Thursday, April 4, 2024

सेलिब्रिटी

     हर बार के चुनाव मेंं कुछ चेहरे अपने अंदर की गंदगी को बड़ी बेशर्मी से उगलने लगते हैं। उनकी विषैली भड़ास हंगामा खड़ा कर देती है, लेकिन उन्हें बड़ा मज़ा आता है। उनका मकसद जो पूरा हो जाता है। ये इतने शातिर हैं कि अपना थूका चाटने में भी नहीं लज्जाते। अपनी कमीनगी का दोष दूसरे पर मढ़ कर खिसक जाते हैं। 2024 का आम चुनाव भी इस कालिमा और कलंक से अछूता नहीं।

    फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत को भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है। वह यहीं की रहने वाली हैं। मायानगरी मुंबई उनकी कर्मभूमि है। किस्म-किस्म की फिल्मों में प्रभावी अभिनय करने के साथ-साथ किसी से भी टकराने का साहस रखने वाली कंगना को जैसे ही टिकट मिली, कुछ लोग भौचक्के रह गये। उन्हें कंगना में हजारों कमियां नज़र आने लगीं। उनकी आंखों के सामने कंगना का फिल्मी चेहरा कौंधने लगा। उन्होंने इस सच को भुला दिया कि किसी भी अभिनेत्री को फिल्म में कहानी के पात्रों को साकार करना होता है। वेश्या और कालगर्ल की भूमिका निभाते समय जिस्म को अधनंगा तो किसी किरदार में बदन को ढक कर रखना पड़ता है। अभिनेत्री का यह असली चेहरा नहीं होता, लेकिन कुछ लोग इस सच को दरकिनार कर अपने मन-मस्तिष्क में कीचड़ भर लेते हैं, जिससे वे कभी भी मुक्त नहीं हो पाते। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत न्यूज चैनलों पर होने वाली विभिन्न परिचर्चाओं में कांग्रेस का पक्ष बड़ी होशियारी से रखती देखी जाती हैं। धारा प्रवाह बोलने का उनका निर्भीक अंदाज दर्शकों को बहुत भाता है, लेकिन  इस राजनीतिक नारी ने लोकसभा का टिकट मिलने के कुछ घण्टों के बाद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट में कंगना की अर्धनग्न तस्वीर डालते हुए लिखा, ‘क्या भाव चल रहा है मंडी में कोई बताएगा?’ सुप्रिया राजनीति में आने से पहले टाइम्स गु्रप में कार्यकारी संपादक रह चुकी हैं। 2019 में पत्रकारिता छोड़कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गईं। उसी वर्ष हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने इन्हें उत्तरप्रदेश के महाराजगंज निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतारा, लेकिन जीत नसीब नहीं  हुई। सुप्रिया श्रीनेत का कंगना के प्रति विष उगलना समझ में आता है। राजनीति में पतन की कोई सीमा  नहीं होती, लेकिन नामी-गिरामी उपन्यासकार, कहानीकार, संपादक मृणाल पांडे इतनी स्तरहीन क्यों हो गईं? उन्होंने एक्स पर लिखा, शायद यूं कि मंडी में सही रेट मिलता है। लेखिका की निगाह में कंगना वेश्या हैं और शहर मंडी कोई वेश्यालय है। भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए खूबसूरत अभिनेत्री को बाज़ार में सजा-धजा कर खड़ा कर दिया है! कभी सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले विख्यात हिन्दी दैनिक हिंदुस्तान की संपादिका रहीं मृणाल पाण्डे वर्तमान में कांग्रेसी मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की संपादिका हैं। मृणाल पाण्डे ने भी सुप्रिया की तरह अपने कांग्रेसी नेताओं को प्रभावित करने के लिए यह घटिया रास्ता चुना। यह अलग बात है कि चौतरफा छीछालेदर होने के बाद मृणाल ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। दूसरी तरफ सुप्रिया को अपने बचाव में यह कहते ज़रा भी शर्म नहीं आई कि किसी ने मुझे बदनाम करने के लिए यह षडयंत्र रचा है। झूठ बोलने के जितने तौर-तरीके सुप्रिया जैसे सेलेब्रिटी औरतों को आते हैं उतने आम औरतों को नहीं आते। 

    कुछ बौखलाये राजनीतिक पुरुषों ने भी कंगना को नीचा दिखाने कोई मौका नहीं छोड़ा। अपने तीखे तेवरों के साथ-साथ खुले विचारों वाली कंगना को भाजपा की टिकट मिलना और भी कई तथाकथित बुद्धिजीवी महिलाओं को रास नहीं आया। कंगना लोकप्रिय अभिनेत्री हैं। बड़ी-बड़ी हस्तियों से टकराने की उनकी हिम्मत को देखकर ही भाजपा ने बहुत सोच-समझ कर उन पर दांव लगाया है। अपने देश में आज भी फिल्मी कलाकारों के प्रति लोगों में आकर्षण और आदर-सम्मान है। दक्षिण भारत में तो सिने कलाकारों को लोग भगवान मानते हैं। इसी हकीकत को भांपते हुए एनटीआर, एमजीआर, जयललिता, करुणानिधि जैसे कई कलाकारों ने राजनीति का दामन पकड़ कई वर्षों तक सत्ता का सुख भोगा। भारतीय जनता पार्टी सितारों पर दांव लगाने के इस खेल में अग्रणी है। 

    भाजपा ने इस बार दूरदर्शन के रामायण सीरियल में भगवान श्रीराम का किरदार निभाकर घर-घर में अपनी पहचान बनाने वाले अरुण गोविल को मेरठ से टिकट दी है। सच तो यह है कि इसमें भी भाजपा की गहरी रणनीति है। चुनावों में वह हर हाल में राम के मुद्दे को जिन्दा रखना चाहती है। तृणमूल कांग्रेस ने लोकप्रिय फिल्मी चेहरे शत्रुघ्न सिन्हा को आसन सोल से टिकट देकर मैदान में उतारा है। शत्रुघ्न सिन्हा ने दूसरे सितारों की तरह राजनीति को हलके में लेने की भूल नहीं की। अभिनेता धर्मेंद्र 2014 में बीकानेर से लोकसभा के लिए चुने गए थे, लेकिन चुनाव के बाद उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र को झांक कर भी नहीं देखा। यही हाल उनके पुत्र सनी देओल का रहा, जिन्हें 2019 में भाजपा ने गुरुदासपुर से टिकट दिया। चुनाव जीतने के बाद वे भी गायब रहे। गुस्सायी जनता को अपने सांसद के गुमशुदा होने के जगह-जगह पोस्टर लगाने पड़े। अभिनेत्री और नृत्यांगना हेमामालिनी ने अपने चुनावी क्षेत्र की कभी अवहेलना नहीं की। 

