Thursday, August 17, 2023

पाठशाला

    हमारी इसी दुनिया में तरह-तरह के लोग हैं। कुदरत का नियम है जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। कांटे बोने पर फूल कभी नहीं मिलते। इसी तरह से जीवन को जीने के भी नियम-कायदे हैं। तौर-तरीके हैं। कुछ लोग जीवन को खेल समझते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि हर खेल के भी कुछ उसूल होते हैं। अनुशासन होता है। लापरवाही से खेलने वालों को मैदान से बाहर होने में देरी नहीं लगती। सावधानी और दूरदर्शिता की डोर से बंधे खिलाड़ी खुद तो विजयी होते ही हैं दूसरों को भी प्रेरणा देते हैं। नागपुर की निवासी पद्मादेवी सुराना ने कुछ ही दिन पूर्व अपना 103वां जन्मदिन मनाया। आज के दौर में जब कई लोग जीना ही भूल चुके हैं, कई तरह की बीमारियां और चुनौतियां उन्हें डराती रहती हैं, तब इतनी उम्रदराज महिला का यह कहना है कि, ‘अभी तो मेरी और जीने की तमन्ना है। उम्र तो महज एक नंबर है।’ आश्चर्यचकित करने के साथ-साथ उनके प्रति मान-सम्मान की भावना को जगाता है। 4 अगस्त 1920 में जन्मी पद्मादेवी सुराना बचपन से ही अपने रहन-सहन, खान-पान को लेकर अनुशासित रही हैं। छठी कक्षा तक पढ़ीं पद्मा हिंदी और मराठी के साथ अंग्रेजी में भी दक्ष हैं। 103 वर्ष की होने के बावजूद युवाओं की तरह साफ शब्दों में बातचीत करती हैं। वे बच्चों को हमेशा प्रेरित करती रहती हैं कि पहले पढ़ाई करो, फिर मेहनत और ईमानदारी से पैसा कमाओ। जिन्दगी को पूरे मन और ठाठ-बाट के साथ जीने वाले ऐसे सभी योद्धा किसी पाठशाला से कम नहीं। इस पाठशाला के गुरू को कोई दक्षिणा नहीं देनी पड़ती। जितना चाहो, उतना ले लो। ऐसे जीवंत प्रेरणा स्त्रोतों के होने के बावजूद भी कुछ लोग जीवन का मोल नहीं समझ पाते। दुनियादारी की मुश्किलें उनके होश उड़ा देती हैं और वे खुद के लिए बाधा बन जाते हैं। अभी हाल ही में देवदास, जोधा अकबर, लगान जैसी पचासों फिल्मों के लिए बड़े-बड़े सेट डिजाइन करने तथा कई फिल्मों में सशक्त अभिनय करने वाले विख्यात कलाकार नितिन देसाई ने खुदकुशी कर अपने असंख्य चाहने वालो को चौंका और रूला दिया। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें अंतिम विदायी देने, श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित हुए विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों को देखकर उनकी लोकप्रियता का पता चल रहा था। परिचितों के साथ-साथ बेगानों को भी गमगीन करने वाली इस खुदकुशी ने फिर कई सवाल खड़े कर दिये, वहीं परिवारजनों को तो जीते जी ही मार डाला। सभी उनसे बेहद प्यार करते थे। बच्चों को अपने पिता पर नाज़ था। उन्होंने कल्पना नहीं की थी कि बेतहाशा कर्ज उनको मरने पर विवश कर देगा। बड़ी मेहनत से खड़े किये स्टुडियो के छिन जाने का भय उनकी जान ले लेगा। वे तो अपने जन्मदाता को लड़ाकू समझते थे, जिसने कई चुनौतियों का डट कर सामना किया था। उनका देश और दुनिया में नाम था। भारत सरकार भी उन्हें पुरस्कृत कर चुकी थी। महाराष्ट्र सरकार ने भी उनकी कला की प्रशंसा करते हुए कई बार सम्मानित किया था। मायानगरी के सभी फिल्म निर्माता, अभिनेता, अभिनेत्रियां उनके कद्रदान थे। ऐसी नामी-गिरामी शख्सियत की खुदकुशी पर उनकी पुत्री को मीडिया से हाथ जोड़कर अनुरोध करना पड़ा कि कृपया मेरे पिताजी की मौत का तमाशा ना बनाएं। 

    सच तो यह है कि इस देश में और भी कई व्यापारी, उद्योगपति, बड़े-बड़े कारोबारी हैं, जिनपर अरबों-खरबों का कर्ज है, लेकिन उन्होंने तो ऐसी कायराना राह पकड़कर अपना तमाशा नहीं बनाया। उनके जीवन का बस यही मूलमंत्र हैं, ‘जान है तो जहान है’। जब तक जिन्दा हैं तब तक हार नहीं मानेंगे। एक बार गिर गये तो क्या हुआ। फिर उठ खड़े होंगे। बैंकों तथा साहूकारों का कर्जा भी उतर जाएगा। संपत्तियां भी फिर से खड़ी हो जाएंगी। अपने अथाह परिश्रम और सूझबूझ की बदौलत उद्योगजगत में अचंभित करने वाली बुलंदियां हासिल करने वाले धीरूभाई अंबानी के दिवंगत होने के बाद उनके दोनों पुत्रों में अनबन के चलते बंटवारा हो गया था। बड़े भाई मुकेश और छोटे भाई अनिल के हिस्से में लगभग बराबर धन-दौलत, व्यापार और संपत्ति आयी, लेकिन कालांतर में मुकेश सफलता की अनंत ऊंचाइयों तक जा पहुंचे और अनिल अपने गलत निर्णयों के कारण लगातार घाटे के गर्त में समाते गये। बैंकों ने उनकी कई बड़ी-बड़ी सम्पत्तियां जब्त कर लीं। बदनामी भी कम नहीं हुई, लेकिन अनिल फिर भी अपना सफर इस उम्मीद के साथ जारी रखे हुए हैं कि आज नहीं तो कल बुरा वक्त जरूर बीतेगा। अच्छे हालातों की खुशियों तथा बुरे हालातों के गमों को सहना ही पड़ता है। यही जीवन की जगजाहिर रीत है।

    फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, जिन्हें आज सदी का महानायक कहा जाता है, उनके करोड़ों प्रशंसक हैं। अस्सी वर्ष से ऊपर के होने के बावजूद मेहनत तथा भागदौड़ करने में युवाओं को मात दे रहे हैं। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए उन्हीं की शरण में जाती हैं। इन्हीं अमिताभ पर कभी विपत्तियों का पहाड़ टूटा था। वर्षों तक फिल्मों में अभिनय कर कमाया धन उनकी ही बनायी एबीसीएल कंपनी ने छीनकर उन्हें कंगाल बना दिया था। आर्थिक हालात इतने बदतर हो गये थे कि उन्हें कोई राह नहीं सूझ रही थी। जो फिल्म निर्माता कभी उन्हें अपनी फिल्मों में लेने के लिए तरसते थे, वही उन्हें अब दुत्कारने लगे थे। ऐसे भयावह, चिन्ताजनक दौर में अमिताभ को बस अच्छे वक्त का इंतजार था। उन्होंने हार मानने की बजाय चुनौतियों का मुकाबला करते हुए नई राह चुनी। उनके शुभचिंतकों ने उन्हें बार-बार समझाया कि टेलीविजन उनके लिए नहीं है। वे तो बड़े पर्दे के लिए जन्मे हैं, लेकिन अमिताभ ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से नई धमाकेदार शुरुआत कर जो इतिहास रचा वो हम सबके सामने है। यदि अमिताभ थक-हार कर के बैठे रहते या कोई गलत कदम उठा लेते तो क्या उन्हें यह सुखद दिन देखने को मिलते? उन्हें अकल्पनीय सफलता का स्वाद चखने को मिलता? अपनी दूसरी सफलतम पारी में अमिताभ को जब अभूतपूर्व ऊंचाइयां मिलीं तभी उन्हें सदी के महानायक का ‘तमगा’ मिला। उससे पहले तो लोगों ने उन्हें भूला ही दिया था। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कार्यक्रम उन्हीं की वाकपटुता की बदौलत पिछले 23 वर्षों से दर्शकों की पहली पसंद बना हुआ है।

