Thursday, September 21, 2023

ज़लज़ला

    किसे खबर थी, ऐसा वक्त भी कभी आयेगा, जब चारों ओर सोशल मीडिया का ही शोर होगा। लोगों के पास पत्र-पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों पर नज़रें दौड़ाने भर का ही समय बच पायेगा। ऐसा अद्भुत चमत्कार तो इलेक्ट्रानिक मीडिया भी नहीं दिखा पाया, जिसके आगमन पर प्रिंट मीडिया के खात्मे तक के दावे होने लगे थे। मुट्ठी में कैद मोबाइल से बातचीत करने के अलावा और इतना कुछ करने-कराने और पाने की कहां सोची थी आमजन ने। इंटरनेट ने तो दुनिया ही बदल दी। बड़ी से बड़ी दूरियां नजदीकियां बन गईं। जिन खबरों तथा जानकारियों को देश दुनिया तक पहुंचने-पहुंचाने में घंटों लगते थे, उन्हें सोशल मीडिया मिनटों में पहुंचाने लगा। भारत में समाचार पत्र अनेकों वर्षों तक करोड़ों लोगों की जरूरत और पसंद बने रहे। सुबह उठते ही अखबार में छपी खबरों के साथ चाय पीने का जो आनंद था, वह धीरे-धीरे कम होता चला गया। वजह रही अखबार चलाने वालों का सार्थक खबरों पर कम और विज्ञापननुमा खबरों पर अधिक ध्यान देना। उद्योगपति घरानों ने भी अखबारों को कब्जा कर जिस तरीके से चलाया वो भी सजग पाठकों को पसंद नहीं आया। सार्थक खबरों की बजाय नकारात्मक खबरों से अखबारों को भरे जाने के कारण पाठकों की प्रिंट मीडिया से दूरी बनाने की हकीकत जब संपादकों, मालिकों को समझ में आयी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 

    वर्तमान में समाचार पत्रों तथा विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं की जो दुर्गति दिखायी दे रही है उसकी वजह पाठकों की कमी नहीं, प्रकाशकों का धन-रोग है, जिसकी कोई सीमा नहीं। न्यूज चैनल भी शुरू-शुरू में पत्रकारिता का धर्म निभाते दिखे। उनके प्रति लोगों का रुझान देखकर ऐसे-ऐसे चेहरों ने इलेक्ट्रानिक मीडिया में घुसपैठ करनी प्रारंभ कर दी, जिनका सजग पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं था। प्रिंट मीडिया की तरह इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी भू-माफिया, कोल माफिया, शराब माफिया तथा अन्य विविध काले धंधों के सरगना अपनी-अपनी कलाकारियां दिखाने लगे। अडानी, अंबानी के साथ-साथ न जाने कितने उद्योगपतियों ने विभिन्न न्यूज चैनलों को अपने कब्जे में लेकर सिद्धांतवादी पत्रकारों, संपादकों, एंकरों को त्यागपत्र देने को विवश कर दिया। वर्तमान में भारत में नाममात्र के ऐसे न्यूज चैनल बचे हैं, जिन पर लोगों का भरोसा कायम है। कुछ अखबारों की तरह इन न्यूज चैनलों में निष्पक्ष तथा निर्भीक पत्रकारिता करने वाले अभी जिन्दा हैं। भले ही उनकी गिनती अपवादों में होती है, लेकिन उनका दमखम बुलंदी पर है। 

    देखते ही देखते लोगों के दिलो-दिमाग पर छा जाने वाले सोशल मीडिया के उफान को देखकर भी यह प्रतीत होने लगा था कि यह नया माध्यम कुछ खास साबित होगा, लेकिन इसमें भी खतरनाक तमाशेबाजी करने वालों की तादाद बढ़ने से इसे अलोकप्रिय होने में देरी नहीं लगी। शुरू-शुरू में सुलझे हुए विद्वानों की पोस्ट देख-पढ़कर ज्ञानवर्धन होता था, लेकिन अब सोशल मीडिया पर अभद्र, अश्लील पोस्ट की भरमार भयभीत भी करती है और क्रोध भी दिलाती हैं। इसमें दो मत नहीं कि सोशल मीडिया ने संचार को आसान और अत्यंत सुलभ बनाया है। फेसबुक, वाट्सएप आदि के जरिए अपनों और बेगानों के संपर्क में रहने की अभूतपूर्व सुविधा उपलब्ध करवायी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, व्यापार आदि के क्षेत्रों की जानकारी का जीवंत माध्यम है सोशल मीडिया। कोरोना काल में सोशल मीडिया की उपयोगिता हम सबने देखी है और उससे लाभान्वित भी हुए हैं। कुछ विघ्न संतोषियों ने वैमनस्य का विष उगलने के लिए सोशल मीडिया को अपना हथियार बना लिया है। सांप्रदायिक तथा जातीय सद्भाव को बिगाड़ने के लिए असमाजिक और अराजक तत्व सतत सक्रिय हैं। जो सोशल मीडिया समाज की मुख्यधारा से अलग लोगों की आवाज़ बन सशक्त वरदान बन सकता उसे अभिशाप बनाने के लिए षडयंत्रों के जाल बुने जा रहे हैं। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के सातारा जिले में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर दो समुदायों की बड़ी तीखी झड़प होने के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई तथा दस लोग घायल हो गए। सोशल मीडिया की विभिन्न उत्तेजक पोस्ट के कारण देश में पहले भी मरने-मारने की कई घटनाएं मीडिया की सुर्खियां बन चुकी हैं। दरअसल, सोशल मीडिया को उत्तेजक और भ्रामक तथ्यहीन खबरें तथा अफवाहें फैलाने का मंच बनाने वालों ने यह मान लिया है कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर तो अंकुश लगाने का प्रावधान है, लेकिन सोशल मीडिया बेलगाम है। उत्तेजक तथा भ्रामक पोस्ट कर खुशियां मनाने वाले अपराधियों को उन्हें अच्छी तरह से पता है कि वे सूखी घास पर पेट्रोल छिड़कने का अपराध कर रहे हैं। इससे अंतत: आग दूर-दूर तक फैलने तथा पता नहीं कितनों को जलाने तथा राख कर देने वाली है। सोशल मीडिया के अत्याधिक उपयोग ने भी कई परेशानियां खड़ी करनी प्रारंभ कर दी हैं। युवाओं के साथ-साथ किशोरों के हाथ से मोबाइल छूट ही नहीं रहा है। उनका अधिकांश समय सोशल मीडिया पर ही बीत रहा है। पढ़ाई-लिखाई पीछे छूटती जा रही है। उनमें अवसाद, डिप्रेशन, चिढ़चिढ़ापन बढ़ने के साथ ही अनिद्रा, मोटापा, आलस्य बड़ी तेजी से अपना डेरा जमाने लगा है। आज सुबह-सुबह अखबार में छपी इस खबर पर दिमाग और नजरें अटकी की अटकी ही रह गईं: दिल्ली के एक शिक्षित धनवान परिवार की बच्ची जब छह महीने की थी तभी फोन के पीछे भागने लगी थी। जब तक फोन हाथ में नहीं आता था, तब तक वह रोना बंद नहीं करती थी। लिहाजा हार मानकर घर वाले उसके हाथ में कभी फोन पकड़ा देते, तो कभी गाना लगाकर चुप कराते। आज वह दो साल की हो चुकी है। फोन पर वीडियो देखे बिना वह खाना नहीं खाती। मां-बाप अपनी लाड़ली को भूखा तो नहीं रख सकते, इसलिए उसकी जिद को पूरा करने को मजबूर हैं। शिक्षित माता-पिता को अच्छी तरह से पता है कि यह आदत अत्यंत हानिकारक है। कच्ची उम्र में लगा यह रोग उम्र बढ़ने के साथ-साथ खतरनाक आदत में तब्दील होना ही है। डॉक्टरों के अनुसार एक से तीन साल की उम्र तक बच्चे के दिमाग का विकास बड़ी तेजी से होता है। इस दौरान वह उठना, बैठना, चलना तो सीखता ही है, उसके साथ ही उसकी सेंसरी मोटर और सोशल ऐक्टिविटीज भी विकसित होती हैं, लेकिन जब इस उम्र में बच्चे फोन में ही उलझ जाएं तो सोचिए, उनका भविष्य कैसा होगा? माना कि युवाओं और किशोरों को समझाना मां-बाप के बस की बात नहीं रही, लेकिन मासूम बचपन पर वक्त रहते यदि वे चाहें, तो पाबंदी लगा सकते हैं। बच्चा रोयेगा, गायेगा अंतत: चुप हो जाएगा। नहीं भी मानेगा तो भी कोई भूचाल तो नहीं आ जाएगा। असली भूचाल और ज़लज़ला तो तब आयेगा जब यही बचपन किशोर होने पर मोबाइल के लिए माथा पटकेगा। आत्महत्या करने की धमकियां देगा या फिर खुदकुशी कर अखबार की खबर बन जाएगा...।