    अक्सर कहा और पूछा जाता है जब महिलाओं को हर क्षेत्र में पुरुषों के बराबर अवसर देने के ढोल पीटे जाते हैं, तो उन्हें लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अहमियत क्यों नहीं दी जाती? अपने देश में प्रतिभावान नारियों की कहीं कोई कमी नहीं। सभी क्षेत्रों में उन्होंने खुद को स्थापित करने के कीर्तिमान रचे हैं। समुचित अवसर मिलने पर उन्होंने पुरुषों को बार-बार पछाड़ा भी है। अपनी इच्छा के अनुसार मतदान करने वाली जागरूक महिलाएं अपना हक चाहती हैं। वो जमाना गया जब भारतीय नारी अपने पिता, पति, भाई, चाचा, मामा आदि के इशारे पर ईवीएम का बटन दबाती थी। विभिन्न राजनीतिक दलों में महिला कार्यकर्ताओं की जो भीड़ नजर आती है, वह सिर्फ शोपीस बने रहना नहीं चाहती। उनके द्वारा जब टिकट की मांग की जाती है तब सेलिब्रिटी बाजी मार ले जाती हैं। संसद से पारित 33 फीसदी महिला आरक्षण विधेयक हवा-हवाई नज़र आता है...।

Thursday, March 28, 2024

पांव पर कुल्हाड़ी

     संतरों के शहर नागपुर में एक शख्स ने बियर बार में जी भरकर शराब गटकी। बैरे के बिल थमाने पर उसका पारा चढ़ गया। बार संचालक को वह धमकाने लगा। यदि इस इलाके में बार चलाना है तो 5 हजार का हफ्ता देना होगा। बार वाला उसे जानता नहीं था। वह सोच में पड़ गया। यह नया ‘दादा’ कहां से आ टपका! शराबी ने सीना तानते हुए अकड़ दिखायी, तू मुझे जानता नहीं। मेरी ऊपर तक पहुंच है। मेरे ज़रा से इशारे पर पचास-साठ लठैत दौड़े-दौड़े चले आयेंगे। बार के साथ-साथ तेरे भी परखच्चे उड़ा देंगे। बार संचालक ने जब धमकी को अनसुना करने की कोशिश की तो उसने उसके सिर पर कांच का गिलास फोड़ दिया। उसके हिंसक तेवर देखकर जाम से जाम टकराते ग्राहक धीरे-धीरे बिना बिल दिये खिसक लिए। गुंडे ने उसके हाथ से पांच सौ का नोट और गल्ले से दो हजार रुपये लूटे और लड़खड़ाते हुए चलता बना। 

    पुलिस को एक ही परिवार के चार लोगों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे डालना पड़ा। बात बहुत छोटी थी, लेकिन खून बह गया। नागपुर के निकट स्थित वाडी में एक कार चालक को किसी घर के सामने खड़े दोपहिया वाहन को देखकर गुस्सा आ गया। दोपहिया वाहन के कारण उसकी चार चक्के वाली चमचमाती कार को आगे निकलने में कुछ मुश्किल हो रही थी। हॉर्न पर हॉर्न बजाने पर घर के सदस्य जब बाहर निकले तो उन पर गंदी-गंदी गालियों की बौछार की जाने लगी। आसपास के लोगों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर शांत किया। फिर भी कार वाले ने जाते-जाते देख लेने की धमकी दे डाली। आधे घण्टे के बाद तीन-चार लोग घर के सामने आ धमके। इनमें कार चालक के साथ उसका पिता भी शामिल था। बेटा घर मालिक युवक पर चाकू से ताबड़तोड़ वार किये जा रहा था और उसके पिता ने लहुलूहान होते युवक को पीछे से कसकर पकड़-जकड़ रखा था। युवक की पत्नी जब उन्हें रोकने के लिए पहुंची तो उसे भी चाकू से जख्मी कर दिया गया। उससे छेड़छाड़ भी की गई। खून से तरबतर पति-पत्नी को किसी तरह से उनके चंगुल से निकाल कर अस्पताल पहुंचाया गया। पति को 17 टांके लगे। पत्नी के सिर पर भी गंभीर चोटें लगने के कारण मोटी पट्टी बांधनी पड़ी। 

    कोचिंग क्लास में पढ़ाने वाली एक तीस वर्षीय युवती की ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करने वाले युवक से फेसबुक के माध्यम से पहचान हुई। दोनों जवान थे। दोस्ती को प्रेम संबंधों में तब्दील होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। इसी दौरान युवक ने पढ़ी-लिखी फेसबुक मित्र को अपनी कंपनी में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी दिलवाने का आश्वासन दिया। दोनों औरंगाबाद जा पहुंचे। यहां पर कंपनी का मुख्यालय है। वहां दोनों ने एक होटल में कमरा बुक कराया। रात को कमरे में युवक ने बड़ी चालाकी से शीतल पेय में कोई नशीला पदार्थ मिलाकर युवती को पिलाया। वह सुध-बुध खो बैठी। सुबह जब वह नींद से जागी तो उसे पता चला कि उसकी अस्मत लूटी जा चुकी है। युवक ने युवती को शीघ्र्र ही शादी के बंधन में बंधने का विश्वास दिलाया। फिर तो दोनों जब भी मौका पाते एक हो जाते और जिस्मानी प्यास बुझाते। कुछ दिनों के पश्चात युवक की नीयत बदल गई। युवती ने पुलिस स्टेशन जाकर खुद के बरबाद होने की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। युवक फरार है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।

    शहर के एक 49 वर्षीय व्यापारी को 40 वर्षीय खूबसूरत औरत ने फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी। मौजमस्ती के शौकीन व्यवसायी ने अनुरोध को स्वीकार करने में जरा भी देरी नहीं की। फटाफट एक-दूसरे के मोबाइल नंबर भी ले लिये गए। मीठी-मीठी बातचीत के साथ-साथ मिलना-मिलाना भी शुरू हो गया। एक दिन महिला मित्र के निमंत्रण पर व्यापारी निर्धारित होटल जा पहुंचा। कमरा पहले से बुक था। दोनों ने घण्टों साथ रहकर शारीरिक संबंध बनाये। इसी दौरान महिला ने वीडियो-फोटो भी ले लिए। कुछ दिनों के पश्चात महिला ने उस पर शादी का दबाव बनाया। व्यापारी शादीशुदा है। बेटी का विवाह हो चुका है। बेटा भी शादी के लायक है। व्यापारी ने अपनी मजबूरी बतायी, लेकिन महिला अपनी पर उतर आयी। वह उससे बार-बार धन की मांग करने लगी। कुछ ही महीनों में उसने पचास लाख की चपत लगा दी। बदनामी के डर से व्यापारी सब्र का घूंट पीकर शांत रहा। एक दिन महिला अपने आठ-दस रिश्तेदारों को लेकर व्यापारी के घर जा पहुंची और गालीगलौच कर उस पर जीवन बर्बाद करने का आरोप लगाने लगी। व्यापारी की सांसें अटक गयीं। महिला ने तुरंत ही पास की मस्जिद से इमाम को बुलाकर निकाह पढ़ाया, साथ ही जबरन उसके घर में रहने लगी। कुछ हफ्तों के बाद वह महंगे फ्लैट की मांग करने लगी। व्यापारी के इनकार करने पर उसने अश्लील तस्वीरों को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। व्यापारी के सब्र का बांध टूटा तो वह थाने जा पहुंचा। वहां उसे पता चला कि महिला तो पहले ही सात शादियां कर चुकी है। शादी पर शादी कर लूटना ही उसका पेशा है। दरअसल, ऐसी वारदातें, नगरों, महानगरों में वर्षों से होती चली आ रही हैं। फेसबुक पर होने वाली मायावी, कपटी मित्रता के फलस्वरूप होने वाली धोखाधड़ी, लूटपाट और तरह-तरह के घात का खुलासा अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर होता रहता है। कुछ लोग सतर्क हो जाते हैं। कुछ लोग यह सोचकर मदमस्त रहते हैं कि जिन्होंने धोखा खाया वे बेवकूफ और नादान हैं। हम तो अक्लमंद हैं। हमारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। फेसबुक के आभासी संसार में सक्रिय किस्म-किस्म के ठग, लुटेरे, धूर्त, चालबाज चेहरों को ऐसे ही मदमस्त शिकारों की तलाश रहती है और यह अति बुद्धिमान ‘आ बैल मुझे मार’ की कहावत को खुद पर चरितार्थ कर अंतत: माथा पीटते देखे जाते हैं। क्षणिक आवेश में आकर अपराधी बनने वाले भी हर हश्र से वाकिफ होते हैं। फिर भी गुनाह करने से बाज नहीं आते। दूसरों की दुर्गति से सबक न लेकर खुद को कलंकित और तबाह करने वालों का तो भगवान ही मालिक है...।

