बिछवा कर चिता तैयार करती हैं। जो लोग शव के अंतिम संस्कार की रीति से अनभिज्ञ होते हैं, उन्हें स्वयं सभी क्रियाएं बताती और समझाती हैं। परिजनों के चले जाने के बाद भी पचपन वर्षीय मायादेवी चिता की लकड़ियों को ठीक करती रहती हैं। वह तब तक वहां से नहीं उठतीं जब तक चिता पूरी तरह से जल नहीं जाती। मायादेवी की बेटियां भी स्कूल से लौटने के बाद उनकी मदद करती हैं। कोई उनसे जब पूछता है कि चौबीस घण्टे श्मशान घाट पर रहने पर तुम्हें भय नहीं लगता तो उनका साहस और आत्मविश्वास से भरा यही जवाब होता है कि श्मशान घाट तो एक पवित्र स्थान है। हमें यहां रहने या शवों के दाह संस्कार से कोई भय नहीं लगता, बल्कि सुकून मिलता है। फिर भयभीत तो जिन्दा इंसानों से होना चाहिए, मुर्दों से क्या घबराना।

    चित्र-3 : छत्तीसगढ़ के गांव चरमुड़िया की स्मारिका ने बड़ी मेहनत और लगन के साथ कम्प्यूटर साइंस में बीई करने के बाद एमबीए किया। उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में दस लाख रुपये सालाना की प्रभावी नौकरी भी मिल गई, लेकिन जब उसका ध्यान अपने पिता की लिवर ट्रांसप्लांट के पश्चात बिगड़ती सेहत पर गया, तो उसने नौकरी छोड़ी और खेती करने की जिम्मेदारी ले ली। पिता घर में आराम करने लगे। स्मारिका को शुरुआत में थोड़ी परेशानी हुई। आसपास के लोगों के तंज भी झेलने पड़े कि खेती तो पुरुषों के बस की बात है। महिलाएं इस कठिन काम के लिए नहीं बनी हैं। स्मारिका ने अपने 23 एकड़ के खेत में खेती के नये-नये प्रयोग करते हुए नई-नई फसलें उपजानी प्रारंभ कर दीं। बेहतरीन खाद और बीजों की बदौलत ऐसी अच्छी-अच्छी फसलें मिलने लगीं, जिन्हें देख बोलने और हतोत्साहित करने की कोशिश करने वाले सभी चेहरे स्तब्ध रह गये। आज स्मारिका के खेत की पोषक सब्जियों की दूर-दूर तक मांग है। विशेष गुणवत्ता के चलते दिल्ली, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, बिहार, ओडिसा तथा कोलकाता तक में इन सब्जियों ने अपनी पैठ जमा ली है। अब तो स्मारिका ने अपने खेत की विभिन्न पैदावारों को विदेश में भी भेजना प्रारंभ कर दिया है। 

    इसी तरह से छत्तीसगढ़ में महासमुंद के कमरौद गांव की 32 वर्षीय वल्लरी का भी खूब डंका बज रहा है। उन्होंने भी कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति कर दिखायी है। छह साल पहले 15 एकड़ के खेत में खेती शुरू करने वाली वल्लरी अब एक साथ तीन गांवों में खेती कर रही हैं। एमटेक करने के बाद किसी मोटी पगार वाली नौकरी से लाखों रुपये की तनख्वाह हासिल कर दिखावटी सुख-सुविधाओं भरी जिन्दगी जीने की बजाय खेती को चुनने वाली वल्लरी को भी शुरू में हतोत्साहित और निराश करने का अभियान चलाया गया, पर अब महासमुंद के हर गांव के पुरुष एवं महिला समूह उनसे उन्नत किस्म की खेती करने के तरीके सीख कर मोटी कमायी कर रहे हैं। कमरौद में 24 एकड़ जमीन में मिर्च, अमरूद, बांस, पपीता, नारियल, स्ट्राबेरी आदि से लाखों की कमाई कर रही इस जूझारू महिला ने भी बोलने वालों की सोच को बदलकर रख दिया है। वल्लरी खेती के नये-नये तरीकों का सतत अध्ययन करती रहती हैं। जब प्रयोग सफल हो जाते हैं तो दूसरे किसानों को भी साझा कर उनके लिए भी विकास के मार्ग खोलती चली जाती हैं। यही भारत का वास्तविक चित्र है, जहां के श्रमजीवी स्त्री-पुरूष खून पसीना बहाकर कमाये गए धन का उपभोग करने में यकीन रखते हैं। उनके लिए परिश्रम ही वास्तविक योग साधना है।

