Thursday, March 16, 2023

आप क्या सोचते हैं?

    दलितों, शोषितों और अल्पसंख्यकों के साथ जुल्म थमते नजर नहीं आते। कोई भी ऐसा दिन नहीं होता जब देश में कहीं न कहीं महिलाओं और बच्चियों के साथ अमानवीय बर्ताव की खबर दिल न दहलाती हो। कुछ बेलगाम गुंडे, बदमाशों तथा धर्म-जाति के ठेकेदारों ने देश में खौफ और अराजकता फैलाने का अभियान-सा छेड़ रखा है। उन्हें कानून, प्रशासन और शासन का भी कोई भय नहीं। वे इस सच को भी अपने पैरोंतले रौंदने-कुचलने से बाज नहीं आ रहे कि भारत देश की अपनी एक संस्कृति और मान-मर्यादा है। जो भी यहां जन्मा है वह भारत माता की संतान है। हर किसी को खुली हवा में सांस लेने, जीने, रहने की पूरी आज़ादी है, लेकिन देश को तोड़ने पर आमादा विषैले चेहरे अपनी कमीनगी से बाज नहीं आ रहे हैं। लातों के भूतों के हिंसक तमाशों का पुरजोर विरोध करने की बजाय खामोशी और नजरअंदाज करने की परिपाटी बददिमाग जुल्मियों के हौसले बढ़ा रही है।

    देश की बुलंद राजधानी दिल्ली में एक जापानी लड़की को अकेली देखकर तीन गुंडे उस पर भूखे शेर की तरह टूट पड़ते हैं, लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आता। कहीं कोई विरोध का स्वर नहीं लहराता! पर्यटन की शौकीन यह लड़की बड़ी उमंगों, तरंगों के साथ भारत में खासतौर पर होली के रंगों में सराबोर होने को आई थी, लेकिन उसने बड़ी मुश्किल से अपनी अस्मत बचायी। मध्य दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में कुछ लोगों को होली खेलते देख वह उनके निकट पहुंची ही थी कि तीन बदमाशों ने उसे जबरन काले-पीले सस्ते रंगों से पोतना प्रारंभ कर दिया। उन्होंने लड़की के नाजुक ज़िस्म को जहां-तहां दबोचा, जिससे वह अपनी जान बचाने के लिए जंगल में अकेली पड़ी हिरनी की तरह छटपटाने और घबराने लगी। वासना की आंधी में नाचते-गाते बदमाशों ने उसके सिर पर धड़ाधड़ अंडे फोड़े और उसके अंगों से जीभर कर खिलवाड़ और बदसलूकी की। उसके लाख विनती करने के बावजूद जब वे नहीं माने तो उसने उन पर थप्पड़ों की बरसात भी की। विदेशी बाला की घृणा, तिरस्कार और थप्पड़ों की बरसात को वे प्रसाद की तरह ग्रहण करते रहे और भारत माता के माथे पर कलंक का काला टीका लगाते रहे। हतप्रभ लड़की ने मन ही मन कसम खायी कि अब वह कभी भी भारत देश की धरा पर कदम नहीं रखेगी। उसने जो सोचा और सुना था वो भारत तो नदारद था। इस शर्मनाक घटना का वीडियो जब असंख्य लोगों ने सोशल मीडिया पर देखा तो उनका खून खौल गया। ताज्जुब है कि उनके खून में जरा भी उबाल नहीं आया जो घटनास्थल पर तमाशबीन की तरह मौजूद थे! 

    राजधानी दिल्ली को सभ्य और सुलझे लोगों का नन्हा से प्रदेश कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि यहां के निवासी किसी के फटे में टांग नहीं अड़ाते। अपने में ही मस्त रहते हैं। लेकिन...? यहीं के शानदार मयूर विहार में वर्षों से रहते चले आ रहे हैं, राम अवतार वर्मा। वे मूलत: राजस्थान के हैं। रोजी-रोटी की तलाश उन्हें दिलवालों की महानगरी दिल्ली ले आई। राम अवतार वर्मा शुरू-शुरू में सड़क किनारे चप्पल जूते सिलते थे। कालांतर में उन्होंने अपनी छोटी सी दूकान बना ली, जिस पर अपने नाम का बोर्ड भी लगा दिया। खुद के नाम के साथ अपना मोबाइल नंबर भी लिख दिया ताकि यदि कभी वे दुकान पर न हों तो लोग उनसे मोबाइल के माध्यम से संपर्क कर सकें। कुछ दिन पूर्व दिल्ली के किसी दबंग मालदार की दुकान के बोर्ड पर ऩजर पड़ी। नाम के आगे वर्मा लिखा देख उसका तो खून ही खौल गया। दरअसल उसके नाम के साथ भी वर्मा जुड़ा है। उसका अच्छा खासा कारोबार है। साथ ही समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा होने का अहंकार भी। कहां वह और कहां यह जूता-चप्पल सिलने वाला अदना-सा दलित मजदूर। उस ‘ऊंचे आदमी’ ने पहले भी राम अवतार पर जाति सूचक गालियों की बौछार की फिर फौरन बोर्ड पर लिखे वर्मा सरनेम को हटाने, मिटाने का फरमान सुना दिया। बाल-बच्चे वाले गरीब राम अवतार ने डरकर उसी के सामने ‘वर्मा’ के ऊपर पेपर चिपका दिया, जिससे अहंकारी रईस चला गया। कुछ दिनों के पश्चात जब तेजी से बारिश बरसी, बोर्ड भी भीग गया और उस पर चिपका कागज भी बोर्ड से उतर गया। दो-चार दिनों के पश्चात उस धनवान वर्मा का फिर से वहां से गुजरना हुआ तो वह बोर्ड पर वर्मा लिखा देख आपे से बाहर हो गया। राम अवतार ने फिर हाथ पांव जोड़े और नाम के आगे मजबूती से कागज चस्पा कर दिया। अपना नाम बदलने को मजबूर हुए राम अवतार की पुलिस ने भी नहीं सुनी।

    कुछ हफ्ते पूर्व दर्शन सोलंकी ने खुदकुशी कर ली। उसके मां-बाप ने बड़े अरमानों के साथ उसे मुंबई में केमिकल-इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए भेजा था। दर्शन को कॉलेज का माहौल रास नहीं आया। दलित और गरीब होने के कारण सहपाठी उस पर व्यंग्यबाण चलाते हुए अपमानित करने में लगे रहते थे। 12 फरवरी, 2022 के दिन उसने आईआईटी परिसर में बने हॉस्टल के सातवें माले से कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। हालांकि आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं। दर्शन की तरह देश में कई होनहार भेदभाव के दंशों को सहन नहीं कर पाने के कारण इस कायराना रास्ते पर चलते हुए अपने मां-बाप के सपनों का खून कर चुके हैं। अपने होनहार बेटे को खो चुके दर्शन के माता-पिता ने इसे आत्महत्या मानने से इनकार करते हुए सीधे-सीधे कहा कि यह खुदकुशी नहीं है, बल्कि यह तो एक सुनियोजित हत्या है। मेरा भी यही मानना है कि किसी को आत्महत्या के लिए विवश करना, उसकी हत्या करना ही है। इस बारे में आपका क्या कहना है? आप क्या सोचते हैं?