Thursday, August 10, 2023

धर्म

चित्र 1 - मेरे मन में अधिकांश माता-पिता को लेकर अक्सर विचार आता है कि विधाता ने उन्हें जिस मिट्टी से बनाया है वो यकीनन आखिर तक अपनी मजबूती नहीं खोती। चट्टानों की तरह मजबूत बन अपनी औलादों के लिए मर मिटने को तत्पर रहती है, लेकिन वहीं अनेकों संतानें सब कुछ पा लेने के बाद अहसान फरामोश क्यों हो जाती हैं? उनका खून पानी क्यों हो जाता है? अपनों के पराये होने के कटु सच से मैं जब-जब रूबरू होता हूं तो यह भी सोचता हूं अपने बच्चों के घातक रंग-ढंग को देखने के बाद भी मां-बाप के होश ठिकाने क्यों नहीं आते? वो उन्हीं राहों पर क्यों चलते रहना चाहते हैं, जिन पर अपनों ने ही कांटे बिछाये। यवतमाल में लावारिस हालत में मिले एक 72 वर्षीय शख्स को नागपुर के मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए लाया गया। जांच में पता चला कि उसे अंतिम चरण का मुख कैंसर है। उसका अब बचना मुमकिन नहीं। सामाजिक कार्यकर्ता इंद्राणी पवार ने उन्हें मेडिकल कॉलेज के निकट स्थित विख्यात सेवाभावी संस्था, ‘स्नेहांचल’ पहुंचा दिया। शहर के परोपकारी जनसेवियों के द्वारा चलाये जा रहे स्नेहांचल में उन मरीजों की देखरेख और सेवा की जाती है, जिनका बचना लगभग मुश्किल होता है। यहां पर वो बेसहारा भी आश्रय पाते हैं, जिनके अपने उन्हें मरने के लिए छोड़ देते हैं। यवतमाल में भिखारी की हालत में मिले कैंसर पीड़ित बुजुर्ग के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। पत्नी भी जीवित है। चल फिर सकती है। मरने से पहले उसने अपने सभी से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। परिवार के सभी सदस्यों को खबर भेजी गई। एक बार आकर मिल लो। किसी का भी दिल नहीं पसीजा। यहां तक कि उनकी मृत देह लेने से भी मना कर दिया गया। अंतत: समाजसेवकों ने ही उनका विधिवत दाह संस्कार कर मानवता का धर्म निभाया। 

चित्र 2 - शहर में कई ऐसे कपूत हैं, जो अपने वृद्ध मां-बाप का तिरस्कार कर अपनी ही मौजमस्ती की दुनिया में खोये हैं। जिन माता-पिता ने खून-पसीना बहाकर उनका पालन-पोषण किया, पढ़ाया-लिखाया और कमाने लायक बनाया, उन्हीं को पेट भर खाने के लिए तरसा रहे हैं। उन्हें धक्के मारकर उन्हीं के घर से बाहर खदेड़ रहे हैं। जब तक वे कमा कर खिला रहे थे तब तक अच्छे थे। अब फालतू का सामान लगने लगे हैं। तेजी से विकास पथ पर दौड़ते शहर में वरिष्ठ नागरिकों की ऐसी अनेक शिकायतों का अंबार लगा है। बहू-बेटों, बेटियों के साथ-साथ नाती-पोतों के द्वारा उनके जीवन को नर्क बनाये जाने की खबरों से अखबार भरे नजर आते हैं। अपने उम्रदराज जन्मदाताओं को दाने-दाने के लिए तरसाने वाली शैतान औलादें उन्हें मारने-पीटने से भी नहीं सकुचा रही हैं। जिन बुजुर्गों के पास अपनी जमा पूंजी है, सरकारी पेंशन मिल रही है उनके हालात तो कुछ ठीक-ठाक हैं, लेकिन जिन्होंने इनकी परवरिश में सब कुछ लुटा दिया, उन्हें भिखारी बनाकर रख दिया गया है। जगमगाते शहर में ऐसे कई विजयपत सिंघानिया हैं, जिन्होंने पुत्रमोह के वशीभूत होकर अपने जीते जी अपना तमाम कारोबार और जमीन जायदाद पुत्रों के नाम कर दी और अब लोगों को अपनी व्यथा-कथा सुनाते भटक रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों की शिकायतों और समस्याओं के निवारण के लिए केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय के द्वारा प्रारंभ की गई हेल्पलाइन में पिछले कुछ महीनों से घर, परिवार में अपनों के द्वारा तरह-तरह से प्रताड़ित किये जाने वाले बुजुर्गों की तादाद में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहर में माता-पिता, दादा, दादी आदि पर बेतहाशा जुल्म ढाने के मामले सतत सामने आ रहे हैं। यह भी सच है बुढ़ापे के हाथों मिली लाचारी के चलते सभी हेल्पलाइन पर अपना दुखड़ा सुनाने नहीं आ पाते। लोग क्या कहेंगे यह चिंता भी उनके कदम रोक देती है। उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी मंजूर हैं, लेकिन अपनी नालायक औलादों को बेनकाब करना मंजूर नहीं।

चित्र 3 - सरकारी नौकरी से रिटायर हुए अशोक वर्मा और उनकी पत्नी को तब बहुत तीखा झटका लगा जब उनके दोनों बेटों ने फोन उठाना ही बंद कर दिया। इस स्वस्थ बुजुर्ग दंपत्ति को मोटी पेंशन मिलती है। दोनों ने अपने बेटों की अच्छी तरह से परवरिश करने में कोई कमी नहीं की थी। उन्हें उच्च शिक्षा दिलवाने के लिए नामी-गिरामी कॉलेजों को चुना। लाखों रुपये का डोनेशन देने में पीछे नहीं रहे। बड़ा बेटा अमेरिका में डॉक्टर है। छोटा सिंगापुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट है। दोनों की शादी में भी उन्होंने शाही खर्चा किया। अपने पैरों पर खड़े होने के कुछ वर्षों बाद ही बेटों ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। पहले तो इस दंपत्ति का इस ओर ध्यान नहीं गया, लेकिन जब बेटों-बहुओं ने अपमानजनक तरीके से उन्हें नजरअंदाज करना प्रारंभ कर दिया तो उनको सच का अहसास हो गया। श्रीमती वर्मा के लिए तो बच्चों का अभद्र व्यवहार असहनीय होता चला गया। वर्मा जी उन्हें समझाते हुए कहते, उनकी अपनी दुनिया है। उन्हें उससे जब फुर्सत नहीं तो तुम क्यों दुखी होती हो। वर्मा जी के छोटे भाई की पत्नी के देहावसान की खबर भिजवाये जाने के बावजूद बहू-बेटे नहीं आए तो वर्मा जी ने अपना मन पक्का कर लिया। ऐसी निर्मोही लापरवाह औलाद की ऐसी की तैसी। जब उन्हें हमारी फिक्र नहीं तो हम क्यों उन्हें याद करें। दोनों  अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों में मस्त रहने लगे। 