Thursday, January 19, 2023

पर्दे की चीर-फाड़

     भूख तो हर किसी को लगती है। छत के बिना भी जिन्दगी नहीं कटती। सभी को सुख-चैन से रहना अच्छा लगता है। हर कोई चाहता है कि उसकी रोजी-रोटी पर कभी कोई खतरा न आए। अपनी हाड़तोड़ मेहनत से बनाये घर, ऑफिस, दूकान, होटल और दरो-दीवार पर कोई दरार और आंच भी ना आए। इस धरा के हर इंसान की हमेशा यही तमन्ना रहती है, कि हम और हमारा परिवार हर हाल में सुरक्षित रहे। यह भी सच है कि इंसान के चाहने और सोचने के बावजूद कभी-कभी स्थितियां और परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहतीं। इंसानी दुष्टता के साथ-साथ कुदरत का कहर भी ऐसा बरपा हो जाता है कि अच्छा भला आदमी माथा पकड़ कर रह जाता है। 

    पहले बात करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान की, जहां पर इन दिनों लोगों को अपने सामने मौत नाचती दिखायी दे रही है। जनता हुक्मरान को दिन-रात कोस रही है, जिनकी गलत नीतियों की वजह से उसे दिन-रात भूख से लड़ते हुए दाने-दाने को मोहताज होना पड़ रहा है। पाकिस्तान में आटे के दाम आसमान के भी पार जा पहुंचे हैं। 160 रुपये किलो में आटा और 60 रुपये किलो में नमक खरीद पाना आम आदमी के लिए आसमान के तारे तोड़ने जैसा है, फिर भी हर मां-बाप अपने बच्चों के लिए यह भी करने को तैयार हैं। प्रतिदिन दुकानों के सामने लम्बी-लम्बी कतारें लगती हैं और कुछ के हिस्से में खाने-पीने का नाममात्र सामान आता है तो अधिकांश को निराश खाली हाथ घर लौट जाना पड़ता है। इस जद्दोजहद में न जाने कितने लोग कुचले जा चुके हैं। कुछ की तो भीड़ में धक्का-मुक्की और दम घुटने की वजह से मौत भी हो चुकी है। साल भर पहले जो प्याज तीस-बत्तीस रुपये किलो बिकती थी अब उसकी कीमत दो सौ रुपये किलो के पार जा पहुंची है। गैस सिलेंडर 10 हजार में तो चिकन छह सौ रुपये तथा दालों तथा सब्जियों के दाम भी गरीबों के मुंह पर तमाचे जड़ रहे हैं। पांच-सात हजार रुपये महीने की कमायी करने वाले परिवारों को एक वक्त की रोटी भी नसीब हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। बीमार होने पर लोगों के लिए दवाएं खरीद पाना भी आसमान से तारे तोड़ने जैसा ही है। डॉक्टरों ने भी अपनी फीस बढ़ा दी है। जमाखोरों के लालच तथा जमाखोरी की कोई सीमा नहीं रही। मौत के सौदागरों के यहां धड़ाधड़ नोट बरस रहे हैं। भ्रष्ट व्यापारी नेता, अधिकारी, कर्मचारी बस हाथ आये मौके का फायदा उठाने में लगे हैं। अपने घरों और गोदामों में खाने-पीने तथा सभी सुख-सुविधाओं के सामान का अंबार लगाकर धनवान बड़ी बेरहमी के साथ तमाशा देख रहे हैं। 