Thursday, March 9, 2023

माथे में ठुकी कील

    अंधविश्वास, अंधभक्ति, भ्रम, शंका, प्रतिशोध और क्रोध यह सभी ऐसे रोग हैं, जिनका कहीं न कहीं एक दूसरे से भी बड़ा गहरा नाता है। इनके शिकार और शिकारी कल भी खबरों में छाये थे, आज भी बड़ी-बड़ी सुर्खियों में हैं। अफसोस तो यह भी है कि पढ़े-लिखे लोग भी इस बीमारी और महासंकट की जंजीरों में जकड़े हैं। केरल प्रदेश की 23 वर्षीय ग्रीष्मा को कॉलेज की पढ़ाई के दौरान 24 वर्षीय जेपी शैरोन से प्यार हो गया। मिलते-मिलाते दोनों ने परिणय सूत्र में बंधने का पक्का मन बना लिया। इसी दौरान ग्रीष्मा के माता-पिता ने अपनी इकलौती बेटी की शादी किसी आर्मी आफिसर से तय कर दी। हालांकि उन्हें जानकारी थी कि उनकी बेटी शैरोन को दिलोजान से चाहती है। दरअसल, हुआ यह कि जब वे अपनी लाड़ली के लिए रिश्ता तलाश रहे थे, तभी उन्होंने किसी ज्योतिषी को बेटी की कुंडली दिखायी। धन के लालची धूर्त ज्योतिषी ने यह बताकर उनके पैरोंतले की जमीन खिसका दी कि ग्रीष्मा की पहली शादी जिससे भी होगी उसकी कुछ ही महीनों के बाद मौत हो जाएगी। हां, दूसरी शादी जरूर हर तरह से खुशहाल और पूरी तरह से सफल रहेगी। ग्रीष्मा को यह बात जब पता चली तो वह बेचैन हो उठी। उसकी रातों की नींद जाती रही। उसके अंदर बैठी स्वार्थी नारी ने नागिन बनने में भी देरी नहीं लगायी। वह किसी भी हालत में विधवा होने की वेदना से बचना चाहती थी। उसने घण्टों बैठकर हिसाब-किताब लगाया तो आर्मी अफसर से शादी कर ठाठ से उम्र बिताने में फायदा नज़र आया। 

    कभी अपने प्रेमी शैरोन को दिलो-जान से चाहने वाली अंधविश्वासी प्रेमिका ने जो राह पकड़ी उसने तो उसके नारी होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। उसने बड़ी चालाकी से शैरोन को मंदिर ले जाकर उससे अपनी मांग में सिंदूर भरवाया और गले में मंगलसूत्र पहन कर पतिव्रता पत्नी का ढोंग करते हुए कुंडली दोष से मुक्ति पाने की क्रूरतम लीला प्रारंभ कर दी। वह सुबह-शाम अपने पति-परमेश्वर को आयुर्वेदिक जूस पिलाने लगी, जिसमें मिला होता था धीमा ज़हर। भोला पति इस भरोसे के साथ पीता चला गया कि पत्नी को उसकी सेहत की बड़ी चिन्ता है। इसीलिए पानी कम और जूस ज्यादा पिलाती है। कई हफ्ते बीत जाने पर भी जहर का असर न होता देख ग्रीष्मा ने एक दिन कीटनाशक मिला जूस पिलाया तो शैरोन की तबीयत बहुत गड़बड़ा गई। शैरोन के माता-पिता को भी ग्रीष्मा पर संदेह हो गया। अपने बेटे को तुरंत अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने जांच की तो पता चला कि विषैले जूस ने शरीर के विभिन्न अंगों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। उनकी सभी कोशिशें नाकाम होती चली गईं और अंतत: शैरोन की मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी पूरी सच्चाई उगल दी। ग्रीष्मा पहले तो किसी भी खूनी साजिश से इनकार करती रही। फिर आखिरकार उसे टूटना ही पड़ा। अब उसकी सारी जिन्दगी जेल की सलाखों में कटने वाली है। 

    देश और दुनिया में कहर बरपाने वाले कोरोना का खौफ एक महिला के मन में ऐसा बैठा कि उसके लिए उससे बाहर निकलना ही मुश्किल हो गया। गुरुग्राम की रहने वाली इस महिला ने सन 2020 में अपने दस वर्ष के बेटे के साथ खुद को कमरे में ऐसे कैद किया कि अंतत: उसे बड़ी मुश्किल से 2023 के मार्च महीने में बाहर निकाला गया। कोरोना के भूत से खौफजदा महिला और उसके बच्चे ने तीन वर्षों तक सूरज की किरण नहीं देखी और न ही किसी बाहरी शख्स का चेहरा देखा। महिला को पक्का यकीन था कि अगर उसने किंचित भी बाहर झांका तो कोरोना दोनों पर भूखे शेर की तरह झपटा मार देगा। 2020 में जब कोरोना की पहली लहर आई थी तभी परिवार ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था। कोरोना की दूसरी लहर के हर तरफ आतंक बरपाने पर मजबूरन जब पति को रोजी-रोटी के चक्कर में बाहर जाना पड़ा तो महिला ने उसके लिए घर के दरवाजे ही बंद कर दिए। अपनी पत्नी के इस हिटलरी बर्ताव से परेशान पति पुलिस थाने भी गया, लेकिन वहां से उसे भगा दिया गया। रिश्तेदारों ने भी महिला को समझाने के पचासों प्रयास किए, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही। घर में जब सिलेंडर खत्म हो गया पर कोरोना की दहशत की मारी महिला ने इंडक्शन पर खाना बनाना प्रारंभ कर दिया। पुलिस और जिला प्रशासन के लोग जब मां-बेटे को कमरे से बाहर निकालने के लिए पहुंचे तो वह दरवाजा खोलने को तैयार नहीं थी। उसने बच्चे को मारकर खुद आत्महत्या कर लेने की धमकी तक दे डाली। उसके घर में कूड़े का अंबार लगा था। चारों तरफ फैली गंदगी की बदबू के कारण वहां खड़े रहना मुश्किल था। कोरोना के खौफ में अपने होशो-हवास खो चुकी महिला को यदि उसके पति की शिकायत पर बाहर नहीं निकाला गया होता तो कुछ दिनों के बाद दोनों की मौत की खबर आती।

    अंधभक्तों और अंधविश्वासियों तथा उनके आकाओं के खिलाफ बोलने और लिखने का अब अभिप्राय हो गया है एक से बढ़कर एक शत्रु पैदा करना और तथाकथित महान धर्म प्रेमियों की निगाह में घोर नास्तिक होना। अपना भारत देश वाकई अद्भुत है। जीते-जागते इंसानों की अवहेलना और जानवरों को पूजे जाने की खबर से अवगत होने के बाद तो मैंने मान लिया है कि यहां कुछ भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खापरी गांव में वर्षों से ‘कुकुरदेव’ मंदिर स्थापित है। इस मंदिर में स्थानीय लोगों के साथ-साथ आसपास के प्रदेशों के शहरों ग्रामों के निवासी बड़े ताम-झाम के साथ पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं। मंदिर के गर्भागृह में कुत्ते की भव्य आकर्षक मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दो कुत्तों की प्रतिमाएं हैं। हैरतअंगेज सच यह भी है कि इस अनोखे मंदिर का संरक्षण राज्य का संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग करता है। वीरों की भूमि बुंदेलखंड की मऊरानी तहसील में कुतिया का मंदिर बना हुआ है, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘जय कुतिया महारानी’ लिखा हुआ है। शादी-विवाह जैसे मांगलिक आयोजनों से लेकर विभिन्न तीज-त्योहारों तक स्थानीय लोग यहां पूजा-अर्चना करना नहीं भूलते। मजे की बात तो यह भी है कि आसपास के गांवों के मांगलिक कार्यक्रमों में भोजन का पहला चढ़ावा कुतिया महारानी को अर्पित किया जाता है। इस तरह के मंदिर देश के कुछ अन्य शहरों में भी बनाए गये हैं, जहां अद्भुत... अभूतपूर्व आस्था का नजारा देखते बनता है...।