अभी हाल ही में वर्मा परिवार के पड़ोस में रहने वाले एक सत्तर वर्षीय वृद्ध पिता पर उनके बेटे-बहू ने हाथ उठा दिया, तो वर्मा जी तुरंत पड़ोसी के घर जा पहुंचे और पिता पर हाथ उठाने वाले शैतान बेटे की वो धुनाई की, कि भीड़ जमा हो गयी। पड़ोसियों ने वर्मा जी को यदि रोका नहीं होता तो वे उसको अधमरा करके ही दम लेते। वर्मा जी की पत्नी ने इससे पहले कभी उन्हें इतने गुस्से में नहीं देखा था। पड़ोसियों के लिए भी स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। श्रीमती के बहुत कुरेदने पर वर्मा जी ने अपने दिल की बात इन शब्दों में कही, ‘‘मैं इन अहसान फरामोश बेटे-बहू को बहुत दिनों से अपने माता-पिता को प्रताड़ित करते देखता चला आ रहा था। पहले भी यह दोनों बाप की पिटायी कर चुके हैं, जिसने बेटे के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। इस नालायक ने अपने नेक पिता पर हाथ उठाने से पहले उनके त्याग के बारे में जरा भी नहीं सोचा। इसकी बीवी भी कितनी टुच्ची है जो पति को रोकने-समझाने की बजाय दरिंदगी पर उतर आयी। यह दोनों तो अपने बुजुर्ग माता-पिता को धक्के मारकर घर से बाहर कर देना चाहते हैं, लेकिन मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूंगा। यह आजकल की बदतमीज नालायक औलादें कितनी खुदगर्ज हो गई हैं! जिन्होंने कभी उंगली पकड़कर चलना सिखाया उन्हीं को अपाहिज बनाने पर आमादा हैं। इन दुष्टों को यह भी याद नहीं कि जिन मां-बाप को आज रोने-बिलखने के लिए विवश कर रहे हो उन्हीं ने तुम्हें अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाया। आज जब वे उम्र की उस दहलीज पर हैं, जहां उन्हें तुम्हारे साथ और सहारे की जरूरत है, तब उन्हें अन्न के एक-एक दाने के लिए तरसा रहे हो। उन्हीं के बनाये घर को छीन कर उन्हें बेघर करने का अक्षम्य पाप करने की दुष्टता पर उतर आये हो? यह दरिंदगी मुझसे तो नहीं देखी जाती। मैंने निश्चय कर लिया है कि किसी भी असहाय माता-पिता के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। अपने आसपास किसी भी नमकहराम को अपने जन्मदाता पर जुल्म ढाते देखूंगा तो शांत नहीं बैठूंगा। पहले प्यार से... फिर दूसरे तरीके से उसके होश ठिकाने लगाकर ही दम लूंगा। जब तक मेरे हाथ पैर में दम रहेगा तब तक अपने इंसान होने के धर्म को निभाने में पीछे नहीं रहूंगा।

Thursday, August 3, 2023

तमाशा...!

    यह खबरें अब गुस्सा दिलाने लगी हैं। जहां आदतन दुराचारियों पर क्रोध आता है, वहीं इनका शिकार होने वाली महिलाओं से भी अब पहले-सी सहानुभूति नहीं होती। जैसे अस्मत के लुटेरे कसूरवार हैं, वैसे ही यह भी दोषी हैं। नागपुर में एक युवक से शारीरिक संबंध की वजह से सोलह वर्षीय छात्रा गर्भवती हो गई। दोनों की पहले से जान-पहचान थी। युवक ने उसे शहर से दूर कहीं घुमाने का प्रलोभन दिया तो छात्रा फौरन तैयार हो गई। घूमते-घुमाते शारीरिक संबंध बन गए। फिर सिलसिला चल पड़ा। कुछ हफ्तों के बाद अचानक छात्रा के पेट में दर्द हुआ तो मां ने डॉक्टर के पास ले जाकर जांच करवायी तो बेटी के गर्भवती होने का पता चला। छात्रा ने खुद को भोली-भाली प्रदर्शित करते हुए कहा कि उसने शादी का वादा किया था। उसे ज़रा भी अंदेशा नहीं था कि उसकी नीयत में खोट है। 