Thursday, September 14, 2023

देर भी, अंधेर भी

    जब किसी ने कोई अपराध किया ही न हो, लेकिन उसे सज़ा भुगतनी पड़े तो उसकी पीड़ा दूसरों को कहां पता चल पाती है! जो सहता है, वही जानता है। बाकी के लिए तमाशा है। किस्मत का खेल है। अपनी ही रंगीनियों में खोये बहुतों को तो खबर ही नहीं कि अपने भारत का कानून कई कारणों से हर किसी को न्याय नहीं दे पाता। उसे भी विवशताओं की जंजीरों में जकड़ दिया गया है। उसके समक्ष ऐसा घना अंधेरा है, जो कभी हटता है तो कभी हमेशा के लिए कायम रहते हुए निर्दोष की जिन्दगी तबाह कर देता है। बार-बार पढ़ी-सुनी कहावत है कि ऊपर वाले के यहां देर है, पर अंधेर नहीं। मुझे भी अपने बुजुर्गों के द्वारा अनुभवों से रची इस कहावत पर बहुत यकीन था, लेकिन अब उतना नहीं रहा। भारतीय जेलों में वर्षों से लाखों बेकसूर कैद हैं। उनकी सुनने वाला कोई नहीं। देश के न्यायालयों में लंबित पड़े मामलों का आंकड़ा 4 करोड़ के आसपास पहुंच चुका है। अब तो यह भी कहने-सुनने में आने लगा है कि अन्य महंगी वस्तुओं की तरह न्याय को भी खरीदा और भटकाया जा सकता है। बस जेब में दम और जुगाड़ की कला का ज्ञान होना चाहिए।

    कुछ वर्ष पूर्व शहर में एक गुंडे ने भरे चौराहे पर अपने विरोध में गवाही देने वाले कॉलेज छात्र की हत्या कर दी थी। नंगी तलवार के अनेकों वार से की गई इस नृशंस हत्या को कई लोगों ने अपनी आंखों से देखा था, लेकिन हत्यारा अदालत से इसलिए बरी हो गया, क्योंकि उसके खिलाफ किसी चश्मदीद ने गवाही ही नहीं दी। वो कुख्यात गुंडा किसी का दोस्त तो किसी का रिश्तेदार था। यहां कोई भी किसी अपने का बुरा होते नहीं देखना चाहता। उसकी हिफाजत के लिए किसी भी हद तक गिरना मंजूर है। सच का साथ देकर दुश्मनी मोल लेने से अधिकांश भारतीय घबराते हैं, लेकिन जब खुद पर आती है तो शिकायती भाषणबाजी सूझती है। अपराध और अपराधियों पर नज़र रखना खाकी वर्दी वालों का मूल दायित्व है। चोर, लुटेरों, डकैतों, बलात्कारियों की शिकायतें लेकर आमजन इसलिए पुलिस के पास जाते हैं, ताकि उन्हें सुरक्षा और इंसाफ मिले और अपराधियों को कठोर दंड मिले। पुलिस थाने इंसाफ के प्रथम द्वार हैं, लेकिन यह दरवाजे सभी के लिए नहीं खुलते। बड़ा भेदभाव होता है यहां।

    अधिकांश खाकी वर्दीधारी किसी न किसी रूप में अपराधियों के साथ दोस्ती-यारी निभाने में अग्रणी हैं। धन की चमक के समक्ष उनका ईमान डोलने में देरी नहीं लगती। देखने और सुनने में तो यह भी आता है कि कुछ पुलिस अधिकारी ही संगीन अपराधियों को बचने-बचाने के मार्ग सुझाते हैं। अभी हाल ही में ही संतरा नगरी नागपुर में दस साल की बालिका को बंधक बनाकर उसका यौन शोषण करने वाले प्रापर्टी डीलर अरमान को पुलिस ने गिरफ्तार किया। रईस अपराधी को पूछताछ के नाम पर अधिकारी के कक्ष में ऐसे बिठाया गया, जैसे वह सरकारी मेहमान हो। अरमान से मेल-मुलाकात करने के लिए बिना किसी रोकटोक के उसके मित्र तथा रिश्तेदारों का वहां आना-जाना लगा रहा। उसके लिए लजीज खाने-पीने की व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी। पुलिस हिरासत में भी वह मोबाइल पर अपने घरवालों तथा मित्रों से बातें करने के लिए स्वतंत्र था। दूसरों को अपना गुलाम समझने वाले अरमान के परिवार के द्वारा 2019 में बच्ची को बेंगलुरु से खरीदकर लाया गया था। तब वह मात्र छह वर्ष की थी। उसके गरीब माता-पिता को आश्वासन दिया गया था कि उनकी बच्ची के भविष्य को पढ़ा-लिखा कर संवारा जाएगा, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ। मासूम को स्कूल भेजने की बजाय घर की साफ-सफाई तथा अन्य भारी-भरकम कामों में लगा दिया गया। कालांतर में अरमान की वासना भरी निगाह बच्ची पर पड़ी तो उससे दुष्कर्म भी किया जाने लगा। बच्ची विरोध करती या उससे काम में थोड़ी सी भी चूक अन्यथा गलती होती तो गर्म तवे तथा सिगरेट के चटके उसके शरीर पर लगाये जाते। बेबस बच्ची दरिंदों के अथाह जुल्म सहने को विवश थी। यह तो अच्छा हुआ कि कुछ दिन पहले जब उसे बाथरूम में बंद कर पूरा परिवार बेंगलुरु घूमने-फिरने गया था, तब अंधेरे में घबरायी बच्ची खिड़की से कूदने में कामयाब हो गई और इतना क्रूर शर्मनाक सच सामने आ पाया। 