Thursday, March 2, 2023

कहां से कहां तक

    रति की विख्यात मॉडल तथा अभिनेत्री बनने की प्रबल चाह थी। मध्यप्रदेश के एक छोटे शहर मेें उसने जन्म लिया था। बी.काम. करने के बाद उसकी मायानगरी मुंबई जाने की तमन्ना जोर मारने लगी। यहीं उसके सभी सपने साकार हो सकते थे। महाराष्ट्र की उपराजधानी, संतरा नगरी में उसके मामा रहते थे। स्कूल और कॉलेज की उसकी छुट्टियां मामा के यहां ही बीतती थीं। अब तो नागपुर में भी फिल्में बनने लगी थीं। ‘झुंड’ फिल्म का निर्माण भी नागपुर में ही हुआ था, जिसमें सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ स्थानीय कलाकारों ने अत्यंत प्रभावी भूमिका निभायी। बी.काम. कर लेने के बाद रति ने मामा के यहां नागपुर रहते हुए नौकरी की तलाश शुरू कर दी। वह नहीं चाहती थी कि मामा को उसके कारण आर्थिक संकट का सामना करना पड़े। वे किसी थोक कपड़े की दुकान में सेल्समैन थे। तनख्वाह घर गुजारने लायक ही थी। इसी दौरान उसकी शामू नामक युवक से एम्प्रेस मॉल में मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में शामू ने रति को बताया कि उसकी फिल्मी दुनिया के नामी-गिरामी फिल्म निर्माताओं से अच्छी-खासी पहचान है। उसने तीन-चार युवतियों को फिल्मों तथा टीवी सीरियल में काम दिलवाया है। आज वे लाखों में खेल रही हैं। अपने सपनों को फटाफट साकार करने को आतुर 21 वर्षीय रति शामू की फरेबी बातों में आ गई। उसने शामू को बताया कि उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। पांढुर्णा से नागपुर आने के लिए भी अक्सर उसके पास रेल टिकट के लिए समुचित पैसे नहीं रहते। फिलहाल वह चाहती है कि उसे कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए, जिससे वह नागपुर में कोई छोटा-मोटा कमरा किराये पर लेकर बेफिक्र रह सके। शामू ने रति पर कोई ऐसा जादू चलाया, जिससे वह उस पर बेहद भरोसा करने लगी। दोनों शहर के बाग-बगीचों तथा यहां-वहां बैठकर घण्टों बातें करते। शामू उसके सपनों में नये-नये रंग भरता रहता। एक शाम शामू ने उसे किसी बार में ले जाकर बीयर का स्वाद चखाया और फिर उसे चुटकियों में धन कमाने का आसान मार्ग सुझाया। पहले तो रति ने देह के धंधे में कदम रखने से इनकार कर दिया, लेकिन जब शामू ने उससे कहा कि तुम अधिकांश हीरोइनों को पर्दे पर नाचते-झूमते देखती चली आ रही हो वे सभी फिल्म निर्माताओं और अभिनेताओं को अपनी देह की सौगात दे चुकी हैं। इसके बिना अभिनेत्री तो क्या अदनी-सी मॉडल बनना भी संभव नहीं। 

    रति ने अपना निर्णय बताने के लिए दो दिन का वक्त मांगा। वह रात भर चिन्तन-मनन करती रही। खुद को समझाती भी रही। चाहे कुछ भी हो जाए उसे टी.वी. और फिल्मी पर्दे पर चमकना ही है। शामू गलत तो नहीं हो सकता। वैसे उसने भी कितनी बार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा ही है कि अधिकांश युवतियों को अभिनेत्री बनने के लिए ‘देह-दान’ के दस्तूर को निभाना ही पड़ता है। वह उनसे अलग तो नहीं। रति की स्वीकृति ने शामू को गद्गद् कर दिया। दोनों ने तुरंत शहर के एक बदनाम होटल के कमरे में डट कर शराब पी। जब रति नशे में धुत हो गई तो शामू चुपचाप कमरे से खिसक गया। सुबह जब रति की आंख खुली तो उसने खुद को अस्त-व्यस्त बिस्तर पर निर्वस्त्र पाया। उसके बाद तो रति की हर रात विभिन्न होटलों में किसी न किसी अनजान धनवान अय्याश पुरुष के संग बीतने लगी। कुछ महीनों के बाद रति ने होटल के उसी कमरे को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया, जहां से उसके देह व्यापार की शुरुआत हुई थी। दो साल में रति के पास कार भी आ गई। उसने खुद का आलीशान फ्लैट भी खरीद लिया। यदाकदा जब वह कभी पांढुर्णा अपने माता-पिता से मिलने जाती तो उन्हें यही बताती कि वह नागपुर के नामी-गिरामी उद्योगपति के यहां कार्यरत है। जहां उसे हर माह मोटी पगार मिलती है। माता-पिता भी बेटी की तरक्की से बहुत खुश हुए। उन्होंने बेटी के लिए किसी योग्य लड़के की तलाश भी शुरू कर दी। कहावत है कि पाप का घड़ा एक दिन तो फूटता ही है। रति एक रात जब शहर के फाइव स्टार होटल में किसी देहभोगी ग्राहक के साथ नशे में हमबिस्तर थी तभी वहां पुलिस का छापा पड़ गया। एक बारगी तो रति को यकीन ही नहीं हुआ। शामू तथा होटल के मैनेजर ने उसे यकीन दिलाया था कि शहर के इस इकलौते फाइव स्टार होटल में छापे-वापे पड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता। पुलिस वालों को नियमित हफ्ता भेज दिया जाता है। बड़े-बड़े नेता, अफसर और उद्योगपति बेफिक्री के साथ यहां अपनी रातें रंगीन करते हैं। अखबारों के माध्यम से शहर के छोटे-मोटे होटलों पर खाकी वर्दी की जब-तब गाज गिरने की खबरों से भी वह अच्छी तरह से अवगत हो चुकी थी, लेकिन इस रईसों के होटल पर छापे पड़ने की कोई भी खबर उसके सुनने और पढ़ने में नहीं आई थी। उस रात रति को कुछ घण्टे पुलिस स्टेशन में बिताने पड़े तो बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। खबर मिलते ही उसके कुछ चाहने वाले भी थाने पहुंच गए। सुबह होते-होते तक वह आजाद हो चुकी थी। एक-दो दिन आराम करने के पश्चात फिर से वह अय्याशों के बंगलों तथा फार्महाऊसों में जाकर उनकी वासना की आग को बुझाने लगी। धन की बरसात ने उसके सभी सपनों का हरण कर लिया था। अपने नाम को पर्दे पर रोशन करने की बजाय माथे पर ऐसा कलंक का टीका लगा चुकी थी, जो अब कभी भी नहीं मिटने वाला था। शामू देह धंधे का अभ्यस्त खिलाड़ी था। रति की तरह उसने न जाने कितनी लड़कियों को वेश्या बनाकर उनकी जिन्दगी नर्क बना दी थी। हमेशा शराब के नशे में गर्क रहने वाली रति देह के धंधे के दलदल में और...और धंसती चली गई। पुलिस की पकड़ा-धकड़ी का भी उसे कोई भय नहीं रहा। उसके पिता तो उसी दिन ही हार्ट अटैक से चल बसे जब उन्हें बेटी की गंदी हकीकत पता चली। मां ने भी बेटी की शक्ल देखने से इनकार कर दिया। उसे उसकी परछाई से भी नफरत हो गई। अत्याधिक शराब पीने की वजह से रति अब कई जानलेवा रोग की शिकार हो चुकी है। होश में तो उसे खुद से डर लगने लगता है। क्या बनने का सपना देखा था और क्या बनकर रह गई। एक अजीब किस्म के भय का हरदम उसके मन-मस्तिष्क में बसेरा रहता है।