    पाकिस्तान और हिंदुस्तान एक ही उम्र के देश हैं। दोनों एक ही साथ आजाद हुए थे, लेकिन कौन कहां पहुंचा यह बताने की जरूरत नहीं। हिंदुस्तान में लोकतंत्र की जड़ें भी अत्यंत मजबूत हैं। कोई भी ताकत उन्हें हिला-डुला नहीं सकती। दूसरी तरफ पड़ोसी देश में तो जनतंत्र का बार-बार जनाजा उठता रहता है। पाकिस्तान के शासक आवाम की खुशहाली के लिए मेहनत करने की बजाय अपने पड़ोसी भारत देश की तरक्की से ही जलते आए हैं। उन्होंने वसुधैव कुटंबकम की संस्कृति और मनोभावना के साथ आगे बढ़ने वाले भारत को तबाह करके रख देने की धमकियां भी दीं, लेकिन अंतत: खुद ही बरबादी और कंगाली के कगार पर जा पहुंचे। अब जब उनका पूरा मुल्क दाल रोटी मांग रहा है, तब वहां के प्रधानमंत्री के होश ठिकाने आये हैं। अपने जन्मजात अहंकार और ऐंठन को अपनी भूल और नासमझी मानते हुए उसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के समक्ष कहा है, ‘भारत के साथ हमने तीन युद्ध लड़े और इससे हमारे लोगों को दु:ख, गरीबी और बेरोजगारी के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। अब हम शांति से रहना चाहते हैं।’ 

    जहां पाकिस्तान में आटा-दाल-चावल को लेकर हाहाकार मचा है, वहीं भारत में पहाड़ों पर भूस्खलन, पानी के रिसाव तथा दरारों ने हजारों लोगों को बेघर होने को विवश कर दिया है। आप कल्पना करें। जरा सोच कर भी देखें। जिस घर... झोपड़ी, महल, दुकान, होटल, कार्यालय आदि को आपने खूब मेहनत कर बनाया... खड़ा किया हो, उसे एकाएक छोड़कर कहीं और रहने और कमाने खाने को जाना पड़े तो आप पर क्या बीतेगी? उत्तराखंड में स्थित शहर जोशीमठ तथा उसके आसपास के गांवों-कस्बों में स्थित घरों की दीवारों तथा सड़कों में दिल दहलाते भूधंसाव तथा दरारों के आने से यहां रहने वाले हजारों लोग बेघर और बेरोजगार होने के संकट से जूझ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि किसी ने उनकी गर्दन पर नंगी तलवार रख दी है। प्रशासन के द्वारा लगभग आठ सौ घरों पर खतरे का लाल निशान लगा दिये गए हैं। कुछ लोग अपनी जमीन से जुदा होने को हर्गिज तैयार नहीं। अपनी जान की परवाह न करने वाले इन लोगों की यह मांग भी है कि जब तक उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलेगा तब तक वे कहीं और नहीं जाएंगे। अंतत: वे यहीं मर खप जाएंगे। बिना रुपयों के नया बसेरा कैसे बनेगा और रोजगार के प्रबंध भी कैसे होंगे? उन्हें क्या पता था कि उन पर ऐसा आफत का पहाड़ टूट पड़ेगा? 