    त्रिपुरा में स्थित है शहर अगरतला। इस महान नगरी की एक जननी का अभिनंदन, जिसने अपने ही बेटे को सज़ा दिलाने के लिए कोर्ट में गवाही देकर आजीवन कारावास की सज़ा दिलवायी। ‘सच’ का साथ देने वाली इस दिलेर मां ने भरी अदालत में बिना घबराये कहा कि ऐसी बेरहम औलाद तो बार-बार फांसी की हकदार है। 

    सफाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाली 55 वर्षीय विधवा महिला कृष्णादास की नमितादास के बेटे सुमन ने अपने दोस्त चन्दनदास के साथ मिलकर गला घोंटकर हत्या कर दी थी। मौत के मुंह में सुलाने से पहले दोनों ने उस पर बड़ी बेरहमी से बलात्कार भी किया। दोनों हत्यारों के खिलाफ किसी ने भी गवाही देने का साहस नहीं दिखाया। ऐसे में इस नमितादास यानी मां ने ही हिम्मत दिखायी। इस साहसी मां ने मोह-माया की जंजीरों को तोड़ते हुए कहा कि वह सिर्फ सच्चाई का ही साथ देंगी। उन्हें पता है कि उसके बेटे ने ही अपने दोस्त के साथ मिलकर असहाय महिला की अस्मत लूटने के बाद मौत के घाट उतारा है। 

    इस प्रेरणास्त्रोत मां की बस यही इच्छा है कि हर ऐसी औलाद को फांसी के फंदे पर लटकाया जाए, ताकि दूसरे अपराधियों के भी होश ठिकाने आएं।

Wednesday, September 6, 2023

खरी-खरी

    भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए विपक्षी नेता कमर कस चुके हैं। ऐसा ही कभी इंदिरा गांधी को सत्ता से दूर करने के लिए तत्कालीन विपक्ष के नेताओं ने जोर आजमाया था। सत्ता भी उनके हाथ लगी थी, लेकिन पीएम की कुर्सी की लड़ाई में अंतत: हंसी के पात्र बन कर रह गये थे। इंदिरा गांधी की तरह नरेंद्र मोदी पर भी तानाशाही से शासन चलाने के आरोप हैं, लेकिन फिर भी दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। इंदिरा गांधी ने विपक्ष की आवाज को पूरी तरह से दबाने के लिए आपातकाल तक लगा दिया था। लगभग सभी विपक्ष के दिग्गज नेताओं को जेलों में ठूंस दिया था। प्रेस पर भी नियंत्रण की तलवारें लटका दी थीं। इंदिरा गांधी के बरपाये आपातकाल का यशगान करने वाले संपादकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों के लिए रंगीन कालीन तो विरोध में खड़े योद्धाओं के लिए सजाएं निर्धारित कर दी थीं। तब के सच्चे जननायक, विद्रोही नेता राज नारायण की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को 1971 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी ठहराया था, जिससे उनका माथा ठनक गया था और विरोधियों को दबाने के लिए आपातकाल की विनाशी राह चुनी थी। 

    इंदिरा गांधी की तरह नरेंद्र मोदी भी दूसरों की कम सुनते हैं, लेकिन वे अंधे और बहरे नहीं हैं। हमेशा सचेत रहते हैं। उनके नेतृत्व में एनडीए सतत एकजुट है। इंदिरा गांधी परिवार के मोह की जबर्दस्त कैदी थीं। गांधी परिवार की यह परिपाटी आज भी बरकरार है। इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी ने अपनी मां के शासन काल में गुंडागर्दी और मनमानी की छूट हासिल कर रखी थी। अक्सर लोग सोचने को विवश हो जाते थे कि देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हैं या उनके बेटे, जिनका दूर-दूर तक आतंक और खौफ था। अपनी मां को इमरजेंसी लगाने की पुरजोर सलाह भी संजय गांधी ने ही दी थी, जिसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया था। सच कहें तो कांग्रेस के पतन की शुरुआत भी तभी हो गई थी। नरेंद्र मोदी के सत्ता पर काबिज होने से पहले दस वर्ष तक मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री रहे। सोनिया गांधी और राहुल गांधी उनको अपने इशारों पर नचाते रहे। उन्हीं के कार्यकाल में प्रियंका गांधी के पति राबर्ट वाड्रा ने जिन तरीकों से अरबों रुपयों का साम्राज्य खड़ा किया, कौन नहीं जानता। नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता पर सत्तासीन होने तथा गुजरात के कई वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान उनके किसी परिजन ने सत्ता का लाभ नहीं उठाया। उनके भाई-बहन तथा सभी रिश्तेदार कल जैसी आर्थिक हालत में थे, आज भी वैसे ही हैं। रही बात अडानी और अंबानी की तो दोनों पहले से ही धनपति रहे हैं। हर सरकार से अपना काम निकलवाना उन्हें आता है।  

    भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने की ओर कदम बढ़ाते पीएम नरेंद्र मोदी का 9 वर्ष का कार्यकाल पूरी तरह से निराशाजनक तो कतई नहीं कहा जा सकता।  नरेंद्र मोदी अति आत्मविश्वासी हैं। चापलूसों से दूर रहते हैं। उनके इसी गुण को विरोधी उनका अहंकार मानते हैं। कुछ गिने-चुने पत्रकारों को भी वे दंभी लगते हैं। दरअसल, मोदी दूसरे पूर्व के प्रधानमंत्रियों की तरह मीडिया को ज्यादा भाव नहीं देते। सिर्फ अपने काम से मतलब रखते हैं। 

    यकीनन, बेतहाशा बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी ने देशवासियों को निराश किया है। आम आदमी के लिए रोजी-रोटी तथा रोजगार प्राथमिक जरूरत हैं। पुल, सड़कें, मेट्रो, वंदेभारत ट्रेन, चंद्रमा पर झंडा फहराना, अयोध्या में राम मंदिर बनवाना तथा जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाना तभी सुकूनदायी है, जब उसकी झोली मूलभूत आवश्यकताओं से परिपूर्ण हो। 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद देशवासियों को जिस भरपूर बदलाव की आशा थी वह पूरी तरह से नहीं हो पाया, लेकिन उम्मीदें पूरी तरह से धराशायी भी नहीं हुई हैं। आशा का दीपक रौशन है। मोदी के कार्यकाल में ही कोरोना की महामारी देशवासियों के हिस्से में आयी। लगभग दो साल इसी से लड़ते-लड़ते बीते। पीएम कहीं भी कमजोर नहीं पड़े। नरेंद्र मोदी जैसा कर्मवीर प्रधानमंत्री पहले देखने में नहीं आया। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता से हटाने के लिए जो दल और नेता बेचैन हैं उनमें भिन्न-भिन्न तरह से दागी भी शामिल हैं। कुछ पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं। आम जनता में उनकी छवि अच्छी नहीं है। फिर भी वे पीएम बनने का सपना देख रहे हैं। विपक्षी पार्टियों के गठबंधन (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस) इंडिया को दिल्ली बहुत नजदीक दिखायी दे रही है। इस सदी के सबसे भ्रष्ट नेता लालू प्रसाद यादव, जिन्होंने जानवरों का चारा तक पचा डाला, रेलवे में नौकरी देने की ऐवज में गरीबों, पिछड़ों की जमीने अपने नाम लिखवा लीं। वह आज नरेंद्र मोदी की गर्दन नोचने की दहाड़ लगाकर हीरो बनने की कोशिश में हैं। लालू की तरह और भी कुछ चेहरे हैं, जो हद दर्जे के भ्रष्ट होने के बावजूद इंडिया गठबंधन में शामिल हैं। 