Thursday, March 21, 2024

आतंकवादी

    बीते दिन एक फिल्म देखी! ‘बस्तर: द नक्सल स्टोरी’! छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सली वर्षों से खून-खराबा करते चले आ रहे हैं। उनकी खूनी आतंकी रफ्तार से सरकारें भी हिलती रही हैं। फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो जिस गांव में जन्मे वह बस्तर से मात्र 40 किलोमीटर दूर है। विवादास्पद फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को बनाने का श्रेय भी सुदीप्तो को ही जाता है। भयावह सच को दिखाना उनका फिल्म बनाने का मकसद है। ‘द नक्सल स्टोरी’ फिल्म के रिलीज से पहले गीत, वंदे वीरम के लांच के दौरान मुंबई में उन्होंने बस्तर इलाके के 14 शहीद जवानों के परिजनों को निमंत्रित कर पत्रकारों से मिलवाया था। शहीदों के परिजनों ने मंच पर बस्तर में वर्षों से हो रहे नरसंहार की पीड़ादायी हकीकत बयान कर अपनी आपबीती सुनाई। बस्तर का नाम सुनते ही मन भयभीत हो जाता है। फिल्म का ट्रेलर और गीत देख-सुनकर सभी की आंखें नम होती रहीं। यहां रोज औसतन 4-5 लोगों की निर्मम हत्या कर दी जाती है। बस्तर में नक्सलियों ने गरीब आदिवासियों को अपना गुलाम बना रखा है। उन्हें नक्सलियों के नियम-कानूनों का मजबूरन पालन करना पड़ता है। बस्तर के घने जंगलों में करीब साढ़े तीन हजार बस्तियां हैं। यहां हर मां को अपना एक बच्चा नक्सलियों को देना पड़ता है। मना करने पर पूरे परिवार का खात्मा कर दिया जाता है। बस्तर में 57 सालों में 55 हजार जवान शहीद हो चुके हैं। 

    लेकिन, गुस्सा दिलाने वाला एक सच यह भी है कि अपने ही देश में कुछ देशद्रोही चेहरे ऐसे हैं जिनको जवानों की शहादत पर ज़रा भी गम नहीं होता। नक्सलियों को मार गिराये जाने पर उनकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगती है। मानवाधिकार का झंडा उठाकर सड़कों तथा अदालतों के चक्कर लगाने लगते हैं। नक्सलियों के शुभचिंतकों को भी राष्ट्र स्वाभिमान और राष्ट्र विकास से चिढ़ है। शहरी नक्सली खुद को मानवता के रक्षक दर्शाते हैं, लेकिन आतंकवादियों के पक्ष में ही खड़े नजर आते हैं। नक्सलियों को हथियार तथा धन उपलब्ध कराने की उनकी शर्मनाक भूमिका राष्ट्रभक्तों का खून खौलाती है। शासन, प्रशासन की सक्रियता से कभी-कभार यह तथाकथित बुद्धिजीवी पकड़ में भी आते हैं। इनके पक्ष में इन्हीं के रंग में रंगे चेहरों का हो-हल्ला गूंजने लगता है। देश की राजधानी दिल्ली, मायानगरी मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, रांची, हैदराबाद, विशाखापट्टनम, पुणे, नागपुर जैसे नगरों, महानगरों में जो शहरी नक्सली चोरी-छिपे सक्रिय हैं, उनका मुख्य एजेंडा शहरों में नक्सलवाद का गुणगान करना और लोगों को नक्सली विचारधारा से जोड़ना है। 

    ऐसा भी होता रहता है कि असली शैतानों के साथ-साथ कुछ बेकसूर भी पुलिस के शिकंजे का शिकार हो जाते हैं। पुलिसिया भूल और जल्दबाजी की वजह से उन्हें सालों जेल में सड़ना पड़ता है। उनकी जिन्दगी के कई वर्ष बर्बाद कर दिये जाते हैं। उनके मान-सम्मान पर भी जो दाग लगते हैं वे भी बड़ी मुश्किल से धुल पाते हैं। कुछ भारतीयों ने इस नाइंसाफी को वर्षों तक झेला है। उन्हीं में से एक हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा। माआवादियों से कथित संबंध रखने के आरोप में दस साल जेल में रहने के पश्चात बम्बई हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में बरी किए गए साईबाबा के दर्द को कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। नागपुर केंद्रीय जेल से सात वर्षों के बाद बाहर निकलने के बाद उनके शब्द थे ‘‘मुझे अभी भी ऐसा लग रहा है जैसे मैं जेल में ही हूं।’’ नक्सलियों से करीबी रखने और उन्हें खून-खराबा करने के लिए उत्साहित करने के संगीन आरोप में साईबाबा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी थी। उन्हें खतरनाक आतंकवादी भी कहा गया था। जेल में मर-मर कर गुजारे पलों को याद करते हुए साईबाबा इस कदर भावुक हो जाते हैं कि उनकी आंखें भीगी-भीगी हो जाती हैं। पिछले सात वर्षों में उनके परिवार ने कैसी-कैसी तकलीफें झेलीं, बिना कोई गुनाह किये लोगों की नजरों में अपराधी बन उनके तानों, नुकीले व्यंग्य बाणों की मार से सतत लहुलूहान होना पड़ा। जेल में बंद रहने के दौरान साईबाबा को खुद से ज्यादा अपने परिजनों की चिंता सताती थी। साईबाबा दिव्यांग हैं। विकलांगता निरंतर बढ़ती चली जा रही है। चलने-फिरने से एकदम लाचार हैं। व्हीलचेयर ही उनका एकमात्र सहारा है। उन्हें यह सच भी शूल की तरह चुभता है कि अपने देश में इंसाफ का चक्का बहुत धीमे चलता है। बेकसूरों को वर्षों तक न्याय पाने की राह देखनी पड़ती है। कुछ तो इंतजार करते-करते मौत के आगोश में समा जाते हैं। उन्हें आज भी 22 अगस्त, 2013 का वो दिन याद है जब उन्हें गड़चिरोली के अहेरी बस अड्डे से गिरफ्तार किया गया। दूसरे दिन के अखबारों में पहले पन्ने पर मोटे-मोटे अक्षरों में छपा था, ‘खतरनाक आतंकवादी’ खूंखार हत्यारे, नक्सलियों का साथी, प्रोफेसर जी.एन.साईबाबा बड़ी मुश्किल से पुलिस की पकड़ में आया। यह पढ़ा-लिखा शहरी नक्सली जंगल में रहने वाले देश के दुश्मन नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक है। न्यूज चैनल वालों ने इस शहरी नक्सली को उम्र भर जेल में सड़ाने की पुरजोर मांग करते हुए देशवासियों से अपील की थी कि ऐसे हर देशद्रोही से सतर्क और सावधान रहें। तभी साईबाबा ने देखा और जाना था कि लोगों की निगाहों ने तुरंत उन्हें अपराधी मान लिया है। कल तक जो लोग इज्जत से पेश आते थे अब नफरत करने लगे थे। 