    ऐसा भी नहीं है कि पहाड़ों पर पड़ने वाली दरारों एवं भूस्खलन का शासन और प्रशासन को पहले से कोई अंदेशा नहीं था। 1976 में ही मिश्रा समिति ने जोशीमठ के आसपास भारी निर्माण पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ रेत और पत्थर के जमाव पर स्थित है, यह मुख्य चट्टान पर नहीं है। यह एक प्राचीन भूस्खलन पर स्थित है। अलकनंदा और धौलीगंगा की नदी धाराओं द्वारा कटाव भी भूस्खलन लाने में अपनी भूमिका निभा रहा है। शासन और प्रशासन को सचेत करते हुए यह भी सुझाया गया था कि पेड़ और घास लगाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जाए। ढलानों पर कृषि से बचा जाए, पक्की नाली प्रणाली का निर्माण किया जाए, ताकि गड्ढों को बंद किया जा सके और सीवरलाइन के माध्यम से सीवेज का पानी बह सके। इसके अलावा रिसाव से बचने के लिए पानी को जमा नहीं होने देना चाहिए और इसे सुरक्षित क्षेत्र में ले जाने के लिए नालियों का निर्माण किया जाना चाहिए और सभी दरारों को चूने, स्थानीय मिट्टी और रेती से भरा जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। दरअसल, शासन और प्रशासन की नींद तो तभी खुल जानी चाहिए थी, जब 2013 में केदारनाथ में प्रलय जैसे हालात बने थे और अनेकों मौतें हो गई थीं। 

    सच कहें तो अपने देश हिंदुस्तान में अतीत से सबक लेने की परिपाटी नहीं है। बहुत कुछ भगवान भरोसे चलता रहता है। जब दुर्घटना घटती है, तब शासन-प्रशासन की नींद खुलती है। भगवान न करे भारत के कभी भी पाकिस्तान जैसे भयावह हालात बनें, लेकिन यहां की अमीरी के नीचे दबती और कराहती गरीबी को छिपाने और नजरअंदाज करने का षडयंत्र-सा चल रहा है। देश के पास संसाधनों की कहीं कोई कमी नहीं, लेकिन अधिकांश साधन-संसाधन धनवानों के हाथों में सिमट कर रह गये हैं। एक प्रतिशत अमीरों की जेब में देश का चालीस प्रतिशत धन कैद होकर रहा गया है। वर्तमान में देश के 81 करोड़ लोगों को गरीब होने के कारण पांच किलो अनाज लगभग मुफ्त में देना पड़ रहा है। सरकार की इस मेहरबानी से देश की गरीबी और बदहाली का कटु सच तो नहीं बदलने वाला। अब प्रश्न तो यह भी है कि हकीकत को कब तक छिपाया जाता रहेगा? एक न एक दिन तो पर्दा फटेगा या फिर उसे किन्हीं हाथों के द्वारा चीर-फाड़ दिया जाएगा...।

Thursday, January 12, 2023

आत्मघाती मदमस्ती

    यह तो बदमाशी की इंतेहा है। जन्मजात गुंडे और सफेदपोश बदमाश लड़कियों तथा औरतों को जमीन पर भी निशाना बना रहे हैं और आसमान पर भी खून के आंसू रुला रहे हैं। उनकी इस जबरदस्ती की गुंदागर्दी में शराब भी खासी भूमिका निभा रही है। देश के प्रदेश हरियाणा के चमकते उद्योगनगर गुरुग्राम में एक नौकरीपेशा लड़की रात को ऑटो से घर लौट रही थी तब नशे में धुत बाइक सवार युवक की उस पर नजर पड़ी तो उसने लड़की को धमकाते हुए कहा कि चुपचाप मेरे साथ मेरी बाइक पर बैठ जा। लड़की के मना करते ही नशे में लड़खड़ाते युवक ने गंदी-गंदी गालियां देते हुए लड़की पर हेलमेट से इतनी जोर से वार किया, जिससे वह लहूलुहान हो गई। घोर हैरानी भरा सच यह भी है कि लड़की की बहन के 112 नंबर पर कॉल करने पर पुलिस जिप्सी में जो खाकी वर्दीधारी घटनास्थल पर पहुंचे वे भी शराब के नशे में चूर थे। उनकी जुबान बुरी तरह से लड़खड़ा रही थी। घायल लड़की को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके सिर पर 20 से ज्यादा टांके लगाने पड़े। 