    रही बात राहुल गांधी की तो उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा में खून-पसीना बहाकर अपने दमखम को दिखा दिया है। जो लोग कल तक उन्हें ‘पप्पू’ कहते थे आज उनकी तारीफ करने लगे हैं। राजनीति में अपनी पैठ जमाने के लिए राहुल ने पिछले तीन-चार वर्ष में भाग-दौड़ कर देशवासियों से जो प्रभावी मेल-मिलाप किया है उससे यकीनन उनका कद बढ़ा है। झुकने की बजाय लड़ाई लड़ने की जिद ने उन्हें ऊंचा उठाया है। विपक्षी दलों के नेता राहुल गांधी के कंधे पर ही बंदूक रखकर बड़े-बड़े सपने देख रहे हैं। आपातकाल से देशवासियों को आहत करने वाली इंदिरा गांधी को जिस जनता दल ने लोकसभा की 298 सीटें जीतकर सत्ता से दूर किया था, उसमें एक से एक कद्दावर नाम शामिल थे। जयप्रकाश नारायण, लाल कृष्ण आडवाणी, चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस चंद्रशेखर, ग्वालियर की राजमाता विजय राजे सिंधिया, मोरारजी देसाई जैसे निस्वार्थ नेताओं पर देश के बच्चे-बच्चे तक को अपार भरोसा था। मोदी को हटाने के लिए बने ‘इंडिया’ में शामिल पांच-सात को छोड़कर बाकी सभी पीएम की कुर्सी के लिए पगलाये हैं। वहीं कुछ को अपनी औलादों को येन-केन-प्रकारेण सत्ता की शाही कुर्सी पर बिठाने की जल्दी है...।

Thursday, August 31, 2023

अपनी हत्या

    अपनी जान को हथेली पर लेकर चलने तथा किसी भी मुश्किल से सीना तान कर लड़ने वाले जांबाजों के पंजाब में एक उम्रदराज नेत्रहीन मां के तीनों बेटे कम उम्र में एक-एक कर चल बसे। उनकी मौत किसी बीमारी से नहीं, अत्याधिक शराब पीने से हुई। अपने जिगर के टुकड़ों से जुदा हो जाने पर ममतामयी मां का दर्द इन शब्दों में छलका, ‘‘काश! मेरी आंखों में रोशनी होती। मैं अपने बच्चों को शराब के नशे में गर्क होने से रोकती-टोकती तो वे जरूर बच जाते। उन्हें कोई समझाने वाला नहीं था, इसलिए उन्होंने मौत के नशे की घातक राह चुनकर अपना खात्मा कर लिया।’’ अखबार के किसी कोने में छपी इस खबर को पढ़ने के पश्चात मैं लगातार सोचता रहा कि काश! ऐसा हो पाता। तभी एक विचार यह भी आया कि जो लाखों बच्चे, किशोर तथा युवा शराबी हो गये हैं, क्या उन्हें मां-बाप ने नहीं बताया होगा कि शराब उनकी सेहत के लिए हानिकारक है। इससे बच कर रहो...। सच तो यह है कि कोई भी माता-पिता अपनी संतान को नशे की लत का शिकार होते नहीं देख सकते।

    पंजाब में पिछले कई वर्षों से शराब तथा अन्य नशों ने मौत का तांडव मचा रखा है। औसतन हर दूसरे दिन नशे से एक मौत हो रही है। स्कूल की उम्र के कई बच्चों ने शराब पीनी प्रारंभ कर दी है। भाईयों की देखा-देखी बहनें भी शराब चखने लगी हैं। हैरान परेशान अभिभावकों, परिजनों की नींदें उड़ चुकी हैं। उन्हें बुरे-बुरे सपने सताते हैं। वे सरकार से हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं कि नशों के सहज-सुलभ बाजारों पर पाबंदी लगाकर उनकी औलादों को बचा लो। बार्डर से आ रहे नशों की गांव-शहरों में होम डिलीवरी हो रही है। बड़े तो बड़े, मासूम बच्चे भी तबाह हो रहे हैं। नशा उन्हें कहीं का नहीं रहने दे रहा है। इसकी चपेट में आकर बर्बाद होने वालों की लिस्ट दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। नशा मुक्ति केंद्र नशेड़ियों से भरे पड़े हैं। जिन बच्चों से अथाह उम्मीदें थीं। जिन्हें मां-बाप डॉक्टर, इंजीनियर, लेक्चरर, उद्योगपति, व्यापारी, नेशनल खिलाड़ी आदि बनते देखना चाहते थे, उन्हें नशे ने भटका दिया है। उनके दिल-दिमाग और जिस्म नकारा हो गये हैं। अत्याधिक नशे ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। कई बेटों की अच्छी खासी नौकरी लगी, व्यापार, कारोबार में भी उनकी रूचि जगी, लेकिन नशे के गुलाम होने के कारण शादी होते-होते तक मौत हो गयी। उनसे ब्याही गई लड़कियों को बड़े दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं। जिन्हें अच्छी किस्मत से कोई सहारा मिलता है, तो वह संभल जाती हैं। बाकी को तो जैसे किसी घोर अपराध की सज़ा भुगतनी पड़ रही है, जो उन्होंने किया ही नहीं। 

    भारत में नशे की महामारी को लेकर अत्यंत चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कराए गए एक सर्वे में पता चला है कि 10 से 75 साल आयु वर्ग की आबादी में नशा करने वालों की संख्या 37 करोड़ के पार चली गई है। यह संख्या दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी अमेरिका से अधिक है। यह हकीकत चौंकाती और दिल दहलाती है कि देश में कई शराब पीने वाले ऐसे हैं, जो इसके बिना नहीं रह सकते। सुबह-शाम उन्हें किसी भी हालत में शराब चाहिए। वैध हो या अवैध उन्हें तो बस पीने से मतलब है। यह सच भी कम हैरान करने वाला नहीं है कि भारत में शराब पीने वालों की संख्या 16 करोड़ है। इतनी ही रूस की आबादी है। आज देश का कोई भी शहर अखंड नशेड़ियों से अछूता नहीं। नागपुर जैसे तीस-पैंतीस लाख की जनसंख्या वाले शहर में धड़ल्ले से हुक्का बार चल रहे है। स्मैक, ब्राउन शुगर और हेरोइन आदि आसानी से उपलब्ध है। इस शहर में जगह-जगह जितने बीयर बार और शराब की दुकाने हैं उतनी और कहीं नहीं हैं। स्कूल कॉलेजों के लड़के-लड़कियां नशों की चकाचौंध में पढ़ना-लिखना भूल रहे हैं। माता-पिता बच्चों की पढ़ाई पर अपनी औकात से ज्यादा खर्च करते हैं और उनकी औलादें नालायक साबित हो रही हैं।