    कुछ दिन पहले मैंने पुरानी दिल्ली के रहने वाले मोहम्मद आमिर खान की आपबीती किसी अखबार में पढ़ी। इस युवक को आतंकवादी होने के झूठे आरोप में 14 वर्ष तक जेल में रहना पड़ा। उन्हीं की लिखी ‘आतंकवादी का फर्जी ठप्पा’ नामक किताब में व्यवस्था के अंधेपन को उजागर करने का साहस दिखाया गया है। आमिर तब लगभग अठारह वर्ष के थे जब बम विस्फोट और हत्या के लिए दोषी मानते हुए जेल में डाल दिया गया। पुलिस रिमांड में उन्हें अमाननीय यातनाएं दी गयीं। जो अपराध उन्होंने किया ही नहीं था उसे कबूलने के लिए जिस्म की हड्डी-हड्डी तोड़ी गई। किसी से मिलने नहीं दिया गया। पिता के गुजरने पर उन्हें सुपुर्द -ए-खाक भी नहीं कर पाए। यह वही पिता थे, जिन्होंने बेटे के इंसाफ के लिए अपना घर-बार तक बेच डाला था। जेल की काली कोठरी में अपनी जवानी को गला कर आमिर जब 14 साल बाद बाहर निकले तो पूरी दुनिया ही बदल चुकी थी। कई डरी -डरी निगाहें उन्हें ऐसे ताक रही थीं जैसे कोई जंगली जानवर शहर में जबरन घुस आया हो...।

Thursday, March 14, 2024

बाज़ार

    दूसरे उत्सवों की तरह शादी-ब्याह भी उत्सव का मज़ा देते हैं। विवाह बंधन में बंधने वाले जोड़े के साथ-साथ घर, परिवार यार-दोस्त और रिश्तेदार अधिक से अधिक पहचान वाले, अड़ोसियों, पड़ोसियों, दूर पास के यारों, रिश्तेदारों से आत्मीय मेल-मुलाकात का सुअवसर भी होते हैं शादी-ब्याह के विभिन्न आयोजन। अपने देश में शादियों को स्टेटस सिंबल के तौर पर भी देखा जाता है। अपना रुतबा और जलवा दिखाने के लिए बढ़-चढ़कर धन खर्च करने के इस अवसर पर होड़ भी खूब देखी जाती है। गरीब हो चाहे अमीर सभी अपनी-अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर शादी के उत्सव को यादगार बनाने की भरसक कोशिश करते हैं। यहां तक कि बैंकों तथा साहूकारों से कर्जा लेकर अपनी हसरतें पूरी करने में संकोच नहीं किया जाता। शादी को सात जन्मों का बंधन भी कहा जाता है। इस पवित्र बंधन को कितने जोड़े निभा पाते हैं। वो अलग बात है। वफा, पवित्रता, आत्मीयता और मजबूती के साथ स्त्री-पुरुष को बांधे रखने के लिए ही कभी विवाह के प्रचलन की नींव पड़ी थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि, आज से लगभग 4 हजार साल पूर्व शादी ने एक सामाजिक संस्था के रूप में अपनी पहचान बना ली थी। 