    उत्तरप्रदेश के शहर सुलतानपुर के निकट स्थित एक गांव में नशे में धुत दो शराबियों ने आधी रात को चाय की दुकान चलाने वाले उम्रदराज पति-पत्नी से नमकीन की मांग की। उनके यह बताने पर कि फिलहाल उनके यहां खाने का कोई सामान नहीं है तो वे इस कदर आगबबूला हुए कि दोनों के सीने में गोलियां दाग कर बुरी तरह से घायल कर डाला। न्यूयार्क से दिल्ली आ रही एयरइंडिया की फ्लाइट में शराब के नशे में धुत एक यात्री ने शौचालय में न जाकर एक बुजुर्ग महिला यात्री पर ही धार छोड़कर उनके कंबल, बैग और अन्य सामान को गीला और गंदा कर दिया। इस घोर अमानवीय और शर्मनाक घटना को अंजाम तो दिया गया 26 नवंबर 2022 की रात, लेकिन देश और दुनिया तक इसकी खबर उड़ते-उड़ते पहुंची 4 जनवरी 2023 के दिन। आराम से सफर करने की अभिलाषा लिए बिजनेस क्लास में यात्रा करती उम्रदराज महिला के साथ अशोभनीय हरकत करने वाले शराबी के सहयात्री ने बताया कि नशे में डोलते अभियुक्त ने लंच में ही सिंगल मॉल्ट के चार गिलास गटकने में देरी नहीं लगायी। वह बार-बार मुझसे यही पूछ रहा था कि आपके कितने बच्चे हैं। मदमस्त हो चुके शराबी की यही पहचान होती है। इतनी अधिक पीने के बाद भी वह पैग पर पैग खाली करने में लगा था। उसकी पीने की यह रफ्तार मुझे भी डराने लगी थी। इसलिए मैंने तुरंत एयरलाइन के स्टाफ से निवेदन किया कि मेरे सहयात्री को बहुत चढ़ गई है। उन्हें कृपया अब और शराब ना दें, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई। वे अंधाधुंध पीते चले गये। हम बिजनेस क्लास कैबिन की पहली पंक्ति में बैठे थे। शौचालय चार पंक्ति पीछे था। जब उसे पेशाब लगी तो उसने शौचालय न जाते हुए पीछे की पंक्ति पर जाकर विंडो सीट की 72 वर्षीय महिला पर पेशाब कर दिया। इतना संगीन अपराध करने के पश्चात वह चुपचाप अपनी सीट पर जाकर सो गया। इसी दौरान ऊपर से नीचे तक भीग चुकी महिला बहुत चिंतित व घबराई हुई थी। उसके कपड़े, जूते और बैग पेशाब से भीग चुके थे। बैग में ही पासपोर्ट, यात्रा संबंधी दस्तावेज और रुपये-पैसे थे। वह काफी देर तक शराबी को कोसती रहीं। पहले तो क्रू मेंबर्स ने उसे छूने से ही इनकार कर दिया। कुछ देर के बाद उनके सामान को शौचालय में ले जाकर धोया गया तथा उन्हें भी पहनने को एयरलाइन का पाजामा और मौजे दिए गये। अच्छी-खासी नींद लेने के बाद 34 वर्षीय पेशाबबाज यात्री जागा और थोड़ा संभला तो मेरी तरफ देखते हुए बोला, ‘‘भाई शायद मैं मुसीबत में पड़ गया हूं।’’ तब मैंने कहा, ‘हां, बिलकुल। आपने गलती ही बहुत बड़ी की है।’ शराब पीकर हद से ज्यादा नशे के गर्त में समाने वाले इस शराबी के करियर और जिंदगी की ऐसी-तैसी होने में देरी नहीं लगी। कल तक नामी-गिरामी कंपनी की ‘महाराजा चेयर’ पर बैठकर लाखों रुपये महीने की पगार पाने वाला आज बदनाम और बदहाल होकर सड़क पर आ चुका है।