    सरकारों को शराब बेचकर करोड़ों का राजस्व मिलता है, आबकारी विभाग पलता है। पुलिस चांदी काटती है और हलाल होते हैं अभिभावक, जिनके खून-पसीने की कमायी नशे की भेंट चढ़ रही है। कुछ प्रदेशों में कहने को शराब बंदी है, लेकिन कितनी है उसके बारे में अब क्या कहें! शराब के तस्करों की तिजोरियों में वो धन जा रहा है, जिसे सरकार की तिजोरी में जाना चाहिए। बिहार में बड़े तामझाम के साथ शराब बंदी की गई, लेकिन पड़ोसी राज्यों से धड़ल्ले से शराब आती है और नशेड़ियों की प्यास बुझाती है। शराब के तस्कर एक से एक तरीके आजमाते हुए बेखौफ शराब खपाने में लगे हैं। कभी मरीजों के लिए उपयोग में लायी जाने वाली एंबुलेंस में शराब की पेटियां पकड़ी जाती हैं तो कभी सैनिटरी पैड के बीच में लाखों रुपये की शराब की बरामदी की खबरें पढ़ने में आती हैं। नकली शराब पीकर मरने वालों की खबरें विपक्षी दलों के नेताओं को सरकार पर निशाना साधने के अवसर उपलब्ध कराती हैं। बिहार में 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। उसके बाद कितने लोग नकली शराब पीने के बाद चल बसे, हमेशा-हमेशा के लिए अंधे हो गये इसका सटीक आकड़ा सरकार नहीं बताती। शासन तथा प्रशासन अंधा होने की कला में पारंगत हैं। उनके इसी अंधेपन के चलते बिहार में कई बेरोजगार युवक अवैध शराब को यहां से वहां पहुंचाने के काम में लगे हैं। वे जानते हैं कि, यह अपराध है, लेकिन फिर भी किये जा रहे हैं। कर्तव्यपरायण खाकी वर्दी तस्करों के हाथों के खिलौना बने गरीबों को दबोचकर संतुष्ट है। अवैध शराब के कारोबार में लगे बड़े मगरमच्छों तक कानून पहुंच ही नहीं पा रहा है। रिश्वत ने इन्हें इस कदर अंधा होने को विवश कर दिया है कि इन्हें शराब की होम डिलिवरी तक नहीं दिखती। लोग तस्करों की चालाकी पर हैरान हैं। शराब के महंगे ब्रैंड आजकल टेट्रा पैक में बड़ी आसानी से हर शराबी को उपलब्ध हैं। शीशे की बोतलों की तरह इनसे न कोई आवाज होती हैं और न ही टूटने-फूटने का खतरा।

Thursday, August 24, 2023

उधार के अस्त्र-शस्त्र

    अब तो नेता और अभिनेता खुलकर अपने भाषणों में गीत और ग़ज़लों को सजाने लगे हैं। कालजयी कहानीकार, पत्रकार प्रेमचंद ने कहा भी है कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। गुलामी के दौर में लोगों में जागरूकता लाने तथा उनमें अंग्रेजो के खिलाफ आक्रोश की आग जलाने के लिए कवियों तथा शायरों ने अपना भरपूर योगदान दिया। ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ जैसे शब्द उनके लिए क्रांति की मशाल थे। प्रेरक साहित्य रचने वालों का इस देश में हमेशा मान-सम्मान होता आया है। उनकी लिखी उम्दा कविताएं और ग़ज़लें आम और खास लोगों के साथ-साथ उच्च शिक्षाविदों के दिलोदिमाग में भी अमिट छाप छोड़ जाती हैं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी तो स्वयं एक महान कवि थे। आज भी उनकी कविताओं के लाखों प्रशंसक हैं। दूर-दूर तक असर छोड़ने वाली शायरी को बार-बार सुनने और गुनगुनाने का मन करता है। कई धुरंधर वक्ता अपने भाषणों में फैज अहमद फैज, राहत इंदौरी, रामधारी सिंह दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, अशोक अंजुम, कुमार विश्वास आदि-आदि की शायरी और कविताओं को बड़े गर्व के साथ पढ़ते और सुनाते हैं, लेकिन उन्हें उनका नाम बताने में झिझक होती है या फिर बताना जरूरी नहीं समझते। वे ये भ्रम भी फैलाते हैं कि इन्हें तो उन्हीं ने ही रचा है। इन भाषणवीरों को पता ही नहीं होता कि कई रातों की जगायी के बाद किसी बेहतरीन कविता और ग़ज़ल का जन्म होता है। लाखों पाठकों की पसंद बनने वाली हर रचना में रचनाकार की अपार मेहनत छुपी होती है। पचासों ग़ज़ले, कविताएं लिखने के बाद भी हर किसी के हिस्से में ख्याति नहीं आती। कुछ ही रचनाएं कालजयी हो पाती हैं। ऐसी कालजयी रचनाओं को अपना अस्त्र-शस्त्र बनाने वाले ताली वीरों को इस हकीकत का आभास दिलाना भी नितांत आवश्यक है। 

पिछले कई वर्षों से हिंदी के ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की ग़ज़ले विभिन्न दिग्गजों के भाषणों की रौनक बढ़ाने का माध्यम बनी हुई हैं। कई राजनेताओं का भी शेरो-शायरी और कविताओं की चुनींदा लाइनों से लगाव अक्सर परिलक्षित होता रहता है। जब उन्हें किसी पर निशाना साधना होता है, अन्यथा सारांश में बड़ी बात कहनी होती है, तब वे किसी शायर, ़ग़जलकार की प्रभावी पंक्तियों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ यह संदेश भी दे देते हैं कि वे भी प्रेरक साहित्य पढ़ने के लिए समय निकालना नहीं भूलते। देश के प्रधानमंत्री तक श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए कविताओं तथा ़ग़जलों की चंद लाइनों का सहारा लेना नहीं भूलते। उनके साहित्य प्रेम पर शंका की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने अपना काफी समय पर्यटन और अध्ययन में व्यतीत किया है। बीते वर्ष जब वे विरोधी सांसदों से मुखातिब थे, तब उन्होंने काका हाथरसी की कविता के इन चंद शब्दों का जो नुकीला तीर छोड़ा था, उससे उन्हें खूब तालियां मिली थीं-

‘‘आगा पीछा देखकर क्यों होते गमगीन

जैसी जिसकी भावना वैसे दिखे सीन।’’

काका हाथरसी शुद्ध हास्य कवि थे। उनके हास्य में व्यंग्य भी रचा-बसा रहता है। मोदी जी को अपने विरोधियों पर व्यंग्यबाण चलाने के लिए उपयुक्त शब्दावली भायी तो उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देने में देरी नहीं की। 

देश के आम आदमी के दिल-दिमाग तक अपना असर छोड़ने वाली ग़ज़लों से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले दुष्यंत कुमार की विभिन्न ग़ज़लों के अंशों को नेताओं के साथ-साथ बुद्धिजीवियों ने भी खूब भुनाया और वाहवाही लूटी है। उनकी लिखी यह पंक्तियां तो कभी ओझल और पुरानी नहीं हुईं-

‘‘मेरे सीने में नहीं तो

तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग... लेकिन

आग जलनी चाहिए।’’