    महाराष्ट्र के ही सुसंस्कृत कहे जाने वाले शहर पुणे में कर्जदार की पत्नी बलात्कार की शिकार हो गई। पीड़ित महिला के पति ने साहूकार से कर्ज ले रखा था। जब कर्ज का निर्धारित समय पर भुगतान नहीं हुआ तो साहूकार ने पहले तो उसके पति को धमकाया और फिर बाद में पति की ही मौजूदगी में बलात्कार कर अपना सीना चौड़ा करने के साथ-साथ बलात्कार के अश्लील दृष्यों को अपने मोबाइल में भी कैद कर लिया। दरिंदे, बेखौफ बलात्कारी ने बाद में वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कानून को भी चुनौती दे दी कि, जो करना है, कर लो। मैंने तो अपनी मनमानी कर ली। कर्जदाता को सबक सिखा दिया और अपनी हवस की आग भी बुझा ली। इसी तरह से नागपुर के निकट स्थित एक ग्राम में एक चचेरे भाई ने अपनी बहन को गर्भवती बना कर रिश्तेदारी का कर्ज वसूल लिया। मां को जब अपनी नाबालिग बेटी के गर्भधारण करने का पता चला तो उसके पैरोंतले जमीन ही खिसक गई। ऐसी कितनी खबरें हैं, जो इंसान के हैवान बनने का जीवंत दस्तावेज हैं। यह शर्मनाक हकीकत तो किसी से छिपी नहीं कि अपनी मनमानी करने वाले बेरहम पुरुष महिलाओं के मुख से हमेशा हां ही सुनना चाहते हैं। ना सुनना उन्हें कतई गवारा नहीं। काम वासना के दलदल में डूबे पुरुषों के आतंक, अहंकार, व्याभिचार का सबसे आसान शिकार बन रही हैं नारियां। इनमें भोली-भाली नाबालिग लड़कियों का भी समावेश है। राजधानी दिल्ली में अभी हाल ही में पॉश इलाके मालवीय नगर में पच्चीस वर्षीय कॉलेज की एक छात्रा का दिनदहाड़े कत्ल कर दिया गया। कातिल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह उस युवती को दिलोजान से चाहता था। उसने उससे शादी करने का भी मन बना लिया था, लेकिन उसके परिवार ने मना कर दिया। इसके बाद युवती भी उससे मिलने से कतराने लगी थी। युवती के इनकार ने उसे बहुत चोट पहुंचायी। उसकी रातों की नींद उड़ गयी। इसी गुस्से और निराशा में उसने लोहे की रॉड से उसकी हत्या कर दी। ऐसी हत्याओं के बारे में पढ़ने और सुनने के बाद अधिकांश लोगों ने भले ही अपनी प्रतिक्रिया देनी बंद कर दी है, लेकिन बदमाशों से परेशान औरतों के सब्र का बांध टूटने लगा है। उनका कानून पर भी भरोसा नहीं रहा। अब महिलाएं अपराधी को सबक सिखाने के लिए अपने तरीके अपनाने लगी हैं। कुछ वर्ष पूर्व नागपुर में पचासों महिलाओं ने मिलकर अक्कु नामक गुंडे की भरी अदालत में हत्या कर दी थी और कानून अवाक देखता रह गया था। उसके बाद भी संतरानगरी की हैरान-परेशान महिलाओं ने एकजुट होकर कुछ बदमाशों को अपने-अपने अंदाज में टपका कर दूसरे हवस के भूखों की नींद उड़ायी और उन्हें चेताया कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ...। अभी हाल ही में नागपुर के निकट स्थित बेला थाने के चिखलापार में सुनील नामक गुंडे को महिलाओं ने मार गिराया। आती-जाती महिलाओं के साथ अश्लील हरकतें करने वाला यह नशेड़ी बदमाश अक्कु की तरह किसी के भी घर में घुस जाता था और परिवार की लड़कियों तथा महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने पर उतर आता था। विरोध करने पर घर में रखे सामान की तोड़-फोड़ कर दहशत फैलाने लगता था। उसके खिलाफ की जाने वाली शिकायतों पर खाकी वर्दी वाले भी ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। बेखौफ हाथ में चाकू लेकर घूमने वाले सुनील से मुक्ति पाने के लिए महिलाओं ने अंतत: वही रास्ता चुना, जो अक्कु ‘कांड’ के लिए आजमाया था। बेकाबू गुंडे की हत्या कर महिलाओं ने गलत किया या सही यह आप तय करें। मैं यह लिखकर छुटकारा नहीं पाना चाहता कि किसी की हत्या करना अक्षम्य अपराध है। उन गुनहगारों और गुनाहों का क्या जो कड़े कानूनों को अपनी जूती से रौंदते चले आ रहे हैं, जिनकी वजह से देश की मासूम बच्चियां तक बलात्कारों से लहुलूहान हो रही हैं। एक सवाल और भी कि हमारी और आपकी चुप्पी कहीं न कहीं दुराचारियों और भावी बलात्कारियों का मनोबल तो नहीं बढ़ा रही? इंटरनेट के इस जमाने में तो हम कितने बेरहम हो गये हैं, उसकी साक्षी है कल के अखबार में छपी यह खबर : ‘दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में एक महिला अपने फ्लैट की बालकनी पर खड़ी थी इसी दौरान वो बिजली के हाईटेंशन तार की चपेट में आ गई। करंट लगते ही महिला के शरीर में आग लग गई। महिला जलती रही, लेकिन लोग उसे बचाने की बजाय बस धड़ाधड़ वीडियो बनाते रहे।’ जहां जीते-जागते इंसानों की दिल दहलाने वाली मौत महज तमाशा हो वहां औरतों की जबरन करायी गई नग्न परेड उनके लिए मनोरंजन के दिलकश नज़ारे के अलावा और कुछ नहीं...।

Thursday, July 27, 2023

आत्ममुग्ध

     भारत के कुछ तथाकथित समझदार लोग जो बुद्धिजीवी होने का भी दंभ भरते हैं, सोशल मीडिया पर अपनी खिल्ली उड़वाते नजर आ रहे हैं। बेचारे बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को नीचा दिखाने वाले पोस्ट डालते हैं, लेकिन ‘मित्र’ हैं कि उन्हें घास तक नहीं डालते। कल फेसबुक पर एक नेतानुमा पत्रकार ने भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की तस्वीर के साथ ‘बेशर्म राष्ट्रपति’ लिख कर चाहा था कि उनके खाते में ‘लाइक’ की झड़ी लग जाएगी। किसी ने उन्हीं पर सवाल दाग दिया, ‘‘तू कौन है बे? एक आदिवासी सुलझी हुई महिला के राष्ट्रपति बनने से तेरी तो खूब जल रही है...।’’ सोशल मीडिया पर देश के माननीय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की खिल्ली उड़ाने की कमीनगी दिखाने वालों में कई तो चूके हुए खाली कारतूस हैं। इन आत्ममुग्धों का कल भले ही महान रहा हो,  लेकिन आज बड़ा बुरा बीत रहा है। इन्होंने तलवे चाटने के लिए अपने ‘आका’ तय कर रखे हैं। उन्हीं की तारीफों के पुल बांधते हुए अपना बौनापन खुलकर प्रदर्शित करते चले आ रहे हैं। इनकी हालत बिलकुल शायर मुनव्वर राणा जैसी है, जिन्होंने कभी ऐलान किया था कि यदि उत्तरप्रदेश में योगी फिर सत्ता में लौटे तो वे अपने परिवार सहित यूपी को छोड़-छाड़कर कहीं ऐसी जगह चल देंगे, जहां उनकी कद्र हो। वैसे इज्जत के लिए हाथ नहीं फैलाने पड़ते। धमकियों का भी सहारा नहीं लेना पड़ता। जो लायक होते हैं उन्हें लोग हाथों-हाथ लेते हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि आप ऊल-जलूल बकवासबाजी करते रहो और उसकी प्रतिक्रिया भी न हो। जैसा दोगे, वैसा ही मिलेगा। 

    वक्त और मतलब के हिसाब से चलने-बोलने वालों की पोल खुल चुकी है। मणिपुर में दो महिलाओं को नंगा करके घुमाया गया।  इस हैवानियत के तीन दिन बाद बिहार में एक युवती की निर्वस्त्र कर पिटायी की गई। इतना ही नहीं कुकर्म का वीडियो भी बनाया गया। इस वीडियो में स्पष्ट दिखायी दे रहा था कि युवती के साथ मारपीट करते हुए उसके प्राइवेट पार्ट को टच किया जा रहा है। जब असहाय युवती वीडियो बनता देख अपने हाथों से खुद की इज्जत बचाने की कोशिश करती है, तब उसके हाथों को खींचकर हटाया जाता है। इंसानियत को शर्मसार करने वाली ऐसी घटनाएं नयी नहीं हैं। नया है लोगों का चुप रहना। अंधे, बहरे होने का नाटक करते चले जाना। पहले ऐसी नपुंसकता कम देखने में नहीं आती थी। अकेला आदमी गुंडों से भिड़ जाता था। अब भीड़ शांत खड़ी तमाशा देखती रहती है। इन तमाशबीनों की मां-बहनों की ऐसे इज्जत लुटे तब उन्हें पता चले कि मां-बहन की इज्जत क्या होती है! अधिकांश पत्रकार भी असली मुद्दे से भटक रहे हैं। उन्हें समाज का हिजड़ापन दिखायी ही नहीं देता। या देख कर भी अनदेखा करने का मज़ा ले रहे हैं। अरे भाई, हमारी आपकी भी कोई जिम्मेदारी है या नहीं? 