    हवाई यात्रा के दौरान नशे में धुत यात्रियों के लड़ने-भिड़ने की खबरें इन दिनों कुछ ज्यादा ही आने और चिंता में डालने लगी हैं। धरती का रोग हवा को भी दहलाने लगा है। 27 दिसंबर 2022 के दिन बैंकाक से कोलकाता की फ्लाइट में यात्री जानवरों की तरह आपस में ही भिड़ गये। उनकी मारकुटायी का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। दो यात्रियों के बीच सीट को लेकर शुरू हुई मामूली कहा-सुनी देखते ही देखते हाथापायी में बदल गई। क्रू मेंबरों के रोकने और समझाने का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ा। उलटे दूसरे व्यक्ति के कुछ साथी भी अकेले पड़ चुके यात्री की अंधाधुंध धुनाई करने लगे। इसी तरह से इंडिगो की इंस्ताबुल से दिल्ली आ रही फ्लाइट में एक यात्री कू्र मेंबर पर बेतहाशा भड़क कर गालीगलौज करने लगा। उसे खाने का स्वाद अच्छा नहीं लगा था। एयर होस्टेस ने यात्री को विनम्रता से अपनी बात कहने का अनुरोध किया तो वह और अभद्र तेवर दिखाते हुए एयर होस्टेस को धमकाने लगा, ‘‘तुम नौकर हो, इसलिए अपना मुंह बंद रखो।’’ एयर होस्टेस भी तैश में आ गई। उसने फौरन जवाब दिया, ‘‘पहले तो आप बोलने की तमीज सीखें और यह भी जान लें कि मैं आपकी नौकरानी नहीं।’’ अब तो यात्री के गुस्से का पारा और भी चढ़ गया...। बड़ी मुश्किल से समझा-बुझा कर उसे ठंडा किया गया। 

    नव वर्ष 2023 के जनवरी महीने के दूसरे हफ्ते दिल्ली-पटना इंडिगो फ्लाइट में नशे में धुत तीन युवकों ने जमकर हंगामा किया। इस दौरान जब एयर होस्टेस ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वे उसी के साथ छेड़खानी और बदसलूकी करने लगे। तीनों फ्लाइट में बैठते ही हंगामा करने लगे थे। तय है कि यात्रा करने से पहले ही उन्होंने चढ़ा ली थी। देश के चुनिंदा हवाई अड्डों पर यात्रियों को मदमस्त करने के लिए बीयरबार खोले ही जा चुके हैं। नशे में पियक्कड़ अपना आपा खो देते हैं। उन्हें समय, जगह और परिस्थिति का भी भान नहीं रहता। उनमें एक अजीब किस्म का अहंकार भी रहता है। इंटरनेशनल फ्लाइट में यह जो ‘पेशाब कांड’ हुआ उस पर कुछ लोग बोले कि शराब के नशे में होने के कारण ही यह निंदनीय अपराध हो गया। नशे में धुत शराबी को कहां पता होता है कि वह क्या बोल, कह और कर रहा है। यह गलती तो शराब की है, जो अच्छे भले इंसान को बहकाती है, लेकिन किसी के कुछ कहने से इतने बड़े तूफानी अपराध और अपराधी को यूं ही तो क्षमा नहीं किया जा सकता। उम्रदराज महिला के हवाई सफर को बदरंग तथा नर्क बनाने वाले शख्स को इतनी तो समझ होनी ही चाहिए थी कि पानी और शराब में फर्क होता है तथा पीने की भी कोई मर्यादा होती है। आप जब पचा नहीं सकते तो इतनी अधिक पीते क्यों हैं कि बुरी तरह से बहक जाएं। उपद्रव और उल्टियां करने लगें। लंबी उबाऊ उड़ानों में थकावट से बचाये रखने के लिए यात्रियों की शराब से मेहमान नवाजी की बहुत पुरानी परिपाटी है, लेकिन इस बात का भी तो ध्यान रखा जाना चाहिए कि मेहमान ने कहीं ज्यादा तो नहीं पी ली है। जब सहयात्रियों को उसके विनाशकारी कगार पर होने का होने का पता चल जाता है तो एयरलाइंस में कार्यरत सेवक और सेविकाओं की आंखें क्यों बंद रहती हैं?