दुष्यंत कुमार ने जिस बेचैन कर देने वाली दूषित व्यवस्था के खिलाफ लिखा, जिन नेताओं और सत्ताधीशों को जीभरकर कोसा, वे भी उनकी ग़ज़लों को अपना हथियार बनाने से नहीं सकुचाते। दुष्यंत कुमार अपनी तीखी तेज-तर्रार ग़ज़लों के जरिए गरीबों, शोषितों, बदहालों और बेबसों को जगाना चाहते थे और शोषकों को इंसानियत की राह पर चलते देखना चाहते थे। आम आदमी के साथ होते घोर अन्याय और उसके निरंतर पिसने और मिटने को लेकर दुष्यंत कितने आहत थे इसका पता उनकी यह पंक्तियां बताती हैं-

‘‘हो गई है पीर पर्वत सी

पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा

निकलनी चाहिए।’’

इसके साथ ही यह पंक्तियां भी काफी असरदार हैं। इनका उपयोग भी नेताओं तथा अभिनेताओं को धड़ल्ले से करते देखा जाता है। सदाचारियों के साथ-साथ दूसरों का हक मारने वाले भ्रष्टाचारी भी इन लाइनों की बदौलत तालियों का आकर्षक उपहार पाते चले आ रहे हैं-

‘‘कौन कहता है, आसमान में

सुराख नहीं हो सकता, 

एक पत्थर तो तबीयत से 

उछालो यारो...।’’

जिस तरह से प्रेमचंद पूंजीवाद, सामंतवाद, ब्राह्मणवाद और सांप्रदायिकता के खिलाफ सशक्त लेखन करते हुए लोगों को जागृत करने की कोशिशें करते रहे, उसी तरह से दुष्यंत कुमार भी जीवनपर्यंत अपने मोर्चे पर डटे रहे। प्रेमचंद का जब निधन हुआ तब वे 56 वर्ष के थे। दुष्यंत तो मात्र 42 वर्ष की उम्र में ही चल बसे, लेकिन दोनों ने ऐसा साहित्य रचा, जिससे उनका नाम अमर हो गया। यह भी सच है कि दोनों ही जिन बुरे लोगों तथा बुराइयों के खिलाफ लड़ते रहे उनका आज तलक अंत नहीं हो पाया है। प्रेमचंद का लेखन आजादी से पूर्व काल का था तो दुष्यंत का देश की स्वतंत्रता के बाद का। यह कहना गलत नहीं है कि दुष्यंत की मशाल-सी ग़ज़लों को प्रचारित प्रसारित करने में उन चेहरों की भी बहुत बड़ी भूमिका है, जो मुखौटे लगाने में अव्वल रहे हैं। जिन नेताओं, राजनेताओं, मंत्रियों, संत्रियों ने देश को लूटा और निचोड़ा वे भी बड़ी होशियारी के साथ दुष्यंत की इन पंक्तियों को गाते, दोहराते नज़र आते हैं- 

‘‘यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां

मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा होगा।’’

यह तस्वीरें ‘मेहनत करे मुर्गी, अंडा खाये फकीर’ की कहावत को भी चरितार्थ करती हैं। जब किसी भ्रष्ट बिकाऊ पत्रकार, संपादक और नेता को रामधारी सिंह दिनकर की कविता की इन पंक्तियों को अपने भाषण में रचा-बसा कर तालियां बटोरते देखा जाता है, तब भी बहुत अचंभा होता है- 

‘‘जला अस्थियां बारी-बारी

चिटकाई जिनमें चिंगारी

जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर 

लिए बिना गर्दन का मोल

कलम, आज उनकी जय बोल।’’

Thursday, August 17, 2023

पाठशाला

    हमारी इसी दुनिया में तरह-तरह के लोग हैं। कुदरत का नियम है जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। कांटे बोने पर फूल कभी नहीं मिलते। इसी तरह से जीवन को जीने के भी नियम-कायदे हैं। तौर-तरीके हैं। कुछ लोग जीवन को खेल समझते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि हर खेल के भी कुछ उसूल होते हैं। अनुशासन होता है। लापरवाही से खेलने वालों को मैदान से बाहर होने में देरी नहीं लगती। सावधानी और दूरदर्शिता की डोर से बंधे खिलाड़ी खुद तो विजयी होते ही हैं दूसरों को भी प्रेरणा देते हैं। नागपुर की निवासी पद्मादेवी सुराना ने कुछ ही दिन पूर्व अपना 103वां जन्मदिन मनाया। आज के दौर में जब कई लोग जीना ही भूल चुके हैं, कई तरह की बीमारियां और चुनौतियां उन्हें डराती रहती हैं, तब इतनी उम्रदराज महिला का यह कहना है कि, ‘अभी तो मेरी और जीने की तमन्ना है। उम्र तो महज एक नंबर है।’ आश्चर्यचकित करने के साथ-साथ उनके प्रति मान-सम्मान की भावना को जगाता है। 4 अगस्त 1920 में जन्मी पद्मादेवी सुराना बचपन से ही अपने रहन-सहन, खान-पान को लेकर अनुशासित रही हैं। छठी कक्षा तक पढ़ीं पद्मा हिंदी और मराठी के साथ अंग्रेजी में भी दक्ष हैं। 103 वर्ष की होने के बावजूद युवाओं की तरह साफ शब्दों में बातचीत करती हैं। वे बच्चों को हमेशा प्रेरित करती रहती हैं कि पहले पढ़ाई करो, फिर मेहनत और ईमानदारी से पैसा कमाओ। जिन्दगी को पूरे मन और ठाठ-बाट के साथ जीने वाले ऐसे सभी योद्धा किसी पाठशाला से कम नहीं। इस पाठशाला के गुरू को कोई दक्षिणा नहीं देनी पड़ती। जितना चाहो, उतना ले लो। ऐसे जीवंत प्रेरणा स्त्रोतों के होने के बावजूद भी कुछ लोग जीवन का मोल नहीं समझ पाते। दुनियादारी की मुश्किलें उनके होश उड़ा देती हैं और वे खुद के लिए बाधा बन जाते हैं। अभी हाल ही में देवदास, जोधा अकबर, लगान जैसी पचासों फिल्मों के लिए बड़े-बड़े सेट डिजाइन करने तथा कई फिल्मों में सशक्त अभिनय करने वाले विख्यात कलाकार नितिन देसाई ने खुदकुशी कर अपने असंख्य चाहने वालो को चौंका और रूला दिया। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें अंतिम विदायी देने, श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एकत्रित हुए विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों को देखकर उनकी लोकप्रियता का पता चल रहा था। परिचितों के साथ-साथ बेगानों को भी गमगीन करने वाली इस खुदकुशी ने फिर कई सवाल खड़े कर दिये, वहीं परिवारजनों को तो जीते जी ही मार डाला। सभी उनसे बेहद प्यार करते थे। बच्चों को अपने पिता पर नाज़ था। उन्होंने कल्पना नहीं की थी कि बेतहाशा कर्ज उनको मरने पर विवश कर देगा। बड़ी मेहनत से खड़े किये स्टुडियो के छिन जाने का भय उनकी जान ले लेगा। वे तो अपने जन्मदाता को लड़ाकू समझते थे, जिसने कई चुनौतियों का डट कर सामना किया था। उनका देश और दुनिया में नाम था। भारत सरकार भी उन्हें पुरस्कृत कर चुकी थी। महाराष्ट्र सरकार ने भी उनकी कला की प्रशंसा करते हुए कई बार सम्मानित किया था। मायानगरी के सभी फिल्म निर्माता, अभिनेता, अभिनेत्रियां उनके कद्रदान थे। ऐसी नामी-गिरामी शख्सियत की खुदकुशी पर उनकी पुत्री को मीडिया से हाथ जोड़कर अनुरोध करना पड़ा कि कृपया मेरे पिताजी की मौत का तमाशा ना बनाएं। 