    एक समय ऐसा भी था जब मानव विभिन्न जानवरों का शिकार कर अपना पेट भरता था। स्वयं को जानवरों से सुरक्षित रखने के लिए समूहों में रहना उनकी मजबूरी थी। एक समूह में पच्चीस से तीस के आसपास लोग होते थे। इन समूहों के लीडर दो-तीन  पुरुष होते थे जो अपनी मर्जी से समूह की कई महिलाओं के साथ शारीरिक संबंध बनाते थे। बाकी तो मन मारकर रह जाते थे। इन महिलाओं से जन्म लेने वाले बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी पूरे समूह की होती थी, लेकिन इस मामले में संतानों के साथ इंसाफ नहीं हो पाता था। लीडर और एक दो को छोड़कर बाकी के मन में यह बात घर किये रहती थी कि जब बच्चे उनके हैं हीं नहीं तो वे उनकी परवरिश पर क्यों ध्यान दें। संतान के पिता की पहचान के संकट के खात्मे के उद्देश्य से की शादी-ब्याह का रास्ता चुना गया। एक महिला की एक पुरुष से शादी का पहला सबूत 2,350 ईसा पूर्व मेसोपोटामिया में मिलता है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि भारत में वैदिक काल से विवाह एक जरूरी धार्मिक और पवित्र संस्कार था। पति-पत्नी मिलकर यज्ञ करते थे और पुत्र पैदा करना शादी का जरूरी मकसद होता था। पुरातन काल में भी शादी-विवाह को भव्यता प्रदान करने का चलन था। धार्मिक पौराणिक विवाहों में दान-दहेज का भी रिवाज था। रामायण में राम और सीता के भव्य विवाह के उल्लेख के साथ राजा जनक के द्वारा अपनी पुत्री सीता को हजारों हाथी, घोड़े, गाएं और सोने-चांदी के आभूषण उपहार में देने का वर्णन है। इसी तरह से महाभारत में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यू और उत्तरा की भव्य शादी में गीत, नृत्य, गायन, मदिरा और महंगे उपहारों की झड़ी लगा दी गयी थी। वो राजा-महाराजाओं का जमाना था। उन्हीं की चलती थी। प्रजा तो बस मूकदर्शक होती थी। राजतंत्र कब से भारत से विदा हो चुका। आज जनतंत्र है। जनता ही राजा है, लेकिन फिर भी जनता की ही बदौलत धनवान बने धनपति खुद को राजा-महाराजा से कम नहीं मानते। उन्हें इस सच से कोई लेना-देना नहीं है कि उनकी गगन चुम्बी तरक्की में असंख्य लोगों के खून-पसीने का योगदान है। नेता, राजनेता, मंत्री, संत्री और उद्योगपति अपने बीते कल को विस्मृत करने में जरा भी देरी नहीं लगाते। अपने बेटे-बेटियों की सगाई और शादी ब्याह में अंधाधुंध धन की बरसात कर खुद को महाराजा साबित करने का मौका नहीं गंवाते। अभी हाल ही में भारतवर्ष के सबसे उद्योगपति अमीर मुकेश अंबानी ने अपने छोटे बेटे अनंत की प्री-वेडिंग सेरेमनी में  1000 करोड़ से ज्यादा रुपये खर्च डाले। देश और दुनिया की हजारों अति विशिष्ट हस्तियों को इस महाआयोजन में निमंत्रित कर अपने व्यक्तिगत आयोजन को ऐसी मंडी की शक्ल दे दी, जहां बड़े-बड़े धुरंधर बिकने को मजबूर हो गए। उन्हें बस अपनी कीमत बतानी थी। तमाम न्यूज चैनल वाले भी मुकेश अंबानी तथा उनके पुत्र की दयालुता और हिम्मत की गाथाओं के पन्ने खोले जा रहे थे। बार-बार राग गा रहे थे कि कभी 208 किलो के वजन वाले अनंत ने प्रतिदिन इक्कीस किलोमीटर की छह घंटे के कड़े विभिन्न व्यायाम और जंक फूड का पूरी तरह से त्याग कर अपना 100 किला वजन कम कर दिखा दिया है कि वो जो ठान लेते हैं उसे साकार करके ही दम लेते हैं। अनंत जमीन से जुड़े पिता के आज्ञाकारी बेटे हैं। खरबपति परिवार में जन्म लेने के बाद भी उनकी जिन्दगी संघर्ष भरी रही है। आज भी वह स्वास्थ्य समस्याओं से घिरे हैं। संस्कारी परिवार के इस बेटे ने संस्कारी लड़की राधिका को अपनी जीवनसाथी बना कर सभी का दिल जीत लिया है। अंबानी परिवार ने इस अपार तामझाम भरी प्री-वेडिंग को विज्ञापित कर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों जरूर बटोरीं, लेकिन उन पर ऐसे-ऐसे सवालों की झड़ी भी लगी रही, जिनके जवाब नदारद रहे। धन कुबेर मुकेश अंबानी ने 2018 में अपनी इकलौती बेटी ईशा की शादी में 800 करोड़ उड़ा कर भी सुर्खियां बटोरी थीं। तब इसे भारत की सबसे महंगी शादी प्रचलित किया गया था। अब 2024 में अपने बीमार दुलारे को खुश करने के लिए 1000 करोड़ खर्च कर डाले। उनके लिए इतना धन हाथ का मैल है। वे जितना रुपया उड़ाना चाहें, कोई उन्हें नहीं रोकने वाला। यह तो खुद की सोच और विवेक का मामला है। धार्मिक प्रवृत्ति के मुकेश को विभिन्न साधु-संतों तथा प्रवचन कारों के सानिध्य में भी देखा जाता है। मोहन यादव वर्तमान में देश के विशाल प्रदेश मध्यप्रदेश के सम्मानित मुख्यमंत्री हैं। वर्षों से राजनीति में हैं। मुख्यमंत्री बनने के पश्चात वे अपने बेटे की शादी का न्यौता देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निवास पर गये थे। मोदी जी ने उन्हें असीम मंगलकामनाओं के साथ एक बात कही, ‘‘अब आप प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। किसी भी ऊंचे पद पर पहुंचने के बाद लोगों की अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। वे अच्छा होते देखना चाहते हैं। जनप्रतिनिधि हों या उद्योगपति, उन्हें बहुत सोझ-समझ कर चलना चाहिए। अपने परिवारिक समारोहों में अत्याधिक दिखावे और फिजूल खर्ची से बचना चाहिए। आचार, व्यवहार और विचार के प्रभावी संदेश से ही दूरगामी आदर्श स्थापित होते हैं। मुकेश अंबानी को अथाह धन फूंक कर भले ही संतुष्टि मिली हो, लेकिन आम लोगों को उनका यह रंगारंग तमाशा अच्छा नहीं लगा। उनकी यह सोच फिर से बलवति हुई है कि अपने देश के अधिकांश धनपतियों का जन सरोकार से कोई वास्ता नहीं। उनके लिए अपना परिवार ही सर्वोपरि है।

Thursday, March 7, 2024

भक्षक-संरक्षक

    सोचें तो माथा घूम जाता है। पैरोंतले की जमीन खिसकती लगती है। आजाद भारत में इतने जुल्म! गुंडागर्दी, लूटमार, बलात्कार। और भी न जाने कैसे-कैसे जुल्मों-सितम। हिसाब लगाना मुश्किल। पश्चिम बंगाल के संदेशखाली पहुंचे पत्रकारों के हृदय के साथ-साथ कान भी कांप रहे थे। मंजर ही कुछ ऐसा था, जो रोंगटे खड़े कर रहा था। शेख शाहजहां उसका नाम था। ऊपर से नीचे तक दुष्कर्मी, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, बलात्कारी और भू-माफिया शेख शाहजहां ने दरअसल संदेशखाली में शासन और प्रशासन को अपनी मुट्ठी में कर आतंकी दबदबा बनाया था। दूर-दूर तक उसकी तूती बोलती थी। कोई उसके विरोध में आवाज नहीं उठा पाता था। महिलाएं तो उसका नाम सुनते ही कांपने लगती थीं। रात होते ही अपने-अपने घरों में दुबक जाती थीं। फिर भी जो औरत, लड़की उसे और उसके साथियों को पसंद आ जाती, कदापि बच नहीं पाती थी। उसे जबरन उसके घर से उठवा लिया जाता था। शाहजहां पूरी तरह से हैवान बन चुका था। बांग्लादेश से चोरी-छिपे पश्चिम बंगाल आया शाहजहां कभी मजदूरी करता था। सत्ताधारी दल के नेताओं के लालची सहयोग ने देखते ही देखते उसे बेताज बादशाह बना दिया। गरीब कल्याण और स्थानीय विकास की योजनाओं में जमकर घोटाले कर उसने चंद वर्षों में अकूत धन-संपत्ति बनायी। पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा चुनाव तक स्थानीय मतदाताओं को डरा-धमका कर तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग करवाने वाले शाहजहां के राजनीतिक आकाओं की लिस्ट बहुत लंबी थी। पुलिस प्रशासन भी उससे घबराता था। 2024 के पांच जनवरी के दिन ईडी की एक टीम, सीआरपीएफ के टुकड़ी के साथ बीस हजार करोड़ के राशन घोटाले के इस सरगना के ठिकानों पर छापेमारी करने पहुंची तो उसने पकड़ में आने से बचने के लिए अपने पाले-पोसे गुंडों से टीम पर ही जानलेवा हमला करवा दिया और खुद फरार हो गया। पचपन दिनों तक गायब रहने के बाद बड़ी मुश्किल से वह पुलिस के हाथ लग पाया। 