सच तो यह है कि होशोहवास के साथ अपना कर्तव्य निभाने वालों पर तोहमतें तथा चाटुकारिता करने वालों की वाहवाही कर पुरस्कृत करने की परिपाटी देश की लुटिया डुबो रही है। अपने असली फर्ज़ को विस्मृत कर तरह-तरह के लटके-झटके दिखाने में तल्लीन पत्रकारों को इन दिनों एक भोजपुरी लोकगायिका आईना दिखाने में लगी है। इस गायिका ने किसी भी प्रदेश सरकार को नहीं बख्शा। योगी के बुलडोजर की नाइंसाफी, पुलिस वालों की गुंडागर्दी, कानपुर में मां, बेटी की जलकर हुई मौत और एमपी के पेशाब कांड आदि पर जिस तरह से बोलने-कहने का साहस दिखाया, अभिनंदनीय है:

बाबा का दरबार बा,

ढहत घर बार बा

माई बेटी के आग में

झोंकत यूपी सरकार बा

का बा, यूपी में का बा

अरे बाबा की डीएम त बड़ी

रंगबाज बा...

बुलडोजर से रौंदत दीक्षित

के घरवा आज बा

यही बुलडोजरवा पे

बाबा के नाज बा

का बा, यूपी में का बा...

    नेहा सिंह ने एमपी में का बा गीत के माध्यम से मध्यप्रदेश में आदिवासियों पर हुए अत्याचार, सरकारी नौकरियों में हुए घोटालों तथा सीधी में हुए पेशाब कांड पर व्यंग्यबाण चलाये तो कांग्रेस नेता गद्गद् हो गये। कुछ महीनों बाद होने वाले चुनाव प्रचार के लिए उन्हें चटपटा मसाला मिल गया। यह तो नेताओं की पुरानी आदत है। कलाकारों की मेहनत पर अपना हक जमाने से बाज नहीं आते। लालू, मुलायम और मायावती छाप नेताओं को चाटुकार बहुत पसंद हैं। इनकी आरती गाने वालों को ईनाम में धन और राज्यसभा, विधान परिषद की सदस्यता से नवाजा जाता है। मेरठ के एक सज्जन, जिनका नाम डॉ. के.के. तिवारी है, ने हनुमान चालीसा की तर्ज पर माया चालीसा लिख डाला-

‘‘तुमने मीर मुलायम मारा,

अमर सिंह तुमने संहारा।

राजनाथ, कलराज मिश्र का

छीन लिया तुमने सुख सारा।

दलित-नंदिनी तुम कहलाती,

मनुवाद को दूर भगाती।’’ 

मायावती के राज में इस माया चालीसा के लाखों कैलेंडर छपवाकर बांटे गये थे। जब तिवारी को पुरस्कारों तथा नोटों से लाद दिया गया तब उन्होंने लिखा-

‘‘सदा तेरा नाम लेता हूं

तुझको भारत मां कहता हूं

दलित नंदिनी... मां

तुझे कोटि... कोटि प्रणाम

अपनी माया से मुझको भी 

करती रहना धनवान...।’’

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में भी अजब-गजब विद्वान चाटुकारों का बोलबाला रहा है। एक पुराने कांग्रेसी ने सोनिया गांधी की प्रशंसा में यह लिखा और अपना डंका बजवाया-

‘‘जय श्री माता सोनिया

ममता मन में अपार

अपनी ही बल बुद्धि से

किया नया संचार

दमखम से भी शक्ति का

किया है जग में प्रचार

कांग्रेस पार्टी का हे मां

आप ही कीं उद्धार।’’

इस सच से कौन इनकार कर सकता है कि ऐसे भक्त ही अपने नेताओं तथा पार्टी का बंटाढार करते आये हैं।

Thursday, July 20, 2023

आप ही बताएं, कहां जाएं?

    हम सबके प्यारे भारत देश ने चांद की ओर कदम बढ़ा दिये हैं, लेकिन इधर धरती के हाल कोई ज्यादा अच्छे नहीं हैं। चंद अमीरों की चांदी है। गरीबों के बड़े बुरे हाल हैं। जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए उन्हें तरसना पड़ रहा है। अमीरों के पास बड़ी-बड़ी कोठियां और कारे हैं। करोड़ों भारतीयों के लिए आज भी रोटी, कपड़ा और मकान चंद्रमा हैं, जो उनके सपनों में आते हैं। हकीकत में कोसों-कोसों दूर हैं। गरीब परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चों को न तो पौष्टिक आहार मिल पाता है और न ही शिक्षा-दीक्षा। आजादी के इतने वर्षों बाद भी करोड़ो माता-पिताओं के साथ-साथ उनके बेटे-बेटियों को भी खाली पेट रहना-सोना पड़ रहा है। शिक्षा से भी वंचित रहना पड़ रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं के घोर अभाव से जूझना और टूटना पड़ रहा है। देश में इस कदर असमानता, अराजकता और अव्यवस्था का आलम है कि एक तरफ लोगों को भूखमरी का शिकार होना पड़ रहा है, तो दूसरी तरफ अन्न की बर्बादी हो रही है। यह कहना सही नहीं है कि देश में अनाज की कमी है, इसलिए करोड़ों देशवासियों को भोजन नसीब नहीं हो पा रहा है। 

    हमारे मेहनतकश किसान हर तरह की फसलों की भरपूर पैदावार कर रहे हैं। यह सच अपनी जगह है कि उन्हें भी अपने परिश्रम का उचित प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है। खेती घाटे का सौदा बन कर रह गई है। अमीरों की शादियों, राजनेताओं, मंत्रियों के यहां होने वाले विभिन्न आयोजनों तथा बड़े-बड़े होटलों की टेबलों पर जो खाना बिना खाये छोड़ दिया जाता है उसका कोई हिसाब नहीं। भोजन के अपमान और उसकी बर्बादी की शर्मनाक तस्वीर उस बेरहमी, मतलबपरस्ती और लापरवाही की तरफ इशारा करती है, जिसकी वजह से करोड़ों भारतीयों के साथ बेइंसाफी और भेदभाव हो रहा है। उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा। उनके कदम अपराध मार्ग की तरफ बरबस खिंचे चले जा रहे हैं। अभी हाल ही में गूंज फाउंडेशन के संस्थापक और रमन मैगसेसे पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता अंश गुप्ता ने 1999 अपनी आखों देखी हकीकत का जिक्र किया। जिस्म को बर्फ कर देने वाली रात थी। सर्दी में दिल्ली वैसे भी बहुत ठंडी होती है। अच्छे-खासे गर्म कपड़ों के बिना मोटे-ताजे बलवान इंसानों लोगों की जान निकलने लगती है। घर में कंबल और रजाई में दुबक कर रहने का सुख लेना हर सक्षम दिल्लीवासी को अच्छा लगता है। ऐसे कंपकंपा देने वाले बर्फीले मौसम में अंशु गुप्ता जब बेघर लोगों को ठंड से बचाने की मुहिम में लगे थे तभी अचानक उनकी नज़र एक ऐसी युवती पर जा टिकी, जो एक लावारिस मृत शरीर से इसलिए चिपक कर सोई थी, क्योंकि उसके पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था। तूफानी सर्दी में उसे मृत शरीर से गर्माहट मिल रही थी। राजधानी दिल्ली ही अकेली ऐसी महानगरी नहीं, जहां गरीबों और असहायों को भरी ठंड में पता नहीं कैसे-कैसे रातें काटनी पड़ती है। उन्हें मौसम के साथ-साथ पापी पेट से भी लड़ना पड़ता है, जो भोजन नहीं मिलने पर बगावत कर देता है। उसी रात अंशु गुप्ता ने असहायों, गरीबों और शोषितों की सहायता और सेवा करने के अपने इरादे को और मजबूती देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। 