Thursday, January 5, 2023

सच्चे कर्मयोगी ... नरेंद्र मोदी

    भारतवर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आदरणीय माताश्री हीरा बेन का शुक्रवार को तड़के साढ़े तीन बजे निधन हो गया। उनके देहावसान पर पूरा देश शोक में डूब गया। उनके सुपुत्र नरेंद्र मोदी तुरंत पुत्रधर्म निभाने में जुट गए। गमगीन बेटे को अपनी आराध्य मां की अर्थी को कंधा देते देख सभी की आंखें बार-बार भीगती रहीं। मां की चिता पंचतत्व में विलीन हो रही थी और अपने असीम दर्द को अपने भीतर समेटे बेटा चुपचाप खड़ा था। दाह संस्कार की लपटें उसे अतीत की तरफ बहाकर ले जाने को आतुर थीं, लेकिन वह अपने वर्तमान के कर्तव्यबोध से बंधा था। वह अपने बड़े भाई को सांत्वना दे रहा था। उसके आंसू पोंछ रहा था। अपनी जान से भी प्रिय अपनी मां की अंत्येष्टि के फौरन बाद बेटा राजधर्म के पथ पर चल पड़ा। देशवासियों ने ऐसा कर्मठ प्रधानमंत्री पहली बार देखा, जिसने अपनी पीड़ा को अपने कर्तव्य पथ के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने वीडियो कॉन्फेंसिंग के माध्यम से पूर्व निर्धारित सभी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गांधीनगर में अपनी मां की अंतिम संस्कार की तैयारियों में लगे थे, तभी उन्होंने देशवासियों से अपील कर दी थी कि अपने पूर्व निर्धारित किसी भी काम को न रोकें। अपने दायित्व का पालन करना ही हीरा बा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अपील का उन्होंने खुद भी पूरे समर्पण भाव से अमल करते हुए पश्चिम बंगाल में 7,800 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन और लोकार्पण किया। इसी दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की पहली वंदे मातरम ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। वे जब कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, तब उनकी जुबान लड़खड़ाने को बेताब थी, लेकिन मुश्किल की हर घड़ी में खुद पर नियंत्रण रखने में दक्ष इस कर्मवीर ने खुद को संभाले रखा और दिखा दिया कि निजी पीड़ा राष्ट्रधर्म के समक्ष कोई मायने नहीं रखती। प्रधानमंत्री के भर्राये स्वर और नम होती आंखों की भाषा को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तुरंत भांप लिया। वह प्रधानमंत्री की कर्तव्य परायणता के प्रति नतमस्तक होकर रह गईं। उन्होंने मोदी जी की माताश्री हीरा बेन के निधन पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि आपकी मां हमारी भी मां हैं। दु:ख की इस घड़ी में हम सब आपके साथ हैं। आप सीधे मां की अंत्येष्टि से आए हैं। मैं चाहती हूं कि आप अभी आराम करें। 