    उसकी मनचाही फरारी के दौरान उसके रक्तपात से सने गुनाहों के काले चिट्ठे एक-एक कर खुलते चले गये। महिलाओं पर ढाये गये कहर और बर्बरता के किस्सों को सुनकर हर किसी के रोंगटे खड़े होने लगे। बीस साल की वर्षा का तो तब मुंह खोलने का साहस ही नहीं था। शाहजहां की गिरफ्तारी के बाद कॉलेज की छात्रा वर्षा ने अंतत: भय को अपने अंदर से बाहर निकाल फेंका। शाहजहां का नाम लेते ही वह गुस्से से लाल हो जाती है। गालियों की बौछार करते हुए कहती है कि शाहजहां इंसान नहीं, दरिंदा है। व्यवस्था का पाला-पोसा क्रूरतम भक्षक है। इस जैसा चरित्रहीन और कोई हो ही नहीं सकता। दूसरों की मां, बहन, बेटी, बहू को बाजारू समझता है। संदेशखाली में इसकी सतायी अनगिनत महिलाएं हैं, जो किसी भी हालत में अपनी पहचान उजागर नहीं होने देंगी। इसने तथा इसके कुकर्मी साथियों ने पूरे इलाके की औरतों का जीना मुहाल कर रखा था। अंधेरा घिरते ही ये वहशी तांडव मचाने लगते थे। जिस घर-परिवार की लड़की, औरत, बहू, बेटी इन्हें पसंद आती उसकी तो जैसे शामत आ जाती। जबरदस्ती उसे अपने साथ ले जाते। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कार्यालय में ले जाकर रात भर बलात्कार करते। जब मन भर जाता तो इस आदेश के साथ छोड़ते कि फिर हम जब बुलाएं तो बिना किसी ना-नुकर के चली आना। कोई बहाना नहीं चलेगा। तुम्हारे मां-बाप, पति, भाई आदि से हम देख लेंगे। 

    शारदा पचास की हो चुकी है। उसकी तीन बेटियां हैं। दो जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी हैं। शारदा को वो मंजर भुलाये नहीं भूलता जब शाहजहां के गुंडे उसकी बड़ी बेटी को रात को उठा कर ले गये थे। दो दिन के बाद लहुलूहान, लुटी-पिटी बेटी घर लौटी थी तो घंटों फूट-फूट कर रोती रही थी। वह बार-बार कहती रही थी कि वह अपवित्र हो चुकी है। उसकी वापस घर लौटने की हिम्मत ही नहीं थी। कुएं में छलांग लगाकर मर जाना चाहती थी, लेकिन अपनी दोनों छोटी बहनों की चिंता ने उसके पांव में बेड़ियां पहना दीं। वह गुंडों के समक्ष हाथ जोड़ती रही, लेकिन उन्होंने अपनी मनमानी करके ही दम लिया। जिस्म को रौंदने के साथ-साथ जालिमों ने उसे अंधाधुंध मारा-पीटा। पच्चीस वर्षीय रानी को संदेशखाली आये अभी पंद्रह दिन ही हुए थे। शादी के पांचवे दिन उसका पति नौकरी बजाने शहर चला गया था। हाथों में लाल चूड़ियां और माथे पर बड़ी-सी बिंदी लगाये रानी खुशी-खुशी बाजार में सब्जी लेने के लिए गई थी, तभी शाहजहां की उस पर काली नजर जा पड़ी थी। आधी रात को किसी गुंडे ने घर के दरवाजे की कुंडी खटखटायी थी। बूढ़े ससुर ने डरते-डरते दरवाजा खोला था। रानी गहरी नींद में थी। उसे जबरन खटिया से उठा कर शाहजहां के हवेलीनुमा घर में बिस्तर पर पटक दिया गया था। शाहजहां और उसके साथी भूखे भेड़िये की तरह उस पर टूट पड़े थे। तीसरे दिन की सुबह जब रानी को उसके घर ले जाकर छोड़ा गया था, तब वह अधमरी हो चुकी थी। शाम को उसे होश आया था। उसके ससुर का रो-रोकर बड़ा बुरा हाल हो चुका था। रानी को घर लेकर पहुंचे गुंडों ने उसे चेताया था कि जब भी बुलावा आए तब फौरन इसे शाहजहां की कोठी में लेकर पहुंच जाना। कोई होशियारी की तो हड्डी-पसली तोड़कर अपाहिज बना देंगे। रानी के ससुर ने दूसरे ही दिन सामान बांधा था और बहू को साथ लेकर अपने बेटे के पास शहर जा पहुंचा था। हताश-निराश ससुर ने बस में बहू से हाथ जोड़कर विनती की थी कि उसके साथ जो हुआ उसे वह बुरा सपना समझ कर भूल जाए। अपने पति को कुछ भी न बताए। 

    संदेशखाली जहां पर शाहजहां ने अपने भाई तथा चंद शैतान साथियों के साथ वर्षों तक अपना शासन चलाया, वह बांग्लादेश का सीमावर्ती क्षेत्र है। सुंदरवन से घिरा यह इलाका अनुसूचित जाति और जनजाति बहुल है। शाहजहां के ठिकाने पर यदि ईडी नहीं पहुंचती तो यहां की असंख्य दलित और आदिवासी महिलाओं पर हुए घोर अत्याचार और बलात्कार की अनगिनत घटनाओं का देशवासियों को पता ही नहीं चल पाता। यह भी सच है कि शाहजहां की गुंडई को यदि राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलता तो उसकी हैवानियत इस कदर नहीं फल-फूल पाती। यह उसका दबदबा ही था कि पुलिस भी उसकी साथी बनी हुई थी। लोग उसकी शिकायतें लेकर थाने जाते और वर्दीधारी शाहजहां और उसके पाले-पोसे गुंडों को शिकायतकर्ताओं के नाम और पत्तों से अवगत करा देते। मुंह खोलने का साहस दिखाने वाले की फिर वो शामत आती कि उसकी हड्डी-पसली एक हो जाती। बहन, बेटी, बहू की इज्जत भी सलामत न रह पाती। तृणमूल कांग्रेस के नेता शाहजहां ने लोगों की खेती की जमीनें छीन कर वहां छोटे-बड़े तालाब बना दिए और उनमें खारा पानी भर दिया। जहां कभी विभिन्न फसलों की पैदावार होती थी वहां मछली पालन कर करोड़ों की कमायी की जाने लगी। शाहजहां तथा उसके आतंकी गुर्गों ने खेल के अनेकों मैदान भी कब्जा लिए। जिन किसानों की जमीनें छीनी गयीं उन्हें एक धेला भी नहीं दिया गया। उलटे मार-पीटकर कही दूर भागने को मजबूर कर दिया गया। हजारों बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत की ज़मीन पर बसाने वाला जन्मजात अपराधी शाहजहां वर्षों तक खतरनाक हथियारों से लेकर गो-तस्करी और सोना तस्करी करता रहा, लेकिन शासन और प्रशासन ने आंखे और कान बंद रखे। इस सच को याद रखा जाना चाहिए कि जैसे ही लोगों को पता चला कि शेख शाहजहां लंबे समय तक जेल में सड़ने वाला है और उसके आकाओं ने फिलहाल उसके सर से संरक्षण के हाथ खींच लिये हैं, तो उन्होंने एकजुट होकर शाहजहां और उसके साथियों के घर पर हमला बोल दिया और यह संदेश भी दे दिया कि अपराधियों के आतंक का भय तभी तक रहता है, जब तक राजनेता और नौकरशाह उनके साथ बने रहते हैं।