    सच तो यह है कि इस देश में और भी कई व्यापारी, उद्योगपति, बड़े-बड़े कारोबारी हैं, जिनपर अरबों-खरबों का कर्ज है, लेकिन उन्होंने तो ऐसी कायराना राह पकड़कर अपना तमाशा नहीं बनाया। उनके जीवन का बस यही मूलमंत्र हैं, ‘जान है तो जहान है’। जब तक जिन्दा हैं तब तक हार नहीं मानेंगे। एक बार गिर गये तो क्या हुआ। फिर उठ खड़े होंगे। बैंकों तथा साहूकारों का कर्जा भी उतर जाएगा। संपत्तियां भी फिर से खड़ी हो जाएंगी। अपने अथाह परिश्रम और सूझबूझ की बदौलत उद्योगजगत में अचंभित करने वाली बुलंदियां हासिल करने वाले धीरूभाई अंबानी के दिवंगत होने के बाद उनके दोनों पुत्रों में अनबन के चलते बंटवारा हो गया था। बड़े भाई मुकेश और छोटे भाई अनिल के हिस्से में लगभग बराबर धन-दौलत, व्यापार और संपत्ति आयी, लेकिन कालांतर में मुकेश सफलता की अनंत ऊंचाइयों तक जा पहुंचे और अनिल अपने गलत निर्णयों के कारण लगातार घाटे के गर्त में समाते गये। बैंकों ने उनकी कई बड़ी-बड़ी सम्पत्तियां जब्त कर लीं। बदनामी भी कम नहीं हुई, लेकिन अनिल फिर भी अपना सफर इस उम्मीद के साथ जारी रखे हुए हैं कि आज नहीं तो कल बुरा वक्त जरूर बीतेगा। अच्छे हालातों की खुशियों तथा बुरे हालातों के गमों को सहना ही पड़ता है। यही जीवन की जगजाहिर रीत है।

    फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, जिन्हें आज सदी का महानायक कहा जाता है, उनके करोड़ों प्रशंसक हैं। अस्सी वर्ष से ऊपर के होने के बावजूद मेहनत तथा भागदौड़ करने में युवाओं को मात दे रहे हैं। देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार के लिए उन्हीं की शरण में जाती हैं। इन्हीं अमिताभ पर कभी विपत्तियों का पहाड़ टूटा था। वर्षों तक फिल्मों में अभिनय कर कमाया धन उनकी ही बनायी एबीसीएल कंपनी ने छीनकर उन्हें कंगाल बना दिया था। आर्थिक हालात इतने बदतर हो गये थे कि उन्हें कोई राह नहीं सूझ रही थी। जो फिल्म निर्माता कभी उन्हें अपनी फिल्मों में लेने के लिए तरसते थे, वही उन्हें अब दुत्कारने लगे थे। ऐसे भयावह, चिन्ताजनक दौर में अमिताभ को बस अच्छे वक्त का इंतजार था। उन्होंने हार मानने की बजाय चुनौतियों का मुकाबला करते हुए नई राह चुनी। उनके शुभचिंतकों ने उन्हें बार-बार समझाया कि टेलीविजन उनके लिए नहीं है। वे तो बड़े पर्दे के लिए जन्मे हैं, लेकिन अमिताभ ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से नई धमाकेदार शुरुआत कर जो इतिहास रचा वो हम सबके सामने है। यदि अमिताभ थक-हार कर के बैठे रहते या कोई गलत कदम उठा लेते तो क्या उन्हें यह सुखद दिन देखने को मिलते? उन्हें अकल्पनीय सफलता का स्वाद चखने को मिलता? अपनी दूसरी सफलतम पारी में अमिताभ को जब अभूतपूर्व ऊंचाइयां मिलीं तभी उन्हें सदी के महानायक का ‘तमगा’ मिला। उससे पहले तो लोगों ने उन्हें भूला ही दिया था। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ कार्यक्रम उन्हीं की वाकपटुता की बदौलत पिछले 23 वर्षों से दर्शकों की पहली पसंद बना हुआ है।

Thursday, August 10, 2023

धर्म

चित्र 1 - मेरे मन में अधिकांश माता-पिता को लेकर अक्सर विचार आता है कि विधाता ने उन्हें जिस मिट्टी से बनाया है वो यकीनन आखिर तक अपनी मजबूती नहीं खोती। चट्टानों की तरह मजबूत बन अपनी औलादों के लिए मर मिटने को तत्पर रहती है, लेकिन वहीं अनेकों संतानें सब कुछ पा लेने के बाद अहसान फरामोश क्यों हो जाती हैं? उनका खून पानी क्यों हो जाता है? अपनों के पराये होने के कटु सच से मैं जब-जब रूबरू होता हूं तो यह भी सोचता हूं अपने बच्चों के घातक रंग-ढंग को देखने के बाद भी मां-बाप के होश ठिकाने क्यों नहीं आते? वो उन्हीं राहों पर क्यों चलते रहना चाहते हैं, जिन पर अपनों ने ही कांटे बिछाये। यवतमाल में लावारिस हालत में मिले एक 72 वर्षीय शख्स को नागपुर के मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए लाया गया। जांच में पता चला कि उसे अंतिम चरण का मुख कैंसर है। उसका अब बचना मुमकिन नहीं। सामाजिक कार्यकर्ता इंद्राणी पवार ने उन्हें मेडिकल कॉलेज के निकट स्थित विख्यात सेवाभावी संस्था, ‘स्नेहांचल’ पहुंचा दिया। शहर के परोपकारी जनसेवियों के द्वारा चलाये जा रहे स्नेहांचल में उन मरीजों की देखरेख और सेवा की जाती है, जिनका बचना लगभग मुश्किल होता है। यहां पर वो बेसहारा भी आश्रय पाते हैं, जिनके अपने उन्हें मरने के लिए छोड़ देते हैं। यवतमाल में भिखारी की हालत में मिले कैंसर पीड़ित बुजुर्ग के तीन बेटे और दो बेटियां हैं। पत्नी भी जीवित है। चल फिर सकती है। मरने से पहले उसने अपने सभी से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। परिवार के सभी सदस्यों को खबर भेजी गई। एक बार आकर मिल लो। किसी का भी दिल नहीं पसीजा। यहां तक कि उनकी मृत देह लेने से भी मना कर दिया गया। अंतत: समाजसेवकों ने ही उनका विधिवत दाह संस्कार कर मानवता का धर्म निभाया। 