    मरीजों की देखरेख और निस्वार्थ सेवा की असीम भावना से वशीभूत होकर मेघा ने नर्स का पेशा चुना था। वह अपना अच्छा-बुरा अच्छी तरह से समझती थी। रोज के अखबार तथा तरह-तरह की किताबें पढ़ने का मेघा को खासा शौक था। किसी ईमानदार परिश्रमी, शालीन रिश्ते से जुड़ने की अभिलाषी मेघा, चंदन को अपना दिल दे बैठी। दोनों शादी किये बिना साथ-साथ रहने लगे। कुछ ही महीनों में चंदन की सज्जनता दुर्जनता में बदलने लगी तो मेघा चिन्ता में पड़ गई। मेघा को पता नहीं था कि चंदन ने अपने चेहरे पर कई नकाब लगा रखे हैं। शराब के नशे में जब उसने उसे पहली बार रात को पीटा तो उसके दिमाग में तंदूर में जला दी गई नैना साहनी, पैंतीस टुकड़े कर दी गई श्रद्धा से लेकर उन सभी युवतियों की दास्तानें हलचल मचाने लगीं, जिन्हें छल-कपट, धोखे का शिकार होना पड़ा। सुबह नशा उतरने के बाद चंदन ने उसके चरणों में माथा रगड़ते हुए जब माफी मांगी थी तो उसे उस पर रहम आ गया था। पांच-सात दिन बाद फिर चंदन के अंदर का शैतान जाग गया था। फिर सुबह उसने माफी मांगी थी। चंदन मेघा से कम कमाता था। किसी सौंदर्य प्रसाधन कंपनी में नौकरी करता था। उसने कई लड़कियों को अपने मोहपाश में बांधकर उनका देह शोषण किया था। उसकी सतायी एक लड़की ने तो मेघा के सामने अपना रोना भी रोया। दिन-पर-दिन बीत रहे थे। चंदन उसके समक्ष कुछ इस तरह से गिड़गिड़ाता, जिससे मेघा को उस पर दया आ जाती। एक दिन तो वह बेशर्मी को ताक पर रखते हुए अपनी किसी प्रेमिका को घर ले आया। रात भर उसने उसे अपने साथ रखा। वह घर के बरामदे में सुबकती रही। अब तो उसने चंदन को छोड़ने का पक्का मन बना लिया था। अपनी पुरानी सहेली वंदना को भी उसने चंदन की शर्मनाक करतूतों के बारे में बता दिया था। वंदना ने भी उसके निर्णय के प्रति सहमति जताते हुए फौरन उससे किनारा करने का सुझाव दिया था। जिस दिन दोनों में यह बातचीत हुई, उसके दूसरे दिन जब वंदना ने मेघा को मोबाइल लगाया तो वह स्विच ऑफ था। दिनभर वंदना चिंतित और परेशान रही। तीसरे दिन अखबारों में उसकी हत्या की खबर पढ़कर वंदना के होश उड़ गए। चंदन ने उसकी नृशंस तरीके से हत्या कर लाश को गद्दे में छिपा दिया था। क्रूर हत्यारा चंदन जब मेघा के शव को पेट्रोल डालकर जलाने जा रहा था तभी पुलिस ने उसे धर-दबोचा। अपनी प्रिय सहेली की मौत से गमजदा वंदना के मन में बार-बार विचार आ रहा था, कि काश! मेघा ने नराधम हत्यारे को उसी दिन छोड़ दिया होता, जिस दिन उसने उसे पहली बार नशे में बेदम पीटा था।

Thursday, February 23, 2023

कलाकारी

    मेले ठेले देश की पहचान हैं। अपनी कहने को आतुर साधु-संतों, प्रवचनकारों, किस्म-किस्म के चर्चित सच्चे-झूठे चेहरों को देखने और सुनने के लिए यहां भीड़ का जुटना-जुटाना बहुत आसान है। जादू-टोना, भूतप्रेत और झाड़फूंक के प्रति विश्वास रखने की घातक भूल और भ्रम से बचने की सीख देते-देते सदियां बीत गईं, लेकिन फिर भी कई लोग अभी भी अंधविश्वासों की मजबूत जंजीरों में बुरी तरह से जकड़े हैं। उनकी भेड़चाल और अंधभक्ति की वजह से इस आधुनिक युग में भी नये-नये तथाकथित चमत्कारी बाबाओं को अपने दरबार सजाने में तनिक भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। आसाराम, राम रहीम, रामपाल, नित्यानंद जैसे कई कपटी-ढोंगी असंत अब जेलों में बंद हैं या अपनी पोल खुलने के पश्चात गायब हो गये हैं। पिछले कुछ हफ्तों से बागेश्वर धाम सरकार के नाम से देशभर के मीडिया में छाये धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की नेताओं ने भी कीमत बढ़ा दी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा कमलनाथ आदि की हाथ जोड़कर नतमस्तक खड़े होने की तस्वीरें देखकर अनजान लोग भी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को जानने, देखने और सुनने को लालायित हो गए। मात्र 26-27 साल के धीरेंद्र शास्त्री के चमत्कारी दावों की गूंज के बीच कुछ विरोध के स्वर भी उठे, लेकिन उन्हें बड़े सुनियोजित तरीके से दबा और दबवा दिया गया। कुशल प्रवचकार धीरेंद्र शास्त्री ने कम समय में धर्म के बाजार में जिस तरह से अपनी धाक जमायी है, उससे पुराने बाबा और प्रवचकारों को भी अपने मायावी जादू के कारोबार पर संकट के बादल मंडराते नजर आने लगे हैं। फिल्मी नायक के से चेहरे-मोहरे वाला यह युवक लोगों के चेहरे के साथ-साथ वर्तमान हालात की नज़ाकत को भी खूब समझता है। तभी तो उसने विरोधियों का मुंह बंद करने और करवाने के लिए ‘हिंदू राष्ट्र’ का गुब्बारा आकाश में ऐसे उड़ाया कि अनेक लोगों को उसमें अलौकिक चमत्कारी बाबा के साथ-साथ भावी राष्ट्रनेता का भी चेहरा नजर आया है। 

    मंचों पर मुस्कराते हुए सनातन का राग अलापने वाले इस ताजा-ताजा बाबा के प्रति आम लोगों की दीवानगी का हाल यह है कि वे उन्हें अपना संकटमोचक मानने लगे हैं। दरअसल, सभी के दिल-दिमाग में यह बात बिठा दी गई है कि बाबा के पास हर बीमारी का इलाज है। वह शरीर और चेहरा पढ़ने में पारंगत है। अपनी सफलता पर बाबा गद्गद् है। एक से एक बीमार उनके दरबार में पहुंच रहे हैं। भीड़ में बेहाल हो रहे हैं। फिरोजाबाद की रहने वाली नीलम देवी नामक महिला की हाल ही में बागेश्वर धाम में मौत हो गई। लोग हतप्रभ रह गए। नीलम देवी किडनी की बीमारी की शिकार थी। उसके घरवालों ने जहां-तहां जोर-शोर से सुना था धीरेंद्र शास्त्री की दरबार में बिना किसी दवाई के फौरन चमत्कार हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बेचारी नीलम देवी चल बसी। अपनी अर्जी... फरियाद लेकर बागेश्वर धाम पहुंची महिला के भला-चंगा होने की बजाय चल बसने पर सोशल मीडिया पर किस्म-किस्म की बहस छिड़ गई। नीलम देवी के घरवाले बेवकूफ थे, जो उसे बागेश्वर धाम ले गए। अस्पताल ले गए होते तो बच भी जाती। इस मौत पर बाबा को कोसना बेवकूफी है। वे उसे बुलाने के लिए तो नहीं गए थे। यह भी तो सच है कि बाबा का बीमारों को ठीक-ठाक करने का अंधाधुंध प्रचार-प्रसार भी कम कसूरवार नहीं। वैसे भी अंधविश्वासी अपने दिमाग का कम ही इस्तेमाल करते हैं। 

    उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले के तिवारीपुर इलाके में हाल ही में यज्ञ का आयोजन किया गया। जुलूस की शान-शोभा बढ़ाने के लिए बड़ी धूमधाम के साथ एक विशाल हाथी को वहां पर लाया गया। कलश यात्रा के लिए महिलाएं जल भरने को जाने को तैयार थीं। तभी कुछ अति उत्साही लोग हाथी से छेड़छाड़ का मज़ा लेने लगे, तो कुछ उसके साथ फोटो खिंचवाने के लिए धक्का-मुक्की पर उतर आए। भीड़ की अनियंत्रित हरकतें देखकर हाथी को गुस्सा आ गया। फिर भी उसके साथ फोटो खिंचवाने वालों की अक्ल पर ताले पड़े रहे। वे अपनी ही ‘भक्ति मस्ती’ में हाथी को छेड़ते रहे। कोई उसकी सूंड को पकड़ता तो कोई उसकी भरी-पूरी काया को। फिर जानवर तो आखिर जानवर ही होता है। उसने अपना उत्पाती रंग दिखा ही दिया, जिसकी वजह से तीन लोगों की मौत हो गई। विशाल हाथी के पैरोंतले कुचले-मसले गए मृतकों में एक बच्चा भी था, जो काफी समय से बीमार था। इस बच्चे की मां उसे हाथी से आशीर्वाद दिलाने के लिए बड़ी श्रद्धा और उम्मीद के साथ अपने मायके आई थी। उसके माता-पिता ने भी उसे हर तरह से आश्वस्त किया था कि बच्चे का अस्पताल में इलाज कराना व्यर्थ है। यज्ञ में लाकर उसका पूजन कराओ तो वह चुटकियां बजाते ही रोगमुक्त हो जाएगा। 

    मध्यप्रदेश के सिहोर जिले में स्थित कुबेरेश्वर धाम में मुफ्त रुद्राक्ष पाने के लिए देशभर से लाखों लोग जमा हो गए। सबसे पहले रुद्राक्ष हासिल करने के लिए मची धक्का-मुक्की में कई लोग चक्कर आने से बेहोश हो गए। महाराष्ट्र के मालेगांव से आई एक पचास वर्षीय महिला सहित चार लोगों की मौत हो गई। कुछ महिलाएं भी लापता हो गईं। कुबेरेश्वर धाम के कर्ताधर्ताओं ने देशभर में प्रचार का डंका बजवाया था कि उनके द्वारा वितरित किए जाने वाले रुद्राक्ष अत्यंत गुणकारी और असरकारी हैं। इस रुद्राक्ष को पानी में डालें और बस उस पानी को पी लें। इससे उनकी हर बीमारी तथा समस्या फुर्र हो जाएगी। यही नहीं भूत बाधा के पुराने से पुराने संकट का भी तुरंत में निवारण हो जाएगा। ऐसे चमत्कारी रुद्राक्ष को किसी भी हाल में हासिल करने के लिए लोग खाना-पीना तक भूल गए। भूखे-प्यासे घण्टों लाइन में लगे रहे। दस लाख लोगों का जमावड़ा कोई म़जाक नहीं होता। उसे संभालने के लिए सुरक्षा के सभी इंतजाम करने होते हैं, लेकिन यह ‘रुद्राक्ष महोत्सव’ तो पूरी तरह से भगवान भरोसे था।

    अपने देश भारत में लोगों की आस्था से खिलवाड़ करने के मामले में कई भगवाधारी विख्यात और कुख्यात रहे हैं। अखबारों तथा न्यूज चैनलों का दायित्व है लोगों को कपटी साधुओं की अंधभक्ति के चंगुल से बचाना, लेकिन मीडिया भी तरह-तरह के खेल करने की उस्तादी दिखाता चला आ रहा है। कुछ वर्ष पूर्व संतरा नगरी नागपुर के एक सबसे पुराने दैनिक अखबार ने अपनी पाठक संख्या और धंधे को बढ़ाने तथा डूबती नैय्या को पार लगाने के लिए शहर में स्थित साईं मंदिर में भभूत के साथ मोतियों का प्रसाद बांटा था। ‘प्रसाद’ के लिए अधिक से अधिक भीड़ पहुंचे इसके लिए कई दिनों तक प्रचारबाजी का भोंपू बजाया जाता रहा था। इन मोतियों को शहर के नेताओं, बिल्डरों, उद्योगपतियों तथा विभिन्न जिन रंगधारी समाजसेवकों तथा कलाकारों ने सपत्निक अभिमंत्रित यानी सिद्ध (!) किया था, उनकी तस्वीरें भी अखबार में प्रकाशित की गई थीं। शहर भर में होर्डिंग्स भी लगाये गए थे। मजे की बात तो यह थी कि, मोतियों की संख्या तो थी मात्र इक्कीस हजार, लेकिन दूर-दूर से लाखों लोगों को निमंत्रित किया गया था। तब भी खूब भगदड़ मची थी। हर किसी को चमत्कारी मोतियों का प्रसाद पाने की जल्दी थी। अखबार मालिकों की खुशी का तो कोई ठिकाना नहीं था, लेकिन कई महिलाएं भूखी-प्यासी बच्चों को अपनी गोद में लेकर रोती-बिलखती रहीं थीं। भारी भीड़ को पुलिस ने बड़ी मुश्किल से संभाला था...।

Thursday, February 16, 2023

यहां तो सब चलता है!

    कई तस्वीरें हैं, जो मेरी आंखों से ओझल ही नहीं हो रहीं। एक बच्ची कई घण्टों से मलबे में फंसी है। इस दौरान इस सात साल की बहादुर बच्ची ने अपने छोटे भाई की रक्षा... सुरक्षा के लिए उसके सिर पर हाथ रख रखा है। लगातार 17 घण्टे तक मौत का सामना कर मलबे में दबे रहने वाले बहन-भाई की इस तस्वीर को जिसने भी देखा हतप्रभ रह गया। मौत से जंग ऐसे भी लड़ी जाती है। हर किसी ने बहन की सराहना की। धरती के सभी संवेदनशील इंसानों को भावुकता से ओतप्रोत कर देने वाली इस अभूतपूर्व तस्वीर ने सृष्टिवासियों को यह भी बताया कि लाल खून के रिश्ते का पूरी दुनिया में एक ही रंग है। सोच और भावनाओं में भी कोई फर्क नहीं। कुछ नादान लोग इस सच से मुंह फेरे रहते हैं। इसी वजह से दंगे फसाद होते हैं। भाईचारे का कत्ल होता रहता है और निर्दोषों का खून बहता है। तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप ने लगभग पचास हजार लोगों की जान ले ली। इस प्राकृतिक आपदा तथा इंसानी लालच और नालायकी ने दुनिया को फिर एक बार चेतावनी देते हुए चेताया कि अभी भी वक्त है, होश में आ जाओ। प्रकृति से छेड़छाड़ करना बंद करो। हद से ज्यादा भौतिक सुखों के लालच के गर्त में मत डूबो। याद रखो जैसा बोओगे, वैसा काटोगे। तुम्हारी गलतियां तुम्हें इससे भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती हैं। 

    तुर्की और सीरिया में आये भयावह भूकंप ने एक से एक विशाल गगनचुंबी इमारतों को जमींदोज कर दिया। मलबे को हटाने के लिए क्रेनें और इंसानी दिमाग चलते और दौड़ते रहे। कड़ाके की सर्दी में राहत कार्यों में रुकावटें आती रहीं। ऐसे-ऐसे चमत्कारों का भी सिलसिला बना रहा, जो यह बताता रहा कि इन हैरतअंगेज चमत्कारों के पीछे कोई तो है, जिसे कई लोग मानने और स्वीकारने को तैयार नहीं होते, लेकिन जब आफत का पहाड़ टूटता है तो नतमस्तक हुए बिना भी नहीं रहते। 