Thursday, February 29, 2024

अक्ल और नकल

     उत्तरप्रदेश के शहर कन्नोज के एक होनहार युवक ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। आपके मन में यह बात आ सकती है कि यह कौन सी नई बात है। अपने देश में युवाओं का मौत को गले लगाना तो आम बात है। कोई दिन ऐसा नहीं बीतता जिस दिन किसी न किसी अखबार में यह खबर पढ़ने में न आती हो कि परीक्षा में फेल होने, नौकरी नहीं लगने, प्यार में धोखा खाने या किसी अन्य वजह से परेशान होने की वजह से युवक या युवती ने खुदकुशी न की हो। अच्छे खासे युवाओं की तनाव की वजह से आत्महत्या करने की खबरें भी देशवासियों के लिए रोजमर्रा की हकीकतें हैं। ब्रजेश पाल ने हाल ही में यूपी पुलिस में भर्ती होने के लिए परीक्षा दी थी। सरकारी नौकरी हासिल कर अपने परिवार को खुशहाल बनाने का उसका सपना था। इसके लिए उसने महीनों टूटकर मेहनत की थी। पेपर भी उसने अच्छे से हल किया था। उसने अपने दोस्तों से कहा भी था कि, उसका चयन होना निश्चित है, लेकिन जैसे ही उसे पेपर के लीक होने की खबर लगी तो उसे बहुत धक्का लगा। उसे लगने लगा कि उसका सपना अब पूरा नहीं हो पायेगा। वो लोग बाजी मार लेंगे, जिन्होंने जोड़-जुगाड़ कर पहले ही पेपर हासिल कर लिया था। उसकी अटूट मेहनत और डिग्री के कोई मायने नहीं हैं। निराशा से घिरा ब्रजेश चुप-चुप रहने लगा था। घरवालों से भी बात करने से कतराने लगा था। उसे बस यही चिंता खाये जा रही थी कि, उसके भविष्य का क्या होगा? आधी उम्र पढ़ते-पढ़ते निकल गई। ऐसी पढ़ाई का क्या फायदा जो एक नौकरी न दिला सके। वह कब से सोचता आ रहा था कि, नौकरी लगने के बाद फटाफट पैसे जमा कर सबसे पहले किसी योग्य युवक से अपनी बहन की शादी करवायेगा। 22 फरवरी, 2024 की देर रात ब्रजेश ने आखिरकार फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘‘मां और बाबूजी, मुझे माफ कर देना। आप दोनों को मुझसे बहुत सी उम्मीदें थीं, लेकिन मैं आपको धोखा देने जा रहा हूं। मेरी मौत के बाद किसी को परेशान ना किया जाए। मैं अब और नहीं जीना चाहता। बस मेरा मन भर गया है। मेरी प्यारी मां, बाबूजी का ख्याल रखना और बोल देना कि हमारा तुम्हारा इतना ही साथ था। मेरी बहन संगीता की शादी अच्छे से लड़के से करना, भले ही हम नहीं होंगे। हमने बीएससी के सारे कागज जला दिए हैं। ऐसी डिग्री का क्या मतलब जो व्यर्थ हो। हमारी आधी उम्र इस डिग्री को पाने के लिए निकल गई।’’

    परीक्षा में पेपर लीक होने के बाद युवा सड़कों पर उतर आये। ऐसा भी नहीं कि यूपी में पहले कभी पेपर लीक नहीं हुए हों। परीक्षा के पेपर खरीदकर बिना मेहनत किये सफलता का झंडा नहीं गाड़ा गया हो, लेकिन इस बार यह धांधली चुनावी मौसम में हुई। लोकसभा चुनाव निकट होने के कारण उत्तरप्रदेश तथा केंद्र सरकार को चिंता और बेचैनी ने घेर लिया। क्रोध में उबलते छात्र-छात्राओं का कहना था कि हम लोग दिन-रात परीक्षा की तैयारी करते हैं। मां-बाप की हैसियत नहीं होती फिर भी उनका खर्चा करवाते हैं। उन्हें बेहतर भविष्य के सपने दिखाते हैं, लेकिन जब परीक्षा देने जाते हैं, तो पता चलता है कि, पेपर तो लीक हो चुका है। उसे परीक्षा के दिन से पहले ही धनवानों ने खरीद कर अपना मकसद पूरा कर हमारी मेहनत पर पानी फेर दिया है। हम मर-मर कर परीक्षा की तैयारी करते हैं, ताकि कुछ बन जाएं, लेकिन बाजी दूसरे मार ले जाते हैं। यह अन्याय वर्षों से हमारे साथ होता चला आ रहा है। पेपर माफिया और नकल माफिया को शासन और प्रशासन के लोग भी जानते हैं। इनकी आपसी मिलीभगत का भी कई बार पर्दाफाश हो चुका है। युवाओं के आक्रोश और विपक्ष के द्वारा इसे चुनावी मुद्दा बनाने की प्रबल संभावना को देखते हुए यूपी सरकार ने परीक्षाओं को रद्द करते हुए छह महीने के भीतर दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा कर दी। हर बार की तरह सरकार ने यह आश्वासन भी दिया कि आगे से किसी भी परीक्षा में धांधली नहीं होने दी जाएगी। 

    सच तो यह है कि परीक्षाओं में नकल करने और करवाने तथा किसी भी तरह से परीक्षा से कुछ घंटे पहले पेपर पाने के खेल में छात्रों के माता-पिता भी हाथ आजमाने से नहीं घबराते। अधिकांश अभिभावकों का एक ही मकसद होता है कि किसी भी तरह से अपने बच्चों को परीक्षा में सफलता दिलवाना। इसके लिए वे किसी भी हद तक गिरने को तैयार हो जाते हैं। कोरोना की महामारी के दौरान जब स्कूल, कॉलेज बंद थे। लैपटाप, कम्प्यूटर, मोबाइल के माध्यम से पढ़ाई और परीक्षाएं हुईं तब ऐसे कम ही अभिभावक थे, जिन्होंने नकल को अपने बच्चों की सफलता का हथियार न बनाया हो। यूं तो हर परीक्षा केंद्र में मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा और चस्पा रहता है कि परीक्षा में नकल करना पाप है। नकलची छात्रों का भविष्य अंतत: अत्यंत अंधकारमय होता है, लेकिन कई कोचिंगबाज शिक्षक नकल करवाने के कीर्तिमान रचते देखे जाते हैं। यही कारोबारी शिक्षक पेपर लीक करने वालों से भी मिले रहते हैं। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के अकोला में बारहवीं की परीक्षा के पहले पेपर में बहन को कॉपी दिलाने के लिए भाई पुलिस की वर्दी पहनकर सीधे परीक्षा केंद्र जा पहुंचा। बहन को नकल कराने के लिए नकली पुलिस बने इस भ्राता ने वहां पर मौजूद असली खाकी वर्दीधारी अफसर को बड़े अदब के साथ सलाम भी ठोका। अफसर ने जब उसे गौर से देखा तो पाया कि उसकी वर्दी पर लगी नेमप्लेट गलत है। उसकी तलाशी ली गई तो उसके पास से अंग्रेजी विषय की एक कॉपी मिली। जेल जाने के भय से वह फूट-फूट कर रोने लगा। आज की तारीख में देशभर में ऐसे कई पुलिस अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, प्रिंसीपल, प्रशासनिक अधिकारी हैं, जिन्हें नकल ने अपनी मनचाही मंजिल तक पहुंचाया है। यह नकली असली पर बहुत भारी हैं।