    ओडिशा के मयूरगंज जिले में गरीबी से त्रस्त एक महिला ने अपनी आठ महीने की मासूम बच्ची को आठ सौ रुपये में बेच दिया। इस गरीब मां की पहले भी एक बेटी है। दूसरी बेटी के जन्म लेते ही उसे बच्ची के पालन-पोषण की चिन्ता सताने लगी। वह पहली बेटी के खान-पान की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही थी। ऐसे में उसने जो रास्ता निकाला यकीनन वो किसी भी जननी को शोभा नहीं देता, लेकिन गरीबी सब करवा लेती है। बीते हफ्ते बाजार से जब वह अकेली वापस लौटी तो गांव वालों ने उससे बच्ची के बारे में पूछा तो उसने कहा कि बच्ची की तो मौत हो गई है। कोई भी उसके जवाब से संतुष्ट नहीं था। तामिलनाडू में मजदूरी करने वाला उसका पति जब घर लौटा तो उसे भी पत्नी की बात पर यकीन नहीं हुआ। उसने फौरन थाने में शिकायत दर्ज करवाई तो यह हैरतअंगेज, घोर पीड़ादायी हकीकत सामने आयी। 

    महात्मा गांधी की कर्मभूमि वर्धा में एक परिवार ने पैसों के अभाव के कारण अपनी 37 वर्षीय पुत्री प्रवीणा के शव को घर में ही दफना दिया। 9 दिन बाद पुलिस को जब खबर लगी तो खुदाई कर शव को बाहर निकाला गया। प्रवीणा मानसिक रूप से बीमार थी। दो साल पहले बड़ी बहन की मौत के बाद लगे सदमे से उसकी हालत और बिगड़ गई थी। पहले भी उसका किसी से मिलना-जुलना बहुत कम होता था, लेकिन अब तो उसने घर से बाहर झांकना भी बंद कर दिया था। अचानक जब उसने प्राण त्यागे तो गरीब माता-पिता के समक्ष संकट खड़ा हो गया कि मृतक बेटी के अंतिम संस्कार के लिए पैसे कहां से लाएं? उन्होंने चुपचाप घर में ही बिना किसी को बताये कमरे में गड्ढा खोदा और शव को दफना दिया। देश के जन-जन तक स्वास्थ्य सेवाओं तथा आवागमन की सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा करने वाली देश और प्रदेश की सरकारों के लिए यह खबर किसी तमाचे से कम नहीं : पालघर जिले के आदिवासी बहुल विक्रमगढ़ तालुका के एक गांव की दो महीने की बीमार बच्ची की अस्पताल में देरी के पहुचने के कारण रास्ते में ही मौत हो गई। 150 लोगों की आबादी वाले इस गांव में कोई संपर्क सड़क नहीं। गरीब माता-पिता ने बच्ची को गोद में लेकर जैसे-तैसे लकड़ी के तख्तों का इस्तेमाल कर नदी तो पार कर ली, लेकिन डॉक्टरों तक पहुंचने से पहले अपनी लाड़ली को खो बैठे। यह बदनसीब गांव दो नदियों गर्गई और पिंजल के पास स्थित है। मानसून के दौरान महीनों इसका जिले की बाकी हिस्सों से संपर्क टूट जाता है। गांववासी पिछले कई वर्षों से नदी पर पुल बनाए जाने की गुहार लगाते चले आ रहे हैं, लेकिन शासन और प्रशासन बड़ी गहरी नींद में हैं...। ऐसे में आप ही बताएं, ये लोग कहां जाएं?

Thursday, July 13, 2023

कृष्ण के सुदामा

    देश के कुछ शहर ऐसे हैं, जिनकी हर किसी के दिल-दिमाग में बड़ी सुखद छवि बनी हुई है। उन्हीं में से एक शहर है, मध्यप्रदेश का इंदौर। यहां एक से एक पत्रकार, संपादक तथा साधु-संत हुए हैं। यहां की विविध खान-पान की वस्तुएं हर भारतीय मन को लुभाती हैं। कोई भी भला मानुस अपने शहर की आन-बान और शान पर बट्टा नहीं लगाना चाहता, लेकिन हर जगह कुछ सनकी, अहंकारी, मंदबुद्धि, क्रूर अपराधी अपना डेरा जमाये हैं, जो बार-बार हैवानियत का नंगा नाच दिखाने से बाज नहीं आ रहे हैं। कुत्ते का तो काम ही है सतत भौंकना। यह निरीह वफादार प्राणी भौंकने की वजह से अपने मालिकों के लिए उपयोगी होता है। डाकू, चोर, सेंधमार उसके भौंकने से खुद को खतरे में पाते हैं। कुत्तों की यह वफादारी ही है, जो बहुत-सी वारदातों से बचाती है। किस्म-किस्म के कुत्तों को पालने के शौकीनों की मंशा भी सार्थक हो जाती है। कुत्तों की वफादारी और सजगता की असंख्य मिसालें हैं। उनका जिक्र फिर कभी। फिलहाल बात इंदौर के रहवासी बच्चालाल यादव की, जिसने अपना शैतानी चेहरा दिखाकर हर किसी को स्तब्ध कर दिया। सनकी बच्चालाल किसी भी कुत्ते को अपने सामने पाते ही भड़क जाता था। कई बार तो कुत्ते की गर्दन मरोड़ देने का विचार भी उसके मन में भगदड़ मचाता था। कुछ हफ्ते पहले कोई पशुप्रेमी उसी के मोहल्ले में किराये के मकान में रहने आये थे। उन्होंने एक विदेशी नस्ल का कुत्ता पाल रखा था। बच्चालाल जब भी उस घर के सामने से गुजरता तो पालतू कुत्ता भौंकने लगता। बच्चालाल को लगता कि कुत्ता उसी को देखते ही जोर-जोर से भौं-भौं करने लगता है। वह चाहता तो कुत्ते के भौंकने को नजरअंदाज कर सकता था, लेकिन उसने तो एक दिन बड़ी फुर्ती के साथ कुत्ते को दबोचा और अपने घर ले जाकर फांसी के फंदे पर लटका दिया। कुत्ते के हत्यारे बच्चालाल यादव के खिलाफ पुलिस ने पशु कू्ररता समेत अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू कर दी है। 