    जिस संयम और धैर्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी निजी पीड़ा को दबाते हुए अपने फर्ज़ को प्राथमिकता दी उसे हमेशा याद रखा जाएगा। मां हीरा बेन की 99 वर्ष की जीवन यात्रा भी काफी संघर्षमय रही। अपने बच्चों को पालने-पोसने-पढ़ाने-लिखाने तथा अच्छी तरह से संस्कारित करने के लिए उन्हें लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाडू-पोछा तक भी करना पड़ा। फिर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बेटे नरेंद्र पर अपनी मां के अटूट परिश्रम और सद्विचारों का इतना अधिक प्रभाव रहा कि उन्होंने सबकुछ छोड़छाड़ कर देश की सेवा करने का संकल्प ले लिया। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा के पन्ने-पन्ने से सभी सजग देशवासी अच्छी तरह से वाकिफ हैं। देशवासी इस सच से भी अनजान नहीं हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी खुद को परिवार के मोह का कैदी नहीं बनने दिया। उनके परिवार के सदस्यों ने भी उनके सीएम और पीएम होने का लाभ उठाने की चेष्टा नहीं की, जबकि अमूमन होता यह है कि किसी भी विधायक सांसद के मंत्री बनते ही उनके परिवार वालों की हर रोज दिवाली मनती है। कभी जिनके पास साइकिल नहीं होती है, वे कारों के मालिक बन जाते हैं। मंत्रियो की औलादें और रिश्तेदार मंत्री के सरकारी निवास पर डेरा जमाये रहते हैं। मंत्री भी जश्न मनाने में लीन हो जाते हैं। सरकारी खर्चे पर देश और विदेश के पर्यटन स्थलों पर बार-बार जाते हैं। उन्हें छुट्टी मनाने के दिनों का बेसब्री से इंतजार रहता है। भारत के अधिकांश पूर्व प्रधानमंत्री किसी न किसी बहाने देश के हिल स्टेशनों तथा विदेश यात्राओं पर जाने के लिए विख्यात रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कोई छुट्टी नहीं ली। हर उत्सव देश के वीर सैनिकों के साथ मनाया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई मोदी स्वास्थ्य विभाग में अपनी सेवाएं देने के बाद रिटायर हो चुके हैं। अब वह अहमदाबाद में वृद्धाश्रम चलाते हुए समाजसेवा कर रहे हैं। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि मेरे और प्रधानमंत्री के बीच एक परदा है। मैं नरेंद्र मोदी का भाई हूं, न कि प्रधानमंत्री का। प्रधानमंत्री के लिए वे करोड़ों भारतीयों में से एक हैं। प्रधानमंत्री जी के दूसरे भाई अमृत भाई एक प्राइवेट कंपनी में फिटर के पद से रिटायर होने के बाद अहमदाबाद में अपने चार कमरों के मकान में आम भारतीयों की तरह रह रहे हैं। उनके बेटे यानी नरेंद्र मोदी के भतीजे 47 वर्षीय संजय मोदी, जो कि अपनी लेथमशीन संचालित कर गुजर बसर कर रहे हैं, का कहना है कि उनका पीएम मोदी से बहुत ही कम मिलना-जुलना होता है। उनके बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी यही स्थिति थी। पीएम नरेंद्र मोदी के तीसरे भाई प्रहलाद मोदी अहमदाबाद में एक किराने की दुकान चलाते हुए सहज और सरल तरीके से जीवनयापन कर रहे हैं। सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले प्रहलाद मोदी को इस बात का कतई अहंकार नहीं कि वे देश के प्रधानमंत्री के भाई हैं। नरेंद्र मोदी के सबसे छोटे भाई पंकज सूचना विभाग से रिटायर हुए हैं। वह गांधीनगर में रहते हैं। इन्हीं के साथ ही मां हीरा बेन रहती थीं। मां से जब भी नरेंद्र मोदी मिलने आते तो ही उनकी मुलाकात अपने बड़े भाई से होती थी। माताश्री हीरा बेन ने भी कभी किसी को नहीं जताया कि वह देश के प्रधानमंत्री की मां हैं। एक-दो बार प्रधानमंत्री निवास पर चंद दिन पुत्र के अनुरोध पर रहीं जरूर, लेकिन तुरंत गांधी नगर के अपने छोटे से घर में लौट आईं। उन्होंने हमेशा नरेंद्र मोदी को अपने बेटे की तरह देखा, सीएम या पीएम के रूप में तो कभी भी नहीं। यही सच उनके आदर्श और पवित्र मातृत्व को दर्शाता है। अपने कर्म को ही धर्म मानने वाले नरेंद्र मोदी को बचपन में अपनी मां से जो संस्कार मिले उनसे उन्होंने कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। आराम करना तो उन्होंने कभी सीखा ही नहीं। वर्षों से ही उनकी ब्रह्म मुहूर्त में उठने की आदत है। इतनी सुबह जागकर वे नियमित ध्यान में बैठते हैं, योग और कसरत करते हैं। इसी से उनकी एकाग्रता, स्फूर्ति, धैर्य और ताजगी बनी रहती है, जो उनके विरोधियों को भी चौंकाती है।