Thursday, February 22, 2024

खरीद-फरोख्त की मंडी

    नेता बड़ी तेजी से अपना रंग बदलने लगे हैं। इनका कोई भरोसा नहीं। आज इस दल में तो कल पता नहीं किस दलदल में। जनता को भ्रम में रखने का इन्हें खूब हुनर आता है। झूठ पर झूठ बोलने में भी इनका कोई सानी नहीं। दस-बीस नेता फरेबी होते तो बात आयी गयी हो जाती, लेकिन यहां तो इस मामले में भी प्रतिस्पर्धा चल रही है। लोगों का माथा चकरा रहा है। कल तक जो घोर शत्रु थे, अछूत थे, झूम-झूम कर उन्हें गले लगाया जा रहा है। देश के हुक्मरान भी किधर जा रहे हैं? कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मेल-मिलाप के इस अजूबे खेल ने वोटरों को असमंजस की जंजीरों में जकड़ कर रख दिया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के किले को खंडहर में तब्दील करने के जो मंजर नज़र आ रहे हैं, उनकी तो कल्पना ही नहीं की गई थी। जो नींव के पत्थर थे, वही खिसकते जा रहे हैं। दूसरे दलों के दिग्गज नेता भी भाजपा के जहाज की सवारी के लोभ में अपनी पुरानी कश्तियों में छेद कर उन्हें बड़ी बेशर्मी से डुबो रहे हैं। 

    कुछ ही हफ्तों के बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी भाजपा की तूफानी जीत का दावा करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति भी किसी पहेली से कम नहीं। देश की आम जनता मान चुकी है कि देश में कोई भी चेहरा मोदी जितना दमदार नहीं। विपक्ष जितना बेबस और बेचारा आज दिख रहा है, वैसा पहले कभी नहीं दिखा। दिखावे के तौर पर वह कुछ भी दावे करता रहे, लेकिन संपूर्ण विपक्ष जानता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी दाल नहीं गलने वाली। फिर भी मैदान में उतरना जरूरी है। नहीं उतरेंगे तो हंसी के पात्र बनेंगे। भविष्य चौपट हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार कहते नहीं थकते कि देश के सजग मतदाता भाजपा को 370 सीटों पर विजयी बनाने के साथ-साथ एनडीए को 400 के पार पहुंचा कर विपक्ष के होश ठिकाने लगायेंगे। ऐसे में प्रश्न यह है कि जब उन्हें इस कदर भरोसा है तो इधर की ईंटों और उधर के रोढ़ों को क्यों अपने साथ जोड़े जा रहे हैं? विपक्षी पार्टियों के नेताओं के काले अतीत को नजरअंदाज करने की पीछे कौन से मजबूरियां हैं? भाजपा तथा मोदी की साम, दाम, दंड और भेद की रणनीति कहीं उनकी अंदर की घबराहट का प्रतिफल तो नहीं? प्रधानमंत्री जीत का कोई भी रास्ता नहीं छोड़ना चाहते। हर बाधा को दूर कर लेना चाहते हैं? इसलिए सभी के लिए दरवाजे खोल दिए गये हैं! जगजाहिर बेइमानों को भी मालाएं पहनाकर तहेदिल से गले लगाया जा रहा है। जिन विधायकों, मंत्रियों, सांसदों के काले कारनामों के विरोध में कभी शोर मचाया करते थे, उनके गले में भाजपा का दुपट्टा पहनाना मोदी के कद को कहीं न कहीं घटा रहा है। यह अलग बात है कि इस तमाशे को राजनीति की रणनीति कहकर पल्ला झाड़ लिया जाए, लेकिन सजग भारतीयों को भाजपा का यह चलन अंदर ही अंदर चुभ रहा है। आहत और निराश तो भाजपा के वो नेता और समर्पित कार्यकर्ता भी हैं, जिन्हें अपनी पार्टी की यह नीति डराने लगी है। उन्हें अपनी वर्षों की मेहनत पर पानी फिरता नजर आने लगा है और भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। उनके मन में बार-बार यह विचार भी आता है, जिस तरह से उनकी पार्टी खरीद-फरोख्त की मंडी में तब्दील हो रही है। सत्ता की सुरक्षा के लिए अशोभनीय समझौते करती चली जा रही है, तो ऐसे में उस विचारधारा और सिद्धांतों का क्या होगा, जिनके लिए उसे मान-सम्मान मिलता रहा है। अपनी पुरानी पार्टी को छोड़ नयी पार्टी में शामिल होकर दुपट्टा ओढ़ने वाले अधिकांश नेताओं की तिजोरियां नोटों से लबालब हैं। मतदाताओं को लुभाने और कार्यकर्ताओं को अपने पाले में लाने के हर गुर में यह धुरंधर पारंगत हैं। चुनावो में पानी की तरह धन बहाना इनके बायें हाथ का खेल है। अपने देश भारत में चुनावी लड़ाई अब पैसे वालों का मनोरंजक खेल भी बन चुकी है। कोई भी सरकार चुनावों में पैसों के दानवी खेल को खत्म नहीं करना चाहती। सरकारों को आखिर चलाते तो नेता ही हैं, जिन्हें अपना बहुमूल्य वोट देकर वोटर सांसद और विधायक बनाते हैं। यह सच अपनी जगह है कि बाद में वे उन्हें भूल जाते है और व्यापार की डगर अपनाते हैं। अभी हाल ही में मेरे पढ़ने में आया कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओबिन की चुनाव के दौरान जिन रईस दोस्तों ने आर्थिक सहायता की थी, बाद में उन्हीं को धड़ाधड़ सरकारी ठेके हासिल हुए और देखते ही देखते वे देश के सबसे अमीर शख्स बन गए। शातिर चतुर और चालाक लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि शीर्ष नेताओं से दोस्ती कितनी-कितनी फायदेमंद होती है। यह नजारा भारत में भी बड़ा आम है। यह कलमकार ऐसे विधायकों, मंत्रियों को जानता है, जो अपने करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों तथा समर्पित कार्यकर्ताओं को सरकारी ठेके दिलवा कर उनकी बदहाली को खुशहाली में बदलने का काम करते हैं। इन चुने हुए जनप्रतिनिधियों के यहां चम्मचों की भीड़ लगी रहती है। उनकी खास कैबिन में शराब, खनिज और तरह-तरह की लूट का धंधा करने वाले खूंटा गाड़ कर जमे रहते हैं। आम जनता से मिलने के लिए ‘साहेब’ के पास वक्त ही नहीं होता।