    एक मासूम बच्चा बीते 45 घण्टों से ढेर सारे मलबे के नीचे दबा हुआ है। वह पूरी तरह से चेतन अवस्था में है। आंखें खुली हैं। वह कभी ऊपर तो कभी इधर-उधर ताकता है। एक बचाव कर्मी उसे बोतल के ढक्कन से पानी पिलाता दिखायी देता है। पानी के कुछ घूंट पीते ही बच्चा मुस्कराता है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ऊपर बैठा विधाता मुस्करा रहा हो। उसकी निश्छल हंसी सभी का मन मोह लेती है। बच्चा बड़ों की भाषा नहीं समझता, लेकिन फिर भी बचावकर्मी उसे बार-बार दिलासा देते हैं कि हिम्मत मत हारना। कुछ ही पलों में तुम्हें हम बाहर निकाल लेंगे। भयंकर तबाही मचा देने वाले भूकंप ने जहां कई बलशाली तंदुरुस्त लोगों को एक ही झटके में मार डाला वहीं कई मासूम बच्चों और वृद्धों को खरोंच तक नहीं आयी। क्रेन, हथोड़े, कुदाल, फावड़े के साथ चेन वाली आरी, डिस्क कटर्स और सरिया काटने वाले औजारों के साथ इंसानी जिन्दगियों को बचाने में लगी रेस्क्यू टीम ने कांक्रीट स्लैब के नीचे बुरी तरह से दबी एक नवजात बच्ची को देखा तो देखती ही रह गई। यह कुदरत का आलौकिक चमत्कार ही था कि बच्ची अपनी मां की गर्भनाल से जुड़ी पूरी तरह से सुरक्षित जिन्दा थी और जन्म देने वाली मां की मौत हो चुकी थी। तय है कि मां ने कुछ घण्टे पहले ही बच्ची को जन्म दिया था। उस बच्ची को अपनी गोद में खिलाने के लिए परिवार का कोई सदस्य नहीं बचा था। बच्ची को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। भूकंप आने के 62 घण्टों बाद सात मंजिला इमारत के मलबे से एक बारह साल के बच्चे को किसी तरह से बाहर निकाला गया तो वह हंस रहा था। उस साहसी बच्चे को हाथ में लेते ही बचाव कर्मी उसे चूमते हुए अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाने लगे। भूकंप की भयावहता से रूबरू होने वाले एक शख्स ने पत्रकारों को आपबीती सुनायी कि मैंने भूकंप के बारे में सुना तो बहुत था, लेकिन इसे देखा और महसूसा पहली बार। जब हमारा अपार्टमेंट एकाएक हिलने लगा तब मैंने मान लिया था कि अब हमारे परिवार का बचना असंभव है। अपने-अपने कमरों में रह रहे सभी परिवार के सदस्यों को मैंने अपने पास बुलाया और कहा कि, अब जब हम सब मरने ही वाले हैं तो कम अज़ कम एक साथ एक ही कमरे में एक ही जगह क्यों न मरें। यह तो हमारी किस्मत अच्छी थी कि हम सब बच गए। जब भूकंप थमा तो मैं बाहर निकला। कई गगनचुंबी इमारतें जमीन पर धराशायी हो चुकी थीं। मलबे में दबे लोगों के रोने, कराहने की आवाजें आ रही थीं। रेस्क्यू टीमें बड़ी फुर्ती के साथ बचाव कार्य में लगी थीं। 

    अपने देश भारत में भी हमने भूकंपों और बादलों के फटने के बाद हुई तबाही को कई बार देखा और झेला है। हाल ही में देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में स्थित जोशीमठ में जमीन के धसने से लोगों को किस तरह से अपने घर-कारोबार को छोड़ने को मजबूर होना पड़ा, इससे भी हम सभी देशवासी खूब वाकिफ हैं। कई विनाश लीलाएं इंसानों की खुदगर्जी और अनदेखी का प्रतिफल रही हैं। भू-धंसाव का खतरा तो जोशीमठ पर 1970 से मंडराने लगा था। भू-वैज्ञानिकों ने भी कई बार चेताया था कि पहाड़ी जमीन पर धड़ाधड़ घरों, भवनों, होटलों का निर्माण तथा बेतहाशा खनन कार्य अंतत: जानलेवा साबित होगा। संभावित खतरों से वाकिफ होने के बावजूद भ्रष्टाचार और इंसानी लालच ने अपनी मनमानी जारी रखी और 2023 के आते-आते तक पहाड़ों पर स्थित जोशीमठ के घरों, होटलों और सड़कों की बेतहाशा दरारों ने हजारों लोगों को बेमन से बेघर होने को विवश कर दिया। सभी जगह बड़ी तेजी से जनसंख्या में इजाफा हो रहा है। लोगों के रहने के लिए छत तो चाहिए ही, लेकिन उन्हें बनाने, खड़ा करने में जिन सावधानियों की आवश्यकता है, उसकी तो अनदेखी नहीं होनी चाहिए। भारत वर्ष के महानगरों, नगरों में खड़ी की गईं अनेकों बहुमंजिला इमारतें भूकंप रोधी नहीं हैं। तुर्की और सीरिया में भूकंप ने ही हजारों लोगों को मौत की नींद ही नहीं सुलाया, वहां की विशाल इमारतों ने भी कई जानें ले लीं। ऐसा भी नहीं कि सभी इमारतें धराशायी हुई हों। कुछ बिल्डिंगें ऐसी भी रहीं, जिनका भूकंप बाल भी बांका नहीं कर पाया। वहां की सरकार ने उन सैकड़ों भवन निर्माताओं को हथकड़ियां पहनाकर जेल में सड़ने के लिए डाल दिया है, जिन्होंने बिल्डिंग की नींव और दीवारों की मजबूती की ओर ध्यान देने की बजाय सिर्फ अपनी तिजोरियों का वजन बढ़ाया। तुर्की में एक तरफ वैश्विक मदद से राहत एवं बचाव अभियान चलता रहा तो दूसरी तरफ बेईमानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी शुरू कर दी गई। ‘हिंदुस्तान में तो सब चलता है’ की परिपाटी चलती चली आ रही है। यहां शायद ही किसी बेईमान भवन निर्माता को जेल में डाला गया हो...।

Thursday, February 9, 2023

तेल देखो, तेल की धार देखो

    प्रवचनकार आसाराम का एक जमाने में गजब का नाम और दबदबा था। उसके प्रवचन सुनने के लिए लाखों की भीड़ जुटा करती थी। नेता, मंत्री, अभिनेता, समाजसेवक, धर्म प्रेमी... सभी उसके दरबार में नतमस्तक होने के लिए उत्सुक रहते थे। उसके प्रवचनों में मनुष्य को धैर्यवान तथा चरित्रवान बने रहने की सीखें दी जाती थीं। दूसरों की मां-बहनों का आदर-सम्मान करने का पाठ पढ़ाया जाता था। उनके बोलने, मटकने और नाचने-कूदने का अंदाज लोगों को लुभाता था। इसलिए दूर-दूर से भीड़ खिंची चली आती थी। नेता, अभिनेता, पत्रकार, संपादक, अखबार तथा न्यूज चैनल वाले उसके लिए आदरसूचक शब्दावली का इस्तेमाल कर गर्वित हुआ करते थे। तब देश और दुनिया के लाखों भक्तों के प्रिय रहे आसाराम को अभी हाल ही में बलात्कार के एक और केस में उम्रकैद की सजा होने पर उसके कट्टर अनुयायियों को भले ही एक और झटका लगा हो, लेकिन देश के लाखों आम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा। यह वही लोग हैं, जिन्हें यह ढोंगी इंसान नहीं भगवान लगता था। अपने कुकर्मों के कारण लोगों के मन और दिमाग से उतर चुका यह यौनाचारी किसी भी तरह की सहानुभूति का अधिकारी नहीं, क्योंकि इसने करोड़ों सीधे सच्चे अपने ही भक्तों, शिष्य-शिष्याओं की पवित्र आस्था और असीम भरोसे का कत्ल करने का अक्षम्य अपराध किया है। 

    इस व्याभिचारी के कारण देश के सच्चे साधु-संतों को भी शंका की निगाह से देखा जाने लगा है। 2018 में जोधपुर की अदालत में जिस 16 साल की नाबालिग लड़की की अस्मत लूटने की वजह से इसे उम्रकैद की सजा सुनायी गई थी, वह तथा उसका पूरा परिवार इस दुराचारी का अंधभक्त था। वासना के इस खिलाड़ी ने उनकी बेटी को रोग मुक्त करने का भरोसा दिलाया था और अपनी कुटिया के एकांत में जंगली जानवर की तरह टूट पड़ा था। लड़की के माता-पिता को जब अपने भगवान के शैतान होने की सच्चाई का पता चला तो एकबारगी तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ था। इस शर्मनाक घिनौने सच की तह तक पहुंचने के लिए उन्होंने उससे गहन पूछताछ की थी। उसके बाद ही उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। 