    मध्यप्रदेश के ही सीधी जिले में प्रवेश शुक्ला नामक शख्स को आदिवासी दशमत रावत पर कुत्ते के अंदाज में तनकर खड़े होकर पेशाब करने की घटियागिरी और क्रूरता दिखाने में कोई शर्म नहीं आयी। जब वह दशमत पर पेशाब कर रहा था, तब उसके मुंह में जलती सिगरेट थी, जिसका धुंआ उसके अहंकार का साक्षी बना हुआ था। इस पेशाब कांड के जैसे ही वीडियो वायरल हुए तो सरकार के भी कान खड़े हो गये। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अपनी सरकार की नाकामी और बदनामी का डर सताने लगा और यह विचार मन-मस्तिष्क में खलबली मचाने लगा : विधानसभा के चुनाव सिर पर हैं। विरोधी तो जीना हराम कर देंगे। आदिवासी के अपमान का राग अलापते हुए पता नहीं कितने वोट खा जाएंगे। उन्होंने बिना वक्त गंवाये उन्हीं की पार्टी के धुरंधर राजनेता के प्रतिनिधी के पेशाब से नहाये दशमत को सरकारी आवास पर बुलाकर बड़े आदर के साथ बैठाया। इससे पहले दूरदर्शी मुख्यमंत्री महोदय ने विभिन्न न्यूज चैनलों की कैमरा टीमों को शीघ्र पहुंचने का आमंत्रण भेज दिया। उन्हें तो दौड़े-दौड़े आना ही था। प्रदेश के मुखिया ने आदिवासी दशमत के वैसे ही पैर धोये जैसे कि अपनी योजनाओं का प्रचार करने के लिए अक्सर वे प्रदेश की भांजियों और महिलाओं के धोते रहते हैं। इससे उनका हर मकसद पूरा हो जाता है। प्रदेश के सर्वेसर्वा ने दशमत के माथे पर तिलक लगाकर शॉल भी ओढ़ाई और धड़ाधड फोटुएं खिंचवायीं। इस सारी नाटक-नौटंकी के दौरान मुख्यमंत्री दशमत से बार-बार यही कहते रहे कि दशमत, अब तुम मेरे मित्र हो। मैं कृष्ण, तुम मेरे सुदामा। अपने इस मित्र से उन्होंने और भी कई मुद्दों पर बातचीत करते-करते यह भी जानकारी लेनी चाही कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उस तक पहुंच रहा है या नहीं...? अपने मुख्यमंत्री से हुई मुलाकात से दशमत अत्यंत प्रसन्न था। जब किसी पत्रकार ने उससे पेशाबकांड की विस्तृत जानकारी चाही तो उसने बस इतना कहा, ‘मैं क्या बताऊं, कुछ नहीं... जो होना था हो गया।’ जो होना था... वो हो गया के ऐसे शर्मनाक किस्से अनंत हैं। उनकी गिनती करना असंभव है। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि आदिवासियों पर जुल्म और कहर बरपाने में देश का प्रदेश मध्यप्रदेश नंबर वन है। आज भी इस प्रदेश के कई इलाके हैं, जहां दलित घोड़े पर चढ़ने और बारात निकालने से डरते हैं। कोई यदि हिम्मत करता भी है तो सवर्णों का खून खौल जाता है। उन्हें तब तक ठंडक नहीं मिलती, जब तक वे उनको अपमानित तथा पीट-पीट कर अधमरा नहीं कर देते।

घोर अहंकारी दरिंदे प्रवेश को गिरफ्तार करने के पश्चात उसके घर के अवैध हिस्से को बुलडोजर से तुरंत ढहा दिया गया, ताकि दूसरे हिंसक शोषकों की बंद आंखें खुल जाएं। वे ऐसी किसी भी घिनौनी करतूत को अंजाम देने से बार-बार घबरायें, लेकिन लगता है कि दबंगों की सोच तो कुत्तों जैसी है, जिनकी टेढ़ी पूंछ कभी सीधी नहीं हो सकती। पेशाब कांड के तीसरे दिन ग्वालियर में फिर एक व्यक्ति से चलती गाड़ी में ऐसा ही अमानवीय व्यवहार किया गया। उसे बेतहाशा मारने-पीटने के साथ-साथ उनके तलुओं को चाटने को विवश करने वाले अपराधी बार-बार असहाय इंसान को ‘गोलू गुर्जर तेरा बाप है’ कहने को विवश करते रहे। उन्होंने उसके चेहरे पर जूते भी बरसाये। सदियों से अपमान और शोषण के शिकार होते चले आ रहे दशमत जैसे भारतीय बड़े ही संतोषी किस्म के जीव हैं। उन्हें बड़ी आसानी से भूल जाना और माफ करना आता है। वे इस उम्मीद पर जिन्दा हैं कि आज नहीं तो कल भारत में बदलाव आयेगा। हमें नहीं तो हमारी आने वाली संतानों को भेदभाव मुक्त आबोहवा जरूर नसीब होगी, लेकिन...?

Thursday, July 6, 2023

गुमराह

    बचपन भटक रहा है। बच्चे मोबाइल रोगी बन रहे हैं। छोटी उम्र में बड़े-बड़े अपराध कर रहे हैं। उनसे गलत काम करवाये जा रहे हैं। जिन्हें भविष्य में देश की बागडोर संभालनी थी उनके हाथ में तलवारें, चाकू, छुरियां और कट्टे हैं। उन्हें न तो अपने माता-पिता और न ही कानून का कोई भय है। अब जब मैं लिखने के लिए अपनी कलम थामे हूं तब मेरी नज़रें कुछ खबरों के शीर्षकों पर अटकी है : एक पंद्रह वर्ष के लड़के ने एक लड़की के सीने में चाकू घोंप दिया। वह लड़की का कई दिनों से पीछा कर रहा था। पहले तो लड़की ने नजरअंदाज किया, लेकिन जब उसकी अशोभनीय हरकतें सीमा लांघने लगीं तो उसने उसे भरी भीड़ में चप्पल से धुन दिया। लड़की की यह अकल्पनीय प्रतिक्रिया ने नाबालिग लड़के के खून को खौला दिया। उसने फौरन अपनी जेब में रखा चाकू निकाला और उसके जिस्म में घोंप दिया। भीड़ देखती रही। बड़े आराम से वह हत्या कर चलता बना।

    नागपुर में एक लड़के का इसलिए खून खौल गया, क्योंकि उसी के एक दोस्त ने उसकी गर्लफ्रेंड को इंस्टाग्राम पर प्रशंसा के मैसेज भेजने की गुस्ताखी कर दी थी। पहले तो उसने उसे इंस्टाग्राम पर मैसेज करके उसकी गर्लफ्रेंड को लाइक और मैसेज नहीं करने की धमकी दी। फिर एक-दूसरे को गाली-गलौच और धमकियों का दौर चला फिर मैसेज करने वाले लड़के के सीने में चाकू उतार कर मौत के घाट उतार दिया गया। हत्यारा शराबी और गंजेड़ी है। इस नृशंस हत्या को अंजाम देने के लिए उसने दो नाबालिग साथियों की मदद लेकर उन्हें भी अपराधी बना दिया। एक पंद्रह वर्षीय छात्र ने अपने पड़ोसी के यहां घुस कर लाखों रुपये की नकदी तथा गहनों पर हाथ साफ कर दिया। उसे पता था कि पड़ोसी कुछ दिन के लिए बाहर गये हैं। स्कूल में अपने धनवान साथियों को बेतहाशा खर्च करते देख उसका मन भटकने लगा था। माता-पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं। अपने सहपाठियों की बराबरी के लिए उसने यह अपराध की राह चुनी! उम्रदराज पिता ने अपनी लड़की की सहेली से दुष्कर्म किया। अपने नाबालिग बेटे से दुष्कर्म का वीडियो भी बनवाया। 