चित्र 2 - शहर में कई ऐसे कपूत हैं, जो अपने वृद्ध मां-बाप का तिरस्कार कर अपनी ही मौजमस्ती की दुनिया में खोये हैं। जिन माता-पिता ने खून-पसीना बहाकर उनका पालन-पोषण किया, पढ़ाया-लिखाया और कमाने लायक बनाया, उन्हीं को पेट भर खाने के लिए तरसा रहे हैं। उन्हें धक्के मारकर उन्हीं के घर से बाहर खदेड़ रहे हैं। जब तक वे कमा कर खिला रहे थे तब तक अच्छे थे। अब फालतू का सामान लगने लगे हैं। तेजी से विकास पथ पर दौड़ते शहर में वरिष्ठ नागरिकों की ऐसी अनेक शिकायतों का अंबार लगा है। बहू-बेटों, बेटियों के साथ-साथ नाती-पोतों के द्वारा उनके जीवन को नर्क बनाये जाने की खबरों से अखबार भरे नजर आते हैं। अपने उम्रदराज जन्मदाताओं को दाने-दाने के लिए तरसाने वाली शैतान औलादें उन्हें मारने-पीटने से भी नहीं सकुचा रही हैं। जिन बुजुर्गों के पास अपनी जमा पूंजी है, सरकारी पेंशन मिल रही है उनके हालात तो कुछ ठीक-ठाक हैं, लेकिन जिन्होंने इनकी परवरिश में सब कुछ लुटा दिया, उन्हें भिखारी बनाकर रख दिया गया है। जगमगाते शहर में ऐसे कई विजयपत सिंघानिया हैं, जिन्होंने पुत्रमोह के वशीभूत होकर अपने जीते जी अपना तमाम कारोबार और जमीन जायदाद पुत्रों के नाम कर दी और अब लोगों को अपनी व्यथा-कथा सुनाते भटक रहे हैं। वरिष्ठ नागरिकों की शिकायतों और समस्याओं के निवारण के लिए केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय के द्वारा प्रारंभ की गई हेल्पलाइन में पिछले कुछ महीनों से घर, परिवार में अपनों के द्वारा तरह-तरह से प्रताड़ित किये जाने वाले बुजुर्गों की तादाद में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में शहर में माता-पिता, दादा, दादी आदि पर बेतहाशा जुल्म ढाने के मामले सतत सामने आ रहे हैं। यह भी सच है बुढ़ापे के हाथों मिली लाचारी के चलते सभी हेल्पलाइन पर अपना दुखड़ा सुनाने नहीं आ पाते। लोग क्या कहेंगे यह चिंता भी उनके कदम रोक देती है। उन्हें दर-दर की ठोकरें खानी मंजूर हैं, लेकिन अपनी नालायक औलादों को बेनकाब करना मंजूर नहीं।

चित्र 3 - सरकारी नौकरी से रिटायर हुए अशोक वर्मा और उनकी पत्नी को तब बहुत तीखा झटका लगा जब उनके दोनों बेटों ने फोन उठाना ही बंद कर दिया। इस स्वस्थ बुजुर्ग दंपत्ति को मोटी पेंशन मिलती है। दोनों ने अपने बेटों की अच्छी तरह से परवरिश करने में कोई कमी नहीं की थी। उन्हें उच्च शिक्षा दिलवाने के लिए नामी-गिरामी कॉलेजों को चुना। लाखों रुपये का डोनेशन देने में पीछे नहीं रहे। बड़ा बेटा अमेरिका में डॉक्टर है। छोटा सिंगापुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट है। दोनों की शादी में भी उन्होंने शाही खर्चा किया। अपने पैरों पर खड़े होने के कुछ वर्षों बाद ही बेटों ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। पहले तो इस दंपत्ति का इस ओर ध्यान नहीं गया, लेकिन जब बेटों-बहुओं ने अपमानजनक तरीके से उन्हें नजरअंदाज करना प्रारंभ कर दिया तो उनको सच का अहसास हो गया। श्रीमती वर्मा के लिए तो बच्चों का अभद्र व्यवहार असहनीय होता चला गया। वर्मा जी उन्हें समझाते हुए कहते, उनकी अपनी दुनिया है। उन्हें उससे जब फुर्सत नहीं तो तुम क्यों दुखी होती हो। वर्मा जी के छोटे भाई की पत्नी के देहावसान की खबर भिजवाये जाने के बावजूद बहू-बेटे नहीं आए तो वर्मा जी ने अपना मन पक्का कर लिया। ऐसी निर्मोही लापरवाह औलाद की ऐसी की तैसी। जब उन्हें हमारी फिक्र नहीं तो हम क्यों उन्हें याद करें। दोनों  अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और परिचितों में मस्त रहने लगे। 

अभी हाल ही में वर्मा परिवार के पड़ोस में रहने वाले एक सत्तर वर्षीय वृद्ध पिता पर उनके बेटे-बहू ने हाथ उठा दिया, तो वर्मा जी तुरंत पड़ोसी के घर जा पहुंचे और पिता पर हाथ उठाने वाले शैतान बेटे की वो धुनाई की, कि भीड़ जमा हो गयी। पड़ोसियों ने वर्मा जी को यदि रोका नहीं होता तो वे उसको अधमरा करके ही दम लेते। वर्मा जी की पत्नी ने इससे पहले कभी उन्हें इतने गुस्से में नहीं देखा था। पड़ोसियों के लिए भी स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। श्रीमती के बहुत कुरेदने पर वर्मा जी ने अपने दिल की बात इन शब्दों में कही, ‘‘मैं इन अहसान फरामोश बेटे-बहू को बहुत दिनों से अपने माता-पिता को प्रताड़ित करते देखता चला आ रहा था। पहले भी यह दोनों बाप की पिटायी कर चुके हैं, जिसने बेटे के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। इस नालायक ने अपने नेक पिता पर हाथ उठाने से पहले उनके त्याग के बारे में जरा भी नहीं सोचा। इसकी बीवी भी कितनी टुच्ची है जो पति को रोकने-समझाने की बजाय दरिंदगी पर उतर आयी। यह दोनों तो अपने बुजुर्ग माता-पिता को धक्के मारकर घर से बाहर कर देना चाहते हैं, लेकिन मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूंगा। यह आजकल की बदतमीज नालायक औलादें कितनी खुदगर्ज हो गई हैं! जिन्होंने कभी उंगली पकड़कर चलना सिखाया उन्हीं को अपाहिज बनाने पर आमादा हैं। इन दुष्टों को यह भी याद नहीं कि जिन मां-बाप को आज रोने-बिलखने के लिए विवश कर रहे हो उन्हीं ने तुम्हें अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाया। आज जब वे उम्र की उस दहलीज पर हैं, जहां उन्हें तुम्हारे साथ और सहारे की जरूरत है, तब उन्हें अन्न के एक-एक दाने के लिए तरसा रहे हो। उन्हीं के बनाये घर को छीन कर उन्हें बेघर करने का अक्षम्य पाप करने की दुष्टता पर उतर आये हो? यह दरिंदगी मुझसे तो नहीं देखी जाती। मैंने निश्चय कर लिया है कि किसी भी असहाय माता-पिता के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा। अपने आसपास किसी भी नमकहराम को अपने जन्मदाता पर जुल्म ढाते देखूंगा तो शांत नहीं बैठूंगा। पहले प्यार से... फिर दूसरे तरीके से उसके होश ठिकाने लगाकर ही दम लूंगा। जब तक मेरे हाथ पैर में दम रहेगा तब तक अपने इंसान होने के धर्म को निभाने में पीछे नहीं रहूंगा।