    अभी गुजरात के गांधीनगर की एक अदालत ने जिस महिला से बलात्कार करने के कारण इस बलात्कारी को उम्रकैद की सजा सुनायी है, वह भी इसकी परम आस्थावान शिष्या थी। उसने कभी कल्पना नहीं की होगी कि जिसे वह देवता मानती है, वह तो आदतन दुराचारी है। आसाराम के देशभर में फैले आश्रमों तथा प्रवचन कार्यक्रमों के मंचों पर एक से एक दिग्गज हाजिरी लगाते थे, इसलिए तो उसे यह भ्रम था कि कानून उसकी मुट्ठी में है। वह कितने भी दुराचार करता रहे, कोई उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं करेगा। इन अहंकार भरी मदमस्ती में वह लगातार अपने आश्रमों में एक तरफ भोग विलास करता रहा, तो दूसरी तरफ विभिन्न मंचों पर मायावी-प्रभावी प्रवचनों का जाल फेंक कर अपने भक्तों की संख्या बढ़ाता रहा। जब उसकी गिरफ्तारी हुई तो कई अंध भक्त उसके समर्थन में सड़कों पर उतर आये। उन्होंने जहां-तहां हंगामा बरपा किया कि हमारे पूज्यनीय बापू निर्दोष हैं। उन्हें किसी साजिश के चलते फंसाया गया है। वे किसी की बहन, बेटी और बहू पर गलत निगाह डाल ही नहीं सकते। 

    अभ्यस्त देहभोगी की शिकार हुई नारियों के परिजनों पर तरह-तरह के दबाव डाले गये। उन्हें डराया और धमकाया गया। कुछ की हत्या करने की कोशिश तो कुछ को मौत के मुंह में भी सुलाया गया। मुंह बंद रखने के लिए करोड़ों रुपये के प्रलोभन दिये गए। इस नकाबपोश नराधम को कभी कोई अपराधबोध भी नहीं हुआ! अगर हुआ होता तो भावी परिणाम के बारे में जरूर सोचता। अपनी वर्षों की तपस्या के बाद बनायी साख पर घोर कलंक नहीं लगने देता। इसमें नारी देह की अथाह भूख के साथ अपार धन की प्रबल लालसा भी भरी हुई थी। नारी जिस्मों पर गिद्ध की तरह झपट पड़ने वाले इस शैतान ने मर-मर कर अंधाधुंध पैसा कमाया, लेकिन वो भी इसके काम नहीं आया। चोर का माल चांडाल खा गये। स्वयंभू बाबा, ढोंगी धूर्त और पाखंडी प्रवचनकार आसाराम का बस चलता तो सारे जहान की धन-दौलत अपनी झोली में समेट लेता। आसाराम में चतुर और घाघ कारोबारी के सभी गुण-दुर्गुण विद्यमान रहे हैं। उसका जिस शहर में भी प्रवचन तथा तथाकथित सत्संग का कार्यक्रम होता था, वहां पर भव्य मंच और विशालतम पंडाल अहमदाबाद से लाकर खड़ा किया जाता था। आसाराम अपने नाम का डंका बजवाने के लिए अपनी तस्वीरों वाले बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर, स्टीकर, कैलेंडर अपने ही कारखाने में बनवाता था। च्यवनप्राश, यौन उत्तेजक दवाओं, चूर्ण, चाय, साबुन, बिस्किट, पेन, आडियो-वीडियो कैसेट, घड़ियों, चाबी के छल्लों आदि को खपाने के लिए अपना पूरा प्रचार तंत्र लगा देता था। खुद को महान संत दर्शाने के लिए ‘ऋषि प्रसाद’, ‘दरवेश दर्शन’, -लोक कल्याण सेतु’ आदि पत्र-पत्रिकाओं को लाखों की संख्या में छपवा और बिकवा कर रातों-रात करोड़ों की कमायी कर लेता था। दरअसल, आसाराम आम भोले-भाले लोगों को अंधविश्वासी बनाने और उनकी हर कमजोरी का फायदा उठाने की सभी धूर्त कलाओं में जन्मजात पारंगत रहा है। इस असंत ने चंद वर्षों में अरबों-खरबों की दौलत जुटायी। दुष्ट सौदागर आसाराम के पास जब धन को अपने पास रखने की जगह नहीं बची तो उसने विभिन्न नगरों-महानगरों में रहने वाले अपने खास शिष्यों के द्वारा उस धन को ब्याज पर चलवाना प्रारंभ कर दिया। उसके यह चेले-चपाटे उस रकम को मोटे ब्याज पर चलाकर खुद भी मालामाल होते रहे और अपने ‘लालची आका’ की तिजोरी का भी वजन बढ़ाते रहे। कुकर्मी आसाराम और उसके बेटे नारायण के जेल में जाने के बाद उस सारी की सारी काली धन दौलत पर उन्हीं चेले-चपाटों का हमेशा-हमेशा के लिए कब्जा हो गया। उम्रकैद के बाद तो उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि उनके पास अमानत के तौर पर रखवायी गयी अपार माया को अब कोई भी वापस नहीं मांगने वाला। दोनों यौन रोगी जेल में ही मर-खप जाने वाले हैं। दिल्ली, पुणे, इन्दौर, अहमदाबाद, सूरत, मुंबई, नागपुर, पानीपत, कटनी जैसे नगरों-महानगरों में रहने वाले जिन चेलों के पास आसाराम एंड कंपनी की काली दौलत जमा थी वे अंदर ही अंदर बहुत खुश हैं। वे भी यही चाहते हैं कि बाप-बेटा कैद में ही परलोक सिधार जाएं। अपने ‘बापू’ के धन से इन्होंने बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर ली हैं। विशाल फार्म हाऊस के साथ कारों की कतारें भी लग गई हैं। इनकी शान-शौकत देखते बनती है। ‘चोर का माल खाए चांडाल’ कहावत को चरितार्थ कर दिखाने की इनकी हिम्मत, ‘प्रताप’ और मक्कारी का लोहा शहरवासी भी मानने लगे हैं।

Thursday, February 2, 2023

पुरुष-सत्ता

      रविवार की सुबह मॉर्निंग वॉक कर घर लौट रहा था। वॉक पर निकलने से पहले ही मैंने अंजली से मिलने का मन बना लिया था। लगभग आठ बजे जैसे ही अंजली के किराये के घर के सामने पहुंचा तो वहां आठ-दस लोगों की भीड़ लगी थी। अंजली भीड़ के बीच अपराधी की तरह चुपचाप सिर झुकाये खड़ी थी। अंजली का मकान मालिक जोर-जोर से चिल्लाते हुए कह रहा था, ‘‘मैं तो पहले से ही तुम्हें किराये पर रखने को तैयार नहीं था। तुमने मिन्नते कीं, एक-दो इज्जतदारों से सिफारिश करवायी, तो मैंने तुम्हें अच्छी और नेक औरत समझकर हां कर दी, लेकिन मैंने तुम्हें तभी वार्निंग दे दी थी कि रात को ज्यादा देरी से आना बिलकुल नहीं चलेगा। शुरू-शुरू में तो तुम रात को दस-साढ़े दस बजे तक बाहर से लौट आया करती थीं, लेकिन अब कई दिनों से रात-रात भर गायब रहती हो। किस्म-किस्म के पुरुषों का भी तुम्हारे कमरे में आना-जाना लगा रहता है। तुम्हारी वजह से हमें आसपास के लोग कितना कुछ सुनाते रहते हैं। कुछ लोगों के मुंह से तुम्हारी बदचलनी के किस्से भी सुनने में आये हैं। लगता है, तभी तुम्हारे शरीफ पति ने हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें घर से बाहर कर चैन की सांस ली है। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी देखा-देखी मेरी जवान बेटी भी हमारे हाथ से निकल जाए।’’ 