    नरेश महिलांगे। हां, यही नाम है उस अपराधी युवक का, जिस पर चोरी, डकैती के तीस से ज्यादा केस दर्ज हैं। उसने पिछले महीने नागपुर में स्थित साईंबाबा कॉलोनी के एक घर से डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक की नकदी तथा कार चुराई थी। तभी से वह फरार था। पुलिस ने उसके पिता से 77 लाख 50 हजार रुपये जब्त किए थे। यानी जन्मदाता को भी अपने बेटे के चोर, डाकू और लुटेरे होने का पता था। वह उसका साथ देता चला आ रहा था। पुलिस ने काफी भागादौड़ी के बाद नरेश को हथकड़ियां पहनायीं। उसके चेहरे पर भय का कोई नामो-निशान नहीं था। उलटे वह पुलिस को ही चुनौती देने के अंदाज में कहने लगा कि तुम लोग चाहे कितना भी जोर लगा लो, लेकिन मैं कुछ भी नहीं उगलूंगा। यह तुम्हारा ‘बाजीराव’ मेरे लिए असरहीन हो चुका है। ज्ञातव्य है कि बाजीराव एक ऐसा पुलिसिया हथियार है, जिससे खूंखार अपराधियों के जिस्म को बड़ी बेरहमी से तोड़ा जाता है और येन-केन-प्रकारेण उसकी जुबान खुलवायी जाती है। कई संगीन अपराधियों की तो इसका नाम सुनते ही चड्डी गीली हो जाती है। पुलिस हिरासत के दौरान पूछताछ से बचने के लिए नरेश कई बार खुद को जख्मी कर चुका है। अनेकों बार जूते-डंडे, घूसे थप्पड़ झेल चुका नरेश पुलिसिया मार का अभ्यस्त हो गया है। हर माह वह महंगे नशों पर लाखों रुपये फूंक देता है। उसकी प्रेमिका भी शराबी है। अपराधी सोच ने युवाओं को किस कदर निर्मोही, लालची और अंधा बना दिया है, इसका इस खबर से सटीक पता चलता है : राजस्थान के अलवर जिले में स्थित खेड़ा गांव में दो कलयुगी बेटों ने जमीन अपने नाम करवाने के लिए अपने बुजुर्ग माता-पिता के पत्थर तोड़ने के हथौड़े से हाथ-पैर तोड़ डाले। गंभीर रूप से घायल वृद्ध मां को लहुलूहान हालत में तड़पता देखकर अस्पताल के डॉक्टरों के भी होश उड़ गये। आंखें नम हो गईं। मां के तो पैर टूटकर लटके हुए थे। उम्रदराज माता-पिता के मुंह से बार-बार यही शब्द निकल रहे थे, ‘भगवान ऐसी औलाद किसी दुश्मन को भी न दे।’ अपनी ही औलाद के हाथों पिटे पिता का कहना था कि जिस तरह से हथौड़े और लात-घूसों से बच्चों ने उन्हें पीटा उसके बारे में बताने में ही हमें शर्म आ रही है।  

    इंटरनेट के इस जमाने में देश, प्रदेश, शहर, गांव और गली मोहल्लों में कई ऐसे बच्चे हैं, जिनसे उनके परिजन ही नहीं, प्रशासन और समाज भी परेशान और दुखी है। नाबालिग लड़के और लड़कियां पान मसाला में एमडी ड्रग ले रहे हैं। स्कूली बच्चे तक ड्रग तस्करों के निशाने पर हैं। छात्र-छात्राओं को पहले तो तस्कर उधारी में ड्रग्स देते हैं और जब उन्हें इसकी लत लग जाती है, तब उनसे रकम वसूलने लगते हैं। वसूली के लिए उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता है। बीते हफ्ते नागपुर में एक लड़के ने तस्करों के आतंक से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या कर ली। कुछ लड़कियों को कालगर्ल के पेशे को अपनाने के लिए विवश होना पड़ा है। अपराध करने की सभी हदें पार करते इन अधिकांश नाबालिग अपराधियों की काउंसिलिंग करने पर पता चला कि कम उम्र में ही शराब, हुक्का तथा दूसरी नशीली वस्तुओं के साथ-साथ शारीरिक संबंध बनाने की लालसा उन्हें किसी भी स्तर तक ले जा रही है। लड़कियों को आकर्षित करने और उन पर धन लुटाने के लिए घर में सेंध लगाने, वाहन चुराने तथा चेन स्नैचिंग करने वाले किशोरों की तादाद में इधर के वर्षों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। यह कितनी हैरत भरी हकीकत है कि, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाने को विवश होना पड़ा है कि रज़ामंदी से शारीरिक संबंध बनाने की उम्र 18 वर्ष की बजाय 16 वर्ष कर दी जाए। कोर्ट का यह सुझाव पढ़कर मेरे मन में ढेरों विचार आते रहे। यह उम्र वासना के भंवर में डूब कर अपनी ऊर्जा नष्ट करने की बजाय सकारात्मक दिशा की तरफ कदम बढ़ने की होती है। बच्चों को बेहतर शिक्षा से संस्कारित करने की बजाय उन्हें सेक्स के दलदल में धंसने की सुविधा से नवाजने की मांग इस कलमकार को तो कतई सार्थक समाधान प्रतीत नहीं होती। इंटरनेट तो अब सर्वव्यापी है। इसकी पहुंच की कोई सीमा नहीं। आज सोलह वर्ष के किशोर सेक्स के लिए पगलाये हैं तो कल को तेरह-चौदह साल के बच्चे धड़ाधड़ खुलकर शारीरिक संबंध बनाने पर उतर आए तो क्या कोर्ट इस उम्र के लड़के-लड़कियों के लिए भी गर्त में समाने की सुविधा की मांग करेगा? मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मानसिक अस्थिरता, हीनता की भावना तथा मंदबुद्धी भी बाल तथा युवा अपराध का बड़ा कारण है। जिन घरों में निर्धनता तथा पारिवारिक क्लेश बना रहता है या परिजन अपराध कर्म में लिप्त रहते हैं, उनके बच्चे बड़ी आसानी से विभिन्न अपराधों मे लिप्त हो जाते हैं। दरअसल, जब उनकी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो उन्हें निराशा और कुंठा घेर लेती है, जिसका प्रतिफल हैं ये अपराध। जिनसे आज सारा देश रूबरू है। माता-पिता की लापरवाही, अशिक्षा और बेरोजगारी लड़के-लड़कियों से गुनाह करवा रही है। आसपास का वातावरण भी बचपन को भटकाने तथा बरबाद करने में सहभागी है। यदि पड़ोस में हत्यारे, शराबी, जुआरी, जेबकतरे रहते हैं, तो उनकी नजदीकी और संगत उन्हें दुर्गुणी बनाती है।