    ‘‘अंकल आप जो सोच रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं। अखबार में साथ काम करने वाली सहेली के अनुरोध पर उसके यहां एक-दो बार रात को ठहरना पड़ा, लेकिन अब आगे से आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगी।’’ 

    ‘‘तुम्हारे लाख हाथ जोड़ने पर भी मैं नहीं पिघलने वाला। यहां अब ज्यादा तमाशा न करते हुए अपना सामान उठाओ और तुरंत चलती बनो।’’ 

    मकान मालिक को मेरा समझाना भी बेअसर रहा। हां, उसने अंजली को शाम तक की मोहलत जरूर दे दी। शहर के दैनिक समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत रहने के साथ-साथ अंजली एक अच्छी कहानीकार तथा कवयित्री भी है। उसे कवि सम्मेलनों के मंचों पर छा जाने का भी खूब हुनर हासिल है। कभी-कभार दूसरे शहरों में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में बड़े मान-सम्मान के साथ आमंत्रित होती रहती है। अंजली ने शहर के नामी कॉलेज के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर से लव मैरीज की थी। दोनों एक दूसरे को कॉलेज के जमाने से जानते थे। शादी के कुछ महीनों के बाद अंजली को पति के माता-पिता से बड़ी परेशानी होने लगी। पहले तो उन्हें अपनी बहू का मंचीय कवयित्री होना पसंद नहीं था। उसकी लोकप्रियता और मिलनसारिता की वजह से जब देखो तब कवि, लेखक, पत्रकार और प्रशंसक उससे मिलने के लिए घर आ टपकते थे और सास और ननद को उनकी मेहमान नवाजी करनी पड़ती थी। अंजली का सभी से खुलकर हंस बोल लेना भी उन्हें शूल की तरह चुभता था। शादी के तीन-चार वर्ष बीतते-बीतते उस पर बच्चा पैदा करने का दबाव भी बनाया जाने लगा। सास-ससुर पोते के सुख से वंचित रहने की वजह से बेचैन हो चुके थे। उधर अंजली ने सात फेरे लेने से पहले ही अपने पति देव को बता दिया था कि पत्रकारिता और साहित्य में अच्छी तरह से स्थापित होने के पश्चात ही वह फैमिली के बारे में सोचेगी। तब पति महोदय ने भी कोई ऐतराज नहीं जताया था। बस मुस्करा कर रह गए थे। हद तो तब हो गई जब उनके करीबी रिश्तेदार भी सवाल दागने लगे कि आखिर वह बच्चा कब पैदा करेगी? अंजली के लिए सबसे ज्यादा आहत करने वाली बात थी अपने बुद्धिजीवी पति देव का पूरी तरह से चुप्पी साधे रहना। कई बार अंजली का मन होता कि वह सभी को मुंहतोड़ जवाब दे, लेकिन...! 

    जब अंजली को लगा कि उसके लिए दकियानूसी और रूढ़िवादी रिश्ते को और निभा पाना संभव नहीं तो उसने हमेशा-हमेशा के लिए पति के घर को ही त्याग दिया। कुछ शुभचिंतकों ने अंजली के इस निर्णय को उसकी नासमझी कहा तो कुछ ने हद दर्जे की बेवकूफी। उसे अकेली औरतों पर मंडराने वाले खतरों के कई किस्से सुनाकर डराया भी गया, लेकिन अंजली अपने निर्णय पर अडिग रही। अखबारी नौकरी से उसे इतनी तनख्वाह तो मिल ही रही थी, जिससे उसके रहने और जीने-खाने पर किसी संकट का कोई खतरा नहीं था। पति का घर छोड़ने के पश्चात बड़ी मुश्किल से उसे रहने के लिए यह किराए का कमरा मिला था। उसे नहीं पता था कि उसका आजादी पसंद तथा खुले दिल-दिमाग का होना नयी आफत का कारण बन जाएगा। जिस शहर में वह जन्मी वहीं उसे किराए के छोटे से कमरे के लिए कितनी ठोकरें खानी पड़ीं। जहां भी जाती कहा जाता कि अकेली औरत के लिए घर खाली नहीं है। 

    इस घर के मालिक ने भी बड़ी मुश्किल से इस शर्त पर मनमाने किराए पर कमरा रहने को दिया था कि 9 से 10 बजे तक ही घर से बाहर रह सकती हो। किसी भी पुरुष को उसके कमरे में आता देखा गया तो अच्छा नहीं होगा। तुरंत कमरा खाली करवा लिया जाएगा। कुछ पत्रकार तथा साहित्यकार मित्रों के अलावा मकान मालिक की बीए पास लड़की यदा-कदा उससे मिलने आ जाती थी। उसकी साहित्य और पत्रकारिता में खासी अभिरुचि है। पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण की अभिलाषी इस महत्वाकांक्षी लड़की से अंजली को इधर-उधर की बातें करने में बहुत अच्छा लगता था। एक शाम लड़की ने उसे यह बताकर चौंकाया था कि वह अपनी एक खास सहेली से बेइंतहा प्यार करती है। दोनों की शीघ्र ही हमेशा-हमेशा के लिए एक साथ रहने की पक्की तैयारी है। इस बात का पिता को तो नहीं, मां को जरूर पता है। मां अक्सर उसे चेताती भी है कि वह इस अप्राकृतिक रिश्ते से फौरन बाज आए नहीं तो पिता को बताकर तूफान बरपा करवा देगी। गुस्सैल पिता उसकी ऐसी दुर्गति करेंगे, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की होगी। जब लड़की की मां ने देखा कि उसकी बेटी घण्टों उस किराएदार महिला के साथ कमरे में बंद रहती है, जो अपने पति से अलग हो चुकी है तो उसने अपने पति के कान भरने शुरू कर दिए। संकीर्ण सोचवाले मकान मालिक को अंजली को अपने घर से खदेड़ने का सटीक बहाना मिल गया।

    अंजली के नये ठिकाने की व्यवस्था कर दोपहर को जब मैं घर लौटा तो पुरुष सत्ता का परचम लहराती यह खबर जैसे मेरा ही इंतजार कर रही थी... कब्र में पैर लटकाये एक 70 वर्षीय वृद्ध ने 28 वर्ष की लड़की से विवाह कर लिया है। यह लड़की और कोई नहीं उसकी ही विधवा बहू है। उसका पति चार साल पहले गुजर गया था। कालांतर में दो-तीन अच्छे-भले युवकों ने लड़की से शादी करने की इच्छा जतायी थी, लेकिन ससुर महाराज ने उन्हें नजरअंदाज कर खुद ही मंदिर में ले जाकर अपने मृतक बेटे की पत्नी से विवाह कर लिया। अब यह बताने की जरूरत तो नहीं कि ससुर बहू के लिए पिता की तरह होता है, लेकिन इसे तो अपने बेटे का भी ख्याल नहीं आया, जो इस लड़की को कभी बड़े अरमानों के साथ ब्याह कर अपने घर लाया था। इस लड़की को तो हर किसी से सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए था, लेकिन इस देह के भूखे ससुर ने बहू से शादी कर पवित्र रिश्ते को कलंकित करने के साथ-साथ शर्मिंदा भी कर दिया। उसकी पत्नी बारह साल पहले दिवंगत हो गई थी। उसकी देखरेख की कमी को बहू पूरा कर सकती थी। बेटियां अपने मां-बाप की सेवा करती ही हैं। वह उसका किसी बेघर युवक से ब्याह करवाने के बाद दोनों को अपने घर में रखकर एक अच्छा प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत  कर देता तो लोग नतमस्तक हो जाते। थू...थू, तो नहीं होती। नेक नीयत वाला होता तो बहू के साथ सात फेरे लेने की बजाय उसे अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाकर अपना कद भी बढ़ा सकता था, लेकिन उसके अंदर दुबक कर बैठी लूली-लंगड़ी, अंधी वासना ने उसे विवेकशुन्य कर उसके चेहरे पर कालिख ही पोत दी।